Monday, 18 December 2023

नानूक कथा - छैँईहा

 नानूक कथा -

     छैँईहा 

देख बहू  -तोर मन म का हे नई जानन? हमन  तोला गरु लागत होबोन त जाव  l तुमन जिंहा जाव तुंहर मर्जी हे  l जिंहा रहे के l ठोस निर्णय सुनावत ससुर कहिस l दिन रात उठा -पटक,बर्तन भाड़ा के  कचराई अउ भांय -भांय के बोली ले तंगा डरेस l  


             बुढ़त खानी म सहे के ताकत नई रहय  मन टोरा  के मन घलो कहिस l ओकर मन रहिस  हर हर कट कट ले हमी मन निकल जातेंन,तेन बने रहिसl

अपन आदमी सुखी ला समझावत रहिस l पर कोठा ले आथे तेन  ला हमर कोठा पर अस लगथे l जी जबो मनटोरा

तिपो के खा लेबो l फेर तपनी ताप नई सहावय l

आजकल के लइका मन ला अलग रहे घूमे फिरे के आजादी चाही l बाहिर म रही त पता चलही l कतका ऐठन हे उलर जही दू एच दिन म l ले अब चुप रह जादा रोस झन कर - मनटोरा कहिस l  अपन छैँईहा बनाके देखाय l गारी देय भर ला आथे  थोथानाहीं ल -थोरको नई घेपय  l मनटोरा अतके कहिके अपन मन ला मढ़ा लीस l

उही दिन ले बहू के मुँह म चपका धरागे l लोगन मन का कइही मोला?

नई कह सकत हे जाथन तोर घर ला छोड़ के l

सास ससुर के छैईहाँ बाहिर म नई मिलय l जान डरिस l


मुरारी लाल साव

कुम्हारी

कहानी--मौन मुक्का

 

कहानी--मौन मुक्का

                             

                                   चन्द्रहास साहू

                              मो .8120578897



गाॅंव भर मा सनसनी दउड़गे आज। डोंगरी मा लाश मिले हाबे। मोला तो जानबा नइ रिहिस फेर गोसाइन बताइस  तब जानेंव। धान बेचे ला गेये रेहेंव सोसायटी। रात दिन उहां ओड़ा ला टेकाये रहिबे तब धान बेचाही.....!

 

                      जेवन के पाछू सुतत हंव अउ गुनत हंव अब कोन मरगे रे , कोन फांसी अरो डारिस ते। कायर झन बनो रे । जीये ला सीखो । गुनत -गुनत मोला सुध आये लागिस बिसालिक के। ओखरे तो पाॅंच छे दिन ले आरो नइ हावय। पचपन साठ बच्छर के किसान मोर संग पढ़े हावय। पांचवी मा फेल होगे अउ पढ़ई छोड़ दिस। हमजोली हावय तभो ले मोला कका कहिथे।

"ठाकुर घर के बइला बनके कब तक कमाबे बिसालिक ! नानमुन कोनो करा भुइयां बिसा लेतेस ।''

" हमन जूठा खवइया आन मालिक ! भगवान हमर हाथ के डाढ़ मा अइसने लिखे हावय । ओखर बिना पत्ता नइ हाले। कब देखही हमर कोती ला ते ?''

 मोर गोठ ला सुनके काहय बिसालिक हा संसो करत। जम्मो ला सुरता करत हंव।

                     आज बिसालिक अब्बड़ उछाह मा रिहिस । ओखर संग गाॅंव के आने किसान मन घला रिहिन। जेन ला जुटहा काहय तौन मन आज मालिक बनत हावय। मजदूर मन  बित्ता भर भुइयां बिसा लेथे ते मालिक ला अतका झार लागथे , जइसे मेंछा के चुन्दी ला पुदक डारे हावय। आज तो सिरतोन दो पाॅंच दस अउ बारा एकड़ फारेस्ट भुइयां ला खेत बना के सरकार हा देवत हावय  एक -एक झन ला। हम पातर जंगल ला खेत बनावत हन काबर..? तुंहर विकास बर।  अब तुंहर दुवार तुंहर सरकार  हावय काबर ..? तुंहर विकास बर।  सिरमिट के जंगल बनत हावय काबर..? तुंहर विकास बर। तरिया ला पाटके स्विमिंग पुल बनावत हावन.. काबर ?  तुंहर विकास बर। वन मंत्री गरीब भूमिहीन मजदूर ला वन अधिकार पट्टा बाँटत हावय। अउ नारा लगवावत हावय।

           आज मंत्री जी  लबरा नइ रिहिस। सिरतोन मा जंगल ला काटके  चौमासा के आगू  खेत बना डारिस। चैतू बुधारू  रमतू असन मन ला किसान भूमिस्वामी बना दिस। बिसालिक ला घला पाॅंच एकड़ खेत मिलिस। 

        सिरतोन किसान के पछीना भुइयां मा चुचवाथे तब सोना उगलथे खेत हा। भलुक पछिना अउ पानी के रंग एक्के होथे तभो ले जब सिंचाई के पानी मा पछीना मिंझरथे तब ओखर रंग हरियर हो जाथे। चारो कोती हरियर- हरियर दिखत हे। लहरावत धान बड़का -बड़का खेत चाकर मेड़, मेड़ मा राहेर अउ घपटे तिली के पौधा। आज बिसालिक के संग ओखर खेत गे रेहेंव। पोरा तिहार आय न ! धान ला चिला खवाय ला गेये रेहेंव।

"तेहां तो हाथ मार देस बिसालिक अतका धान मा कोन पोठ नइ होही..?''

"हाॅंव कका ! सब तुंहर असीस आवय।'' 

               बिसालिक के खेत ला देख के सिरतोन अकचका गेंव। काली के बंजर भुइयां मा आज अतका फसल लहरावत हे हरियर - हरियर । मेड़ के डिपरा मा छेना मा खपत आगी ला मड़ायेंन। फुलकाछ के लोटा के पानी ले आचमन करेंव। धूप दशांग अउ गुड़ के हुम देयेंव। गुड़हा चिला के नानकुन कुटका ला आगी देव मा अरपन करेंव। सिरतोन हमर कतका सुघ्घर नेग हावय।  किसान हा गभोट धान  अन्न्पूर्णा दाई ला बेटी मानके सधौरी खवाथे । 

"सदा दिन बर छाहत रहिबे अन्न्पूर्णा दाई ! अपन मया बरसाबे ओ ! कोठा कोठार अउ कोठी मा मेछरावत आबे ओ ! हमरो भाग ला जगाबे ओ !''

 अब्बड़ आसीस मांग डारेंव। पाॅंच चिला ला कुटका - कुटका करके आदर ले खेत मा परोसत केहेंव।

 "खेत तो बोये हंव कका ! फेर टोंटा के आवत ले करजा बोड़ी हो गेये हाबे ।''

"अब बड़का काया बर बड़का चददर ओढ़े ला पढ़ही भई। छुटा जाही जम्मो करजा हा।''

बिसालिक के गोठ सुनके केहेंव।

"कोन जन कका .....? तोर बहुरिया नेवनिन रिहिस तब मंगल सूत्र ला किसानी करे बर मांगेंव अउ आज ले नइ चढ़ा सकेंव। एकोदिन ठोसरा नइ मारिस गोसाइन हा फेर सगा - पहुना, बाजार -हाट,मेला-मड़ई, बर-बिहाव मा बजरहा डालडा के जेवर ला पहिरके जाथे तब लजाथे। फेर का करही..? तरी - तरी रो डारथे। मुॅॅंहू फटकार के येदे ला खाहूं नइ किहिस। अपन भुखाये रहिथे तभो ले मोला जेवन करवाथे। ओखरे सेती ये फसल ला बेंच के गोसाइन बर गुलबंद बिसाहूं कका !'' 

बिसालिक किहिस।

खेत किंजरत हंव अउ बिसालिक बतावत हावय।  कभु मुचकावत हावय तब कभु उदास हावय। चेहरा कभु झक्क ले दमक जाथे तब कभु मुरझा जाथे गरीबी अउ अभाव के गोठ करथे तब।

"फुटहा करम के फुटहा दोना,लाई गवां गे चारो कोना। अइसन होगे हावय कका ! थोकिन पइसा सकेलथन अउ घर मा कोनो न कोनो बुता आ जाथे सिराये बर। तीस हजार सकेले रेहेंव गोसाइन के गुलबन्द लेये बर । अबक-तबक जवइया घला रेहेंव सोनार दुकान। उदुप ले दमाद के फोन आगे। बाबू जब ले तोर बेटी हमर घर मा आये हावय तब ले हमर घर मा गरीबी के चमगेदरी उड़ावत हावय। बेटा अउ गोसाइन के जर बुखार मा मोर जैजात सिरावत हावय। आज घला मोर डेरउठी के दीया ला झन बुतावन दे बाबू। मोला पइसा दे...। दे देंव। एक दरी फेर पइसा सकेलेंव । बहुरिया हरू-गुरु होइस। छट्टी बरही , नत्ता-गोत्ता सयनहिन दाई के खात -खवई अउ टूरी के पढ़ई के फीस, जम्मो मा उरकगे फेर गुलबन्द नइ बिसा सकेंव।''

बिसालिक बतावत रिहिस अउ हमन खेत किंजरत रेहेंन। बम्बूर रुख  ला देखेंव। डोड़का के नार छिछले रिहिस। पियर फूल अउ झूलत डोड़का। टोरे लागेंव। 

"लइका मन तो बने कमावत होही बिसालिक ..? संसो झन कर सब सुघ्घर हो जाही । बहुरिया ला गुलबन्द पहिरा डारबे।''

"कोन जन कका...? टूरा मन ला पुछेस!'' बिसालिक मौन मुक्का होगे। फेर किहिस। 

"एक झन ट्रक चलाथे अउ दुसर हा गरवा चरातिस ते जादा कमातिस..। मास्टर हावय। शिक्षा मितान। दूनो के दुये हाल। ट्रक वाला ला बरजथो झन पी रे मंद महुआ। मुॅंही ला भोकवा कहिथे ।  इही तो कलजुग के अमरित आवय ददा ! तभे तो अस्पताल ला प्रावेट डॉक्टर हा चलाथे अउ सरकार हा दारू भठ्ठी ला। अब्बड़ फरजेंट गोठ-बात मा मोला चला देथे। भलुक ओखर गोसाइन लइका ला चलाये के सामरथ नइ हावय अउ एसो सरपंच बनके पंचायत ला चलाहूं कहिथे। बिसालिक बताइस अपन बड़का लइका के बारे मा।

"ले बिसालिक बने अउ समझाबे मंद महुआ ला झन पीये अइसे।''

मेंहा केहेंव। मेड़ मा जागे पटवा अउ अमारी भाजी ला टोरत हन अब दूनो झन। शिक्षा मितान  बने हावय पढ़ लिख के नान्हे टूरा हा। कमती वेतन वाला हा रेगड़ा टूटत ले कमाथे अउ जादा वाला हा मोबाइल मा गेम खेलथे स्कूल मा । अइसना बताथे लइका हा। अब्बड़ सिधवा । कइसनो होवय  लइका लोग ला पालत पोसत हावय। महीना पुट चाउर पठो देथंव । मोला लागथे इही लइका हा नाव के अंजोर करही कका ..।

बिसालिक के चेहरा दमकत रिहिस आस मा।

"कका ! सब लइका मन अब अपन - अपन खोन्दरा सिरजा डारिस। बस नान्हे नोनी के हाथ मा दू गांठ के हरदी लगा देतेंव ते मोरो कन्या दान के नेंग हो जातिस। अब्बड़ संसो रहिथे । कोनो गरीब अलवा-जलवा लइका मिलही ते बताबे कका !

"हाॅंव ।''

बिसालिक के गोठ सुनके हुंकारु देये हंव। जाम पेड़ मा छछले लट्टू कस फरे  तुमा ला टोरे के उदिम करत हंव अब अउ बिसालिक फेर बतावत हावय।

"लइका के दाइज डोली देये बर एको पइसा नइ सकेले हंव कका ! पांव पखारे बर फुलकाछ के लोटा थारी लेये हंव। भांवर बर सील अउ जोरन बर कंडरा ला  झांपी बनवाये बर केहे हंव।  ... अउ  धौरी बछिया ला घला राखे हंव। फेर सगा सोदर बरतिया घरतिया बइठे बर ठौर नइ हावय कका !''

