Thursday, 30 November 2023

गऊ माता के इच्छा

 गऊ माता के इच्छा 

                    सरग म गऊ महतारी ला मनाये बर ब्रम्हाजी लगे रहय । गऊ माता हा धरती म जनम धरे बर बिलकुलेच मना कर दे रिहिस । ब्रम्हाजी कारण पूछिस तब गऊ माता बतइस - धरती के रहवइया मन महू ला मनखे समझथे अऊ अपने कस … खाये बर चारा देथे । मेहा मनखे थोरहे आँव ... तिहीं बता , मोला पचही तेमा  ? मोर रेहे बर .. बड़े बड़े गौशाला बना देथे ... हमन नानुक कोठा अऊ परसार के रहवइया आवन .. ओतेक बड़ जगा के आक्सीजन ... हमन ला बर्दाश्त नइ होवय , साँस ले बर तकलीफ शुरू हो जथे । इलाज पानी तो अतेक कर देथे के .. झिन पूछ ...। दूध नइ आही त सुजी , बाढ़हे बर सुजी ....... । बछरू बियाये बर सुजी .....। मोला अस्पताल सुजी पानी दवई बूटी हा डर लागथे ...... कहूँ मनखे मन कस घिसट घिसट के झन मरँव .. । ब्रम्हाजी किथे – तोला तो खुश होना चाही के .... तोर बहुतेच ख्याल राखथे धरती के मन .... ? गऊ माता किथे – खुश होके जातेंव ... फेर मोर का उपयोगिता हे उहाँ ... ? मोर दूध के कन्हो आवश्यकता निये .... मिठई बनाये बर यूरिया आ चुके हे । मोर गोबर कन्हो ला नइ चाही । छेना के जगा गेस सिलेंडर म जेवन चुरथे । उपज बढ़होये बर ... गोबर खातू के जगा .... रासायनिक कचरा हा खातू बन चुके हे । अब तो मोला बछरू जनमे के घला जरूरत निये ... मनखे के पेट ले ... भुकुर भुकुर के खवइया .... कतको गोल्लर ..... जनम धर डरे हे । मोर  पिला के का आवश्यकता हे अब तो खेती करे बर ...... मशीन निकल चुके हे । 

                  ब्रम्हाजी किथे – जे गऊ पोसथे तेला सरग मिलथे .... तैं नइ जाबे त .. मनखे मन कोन ला पोस के सरग म आहीं । गऊ माता किथे – धरती म पोसे पाले बर कुकुर हाबे .. । रिहिस बात तोर सरग के .. त सुन भगवान , जे कुकुर पोसथे तेकर घर , तोर सरग ले कतको सुंदर होथे .... । जीते जी सरग भोगइया मनखे ला मरे के पाछू ... तोर सरग के काये आवश्यकता । एक बात अऊ ... मेहा धरती म जाथँव त .... मोला कन्हो पोसय निही ..... मेंहा पोसथँव ... कतको झिन ला जियत ले अऊ कतको झिन ला ..... मरे के बाद .... । ब्रम्हाजी पूछिस - कइसे ? गऊमाता किथे – जियत रहिथँव त .... मोर नाव के सरकारी लछमी म .... कतको मनखे पल जथे । मर जथँव त .... मोर लाश म रोटी सेंकत ..... कतको के जिनगी सँवर जथे ..... । 

                    ब्रम्हाजी किथे – जनम धरे के बेरा लकठियावत हे ..... तैं जा बेटी ... ? गऊ माता किथे – तोर आदेश ...... मुड़ी नवा के स्वीकार हे फेर ...... मोरो एक ठिन शर्त हे ....... में उहां गाय के पेट ले जनम नइ धरँव ...... । उदुपले अइसन अलकरहा बिचार सुन ....... सुकुरदुम होके ब्रम्हाजी मुहुँ फार दिस ..... । पछीना पछीना होके ... सियान थकथकागे । हावा धुँकत .... चित्रगुप्त उपाय बतइस – येला दू गोड़िया बना देथन । वइसे भी धरती म येहा साधारन दू गोड़िया कस .... उपयोगिता विहीन होके ..... बिगन हुँके भुँके भुगतत हे .... । दू गोड़िया बन जही ते कम से कम मुहुँ तो दिखहि ....... । ब्रम्हाजी किथे – अतेक सिधवी ला काकरेच पेट म डार देबे .... ? मुहुँ ला काये करही देखाके .. ? चित्रगुप्त किथे – तैं ओकर फिकर झिन कर भगवान । में ओकर बेवस्था कर देवत हँव ..... । रिहीस बात मुहुँ के ... येहा बोलय झन कहिके ... जम्मो झन एकर सेवा बजाये के छ्द्म उदिम करही ... ।  उही समे ले गऊ माता हा जनता के नाव ले जनम धरके आये लगिस अऊ ओकरे कस भुगतत .. जिये मरे लगिस । तभो ले गऊ माता सिर्फ अतके म बड़ खुश हे के .... अब ओला जियत ले दूसर ला पोसे बर नइ लागे .... बल्कि उही ला पोसे के नाव म .... इहाँ के इंद्र मन .... जियत मरत लड़त भिड़त रहिथें ।  

  हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

कहानी : *एक लोटा पानी*

 कहानी : *एक लोटा पानी*

                       पोखन लाल जायसवाल

           भादो के महीना रहिस, अगास म पड़री बादर अइसे बगरे रहय, जइसे कोनो पोनी बेचइया ह पोनी के कुढ़वा मन ल बगरा दे हे, बीच-बीच ले झाँकत घाम चाम ल जरोते राहय। कमरछठ मनगे रहिस। आठे घलव बुलक गे राहय। आठे के दिन कृष्ण भगवान के असनादे बर घलव दया नइ दिखइस, बइरी बादर ह। करिया करिया मार घपटे रहिस अउ कोन जनी कति बिलम गे। द्वापर युग म इही बादर ह कइराहा इंद्रदेव के कहे ले जमके बरसे रहिस, वहू ल कातिक के महीना म। तभे तो एक अँगरी म गोवर्धन पर्वत ल उठाँय रहिन हें किसन महराज ह। छाता बरोबर सब के रखवारी करे रहिस तब गोवर्धन पर्वत ह। फेर अभी दिन अइसे जनावत हे कि चउमासा बुलक गे हे। कोनो-कोनो मेड़ पार के फूले काँसी ह बरसा के बुढ़वा होय के चारी करत हे। सफाचट के उतरे ले मेड़ पार के काँसी घलव नँदाय ल धर ले हे। अधछइहाँ घाम म फुरफूँदी मन बिकटे उड़त हवँय।

           आज तीजा हरे। बिहनिया ले घर-अँगना अउ दुआरी ल बहार-बटोर के बहिनी-माई मन असनान-ध्यान म लगे हें। भोले बाबा ल सुमिरन करत हें। माटी के बनाय शिवलिंग के अभिषेक करत  मोर माँग के सिंदूर सदा दिन चमकत रहय, कहिके पूजा पाठ करत विनती करत हवयँ। तीजा उपास ल पति के लम्बा उमर बर रखे जाथे। कोनो-कोनो मन अपन मइके तो आय हवयँ, फेर उपास नइ राखे हें। बेरा-कुबेरा कहूँ ए उपास टूट जथे त अउ रखे नइ जावय, इही मानता ले कुछ झन मन उपास रहई के शुरुआत नइ करे हें। वइसने जेन मन ए उपास ल शुरुच नइ कर पाय रहिन हें, ओमन आसो लौन के बाढ़े ले उपास नइहें। लौन नइ बाढ़े रहितिस, त अभी नवरात्र परब चलत रहितिस। चउँक-चउँक म देवी पूजा होवत रहितिस। माँदर के थाप अउ झाँझ के संग जसगीत सुनत मन झुमरत-नाचत रहितिस। गाँव के महामाई अउ शीतला दाई के मंदिर सजे मिलतिस। आस्था के जोति ले मन म उजास बगरत रहितिस। ए जोत अंँजोर तो आगू बगराबे करही, ओकर पहिली गणपति ल भजे ल परही अउ ओकर गे ले सरगवासी पुरखा मन ल परघा के असीस ले ल परही। अपन पुरखा मन ल हम नइ सोरियाबोन त काली हमर लइकामन हमर कति ले हियाव करहीं? अब तो कतको मन कहे धर लेहे - 'जीयत म पुछारी नहीं अउ मरे म सोहारी।' त कोनो अउ पटंतर देवत कहिथे- 'जीयत भर दू लोटा पानी बर नइ पूछे, अउ मरे म गंगा।' 

