Saturday, 14 February 2026

विद्रुपता मन ले आहत कवि-मन के पीरा आय - 'दिन म घलो ॲंधियार हवय'*


 *विद्रुपता मन ले आहत कवि-मन के पीरा आय - 'दिन म घलो ॲंधियार हवय'*


*संग्रह - दिन म घलो ॲंधियार हवय*

*रचनाकार - डॉ पीसी लाल यादव* 

*प्रकाशक - वैभव प्रकाशन रायपुर, छत्तीसगढ़* 

*वर्ष - 2025*

*कापीराइट - रचनाकार*

*पृष्ठ संख्या - 71*

*मूल्य - 200/ रुपये*

        डॉ. पीसी लाल यादव लोक संस्कृति के मर्मज्ञ हवॅंय। लोक संस्कृति ला लेके अपन लेखनी ले लोकजीवन के जम्मो ताना-बाना ला उकेरे मं उन मन लगे हवॅंय। अपन इही प्रयास मन ले उन कभू गद्य रचना रचथें। कभू लोकगीत मन ले ममहावत अपन गीत अउ कविता मन बर अपन कलम धरथें।  उॅंकर इही प्रयास मन मं एक हे, 'दिन म घलो ॲंधियार हवय'। जउन छत्तीसगढ़ी गीत, कविता अउ गजल मन के संग्रह के रूप मं प्रकाशित हे। अइसे उॅंकर गीत ला पारंपरिक गीत मन के श्रेणी मं रखे जाय त जादा बेहतर होही। उॅंकर गीत मन के सुर लोकजीवन के सुर आय। जउन मं श्रमशील लोक अपन अनुभव ले अपन गोठ बिना कोनो लाग-लपेट के रखथें। अइसन मं लोकगीत मन या लोक के सृजन ला साहित्य के शास्त्रीयता (शिष्ट साहित्य) के कसौटी मं कसई या परखई ह लोकजीवन के मनोभाव संग नियाव नइ होही। लोकजीवन अउ उॅंकर दिनचर्या ला कोनो भी विधा के शिल्प मं सॅंजोए के उदिम असंभव तो नइ हे फेर कठिन जरूर हावय। शिल्प मं जाय ले, ओकर भाव पक्ष कमजोर होय धर लेथे। 

       अइसे तो डॉ. पीसी लाल यादव के ए प्रयास सराहनीय भर नइ हे, बल्कि स्तुति के लाइक हे। भाव पक्ष सशक्त हे। डॉ पीसी लाल यादव के बारे मं ए कहई प्रासंगिक होही कि छत्तीसगढ़ी लोकजीवन बर उन मन लोक के धरती ऊपर लोक संस्कृति, लोक साहित्य और लोक कला रूपी नदिया मन ला संरक्षण देहे के बड़का बीड़ा उठाय हवॅंय। 

      'दिन म घलो ॲंधियार हवय' 2025 के आखिर मं प्रकाशित उॅंकर नवा कृति आय। शीर्षक ध्यान आकर्षित करथे।एमा आम जन के पीड़ा ला लेके उॅंकर संसो-फिकर हवय। ए संग्रह मा उॅंकर 51 रचना मन शामिल हवॅंय। गिनती के मुताबिक एहर अटल जी के सुरता कराथे। संगे संग 'जइसन मैंहा लिखत हॅंव, तइसने बस दिखत रहॅंव।' दिल की बात मं लिखे गे डाॅंंड़ घलो अटल जी के सुरता दिलाथे। जउन म ओमन लिखे रहिन कि .....मुझे इतनी ऊंचाई मत देना....।

      मोर नजर मं ए किताब लोक के ऊपर लिखे गे अउ लोक ला समर्पित हवय। पहलीच घलो कहे हवॅंव कि एमा शामिल जम्मो रचना मन ला शिष्ट साहित्य के मानक शिल्प मं कसना एकर संग नियाव नइ होही। लोक के रचना लोक बर लोक स्वर मं हे। इही एकर खासियत ए। 

      संग्रह के पहलीच दू डाॅंड़ प्रतीकात्मक रूप मं लोक जीवन बर बड़का संदेश देथे, जउन मं उन लिखे हवॅंय-

              बेरा-कुबेरा तैं आबे बादर।   

              तब कइसे तैं पाबे आदर।

      उॅंकर ए डाॅंड़ 'तुलसी वहाॅं न जाइए, जहाॅं न बरसे नैन।...' उन ला तुलसीदास जी के लोक धारा ले जोड़त नजर आथे। बादर ला पहुना रूप मं देखे ले संदेश अउ स्पष्ट हो जथे। 

     कहे गे हवय कि साहित्य मं प्रतिरोध के स्वर होना चाही। पटरी ले उतरत व्यवस्था ला पटरी मं लाने के जिम्मा साहित्य अउ साहित्यकार के होथे। ए संग्रह मं ए डहर इशारा हवय। 

दारू भट्टी भरोसा सरकार चलत,

उन्ना के दुन्ना जऊॅंहर भइगे।

    प्रकृति के मानवीकरण ए संग्रह मं भरपूर हे। प्रतीक मन के माध्यम ले डॉ पीसी लाल यादव अपन बात पाठक तक सहजता ले पहुॅंचात दिखथें जइसे -

बाज के डर शिकारी के डर।

सुवा चना ल फोलय नहीं।

      एमा बाज अउ शिकारी शोषक के प्रतीक हें त सुवा शोषित के।

      साहित्य के मूल स्वर ले जुरे डॉंड़ देखव, जेन मं कवि के पूछे प्रश्न यक्ष प्रश्न जनाथे।

एक घर हॅंड़िया परे हे लांघन।

दूसर कूद-कूद के देवे भासन।

गरीब कइसे आगू बढ़ही तहीं बता?


एक ठन अउ उदाहरण-

बड़े-बड़े सपना देखा के लूटथे कोई,

सरलग ठग फुसारी कब तक चलही। 


    संग्रह मं एक कोति गॅंवई जीवन मं आपसी प्रेम अउ सहकार के भाव के जीवन्त चित्रण हवय। लोक मं प्रचलित अनूठा चलन मन के झलक हें। उहें दूसर कोति कुछ लोगन के तीर्थ यात्रा ला लेके चुटीला व्यंग्य घलव हवय।

माली ल घलो जुच्छा नइ फेरे।

साग-पान धरके देथे परोसी।

    