बिसालिक बताये लागिस सुरता कर - कर के। 

''घर तो बने हावय का बिसालिक । आवास योजना मा नाव आये हे कहिके पीछू दरी बताये रेहेस।

"नाव तो आये हे कका   फेर....।'' 

दमकत चेहरा फेर बुतागे बिसालिक के ।

"का होगे ?''

"काला बताओ कका ! पहिली क़िस्त मिलिस  जुन्ना घर ला उछाह मा उझारेंन अउ ईटा पथरा के नेंव निकालेंन अउ धपोड़ दे हावन अभिन। तीन बच्छर होगे थुनिहा गड़िया के  झिल्ली - मिल्ली ला छा के गुजारा करत हावन। एसो बनाहूं कका पक्का घर चाहे सरकार पइसा देये कि नही....। मोर धरती मइयां हा मोला उबारही गरीबी ले । लइका के बिहाव हो जाही घला ।''

".... अउ  तोर गोसाइन के गुलबन्द ?''

"अब तो डोकरी होगे हाड़ा अउ मांस ला साजे के दिन नइ हे अब कका ! का गुलबंद पहिरही गोसाइन कही लिही "लबरा'', सुन लुहूं मेंहा।''

बिसालिक अब बिद्वान महात्मा बरोबर गोठियावत हावय। बोर के हरियर बटन ला मसकिस । बम्बाट पानी निकलिस । पैलगी करिस गंगा मइयां ला। मोही के धार ला बहकाइस अउ अब घर आगेंन दुनो कोई धान ला देख के उछाह मा मगन होवत।

 कुकरी अपन अंडा ला कइसे सेथे  ? पांख मा लुका के।  चियामन ला कइसे राखथे ? महतारी लइका मन ला कइसे बटोर के जतन के राखथे ?  बस वइसना जतन करत हावय बिसालिक हा अपन खेत के, धान के, परिवार के।


"जतका के धान नइ बोये हे लइका लोग ला तियाग देहे । कका ! नान्हे देवर बाबू ला पठो दे तो, खेत ले खोज के ले आनही ।''

बिसालिक के गोसाइन आवय। आज रात के जेवन के बेरा आके किहिस। मोर नान्हे टूरा हा गिस। गाॅंव के निकलती अमरा लिस । खुटूर - खुटुर ठेंगा ला बजावत ठुकुर-ठुकुर खाॅंसत बीड़ी के सुट्टा मारत आवत रहिथे बिसालिक हा रोजिना । 

बिसालिक अउ गोसाइन एक उरेर के झगरा होतिस तेखर पाछू जेवन करतिस।

           ..... अउ सिरतोन भुइयां हा अतका धान उछरिस की देखनी होगे गाॅंव भर। पटवारी हा तो क्राप कटिंग के प्रयोग घला करिस। खेत ले कोठार अमरगे। कोठार ले कोठी जवइया हावय।

          कोठार के मंझोत मा धान के रास (हुंडी)

माड़े हावय। भुर्री के करिया गोल घेरा सोनहा धान अउ बीच के करिया मोती के माला बरोबर। मोखला काॅंटा नजर डीठ ले बाॅंचे बर। काठा कलारी जम्मो । कोठार के तीर मा पैरा के पैरावट । अन्नपूर्णा दाई ला परघा के कोठी अउ ससराल पठोये के तियारी होये लागिस। 

बिसालिक के मन गमके लागिस। मोर जम्मो करजा छुटा जाही नोनी के बिहाव अउ घर...। जम्मो सुघ्घर हो जाही।

                  

                  रतिहा तीन चार बजे ले सोसायटी मा दू दिन ले ओड़ा ला टेकाये रिहिस। कतका लड़ई झगरा तना - तनी सहिस अपन कुरता अउ पगड़ी के बलि दिस । तब टोकन मिलिस। ओ तो बिसालिक के किस्मत जब्बर हावय तभे कनिहा के ओन्हा बाचिस नही ते कतको झन तो ...?

                 इंदर भगवान तो अखफुट्टा आवय सबरदिन । बोता घरी मा भोम्भरा जरथे अउ लुवे के घरी पूरा बोहाथे। अउ बिसालिक कोनो राजा  नोहे कि ओखर भाग जब्बर रही..। अउ न ही मालगुजार आवय । धान के सोनहा रास हा ताम्बई रंग के हुंडी बनगे। भलुक अकरस पानी अतरगे रिहिस फेर बिसालिक के आँखी के पानी नइ अटाये हे। सुरुज नरायेन के किरपा ले सुखाइस अउ सोसायटी मा लेगगे किराया के टेक्टर मा।

"ये धान बिकने लायक नही है। सब बदरंग और पाखर हो गया है।'' 

ससन भर देखिस जम्मो धान ला अउ आँखी ला नटेरत किहिस साहब हा। मॉइश्चर मीटर ले धान के नमी घला नाप लिस। जौन हा जादा रिहिस।

"ले लेव साहब ! येहां धान भर नोहे मोर सपना आय। मोर जिनगी आय....।''

बिसालिक करेजा ला निकाल के किहिस फेर साहब तो दाऊ संग ठठ्ठा करत हावय।

 "साहब ! दाऊ के धान ला बिसा लेव वइसना मोरो....?''

साहेब कलेचुप।

"साहेब ! बोकरा भात खवा दुहूं महूं हा...।''

चभलावत पान के पीक ला थुकिस साहब हा। बिसालिक के गोड़ मा घलो परिस थूक हा फेर का करही ...?

दुनो हाथ जोर के अरजी करिस बिसालिक हा। फेर कलेक्टर मंत्री अउ राजधानी जाये के सुझाव दिस साहेब हा।

" का करहूं साहब  ? मोर मा अतका ताकत नइ हावय। न मेंहा खा सकंव न जानवर ला खवा सकंव।  न बेच सकंव । घुरवा मा घला फेक नइ सकंव तब करहूं ते का....? हा ....फेर जाहूं..... तेहां जिहां पठोबे तिहां जाहूं ।''

 सिरतोन करेजा निकाल के चिचियाइस बिसालिक हा ।

                

            जम्मो ला गुनत-गुनत नींद परगे। चारबज्जी उठेंव। तियारी करेन जाये के।  भिनसरहा होगे । अब जंगल के रस्दा नाहक के डोंगरी ला चढ़त हावन। छे झन पुलिस वाला। लाश ला देखइया जवनहा गाॅंव वाला अउ मेंहा। पुलिस वाला अब पहिली देखइया जवनहा बर गुर्रावत हाबे।

"का करे बर अतका दुरिहा आये रेहेस रे ? लकड़ी जंगली जानवर के तस्करी तो नइ करस न..? करत होबस ते बारा बच्छर बर धांध दुहूं जमानत घला नइ होवय।''

"जब देख डरेस कलेचुप नइ रहितेस । मर जातिस सड़ जातिस नही ते कुकुर कोलिहा खा डारतिस।''

"जिमकांदा खाये रेहेस का बे ! तोर मुॅंहूअब्बड़ खजवात रिहिस । अउ लाश घला छे सात दिन जुन्ना ..। यहुं हा बताये के कोई जिनिस आय ? ''

पुलिस वाला मन जवनहा ला चमकाये लागिस। जवनहा तो अतका चेत गे कि अब न लाश ला  का ...., कोनो ला एक गिलास पानी घला नइ पियाय। 

                         अभिन दूसरिया बेरा आवय मंद के भभका लेवत हावय पुलिसवाला अउ गाॅंव वाला मन। मंद पीये ले लाश नइ बस्साये कहिथे। अब अमरगेंन ओ ठउर मा।

                         ससन भर देखेंव। तेंदू रुख के तीर मा परे तुतारी अउ रुख मा बॅंधाये नायलोन के डोरी ला। डोरी मा गठान अउ गठान मा अरझे झूलत लाश। काया के उप्पर कोती उघरा अउ कनिहा मा नानकुन पटकू सूती के। आँखी के जगा मा मांस के लोथा अऊऊ गोटारन कस झूलत आँखी। कोनो जिनावर कोचक के निकाल देहे। आधा हाथ नइ हे कोलिहा चफल दे होही। नाक के जगा नाक नही, कान के जगा कान नही। पेट तुमा कस फुले छाती मा हाड़ा नही... अउ कही हावय ते बिलबिलावत किरा- सादा सादा। एक,दो , हजार , लाख नही...करोड़ो के संख्या मा सादा किरा। रुख के डारा मा किरा। डोरी मा लबर - लबर रेंगत किरा अउ लाश नइ झूलत हावय अब जइसे किरा हा फांसी के डोरी मा झूलत हावय। लाश के एक कुटका संग अब लंझका-लंझका गिरे लागिस। भुइयां भर बिगरे लागिस किरा अब। मेहत्तर के गोड़ मा चढ़त हे। बुधारू के धोती मा अउ लाश.. हवा के झोंका आइस अउ  फेर एक कोती गिरगे। अकरस पानी .. अउ बस्साई...पेट खदबदाये लागिस । ..उच्छर डारेंव। अपन उम्मर भर नइ देखे रेहेंव अइसन लाश। क्षत- विक्षत लाश। मास्क अउ हेन्ड ग्लव्स पहिरके लाश ला उतारत हावय । लाश नही ....?  किरा ला उतारत हावय। टूरा आवय कि टूरी, माईलोगिन आवय कि बबा जात । कुछु नइ जानबा होवत हावय। 

"वो तो विधान सभा प्रश्न उठ गया है इसलिए इतना मसक्कत करना पड़ रहा है वरना कितने ही लाश को गुमशुदगी अउ लावारिश बना के रफा दफा कर देते है।'' 

पंचनामा बनावत किहिस पुलिसवाला हा। प्लास्टिक के थैली मा भर डारिस अउ लेबल लगा दिस अज्ञात लाश के। फोरेंसिक जांच बर राजधानी जाही । तुतारी ला घला जोरत हावय।

                  कोन जन का पता चलही ते...? बिसालिक घला  कहाॅं गेये हावय ते ? कलेक्टर करा गेये हावय कि मंत्री कि राजधानी। संसो होये लागिस। मन अब्बड़ बियाकुल हावय टीवी चालू करेंव। गाना सुनके मन नइ करिस। फिलिम देखे के मन नइ करिस। समाचार लागयेंव मछरी बाजार कस हांव-हांव होवत रिहिस। कुकुर झगरा। लोकतंत्र के पुजारी आवय ये मन। किसान आत्महत्या के आंकड़ा बतावत रिहिस खुर्सी के सपना देखइया मन। अउ खुर्सी वाला मन सबुत मांगत रिहिस। हमर छत्तीसगढ़ मा एको झन किसान आत्महत्या नइ करे हे...?  मेंहा मौन मुक्का हो गेंव। एकदम चुप कलेचुप। टीवी ला बंद करेंव अउ आरो कोती धियान लगायेंव। बिसालिक के गोसाइन आवय अब्बड़ बम्फाड़ के रोवत रिहिस।

" मोर राजा! मोर दाऊ  ! ते कहा लुकागेस धनी ....?''

थोकिन मा थक गे अउ वहु होगे मौन मुक्का...।


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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com



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समीक्षा


      कहानी - मौन मुक्का


कहानीकार - चंद्रहास साहू 


   समीक्षक - ओमप्रकाश साहू "अंकुर "


साहित्य के गद्य विधा म  कहानी एक प्रमुख विधा हरे. कहानी के माध्यम ले एक कोति समस्या ल उजागर करे जाथे  त दूसर कोति येकर माध्यम ले सीख देये जाथे. समाज अउ सरकार के धियान दिलाय जाथे कि ये समस्या ल उलझाव झन बल्कि सुलझाव. इही म भलाई हे. समाज अउ सरकार के" मौन मुक्का" होय ले बिपत्ति ह सुरसा सहिक अउ बाढ़थे. अइसने किसान के पीरा ल  महतारी भाषा छत्तीसगढ़ी म  लिखे हावय  युवा कहानीकार भाई चंद्रहास साहू ह अउ कहानी के नांव हे "मौन मुक्का".

