Saturday, 20 May 2023

ब्यंग "" "आम आदमी खास आदमी" ""

 ब्यंग  


  "" "आम आदमी खास आदमी" ""       


             आदमी के फकत आदमी होय ले कोनों बात नइ रतिस। फेर इहाँ तो वर्ण भेद के चिखला मा सबो सनाये हे। जात धरम रंग के भेद। अब एकरे भीतर वर्ग भेद। जिंहा छोटे बड़े आम आदमी अउ खास आदमी के भेद हे। वर्ग भेद के भोंड़ू मा कुछ मन खास होगे अउ कुछ मन आम। खास मन के मुड़ी मा पद पावर पइसा रुतबा ठसन के सिंग रथे। जेला व्ही आई पी दर्जा के घलो कथें। अउ दूसर आम आदमी जेकर खाय बर खपुर्रा ना बजाय बर दफड़ा। ये हाना हर आम आदमी के सबो भूगोल अउ अर्थशास्त्र के परिभाषा ला अवगत कराथे। फेर अटल सत्य ये हे कि इही लँगोटी वाले के बल मा धोती वाले टोपी वाले मन फुदरथें। ये आम आदमी ला आमा के रूप मा समझ सकथन। एला कइसनो सेवन करले सवाद दिही। पना बना ले सिलपट रगड़ले नून चर्रा से लेके अथान डार के मजा ले सकथस। अउ ते अउ गेदराय पाके ला गोही छोड़त ले गुदेल गुदेल के चुचर सकथस। ये आमा रूपी आम आदमी ला कइसनो उपयोग करले सवाद बरोबर मिलही। डर भय देखाके रेवड़ी बतासा के लालच देके वोट डरवा ले। भाषण झाड़ना हे त इही आम आदमी के भीड़ बढ़वा ले। दंगा करवाना हे त लाठी डंडा धरादे। माटी तेल माचिस धराके कोनों न कोनों आम आदमी के घर भुँजवादे।जेकर आँच खास मन के छइँहा नइ खूँदे। जर भुँज के राख हो जही तब मरे लाश अउ जरे घर के आँच मा रोटी सेंके बर आहीं। दरद निवारक औषधि बनके हल्ला मचावत संसद भवन ला हलाहीं। अउ आम आदमी के संताप ला पोष्टर बनाके चौराहा मा टाँगहीं।

          आम आदमी के समझ ये हे कि सबो मनखे अपने जइसे होही। फेर समझ समझ के फेर हे। हमरे बीच के आम हर खास बन जथे तब आमा सही गुदेल के चुचरे के फेरा मा रथे। झूठ फरेब धोखा बइमानी के बजार मा ईमानदारी के पसरा कब के उठ चुके हे। चाँदी के चमचा तो देखे ला नइ मिले। फेर कतको कोचिया किसम के चाँदी खास मन के पाँव धो के पिये ले होवत रथे। खास मन के अँगना मा सुरुज पहिली उथे तब आम जन के कुकरा बासथे।

           पाछू बखत के बात आय। आम आदमी के हैसियत ले गाँव गली के हाल जाने बर अपन दुरदर्शी चश्मा पहिर के चौराहा मा पहुंच गेंव। एक झन आम आदमी खास बने के सपना साधे अखंड भारत के निर्माण बर कसम खाके मोला अवाज देत रहय। देखते देखत मोर ले कका बबा के रिस्ता बना डारिस। फेर अस्सी साल के बहुरुपिया आरो सुन सुनके कान पाक के पीप बोहात रिहिस। तब असली आम आदमी के कला रचत भैरा बनके मौनी ब्रत के रियाज करत सुटुर सुटुर रेंगे लगेंव। मोला अंदाजा हो गेय रिहिस कि ये आदमी खास बने बर ऊँचा दर्जा के भिखारी के भूमिका निभावत हे। कतको दिन के लाँघन भूखन कस आके पाँव पर डारिस। कका बबा फूफा मोसा के रिस्ता बना डारिस। अपन लाम लाहकर एजेंडा के सूचि देखावत वादा वचन निभाय के किरिया कसम तको खा डरिस। अउ लड़हार पुचकार के मोर एक वोट के माँग करत मोरे लइका बनके मोला अपन बाप घलो बना डारिस। अपन अधिकार के सही उपयोग करत हवँ कहिके दया करके दे पारेवँ। ओकर सपना तो पूरा होगे। वोकर बाद कोन कका कोन बबा सब रिस्ता खतम। ओकर वादा वचन के कचरा मा दिंयार चढ़गे। अटके बनिया परे बखत मा काम आना तो दूर पहिचानिस तको निंहीं।

            हमर असन आम जन इँकर रोना धोना लमछोरहा एजेंडा अउ रेवड़ी बतासा के मोंह मा फँसके बाँचे खोंचे एक ठन अधिकार के घलो बली चढ़ा देथन। तब धोखा मा हाथ झर्राना बाँचे रथे। अउ फेर इतिहास गवाही हे आज तक कोन खास अपन जबान मा अटल हे? फेर वाह रे आम आदमी अपन एक वोट के कीमत जान सके न कदर। छोटे बड़े आम अउ खास के बीच के खाई पटबे नइ करे। भरे ला भरे जावत हे अउ जुच्छा के कनोजी खपलावत हे। लोक लुभावन गोठ के सँग धार्मिक आस्था के चारा सान के गरी काँटा मा  गुँथके आम जनता के बीच फेंके के चलन बाढ़ गेहे। इँकरे हाथ मा छूरा अउ मूड़े बर हमरे मुँड़ी। जतके बाल ओतके माल। दिल्ली हीरा ले भरे कोइला के खदान आय। हाथ सनाये के चिन्ता नइये हीरा तो खास मनके हाथ लगत हे। दरी जठइया मन दर दर भटकत हे। जमीन ले जुड़े जमीदार मन सरकारी मुआवजा के अरजी धरके किंजरत हे। मजदूरी करइया रिक्शा ठेला रेहड़ी वाला पाव भर दारू के चक्कर मा खास मनके जनम दिन के पोष्टर टाँगे मा लगे हे।

