Thursday, 16 July 2020

विमर्श-छत्तीसगढ़ी भाषा मा --गणित ,विज्ञान, समाजिक अध्ययन,भूगोल, होंदी आदि विषय के अनुवाद के जरूरत*




विमर्श-छत्तीसगढ़ी भाषा मा --गणित ,विज्ञान, समाजिक अध्ययन,भूगोल, हिदी आदि विषय के अनुवाद के जरूरत*


     अनुवाद के जरूरत परथे  अपन भाषा के भंडार भरे बर , ज्ञान , विज्ञान , धर्म , राजनीति , सामयिक सन्दर्भ के जांनकारी बढोये बर ..।   संसार के जतका भाषा हे समय , सुजोग , जरूरत के मुताबिक आने  भाषा के कृति मन के अनुवाद करथें  एहर ज्ञान के विस्तार के तरीका आय ।
   अनुवाद के तीन प्रकार  माने गये हे ....
  1 भावानुवाद ....विषय वस्तु उही रहिथे भाषा अपन रहिथे
 2  शब्दानुवाद ....समानार्थी शब्द के अनुसार अनुवाद
 3 छायानुवाद  .....मूल भाव ल अपन भाषा मं अभिव्यक्त करना ..।
        छत्तीसगढ़ी मं तीनों तरह के अनुवाद के जरूरत हे , अभियो जौन अनुवाद होवत हे हमर भाषा भंडार ल बढ़ावत हे फेर सुरता राखे बर परही के जेन भाषा के लिपि , कथन  शैली , विषयवस्तु सब कुछ ल हम बने बने समझ सकत हन ओकर अनुवाद के जरूरत काबर पर गे ?
रहिस बात पाठ्यक्रम के विषय मन के छत्तीसगढ़ी मं अनुवाद करे के ...त ...
1 ...विषय विशेषज्ञ मन के सहायता लेना परही काबर के तकनीकी शब्दावली मन के छत्तीसगढ़ी शब्द नई मिलय ..जोर जबरन आने भाषा के शब्द ल तोड़ मरोड़ के छत्तीसगढ़ी बनाना बेमानी हे ...प्रतिदिन ...परतीदिन ।  स्टेशन ...इसटेसन ..
नहीं वो शब्द ल स्वीकार करव ...हिंदी हर कई भाषा के शब्द मन ल अपनाये हे ...।
2 गणित बर तो संसार हर मीट्रिक प्रणाली  ,  अंग्रेजी के गणना  ल अपना ही  लिये है ...कॉस , थीटा , दशमलव आदि त छत्तीसगढ़ी मं भी तो अपनाये च ल परही ।
3 विज्ञान के शब्द कोशिका , मेटाबॉलिजम , ओज़ोन , ऊर्जा अउ बहुत अकन शब्द हे अनुवाद करत समय  जस के तस लिखे बर परही ।
4  अनुवाद कोनो भी भाषा ले छत्तीसगढ़ी मं करे जावय ...मूल रचना के विषय वस्तु ल जस के तस रहन देवव ।

सरला शर्मा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

मोर खियाल मा कोनो भी विषय के अनुवाद कराई हा मुश्किल बूता नईये...! बात
अतका जरुर हे के अनुवाद करईया कोन हे....? अनुवाद ओखर मेर नई हो सकय जेन बचपन ले अपन
पिता के सँग गाँव ला छोड़ सहर मा बसगे ....माता पिता सहर मा आतेच छत्तीसगढ़ी ले लाज के मारे परहेज करे लागिस अऊ लईका घलो के नता अपन महतारी भाखा ले टूट गे..कहूँ थोर बहुत सुरतो रहिगे तव हिंन्दी लहजा के सँग मिंझरके ....! पढ़ाई लिखाई तो फेर छत्तीसगढ़ी ले दुरिहा रहेच हे...भगवान सहरे मा ओखरो नउकरी लगवा दिस ...अब छत्तीगढ़ी
से कोनो मतलबे नई रहिगे..
जरुर नाव करे बर छत्तीसगढ़ी मा कई बछर ले लिखत हे ...कतको किताब छपगे लकिन वो सिरजन मा छत्तीसगढ़ीहा रस नई रहिगे
अब अईसन के अनुवाद कईसे रईही ...?
चाहे कोनो भी विषय होय ...
कोई दिक्कत नई ये ...
दिक्कत उहें आही जिहाँ हमर अपन कमजोरी रईही ....
फेर अनुवादेच मा हम काबर अँटके रहिबो ....जईसे गुरुदेव कहिन के ...नवाँ भी तो लिखे जा सकत हे ...!

राधेेशयाम पटेेेल
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

शोभमोहन श्रीवास्तव: छत्तीसगढ़ी भाषा मा विज्ञान भूगोल अउ तकनीकी विषय के अनुवाद ऊपर बने गुनान होवत हे ।

फेर कुछ प्रश्न जेन मोर मन मा हे ।

1/ हमन तकनीकी विषय के अनुवाद काबर करना चाहथन ?
2/अनुवाद के उद्देश्य अउ आवश्यकता का हे?
3/तकनीकी विषय के अनुवाद  करके हमन छत्तीसगढ़ी के विकास कइसे कर सकथन ?
4/ छत्तीसगढ़ी मा श्रेष्ठ साहित्य अउ परिष्कृत शब्दभंडार के बिना  प्रभावी अनुवाद कइसे संभव होही ?
5/का सबले आगू छत्तीसगढ़ी ला स्कूली शिक्षा मा पहिली ले 12वीं तक एक अनिवार्य विषय के रूप मा शामिल करे के उरथी (शूरुआत)बर प्रयास नहीं करना चाही ?

काली कुछ अनुवादित साहित्य पढ़े बर मिलिस जेन मा आदरणीय भाई सुशील भोले जी के द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी जी के रचना के अनुवाद मा छत्तीसगढ़ी के लहजा संग सार्थक अनुवाद बन पड़िस हे, छत्तीसगढ़ी मा अइसने अनुवाद होना चाही तभे छत्तीसगढ़ी के शब्दसामर्थ्य के पता लगही ।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 संज्ञा के अनुसार ही क्रिया के उपयोग पूरा छत्तीसगढ़ मं होथे ...क्रिया विशेषण के उपयोग  करत बेर आंचलिकता के प्रभाव दिखथे विशेषकर बस्तर यानि दंडकारण्य के छत्तीसगढ़ी हल्बी , गोंडी , भतरी  मन मं ...साहित्य के सबो विधा मं  अनुवाद ल जगह देवव ...धीरे बाने छत्तीसगढ़ी भाषा के परिष्कृत रूप उभर आही ।
   अभी ध्यान देहे लाइक जरूरी बात एहर हे के पाठ्क्रम के विषयानुसार अनुवाद सरकार के जिम्मे करना चाही फेर हमरो तो योगदान जरूरी हे जेकर से जतका बनय ..संगवारी मन जब सेतुबंध बांधे गिस त गिलहरी अपन पूछी मं कुधरा लपेट के डारत रहिस ...। हमर बीच मं कई झन बुधियार साहित्यकार हें जिनमन आने भाषा के  अच्छा अध्ययन करें हंवय त  उनमन से मोर निवेदन हे कि गम्भीर लेखन के अनुवाद करयं , कई झन सक्षम हें विषयवार अनुवाद करे के त उनमन से भी निवेदन हे ...।
   आज अनुवाद ऊपर विचार विमर्श हर नवा दिशा डहर इशारा करत है , बिनती हे सबो झन अपन विचार लिखव ...। आठवीं अनुसूची , पाठ्यक्रम आदि ले अलग हटके सोचव के छत्तीसगढ़ी भाषा के भंडार भरे बर अनुवाद के महत्ता कतका हे , काबर  हे ?

सरला शर्मा
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया- छत्तीसगढ़ी भाखाँ म अनुवाद

            छत्तीसगढ़ के धर्म संस्कृति, नाचा, गम्मत, गीत कविता, खेत खार, काम बुता के कोनो सानी नइहे। अउ एखर लिखित पोथी के घलो कमी नइहे। चाहे पुरखा मनके कलम होय, चाहे नवा कलमकार संगी मनके, सबके कलम ये सब म खूब चले हे। अउ अभो चलत हे। हम सबके ध्यान  साहित्य कोती हे, अउ साहित्य म गद्य अउ पद्य के रचना चलत हे, अब हर विधा(कथा,नाटक, यात्रा) म रचना घलो होवत हे। फेर विज्ञान, गणित, भूगोल म नही।
*का छत्तीसगढिहा बिन हिसाब किताब के जिथे, का उँखर जिनगी म गणित नइ होय, का ओमन विज्ञान, भूगोल, सामाजिक विज्ञान बिन रथे? त आज तक ये मन म लिखित समाग्री काबर नइ आइस? एखर एके जवाब हे जरूरत नइ पडिस। फेर आज जरूरत महसूस होवत हे। मनोरंजन बर गीत कविता कहानी कन्थली भरे पड़े हे, फेर पाठ्यक्रम या ज्ञान विज्ञान के पोथी कमती हे। लिखई पढ़ई बर सबे विषय जरूरी हे। *हमर कलमकार संगी मन सशक्त हे, ज्ञान विज्ञान भूगोल गणित सबे ल अपन महतारी भाँखा म अनुवाद कर सकथे, अउ मौलिक घलो परोस सकथे।* हमर छत्तीसगढिहा समाज विस्तृत अउ विशाल हे, जेखर जीवन म गणित भूगोल विज्ञान  अर्थेशास्त्र, राजनीति सबे समाहित हे, त सबे म लिखई हो सकथे, बशर्ते ओखर मांग होय, उपयोग होय, सरकार निर्देशित करय, लिखइया मान सम्मान पाय।

*विज्ञान के एक उदाहरण* - गोलू पतंग ल अगास म उड़त देख अपन ददा ल पूछिस, ददा ये पतंग हवा म कइसे उड़थे? का एखर जवाब हमर भाँखा म अलग हो सकथे का, उही विज्ञान के नियम लागू होही। त लिखे म कोनो परेसानी कइसे होही? *हाँ कुछ टेक्निकल शब्द मन हिंदी अँग्रेजी हो सकते। अब येमा घलो ठेंठ ठेंठ रटत रहिबो, त हँसिया के बेंठ हो जबों, कहे के मतलब भाँखा के प्रति उदारवादी होय बर पड़ही*।

          हमर जुबान म सबे चीज हे,  अब जरूरत हे त ओला लिखित रूप म लाने के। एखर बर एक घाँव अउ दोहरात काहत हँव, ओखर माँग होय। *मैं स्वार्थी होत अपन बात काहत हँव, मैं काबर गणित ,विज्ञान, भूगोल लिखँव? का ये लिख मैं साहित्यकार, या कवि कहलाहूं? का कोनो मोर, लिखे गणित, विज्ञान,भूगोल ल मंच ले सुनही? का मोर नाम गाँव घलो होही? नही न, त मैं काबर 10,15 हजार खर्चा करके एखर पुस्तक छपवाँव ददा? हाँ कोनो कही त जरूर महिनत करहूँ?*
        शिक्षा आयोग,या सरकार छत्तीसगढ़ी ल बढ़ावा देय,ये भाँखा के ज्ञानी गुनी मनके मान सम्मान करें, पद पदवी(नोकरी चाकरी) घलो छत्तीसगढ़ी लिखइय्या पढइय्या ल मिले। ताहन देख कइसे नइ बाढ़ही, हमर छत्तीसगढ़ी। *आज हम सब मनखे मन स्वार्थी हो गे हन ,मैं जानत हँव मोर, अउ मोर असन कतको झन के लइका मन छत्तीसगढ़ी लिख पढ़ डारही, तभो वोला नोकरी चाकरी या जीवन यापन में मदद बर कुछु नइ मिलय, त काबर वोला जबरजस्ती पढ़ाय लिखाय। हाँ यदि सरकार या सभ्य समाज रोजगार या मान धन देतिस त मार पीट के पढ़ातिस।* फेर अइसनो नइहे । ददा दाई के बोली भाँखा ल लइका मन बरोबर सीखत हे, लिखत हे, अब जरूरत हे, त ये भाँखा के सरकारी अउ व्यवसायिक क्षेत्र म पहल करे के। ताकि माँग अउ बढ़े।

  मोर विचार से जमे विषय के अनुवाद करे जा सकथे, फेर आँख कान मूँद के नही, बने जांच परख अउ गुण ज्ञान ल सकेल के भिड़े बर पड़ही। थोरिक उदारवादी भाँखा म दिखाये बर पड़ही। कोनो भी भाखाँ के अनुवाद बर वो दुनो भाँखा के जानकारी अउ जानकार  होना दुनो जरूरी हे। तभे सही अनुवाद सफल होही। *एक बात अउ कि ऐसी के आघु म बइठ के जेठ के घाम के वर्णन करई अउ जेठ के घाम म तप के लिखई बतई, दुनो म अंतर होबेच करही।* केहे के मतलब मोती पाय बर पइसा खरचना नही बल्कि समुंदर म डुबकी लगाय बर पड़ही।



जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

*विषय--छत्तीसगढ़ी भाषा मा --गणित ,विज्ञान, समाजिक अध्ययन,भूगोल, होंदी आदि विषय के अनुवाद के जरूरत*

-------------------------------------
आज पूरा देश मा स्कूली शिक्षा बर NCF 2005 के प्रावधान लागू हे। जेकर मुख्य   तीन ठन मुख्य बिंदु हे--
1 बिना बोझ के शिक्षा (लर्निंग विदाउट बर्डन)
2 प्राथमिक शिक्षा ल बच्चा के मातृभाषा म देना
3 बच्चा के स्कूली शिक्षा ल बाहर के जीवन ले जोड़ना

