Saturday, 1 April 2023

नानपन म लडरेंगवा के विहाव

 नानपन म लडरेंगवा के विहाव


 अंजोरपुर गांव नदिया के पार बड़े बड़े रूख राई के छैहा बेदरा भालू के बसेरा पैडगरी गाड़ी रवन जोगनी के अंजोर म झुकुर झुकूर दिखय ऊहा से दु कोस दुरिहा म लडरेगवा के ससुलाल रहीस लडरेंगवा के उमर होगे कोरी भर म दु बछर कम ले देके चौथी फैल के डिग्री ओकर महतारी खोबाहरीन ह सोचिस लइका के उमर होगे पठौनी के उमर  गांव घर म येती ओती घुमत रहीथे बहु बाढ़ के होही त पठौनी करा के ले आतेन काम बुता के झिकझिक होवत हे रात म लढरेंगवा संग गोठ बात करीन सुबह लढरेंगवा ह बासी खाके तियार होगे ओकर महतारी ह बहु बर अंगरा के रोटी बना के चिरहा झोला म जोर दिस अवु एक ठन टुटहा छाता पकड़ा के लड़रेंगवा कहिस अब ले जा बहु सज्ञान होगे होहि देख के आ फेर बहु के गवना मांगबो लढ रेंगवा धीरे धीरे ससुराल के लिए चलिस बैसाख के महीना तीपत

मझनिया घाम गाड़ी रवन के फुदका म गिर पडी स औहा झौहा देख के रटपटा के उठीस परसा पान के नवा उल्होए पत्ता ल जमो

फुदका ल झरराइस फिर धीरे ससुराल म पहुचिस करिया छाता ल नवा सगा ल देख के गांव कुतवा मन घेर लिस लड़रेंगवा दौड़ के जान बचाइएस ले देके ससुराल घर म पहुचीस ओकर सास अंगना म सुमा डोरी के खटिया बिछाईस लाढरेंगवा खटिया म बैठीस डोकरी ओकर सुआरी ल आवाज़ दिस एक लोटा पानी लेके बीस बछर के रोठडाट नोनी निकलिस कभू अपन सुआरी ल नय देखे रहीस लढरेंगवा उठ के टपाटप पाव पर डरिस ओकर सास अकबका गय 

ओकर सास पुछिस तै काबर पाव परत हच बाबू लड़ रेंगवा पूछिस ये कोन ये दाई ओहा बताइस अही तोर सुवारी ये बाबू लढ़ रेंग्वा कहीस धोखा होगे दाई लड़ रेंगवा ल रात मे खाव इस पठोनी के बात करीन बिहान भर मोटियारी टूरी कहिस दु बच्छर के बाद आबे लढ़ रेंग्वा अतका बात ल सुन के लढ रेंगवां अपन गांव के डगर चलीस बिहान भर गांव म हल्ला होगे ओकर सुवारि मोटियारी गांव के टूरा भोलू के साथ उढरिया भाग गय l

मोहन लाल "निर्दोष"


दिन कइसन आगे संगी !!

 दिन कइसन आगे संगी !!

बात जादा जुनियाए नइहे। दूए दिन पहिली के हरय। काम से एक ठो आफिस के चक्कर लगावत रहवँ। उही बीच एक झन मोर आगू ले गुजरिस। छरहरा देंह, ऊँचपूर, सूट-बूट ले टुमटाम। मोर नजर के लबेदा परे ले ओकर चाल के आमा ‘लद्द ले’ मोर अंतस म गिरगे। ओकर लकधक, लदफद चाल-ढाल बतावत रिहिस हे कि वो कइसन चाल के हे। 

कुछ देर पीछू मैं अपन काम निपटावत वो आफिस म बइठे रहवँ। कति ले घूमत-फिरत वो धूमकेतु कस उहेंचे आ धमकिस। आते साथ मेडम ल कहिस-‘मेडम जी नमस्ते ! का बात हे आज आप अबड़ व्यस्त हौ।’

‘ये तो हमर रोज के बूता हरे, हम इही म मस्त हवन, व्यस्त हमर ले पस्त रहिथे।’

सुन्दर सिरिफ बाते भर के नहीं, जात, घात अउ मात म तको सुन्दर रिहिस हे। वो समझगे- जऊन व्यस्त हौं, व्यस्त हौं कहिथे उही सबले जादा अस्त-व्यस्त रहिथे। वोहँ चाव के मोल -भाव करे बिना भाव के एक दाँव मारिस-

‘नहीं ! आप मुस्कुरावत नइहौ।’ 

जब कोनो सुन्दर सुग्घर ढंग ले सुलहारे त कोनो सुन्दरिया कइसे सुनसुनाए रहय भला। येला कहिथे अक्कल से धक्कल मारे म बेअक्कल तको चप्पल नइ मारय। मेडम अभीन तक अपन मति के छरियावत धीरज ल बाँधे बूता करत रिहिस हे। ओकर कोंवर बानी के पानी परे ले मेडम के धीर के भक्का लाड़ू छरियागे।

मनखे उही मुँह ले पान खाथे उही मुँह ले पनही। वो सुन्दर लइका जेला आजकल के भाखा म ‘स्मार्ट’ कहिथे, पान खाए वाले बानी के सदुपयोग करे रिहिस हे। वो सुन्दर लइका के नाम तो नइ पता फेर चलव ओकर नाम सुन्दर रख देथन। अब आगू कोति ओला सुन्दर कहिबोन। 

अइसन मनखे पनवाड़ी बानी के सुन्दर, सुग्घर, सदुपयोगी ठऊर -ठिकाना अउ ठिहा ल ठऊँका जानथे। पनवाड़ी बानी ले मुँह तो लाल होबेच करथे, संगे-संग गाल के चमक अउ पनही के धमक बने रहिथे। जिनगी म ठसन ठनठनावत ठसाठस भरे रहिथे।ं

मेडम अपन बूता के बोझा ल पटक डरिस। मुड़ के मोटरी ल छोर-उघारके बताए लगिस- ‘देख न ! का करबे। ये हे, वो हे, अमका हे, ढमका हे।’ 

ओकर मोटरा म फलाना-ढेकाना, छकना-छकाना, चखना-चखाना, आनी-बानी के बूता। किसम -किसम के लफड़ा के दफड़ा बजाए लगिस मेडम हँ। आखिर म कहे - ‘ये मस्का पालिस, हाव-भाव अउ चाव-दाँव ल आप बताव। का काम हे ?’

मोर मन बदबदाइस- ‘अरे मॉम ! इहाँ कोन निश्काम ? तमाम तामझाम, झिमझाम सब सकाम हे।’

सुन्दर अपन सुन्दर चाल म आ गे। पाम्प्लेट देखाए लगिस। 

‘ये सब मोला मत देखा, मगज खराब होथे, काम के गोठ गोठिया’-मेडम मुड़ी खजुवाइस -‘मै ये सब देखके का करहूँ ?’

‘का मेडम आप जानके तको अनजान बनथौ।’ 

मोर नजर पाम्प्लेट ऊपर परगे। मैं अपन फुसियाहा हुसियारी ल बकर डरेवँ -‘पेन्टिग प्रतियोगिता !’

सुन्दर झट चटकारिस-‘हाँ ! देखो साहब समझगे ? हम चेरिटी वाले अन मेडम, अइसे नहीं, हम पत्रकार तको हौं।’

‘पत्रकार हौ, ठीक हे, त मैं का कर सकथौं ?’- मेडम कहिस।

मैं भकमुड़वा कस अपन मुड़ ल दे परेवँ-‘ये पेन्टिग प्रतियोगिता होगे का ?’

सुन्दर के चाल ल ढाल मिलगे। वो ढाल थाम्हे ढलान म ढुलगत ताल मारत कहिस -‘देख ! साहब अब्बड़ समझदार हे, उहू हाँ म हाँ मिलावत हे। कइसे साहब ?’

मैं कहेवँ - ‘देख यार ! मैं फोकटइहा हुँकारू के हमेरी नइ झाड़वँ। तैं कइसे कहि दिए कि मैं तोर गोठ म हुँकारू हाँकत हौं। जब तक जम्मो बात ल फरी-फरा नइ बताबे तब तक मैं कइसे जानहूँ कि तैं का कहना चाहत हस। मोर गोठ के भाप म तैं अपन फरा ल झन उसन।’

ओतका म सुन्दर अपन चाल ल फरी बताए बर गोठ ल फरियाए के उदीम करे लगगे। फोकलू मोबाइल ल चालू कर लिस। एक झिन मेडम के वीडियो चलाए लगिस-‘देख, येला देख। जानथस कोन हरे ?’ चिटिक रूक के ओला दुरूग के अबड़ बड़का अधिकारी के नाम लेवत कहिस-‘ये फलानीन मेडम हरे।’ अउ मोला देखाए लगिस।

मैं कहेवँ- ‘ये मत देखा मोला। अइसन अधिकारी मन ल रोज देखथन, रोजे मिलथन। पेपर दिखा।’

पेपर म कुछुच नइ रिहिस हे। वो जुच्छा पेन्टिग प्रतियोगिता के पाम्प्लेट रिहिस हे। मोर सुरता के कबर म ओइसनेहे देखे -गुजरे, सुने -जाने जबर -जबर घटना के भूत मन खदर-छानी बनाके बसेरा करे हावय। उन उदुपहा जागगे। अकर-जकर ल देखत हबर -हबर निकले लगिन। मैं भकभकाके उछरे लगेवँ- ‘अरे यार ! ये बिलकुल गलत हे भाई, अहसे नइ होना चाही। अइसन हमर इहाँ नइ होवय।’

‘हम ओइसन नइहौं भइया। हम पत्रकार हौं, चैरिटी वाले हौं।’

‘मैं अक्सर देखथौं, कतकोन बाहिरी मन अइसनेहे सब ल बेवकूप बनाथे। कभू गाय के दू पूछी, पाँच पाँव या कभू तीन ठिन कान म दूकान खोल लेथे- देखव ये नंदी, ये कामधेनु त कभू अउ कुछ। मनखे तो घलो छैअँगुरिया, बटरेंगवा, तीरपट, दँइतला जनमथे, कभू पूजा करे हस ओकर ?’