        मौन मुक्का कहानी ल पढ़ के प्रेमचंद के कहानी "पूस की रात" , अउ उपन्यास" गोदान" के चित्र बरबस सामने आ जाथे. बाबा नागार्जुन ह अपन कविता "अकाल और उसके बाद" के माध्यम ले अकाल के मार्मिक चित्रण करे हावय.  कतको लेखक,कवि मन किसान के पीरा के बरनन करे हावय.अइसने किसान के पीरा के मार्मिक चित्रण हावय कहानी " मौन मुक्का" म. येमा एक भारतीय किसान के जांगर टोर कमाई के बखान हे त दूसर कोति करजा -बोरी म डूबे किसान  के चिंता- फिकर ल उकेरे हावय. दाऊगिरि अउ सरकारी बेवस्था के पोल खोले गे हावय. बेईमानी, कामचोरी अउ भ्रष्टाचार के कुवां ह कत्तिक गहरा हे वहू ल बताय गे हावय.लोक तंत्र के बात करथन त विपक्ष अउ पक्ष म कइसे तनातनी होथे. सत्त पक्ष कइसे सबूत ल दबा देथे. टीवी म डिबेट के स्तर कत्तिक गिर गे हावय. विकास के नांव म प्रकृति के जउन बिनाश होवत हे. आज के नवजवान संगवारी मन मंद- महुआ के फेर म पड़ के कइसे अपन जिनगी अउ घर वाले मन के जिनगी ल नरक बना के रख देथे. सरकार ह शिक्षा के नांव म कभू शिक्षाकर्मी त कभू शिक्षा मितान जइसे योजना लाके बेरोजगार मन के मजाक उड़ाथे. कर्मचारी अउ गुरूजी मन के अलग -अलग कैटेगरी बना के फूट डालके राज करथे. घोषणा पत्र म वादा करे रहि तेला पांच बछर म घलो पूरा नइ करय. दू चार महीना म पगार देथे अउ ओपीएस के जगह एनपीएस लाके कर्मचारी मन ल अब्बड़ टेंसन देथे.ये सबके बरनन देखे ल मिलथे " मौन मुक्का " म.

    मौन मुक्का के प्रमुख पात्र हरे बिसालिक. येहा गरीब किसान हरे अउ उमर हे पचपन - साठ बछर के जउन ह पहिली दाऊ घर चरवाहा लगे. सासन के योजना के मुताबिक बिसालिक ल घलो खेती किसानी बर बंजर बन भूमि देये गे हावय. खेती अपन सेति नइ ते नदिया के रेती कहे गे हावय.बिसालिक ह जांगर टोर कमाके बंजर भुइयां ल अब्बड़ उपजाऊ बना डरिन. ये जगह कहानीकार ह सुघ्घर बरनन करथे कि " सिरतोन किसान के पसीना भुइयां म चुचवाथे तब सोना उगलथे खेत हा".

     त दूसर कोति किसान के पीरा के बरनन करत बिसालिक के माध्यम ले कहिथे -" खेत तो बोये हंव कका! फेर टोंटा के आवत ले करजा- बोड़ी हो गेये हावय ". येमा एक भारतीय किसान के पीरा के मार्मिक चित्रण देखे ल मिलथे.ऊपराहा मउसम के मार ह किसान मन बर दुब्बर बर दू असाड़ हो जाथे. 

  बने धान लुवई के बेरा म मउसम कइसे पेरथे वोकर बरनन करत कहानी ह कहिथे -" इंदर भगवान ह तो अंखफुट्टा आय सबर दिन. बोता घरी म बोम्भरा जरथे अउ लुवे के घरी पूरा बोहाथे." मउसम के मार ह किसान ल मार डारथे. किसान के कमर तोड़ के रख देथे बेमउसम बारिश ह. चिंता फिकर म न दिन के चैन मिलथे अउ न रात म नींद आथे. अइसन बिपत्ति के बेरा के बरनन करत कहानीकार ह लिखथे - फुटहा करम के फुटहा दोना,लाई गंवागे चारो कोना ". ये जगह कहानीकार ह सुघ्घर हाना के प्रयोग करके कहानी के भाषा शैली ल पोठ बनाहे. कइसे बछर भर के कमाई ह पानी के मोल हो जाथे अउ नंगत झड़ी के कारन धान ह खराब हो जाथे. ये जगह अपन पात्र बिसालिक के माध्यम ले प्रकृति के मार के मार्मिक बरनन करथे - " भलुक अकरस पानी अतरगे रिहिस फेर बिसालिक के आंखी के पानी नइ अटाये हे."

      जब बिसालिक ह अपन धान ल बेचे बर सोसायटी ले जाथे त उहां साहब ह धान ल रिजेक्ट कर देथे. ये जगह कहानीकार ह भ्रष्टाचार ल उजागर करत गरीब किसान बिसालिक के माध्यम ले कहिथे - " साहब! दाऊ के धान ल बिसा लेव वइसना मोरो....?

साहेब कलेचुप...? साहेब! बोकरा भात खवा दुहूं महूं हा ."  येहा सरकारी बेवस्था म ब्याप्त बेईमानी, भ्रष्टाचार ल उजागर करथे कि कइसे दाऊ के खराब धान ल साहेब ह बिसा लेथे अउ गरीब किसान मन ल खून के आंसू रोवाथे.येकर सेति थक- हार के आत्म हत्या जइसे कदम उठा लेथे. फांसी जगह म पुलिस वाले मन के बेवहार के सजीव बरनन कर के जब्बर व्यंग्य करे हावय कि संवेदना नांव के चीज नइ हे.


  कहानी के भाषा सरल अउ सहज हे. पात्र के अनुसार भाषा के चयन करे हावय. किसान ल ठेठ छत्तीसगढ़ी बोलवाय हे त सोसायटी के साहब बर हिंदी भाषा के प्रयोग करे हावय.कहानी लंबा हे पर पाठक वर्ग ल बने बांध के राखथे. कहानी के शैली नदिया के धार कस प्रवाहमयी हे. कहानी के शीर्षक ह  सार्थक हे. एक उद्देश्य हे कि भुइयां के भगवान कत्तिक हे परेशान. समाज अउ सरकार कब तक मौन मुक्का बन के किसान मन के पीरा ल नजर अंदाज करहू अउ कब तक बिसालिक जइसे गरीब किसान मन करजा -बोड़ी म डूबके आत्महत्या जइसे कदम उठात रहि. 

               ओमप्रकाश साहू "अंकुर "

             सुरगी, राजनांदगांव

मान* (नान्हें कहानी)

 *मान* (नान्हें कहानी)


जमील सेठ एतराब के बहुत बड़े वनोपज अउ अनाज के बैपारी रहय।चार पांच बच्छर पहिली परदेस ले आइस अउ बनेच गिराहिकी जमा डरिस।जिनिस के रेट बने देवय फेर काकरो ऊपर चार आना के विश्वास नी करय।अपन नौकर चाकर मन ऊपर घलो ओला भरोसा नी रहय।घेरी बेरी समान ल तौलावय।अपन आंखी में नजर भर देखय तभे पतियावय। रामलाल ओकर पोगरी गिराहिक रहय।सबर दिन के लेन देन चलत रहय।

एक दिन के बात आय। रामलाल कना हाट जाए बर नगदी पैसा नी रिहिस।एक झोला धान ला कोठी ले निकालिस अउ साइकिल के हेंडिल में अरो के जमील सेठ के दुकान पहुंचिस।जय जोहार अउ एती ओती के गोठ बात करत रामलाल के धान तउलागे।ओकर बाद जमील सेठ रामलाल ला सौ के नोट देवत किहिस-रामलाल भाई तोर धान के पैसा चार कोरी सत्रह रु बनत हे।तीन रु धरे होबस त दे। रामलाल किहिस-में तो जुच्छा हाट आय हंव सेठ!!पैसा धरे रतेंव त धान ला काबर बेंचतेंव। ले तोर तीन रुपिया ला हाट ले समान बिसा के लहुटत खानी अमर देहूं।

जमील सेठ किथे-बन जही रामलाल भाई!!फेर तोर गमछा ला छोड़ दे रतेस त बने होतिस।लहुटत खानी सुरता आ जतिस।

जमील सेठ के गोठ ला सुन के रामलाल ला गुस्सा आगे।ओहा जमील सेठ ला ललकारत किहिस-वा रे परदेसिया सेठ!!तोर दुकान मा तीन रुपिया बर में अपन सम्मान ला गिरवी रखंव।तें लेन देन करे के बाद चार दिन बाद पैसा देहूं केहेस कतको घांव।हम भरोसा करेन।अउ तें तीन रुपिया बर मोर गमछा रखबे।जा लान मोर धान ला तौल के वापस कर।सौ के नोट ला ओकर थोथना में फेंकत किहिस-मोला अपन इज्जत प्यारा हे!तोर पैसा ला तोर खींसा में राख!!!

अतका काहत नौकर कना गिस अउ अपन धान ला तौला के रामलाल झोला में धरिस अउ चलते बनिस।

जमील सेठ मुॅंहू फार के देखत रहिगे।


रीझे यादव

टेंगनाबासा (छुरा)

भाव पल्लवन-- घर म नाग देव, भिंभोरा पूजे ल जाय।

 भाव पल्लवन--


घर म नाग देव, भिंभोरा पूजे ल जाय। 

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मनखे के जिनगी मा कतका भटकाव भरे परे हे,गुने मा बड़ अचरज होथे। पूजा करे बर--आशिर्वाद पाये बर घर मा नागदेवता  हे तेला नइ जान के व्यर्थ मा खेत खार मा भिंभोरा खोजत बइहा-भुतहा कस घूमत रहिथे। नागदेवता हा एक प्रकार ले उदाहरण आय, असली बात तो मनखे के भटकाव ला फोरियाना आय।वो कभू माया के पिछू परे रहिथे ता कभू मायापति के पिछू।ए चक्कर मा वोकर हालत कस्तुरी मिरगा कस हो जथे। कहे गे हे के--

कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढ़ूँढ़ै बन माहि।

ऐसे घटी-घटी राम हैं दुनिया जानत नाँहि॥

वो हा सुख ला --आनंद ला ,देवता-धामी ला,भगवान ला नाना प्रकार के अंटा-टंटा मा,टोना-टोटका मा एती-वोती खोजत रहिथे। जबकि असली आनंद तो वोकरे तीर मा--वोकर हिरदे के खजाना मा--आत्मा मा भराये रथे। वोहा अज्ञानता मा परके वोला टमड़ के नइ देखय।भगवान के निवास स्थान तो आत्मा ला बताये गेहे।अइसे भी ईश्वर के सत्ता कण-कण मा हाबय। मनखे हा अपन एही आत्मज्ञान ला जगालिस त वोला पल भर मा तको पा सकथे। भटके के जरूरत नइ परय।संत कबीरदास जी ज्ञान के उजास फइलावत कहे हें--

मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में। 

ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में। 

ना तो कौन क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में। 

खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तलास में। 

कहैं कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में॥ 

   इही बात ला गोस्वामी तुलसीदास कहिथें के--

सिया राम मय सब जग जानी।

करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।

    तीर्थ यात्रा,पूजा-पाठ सबके महत्व हे फेर कोनो चाहै ता अपने घर मा बिराजमान सब ले बड़े देवी-देवता माता-पिता के निश्छल सेवा करके जम्मों पुण्य के भागी हो सकथे। सब जीव जंतु के आत्मा मा ईश्वर के निवास मान के --सब संग अच्छा व्यवहार करके परमानंद के अनुभव कर सकथे। हर आत्मा मा परमात्मा हे।

सब घट मेरा साईंयां,सूनी सेज न कोय।

बलिहारी वा घट्ट की,जा घट परगट होय।।

🙏🙏


चोवाराम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

Friday, 8 December 2023

सुरता 'मयारु माटी' के..

 






सुरता 'मयारु माटी' के.. 

  अइसन बेरा म छत्तीसगढ़ी भाखा म मासिक पत्रिका निकाले के बारे म सोचना, जब लोगन रायपुर जइसन शहर म छत्तीसगढ़ी गोठियाए तक म लजावंय. फेर जेन मनखे चेतलग होए के संग छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन म जुड़ जाय, अउ वोकरेच संग छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के रंग म रंग जाय, तब तो अइसन सोचना कोनो किसम के अचरज वाले बात नइ हो सकय. 