दाई-ददा हवय तोर घर देवता।

बेकार हे तोर जात्रा पंचकोसी।


    मनखे के भीतर घटत मनखेपन ले आहत कवि के बोल ए तरह फूटे हवॅंय -

इरखा-बैर ह भोगावत हे रोज़,

दुबरावत हवय मीत-मितानी।


मिले के मिले ठगत हवे मनखे,

छल-कपट म सनाय मीठ बानी।


हाथ मा फूल अउ दिल मा आरी हे।

आज काल मिलत अइसने संगवारी हे।


दर्शन के भाव समेटे मं उन पीछू नइ हें। संग्रह ला पढ़े मं सबो के लइक कविता मिलथे। संवेदनशील मनखे ला समाज के पीरा ओकर अपन पीरा जनाथे। कवि ने 'नवा साल के बधई' गीत मं इही ला अभिव्यक्ति दे हवॅंय।


     संग्रह के मुख पृष्ठ आकर्षक हवय। शीर्षक के भाव घलाव उभर के आय हे। काग़ज के क्वालिटी बहुते बढ़िया हे। छपाई अच्छा होय हे। एक-दू जगह प्रूफ रीडिंग के कमी नजर आइस, जउन होना नइ रहिस। यहू बात हवय कि अर्थ नइ बिगड़े ले, एला नजरअंदाज करे जा सकथे। 

     गीत अउर ग़ज़ल काव्य के विधा हरे। जम्मो गीत अउ ग़ज़ल कविता माने जाथे फेर जम्मो कविता ला गीत या ग़ज़ल नइ कहे जा सकय। पारंपरिक गीत ला छोड़ देवन तौ गीत अउ ग़ज़ल के अपन शिल्प होथें, जेन मं ए संग्रह के जादातर रचना मन फिट नहीं बइठॅंय। अइसन मं ए संग्रह ला मोर नजर मं केवल काव्य संग्रह लिखना बेहतर होतिस। 

     भाषाई दृष्टि ले ध्वन्यात्मक शब्द, बिसरावत ठेठ छत्तीसगढ़ी अउ मुहावरा मन के प्रयोग ले संग्रह उच्च स्तरीय बन गे हावय।

    

     आखिर मं एक वाक्य मं अतके कहिहूॅं कि डॉ पीसी लाल यादव के ए संग्रह अपन समय के विद्रुपता मन ले आहत कवि मन के पीरा हरे।

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पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा 

छत्तीसगढ़

मो: 6261822466

नान्हें कहिनी ओखर खुसी

 नान्हें कहिनी

     ओखर खुसी

     दुलारी ह साग भाजी के टुकना बोहे कालोनी  डहर जात रहिस।ओला कालोनी  कोती जात देखत समारू ह कहिस-"कहाँ जावत हस ओ दुलारी ।कालोनी म कोनो तो तोर साग भाजी ल नी बिसाये ।कालोनी वाला मन तो हमर असन गली -गली म बेचाईया मन ले कुछु जिनिस नी बिसाये ।ओमन तो आन लाइन जिनिस बिसाथे।तै ओती काबर जावत हस?"

     दुलारी ह हांसत कहिस -"सही कहत हस भैय्या , फेर वो बारा नम्बर वाली मेम साहब हे न तेखर सियानिन सास ह  गांव ले आये हवे। ओहा अपन बालकनी म एके झि बैठे रहिथे।एक दिन मोला देखिस त बुलाइस अउ कहिस।आना ओ बेटी का धरे हस?अउ मोर सन बड़ बेरा ले गोठियाइस ।बताइस कि ओखर बहु-बेटा मन नउकरी करथे। दु झि पोता मन बिहनिया ले स्कूल चल देथे सांझ कुन ओमन आथे अउ अपन-अपन काम म लग जाथे।मेहा दिन भर अउ रात कन घलो अकेल्ला पड़ जाथो ।एखर ले बने मोर गांव रहिस है।उहाँ पारा परोस के मन घर म आवे-जावे।सुख-दुख गोठियावय।इहा सहर म जम्मो घर के दुवार फ़ईका मन बंद रहिथे।कोनो परोसिन एक दूसरे ले कोनो वास्ता नी राखे। सुन ओ बेटी तें हा आथस त दु घड़ी गोठिया लेथो त मोला बड़ खुसी होथे।

बस समारू भैय्या एखरे कारण मेहा सियानीन तीर ये कालोनी म जाथो ताकि सियानीन ल खुशी होय।ओखर चेहरा म खुसी देखके और सुकून देख के महुँ ल खुसी लागथे।"

          ये सुनके समारू कहिस- "बढ़िया काम करत हस ओ दुलारी बहिनी।अइसने सोच सबके होना चाहिये।"

             डॉ. शैल चन्द्रा

             रावण भाठा, नगरी

             जिला-धमतरी

            छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा लेड़गा के कड़ही वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी हास्य लोक कथा


लेड़गा के कड़ही

वीरेन्द्र ‘सरल‘

एक गांव म एक झन डोकरी रहय। डोकरी के एक झन बेटा रहय, गांव भर के मनखे ओला लेड़गा कहय। लेड़गा ह काम-बुता कुछु करय नहीं बस गोल्लर कस झड़के अउ गली-गली किंजरय। डोकरी बपरी ह बनी-भूती करके अपन गुजर-बसर करत रहय। 

       एक दिन डोकरी ह किहिस-‘‘ कस रे धरती गरू लेड़गा। अब तो तैहा जवान होगे हस अउ मोर जांगर थकगे हे। कहीं काम-धाम नइ करबे तब हमर गुजारा कइसे होही? तोर देहें पांव भर बाढ़े हे अक्कल-बुध ला घला बढ़ाके कुछु काम करबे तभे तो जिनगी चलही।

         फेर लेड़गा ह तो लेड़गा रहय। फकत नाम के नहीं बल्कि पक्का काम के घला। अपन संगी -जहुंरिया मन के बिहाव होवत देखे तब उहू ला अपन बिहाव करे के साध लागे। गांव म जेखर घर बिहाव होवय, उहां लेड़गा ह बिहाव के झरत ले अपन अड्डा जमा देवय। लेड़गा ह बिहाव के नेंग नत्ता ल बड़ा धियान से देखे तब सगा सोदर मन ओला तहु बिहाव कर ले कही के भड़का देवय।

   अइसने दूसर मन के भड़कौनी म आ के लेड़गा ह एक दिन अपन घर म जाके टुटहा खटिया ला बिछा के मुंहू फुलोय सुतगे।  

     ओखर दाई ह रोजी-मंजूरी करके घर अइस तब लेड़गा ल रिसाय देख के पुछिस-‘‘ कस रे गड़उना, आज काय होगे तेमे मुंहू फुलोय रिसाय हस।‘‘

       लेड़गा किहिस-‘‘गांव भर के सबो मोर जहुंरिया टुरा मन के बिहाव होगे हे। मोरे भर बांचे हे। गांव भर के मनखे मोला डिड़वा भगत कहिके भड़काथे। अब तैहा मोर बिहाव करबे तभे मेंहा जिंहू नहीं ते अन्न-पानी त्याग के मर जहूं।‘‘