   इन प्रावधान के बिंदू क्रमाक 2  म विचार करे जाय त साफ हे कि जब *मातृभाषा म शिक्षा देना हे* त कोनो विषय (गणित, हिंदी ----आदि) बर अनुवाद के जरूरत बिल्कुल नइये। इन विषय मन के पाठ *मौलिक रूप से लिखे जा सकथे।*
पाठ मन मा का का रहना चाही एहू बात ल NCF 2005 म बताये गे हावय। इहाँ दू समस्या के चर्चा होथे--
1  का वैज्ञानिक शब्दावली ल छत्तीसगढ़ी म लिखे जाय?
     मोर विचार ले वो शब्द मन ल ओइसने के ओइसने रखे जाय अउ ओला छत्तीसगढ़ी म समझाये जाय ।जइसे *चुम्बकत्व*(चुम्बक के इँचे के ताकत)
*गुणन फल*(गुना करे के बाद मिले उत्तर)----------आदि।
*माँ*( एला माता , दाई, दई, महतारी----- आदि घलो कहिथन । लइका अपन परिवेश के शब्द म समझ जही।
पूरा संसार म कोनो भाषा होवय *एके वैज्ञानिक शब्दावली के प्रयोग करे जाथे।* भले वोला सम्बंधित देश/जगा अनुसार भाषा म विश्लेषित करे जाथे।
2  छत्तीसगढ़ी के मानक रूप नइये------
हाँ अभी तक सिरतोन म नइये। फेर एकर *तत्कालिक निदान हे।* *छत्तीसगढ़ी के जेन रूप ह जादा ले जादा क्षेत्र म बोले अउ समझे जाथे ओला अपनाये जाय*
    *अभी रेडियो , टीवी म छत्तीसगढ़ी के जेन रूप के प्रयोग करे जावत हे। वो ए खाँचा म फिट हो सकथे।*
          NCF 2005 के एहू कहना हे कि उच्चतर माध्यमिक/ कालेज स्तर म बच्चा चाहे त अपन *रुचि अनुसार* अन्य भाषा सीख सकथे।
   ए स्तर म जाके अन्य भाषा म व्यक्त ज्ञान ल(किताब मन ल ) अनुवाद करे जा सकथे।

    *जब हम छाती ठोंक के कहिथन कि-हमर महतारी भाषा कोनो ले कमतर नइये। सब भाव ल व्यक्त कर सकथे त हिम्मत देखाके अउ मेहनत करके छत्तीसगढ़ी भाषा म पाठ्यक्रम गढ़े जा सकथे। अनुवाद के जरूरत नइये।*

चोवा राम 'बादल'
हथबन्द, छत्तीसगढ़

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

छत्तीसगढ़ी भाषा में पुरा पुरा पढ़ाई अभी नइ होय के परमुख कारण सबो दर्जा बर पढ़े के साधन समागरी के अभाव हरे|
विषय वस्तु भरपुर मातरा में नइ लिखाए ले | पाठ्यक्रम कैसे बन सकही |ओकर बर मूल भाषा साहित्य, भूगोल , विज्ञान , गणीत , सामाजिक विज्ञान, सबो ल लिखे बर परही चाहे अनुवादित करे बर लगही|
   *शिक्षा विभाग ले जुड़े हवन 13 बछर होगे भौतिक पढ़ावत हवन*, गाँव म  हवन | जिला म अपन बिषय म परबोधक हँवन| जरूरत पड़े ले न्यूटन ,आइंस्टीन फैराडे के नियम , सिद्दांत ल छत्तीसगढ़ी म घलो समझाथन| जादा अनुभव तो नइ हे फेर कुछ बदले ले बदल सकत हे संभावना भर पुर हे| टैलेंट के कमी नइ हे |
पर सरकारी , परशासनीक सिस्टम म बैठे लोगन नइ चाहँय |
राज भाषा के दरजा कैसे दे दे गए हे| *छत्तीसगढ़ी बोली के ज्ञान हे के नी लोक सेवा आयोग के परीक्षा म 100 अंक के पुछे जावत हे ऐखर ले आप  छत्तीसगढ़ी भाखा* के  महत्ता ल जान सकत हव| आमने सामने पूछे वाले *साक्षात्कार म घलो* छत्तीसगढी़ भाखा ले जानकारी ,गोठ बात ले प्रश्न ,सवाल जवाब ,पुछे जथे| मानक छत्तीसगढ़ी के संगरहन घलो करे जा चुके हे|
मानक उत्तर के परकासन होथे|

 *नवमी, दसमी गियारवी, बारवी म हिन्दी भाषा संग मिझरा छत्तीसगढ़ी पढ़ाय जावत हे|*
पहली ले पाँचवी तक घलो महतारी भाखा ले पढ़ई होवत हे| छेत्र बिशेष म हलबी,भतरी , डोरली स्थानीय बोली भाख म घलो पहली ले आठवी तक पढाय जावत हे|
ये मा विज्ञान, गणित  ल घलो महतारी भाखा ले पढा़य जावत हे|
  *बिग्यानिक अउ तकनीकी बिषय मन* ल जस के तस रख के महतारी भाखा म समझाय सीखाये जावत हे|
  संसाधन ल बढा़य के जरूरत हे|
 *बस्तर संभाग म भासा *सीखाये के ** *तकनीकी ले समरिद्ध भाषा केन्द्र* घलो* खोले* जा चुके हे|
    कुछ अच्छा काम तो होय हे ,पर आप मन सुने हव जानत हव **कुछ जिलाधीश मन छत्तीसगढ़ी* म समस्या सुने के, अवेदन देके घलो सुरुआत करे रहीन |
 धीरे धीरे सबो बिसय के लेखन अउ जरूरत होय ले अनुवाद करे जा सकत हे| *मजबूत मानसिकता अउ नीयत के* बात हे|
    *आई एस के परीक्षा म अपन भाषा म लिखइया तेलगू , मलयाली ,तमील* अउ अभी अभी हिन्दी भाषी परीक्षारथी मन के* जादा अवसर बने हे| त *का छत्तीसगढ़ी भाखा ल* व्यापक होय ले अइसने सफलता नइ मिलही |
अभी संघर्ष के समे काल हे|
अवइया बेरा बहुत उज्जर हे|

 अश्वनी कोसरे
 कवर्धा कबीरधाम
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

*छत्तीसगढ़ी भाषा मा "गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, भूगोल, हिन्दी आदि विषय" के अनुवाद के जरूरत*

       छत्तीसगढ़ी भाखा अपन आप मा पूर्ण हावय अउ एला हम मूल रूप मा गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, भूगोल, हिन्दी आदि विषय"  ला लिखे जा सकथे। *मन चंगा त कठौती मा गंगा* अगर हमन प्रयास करबो ता काबर पूरा नई होही। सरकार ला जरूत हे ता लिखइया मन ला उचित मान सम्मान अउ मेहनत के उचित मान देय। अनुवाद के जरूरत " परत हावय त ओहू काम ला करे जा सकत हावय। फेर मूल शब्द ला जस के तस रखना या लेना हावय। मँय आदरणीय सरला दीदी जी के बात मा सहमत हावय। हमन आ तकनीकी नाम, वैज्ञानिक नाम अउ मूल नाम न बिगाड़के जौ के त्यौ रख बाकी ला छत्तीसगढ़ी भाखा मा मौलिक लिखे जाय। सब्बो ला अनुवाद जैसे के तैसे करे मा बनावटी लगही।

          हमर छत्तीसगढ़ी मा गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, भूगोल, हिन्दी आदि विषय" तैयार नई होही ता पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी भाखा ला कइसे सामिल करही एहू एकठन सवाल हवे। सबले पहली पाठ्यक्रम बर सब्बो विषय ला छत्तीसगढ़ी भाखा मा तैयार करे बर परही। फेर सरकारी सहयोग के बिना सम्भव नई हावय।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

सबो विषय के छत्तीसगढ़ी मा अनुवाद के जरूरत बिल्कुल नइ हे,ये व्यवहारिक भी नइ हे। आदरणीय श्री रामनाथ साहूजी के विचार ले मैं पूर्णतः सहमत हँव कि-

*छत्तीसगढ़ी म अनुवाद करके पाठ्यपुस्तक नइ बनाय जा सके। वोकर बर पाठ्यपुस्तक के नवा रचना करना पडही*

छत्तीसगढ़ी विषय ल पाठ्यक्रम म ये प्रकार से लागू करे मा सहूलियत होही -

*1) कक्षा पहली ले स्नातक स्तर तक केवल एक विषय छत्तीसगढ़ी (विशिष्ट) पढ़ाये बर पाठ्यक्रम तैयार करके अनिवार्य रूप से पढ़ाय जाय। येमा छत्तीसगढ़ी के व्याकरण भी शामिल रहय*

*लइका मन जइसे अंग्रेजी (विशिष्ट) ,हिंदी (विशिष्ट) संस्कृत (विशिष्ट) पढ़थे वइसने एक विषय छत्तीसगढ़ी (विशिष्ट) पहली ले स्नातक स्तर तक पढाय जाय। स्नातकोत्तर म तो पढ़ई होबे करत हवय*

*2)  प्राथमिक स्तर मा पढ़ाई के माध्यम छत्तीसगढ़ी होना चाही (मौखिक रूप में) ।  ताकि लइका मन छत्तीसगढ़ी ल बोले बर सीख जाय खासकर  हिन्दी या अन्य भाषी लइका मन। गणित,विज्ञान आदि पुस्तक के अनुवाद के कतई जरूरत नइ हे।*


*3) माध्यमिक से हायर सेकेंडरी तक स्कूल के स्टाफ अउ क्लासरूम मा बोलचाल के भाखा अनिवार्य रूप से छत्तीसगढ़ी करे जाय पाठ्यक्रम जेन भाखा म हवय वोला उही भाखा म रहन दव लेकिन कन्वर्सेशन (गोठ बात) अउ समझाय के पूरा काम छत्तीसगढ़ मा होना चाही*

अजय अमृतांशु
भाटापारा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा मा दिये जाय ये NCF 2005 के प्रावधान मा हे।मोरो इही विचार हे कि हमर राज छत्तीसगढ़ मा घलो प्राथमिक शिक्षा हमर राज भाषा छत्तीसगढ़ी मा ही दिये जाय लेकिन येखर बर अनुवाद न करके
पाठ्यक्रम ला छत्तीसगढ़ी मा ही मौलिक रूप मा लिखे जाय ।संगे संग इहू बात के धियान रखे जाय कि टेक्निकल शब्द मन ला उही रूप मा अपना लिये जाय।माध्यमिक/उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बर छत्तीसगढ़ी माध्यम के अनिवार्यता नइ होना चाही काबर कि लइकन ला नीट ,जेईई जइसे कठिन काम्पटिटिव परीक्षा के तैयारी बारहवीं मा ही करे बर परथे अइसन मा छत्तीसगढ़ी माध्यम रहे ले हमर लइकन मन के पिछड़े के डर रइही।आज भी सरकारी स्कूल मा दूर दराज गाँव के या फेर गरीब घर के लइका पढ़त हे ।अइसन मा अतिक बड़े परीक्षा मा सफल होना उखँर बर अउ मुश्किल हो जही।रोजगार के समस्या, सरकारी नौकरी के कमी, प्राइवेट कंपनी मा नौकरी, रोजगार बर दूसर राज इहाँ तक विदेश घलो जाय ला परत हे त फेर सिर्फ छत्तीसगढ़ी मा शिक्षा दिये ले हमर गाँव गंवई के ,गरीब के लइकन मन के पछुवाय के डर बने रही काबर कि शहर के, अमीर घर के लइका तो तभो अंग्रेजी मीडियम पब्लिक स्कूलमा पढ़ही।


चित्रा श्रीवास
बिलासपुर छत्तीसगढ़

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

सरला शर्मा: भाषा अउ अनुवाद के संबंध
  
        मनसे के सुभाव होथे बने जिनिस , बने विचार , उपयोगी ज्ञान -  विज्ञान जहां ले मिलय सकेलथे ...आज के नहीं तइहा दिन ले ये चलागत चलत आवत हे ....।  आज हमन चिटिकन सुरता तो करिन अनुवाद के
  1 जर्मन साहित्यकार गेटे  कालिदास के संस्कृत कृति के अनुवाद करे रहिस ।
  2 रांगेय राघव हर शेक्सपीयर के हेमलेट , मैकबेथ असन कृति के हिंदी अनुवाद करे रहिस ।
 3 दारा शिकोह हर उपनिषद मन के फ़ारसी मं अनुवाद करे रहिस
4  गीतांजलि पहिली अंग्रेजी मं लिखे गये रहिस बाद मं बंगला मं गुरुदेव खुद अनुवाद करे  रहिन ।
 5 धन्य कुमार जैन पूरा रवींद्र साहित्य के हिंदी अनुवाद करे हंवय
 6 मिर्जा गालिब के दीवान के हिंदी अनुवाद हर ग़ज़ल के लोकप्रियता के अधार बनिस ...
  7 वैदिक ऋचा मन के अनुवाद स्वामी दयानंद
        छत्तीसगढ़ी मं भी संस्कृत से करे गये अनुवाद मिलत हे खुशी के बात आय इही पटल मं शकुंतला शर्मा द्वारा  करे गये अनुवाद हमन पढ़े  हन ।अनुवाद सिर्फ साहित्य के होवत आवत हे ये बात नोहय सुरता करव सर यदुनाथ सरकार के इतिहास के हिंदी अनुवाद , डिस्कव्हरी ऑफ इंडिया के अनुवाद  अउ बहुत अकन हवय ..गुने बर ये हंवय के हमर छत्तीसगढ़ी भाषा के भंडार भरे बर हमन ल कोन तरह के किताब में के अनुवाद करना चाही अउ ओकर महत्ता का हे ?
छायावाद के संस्थापक मुकुटधर पांडे असन गुनी -   मानी साहित्यकार जब मेघदूत के छत्तीसगढ़ी अनुवाद करिन त कहे रहिन के ये अनुवाद हर " छायानुवाद " आय काबर के छ्न्द बदले हे त प्रसंगानुसार शैली भी बदले हे फेर ये अनुवाद हर तो छत्तीसगढ़ी भाषा के भंडार भरबे  करीस न ?
अनुवाद  उपर विमर्श करत समय  एहू डहर धियान देहे बर परही ...ताकि महत्वपूर्ण  , ज्ञानवर्धक किताब - पोथी मन के छत्तीसगढ़ी मं अनुवाद करे जा सकय ।

सरला शर्मा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

अरुण कुमार निगम -छत्तीसगढ़ के शकुंतला शर्मा जी के कुछ किताब -
अभिज्ञान शाकुंतलम् के भाव-पद्यानुवाद,
रघुवंश के भाव-पद्यानुवाद, चाणक्य नीति के भाव-पद्यानुवाद,
विदुर नीति के भाव-पद्यानुवाद, ऋग्वेद सप्तम् अष्टम् नवम् अउ दशम् मण्डलम् के भाव-पद्यानुवाद (कुछ हिन्दी मा, कुछ हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी मा)

पढ़े के बादे पता चलथे कि अनुवाद बर गहन अध्ययन जरूरी होथे। हर वाक्य के भाव मा उतरे बर पड़थे, मेहनत करना पड़थे तब जाके वो अनुवाद एक धरोहर बन पाथे। ये सब ग्रंथ संस्कृत भाषा मा हें जिन ला मोर असन अल्प ज्ञानी न पढ़ सके अउ न समझ सके। हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी भाषा मा अनुवाद होए के कारण अब ये ग्रंथ मन पढ़े अउ समझे मा सरल होगें। ये जम्मो अनुवाद, पाठ्यक्रम मा शामिल होए के स्वार्थ मा नइ बल्कि साहित्य अनुरागी जम्मो आम मनखे के हित बर करे गेहे। हिन्दी कहानी के अनुवाद बर ज्यादा मेहनत के जरूरत नइ पड़े। छत्तीसगढ़ी जानने वाला मन ला हिन्दी भाषा पढ़े अउ समझे मा वइसे भी दिक्कत नइ होय।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
 