                आज देश उद्योगपति बैपारीअउ राजपथ वाले मन के ताल मेल ले चलत हे। इही तीनो मन आम के पना बनाके पियत हे। यहू कहि सकथन कि आम आदमी माने हलाल करे के वो कुकरी जेकर प्राण हरे ना सुलिन लगाके जीयन देय। अब तो आम आदमी के भरम हे कि सरकार हम बनाथन कहिके। फेर सच ये हे कि सरकार मशीन बनाथे उद्योगपति बैपारी जेला कार्पोरेट घराना के खास कथन वोमन बनाथे। अपन फायदा के हिसाब ले इही खास मन खास मनके निर्माण करथे। आम आदमी अपन अँगरी मा परे सियाही के निसान देखके खुशी मा तिहार मनावत रथे। कि सरकार हम बनाय हन। मशीनीकरण के तहखाना मा काजर के डबिया हे आँजबे तभो अँधरा नइ आँजबे तभो अँधरा। जेन खास मन खास के चुनाव करथे उँकर लागत अउ लाभ चार गुना का चोबिस गुना होके मिलथे। आम जन के हाथ चरन्नी नइ लगे। हम जब "आप" के कथन तब जुरमी अपराधी करार देय जाथे। "का" के सँग जुड़के रेहे मा देश ला कँगला अउ गरीब बनइया के सूची मा नाम सँघेर देथे। "भा" वाले मन तो भकला भोंदू समझके ठग जग करे मा माहिर दिखथे। ओकर सेती "आ" मे "म" जोड़ के अँगरी मा सियाही के निसान लगाना ला अपन सौभाग्य मानत हे। दानवीर करण कस कवच कुंडल तो का कनिहा के लँगोटी तको उतरगे तभो ले नाती भतीजा मन ला खास बनाके बरेंडी मा टाँगे के धरम निभावत हवन।आम जनता आमा कस गुदेलाय पिचकोलाय चाहे चुहकाय राष्ट हित मा  त्याग करे के कसम खा डरे हे। फेर अपन अधिकार ले अनजान मन आज ले नइ जान पाये हे कि आम कोन हरे अउ खास कोन हे।


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनांदगांव।

Friday, 12 May 2023

कुटनी चाल महेंद्र बघेल

 कुटनी चाल 

                  महेंद्र बघेल 


ननपन म हमर परोस म एक झन होनहार कका रहय।ओला कई ठन कथा-कहानी ह मुअखरा याद रहय।जब कभू किस्सा -कंथली सुने के मन होय मॅंय कका कथा दास के आरो लेवत ओकर तपोभूमि म पहुॅंच जाॅंव।उपन्यास कस बड़े ले बड़े, लघुकथा कस नान्हे ले नान्हे अउ कहानी कस मॅंझोलन टाइप के कथा-कहानी सुनाय म एक नंबर के उस्ताज रहिस कका कथा दास ह।कथा दास ह कतको कथा- कहानी ल जाने फेर ओकर जिनगी म कथा- कहानी सीखे के कोई विशेष कथा- कहानी नइ रहिस।

          कभू-कभार बबा (कका के ददा) ल पूछन त ओहा बताय - "हमन कथा दास ल बड़ मुशकुल म पाय हन बेटा.., कई साल ले इहाॅं -उहाॅं जा-जाके मूड़ी नवायेन, मनौती माॅंगेन.., घर-दुवार अउ डिही-डोंगर म बड़े-बड़े कथाकार मन ले कथा कहवायेन।त ले देके ऊपरवाला के हेड आफिस म हमर मनौती के बनौती बनिस। कथा दास ह जब लघु कथा कस नान्हे रहिस तभे कथा-कंथली कहवइय्या सियान मन ल सुन-सुन के कथा कहे बर सीखगे रहिस।"        

          जातक कथा, लोक कथा, परी कथा, जोक्कड़ कथा, एकम कथा ,दूज कथा, एकादशी कथा.., पुन्नी कथा, अमौसी कथा, राजा रानी के कथा, माल मवेशी के कथा अउ किस्सा-कंथली..,जेन कथा के फरमाइश कर दे उही कथा ल सुनाय बर एक गोड़ म खड़े रहय कका कथा दास ह..। तुम नइ पतियहू फेर कथा दास के अवाज ह अमीन सयानी के अवाज कस बड़ गुरतुर रहिस। सुनत-सुनत पेट ह लाॅंघन पर जतिस फेर सुने बर मन ह नइ अघाय।

