Thursday, 20 July 2023

पितृ दिवस पर एक लघुकथा

 पितृ दिवस पर एक लघुकथा

किस्सा नो हय *** कंथुली *** आय 


***** बाबू तैं कब मरबे *****

नरियरा गांव राधावल्लभ के नगरी जेमा रहय रामसनेही गुरुजी ,,,, १९६७ म लटपट मिलय ४ कोरी दस रुपिया तनखा, गुरुजी के एक ठन बड़ दुलरुवा बेटा भारती 

सब्बो गुन श्री कृष्ण कन्हैया के, तेकर ऊपर बाप के दुलार

पढ़ लिखगे बाबू भारती ,नौकरी घला लगगे, लगे हाथ बिहा होंगे ,,, फेर लईका घलो घर म घरवाली के पेट म संचरगे लईका मनके पढ़ाई लिखाई के बहाना म बाबू भारती कोइला खदान कोरबा म रहे बर धर लिस ।।।


समय संग दाई-ददा बूढ़ागे एक दिन दाई बिन कहे परलोक चल दिस, बाप के जोंडी टूटगे मुँहाचारी के खंजा बिगड़गे 

रामसनेही बीमार परगे परोसी करा खबर आईस 

बेटा भारती लकर-पकर पहुंचिस नरियरा गुरुजी ल लेगे धरम अस्पताल ,,, डॉक्टर छुट्टी दे दिस, सियान होंगे ,जा घर ले जा , उहें सेवा करबे अब बेरा पुरगे .....

भारती घर ले आइस रामसनेही गुरुजी ल ....


"शनिच्चर के संझउती भारती ह गुरुजी ल कहिस बाबू तैं सियान होगये ग मोरो छुट्टी सिरागे बता न तैं कब मरबे ,,

रात कइसे कटिस होही राम जानय के बांके बिहारी


(कंथुली आय नाम गांव ह दंत निपोरी म लिखा जाथे)

बस यूं ही बैठे-ठाले

 गुरुपूर्णिमा 03, 07, 2023

भाव पल्लवन---

 भाव पल्लवन---



असाड़ के कुहकी,कुँवार के घाम।

सहि लिच तेन, जीव लिच थाम।

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खेती किसानी बर वर्षा ऋतु के अबड़ेच महत्व होथे।ये ऋतु मा किसान हा भारी उमस,गर्मी ,झड़ी-झक्कर,हारी-बीमारी ला सहिके जी-परान लगा के फसल उगाथे।अइसे लागथे के जेन मनखे हा असाड़ के कुहकी अउ कुँवार के चिलचिलावत घाम ला सहिगे ता समझ ले वोकर जीव बाँचगे नहीं ते ये दूनों महिना जीव लेवा कस हो जथे।

  ग्रीष्म ऋतु के भागती अउ वर्षा ऋतु के आती मा असाड़ के महिना परथे अइसनहे वर्षा ऋतु के छेवर अउ शीत ऋतु के शुरवात होये के समे कुँवार के महिना आथे।

    जेठ के भारी गरमी मा लकलक ले तिपे धरती मा जब असाड़ महिना मा मानसूनी बादर बरसथे ता पानी के बूँद हा गरम तावा मा छिंचे पानी ले बने गरम भाप कस उड़े ला धर लेथे। ये समे पानी हा लगातार नइ बरसै- थोक बहुत गिरथे तहाँ ले घाम तनिया देथे। हवा खोभिया देथे। शरीर मा पसीना थपथपाये ला धर लेथे। ये महिना के हवा मा गरम भाप भरे रथे जेकर ले शरीर हा उसनाय कस लागथे। इही समे दुनिया भर के रोग-राई तको फइले ला धर लेथे। मौसम के उतार-चढ़ाव के संग पिये के पानी मा गंदगी के सेती सर्दी-खाँसी, जर-बुखार अउ डायरिया होये ला धर लेथे। फेर का करबे किसान हा सब ला साहत बोनी मा बिपतियाये रहिथे। 

     अइसनहे निंदई-कोड़ई के दिन कुँवार महिना मा मनमाड़े घाम करथे। जेठ-बइसाख के घाम हा तो कइसनो करके झेला जथे फेर कुँवार के उमस-धमका वाले घाम खटिया धरा देही तइसे लागथे। खान-पान मा थोरको ऊँच-नीच होथे तहाँ ले शरीर साथ नइ देवय।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