         शहरिया मन के चरितर ल सुन के गँवइहा मन के छाती फाट जथे। जेन ददा पुरखा के कमई ले टींग पूछ करथे। अपन गोड़ म ठाड़ होय रहिथे। उही दाई ददा के हियाव नइ करँय। अथक होय ले उन ल आश्रम म भरोसा छोड़ आथे। बने हे, ए बीमारी अभी गाँव म नइ सँचरे हे। 

          गणपति पंडाल तिरन इही गोठ ल सुन के सुरता आगिस पउर साल के। इही मेर के गोठ आय। जब अइसन पटंतर देवइया जवनहा मन के गोठ ल सुन के मनराखन बबा के रिस तरवा म चढ़गिस। अउ गुसिया के चिचियाइस। ' रे! परलोखिया हो!! तुमन अपन ल देखव। दूसर ल दोष काबर देथव? तइहा के मनखे मन अपन दाई-ददा के तन-मन ले सेवा करँय, खटिया म परे तभो जतन करँय। कभू दाई-ददा के आगू मुँह नइ उलत रहिन उँकर। अभी के मन ... एक ले दू होइस अउ दू ले चार महीना नइ बीते पाय, दू ठन चूल्हा बना डारथे घर म। घर के अँगना खँड़ा जथे। दाई-ददा बइरी जनाथे। अइसन मन बर तो दाई-ददा बोझा होथे... बोझा..।' 

        मनराखन बबा इही मेर नइ थिराइस आगू काहते गिस - अपन करनी ल तोपे बर दस बहाना तूहीं मन ल आथे, रे ननजतिया हो! पुरखा मन के नेंग-जोंग मन ल निभा नइ सकव त झन निभाव, फेर उँकर भावना के मजाक झन तो उड़ावव। कोन काहत हे तुम मानौ। फेर एकरे बहाना जउन पुरखा ल मानत हें उँकर आस्था ल तो चोट झन करव।'

        कोन जनी? मनराखन बबा के कोन पीरा ह उसल गे रहिस ते ओ दिन? बड़ सुनाय रहिस टूरा मन ल। सब्बो झन के मुँह सिलागिस बबा के गोठ सुन के। पंडाल सजई ल छोड़ के सुटूर-सुटूर टरक दे रहिन सबझन। 

       'ले बबा! चुप रहा...सबो झन भगा गिन हें अब। कोनो नइ हे। लइका आय नइ जानय। रीत रिवाज अउ उँकर मानता ल। हमीं मन सिखाबो अउ उँकरे मन के रम के समझाय म समझहीं। बिशेसर कका ह बबा ले कहिस।

*******

          'कुछु होवय एक बात तो मानेच ल परही कि तीज तिहार के बहाना हम बेटी मन बर मइके के दुआरी खुला रहिथे। कभू-कभू मन मुटाव अउ कोनो किसम के अनबोलना होगे हे, गलतफहमी होगे हे, वहू ह एकरे बहाना दुरिहा जथे। मन मिल जथे।'  करू भात खावत-खावत महेश्वरी ह अइसने च तो केहे रहिस काली अउ छोटे फुफू ह हुँकारू देवत कहिस - 'बने काहत हस बेटी! हम नारी-परानी मन तो बिहा के, मइके बर पहुना हो जथन। एक लोटा पानी भर मिलत रहय, मन म अतकेच के आस रहिथे। मया के बँधना ल इही एक लोटा पानी ह जोर के राखथे।' 

          बड़की फूफू ह जुन्ना दिन ल सुरता करत कहिस, 'अब तो पहिली के जइसे दिन नइ रहिगे हे। पहिली बहिनी-माई मन तीजा माने अठुरिया अकताहा मइके आ जवत रहिन। अब तो पोरा घलव ससुरार म मान लेवत हे। तीजा उपास रहे के दिन ले मइके के अँगना म हबरथे। करू भात के दिन बेरा आछत ले मइके पहुँचे के दिन-बादर (नेत मढ़ाथें) धरथें। लइका मन के पढ़ई-लिखई बहाना जउन होगे हे। पढ़ई ले जिनगी के अँगना म अंजोर बगरथे। बस्ता ल खूँटी म टँगई ह बने बात नोहय। प्रतियोगिता बाढ़ गे हावय, अइसन म चेत तो करेच ल परही। जे पढ़थे, ते बढ़थे।'

           फूफू के गोठ लम्बा रेस सहीं नॉनस्टॉप चलते रहिस।

           'मोटर गाड़ी घलव अब अपने हाथ के बात होगे हवय। घरोघर फटफटी जउन होगे हवय। बरसा पानी ले नरवा-ढोंरगी के पूरा आय के तो गोठेच नइ रहिगे हे। रपटा-पुलिया मन पक्की हो होगे हें। चउमासा म घलव पहिली घरी कस अब झड़ी नइ होवय। सुरुज नरायन के दर्शन बिगन बासी खवइया मन ल लाँघन रेहे के जरूरत नइ रहिगे हे।' बड़की फूफू कोनजनी अउ कतेक ल अमरतिस ते। रोटी-पीठा बनाय बर पिसान अउ जरूरी सबो जिनिस के गोठ करत महेश्वरी ह फूफू ल अपन गोठ ल घिरियाय बर कहिस। फूफू ह महेश्वरी के चाल ल समझ गिस, तभे तो कहिस- 'महेश्वरी ल मोर गोठ कभू भाबेच नइ करय।'

        महेश्वरी ह फूफू ल मनावत कहिस, 'अइसन बात नोहय दीदी, तहीं बता न? काली पूजा पाठ करे मंदिर जाबोन कि नहीं? अभी संसो नइ करबो त फेर तेलई कतका बेर बइठबो? ...मन नइच माढ़े होही त गोठियाइच ले। फेर मन ल झन मार ...मोर माता।'

         'नहीं बेटी ! में तो ठठ्ठा करत रेहेंव। तें सहीं काहत हस। ...अउ सुन न बेटी! काली अतके जुआर तोर मोबाइल म 'श्री शिवाय नमस्तुभ्यं' वाले महराज के कथा चलाय बर भुलाबे झन। शिव-पारबती के कथा सुनवाबे हँई?' अतका ल सुन सबो कोई हाँस डरिन। 

          दीदी! महराज तो तीजा तिहार म फुलेरा बाँधे बर कहिथे, बाँधबोन का ओ ...अतका ल सुन के छोटकी फूफू ल खलखला के हाँस डरिस।...