                 जेठ के गरमी म घर के सबो परानी मन खा-पीके मंझन कुन ढार परत रहेन। हमन मंझनिया ल अभी ढारतेच रहेन कि सबरदिन कस आजो बिजली माता ह खुद मंझनिया ढार परे बर नौ दो ग्यारा होगे। बिजली आफिस के सम्मान करे बर हमर कर करेंट वाले एको ठन शब्द नइहे फेर बिजली बाबू-साहेब मन कर कतको शिकायत करले, उद नइ जले..।एकरे ओधा म उनकर भरे मंझनिया ढार परे के प्रोग्राम ह पहिली ले सेट रथे। एती बिजली माता के किरपा ल देखके घर के जम्मो पंखा,कुलर मन घलव ढार परगें। इनकर ढार परई ल देखत हमर ढार परई के पसीना छूटगे । शिवनाथ खारून के धारा कस तरतर-तरतर बोहावत पसीना के डीओ टाइप नेचरल खुशबू ले जीव ह हलाकान होय लगिस। तुरते एक ठन गमछा ल धरके बिजना कस धूॅंकत अउ एसी के अनुभो करत बेरा पहाय के उदीम म अपन गोड़ के दिशा ल कका कथा दास के तपोभूमि के दरबार हाल डहर जाय बर मोड़ देंव।

   कहाॅं जी कका..,का करत हस मॅंय हूॅंत करायेंव। कका कहिस-" घर के भीतरी म हॅंव जी..,माछी खेदारत हॅंव। बिजली गोल होय के खुशी म माछी मन आजादी के तिहार मनावत मुॅंहुॅं-कान म भरतनाट्यम करत हें,उही मन ल खेदत अपन राष्ट्रीय धरम निभावत हॅंव।चल बता कइसे आना होइस।

          बिजली महतारी के किरपा ले खटिया मा ढलंगे कथा दास ह गरमी म खुदे तालाबेली होके छटपटावत मोबाइल ल कोचक- कोचक के ओकर प्राण पुदक डरे रहय। अउ नब्बे परसेंट बतावत डाटा ह लसियाके टाटा करे बर उल्टी गिनती गिनत रहय।

         कथा दास के कथात्मक गोठ ल सुनके सबले पहिली बिजली विभाग ल श्रद्धा सुमन अर्पित करेंव अउ गरमी के मारे चोपियाय अपन बक्का ल खोलेंव -" बड़ दिन ले तोर कन आय बर योजना बनात रहेंव कका..,फेर नइ उसरत रहिस,आज धन्य मनावत हॅंव बिजली महतारी के जेकर परसादे कथा-कहानी सुने के मौका मिलही।" 

        कका कथा दास ह बड़ बेर ले मनेमन म गुनिस अउ कथा सुनाय के बोहनी करिस -" तोर आय के पहली एक ठन समाचार ल पढ़त रहेंव बाबू रे.., रातकुन बीच सड़क म बइठे कारी गाय म झपाके होंडा सवार बाप-बेटा के अस्पताल म मौत।एक तो पक्की सड़क उपर ले कारी गाय,अइसन अलहन ले भगवान बचाय।चल आज मॅंय तोला इही मवेशी समाज के किस्सा सुनावत हॅंव।चातर राज म माल-मवेशी मन के भरोसा म किसान मन अपन खेती-बाड़ी करत सुख-दुख म जिनगी पहावत रहिन। ओ राज के किसान के बेटा मन बड़ हुसियार रहॅंय,ओमन खेती-किसानी ल सरल बनाय बर खोज-खोज के नवा-नवा मशीन बनाना शुरू करिन। मोटर पंप बनाय ले किसान के चेहरा म खुशियाली छागे। फेर उड़ावनी पंखा, थ्रेसर अउ हार्वेस्टर जइसे किसानी के जम्मों औजार बना-बनाके किसान मन के काम ल सुभित्ता करत गिन। होनहार पुत्तर मन के नवा-नवा खोज के सेती किसानी काम-काज म माल-मवेशी के पूछ -परख कम होगे। पूरा मवेशी समाज मन अकाल बेरोजगारी के शिकार होगें, समाज के समरसता छिदिर-बिदिर होय लगिस। बिना काम-धाम के बैठांगुर गाय-भैंस परिवार के बछवा, पड़वा मन के आदत एकदम बिगड़गे।सड़क होय चाहे बरदी येमन खुलेआम छेड़छाड़ अउ नान्हे नीयत रखना शुरू कर दिन। मने येमन टपोरी,सड़क छाप होगें अउ अपन खानदानी संस्कार ल भुलाय लगिन। मवेशी समाज म असहिष्णुता के बोलबाला होगे। समाज म समरसता के भाव ल छर्री-दर्री होवत देखके चारा,आवास अउ रोजगार के फिकर करत एक दिन मवेशी समाज के जम्मो सियान मन आम सभा बलाइन। एमा गधा-घोड़ा, उॅंट, छेरी-भेड़ी गाय अउ भइस समाज के सियान मन अपन अपन बात ल लइन से रखिन अउ सबके सहमति ले गाय समाज ले गबरू गोल्लर अउ भइस समाज ले भुसुंड भैसासुर ल अपन महासभा के सियान मनोनीत कर दिन। फेर बारी-बारी ले अपन- अपन समाज के समस्या अउ सुझाव ल बइसका म सुनाय बर कहिन।

