Friday, 3 July 2020

कहानी... शकुन्तला शर्मा

कहानी...
      शकुन्तला शर्मा
आज सविता के समधिन हर, अपन बेटी अउ वोकर ननद ला धर के,सविता घर आइस। सविता हर मने मन म दाँत पीसत - पीसत कहिस ...एके गाँव मा समधियाना घला हर बड़ा मरन तो आय, फेर काय करबे? प्रेमचंद कस कहती..."जौन गोड़ के तरी मा हमर नरी हर मस्काय हे,तौन गोड़ ला माथा मा मढ़ा ले, तइसे कस कहती,जौन घर मा बेटी देहे हन,तेकर चोचला ला तो सहेच बर परही... अइसने कोन मार जियन देवत हे? मोर मोंगरा बेटी के बारह हाल कर डारे हावैं !अब मोर घर मा आके मोर तरुवा मा बैठ गिन। रात-दिन मैं एमन ला सोंहाँरी खवावत हवँ अउ उहाँ मोर बेटी हर, भरपेट दार भात बर तरसत हे।
      सविता के कलेजा मा तो भूरी बरत हे, फेर जाके अपन समधिन के स्वागत करत हे, वोकर बेटी के खुशामद मा लगे हे बिचारी हर। अपन बहू लक्ष्मी ला कहिस हे "जा बिटिया खीर सोंहाँरी बना के परोस दे!"
अतके मा वोकर ननद भीतर मा आगिस,अउ कहिस  "तोर हाथ के काफी पीतेन अम्मा! मोला बहुत मिठाथे।"
एदे बपरी नोनी के महतारी हर खवा - पिया के दूनों झन ला लुगरा - धोती देके विदा करिस हे।
बहू हर एक आखर पूछिस.."अतेक पान हर हमेशा देना लेना,काबर करथस अम्मा!वोमन तो हमन ला कुछु नहीं देवयँ।" सविता हर रोनहुत हो के कहिस..."का बताववँ बिटिया.....एही ला कहिथें, "बूड़ मरय नहकौनी दय।"   🙏🏻

लघुकथा- ज्ञानु

लघुकथा- ज्ञानु
 
         बड़े बिहनिया चहा पीयत रहँव तभे पाँव परत हव कका कहत गजेंद्र आइस।आ बइठ बेटा कहत खटिया ले एक डहर तिरियावत पूछेंव ,कब पहुँचे अउ सब बने बने ।गजेंद्र हव कका सब बने बने आजे रतिहा 10 पहुँचे हन। लकर धकर करत कहिस अतके बइठ हू कका बहुत काम हावय; आज ददा ला बरसी मिलात हन नेवता हे माइपिल्ला आहू कहत निकलगे।
            मैं बीते समे के सुरता मा थोकुन खोगेंव , मोर ननपन के सँगवारी दुकालू बपरा कतका तंगी अउ बीमारी के मार ला सहत सरग सिधारगे।कतको खबर भेजिस फेर वाह रे बेटा निहारे तक ला नइ आइस।
             मंझनिया मोर सँगवारी दुकालू घर गेंव , देखके आँखी चकरागे ,बड़े -बड़े पंडाल, किसिम -किसिम के पकवान ।मने मन सोचँव जतका खर्चा आज बरसी मा करत हे, इही कहू ईलाज पानी बर करे रहितिस ता मोर सँगवारी दुकालू बपरा जरूर कुछ बरस अउ जी जतिस।