         तीजा के अगोरा तो सबो ल रहिबे करथे। लइका मन ल घलव ममा घर जाय के बड़ अगोरा रहिथे। आजकाल तो गरमी छुट्टी ह होमवर्क के भेंट चढ़ि च जथे। प्राइवेट स्कूल के तो हाल अउ झन पूछव। अइसन म घर म धँधाय लइका मन बाहिर जाय के सोचथें। फेर अब तो ओमन ल तिमाही परीक्षा के राहू गिरहा मन ह जम के घेर ले रहिथें। उँकर मनसा म पानी फेर देथे। महेश्वरी सात बछर के नोनी ल घर म छोड़ के आय रहिस। फूफू के मोबाइल कहे म नोनी कोति महतारी के मया उफनाय लगिस। सुरता के डोर लाम गिस। नोनी ले तुरते गोठियाइस तब कहूँ महतारी के उफनात मया शांत होइस।

          कुछु रहय मइके के सुरता ल तीजा के जोरन म अकताहा जोरत रहिथें। बेटी-माई मन घलव भाई-भौजी के घर एक लोटा पानी के थेभा बने रहय, सोचथें। इही आस म अपन मन ल मढ़ा लेथें। एकरे ले मया के बँधना जुरे रहय, इही आसरा करथें। इही आस ल तीजा तिहार ह बछर भर म पूरा करथे। 

           कोरोना बइरी ह अँगना ल उजाड़ कर दे रहिस। महेश्वरी के दाई-ददा अउ कोइली कस कुहकत नान्हे भतीजिन ल अपन गाल म भख ले रहिस हे। भाई कमलेश के अँगना सुन्ना होगे रहिस। बिपत के ओ घरी म भाई कमलेश ह यमराज के दुआरी ले, ले दे के घर लहुटे रहिस। बीस-बाईस दिन ले बिस्तर म परे रेहे रहिस। सबो के मन उतर गे रहिस हे। कोनो ल भरोसा नइ रहिस कि भाई ह हाथ आही। कमलेश के दाना-पानी बाँचे रहिस, तभे तो घर आ पाइस।.... बड़ दिन ले घर के हाँसी ल गरहन धर ले रहिस हे। कोरोना के लगे सूतक उतरे नइ रहिस। 

           चार महीना पहिली घर म नवा सगा के आय ले खुशहाली ह लहुटे हावय। इही तो जिनगी आय। दुख के पाछू सुख अउ सुख के पाछू दुख लगे रहिथे। बेरा एके ठउर म नइ ठहरय। उवत बेरा धीरे-धीरे बुड़ती म जाथे, त रतिहा पोहाय ले फेर उत्ती डहर ले झाँके लगथे। बिहनिया सुरुज नरायन अपन अँजोर ले घर के मुहाटी खटखटाथे। अउ नवा संदेशा देथे, नवा शुरुआत के। दुख के दिन ल बिसार हँसाय के उदिम करथे। दुख के घड़ी आथे त चल घलव देथे। घड़ी के काँटा कब रुके हे, भितिया म टँगाय घड़ी के जेन काँटा बारा बजावत ठाड़ तपथे, उहीच काँटा तो छै बज्जी अपन थोथना उतार देथे। बस मनखे ल मन म आस अउ धीर राखे के चाही। अइसने कमलेश के जिनगी म छाय उदासी के अँधियार घलव छटगे रहिस हे। अँगना म फूल ममहात रहिस। ओकर जिनगी अब उछाह ले भरगे हावय।

          चतुर्थी के दिन हरे। कमलेश तीजहारिन फूफू अउ बहिनी मन ल तीजहा लुगरा देवत हावय। लुगरा झोंकत फूफू मन के आँखी छलछलाय लागिस।  बड़की फूफू के मुँह अपन भाई-भौजी के सुरता करत रोनहुत होगे। सुरता कइसे नइ आतिस, जइसने लुगरा भाई भौजी बिसावय तइसने च लुगरा भतीजा घलव बिसाय हे। कोनो भेद नइ करे हे कमलेश ह बहिनी अउ फूफू म। लुगरा ल झोंकत बड़की फूफू कहिस,  ''कमलेश बेटा! हम ल अइसने तीजा म सोरिया ले करबे बेटा। भलुक लुगरा झन बिसाबे। मन म अतके आस हावय कि जीयत भर ए घर म एक लोटा पानी मिलत राहय। मया के पाग म जुरे नता कभू छरियाय झन।"

           अतका सुन के कमलेश कहिथे- "दीदी! ददा के रहिते आवत रेहे, त ददा के गे ले नता गोता ल मैं नइ सरेखहूँ त कोन सरेखही? बाप एके झन रहिन अउ महूँ तो अकेला हवँव। पुरखा मन के चलागन ल आगू बढ़ाय बर। भाई रहितिस त ओकर हिजगा करतेंव। बाप अउ भाई के आँखी मूँदे ले तोर मइके डेरउठी तो इही भतीजा के डेरउठी आय। तीजा ले जुरे तुँहर आस ल कभू नइ टोरँव दीदी मैं ह। काहीं ल सकँव, ते झन सकँव... एक लोटा पानी ल जरूर सकहूँ।"

          भादो के महीना म पानी बरसत नइ हे त का होइस, फूफू-भतीजा के मया छलके लगिस। दूनो के आँखी ले अरपा-पैरी बोहाय लगिस। महेश्वरी फरहार बर लोटा के पानी मढ़ावत दू मन आगर फूफू मन ल कहत हावय- मोरो घर एक लोटा पानी तुँहर अगोरा करत हावय दीदी हो। भाई ऊपर जम्मो मया ल झन ढकेलव, थोर बहुत मोरो बर बचाहू।....अब जम्मो झन खिलखिला के हाँसत हावय।



*पोखन लाल जायसवाल*

पठारीडीह (पलारी)

जिला: बलौदाबाजार भाटापारा छग

मो. 6261822466

जेठउनी

 जेठउनी ....

    कातिक के दूसर पाख एकादशी ...तुलसी बिहाव है न ? आज के बाद चार महीना ले सुते देवता धामी मन जागहीं तभे तो लोग लइका मन के बर बिहाव सुरु होही । लोक मान्यता आय ओइसे मुख्य कारण ये हर आय के चार महीना चौमास मं लोगन खेती किसानी मं बिपतियाय रहिथे । पानी बादर मं बर बिहाव करे ले घराती , बराती सबो ल परेशानी तो होबे करथे । 

      वृंदा पतिव्रता नारी रहिस फेर मति फिर गे ते पाय के छल ल नइ चीन्ह पाईस , रिसा के पति महाराज श्राप दिस जा तैं तुलसी के बिरवा बन जा फेर तोर जघा घर के बाहिर अंगना मं रहिही । ठीक हे भाई सदा दिन ले तो नारी ही सजा पावत आवत हे । चिटिकन ध्यान देहव ...हमर संस्कृति मं नारी के शक्ति रुप के पूजा अर्चना के विधान घलाय तो हे न ? तभे तो वृंदा श्राप दिहिस भगवान हरि ल , गुनव तो नारी के शक्ति ल ..दूसर बात के भगवान हरि नारी के सम्मान करीन तभे तो मूड़ नवा के सालिग राम पथरा बन गिन । ओकरो ले बड़े बात के तुलसी चौंरा मं सालिग राम तुलसी के जरी मेरन  माने गोड़ तीर बिराजथें ...। भगवान तो पुरुषोत्तम आयं न फेर नारी ल सम्मान देहे बर शरणागत हो गए हें । 

     इही हर आय हमर संस्कृति के विशेषता जिहां नर नारी दूनों एक दूसर के सम्मान करथें , कोनो छोटे बड़े नोहयं बल्कि एक दूसर के पूरक आयं । 

वृंदा के महत्ता ल उजागर करे च बर तो कहिथन वृंदावन बिहारी ...। 

   फेर कोनो दिन अउ लिखिहंव ...चलत हंव कुसियार के मड़वा तियार हे तुलसी , सालिगराम के बिहाव करे बर हे । 

सरला शर्मा

शिक्षा माध्यम के महत्व..

 शिक्षा माध्यम के महत्व..

    जेन भाखा म हम शिक्षा पाथन वो भाखा के संगे-संग वोकर ले जुड़े कला, संस्कृति, साहित्य, इतिहास अउ गौरव सबके हमन ल जानकारी होवत जाथे. वोकर ले जुड़े धर्म, पूजा उपासना के प्रतीक अउ जीवन पद्धति घलोक कोनो न कोनो माध्यम ले हमर जिनगी म समावत जाथे. 