भाव पल्लवन--

 भाव पल्लवन--



पानी बरसे आधा पूस, आधा गहूँ आधा भूँस।

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उचित समय मा कोनो काम नइ होये ले भारी नुकसान उठाये ला परथे ।मनखे के जिनगी के हर क्षेत्र मा येला भँजा के देखे जा सकथे।चाहे पढ़ई-लिखई होवय चाहे व्यवसाय होवय या नौकरी-चाकरी होवय या फेर खेती किसानी होवय।     

      खेती-किसानी के काम ला तो बड़ चेतलग होके करे ला परथे। बोंवइई-बतरई,खातू-माटी,  निंदई-गुड़ई ,दवई-पानी ,सिंचाई आदि  ला उचित समय मा नइ करे ले उत्पादन तो घटबे करथे ,कभू-कभू फसल चौंपट तको हो जथे।जइसे के पूस के महिना के लगती मा गहूँ हा पोटिरियाके कंसा आये ला धरथे।ये समय फसल ला पानी के खच्चित जरूरत होथे। पानी चाहे सिंचाई के साधन ले मिलै चाहे बादर ले बरस के मिलै। गँहू ला देरी मा पानी मिले ले बने दाना नइ परै।गहूँ के बाली मा ढंग ले दूध नइ भरावै अउ वो आधा ले जादा भूँसा जइसे पोचवा हो जथे। ये समय बुलके के पाछू आधा पूस मा बरसा होये  के कोनो फायदा नइ मिलय उल्टा चना,बटरी ,तिंवरा आदि उन्हारी के फसल मन ला नुकसान होये के खतरा हो जथे।

  काम समय मा होथे तभे वोकर भरपूर लाभ मिलथे।चाहे कोनो सेवा-सहायता के बुता होवय उचित समय मा होना चाही फेर जादातर अइसे देखे मा आथे के वइसन नइ होवय। जइसे के सेवा- सहायता ले दे बर बहुत कस सरकारी हेल्प लाइन नंबर हें जइसे 102,104,112 आदि ।भुक्तभोगी मन बताथें के ये मन मा डायल करे मा सहीं समय मा इम्बुलैंस पहुँचगे त तो वहा-वहा नहीं ते कोनो न कोनो कारण से देरीच मा पहुँचथे नहीं ते पहुँचबे नइ करैं। मरीज के जीव छूटगे त दवई के का काम?

   सहायता करइया भर हा दोषी होथे --अइसे नइये। भुक्तभोगी मन तकों अज्ञानता के कारण सहीं बेरा मा सहायता नइ ले पाँवय। ए टी एम फ्राड, बैंक धोखाधडी मा  ए टी एम कार्ड ला तुरते ब्लाक करवाके पुलिस, बैंक ला सूचित करे बर लागथे तभे उचित ढंग ले सहायता मिल पाथे।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

सुनव चार के ... करव बिचार के

 सुनव चार के ... करव बिचार के

               तइहा तइहा के बात आय । राजा के राज्य के विस्तार बहुत धूर तक रिहिस । राजकोष म धन दोगानी छलछलावत रहय । राजा अऊ रानी उदार रिहिस । दुनों हाथ खोल के दान दक्षिणा करे बर कोताही नइ करय । रानी हा जतके पूजा पाठ करय ... राजा हा ओतके कलाप्रेमी । राज चलाय बर नियुक्त मंत्री अऊ दरोगा मन बहुतेच ईमानदार अऊ मेहनती । चारों डहर नदिया तरिया कुँवा बावली के सेती राज्य म पानी के कमी नइ रिहिस तेकर सेती फसल घला बने होवय । जनता ला कोनो बात के दुख पीरा नइ रिहिस । राज्य म केवल एके कमी रिहिस ... राजा के संतान नइ रिहिस । राजा रानी ला इही फिकर हा घुन कस कीरा भितरे भितर खाय लगिस । चारों डहर देखना सुनना करवा डरिन फेर रानी के कोख हरियर होबे नइ करिस ... लइका नइ नांदिस । 

