Saturday, 5 October 2024

छत्तीसगढ़ी कहानी

 कहानी संग्रह सात लर के करधन ले ---                                            ---शकुंतला तरार                                                                                                                                                                          -+++सुख के अंजोर बगरगे  +++

                       घर के मुहाटी मा रिक्सा हर आके थेभिस।----- गंगा के अवाज आईस भ--अ—इ--गे भईगे भईगे । एक घांव राग ल लमा के तहाँ जल्दी-जल्दीदू घांव बोलिस –एती घर के भीतरी ले चम्पा हर सुन डारिस। अवाज ला सुन के चम्पा के मुंहु हर ओथरगे,  अरे! ए तो मोर सास के अवाज सहीं लागत हे, एहर फेर आगे काय रे .... देखवं तो ? बइठे जघा ले चम्पा हर कोरा के लइका का कनिहा मा धर के धरारपटा बाहिर निकलिस। देखत हे गंगा जेन ओखर सास ए रिक्सा ले उतरे नइये समान मन के बीच मा फंसे बइठे हे ऊहंचे बइठे-बइठे रिक्सा वाला ले चुमड़ी मन ला उतरवावत हे। एक चुमड़ी, दू चुमड़ी, दू चुमड़ी, एक झोरा दू झोरा, केटली अउ ओखर कपड़ा के बेग। जब जम्मो समान ला उतराके रिक्सा वाला ठाड़ होईस तब गंगा हर उतरिस अउ बिलाउज मा बने खीसा ले पईसा ला निकला के रिक्सा वाला ला दिस त रिक्सा वाला कहत हे दस रूपया उपराहा अउ दे दे ना कतना अकन समान हे एक तो घरो हर अतना दुरिहा हे ,चंपा कहत हे समान हे त काय होगे मैं जब भाव करेंव तब तो देखे रहे ना तयं हर फेर अब काबर ----राग ला लमा के चंपा किहिस त रिक्सा वाला चुपेचाप चल दिस । समान ला देख के चम्पा मने मन खुस  होवत हे। फेर सास के मुंहुं ला देख के ओखर थोथना हर फेर ओथरगे। थोकन खिसियाय सहीं हांसी  हांसे सही करिस अउ लईका ला भूईयां मा बइठार के  मुड़ मा अंचरा धर के पांव पर लिस। पांव परके समान ला दूनों झिन भीतराय लगगें। ओतका मा तो भूईयाँ के लईका हर किर्री पार के रोये लगगे। गंगा लईका ला धरे के उदीम करसि त लईका अउ चिचिया के रो दिस। गंगा हर चम्पा ला लईकाला पाये बंर कहिके जम्मो समान ला खुदे भितरा डारिस। चम्पा एक हाथ में कनिहा मा लईका धरे दूसर हाथ मा बेग ला धर के भितराईस तब तक ले गंगा अपने ले होके जाके नल के पानी मा हाथ-गोड़ ला धो डरिस। गांव होतीस त सबले पहिली एक लोटा पानी दिये जातीस। अरे इही तो हमर छत्तीसगढ़ के पहुना संस्कृति ए। 

                             कोनो बिंसवास करय के झन करय आन राज के मनखे के नई कहे जा सके फेर हमन तो जानत हन एक लोटा पानी के महात्तम  ला। उही एक लोटा पानी गांव-देहात मा आदर, मान, सम्मान के रूप म हमर चिन्हारी आय। आज सहर मा घर भीतरी जघा-जघा नल, पक्की अंगना दुवारी मा कांहा गोड़ धोही सगासहोदर । तेखर ले नल कोती, नहानी कोती जाके खुदे गोड़ हाथ धो लव। पानी देये के संसो तको नइये। संसो हर हावे त अतका कि सहर के जिनगी मा हम दू अउ हमर दू करत-करत सियनहा मन के जघा कहंचो छूटत चल दिस हे। सब के रहत आज वो मन जादा अकेल्ला होगे हवयं।

गोड़-हाथ ला धोके गंगा हर परछी मा आके खटिया मा बइठिस तब तक ले चम्पा के देरानी छोटकी बहुरियां अपन सास के अवाज अउ लईका के रोवई ला सुन के झकनका के उठ के आईस अउ सास के पांव परके रंधनी मा जाके हड़बड़ावत गेस चूलहा मा चाहा ला मड़ाईस। एती चम्पा सास ला पूछत हे कतका बजे घर ले निकलेव —गंगा सांस भरत कहिथे का बताववं! ए रोगहा मोटर ला घलो आजेच बिगडऩा रिहिस। दस बज्जी के डईरेट रायपुर के गाड़ी मा चघा देय रिहिस वो-- तोर बाबूजी हर— आवत आवत रद्दा म ठाड़ होगे अइसना जघा बिगड़गे जिहाँ पानी तको नईं, --ना एको ठिन रूख-राई। धाम अउ पियास के मारे तो जम्मो पछिन्जर के जीव हलाकान होगे रिहिस, दू घंटा लगगे बनावत ले। फेर लेद्दे-लेद्दे बेलासपुर लानिस उहां ए डईरेट गाड़ी ला बदलवाईस। जम्मो एती रईपुर के सवारी ला आने मोटर मा चघा दिस।

चम्पा मने मन सास के परसानी ला सुन के खुस होवत बात ला आधू बढ़ाय बर फेर पूछथे—त अतका अकन समान ला धरके अकेल्ला काबर आयेव तु मन।— गंगा कहिथे— का बतावतं ओ चम्पा, आज तो मोर अइसे बेजती होय हे ए समान के मारे कि झन कि पूछ। इहां ले उहां करत-करत, चघात- उतरावत गाड़ी वाला मन मोर अत्तेक इनसट करे हें कि का कहवं। सिरतोन घलाव त आय। गाड़ी हर नईं बिगड़तीस त सोज्झ रइपुर अमरा देतीस अब का जानतेवं महुं हर अइसना होही कहिके।

गंगा जानत हे बहुरिया मन के मन म मोर बर रत्ती भर दया-नइये। दून्नो बहुरिया वइसनेच आंयथूके थूक म बरा चुरो देथें कब के खा पी के निकले हवे कुछु बना के देय बर धियान नईं देवयं । कुछ खाये पीये बर पूछबे नई करयं । जब तक ले खाये के बेरा नईं हो जावय।

                           गंगा हर अपन लाने समान ले छोटकी ला झोरा ला मांगिस। छोटकी जेन चहा धर के ठाड़े रिहिस। झोरा ल लान के अपन सास ला धराईस , ओखर बाद तो एक ले सेक समान झोरा के भीतरी ले। चम्पा के बेटा अउ छोटकी के बेटी के हाथ मा एकक ठिन अइरसा ला धरा के गंगा हर अपन बर हाथ मा दू ठिन निकालिस अउ झोरा ला धरा दिस चम्पा के हाथ मा अउ किहिस- तहूँ मन हेर के खा लेव वो। मयं खावत हौं,-- भूख के मारे सहउल नईं होवत हे--- बिहनिया लकर-धकर बासी खा के निकले रिहेवं। कहिके गंगा एक हाथ मा चहा के कप पिलेट ला झोंकिस अउ दूसर हाथ के अइरसा ला खा के चाहा पी के उही खटिया मा ढलंगगे-हाथ गोड़ ला लमा के। आज अड़बड़ थकगे रिहिस रइपुर के आवत ले। छै-सात घंटा होगे रिहिस। सियाना देहें। ढलंगते सात ओखर नींद परगे।

                   को जनी कतका बेरा होगे रिहिस ओला सोवत कि धीरे-धीरे खुसुर-पुसुर के अवाज ओखर कान मा सुनई आगे। चम्पा अउ छोटकी बहुरिया गोठियावत रिहिन। चम्पा कहत रिहिस-ए दारी डोकरी हर कतका दिन बर आय हे ते। गांव मा एला काय कीरा चाबत रहिथे त अपन डोकरा लाछोंड़-छोंड़ के मुंहुं उठा के इहां सहर मा आ जाथे।

अब सुरु हो जाही काली ले एखर पूजा पाठ, एखर छुआछूत। सूत उठ के नहा लेवव, एला झन करव ओला झन करव। जनो-मनो एखरे घर ए। बेटा मन ला काय ए-महतारी ला देख के कोरा के लईका मन कस दाई-दाई करत बिल्होरत रहिथें। उही पाय के मया मा घेरी-बेरी आवत रहिथे। दिन भर मरना त हमला हे एखर संग मा।

दीदी-अब छोटकी के अवाज गंगा सुनत हे-छोटकी कहत हे मोला तो बिहनिया के उठई करलई हो जाथे वो नानकन के संग मा। अपन पूजा पाठ करथे अउ घंटी ला बजावत रहिथे। समान धर के आये हवं कहिके टेस भारत रहिथै। महेना भर के पूस ह फुस ले भगा जाथे दीदी फेर एखर महेना साल संही लागथे। टेस तो अइसन कि मड़ई के देवता के रिसाये ले नरियल लिमऊ दे के मना ले फेर एहर रिसाईस त घेरी-बेरी पइयांला पड़ाथे।

                                ऊँखर गोठ-बात ला सुन के गंगा के छाती धक-धक करे लगगे। अंतस मा पीरा भरगे अउ आँखी डहर ले आंसू बनके बोहाय लगिस। हे ईसवर काय के कमी हे मोला। गाड़ा-गाड़ा धान, चना, राहेर, तिवरा भरपूर ओन्हारी होथे। गन्ना अलग होथे सालभर के गुर हो जाथे। नून, तेल, कपड़ा बर धान बेंचा जाथे पइसा के तो कमी नइये मोला। गांव मा देवर, देरानी दू-दू झिन। ननपन ले बिहाव होके आगे रिहेवं त ननद-देवर मनला लईका संही पोसे हवं। इसकूल पठोए हवं। कभू नई जानेवं कएरी बइरी, लड़ई-झगरा।

                                     मनखे अपन सोंच अउ सुग्घर बानी केबल मा दुनिया भर मा जाने जाथे। पहली घर, त पारा, मोहल्ला, गांव, राज, देस अउ दुनिया। ए अलग बात ए कि सबके बिचार अलग-अलग होथे। दू झिन कहूं जान चिन्हार मिलगे त राम-राम, पैलगी, जै जोहार के संग मा सुख-दुख, मया-पीरा, गोठिया ले । भलूक वो माई लोगन होवयं की आदमी जात। जान चिनहार हे त ठाड़ेच ठाड़ रद्दाच मा घंटा भर ले गोठिया डारथें। घड़ी भर मा रो लिहिं छिन भर मा हांस लिहीं। इही त हमर मया पीरीत के नता आय। उहें कतको झिन अपन-अपन थोकन बोली बात मा अपन ला बिरान कर देथें। कखरो सुभाव होथे अपन बड़ाई मा जग जीता। अपनेच्च अपन बड़ाई करत रीहीं। मयं अइसन, मयं वइसन मोर दाई मोर ददा। मोर लईका ले बढ़के सुंदर अउ सरीफ कोनो नईये। वइसने मन के लईका मन पाछू ठेंगा देखाके अलग हो जाथें।