                सबले पहिली छेरी-भेड़ी समाज डहर ले डड़िहारा बोकरा ह में-में-में.. राग धरत बुलंद अवाज म मेमियावत चार समाज म अपन बात ल रखिस -" में -में.., मॅंय का बोलव में-में..हमर तो अवाजे थोरको नइ सुने सरकार ह.., कुछु कहिबे ते चुप रे छेरी कहिके हमर बोलती बंद कर देथें।हमर चारा के चरागन- ये भाठा,पाई -परिया ह डिस्पोजल कप ,पतरी-पलेट, गिलास, झिल्ली, सनपना के मारे पटा गेहे,चतुरा किसान मन मेड़ -पार म सफाया छिंच -छिंच के चारा के भ्रूण हत्या करे म लगे हें।मनखे समाज के दाढ़ी वाले मन अपन तिहार म हमर सामूहिक कतल करत जशन मनाथें अउ मनौती माॅंगे बर चोटइय्या वाले मन हमर बली दे-देके घंटी बजावत नोट गिनत हें। सुवारथी मनखे के धरम -करम ह हमर प्राण ले जादा किमती हे का..। मनखे के चोला म येमन शेर-भालू ले जादा हिंसक नइ होगे हें..।

ये आमसभा म हमला इही कहना हे कि झिल्ली डिस्पोजल के बउरई अउ सफाया छिंचई उपर तत्काल बेन लगाय जाय अउ हमर बर कोंवर-कोंवर, हरियर-हरियर हाइजीनिक चारा के व्यवस्था करे जाय। नइते ठगेश्वर बाबा सही हमन ला तांत्रिक विद्या सिखोय बर ठगानंद विद्यालय खोले जाय।जेकर ले हम अपन सिंग म तंत्र विद्या सकेल सकन,समाज म एकता ला सकन अउ हमर छेरी समाज के हत्यारा बैरी मन ले हुमेल-हुमेल के ऐतिहासिक बदला ले सकन।

      दूसरइय्या नंबर म ऊंट अउ घोड़ा समाज मन अपन अल्पसंख्यक होय के रोना रोइन अउ खेत-खार, परिया-कछार जिहां तक हरिहर-हरियर दिख जाय उहाॅं तक चरे बर विशेष सुविधा देय बर आवेदन लगाइन।एक ठन सुधवी बपरी सही दिखत धौरी घोड़ी ह समाज के दुख म अपन दुख ल मिंझारके हिनहिनावत कहिस-" विकास बाबू के राज म हमन तो अल्पसंख्यक होगेन जी, राजा-महाराजा के समे म हमर अलगे धाक रहय, हमर बिना एक ठो पत्ता नइ डोले। आजकल तो हमर कोई पूछन्त्ता नइहे। बिहाव सीजन म एकाद कनी रोजगार मिल जथे फेर यहू डहर कभू-कभू जात-पात म बुड़े दबंग समाज के ॲंखफुट्टा मनखे मन मोर उपर बइठे दूल्हा मन ल जबरन खींचके उतार देथें।मनखे डहर ले मनखे के अतिक हिनमान होवत देखके पोटा अइॅंठ जथे।दबंग समाज के मनखे मन अतिक देखमरा होथे,हम बता नइ सकन..,फेर हम ये ॲंखफुट्टा मन ल छटारा (दुलत्ती) मारके अपन बेइज्जती घलव नइ करा सकन, घोड़ा समाज के अपन इज्जत के सवाल रहिथे। आखिर म हमर एके ठो डिमांड हे हमर पुरखा.., घोड़ा शिरोमणी खूर-वंदनीय एक हजार एक घोड़ेश्वर चेतक महराज के जन्म जयंती अउ पुण्य तिथि बर शासकीय अवकाश के घोषणा करे जाय।

        अपन पारी म गधा ह रूतबा देखाय के चक्कर म अपन अवाज ल बदलके कोयली कस मीठ अवाज म बोले के कोशिश करिस फेर बिचारा गरीब ह रेक डरिस अउ आखिर म होची- होची करत अपन बात ल रखिस-" हमर दुख ल हम का बतान सियान बबा हो, दुनिया म जब तक हुशियार मन ह रहीं तब तक हमरो नाम ह अमर रही। हमर तो नामे ह हुशियार लइका अउ सरकारी स्कूल के भरोसा म जिंदा हे।कते दिन सरकार ह यहू ल बेच भाॅंज के प्राभेट कर दिही ते हमर नाम के अर्थी निकल जही। सरकारी स्कूल के मास्टर मन कमजोरहा लइका ल बात-बात म अरे गधा हो कहि कहिके हमर समाज के नाम ल अमर कर देहें।प्राभेट स्कूल के सूट-बूट पहिरे लइका ल भला गधा कहिके तो देख।  मनखे समाज मन कूद-कूद के कतको चिल्लावत हें, हमर जनगणना करो कहिके फेर कुर्सी म बइठे हमर टाइप के सगा मन कहाॅं मानत हें।अउ हमर ल देख लेबे कइसे फटाफट जनगणना हो जही तेला।अब चार समाज मन खुदे समझ सकथो जनगणना के मामला म मनखे अउ हमर म काकर रूतबा ह जादा हे।एती मिक्सी ग्राइंडर के जलवा सेती जाॅंता अउ सील -लोढ़ा म वाट लगगे हे।एकर साइड इफेक्ट अइसे कि बेल्दार भैया मन हमला लात मार के भगा दिन।वांशिग मशीन के सेती बरेठ भाई मन लचार हें त हमर हाल ल समझ सकथो बबा हो..। हमरो समाज के रोजी-रोजगार बर कुछ योजना बना देतेव ते गधा समाज ह ये महासभा के जीयत भर आभारी रही बबा हो.., होची..होची।