               राजा के भाई भतीजा रिहिन ... ओमन युवराज बने के सपना देखे लगिन । एती रानी के नता गोता मन घला  .. राज पाये के आस म आँखी गड़ाय ताकत रिहिन । एक दिन राजा हा दरबार म एलान करिस ... राज्य के सबले योग्य मनखे ला युवराज बनाय जाहि । दरबार म कोनो ये नइ कहि सकय के ओकरे बेटा हा सबले योग्य हे फेर मने मन सबो इही चाहय के ओकर बेटा ला युवराज के पद मिल जतिस ... तेकर सेती युवराज बने के काबिल मनखे के काय काय गुण होना चाहि तेला अपन अपन ढंग ले परिभाषित अऊ साबित करत रिहिन । मंत्री हा किथे - जेकर लहू म राजनीति हा जन्म जन्मांतर ले बोहावत चले आवत हे तेकर ले अच्छा ... राज चलाय के समझ कोन ला हो सकत हे ... अइसने मनखे के योग्यता के परीक्षण के आवसकता घला नइहे .. । पुरोहित किथे – राज हा अतके म नइ चल सकय महराज  .. । अइसन मन युवराज बन जहि तहन केवल राजनीति म मात जहि तहन ..  बुढ़ापा म तुँहर देखरेख कइसे होही । रानी दई के पूजा पाठ म .. कोन ओकर संगे संग किंजरहि । सेनानायक किथे – राज तभे चलथे जब राजा मजबूत बलवान होथे ... बलवान हाथ म राज सुरक्षित रइहि महराज .. मौका अइसने ला मिलना चाहि । ओकर भाई हा किथे – परिवार के मनखे के हाथ म सबो के भविष्य हा सुरक्षित रहि सकत हे ..  परिवार भितरि के मनखे ला मौका मिलना चाहि । एती रानी हा अपन भतीज ला युवराज बनाय बर कुलबुलात रहय .. फेर सीधा सीधा कहि नइ सकत रहय । सबो के बात सुन .. राजा हा समय के अगोरा करे के सलाह देवत स्वयँ जाँचे के घोषणा करिन । 

               राजा हा युवराज बन सकइया जम्मो झन ला खोज के लाने बर किहिस । मंत्री .. सेनानायक .. पुरोहित ... राज बइद .. राज बइगा अऊ ओकर भाई हा .. अपन अपन लइका ला भेज दिस । राजा हा सबो झन बर .. दरबार म अपन तिर म बइठे के जगा बनवा दिस । राज के हरेक काम काज म इँकर मन के सलाह अऊ बिचार के समीक्षा राजा हा खुदे करय ‌। उँकर मन के आचार विचार खान पान ला तिर ले परखे बर ... उनला महल म जगह देवइस । कभू कोन्हो ला संग म राखय .. कभू कन्हो ला । कभू एके संघरा सबो संग रहय । एक दिन राजा ला शिकार म जाय के इच्छा होइस .. । शिकार खेले बर सबो ला अपन संग जंगल लेगे । संग म महल म बुता करइया अऊ राजा के कुछ विश्वासपात्र मन घला गिन ।