गंगा सोंचतेच्च हे—हे भगवान मयं तो कभू वइसना नई करेवं लईका मन ला सत आचरन धरम-करम, बडे के आदर नान्हे के सनमान सिखोएवं तभे आज सहर मा आके उही आचरन ले बने कमावत खात हें ।

फेर मयं का करवं ईसवर! मोला मया हर मार डारथे। बेटा तो बेटा मयं बहु मन ला तको ओतके मया करथवं। फेर ऊँखर मन मा कइसे ए बात आगे कहि नी सकवं।

गंगा फेर सोंचत हे मने मन कहत हे मयं काहां गलती कर डारे हवं जेन मा बहूरिया मनला खटक गय हाववं। मोला अपन मन के भीतर म झांके बर परही। मयं खुसी बाटहूं तब खुसी पाहूं। सब हांसी खुसी रहीं त घर मा सुख सम्पत्ति नाना परकार ले आही। आज जमाना काहां ले काहां अमरगे। का होईस वोमन मोला कुछु कहत हें त। एमा कोनो तो कारन जरूरेच्च होही। अउ कारन ला जान के मोला अपन ला बदलना परही।

                                श्री कृष्णा हर गीता मा कहे हवय “कर्मन्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”आज मोला उही करम के धरमला निभाना हे। कहिथें कि बिरिख मा जतका फल लगही ओतका नवत जाथे। वइसने मोला फल देय खातिर नवे परही। अपन परवार के नेव ला मयं नई भसकन दवं। चार-छै दिन रही के मयं हर चल देहूँ अपन गांव अपन घर। कखरो बर भार बनके रहना नई चाही जब तक जांगर चलत हे कमा के खा लेव जांगर नई चलही तब देखे जाही | अउ देखना घलो काला हे कुछु अईसन करके जावव कि तुहंर जाए पाछू ए दुनिया म नाव लेवैय्या तो होना चाही |

                              चुपेचाप खटिया मा परे बिचारत-बिचारत संझा होगे।सुरुज देंवता कब के चल दे रिहिस अंधियारी होगे  रिहिस बाहिर फेर गंगा के अंतस मा अंजोर बगरत रिहिस, वो अंजोर रिहिस “गियान के अंजोर”''सुख के अंजोरी”| 

                                    आज महेनाभर होय नइये गंगा ला गांव गए। बहुरिया मन बियाकुल होगे हें गंगा बर। दाई हर कब आही दाई हर कब आही। अब गंगा के घर मा सुख के अंजोरबगरगे हवय जेखर जोती मा सबके मुंहरन दमकत हावय दप-दप करत।

                                                                    शकुंतला तरार

                                       एकता नगर, सेक्टर २ 

                                                   प्लॉट नं. ३२ 

                                                  रायपुर (छत्तीसगढ़)

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समीक्षा पोखनलाल जायसवाल:

 साहित्य अपन समय के समाज अउ लोकजीवन के चित्र प्रस्तुत करथे। कहानी उही साहित्य के एक विधा आय। जउन म कहानीकार अपन आँखी देखी घटना ल अपन कल्पना ले चतुराई के संग कहानी गढ़के प्रस्तुत करथें। जउन पढ़त खानी पाठक ओमा रम जथे। शब्द चित्र के संग कहानी म प्रवाह रहे ले पाठक कहानी ल एक साँस म पढ़ डारथे। शकुन्तला दीदी के कहानी *सुख के अंजोर बगरगे* दू पीढ़ी के नारी के मनोविज्ञान ल समझे म मददगार हे। एकर पात्र मन हमर तिर-तखार म हें। 

      आज परिवार म बिखराव(टूटन) रोजगार के चलत जल्दी हो जवत हे। गँवई-गाँव म रोजगार पहिली जइसे नइ रहिगे हे। बड़का कारण ए कि सबे खेती ले मुँह फेरत हें। शहर के रस्ता नापे लग गे हें। 

      शहर म रहवइया बेटा बहू घर पहुँचे गंगा के अंतर्द्वंद्व अउ समझदारी दूनो ए कहानी म दिखथे। गंगा के दूनो बहू के माध्यम ले तथाकथित सभ्य अउ आधुनिक समाज के नारी के चरित्र ल बड़ सुघरई ले गढ़े गे हावय। एमा कोनो शक नइ हे कि अइसन नइ होवत हे। आज परिवार हम दू अउ हमर दू तक ही समेटावत हे या कहन समेटागे हावय।

      गंगा सियान आय। उँकर भीतर सियानी हियाव हे। तभे तो बहू मन के उपेक्षा अउ तिरस्कार ल नवा ढंग ले लेथे अउ बहू मन के लइक अपन आप ल बनाय के कोशिश करथे। अपन घर परिवार म सुख के अंजोर बगराय के जतन करथें। सफल घलो होथे।

     गंगा महतारी आय, महतारी के अंतस् म सिरतोन गंगा मैया के निर्मल धार सहीं बेटा अउ बहू दूनो बर मया पलपलात रहिथे। जेला चम्पा देर म भाँप पाइस। मया अपन असर दिखाबे करथे।

         एक लोटा पानी दे के लोक संस्कृति के झलक दिखावत सुग्घर कहानी के संवाद जीवंत अउ प्रासंगिक हे। भाषा शैली अउ प्रवाह सुग्घर हे। 

     कहानी अपन उद्देश्य म सफल होही, परिवार म एक दूसर के बीच मया के पुल ल सजोर करही, इही आशा करत शकुन्तला दीदी ल कहानी बर अंतस् ले बधाई💐🌹 


पोखन लाल जायसवाल

पलारी बलौदाबाजार

नाचा के पितामह- मंदराजी दाऊ

 सांस्कृतिक तर्पन 


24 सितंबर - पुण्यतिथि म विशेष 


नाचा के पितामह- मंदराजी दाऊ 





-ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’


धान के कटोरा छत्तीसगढ़ के लोक कला अउ संस्कृति के अलग पहचान हवय । हमर प्रदेश के लोकनाट्य नाचा, पंथी नृत्य, पण्डवानी, भरथरी, चन्देनी के संगे संग आदिवासी नृत्य के सोर हमर देश के साथ विश्व मा घलो अलगे छाप छोड़िस हे। पंथी नर्तक स्व. देवदास बंजारे ,पण्डवानी गायक झाड़ू राम देवांगन, तीजन बाई, ऋतु वर्मा, भरथरी गायिका सुरुज बाई खांडे जइसन कला साधक मन हा छत्तीसगढ़ अउ भारत के नाम ला दुनिया भर मा बगराइस हवय. रंगकर्मी हबीब तनवीर के माध्यम ले जिहां छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकार लालू राम (बिसाहू साहू),भुलवा राम, मदन निषाद, गोविन्द राम निर्मलकर, फिदा बाई मरकाम, माला बाई मरकाम हा अपन अभिनय क्षमता के लोहा मनवाइस. ये नाचा के नामी कलाकार मन हा एक समय नाचा के सियान मंदराजी दाऊ के अगुवाई मा काम करे रिहिन ।मंदराजी दाऊ हा नाचा के पितृ पुरुष हरय. वो हा एक अइसन तपस्वी कलाकार रिहिस जउन हा नाचा के खातिर अपन संपत्ति ला सरबस दांव मा लगा दिस ।

नाचा के अइसन महान कलाकार मंदराजी के जनम संस्कारधानी शहर राजनांदगांव ले 5 किलोमीटर दूरिहा रवेली गांव मा 1 अप्रैल 1910 के एक माल गुजार परिवार मा होय रिहिन ।मंदरा जी के पूरा नांव दुलार सिंह साव रिहिस । 1922 मा ओकर प्राथमिक शिक्षा हा पूरा होइस।दुलार सिंह के मन पढ़ई लिखई मा नई लगत रिहिस । ओकर धियान नाचा पेखा डहर जादा राहय । रवेली अउ आस पास गांव मा जब नाचा होवय तब बालक दुलार सिंह हा रात रात भर जाग के नाचा देखय ।एकर ले

ओकर मन मा घलो चिकारा, तबला बजाय के धुन सवार होगे. वो समय रवेली गांव मा थोरकिन लोक कला के जानकार कलाकार रिहिस । ऊंकर मन ले मंदराजी हा

चिकारा, तबला बजाय के संग गाना गाय ला घलो सीख गे । अब मंदरा जी हा ये काम मा पूरा रमगे ।वो समय नाचा के कोई बढ़िया से संगठित पार्टी नइ रिहिस । नाचा के प्रस्तुति मा घलो मनोरंजन के नाम मा द्विअर्थी संवाद बोले जाय ।येकर ले बालक दुलार के मन ला गजब ठेस पहुंचे ।वोहा अपन गांव के लोक कलाकार मन ला लेके 1928-29 मा रवेली नाचा पार्टी के गठन करिस ।ये दल हा छत्तीसगढ़ मा नाचा के पहिली संगठित दल रिहिस ।वो समय खड़े साज चलय । कलाकार मन अपन साज बाज ला कनिहा मा बांधके अउ नरी मा लटका के नाचा ला करय ।

मंदराजी के नाचा डहर नशा ला देखके वोकर पिता जी हा अब्बड़ डांट फटकार करय ।अउ चिन्ता करे लगगे कि दुलार हा अइसने करत रहि ता ओकर जिनगी के गाड़ी कइसे चल पाही । अउ एकर सेती ओकर बिहाव 14 बरस के उमर मा दुर्ग जिले के भोथली गांव (तिरगा) के राम्हिन बाई के साथ कर दिस ।बिहाव होय के बाद घलो नाचा के प्रति ओकर रुचि मा कोनो कमी नइ आइस ।शुरु मा ओकर गोसइन हा घलो एकर विरोध करिन कि सिरिफ नाचा ले जिनगी कइसे चलहि पर बाद मा

वोकर साधना मा बाधा पड़ना ठीक नइ समझिस ।अब वोकर गोसइन हा घलो वोकर काम मा सहयोग करे लगिन अउ उंकर घर अवइया कलाकार मन के खाना बेवस्था मा सहयोग करे लगिन ।