    लेड़गा के गोठ ला सुनके, डोकरी के हँसई के मारे पेट फूलगे। डोकरी किहिस-‘‘ अरे लेड़गा तैहा नान-नान बात बर रिसा जथस। अरे, तोर संगवारी मन के बिहाव तो अभी होवत हे, मैहा तो तोर बिहाव ला तोर ननपन म कर दे हवं। अब तै सज्ञान होगे हस तब जा अउ बहुरिया ल लेवा के ले आ।"

              डोकरी ह लेड़गा के ससुरार के पता ठिकाना , नाव-गांव सब ला बता दिस। अपन बिहाव के बात सुनके लेड़गा खुश होेगे।

       बिहान दिन डोकरी ह चुनी-भुंसी के रोटी रांध दिस अउ मोटरी म जोर के लेड़गा ल दे दिस। लेड़गा अपन ससुरार गांव जाय बर घर ले निकलगे।

        बिहनिया के रेंगत-रेंगत लेड़गा ह संझाती अपन ससुरार घर म पहुँचिस। 

          दमाद बाबू दुलरू ला आय देख के ओखर सास-ससुर मन घला खुश होगे। रतिहा लेड़गा के सास ह बने बड़ा - भजिया, खीर - सोंहारी रांधिस अउ अम्मट म डुबकी-कड़ही के साग बना दिस।

     लेड़गा बाप पुरखा कढ़ी,  डुबकी-बफौरी के साग खाय नइ रिहिस । ओला डुबकी के साग अड़बड़ मिठाइस। लेड़गा ह अपन सास ल साग के नाव अउ एला बनाय के विधि पुछिस अउ मने मन गुनिस घर पहुँच के दाई ल अइसनेच साग रांधे बर कहूं अउ मनमाने झड़कहूं।     गोठ-बात करत रतिहा ह बीतगे।

          बिहान दिन लेड़गा ह गौना के बात करिस तब ओखर सास- ससुर मन किहिन-‘‘दमाद बाबू अभी तो हमन बेटी के जोखा-तोरा करे नइ हन। तुमन उदुप ले आय हव। थोड़किन समे अउ देवव। हमन बेटी के जोखा करके तुमन ला संदेश भेजबो तहन ले बर आ  जाहू।"     लेड़गा ह हव कहिके उहां ले घर आय बर निकल गे। 

बरसात के समय रहय रतिहा पानी गिरे रहय। रस्ता म चिखला माते रहय फेर लेड़गा के दिमाग म तो खाली कड़ही के साग रहय। ओहा नाव ल झन भुला जावं कहिके कड़ही-कड़ही कहत रस्ता रेंगत रहय।

        एक जगह मेड़ के मुंही पार ल कूद के नहकत लेड़गा बिच्छल के गिरगे अउ कड़ही के नाव ल भुलागे। लेड़गा ह समझिस साग के नाव ह इही मेरन गंवा गे। ओहा मुही के पानी म उतर के कड़ही के नाव ला खोजे लगिस। लेड़गा ला गजब बेरा ले कुछु खोजत देख के सब खेत के कमइय्या मन सकलागे। 

    एक झन किसान ह पूछिस-‘‘ काय गंवागे हे भैया। अड़बड़ बेर के खोजत हस।‘‘

     लेड़गा किहिस-‘‘अरे गोल-गोल ग बबा। पिंयरे-पिंयर रहिथे। उही ह गंवाय हे तउन ल खोजत हव।‘‘

        कमइय्या मन सोचिन-‘‘गोल-गोल, पिंयरे-पिंयर कथे बुजा ह। कहूँ सोन के डल्ला ल तो नइ गवांय होही? 

        सोन के डल्ला के लालच म सब कमइय्या मन घला खोजे बर भिड़गे। खोजत-खोजत ऊवत के बुड़त होगे। संझा होेइस अउ सब झन थकगे तब एक झन सियनहीन दाई कहिस-‘‘ ये मेरन के चिखला ह खोजई के मारे दही के मही कड़ही होगे ओ फेर काय गंवाय हे तउन ह मिलबे नइ करिस।

         कड़ही के नाव सुन के लेड़गा खुश होके नाचे लगिस अउ मिलगे-मिलगे कही के ऊंहा ले पल्ला भागिस। सब कमइय्या मन सोन के डल्ला ल झटकबो कहिके लेड़गा ल अउ़बड़ कुदाइस फेर अमराबे नइ करिन। लेड़गा ह कड़ही-कड़ही कहत भागगे। मोर कहानी पुरगे , दार भात चुरगे।

बोड़रा , मगरलोड

जिला-धमतरी, छत्तीसगढ़

नृत्य/नाच:- तब अउ अब

 नृत्य/नाच:- तब अउ अब


                     बर बिहाव, छट्ठी बरही, पार्टी सार्टी, भागवत, रमायण कस चाहे कुछु भी जुराव या मंगल के कार्यक्रम होय आज बिना नाच(नृत्य) के नइ होत हे। नृत्य जे युगों युगों ले चलत आवत हे, ता आज भला कइसे रुक जही। बल्कि आज तो दुनिया के लगभग 80-85% मनखें नाचत गावत दिखथें। एक जमाना रिहिस जब नचइया गिनती के राहय। सुनब मा आथे कि स्वर्ग लोक मा रम्भा, मेनका, उर्वशी, तिलोत्तमा कस गन्धर्व कन्या मन नाच करें, अउ उही मन ला पृथ्वी लोक मा घलो राजा अउ राक्षस मन अपन शक्ति के दम मा नचावै। खैर वो समय ला छोड़व। जब 1912 मा दादा साहब फाल्के फिलिम बनाए के सोचिस ता वो बेरा मा, उन मन चारो मुड़ा नृत्यांगना अउ फिलिम बर हीरोइन खोजिस, फेर उन ला निरासा हाथ लगिस, आखिर मा पुरुष कलाकार मन ही स्त्री पात्र के रोल करिन। एक दौर रिहिस जब नचई ला बने नइ समझे जावत रिहिस। अउ जे नाचे गावै तेला समाज मा घलो बने मान सम्मान नइ मिलत रिहिस। नोनी मन के शादी बिहाव मा घलो नचई गवई अड़ंगा डाल देवत रिहिस। फेर धीरे धीरे समाज स्वीकारत गिस अउ आज के स्थिति ला तो सब देखतेच हन।