               कटकटऊँवा जंगल म पड़ाव परिस । रात के साँय साँय होय लगिस । रथिया के घुप्प अंधियार म ... शेर चितवा के दहाड़ सुनाय लगिस । मंत्री पुरोहित राज बइद अऊ राज बइगा के लइका मन अपन अपन टेंट म दुबक के लुका गिन फेर डर के मारे सुत नइ सकिस । सेनानायक के बेटा हा  ... बहुत बलवान रिहिस ... ओकर मन म कोई डर भाव नइ रिहिस । दिन भर के थके रहय ... फरर फरर निश्चिंत सुतगे ।  थोकिन रात गहरइस तइसने म ... कुछ हथियारबंद मन ... राजा के पड़ाव उपर हमला कर दिस । बहुत कोलाहल मातगे । सेनानायक के बेटा के संगवारी हा ओला हुद करइस तब ओकर नींद उमचिस । ओहा अपन तीर कमान धरके बाहिर निकलगे । एती राजा के मचान डहर ले चलत तीर कमान म एको दुश्मन नइ बाँचे रहय ...  कुछ मरगे रहय .. कुछ मन पोट पोट करत रहय । तब तक भिनसरहा होगे । सुतके उचे के पाछू .. राजा ला सरी बात के पता लगिस ... । राजा हा भुँइया म परे .. दुश्मन मन के तिर म गिस । जे मरगे रहय तेकर अग्नि संस्कार के तैयारी चलत रहय अऊ जे जियत रहय तेकर बर दवई बूटी के बेवस्था होवत रहय । राजबइद के बेटा ला राजा हा किहिस – एमन ला तुरत फुरत उपचार के आवसकता हे .. कुछ जल्दी बेवस्था करव । राज बइद के बेटा हा किथे – जंगल म काय बेवस्था करबो राजा साहेब ... इहाँ सम्भव नइहे ... फेर येमन हमन ला मारे बर आय रिहिन ... इँकर उपचार हम काबर  करबो .. । राजा कुछ कहितिस तेकर पहिली ... एक झन मोहाली हा जंगल ले दवई बूटी धरके लहुँटिस । राजाज्ञा से इलाज शुरू होगे । सेनानायक के बेटा के संगवारी हा .. राजा ला सेनानायकपुत्र के बहादुरी बतावत कहत रहय के .. जतका झन मरे हे ततका झन के देंह म ओकरे बाण बेधाय हाबे । राजा हा मुर्दा के छाती ले एक ठन बाण ला तिरिस ... बाण म राज शासन के निशान रहय ... । सेनानायक के बेटा अऊ ओकर संगवारी के मुड़ ... शरम के मारे उचबे नइ करिस । 

               जंगल म भरे मंझनिया राजा के दरबार लगिस । घायल दुश्मन मन ...  थोर बहुत बोले गोठियाय लइक होगे रिहिस । इँकर काय करना हे ... उही फैसला तै करना रिहिस । मंत्री के बेटा हा केहे लगिस – इन राज द्रोही आय महराज ... आपके उपर सीधा हमला होय हे इनला मृत्यु दंड मिलना चाहि । ओकर भाई के बेटा किथे – मोर बिचार से अइसन मनला कुछ दिन बर बंदी बनाके राख लेथन .. भविष्य म इँकर चाल चलन देख इनला छोंड़े जा सकत हे । राज पुरोहित के बेटा हा केहे लगिस – अपराधी के बात ला घला सुन लेना चाहि महराज ... हो सकत हे ... येमन जाने अनजाने म गलती करिन होही । सरगना के मुँहु ला उघारिन ... जम्मो झन उदुपले रानी के भतीजा ला देख सुकुरदुम होगे । राजा तको अवाक होगे । ओकर मन म .. अपन रिश्तेदार देख .. थोकिन दयाभाव जागे लगिस । मंत्रीपुत्र हा राजा के मुख के भाव ला पढ़ डरिस अऊ अपन बात बदलत केहे लगिस – जाने अनजाने म होय गलती ला माफ करना राज धरम आय । अपराधी ला माफ कर देना चाहि । एती राजा के भाई के बेटा के बोल बदलगे ... ओहा भड़कगे ... राजा के उपर सीधा हमला .. चाहे जाने अनजाने म होय ... चाहे जानबूझके ... माफी लइक बिलकुलेच नइहे ... इनला बिगन पल बीते फाँसी म चइघा देना चाहि ... । 

               राजा हा .. पुरोहितपुत्र तनि देखिस । वो किथे - मोला लागथे राजा साहेब ... हमर निकले के मुहूरत ठीक नइ रिहिस ... का उपाय हो सकत हे तेला पोथी पतरा देख बता सकत हँव .. वापिस जाय के पाछू कुछ करबो ... । राजा के पिछु म ओकर दासी के बेटा हा खड़े रहय । राजा हा ओला इशारा म आगू तनि बलइस अऊ किहिस – अब तैं बता का करना हे ... । नवजवान हा मुड़ी गड़ियाय कलेचुप खड़े रिहिस ... ओहा अपन मुँहु उलातिस तेकर पहिली बाँकी मन केहे लगिस – ओ का जानही राज काज के बात ला राजा साहेब । ओला तो अतको मालूम नइ होही के रथिया के तुँहर उपर जानलेवा हमला होय हे । ओहा खइस पिइस ... सुत गिस होही ... । राजा हा जम्मो झन ला अपन हाथ के इशारा से छेंकिस अऊ किहिस – मोर उपर जब हमला होइस तब .. मोर प्राण बँचाय बर ... मोर धनुष बाण के सहायता ले दुश्मन के नाश करे बर ... अपन जान के बाजी लगइया इही आय । मोला बिगन पूछे मोर कोई चीज ला कोनो हाथ नइ लगा सकय ... जे करही तेहा प्राणदंड के भागी हो सकत हे ...फेर मोर रक्षा बर सरी बात ला जानत ... मोर धनुष ला उचाय के हिम्मत करिस अऊ मोर प्राण बचइस । दुश्मन के लाश के गत इही बनइस अऊ घायल के इलाज .. येकरे इशारा म होइस । तेकर सेती येकरो मन जानना जरूरी हे । 