सन् 1932 के बात हरय ।वो समय नाचा के गम्मत कलाकार

सुकलू ठाकुर (लोहारा -भर्रीटोला) अउ नोहर दास मानिकपुरी (अछोली, खेरथा) रिहिस ।कन्हारपुरी के माल गुजार हा सुकलू ठाकुर अउ नोहर मानिकपुरी के कार्यक्रम अपन गांव मा रखिस ।ये कार्यक्रम मा मंदरा जी दाऊ जी हा चिकारा बजाइस ।ये कार्यक्रम ले खुश होके दाऊ जी हा सुकलू

अउ नोहर मानिकपुरी ला शामिल करके रवेली नाचा पार्टी के ऐतिहासिक गठन करिन ।अब खड़े साज के जगह सबो वादक कलाकार बइठ के बाजा बजाय लागिस ।

सन् 1933-34 मा मंदराजी दाऊ अपन मौसा टीकमनाथ साव ( लोक संगीतकार स्व. खुमाम साव के पिताजी )अउ अपन मामा नीलकंठ साहू के संग हारमोनियम खरीदे बर कलकत्ता गिस ।ये समय वोमन 8 दिन टाटानगर मा घलो रुके रिहिस ।इही 8 दिन मा ये तीनों टाटानगर के एक हारमोनियम वादक ले हारमोनियम बजाय ला सिखिस ।बाद मा अपन मिहनत ले दाऊजी हा हारमोनियम बजाय मा बने पारंगत होगे । अब नाचा मा चिकारा के जगह हारमोनियम बजे ला लगिस ।सन् 1939-40 तक रवेली नाचा दल हमर छत्तीसगढ़ के सबले प्रसिद्ध दल बन गे रिहिस ।

सन् 1941-42 तक कुरुद (राजिम) मा एक बढ़िया नाचा दल गठित होगे रिहिस ।ये मंडली मा बिसाहू राम (लालू राम) साहू जइसे गजब के परी नर्तक रिहिस । 1943-44 मा लालू राम साहू हा कुरुद पार्टी ला छोड़के रवेली नाचा पार्टी मा शामिल होगे ।इही साल हारमोनियम वादक अउ लोक संगीतकार खुमान साव जी 14 बरस के उमर मा मंदराजी दाऊ के नाचा दल ले जुड़गे ।खुमान जी हा वोकर मौसी के बेटा रिहिस ।इही साल गजब के गम्तिहा कलाकार मदन निषाद (गुंगेरी नवागांव) पुसूराम यादव अउ जगन्नाथ निर्मलकर मन घलो दाऊजी के दल मा आगे ।अब ये प्रकार ले अब रवेली नाचा दल हा लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, खुमान लाल साव, नोहर दास मानिकपुरी, पंचराम देवदास, जगन्नाथ निर्मलकर, गोविन्द निर्मलकर, रुप राम साहू, गुलाब चन्द जैन, श्रीमती फिदा मरकाम, श्रीमती माला मरकाम जइसे नाचा के बड़का कलाकार मन ले सजगे ।

नाचा के माध्यम ले दाऊ मंदराजी हा समाज मा फइले बुराई छुआछूत, बाल बिहाव के विरुद्ध लड़ाई लड़िस अउ लोगन मन ला जागरुक करे के काम करिस ।नाचा प्रदर्शन के समय कलाकार मन हा जोश मा आके अंग्रेज सरकार के विरोध मा संवाद घलो बोलके देश प्रेम के परिचय देवय ।अइसने आमदी (दुर्ग) मा मंदराजी के नाचा कार्यक्रम ला रोके बर अंग्रेज सरकार के पुलिस पहुंच गे रिहिस । वोहर मेहतरीन, पोंगा पंडित गम्मत के माध्यम ले छुअाछूत दूर करे के उदिम, ईरानी गम्मत मा हिन्दू मुसलमान मा एकता स्थापित करे के प्रयास, बुढ़वा बिहाव के माध्यम ले बाल बिहाव अउ बेमेल बिहाव ला रोकना, अउ मरानिन गम्मत के माध्यम ले देवर अउ भौजी के पवित्र रिश्ता के रुप मा सामने लाके समाज मा जन जागृति फैलाय के काम करिन ।

1940 से 1952 तक तक रवेली नाचा दल के भारी धूम राहय ।


सन् 1952 मा फरवरी मा मंड़ई के अवसर मा पिनकापार (बालोद )वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख हा रवेली अउ रिंगनी नाचा दल के प्रमुख कलाकार मन ला नाचा कार्यक्रम बर नेवता दिस । पर ये दूनो दल के संचालक नइ बुलाय गिस। अइसने 1953 मा घलो होइस ।ये सब परिस्थिति मा रवेली अउ रिंगनी (भिलाई) हा एके म सामिल (विलय) होगे ।एकर संचालक लालू राम साहू बनिस ।मंदराजी दाऊ येमा सिरिफ वादक कलाकार के रुप मा शामिल करे गिस । अउ इन्चे ले रवेली अउ रिंगनी दल के किस्मत खराब होय लगिस ।रवेली अउ रिंगनी के सब बने बने कलाकार दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा संचालित छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल म सामिल होगे ।पर कुछ बछर बाद  छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के कार्यक्रम सप्रे स्कूल रायपुर म होवत रिहिस।ये कार्यक्रम हा गजब सफल होइस ।ये कार्यक्रम ला देखे बर प्रसिद्ध रंगककर्मी हबीब तनवीर हा आय रिहिन ।वोहर उदिम करके रिंगनी रवेली के कलाकार लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, ठाकुर राम, बापू दास, भुलऊ राम, शिवदयाल मन ला नया थियेटर दिल्ली म सामिल कर लिस ।ये कलाकार मन हा दुनिया भर मा अपन अभिनय ले नाम घलो कमाइस अउ छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के सोर बगराइस । पर इंकर मन के जमगरहा नेंव रवेली अउ रिंगनी दल मा बने रिहिस ।

एती मंदरा जी दाऊ के घर भाई -बंटवारा होगे ।वोहर अब्बड़ संपन्न रिहिस ।वोहर अपन संपत्ति ला नाचा अउ नाचा के कलाकार मन के आव भगत म सिरा दिस ।दाऊ जी हा अपन कलाकारी के सउक ला पूरा करे के संग छोटे -छोटे नाचा पार्टी मा जाय के शुरु कर दिस । धन दउलत कम होय के बाद संगी साथी मन घलो छूटत गिस । वोकर दूसर गांव बागनदी के जमींदारी हा घलो छिनागे ।स्वाभिमानी मंदरा जी कोनो ले कुछ नइ काहय ।


मंदराजी दाऊ ला नाचा मा वोकर अमूल्य योगदान खातिर जीवन के आखिरी समय म भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग द्वारा मई 1984 मा सम्मानित करिस । अंदर ले टूट चुके दाऊ जी सम्मान पाके भाव विभोर होगे ।

सम्मानित होय के बाद सितंबर 1984 मा अपन दूसर गांव बागनदी के नवाटोला म पंडवानी कार्यक्रम मा गिस । इहां वोकर तबियत खराब होगे ।वोला रवेली लाय गिस । 24 सितंबर 1984 मा नाचा के ये पुजारी हा अपन नश्वर शरीर ला छोड़के सरग चल दिस ।

स्व. मंदरा जी दाऊ हा एक गीत गावय – ”


दौलत तो कमाती है दुनिया पर नाम कमाना मुश्किल है “.दाऊ जी हा अपन दउलत गंवा के नांव कमाइस ।

मंदराजी के जन्म दिवस 1 अप्रैल के दिन हर बछर 1993 से लगातार मंदरा जी महोत्सव आयोजित करे जाथे ।1992 मा ये कार्यक्रम हा कन्हारपुरी मा होय रिहिस । कन्हारपुरी म घलो  मंदरा जी के जयंती म दिनमान लोक कलाकार अउ साहित्यकार मन सकला  के उंकर योगदान याद करके श्रद्धा के फूल अर्पित करथे।जन्मभूमि रवेली के संगे- संग कन्हारपुरी मा घलो मंदराजी दाऊ के मूर्ति स्थापित करे गेहे ।वोकर सम्मान मा छत्तीसगढ़ शासन द्वारा लोक कला के क्षेत्र मा उल्लेखीन काम करइया लोक कलाकार ला हर साल राज्योत्सव मा मंदराजी सम्मान ले सम्मानित करे जाथे ।नाचा के अइसन महान कलाकार ल शत्- शत् हे। विनम्र श्रद्धांजलि।


           ओमप्रकाश साहू अंकुर

        सुरगी, राजनांदगांव

छत्तीसगढ़ मा छन्द के अलख जगइया - जनकवि कोदूराम "दलित"

 57 वीं पुण्यतिथि पर सादर नमन.........

                                                                                                       

छत्तीसगढ़ मा छन्द के अलख जगइया - जनकवि कोदूराम "दलित" 


छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के हर मंच ले दुनिया मा कविता के सब ले छोटे परिभाषा ला सुरता करे जाथे “जइसे मुसुवा निकलथे बिल ले, वइसे कविता निकलथे दिल ले” अउ एकरे संग सुरता करे जाथे ये परिभाषा देवइया जनकवि कोदूराम “दलित” जी ला. दलित जी के जनम ग्राम टिकरी (अर्जुन्दा) मा 05 मार्च 1910 के होइस. उनकर काव्य यात्रा सन् 1926 ले शुरू होईस. छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी मा उनकर बराबर अधिकार रहिस. गाँव मा बचपना बीते के कारन उनकर कविता मा प्रकृति चित्रण देखे ले लाइक रथे. दलित जी अपन जिनगी मा भारत के गुलामी के बेरा ला देखिन अउ आजादी के बाद के भारत ला घलो देखिन. अंग्रेज मन के शासन काल मा सरकार के विरोध मा बोले के मनाही रहिस, आन्दोलन करइया मन ला पुलिसवाला मन जेल मा बंद कर देवत रहिन. अइसन बेरा मा दलित जी गाँव गाँव मा जा के अपन कविता के माध्यम ले देशवासी मन हे हिरदे मा देशभक्ति के भाव ला जगावत रहिन. दोहा मा देशभक्ति के सन्देश दे के राउत नाचा के माध्यम ले आजादी के आन्दोलन ला मजबूत करत रहिन. आजादी के पहिली के उनकर कविता मन आजादी के आव्हान रहिन. आजादी के बाद दलित जी अपन कविता के माध्यम ले सरकारी योजना मन के भरपूर प्रचार करिन. समाज मा फइले अन्धविश्वास, छुआछूत, अशिक्षा  जइसन कुरीति ला दूर करे बर उनकर कलम मशाल के काम करिस. 