                 लगभग 200 ईसापूर्व मा भरत मुनि नाट्य शास्त्र के रचना करे रिहिन, जिहाँ रंगमंच, नृत्य अउ संगीत के वर्णन मिलथे।  ऋग्वेद के श्लोक मन मा घलो नृत्य के वर्णन हे। प्राचीन वैदिक धर्म ग्रंथ मन मा देवी देवता मन ला घलो नृत्य करे के चित्रण करे गय हे। भगवान शंकर ला तो साक्षात नटराज घलो कहे जाथे।नृत्य करत नटराज के मूर्ति सहज दिखथे। महाभारत मा वर्णन हे, कि अर्जुन हा इंद्रलोक मा नृत्य अउ संगीत के शिक्षा लिए रिहिन। द्वापर युग मा भगवान कृष्ण अउ गोपी मन के द्वारा प्रस्तुत रास नृत्य के वर्णन मिलथे। नृत्यकला 64 कला मा अपन एक महत्वपूर्ण स्थान रखथे। एक मात्र भगवान कृष्ण ला सम्पूर्ण 64 कला मा पारंगत बताए गय हे।

                  वैदिक काल मा नृत्य, देवी देवता मनके आराधना अउ पूजा पाठ करत बेरा करे जावत रिहिस, फेर धीरे धीरे समय अनुसार जम्मों मंगल काज, ताहन फेर मनखें मन के मनोरंजन बर होय लगिस। मोहनजोदड़ो के खुदाई मा प्राप्त तांबा के मूर्ति मन के भाव भंगिमा ला देखे ले नृत्य के पुष्टि होथे। प्राचीन काल में नृत्य के एकमात्र उद्देश्य रिहिस- धार्मिक अउ आधात्मिक उद्देश्य के पूर्ति बर देवी देवता मन के नाच नाच आराधना अउ पूजा। जे शास्त्रीय नियम अउ लय ताल मा बँधाये रहय। भक्तिकाल में रामलीला अउ अउ कृष्णलीला कस कतको दैविक कथा ला नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करे के वर्णन मिलथे। समय बीतत राजा महाराज अउ मुगलकाल मा नृत्य राजदरबार मा मनोरंजन अउ सभा सदन के मन बहलाये बर होय लगिस। आज घलो विभिन्न अवसर मा नृत्य देखे बर मिलथे।

                  अलग अलग देश, राज अउ क्षेत्र के अलग अलग नृत्य देखब मा मिलथे। पहली भारतीय नृत्य कला के सिर्फ दुई रूप रिहिस शास्त्रीय नृत्य अउ लोक नृत्य। शास्त्रीय नृत्य मा भरतनाट्यम, कत्थक, कत्थक्कली, कुचिपुड़ी, ओड़िसी, मणिपुरी, मोहनीअट्टम,सत्रिया जइसन नृत्य शामिल हे, ता लोक नृत्य मा  भांगड़ा, गरबा, गिद्दा, चौ, लावणी, कर्मा, घूमर कस  नृत्य मन के नाम आथे। बॉलीवुड नृत्य मा ये दुनो के सम्मिश्रण ले विशेष शैली मा नृत्य होय लगिस। एखर आलावा समय के साथ साथ वैश्विक प्रभाव पड़त गिस, अउ  पश्चिमी नृत्य घर करत गिस। ब्रेक डांस,  हिपहॉप, स्विंग, कांट्रा कस कतको नृत्य देखे बर मिले लगिस। समकालीन नृत्य घलो भारतीय नृत्य मा झट झट समाहित होगे। जेमा बैले, जैज अउ आधुनिक नृत्य कस अउ कतको प्रकार नाच शामिल हे।

                   भाव(अभिव्यक्ति), राग(संगीत) अउ ताल(लय) ये तीनों के मधुर समन्वय बिन नृत्य नइ होय। सबे प्रकार के नृत्य के अलग अलग शैली होथे, जेमा भाव, राग अउ लय होबेच करथे। प्राचीन कालीन नृत्य मा चेहरा के भाव अउ हस्तमुद्रा प्रमुख रहय, फेर आज शरीर के अन्य अंग भी शामिल दिखथे।  धार्मिक, आध्यात्मिक ले चालू होके नृत्य मनोंरंजन के साथ साथ आज आकर्षण, ग्लैमर अउ व्यवसायिक होवत जावत हे। आधुनिकता के चकाचौंध मा नृत्य फूहड़ता कोती भागत हे। जे नाच ला देखत आध्यात्मिक अउ मानसिक सुख मिलत रिहिस, उहाँ आज काम वासना जाग्रत होवत हे। आज शारीरिक खुलापन, अउ बेढंग शारीरिक मुद्रा नृत्य के पारम्परिकता ला भंग करत हे। जे चिंतनीय हे। पहली नाच देखे बर मनखें तरस जावत रिहिस, कई कोस के दूरी लांघे के बाद नृत्य के आनंद मिले, उंहे आज सोशलमीडिया के दौर मा, घर बैठे रंग रंग के नाच देखे बर मिल जावत हे। नचइया अतका के देखइया घलो कमती हो जावत हे। नाचे मा छोटे, बड़े, बुढ़वा,  जवान सबे लगे हें, अउ एखर श्रेय जाथे इस्टाग्राम अउ रील ला। रील के चक्कर मा नृत्य के छाती मा खील गोभावत हे। मन ला मोहित करइया अउ परम् शांति प्रदान करइया नृत्य आज उत्तेजक, फूहड़ अउ मन ला अशांत करइया हो गय हे। अइसे भी नही कि सबे नाच मा अश्लिता हे। आज भी विशेष पोशाक अउ शैली के कतको नृत्य जस के तस प्रभावी हे, चाहे कत्थक होय, कुचीपुड़ी होय,ओड़िसी होय या कोनो लोक नृत्य, फेर आधुनिकता के छाप अब नृत्य के शैली, हाव भाव अउ भाव भंगिमा मा आघात करत हे।

                   गुण ज्ञान अउ कला कखरो भी होय यदि मनोभाव सकारात्मक हे, ता वो गुण, ज्ञान अउ कला ला देखत सुनत मन मा आनंद अउ सुख के संचार होबेच करथे, अउ यदि कहीं मनोभाव नकारात्मक हे, ता डाह घलो उपजत दिखथें। यदि वो डाह प्रतियोगिता ला जनम देवत हे, ता तो बने बात हे, फेर यदि टांग खिचई के उदिम होय लगथे, ता वो बड़ घातक हे। आजो कई  कलाकार नृत्य कला के ज्ञान पाय बर बड़ महिनत करत हे, कतको जघा सीखत पढ़त हें। कई ठन नृत्य अउ संगीत के विद्यालय अउ कोचिंग खुलगे हे, जिहाँ नृत्य सीखे के सरलग उदिम होवत हे। कला, साधना के नाम आय, अउ साधना साधे ले सधते। कला ला तपस्या घलो कहे जाथे, जेखर बर ईमानदारी, लगन अउ महिनत के जरूरत पड़थे। फेर आज कला मात्र देख देखावा अउ ग्लैमर के चीज बनत हे, चाहे नचई होय या फेर गवई। जे नही ते देखासीखी बेढंग कनिहा हलावत हे। सोसल मीडिया मा चढ़े डांस अउ अभिव्यक्ति के नशा देखत लाज लगथे। रील बनई के चक्कर मा बहू बेटी मन में मर्यादा अउ डांस के दायरा ला लांघत हें।