               नवयुवक ला राजा हा बोले के इशारा करिस । राजाज्ञा पाके बहुत निर्भीकिता से अपन बात राखत किहिस – राजा उपर हमला करइया चाहे राजपुत्र होय ... दंड के भागी आय । येहा तो दूसर देश के युवराज आय अऊ हमर राजा ला मारके हमर राज के राजा बनना चाहत रिहिस । इनला बंदी बनाना  उचित रइहि ... इनला तभे छोंड़बो जब तक येकर राज के राजा हा .. हमर राजा के शरण म नइ गिरहि । राजपुरोहित के बेटा हा केहे लगिस – हमर समय उचित नइ चलत हे जी ... अइसन करना ठीक नइ रहि ... । राजा से निर्भय पाय ... नवयुवक हा डंके के चोट म केहे लगिस – राजा हा समय के हिसाब से निही बल्कि समय हा राजा के हिसाब से चलथे । राजा हा जे समे जे बुता करे के ठान लिस ... समे ला ओतके बेर उचित बने ला परथे ... । राजा हा सबो के बात सुन ..  वापिस जाके राज सभा म निर्णय बताय के बात किहिस । सरगना ला बंदी बनावत .. तुरते जंगल ले लहुँट गिन ।   

               दूसर दिन राज सभा लगिस । रानी के भतीजा ला जंजीर म बाँध के लाने गिस । ओकर करतूत  जाने के बाद रानी हा ओला माफी देवाय के मूड म नइ रिहिस ।  जम्मो के ध्यान राजा साहेब कोति रिहिस । राजा किथे – आज के निर्णय ला युवराज सुनाही । जम्मो झन कलेचुप ताकत रहय के .. कति जवान ला युवराज बने के मौका मिलिस । राजा हा इशारा म दासीपुत्र नवयुवक ला अपन तिर बलइस अऊ अपन संग बइठारत ... जंगल मा घटे सरी बात ला बतावत ...उही ला युवराज बनाय के घोषणा करिस । सब अवाक हो गिन । एती युवराज हा फैसला सुनाए के पहिली सबके मत जानिस । रानी के भतीजा जान ... लगभग हरेक दरबारी हा क्षमा के बात करय । कोन्हो दबे जुबान ले ... दंड देके छोंड़ दे के बात करिन । सबके बात अऊ तर्क सुन युवराज के फैसला अइस – अक्षम्य अपराध के दंड तो भोगे ला परही । जब तक अपराधी के पिता हा .. हमर राजा साहेब के ढोकर ढोकर के पाँव परत माफी नइ माँगही तब तक ... इन हमर बंदी रइहि । एक महिना म इँकर माफीनामा धरके इँकर पिता हा नइ आही तब .. हम इही समझबो के ... येहा अपन देश बर घला मूल्यहीन रिहिस ... तब इनला चौंक म सरे आम फाँसी चघा देबो । रानी हा सोंचत रहय .. मोर भतीजा जान .. मोर इज्जत करत ... ओला छोंड़े के फैसला सुनाही । युवक के निर्भीकता के सब कायल होगिन । रानी घला मने मन युवक के तारीफ करे लगिस । राजा हा युवराज के बात के समर्थन करत केहे लगिस ... सबो देख सुन जान डरेव .... निर्णय के बेर निर्भीकता हा सही न्याय देथे । राज उही चला सकत हे .. जेहा सुनथे चार के ... फेर करथे बिचार के .... । दासी के गुणवंता बेटा हा युवराज बनगे .... राजा हा घलो .. सबो के सुनिस ... फेर उही करिस जो उचित रिहिस । राज्य भर म .. राजा के यशोगान होय लगिस । उचित निर्णय बर आज घला .. सुनव चार के ... करव बिचार के ... ओतके प्रासांगिक हे । 

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन . छुरा .