              जब भैंइस समाज के पारी अइस तब सियान भैंसासुर ह समाज के समस्या ल बताय बर मुर्री भैइॅंसी ल नेम दिस।मुर्री भैइॅंसी ओंय..,ओंय.. नरियावत कहिस -" हम हमर दुख ल का गोहरावन जी हमर बर तो हमर कायाच ह ॲंधियार हे,एक कन घाम म जाथन त चट ले जरथे..,जीव अगिया जथे।फेर का करबे जीयत हन,लद्दी म घोलन्डबे त मालिक ह धो देथे।इही लद्दी ह हमर बर एसी के काम करथे फेर वाह रे सुवारथी मानुष चोला, धो-धो के हमला गरमी के मुंहुं म ढकेल देथें..। हमर भैइस समाज के दूध एकदम गाढ़ा रहिथे तभो हमर ले दुवा-भाव, मनखे मन अपन देवता-धामी म नइ चढ़ाॅंय।बेचे बर,इस्पेशल चहा बनाय बर, लस्सी बनाय बर हमरे दूध एक नंबर माने जाथे। फेर हड़ही गाय जेकर कोई औकात नइहे.., निच्चट पनीयर दूध देवइय्या ल मुड़ी म चढ़ाय रहिथें। ओकरे दूध ल देवता म चढ़ाथें, घीव के दीया जलाथें। हमर तो पूछन्त्ता नइहे।

           गाय समाज के निंदा ल सुनके उनकर युवा वाहिनी के नेता गबरू गोल्लर ह बगियागे फेर सियान होय के नाते मन मसोस के रहिगे। येकर जगा कन्हो मनखे समाज के नेता रहितिस ते ओकर भावना ह खच्चित आहत हो जाय रहितिस। अब आखिरी वक्ता के रूप म गाय समाज ल बोले के मौका देय गीस त गाय समाज के चतुरा सियान मन मुर्री भैइॅंसी ल धवाॅंय बर हरही-चोट्टी टाइप के मुहुबाड़िन गाय ल बोले बर उठईन । ठड़सिंगी चोरही गाय ह उनिस न गुनिस सोज-सोज शुरू होगे अउ भैइसी समाज के सात पुरखा म पानी रितो दिस-" हाव रे.., बिलवी भैइसी.., भदही.., भाॅंठा के चारा ल सफाचट कर देथस, हमर बाटा के काॅंदी -पैरा ल मनमौजी खाथस ,कोटना के दाना-पानी ल दमोर के झड़कथस तब तो तोला कुछु नइ लागिस,आज भरे मिटिंग म ओंय-ओंय करत हस खबड़ी.., पेटमाॅंहदूर..। गऊ माता कहि-कहिके हमला कट्टीपार भेजत हें,रात-दिन सड़क म रउॅंदा -रउॅंदा के मरत हन, तेकर कुछ हिसाब हे..।

 नइ जानस तेला आज जान ले। मनखे समाज कस जानवर समाज म कन्हों पोथी-पत्तर होतिस ते हमर गाय समाज ल सबले ऊंचा जात के पदवी मिलके रहितिस समझे। हमर मान गौन ह मनखे समाज ले कौन मार से कम हे। दंगा म लिल्हर मनखे ह मर जही ते दबंग समाज मन ल कोई फरक नइ परे फेर हाॅं दूसरा धरम वाले ह हमर समाज के लेवई तक ल छू दिही ते इनकर भावना ह खट ले आहत हो जथे अउ लड़ई-गुंडई के कोशिश म लग जथें। अब समझेस कि अउ समझाॅंव.., गाय के आगू म लिल्हर मनखे के का औकात हे..‌। मनखे समाज म हमर तो अइसे-अइसे ऑंखी वाले भगत हें..,जेन सु-सु ते सु-सु गोबर ल घलव गापा मार देथें त हमर का दोष..।

              जानवर समाज के महासभा म अपन दबंगई दिखाय के गाय समाज के कुटनी चाल ल समझत मुर्री भैइॅंसी ल देरी नइ लगिस। ओ मने मन म गुनान करे लगिस -" लफर- लफर डिंग मारके जानवर समाज ल कइसे भोंदू बनाना हे, इही मन ल आथे। हत रे कपटी हो दिखत के सुधवा-सुधवी फेर दिल- दिमाग म जहर भरे हे रे बैरी हो। एक्के घाॅंव पखुरा ल हुदेनहू ते तुॅंहर बुता बन जही फेर ठउॅंका समय म मोरे समाज के डरपोकना मन संग दिही कि नइ दिही तेकर का भरोसा, कतिक बेर पाछू घूॅंच दिही..,जानवर समाज के बाते झन पूछ..।"  इही सोचत मुर्री भैइॅंसी ह अपमान के घूॅंट ल गटागट पीगे..। अउ चार समाज के हित के बारे म सोचत अपन बात ल महासभा के बीच म फेर रखिस -" टार बहिनी तुमन फोकट के झगरा मतावत हो,आज ले गाय समाज के एको मेंमर ह हमर समाज के नानचुन लेवई तक ल बिलवी भैइसी नइ कहे रहिन। अउ तुमन भरे आमसभा म नसल भेद के बात करत हो। जानवर ते जानवर मनखे समाज ह घलव अइस ठोसरा नइ मारे रहिन।" 