        *तकनीकी शब्द अउ उच्च शिक्षा बर छत्तीसगढ़ी उपयुक्त नइ*   
           गणित विज्ञान सामाजिक अध्ययन भूगोल हिंदी ए सब के नाँव सुनतेच साठ स्कूल अउ पढ़ई के गोठ बात चलत हे,अइसन समझे म कोनो देरी नइ होय।शिक्षा ह मनखे के विकास के जम्मो दुवार ल खोल देथे।विकास चाहे आर्थिक होय,सामाजिक होय, साँस्कृतिक होय,जम्मो किसिम के विकास शिक्षा ले ही हासिल होथे।शिक्षा देश अउ राज के नीति निर्धारण करइया सरकार अउ सरकारी तँत्र के मुताबिक दे जाथे।एक एक कक्षा बर उमर मुताबिक पाठ्यक्रम बनाके शिक्षा के योजना बने रहिथे।जइसन जइसन विषय तइसन तइसन उँखर अपन शबद रहिथें।हर विषय के शिक्षा बर अपन अपन मानक शब्द होथे।अउ बात ल स्पष्ट करे खातिर सरल भाषा अउ बोली के उपयोग लइका के स्तर म करे ले शिक्षा के उद्देश्य ल हासिल करे जा सकत हे।
      पाठ्यक्रम निर्धारण केन्द्र सरकार अउ राज्य सरकार के साझा योजना ले बनथे।अइसन म कोनो राज्य सरकार अपन भाखा बोली ल महत्तम दे  एमा जम्मो विषय ल अनुवाद कर तो सकत हें। अइसन करे ले उच्च शिक्षा खातिर बड़े सँस्थान जाय म दिक्कत हो सकत हे। जम्मो विषय के तकनीकी शब्दावली मन के अनुवाद नइ करे जा सके। अइसन म जम्मो विषय के छत्तीसगढ़ी अनुवाद ल मँय सही नइ मानँव।
*अनुवाद का अउ काखर होय*
        अनुवाद कहे ले समझ म आथे के एक भाखा के गोठ-बात ल दूसर भाखा म कहना।ए गोठ-बात तुरते होवत गोठ-बात के हो सकथे अउ लिखाय कोनो भी जरुरी दस्तावेज अउ जानकारी मन के घलुक। अनुवाद ले उन भाखा बोली ल नइ जनइया मन तक वो भाखा के गोठ-बात ल पहुँचाना ए। जानकारी कहे के मतलब लोकजीवन के साँस्कृतिक,पारम्परिक, रीत-रिवाज अउ मान्यता ले हे।जेखर से कोनो अउ क्षेत्र के लोकजीवन के अच्छाई के संग लोक साहित्य मन ल अपनाय म समाज के विकास के नवा रस्ता मिलथे।अनुवाद म ए बात घलुक हे कि ए हर मौलिक नइ होय।कोनो आने भाखा के मूल बात अउ विचार ल अपन भाखा-बोली म लिखे ले अपन भाखा बोली के साहित्य अउ खजाना बाढ़थे संगेसंग अपन भाखा बोली म वइसन लिखे बर प्रेरणा मिलथे।विषय अउ नवा उदीम घलुक सोचे बर मिलथे।बढ़िया बढ़िया भाव आथे।
         भाषाविद् मन  डाहर ले अनुवाद घला लोकहित ल ध्यान दे के होना चाही।मोर बिचार म समे अउ आज के माँग के मुताबिक साहित्य सिरजन होना चाही अउ अनुवाद घलुक।
*शिक्षा के उद्देश्य सिरीफ नौकरी होगे हे*
         आज शिक्षा के उद्देश्य सिरीफ अउ सिरीफ रोजगार रहिगे हे।रोजगार सबो ल जरूरी हे,फेर स्वरोजगार अउ पैतृक ल छोड़ सब ल सरकारी नौकरी चाही।एकर सेती सब अपन लइका ल आज अँग्रेजी माध्यम म पढ़ाय धर ले हे।पूरा समाज के सोच अँग्रेजी पढ़े ले नौकरी मिलही अइसन बनगे हवै।इही सोच के चलत छत्तीसगढ़ी के उपेक्षा होवत हे।भले अपन अँग्रेजी पढ़े मत जानय।जेन जानथे तेने अपन लोग लइका ल दुरिहा राखत हें।आज समय हे लोगन ल समझाय के कि नौकरी सबो ल नइ मिल सकै।शिक्षा के उद्देश्य सिरीफ नौकरी मत सोचव।आत्मनिर्भर बने के उदीम के आय।अपन सोच ल समय के संग सही रद्दा म बदले बर ए।
        *छत्तीसगढ़ी के संरक्षण प्राथमिक शिक्षा ले हे*
       अपन राज के लोक सँस्कृति परम्परा अउ भाखा-बोली के संरक्षण वो राज के जनता के भरोसा रहिथे।लोक व्यवहार ले भाखा जिंदा रहिथे।लोक व्यवहार म मया पिरीत के निर्वाह करत भाखा-बोली पोट्ठाथे।इही बात ल ध्यान रखत सरकार ल चाही कि प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा अनिवार्य ढंग ले राज के भाखा-बोली म करे जाय।जेखर से लइकापन ले छत्तीसगढ़ी ल बालमन म रोपे जा सकय।एखर बर त्रिभाषी म छत्तीसगढ़ी ल स्थान दिए जा सकत हे।
       अइसे भी बहुत समे ले अँग्रेजी पढ़ई छठवीं म शुरु होवत रहिस।आजो अइसन करके छत्तीसगढ़ी ल शामिल करे म कोनो दिक्कत नइ होही।जादा हे त एक विषय अउ पढ़ाय जा सकत हे।मोर मानना हे इही ढंग ले छत्तीसगढ़ी ल पोठ करे जा सकत हे।
   
*पोखन लाल जायसवाल*
पलारी बलौदाबाजार छग

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 मीता अग्रवाल:

छत्तीसगढ़ी मातृभाषा ला प्राथमिक शिक्षा  ले अनिवार्य विषय के रुप मा उच्च शिक्षा तक सामिल करे जा ही, तभे प्रभावी भाषा साहित्य के साहित्य कार के सबो पक्ष के ज्ञानात्मक  समग्र जानकारी जन जन ला सुलभ हो पाही।सकारात्मक प्रभाव ले छत्तीसगढ़ी भाषा के गंगा ,बरोबर प्रवाहित हो अपन महत्ता ला स्थापित  करही।लडकपन के बुद्धि मा सीखे ज्ञान स्थायी होथे।
कोई भी भाषा ला बोलना लिखना व्याकरण ज्ञान, साहित्य ज्ञान अपन उपादेयता ला सिद्ध  करथे।यदि अनिवार्य कर दे जाही तव वो राज के भाषा के अलग पहचान बनथे,रचनात्मकता घलव बाढथे।
पढते पढते माआसनी से प्रश्न उत्तर शैली के विकास मा सहायक  हो जाथे।भाषा के महत्व सिद्ध होथे।

मीता अग्रवाल रायपुर

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

शोभमोहन श्रीवास्तव:

छत्तीसगढ़ी ला माध्यम बनाय बर भावुक अपील अउ सतही चिंतन ले काम नहीं बन सकै , पहिली एक अनिवार्य विषय के रूप मा तो स्थापित करे बर प्रयास करना चाही , मैं आपके बात से सहमत हौं चित्रा जी आप स्वय प्रोफेसर हौं  शिक्षण प्रक्रिया ला बारीकी से जानथौ । छत्तीसगढ़ी ले अवइया पीढ़ी ला जोड़ना ही प्राथमिक उद्देश्य होना चाही । जेन मन घर मा अपन लोग ल इका मन संग छत्तीसगढ़ी नहीं बोलै तेने मन छत्तीसगढ़ी भाषा के अस्मिता बर व्याख्यान देथें । आज साहित्यकार  गँवइहा अउ अनपढ़ मनके सेती छत्तीसगढ़ी बाँचे हे । छत्तीसगढ़ी भाषा के सेवा करइया बहुत हे तेकर सेती छत्तीसगढ़ी हर बढ़वार करत हे जबकि विश्व में हर  दिन कोई न कोई भाषा मरत हे ।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

सरला शर्मा
: बोली हर जब भाषा के रूप धारण करथे वो समय वाचिक अउ शिष्ट दूनों तरह के साहित्य हर सहायक होथें  त क्षेत्रीय शब्द मन के प्रयोग  मं भिन्नता पाये जाथे काबर के कोस कोस पर बदलय पानी , चार कोस मं बदलय बानी कहे गये है , ये बदलाव मं  पत्र पत्रिका , अखबार , किताब  मन के भी प्रमुख भूमिका रहिथे संगवारी मन ! इही तथ्य ल ध्यान मं रख के हमन  आज लोकाक्षर पत्रिका के सम्पादक वरिष्ठ साहित्यकार श्री नन्दकिशोर तिवारी जी के योगदान के सुरता करत हन । उनला प्रणाम करके मोर छोटकुन प्रयास .....

               जिनगी के सुख -  दुख ल लिखत समाज के विसंगति मन ल उजागर करत वरिष्ठ साहित्यकार , लोकाक्षर के सम्पादक श्री नन्दकिशोर तिवारी जी के कलम पचास साल ले जादा समय होगिस सरलग चलत हवय फेर अभियो भोथराये नई हे । चीटिक देखव न उनकर लिखे " मोर कुंआ गंवा गे "  नाटक ल ....ये दे रे ...अभी कइसे देखिहव ? त चलव पढ़ लेवव ...।
  " इंकर सेवा ल कर अउ गोठ बात भर नहीं मार ल घलो खा ..। " देवकी के आरो आइस  तइसने नारी परानी के हाल पता चल गिस , नारी उत्थान के सबो पोल पट्टी खुल गिस ।  निरक्षरता के बोझा ढोवत तिहारु ल पढ़े लिखे पटवारी बुद्धू बना दिहिस बपुरा ह जाने च नई पाइस के कोन मनसे कब , कइसे , कतका पइसा झोंकिस ओहू कुंआ खनवाये के सरकारी अनुदान के रूप मं फेर कर्जा के सम्मन तो सही समय म  हबर गिस अब तुरूवा ठठावत हे ....दूबर बर दू असाढ़ काला कहिथें तेला जानिस सतवंती हर काबर के रिपोर्ट लिख़ौनी थानेदार साहेब हर ओकर एकलौता पचास के नोट ल मांग लिहिस । तिवारी जी सुरता करवा दिहिन के साहित्य हर समाज के दरपन आय  लेखक के ईमानदारी समाज के अनाचार के प्रति करतब घलो हर जग  -  जग ले उजागर हो गये हवय ।
 पटवारी के चरित्र चित्रण करत समय लेखक के कलम के धार  देखे लाइक हे , सोझुवा तिहारु के खेत ऊपर  भी नज़र गड़ाये रहिथे तभे तो कारखाना के मालिक के तरफदारी करत भुइयां महतारी ल बेचे के प्रस्ताव ले के तिहारु के दुआर मं हाजिर होये सकथे ...सफ़ल चरित्र चित्रण इही ल कहिथें ।
   माटी के मितान मन अपन हक बर , अन्याय के विरोध करे बर सकेलाथे " हम अपन भुइयां नई देवन , हमला न काम चाही न नौकरी चाही , हम जांगरटोर  कमाबो , फसल उपजाबो , हमला कारखाना नई चाही , जेकर चिमनी के कुहीऱा मं आंखी धुँधऱा जाथे ।"
     नाटक के सन्देस  /  उद्देश्य डहर तिवारी जी आघू चलिन भुइंहार मन के मन मां भुइयां बर प्रेम उमड़े लगिस । लचर -  पचर शासन व्यवस्था के पोल खुलिस । बेधड़क कलम चले हे जेकर बर तिवारी जी के कलम के जय बोले च बर परही ।
   नाटक  मं सूत्रधार अवई हर नाटक परम्परा ल आघू बढ़ाथे । रहिस बात भाषा के त तिवारी जी भाषा के धनी तो आय फेर पात्र के अनुकूल भाषा के प्रयोग उनकर विशेषता आय ।  छोटे छोटे , सार्थक संवाद मन कथानक ल ठीक दिशा मं आघू बढ़ावत चले हे । नाटक पढ़इया , देखइया मनसे के मनोभाव जुरत चले हे जेला साधारणीकरण कहिथें इही मेर सार्थक , सफ़ल होये हे ।
   प्रशासन के असहयोग ,  सुरसा के मुंह कस बढ़त  घूसखोरी , कारखाना के चौहद्दी मं समावत खेत खार ये सबो सामयिक
प्रसंग के उल्लेख ,  नाटक ल सफ़ल , सार्थक  बनाथे ।
  चलत हंव ..देखे ल तो परही के फेर कोनो पटवारी कोनो तिहारु तीर  अनुदान पत्र मं दस्तखत / अंगूठा तो नई लगवात हे ।।
अरे हां ...दूबर - पातर , चिक्कन चांदो " मोर कुंआ गंवा गे । "  नाटक मिले के जगह हे " वैभव प्रकाशन रायपुर
   धन्यवाद

सरला शर्मा
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

Tuesday, 14 July 2020

बड़े घर के बेटी(मुंसी प्रेमचंद)-(छत्तीसगढ़ी अनुवाद जगदीश "हीरा" साहू)

बड़े घर के बेटी(मुंसी प्रेमचंद)-(छत्तीसगढ़ी अनुवाद जगदीश "हीरा" साहू)