जनकवि कोदूराम “दलित” जी के पहचान छत्तीसगढ़ी कवि के रूप मा होइस हे फेर उनकर हिन्दी भाषा ऊपर घलो समान अधिकार रहिस. लइका मन बर सरल भाषा मा बाल कविता, जनउला, बाल नाटक, क्रिया गीत रचिन. तइहा के ज़माना मा ( सन् पचास के दशक) जब छत्तीसगढ़ी भाषा गाँव देहात के भाषा रहिस कोदूराम दलित जी आकाशवाणी नागपुर, भोपाल, इंदौर मा जा के छत्तीसगढ़ी भाषा मा कविता  अउ कहानी सुनावत रहिन. छत्तीसगढ़ी भाषा ला कविसम्मेलन के मंच मा स्थापित करइया शुरुवाती दौर के कवि मन मा उनला सुरता करे जाही. दलित जी के भाषा सरल, सरस औ सुबोध रहिस. व्याकरण के शुद्धता ऊपर वोमन ज्यादा ध्यान देवत रहिन इही पाय के उनकर ज्यादातर कविता मन मा छन्द के दर्शन होथे. दलित जी के हिन्दी रचना मन घलो छन्दबद्ध हें.   पंडित सुंदरलाल शर्मा के बाद कोनो कवि हर छत्तीसगढ़ मा छन्द ला पुनर्स्थापित करिस हे त वो कवि कोदूराम "दलित" आय. 28 सितम्बर 1967 के दलित जी के निधन होइस। दलित जी के छन्दबद्ध रचना ला छन्द विधान सहित जानीं।

 

दोहा छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों पद आपस मा तुकांत होथें अउ पद के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 13 अउ 11 मात्रा मा यति होथे। कोदूराम दलित जी के नीतिपरक दोहा देखव -


संगत सज्जन के करौ, सज्जन सूपा आय।

दाना दाना ला रखै, भूँसा देय उड़ाय।।


दलित जी मूलतः हास्य व्यंग्य के कवि रहिन। उनकर दोहा मा समाज के आडम्बर ऊपर व्यंग्य देखव - 


ढोंगी मन माला जपैं, लम्भा तिलक लगाँय।

मनखे ला छीययँ नहीं, चिंगरी मछरी खाँय।।


बाहिर ले बेपारी मन आके सिधवा छत्तीसगढ़िया ऊपर राज करे लगिन। ये पीरा ला दलित जी व्यंग्य मा लिखिन हें – 


फुटहा लोटा ला धरव, जावव दूसर गाँव।

बेपारी बनके उहाँ, सिप्पा अपन जमाँव।।


टिकरी गाँव के माटी मा जनमे कवि दलित के बचपना गाँवे मा बीतिस। गाँव मा हर चीज के अपन महत्व होथे। गोबर के सदुपयोग कइसे करे जाय, एला बतावत उनकर दोहा देखव –


गरुवा के गोबर बिनौ, घुरवा मा ले जाव।

खूब सड़ो के खेत बर, सुग्घर खाद बनाव।।


छत्तीसगढ़ धान के कटोरा आय। इहाँ के मनखे के मुख्य भोजन बासी आय। दलित जी भला बासी के गुनगान कइसे नइ करतिन – 


बासी मा गुन हे गजब, येला सब मन खाव।

ठठिया भर पसिया पियव, तन ला पुष्ट बनाव।।


दलित जी किसान के बेटा रहिन। किसानी के अनुभव उनकर दोहा मा साफ दिखत हे – 


बरखा कम या जासती, होवय जउने साल।

धान-पान होवय नहीं, पर जाथै अंकाल।।


जनकवि कोदूराम "दलित" जी नवा अविष्कार ला अपनाये के पक्षधर रहिन। ये प्रगतिशीलता कहे जाथे। कवि ला बदलाव के संग चलना पड़थे। देखव उनकर दोहा मा विज्ञान ला अपनाए बर कतिक सुग्घर संदेश हे – 


आइस जुग विज्ञान के, सीख़ौ सब विज्ञान।

सुग्घर आविष्कार कर, करौ जगत कल्यान।।


सोरठा छन्द - ये दोहा के बिल्कुले उल्टा होथे। यहू दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों विषम चरण आपस मा तुकांत होथें अउ विषम चरण के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 11 अउ 13 मात्रा मा यति होथे।


बंदँव बारम्बार, विद्या देवी सरस्वती।

पूरन करहु हमार, ज्ञान यज्ञ मातेस्वरी।।


उल्लाला छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। विषम अउ सम चरण  या सम अउ सम चरण आपस मा तुकांत होथें अउ हर चरण दोहा के विषम चरण असन होथे। ये छन्द मा 13 अउ 13 मात्रा मा यति होथे।


खेलव मत कोन्हों जुआ, करव न धन बरबाद जी।

आय जुआ के खेलना, बहुत बड़े अपराध जी।। 

 

सरसी छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों पद आपस मा तुकांत होथें अउ पद के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 16 अउ 11 मात्रा मा यति होथे। दलित जी सन् 1931 मा दुरुग आइन अउ इहें बस गें। वोमन प्राथमिक शाला के गुरुजी रहिन। उनकर सरसी छन्द मा गुरुजी के पीरा घलो देखे बर मिलथे –


चिटिक प्राथमिक शिक्षक मन के, सुनलो भइया हाल।

महँगाई के मारे निच्चट , बने हवयँ कंगाल।।


गुरुजी मन के हाल बर सरकार ऊपर व्यंग्य देखव –

 

जउन देस मा गुरूजी मन ला, मिलथे कष्ट अपार।

कहै कबीरा तउन देस के , होथे बंठाढार।।


दलित जी अइसन गुरुजी मन ऊपर घलो व्यंग्य करिन जउन मन अपन दायित्व ला बने ढंग ले नइ निभावँय – 


जउन गुरूजी मन लइका ला, अच्छा नहीं पढ़ायँ।

तउन गुरूजी अपन देस के, पक्का दुस्मन आयँ।।


रोला छन्द - चार पद, दू - दू पद मा तुकांत, 11 अउ 13 मात्रा मे यति या हर पद मा कुल 24 मात्रा।

दलित जी के ये रोला छन्द मा बात के महत्ता बताये गेहे –


जग के लोग तमाम, बात मा बस मा आवैं।

बाते मां  अड़हा - सुजान  मन चीन्हें जावैं।।

करो सम्हल के बात, बात मा झगरा बाढ़य।

बने-बुनाये काम,सबो ला  बात  बिगाड़य।।


आज के जमाना मा बेटा-बहू मन अपन ददा दाई ला छोड़ के जावत हें। इही पीरा ला बतावत दलित जी के एक अउ रोला छन्द – 


डउकी के बन जायँ, ददा - दाई नइ भावैं।

छोड़-छाँड़ के उन्हला, अलग पकावैं-खावैं।।

धरम - करम सब भूल, जाँय भकला मन भाई।

बनँय ददा-दाई बर ये कपूत दुखदाई।।


छप्पय छन्द – एक रोला छन्द के बाद एक उल्लाला छन्द रखे ले छप्पय छन्द बनथे। ये छै पद के छन्द होथे। गुरु के महत्ता बतावत दलित जी के छप्पय छन्द देखव –


गुरु हर आय महान, दान विद्या के देथे।

माता-पिता समान, शिष्य ला अपना लेथे।।

मानो गुरु के बात, भलाई गुरु हर करथे।

खूब सिखो के ज्ञान, बुराई गुरु हर हरथे।।

गुरु हरथे अज्ञान ला, गुरु करथे कल्यान जी।

गुरु के आदर नित करो, गुरु हर आय महान जी।।


चौपई छन्द - 15, 15 मात्रा वाले चार पद के छन्द चौपई छन्द कहे जाथे। चारों पद या दू-दू पद आपस मे तुकांत होथें। 


धन धन रे न्यायी भगवान। कहाँ हवय जी आँखी कान।।

नइये ककरो सुरता-चेत। देव आस के भूत-परेत।।

एक्के भारत माँ के पूत। तब कइसे कुछ भइन अछूत।।

दिखगे समदरसीपन तोर। हवस निचट निरदई कठोर।।


चौपाई छन्द - ये 16, 16 मात्रा मे यति वाले चार पद के छन्द आय। एखर एक पद ला अर्द्धाली घलो कहे जाथे। चौपाई बहुत लोकप्रिय छन्द आय। तुलसीदास के राम चरित मानस मा चौपाई के सब ले ज्यादा प्रयोग होय हे। जनकवि कोदूराम "दलित" जी अपन कविता ला साकार घलो करत रहिन। उन प्राथमिक शाला के गुरुजी रहिन। अपन निजी प्रयास मा प्रौढ़ शिक्षा के अभियान चला के  आसपास के गाँव साँझ के जाके प्रौढ़ गाँव वाला मन ला पढ़ावत घलो रहिन। प्रौढ़ शिक्षा ऊपर उनकर एक चौपाई – 


सुनव सुनव सब बहिनी भाई। तुम्हरो बर अब खुलिस पढ़ाई।।

गपसप मा झन समय गँवावव। सुरता करके इसकुल आवव।।

दू दू अक्छर के सीखे मा। दू-दू अक्छर के लीखे मा।।

मूरख हर पंडित हो जाथे। नाम कमाथे आदर पाथे।।

अब तो आइस नवा जमाना।हो गै तुम्हरे राज खजाना।।

आज घलो अनपढ़ रहि जाहू।तो कइसे तुम राज चलाहू।।


पद्धरि छन्द - ये 16, 16 मात्रा मा यति वाले दू पद के छ्न्द आय। एखर शुरुवात मा द्विकल (दू मात्रा वाले शब्द) अउ अंत मा जगण (लघु, गुरु, लघु मात्रा वाले शब्द) आथे। हर दू पद आपस मा तुकांत होथे। दलित जी अपन जागरण गीत मा पद्धरि छन्द के बड़ सुग्घर प्रयोग करिन हें – 


झन सुत सँगवारी जाग जाग। अब तोर देश के खुलिस भाग।।

अड़बड़ दिन मा होइस बिहान। सुबरन बिखेर के उइस भान।।

घनघोर घुप्प अँधियार हटिस। ले दे के पापिन रात कटिस।।

वन उपवन माँ आइस बहार। चारों कोती छाइस बहार।। 


मनहरण घनाक्षरी - कई किसम के घनाक्षरी छन्द होथे जेमा मनहरण घनाक्षरी सब ले ज्यादा प्रसिद्ध छन्द आय। येहर वार्णिक छन्द आय। 16, 15 वर्ण मा यति देके चार डाँड़ आपस मा तुकांत रखे ले मनहरण घनाक्षरी लिखे जाथे। चारों डाँड़ आपस मा तुकांत रहिथे। घनाक्षरी छन्द ला कवित्त घलो कहे जाथे। जनकवि कोदूराम "दलित" जी के ये प्रिय छन्द रहिस। उनकर बहुत अकन रचना मन घनाक्षरी छन्द मा हें। कविता मा गाँव के नान नान चीज ला प्रयोग मा लाना उनकर विशेषता रहिस। ये मनहरण घनाक्षरी मा देखव अइसन अइसन चीज के बरतन हे जउन मन समे के संगेसंग नँदा गिन। चीज के नँदाए के दूसर प्रभाव भाजहा ऊपर पड़थे। चीज के संगेसंग ओकर नाम अउ शब्द मन चलन ले बाहिर होवत जाथें अउ शब्दकोश कम होवत जाथे। तेपाय के असली साहित्यकार मन अइसन चीज के नाम के प्रयोग अपन साहित्य मा करके ओला चलन मा जिन्दा राखथें। ये घनाक्षरी दलित जी अइसने प्रयास आय – 