‘भइया ! भइया !! हम ओइसन नइ करन।’ हाथ जोरके ऊपर फेंकत -देखत इशारा करिस- ‘हम ओकर ले डरथन- भोलेनाथ ले !’

‘तोर भोलेनाथ मोर माथ ले छै हाथ ऊपर गै भाई। मैं सब समझ गेवँ।’

वो बिन सकपकाए चटाक ले कहिथे-‘अरे भइया, हमू छत्तीसगढ़िया हरौं, इहेंचे के पैदाइस अवँ।’

मैं कहेवँ - ‘देख भाई ! पैदाइस भर ले कुछु नइ होवय। छत्तीसगढ़ म पैदा नइ होके तको मनखे छत्तीसगढ़िया हो सकथे। बात इहाँ क्षेत्रीयता - माने छत्तीसगढ़िया अउ बाहिरी, संकीर्णता -माने दुराव अउ छुपाव, साम्प्रदायिकता - माने जात -पात के भेदभाव के नइ हे। बात छत्तीसगढ़ के संस्कृति, अस्मिता अउ संस्कार के हे। स्वाभिमान के हे। छत्तीसगढ़िया आववँ कहिके इहाँ के भावना संग खिलवाड़ करे के हे।’

वोकर चैरिटी के चोलिया चेंदरा रहय। चर्रर के चिरागे। कहे लगिस- ‘सही बात सर जी, बिलकुल सही बात।’

अइसेनेहे जिनगी के कतको पतझर देखत -झेलत मोर अंतस के जम्मो पाना -पतऊव्वा पींवरागे हवय। उपरहा म ये बँड़ोरा ले बाँचे -खुचे पाना मन झरे लगिस - ‘ये सब घाम -छाँव, जाड़- उमस, हवा-पानी म दिन भर खँटके, ईमानदारी अउ लगन से कमाथे। अपन पेट काट-काट के भविश्य बर कुछु जोरे के उदीम करथे, उन्कर भावना ले तुम अइसे खिलवाड़ करथौ। का इही छत्तीसगढ़िया के पहिचान हरे ? का इही मानवता ये ?’

वो कट्ट खाए कठवा कस खड़े रहिगे। बोकबाय सोचत- ‘सब खदर-बदर, छीछी-लेदर होगे यार।’

फसल के पैदावार माटी अउ आब-हवा ऊपर निर्भर करथे। कहूँ-कहूँ माटी बाँझ होथे। बने बीजहा तको ओकर बर बदरा पर जथे। उहाँ कतको बने खातू-पानी डार, जब उपजही त बेंवारस बन-कचरा ही उपजही, बने फसल होबे नइ करय। कहूँ के भूइँया ले वीर सपूत अवतरथे, कोनो भूइँया गाय -गरूवा कस सीधवा जनमथे, त कोनो-कोनो माटी म बइमाने पैदा होथे। 

वो ईमानदार छत्तीसगढ़िया सुन्दर के श्यामसुन्दर सखा बइमानी हँ ओकर संग ल नइ छोड़ सकिस। वोहँ मुड़ ल नवाके धीरे कुन मेडम ल कहिस- ‘ठीक हे मेडम ! दू सौ नहीं ते सौ -पचास ही दे दौ।’ 

मेडम अपन कल्ला काटे बर पल्लू झर्रावत पचास रूपिया ल धरा दिस- ‘ले तोर मुख ल टार ये मेर ले, मोला बहुत काम हे।’

कोनो बंचक के बेंवारस लइका बइमानी अउ बंचकई ल छोड़ दिही त तो ओकर जिनगी जऊँहर हो जही। बने सुग्घर खातू- पानी अउ सेवा -जतन ले पोसे-पाले खेती ओतका चिक्कन, हरियर, सुग्घर अउ पोठ नइ होवय जतका अदर-कचर म उपजे बेंवारस बन कचरा मन होथे अउ लहलहाथे। 

वो सुन्दर अपन बइमानी अउ नीचता के दाहरा म एक पाँव अउ उतरगे। अपन गोठ -बात अउ कागज-पत्तर ल घरियावत-धरियावत कहिथे- ‘येमा दस्कत कर देवव न मेडम।’

मेडम कहिस-‘अब फोकट कचर-कचर झन कर, रेंग ये मेर ले।’

मैं बिचारा बिचार के बँड़ोरा म उड़ाए लगेवँ- ‘वा भई ! ये होथे नीचतई के जिद अउ सिधई के हद !’ 



धर्मेन्द्र निर्मल  

9406096346

मूर्ख दिवस के गाड़ा-गाड़ा बधाई

 मूर्ख दिवस के गाड़ा-गाड़ा बधाई

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मूर्ख दिवस बस एके दिन,एके अप्रेल के काबर मनाये जाथे? येला तो रोज-रोज मनाना चाही ,काबर के एको पल --एको घड़ी अइसे नइ होही जब कोनो मूर्ख नइ बनत होही अउ कोनो नइ बनावत होही ।ये दुनिया म सब कोई एक-दूसर ल मूर्खे बनाये म लगे हावयँ।अउ करोड़ों म एकाध झन कहूँ दूध म रगड़-रगड़ के नहाँये होही-- अइसे तो एकर संभावना रेती म तेल निकाले सहीं बहुतेच कम हे तभो ले कहूँ मिलीगे त मान लव ये इक्कीसवीं सदी म वोकर ले मूरख कोनो नइये।अइसन मनखे मन ल आज के समे म भोकवा--जोजवा अउ नइ जाने का का महाउपाधि फोकटे-फोकट म मिल जथे ,आन उपाधि सहीं ककरो तेल मालिश करके या फेर खर्चा पानी करके बिसाये ल नइ परय।

    मूरख बने अउ बनाये बर दू जिनिस--स्वार्थ अउ प्रेम के कच्चा माल जरुरी होथे।तभे तो कहे गे हे--" सुर नर मुनि सब कै यहि रीती।स्वारथ लाग करहिं सब प्रीती।" अब भला बतावव ,ये दूनों चीज के कहूँ कमी हे का?नइये--हाँ अतका हो सकथे ,ककरो करा जादा मात्रा म हे त ककरो करा कम मात्रा म हे। ये मामला म --आज के सबले बड़का देवता धामी --भगवान,पैगम्बर कस जिंकर मान-गउन होथे वो चतुरा मन --हाँ चतुरा कहना ठीक होही काबर के धूर्त कहे म मानहानि के केस हो सकथे--- मतलब नेता मन अउ कतकोन नाना नामधारी उपदेशक मन सबले धनी मानी हें।भले कोनो कहि दय के पाँचो अँगरी एक बरोबर नइ होवय फेर इहाँअपवाद के नियम लागू होथे तेकर सेती पाँच ल कोन काहय--बीसों अँगरी बरोबर होथे।  ये मन लुड़हार-सुल्हार के,मीठ-मीठ गोठियाके, रंग-रंग के वादा के चारा गूँथ के लालच के गरी म फँसा के अइसे मूरख बनाथें के न तो खात बनय न उगलत बनय।

  ये मन सरी जगत ल अउ सरी जनता ल मूरख बनावत रहिथें फेर अइसे बात नइये के ये मन मूरख नइ बनत होहीं,ये मन ल कोनो मूरख नइ बनावत होहीं? मूरख बनना अउ बनाना सर्वव्यापी हे।काल के चक्का कस घूमते रहिथे।येहू मन मूरख बनथें। जनता ह जब "सोनार के सौ पइत अउ लोहार के एके पइत" कहिके चुपेचाप वोट देये के बेरा--दारू-पानी,मुरगा बोकरा,रुपिया-पइसा--अपन-अपन श्रद्धा भक्ति के अनुसार झोंके रहिथें तभो ले एती खाके वोती ठोंकथे त इँकर बया भुला जथे। कभू कभू इडी ,सीडी ह एती-वोती,आधा हकीकत आधा फसाना म फँसाके डीडी कर देथे त येमन ल डोकरी दाई सुरता आ जथे।ओइसने "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" वाले मन के जब भंडा फूटथे त अंठी-कंठी,बाना-बिंदरा,कट्टरता,अंडा-झंडा-डंडा सब फेका जथे।जेल म नरक झलके ल धर लेथे।हूर तो मिलय नहीं, कट-कटाकट चाबत मच्छर मन ले जरूर मुलाकात होथे।