   सिरतोन आय, तब वो बखत हमन ल छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के छोड़ अउ कुछू नइ सूझत रहय. बस इही सोच म दिन पहा जावय के कइसनो कर के छत्तीसगढ़ी के सेवा कर लेतेन. वइसे तो मैं छात्र जीवन ले ही अलवा-जलवा लिख के खुदे पढ़ के खुश हो जावत रेहेंव, फेर सन् 1982 के आखिर म जब अग्रदूत प्रेस म काम करे बर गेंव, अउ 1983 ले जब अग्रदूत ह दैनिक के रूप म निकले लगिस, त उहाँ के साहित्य संपादक प्रो. विनोद शंकर शुक्ल जी ल मोर छोटे मोटे लिखे रचना मनला देखावंंव उन वोमा कुछू जोड़ सुधार के छाप देवंय. उही म मोर छपे रचना ल पढ़ के छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के सुशील यदु अउ रामप्रसाद कोसरिया जी मोर संग मिले बर अग्रदूत प्रेस आइन. तहाँ ले एकरे मन संग चारों मुड़ा के छत्तीसगढ़ी लेखक मन संग जुड़े बर धर लेंव. संग म पत्रकारिता म घलो जाना होगे. फेर आगू चलके अइसन संयोग बनिस के अपन खुद के प्रिंटिंग प्रेस घलो चालू कर डारेन. मन तो छत्तीसगढ़ी म एक पत्रिका निकाले के रहय, तेकर सेती पंजीयक, दृश्य एवं प्रचार निदेशालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली के कार्यालय म पत्रिका के रजिस्ट्रेशन खातिर चार-पांच अलग अलग नाॅव लिख के पठो देंव. महीना भर के बुलकते उहाँ ले मोर जगा चिट्ठी आगे, जेमा 'मयारु माटी' के नॉव ले तीन महीना के भीतर पत्रिका चालू करे के निर्देश रिहिस हे. 

   मैं तुरते प्रकाशन के प्रक्रिया म भीड़ गेंव. संग म चारों मुड़ा के छत्तीसगढ़ी लिखइया-पढ़इया मन ल सोर दे लगेंव. महीना भर के भीतर पूरा छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत म एकर सोर बगरगे. कतकों झन छत्तीसगढ़ ले बाहिर रहइया मन के घलो पता-ठिकाना के आरो कराइन. उहू मनला, पाती भेजेंव.

    'मयारु माटी' के पहला अंक खातिर चारों मुड़ा ले रचना अउ शुभकामना आए लागिस. फेर वोमन म पद्य रचना ही जादा रहय. मैं शुरू ले पत्रकारिता ले जुड़े रेहे के सेती गद्य रचना के जादा मयारुक रेहेंव, एकरे सेती गद्य के विविध रूप एकर प्रकाशन खातिर चाहत रेहेंव. कतकों झन ल जोजिया के कहानी, नाटक, व्यंग्य, मुंहाचाही, आनी-बानी के लेख आदि लिखे बर काहंव. पहिली के एक दू अंक म तो महिंच ह कतकों किसम के रचना ल अलग अलग नांव म लिखंव, कतकों झन के हिन्दी रचना मन के अनुवाद घलो कर देवंव. वोकर बाद फेर भरपूर रचना आए लागिस, तब मोला वोमा छांट- निमार करे बर लग जावय.

    पहला अंक के छपई लगभग पूरा होए ले धर लिए रिहिसे, तब एकर विमोचन खातिर चर्चा होए लागिस. विमोचन कार्यक्रम म मैं कोनो नेता- फेता बलाए के पक्ष म नइ रेहेंव. आदरणीय हरि ठाकुर जी घलो कहिन- सिरतोन आय बाबू, अइसन पवित्र काम के शुरुआत कोनो पवित्र हाथ ले होना चाही. वो बखत मोर सबले बड़े सलाहकार आदरणीय टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी रहिन, वोमन सुझाव देइन के छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच  'चंदैनी गोंदा' के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ल बलाए जाए. मोला उंकर बात जंचगे.

   मैं तो चाहते रेहेंव के जे मन के छत्तीसगढ़ी भाखा संस्कृति के बढ़वार म योगदान हे, उही मनला पहुना के रूप म बलाए जाय. रामचंद्र देशमुख जी के संग सोनहा बिहान के सर्जक दाऊ महासिंग चंद्राकर जी ल घलो बलाए के बात तय होगे.

    छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच के दूनों पुरखा मन ले अनुमति ले खातिर उंकर घर जाए के कारज ल मैं टिकरिहा जी संग पूरा करेंव. इतवार के दिन दूनों झन रायपुर ले रेल म चढ़के दुर्ग पहुंचेन. उहाँ ले पहिली बघेरा जाए के गुनेन, लहुटती म दुर्ग तो फेर आना हे, त महासिंग दाऊ इहाँ हमा लेबो केहेन.

    बघेरा के पहुंचत ले बेरा बने चढ़गे रहय. टिकरिहा जी दूनों हमन देशमुख जी के घर पहुंचेन. वतका बेरा वोमन अकेल्ला कुर्सी म बइठे राहंय. उंकर आगू के टेबल म डाॅक्टर मन के कान म अरझा के मरीज के देंह ल टमड़े के जिनिस माढ़े राहय. तब तक मैं नइ जानत रेहेंव के वोमन लकवा के मरीज मन के इलाज घलो करथें कहिके. 

  उन टिकरिहा जी ल देखते तुरते कुर्सी ले खड़ा होके अगवानी करीन अउ तीर म माढ़े कुर्सी म बइठे बर कहिन. महू ल बइठे के इशारा करीन. वोकर बाद टिकरिहा जी उंकर जगा मोर परिचय बताइन, संग म छत्तीसगढ़ी म मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' निकाले के बात घलो बताइन. देशमुख जी बड़ा खुश होइन. टिकरिहा जी उनला विमोचन कार्यक्रम खातिर पहुना के रूप म पहुंचे खातिर पूछिन, त उन तुरते तैयार होगें. तहांले उंहचे दिन बादर घलो धरा डारेन के 9 दिसंबर 1987 दिन इतवार के संझा 5 बजे तात्यापारा रायपुर के कुर्मी बोर्डिंग म विमोचन कार्यक्रम ल राखबो कहिके. 

    दाऊ जी फेर पूछिन के अउ कोन कोन अतिथि रइहीं कहिके, त हमन बताएन के महासिंग चंद्राकर जी ल घलो बलाए खातिर सोचे हावन, अभी इहाँ ले लहुटती म उंकर जगा अनुमति ले खातिर जाबो, त उन कहिन के ठीक हे, अच्छा बात हे, फेर मैं चाहथंव के दैनिक नवभारत के संपादक कुमार साहू जी ल घलो बला लेहू, मोर नॉव बताहू त उन तुरते तैयार हो जाहीं. हमन हव कहिके वापस दुर्ग लहुटेन. तहाँ दाऊ महासिंग चंद्राकर जी के इहाँ गेन. उहू मन कार्यक्रम म आए खातिर अनुमति दे देइन.

    रायपुर आए के बाद नेवता पाती छापे अउ वोला चारों मुड़ा बगराये के बुता म भीड़गेन. 9 दिसंबर के बिहनिया ले जतका हमर संगी साथी राहंय सबो झनला अलग अलग बुता खातिर जिम्मेदारी सौंप देन. फलाना फलाना काम फलाना ल करना हे, अउ वोकर बाद संझा 4 बजे तक जम्मो झनला कुर्मी बोर्डिंग पहुंच जाना हे.

     वाजिब म संझा 4 बजे तक हमर जम्मो संगी कुर्मी बोर्डिंग पहुंचगे रिहिन हें, तहां ले उहाँ के ऊपर वाले सभा कक्ष म विमोचन के तैयारी होए लागिस. रायपुर के जतका छत्तीसगढ़िया साहित्यकार, भाखा प्रेमी अउ मयारुक लोगन रहिन सब उहाँ पहुंचगे राहंय. पहुना मन म सबले पहिली दाऊ महासिंग चंद्राकर जी लाल रामकुमार सिंह संग पहुंचीन, तेकर पाछू कुमार साहू जी पधारिन. दाऊ रामचंद्र देशमुख जी घलो थोरकेच बेर म पहुंच गिन.

   उंकर मन के आवत ले हमर मन के सबो तैयारी होगे राहय. उंकर पहुंचते डाॅ. सुखदेव राम साहू 'सरस' जी कार्यक्रम के संचालन म लगगें. माता सरस्वती के छापा म फूल माला अउ हूम धूप के पाछू सबो पहुना मन के फूल माला ले स्वागत होइस. 'मयारु माटी' के मुंह उघरउनी (विमोचन) होइस, तेकर पाछू पहुना मन के आशीर्वचन होइस. तहांले उहाँ पहुंचे जम्मो झनला मयारु माटी के प्रति बांटे गिस.

   पहला अंक ल देखे के बाद लोगन के भारी दुलार मिले लागिस. अपन अपन ले सब रचनात्मक सहयोग करे लागिन. जे मन गद्य रचना म अच्छा सहयोग करीन उंकर मन के नांव मैं ए जगा जरूर लेना चाहहूं- श्यामलाल चतुर्वेदी, हरि ठाकुर, डॉ. बलदेव साव, लक्ष्मण मस्तुरिया, रामेश्वर वैष्णव, चेतन आर्य, राजेश्वर खरे, हेमनाथ वर्मा 'विकल', तीरथराम गढ़ेवाल, मुकुंद कौशल, डॉ. महेंद्र कश्यप 'राही', डॉ. व्यास नारायण दुबे, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्रा, डॉ. निरूपमा शर्मा आदि मन के सरलग सहयोग मिलय. इंकर मन के छोड़े डॉ. विमल पाठक, नारायण लाल परमार, लाला जगदलपुरी, जीवन यदु 'राही' के संगे संग अबड़ झन जुन्ना अउ नवा लिखइया मन एमा अलग अलग स्तंभ के अन्तर्गत छपत राहंय.

     'मयारु माटी' के सरलग प्रकाशन म तब आर्थिक समस्या घलो आये लागिस, जइसे के जम्मो साहित्यिक पत्रिका मन के आगू म आथे. एमा जादा फोरियाए के जरूरत नइए, काबर ते प्रकाशन के कारज ले जुड़े जम्मो मनखे एकर पीरा ल जानथें. 

  पंजीकृत पत्रिका के प्रकाशन म ए नियम हे, के छै महीना लगातार प्रकाशन के बाद सरकारी सहायता विज्ञापन के रूप म मिले लगथे. आज अलग छत्तीसगढ़ राज बने के बाद ए ह बहुत आसान होगे हे वोकरे सेती इहाँ कतकों छोटे बड़े पत्र पत्रिका आज देखे बर मिल जाथे. फेर वो बखत हमन संयुक्त मध्यप्रदेश के अन्तर्गत राहत रेहेन, तेकर सेती जम्मो जिनिस खातिर भोपाली मन के मुंह ताकना परय. वोमन तो छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के नाॅव सुनते बिदके बर धर लेवंय, अंगरा कस गंजा जावंय. अइसे म भला सरकारी सहयोग कइसे मिले पातीस, सोचे के लाइक बात आय.एक दू छत्तीसगढ़िया नेता मन भोपाल ले सहयोग करवा देबो काहंय, फेर नेता मन के बात ह बाते बन के रहि जाय. अइसे तइसे करत कुल 13 अंक करीब डेढ़ बछर अकन म निकाल पाएन तहांले आगू नइ सक पाएन.

-सुशील वर्मा 'भोले'

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


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9 दिसंबर : वो ऐतिहासिक बेरा के सुरता... 

    छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास म 9 दिसंबर 1987 के दिन ल सबर दिन सुरता राखे जाही, जे दिन छत्तीसगढ़ी भाखा के ऐतिहासिक मासिक पत्रिका 'मयारु  माटी' के विमोचन रायपुर के आजाद चौक तीर तात्यापारा के कुर्मी बोर्डिंग के सभा भवन म जम्मो छत्तीसगढ़ी के मयारुक मन के उपस्थिति म संपन्न होए रिहिसे.


    ए विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच 'चंदैनी गोंदा' के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी रहिन हें. अध्यक्षता दैनिक नवभारत के संपादक कुमार साहू जी करे रिहिन हें. संग म 'सोनहा बिहान' के सर्जक दाऊ महासिंह चंद्राकर जी विशेष अतिथि के रूप म पधारे रिहिन हें. ए बेरा म छत्तीसगढ़ी भाखा साहित्य के जम्मो मयारुक मन उहाँ बनेच जुरियाए रिहिन.


चित्र 1- 'मयारु माटी' के विमोचन के बेरा. डेरी डहर ले- सुशील वर्मा (भोले), पंचराम सोनी, टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा, विमोचन करत दाऊ रामचंद्र देशमुख जी अउ नवभारत के संपादक रहे कुमार साहू जी.


चित्र 2- डेरी डहर ले- कुमार साहू जी के स्वागत होवत, स्वागत करत 'मयारु माटी' के संपादक सुशील वर्मा 'भोले', अउ बीच म कुर्सी म बइठे दिखत हें- सोनहा बिहान के सर्जक दाऊ महासिंह चंद्राकर जी.