इही ला कहिथे -'जीयत मा डंडा अउ मरे मा गंगा' ।
गुनत लहुट गेंव।

ज्ञानु

हरेली तिहार के वैज्ञानिक पक्ष*-पोखनलाल जायसवाल

*हरेली तिहार के वैज्ञानिक पक्ष*-पोखनलाल जायसवाल
   
       भारत भुइँया देव भूमि आय,तपोभूमि ए,सँस्कार के भुइँया ए।बीर मन के अँंगना ए।ए हर राम कृष्ण, गौतम, गाँधी, नानक, जइसन कतको के करम स्थली ए।ए पुण्य भूमि म आने-आने भाषा बोली के मनखे, अलग-अलग पंथ के अनुयायी, तरा तरा के जाति-धरम अउ रीत रिवाज के मनइया मन आपस म जुर मिल के मया परेम ले रहिथें।अनेकता म एकता ह इहाँ के चिन्हारी ए।
ए पावन भुइँया के माटी के महमहासी कोनो चंदन ले कमती नइ हे।पूरा बछर भर तीज-तिहार होत रहिथें।तेकरे सेती तिहार के भुइँया घला कहाथे।एक तिहार मनिस कि दूसर के अगोरा अउ जोखा शुरु हो जथे।खुशी कभु कमतियाय नइ पाय।कृषि प्रधान देश होय ले इहाँ के जादा ले जादा तिहार ह किसानी काम के ऊपर निर्भर करथे।कोनो फसल बोय के पहिली, कोनो बीच के काम पूरा होय के खुशी त कोनो फसल काटे के तियारी अउ लछमी के घर आय के खुशी म मनाय जाथें।
     भारत भुइँया के किसानी मानसून अवई के संग धान बोय ले शुरु होथे।आसाढ़ सावन म भरपूर पानी गिरे ले धरती दाई ह हरियर लुगरा पहिरे सबके मन ल हरिया देथे।नरवा नदिया कल-कल छल-छल बोहाय लगथे।तरिया डबरी लबालब भर जथे।जिहाँ पानी उहाँ जिनगानी,कस सबके मन आनंद ले ,उछाह ले नाचे कूदे लागथे। इही बेरा म सावन अमावस्या के हरेली तिहार मनाय जाथे।ए तिहार प्रकृति के संग मिल के धरती दाई के खुशी म खुशहाली मनाय के तिहार हरे।
         छत्तीसगढ़ म प्रकृति के संतुलन के बिगड़े के पहिली समे म बरोबर पानी गिरे ले सावन अमावस के आवत ले रोपा-बियासी के बुता पूरा हो जात रहिस।आज किसानी कोनो कोनो मेर पूरा नइ हो पावय। इही हरेली के दिन किसान मन नागर ,कुदारी, रापा जइसन किसानी म उपयोगी सबो अउजार ल धो के ओकर उपकार मानत पूजा-पाठ करके बने सुक्खा जगा म रखथें।हीरा-मोती के संग गाय-गरुवा के घला हियाव करथें।कृषि अउजार के भोग बर चीला चढ़ाथे।बइला अउ गाय मन ला लोंदी खवाथें। लोंदी म दशमूल काँदा, नून अउ पिसान ल परसा /खम्हार पान संग खवाय के चलन तइहा ले आत हे।राउत भाई मन दशमूल काँदा के जोखा करथे।एला मनखे मन घलो खाथें।एखर वैज्ञानिक पहलू ए समझ आथे कि बरसात म तरा तरा के रोग राई होय के डर रहिथे।एकरे ले बचाव बर एखर उपयोग हमर पुरखा मन अपन ढंग ले करत रहिन होही।काबर कि तब सबो कोति आज कस डॉक्टर अउ दवई के बेवस्था नइ रहिस।