  अगर मूर्ख होना अउ मूर्ख बनाना बुराई होही त मैं पूज्य कबीरदास जी ल हाजिर-नाजिर जानके, कसम खाके घोषणा करत हँव के -

 "बुरा जो देखन मैं चला,बुरा न मिलिया कोय। 

जो दिल देखा आपनो, मुझसे बुरा न कोय।।

     हम एक बात अउ बताना चाहत हन के कोनो ल मूर्ख बनाना सहज होथे फेर खुद ल मूर्ख मानना अब्बड़ कठिन होथे फेर हम सौभाग्यशाली हन के मूर्ख मन के संगति म रहिके हम ला जल्दी समझ आगे के हमर ले बढ़के बोदा बइला कोनो दूसर नइये। हम जान डरेन ये दू लाइन हमर उपर बिलकुल फीट बइठथे-

मल मल धोए शरीर को,धोए न मन का मैल।

नहाये गंगा गोमती, रहे बैल के बैल।

    येकर मतलब ये नइये के हमर जिनगी व्यर्थ होगे। नहीं नहीं --एकदम सार्थक होगे काबर के महामूर्ख --बोदा बइला ले सुखी कोनो प्राणी नइ होवय अइसे बताये जाथे। वोला तो का दुख ,का सुख के पतेच नइ चलय।कुछु समझ म आही तभे तो पता चलही। हमर हाल अउ चाल इही हे।

 मानौ चाहे झन मानौ--सब ले जादा व्यर्थ तो चतुरा मन के जिनगी हो जथे काबर के वो मन सब चीज म डिमाक लगावत रहिथें। टेंशन इँकरे उपज ये। बी पी,शुगर अटेक-सटेक इँकरे सँगवारी ये।दिखय नहीं फेर अँधविश्वास ल इही मन थइली म धरे रहिथे। मूर्ख ल मूर्ख बनाना सब ले कठिन कारज होथे काबर के वो उही हाबय त अउ कइसे बनाबे ।एकर उलट बड़े-बड़े पढ़े-लिखे चतुरा मन ल बहकाके ,उकसाके,प्रेम जाल म फँसाके,लालच के चाशनी चँटवाके झटकुन मूरख बनाये जाथे। प्रेम जाल के बात निकलगे त जेती देखव तेती चारों मुड़ा बिछाये दिख जही। ब्वाय फ्रेड मतलब बउराय फ्रेड,गर्ल फ्रेड मतलब जेब म नजर गड़ियाये फ्रेड के ट्रेंड चलत हे। बेंड बाजा भले नइ बजय फेर इँकर जिनगी के बारा जरुर बज जथे। अइसन मूर्ख मन संग दुनिया भर के मूर्ख मन ल मोर महामूर्ख कोती ले "मूर्ख दिवस ' के सपरिवार गाड़ा-गाड़ा बधाई हे।

 

चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

धर्मेंद्र निर्मल: कहानी - पूत के पाँव

 धर्मेंद्र निर्मल: कहानी - पूत के पाँव

अक्सर मोर ददा काहय -‘पूत सपूत त का धन जोरय, पूत कपूत त का धन जोरय।’ 

वो पइत मैं बनेच छोटे राहवँ। अब्बड़ चेंध -चेंधके मायने पूछवँ। अउ आन पइत कऊव्वा जावय -‘अब्बड़ सवाल पूछथस रे !’ 

फेर अइसना बेरा होवय त चिटको नई गुसियावय। ओकर मतलब ल बजुर समझातिस। अभीन तको ओइसनेहे होइस। 


कहिस -‘सपूत बर जोरे के कोनो जरूरत नइ परय, वो बड़े होके खुदे जोर-जँगार लेथे। कपूत बर जोरे तको अबिरथा होथे, काबर कि वोहँ जोरे-जुरियाए सब ल उजार डरथे।’

वो समे तो एक कान ले सुनके दूसर कान ले भूँसा-बदरा समझ उड़वा देववँ। फेर जगत के जम्मो पोठ गोठ मन हँ मन के कोनो कोन्टा म माढ़े रहि जाए रहिथे। जइसे माटी म बड़ोरा चले के बाद तको पोठ दाना माढ़़े रही जथे। अउ समे परे हवा-पानी खाके बिरवा बन जथे। बचपन के कुछु गोठ मनखे के जिनगी म अइसनेहे प्रभाव डारथे। नान्हेपन हँ जिनगी के नेंव होथे, जइसे गढ़ले। इही संस्कार हँ आगू चलके लइका ल लाइक अउ मनखे ल मनखे बनाथे। 


बुढ़हत काल म दाई -ददा लइका ले छप्पन भोग के इच्छा नई राखय। लइका के व्यक्त्वि अउ कृतित्व ल देख जतका खुस होथे, ओतका खुस छप्पन भोग खाके नई होवय। बुढ़ापा म छप्पन भोग का, खिचरी पचाए के उन्कर सामरथ नई राहय। दाँत संग देई देही त आँत ह धपोर देथे। दाँत हे चना नहीं, चना हे त दाँत नहीं जस हाल रहिथे।

 दाई ददा जनम देके संस्कार देथे। पालथे -पोसथे अउ नेकी कर दरिया म डार के भाव म भूला तको जथे। 


आजकल के चलागन अइसे हे कि दीखथे तेन बिकथे। मनखे दिखावा के पीछू भेंड़ियाधसान भागे लगे हे। दिखावा, फैशन अउ आधुनिक चमक-दमक म चौंधियाके कतको गलत संगत म पर जथे। इही संगत मनखे के जिनगी ल नरक तको बना देथे। संगत के जोर, जादा नहिते थोरे थोर। गरब के गोठ ल मनखे चपक-दबाके बइठ जथे अउ अहम के गोठ ल गरज के बोलथे। 

बाप कहिते रहि जथे- तोर बाप औ रे मैं। बेटा कब बाप के पनही पाँव म खाप के दुनिया नाप जथे, पते नई चलय। मोला गरब हे कि मोर पुत्तर अइसन-वइसन चरित्तर ले कोसो दूरिहा हवय।


पूत के पाँव पलने म दीख जथे।

लोगन कहिथे कि पूत के पाँव, पिता के पनही म आ गे त समझ लइका लाइक होगे।

मोर लइका लक्ष्य हँ उम्मर के सत्रा विराट ओपनिंग मैच खेल डारे हे। अठारवाँ ओवर चलत हावय। 


पढ़ई के नाम लेके ओकर संग मोरो जगदलपुर जाना होइस। जगदलपुर इंजीनयरिंग कॉलेज के बीटेक म ओकर भर्ती होना राहय। गँवई ल छोड़के ओतका दूर जाना मोरो पहिली पइत राहय अउ हमन ल छोड़के ओकरो ओतका दूरिहा जाना पहिलीच पइत रिहिस हे। भर्ती के आखरी दिन हँ दूए दिन बाचे राहय। हमन दूनो बाप-बेटा तुरत-फुरत मोटर के टिकिस कटाके निकल गएन -सिक्षा यात्रा म। हमर ये सिक्षा यात्रा पेरेन्ट ले पार्टनर तक होगे। 


हमर जाना रात के होइस। 

दिन होतिस त अकर-जकर ल देखत जातेन। मोटर संग हमर दऊँड़ई -भगई ले आजू -बाजू के छूटत ठऊर -ठिकाना, पेड़-झाड़ मन के दूरिहा होवई ले हमर कुछू बेरा कट जतिस। जाड़ के दिन रहय। हमन काँच-ऊँच ल बंद करके अपन सीट म दुबक के बइठ गएन।


लड़कपन म जिज्ञासा के संगे-संग एक किसम के डर तको मन के कोन्टा म कलेचुप मिटकियाए बइठे रहिथे। उही डर या जिज्ञासा अचानक बेरा-कुबेरा अँटियावत जाग जथे। ओइसनेहे मोरो लइका संग होइस। ओकर मन म आइस होही- ‘रतिहा के बेरा, कहूँ दूनो झिन के नींद परगे त ?’ 