चित्र 3- विमोचन के बेरा म उपस्थित छत्तीसगढ़ी के मयारुक मन म. डेरी डहर ले-  जागेश्वर प्रसाद जी, डॉ. देवेश दत्त मिश्र जी, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र जी, डॉ. शालिक राम अग्रवाल 'शलभ' जी, डॉ. व्यास नारायण दुबे जी, जगदीश बन गोस्वामी जी

उंकर पाछू म डॉ. भारत भूषण बघेल जी, डॉ. राजेन्द्र सोनी जी रामचंद्र वर्मा जी संग डॉ. सुखदेव राम साहू 'सरस' अउ जम्मो छत्तीसगढ़ी के मयारुक मन.


Thursday, 30 November 2023

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य - गुरुजी के गुरुरनामा

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य -

गुरुजी के गुरुरनामा

बरसो बाद कालि फेर उदुपहा ‘‘नमो भूखमर्रा गुरूजी’’ के आगू म हपटके अभर गेवँ। 

पढ़त रहेन तेन समे सब्बो लइका वो गुरूजी संग कोनो मेरन झन संघरन कहिके बिनती बिनोवय। वो कहूँ बजार-हाट, रद्दा-बाट म दिख जावय त दुरिहे ले सब कन्नी काटके छू-लम्मा हो जावय। 

‘बाँचेवँ रे भाई !!’

कोनो जगा अचानक-भयानक संघर जावय त वो गुरूजी अपन सब काम -बूता ल भूला-छोड़ देवय। एकदम टकटकी लगाय हमरे कोति ल देखत राहय। उत्ता-धुर्रा सरपट रेंगत रहय तेनो हँ मरहा-खुरहा-पंगुरहा मन बरोबर एकदम धीरे-धीरे रेंगे-घिसले लगय। हमन ओला देख परन त मुड़ी ल नवाए कनेखी देखत ओकर नजर ले बाँचे के प्रयास म बिलई कस सपटे-लुकाए-तीरियाए असन रहन।

कहूँ हमन गुरूजी ल नइ देखे राहन त वोहँ हमन ल देखय-जानय अउ नमस्ते करय कहिके अपने अपन खाँसय-खखारय। अचानक नजर मिल जावय, देख परन, त वोहँ बिलकुल विकेटकीपर बरोबर तियार देखत राहय कि कब हम नमस्ते के बॉल फेंकन अउ वो ‘गपाक-के’ लपक-छपकके चपक लेवय। जब ओकर खखाय-भूखाय चेहरा, लार बोहावत लपलपावत बाहिर निकले जीभ अउ उसवाय आँखी ल नमस्ते बर अलकरहा अकबकाए-कलबलाए देखन त हमीमन ल नकमर्जी लगे लगय। नइ चाहते हुए घलो जबरन ’नमस्ते गुरूजी’ कहे बर लग जावय। हम पूरा-पूरा नमस्ते नइ कहे पाए राहन, वोहँ बिना कुछु देरी करे ‘तपाक-ले’ ताते-तात जुवाब दे देवय-

नमस्ते ! नमस्ते !!

गुरू आखिर गुरू होथे। वोहँ हमर चेहरा ल देखके पढ़-जान-समझ लेवय कि अब येहँ नमस्ते करइया हे। तेकर पाए के हमर आधे अधूरा नमस्ते निकले राहय अउ वोहँ मुड़ी ल हलाके जोरदरहा काँखत किकिया-चिचियाके नमस्ते कहि डारय। एके घँव तको नहीं, दू-तीन घँव कहि डारय- नमस्ते ! नमस्ते !! नमस्ते !!!

ओकर ले लगे हाथ फोकटइहा ये विज्ञापन हो जावय कि तीर-तखार के मनखे देख-सुनके जान-समझ जावय कि येहँ गुरूजी हरे। अउ इहाँ गुरू-चेला के राम-भरत-मिलाप होवत हे।

हरू खर्चा म गरू विग्यापन हो जावय। येला कहिथे असल अक्कल, चुस्त-दुरूस्त व्यवस्था अउ पोठ प्रबंध।

हमर ले नमस्ते झोंक-लपकके अपन झोला ल भर लेवय, तेकर पीछू उही नमस्ते ल चाँटत-चिचोरत-चबुलावत वोहँ अपन काम-बूता कोति ध्यान देवय।

बिहान भर ओ घटना हँ जम्मो छात्र मित्र मण्डली म दिनभरहा मनोरंजन के साधन बने कुण्डली मारे बइठे राहय।

उही ल खाके खखाय गुरूजी हँ दिनभर अपन गम भुलाए गुमसुम गमगमाए राहय।

गुरूजी ल देखते ही दुरिहा ले मैं दूनो हाथ ल जोर लेवँ-‘नमस्ते गुरूजी !’

वो मनढेरहा किहिस- नमस्ते ! (जानो मानो काहत हे कि राहन दे, अब मोला तुँहर झोला-छाप, झिटी-झाँझर, रिंगी-चिंगी नमस्ते के जरूरत नइहे) बड़ अचम्भा लगिस। अचम्भा के खम्भा ल खखौरी म चपके-दाबे मैं होंठ म मुस्कान ल हुदेनत लान के कहेंव -‘अबड़ दिन बाद आपके दर्शन होइस गुरूजी, बड़ खुशी होवत हे।’

गुरूजी मुसकियावत असमान ल देखे लगिस। ( मानो काहत हे -तोर ले जादा तो मोला खुशी होवत हे।)

‘मोर अहो भाग्य !’ (मन के बजबजावत नाली ले बुलबुला फूटिस, सोचेंव -‘अब तो सोचते होबे गुरूजी कि मोला नमस्ते कहइया मिलगे रे कहिके ?’)

होथे .....होथे। (गुरूजी सोचिस - ‘उहूँ ..... मोला ‘‘सच्चा गुरूजी पुरूस्कार’’ मिले हे तेला तोला बताना हे कहिके।)

गुरूजी के गुरूता, उदारता अउ महानता देखव कि वोहँ अपन चुचरू चेला के चेहरा देखके मन के बात ल टमर डारिस। ओइसने योग्य चेला तको मिले हे। दूनो के बीच तन अउ मन दूनो ले दुमुँहा गोठ-बात होय लगिस।

मैं कहइयच रहेंव- ‘आपमन ल ‘‘सच्चा गुरू.......’’ मोर मुँह के भाखा ल फटाकले झपट लिस अउ आँखी ल लिबलिबावत गुरूजी शुरूजी हो गइस -‘इही साल मैं ‘‘सच्चा गुरूजी पुरूस्कार’’ से सम्मानित होए हौं।’

‘गाड़ा गाड़ा बधाई हो गुरूजी।’

वो बिलई कस आँखी मूँदे टेटका कस मुड़ी ल हला-डोलाके स्वीकार करिस। ( स्वीकार का करिस जानो मानो कोनो कपड़ा के धुर्रा झटकारथे, तइसे झर्रा दिस-हूँ .........का झोलाछाप तैं अउ का तोर झोल्टू बधाई।)

‘आपमन ये पुरूस्कार ल पाके कइसे अनुभव करत हौ ? ........ ’ गुरूजी दूनो हाथ ल उठा भर दिस, भीतरे -भीतर गदगदई के मारे गदफद कुछू नइ बोल सकिस। मैं जानत रेहेंव कि एकर ले तिरछन, बंचक-पंचक, नवटप्पा अउ तीन-पाँच करइया कोनो हे, न तीन काल म कोनो होवय। तभो कहेंव - ‘सब आपके मेहनत, ईमानदारी अउ लगन के फल ये गुरूजी।’

‘बहुत चिला लहुटाए बर परथे बेटा !’ अतके काहत गुरूजी मोर हाथ ल धरके तीरत अपन घर कोति लेगे।

‘चल न .. एमेर खड़े-खड़े का बताहूँ, घर म बने बइठ के फुरसुतहा गोठियाबो।’

मैं अपन चरणकमल ले चरणदास ल नइ निकाले पाएँव वोहँ लकर-धकर जाके भीतर ले अपन पोथी -पुरान ल ले लानिस। मोला एकक करके देखाए लगिस -‘देख, तुँहर समाजिक बइठका के प्रमाणपत्र। अउ ये ओकर फोटू।’

‘अरे ! ये बइठका कब, कहाँ होइस गुरूजी, हमला काँही पतच् नइ चलिस।’

‘उहीच तो .....खोजे बर परथे गा, मोती बइठे-बइठे अइसने भूइयाँ म परे नइ मिलय -‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’। गुरूजी मंद-मंद मुसकाए लगिस -‘कोनो जात के समाजिक बैठक होवय, मैं जरूर उपस्थित राहँव। ओ जात के विशेषता के बखान करौं। दू चार झिन ओ जात के मनखे मन ल महापुरूष बता देववँ। प्रमाणपत्र मिलनच् हे।’

‘अच्छा ! आपमन तो अक्सर इहाँ-उहाँ ये कार्यक्रम कभू ओ कार्यक्रम म घूमते राहव।’

‘त .... मैं कोनो दिन बारा बजे के पहिली स्कूल नइ गेवँ, न दू बजे के बाद कभू स्कूल म रहेवँ। तभो ये शत-प्रतिशत मोर हाजरी के प्रमाण देख ! अब सोच, ये कमाल होइस कइसे ?’ गुरूजी अँखिया-अँखियाके बताए लगिस -‘बीमार खटिया म परे रहँव तभो मोर गैरहाजरी नइ चढ़ै। दूसर गुरूजी अनुपस्थित हे अउ छुट्टी के आवेदन घलो नइ हे। अउ कहूँ कोनो साहेब-सुधा जाँच बर पहुँच गे त वो जाँच के आँच ले उन्कर म लाल स्याही के टीका लग जही। हमार न नइ लगय।’

गुरूजी ये। चुप रहिबे त एकर समझ म नइ आवत हे कहिके उल्टा गोला दाग देथे। ओकर ले अच्छा मैं कुछ पूछना ही उचित समझेवँ। मैं हल्लु-कन ओकर दिमाक के तरिया म अपन दिमाक के भैंस ल ढील देवँ - ‘अइसे काबर गुरूजी ?’

गुरूजी जोशियागे - ‘काबर कि हम पहिलीच ले टीकावन टीक डारे रहिथन। अइसन म कतको बड़े साहेब-सुधा होवय हमर सेर-सीधा के सुविधा के आगू म बोक्को-बोकरा होइ जथे। ये सब प्रबंध-व्यवस्था देखे-बनाए बर परथे, जाने।’

ओतके म एक झिन लबरा नेता ‘मीठलबरा सिंग छेरीचरे’ के गोड़ म घोण्डइया मारत गुरूजी के फोटू ल देख परेवँ। जेला जनम भर गुरूजी पानी पी-पीके गारी देवय। 

‘एहँ तो आपमन ले कतकोन के छोटे हरे का गुरूजी ?’

‘का होही त ! पाँव परे म माथा नइ खियावय। जेमा फर लगथे उही पेड़ नवथे। एहू जानत होबे माथ नवाए ले कोनो छोटे नइ हो जाय बेटा । मोला प्रमाणपत्र से मतलब। उही चढ़ौतरी के पलौंदी ले तो ड्यूटी के दौरान प्रमाणपत्र के फर म बढ़ौतरी करना रिहिस हे बस।’

गुरूजी ओतके म कुर्सी ले झुकके मोर कान तीर अपन बस्सावत मुँह ल टेकाके धीरे से कहिस -‘तैं तो अतके ल देखे हस। मैं तो एकर कस कतको जीछुट्टा, चोरहा, लबरा अउ लंपट नेता मन के मंच म चढ़के उन्कर चरण पखारे हौं। चारण घलो गाए हौं। एहँ अइसनेहे सब करम के परिणाम हरे बेटा ! जउन आज मैं सम्मानित होए हौं। स्वाभाविक हे, मान देबे त सम्मान पाबे। लगाए बर बम्हरी, फरे बर आमा कहिबे त कइसे होही बता ? पाँव परत म पद मिलय, त कोन फोकट के करम छीलय।’

गुरूजी आगू बोमियाते रिहिस -‘जनगणना ड्यूटी मैं कभू नइ करेवँ। बेरोजगार टूरा मन ले ठेका म करवाके ’सर्वश्रेष्ठ जनगणना करमचारी’ के प्रमाणपत्र पा लेवँ। सरकार ल जनगणना से मतलब, बेरोजगार ल पइसा से अउ हमला प्रमाणपत्र से जी ! पोलियो ड्राप मैं नइ पिलाएँव तभो सर्वश्रेष्ठ पोलियो करमचारी हौं। हाथ कंगन को आरसी क्या ? प्रमाण तोर आगू म हे।’

मैं मनेमन सोंचे लगेंव - ‘अरे ! भयंकर !! गुरूजी तो वाकई म गुरूजी हे भई। विचार भले पोलियो-ग्रस्त हे फेर दिमाक एक नंबर के मौकापरस्त हे।’

गुरूजी सरलग अपन बखान के गरू-गरू, बड़े-बड़े बात ढीलते गइस -

‘कोनो बड़का करमचारी-अधिकारी आवय, सबले पहिली मैं पाँव परवँ। चिन्ह-पहिचान होनच् हे।’

मैं कहेवँ -‘गुरूजी ! एक बात मोर दिमाक म नइ पचत हे।’

गुरूजी तुरत हाजमोला फेंकिस - ‘पूछ ! पूछ !! आज तोला सब ज्ञान से परिपूर्ण कर देथौं बेटा।’

‘सरकारी योजना, जइसे कि पोलियो ड्यूटी, जनगणना या चुनाव हँ सरकार के जिम्मा होथे त हाजरी चढ़गे। फेर कोनो समाजिक सम्मेलन के बेरा म आप उहों उपस्थित हौ अउ रजिस्टर के हिसाब से स्कूल म घलो उपस्थित हौ, ये कइसे होइस ?’