        इही दिन गेंड़ी चढ़े के रिवाज हे।आज के दिन बने गेंड़ी पोरा तिहार के आवत ले  उपयोग करथे।बउरथे।गेंड़ी बाँस ले बनाय जाथे।जेमा दूनो गोड़ बर  बाँस के दू ठन टुकड़ा, अउ दूनो म पाँव रखे बर पउवा बनाके अपन मनमर्जी ऊँच्च बाँधे जाथे।कोनो कोनो के मानना हे कि एखर शुरुआत द्वापर युग म पाँडव मन करिन हे।मँय अपन बचपन ल सुरता करत सोंचथँव कि आज ले तीस बछर पहिली हर गाँव के गली मन के कँकरीटीकरण नइ होय रहिस।त गली-गली बहुतेच चिखला होवय।त  बबा पुरखा मन के समे का हाल रहिस होही,सोच सकथँन।ओ समे बरसात म चले खातिर गेंड़ी के परयोग करिन होहीं।अउ चिखला-माटी ले ,केंदवा अउ तरा-तरा के संक्रमण ले बाँचे ए ल बरसात के कमतियावत ले बउरत रहिन होही अइसे सोंचथँव।आजो बहुत अकन गाँव हो सकत हे जिहाँ गेंड़ी सउँक अउ रिवाज बर नहीं, जरूरत बर बनात होही।आज काल गेंड़ी दौड़ के भी आयोजन करे जाथे।
     छत्तीसगढ़ी समाज के पउनी-पसारी मन ए दिन अपन अपन कोति ले मालिक अउ मालिक के परिवार बर मंगल कामना करत कुछु कुछु नेंग करथें।जइसे राउत भाई मन लीम डारा घर के मुहाटी दरवाजा म खोंचथें,लीम के औषधि गुन ले सबो परिचित हँन।लुहार ह खीला के पाती दाबथें।मोला सुरता आत हे,मोर डोकरी दाई पानी गिरे अउ बादर गरजे म हँसिया कुदारी मन ल अँंगना म फेंके काहय अउ बताय कि गाज उही म गिरही, हमर कोति नइ आही।हो सकत हे लुहार के सींग दरवाजा म खीला ठोंके के कारण इही हो।सबो पउनी-पसारी ल दान पुन म चाँउर दार नून दे जाथे।
      इही दिन के रतिहा ल लेके कतको आनी-बानी के गोठ होथे।जादू-टोना अउ ताँत्रिक साधना के सिद्धि बर  साधना इही दिन शुरुआत करथे, के गोठ घला होथे।एला अइसन ढंग ले भी सोचे बर चाही कि कोनो भी काम ल करे बर कसम खा के शुरुआत करे जाय त अपन सबो काम बुता पूरा होही।कोनो अड़चन नइ आही।
     गाँव के बइगा(पुजारी) गाँव भर के सबो देवी देवता ल सुमर गाँव के पूजा पाठ कर गाँव के सुख, शाँति,उन्नति अउ सपन्नता के कामना अउ प्रार्थना करथे।बदला म वहू ल चाँउर दार दे जाथे।
       इही ढंग ले छत्तीसगढ़ी समाज आपस म जुर मिल एक दूसर के चिंता अउ सेवा म लगे रहिथे।
       आज प्रकृति ले मनखे के खिलवाड़ अतका बाढ़गे हवय कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ गे हे। जेन साफ साफ दिखथे।एके समे म कोनो कोति भयंकर गरमी त कोनो अउ कोति नदिया म भारी पूरा (बाढ़) देखे मिलथे।प्रकृति अपन बिफरे के इशारा कोनो न कोनो रूप म देत हवै फेर वाह रे मनखे विकास के घोड़ा म चढ़े, अनदेखा करत कति भागत जात हे।अभी समे हे धरती ल सँवारे के ,नवा सिरा ले सजाय के।धरती के हरियाली बाँचही त मनखे के अस्तित्व रही।इही हरियाली हमर बर संकट मोचक हरे माने ल परही।तभे हरेली तिहार अपन सही समे म सही ढंग ले नवा पीढ़ी मनाही, ए हमर नवा पीढ़ी बर पुरखा मन के हमर करजा आय मानन।