सूपा ह पसीने-फुने, चलनी चालत जाय

बहाना मूसर ढेंकी, मन कूटें धान-ला।

हँसिया पउले साग, बेलना बेलय रोटी

बहारी बहारे जाँता पिसय पिसान-ला।

फुँकनी फुँकत जाय, चिमटा ह टारे आगी

बहू रोज राँधे-गढ़े, सबो पकवान-ला।

चूल्हा बटलोही डुवा तेलाई तावा-मनन

मिलके तयार करें, खाये के समान-ला।।


जब अपन देश ऊपर कोनो दुश्मन देश हमला कर देथे तब कवि के कलम दुश्मन ला ललकारथे। सन् 1962 मा चीन हर हर देश ऊपर हमला करे रहिस। दलित जी के कलम के ललकार देखव - 


चीनी आक्रमण के विरुद्ध (घनाक्षरी)


अरे बेसरम चीन, समझे रहेन तोला

परोसी के नता-मा, अपन बँद-भाई रे।

का जानी कि कपटी-कुटाली तैं ह एक दिन

डस देबे हम्मन ला, डोमी साँप साहीं रे ।

बघवा के संग जूझे, लगे कोल्हिया निपोर

दीखत हवे कि तोर आइगे हे आई रे।

लड़ाई लड़े के रोग, डाँटे हवै बहुँते तो

रहि ले-ले तोर हम, करबो दवाई रे ।। 


अइसने सन् 1965 मा पाकिस्तान संग जुद्ध होइस। दलित जी के आव्हान ला देखव ये घनाक्षरी मा –

 

चलो जी चलो जी मोर, भारत के वीर चलो

फन्दी पाकिस्तानी ला, हँकालो मार-मार के।

कच्छ के मेड़ों के सबो, चिखलही भुइयाँ ला

पाट डारो उन्हला, जीयत डार-डार के।

सम्हालो बन्दूक बम , तोप तलवार अब

आये है समय मातृ-भूमि के उद्धार के।

धन देके जन देके, लहू अउ सोन देके

करो खूब मदद अपन सरकार के।।


गाँव मे पले-बढ़े के कारण दलित जी अपन रचना मन मा गाँव के दृश्य ला सजीव कर देवत रहिन। उनकर चउमास नाम के कविता घनाक्षरी छन्द मा रचे गेहे। उहाँ के दू दृश्य मा छत्तीसगढ़ के गाँव के सजीव बरनन देखव – 


बाढिन गजब माँछी बत्तर-कीरा "ओ" फांफा,

झिंगरुवा, किरवा, गेंगरुवा, अँसोढिया ।

पानी-मां मउज करें-मेचका भिंदोल घोंघी,

केंकरा केंछुवा जोंक मछरी अउ ढोंड़िया ।।

अँधियारी रतिहा मा अड़बड़ निकलयं,

बड़ बिखहर बिच्छी सांप-चरगोरिया ।

कनखजूरा-पताड़ा सतबूंदिया औ" गोहे,

मुंह लेड़ी धूर नाँग, कँरायत कौड़िया ।।


जनकवि कोदूराम "दलित" के एक प्रसिद्ध रचना "तुलसी के मया मोह राई छाईं उड़गे" मा गोस्वामी तुलसी दास के जनम ले लेके राम चरित मानस गढ़े तक के कहिनी घनाक्षरी छन्द मा रचे गेहे। वो रचना के एक दृश्य देखव कि छत्तीसगढ़ के परिवेश कइसे समाए हे – 


एक दिन आगे तुलसी के सग सारा टूरा,

ठेठरी अउ खुरमी ला गठरी मा धर के।

पहुँचिस बपुरा ह हँफरत-हँफरत,

मँझनी-मँझनिया रेंगत थक मर के।

खाइस पीइस लाल गोंदली के संग भाजी,

फेर ओह कहिस गजब पाँव पर के।

रतनू दीदी ला पठो देते मोर संग भाँटो,

थोरिक हे काम ये दे तीजा-पोरा भर के।।


कुण्डलिया छन्द – ये छै डांड़ के छन्द होथे. पहिली दू  डांड़ दोहा के होथे ओखर बाद एक रोला छन्द रखे जथे. दोहा के चौथा चरण रोला के पहिली चरण बनथे. शुरू के शब्द या शब्द-समूह वइसने के वइसने कुण्डलिया के आखिर मा आना अनिवार्य होते. कोदूराम "दलित" जी  आठ सौ ले ज्यादा कविता लिखिन हें फेर अपन जीवन काल मा एके किताब छपवा पाइन - "सियानी गोठ"। ये किताब कुण्डलिया छन्द के संग्रह हे। कवि गिरिधर कविराय, कुण्डलिया छन्द के जनक कहे जाथें। उनकर परम्परा ला दलित जी, छत्तीसगढ़ मा पुनर्स्थापित करिन हें। साहित्य जगत मा कोदूराम "दलित" जी ला छत्तीसगढ़ के गिरिधर कविराय घलो कहे जाथे। गिरिधर कविराय के जम्मो कुण्डलिया छन्द नीतिपरक हें फेर दलित जी के कुण्डलिया छन्द मा विविधता देखे बर मिलथे। आवव कोदूराम "दलित" जी के कुण्डलिया छन्द के अलग-अलग रंग देखव – 


नीतिपरक कुण्डलिया – राख


नष्ट करो झन राख –ला, राख काम के आय।

परय खेत-मां राख हर , गजब अन्न उपजाय।।

गजब  अन्न  उपजाय, राख मां  फूँको-झारो।

राखे-मां  कपड़ा – बरतन  उज्जर  कर  डारो।।

राख  चुपरथे  तन –मां, साधु,संत, जोगी मन।

राख  दवाई  आय, राख –ला नष्ट करो झन।।


सम सामयिक  - पेपर

पेपर मन –मां रोज तुम, समाचार छपवाव।

पत्रकार संसार ला, मारग सुघर दिखाव।।

मारग सुघर दिखाव, अउर जन-प्रिय हो जाओ।

स्वारथ - बर पेपर-ला, झन पिस्तौल बनाओ।।

पेपर मन से जागृति आ जावय जन-जन मा।

सुग्घर समाचार छपना चाही पेपर-मा।।


पँचसाला योजना  (सरकारी योजना) - 

 

पँचसाला हर योजना, होइन सफल हमार।

बाँध कारखाना सड़क, बनवाइस सरकार।।

बनवाइस सरकार, दिहिन सहयोग सजाबो झन।

अस्पताल बिजली घर इसकुल घलो गइन बन।।

देख हमार प्रगति अचरज, होइस दुनिया ला।

होइन सफल हमार, योजना मन पँचसाला।।


अल्प बचत योजना - (जन जागरण)

अल्प बचत के योजना, रुपया जमा कराव।

सौ के बारे साल मा, पौने दू सौ पाव।।

पौने दू सौ पाव, आयकर पड़ै न देना।

अपन बाल बच्चा के सेर बचा तुम लेना।।

दिही काम के बेरा मा, ठउँका  आफत के।

बनिस योजना तुम्हरे खातिर अल्प बचत के।।


विज्ञान – (आधुनिक विचार)

आइस जुग विज्ञान के , सीखो  सब  विज्ञान।

सुग्घर आविस्कार कर ,  करो जगत कल्यान।।

करो जगत कल्यान, असीस सबो झिन के लो।

तुम्हू जियो अउ दूसर मन ला घलो जियन दो।।

ऋषि मन के विज्ञान , सबो ला सुखी बनाइस।

सीखो सब  विज्ञान,   येकरे जुग अब आइस।।


टेटका – (व्यंग्य) 


मुड़ी हलावय टेटका, अपन टेटकी संग।

जइसन देखय समय ला, तइसन बदलिन रंग।।

तइसन बदलिन रंग, बचाय अपन वो चोला।

लिलय  गटागट जतका, किरवा पाय सबोला।।

भरय पेट तब पान-पतेरा-मां छिप जावय।

ककरो जावय जीव, टेटका मुड़ी हलावय।।


खटारा साइकिल – (हास्य)


अरे खटारा साइकिल, निच्चट गए बुढ़ाय।

बेचे बर ले जाव तो, कोन्हों नहीं बिसाय।।

कोन्हों नहीं बिसाय, खियागें सब पुरजा मन।

सुधरइया मन घलो हार खागें सब्बो झन।।

लगिस जंग अउ उड़िस रंग, सिकुड़िस तन सारा।

पुरगे मूँड़ा तोर, साइकिल अरे खटारा।।


अउ आखिर मा दलित जी के ये कुण्डलिया छन्द, हिन्दी भाषा मा -

नाम -

रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार।

अतः सभी का कर भला, है इसमें ही सार।।

है इसमें ही सार, यार तू तज के स्वारथ।

अमर रहेगा नाम, किया कर नित परमारथ।।

काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है।

किन्तु सुनाम सदा दुनिया में रह जाना है।।


छत्तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम "दलित" जी अपन पहिली कुण्डलिया छन्द संग्रह "सियानी गोठ" (प्रकाशन वर्ष - 1967) मा अपन भूमिका मा लिखे रहिन- "ये बोली (छत्तीसगढ़ी) मा खास करके छन्द बद्ध कविता के अभाव असन हवय, इहाँ के कवि-मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करें। स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देवें। ये बोली पूर्वी हिन्दी कहे जाथे। येहर राष्ट्र-भाषा हिन्दी ला अड़बड़ सहयोग दे सकथे। यही सोच के महूँ हर ये बोली मा रचना करे लगे हँव"। 