                   महतारी कतको भूख मरत रहै, भुखाय लइका के पेट भरत देख, परम् शांति अउ सुख के अनुभव करथे, अउ अपन भूख ला भूला जाथे। घर मा कोनो एक के तरक्की या नाम होय ले, न सिर्फ घर, बल्कि पूरा गाँव गर्व करे। कहे के मतलब मनखें दूसर के सुख अउ दुख ले आत्मीय भाव ले जुड़े रथे, अउ सुख दुख के अनुभव करथे। वइसने गीत संगीत सुने अउ नाच देखे मा परम् सुख मिलथे। आँखी अउ कान अइसन इंद्री आय के नृत्य और गीत संगीत ला मनखें के अन्तस् मा आनंद के अनुभूति करा देथे। देखना, सुनना भी एक कला आय, अउ ये माध्यम से भी आनंद के परम् अनुभूति होथे।  एक गवइया या एक नचइया हजारों करोड़ो के मन ला मोहित कर लेथे। फेर आज मनखें नचइया के संग खुदे नाचत दिखथें या बिन नाचे नइ रही सकत हे। बस कुछु नाचे के बहाना चाही ताहन घर भर कनिहा मटकाए बर धर लेथे। आज वो अनुभव के चीज ला खुदे करे ला धर लेहे। पहली नाचे ते समाज मा असहज महसूस करे, फेर आज जे नइ नाचे तेखर मरना हो जावत हे। इशारा मा नाचना या कठपुतली बनना मुहावरा ला तो सबे जानते हन। येला स्वीकारना बने बात नइ रहय। अइसन करना मतलब अपन आप ला झुका देना या स्वाभिमान ला बेच देना होय। शोले फिलिम मा गब्बर के आघू मा बसंती नाचे बर तैयार नइ रिहिस। बड़े मिया छोटे मिया फिलिम मा अमिताभ अउ गोविदा गुंडा के आघू नाचे बर अनाकानी करथे। कहानी, क्वीन, साहब बीबी और गुलाम, मदर इंडिया, राजी अइसन कतको फिलिम अउ हकीकत दृश्य हे, जिहाँ हीरो हीरोइन अउ मनखें मन गुंडा या कखरो आन के आघू मा नाचे बर या अपन स्वाभिमान बेचे बर मना करथें। फेर आज कोनो भी मनखें कही भी नाच देवत हे, वाह रे जमाना। शादी मा पहली नचइया लगाय जाय, अउ घर भर के मनखें सगा सोदर संग आनंद उठावय। आज घरे के मन सगा सोदर सुद्धा जे बेर पाय ते बेर रही रही के नाचत हें। भागवत, रमायण मा बेढंग ठुमका लगावत मनखें भला का वो पावन ग्रंथ के मरम ला पा पाही? पंडा, पंडित मन घलो नाच ला प्राथमिकता देवत हें। अपने अपन सब मिलजुल के नाचत कूदत हें, अइसन मा जोक्कड़, परी, नचइया अउ गवइया मन के पेट भरना मुश्किल हो जावत हे। नाचत हे ते तो ठीक हे, फेर कुछ भी नाचत हे, ते चिंतनीय हे। रील अउ नेम फेम अउ चंद पइसा के चक्कर मा मनखें मन गिरत जावत हे। छोटे बड़े के लिहाज नइहे। इस्टाग्राम अउ रील के चक्कर मा नचइया मनके बाढ़ आ गय हे। कोनो भी चीज होय, मर्यादा मा ही शोभा पाथे। जिहाँ मरियादा नइ रहय उहाँ इज्जत मान सम्मान के जघा नइ रहय। लाज रूपी चिड़िया आज विलुप्तप्राय होवत जावत हे। बेटी, बहू के फूहड़ नृत्य ला देख के, बाप,भाई अउ पति ऊपर का बीतत होही तेला उही मन जाने? फेर पूरा समाज तो मजा ले ले के देखत हें, यहू बात सही हें। व्यूह,लाइक अउ सब्सक्राब पाय बर आँय बाँय नाच आज निश्चित ही चिंतनीय विषय हे। पर्दा के चीज आज उघरत हे अउ उघरे के चीज तोपावत हे। कोन जन जमाना आघू बेरा मा नृत्य जइसन पाक कला ला अउ कतका गिराही? बहरहाल अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस के आप जम्मों ला सादर बधाई।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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"""""फकत नचइयाँ बाढ़गे""""


गवइया बजइया कमती होगे,

बढ़िया जिनिस तरी मा माढ़गे।

गांव लगत हे ना शहर लगत हे,

फकत नचइयाँ बाढ़गे-----------।


परी जोक्कड़ मन देख के दंग हें।

नचइया मन मा चढ़े जबर रंग हे।

बिन बाजा के घलो हाथ पांव हलात हें।

आ आ कहिके एला ओला बलात हें।।

नाचते नाचत जाड़,घाम अउ आसाढ़ गे।

गांव लगत हे------------------------।।


टूरा टूरी भउजी भैया ना बहू लगत हे।

एक जघा झूमत सब महू लगत हे।।

चुंहकत हें लाज शरम के फसल ला।

ढेंगा देखावत मा, छोड़  असल ला।।

नाचे संझा बिहना, रति रंभा ला पछाढ़गे।

गांव लगत हे------------------------।।


आज पर के नाच देख, कहाँ मजा आत हे।

नचनइया बनके नाचत हे, तभे मजा पात हे।।

मरनी भर ला छोड़, ताहन सब मा फकत नचई,

सोसल मीडिया मा तो, सबके आ गय हे रई।।

बरतिया कस धक्का मारे, झगड़ा लड़ई ठाढ़गे।

गांव लगत हे-------------------------------।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा

 सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा


                                सुरता आथे वो बेरा के, जब गाँव के घर,गली,खोर,कोठार, कोला, ब्यारा, बारी  रेडियो के गूँज मा गुंजायमान रहय। तन संग मन घलो रेडियो के गीत संगीत मा बिधुन  होके नाँचे। रेडियो के उहू सोनहा बेरा ला देखे हन जब, घर मा रेडियो नइ राहय ता संगी संगवारी या पारा परोसी घर के चौरा मा बइठ के संझा, बिहना अउ मंझनिया के कतकोन कार्यक्रम के आनंद लेवन। रेडियो ऐसे मनोरंजन के साधन रिहिस जे भले एक घर बजे फेर सुनात भर ले पारा परोसी सबके मनोरंजन करे। एक जमाना मा घरों घर रेडियो घर के कोठ मा अरवाय रहय। आकाशवाणी अउ आंचलिक स्टेशन ले हिंदी, अंग्रेजी अउ छत्तीसगढ़ी मा कतकोन कार्यक्रम आय। हिंदी छत्तीसगढ़ी गीत संगीत, खेती किसानी/ज्ञान विज्ञान/ परब तिहार, संस्कृति-संस्कार के गोठ, रोजगार के अवसर,खेल, समाचार, युवा/ नारी/ लइका अउ सियान मन के कार्यक्रम, नाटक,कहानी,कविता, रूपक,भाव,भजन,खेल कमेंट्री, ------- का का नइ सुनन रेडियों मा। ऐसे नही कि ये सब अब रेडियो मा नइ आय। आजो बरोबर अइसन कतको कार्यक्रम रेडियो मा आथे फेर नवा जमाना के नवा शोरगुल मा दबगे हे। नवा जमाना के नवा नवा ढेंचरा जुन्ना दौर के सोनहा सुरता ऊपर कुंडली मार के बइठ गय हे। रेडियो सुनत सुनत घर के बुता काम अउ बेरा कब बुलके पता नइ लगत रिहिस। सुरता आथे कुनकुन कुनकुन जाड़ के बेरा मा बजत रेडियो अउ बबा के फाँदे दौरी/बेलन। धान कोदो कब मिंजा जाय पता तको नइ चले। जाड़ घरी  कोठार बियारा मा काम कमई के बेरा मा, कमइयां मन बर रेडियो ताकती बरोबर काम करे। घर बनइया मिस्त्री, दर्जी, कुम्हार, लोहार, हजामत बनइया होय या एक जघा बइठ के सिधोय वाले अउ कतकोन काम, रेडियो सबके तीर रहय। पहली रेडियो सेल ले चले,ताहन बिजली ले अउ अब तो मोबाइल मा ही aap के माध्यम ले कतको चैनल संघरा मिल जावत हे, बस छुए करे भर के देरी हे, तभो मनखे मन के रुझान जादा नइ दिखे। चाहे लोकगीत संगीत होय या फिल्मी गीत संगीत/ गजल/ सुगम संगीत-------खांटी रेडियो सुनइया मन ला मुँहअखरा गीत, गीतकार, फिल्म, संगीतकार आदि के नाँव सुरता रहय। आजो जेन रेडियो के वो सोनहा बेरा ला जिये होही, वोखर जेहन मा रेड़ियो के मनभावन रिंगटोन अउ जुन्ना गीत संगीत अंतस जे कोनो कोंटा मा समाय होही। जेन स्टेशन के कार्यक्रम ला सुनना हे, वो स्टेशन के नम्बर मिलाय के अलगे आनन्द रहय। 

                     मनोरंजन, ज्ञान विज्ञान के संगे संग रेडियो घर बइठे राज भर मा संगवारी बना देवय। सुन के अटपटा लगत हे न, फेर ये सच हे। रेडियो मा लगभग सबे कार्यक्रम मा स्रोता मन के चिट्टी पाती आय। कतको नियमित स्रोता मन बरोबर चिट्टी भेजे, उंखर नाम गांव रेडियो के उद्घोषक संग अन्य स्रोता मन ला तको रटा जावत रिहिस।  कोनो गांव मा घुमत घामत जाय बर मिल जाय ता, नाम बताके पूछे मा वो स्रोता मिल घलो जात रिहिस। रेडियो  मोरो कतको झन संगवारी बनाइस, चाहे नवागढ़ मा होय, बालोद मा होय या बरदा लवन मा--- ------। कई बेर तो इही रेडियो संगवारी मन के सेती रद्दा बाट मा आय कोई अड़चन  सहज टर घलो जाय। महुँ रेडियो मा बरोबर चिट्टी लिखँव, उद्घोषक के मुख ले अपन नाँव सुनत अन्तस् अघा जावत रिहिस। उद्घोषक संग सबे स्रोता मन के मन ला आपस मा जोड़ के रखे रेडियो हा। स्रोता मन के सुझाव,शोर खबर, फरमाइस अउ  कतको कार्यक्रम रेडियो के चिट्ठी पाती कार्यक्रम मा आय, जे बड़ मनभावन लगे।

                       रेडियो के चढ़े दीवानगी राजभर मा चारो कोती दिखे। घर- दुवार, गली-खोर संग चाहे होटल ढाबा होय या खेत खार, नदी-ताल या फेर ठेला-मेला। कोई खीसा मा छोटे रेडियो धरके चले ता कोई  बड़े रेडियो ला छोड़े घलो नही। रेडियो सुनत मन मा आय कि रेडियो के वक्ता/कवि/कलाकार/ गायक आदि मन कतिक भागमानी होही जेन ला सरी जमाना शान ले सुनथे। मोर ननपन आकाशवाणी रायपुर के संग बीते हे। रामचरित मानस के दोहा- चौपाई, चौपाल, बालवाटिका, युगवाणी, घर आंगन, मोर भुइँया, गाँव गुड़ी, ग्राम सभा, फोन इन फरमाइस------ अउ कतको कार्यक्रम के रिंग टोन आजो अन्तस् मा गुंजत रथे। रेडियो मा सुने  छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी गीत मन कभू नइ भुलाये, न वो गीत के गीतकार, संगीतकार अउ गायक मन के नाम। मनोरंजन के जब कमती साधन रिहिस ता आकाशवाणी, दूरदर्शन, खेल मदारी, सर्कस----- आदि कतकोन चीज पूरा तन अउ मन ला रच के रंजित करे, आनन्दित करे। फेर जइसे जइसे मनोरंजन के साधन बढ़त गिस, मनोरंजन मन ल छोड़ सिर्फ नयन तक सिमट गिस। नवा जमाना के नवा चोचला मा अरझ रेडियो ले कइसे दुरिहाएंव मोला खुदे पता नइ चलिस?

                          मैं रेडियो मा आय के कभू सोचे घलो नइ रेहेंव, फेर जब तीन चार साल पहली आकाशवाणी बिलासपुर मा मोर कविता रिकार्डिंग होइस तब खुशी के ठिकाना नइ रिहिस। आज  सात आठ पँइत आकाशवाणी बिलासपुर अउ रायपुर  मा कविता/गीत/कहानी पढ़त गावत होगे। नियमित स्रोता के रूप मा खुद ला, आज नइ पाके आत्मग्लानि होथे। मोर ये हाल हे, ता आने ला का कहँव? तभो विश्वास हे जब दर्शन के चीज ले दिल भर जही ता एक घांव फेर श्रवण के वो सुनहरा दौर जरूर आही। भले नवा रूप मा ही सही। जइसे भाजी कोदई, काँदा कूसा, खोंधरा-झोपड़ी,पंगत, धोती कुर्ता कस कतको जुन्ना चीज नवा रूप मा मनखें मन के बीच आवत हे। अपन रंग रूप बदल, धीरे धीरे सबे बने चीज एक घांव अउ लहुटही, आखिर धरती गोल जे हे।