‘अतेक असन कीमती हमर समान ल कोनो उठाके ले जाही। सुते अउ मरे कहिथे।’



जबकि हमर तीरन पढ़ई -लिखई के कागज -पत्तर अउ ओढ़ना-दसना के छोड़ अउ आने कोनो कीमती समान नइ रिहिसे। ओतके हँ ओकर बर भारी रिहिस। ओकर दिमाक ल अंतस के उठत बँड़ोरा हँ झकझोरिस होही। मोला कहिथे - ‘ओसरी पारी सुतबोन।’

‘हौ बने कहिथस।’ मैं ओकर हाँ म हाँ मिलाएवँ। 

‘आप सो जावव, मैं अभी नइ सुतवँ।’ वो बिना कुछु देरी करे ‘फट्ट ले’ कहिस। 

‘तैं सुत जा न।’ मैं अपन सियानी के हुसियारी बघारेवँ।

‘नहीं मोला अभी नींद नइ आवत हे’ काहत मोबाइल ले मोटर के वीडियो बनाए लगिस। अउ ओला अपन व्हाट्सअप के स्टेटस म डार दिस।



‘नींद तो महूँ ल नइ आवत हे’- ओकर नींद के आसरा ल पंदोली देवत कहेवँ।

वो चुप रहिस। मोला ओकर जुवाब के चिटको आसरा तको नइ रिहिसे।

मैं ठलहा गोठ ल आगू ढकेलत-रेंगावत कहेवँ- ‘चल अच्छा होगे यार ! तोर सरकारी कॉलेज म चयन होगे, नइ ते निजी इंजीनयरिंग कॉलेज म आजकल छोटे -मोटे मनखे अपन लइका ल नइ पढ़ा सकय।’


अइसे वोह पहिलीच ले हमर तीरन कहि डारे रिहिस हे -‘सरकारी कॉलेज म चयन होही तभेच कॉलेज करहूँ, नइ ते आईआईटी बर घर ले ही मेहनत करहूँ।’

‘इंजीनयरिंग भर के बात नइ हे आजकल के महँगई म लइका ल ऊँच कक्षा म पढ़ाए बर पालक ल एक पइत सोचे बर परथे। अगल-बगल के कमईच वाले मन अपन लइका ल जऊन चाहथे पढ़ा सकथे।’

‘हाँ’-कहिके हुँकारू देवत वो कुछु सोचे लगिस। जना-मना मोर संग बहुत कुछ गोठियाना चाहत हे, फेर बक्का नइ फोर पाइस।


मैं कहेवँ - ‘फेर जेन हँ जऊन करना चाहथे ओला वो नइ मिल पावय। अउ जेन करवाना चाहथे, जेन सुविधा-संपन्न हे ओकर लइका बिगड़े नवाब हो जथे।’

अइसन कहिते -काहत मैं गौर करत रहेवँ। ओकर चेहरा म उछाह अउ आत्मसंतोस के एक ठो पतला तार हँ तऊरत रिहिसे। मैं वो तऊरत तार के भाव ल पढ़े-जाने बर गोठ के फुचरा ल आगू बढ़ाएवँ-‘फेर ये सब संस्कार ऊपर होथे। बालमन हँ कच्चा माटी के लोंदा बरोबर होथे। कच्चा माटी ल मन मुताबिक अकार दे सकथस, वइसनेहे बालमन म उचित संस्कार भरके ओला सहीं रद्दा म लेगे जा सकथे।’


वो मुस्कुरावत, बड़ा धियान से मोर गोठ ल सुनत राहय। 

मैं कहिते गएवँ - ‘कोनो होवय, सब ल अपन लक्ष्य बनाके चलना चाही। ओला अपन एक आदर्स बनाके रखना चाही, जेकर जिनगी के बारे म ल पढ़-समझ के ओकर ले मार्गदर्शन मिलत राहय’- कहिते -काहत देखत रेहेवँ वो अबक-तबक कुछ बोलना चाहत हे। मैं ओकर गोठ के अगोरा अउ स्वागत म अपन बोली -बचन के हाथ धरके थाम लेवँ। चुप रहिगेवँ।


वो कहिस - ‘हाँ, बजुर रखना चाही। महूँ रखे हौं।’

मोला खुसी होइस कि मोर लइका अपनो जिनगानी के एक आदर्स, एक रद्दा, एक लक्ष्य बनाके रखे हवय। वो मोर चेहरा ल धियान से देखत राहय। मोला लगिस कि वोहँ कुछु बोले बर तुकतुकावत हे।

वो बोलय कहिके मैं अपन मुँह म मुस्कुरई के तारा लगा लेवँ। ओकर गोठ के अगोरा करे लगेवँ। दुबारा देखेवँ त लगिस जना मना वोहँ मोर कोनो प्रश्न के अगोरा करत हवय। मैं नइ जानत रहेवँ कि वो हँ काकर अगोरा करत हवय। उही ल जाने बर मैं मुस्कुराके ओला देखत सहारा देवँ। मोर सहिलावत भाव ल वो हँ पढ़ डारिस। ओला भरोसा होगे कि मैं ओकर गोठ के अगोरा करत हाववँ।


कहे लगिस -‘ददा ! आप ल सुरता हे ? एक दिन हमन दूनो झिन सइकिल म नानी घर जावत रहेन। वो समे मैं तीसरी कक्षा म रेहेंव।’

मैं अपन दिमाक के थैली ल झाँक-टमर के देखेवँ। वो हँ जुच्छा रिहिस। मोला काँही सुरता नइ आइस। मैं फोकटइहा सुरता के बहाना इही मेर चलत गोठ ल रोके नइ रखना चाहत रहेवँ - ‘हाँ जावत रहे होबोन, मोला सुरता नइ हे। फेर का होइस ?’ मैं प्रस्न करेवँ।

वो बिना रूके सरलग कहे लगिस -‘चौंक म पहुँचे रहेन। उहाँ हमन देखेन, एक झिन लइका ल कुकुर हँ भूँकत कुदावत रिहिसे। आगू -आगू रोवत लइका, पीछू -पीछू भूँकत कुकुर।’


जब वो मुचुर-मुचुर मुसकावत बतावत रिहिस हे, मैं मगन ओला देखते रहिगेवँ टुकुर-टुकुर। वो उमंग अउ उछाह म भरे अइसे गोठियावत राहय, जना-मना मैं ओकर लइका अवँ, वो मोर सियान। 

वो अपन आप म मगन गोठियावत हावय - ‘हमन दूनो देखत रहेन। का देखथन, रोते रोवत वो लइका अचानक रूकगे।’


’डर म मनखे के अवाज पता नहीं काबर, बाढ़ जथे। वो लइका एकदम जोर से चिचियाके रो डरिस अउ रोते-रोवत अचानक रूक के खड़ा होगे। चिचियाके रोए के बेरा ओहँ कुकुर कोति मुड़गे अउ जोर से किकियाइस- ‘हुर्रे’। कुकुर ल लगिस होही कि एहँ मोला मारे बर खड़ा होगे। कुकुर भूँकई अउ कुदई ल छोड़के रूकगे।’

‘तब जानत हस का होइस ?’

मैं उदुपहा ये प्रस्न ले हड़बड़ा गेवँ अउ इन्कार म मुड़ी ल डोलाएवँ- ‘उहूँ !’



वो सरलग बताए लगिस - ‘आप मोला पूछेव - देखे हस का होइस हे तेला ? मैं कहेंव - हौ, कुकुर हँ कुदावत रिहिसे, लइका भागत रिहिसे। लइका रूकिस त कुकुर तको रूकगे। कुछु समझ म आइस ? मैं अचानक ये बिन बलाए पहुना बरोबर प्रस्न ले चकरित खा गेवँ। मोला निरूत्तर देख आप कहेव- देख, डर के जउन भाव हे वोहँ भागत लइका हरे। माने डर हमर मन के भीतर रहिथे। हम भागे जाथन, डर हमला दऊँड़ाते रहिथे।’

 

मोला थोर -थोर सुरता आए लगिस। मैं सुनते रहेवँ, वो कहिते रहिस -‘सही म जेन डर हे, जोन समस्या हे, या ये दुनिया हे, वोहँ कुकुर बरोबर हे। जब तक तैं डरबे -भागबे, ये डर, ये दुनिया सब तोला डरवाए परही। दऊँड़ाही -कुदाही। एक पइत अइसे होही कि तैं अपन डरे ले डरके जिनगी के जंग हार जबे। जब तक डराबे जिनगी म हारते रहिबे।’


‘थोरिक रूकके आप कहेव- बेटा ! हारना नई हे। डर ल ही अपन ताकत बनाना हे। गनित म तैं अपन आप ल कमजोर समझथस। गनित ले डर के भागथस। तैं कमजोर नई हस। मनखे कभू कमजोर नइ हो सकय। मनखे कमजोर होतिस त उड़नखटोला म बइठ आज अकास म नई उड़ातिस। सागर के गहरई नइ नाप सकतिस।


 कमजोर होथे ओकर हिम्मत, ओकर आत्मबल। डर या समस्या कोनो बघवा तो नोहय जउन जीयत लील-खा डारही। वो तो सवाल हरे, एक परिस्थिति हरे। दुनिया म अइसे कोनो सवाल नई होवय, जेकर जवाब नई रहय। अइसे कोनो समस्या नइ होवय जेकर निवारण नइ होवय, भलकुन जवाब ले ही सवाल बनथे। पढ़, बने समझ अउ बना। 


एक पइत गलत होही, दू पइत गलत होही। चल तीसरइया पइत घलो गलत होही। चउथइया म ओला बनेच बर परही। ओला बने बर परही ओकर बाप ल बने बर परही। एके कौंरा म पेट नई भरय । घेरी पइत कौंर खाथस तब जाके पेट भरथे न !’ 