    आज अपन आसपास ल देख लेवव. हमन ल हिन्दी भाखा के माध्यम ले शिक्षा दिए गे हे, तेकर सेती जतका हिन्दी भासी क्षेत्र अउ राज्य हे, उन सबो ले जुड़े संस्कृति अउ परंपरा ल घलो हमला पढ़ाए गे हे. जबकि हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी आय, फेर हमला छत्तीसगढ़ी के माध्यम ले शिक्षा नइ दिए गे हे, तेकर परिणाम ए आय के हम छत्तीसगढ़ी ले जुड़े संस्कृति अउ परंपरा ल वतका नइ जानन जतका हिन्दी ले जुड़े संस्कृति अउ परंपरा ल जानथन-समझथन. इही शिक्षा के माध्यम के सेती आज हम अपन मूल संस्कृति अउ परंपरा ल बिसरावत जावत हन. एकर ले बचे बर एकर असल कारन, माने शिक्षा के माध्यम ल अपनाना परही. जब हमर शिक्षा के माध्यम छत्तीसगढ़ी बनही, तभे छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी ले जुड़े जम्मो कला, संस्कृति परंपरा, इतिहास अउ गौरव बांचे पाही, हमर आने वाला पीढ़ी जान पाही, आत्मसात कर पाही.

    मैं तो इहाँ तक कहिथौं, हमन ल धर्म अउ पूजा उपासना के बारे म घलो इही मानक ल अपनाना चाही. मैं हमेशा लिखत-बोलत रहिथौं- छत्तीसगढ़ आध्यात्मिक रूप म अतका समृद्ध हे, ते हमला कोनो भी बाहर के न कोनो गुरु के जरूरत हे, न कोनो ग्रंथ के, न कोनो उपासना के प्रतीक या विधि के. इहाँ सबकुछ हे, बस जरूरत अतके हे, के हम अपन पुरखौती परंपरा ल झांकन, वोला धो-मांज के उजरावन अउ अपन संगे-संग जम्मो पिरोहिल मनला आत्मसात करे बर जोजियावन.

    आज हमन छत्तीसगढ़ी भाखा ल शिक्षा के माध्यम बनाए खातिर सरकार जगा गोहरावत रहिथन, वोकर इही सब कारन आय. जे दिन छत्तीसगढ़ी इहाँ के शिक्षा के माध्यम बन जाही, हमर हर किसम के विकास अपने-अपन हो जाही. हमला 

 कोनो भी कारन ले ककरो मुंह देखे के जरूरत नइ परही. 

जय छत्तीसगढ़.. जय छत्तीसगढ़ी

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

छत्तीसगढ़ी" कब बनही राज-काज के भाखा ..???

 "छत्तीसगढ़ी" कब बनही राज-काज के भाखा ..???


28 नवंबर 2007 के  छत्तीसगढ़ विधानसभा म छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा दे खातिर विधेयक पारित करे गे रहिस । तब ले हमन 28 नवम्बर के दिन ला छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के रूप म मनावत आत हन। 16 बछर होगे हवय छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा बने फेर अब तक राज-काज के भाखा नइ बन पाना ये चिंता के विषय हे ।


पाठ्क्रम म छत्तीसगढ़ी भाखा ला शामिल करें के माँग कई बच्छर ले उठत रहिस । प्राथमिक स्तर म कक्षा पहली ले पाँचवीं तक कम से कम एक विषय छत्तीसगढ़ी ल अनिवार्य रूप से लागू करे के माँग ल सरकार पूरा तो करिस फेर छत्तीसगढ़ी के संग अन्य क्षेत्रीय बोली ल अलग अलग जगा पढ़ाये के उदीम कर के छत्तीसगढ़िया मन ल बांटे के काम सरकार हा कर दिस। जब कोनो राज के भाखा,साहित्य अउ संस्कृति के विकास होही तभे सही मायने मा उँहा के मनखे मन के विकास होही। छत्तीसगढ़ी म सरलता अउ सहजता लाये खातिर देवनागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण के प्रयोग होना चाही संगे संग दूसर भाखा ले आये शब्द ल ज्यों के त्यों ले बर परही येकर ले छत्तीसगढ़ी के शब्द भंडार घलो बाढ़ही । शब्द भंडार बाढ़े ले भाखा के प्रसार अउ व्यापक होही।

          छत्तीसगढ़ी प्रायमरी स्कूल म लागू होय के पहिली ले एम.ए.के कोर्स विश्वविद्यालय म पढ़ाये जात हवय फेर  छत्तीसगढ़ी भाखा फिलहाल तक रोजगारोन्मूलक नइ हे। एम.ए.करे के बाद युवा मन बेरोजगार घूमत हवय। यदि भाखा हा रोजगारोन्मूलक नइ होही तब वो भाखा ला कोनो काबर पढ़ही ? सवाल यहू हवय कि जब हिन्दी, अँग्रेजी, संस्कृत सहित अन्य प्रदेश के भाखा म पढ़े लिखे युवा मन बर रोजगार के अवसर हवय तब छत्तीसगढ़ी भाखा के पढ़े लिखे युवा मन बर काबर नहीं ? अउ यदि छत्तीसगढ़ी मा एम.ए.करे युवा ल रोजगार नइ मिलही तब ये कोर्स चलाय के का फायदा ?


छत्तीसगढ़ी ला आठवीं अनुसूची में शामिल करे बर के बात कहे जाथे ये केवल मन ला बहलाए के उदिम आय। प्रदेश के सांसद मन लोकसभा अउ राज्यसभा मा ये मुद्दा ला उठाइन,बने बुता करिन हवय फेर एक संग एक स्वर म काबर नहीं। फेर मोर सवाल अतके हवय कि पहिली अपन राज म तो छत्तीसगढ़ी ला राज-काज के भाखा बना लव फेर आठवीं अनुसूची कोती जाबों । छत्तीसगढ़ी आठवीं अनुसूची म जब आही तब आही अभी फिलहाल तो राज-काज के भाषा बनाना जरूरी हवय। जेन काम केंद्र के आय तेकर बर दउड़ धूप अउ जेन काम राज के आय तेकर बर सबो चुप..? 


छत्तीसगढ़ के जम्मो जन प्रतिनिधि मन छत्तीसगढ़ी ल बने ढंग से जानथे अउ बोलथे घलो फेर विधानसभा के कार्यवाही, मंत्रालयीन कार्य, प्रेस कांफ्रेंस अउ आम बोलचाल मा छत्तीसगढ़ी के उपयोग काबर नइ करय ? जइसन धारा प्रवाह छत्तीसगढ़ी के प्रयोग चुनावी भाषण म करथे, चुनाव होय के बाद अपन महतारी भाखा ल काबर भुला जथे ? सही मायने म देखा जाय ता छत्तीसगढ़ी ल यदि कोनो बचा के रखे हवय ता वो हे- गाँव के किसान, मजदूर, काम वाली बाई, मिस्त्री, बढ़ई मन हे। जेन दिन इमन छत्तीसगढ़ी बोले ल छोड़ देही वो दिन छत्तीसगढ़ी नँदाय के कगार म पहुंच जाही। 


छत्तीसगढ़ी के प्रशासनिक शब्दकोष तैयार करे गिस अउ प्रशानिक अधिकारी मन ला मंत्रालय मा  प्रशिक्षण भी दे गिस फेर मंत्रालय के अधिकारी मन छत्तीसगढ़ी के कतका प्रयोग करथे ये बताय के जरूरत नइ हे। जब राजनेता मन छत्तीसगढ़ी  बोलही तभे अधिकारी अउ कर्मचारी मन छत्तीसगढ़ी बोलही। काबर जेन भाखा ल राजा बोलथे उही भाखा के प्रयोग नौकरशाह करथे। छत्तीसगढ़ी तो केवल नाम के राजभाषा हावय काम तो होबे नइ करत हे। छत्तीसगढ़िया मनखे मन सरकार डहर आस लगाए देखत हवय आखिर  छत्तीसगढ़ी कब बनही राज-काज के भाखा..?