‘उही ....सब व्यवस्था। जइसे पैसा हाथ के मैल, तइसे सब व्यवस्था के खेल।’

गुरूजी हिन्दी साहित्य के बने जानकार रिहिस। अपन झोली ले निकालके एक ठन जोरदरहा लाइन फेंकिस - ‘सेवा ले मेवा बढ़य, त कोन बलि कस बोकरा चढ़य।’

मैं वाह ! वाह !! काहत गुरूजी के चाहत ल गोड़ ले तरूवा म चढ़ाए लगेवँ -‘ओकर फायदा गुरूजी ?’

गुरूजी के थोथना म गुरूता-गरूर के प्रमाण पत्र ‘लकलक-ले’ चमके लगिस।

‘उही सब प्रमाणपत्र ल नत्थी करे बर परथे ‘‘सच्चा गुरूजी पुरूस्कार’’ के फारम संग।’

‘जब आप अपन करम म बने हौ, त ये सब प्रमाणपत्र अउ दुनियादारी के का मतलब गुरूजी ?’

मोर सवाल के लबेदा परे ले गुरूजी के मंघार झन्नागे। दिमाक चार भाँवर घूमगे। वो अपन सात भँवरी संगिनी ल तुरत चिचियाइस - ‘पानी लान तो वो एक गिलास।’

गुरूजी सोचे लगिस -‘पूरा गोबर गणेश हे टूरा हँ। रात भर रामायण पढ़े, बिहिनिया पूछे, राम-सीता कोन ? त बताथे, भाई -बहिनी। पानी के लानत ले गुरूजी आँखी ल मूँदके माथा म अँगरी फेरत मने मन मोला गारी देये लगिस - ‘अतका चिचिया-चिचियाके सिखाएवँ-पढ़़ाएवँ फेर तैं बोदा के बोदा रहे रे। अरे अक्कल के दुश्मन ! सौ बक्का एक लिक्खा। कोन-कोन ल बतावत फिरतेवँ कि मैं टाइम म स्कूल आथौं-जाथां। हरेक सरकारी योजना ल बिना नागा करे जी परान देके सबले पहिली मैं पूरा करथौं। मैं सदा समे के पाबंद रथौं। ये सब प्रमाणपत्र के बिना मोला ‘‘सच्चा गुरूजी पुरूस्कार’’ कइसे मिलतिस।

मोर प्रश्न के बाद मोर प्रति गुरूजी के मन म तिरस्कार भाव आगे। संगे-संग ओकर कुचराए-कोचराए दिमाक म चारी चरित्र के घलो सूत्रपात होगे। घेरघेरहा टोटा ले धीरे से कहिस - ‘वो करमचंद सतरंगा हे न ?’

मैं पूछ परेवँ  -‘बीईओ साहब गुरूजी ?’

‘हाँ ...हाँ उही। वो नालायक ल साहब झन कहे करौ मोर आगू म, मोर मइन्ता भोगा जथे ओकर नाम सुनके। जनम के जाँगर चोट्टा आय वोहँ। जस नाम तस काम। इही करम करके वो सकलकर्मी, पहिली संकुल अधिकारी बनिस। छुट्टी के आवेदन पत्र लिखे बर नइ आवत रिहिसे। छुट्टी ल छट्ठी लिखय। हप्ता म चार दिन स्कूल आजय त अब्बड़ होजय। कोनो दिन मुड़ पिरावथे, कोनो दिन बाई के कनिहा धर लेहे, त कोनो दिन लइका ल दस्त होवथे कहि-कहिके नागा करय अउ घर म मस्त राहय। .......आज वो....... हमला सिखोथे ......अयँ।’

अचानक पता नहीं गुरूजी ल का सूझिस। पोंगा बंद होगे। चारी के बाना ल उतारके गंभीरता के चद्दर ओढ़ लिस। फेर धीरे से कहिथे-‘अइसे......मैं अब संकुल समन्वयक होगे हौं। जिला ले आर्डर निकल गेहे। बस एक दू दिन म मोर हाथ म अइच् जथे। अब मोर बर गुरूजी गरू होय लगे रिहिस अउ मैं गुरूजी बर हरू। मैं लकर-धकर संकुल समन्वयक के बधाई थमावत उठते रहेवँ, ओइसने म गुरूजी कहिथे - ‘चल, ठीक हे। अच्छा लगिस। मिलत रहिबे।........चाय तो नइ पीयत होबे ?’

‘नहीं.......नहीं गुरूजी।’

गुरूजी दाँत ल खिसोरिस - ‘ओकरे सेति तोर बर नइ बनवाएवँ हें हें हें .........!

महूँ दाँत ल निपोरत हें हें हें करत रेंगते बनेवँ।


धर्मेन्द्र निर्मल 

9406096346

कहानी: पिंजरा के चिरई

 कहानी: पिंजरा के चिरई


                                  चन्द्रहास साहू

                                मो 8120578897       

"तपत कुरु रे मिठ्ठू ''

पिंजरा मा धंधाये मिट्ठू ला आरो करत किहिस मोटियारी गंगा हा। मिट्ठू फर-फर उड़ावत हाबे।

"टेऊँ-टेऊँ टे... टे तपत कुरु !''

मिठ्ठू घला मया के गोठ सुनके कभु चोंच ला पाँख मा टोंचथे तब कभु पिंजरा भर पाँख ला फरिहा के उड़ियाये के उदिम करथे। का होइस चिरई  तो आय फेर जम्मो ला सीख डारथे,रट डारथे। मन मगन हो जाथे मया के बानी सुनके वोकरो। 

कटोरी भर भात लानके मड़ाइस गंगा हा।

"ले खा ले मिट्ठू !''

फेर मिट्ठू ला तो उसमान छूटे हाबे। हिरक के नइ देखिस। एक चोंच मारिस अउ गोड़ मा उण्डाये के उदिम करत हे कटोरी ला।

"चिकनू महराज ! थोरिक दम धर जादा रिसा झन, नही ते जौन मिलत हाबे तौन घला नइ मिलही....।''

गंगा हा मिट्ठू संग गोठियावत हाबे। कभु बरजथे तब कभु दुलारथे घला मिट्ठू ला। भलुक गंगा के अंतस के गोठ ला कोनो नइ जाने-समझे फेर गंगा ही तो आय जम्मो परिवार के अंतस के गोठ ला जानथे। मिट्ठू के अंतस के गोठ ला घला जान डारिस। बड़का  मिर्चा लानिस लाल-लाल,अब्बड़ चूरपुर अउ साग ला डारिस भात मा तब खाये लागिस मिट्ठू हा। चिकनू महराज !

भलुक जम्मो ला सीख डारथे मनखे बरोबर मिट्ठू हा फेर बिसवास टोरे बर नइ सीखें हाबे। कोन जन गंगा के मया-दुलार आय कि मिट्ठू हा उड़ियाये ला बिसरा दे हे, भगवान जाने। पिंजरा के फईरका भलुक उघरा हो जाथे तभो ले उड़ियाके अगास के गहिरी ला नइ नाप सके। भलुक परछी भर ला किंजर लिही अउ सबरदिन बरोबर फेर लहुट के धन्धा जाथे पिंजरा मा  गंगा बरोबर। हाय रे मोर बोरे बरा घूम फिरके मोरे करा। सिरतोन तो आय गंगा घला पिंजरा के चिरई बन गे हावय। माइके के उतबिरिस झक्की टूरी अउ ससुरार के- जिम्मेदार बहुरिया। ये जिम्मेदार आखर.... ? कोनो आखर नोहे भलुक बेड़ी आय गोड़ के। पिंजरा आवय जब तक जीयत रही तब तक धन्धा जाही माईलोगिन हा। न कभु कोनो आस ला सपूरन कर सकस,न अगास ला अमर सकस। रंधनी कुरिया के पुरती होगे पढ़े लिखे गंगा हा। इंजीनियरिंग मेकैनिकल ब्रांच के टॉपर गंगा भलुक एक दू बेर बुता खोजिस अपन लइक फेर गोसाइया के गोठ।

"अभिन तो नवा-नवा बिहाव होये हाबे अभिन इंजॉय कर लेथन ताहन सरी उम्मर बाचे हाबे नौकरी करे बर।'' 

अइसना तो केहे रिहिन गोसाइया राहुल हा। एक बेर अउ डेरउठी ले निकले के उदिम करिस तब फेर बेड़ी लगा दिस। 

"अभिन तो लइका मन नान-नान हाबे। छोटकी नोनी हा तो दूध पीयत हाबे कइसे जीही बपरी हा। तोर आवत-जावत ले लाँघन नइ हो जाही ?''

ये यक्ष प्रश्न के का जवाब दिही महतारी गंगा हा। कलेचुप कुरिया मा लहुट गे। अछरा के कोर के भिंजत ले रोइस फेर कोनो चुप नइ कराइस। जिम्मेदार बहुरिया आवय ना, अपन आँसू पोछे के जिम्मेदारी घला उठाये ला परथे। तभो ले, एक बेर अउ सामरथ करके नौकरी करे बर अपन कागज-पाती ला धरके गिस। 

"तोर असन माइलोगिन ला का जरूरत हाबे इहाँ नौकरी करे के ? तोर गोसइया राहुल हा सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज मा नामी प्रोफेसर हाबे। पइसा के का कमती तुंहर घर। जादा पइसा कमाके का करहु ? राहुल के कमई नइ पुरत हे का ?''

एक झन संस्था के मुखिया आवय। अइसन मइलाहा बिचार वाला संग बुता करके गंगा मइलाहा नइ हो जाही...? गंगा फेर लहुट गे अपन कुरिया।

           गंगा अपन दाई-ददा के एके बेटी आय-एकलौती। फुरफन्दी बरोबर किंजरे। जम्मो कोई बर मयारुक- गंगा,लाडो,भूरी,पांखी,पीहू, मिट्ठू जतका मुँहू वोतका नाव। एक झन टूरी गाँव भर नाव धरइया। बेटी तो बांस आय। झटकुन बाढ़ जाथे। अभिन-अभिन तो आठवी पास होइस, अभिन दसवीं अउ अभिन बारवी।....अउ बारवी पास होइस ताहन ददा के संसो बाढ़गे। अब कइसे पढ़ाव बेटी तोला ! बड़का कॉलेज फीस शहर के खरचा ? 

"मोला पढ़ा दे बाबू ! महुँ कुछु करना चाहत हँव बाबू ! कुछु बनना चाहत हँव। महुँ अगास मा उड़ियाहू, ददा मोला पाँख दे दे। शहर पठो दे। इंजीनियरिंग कॉलेज में भरती कर दे बाबू !''

गंगा रोये लागिस। 

"बीस हजार रुपिया लागही बेटी ! कहाँ ले अतका पइसा लानहु ? दुनिया मे सबले बड़का पाप आय बेटी-गरीब होना। ...अउ जन्मजात गरीब होना ? महापाप आवय-महापाप। काला बेंचो-भांजों ? न तोर दाई करा गहना-जेवर हाबे न ददा करा जमीन जैजात। नइ पढ़ा सकंव बेटी  ! अब अतकी मा मान जा। अब गोदी-माटी खनके जिनगी के पाठ ला पढ़।''

ददा हरा गे अब। सुन्ना अगास ला देखत किहिस। जनम आइस तब अब्बड़ सपना देखे रिहिन गंगा ला अब्बड़ पढ़ाबो-लिखाबो अइसे फेर .....?