*पोखन लाल जायसवाल*
पलारी बलौदाबाजार छग.

मोटरा-गठरी(कहनी)*-हेम साहू

मोटरा-गठरी(कहनी)*-हेम साहू

          जाड़ा के दिन बादर राहय जेठिया दाई  जेन 90 साल के ढोकरी होेगे हावय। मुधियार कन भुर्री ला तापत बइठे नाती टूरा मन के रद्दा देखत हावय, रोज इहि बेरा मा इहि मेर सब्बो टूरा मन सकला के भुर्री तापथे अव डोकरी दाई मेरा किसम किसम के कहनी किस्सा सुनथे अव सीख ओकर से सीख लेथे। देखथे देखत सबले पहली बुधारू टूरा टपकथे अउ पा लागी दाई कथे दई कथे खुसी रा बेटा एकक एकक झन करके सब्बो टूरा मन सकला जाथे। बुधारू, समारू,दुकालू, सुकालू, आमरु सबो आके भुर्री तापे बर बइठ जाथे। समारू हा थोकिन चटरहा बानी के रहिथे अउ चटर पटर मारत रहिथे। समारू हा दाई लेना बने अस कहनी सुना न ओ सुकालू हा दाई सुना न ओ दाई तोर जवाना के कहनी। दाई हा मुड़ ला हलावत कहिथे ले भई ठीक हे सुना दे हूँ,  अरे सुकालू जातो रे बेटा मोर मोटरा-गठरी ले बाजार के लाड़ू होही तेन ला निकाल के लाबे। दाई के बात ला सुनके सबो टूरा मन खिलखिला के हाँस भरते अउ सुकालू हा कभू मोटरा देखे नई रहय त का जानय बपरा हा, त पूछथे दाई ए मोटर काला कथे, हमन तो नई जानन अउ जम्मो टूरा मन सुर मा सुर मिलाके हा... हा.....दाई हमन तो नई जानन। फेर दाई हा कथे ओ देख बेटा परछी के खूँटी मा टगे हे ना झोला उहिच ला मोटरा-गठरी कथे। फेर समारू हा कथे त दाई हमन का जानन मोटर- गठरी झोला ला कहिथे। जाके के सुकालू हा झोला के लाड़ू ला लाके दाई ला देथे अउ दाई हा लाड़ू ला सब्बो झन मा बाँट देथे। येति मोटरा- गठरी नाम सुनके बुधारू हा अकबकाय रहय ओला कुछु समझ नई आय झोला ला मोटरा- गठरी कथे, लाड़ू ला खाय अउ सोचय अउ मन के बात मुँह ले निकलगे अउ पूछ परिस दाई मोला बता न काबर मोटरा- गठरी ला झोला कहिथे अउ सब्बो टूरा मन सुर मिलाके हा हा बताना दाई काबर कहिथे?  दाई कहिथे त सुनव सबो झन बने कान दे के पहली हमर जवाना मा ये झोला(बैग) नई चलत रहिस हे ओकर जगह मा मोटरा- गठरी चलय। मोटरा हा बड़े होथे जेला अपन सामान के हिसाब ले जतका बड़का बना ले अव गठरी हा ओकर छोटे रूप आय। पहली हमन कुछू लाना हे या ले जाना हावय या गाँव गौतरी जाना हे त मोटरा- गठरी बनाके समान ला भर के मुड़ मा बोहिके  लेगन  या गाँव जावन। फेर समय बदलत गिस उव समय म नवा नवा खोज अउ सुविधा बर येकर रूप अउ नाम अकार बदलत गिस अउ आज उहि बदलाव हा धीरे धीरे झोला के रूप ले लिस। देखव झोला ला आज पाछू मा लदक के रेंगथव रे ..दुकालू हा झट से हा दाई ओला बैग कहिथन हा बैग के रूप लेलिस। मोटरा- गठरी मा हमन बड़े समान ला रखन उव गठरी मा छोटे छोटे समान ला जइसे रुइया पाइसा, गहना गुठी ला बने गठिया के रखन। दाई कथे अब जान डरेव न काला कहिथे मोटरा- गठरी सब झन हव दाई। अतका बढ़िया नवा जानकारी ला जनके जम्मो टूरा मन हा वाह दाई कतका बढ़िया जानकारी देव। जानकारी देवत देवत खाय के बेरा हो जाथे फेर दाई हा कहिथे चलव रे अपन अपन घर खाये के बेरा हावय अपन अपन घर चलव अउ भूरी के आगी तको कनझा गे। लेवा फेर काली एतके बेरा बइठबो त फेर कुछू नवा गोठ ला गोठियाबो ले चलव घर के मन देखत होही। जम्मो टूरा मन दाई ला कहिथे मजा आगे दाई मोटरा-गठरी के बारे मा जानके।
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील- नवागढ़, जिला बेमेतरा