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ी राज्य भाषा दिवस म विशेष छत्तीसगढ़ी के दशा अउ दिशा

 छत्तीसगढ़ी राज्य भाषा दिवस म विशेष 



छत्तीसगढ़ी के दशा अउ दिशा 


 छत्तीसगढ़  देस के 26 वां राज्य हरे.  छत्तीसगढ ह 1 नवंबर 2000 म नवा राज्य के रुप सामने आइस.  




 इहां के राज्य गीत 'अरपा पैरी के धार...' हे. येकर रचयिता डा. नरेंद्र देव वर्मा हरे. राजकीय पशु वन भैंसा, राजकीय पक्षी बस्तर के पहाड़ी मैना, राजकीय वृक्ष साल या सरई, राजकीय फूल गोंदा  ( गेंदा)अउ प्रमुख भाषा छत्तीसगढ़ी हरे. इहां के अभी राजभाषा हिंदी हे. छत्तीसगढ़ी राजभाषा बने खातिर आठवीं अनुसूची म सामिल होय बर अगोरा करत हे. इहां के रहवासी मन येकर बर अपन अपन तरीका ले उदिम करत हे. छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग घलो बने हावय. 




  कतको इतिहासकार मन के मत हे कि हमर छत्तीसगढ भगवान श्री रामचंद्र के माता कौशल्या के मईके हरे. छत्तीसगढ़ के पुराना नांव कोसल रिहिस  अउ इहां के भाषा ल कोसली कहे जाय.कौशल्या के नांव भानुमति रिहिस जउन ह दक्षिण कौशल के महाप्रतापी राजा  भानुमनत के बेटी रिहिन. अयोध्या के राजा दशरथ के महारानी भानुमति कौशल प्रदेश के होय के कारन आगू चलके कौशल्या कहलाइस. आदिकाल म छत्तीसगढ़ महाकौशल  नांव ले प्रसिद्ध रहे हे. श्रीराम के जनम भले अयोध्या म होय हे पर कर्मभूमि छत्तीसगढ़ रहे हे. श्रीराम के ननिहाल दक्षिण कौशल म चंदखुरी (आरंग) हरे. बाल्मिकी द्वारा रचित रामायण के अनुसार सूर्यवंशी श्री राम अपन वनवास काल म लगभग बारह बछर तक इही छत्तीसगढ़ (सिहावा) राज्य म वो समय के सप्तऋषि क्षेत्र म बिताय रिहिन.


हैदरअली अउ रत्नदेव के बाद पृथ्वी देव,जाजल्व देव चेदीवंशीय राजा मन कोसल प्रदेश म ३६ किले (गढ़) बनवाइस.येकर अलावा गोंड राजा मन घलो गढ़ बनवाइस.चेदीवंशी राजा मन के कारन ये राज के नांव चेदीसगढ़ रखे गिस जो आगू चलके छत्तीसगढ़ कहलाइस. तेकर सेति इहां के कोसली भाषा ह घलो छत्तीसगढ़ी कहलाय लागिस.  छत्तीसगढ़ी अब्बड़ पुराना भाषा आय .राज्याश्रय नइ मिल पाय के कारन छत्तीसगढ़ी के लीखित रुप विकसित नइ हो पाईस.पर इहां के जन जीवन म ये भाषा ह मौखिक रूप ले बराबर फूल -फरत अउ बाढ़त रिहिस.अउ आजो  छत्तीसगढ़ राज बने तेवीस बछर पूरा होगे पर सही ढंग ले राज्याश्रय नइ मिल पाय के कारन संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल नइ हो पात हे. 


आज छत्तीसगढ़ राज्य बने 23  बछर होगे. अलगे छत्तीसगढ़ के मांग अंग्रेज शासन के समय ले करे जात रिहिन हे. हमर छत्तीसगढ ह मध्यप्रदेश के 44  बछर तक हिस्सा रिहिन.




  अलगे छत्तीसगढ़ राज बर हमर पुरखा मन अब्बड़ लड़ाई लड़िन हे. राजनीति दल, राजनीतिज्ञ के संगे -संग हमर छत्तीसगढ के साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार अउ मजदूर, किसान मन के गजब सुग्घर योगदान हे. ये बने बात हे कि छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन म कोनो किसम के खून- खराबा, सरकारी संपत्ति ल नुकसान  नइ पहुंचाय गिस. ये हमर छत्तीसगढ के बड़का उपलब्धि हरे.आप सब ल मालूम हे कि 

आने राज बने म नंगत खून खराबा होय हे. 


  छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना म इहां के साहित्यकार अउ कलाकार मन के गजब सुग्घर योगदान हे.




कोनो भी देश अउ राज्य के पहिचान उहां के भाषा के माध्यम ले होथे.अपन स्वाभिमान, अतीत के गौरव, संस्कृति के रक्षा अउ विकास बर अपन मातृभाषा सबले बड़का माध्यम होथे. वइसने छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ के आत्मा हरे. हमर छत्तीसगढ़ी ह आठवीं अनुसूची म शामिल होय बर लड़त हे.


  


धनी धर्मदास - संत धर्मदास संत कबीर के शिष्य रिहिन. उंकर जनम  सन १३९५ म कसौदा गांव , बाधोगढ़,के वैश्य परिवार म होय रिहिन हे.  उन्कर कर्म क्षेत्र छत्तीसगढ़ रिहिन. बांधो गढ़ पहिली छत्तीसगढ़ म रहिस हे.१४५२ म वो सत्यलोक प्रयान करिन. हेमनाथ यदु जी ह धर्मदास ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि मानथे.  वोहर कवर्धा (कबीरधाम) म कबीर पंथ‌ के स्थापना करिन. वोहर संत कबीर ले प्रेरित होके निर्गुन भक्ति के कतको पद के रचना छत्तीसगढ़ी भाषा म करिन. वोकर पद म हमला छत्तीसगढ़ी भाषा के पुराना रूप के दर्शन होथे.  छत्तीसगढ़ी चौका गीत म धर्मदास के नांव के उल्लेख हे.ये ह लोकगीत अउ लोक भजन के रूप म गजब प्रसिद्ध हे. संत धर्मदास ह लोक गीत के सहज,सरल शैली म निगूढ़तम दार्शनिक भावना ल अभिव्यक्त करिन. धर्मदास के उद्देश्य साहित्य सृजन करना नइ रिहिस. वोहर

तो निर्गुन भक्ति के प्रचार के रूप म छत्तीसगढ़ी ले प्रभावित होके पद लिख के संतोस कर लेइस.


जमुनिया की डार मोरी टोर देव हो।

एक जमुनिया के चउदा डारा,सार शबद ले के मोड़ देव हो.


मोर हीरा गवां के कचरा में, कोई पूरब,कोई पछिमम बतावै, कोई बतावै है पानी पथरा में।


छत्तीसगढ़ के संस्कृति, साहित्य अउ धर्म परंरपरा के बढ़वार म संत धर्मदास के अब्बड़ योगदान हे.


दलपत राव - खैरागढ़ के राजा लक्ष्मी निधि राय के चारण कवि दलपतराव ह सबले पहिली छत्तीसगढ़ शब्द के प्रयोग १४९४ ई.म करे रिहिन.


सुंदर राव - देवी प्रसाद शर्मा,बच्चू जाजगीरी है खैरागढ़ के कवि सुंदर राव ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि बताय हे. १६४६ म रचित उंकर कविता म छत्तीसगढ़ी के पुट कम दिखथे अउ अवधी के नजदीक जादा दिखथे. 