संस्मरण* *शीर्षक - मनेमन अब्बड़ हाँसथँव*

 *संस्मरण*

*शीर्षक - मनेमन अब्बड़ हाँसथँव*


          ये घटना सतरा बछर पहिले के आये। मँय अउ मोर संगवारी राजेश, दुनों झिन अक्सर एक फल्ली ठेला वाला तीर फल्ली खाये बर जावन। ओ फल्ली वाला ले हमर मन के बने संबंध बन गे रिहिस हें। ओ दिन घलो हमन ओकर ठेला मा फल्ली खाये बर गे रेहेन। ओ बड़ खुश लगत रिहिस ता हमन पूछेन “का बात हे, बड़ मुस्कावत हस?" ता ओ बताइस कि महूँ हा मोबाइल बिसो डरे हँव। तब हमन केहेन देखा तोर नवा मोबाइल ला। ओ हर अपन नवा मोबाइल ला हमन ला दिखावत रिहिस ता राजेश हा ओकर मोबाइल ला मांग के मोबाइल ला कोचके बर शुरू कर दिस। कुछ देर बाद ओला मोबाइल वापस घलो कर दिस।

          बड़ दिन बाद फल्ली वाला तीर गे रेहेन ता हमन फल्ली खावत-खावत ऐती ओती के गोठ-बात मा भुलाये रेहेन। तभे अचानक ओ फल्ली वाला “ऐ दाई ओ... ऐ दाई ओ...“ चिचयावत खड़े-खड़े कूदे बर शुरू कर दिस।

          हमन ये देख के अकचका गेन, अउ ओला पूछेन “का हो गे, तँय काबर अतका कूदत-फाँदत हस?” तब ओ हर अपन खिसा ले मोबाइल ला निकाल के ठेला मा रख दिस अउ घबरावत-घबरावत बोलिस “मोर मोबाइल हा झटका मारत हे।” अउ तहान गुसिया के पूछिस “तुमन का करे हव मोर मोबाइल सन?” 

          राजेश हा ओकर मोबाइल ला चलाये रिहिस ता मँय ओकर कोती देखेंव ता ओ कहिस “भाई! मँय तो येकर मोबाइल के वाइब्रेशन वाला ऑप्शन भर ला चालू करे रेहेंव अउ कुछु नइ करे हँव।”

          पूरा मामला मोला समझ मा आ गिस। मँय फल्लीवाला ला वाइब्रेशन मोड के बारे मा विस्तार ले बतायेंव ता ओकर गुस्सा शांत होइस।

          ओ दिन के बाद जब भी मँय ओ फल्लीवाला ले मिलथँव या ओ घटना ला सुरता करथँव ता मँय मनेमन अब्बड़ हाँसथँव। नवा टेक्नोलॉजी के बारे मा जब हम नइ जानन ता कइसे अलकरहा स्थिति उत्पन्न हो जाथे।


✍️ श्लेष चन्द्राकर,

महासमुन्द (छत्तीसगढ़)

उपाय

 उपाय

               भ्रस्टाचार बहुत जादा बाढ़ चुके रिहिस । येकरे सेती देश म मँहँगई हा पदोवत रिहिस । देश के गरीब मनखे के जीना दूभर हो चुके रिहिस । सरी पार्टी के मन येला मेटाये बर बहुत जादा चिंतित रिहिन । ओमन अपन विरोधी पार्टी के भ्रस्ट मनखे ला गिन गिन के कोसे लगिन अऊ सरी जनता ला बताय लगिन के येकरे मन के सेती भ्रस्टाचार हा पनपे हे । इही मन भ्रस्टाचार बगराय के कारन आय । इनला चिन्हव अऊ जतेक जल्दी हो सके सत्ता ले वंचित करव । 