1.
बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार अउ नम्बरदार रहिस। ओकर बबा  कोनो बेरा बड़ धन-धान्य मा संपन्न रहिस। गाँव के पक्का तरिया अउ मंदिर जेकर अब मरम्मत घलो मुश्किल रहिस, उँकरे जस के खम्भा रहिस। कहिथे ये दुवारी मा हाथी झूमत रहय, अब ओकर जगा मा एकठन बुढ़िया भइँस रहिस, जेकर शरीर मा हड्डी पसली के सिवा अउ कुछु नइ बचे रहय; फेर दूध लगथे अबड़ देवत रहिस; काबर एक न एक मनखे हड़िया लेके ओकर मूड़ म चढ़े रहत रहिस। बेनीमाधव सिंह अपन आधी ले जादा जायदाद वकील मन ला चढ़ा डरे रहिस। ओकर वर्तमान आय एक हजार रुपये एक साल मा,  एकर ले जादा नइ रहिस। ठाकुर साहब के दू बेटा रहिस। बड़े के नाम श्रीकंठ सिंह रहिस। ओहा अब्बड़ दिन में मेहनत अउ उदिम के बाद बी.ए. के डिग्री पाय रहिस। अब एक दफ्तर मा नौकर रहिस। छोटे बेटा लालबिहारी सिंह दुहरी देंह के, सुग्घर जवान रहिस। भरे हुए गोल मुँह,चौड़ा छाती। भइँस के दू सेर ताजा दूध ओहा उठ के बिहनिया ले पी डरय। श्रीकंठ सिंह के दशा एकदम अलग रहिस। ये आँखी ला अच्छा लगइया गुण ला ओहा बी.ए. --इही दू अक्षर मा चढ़ा दे रहिस। ये दू अक्षर है ओकर शरीर ला निरबल अउ मुँह ला  कांतिहीन बना दे रहिस। एकरे खातिर वैद्यक ग्रंथमन मा ओकर विशेष मया रहिस। आयुर्वेदिक दवई मा ओकर अब्बड़ बिसवास रहिस। सँझा-बिहनिया ओकर खोली ले हमेशा खरल के सुग्घर कान ल अच्छा लगइया अवाज़ सुनाई देवत रहय। लाहौर अउ कलकत्ता के वैद्यमन ले बड़ लिखा-पढ़ी रहत रहिस।
श्रीकंठ ये अँगरेजी डिग्री ला पाये के बाद भी अँगरेजी समाजिक प्रथा बर विशेष लगाव नइ रहिस; बल्कि ओहा कईबार बड़ जोरदार ओकर निंदा अउ  तिरसकार करत रहिस। एकरे खातिर गाँव मे ओकर बड़  सम्मान रहिस। दसरहा के दिन मा ओहा बड़ मगन होके रामलील्ला होवय अउ खुद कोनो न कोनो के पात्र लेवत रहिस। गौरीपुर मा रामलीला के उही जनमदाता रहिस। पहिली के हिंदू सभ्यता के गुणगान करना ओकर धरम बर झुकाव के हिस्सा रहिस। समिलहा परिवार के ओहा एके झन मानने वाला रहिस। आज-काल नारी मन ला, परिवार ला परिवार मा मिल-जुल के रहना जेन ला अच्छा नइ लागे, ओला ओहा जात अउ देश दूनों बार  हानिकारक समझत रहिस। इही कारण रहिस कि गाँव के मनखे मन ओकर बुराई करय ! कोनो-कोनो  तो ओला अपन दुश्मन समझे मा घलो  संकोच नइ करत रहिस ! खुदे ओकर बाई घलो ला ये  बिसय मा ओकर ले विरोध रहिस। एहा एकर सेती नोहय कि ओला अपन सास-ससुर, देवर या जेठ मन ले घिनावत रहिस; बल्कि ओकर बिचार रहिस  कि कहूँ  अब्बड़ सहे अउ सम्मान दे के बाद भी  परिवार के साथ गुजर बसर नइ हो सकय, त रोज-रोज के झगरा ले अपन जिनगी खुवार करे ले अच्छा हे अपन खिचरी अलग राँधे जाय।
आनंदी एक बड़े उच्च कुल के लड़की रहिस। ओकर ददा एक छोटे-ले रियासत के ताल्लुकेदार रहिस। बड़ेज्जन घर, एकठन हाथी, तीनठन कुकुर, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेट अउ उधारी, जेन एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के खाये के समान हे सब उँहे रहिस। नाम रहिस भूपसिंह। बड़े दिल के अउ प्रतिभाशाली आदमी रहिस; फेर दुर्भाग्य ले बेटा एकोझन नइ रहिस। सात झन बेटीच बेटी अउ भगवान के किरपा ले सबो झन जिंयत रहिस। पहली खुशी-खुशी मा तो ओहा तीन घा बिहाव दिल खोलके  करिच; फेर पन्द्रा-बीस हजार रुपया के करजा मूड़ म चढ़गे, त आँखी चौंधियागे, हाथ ला सकेल लिच। आनंदी चौथइया बेटी रहिस। वह अपने जम्मो बहिनी ले जादा  रूपवती और गुणवती रहिस। एकरे सेती ठाकुर भूपसिंह ओकर ले अब्बड़ मया करत रहिस। सुग्घर लइका ला ओकर दाई ददा घलो अब्बड़ मया करथे। ठाकुर साहब बड़ा धरम-संकट मा रहिस कि एकर बिहाव कहाँ करन? न तो ये चाहत रहिस कि उधारी के बोझा बाढ़य अउ न ये मान सकता रहिस कि ओला खुद ला भाग्यहीन समझना परय। एक दिन श्रीकंठ ओकर सो कोनो चंदा के रुपया माँगे बर आइच। लगथे नागरी-प्रचार के  चंदा रहिस। भूपसिंह ओकर सुभाव मा मोहागे अउ धूमधाम ले श्रीकंठसिंह के आनंदी के साथ बिहाव होगे।
आनंदी अपन नवा घर मा आइच, त इहाँ के रंग-ढंग कुछ अउच दिखिच। जेन टीम-टाम के ओला ननपन ले आदत पड़े रहिस, ओहा इहां थोरको भी नइ रहिस। हाथी-घोड़ा के त कहना ही का, कोनो सजे  सुग्घर बहली घलो नइ रहिस। रेशमी चप्पल साथ मा लाये रहिस; फेर इहाँ बगइचा कहाँ। घर मा खिड़की घलो नइ रहिस, न भुइँया मा फरस, न भिथिया मा फोटू। एहा एक सीधा-सादा देहाती परिवार के घर रहिस ; फेर आनंदी हा थोरके दिन मा खुद ला ए नवा माहौल बर अइसे ढाल  लिच, जइसे ओहा रहिसी के सामान कभू देखे नइ रहिस।

2
एक दिन मँझनिया बेरा लालबिहारी सिंह दू ठन चिरई धरके आथे अउ भउजी ल कहिथे- जल्दी राँध दे एला, मोला भूख लागत हे। आनंदी खाना बनाके ओकर रद्दा देखत रहिस। अब ओहा नवा पकवान बनाये बर बैठिच। हड़िया मा  देखिस, त घीव पाव-भर ले जादा नइ रहिच। बड़े घर के बेटी, बचत ला का जानय। ओहा सब्बो घीव ला मांस मा डाल दिच। लालबिहारी खाये बर बइठिच, त दार मा घीव नइ रहय, त कहिथे- दार मा घीव काबर नइ डारे हच?
आनंदी हा कहिथे - सब्बो घीव मांस मा डाल देंव। लालबिहारी चिल्लाके कहिथे- अभी परनदिन घीव आये हे। अतेक जल्दी कइसे सिरा जाही?
आनंदी हा उत्तर दिच- आज तो बस पाव-भर ही रहिस होही। ओतका ल मँय हर मांस मा डाल देंव।
जइसे सुक्खा लकड़ी जल्दी  बर जथे, वइसने भूख मा तड़पत मनखे नान-नान बात मा भड़क जाथे। लालबिहारी ला भउजी के ए ढिठपना बहुत बुरा  लगिस, भड़क के कहिथे- अइसे लगथे मइके मा घीव के नदिया बोहाथे !
नारी गारी सहि लेथे, मार ला सहि लेथे; फेर मइके के निंदा ओकर ले नइ सहे जाय। आनंदी मुँह फेर के कहिथे - हाथी मरही  भी, तभो नौ लाख के। उँहा अतका घीव ला रोज नाउ-कहार मन खा जाथे।
लालबिहारी जल गे, थारी उठाके पटक दिच, अउ कहिथे--मन तो अइसे लगथे, जीभ ला धरके सुरर लँव।
आनंदी घलो ला गुस्सा आगे। मुँह लाल होगे, कहिथे - वो रहितिच त आज एकर मजा चखातिच।
अब अनपढ़, उजड्ड ठाकुर ले रहे नइ गिच। ओकर बाई एक साधारण जमींदार के बेटी रहिस। जब जी आवय, ओकर ऊपर हाथ साफ कर लेवय। खड़ऊँ उठाके आनंदी डहर जोर से फेंकिच, अउ कहिथे - जेकर घमंड मा भुलागे हच, उहू ल देख लुहूँ अउ तँहू ला।
आनंदी हा हाथ मा खड़ऊँ रोकिच, मूड़ बाँचगे; फेर अँगरी मा चोट आइच। गुस्सा के मारे हवा मा डोलत पत्ता कस कांपत अपन खोली मा आके खड़ा होगे। स्त्री के बल अउ हिम्मत, मान अउ मरयादा पति तक हे। ओला अपन पति के ही बल अउ पुरुषार्थ के घमंड होथे। आनंदी लहू के घूँट पीके रहि गे।