गोपाल मिश्र और माखन मिश्र-  


 गोपाल मिश्र रतनपुर के हैहयवंशी राजा राज सिंह के राजकवि अउ दीवान रिहिन.राम नरेश त्रिपाठी ह उंकर जनम १६३३अउ 

प्यारेलाल गुप्त ह १६३४ माने हे. उंकर रचना' खूब तमाशा' अब्बड़  प्रसिद्ध होइस.उंकर आखिरी अपूर्ण ग्रंथ 'राम प्रताप' ल वोकर सुयोग्य बेटा कवि माखन मिश्र ह 

पूरा करिन.   हरि ठाकुर के कहना हे कि गोपाल मिश्र एक महान कवि रिहिन पर वो मन अपन साहित्य के रचना छत्तीसगढ़ी म नइ करिन. येला छत्तीसगढ़ी के दुर्भाग्य ही कहे जा सकथे.


बाबू रेवा राम - बाबू रेवा राम बहुमुखी प्रतिभा के धनी रिहिन. वोकर जनम रतनपुर म सन् १८१३ म होय रिहिस. वोहर हिंदी, संस्कृत, ब्रजभाषा,अउ छत्तीसगढ़ी के बढ़िया जानकार रिहिन हे. संगे संग उर्दू अउ फारसी म घलो अधिकार रखे. हरि ठाकुर जी के अनुसार रेवाराम बाबू छत्तीसगढ़ी म कुछ भजन लिखा के थिरागे. समीक्षक अउ भाषाविद् डा. विनायक कुमार पाठक के कहना हे कि बाबू रेवा राम के रचना 'सिंहासन बत्तीसी'  म छत्तीसगढ़ी के पुट देखे ल मिलथे.


प्रहलाद दुबे - सत्रहवीं शताब्दी म सारंगढ़ निवासी प्रहलाद दुबे के रचना 'जय चंद्रिका ' म छत्तीसगढ़ी के प्रकृत रूप देखे ल मिलथे.


संत घासी दास - संत घासीदास के जनम छत्तीसगढ़  के गिरौदपुरी म  होय रिहिस हे. सतनाम पंथ के संस्थापक संत घासी दास के उपदेश छत्तीसगढ़ी म लिखे गे हवय. उंकर रचना म संसारिक संबंध के असारता अउ ईश्वरीय  कृपा के प्राप्ति के इच्छा ह झलकथे. 'चल हंसा अमर लोक जइबो ' अउ ' खेलथे दिन चार मइहर मा '  जइसन पद येकर उदाहरण हे.


नरसिंह दास वैष्णव - समीक्षक डा.विनय कुमार पाठक ह जांजगीर जिले के गांव तुलसी निवासी नरसिंह दास वैष्णव ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि मानथे. उंकर रचना शिवायन (१९०४)म आय रिहिस.


पंडित सुंदरलाल शर्मा - डा. नरेन्द्र देव वर्मा ह छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि चमसूर ( राजिम)निवासी, छत्तीसगढ़ के गांधी  पंडित सुंदरलाल शर्मा ल मानथे.छत्तीसगढ़ी म 

बड़का सृजन करइया वो पहिली रचनाकार रिहिन. १९०६ म प्रकाशित' छत्तीसगढ़ी दान लीला ' अब्बड़ प्रसिद्ध होइस.येहा छत्तीसगढ़ी के पहिली प्रबंध काव्य माने जाथे. ये कृति ह हमर छत्तीसगढ के साहित्यकार मन ल छत्तीसगढ़ी म लिखे बर प्रेरित करिन. उंकर देहावसान २८ दिसंबर १९४०म होइस.


पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय - नंद किशोर तिवारी जी ह पं.लोचन प्रसाद पाण्डेय ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि बताय हे. अइसने दया शंकर शुक्ल ह घलो' कविता कुसुम ' १९०८-०९ म‌ प्रकाशित उंकर छत्तीसगढ़ी कविता ल छत्तीसगढ़ी के पहिली रचना माने हे. 


हरि ठाकुर -  सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर प्यारेलाल लाल सिंह जी के पुत्र, छत्तीसगढ़ी गीतकार हरि ठाकुर जी छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन ले 1956 ले जुड़ गे रिहिन. उंकर रचना म छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान झलकथे. छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर खण्ड काव्य अउ छत्तीसगढ़ी गीत अउ कविता लिख के छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ल जगाइस. राजनांदगांव के विद्रोही कवि कुंज बिहारी चौबे जी के छत्तीसगढ़ी कविता मन के संपादक करिन.


डा.नरेंद्र देव वर्मा - छत्तीसगढ़ राज्य गीत -अरपा पैरी के धार महानदी हे अपार... के रचयिता डा. नरेन्द्र देव वर्मा हरे. ये गीत ह छत्तीसगढ़वासी मन के स्वाभिमान ल जगाय के काम करिन. सोनहा बिहान के लेखक.


लक्ष्मण मस्तुरिया - दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा स्थापित' चंदैनी गोंदा' बर गीत लिख के स्थापित होय लक्ष्मण मस्तुरिया जी के छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना म अब्बड़ योगदान हे. उंकर लिखे गीत - 'मोर संग चलव रे' अउ  'मंय छत्तीसगढ़िया अंव रे'  ह अलग छत्तीसगढ़ राज्य के नेंव तइयार करिस.


संत कवि पवन दीवान - संत कवि पवन दीवान जी ह प्रवचन अउ कवि सम्मेलन के माध्यम ले अलगे छत्तीसगढ़ राज्य बर जनता मन ल जागरुक करिन. छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन म गजब योगदान दिस. दीवान जी के गीत 'तोर धरती तोर माटी ' ले छत्तीसगढ़वासी मन म जागृति आइस.


गिरिवर दास वैष्णव - छत्तीसगढ़ सुराज गीत


डॉ निरुपमा शर्मा- डॉ निरुपमा शर्मा छत्तीसगढ़ी के प्रथम मंचीय कवयित्री माने जाथे . उंकर पतरेंगी रचना के अब्बड़ सोर होइस.


अइसने  छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन म   मुकुटधर पांडेय,द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, बंशीधर पांडे ,सीताराम मिश्र , ,लखन लाल गुप्त, प्यारे लाल गुप्त,  निरंजन लाल गुप्त,पालेश्वर शर्मा, अमृत लाल दुबे , कपिल नाथ कश्यप प्रणयन जी, कपिल नाथ मिश्र, सुकलाल प्रसाद पाण्डेय, शिवदास पाण्डेय,नारायण लाल परमार,  भगवती लाल सेन, स्वर्ण कुमार साहू,चतुर्भुज देवांगन , रवि शंकर शुक्ल,  पं. रामदयाल तिवारी,बद्रीविशाल परमानंद,हनुमंत नायडू  कुंजबिहारी चौबे,, कोदू राम दलित, मेहत्तर राम साहू जी, डॉ.खूबचंद बघेल, केयूर भूषण, श्याम लाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा, रामेश्वर वैष्णव, नंदकिशोर तिवारी, नंद किशोर शुक्ल, डॉक्टर परदेशी राम वर्मा, हरि ठाकुर, डा. विनय कुमार पाठक,डा.विमल कुमार पाठक,‌ जागेश्वर प्रसाद ( छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक), डा. चित्तरंजन कर,सुशील यदु,बसंत दीवान, किसान दीवान,शिव शंकर शुक्ल, डा.बल्देव साव,डा. बिहारी लाल साहू,मंगत रवीन्द्र,  जी. एस. रामपल्लीवार नूतन प्रसाद शर्मा ( गरीबा महाकाव्य),डॉ. बलदाऊ राम साहू,(बाल साहित्यकार, गजलकार, छत्तीसगढ़ी निबंध अउ आलेख - मोटरा संग मया नंदागे)रामेश्वर शर्मा, कृष्ण कुमार शर्मा,सीता राम मिश्र, विद्या भूषण मिश्र,विमल मिश्र,सीता राम मिश्र,मेदिनी प्रसाद पाण्डेय,लाला जगदलपुरी, हरिहर वैष्णव, देवी प्रसाद वर्मा,डा. नरेश कुमार वर्मा, नरेंद्र वर्मा, विश्वंभर यादव मरहा, डा. गोरे लाल चंदेल,डा. जीवन यदु, डा. देवधर महंत, संत राम साहू,विनय शरण सिंह,  सुरेन्द्र दुबे,रामेश्वर वैष्णव, बंधु राजेश्वर खरे,डा.पीसी लाल यादव ,  आचार्य सरोज द्विवेदी, कुबेर सिंह साहू( छत्तीसगढ़ी कहानी संकलन- भोलापुर के कहानी2010, कहा नहीं 2011,निबंध, आलेख अउ संस्मरण- सुरति अउ सुरता (2021), महान रूसी कहानीकार अंतोन पाब्लाविच चेखव के कहानी के हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी अनुवाद),  लोक कथा संग्रह -छत्तीसगढ़ी कथा कंथली, साकेत स्मारिका के संपादक) जे. आर. सोनी,