बलराम चंद्राकर: असाड़

बलराम चंद्राकर: असाड़

असाड़, साल के चौंथा महिना, लगते पानी बादर के गुरुरघारर शुरू हो जथे। जेठ के घाम ले लाहके जीव थीर पाथे।सरग के कतको पानी ला पियासे धरती तुरते सोंख लेथे।बरसा के पानी परे ले उन्ना तरिया डबरी के मछरी बेंगवा मन ला घलो नवा जीवन मिलथे।प्रकृति मा नवा ऊर्जा के संचार होथे। भोंभराय धरती हा हरिया जथे।हरियर हरियर डारा पाना देख के लागथे भुइयाँ नवा लुगरा अंगीकार करत हे। गरमी के चार महिना थिराय कमिया किसान खेती किसानी के उदीम मा लग जथे। झुलसे धरती मा गरवा गाय के चारा घलो सबो कोती दिखे ला धर लेथे। मानसून के आय ले बादर छाय रहिथे ।सुरुज नारायण छूपा छूपी खेलत अपन तेज ला कदा करत रहिथे।असाड़ के पहिली पानी हा धरती खेत खलियान ला सुवासित कर देथे। बादर कभु गरजथे कभु बरसथे त कभु हवा गरेर घलो चलथे। सुक्खाय नदिया नरवा मा फेर जलधार बोहावत देख के मन हरस जथे।
किसान के खेती किसानी अउ चउमासा के तइयारी शुरू हो जथे। नागर बखर अउ फसल के बोनी बर कांटा खूटी ला बिन के खेत के सफाई किये जाथे।  जोताई अउ धान के बोनी बर किसान संझा बिहनिया एक करके खेत ला संवारथे। अंकुरित धान ला देख किसान के मन खुश होथे।
असाड़ के पानी परते ही किसान बियारा के पैरा ला परसार मा भरके मवेशी बर चार महिना के सुखा चारा के बेवस्था ला पुख्ता करथे।
चउमास हा पूरा खेती किसानी अउ फसल के बढ़ोत्तरी के काम बर हरे। किसान दिनरात लगे रहिथे। असाड़ के शुक्ल एकादशी ले देवता मन चार महिना बिश्राम करथे। कोनो प्रकार के मुहुर्त वाले काम बर देवउठनी तक विराम रहिथे। फेर। अन्नदाता किसान ए चार महिना जी तोड़ मेहनत कर के संसार बर अन्न उपजाथे। अउ शिव भोले के सुमिरन कर के शक्ति पाथे। काबर चउमासा भर शिव-शक्ति के उपासना होथे।
रजुतिया के तिहार अउ गुरू पूर्णिमा हर असाड़ के बहुत बड़े तिहार होथे।
 हमर छत्तीसगढ़ मा भगवान जगन्नाथ के पूजा के ए परब ला बड़ हांसी खुशी सबो डाहर मनाथे। पढ़इया लइका मन के नवा कक्षा घलो इही असाड़ मा शुरू होथे। संत मन के चतुर्मास के पहिली पडा़व हरे असाड़ हा।
असाड़ मा बियारा बखरी ला जोत के किसम किसम के बीज ला बो के चार महिना के साग भाजी के बेवस्था घलो करथे।
असाड़ लगते घर छानही के खपरा लहूटाय के काम पूरा करे बर पड़थे, बरसा के पानी चुहे ले घर ला बचाय बर। पानी निकासी के बेवस्था ला ठीक किये जाथे।कतको घर झिपारी बांधे जाथे परछी, दिवार अउ दुवारी ला पानी के छींटा ले बचाय बर।
असाड़ के महिना मा पानी गिरते नवा नवा किसम के कतको किरा मकोड़ा के भरमार हो जथे। प्रजनन काल होय के कारण ए महिना मा असंख्य प्रकार के कीरा मन दिखथे अउ कुछ दिन बाद कहां जाथे पता नइ चलय। बतर तो पहिचान हरे असाड़ लगे के। मच्छर के प्रकोप बाढ़थे त कई प्रकार के रोग के राई घलो डर रहिथे। ए खातिर खास सावधानी ज़रूरी रहिथे। मेचका, गेंगरुआ, पिटपिटी ढोढ़िया, हिरु बिच्छु, किट पतंग ले पाला पड़थे। लोग लइका मन के खियाल विशेष करे ला पड़थे, चिखला पानी ले बचाय बर।
असाड़ धरती के श्रृंगार के महिना हरे।प्रकृति चारों तरफ हरियाली ले भर जथे। । ए प्रकार ले असाड़ के महिना हा संसार के सबो जीव बर वरदान हरे। कहे गए हे - "डार के चूके बेंदरा अउ असाड़ के चूके किसान " दूबारा पार नइ पाय।सिरतोन असाड़ अमरित बरसाथे धरती मा तभे संसार हा सालभर सजीव रहिथे।