3
श्रीकंठ सिंह शनिच्चर के घर आवय। बिरस्पत के ये घटना होइच। दू दिन तक आनंदी कोप-भवन मा रहिच। न कुछु खाइच न पीच, ओकर रद्दा देखत रहय। आखिर मा शनिच्चर के ओहा नियम के अनुसार सँझा के बेरा घर आइच अउ बाहिर मा बइठ के कुछु एती-ओती के गोठ, कुछ देश-काल संबंधी समाचार अउ कुछु नवा मुकदमा आदि के चर्चा करे लागिच। ए गोठबात दस बजे रात तक होवत रहिच। गाँव के बने-बने मनखे मन ला को ये बात मा अइसे आनंद मिलय कि खाय पीये के सुरता घलो नइ रहय। श्रीकंठ ल उँकर ले पाछू छोड़ाना मुश्किल हो जाय। ये दू-तीन घंटा आनंदी बड़ मुश्किल मा काटिच! कइसनो करके खाय के बेरा आइच। पंचइती सिरागे। जब कोनो नइ रहिच, त लालबिहारी हा कहिथे -भइया, आप थोकिन भउजी ला समझा देहू कि मुँह सँभाल के बातचीत करे करय, नइ तो एक दिन अनरथ हो जाही।
बेनीमाधव सिंह हा बेटा डहर गवाही दिच -हाँ, बहू-बेटी मन के ये सुभाव अच्छा नइ होवय कि ओहा मरद मन ले जुबान लड़ावय।
लालबिहारी- ओहा बड़े घर के बेटी ये, तो हमु मन घलो कोनो कुर्मी-कहार नोहन।
श्रीकंठ हा चिंतित अवाज़ मा पूछथे- आखिर का बात होगे?
लालबिहारी  कहिथे - कुछु नइ होय हे; अइसने अपने आप उलझ गे। मइके के आगू मा हमन ला कुछु समझबे नइ करय।
श्रीकंठ खा-पीके आनंदी के तीर जाथे। ओहा दुखी बइठे रहय। ओकर हावभाव घलो तीखा रहिस। आनंदी हा पूछथे-- मन तो खुश हे ना।
श्रीकंठ कहिथे - अब्बड़ खुश हे; फेर तैंहा आजकाल घर मा ये का उधम मचा रखे हावच?
आनंदी के गुस्सा चढ़ जाथे, गुस्सा के मारे शरीर घलो जले लागिच। कहिथे - जेन हा तोला ये आगी लगा हे, ओला कहूँ पा जहूँ,  त ओकर मुँह ला हुरस देहूँ।
श्रीकंठ- अतेक गरम काबर होवत हावच, का होगे तेला तो बता।
आनंदी- का कइहँव, मोरे किस्मत खराब रहिस हे ! नइते गँवार छोकरा, जेला चपरासीगिरी करे के भी सहुर नइहे, मोला खड़ऊ मा मारके अइसन अकड़तिच।
श्रीकंठ- सब बात साफ-साफ बताबे, तो समझ आही। मैं तो कांही जानबे नइ करंव।
आनंदी--परनदिन तोर लाडला भाई हा मोला मांस राँधे बर कहिच। घीव हांडी मा पाव-भर ले जादा नइ रहिच। सब्बो ला मैं मांस मा डार देंव। जब खाय बर बइठिच त कहे लागिच - दार मा घीव काबर नइहे? बस, इही बात मा मोर मइके ला बुरा-भला कहे लगिच - मोर ले रहे नइ गिच। मैं कहेंव उँहा अतका घीव ला तो नाउ-कहार मन खा जाथे, अउ कोनो ला पता घलो नइ चलय। बस अतकेच बात मा वो अन्यायी हा मोला खड़ऊ मा फेंक के मारिच। कहूँ हाथ मा नइ रोके रहितेंव, त मोर मूड़ी फूट जतिच। उही ला पूछ, मैं जेन कहेंव, ओहा सच ये की झूठ।
श्रीकंठ के आँखी लाल होगे। कहिथे - इँहा तक होगे, ये छोकरा के ये दुस्साहस! आनंदी नारी सुभाव मा रोये लागिच; काबर कि आँसू उँकर आँखी के उपरेच मा रहिथे। श्रीकंठ बड़ा धैर्यवान अउ शांत आदमी आय। ओला कभूच कभू गुस्सा आवय; नारी के आंसू आदमी के गुस्सा भड़काये बर तेल के काम कर देथे। रात भर एती ले वोती करवट बदलत बितिच। गुस्सा के कारण नींद नइच आइच। बिहनिया अपन बाप सो जाके कहिथे - बाबू, अब ये घर मा मोर रहइ नइ हो सकय।
अइसन विद्रोह के बात कहे खातिर श्रीकंठ हा कई बार अपन कई सँगवारी मन ला को धुत्कारे रहिस; फेर दुर्भाग्य, आज उही खुद वो बात अपन मुँह ले कहत हे ! दूसर ला उपदेश देना बड़ सरल होथे!
बेनीमाधव सिंह घबरागे अउ कहिथे - काबर?
श्रीकंठ- एकर सेती कि मोला भी अपन मान--प्रतिष्ठा के कुछु चिंता हे। आपके घर मा अब अन्याय अउ हठ के  प्रकोप होवत हे। जेला बड़े के आदर-सम्मान करना चाही, वो ओकर मूड़ मा चढ़त हे। मैं दूसर के नौकरी करथंव घर मा नइ रहँव। इहाँ मोर पीठ पीछू मोर बाई पर खड़ऊँ अउ  पनही के बौछार होवत हे। कड़ा बात के चिन्ता नइ हे। कोनो एक- दो कहि सकथे, ओतका ला मैं सहि सकत हँव, फेर ये कभू नइ हो सकय कि मोर ऊपर कोनो मारपीट करय अउ मैं चुप रहँव।
बेनीमाधव सिंह कुछु जवाब नइ दे सकिच। श्रीकंठ हमेशा ओकर आदर करत रहिस। ओकर अइसन तेवर ला  देखके बुढ़वा ठाकुर अवाक रहिगे। बस अतके बोलिच - बेटा, तँय बुद्धिमान होके अइसन बात करत हच? नारी मन अइसने घर के नाश कर देथे। ओला जादा मूड़ी मा चढ़ाना ठीक नइ होवय।
श्रीकंठ- मैं अतका जानथंव, आपके आशीर्वाद ले अइसन मूरख नोहँव। आप खुदे जानथव कि मोरे समझाय-बुझाय ले, ए गाँव के कई घर सँभल गे, फेर जेन नारी के मान-प्रतिष्ठा के ईश्वर के दरबार मा जिम्मेदार हँव, ओकरे बर अइसन घोर अन्याय अउ जानवर जइसे व्यवहार मैं नइ सहि सकंव। आप सच मानौ, मोर बर ये कुछु कम नइहे,  कि लालबिहारी ल  कुछु दंड नइ होय।
अब बेनीमाधव सिंह घलो गुस्सागे। अइसन बात अउ नइ सुन सकँव। कहिथे - लालबिहारी तोर भाई हे। ओकर ले जब भी भूल--चूक होही, ओला सजा दे, फेर...
श्रीकंठ—लालबिहारी ला मैं अब अपन भाई नइ समझंव।
बेनीमाधव सिंह- नारी खातिर?
श्रीकंठ—जी नहीं, ओकर क्रूरता अउ बुद्धि हीनता के कारण।
दूनों कुछ देर चुप रहिथे। ठाकुर साहब बेटा के गुस्सा शांत करना चाहत रहिस, फेर ये स्वीकार करना नइ चाहत रहिस कि लालबिहारी हा कोनो अनुचित काम करे हे। इसी बीच मा गाँव के अउ  कई सज्जन मन  हुक्का-चिलम के बहाना उँहा आके बइठगे। कई माईलोगन मन जब ये सुनिच कि श्रीकंठ बाई के पाछू बाप सो लड़े बर तैयार हे, त ओमन ला बड़ खुशी होइच। दूनों के लड़ई-झगरा सुने बर उँकर आत्मा तिलमिलाये लगिच। गाँव मा कतको अइसन कपटी मनखे घलो रहिस, जो ये कुल के सुग्घर न्याय के रद्दा म रेंगई मा मने-मन जलत रहिस। वो मन काहय—श्रीकंठ अपन बाप ले दबथे, तेकरे सेती ओहा दब्बू हे। ओहा बस विद्या पढ़े हे, एकर सेती ओहा किताबी कीरा आय। बेनीमाधव सिंह ओकर सलाह के बिना कोनो काम नइ करत रहिस, ये ओकर मूर्खता हे। इन महानुभाव मन के शुभकामना आज पूरा होवत दिखत हे। कोई हुक्का पीये के बहाना अउ कोनो लगान के रसीद दिखाये के बहाना आके बइठगे। बेनीमाधव सिंह जुन्ना आदमी रहिस। इँकर भाव ला जान डरिच। ओहा सोंच लिच चाहे कुछु होय,  इन दुश्मन मन ला ताली बजाये के मउका नइ दँव। तुरते नरम शब्द मा बोलिच - बेटा, मैं तोर ले बाहिर नइ हँव। तोर मन जइसन चाहय वइसन कर, अब बेटा ले अपराध हो गेहे।
इलाहाबाद के अनुभव-रहित झल्लाये ग्रेजुएट ये बात ला नइ समझ सकिच। ओला डिबेटिंग-क्लब मा अपन बात मा अड़े के आदत रहिस, ये बात ला वो का जानय? बाप हा जेन मतलब के खातिर बात पलटे रहिस, ओहा ओकर समझ मा नइ आइच। कहिथे —लालबिहारी के साथ अब ये घर मा नइ रहि सकँव।
बेनीमाधव—बेटा, बुद्धिमान मनखे मूरख के बात मा ध्यान नइ देवय। वो नासमझ लड़का हे। ओकर ले कुछु भूल होगे हे, ओला तँय बड़े होके क्षमा करदे।
श्रीकंठ— ओकर ये दुष्टता ला मैं कभू नइ सहि सकँव। या तो उही ये घर मा रइही, या मैं। आपमन ला कहूँ उही जादा प्यारा होही, त मोला छुट्टी दे, मैं अपन भार खुदे संभाल लेहूँ। कहूँ मोला रखना चाहत हच त ओला बोल दे, जिहाँ चाहे चले जाय। बस इही मोर आखिरी निश्चय हे।
लालबिहारी सिंह दुवारी के चौखट मा चुपचाप खड़े-खड़े बड़े भाई के बात ला सुनत रहय। ओहा ओकर बहुत आदर करय। ओकर कभू अतका हिम्मत नइ होइच कि श्रीकंठ के आगू मा खटिया मा बइठ जाय, हुक्का पी लय या पान खा लय। बाप घलो के ओहा अतका मान नइ करत रहिच, जतका ओकर करय। श्रीकंठ घलो के ओकर  ऊपर अब्बड़ मया रहिस। अपन सुरता मा कभू ओला चिल्लाय घलो नइ रहिस। जब ओहा इलाहाबाद ले आवय, त ओकर बर कुछु न कुछु चीज जरूर लावय। मुगदर के जोड़ी उही हा बनवा के दे रहिस। पिछले साल जब ओहा अपन ले डेढ़वा जवान ला नागपंचमी के दिन दंगल मा हरवाय रहिस, तो ओहा खुश होके अखाड़ा मा ही जाके ओला गले लगा ले रहिस, पाँच रुपये खर्चा घलो करे रहिस। अइसन भाई के मुँह ले आज अइसन करेजा फाटे के लायक बात सुनके लालबिहारी ला बहुत पश्चाताप होइच। ओहा फूट-फूट के रोये लागिच। एमा कोनो शक नइहे कि अपन किये मा पछतावत रहिच। भाई के आये के एक दिन पहिलिच ले ओकर छाती धड़कत रहिस कि पता नइ भइया का कइही। मैं ओकर आगू कइसे जाहूँ, ओला कइसे कइहूँ, मैं ओकर ले नजर कइसे मिला पाहूँ। वो सोंचे रहिस कि भैया मोला बलाके समझा दिही। इही आशा के उल्टा आज ओहा ओला निर्दयी बने पाइच। ओहा मूरख रहिस। फेर ओकर मन कहत रहिस कि भैया मोर साथ अन्याय करत हे। कहूँ श्रीकंठ ओला अकेल्ला मा बलाके दू-चार बात कइ देतिच; अतके ही नइ दू-चार झापड़ मार भी देतिच तो ओला अतेक दु:ख नइ होतिच; फेर भाई के ये कहना कि अब मैं एकर सूरत नइ देखना चाहत हँव, लालबिहारी ले सहे नइ गिच ! ओहा रोवत-रोवत घर आइच। खोली मा जाके कपड़ा पहिनिच, आँसू पोछिस, जेमा कोनो ये मत समझय कि रोवत रहिस। तब आनंदी के दुवारी मा आके कहिथे —भउजी, भैया हा ये निश्चय कर डरे हे कि ओहा मोर साथ ये घर मा नइ रहय। अब ओहा मोर मुँह घलो नइ देखना चाहत हे ; तेकर सेती अब मैं जावत हँव। ओला फेर कभू मुँह नइ देखावँव ! मोर ले जो गलती होगे हे, ओला क्षमा करबे। ये कहत-कहत लालबिहारी के गला भर जाथे।

4
जतका बेरा लालबिहारी सिंह मूड़ी नवाये आनंदी के दुवारी मा खड़े रहिस, ओतके बेरा श्रीकंठ सिंह घलो आँखी लाल करत बाहिर ले आइच। भाई ला खड़े देखिच, त नफरत ले  आँखी ला दूसर डहर कर लिच, अउ तिरिया के निकलगे। जइसे ओकर छइँहा ले दूरिहा भागत हे।
आनंदी हा लालबिहारी के शिकायत तो करे रहिस, फेर अब मन मा पछतावत रहिस ओहा सुभाव ले ही दया करइया रहिस। वो येला थोरको नइ सोंचे रहिस कि बात अतका बढ़ जाही। ओहा मने-मन अपन पति ऊपर झुँझलावत रहिस कि एहा अतेक गरम काबर हो जाथे। ओकर मन मा ये डर भी रहिस कि कहूँ मोला संग मा इलाहाबाद जाय बर कइही , त मैं कइसे करहूँ। इही बीच मा जब ओहा लालबिहारी ला दुवारी मा खड़ा होके ये कहत सुनिच कि अब मैं जाथंव, मोर ले जो भी अपराध हो हे, क्षमा करबे, तो ओकर थोर बहुत गुस्सा रहिस तेनो पानी होगे। ओहा रोये लगिस। मन के जम्मो  मइल धोये बर आँखी के पानी ले जादा अच्छा अउ कोनो जिनिस नइ होवय।
श्रीकंठ ला देखके आनंदी हा कहिथे—लाला बाहर खड़े बहुत रोवत हे।
श्रीकंठ- त मैं का करँव ?
आनंदी—भीतरी मा  बला ले। मोरे मुँह मा आगी लगय! मैंहा कहाँ ले ये झगरा उठा डरेंव।
श्रीकंठ--मैं नइ बलावँव।
आनंदी--पछताबे। ओला बहुत अफसोस होवत हे, अइसन झन कहि, कहूँ चल दिही।
श्रीकंठ नइ उठिच। अतका मा लालबिहारी हा फेर  कहिच -भउजी, भइया ला मोर प्रणाम कहि दे। वो मोर मुँह नइ देखना चाहत हे; तेकर सेती महूँ हा अपन मुँह ओला नइ देखावँव।
लालबिहारी अतका कहिके लहुटगे, अउ जल्दी-जल्दी दुवारी डहर जाये लागिच। आखिर मा आनंदी अपन खोली ले निकलिच अउ ओकर हाथ ला धर लिच। लालबिहारी पाछू लहुट के देखथे अउ रोवत-रोवत कहिथे - मोला जावन दे।
आनंदी-- कहाँ जाबे?
लालबिहारी-- जिहाँ कोनो मोर मुँह झन देखय।
आनंदी—- मैं न जान दँव?
लालबिहारी—- मैं तुँहर संग रहे के लाइक नइ हँव।
आनंदी— तोला मोर कसम, कहूँ अब अउ अपन गोड़ ला अउ आगू मत बढ़ाबे।
लालबिहारी—जब तक मोला ये पता नइ चल जाही कि भइया के मन मोर बर साफ हो गेहे, तब तक मैं ये घर मा कदापि नइ रहँव।
आनंदी—मैं भगवान ला गवाही मान के कहत हँव कि तोर बर मोर मन मा थोरको मइल नइहे।
अब श्रीकंठ के हृदय घलो पिघलगे। ओहा बाहिर आके लालबिहारी ला पोटार लिच। दूनों भाई खूब फूट-फूट के रोइच। लालबिहारी हा सिसकत-सिसकत कहिथे —भइया, अब कभू झन कहिबे कि तोर मुँह नइ देखँव। एकर सिवा आप जो सजा देहू, मैं खुशी-खुशी स्वीकार कर लेहूँ।
श्रीकंठ हा कांपत बोली मा कहिथे - लल्लू! ये बात मन ला बिल्कुल भूल जा। भगवान चाहही, त फेर अइसन अवसर कभू नइ आवय।
बेनीमाधव सिंह बाहर ले आवत रहिस। दूनों भायमन ला  गला मिलत देखके आनंद ले मन प्रसन्न होगे। अउ कहिथे — बड़े घर के बेटी मन अइसने होथे। बिगड़त काम ला बना लेथे।
गाँव मा जेन हा भी ये किस्सा ला सुनथे, उहिच हा ये बोल कर आनंदी के उदारता के बड़ाई करथे —
‘बड़े घर के बेटी मन अइसन हे होथे।'

(मूल कहानी:- बड़े घर की बेटी, मुंशी प्रेमचंद जी)

छत्तीसगढ़ी अनुवादक-
जगदीश "हीरा" साहू (व्याख्याता)
कड़ार (भाटापारा), बलौदाबाजार

Monday, 13 July 2020

जाँगर-हेम साहू

जाँगर-हेम साहू

एकठन गाँव मा फुदालु अव लतालू नाव के दू झन भाई भाई रहिस। फुदालु अडबड़ मेहनती रहिस अउ लतालू हा अड़बड़ कोढ़िया रहिस। दूनो भाई एक संग रहय, एक दिन के बात ये फुदालु हा अपन भाई ला समझावत कहिथे देख भाई रात दिन गल्ली खोर मा किंजरत रहिथस लुठुर लुठुर ओकर ले बढ़िया मोर संग काम करथे भाई । हमन दूनो भाई खेत मा जाँगर पेरबो त हमार बंजर खेत हा घलो उपजाऊ बन जाहि रे मेहनत के फल अबड़ मिठास होथे रे भाई, फेर लतालू ला नई समझ मा आइस। अउ बड़े भाई ला उल्टा पुलटा बोल डारिस। बात हा थोरे थोरे मा झगड़ा म बदल बदलगिस अउ दूनो के बीच के झगड़ा अतेक बाड़ गिस  की बाँटा खोटा मा आगिस। उकर दस एकड़ खेत रहय जेमा 5 एकड़ भुइँया खेत हा बने उपजाऊ रहय अउ 5 एकड़ भुइँया हा एकदम बंजर रहय। लतालू हा अपने बड़े भाई ला कहिथे ओ 5 अकड़ खेत जेन हा बंजर हावय तेला तँय राख अउ मँय हा नेगी खार के 5 एकड़ खेत ला जेन उपजाऊ हावय। फुदालु कथे ले ठीक हे भाई तोर जइसन इच्छा सब मा मोला मंजूर हावय। दिन बीतत  गिस  समय निकलत गिस अउ फुदालु अपन जाँगर के भरोसा बंजर खेत ला उपजाऊ बना डरिस। खेत मा हरियर हरियर फसल लहलहात रहिस। लतालू हा  अपन कोढ़ियापन मा आज कल आज कल करके समय ला निकाल दिस। घूम घूम खवई अउ गली खोर किंजरइ ताय। अपन उपजाऊ भुइँया ला बिन मिहनत अउ रेख देख के बंजर कर डारिस। अब खाय बर घर मा एक दाना नई रहय लतालू हा अपन भाई मेर माँग भी नई सकत रहिस। गाँव मा भीख माँग के अपन गुजर बसर करे ला धरलिस अउ कई झन गाली भी देवय अहा काय ये अतका बड़ जाँगर नगत अकन खेत तभो ले घर घर दुवारी मा ये कोढ़िया ला भीख माँगत देख। कतको झन दुवारी ले फटकार तको दय। ये बात हा एकदिन फुदालु के कान में सुनई परथे अउ ओला दुःख होथे की मोर रहत ले मोर भाई भीख माँगत हावय ओह दर दर के ठोकर खावत हावय। फुदालु तुरन्ते अपन भाई ला खोजत ओकर मेर जाथे। अपन भाई ला बुला के लाथे अउ कहिथे तोला भीख माँगे के जरूरत नई हावय भाई मोर धन्य धान सब तोरेच ताय बस तँय मोर संग मेहनत ला कर अपन कोढ़िया जाँगर ला पेर। अपन भाई ला समझावत कहिथे देख भाई जाँगर पेरे मा बड़े से बड़े बंजर खेत ला उपजाऊ बना सकथन अउ अलाली करे मा बढ़िया से बढ़िया खेत हा बंजर हो जाथे।  भाई के दया अउ ओकर बात ला सुनके लतालू के आँखी ले आँसू तरतर तरतर बोहाय लागिस अपन करनी मा ओला पछतावा होय ल लागिस। अपन भाई के चरन मा गिर के माफी माँगथे अउ अपन मन मा ठान लेथे आज ले कभू अलाली नी करव। ओ दिन ले दूनो भाई अपन जाँगर के फल ले बढ़िया सुख से जिनगी बिताथे।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा

टुटहा नाँगर*अश्वनी कोसरे

*टुटहा नाँगर*अश्वनी कोसरे

आय असाढ़ के दिन म खोरबहरा के नींद हजा के हे रात भर संसो करत चटपिट चटपिट म पहावत हे | दू बेटी अउ दू बेटा हे| रइमत  ले दे के घर के काम बुता कर पाथे आए दिन खटिया धर लेथे |बेटी सग्यान होगे हे , सगा सगोदर पुछे लगे हवँय ,बड़े नोनी के बर बिहाव माढे़ के बात चलत हवय |आँसो के दिन हर निकल जही फेर अवइया सुक्खा घरी बने रिश्ता नता देख के हाथ म हरदी रचाय ल परही| चिंता म बूड़े खोरबहरा के आजो आधा रात ले नींद नइ परे हे | रइमत  अलथी कलथी करत खोरबहरा के फिकर  ल जानथे | रइमत कहत हे पाँव दबादेंव का चुकनी के बाबू| काली के बड़ पार चढ़ा के आयेहव हाथबाह पिरावत होही| खोरबहरा करवट बदलत रइमत ल देखे लगिस| रइमत भले बैमरहिन अस भेख होगे हे पर अपन के जीवन साथी के संसो ल जानत हे | देवव कहत खोरबहरा के पैर ल दबाय लगिस| खोर बहरा बात ल टारत कहत हे नइ लगे सोनू के अम्मा तँय सो जा लइका मन जाग परही|
छोटे असन दू खोली के आवास बने हे | एक खोली म तीन भाई बहिनी बड़े नोनी कमला ,छोटी चुकन अउ  मँझिला राजू सोय हे छोटे सोनू अभी चार साल के हवय रइमत बिना एक छिन नइ राहय| रइमत एक बेर अउ कहिस काबर चिंता करत हव मालिक के घर देर हवय कुछू तो दया करही सब बने बने निपट जही| देवव मुड़ म ठंडा तेल सार दँव| फेरे खोरबहरा हरुकन कहत हे सोय के बखत लायेतो रहेव |र इमत खोरबहरा के मुड़ म हाथ फेरत कहत हे काबर संसो करत हव मँय तो  बने हँव | लइका मन ल भी बने के देखरेख करत हँव तुमन खेती बारी अउ बाहिर के काम ल सम्हारे हव| ते कोनो अउरे बात हे| खोरबहरा अउ रइमत  दुखसुख बांटत गोठियावत हे रात दू बजत हे| तुमन ल घर चुल्हा चौका के काम बुताअउ  ल इका मन ल सम्हारे ल पर थे सो जा सोनू के अम्मा मँहू सोवत हँव कहत खोर बहरा आँखी ल मूँदे लगिस| रइमत सोनू ल अपन अँचरा ल ढाँकत खटिया म ढरकत हवय| खोरबहरा आँखी मूँदे देखत के काली धवरा बइठ गे रहिस एको हरइ नइ रेगे हे | आज बने  करई कोढहा भूसा डारेहँव कोटना भर के खाडरे होही| बिनसरहा ले रेगिहँव जोते बर| सोचते सोचत चार बजगे उठके धँवरा- बलहा मन ले खोरबहरा ढीले लगीस पाही खार म धनहा हवय सबो सबो नँगरिहा संगे आगू पीछू जावन लगे हे | नाँगर बोहे खोरबहरा बइला ल हकालत जाए लगिस| बाउग के पाग देहे आज तो दू इकड़ म बावत हो जही सोचत घर ले निकलत हे धान के बीजा बोहे रइमत पीछू पीछू आवत हे खेत पहुँच गे बीजा टोकनी उतार के रइमत घर लहुटत हे | खोरबहरा मूदरहा ले नाँगर फाँद डरे हे| जल बेटा  धवरा - बलहा तता ..तता घँच जा कहत ! नाँगर जोते लगिस|खेत भर ल दू हरइ धर के धान बीजा छिचे हे| बेरा चढ़े लगीस धवँरा कालि के सुसताय बने बलहाके सग रेंत हे एक हरइ भुइँया जोता बोंवा गए दुसरइया हरइ के मुड़ा ल दूनत खनी मोरी मधवँरा बइठ गे | खोरबहरा पुचकारत धवरा ल
मनखे कस कहत हे | तँय अइसने बइठ बे रोजे त धान क इसे बोहँव धवरा? अभीन तो एक हरइ  ए डोली म अउ दू दूसर खँड़ म रेंगेल हे| हाँके म नँइ उठीच धवँरा ह थोकन घाम जनाय रहय  फेर बादर ढाँक लीच|रइमत राँध पो के ल इका मन ल खवा जताबता के  पेजपसिया पानी धरे खेत म आगे|
खोरबहरा धवँरा ल ढ़िल के देखिस उठ खड़ा होही त फेर फाँद लेहूँ | फेर धवँरा नइ  उठत हे| ललहा अपन जोड़ी ल चाँटे लगिस जैसे मया करत मनावत हे चल उठ मालिक के करजा अभी छूटेला बाँचे हे|
    रइमत मेढ़ म खाना के झउँहा ल उतारत आरो करत खोरबहरा ल कहत हे| बेरा होगे हवय पेज पसिया पीलव फेर जोतिहव|
 खोरबहरा धवरा बइला ल देखत कहत हे मोर पेज पियत ले सुसता ले फेर बने तरर तरर रेंगबे| ले मुखारी घिसलव ओ मन ल भी सुरतावन दव बेचारा मन के सियानी जाँगर आ गे हवय|
थोर थोर करके पार लगाबे करही लक्षमी यहराज ह|  रइमत बठकी भर पेज अउ माली म चेंच भाजी निकाल के देदिस|खोरबहरा संसो करत अउँवा- झउवा खाय लगिस |रइमत कहत हे धिरलगहा खावव अपन खेत -खार म  काय जल्द बाजी हे? खोरबहरा  कहत हे सोनू के दाई बने बने चेंच भाजी बनाय हस| बड़ मिठावत हे|
 खोरबहरा खाके मुँह पोछत उच गे|  रइमत कहत हे थोकिन बइठ लेव फेर तुहँर काम तो लगेच हे|
खोरबहरा मुड़ डोलावत रेंगत हवय सोना बतर बनत हे बइठे के बेरा नइहे | नाँगर संग धवँरा फाँद के फेरे उठावत हे| ले दे के धवँरा उठगे डिगिर डिगिर रेंगत हे | खोरबहरा बने दबावत अरई देवत बहिरहा  ललहा ल हाकत हे| ललहा गुणधरे बने सपेटे तिरत हे फेर धवरा पहली कस बने नइ रेंगत हे| रइमत बरतन मन ल धो मढ़ा के धनहा के बनझार कांद दुबी ल बिनत हवय | हरई म चार कुँड़ बाचे रहिस के धवरा लस ले बइठ गे| खोरबहरा धवरा ल दबा के डाँटत कड़ा भाखा ले कहत हे हत रे कब ले गरियार होगे ,दस बछर म आँसो अतका पदोवत हस  अका बीसा चार दून करदे तहाँ बइठ लेबे | आज अ उ न इ जोतँव रे धवँरा कहत | तुतारी लगॎवत हे| फेर धवरा नइ उचत हे|  दू तुतारी धवरा ल पीट डरिस खोरबहरा गुस्सा म |दस बछर म कभू न इ मारे हे| फेर पुचकारत हे नइ मारव बेटा धवँरा उठ जा  रे|रइमत खोरबहरा ल डाटे लगीस लक्षमी ल काबर मारत हस | थोकन सुसतावन दे| एक मोरी बर मारत हव| मया करत बइला बर बाँचेपसिया ल रइमत  धवरा व देवत हे| धवँरा ह जीभ निकाले हफरत हे , लाहकत हे|  पसिया ल नइ देखिस न सुँघत हे| रइमत खोरबहरा  ल कहत हे जादा थक गे हवय इमन ल ढिल दव काली बिहना घुमा लेहू|
    खोरबहरा ल एक एक दाना ल बने  राग - पाग  म बोय के संसो हे |ते पाय के एक बखत अउ धवँरा ल उठाय के कोशिश करिन| उठबे नइ करिस  तिर के देख डरिस|
 धवँरा ल खींच के हरइ ले घूँचा डरिस खोर बहरा ,फेर धवँरा ल नइ ढ़केल सकिच|
              धवँरा के हँफरइ बढ़ गे|
धवँरा के जोंता ल ढील दिस| धँवरा चारो गोड़ ल खुरचे लगिस|
 खोरबहरा समझ नइ सकत हे| खोरबहरा रइमत ल  कहत हे देखव तो धवँरा कइसे करे लगिस रइमत कइसे  करत हस लक्षमी पार लगादे कहत धवँरा ल छुवत जय करत हे| खोरबहरा मुड़ी पकड़ के बैठ गय | धवँरा चारो गोड़ ल उपर टाँग दिस मुँह ले खासत एके बेर म परान निकल गे| रइमत अउ खोरबहरा दूनो  चिल्ला चिल्ला खेत म दहाड़ मार के रोय लगिन हमर नाँगर टूट गे हमर नागर टूट गे हमर करम फूटगे | आस पास के नँगरिहा जुरिया गें , करल ई देख चुप करावत हे| दूनो ल समझावत हे|
तुहँर लक्षमी के करजा छूटागे अतके दिन बर तोर घर म आए रहिस | धिरज धरावत पंचु कहत हे करम के लेखा इही मेर तक रहिस| चल लक्षमी ल तोप माटी दे | उठा के गासा पार परिया म धँवरा ल  मिट्टी देदिन | रोवत रइमत  खोरबहरा ललहा ल घर ले गए| रात बिते पाछू दूसर दिन  ललहा संग खोरबहरा एक पार फँदाये हे रइमत  टुटहा नाँगर ले बाचे मोरा ल पुरा करिन हे|