                          विश्व रेडियो दिवस के आप जमो ला सादर बधाई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

छत्तीसगढ़िया खोइला”

 “छत्तीसगढ़िया खोइला”




            वइसन तो छत्तीसगढ़ हा धान के कटोरा आय।इहाँ धान के उत्पादन हा शुरुच ले अबड़ेच कन होथे।तइहा जमाना 

मा सबके घर मा कोठी रहय जेमा धान ला रखे जाय।धान ,जोंधरी, जुआर, गहूँ, चना, लाखड़ी, तिवरा, सरसों ,अरसी,

तिल, राहेर, के फसल होवय।सबके घर के पाछू म बड़का कोला - बारी रहय जेमा अपन खाय के पुरतन साग भाजी करेला ,बरबट्टी,खीरा, पताल, रमकेलिया ,कुंदरू, लाल भाजी,धनियाँ, मेथी,निकल जावय।चौमास मा साग भाजी के बड़ किल्लत होवय काबर तइहा अभी कस वैज्ञानिक उन्नति नइ होय रिसिस ते पाय के ना घर मा फ्रिज रहय ना कोला खेत मा ट्यूबवेल रहय ।सिंचाई के साधन नई रहे ले गर्मी मा सब्जी नइ लगाय जा सके सिरिफ आलू अउ गोंदली हा बारो महीना मिलय।अब चार महीना ले दुनो जुआर आलूच ला तो नइ खाय जा सकय ना त हमर माइलोगन मन येखर बर उपाय करय जेला देशी जुगाड़ कहे जा सकथे। ये सुपर उपाय  हा  एक तरह ले  फूड प्रोसेसिंग आय जेमा कोनों रासायनिक पदार्थ ला नइ बउरयँ।ये आय हमर छत्तीसगढ़िया खोइला। खोइला साग के सुखरी ला कहे जाथे ।

            जाड़ के दिन मा सब साग भाजी मन सस्ता हो जाथे काबर कि ये समय मा साग भाजी के उत्पादन भरपूर होथे।अकाश साफ रहिथे अउ घाम घलौ बढ़िया रहिथे ता माई लोगन मन अलग अलग साग मन ला धो ,पोंछ के छोट छोट काट लेवय तहने वोला घाम मा सुखा देवय भांटा, करेला पताल ला सुखा लेवँय इही खोइला आय  सेमी,चुरचुटिया ला उसन लेय फेर बगरा देंवय सुखाय बर ।खोइला ला गर्मी मा साग राँधय।।खोइला के साग अब्बड़ मिठावय कच्चा सागेच कस लागय।तिंवरा भाजी,चनौरी भाजी,चना भाजी ला अइसने सुखा के धर लेवयँ जेला सुसका कहे जावय ।सुसका    भाजी ला दार अउ सुक्खा बोइर डार के राँधय ।इही जाड़ के दिन मा किसिम किसिम के बरी बनावय।रखिया,मखना,पपीता, मुरई, जिमीकान्दा,तुमा, के बरी बना के बढ़िया सुखा के सुक्खा डब्बा मा भर के राख लेवय जेला, मुनगा, झुनगा,आलू संग राँधय।उरिद दार के  पीठी मा रखिया बीजा,तिल अउ मसाला डार के बिजौरी बना लेवय जेला तेल मा छान के पापड़ कस भात  मा खावयँ  संग मा आमा के अथान राहय।अभी घलौ बरी,  बिजौरी बनाय के चलन गाँव मा हावय ।कच्चा आमा ला छोल अउ काट के सुखों देवय जेहाअमचूर कहे जावय गर्मी के दिन मा अमचूर डार के अम्मठ साग राँधय ।गर्मी मा अम्मठ साग  बोरे बासी संग अब्बड़ मिठाथे दू कौरा अकतिहा  खवाथे।बोइर के सुखरी करके राख लेवय ।सुक्खा बोइर ला कूट के गुड़,नून अउ लाल मिर्चा डार के पपची बना के सुखा देवयँ ये पपची हा अब्बड़ मिठावय।सुक्खा बोइर ला गुड़ नून डार के उसन लेंवय जेहा खटमधु लागय येला लइकन मन खेलत खेलत खा डारँय।पाके अमली ला सुखो के राखय जेहा चटनी बनाय के काम आवय।अमली डार के अम्मठ साग  बनाय जाय।अमली मा गड़,नून हरदी डार के राख लेवय जेला लइकन सियान सब खावयँ।अमली मा नून ,मिरचा ,लसून धनिया डार के कूट लेंवय येला छोट कन बाँस के लकड़ी मा लपेट के लाटा बनावय जेला सब चूस चूस के खावयँ।अमली लाटा के नाम सुनके सबके मुँह मा पानी आ जाथे। अइसने कच्चा तिंवरा ,चना अउ बटुरा ला पैरा मा भूँज लेवँय जेला होरा कहे जाये होरा हा सोंध सोंध  सावन भादों मा अब्बड़ मिठावय ।

   ये तरह ले हमन देखथन कि छत्तीसगढ़ मा तरह तरह के खोइला बना के राखे के अउ गर्मी के दिन मा साग भाजी के कमती ला पूरा करें  मा  तइहा के हमर छत्तीगढ़िया खोइला हा बड़ काम के चीज राहय।