 डा. दादू लाल जोशी( भारतीय ज्ञानपीठ ले पुरस्कृत चौदह भारतीय भाषा के कविता मन के छत्तीसगढ़ी अनुवाद) आनी बानी- ,मुकुंद कौशल, बसंत देशमुख,  उधो राम झखमार ,  मीर अली मीर( कविता- नंदा जाही का रे), डा. अनिल भतपहरी, संजीव बक्शी, डा. माणिक विश्वकर्मा नवरंग,संजीव तिवारी, आरेख चंद्रकांत, अनंत राम पांडेय, दया शकर शुक्ल, शत्रुघन सिंह राजपूत ,हेमनाथ यदु, सुरजीत नवदीप ,गणेश सोनी प्रतीक,  प्रभंजन शास्त्री,दशरथ लाल निषाद,दुर्गा प्रसाद पाकर ,सुशील भोले, कांशीपुरी कुंदन, चेतन भारती, गुलाल वर्मा , परमानंद वर्मा( उपन्यास- करौंदा),डॉक्टर सुखनंदन सिंह धुर्वे नंदन , कामेश्वर पांडेय, डा.दीनदयाल साहू ,  डा. सी. एल. साहू ( कहानी), डा. राजेंद्र सोनी ( छत्तीसगढ़ी के प्रथम लघु कथा संग्रह के लेखक,  व्यंग्य -खोरबाहरा,तोला गांधी बनाबो),  रमेश कुमार सोनी,भगत  सिंह सोनी, डी. पी. देशमुख ( कला परंपरा के संपादक), प्रदीप कुमार दास" दीपक", नवल दास मानिकपुरी, गिरवर दास मानिकपुरी, नरेश मानिकपुरी,बुधराम यादव,पुनू राम साहू राज,  लतीफ खान गजलकार,डुमन लाल ध्रुव,प्यारेलाल देशमुख , गजपति साहू,संतराम निषाद,सीता राम साहू श्याम , डॉक्टर रामनाथ साहू, रामनाथ साहू, टिकेंद्र टिकरिहा, चंद्रशेखर चकोर,गजानंद देवांगन,  हरिशंकर गजानंद देवांगन, वीरेंद्र साहू सरल, ध्रुव राम वर्मा, अरुण कुमार निगम, रमेश कुमार सिंह चौहान,मुरली चंद्राकर,प्रेम साइमन,  चंद्रहास साहू, भोला राम सिन्हा गुरुजी, हीरा लाल साहू गुरूजी,दिनेश चौहान, राजेश चौहान, गया प्रसाद साहू, मुरारी साव, बसंत साव राघव, टिकेश्वर सिन्हा गब्दीवाला,चोवा राम वर्मा बादल, बलराम चंद्राकर, कन्हैया साहू अमित,बोधन राम निषाद, जितेन्द्र वर्मा खैरझिटिया, विजेन्द्र वर्मा, सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, द्वारिका प्रसाद लहरे, 

पोखन लाल जायसवाल, अजय साहू अमृतांशु, मनी राम साहू मितान, जगदीश साहू हीरा, राम कुमार चंद्रवंशी,  ज्ञानु मानिकपुरी,कमलेश शर्मा बाबू , मोहन निषाद मयारू,गैंद लाल साहू दीया, तिलोक साहू बनिहार, नंद कुमार साहू साकेत, कृष्ण कुमार चंद्रा,आत्मा राम कोशा अमात्य,राज कुमार चौधरी रौना( व्यंग्य संग्रह -का के बधाई, गजल संग्रह - पांखी काटे जाही)महेन्द्र कुमार बघेल मधु, श्रवण कुमार साहू,ओमप्रकाश साहू अंकुर ( काव्य संग्रह - जिनगी ल संवार -2008) लखन लाल साहू लहर ( काव्य संग्रह - मंय छत्तीसगढ़ तांव), गिरीश ठक्कर, फागू दास कोसले ( काव्य संग्रह - वाह रे जमाना), शिव प्रसाद लहरे ( काव्य संग्रह - सुनता के गांठी)अशोक पटेल, जयंत साहू,तुका राम कंसारी, धनराज साहू,  राज कुमार मस्खरे,मिनेश कुमार साहू, राम कुमार साहू, ईश्वर साहू आरूग, ईश्वर साहू बंधी, हेम लाल सहारे कृष्णा भारती, अरविन्द कुमार लाल,वीरेन्द्र कुमार तिवारी वीरू,‌ रामानंद त्रिपाठी,कैलाश साहू कुंवारा, ग्वाला प्रसाद यादव नटखट,पुष्कर सिंह राज, शिव कुमार अंगारे, शशिभूषण स्नेही, गजराज दास महंत, नारायण चंद्राकर, सुनील शर्मा नील, हीरामणि वैष्णव,  गुणी राम बादल, जयवंत जंघेल,शेर सिंह गोड़िया आदिवासी, अमृत दास साहू,रमेश कुमार मंडावी,कुलेश्वर दास साहू ( एकांकी) ,फकीर प्रसाद साहू फक्कड़, भूखन वर्मा,रोशन लाल साहू , ऋतु राज साहू , दुर्गेश सिन्हा दुलरवा, घनश्याम कुर्रे, जयंत पटेल,  देवनारायण नंगरिहा,द्रोण कुमार सार्वा सहित कतको साहित्यकार मन महतारी भाषा म कलम चलावत हे.


महिला साहित्यकार मन के योगदान 



हमर छत्तीसगढ के छत्तीसगढ़ी महिला साहित्यकार मन म डॉक्टर सत्यभामा आडिल,  डा. सुधा वर्मा, डा. निरूपमा शर्मा,सरला शर्मा,  डा. उर्मिला शुक्ला, शकुंतला तरार, शकुंतला शर्मा( छंदबद्ध काव्य- छंद के छटा, चंदा के छांव म)  , शकुंतला वर्मा,गीता शर्मा, डा. शैल चंद्रा,  डा. मीता अग्रवाल,बसंती वर्मा,शोभा मोहन श्रीवास्तव,आशा देशमुख , हंसा शुक्ला, लता शर्मा, डा. जयाभारती चंद्राकर, लता राठौर, शुचि भवि, धनेश्वरी गुल,नीलम जायसवाल,केंवरा यदु, शशि साहू, द्रोपदी साहू सरसिज, सुमित्रा कामड़िया,चित्रा श्रीवास, पदमा साहू पर्वणी, प्रिया देवांगन, गायत्री श्रीवास,  अउ आने महिला साहित्यकार  मन  अपन सुघ्घर लेखनी ले छत्तीसगढ़ी भाषा ल समृद्ध करत हे.



 हमर छत्तीसगढ के कतको रचनाकार  रचना के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी भाखा के सेवा करत हे.

साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना म अपन योगदान दिस. कतको साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन म भाग लिस. 