बलराम चंद्राकर भिलाई

नाँग साँप (कहानी)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

नाँग साँप (कहानी)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

कथे न, राम राम के बेरा हाँव हाँव अउ खाँव खाँव, अइसने होइस घलो जब पहातिच बेरा शहर के कृष्णा चँउक म, किसन के  घर साँप दिखगे। कोनो दतवन चाबत, त कोनो लोटा धरे, त कोनो मन बिन मुँह - कान धोय घलो वो मेर पहुँच के किलबिल किलबिल करत हे। पड़ोस के लइका  मनोज जेन दाई ददा के बिना लात घुसा खाय घलो नइ जागे तेखरो आँखी भिनसरहा ले उघर गे रहय, फेर अलाली  के मारे  कुछ देर  खटियच म पड़े पड़े गोहार ल सुनिस, अउ आखिर म आँखी रमजत वो मेर हबरगे। जिहाँ देखथे कि बनेच मनखे सकलाय हे, अउ अपन अपन ले सबे चिल्लात हे। कोनो काहत हे- ओदे संगसा म खुसरे हे। कोनो काहत हे- रँधनी खोली कोती गेहे। कोनो काहत हे, दोनो हाथ ल फैलाबे तभो वो साँप ले छोटे पड़ जही। कोनो काहत हे- बड़ मोठ लामी लामा धनमा ये। कोनो कहे- करायेत हरे, त कोनो कहे- बिखहर डोमी आय।
उही भीड़ के सँग चिल्लावत, मनोज घलो कथे- बाकी साँप के तो पता नही फेर जब तक वो साँप फेन नइ काटही,  डोमी नइ हो सके। एक ठन साँप के आरो पाके कतको झन मनखे रूपी साँप मन बड़बड़ावत हे। एती किसन के मुँह घलो नइ उलत हे, लइका लोग सुद्धा, घर के बाहर थोथना ओरमाये खड़े हे। अउ करे त का, जेखर गला मा घाँटी ओरमथे, उही ओखर दुख ल जानथे, बाकी मन तो बस लफर लफर लुथे। सबे चिल्लावत हे ,फेर कोनो भगाये बर उदिम नइ करत हे। ले दे के एकझन सज्जन साँप पकड़इय्या ल धर के लाइस। पकड़इया ह बड़ महिनत करे के बाद साँप ल घर ले बाहिर निकालिस। साँप ह जुरियाय जम्मो मनखे मन ला देख के, फेन काट के तनियाय खड़े हो जथे। लोगन मन देख फेर फुसफुसात हे देखे जुन्नेट डोमी आय। ये भारी बिखहर होथे, एक घाँव चाबिस, मतलब राम नाम सत। येती मनोज तनियाय खड़े हे, देखे में केहे रेहेंव, ते सहीं होइस न,फेन काटही कहिके। एक झन चुप करात चिचियावत कहिथे,ते चुप रे,आज के लइका का जानबे, का का साँप होथे तेला, भगवान शंकर के फोटू ल भर देखे हस, कभू बाप पुरखा नाँग देखे रेहेस।  येती किसन के पोटा साँप ल देख के काँपत रहय। किसन कहिथे, येला कोई मार देवव, आज मोर घर म घुसरिस, काली अउ कखरो घर घूँस जही। आघू म खड़े एक झन मनखे कहिथे- बात तो बने काहत हस किसन,  फेर मोर डहर अँगरी काबर देखात हस, मोर घर काबर घुसही।  वो मेर खड़े अउ मन फुसफुसावत कहिथे, काबर की तोर घर जादा धन दौलत हे। ततकी बेरा मनोज बात ल काटत कहिथे, इती के बात ल छोड़व। कइसे ग कका किसन, तैं जीव हत्या के बात करइया निरदई आदमी कइसे हो सकथस? बात वो किसन के अलग हे जउन नाँग नाथे रिहिस। ते तो निच्चट डरपोक आवस। हाँ नाँग देवता,तोर घर आय हे, बढ़िया पूजा पाठ कर, धन रतन बाढ़ही। ये मजाक के बेरा नइहे, किसन बिलखत कथे- अब तुही मन बतावव ददा, मोर घर  ले ये बला टरे। साँप पकड़इय्या वो साँप ल चुंगड़ी म भरके, मनोज ल कहिथे, चल येला कहूँ मेर छोड़ के आबों। मनोज छाती ठोंकत कहिथे ,अइसन काम बर तो मैं बने हँव। अउ साँप घलो तो जीव आय, मारना पीटना बने बात नोहय। चल ये साँप ल खाली जघा म छोड़ आबों। तीर म ओखर ददा घलो रहय। वो मनोज ल कहिस -हव ",काम के न कौड़ी के, दँउरी के बजरंगा" अउ कामे का कर सकत हे। दुनो झन साँप ल चुंगड़ी म धरके निकल गे। इती किसन ला हाय जी लगिस। लोगन मन घलो छँटियाय लगिस।
                   साँप पकड़य्या के पाछू पाछू मनोज रेंगत कहिथे, अउ कतिक दुरिहा जाबों, ऐदे मेर छोड़ देथन। बेरा उग के चढ़त रहय, मनखे के चहल पहल बढ़ गे रहय। साँप ल छोड़े बर जइसे चुंगड़ी ल खोलेल धरथे, नजदीक के घर वाले करलावत निकलथे, हव छोड़ दव इही मेर, ताहन मोर घर खुसर जाय। चलो भागो ए कर ले।  दुनो फेर सड़क नापथे, सबो जघा मनखे मन देखे के बाद दुनो ल गरिया देवव। दुनो थक हार गे। आखिर में साँप पकड़य्या कहिथे, मोर ले गुनाह होगे जी मनोज, जे सांप ल पकड़ेव। फेर ये मोर बर थोरे हरे, भलाई के जमाना नइहे, मोरे मरना होगे।