       भैइसी ह जानत रहिस अपन समाज के कमजोरी ल.., कइसे भुसुंड भैसासुर ह गाय समाज अउ गोल्लर के घपघप (बहकावा) म आ जथे अउ सबो जगा म गबरू गोल्लरे के कूटना चाल अउ दबंगई ह चल जथे। मनखे वाले लोकतंत्र सही अपनो लोकतंत्र ल दबंग मन के कठपुतली बनत देख.., मवेशी समाज म समरसता ल सदा कायम रखे बर मुर्री भैइॅंसी ह अपन अंतस के आक्रोश ल चुमुक ले दबा दिस।तहाॅं अवइय्या विश्व जानवर दिवस बर अइसनेच बइसका के घोषणा करत गोल्लर ह भूॅंकर -भूॅंकर के सभा समापन के घोषणा कर दिस..।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

भाव पल्लवन-- झन खेल जुआँ,झन झाँक कुआँ

 भाव पल्लवन--


झन खेल जुआँ,झन झाँक कुआँ

-------------------------------

जुआँ नइ खेलना चाही चाहे वो ह पासा ,काट पत्ती,रमी,सट्टा,लाटरी ,घुड़दौड़ आदि कोनो रूप म होवय काबर के एकर ले जिंदगी बरबाद हो जथे।

 जुआँ ह एक प्रकार ले भयानक नशा आय। नशा चाहे कोनो होवय वो नुकसान तो करबेच करही। जुआँ ह अइसन लालच के बुराई आय जेन ह आदत परिच तहाँ ले छोड़े म छूटे ल नइ धरय । ये हा धीरे-धीरे जिनगी के आनंद ल चुहक के सेटराहा कर देथे।

  जुआँ खेले के अतका जादा नुकसान हे के गिने नइ जा सकय।रुपिया पइसा, धन-दौलत अइसे बरबाद होथे के राजा ल रंक बनत देरी नइ लागय। जुआरी के बाई,लोग-लइका रिबी-रिबी बर तरस जाथें। घर-परिवार म दुख के बासा हो जथे।जुआरी ल उदासी अउ क्रोध ह हरदम घेरे रइथे।जिनगी के किमती समे अइसे नष्ट होथे के झन पूछ? समाज म इज्जत घट जथे।

  कर्जा म बूड़े हारे जुआरी के हालत बइहाय कुकर या फेर मनमाड़े घायल शेर कस हो जथे ।वो कुछ भी कर देही। जुआरी के पाप करम शराब खोरी,व्यभिचार,चोरी, डकैती आदि म डूब के मरे के पूरा संभावना रहिथे।

  ओइसनहे कोनो गहिरा कुआँ ल निहरके नइ झाँकना चाही काबर के थोरको बेलेंस बिगड़ीच ,चिटको असावधानी होइस तहाँ ले मुड़भसरा गिरके पानी म बूड़के मरना हो जथे। कुआँ कहूँ सुक्खा हे त तो  मूँड़-कान फूटहीच, हाड़ा-गोड़ा टूटहीच अउ प्रान निकलहीच।


चोवाराम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

11 मई पुण्यतिथि म सुरता// संत कोटि के अलमस्त कवि बद्रीबिशाल परमानंद

 11 मई पुण्यतिथि म सुरता//

संत कोटि के अलमस्त कवि बद्रीबिशाल परमानंद

    जेन मनखे के रचना मन भले कभू पत्र-पत्रिका के मुंह नइ देखिन, फेर लोगन के कंठ म बिना वोकर रचनाकार के नांव जाने बइठिस अउ सुर धर के निकलिस, उही तो लोककवि होइस. 

    सन् 1917 के रथयात्रा परब के दिन रायपुर जिला के गाँव छतौना (मंदिर हसौद) म महतारी फुलबाई अउ ददा रामचरण यदु जी के घर जनमे बद्रीबिशाल यदु 'परमानंद' जी के संग अइसने होए हे. उनला उंकर जीयत काल म ही लोककवि के रूप म चिन्हारी मिलगे रिहिसे.

    वोकर लोकप्रियता अतेक रिहिसे, जेला देख के हमूं मनला गरब होवय. मोला सुरता हे, बसंत पंचमी के दिन हर बछर गुरु पूजा के रूप म उंकर सम्मान होवय. पूरा छत्तीसगढ़ म चारों मुड़ा सैकड़ों के संख्या म बगरे उंकर चेला मन अपन-अपन मंडली संग सकलावयं. हर बछर ए आयोजन ह अलग-अलग जगा म होवय, तेकर सेती मैं दुरिहा वाले आयोजन म तो नइ जा सकत रेहेंव, फेर भांठागांव म दू-चार बखत संघरे रेहेंव. 

    वो बखत के लोकप्रिय गायक केदार यादव, साधना यादव, कुलेश्वर ताम्रकार, छन्नू यादव, नरेश निर्मलकर जइसन कतकों नवा अउ जुन्ना गायक-गायिका मन परमानंद जी के पूजा-सम्मान करयं अउ रात भर उंकरेच लिखे गीत मन के प्रस्तुति देवयं. परमानंद जी के संग म हमर मन असन नेवरिया मनला ल घलो उंकर संग मंच म बइठार के गुरु-पूजा के सम्मान देवयं.