फेर वो हँ बड़ा गरब अउ आत्मविश्वास ले लबालब भरे तरिया कस उफनावत कहिस -‘बस ! वो एक बात हँ मोर मन के जम्मो डर ल निकालके रख दीस। गनित बर रूचि जागगे। वो दिन ले मैं आप ल अपन सबले बड़े प्रोत्साहक मानथौं। सही म मोर पहला प्रोत्साहक (मोटिवेटर) आप हरौ।’


मैं ओकर गोठ ल सुनत जाने कोन दुनिया म दऊँड़े -भागे लगेवँ। कोन जनी कोन उमंग-उछाह के पाँखी उड़ाए लगेवँं। मोर पाँव हँ भूइँया म नइ माड़त रहय। सोचे लगेवँ -‘दुनिया म सब फिल्मी सितारा के, बड़े -बड़े खेल हस्ती के त कोनो अउ काकरो काकरो फेन होथे। उन सितारा मन के आचरण, बेवहार अउ उन्नति ल देखके।’ 


ओतके म मोला अपन पढ़ई जिनगी के एक ठो बात सुरता आगे। कहूँ सुने रहेवँ कि कोनो लइका अपन दाई-ददा ल आदर्स नइ मानके दूसर ल आदर्स काबर मानथे ? फेर उही एकर जुवाब तको देहे रिहिस हवय - ‘काबर कि हम अपन लइका के आगू वोइसन आदर्स नइ परोस सकन।’


तब मैं अपन आप ल धन्य माने लगेवँं। गरब म मोर छाती फूलके चऊँक-चाकर होगे। 

आज ये जानके कि मोर लइका मोरे फेन हे, मैं ओकर फेन होगेंवँ।


धर्मेन्द्र निर्मल

ग्राम कुरूद, पोस्ट एसीसी जामुल

तहसील भिलाईनगर जिला दुर्ग छग

पिन 490024

9406096346

समीक्षा

[3/23, 10:55 AM] पोखनलाल जायसवाल:


 जिनगी म कखरो ले कहे हमर कोनो गोठ-बात ओकर मन के कोनो कोनटा म कब माढ़ जही? कहे नइ जा सकय। एकरे सेती हम ल बड़ सावचेत होके बात कहना चाही। अइसे भी कहे गे हे- बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पाॅंव। माने कोनो भी बात ल बड़ सोच विचार के कहना चाही। नइ तो ले के बलदा दे ल पर सकथे। कखरो दिल दुखे के लइक बात ह एक कोती मनखे ल भीतरे-भीतर करोवत रहिथे, त दूसर कोती ओकर मन म बैर भाव ह भभकत रहिथे अउ बखत परे लावा बनके उफने लगथे। कोन बात कोन ल चुभ जही कौनो ल पता नइ चले। इही च भाॅंप के रहीम जी कहे हें- ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।। 

        अउ कहूॅं हमर बात लोगन के सीख के लइक हे, प्रेरणा के लइक हे। जिनगी सॅंवारे के लइक हे, त वो बात मनखे बर वरदान साबित हो जथे। ओकर अंतस् म हमाय निराशा के ॲंधियारी बर काल बन जथे। मनखे नवा उछाह अउ ऊर्जा ले भर जथे। जिनगी जिए के सार ल पा लेथे। 

         अभी के बेरा अतेक भटकाव के होगे हे कि नवा पीढ़ी बर संगत के चुनई बड़ मुश्किल बुता होगे हे। अइसन म दाई ददा ल अपन लइका ले मित्रवत बेवहार रखे के जरुरत हे। तभे तो मन के दुविधा ल बड़ सहज भाव ले रख पाही। बहुत अकन जिनिस जिनगी म बेवहार म कब समा जथे, मनखे गम नइ  पावय। इही ह तो संस्कार आय। इही सब बात के परछो करावत हे- पूत के पाॅंव कहानी। 

          छोटे से दैनिक घटना जउन आय दिन हम ल गली खोर म दिख जथे। उहाॅं ले जिनगी के दिशा कइसे बदलथे अउ बदले जा सकथे ए कहानी ओकर प्रमाण आय। जब तक मनखे के भीतर डर समाय रहिथे, सच म वो कुछु च करे नइ सकय। सबो ऊर्जा डर म सिरा जथे। फेर डर ल जीते बर सिखाने वाला मिलगे त जिनगी भर कदम कभू थमे के नाव नइ लय। आगू बढ़तेच जाथे। लक्ष्य तीसरी कक्षा के उमर म अपन बाप ले अइसन हिम्मत पाइस कि अपन भीतर डर ल खोभन नइ दिस, जड़ जमावन नइ दिस अउ गणित ले पार पावत आज इंजीनियरिंग करे बर जावत हे।

        ए कहानी यहू मामला प्रेरक कहे जा सकत हे कि दाई ददा अपन लइका के आदर्श बने के कोशिश करयॅं। दाई ददा अउ लइका एक दूसर के पूरक बनयॅं। एकर ले पारिवारिक जुड़ाव ल मजबूती घलव मिलही। कहानीकार के यहू एक ठन उद्देश्य हे।

        कहानी आदर्श अउ प्रेरणा के मिशाल हे। भाषा शैली प्रभावी हे। हाना मुहावरा मन के प्रयोग सटीक हे। कोन जनी काबर ते, कहानीकार 'श' वर्ण के प्रयोग ले हिचकत हें? अइसे लगिस। 

       एक अच्छा कहानी पढ़वाय खातिर कहानीकार धर्मेंद्र निर्मल जी ल बधाई💐🌹🙏

अब्बड़ मिठाथे बोहार भाजी---

 अब्बड़ मिठाथे बोहार भाजी---       


           हमर छत्तीसगढ़ मा कई किसिम के भाजी-पाला होथे। जेहा हमर शरीर बर पुस्टई के काम करथे। गरमी घरी लगती चैत महीना मा सबसे जादा बाजार मा बोहार भाजी बेचाय बर आथे। इही समे बोहार भाजी नंगत फूले ला माते रहिथे। उँकर नवा-नवा उलवा पाना संग फूल के कोंवर कली ला टोर के साग बनाये जाथे। इंकर अमसुरहा स्वाद मा मन भर जाथे, अउ दू कंवरा उपराहा खवाथे। साल भर मा एक बार मिले ले येकर मांग अब्बड़ रथे। बाजार मा थोरको माढ़ीस कि सब अपन-अपन ले बिसा लेथे। जिंकर खेत-खार, बारी-बखरी अउ कोठार मा बोहार के पेड़ हवय, वोमन बने पैसा घलो कमा लेथे। फूल हा उरके के बाद उँखर फर के घलो साग बनथे।

          बोहार भाजी मा पोषक तत्व भरपूर मात्रा मे हे। जेकर ले हमर शरीर ला उचित पोषण मिलथे। ये भाजी विषनाशक आय। हमर शरीर के कफ, कृमि अउ अतिसार ला दूर करे के काम करथे। येकर सेवन ले हमर पाचनतंत्र मजबूत होथे। पेड़ के छाल पीसके लगाय ले शरीर के खुजली घलो दूर हो जाथे।

          बोहार भाजी मा दार मिलाके, आमा खुला, अमली, दही नहिते बंगाला संग रांधते। येला सब अपन-अपन सहूलियत के अनुसार बना लेथे। हमर डहन आमा खुला संग जादा बनथे। कलोंजी नहिते कढ़ाई मा सबले पहली दार ला चुरोके आमा खुला ला डार दे। फेर बोहार भाजी ला धोके ओईर दे। चुरे के पीछू  लसुन, सुक्खा मिर्चा के फोरन देके बघार दे ले बोहार भाजी तैयार हो जाथे। बोहार भाजी छरछरहा रेहे ले बने लगथे। फेर बासी, भात अउ रोटी संग स्वाद लेके खाय मा बड़ मजा आथे। पड़ोसी मन ला पता होय ले साग मांगे बिन नइ रहय। बांट-बिराज के खाय मा बोहार भाजी के स्वाद दुगुना हो जाथे।


आय हे बोहार भाजी, बीस रुपया भाग।

पान उलवा फूल कोंवर, नीक लागै साग।।

घात पोषक तत्व हावय, छाल खुजली मार।

तंत्र पाचन ठीक होवय, होय कफ उपचार।।


                        हेमलाल सहारे

               मोहगाँव(छुरिया)राजनांदगॉंव

मंथरा

  *मंथरा*


                                     चन्द्रहास साहू

                                   मो 8120578897


आज मोर चेहरा अब्बड़ दमकत हावय भलुक आंखी ले दू टीपका आंसू निकलगे तभो ले मन गमकत हावय। सिरतोन आंसू घला  सुघ्घर लागथे,...उछाह के आंसू। काखरो जिनगी सिरजाये ले बड़का उछाह का होही...?

           गोरी सांवरी बरन,घुंघरालू चुन्दी, सरई के कोंवर पाना कस होंठ, खीरा बीजा कस दांत। नाक मा चमकत रवाही फूली, कान मा झूलत झुमका, बाहां भर चुरी,गोड़ मा बिछिया आलता अउ संग मा दमकत लाल कुहकू। शिफॉन के लुगरा सिंपल सोबर पोलखा ओखर उप्पर सादा डॉक्टरी कोट....! साज-संवर के अपन चेहरा ला देखेव दरपन मा। सुघ्घर... अब्बड़ सुघ्घर लागत रहेंव।

"काखरो नजर डीठ झन धरे......!''

 कजरारी आंखी ला मटकावत केहेंव अउ काजर के दू टीपका ला कान के पाछू लगायेंव। कोन जन ये बिसवास आवय कि अंधविश्वास..।फेर दाई के मया दुलार हाबे अइसे लागथे।

जादा उछाह मा झन नाच लता कोनो नइ हे देखइया। बाल मन हुक मारें लागिस मोर। फुसफुसावत हावव अउ अपन वैक्सीन बेग ला सावचेती होके जोरे लागेंव। अपन पर्स मा पइसा डारेंव अउ टिफिन मा इडहर के साग.. । चट्ट चट... चटकारा लेयेंव। पहिली बेरा बनाये रेहेंव...