दुनो लहुट के किसन घर कर आगे। किसन पुचपुचावत कहथे-बने करे दाऊ, तोर बिना मैं तो संसो म पड़ गे रेहेंव। ले चाय पीके जाबे। किसन के बात ल सुनके, मनोज कहिथे- का बने कका, साँप तो चुंगड़ी म हे। कोनो मन अपन तीर तखार म ढीलन नइ दिन। मुँह उठाके फेर आगेन। अब तोर नाँग ल तिहीं पूज, हमन चली। अरे अरे अइसे कइसे हो सकत हे, ये गलत ए, अउ ये कोनो मोर पोसवा थोरे आय, एखर मैं काय करहूँ, किसन बिलखत हे। मनोज का, सबे झन भाग गे।  किसन के मूड़ म पहाड़ टूट गे, साँप के चुंगड़ी के दुरिहा म बैठे लइका लोग सुद्धा फेर रोय लगिस।
             एकाएक मँझानिया, मनोज के ददा कल्हरत भागत चिल्लाथे, साँप साँप साँप। अरे भागो भागो, किसन घर के  डोमी नाँग हमर घर खुसर गेहे। मनोज गिरत हपटत भागथे, अउ किसन ल खिसियाथे, जेन चुंगड़ी के आघू अपन भाग ऊपर रोवत राहय। मनोज के ददा झाँक के देखथे, चुंगड़ी भोंगरा रहय, ओखर मुहड़ा थोरिक खुल गए रहय। मनोज सोचथे, साँप पकड़इय्या लगथे, ढीले के बेरा बने से नइ बाँधे रिहिस। फेर अब साँप तो मनोज घर खुसर गेहे। किसन जान के खुश तो नइ होइस, तभो अइसे लगिस जइसे ओखर करेजा म लदे पथना, हट गे। लइका लोग सुद्धा खैर मनाइस। अउ मुंह बजावत कइथे, कइसे बाबू मनोज, अब कइसे लगत हे, जा तिहीं पूजा कर नाँग देवता के , सावन घलो चलत हे, नागपंचमी घलो अवइया हे। मनोज के ददा दाँत कटर के रिहिगे, देखते देखत मनखे मन फेर जुरियागे, हो हल्ला मात गे। कोनो काहत हे अइसन म बात नइ बने, पुलिस म खबर देना चाही। कोनो कहय पुलिस का करही, वन विभाग के अधिकारी मन  ल बतावव, उही मन ले जही। फेर वोमन फोकट म बिन पइसा कौड़ी के थोरे आही। अउ वन विभाग वन कोती रइथे, शहर नगर म कहाँ के। मनोज के ददा किसन ल देखत कहिथे, चल दुनो मिलके वन विभाग ल बलाबों।किसन मुँह अँइठत घर म खुसर गे।  अचानक साँप मनोज के घर म एक डाहर ले दूसर डाहर जावत दिखथे, भीड़ फुसफुसाए लग जथे,  किसन के बला, मनोज घर  सपड़ गेहे, लगथे किसन बने आदमी नोहे, नाना जाति के गोठ उभरे बर धर लेथे। फेर जेन संसो कुछ देर पहली किसन के रिहिस, वो अब मनोज अउ ओखर घरवाले ल सतावत हे। अब तो साँप धरइय्या घलो नइ आँव काहत हे, उहू अपन दुख दर्द बतावत हे कि मैं पकड़ के अचार थोड़े डालहू ,ये शहर म दूर दूर तक  न परिया हे न खाली जघा, मैं काल काबर मोल लेवँव। मनोज के पड़ोसी मन ल घलो संसो सताये बर लग गिस, कही ये साँप हमर घर म आ जही तब। अब सबे केहेल धर लिस, साँप ल दूध पियाबे त चाब्बे करही, ओला पाले के बजाय मार देना चाही। मनोज के ददा अउ वो मुहल्ला के दू सियान लउठी धरके, साँप कोती बढ़थे। साँप डर के मारे एती वोती भागेल धर लेथे। लउठी पड़इय्यच रहिथे, मनोज तीर में जाके हाथ ल धर लेथे। अउ कहिथे- मोर बात वन विभाग के अधिकारी मनले होगे हे, झन मारव। ये साँप बिचारा आखिर रहे त कहाँ रहे, जम्मे कोती हमन अपन ठिहा ठौर बना डरे हन, न कोनो मेर रीता भुइयाँ हे, न परिया। यहू मन तो ये धरती के प्राणी आय, अगास या पताल के थोरे, फेर हम मानव मन स्वार्थ अउ आधुनिकता के चकाचौंध म जम्मे कोती क्रंकीट अउ सीमेंट बिछा डरे हन, सांप बिच्छू मन चकचक ले  दिख जावत हे, उँखर बर बिला भरका घलो नइ  बचायेन , रुख राई के तो बातेच ल छोड़ दव। न बारी बखरी हे, न कोठा ,न कोला आखिर साँप बिच्छु कस विवश प्राणी मन रहे त कहाँ रहे? अउ कहूँ दिख जाथे, त साँप ले जादा खतरनाक हम मानव मन वोला मार डरथन। शहर नगर सिर्फ मनखे मन बर होगे हे, गाय,गरवा  मन घलो  सड़क म बैठे रहिथे। हमर करनी के फल हमन असमय गर्मी, बरसा, आंधी तूफान ले तो भुगतते हन, फेर ये निरीह प्राणी मन बिन जबरन काल के मुख म समा जावत हे। हमला उँखरो बारे म सोचना चाही।  वो मेर खड़े जम्मो झन मनखे मन मनोज के बात ल सुनके कलेचुप मुँह लुकावत छँटेल धरलिस। कुछ देर बात वन्य जीव संरक्षण विभाग वाले कर्मचारी मन आगे, अउ साँप ल लेगत बेरा, मनोज ल बूता जोंगत कहिथे- सिरिफ साँप का, कोनो भी जीव  यदि कभू भी अइसने ये मुहल्ला या तोर आसपास भटकत दिखही त आज ले तैं हमन ल सूचना देबे। तोला हमन ट्रेनिंग घलो देबों, ताकि साँप बिच्छू ल तैं पकड़ सकस। गारी गल्ला खावत, ठलहा पड़े, मनोज ल काम मिल जथे अउ  मुहल्ला वाले संग अपन ददा के घलो डाडला बन जथे। 