    सन् 1947-48 म परमानंद जी स्व. हनुमान प्रसाद यदु जी ले साहित्य विशारद के शिक्षा लिए रिहिन हें. तब हरि ठाकुर, देवीप्रसाद वर्मा 'बच्चू जांजगिरी जइसन साहित्यकार मन उंकर गुरु-भाई रिहिन. 

    परमानंद जी माटी के कवि रिहिन. उंकर रचना मन म छत्तीसगढ़ माटी के महक जनाथे. भले उन रायपुर जइसन शहर म रहंय, फेर ग्रामीण संस्कार अउ परिवेश ह उंकर गीत म सांस लेवय. बसंत के आगमन म लिखे एक गीत देखव-

  मातगे हे सरसों के फूल, गंधिरवा मातगे हे रे..

   मातगे हे परसा, मातगे हे कउहा

   अरसी के झूल माते, गहूं के घूल माते

   तिंवरा के लाज गे हे रे

   गंधिरवा मातगे हे रे..

    बसंत के ये प्राकृतिक मादकता बेरा म लइका, सियान, जवान सब मदमस्त होगे हें, देखव-

   मातगे हे लइका मन गुदु-गुदु हांसी

   मातगे बुढुवा घलो लागे खुदबुदासी

    झुमर झुमर झुमर झुमर माते जवानी

   सुवा पड़की नाचगे हे रे..

   गंधिरवा मातगे हे रे..

    किसान के दुख-पीरा ल समझत कवि वोकर जोहार करत कहिथे-

   तोला बंदव हो,

   तोला संवरंव हो, मोर नगरिहा देवता.

   मोर अलकरहा, मोर बलकरहा

   तोर भरोसा तीन परोसा दुनिया ह खाथे नेवता..

* * * * *

   नगरिहा नइ उपजय तोर बिन धान.

   धरती पूजीं, धरती रुजीं धरती पूत किसान.

   दाई के थन म दूध भरे हे

   लइका बर भगवान गढ़े हे

   तइसे तोला गढ़ के भेजिस

   भुइंया बर भगवान..

     परमानंद जी के नांव ले सैकड़ों भजन अउ फाग मंडली रिहिस, जेकर बर उन भजन के संगे-संग फाग घलो लिखंय. उंकर लिखे कतकों फाग मन आज घलो जनमानस म व्याप्त हे, जेला लोगन पारंपरिक गीत या फाग के रूप म गावत रहिथें-

   एक गीत म देखव, गोप बाला दही बेचे बर निकले हे, अउ कन्हैया वोला छेंक के दही मांगत हे-

   मांगे कन्हैया माखन देबे का वो 

   नहीं नहीं काहत वो हां हां म आगे.

दही बेचत बेचत दही वाली बेचागे..

   परमानंद जी सैकड़ों के संख्या म गीत, भजन अउ फाग लिखिन, फेर कभू वोला सकेल के नइ राखिन. मैं तो कतकों बेर अइसनो देखे हौं, कोनो उंकर चेला या गायक कलाकार रचना मांगे बर या लिखवाए बर आए राहय, वोला वो लिख के ओरिजिनल प्रति ल ही दे देवत रिहिन हे. न वोकर दूसरा प्रति बनावय, न अउ कुछू करय. एकरे सेती उंकर रचना मन के बारे म निश्चित कह पाना कठिन हे, के उन कतेक लिखिन, कोन-कोन संदर्भ म लिखिन. एकदम फक्कड़ किसम के संत मन होथें न, न कुछू के चिंता न फिकर. बस अपन म मस्त. तभो ले उंकर मंडली अउ चेला मन जगा ले खोज-निमार के 45 ठन रचना मनला छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति डहार ले 'पिंवरी लिखे तोर भाग' के नांव ले एक संकलन के रूप म निकाले गे हे.

    अइसने सब परिस्थिति के सेती परमानंद जी के कतकों रचना मन के बारे म लोगन ए नइ जानंय, के वो काकर लिखे आय. मैं तो इहाँ तक देखे हौं. धमतरी क्षेत्र एक कवि सम्मेलन म उहिच डहार के एक झन कवि ह परमानंद जी के गीत ल अपन रचना आय कहिके मंच म बड़ा शान से पढ़त रिहिसे. संयोग ले महूं वो मंच म आमंत्रित कवि के रूप म उपस्थित रेहेंव.

     परमानंद जी जिनगी के आखिरी बेरा म थोरिक बनेच शारीरिक कष्ट पाइन हें. वइसे ए बात ल मैं आध्यात्मिक मनखे होय के सेती समझथौं, काबर ते ऊपर वाला जेला मोक्ष या सद्गति देथे, वोकर पिछला जनम मन के हिसाब-किताब ल बरोबर करे बर जिनगी म कुछ अइसन तकलीफ के बेरा देथे. अध्यात्म म इही ल 'प्रारब्ध भोग' केहे गे हे. प्रारब्ध भोग ल पूरा करे बिना कोनो भी मनखे ल सद्गति नइ मिलय. 

    परमानंद जी 11 मई 1993 के ए दुनिया ले बिदागरी ले लेइन. जब उंकर सरग सिधारे के खबर वोकर मंडली के लोगन ल मिलिस, त उनला भजन-कीर्तन करत अंतिम यात्रा म लेगे के व्यवस्था करे गिस. रायपुर के रामकुंड म आमा तरिया हे, एकरे पार म उनला स्थान दिए गइस. वतका बखत महूं वो जगा उपस्थित रेहेंव. तब दू  किसम के विचार चलत रिहिसे, के उनला समाधि दिए जाय दाह संस्कार करे जाय. 