कोंवर-कोंवर कोचई पान ला मास्टर घर ले आनेंव उरिद दार के पीठी बनायेंव। दूनो ला मिंझारके थारी मा राखेंव अउ ओ थारी ला कड़ाही मा मड़ाके भांप मा उसनेंव। ...अब नान-नान कुटका कांट के डबकत अम्मट मा ओइर के बनायेंव। अब बनगे इडहर साग हा पियर-पियर .. फोरन के मिठ्ठी लीम पाना अउ सरसो-राई के दाना उफले ....अब्बड़ ममहावत इड़हर साग।

मास्टर कका ला तो  देयेंव घला। ओखर कटोरी घला सकेलागे रिहिस।

"वाह.. अब्बड़ सुघ्घर,स्वादिष्ट, गुरतुर । तोर हाथ के जादू ... अहा..ह..अब्बड़ मिठाथे ओ लता तोर बनाये साग हा।''

कका अघागे।

कंघी करके एक बेरा दरपन के आगू मा अउ ठाड़े होयेंव। मुँहू के मुंहुरंगी लागयेंव अउ ड्रेसिंग के दरपन मा होंठ के गोल-गोल चिन्हा बनायेंव लिपिस्टिक मा। चुन्दी मा फूल खोसेंव। मुच ले मुचका के नानकुन कागज लिखेंव।

मोर मयारुक !

पैलगी 

           ये कुरिया मा तोर स्वागत हाबे मोर देवता !  भलुक तेंहा आबे तब मेंहा अपन ड्यूटी कोती रहू फेर ये घर तोला सुन्ना नइ लागे।    भीतरी मा आबे  ..अउ लम्बा सांस लेबे तब,..मोर ममहासी ला महसूस करबे। खिड़की खोलबे तब, खिलखिलावत हवा के झोंका बनके गुदगुदाहू। दरपन ला देखबे तब मुचकावत रहू। अउ गद्देदार सोफा मा बइठबे तब,.. तोला बइहा बनाहु ही..ही...। 

दूध वाला आरो करही ते कसेली मा दूध झोंका लेबे। मेंहा झटकुन आहूं मोर राजा !

                                  तोर गोसाइन

                                         लता

कागज मा नानकुन स्माइली बनायेंव अउ टी टेबल मा मड़ा देंव चंदैनी गोंदा के गुलदस्ता मा दबाके। तारा कूची लगा के जिला अस्पताल अमरगेंव।

गोसाइया आवत हावय आज। पहिली हफ्ता-पन्दरा दिन मा आवय फेर ये पारी पूरा-पूरा तिरसठ दिन मा आवत हाबे। ओखर बिना कतका तड़पेंव.. कतका रोयेंव ..परेशान होयेंव.. मेंहा जानहु, मोर आँसू जानही अउ मोर अकेल्लापन जानही..। 

            दू महीना के ट्रेनिंग मा गेये रिहिस रायपुर। मास्टर नोकरी लगगे हावय ट्रेनिग होही ओखर पाछू स्कूल मा पोस्टिंग। हे महामाई एके ठौर बर आदेश निकलवाबे दाई ! हमर दुनो के.. हमर शहर बर।         

                      आज मोर बर अब्बड़ उछाह रिहिस। गोसाइया आवत हे। मोर ससुर बेटी के नर्सिंग पढ़ाई मा नाव आये हाबे अउ बहिन बेटी के बिहाव तय होगे।....सब्ब एक संघरा अब्बड़ अकन खुशखबरी। भलुक मोर जेठ-जेठानी के बेटी आवय फेर पइसा के कमती नइ होवन देवव पढ़े बर। जिनगी सिरजाये बर।

                     मोर बाबू मन दू भाई अउ दू बहिनी होथे। मोर बाबू बड़का आवय जम्मो झन ले, अउ कका हा जम्मो झन ले नान्हे। हमर खानदान मा पहिली बेटी आवव मेंहा, जम्मो के दुलारी। सबके लाड़ली रेहेंव फेर कका बर जादा। कका के परी आवव न ..। कही जातिस कका के साइकिल के आगू कोती डंडिल मा बइठव। ....अउ डंडिल ले अब केरियल मा। जम्मो  गाँव भर किंजर डारो मेंहा।

कका के  बिहाव के बरात निकलिस तब फूफू के बेटी संग मोहाटी के दोनों कोती  शुभ कलश ला बोहो के ठाड़े रेहेंव । कका हा ओला दस के कड़कड़ाती नोट दिस अउ मोला मइलाहा दस के नोट।  अतकी मा अब्बड़ रोयेंव मेंहा अउ जम्मो देखइया मन अब्बड़ हाँसिस। लइका पन के रूठना मनाना..। कका जानथे। पचास के कड़कड़ाती नोट दिस अपन दुल्हा माला ले निकाल के। 

'मोर कंकालिन दाई ला कइसे मनाना हे जानथो मेंहा।''

कका किहिस अउ टुप-टुप पांव परिस। कोन जन काबर पांव परिस ते आज ले समझ नइ आइस।

मोर कका के कोरा मा बइठके बरतिया गेयेंव। अउ लहुटेंव तब तो कका काकी दुनो के कोरा ला पीरा कर डारेंव जागत भर ले ।....अउ अब बिहनिया उठेंव तब फूफू दीदी के तीर मा सुते रेहेंव। कका के परी,कंकालिन दाई फेर बिगड़गे रिहिस। कोंन जन फूफू का तेल लगाथे ते अब्बड़ बस्साइस। मइलाहा लागथे मोला,ये फूफू हा साफ-सफा मा धियान नइ देवय न। बफल-बफल के अब्बड़ रोयेंव। कका-काकी मनाइस अब, फेर शर्त रिहिस मोर।

"रातकुन दुनो के संग सुतहु कका !''

जम्मो कोई फेर हाँसिस ।

"हांव मोर बेटी ! सूत जाबे ।''

काकी किहिस। ओ दिन अब्बड़ रोये रेहेंव घोलन-घोलन के अउ कका हा पेमखजूर खवाके मनाये रिहिस।

कोन जन सिरतोन मा सुतेंव कि नही  भगवान जाने फेर कतको महीना ले मोर नींद हा कका-काकी के पलंग मा परे अउ दाई ददा के पलंग ले बिहनियां उठो । ननपन के जम्मो गोठ ला सुरता करत मोर मन गमकत हे। 

          मोर दाई ददा अब्बड़ बुता करथे उवत के बुढ़त ले। रोपा लगाई अउ मिंजाई बर तो कोन जन ...? घुघवा के आंखी ला उधार मांग के खार ले घर आथे। ठुकुर-ठुकुर रेंगत ददा आगू-आगू, दाई पाछू-पाछू अउ ओखर पाछू मा कमइया बनिहार मन के रेला अंधियारी रात मा।

"कइसे दाई अब्बड़ बेरा होगे घर लहुटे बर।''

"का करबो बेटी ! उवत ले बुड़त कमाबो तब तो दू पइसा बाचही ओ। 

महतारी बेटी गोठियावत हावन अउ अब काकी के गोठ मिंझरगे।

"तोर पढ़ाई लिखाई मा अब्बड़ खरच आवत हे नोनी । तोर बिहाव बर घला सकेले ला लागही का   ? उवत के बुड़त कमाही तब तो तोर दाहिज-डोल बर पइसा सकेलाही, न बड़की दीदी !''

काकी चटाक ले किहिस अउ दाई हा बुताये बरोबर हुकारु दिस।

"हांव ।''

आज सोज्झे अपन कुरिया मा खुसरगे दाई हा। नही ते आने दिन..कभू जुआ देखे ला काहय कंघी ला धर लेवय अउ कभू डोकरी दाई बबा बर गोरसी सपचा देवय कभू सुआ ददरिया सुना देवय। ...फेर आज हाथ गोड़ धोइस अउ कुरिया मा खुसरगे।

"दाई चाहा पी ले।''

अब्बड़ गेलोली करेव तब पीयिस चाहा। कमइया मन संग अब्बड़ हाँसत गोठियावत आयेस दाई ! अउ काकी के गोठ सुनके का होगे.......?

दाई मोला पोटार लिस अउ अपन छाती मा सूता लिस । अब रोये लागिस। बारवी पढ़त हव फेर दाई के रोवई ला नइ जान सकेंव। दसवीं पढ़इया भाई संग अब्बड़ गुनेंव फेर कुछु नइ सूझिस।

                    कका सोसायटी मा सेल्समैन हाबे। काकी हा तो बड़का घर के गुनवंती बेटी आवय। तभे तो कहिथे-

"पइसा सकेल के राख, हमरो तीन झन बेटी हावय। टूरा के अगोरा मा पुरोनी घला टुरी होगे।पाले-पोसे मा अब्बड़ खरच आही। बड़की के  बेटी लता उप्पर जम्मो ला झन लुटा...। जम्मो कोई बर कपड़ा लेथस.. खई-खजाना बिसाथस.... फीस भर देथस ..।''

 कोन जन काकी ला का होगे ते   ? ओखर ले अब्बड़ दुलार पाये रेहेंव फेर अब ..... बिखहर सांप बरोबर बीख उगलत हावय। 

                   गाँव मा कथा-भागवत माढ़े रिहिस। घर-घर सगा पहुना आये रिहिस। हमरो घर सगा आये रिहिस। कतको  सगा झर गे अउ कतको सगा रुकिस। काकी के फूफू दीदी घला आये रिहिस। हफ्ता दिन ले रिहिस।

"दमाद बाबू ! तोर लइका मन बर का सकेले हस   ? अब लइका मन संग्यान होवत हे। बड़का स्कूल मा पढ़ावत हस ते सुघ्घर आवय फेर बर बिहाब बर घला कुछु गुन। आगी लगत ले महँगाई बाढ़ गेहे ,...जानथस ? हमन बड़का नौकरी वाला मन दू तोला सोना नइ बिसा सकत हावन ते तोर का होही...? नानकुन नौकरी वाला के। तीन झन टूरी तीनो के दाइज-डोल, बर-बिहाव, पढ़ाई-लिखाई जम्मो मा लगही ...। करजा करबे ..? वहु ला छूटे ला परही...?''