               जनता काय कर सकही .. सबो जानत हे । ते पायके बपरा मन खुदे भ्रस्टाचार ला जड़ ले उखाने बर भिड़ गिन । बड़ उपाय तलाशिन । उपाय बहुत आसान रिहिस । कुछ दिन पाछू ... एक पार्टी के भ्रस्ट मन ला .. दूसर पार्टी वाले मन .. अपन म संघेर लिन या अपन मन ओकरे संग संघर गिन । भ्रस्टाचार ला मेटाये के फिकर सबो झन ला रिहिस तेकर सेती ... दूसर अऊ तीसर पार्टी वाले मन घला अइसने करिन .. अब इहीच मन ओला मेटाये के ठेका थोरेन लेहे तेमा .. तेकर सेती ... सबो पार्टी वाले मन भिड़ गिन .. । गऊकिन ... भ्रस्टाचार हा अपने अपन जड़सुद्धा मेटाके कहाँ फेंकइस ... पता नइ चलिस । 

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

बरसात मा महँगाई-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 बरसात मा महँगाई-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                 असाढ़ ले सब ला आस रथे, काबर कि असाढ़ आथे धरके पानी, अउ पानी आय जिनगानी। चाहे वो जीव जंतु होय या पेड़ पउधा या फेर तरिया नदिया, सबे इहिच बेरा अघाए दिखथे, फेर भुखाय दिखथे ता हाँड़ी, काबर कि बरसात लगत साँठ खेत खार बारी बखरी मा पानी भर जथे, अउ जम्मो खड़े साग भाजी के फसल चोरोबोरो हो जथे। ना बने भाजी भाँटा मिले ना मिर्चा धनिया। टमाटर,आदा, लहसुन,पियाज, गोभी कस अउ कतको साग भाजी महँगा हो जथे। ये बेरा मा हरियर  साग-भाजी छोट मंझोलन के हाथ घलो नइ आय। चारो मुड़ा महँगाई महँगाई राग सुनावत दिखथे।  एक समय इभी टीवी  पाकिस्तान मा टमाटर के खबर बतावत हाँसत, नइ थकत रिहिस, ते आज  खुदे टमाटर के महँगाई के मारे थर्रा गेहे, तभे तो मुँह ले बख्खा नइ फूटत हे। आज बंगाला,आदा,दार,कस अउ कतको साग भाली दोहरा, तीसरा शतक मारत हे, हाय रे महँगाई। 

                  कथे कि, यदि प्रकृति के संग चलबे ता प्रकृति वोला पालथे, फेर मूरख मनखे मन तो प्रकृति ले मुँह मोड़ लेहे, ता महँगाई भर का अउ कतको आफत झेले बर पड़ही। कटत पेड़, अँटत नदिया नरवा, भँठत बखरी ब्यारा, बढ़त प्रदूषण अउ कांक्रीटीकरण के मारे प्रकृति खुदे आकुल- ब्याकुल हे,ता का मनखे अउ का जीव जानवर। आधुनिकता के मोह मा चूर मनखे प्रकृति ला लात मारत जावत हे। फ़्रिज,टीवी, महल,मीनार,टॉवर,कल कारखाना, खच्चित नवा जमाना मा कूदा सकथे, फेर पेट मा कूदत मुसवा ला नइ चुप करा सके। एखर बर खेती किसानी, बखरी ब्यारा जरूरी हे। कृषि भूमि भारत आज अपन ये छबि ला धूमिल करत जावत हे। किसान अउ कृषि भुइयाँ दिन ब दिन कमती होवत हे। सब ले ले के खाना चाहत हे, उपजा के खवइया गिनती के हे। अइसन मा जे धर पोटार के रखे रही, ओखरे बोलबाला  तको रही, अउ इही होवत हे, कोल्ड स्टोरेज के जमाना मा नफा व्यापारी मन कमावत हे। *मैं तो कथों जे दिन तक कोठी मा धान रही, ते दिन तक ईमान रही।* आज कोठी,काठा के जमाना नइहे, अइसन मा ईमान, धरम ल भूले बर पड़त हे, सब आफत मा अवसर खोजइया हे। किसान के बारी बखरी ले जब इही बंगाला भक्कम निकले, ता सड़क तक मा कोल्लर कोल्लर फेकाय दिथे, अउ जब बरसा घरी धान, पान अउ पानी बादर के सेती बखरी उजड़ गे, ता ये  स्थिति हे। बरसा घरी फकत इही साल अइसन महँगाई आय हे, यहू बात गलत हे। काबर कि अइसन स्थिति हर बछर बनथे। हरियर साग भाजी  सहज नइ मिले, अउ मिलथे ता बनेच महँगा। पेड़ प्रकृति, बखरी ब्यारा, खेत खार ले जतका दुरिहाबों ओतके दुख भोगेल लगही।