उंकर निधन 28 सितम्बर 1967 मा होइस, उंकर बाद छत्तीसगढ़ी मा छन्दबद्ध रचना लिखना लगभग बंद होगे। सन् 2015 के दलित जी के बेटा अरुण कुमार निगम हर छत्तीसगढ़ी मा विधान सहित 50 किसम के छन्द के एक संग्रह "छन्द के छ" प्रकाशित करवा के दलित जी के सपना ला पूरा करिन। आजकाल छन्द के छ नाम के ऑनलाइन गुरुकुल मा छत्तीसगढ़ के नवा कवि मन ला छन्द के ज्ञान देवत हें जेमा करीब 200 नवा कवि मन छत्तीसगढ़ी भाषा मा कई किसम के छन्द लिखत हें अउ अपन भाषा ला पोठ करत हें। 


आलेख - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़

गांधीवादी विचारधारा के हास्य - व्यंग कवि - कोदू राम दलित

 आज पुण्य तिथि मा विशेष


गांधीवादी विचारधारा के हास्य - व्यंग कवि - कोदू राम दलित 




जब हमर देश हा अंग्रेज मन के गुलाम रिहिस ।वो बेरा म हमर साहित्यकार मन हा लोगन मन मा जन जागृति फैलाय के गजब उदिम करय । हमर छत्तीसगढ़ मा हिन्दी साहित्यकार के संगे- संग छत्तीसगढ़ी भाखा के साहित्यकार मन घलो अंग्रेज सरकार के अत्याचार ला अपन कलम मा पिरो के समाज ला रद्दा देखाय के काम करिस ।छत्तीसगढ़ी के अइसने साहित्यकार मन मा लोचन प्रसाद पांडेय, पं. सुन्दर लाल शर्मा, पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, कुंजबिबारी चौबे ,प्यारे लाल गुप्त, अउ स्व. कोदूराम दलित के नाम अब्बड़ सम्मान के साथ लेय जाथे ।येमा विप्र जी अउ दलित जी हा मंचीय कवि के रुप मा घलो गजब नांव कमाइन। छत्तीसगढ़ी मा सैकड़ो कुंडलिया लिखे के कारण वोला छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय कहे जाथे।


जन कवि कोदू राम दलित के जनम बालोद जिले अर्जुन्दा ले लगे गांव टिकरी मा 5 मार्च 1910 मा एक साधारण किसान परिवार मा होय रिहिन । उंकर ददा के नांव राम भरोसा रिहिस। उंकर सुरुआती शिक्षा अर्जुन्दा म होइस। वोकर बाद नार्मल स्कूल रायपुर अउ नार्मल स्कूल बिलासपुर म पढ़ाई करिन।

पढ़ाई पूरा करे के बाद दलित जी ह  प्राथमिक शाला दुर्ग म मास्टर बनिस । फेर बाद म उहां के प्रधान पाठक के दायित्व ल सुघ्घर ढंग ले निभाइस।1931 ले 1967 तक शिक्षा विभाग म सेवा दिस।


बचपन ले वोकर रुचि साहित्य डहर राहय। 1926 ले लेखन कारज के सुरुआत करिस।  ग्राम अर्जुन्दा के आशु कवि पिला राम चिनोरिया ह वोकर कविता लेखन के प्रेरणा स्त्रोत रिहिन। 


दलित जी ह अपन परिचय ल सुघर ढंग ले कुंडलियां म दे हावय-


लइका पढ़ई के सुघर, करत हवंव मैं काम ।

कोदूराम दलित हवय मोर गंवइहा नाम ।।

मोर गंवइहा नाम, भुलाहू झन गा भइया ।

जनहित खातिर गढ़े हवंव मैं ये कुंडलियां ।।

शउक महूँ ला घलो हवय, कविता गढ़ई के ।

करथव काम दुरुग मा मैं लइका पढ़ई के ।।


दलित जी  ह हास्य- व्यंग्य के हिट कवि रिहिन हे ।  वोकर समकालीन मंचीय कवि मन म विप्र जी, पतिराम साव,शिशु पाल, बल्देव यादव, निरंजन लाल गुप्त,दानेश्वर शर्मा रिहिन।


उंकर कविता के उदाहरण आजो छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के सुरुआत म दे जाथे -


जइसे मुसवा निकलथे बिल ले।

वइसने कविता निकलथे दिल ले।।


शोषण करइया मन के बखिया उधेड़ के रख देय ।दिखावा अउ अत्याचार करइया मन ला वोहा नीचे लिखाय कविता के माध्यम ले कइस अब्बड़ ललकारथे वोला देखव –


ढोंगी मन माला जपयँ, लमभा तिलक लगायँ।

हरिजन ला छूवय नहीं, चिंगरी मछरी खाय ।।

खटला खोजो मोर बर, ददा बबा सब जाव ।

खेखरी साहीं नहीं, बघनिन साहीं लाव ।।

बघनिन साहीं लाव, बिहाव मैं तब्भे करिहों ।

नई ते जोगी बनके तन मा राख चुपरिहौं ।।

जे गुण्डा के मुँह मा चप्पल मारै फट ला ।

खोजो ददा बबा तुम जा के अइसन खटला ।।


ये कविता के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नारी मन के स्वभिमान ला सुग्घर ढंग ले बताय गेहे । संगे संग छत्तीसगढ़िया मन ला साव चेत करिन कि एकदम सिधवा बने ले घलो काम नइ चलय ।अत्याचार करइया मन बर डोमी सांप कस फुफकारे ला घलो पड़थे ।


दलित जी के कविता मा गांव डहर के रहन सहन अउ खान पान के गजब सुग्घर बखान देखे ला मिलथे –


भाजी टोरे बर खेतखार औ बियारा जाये ,

नान नान टूरा टूरी मन धर धर के ।

केनी, मुसकेनी, गंडरु, चरोटा, पथरिया,

मंछरिया भाजी लाय ओली ओली भर के । ।

मछरी मारे ला जायं ढीमर केंवटीन मन,

तरिया औ नदिया मा फांदा धर धर के ।

खोखसी, पढ़ीना, टेंगना, कोतरी, बाम्बी, धरे ,

ढूंटी मा भरत जायं साफ कर कर के ।।


दलित जी गांधीवादी विचारधारा के साहित्यकार रिहिन।गांधी जी के गुनगान करत उंकर रचना देखव -

सबो धरम अउ सबो जात ला,एक कड़ी म जोड़े।

अंगरेजी कानून मनन ला, पापड़ सही तोड़े।।

चरखा-तकली चला -चला के, खद्दर पहिने ओढ़े।

धन्य बबा गांधी,सुराज ला लेये तब्भे छोड़े।।


देस के अजादी बर सहीद होवइया सपूत मन बर लिखे हावय -


फांसी म झूलिस भगत सिंह,

होमिस परान नेता सुभाष।

अउ गांधी बबा अघात कष्ट,

सहि -सहि के पाइस सरगवास।

कतको बहादुर मरिन- मिटिन,

तब ये सुराज ल सकिन लाय।

बहुजन हिताय बहुजन सुखाय...।।


अजादी के समय के नेता अउ आज के नेता के तुलना करत उंकर रचना म व्यंग्य के धार देखव -


तब के नेता काटे जेल ।

अब के नेता चौथी फेल।।

तब के नेता गिट्टी फोड़े।

अब के नेता कुर्सी तोड़े।।

तब के नेता लिये सुराज।

अब के पूरा भोगैं राज।।


दलित जी ह हमर छत्तीसगढ के दसा पर कलम चलाके पीरा ल व्यक्त करे के संगे- संग बताय हावय कि काबर पिछड़े हे-

छत्तीसगढ़ पैदा करय, अब्बड़ चांउर

दार।

हवयं लोग मन इहां,सिधवा अउ उदार।।

सिधवा अउ उदार हवयं,दिन -रात कमावयं।

दे दूसर ल मान,अपन मन बासी खावयं।।

ठगथयं ये बपुरा मन ला बंचक मन अब्बड़।

पिछड़े हवय अतेक,इही कारण छत्तीसगढ़।।


दलित जी खादी कुर्ता,पायजामा अउ गांधी टोपी पहनय।हाथ म छाता पकड़े राहय। साहित्य साधना म अत्तिक रम जाय कि खाना- पीना अउ सोवई के ठिकाना नइ राहय। साहित्य साधना म एक मजदूर जइसे पसीना बहाय।उंकर रचना आठ सौ के लगभग हे। हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी म बरोबर ढंग ले लिखिस। पद्म के संगे -संग गद्य म कलम चला के अपन एक अलग पहिचान बनाइस। हिंदी साहित्य समिति दुर्ग के मंत्री पति राम साव के सहयोग ले 1967 म उंकर रचना "सियानी गोठ" प्रकाशित होइस।येमा उंकर 76 हास्य व्यंग के कुंडलियां सामिल हावय। स्थिति अइसन नइ रिहिन कि अपन सबो रचना ल किताब के रूप म प्रकाशित करवा सकय। जीते जियत एके किताब छप पाइस।

बाद म सन् 2000 म "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" फेर "छनन छनन पैरी बाजे " ह प्रकाशित होइस।

दलित जी के आने रचना म कनवा समधी,अलहन,दू मितान,हमर देस, कृष्ण जन्म,बाल निबंध,कथा- कहानी,

छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार अउ लोकोक्ति

सामिल हावय।उंकर रचना कई ठन अखबार  म प्रकाशित होइस। आकाशवाणी भोपाल, इंदौर, नागपुर अउ रायपुर ले उंकर कविता अउ लोक कथा के प्रसारण होइस। दलित जी ह उज्जैन म आयोजित सिंहस्थ मेला म कविता पाठ करिन। वोहा कवि सम्मेलन के अब्बड़ मयारू कवि रिहिन। हमर छत्तीसगढ म कवि सम्मेलन म जब हिंदी कवि मन के दबदबा रिहिस वो बेरा म घलो दलित जइसे कुछ कवि मन छत्तीसगढ़ी के धाक जमाइस अउ श्रोता वर्ग ले अब्बड़ तारीफ पाइस। उंकर रचना म ग्रामीण जन जीवन के सुघ्घर चित्रण ,

  देसभक्ति , गांधीवादी विचारधारा के दरसन  होय। शिष्ट हास्य - व्यंग ले भरपूर रचना के कारण कवि सम्मेलन म छा जाय।














दलित जी हा 28 सितंबर 1967 मा अपन नश्वर शरीर ला छोड़ के सरगवासी होगे ।


दलित जी के सपूत अरुण कुमार निगम जी हा अपन पिता जी के रद्दा ल सुग्घर ढंग ले अपना के साहित्य सेवा करत हावय । संगे संग” छंद के छंद “जइसे साहित्यिक आंदोलन के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ के नवा पीढ़ी के साहित्यकार मन ला छंद सिखा के सुग्घर ढंग ले छंदबद्ध रचना लिखे बर प्रेरित करत हावय त दूसर कोति" छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर ग्रुप" के माध्यम ले ग्रुप एडमिन के भूमिका ल सुघ्घर ढंग ले निभावत छत्तीसगढ़ी के गद्य विधा ल पोठ करे बर साहित्यकार मन ल प्रेरित करत हावय। उंकर ब्लाग "छंद के छ पद्य खजाना "अउ "छंद के छ गद्य खजाना" के माध्यम ले सुघ्घर ढंग ले रचना मन संरक्षित होवत हे जेला आने देस के लोग मन घलो पढ़त हावय। येहर एक एक पुत्र द्वारा अपन साहित्यकार पिताजी ल सच्चा श्रद्धांजलि हरय। 

जन कवि, गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिहा दलित जी के दमाद रिहिन हे जउन ह अपन गीत के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ल जगाय के अब्बड़ उदिम करिन ।

आज दलित जी ला उंकर पुण्य तिथि मा शत् शत् नमन हे.