काकी के फूफू हा कका ला अब समझावत हे। अब तो फूफू सास कमती अउ मंथरा जादा लागत हाबे। कका सुनत हे।

"देख दामाद बाबू दुलरू ! अभिन एके मा हावव तब बड़की के नोनी बाबू के पढ़ाई -लिखाई के खरचा , समिलहा होवत हाबे। काली बिहाव होही दुनो लइका के। खेत बेचहु तब, ...अउ खेत नइ बेचहु तब करजा कइसे छुटाही ..? बिहाब होवत ले ...करजा करत ले तोर संग मा रही तोर चतरा भाई हा। ताहन बाँटा-खोंटा माँगही। तोला देये ला परही..। ओहा गंगा नहा डारही अउ तेहाँ फदक जाबे।''

"कइसे फूफू..,कइसे फदक जाहू..?''

कका पुछिस  फूफू सांस के गोठ सुनके। अब थोक-थोक समझे लागिस कका हा फूफू सास के गोठ ला।

"भोकवा नही तो ...! जम्मो सकेले रहिबो तेला बड़की के नोनी बाबू मा लगा देबो तब हमर लइका बर का बाँचही ..? अउ तोर भतीजी हा नर्सिंग कॉलेज मा पढ़े बर रुंगरूँगाये हाबे। जानथस कतका पइसा लागही ...? चार बच्छर के कोर्स, दस लाख लागही...दस लाख। सब उही सिरागे तब हमर लइका हा कटोरा धर के भीख माँगही । अप्पड़ रही .., गुन कुछु , बइला झन बन।''

काकी अगियावत रिहिस। अब कका जान डारिस। दूसरा दिन ले कका हा मोर बाबू करा अड़गे बाँटा मांगे बर। आज अउ अब्बड़ रोयेंव मेहां। जम्मो बेरा मोर कका मनावत रिहिस फेर आज....? आज तो ओखरे सेती रोवत हावव।

"कका मोला नर्सिंग कॉलेज मा पढ़ा दे।''

कका मुँहू मुरकेटत रेंग दिस। आज के मंथरा के नजर हमर घर मा परगे रिहिस। भगवान राम ओखर ले नइ बाचीस तब मोर ददा का बाचही।  साधारण मइनखे हा। 

        भागवत मा कतका सुघ्घर बताइस महराज जी हा। आज कलजुग मा खुरसी  मा बइठे बर भाई-भाई गला कांट झगरा होथे। अउ  श्री रामजी अउ भरत जी घला झगरा होइस फेर उँखर भाव आने रिहिस। 

छोटे भाई ते बइठ ! बड़का भइया ते बइठ गद्दी मा अइसे। जम्मो सुनइया हो ! राम ला जानना हे तब आचरण मा उतारहु। हजारों के भीड़ सकेल के बड़का आयोजन करवाये मा भगवान के आसीस नइ बरसे भलुक चरित्र  बनाये ले आसीस होही...।

 कका ददा अउ जम्मो कोई  प्रसंग मा ताली बजा-बजा के नाचिस,गाइस  भजन सुनिस अउ ..... घर लहुट के बाँटा होइस।

                 गरीब मन बर सरकार के योजना संजीवनी आवय। बैंक ले लोन लेयेंव - शिक्षा लोन अउ नर्सिंग कॉलेज मा पढ़े बर भर्ती होयेंव। सिरतोन अगास मोर रिहिस अउ पांख घला मोर। तब बेटी ला उड़ियाये ले कोन रोकही..? पढ़ डारेंव अउ बनगेव नर्स दीदी।

             सरकारी अस्पताल के वेक्सीनेशन सेक्शन मा ड्यूटी हाबे मोर। अब्बड़ जिम्मेदारी ले ड्यूटी करत हँव। कतको झन ला पढ़े बर प्रोत्साहित करत हँव अउ कतको झन  दीदी मन ला प्राथमिक उपचार करे बर सीखोवत हँव। लइका के जतन टीका के खुराक .. जम्मो ला बताथो।

         ड्यूटी ले घर अमरेंव। गोसाइया आगे रिहिस। मुचकावत मोर स्वागत करिस। 

"मोला पचास हजार रुपिया के जरूरत हाबे लता !''

"काबर  ?''

"भतीजी के नर्सिंग कॉलेज मा एडमिशन करवाये  बर पइसा कमती परत हाबे।''

"हांव ''

एटीएम कार्ड ला देयेंव अउ पासवर्ड ला घला बतायेंव। 

"मोर गरीबहा कका के लइका मन ला घला पढ़े लिखे मा अब्बड़ दिक्कत होवत हे । उपराहा पइसा निकाल देबे। ओमन नइ मांगे तभो ले काखरो जिनगी सिरजाये बर  पंदोली  देबो ते  अब्बड़ उछाह मनाही। ...अउ नत्ता गुरतुर हो जाही। काखरो बर मंथरा बने मा उछाह नइ हे भलुक शबरी बनके जूठा बोइर के पुरती मया दे देबो ।

"सिरतोन काहत हस लता ! मोला तोर उप्पर गरब हाबे।''

गोसाइया किहिस छाती फुलोवत अउ एटीएम के रस्दा चल दिस। मेंहा अब साँझकुंन के दीया-बाती के तियारी करत हँव, मुचकावत, गमकत ।

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

समीक्षा


 पोखनलाल जायसवाल: 

आज जब घर परिवार दिनोंदिन एकाकी होवत जावत हे। कोनो ल अपन छोड़ कखरो संसो फिकर नइ हे। स्वार्थ के बड़ोरा म नता-गोता पेरौसी भूसा सहीं उड़े लागे हे। बाॅंटे भाई परोसी, के हाना सोला आना फिट बइठत हे। समिलहा परिवार (संयुक्त परिवार) जउन भारत के बड़ ताकत रहिस। जेकर छाॅंव म लइका मन संस्कारी, आज्ञाकारी,  अउ जम्मो मानवीय गुण ल सीख पावत रहिन। भाईचारा अउ साहमत करे के मानवीय गुण ल घरिया के खूॅंटी म टाॅंग डरे हे। मनखे स्वार्थ के चिखला माटी म तरी मुॅंड़ सनाय दिखत हे। अइसन म जिनगी के पाछू बेरा के जम्मो करू-कसा ल भुला लता नवा रस्ता गढ़थे। 

         पैसा तो हाथ के मइल आय, अभी हे त हे, चिटिक बेर म नइ रहे। तभे तो बड़े बड़े मनखे घलव अटक जथे।  अटके म मनखे अपन मेर नइ गोहराही? त काखर मेर गोहराही। अइसे भी ताली तो दूनो हाथ म बजथे का? फेर कभू-कभू मति हरा जथे। दूसर के गोठ बात म आय ले मया के फुलवारी उजर जथे। फुलवारी के उजरे ले अउ ॲंगना के बॅंटे माहर-माहर महकत ममहासी बटय नइ भलुक सिरा जथे। अइसने लता के कका सेल्समैन अपन पाॅंव म पखरा कचार डारथे। वो भुला जथे कि मनखे के बिगाड़े मनखे के बिगाड़ नइ होवय, जब भगवान नइ सोचे हे त। लता जइसे तइसे पढ़ डारिस अउ आज अपन पाॅंव म खड़े हे। पूरा दम के संग। 

        कहिनी म हमर समाज म मया ले महकत घर परिवार के उछाह घरी के सुग्घर चित्रण करे गे हे। फेर जे बड़ सुंदर दिखथे, उही ल झटकुन नजर घलव लगथे। चिटिक धियान देवव न, मनखे मुखारी अउ लउठी बर सोज अउ सुग्घर डार ल खोजथे न? कका के परी बर चिटिक मया नइ दिखय। इही तो आय समे के फेर। फूफू सास के फूके कान ले घर बॅंटागे। कुल मिलाके कहानी म घर गाॅंव के लोगन के मनोभाव ल बड़ सुग्घर ढंग ले उकेरे गे हे। जीवंत हे। 

         लता के सोच घर-परिवार ल मया के सुतरी म गुॅंथ के माला सहीं पिरोय के दिखत हे। इही कहानीकार के सामाजिक सरोकार ल रेखांकित करथे। कका के बेटी मन बर संसो करत शिक्षा के उजियार ल बगराय के ओकर उदिम सराहे के लइक हे। 