अबेर नइ होय हे*

*अबेर नइ होय हे*
~~~~~~~~~~~~~~~~
                           ---राधेश्याम पटेल

---"अब चाहे कुछू होय ...फेर मोला कोनो पीये देखऊल दे देहीं तव मैं उहें ले बिदार देहँव"---  रमेश के बोली थोरक उँचहा होगे रहय...
मनहरन कहिथे ---- "अरे का कहिबे भईया  आज काल के लईकन नई मानँय"
"---घर जाने घलोक होथे गा  मनहरन भाई...! जईसन चलाबे तईसन चलथे"
----बात रमेश भाई के घर ओखर बेटा के बरात जाय के चलत रहय....मनहरन के कहना रहय के बराती मा दारु पानी ल रोकना मुस्कुल काम आय ...अऊ रमेश कहत रहय के जईसन चलाबे तईसन चलथे...काबर के रमेश दारु पानी ले दुरिहा रहिथे अऊ मनहरन मेर सब चलथे...दूनो के आचरन मा बहुत कुछ अंतर ....तभो दूनो पक्का संगवारीआँय सुख दुख के...मनहरन कोनो संग भले कईसनो व्यवहार करय लकिन रमेश मेरन ओखरे कस सादा सरबदा रहय ...।
       तीन दिन के गय ले रमेश के घर ओखर बेटा के मड़वा गड़गे ...तेल मायेन..हरदाही
 के बाद बरात के तियारी होगे ..!
जईसन रमेश सादा रहय तईसन ओखर घर के सबो बराती तो नई रहँय ...फेर बरतिया बनगें  रहँय रमेश घर के ..जेमन पियईया रहँय तेन घलो मन रमेश के आदत के मुताबिक सावचेती रहँय ...  कोनो गड़बड़वाय के कोशिश नई करिन...काबर के रमेश के  आदत व्यवहार के सम्मान गाँव मा बने अऊ बिगड़े जमो मनखे करँय..!
बरात बेटी वाले के गाँव माँ हबरगे ...बेन्ड बाजा के संग बरतिया अऊ घरतिया दूनो मँगन नाचे कूदे लागिन ...!
    ओ घर मा दू ठन बरात हबरे रहय तेखर सेती गुँड़ी मा कसहा भींड़ होगे रहय...
नाचत बजावत दूनो बरात के परघऊनी होगे बने शाँती ढंग ले ... अब दूनो बरात ला गुँड़ी मेरन ले जेवनसहा घर कोती रेंगे बर कहिन...जेवनास घर डहर जात जात घलो बरतिया घरतिया खूब नाँचत रहँय...
थोरक माँ रमेश के बराती मन नाचे ला बंद कर दिन फेर दूसर बराती अऊ गाँव घर के लईकन नाँचते रहँय ...रमेश के समधी के सारा जऊन रमेश के संगे संग रेंगत रहय तेन थकत बरतिया मन ला देख के रमेश ला कहिथे----
             "का बात हे साहेब ...
तुहाँर बरतिया बड़ जल्दी  सुस्त होगें ..? "
---"का फरक परथे जी ...
बरतिया न सहीं ...घरतिया मन तो नाचत हावा...!"
--- रमेश हा हाँसत हाँसत जुवाब दिहिस...
---"अब खुसी तो खुसी होथे जी ..तुहँर संग हम अऊ हमर सँग तुम... हे तो ऐकेच न..!"
     कहत कहत घरतिया पहुना घलो हाँसे लागिस ----!
---" असल मा तुमन सीसी नई चलाय हा जी ....तेखर सेती जल्दी थकगें ...!"
---" बात तो ठीके कहत हव जी ...पर ऐ सब मोर मेर नई चलय भई ..मैं तो घरे ले चेता देहे रहेंव के उहाँ कोनो परकार के उधम कूद नई  चाही मोला ....ते जान के बरात चलिहा ...!"
---"काय करिहा ... आजकाल तो ऐला फेसन बना डारें हैं.."
पहुना घरतिया हा हाँसत हाँसत  कहिच...!"
--"अरे आगी लगय अईसन फेसन ल जी ... जेन मान  सम्मान ला ऐके घरी माँ रउँद खउँद डारथे ओईसन फेसन नई चाही हमका..."
--- रमेश पहुना घरतिया के गोठ के तुरते रटपटउहन जुवाप दे देहिस..!

      सबो  झन बने हाँसत गोठियात जेवनास कोती जावत रहँय..
ओतके बेरा रमेश हा मनहरन  ला देख के कथे...
---" गूँडी मेरन ले सबो इही कोती आवत तो हें ना गा  मनहरन भाई ...? तैं एक घाँव अऊ बने देख बगोड़ के ले आ सब ला..."
---"मोर खियाल से सबो आवत हें भईया ...साईद ओ बरात के दू चार लईकन मन ठेला मेरन खड़े रहिन ...तभो मैं एक पईत आऊ देख लेथँव"
--- कहत कहत मनहरन हा गुँड़ी कोती लहुटत रहय ओतके बेरा दूसर बरतिया मा के दू झन झगर परिन...
असल मा होय ऐ रहय के नाचे के धून एक झन के हुद्दा एक झन ला परगे ...तव ओखर मोबाईल हाँथ ले छुट के फेंकागे ....अब नाचत कुदत भींड़ मा तुरंत कईसे बिरेक लगय ...खुँदा कचरा के मोबाईल राजा बिनत ले मस्त छरियागे हरहिंछा ...तहाँ भइगे ...  देखते देखत मार पिटाई चालू होगे ...
रमेश हा कथे---
" देखव साहेब ..मैं अतके ल डराथँव...ऐकेच कनी मा होगें ना..!"
कहत दूनो झन भींड कोती
अमाईन तव पता चलिस के झगरा होवईया दूनो झन दूसरईया बराती आँय ...रमेश के जी मा जी आईस..!
दारू मा माँते झगरिहा मन बड़ मुस्कुल मा धिराईन ...!
सब उमंग उछाह ऐकेच घरी मा छू मंतर होगे...सब झन जेवनास मेरन पहुँचगें ...
व्यवस्था के मुताबिक नेंग जोंग घलो होगे अऊ बेरा ला देखत मड़वा डहर घलो पूजा पाठ चालू होगे ...भोजन के तियारी होगे रहय खाय बर पंगत लगगे...पतरी मा जेवन पोरसा गे रहय ...दू बरात के सेती सब मिंझरे बईठे रहँय..
ठऊँका ओतके बेरा गली कोती फेर चिल्ल बोल्ल गारी गुप्तार सुनाय लागिस ...कोनो कुछू समझ पातिन तेखर ले पहिलिच मारा पीटा ...दउँड़ा मातगे ...पंगत लगे रहय तेने कोती एक झन ला दुउँड़ात आइन ...काहाँ के पतरी काहाँ के भात..काहाँ के रोटी काहाँ के साग...सब देखा देखा होगे !  पंगत के तीरे मा एक डहर सब गाड़ी मोटर खड़े रहय तेने डहर कतको झन ला रझारझ परगे ...कोनो के मुड़ फुटगे कोनो के हाँथ टुटगे ..,.. झगरा थिराय ले पता चलिस के उही दूनो लड़का मनके चक्कर मा फेर कई झन उलझ गें रहँय तेखर सेती सब तहस नहस होगे ...
भागा भागा के चक्कर मा पंगत के तीर एक डहर ईंटा के कच्चा देवाल रहय तेन हा पंगत पार ढंकलागे तेमा कतको झन के खूब लागे रहय ...ईंटा छिंटक के मनहरन के गोड़  मा परे रहय ...!
मड़वा मा बिहाव तो जरुर  होईस ....फेर सब बुझाय बुझाय असन ...बिदा  के होत ले बने बेरा चढ़गे रहय ...दूनो बराती के बरतिया रात के बिन खाये कोनो घर लहूट गें तव कोनो अस्पताल पहुँच गें...!
बिदा के बेरा रमेश के समधी रमेश मेरन क्षमा माँगत कहिथे---
   ---" भूल चूक ला क्षमा करिहव समधी महराज ...ओ बरात के नाँव ले तू हू मन  परसान हो गया..."
---" आप ला क्षमा माँगे के जरुरत नई ये समधी ...ऐमा आपके का दोस...क्षमा तो आपके ओ समधी ला माँगना चाही ...जेन अपन बरतिया ला दारु मा बोर के लाईस...
सरम तो उनला आना चाही जेन अपन मस्ती मा दूसर ला भुगताईस ....ऐ पीये पियाय के फेसन हमला मारत हे...
अगर हम चाही तव ऐ फेसन ला रिति संस्कार बने के पहिली मार सकत हन  ...
     अभी घलो ....
        *अबेर नई होय हे*...!"
                                ***

*गोबर दे बछरू गोबर दे* - छत्तीसगढ़ी कहानी(जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया)

*गोबर दे बछरू गोबर दे* - छत्तीसगढ़ी कहानी(जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया)


गोबर दे बछरू गोबर दे-----,नानपन ले खेल खेल म ये गीत ला गावत झामिन अउ कामिन, दुनो जुड़वा दुखिया बहिनी मनके उम्मर कब अधियागे, पता घलो नइ चलिस। दुनो बहिनी ल बियावत बेरा दाई गुजर गे, त गोसाइसन के बिछोह म कुछ दिन बाद ददा। कामिन अउ झामिन ल ओखर दरुवहा कका स्वार्थी बरोबर उँखर धन के राहत ले पालिस, ताहन अपन ठिहा ले सातेच बछर के छोटे उमर म वो बपरी मन ल धकिया दिस। दुनो दुखिया बहिनी के दुख ल देख  गाँव म पंचायत बैठिस, पंच,पटइल मन फैसला करिस  कि, गाँव के दैहान मेर एकठन घर दिये जाय, अउ जीवन यापन बर गौठान के गोबर ल  बिने के काम दुनो बहिनी मन जब तक चाहे कर सकत हे। पंचायत के ओ दिन के फैसला अनुसार दुनो बहिनी मन, बरदी के गोबर ल बिने अउ उही मेर के बड़का घुरवा म सरोय बर फेक देवय, कुछ के छेना घलो थोपे, त कुछ ल कोई तुरते छर्रा, छीटा अउ लीपे बर ले लेवय। गाँव बने बड़े जान रिहिस, जिहाँ के खइरखा म  कई हजार गाय,भैस सकलाय। गोबर खातू अउ छेना ल बेंच दुनो बिहिनी ले देके अपन जिनगी के गाड़ा ल खींचय। *कहिथे न कि पथरा ल धूप,छाँव अउ हवा पानी नइ जानवव, कहे के मतलब पथना ल कतको मार पड़े फेर आँसू नइ बोहय, वइसने दुनो बहिनी मन पहाड़ कस दुख ल करम के लेखा समझ के झेलिस*, अउ कभू हार नइ मानिस।

        रिमझिम रिमझिम पानी झरत सावन महीना म पेड़,पात ,नदी, नाला अउ भुइयाँ सँग जम्मो जीव जंतु प्रकृति के दया मया पाके, हरिया जथे। मयूर गा गाके नाचथे, किसान मन कर्मा ददरिया गाथे, दादुर अउ झिंगुरा मन राग धरके, रात रात भर गाथे। *फेर दुनो बहिनी  उदास रहय काबर कि बरदी के गोबर, पानी बादर म  एकमई हो जाय। तभो दुनो अतिक महिनत करे कि, जादा से जादा गोबर हाथ आ जाय।* एक दिन शहर जावत बेरा, दुनो बहिनी ल गाँव के मितानिन गोबर बिनत देख रूक गे, अउ टकटकी लगा के ओमन ल देखेल लगिस। भरे सावन महीना म घलो पछीना म तर बतर, कामिन डहर ल देखत झामिन कहिथे, देख तो बहिनी, ये दुखाही , हमला चील कस घूरत हे, कही हमर पेट म लात मारे के बिचार तो नइ बनात हे? झामिन के हाँ में हाँ मिलावत, कामिन कहिथे, हो सकथे बहिनी, आजकल सरकारी मनखे मनके भारी पावर रथे, गाँव,पंच,पटइल अउ अइटका बइठका ल घलो नइ माने। त का हमर हाथ ले, ये दुखाही ह गौठान ल नँगा लिही का, झामिन मितानिन ल तीर म आवत देख फड़फड़ात कहत हे। मितानिन तीर म आके कहिस, कि का तुमन ल सरकार के योजना के खबर हे? तुरते कामिन कथे, का ख़बर बहिनी, का राशनकार्ड ले नाम कटइय्या हे, या फेर हमर रोजी रोटी जवइइय्या हे, अउ हम अनपढ़  का जानबों?  न टीबी देखन, न रेडियो सुनन, न पेपर सेपर। अउ ये सरकार घलो तो आके नइ बताये। मितानिन कहिथे, अतेक डरे के बात नइहे, बल्कि ये तो खुशखबरी आय कि सरकार कोती ले अब गोबर के घलो दाम मिलही। झामिन कहिथे, बने हो जाही बहिनी, *अभी तो हमर मरना होगे हे, किसान मन गोबर खातू ल भुला, यूरिया डीपी धर लेहे, चूल्हा अउ छेना के जघा घर म गैस माड़ गेहे, अउ अब तो टाइल्स,पेंट-पुट्टी के जमाना म छर्रा छीटा घलो नँदा गय।*  मितानिन ढाढस धरावत कहिथे, अब संसो झन करव। वइसे के किलो गोबर सकेल लेत होहू एक दिन म ? दुनो बहिनी हाँसत कहिथे, भाजी पाला थोरे हरे, जे किलो बाट ल सनाबो बहिनी, आज तक तो झँउहा अउ कोल्लर  ल जानथन।  उँखर बात ल सुनके, मितानिन घलो हाँसत चलदिस। कामिन अउ झामिन ल मितानिन के बात सपना कस लगिस, अउ वोला तुरते बिसरावत अपन बुता म लगगे। जम्मो गोबर ल तिरियाके दुनो बहिनी बँइहा जोरे घर कोती चल दिस ।
           दुनो बहिनी के घर ल, गाँव के धान कोचिया कालू झाँकत कहिथे, कोनो हो वो। कालू के हुँक ल सुन कामिन आथे अउ कहिथे, कइसे ग रद्दा भुलागे हँव का ? जेन हमर घर आगे हव, न हमन किसान अन न दीवान, कहाँ के धान पान पाबो ददा? अरे नही, मैं कोनो रद्दा नइ भुलाये हँव, बल्कि ये बताये बर आय हँव कि, तुम्हर बरदी के गोबर ल  कल ले, मैं खरीदहूँ। माने अब मैं काली ले गोबर के कोचयई चालू करहूँ। कामिन मितानिन के बात ल उही समय सुरता करत घर म मुचमुचावत खुसर जाथे। दुनो बहिनी दूसर दिन बिहना फेर बरदी मा आ जथे, पाँच ठन पहट जेमा कई हजार गरवा गाय, जे पहातीच ले माड़े अउ दस बज्जी उसले। सबके गोबर बिने म बनेच महिनत लगे। तभो धकर लकर गोबर ल दुनो बहिनी घुरवा म न डार के एक जघा कालू के केहे अनुसार कुढ़ोवत गिस। बरदी उसले के बाद, कालू अपन नाप तौल के समान धरके गौठान म आगे, अउ सकलाय गोबर ल तऊले बर लगिस, तउलत ले कालू पछीना म गदगद ले नहा डरिस,आखिर म थक खागे, अउ अपन कोचयई के अनुभव म गोबर ल देखत कहिथे, तुम्हर ये गोबर ह, लगभग डेढ़ टन होही। का टन वन, कालू, हमन तो स्कूल के मुंह ल घलो नइ देखे हन,काँटा मारत  घलो होबे। अपन टन वन ल तैं अपने कर रख अउ ये बता कि, के पइसा  होइस? कालू  दू ठन नोट देखात कहिथे,ये ले 500 तोर अउ 500 तोर। दुनो बहिनी एक दूसर ल देख, गौठान के पाँव परत हाँसत कहिथे, जब गोबर ल सरोइया घुरवा के दिन बहुरथे कहिथे, त का गोबर बिनइया मनके दिन नइ बहुरही?  दुनो बहिनी भारी खुश हो गुनगुनाय बर धर लेथे। इती कालू गोबर ल चुंगड़ी म भरके चल डेेेथे। कामिन झामिन के चेहरा खिले रहय,अउ काली के सपना ल मन ह आजे गढ़े लगगे कि काली घलो,500, 500 मिलही। ओतकी बेरा पड़ोस गाँव के आदमी बिसन  आके दुनो बहिनी ल कहिथे कि तुम्हर गोबर ल देव, मैं खरीदहूँ। झामिन मुंह छुपावत कहिथे, वोला तो गाँवे म बेंच डारेन। का ये गाँव म गोबर कोचिया घलो हे, अकचका के बिसन कहिथे। मोर नाँव बिसन हे, मैं साग भाजी बेचथों, अउ अब गोबर घलो लेहूँ, वइसे कतका रुपिया के होइस ,के किलो रिहिस ते। झामिन कहिथे, वो डेढ़ टन टन अइसे कुछु काहत रिहिस, अउ येदे 1000 दे हे। बिसन बात काटत कहिथे, मैं एक हजार के जघा बारा तेरा सौं देतेंव। दुनो बहिनी भइगे काहत मुँह घुमावत  घर  कोती चलदिस।