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)


बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

*बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

मंगतिन गांव म अपन जिनगी काटत राहय। मंगतिन के बिहाव नानपन म होय रिहिस हे अउ १५ बच्छर म ससुरार आगे रिहिस हे, वोला गुड़ाखू घसे के बड़ नशा रिहिस हे, दिन भर रतिहा जसना म जावत ले ओखर मुहु म गुड़ाखू दबे राहय। धीरे -धीरे दिन बितत गिस अउ मंगतिन तीन लईका के महतारी बनगे।धनसिंग (बड़े बेटा) कुंती (मंझली) अउ जीवन सबले छोटे रिहिस हवय, जीवन के अवतरे के दू बच्छर बाद मंगतिन के गोसैंया ल एक दिन खेत म सांप चाब दिस बिचारा बीत गे ।धनसिंग अउ कुंती बड़े होगे अउ गांव के सरकारी इस्कूल म पढ़े जाय लगिस... लेकिन ओखर छोटे बेटा जीवन के हाव-भाव,रेंगना-फिरना दूनो लईका मन ले अलग राहय कभू कखरो संग हां,हूं ,घलो नइ गोठियावय।कले चुप रेहे राहय,मल मूत्र अउ पखाना घलो ओन्हा म कर डारय,बाढ़त उमर अईसने कटत लईका बड़े होगे।
          धीरे-धीरे मंगतिन ल संसो होगे अउ बड़ परशानी घलो होवय लईका ल घर म छोड़ के बनी-भुति म निकल जावय , जीवन के बेवहार ल देख के मंगतिन हदास होगे राहय अउ खेत खार अउ  मड़ई मेला अउ सगा सोदर कोनो गांव जावय त दूनो लईका मन ल संग म धरके जावय अउ जीवन ल कुरिया मे धांध के संकरी ल लगाके रखय।
         कोनो दिन कंहू घर ले जीवन निकल जतिस त गांव बस्ती पारा परोस के मन बिचारा ल पथरा ढेला म मारय अउ कोनो पानी ल घलो ओखर ऊपर फेंक देवय...नान-नान लईका संग बड़े मन घलो बिचारा ल *बईहा* आगे कहिके भगावय ,मंगतिन हदास होगे राहय अउ घर के मुहाटी म बैठे राहय उहि बेरा मा गांव के एक झन पढ़े लिखे सियान ह शाहर के *मनोरोग चिकित्सक* डॉक्टर
के तीर म देखाए म सुझाईस अउ मंगतिन ल डॉ. के पता ठिकाना ल चिट्ठी म लिखके दे दिस दुसरईया दिन मंगतिन जीवन ल धर के  डाॅ. ले भेंट करिन अउ डॉ.साहब ह पुछिस ।
का जीवन ह ?अवतरे के तुरते बेरा रोईस हे...... मंगतिन कहिथे नहीं साहब।
का तेंहा नशा करथस?
हव....... साहब गुड़ाखू घसथंव।
फेर मंगतिन कहिथे डॉ साहब मोर लईका ल गांव वाले मन, पारा परोस के मन *बईहा-बईहा* कहिथे!हव साहब मोर लईका बईहा हे!
तब डॉ साहब (मनोरोग विशेषज्ञ)कहिथे जीवन बईहा नइहे.......ऐला मानसिक दिव्यांग कहिथे।अउ ईखर बुद्धि सामान्य लईका ले कम होथे।
जौन कोनो महतारी अम्मल म रहिथे तब के बेरा म नशा,अउ जेला घेरी भेरी झटका आथे अउ अन्ते-अन्ते नंगत अकन कारन हे अउ अवतरे के तुरते बेरा म  लईका नइ रोवय त अईसन म लईका के बुद्धि के नस बराबर काम नइ करय जेखर कारन लईका ह मानसिक दिव्यांग होथे।
*लईका बईहा नइहे* ऐला रोज के काम धाम ले संग म रहिके सिखोवव! लईका धीरे-धीरे अपन जिनगी ल चलाए बर तो सीख जहि। कखरो बर बोझा नइ रहि।

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मिनेश कुमार साहू
भुरभुसी गंडई/माना कैंप रायपुर