छत्तीसगढ़ी शब्दकोश, व्याकरण म हीरालाल काव्योपाध्याय  डॉ कांति  कुमार  जैन, डा.शंकर शेष तिवारी, डा.पालेश्वर शर्मा डॉक्टर नरेंद्र  देव वर्मा ,भालचंद राव तैलंग ,नरेंद्र कुमार सौदर्शन ,रमेशचंद्र महरोत्रा, नंद किशोर तिवारी,मंगत रवीन्द्र,मन्नूलाल यदु , महावीर अग्रवाल, जय प्रकाश मानस,  ,बिहारी लाल साहू,साधना जैन,डॉक्टर विनय कुमार पाठक, डा. सोमनाथ यादव,डॉ. चंद्र कुमार चंद्राकर, पुनीत गुरु वंश ,डॉक्टर विनोद वर्मा , डा. सुधीर शर्मा,डॉ गीतेश अमरोहित  जइसन विद्वान मन पोठ काम करे हे. 


पाछु पांच बछर ले छंदविद  अरुण कुमार निगम द्वारा स्थापित छंद के छ छत्तीसगढ़  के माध्यम ले छत्तीसगढ़ के कवि मन छत्तीसगढ़ी म छंदबद्ध रचना करके छत्तीसगढ़ी साहित्य के कोठी ल

 समृद्ध करत हे. अब छत्तीसगढ़ी साहित्य म गद्य विधा ह घलो पोठ होवत हे. ब्लॉग छंद के छ गद्य खजाना अउ पद्य खजाना, संजीव तिवारी के गुरतुर गोठ, छत्तीसगढ़ आसपास के ब्लॉग (  प्रदीप भट्टाचार्य)म जाके ठाहिल रचना पढ़े जा सकथे.

छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर ग्रुप के संगे- संग अखबार मन के स्तंभ दैनिक देशबंधु के मड़ई अंक( संपादक- सुधा वर्मा)

, दैनिक हरिभूमि के चौपाल अंक( संपादक- दीनदयाल साहू), दैनिक पत्रिका के पहट अंक( संपादक- गुलाल वर्मा), लोकसदन के झांपी अंक( संपादक- डा. सुखनंदन सिंह धुर्वे), गुड़ी के गोठ ( आशीष सिंह) साकेत स्मारिका ( सालाना पत्रिका - कुबेर सिंह साहू)आरूग चौरा( ईश्वर साहू आरूग) , अरई तुतारी पत्रिका , "अंजोर"( जयंत साहू) अउ आने मन के पत्रिका अउ ब्लॉग के माध्यम ले पद्य के   संगे -संग गद्य म   सुघ्घर काम चलत हे  जउन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल बढ़वार करत हे. 

 

 23 बछर  छत्तीसगढ़ राज बने अउ 16 बछर छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा बनाय के घोषणा करे होगे पर आज तक येहा राजकाज के भाषा नइ बन पाईस. इहां के अफसर मन के छत्तीसगढ़ी के प्रति उदासीनता अउ नेतामन द्वारा  छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा बनाय म श्रेय लेय के चक्कर म आज तक येहा काम- काज के भाषा नइ बन पात हे. उपलब्धि के नांव म प्राथमिक शिक्षा म हिंदी विषय म कुछ छत्तीसगढ़ी पाठ सामिल करके, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कुछ आयोजन करके अपन मन ल मड़ा लेथन.  


 छत्तीसगढ़ी ह संविधान के 8 वीं अनुसूची म सामिल होय बर छूट जाथे अउ छत्तीसगढ़ी ल राज -काज के भाषा के रूप म देखे के सपना ह टूट जाथे.  16 बछर ले बस लालीपाप धराथे.


 



          ओमप्रकाश साहू" अंकुर"


        सुरगी, राजनांदगांव

  लेखक संपर्क - 7974666840

28 नवंबर// छत्तीसगढ़ी दिवस के बधाई संग चिटिक आस..

 28 नवंबर//

छत्तीसगढ़ी दिवस के बधाई संग चिटिक आस.. 

    छत्तीसगढ़ राज के महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी ल 28 नवंबर 2007 के छत्तीसगढ़ विधानसभा म सर्वसम्मति ले पास करके हिंदी संग ये राज के "राजभाषा" के रूप म स्वीकृत करे गे रिहिसे। एकरे सेती ये राज के जम्मो भाखा प्रेमी साहित्यकार, पत्रकार, समाजसेवी अउ बुद्धिजीवी मन मिलके हर बछर 28 नवंबर के "छत्तीसगढ़ी दिवस" मनाये के निर्णय लिए रिहिन  हें. तब ले हर बछर 28 नवंबर के लोगन अपन-अपन सख के पुरती ए दिन आयोजन अउ आने उदिम करत रहिथें. छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहार ले घलोक सरकारी खानापूर्ति के आयोजन कर के अपन कर्तव्य ल झर्रा दिए जाथे, फेर आज तक जेन ए भाखा के असल बढ़वार के रद्दा हे, तेकर डहार ककरो चेत नइ गे हे.


     इहाँ के जम्मो भाखा प्रेमी कतकों बछर ले छत्तीसगढी ल शिक्षा अउ राजकाज के भाखा बनाए के माॅंग करत हें, फेर सत्ता म बइठे लोगन एक दूसर के ऊपर आरोप लगा के अपन-अपन धुर्रा ल झटकार देथें. एक पार्टी के मन केंद्र के सत्ता म बइठथें, त दूसर मन छत्तीसगढ़ी ल आठवीं अनुसूची म शामिल करे के नाटक करथें, अउ जब वोमन सत्ता म बइठ परथें, त पहिली वाले मन नौटंकी करथें. कुल मिलाके दूनों पार्टी वाले मन ओसरी-पारी नौटंकी करत रहिथें. एकर परिणाम ए हे के छत्तीसगढ़ी आज अलग राज बने के कोरी भर बछर ले आगर होए के बाद घलो अपन स्वतंत्र चिन्हारी म गरब करे खातिर छटपटातेच हे.


     अभी केंद्र म बइठे सरकार ह एक ठन नवा शिक्षा नीति के कारज करे हे, तेमा जम्मो देश भर म उहाँ के अपन महतारी भाखा म प्राथमिक शिक्षा दे खातिर जोजियाय हे, फेर हमर राज के सरकार अभी अंगरेजी माध्यम के नॉव म दंतखिसरोई करे म बिधुन रिहिसे. सिरिफ अतकेच नहीं, पॉंच बछर के अपन शासन काल म 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग' के गठन तक नइ कर पाए रिहिस हे. एकर ले जादा दुर्भाग्य के बात अउ का हो सकत हे...? जेन ह अपन आप ल छत्तीसगढ़िया सरकार काहत राहय, तेकर अइसन हाल हे, त जे मनला परदेशिया के चिन्हारी कराए जाथे, उंकर ले कतका आस मढ़ा सकथन? 


       त आवव संगवारी हो, हमन सरकार मन के मुंह तकंई ल छोड़ के अपन महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी के बढ़वार खातिर परन ठानन के आज ले जम्मो काम-काज अउ लेखा-जोखा ल छत्तीसगढ़ीच म करबोन, सरकार ल येला शिक्षा अउ राजकाज के माध्यम बनाये खातिर मजबूर करके रहिबोन. 


    वइसे तो अभी तक इही देखे म आए हवय के छत्तीसगढ़ी भाखा खातिर इहाँ के आम लोगन अउ भाखा प्रेमी मन अपन स्तर म जतका ठोसहा बुता करे हे, वतका अभी तक तो कोनोच सरकार ह नइ कर पाए हे. इही सच्चाई आय, अउ ए सच्चाई ल सरलग उजरावत रहना हे.


जय छत्तीसगढ़ी... जय महतारी भाखा...  


-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)

मो/व्हा. 98269-92811