चित्रा श्रीवास 

सिरगिट्टी बिलासपुर

छत्तीसगढ़

Tuesday, 10 February 2026

चुनाव लड़ई आज नइ हे बस के-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 चुनाव लड़ई आज नइ हे बस के-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                   चुनाव शब्द सुनत बने आदमी के माथा ठनक जाथे, काबर कि आजकल के चुनाव मा दुनिया भरके चोचला अउ शाम दाम दंड सबे देखे सुने बर मिलथे। फेर चुनावी रंग मा रंगे कतको मनखें मन भारी खुश दिखथें। रोज रोज नास्ता पानी, दारू मुर्गा, पइसा जे मिलथे। चुनाव हमर अधिकार अउ कर्तव्य घलो आय, येमा भाग लेना जरूरी हे। चुनाव शब्द ला यदि विच्छेद करके देखन ता "चुन आव" माने चुनाव। फेर आजकल तो चुन आव नही चुन लाव चलत हे। आव शब्द मा सादगी शालीनता विनम्रता ईमानदारी सोच घलो सकथन, फेर लाव मा एखर कल्पना ही बेकार हे। मोर कहे के मतलब कि प्रतिनिधि मन चुन के आवत नइहें बल्कि चुन के लाए जावत हे, वो भी पइसा दारू मुर्गा अउ किसम किसम के लोभ लालच द्वारा। जे जन प्रतिनिधि खर्चा करत हे, देख देखावा अउ हो हल्ला करत हें ओखरे दावेदारी दिखथे। जे आज के समय बर बड़ चिंतन के विषय हे। कतको झन मन काहत फिरथें कि एक घांव तो चुनाव के बेरा भर नेता मन जनता ला देथे, जनता तीर हाथ जोड़थे, ताहन छू मंतर हो जथे, ता उंखर ले पइसा कौड़ी अउ खर्चा पानी लेय मा का हरज?  फेर का हमर मत के कीमत सिर्फ एक पाव दारू, एक ठन मुर्गा, 500 पइसा या एक ठन साड़ी या सूट हे? नही न, ता काबर ये प्रलोभन ला हमन झोंकत हन? अउ हमर लेय के कारण ही दारू मुर्गा या पइसा बँटई के बीमारी बढ़ते जावत हे। आज के स्थिति परिस्थिति ला देखत काहन ता चुनाव माने धन बाँटना लुटाना फेसन बनगे हे। लोगन के नजर मा बाँटही तिही नेता आय। अइसन मा आम आदमी या कोनो गरीब आदमी तो चुनावे नइ लड़ सके। अउ अइसने होवत घलो हे। दू नम्बर के कमाई वाले या धनाढ्य मन तो चुनाव मा खर्चा कर सकथें फेर गरीब मन तो मर जही। कतकों मन खेत खार ला बेच भांज के घलो चुनावे लड़थें फेर यदि नइ जीत पाय ता मरना हो जथे। कई झन सज्जन अइसनो काहत दिख जथे कि जे जे देवत हे तेखर ला खाव अउ वोट मन के देव, फेर ये तो गलत आय न? अउ अइसन गलत ला फोकटे लालच रूपी गिधान पालके काबर बढ़ाना? सहज पंच, सरपंच, अउ पार्षद के चुनाव मा आज 10-15 लाख फूका जावत हे, सांसद विधायक के चुनाव ला छोड़। सबे अइसन कर सके यहू सम्भव नइहें, अइसन मा हम जनता मन खुदे अपन पैर मा कुल्हाड़ी मारत हन। जे दिही ते वसूलबे करही। चुनाव घरी हमन लालच मा रथन ताहन चुनाव के बाद, जीते प्रत्याशी लालच मा पड़ जथे। जीत गे तेखर तो बल्ले बल्ले हे, फेर जरा सोचव घर दुवार गिरवी रखके चुनाव मा हारे प्रत्याशी के का गत होवत होही? चुन आवत हे ता ठीक नही ते लागा बोड़ी के आरी मा चुनावत हे।  जीत तो एक ला मिलथे फेर बाकी मन तो दुच्छा हो जथे, अइसन सदमा ले कतको प्रत्याशी जिनगी भर घलो उबर नइ पाय। पहली बात तो चुनाव मा धन बल लुटाना गलत बात हे, शासन घलो एखर खिलाफ हे, फेर जनता ही मुंह फार के बइठे हन ता कोनो का कर सकही? आजकल फ्री के रेवड़ी, लोक लुभावन वादा, दारू, मुर्गा, पइसा, भीड़ भाड़, खरीद फरोख ये सब चुनाव जीते के हथियार बन गे हे। जे बने अउ ईमानदार प्रत्याशी कर शायदे रथे। अइसन मा हमन थोर बहुत लालच के चक्कर मा अपन राज पाठ अउ कुर्सी ला गिनहा आदमी मनके हाथ मा बेचत हन। आलाकमान घलो टिकट उही  ला देथे जे खर्चा कर सके, अइसन मा छोट मंझोलन के मरना हे।

                 एक जमाना रहे जब नेता अभिनेता के हजारों लाखों दीवाना रहय, फेर आज तो रैली, सभा,समाज आदि बर घलो पइसा मा आदमी जुगाड़े बर लगथे। तब कहीं जाके भीड़ दिखथें। इज्जत बनाए मा उमर गुजर जाथे फेर गंवाए मा छिन नइ लागे, ये बात शाश्वत हे, कतको बड़े नेता, अभिनेता हो जाए, करनी के फल विधना देथेच। पइसा खर्चे मा चरदिनिया चकाचोंध मिल सकथे, फेर सबके जुबां मा समाए बर आजो आदमी के व्यवहार, ज्ञान, काम धाम काम आथे। पइसा पाके कखरो भी जयकार कर देना कहाँ शोभा देथे, लेकिन आज हमीच अइसने करत हन। अउ एखर फायदा उठावत हें बड़का मन।  का हम छोट मन जिनगी भर गुलामी करे बर बने हन? का हमन ला पद पाए के अधिकार नइहे? यदि हे ता आँय बाँय खर्चा चुनाव मा काबर? चुनाव मतलब बड़े बड़े बैनर, बाजा गाजा, सभा, संसद, भीड़ भाड़, दारू मुर्गा, देख देखावा के पुलिंदा काबर? आज के स्थिति देखत तो इही लगथे कि चुनाव मतलब चुनाव, लागा बोड़ी के आरा मा। साफ सुधरा अउ ईमानदार प्रत्याशी कर पइसा नइहे ता आज वो जीतेच नइ सके, अउ चुनाव लड़े के घलो नइ सोचे। आपो मन अपन छाती मा कखरो गरीब के दारू मुर्गा पइसा ला खावत पीयत बेरा सोचव कि जे करत हव ते का बने हे? यदि नहीं ता फेर ये बीमारी काबर फलत फूलत हे। यदि अइसने ये बीमारी बढ़त जाही ता लोकतंत्र के कुर्सी मा कोनों सच्चा सेवक नइ बइठ पाही। एखर दोषी हमी मन ही होबो। अउ आज इही सब होवत हे। 

                एकात दू अपवाद के आलावा आज, कुर्सी बिना खर्चा पानी के नइ मिलत हे। एखरे डर मा बने मनखें येला दलदल समझ के किनारा हो जावत हे अउ दू नम्बरी के आदमी मन राजनीति के पंडित बनत जावत हे।  हम तो ननपन ले इही सुनत आय हन फोकट के कखरो नइ पँचे, चाहे नेता हो या फेर जनता। अइसन मा फोकटिया का के हांव हांव अउ खांव खांव? राजनीति सेवा रिहिस ते आज का होगे हे? देखते हन। यदि आज हम सब फोकट के रेवड़ी अउ लोभ लालच ला नइ छोडबों ता काली कोनो बाहरी अंग्रेज के नहीं बल्कि कुर्सी मा काबिज नेता मन के गुलाम हो जबों। जे मन आज बड़ चालाकी ले चार फेक के चालीस अंदर करत हे। खैर जगई सुतई अपने हाथ मा हे। फिरहाल मोर हाथ मा कलम हे ता लिख परेंव। कोनो ला करू कस्सा लगिस होही ता माफी देहू।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)