"संसो झन कर लइका ला पढ़ाबो। मन ले झन हार। रद्दा देखाही भोलेनाथ हा।''

कुछु गुनत किहिस गंगा के दाई हा। रोवत गंगा के चेहरा मा उछाह तौरे लागिस अब। दाई आवय-पंदोली देवइया दाई। भोलेनाथ के नाव मा कोनो मंतर मारही। .... अउ सिरतोन दाई के मुँहू ले निकले गोठ संजीवनी बूटी होगे गंगा बर।

" हे भोलेनाथ ! तोर वाहन ला अब लेग जा। मोर लइका के पढ़े लिखे बर पइसा के बेवस्था कर दे। गाँव के लुबरु कोचिया ला बला अउ  लखिया-धौरा बइला मन ला बेंच दे, गाड़ा सुद्धा। गाड़ा हा सरत हाबे अउ बइला मन बुढ़ात हाबे। टेक्टर के आय ले कोनो नइ पूछे कमाये-धमाये बर अब।'' 

दाई भलुक टाय-टाय कहि दिस ददा ला फेर अंतस अब्बड़ रोवत हाबे। कमइया बेटा तो आय लखिया-धौरा बइला मन। ....फेर बेटा हो बहिनी के जिनगी बनाये बर बेचत हँव तुमन ला, मोला माफी दे देबे दाऊ !''

दाई अब्बड़ कलप-कलप के रोवत हाबे बइला मन ला पोटार के। ...अउ बइला मन ? वोकरो आँखी ले आँसू बोहावत हे। चांटत हाबे दाई के हाथ ला। करेजा फाट गे दाई के जब लुबरु कोचिया हा पइसा देके अपन घर लेगिस बइला गाड़ा मन ला तब। जावत बइला हा गोबर देके आसीस दिस गंगा के उज्जर भविस बर। तुलसी चौरा मा मान पावत हाबे कमइया बेटा के इही गोबर हा अब।

"बेटी अपन रद्दा मा आबे, अपन रद्दा मा जाबे ओ ! टूरी हा बांस आय बेटी ! अब्बड़ झटकुन आगी धर लेथे....... सावचेती रहिबे।''

"कतको आगी-बुगी लग जाये बेटी ! उहाँ विद्या हा बचाही। कलम के सामरथ हा तलवार के सामरथ ले जादा होथे बेटी। तलवार के दम मा खुर्सी नइ पावस भलुक कलम के बल मा बड़का इंजीनियर के खुर्सी ला पा लेबे। ... अउ बड़का खुर्सी वाली बन, इही तो हमरो सपना हाबे बेटी ! अब्बड़ पइसा अउ नाव कमा अउ हमर गरीबी ला टार दे।''

दाई-ददा दुनो कोई समझाये लागिस। अरपा-पैरी के धार बोहावत हे दुनो कोई के आँखी ले अब। रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज मा भर्ती कर दिस। मेकैनिकल ट्रेड। अउ उहाँ  के हॉस्टल मा राहय गंगा हा।

                   गोबर चिखला मा सनाये गाँव जोरातरई के बेटी अब राजधानी मा पढ़त हाबे। पहिली बच्छर, दूसरा बच्छर ....अउ अब फाइनल ईयर। जम्मो क्लास मा फर्स्ट डिवीज़न मा पास होइस गंगा हा।


"तेहां तो टॉपर अस बहिनी ! हमन ला झन बिसराबे बड़का अधिकारी बनबे तब।'' 

आवत जावत रहिबे रे गंगा हॉस्टल मा, कॉलेज मा।''

आज आखिरी दिन रिहिस गंगा बर। जम्मो संगी-संगवारी मन सुख-दुख के गोठ गोठियावत हाबे। येहाँ भलुक कॉलेज आय फेर चारो कोती के चाल-चलागन रस्म-रिवाज संस्कार-संस्कृति के मिलाप के ठउर घला आवय। रिकम-रिकम के सुभाव वाली लइका मन संग घला पढ़ीस गंगा हा फेर अपन आदत ला नइ बिगाडिस।

"आज आखिरी रात आय बहिनी ! एक चीज के साध पूरा कर दे मोर।''

"आज तो मोर संगी के रात आवय। हॉस्टल लाइफ कोनो कमती होही तौन ला पूरा करबो। जब छोड़ के जाही तब कोनो जिनिस के कमती झन होवय।''

"आज तो गंगा ला नइ छोड़ो मेंहा। एक बेरा मोर रंग मा जरूर रंगहू वोला।''

लता नेहा मनीषा मंदाकिनी जम्मो कोई संगी-संगवारी मन केहे लागिस गंगा ला दबोचत। जम्मो कोई अब्बड़ सुघ्घर हाबे फेर मइलाहा घला अब्बड़। बीड़ी सिगरेट के घला सुट्टा मार डारे हाबे अउ चखना संग सोमरस ला घला चीख डारे हाबे मंदाकिनी अउ सुरेखा हा। पढ़त खानी अब्बड़ जोजियावय गंगा ला घला। फेर गंगा भाग जावय। .....आज नइ बांचे गंगा हा।

दाई किरिया,ददा बबा ममा मामी ...अउ अब दोस्ती के किरिया खा डारिस सुरेखा हा।

"गंगा कांच के गिलास मा ढ़राये जिनिस ला पीये ला लागही सिगरेट के सुट्टा तीरे ला लागही...नही ते दोस्ती खतम।''

"डौका घर जाबे तब पछताबे रे टूरी! सरी रिकम ला इहींचे कर ले। पिंजरा के चिरई हो जाबे।''

मंदाकिनी आवय बरपेली सिगरेट ला ठुसत किहिस गंगा ला। जम्मो कोती हा.... हा.... ही...ही... के आरो आवत हे।

गिलास के पीयर रंग ला एक घुंट पीयिस तब सिरतोन गंगा हा जम्मो कोई के वादा पूरा कर दिस ...अउ बेलबेलही टूरी मन शर्त जीत डारिस। गरब करत हे अपन संगी मन उप्पर।

              आज डिग्री झोंक के घर अमरिस तब अब्बड़ मान पाइस गंगा हा। दाई-ददा काबा भर पोटार लिस बेटी ला- इंजीनियर गंगा ला। चित्र मित्र अउ चरित्र के सोर अब्बड़ उड़ाथे। गंगा के चरित्र के सोर उड़ाये लागिस। सुघ्घर सुशील गृहकार्य में दक्ष.......! अउ पढ़े-लिखे इंजीनियर गंगा । इंजीनियरिंग कॉलेज बिलासपुर के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकॉम्युनिकेशन डिपार्टमेंट मा राहुल नाव के टूरा हाबे असिस्टेंट प्रोफेसर। सरपंच चोवाराम के संदेस सुनिस तब गंगा के ददा उछाह मा मुचकाये लागिस। न कोनो राग-पाग न कुंडली मिलान। दू इंजीनियरिंग के डिग्री मा गुन मिलगे-छत्तीस के छत्तीस गुन।भविस के उज्जर सपना देखे लागिस दुनो परिवार हा अब। मुचकावत डोली बइठके राहुल के डेरउठी के बहु लछमी बनगे अब गंगा हा।  सब तो मिलगे अब। मेरिट मा आय डिग्री, लाखो में एक गोसाइया, सुघ्घर घर परिवार अउ बड़का घर दुवार। चिरई बरोबर उड़ावय अपन सपना ला सपूरन होवत देख के गंगा हा। उछाह मा गमकत रहिथे। अब्बड़ ऊंचा अगास मा अब्बड़ ऊंचा उड़ान राहय गंगा के।

"गंगा अभिन सियान दाई ददा के संग रहा गाँव मा। बेरा-बखत देख के लेग जाहू बिलासपुर।''

गोसाइया के गोठ सुनिस तब जइसे भुइयां मा गिरगे धड़ाम ले गंगा हा। कभु नइ गुने रिहिस गंगा हा गाँव मा रहे ला लागही अइसे फेर एकलौता आवय राहुल हा, अब जम्मो जिम्मेदारी ला निभाये ला परही गंगा ला। ससुरार के जिम्मेदारी अब नागपाश बनगे। अरहज गे गंगा हा। अब दू लइका के महतारी बनगे फेर बेटी बनके सास ससुर के सेवा-जतन मा कोनो कमती नइ करिस।


"बेटी गंगा कहाँ हस ओ ! अकरस पानी मा जम्मो छेना-लकड़ी कपड़ा-लत्ता भींज जाही बेटी।''

सियान सास ससुर के गोठ सुनिस गंगा हा अउ सुरता के धारी ले निकलिस। लकर-धकर जम्मो ला सकेले लागिस। उत्ता-धुर्रा जम्मो ला तोपे ढांके लागिस। आषाढ़-सावन के पानी सिरतोन अब्बड़ बिटोना रहिथे। कभु सुरुज नारायेण चरचराथे तब कभु ओइरसा चुहँव पानी। 

लकड़ी छेना ला रंधनी कुरिया मा भीतराइस अउ चूल्हा बारे लागिस फु.....फु.....।

पानी मा मउसार लकड़ी छेना अब्बड़ पदनी-पाद पदोथे। आँखी ले आँसू आ जाथे चूल्हा के सपचावत ले। 

"जा बेटी ! लइका मन ला देख। मेंहा देखत हँव ये आगी ला। ये अगिन महराज हा कइसे नइ बरही देखथो। भलुक गाँव मा हाबे गंगा हा तभो ले सास बरोबर चूल्हा के मरम ला कहाँ जानही ? सास के बारे चूल्हा भरभर-भरभर बरे लागिस अब। .......उरीद दार अउ तुलसी मंजरी चाउर अब डबकत हाबे। पारा भर जान डारिस चाउर के ममहासी ला। उरीद दार घला डबकत हाबे बुडूक-बुडूक डुबक-डुबक। ...अउ खेखसी के साग ?  इही चौमासा मा निकलथे बोड़ा खेखसी केरा गभोती हा। जम्मो जिनिस घर के बखरी मा मिल जाथे। ठाकुर देव मा चार ठन पहिली फर ला टोर के चढ़ाए रिहिस सियान हा अउ बाचल-खोंचल खेखसी ला साग रांधत हाबे। अब बन गे जेवन। घर के डीही डोंगर बर नानकुन परसा पान मा जेवन परोसिस अउ फुलकांच के लोटा मा पानी दिस सास ससुर ला जेवन करे बर।  

"ये दे बाबूजी माँ पानी, चलो जेवन करहुँ।''

सियान-सियानहिन मन जेवन करिस। लइका मन ला खवाइस तब गंगा हा आचमन करके धरती मइयां मा माथ नवाके जेवन करे लागिस। अब्बड़ सुघ्घर साग-गुरतुर। गंगा जेवन करत हे । छेना लकड़ी सपच के बुतागे हाबे। फेर एक ठन गोठ रोज बरोबर अटके लागिस। महुँ हा छेना बरोबर सपच के बुतागेंव का....? अब जम्मो मोर सपना टूटत हाबे। दाई-बाबू जी के घला सपना रिहिन - लइका हा समाज बर कुछु करे अइसे। गाँव के लइका मन ला पढ़ाये, कुछु सिरजन के बुता करे अइसे। फेर का करत हँव मेंहा ? दाई-ददा अब्बड़ पढ़ाइस लिखाइस अउ मेंहा चूल्हा चुकी के पुरती होगेंव। गंगा अब फेर छटपटावत हाबे, गुनत हाबे। दू चार बेरा तो केहे रिहिन गंगा हा गोसाइया ला कुछु नौकरी करहुँ अइसे फेर .....? पिंजरा के चिरई बन गे। जिम्मेदारी के पिंजरा मा धन्धागे। 

                         गोसइया राहुल आज चाउर लेगे बर गाँव आये हाबे। सांझ कन आइस, टीवी मोबाइल मा देश दुनिया के हाल-चाल जानिस। दाई-ददा ला "बने तो हो का ?'' पाँव परत पूछिस अउ बस ....। दाई-ददा करा अब्बड़ समस्या हाबे फेर बेटा करा सुने बर बेरा नइ हाबे। ...बहुरिया सुन लेथे फेर जम्मो हा बहुरिया के बांटा तो नो हे ? दाई-ददा गोठियाये के उदिम करथे फेर बेटा तो अधिकारी आय। आने स्टाफ संग फोन मा डिस्कशन करत हे स्टाफ वाली मेडम के पहिनइ-ओढ़हई के सम्बंध मा। अब आही तब आही ...बेटा नइ ओधिस तीर मा। सोवा परगे तब गोठ उरकिस।  गंगा के टोंटा मा फेर उही गोठ अटकगे हाबे। छटपटावत हे, अकबकावत हे। फेर मन ला शांत करिस अउ पूछिस।

" गाँव तीर के आई टी आई मा पढ़ाये बर जाहू का जी !''