       सुरगी, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़,)

जनकवि कोदूराम 'दलित' के काव्य मा चउमास-*

 *जनकवि कोदूराम 'दलित' के काव्य मा चउमास-*


(पुण्यतिथि बिसेस- 28 सितंबर)

साहित्यिक तर्पण-


छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय के नाव ले प्रसिद्ध गाँधीवादी भावधारा के कवि कोदूराम 'दलित' हास्य व्यंग्य के बेजोड़ कवि रिहिन।  'दलित' जी के लेखन 1926 के शुरू होके 1967 तक चलिस। लेखन के शुरुआत मा देश मा सुराज बर लड़ाई जारी रिहिस।


'दलित' जी के काव्य कला के कमाल आय कि ओमन हिंदी के छन्द मा छत्तीसगढ़ी कविता लिखय। उँकर हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी दूनो मा बरोबर अधिकार रिहिस। फेर उँकर छत्तीसगढ़ी मा काव्य रचना ज्यादा हे। कवि के काव्य मा राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता भावना, देशप्रेम, जनजागरण, अनिवार्य शिक्षा, खादी ग्रामोद्योग, सहकारिता, मद्य निषेध, खेती-किसानी के संग प्रकृति वर्णन के दर्शन घलो होथे। 


     'दलित' जी किसान परिवार में जन्म होय के सेती खेती-किसानी ला करीब ले जाने। येकर सेती उँकर काव्य मा प्रकृति चित्रण के अलगे रूप देखे ला मिलथे। चउमास लगे के शुरुआती भाव ला देखव-  


"घाम दिन गइस, आइस बरखा के दिन।

सनन-सनन चलै पवन लहरिया।

छाये रथे अकास-मां चारों खूँट धुवाँ साहीं।

बरखा के बादर निच्चट करिया।"


    बरसा ऋतु मा पानी के गिरे के बाद किसान अपन नांगर अउ बइला लेके खेत मा धान बोय ला चल देथे। मनमाड़े करमा-ददरिया झोरत झड़ी मा घलो अपन बुता मा मगन हो जथे-


"नाँगर चलायँ, खेत जा-जाके किसान मन।

बोय धान-कोदों गायँ करमा-ददरिया।

कभी नहीं ओढ़े छाता, उन झड़ी-झाँकर-मां।

कोन्हों ओढ़ें मोरा, कोन्हों कमरा खुमरिया।"


   पानी घरी रात-बिकाल के अब्बड़ जीव-जंतु, कीरा-मकोरा मन निकल जथे। जिंकर मन ले बच के घलो रेहे ल पड़थे। उँकर वर्णन करत कवि लिख के चेतात हवे-


"बाढ़िन गजब माँछी, बत्तर कीरा औ 'फाँफा'।

झिंगुरवा,किरवा,गेंगरुवा,असोढिया।

पानी-मां मउज करें-मेंचका, भिंदोल घोंघी।

केंकरा, केछुवा,जोंक,मछरी अउ ढोंढिया।"


    कवि के काव्य मा खेत-खार, मेड़-पार अउ भर्री-भांठा मा बोय जाने वाले फसल के संगे-संग चौमास के तिहार मन के घलो सुघ्घर वर्णन हवे-


"धान-कोदों,राहेर,जुवारी-जोंधरी, कपसा।

तिली, सन-वन बोये जाथें इही ऋतु मां।

हरेली, नागपंचमी, राखी, आठे, तीजा-पोरा।

गनेस-तिहार,सब आथें इही ऋतु मां।"


    बरसात मा घर के बारी-बखरी मा अपन खाय बर साग-भाजी बोय के व्यवस्था गॉंव मा आजो होथें। जेकर ले बाजार के मंहगाई ले चार महीना निकल जाथे। इही बात ला बतात कवि के पंक्ति ला देखव-


"माँदा-माँ बोये हें भाँटा, रमकेरिया,मुरई।

चुटछुटिया, मिरची खातू डार-डार के।

करेला, तरोई, खीरा, सेमी, बरबट्टी अउ।

ढेंखरा गढ़े हवयँ कुम्हड़ा के नार के।"


     बरसात के चार महीना तो बखरी के साग-भाजी ले निकल जथे। फेर आघू डहन के बेरा बर घलो साग-पान तो लगबे करही। उँकर व्यवस्था ग्रामीण अंचल मा रखिया, तुमा के बरी अउ कुम्हड़ा ला कई दिन के रखके साग के व्यवस्था रखे जाथे। कवि के पंक्ति देखव-


"घर-घर रखिया, तूमा, डोंड़का, कुम्हड़ा के।

जम्मो नार बेंवार-ला छानी माँ चढायँ जी।

धरमी-चोला-मन पीपर बर गसती  'औ'।

आमा,अमली,लीम के बिरवा लगायँ जी।"


     'दलित' जी के काव्य मा चौमास के अइसन रूप हम ला देखे बर मिलथे। जेमा कवि के नजर मा धरती अउ हमर आसपास मा बरसात आये के पीछू के परिवर्तन ह छूट नइ पाय हे। सबले बने बात तो एमे कवि वृक्षारोपण बर घलो चेत करत हावे। जे उँकर प्रकृति प्रेमी होय के बात ला जाहिर करत हे।


         कोदूराम 'दलित' समाज अउ देश बर सचेत करइया कवि रिहिन।  बापूजी के बिचार ला धरके गाँव, समाज अउ देश ला आघु लाय के सपना  देखिस। अउ ओला पूरा करे बर सही रद्दा घलो बताइस। किसान, मजदूर मन ला खेती के काम बने चेत लगाके करे बर, संगे-संग खदान अउ कारखाना मा उत्पादन बढ़ाय बर जोर देइस। ताकि कड़ी मेहनत के उदिम ले देश के उत्तरोत्तर विकास होवय।


जनकवि कोदूराम 'दलित' के 57 वीं पुण्यतिथि मा डंडासरन पैलगी...🙏🌹🌷🌻


हेमलाल सहारे

मोहगाँव(छुरिया)

राजनांदगाँव

संघर्ष ले उपजे जनकवि : कोदूराम "दलित"

 *28 सितम्बर, पुण्यतिथि विशेष*


संघर्ष ले उपजे जनकवि : कोदूराम "दलित"

                               

छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय के नाम ले मशहूर जनकवि कोदूराम "दलित" जी के जन्म 5 मार्च 1910 के ग्राम-टिकरी (अर्जुन्दा) जिला दुर्ग के  साधारण किसान परिवार म होय रहिस। किसान परिवार म पालन पोषण होय के कारण पूरा बचपन किसान अउ बनिहार के बीच म बीतिस।  ।आजादी के पहिली अउ बाद उन कालजयी सृजन करिन। समतावादी विचार,मानवतावादी दृष्टिकोण अउ यथार्थवादी सोंच के कारण आज पर्यन्त उन प्रासंगिक बने हवय।


दलित जी के कृतित्व मा खेती किसानी के अदभुत चित्रण मिलथे। खेती किसानी ल करीब से देखे अउ जिये हवय येकर सेती उँकर गीत म जीवंत चित्रण मिलथे :- 

पाकिस धान-अजान,भेजरी,गुरमटिया,बैकोनी,

कारी-बरई ,बुढ़िया-बांको,लुचाई,श्याम-सलोनी।

धान के डोली पींयर-पींयर,दीखय जइसे सोना,

वो जग-पालनहार बिछाइस,ये सुनहरा बिछौना।

दुलहिन धान लजाय मनेमन, गूनय मुड़ी नवा के,

आही हंसिया-राजा मोला लेगही आज बिहा के।


स्वतंत्रता आंदोलन के बेरा लिखे उँकर प्रेरणादायी छन्द -

अपन देश आजाद करे बर,चलो जेल सँगवारी,

कतको झिन मन चल देइन,आइस अब हमरो बारी। 

गाँधीजी के विचारधारा ले प्रभावित अंग्रेजी हुकूमत  खिलाफ साहित्य ल अपन हथियार बनाईन शिक्षक रहिन तभो ले लइका मनके मन मे स्वतंत्रता के अलख जगाय खातिर राउत दोहा लिख-लिख के प्रेरित करिन :-

हमर तिरंगा झंडा भैया, फहरावै असमान।

येकर शान रखे खातिर हम,देबो अपन परान।


अपन मन के उद्गार ल बेबाक लिखइया दलित जी के रचना मन कबीर के काफी नजदीक मिलथे। जइसन फक्कड़ अउ निडर कबीर रहिन वइसने कोदूराम दलित जी। समाज म व्याप्त पाखण्ड के उन जमके विरोध करिन। एक कुण्डलिया देखव :- 

ढोंगी मन माला जपैं, लम्हा तिलक लगायँ ।

हरिजन ला छीययँ नहीं,चिंगरी मछरी खायँ।।

चिंगरी मछरी खायँ, दलित मन ला दुत्कारैं।

कुकुर – बिलाई ला  चूमयँ – चाटयँ पुचकारैं।

छोड़ - छाँड़ के गाँधी के, सुग्घर रसदा ला।

भेद-भाव पनपायँ , जपयँ ढोंगी मन माला। 


कोदूराम "दलित" ला जनकवि कहे के पाछू खास वजह ये भी हवय कि उँकर रचना म आम जनता के पीरा हे,आँसू हे,समस्या हे। उँकर कविता सुने के बाद आम अउ खास दूनो मनखे प्रभावित होय बिना नइ रह सकिस। उँकर कविता लोगन मन ला मुँह जुबानी याद रहय । उँकर रचना  समाज म व्याप्त बुराई उपर सीधा चोट करय। जेन भी बात उन लिखिन बिना कोई लाग लपेट के सीधा-सीधा कहिन। छत्तीसगढ़िया के पीरा ल दलित जी अपन जीवनकाल म उकेरिन जेन आज भी प्रासंगिक हवय। उँकर लिखे एक एक शब्द छत्तीसगढ़िया मनखे के हक के बात करथे :-

छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर दार।

हवय लोग मन इहाँ के, सिधवा अउ उदार।।

सिधवा अउ उदार, हवयँ दिन रात कमावयँ।

दे दूसर ला भात , अपन मन बासी खावयँ।

ठगथयँ बपुरा मन ला , बंचक मन अड़बड़।

पिछड़े हवय अतेक, इही करन छत्तीसगढ़।


कवि हृदय मनखे प्रकृति के प्रति उदात्त भाव रखथे काबर कि उँकर मन बहुत कोमल होथे । दलित जी के प्रकृति प्रेम घलो ककरो ले छुपे नइ रहिस। उँकर घनाक्षरी मा प्रकृति के अदभुत चित्रण अउ संदेश मिलथे:-

बन के बिरिच्छ मन, जड़ी-बूटी, कांदा-कुसा

फल-फूल, लकड़ी अउ देयं डारा-पाना जी ।

हाड़ा-गोड़ा, माँस-चाम, चरबी, सुरा के बाल

मौहां औ मंजूर पाँखी देय मनमाना जी ।

लासा, कोसा, मंदरस, तेल बर बीजा देयं

जभे काम पड़े, तभे जंगल में जाना जी ।

बाँस, ठारा, बांख, कोयला, मयाल कांदी औ

खादर, ला-ला के तुम काम निपटाना जी ।


विद्यालय कइसन होना चाही दलित जी जे सपना रहिस उँकर कविता मा साफ झलकथे-

अपन गाँव मा शाला-भवन, जुरमिल के बनाव

ओकर हाता के भितरी मा, कुँआ घलो खनाव

फुलवारी अउ रुख लगाके, अच्छा बने सजाव

सुन्दर-सुन्दर पोथी-पुस्तक, बाँचे बर मंगवाव ।


खादी के कुर्ता, पायजामा,गाँधी टोपी अउ हाथ मा छाता देख के कोनो भी मनखे दुरिहा ले दलित जी ल पहिचान लय। हँसमुख अउ मिलनसार दलित जी के रचना संसार व्यापक रहिस। गांधीवादी विचार ले प्रेरित होय के कारण सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के संदेश अक्सर अपन रचना म दँय। हास्य व्यंग्य के स्थापति कवि होय के कारण समाज के विसंगति ल अपन व्यंग्य के हिस्सा बनावय। राजनीति उपर उँकर धारदार व्यंग्य देखव- 

तब के नेता जन हितकारी ।

अब के नेता पदवीधारी ।।

तब के नेता काटे जेल ।

अब के नेता चौथी फेल ।।

तब के नेता लिये सुराज ।

अब के पूरा भोगैं राज ।।


दलित जी अपन काव्य-कौशल ला केवल लिख के हे नहीं वरन् मंच मा प्रस्तुत करके घला खूब नाव बटोरिन। अपन बेरा मा मंच के सरताज कवि रहिन। सटीक शब्द चयन, परिष्कृत भाखा अउ रचना मन व्याकरण सम्मत रहय जेकर कारण उँकर हर प्रस्तुति प्रभावशाली अउ अमिट छाप छोड़य ।कविता काला कहिथे येकर सबसे बढ़िया अउ सटीक परिभाषा दलित जी के ये मात्र दू लाइन ल पढ़ के आप समझ सकथव : - 

जइसे मुसुवा निकलथे बिल से,

वइसने कविता निकलथे दिल से।


छत्तीसगढ़ी कविता ल मंचीय रूप दे के श्रेय पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी "विप्र" अउ कोदूराम "दलित" ला जाथे। 50 के दशक म दलित जी के छत्तीसगढ़ी कविता के सरलग प्रसारण आकाशवाणी भोपाल, इंदौर,ग्वालियर अउ नागपुर ले होइस जेकर ले छत्तीसगढ़ी कविता ल नवा ऊँचाई मिलिस। समाज सुधारक के रूप में दलित जी के संदेश अतुलनीय /अनुकरणीय हवय :-

भाई एक खदान के, सब्बो पथरा आँय।

कोन्हों खूँदे जाँय नित, कोन्हों पूजे जाँय।।

कोन्हों पूजे जाँय, देउँता बन मंदर के।

खूँदे जाथें वोमन फरश बनयँ जे घर के।

चुनो ठउर सुग्घर मंदर के पथरा साँही।

तब तुम घलो सबर दिन पूजे जाहू भाई ।।


दलित जी के कुल 13 कृति के उल्लेख मिलथे जेमा- (१) सियानी गोठ (२) हमर देश (३) कनवा समधी (४) दू-मितान (५) प्रकृति वर्णन (६)बाल-कविता - ये सभी पद्य में हैं. गद्य में उन्होंने जो पुस्तकें लिखी हैं वे हैं (७) अलहन (८) कथा-कहानी (९) प्रहसन (१०) छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ (११) बाल-निबंध (१२) छत्तीसगढ़ी शब्द-भंडार (13) कृष्ण-जन्म (हिंदी पद्य) फेर दुर्भाग्य से उँकर जीवनकाल में केवल एक कृति- "सियानी-गोठ" ही प्रकाशित हो सकिस जेमा  ७६ हास्य-व्यंग्य के कुण्डलियाँ संकलित हवय। बाद में बहुजन हिताय बहुजन सुखाय‘ अउ ‘छन्नर छन्नर पैरी बाजे‘ के प्रकाशन होइस। विलक्षण प्रतिभा के धनी लगभग 800 ले आगर रचना करे के उपरांत भी दलित जी आज भी उपेक्षित हवय ये छत्तीसगढ़ी साहित्य बर दुर्भाग्य के बात आय।  प्रचुर मात्रा म साहित्य उपलब्ध होय के उपरांत भी  दलित जी उपर जतका काम होना रहिस वो आज पर्यन्त नइ हो पाय हवय। कभू कभू तो अइसन भी महसूस होथे कि पिछड़ा दलित समुदाय हा सदियों से जेन उपेक्षा के शिकार रहे हे उही उपेक्षा के शिकार दलित जी भी होगे । 


दलित जी साहित्यकार के संग एक आदर्श शिक्षक, समाज सुधारक, अउ संस्कृत के विद्वान भी रहिन । उमन छत्तीसगढ़ी के संगे संग हिंदी के घलो शसक्त हस्ताक्षर रहिन दलित जी साक्षरता अउ प्रौढ़ शिक्षा के प्रबल पक्षधर रहिन। दबे कुचले मनखे मन के पीरा  लिखत दलितजी 28 सितम्बर 1967 के नश्वर देह ल त्याग के परमात्मा म विलीन होगे,फेर अपन रचना के माध्यम ले आज भी अपन मौजूदगी के अहसास कराथें । दलित जी के जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण अउ अभाव म बीतीस ,शायद येकरे कारण उमन अपन रचना के प्रकाशन नइ करवा पाइन। आज जरूरत ये बात के हवय कि नवा पीढ़ी उँकर साहित्य के प्रकाशन करवा के गहन अध्ययन भी करयँ। 


अजय साहू "अमृतांशु"

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

मो. 9926160451

कौव्वे का भोजन (लघुकथा )

 कौव्वे का भोजन (लघुकथा )

आज माँ का श्राद्ध है। राजीव परेशान है। पंडित जी ने कहा है गाय  और कोव्वे को खिलाना जरुरी है। गाय तो यहाँ रोज आती है पर कौव्वे ने तो शहर ही छोड़ दिया है।

रमा कहती है "तुम्हे याद है हम लोग पुरी जा रहे थे तो रास्ते में चाय पीने रूके थे वहाँ पर पीपल का पेड़ था। जिसमें सैकड़ो कौव्वे थे जो बहुत कांव कांव कर रहे थे।"

" अरे हाँ पर वह तो यहाँ से करीब चालीस किलोमीटर दूर है।"

"अरे तो क्या हुआ? साल मे एक दिन की बात है। माँ ने हमको इतना प्यार दिया है तो उनके लिये इतनी दूर छाना कौन सी बड़ी बात है।" 

"चलो हम सब चलते हैं। यहाँ का काम निपटा देती हूँ। आप छुट्टी ले लो। पंडित के लिये खाना टिफिन में मंदिर में पहुँचा दो।"

"ठीक है चलो ग्यारह बजे निकलेंगे। खीर पुड़ी कुछ ज्यादा रख लेना। वहाँ किसी को बाँट भी देंगे।"

"हाँ, ठीक है"

रमा ने पंडित के लिये टिफिन तैयार किया। बड़ा पूड़ी, तोरई की सब्जी, भिंडी की सब्जी, दाल और भात। राजीव टिफिन उठा कर मंदिर चला गया। गाय का हिस्सा निकाल कर रख दी। गाय समय पर ही आती है। दस बजे गाय आई और उसके सामने पत्तल में भोजन रख दिये। दो पूड़ी उसके ऊपर खीर रखा जाता है। बड़ा और सब्जी दाल भात। पूरा भोजन आराम से खा कर गाय चली गई। वह रोज आती थी और एक रोटी खाकर चली जाती थी। 


दोनों पति पत्नी तैयार होकर दो तीन पत्तल और टिफिन में खाना रख कर कार से निकल जाते हैं।रास्ते में भी देख रहे थे कि कहीं कौव्वा थिख जाये पर आज तो जैसे कौव्वौं ने हड़तार कर रखी थी। जब उस ढाबे तक पहुँचे तब वहाँ कौव्वौ की तेज काँव काँव की आवाज आने लगी। 


राजीव अपनी कार रोक दिया। ढाबे वाले के पीछे आँगन में पेड़ था।राजीव ने ढाबे वाले से बात की तो उसने बोला आप पीछे आँगन में जाइये। दोनो पति पत्नि खाना लेकर जाते है जैसे ही फत्तल पर खाना  रखते हैं । कौव्वै पेड़ से एक एक उतरते जाते हैं और खाने लगते है। तीनों पत्तल में खाना रख देते हैं और एक किनारै बैठ कर देखते हैं। जब खाना खतम हो जाता है तो कौव्वे राजीव.के पास आ जाते है औऋ काँव काँव करते है। राजीव को लगता है कि माँ भूखी है उसे और खाना चाहिये। राजीव के आँखो से आँसू झरने लगते हैं।पति फत्नि दोनों हाथ पकड़ कर चुप खड़े रहते हैं। माँ का चेहरा सामने आ जाता है। जैसे माँ और खीर माँग रही है। यादों को समेटते दोनो वापस आ जाते है। कौव्वा संदेश वाहक है.वह.माँ को बतायेगा कि हमने अच्छे हे खाना खिलाया है। माँ के प्रति श्रद्धा बनी ही रहेगी।

सुधा वर्मा, 29/9/2024