        मंथरा अउ शबरी के पौराणिक चरित्र ल सुरता करत कहानी अपन भीतरी भारतीयता के ममहासी ल महर महर महकात हे अउ उछाह के संदेश बगरात हे।

        कहानी के भाषा शैली अनुपम हे। पात्रानुकूल कथोपकथन ले कहानी सुग्घर ढंग ले आगू बढ़थे। उद्देश्य पूर्ण कहानी बर चंद्रहास साहू जी ल बधाई।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी जिला बलौदाबाजार भाटापारा छग

6261822466

कहानी बिसाखा

 कहानी बिसाखा


*कहिनी : बिसाखा*

          पोखन लाल जायसवाल


      बिसाखा रात दिन समझातिस फेर घरवाला के आगू वोकर कभ्भू नइ चलिस। ननकू बिसाखा के एको बात नइ धरिस, न गुनिस। दू ले तीन होगे, तीन ले चार अउ पाँच घलो होगे। दू बेटा अउ एक बेटी के बाप बनगे, फेर कोन जनी काबर ओकर आँखी नइ खुलिस। चेथी के ऑंखी चेथी कोती रहिगे। अपन परिवार बाढ़े के संग घर के कोनो संसो-फिकर नइ करत रहिस। इही हाल ल देख के वोकर दाई-ददा उँकर ले छुटकारा पा लिन। ननकू के चेत आही कहिके दाई-ददा मूल के संगेसंग ब्याज के मोह ल छोड़ दिन। चार कुरिया अउ आठ परानी के घर म अब एक के जगा दू चूल्हा म जेवन बने लगिस। दाई-ददा अपन पढ़ंता छोटे लइका संग रहे ल धर लिन। भले अपने जाॅंगर भरोसा रहिन। अतका होय ले घलव ननकू के चेत चेथीच म रहिस। बिसाखा बपुरी ह कइसनो करके चारो परानी के मुँह म चारा डारे के उदीम करत रहय। 

        ननकू जतका कमाय ततका ल उड़ा देवय। एको आना घर म नी लावय। दिनभर हरर-हरर कमातिस अउ संझौती पी के ढरका देतिस। चार झन लगवार मन ल घलव पिला देतिस, फेर लइका मन बर कभू चना-फल्ली नइ जानिस। बिसाखा कभू लइकामन बर चिंता करे कहय त उल्टा कहे लगतिस , "बिसाखा! भगवान जनम दे हे के पहिली सबो परानी के खाय के बेवस्था खुदे कर देथें, त मैं काबर संसो करँव? इँकर चिंता कर अपन लहू काबर अउँटावँव?" अतका सुन के बिसाखा मुड़ धर रोय लगिस। चिरई चिरगुन मन घलव चोंच म दबा के लानथें अउ अपन पिला मन ल ओसरी पारी खवाथें। सरी दुनिया अपन लोग-लइका के चिंता करथें। फेर ...याहा का मनखे के संग धरा दे हे मोर ...। कभू दाई ददा ल कोसय, त कभू भगवान ल अउ कभू अपन किस्मत ल दोष दे लागय बिसाखा ह। ...ऑंसू बहाय ले जिनगी ह नइ चलय कहिके, बपुरी ह खुदे चुप होइस। मन ल मनाय घलव, मोर जिनगी भर रोना बदे होही त कोन काय करही? ननकू के नशा के आदत छुटबे नइ करिस। हाँ ननकू के एक ठन बढ़िया बात इही रहिस, के नशा पानी करे के पाछू ओहा कोनो ल कभू गारी-गुफ्तान नइ करय। आन नशेड़ी मन कस कभू बिसाखा ऊपर हाथ घलव नइ उठाइस। एकर ले बिसाखा अपन लइका मन के बरोबर चेत कर लेवत रहिस हे। धीरे-धीरे दिन बीतत गिस। बिसाखा लइका मन के हाथ पिंवरा घलो डरिस। दूनो बेटा बहूमन संग शहर म जाके रोजी मंजूरी कर जिनगी जीयत हावयॅं। गाँव म बारो महीना बूता नी मिले ले जिनगी मुश्किल होगे रहिस। गाॅंव म खनती कुदारी के दिन तो अब तइहा के बात होगे हे। कोनो मेंड़ म ढेलवानी नी देवय। राहेर ओनहारी घलव अब नोहर होगे। बेंदरा के बहाना कर मनखे अलाल होवत जावत हे। गाँवभर ओनहारी बोही त बेंदरा कतेक ल खाही। ...फेर....। गँवइहाँ मनखे घलव कमती पइसा म का कमाबो कहिके शहर के रस्ता धर लेथे। जतका जादा कमाही तेला भले किराया भाड़ा दे के दूसर के भोभस भरहीं। 

        बेटी सोनकुँवर आठ कोस भर के दुरिहा गाँव म बने घर-दुआर म गे रहिस। बिसाखा एक सरविन नारी-परानी जात काला परखतिस? सास-ससुर दू बछर पहिली ओसरी-पारी सालभर म सरग सिधार गे रहिन हे। देवर बाँटे भाई परोसी होके अपन परिवार म भुलागे रहिस, ओकर ले का आस रखे जा सकत रहिस? बिसाखा सात-आठ एकड़ के जोतनदार किसान के बेटा संग सोनकुँवर ल बिहा दिस। ननकू ल पीए-खाए ले फुरसत मिलतिस त कुछु करतिच। 

       कहे गेहे बइठे-बइठे तरिया के पानी नइ पूरय। वइसने सोनकुँवर के ससुरार म होइस। दमाद ल कभू कमई-धमई ले मतलबे नइ रहिस। घूम-घूम के खाना बस ओकर बूता राहय। बइठाँगुर दमाद कभू-कभू ससुरार आइस त ससुर के रस्ता चले लगिस। कभू-कभू पियइया मनखे रोजे पीए धर लिस।  सोनकुँवर घलव महतारी बिसाखा सही घरवाला ल समझाना चाहय त कूट-कूट ले मार खावय। तीन आँसू रोये बिगन दिन नइ बीतत रहिस। "तोर ददा ल नइ समझा सकेच, त का मोला समझा पाबे।" अइसन सुन सोनकुँवर कहिस, "तैं समझना नइ चाहबे त ब्रह्मा घलो नइ समझा सकय, मोर जइसन नारी-परानी ल कोन कहय? जउन ल तुमन पाँव के पनही समझथव। तुम भुला जथव कि पनही हर ही काँटा-खूँटी ले बचाथे, भोंभरा जरे ले बचाथे। तुम का जानव पनही के मरम ल।" अतका सुन गुस्सा तरवा म चढ़गे।  आव देखिस न ताव, सोनकुँवर ल फेर पीटे ल धर लिस। सिहरत ले मार खाय के पाछू महतारी बिसाखा ल फोन करिस अउ कहिस, "दाई! जब ले तोर दमाद आय हे तब ले रोज बइहाय हे, सिरीफ पियईच करत हे। कछु कहे म सिहरत ले मारथे, पीटथे।...." सोनकुँवर के गोठ सुन बिसाखा फफक-फफक के रो डरिस।  महतारी के मया तुरते सोनकुँवर के ससुरार के रस्ता नापे धर लिस।

        दमाद बाबू ल तिर म बिठा समझाय लगिस। "देख बाबू! बाप पुरखा के जउन जमीन हे, ओला बरोबर कमा। खेती अपन सेती होथे। रेगहा दे म खेती बिगड़त हे।" अपने ससुर ल देख का करे हे जिनगी भर, सिरीफ पिए के।" 

       "मैं तोला अपन बेटी ल मंद-मउहा पीके मारे बर नइ दे हँव। आज अपन बेटी ल अपन घर लेगे बर आय हँव।" 

       "तइहा के सियान मन मानिन त मानिन, घर ले बिदा होय के बाद बेटी बर बाप घर ले सबर दिन बर छुट्टी हो जथे। मोर घर के दुवारी मोर बेटी बर हमेशा खुल्लाच हे। आज मैं लेके जाथँव।"

         अतका सुन के दमाद बाबू गिड़गिड़ाय लगिस, "मैं सोनकुँवर बिगन नइ जी सकँव। ओला झन लेगव।"

       "एक्के शर्त म सोनकुँवर इहाँ रही, जब तें मंद मउहा छोड़ के काम बूता करबे। अपन दाई ददा के संग अपन खेती ल खुदे करबे।" बिसाखा कहिस। 

         बिसाखा जानत रहिस कि बेटी अउ दमाद एक-दूसर ले दुरिहा नइ रहे सकयॅं, अउ गृहस्थी के गाड़ी ल जिनगी के भुइयाँ म चलाय बर दूनो एक-दूसर के सारथी बने ल परही। बिसाखा के तीर सही निशाना म परिस।

          दमाद बाबू सोनकुँवर ले माफी माँगत अपन सास बिसाखा के शर्त मान लिस। अउ ठान लिस कि आज ले मंद-मउहा के दाहरा म डूबकी नइ लगावँव। सोनकुँवर महतारी बिसाखा ल पोटार रोय लगिस। फेर ए दरी ओकर ऑंखी ले खुशी के आँसू बोहात रहिस।


पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह) जिला बलौदाबाजार भाटापारा छग.