राहुल तो अकचकागे। गंगा अभिन तक नइ माने हाबे। एड़ी के रिस तरवा मा चढ़गे।

"तोला कतका बरजे हावंव तभो ले ...? मोर कमई नइ पुरत हे का ? दाई ददा ला फेंक देंव का मोर ? दाई ददा के जतन-पानी के डर मा भागे बर गुनत हावस। मेंहा अपन नौकरी मा बिलमे रहिथो तब कोन करही मोर दाई-ददा के सेवा। दाई-ददा के सेवा कर घर दुवार के जतन अउ लइका पिचका उपर सुघ्घर संस्कार दे। अतकी के आस राखथे जम्मो गोसइया हा। महुँ हा अतकी के पंदोली दिही कहिके तोर संग बिहाव करे हँव।.....फेर तोला तो मौका चाही हरहिंछा किंजरे बर ?''

राहुल तमकत हाबे। जच्छार होगे। फेर गंगा घला कमती हे का ?

"अतका पढ़ लिख के अप्पड़ बरोबर झन गोठिया जी। तोर दाई-ददा ला अपन सगे मानथो। फेर तेहां बिरान मानथस मोर दाई-ददा ला। कभु गुने हस मोरो कोनो साध होही कहिके  ? कभु गुने हावस मोरो दाई-ददा के सपना का हाबे मोर बर तेन ला ? बेटी पढ़ लिख के समाज के विकास मा पंदोली देबे अइसे कहाय ददा हा। तेहां पुरुष आवस न- पुरूष सत्ता के पक्षधर। नारी पढ़ लिख डारही तौन ला खिल्ली उड़ाथो। कॉलेज मा घला पढ़ाथस नर नारी एक बरोबर फेर घर मा का हो जाथे ? तुमन ला तो डर लागे रहिथे माईलोगिन भाग तो नइ जाही घर छोड़के ? आनी-बानी के भरम रहिथे तेकरे सेती पिंजरा मा धान्ध देथो।'' 

गंगा अब अगियाये लागिस। 

अब तो सियान मन घला पंदोली देये लागिस। 

"बेटा ! मेंहा धन्य हँव गंगा बरोबर बहुरिया पा के। अब्बड़ गुणवती हाबे बेटा येहां। तेहां तो मरही-खुरही दाई-ददा ला खाये हस कि नही तेला नइ पूछ सकस अउ बहुरिया हा हमर जम्मो नखरा ला उठाथे रे ! खटथे रात अउ दिन। तोर भरोसा मा रहितेन ते मर जाये रहितेन आज तक। बहुरिया के सेवा ले चंगा हावन। बिहाव के बेर तो आदर्श टूरा बनत रेहेस। गंगा तोर जौन साध हाबे तौन ला पूरा करहु कहिके किरिया खाये रेहेस। अतका दिन ले तोर बर खप गे बपरी हा। अब अपन साध ला पूरा करन दे। आई टी आई मा पइसा कमाये बर नइ जावत हे गंगा हा भलुक विद्या दान करे ला जावत हाबे। गरब कर अइसन गोसाइन बर।''

राहुल के दाई-ददा आवय। आज मयारू गंगा बर नित के गोठ गोठियावत हाबे दुनो कोई। बिसवास कर बेटा गंगा ऊपर सुघ्घर अउ संस्कारवति हाबे।''

राहुल ठुड़गा रुख बरोबर ठाड़े हाबे। मुँहू ले बक्का नइ फूटत हाबे-बोक-बाय होगे।

सास-ससुर के मया पाके गमके लागिस गंगा हा। बिहनिया तियार होइस। सास-ससुर के पाँव-पैलगी करिस अउ पिंजरा के मिट्ठू ला पिंजरा ले उड़ाइस। 

मुँहु मा स्कॉर्फ बाँधिस, हेलमेट पहिरिस, चश्मा चढ़ाके पर्स ला खांध मा अरोइस अउ स्कूटी स्टार्ट करके आई टी आई के रद्दा मा चल दिस गंगा हा अब। सास-ससुर अब हाथ हलाके आसीस देवत हाबे।

"दुधे खा, दुधे अचो बेटी !''

"जा मोर मयारू मिठ्ठू ! अब उड़ान तोर अउ जम्मो अगास तोर।''

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

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1,समीक्षा-पोखनलाल जायसवाल:

 आज शिक्षा के अँजोर चारों मुड़ा जगर-मगर करत हे। शिक्षा के प्रचार-प्रसार होय ले समाज ल कतको कुरीति अउ आडंबर ले मुक्ति मिले हे। शिक्षा के चलत लोगन के सोच बदले हे। वैज्ञानिक दृष्टिकोण आय हे। नइ बदले हे त नारी के दशा। नारी शिक्षा पाके ससन भर उड़ना तो चाहथे, फेर उँकर हाल पिंजरा के चिरई जस हे। उड़ान भरना तो चाहथे, फेर भर नइ सकय। खासकर ए दशा सुशिक्षित परिवार म जादा देखे सुने मिलथे। पढ़े-लिखे अउ कमाऊ पुरुष नारी ल घर के भीतर कैद करके रखना चाहथे। तरह-तरह के जिम्मेदारी म फाँस उँकर क्षमता के शोषण करथे। उँकर सपना ले ओला कोनो मतलब नइ रहय। कहूँ कमई के (पइसा के) बात आथे त दंभ भरथे, कि का कमी हे तोला? ...का चीज के पुरती नइ होवत हे तउन ल बता? पढ़े लिखे पुरुष जब पढ़े लिखे नारी ल सम्मान नइ देवय, त ओकर नकसान पूरा समाज ल भोगे बर परथे। आज के तथाकथित सभ्य अउ सुशिक्षित समाज म नारी शोषक के समर्थक कतको राहुल हें। जउन नारी ल चिरई सहीं पिंजरा म धाँध के रखना चाहथें।

        गंगा गरीब मजदूर के मान बढ़ोइया सुशिक्षित अउ संस्कारित बेटी आय। जउन बेरा के संग जिम्मेदारी ल पूरा करथे। अपन अउ अपन दाई-ददा के सपना पूरा करे बर नारी जात ल लेके राहुल के दोहरा चरित्र ल उघारत झंझेटथे। ओकर बोलती बंद करथे। आज के जादातर शिक्षित अउ सम्पन्न(आर्थिक रूप ले) घर-परिवार म नारी के प्रति करनी अउ कथनी म इही फरक जादा मिलथे। सिरतोन म इहें नारी के जिनगी पिंजरा के चिरई ले कमती नइ जनावय। 

           नारी विमर्श के ए कहानी म युवा वर्ग के जीवनशैली अउ हॉस्टल लाईफ के जीवंत चित्रण कहानी के सुघरई तो बढ़ाबे करथे, कहानी बर काल्पनिकता ले हकीकत के जमीन तियार करथे। एक कहानीकार कोनो घटना ल कल्पना के उड़ान भर अइसन गढ़थे कि पाठक कहानी म अपन आसपास के घटना ल ही पाथे। 

       चंद्रहास साहू के कहानी के भाषा शैली उत्तम हे, कहानी के प्रवाह पाठक ल मिल्की मारन नइ दय। 

        कथानक के मुताबिक कहानी के शीर्षक सार्थक हे। सच म नारी के जिनगी पिंजरा के चिरई ले आने जनाबे नइ करय। 'जिम्मेदार बहुरिया' म जुड़े 'जिम्मेदार' शब्द ल लेके कहानीकार के कहना ....कोनो आखर नोहे भलुक बेड़ी आय गोड़ के। पिंजरा आवय जब तक जीयत रही तब तक धँधा जाही माइलोगिन हा...। सोला आना सिरतोन जनाथे। पिंजरा के चिरई बर।

      नारी विमर्श के सुघर कहानी अपन उद्देश्य म सफल हे, अइसन सुघर कहानी बर चंद्रहास साहू को बधाई💐🌹


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह (पलारी)

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2,समीक्षा--ओम प्रकाश अंकुर:


 सुघ्घर संदेश समाय हे चंद्रहास साहू जी के कहानी " पिंजरा के चिरई" म. चंद्रहास साहू के सबो कहानी ह दमदार रहिथे अउ अपन कहानी के माध्यम ले एक सुघ्घर संदेश देथे. अइसने यहू कहानी म देखे ल मिलथे. 

कहानी के मुख्य पात्र गंगा एक गरीब घर के बेटी आय. गंगा के ददा ह कहिथे कि अब मंय ह तोला इंजिनियरिंग कालेज नइ पढ़ा सकंव बेटी. गरीब होना सबले बड़का पाप हे.ये जगह के मार्मिक चित्रण भाई चंद्रहास साहू ह करे हावय. आगू बढ़े के सपना देखे बर गंगा ह अपन ददा -दाई कर कइसे कलपथे. तहां ले दाई ह गंगा ल आगू बढ़ाय बर हामी भरथे. फेर  गंगा ल इंजिनियरिंग पढ़ाय बर बइला अउ गाड़ी ल बेचे के दृश्य ह पाठक मन ल झकझोर के रख देथे. आंख ले आंसू टपका देथे. 


गंगा के कालेज म 

अब्बड़ मिहनत,उंकर सहेली मन के बेवहार के वर्णन के सजीव चित्रण करे गे हावय . फेर कालेज पढ़ के गांव म आना अउ अपन बेवहार ले सब झन ल प्रभावित करे के बात ल उकेरे गे हावय.

   फेर कहानी म टर्निंग पाइंट आथे बिहाव के बाद. वोकर गोसइया राहुल खुद इंजिनियरिंग कॉलेज म प्राध्यापक हावय. बिहाव के समय राहुल ह वादा करे रिहिस कि गंगा के योग्यता के मान राखे जाही. वोला नौकरी करे के इजाजत देबो कहिके. पर ये का राहुल ह तो गंगा के सबो सपना के छर्री -दर्री कर दिस अउ गंगा ह पिंजरा के चिरई बन के रहिगे जेहा मन से न पिंजरा ले निकल सकय न उड़ सकय. धंधाय रहिगे पिंजरा म. आजो गंगा असन न जाने कतको गंगा ले वोकर गोसइया अउ ससुर- सास मन बिहाव होत ले आगू बढ़ाय के हामी भरे रहिथे तहां ले धीरे ले पिंजरा के चिरई कस धांध के राख देथे अउ गंगा मन के सबो सपना ह टूट जाथे.!

पर चंद्रहास साहू के गंगा ह अपन अधिकार बर जोम दे देथे. सास ससुर के अब्बड़ सेवा घलो करथे तेकर सेति वोला सास ससुर मन वोला बेटी बरोबर मानथे. गंगा के बने बेवहार ह वोला आगू बढ़े म मदद करथे. वोकर सास ससुर मन अपन लड़का राहुल ल वोकर बेवहार बर फटकारथे अउ अपन बहू गंगा ल नौकरी करे बर भेजथे. राहुल के आंखी ल खोलथे कि बेटा अपन वादा ल झन भुला.

  ये मामला म चंद्रहास साहू जी के गंगा ह अब्बड़ भाग्यशाली हावय. नि ते गोसईया , सास -ससुर के कतको सेवा करय लेय गंगा मन. पर वोला आगू बढ़ाय बर उंकर मन के कान म जुआं नइ  रेंगे. अउ बिहाव के बेरा के अपन वादा ल नेता मन कस भुला जाथे!


  एक धारदार अउ सीखपरक कहानी हे " पिंजरा के चिरई" ह. पात्र के हिसाब ले सुघ्घर भाषा के प्रयोग करे गे हावय. कहानी के शैली सरल,सहज अउ प्रवाहमयी हे. बोलचाल के अंग्रेजी शब्द मन के प्रयोग करे गे हावय. घर,कालेज अउ आफिस के सजीव चित्रण देखे ल मिलथे. एक बढ़िया कहानी बर कहानीकार भाई चंद्रहास साहू ल गाड़ा - गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना हे. 

ओमप्रकाश साहू अंकुर