             मोला मोर ननपन के सुरता आवत हे, जब डोकरी दाई अउ ममा दाई मन रोज गरमी घरी कभू तूमा, कभू कोंहड़ा, कभू रखिया ता कभू पोगा कस कतको किसम के बरी बनाये, अउ रोज रोज रंग रंग के भाजी पाला ,साग सब्जी ला घाम मा सुखाए। पूछंव ता काहय कि,  चौमासा के जोरा करत हन बेटा। अउ उही जोरा के सेती, वो बेर उन मन ला कभू बाजार हाट के मुँह ताके के जरूरत तको नइ पड़िन। गर्मी मा चौमास बर जोरा सबो चीज के होय, चाहे छेना लकड़ी, पैरा भूँसा, भाजी खोइला होय या छत छानी, पंदोली या फेर टट्टा झिपारी। अउ एखरे सेती चौमासा बढ़िया बीते तको। अइसे नही कि रात दिन बरी बिजौरी ही खाएल लगे, रोज बदल बदल के साग बने। एकात दिन सेमी भाँटा खोइला, ता एकात दिन आलू मसूर-चना। कभू लाखड़ी ता कभू चना चनवरी भाजी, कभू काँदा, कभू बड़ी ता कभू कढ़ी। एखर आलावा हरियर साग भाजी बारी बखरी के तको निकले, जइसे जरी, खोटनी, चेंच, चरोटा,खेकसी, कुंदरू। संग मा खेत खार ले रंग रंग के पुटू, बोड़ा अउ करील। तरिया नरवा मा चढ़त मछरी कोतरी तको ये समय सहज मिल जथे। घरों घर नींबू,पपीता, केरा, मुनगा के पेड़ तको रहय। अदरक के पत्ता चाहा बनाये के काम आ जाय, चाहा तको बढ़िया लगे।फेर आज कहाँ कोनो पीथे। ये प्रकार ले चौमास के जोरा अउ पेड़ प्रकृति ले जुड़े रहे मा, कभू साग सब्जी के किल्लत नइ होवत रिहिस।

 फेर आज मनखे कर न बखरी ब्यारा हे न खेत खार,  अउ थोर बहुत हे उहू मा क्रांकीट अउ मार्बल लगे हे, अइसन मा कहाँ खेकसी कुंदरू, चेंच चरोटा अउ कहाँ के पुटू, बोड़ा अउ काँदा कुसा।

                         आज मनखे रोज रोज बाजार ले भाजी पाला लाथे ता रांधथे खाथे। जबकि पहली के सियान मा कतको दिन के झड़ी, झक्कर अउ पूरा तक मा घर के ही साग भाजी ला खाये। कोन जन आजो अइसने हो जही ता का होही। घर मा ना बरी हे, ना बिजौरी न कुछु सुक्सा अउ न बारी बखरी। मनखे के जिनगी चुक्ता बाजार मा टिके हे, अइसन मा बाजार बाजा बजाबे करही। कभू नरियात, ता कभू कोनो ला गरियात काटव बरसा ला, फेर यहू बात ला झन भुलव कि दोषी खुदे हरव, काबर कि अपन संसो खुदे नइ करत हव। काली बर धन दौलत तो जोड़त हन,फेर जिनगी, नइ जोड़त हन। आज मनखे ला, हाय हटर अउ ताजा ताजा खाबो वाले चोचला, ले डूबत हे। तभे तो रोज रोज लेवत खावत हे। भले बोतल अउ पाउच के बासी पानी, लस्सी, मटर,मशरूम कतको दिन के होय। टमाटर, समाटर तको तुरते के टोरे नइ रहय। ताजा ताजा कहिके राग लमाइया, फ्रिज मा पन्दरा पन्दरा दिन साग भाजी ल रख के खवइया संग कोन मुँह लड़ाय। 


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)