            पइसा पाके झामिन बड़ खुश रहय, सँझौती बेरा पुचपुचावत , गाँव म लगइया बाजार कोती बेनी हलावत, चल दिस। झामिन के जाते ही कालू उँखर घर हबरगे, कामिन ल अउ 200 देवत किहिस, अब मैं तुम्हर गोबर ल रोज लेहूँ। इती झामिन के मुलाकात बाजार म बिसन ले होगे।  बिसन  अउ झामिन  बाजार म दू चार बेर आमने सामने होइस, फेर बिसन, कुछु बोल नइ सकिस।आखिर म हिम्मत करके जावत जावत मुँह घुमाये कहिथे, तुमन दू बहिनी हव का अइसे नइ हो सके, कि आप मन अपन हिस्सा के गोबर ल मोर तीर बेच दव। झामिन बिसन ले नजर मिलाथे, फेर कुछु बोले नही, अउ अपन घर आ जथे। दुनो बहिनी पहाती फेर गौठान म चल देथे, अउ अपन बुता म लग जथे। बरदी उसलते साँठ बिसन अउ कालू दुनो पहुँचगे। झामिन,बिसन ल अउ कामिन, कालू ल गोबर बेचबों कहिके बाताबाती होय बर धर लिस, ओतकी बेरा बिसन कहिथे, ले का होही, आधा आधा कर लेथन, कालू घलो  मूड़ी हला दिस। *गोबर के कुड़ही के दू टुकड़ा होगे, मानो दुनो के मया बँटागे।*  600, 600 रुपिया थमा के दुनो कोचिया बरदी ले चल देथे। एती झामिन अउ कामिन घलो एक दूसर ल देख के मुँह अँइठ लेथे। अउ लरधंग लरधंग दुनो मरखण्डी बछिया बरोबर घर आके तिलमिलाय बर धर लेथे।  बढ़त मन मुटाव म, उँखर घर घलो खँड़ा जथे। हाथ के पइसा, एक दूसर के जरूरत अउ नानपन के मया ल भुला दिस। गाँव भर के मनखे मन जौन झामिन अउ कामिन के मया के गुणगान करे, उहू मन देखते रिहिगे। झामिन के मया बिसन बर, अउ कामिन के मया कालू बर दिन ब दिन बाढ़ेल लगिस। बिसन अउ कालू मितानिन ले डरे कि कही, वोहर दुनो बहिनी मन ल गोबर के सही दाम झन बता देवै, अउ यदि जान जाही, त ओमन ह गोबर ल आने तीर बेंच दिही। फेर दुनो कोती ले, बाढ़त मया म दुनो कोचिया बिहाव के बँधना म बँधा जथे।  बिहाव के बाद घलो,दुनो बहिनी गोबर बिनय अउ आधा आधा दुनो साढ़ू बाँट के बेचे बर ले जावय।  हाथ म आवत पइसा अउ नवा नवा गोसँइया सँग दुनो के जिनगी बढ़िया गुजरे लगिस। बिसन अउ कालू दुनो साढ़ू  गाँव के बरदी के गोबर के सँगे सँग आसपास म घलो गोबर खरीदय अउ बेचे। झामिन अउ कामिन घलो गोबर बिनइया बनिहारिन लगा डारिस। सियान मन कइथे गरीबी म मया बढ़ाथे अउ अमीरी म कम्पीटिशन(प्रतियोगिता)। अउ अइसने  घटिस घलो एक घर टीवी, फ्रीज, कूलर आइस ताहन दूसर घर आवत देरी घलो नइ लगिस। दुनो देखा सीखी गाय गरुवा घलो बिसा डरिस। दुनो बहिनी भले अपन आधा उम्मर ल गरीबी अउ बेसहारा होके जीये रिहिस फेर बचे जिनगी बढ़िया कटेल धरलिस।  गांव वाले मन उँखर दुख अउ कंगाली ल देखे रहिस, त बढ़ोतरी ल देख इही काहत ,दुनो के उप्पर रोष नइ जतावय कि जब बाँटे भाई परोसी अउ एके भाई बर बिहाय दू सगे बहिनी देरानी जेठानी कस लड़ सकथे, त इँखरो बीच छोट मोट मन मुटाव सहज हे।

                  गोबर के पइसा मिले ले गाँव म अब गोबर के पोटी घलो देखना नोहर होगे। झामिन अउ कामिन मन तो रोजे गोबर चोरइय्या ल हात हूत काहत, अउ कभू कभू गरिवावत घलो दिखे। गाय गरु जे सड़क म बइठे, मोटर गाड़ी के भेंट चढ़ जावत रिहिस, उहू मन ल, उँखर गोसाइया मन चेत करे बर धर लिस। गोबर के माँग ले गाय भैस के मान बढ़ेल लग्गिस। शहर नगर का, गाँव घर म घलो बाम्हन पुरोहित मन ये कहि दिस कि यदि गोबर नइ मिलही त माटी के गौरी गणेश घलो चलही, यहू म पूजा सफल हो जही। गोबरेच खोजना जरूरी नइहे। गोबर के भाव मिलत देख, कामिन अउ कालू के मन म लालच हमाय बर धरलिस,देखते देखत गाँव के गौठान गढ्ढा होय बर लगगे, काबर कि गोबर के सँग  अब, कामिन भुइयाँ के मास ल उकाले बर लगगे कहे के मतलब पहली गोबर भर ल बिने अब वजन बाढ़ही कहिके माटी घलो ल सँग म उखाड़े बर धरलिस,। अउ करिया दिखइया  जतेक प्रकार  के भी मल रहय  चाहे वो छेरी बोकरा के होय या कुकुर माकर के, आधा आधा गोबर ल बाँटे के बाद कालू अउ कामिन ओमा मिलावट करे बर घलो लग्गिस। बिसन अउ झामिन ले जादा कालू अउ कामिन पइसा कमाये बर धर लिस, तभो झामिन अउ बिसन ईमानदारी ल नइ छोडिस।  फेर बुराई कतेक दिन छुपही,एक दिन कालू ल फटकार पड़थे अउ जुर्माना घलो हो जथे, जतका  मिलावट म कमाये रिहिस ओखर ले जादा, जुर्माना म सिरा जथे। पुलिस अउ कोर्ट केस होय ले, बिसन अउ झामिन मन बचाथे, ते दिन ले  कालू मिलावट करे बर चेत जथे।  दुनो बहिनी के छरियाय मया पहली कस तो नही, फेर परोसी बरोबर जरूर जुड़ जथे।  दुनो बहिनी घर गाय गरुवा के सँगे सँग धन दौलत के बढ़वार लगातार होय लगिस। अँगना म मेछरावत बछरू के पीला  ल देख  गोबर माँगत, डेरउठी म बइठे कामिन अउ झामिन गँवाय दिन के सुरता करत गावत हे,,,,,,, *गोबर दे बछरू गोबर दे*,,,,,,,,,,,,, फेर  पहली कस ये गीत  कोनो खेल खेल म नइ रिहिस,,,,,,,,,,,  बल्कि पइसा के लालच म रिहिस, कि, रे बछरू तैं गोबर दे, ताहन वोला बेच पइसा पाबों। दुनो बहिनी के आँखी इही सब सोचत एकाएक मिलथे, फेर एक दूसर ल नइ देखिस तइसे, फेर  राग लमा गाये बर धर लेथे,,,,, गोबर दे बछरू गोबर दे-----------।
(बछरू गोबर दय, अउ सरकार ओखर दाम दय, ताकि झामिन कामिन कस कतको दुखियारी मन अपन जिनगी सँवार सकयँ)


    जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
      बाल्को,कोरबा(छग)
        9981441795

Friday, 10 July 2020

सम्मान के बोजहा (निबन्ध)

सम्मान के बोजहा (निबन्ध)


सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलख कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु,जसु अपजसु विधि हाथ।।
         रामचरित मानस के ए दोहा ह बहुत बड़े जीवन दर्शन ए, अचूक राम बाण मन्त्र आय।एखर सीधा सीधा अर्थ तो इही हे कि--राजा दशरथ के मरे अउ क्रियाकर्म होये के बाद ,आगू काय करना हे तेला सोंचे बर सभा सकलइच तब रोवत गावत ,बहुतेच दुखी अउ उदास-निराश भरत जी ल अबड़ेच दुखी मन  ले गुरु वशिष्ठ जी ह समझावत कहिन--बेटा भरत ! दुखी झन हो।अपन ल दोषी झन मान।  नफा-नुकसान ,जीना-मरना,मान-अपमान उपर मनखे के जोर नइ चलय। समय बलवान होथे। ए सब के देवइया,रचइया भगवान होथे।
            फेर ए दोहा के  अतके अर्थ बस नइये ,एमा गूढ़ भावार्थ समाये हे। ए काहत हे कि-मनखे के जिनगी म सुख-दुख ,लाभ-हानि, जस-अपजस  के आना -जाना,धूप-छाँव कस लगे रथे। ए ह जम्मों घोर दुख म परे, बिपति के फांदा म फँसे मन ल ढाढ़स बँधावत ,धीर रखे के सीख देवत काहत हे - समय गुजरही तहाँ ले सब ठीक हो जही। दुख के दिन बीत जही। जेन भगवान अपन बिधान के चलती दुख देहे ,उही ह सुख घलो देही।कहे गे हे-घुरूवा के दिन घलो बहुरथे।
     कतका बड़े गुनान बात भरे हे एमा। सच म जे मनखे हा दुख मा धीर नइ धरय  वो ह टूटे माला सहीं बिखर जथे, छरिया जथे। कतको झन तो भगवान के दे वरदान ए मानुस तन ल बुजदिल बनके, आत्महत्या करके नष्ट तको कर देथें जबकि मन ल सम्हाल के दुख ल सहना चाही।
      ओइसने मान-अपमान के बात घलो हे। ए मृत्यु लोक म भला अइसे कोन हे जेला कभू मान नइ मिले होही या अपमान के अनुभव नइ करे होही? सब ल मान ,अपमान मिलत रइथे।इहाँ तक बड़े- बड़े सन्त-ज्ञानी, साधु-महात्मा, अवतार ,भगवान तको मन के जीवन म  उज्जर सम्मान के संग अपमान के करिया केंरवछ  लगे दिखते। चंदा म दाग हे त सुरुज ल घलो गरहन घेर लेथे, सूतक लग जथे। जेन आदमी अपमान ल हाँस के नइ टाल सकय ,धीर नइ धर सकय,वो ह बहुत अकन मानसिक बीमारी के चपेट म आ जथे। ओला इरखा, बैर, अवसाद, चिड़चिड़ापन, मनखे मन के बीच बइठइ ले डर , ककरो संग नइ गोठियाना, चुगरी-चारी करना,घर खुसरा बन जाना-----आदि अनेक प्रकार के बीमारी धरे के पूरा सम्भावना रइथे। अपमान के बीमारी ले बाँचे के सुग्घर उपाय तो इही हे कि हमला हमेशा धियान देना चाही कि अपमान होय के मौकैच झन आवय। फेर ए ह कोनो न कोनो रूप म आ जथे। जब आ जथे त झेल लेना चाही।अउ समझ लेना चाही कि ए दुनिया म भूँकइया कुकुर मन के कमी नइये। कुत्ता भूँके हजार, हाथी चले बाजार। बादर म थूकइया ऊपर ओकरे थूंक ह गिर जथे। अपमान होगे, अपमान होगे कहिके मूँड़ धरे सोंचत नइ बइठ के ,अपन अच्छा काम ल करते रहना चाही।
             अपमान ले जादा खतरनाक सम्मान ह होथे। एखर मतलब ए नइये कि ककरो सम्मान नइ होना चाही, ककरो सम्मान नइ करना चाही या कोनो ल सम्मान नइ मिलना चाही। सब होना चाही। सम्मान भला कोन ल अच्छा नइ लागय? हम दूसर ल सम्मान देबो त हमू ल मान मिलही।ताली दूनों हाथ ले बाजथे। संसार म अच्छा मनखे के , प्रतिभा के, गुन के सम्मान नइ होही त अच्छा काम करे के, अपन कर्तब्य ल डँट के निभाये बर पंदोली, प्रेरणा कइसे मिलही?
    सँगवारी हो! मैं तो ए कहना चाहत हँव कि जब-जब हमला कोनो सम्मान मिलय तब-तब भारी सावधान रहना चाही। सम्मान के संग फूल के कुप्पा होये के बीमारी धरे के सोला आना सम्भावना रहिथे। कहूँ ए रोग संचरगे त घाव बनत देरी नइ लागय। सम्मान के खातू-माटी अउ वाह-वाह के पलोये पानी म हिरदे भीतर घमंड के विष बेल जामे अउ घपटे के पूरा खतरा रहिथे। ए कहूँ जाम गे त दुर्गति होना तय हे।  सम्मान के संग एक ठन भयानक ' कलकलहा ' रोग घलो कई झन ल धरे दिखथे। ए रोग म 'सम्मान के भूख' बाढ़ जथे।पेट भरबे नइ करय। ए रोगी ह जेती पाथे तेती मुँह मारते रथे। ओला छिन भर चैन नइ राहय। ए ला कहूँ सम्मान नइ मिलय त छीना झपटी अउ लड़ाई झगरा म तको उतर आथे। एकर हालत सीलनिधि राजा के स्वयम्बर मा एती-वोती कूदत नारद मुनि कस हो जथे। सम्मान ह अइसे विटामिन ए जेला जादा खाये म उल्टा 'अंधरौटी ' रोग धर लेथे । ए बेचारा बिमरहा ल दुनिया म खुद ले श्रेष्ठ अउ कोनो दिखबे नइ करय। जेन मेर रइही, ऊँट असन घेंच ला टाँगेच रहिथे। हाँ एक बात अउ हे जेन मनखे ल सम्मान नइ पचय ओला 'लपलपहा अउ चपचपहा ' रोग संघरा धर लेथे। लपलपहा रोग के चिनहा अइसे हे कि हर जगा लपर लपर अबड़े गोठियाते रहना, कोनो दूसर के नइ सुनना अउ अपन श्री मुख से मैं, मैं, मैं---नरियाते रहना। चपचपहा रोग मा रोगी ह चिपकू हो जथे।ओ कहूँ सुन डरिच कि फलाना जगा ढेकाना आयोजन होवत हे जेमा देकर- ओकर सम्मान करे जाही त आप दू सौ परसेंट सहीं मानव ओहा आयोजक करा जाके चिपकबे करही अउ कइसनो करके अपन सम्मान के जुगाड़ मढ़ा के रइही।ए रोगी बड़ा टेलेंटेड जुगाड़ू होथे।
              सँगवारी हो सम्मान पाना सहज हो सकथे फेर वो सम्मान ल बनाये रखना बहुतेच कठिन बूता आय। सम्मान ल बहुत सहजभाव अउ बिना अहंकार के स्वीकारना चाही, बिना मतलब के सम्मान के पीछू नइ परना चाही। सम्मान के लाइक करम रइही त  सम्मान  मिल के रइही। विधाता घलो ह मनखे के जइसने करम होही ओइसने भाग ल लिखथे कहिथें।
    सम्मान ह अपन संग बहुत अकन बन्धन घलो संग म धरके आथे। खासकर कोनो ल ओकर नैतिक पक्ष ल,समाज सेवा ल, इंसानियत ल देख के, उत्तम कला ल देख के, उत्तम साहित्य सृजन ल देख के, देशभक्ति ल देख के सम्मान मिले हे त ओला अउ जादा सम्हल के जिंदगी बिताये ल परथे। ए ह खांड़ा के धार म चलना आय। उज्जर कुरता म छोटकुन करिया दाग ह घलो टकटक ले दिखे ल धर लेथे।ए जमाना म  कोनो आन म दाग खोजइया मन जादा हें, भले  वो खुद चिखला म रात-दिन सनाये रइही।
     सँगवारी हो! सम्मान ल यदि सहज भाव ले नइ ले जाय तब एहा भार स्वरूप हो जथे। गँजा -गँजा के घातेच गरू बोजहा हो जथे जेमा लदका के जिनगी के सुख-शांति हा मर जथे।

चोवा राम 'बादल'
हथबन्द, छत्तीसगढ़