    कतकों झन कहंय, के उंकर जिनगी तो एक संत बरोबर रेहे हे, तेकर सेती उनला समाधि देना उचित रइही. कतकों दाह संस्कार कर के वो जगा स्मारक बनाय के बात काहंय. आखिर म दाह संस्कार कर के उही जगा म चबूतरा बनाए के निर्णय लिए गइस. आज वो चबूतरा ल 'परमानंद चबूतरा' के नांव म लोगन जानथें. कोनो परब-विशेष म उंकर चेला मन वोमा दीया-अगरबत्ती कर नरियर-फूल चढ़ा के उंकर आशीर्वाद लेवत रहिथें.

उंकर सुरता ल पैलगी जोहार🙏🌹🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

रज्जू* छत्तीसगढ़ी कहानी

 *रज्जू*

                    छत्तीसगढ़ी कहानी

              

लेखक डॉ.अशोक आकाश


          मैनखे अपन उमर के अलग- अलग पड़ाव में उतार-चढ़ाव भरे जिनगी जीथे। सुख-दुख, दिन-रात, बारिश, जाड़, घाम, भूख-पियास सहत जीवन के रद्दा में सबे जीव ला रेंगे ला पड़थे। दुनिया के सबे परानी जीवन में सुख पाथे त कभू दुख के खाई में तको गिर परथे, फेर जेन सम्हल के रेंगे के कोशिश करथे ओकर सब्बेच सपना जरूर पूरा होथे। 

            बात वो बेरा के हरे जब मेंहा आठवी कक्षा में पढ़त रेहेंव, त मोर संग में रज्जू तको पढ़त रीहिसे। रज्जू हा अब्बड़ सुन्दर गोरी अउ छरहरी देहें के नोनी रीहिसे। कक्षा में सबले हुशियार। अपन सबे भाई बहिनी में सबले बड़े रज्जू के बेरा में स्कूल जाय के  रोज के दिनचर्या रीहिसे। साफ उज्जर कपड़ा, महमहाती तेल चिकचिकात सुन्दर दू ठन बेनी, काजर पावडर लगाय छुकछुकले सुन्दर रज्जू  , पारा भर में सबके बात मनैया सबके दुलौरिन। प्रार्थना मा  मैंहा टूरा लाइन में आगू में खड़े होववँ त रज्जू टूरी लाईन में सबले आगू मा राहय। प्रार्थना करवाय बर गुरूजी मन रज्जू के बोले चाले के तरीका ला अब्बड़ पसंद करे। ओकर प्रार्थना करवई अउ जयकारा बोलवई हा सबके मन ला भा जाय। 

            15अगस्त अउ 26 जनवरी के राष्ट्रीय तिहार मन में रज्जू आगू में तिरंगा झंडा धरे महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, पंडित जवाहरलाल नेहरू अउ भारत माता के जयकारा करत आगू बढ़े तब गॉंव भर के मैनखे मन गली तीर के चॉंवरा अउ मँहाटी मन मा खड़े होके हमर रैली ला सम्मान देवय अउ हमर भारत माता के गुऩगान ला सुनय।

         हर साल राखी तिहार बर गुरूजी मन सबे लइका मनला टाटपट्टी में बैठारके राखी बंधवाय, तब रज्जू हा मोला राखी बांधे, भाई बहिनी के मया दुलार छलक अउ झलक जाय। एक दूसरा ला चवन्नी चाकलेट खवाके मुसकात मया बॉटन, त कभू कभू झगरा तको हो जावन, फेर अबोला कभू नीं रेहेन। एको दिन में कहूं स्कूल नइ जॉंव त रज्जू हमर घर आ जाय, अउ पूछे आज स्कूल काबर नइ आयेस भाई ? अउ स्कूल में पढ़ाय सबे विषय के पाठ ला मुँह अखरा बताके समझा डरे। 

         रज्जू के बाबू ननपन में गुजर गे रीहिसे, ओकर महतारी निर्मला हा बनी-भूती करके परिवार चलात रीहिसे। 

         स्कूल के कोनो कार्यक्रम होय रज्जू के भाषण गीत कविता बिगर अधूरा लागे, समूह नृत्य, एकल नृत्य, नाटक सबमें रज्जू अगुवा राहय। सब गुरूजी अउ लइका मनके चहेती रज्जू पढ़ई साँस्कृतिक कार्यक्रम के संगे संग खेल कूद में तक अगुवा रीहिसे, सबे खेल ला बढ़िया खेले फेर दौड़ में रज्जू अपन स्कूल के केन्द्रस्तरीय खेल प्रतियोगिता में पहिला आय रीहिसे, केन्द्र स्तर के बाद सम्भाग स्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिता में पहिला आयके बाद गुरूजी मन अपन खर्चा में प्रांत स्तरीय प्रतियोगिता बर भेजिन, जिहॉं रज्जू फेर पहिला स्थान बनाके लहुटिस, तब विधायक द्वारा रज्जू के सम्मान में समारोह के आयोजन करेगे रीहिस, ये सम्मान समारोह में विधायक हा रज्जू ला पढ़ाय बर गोद लेयके घोषणा करीस अउ जिहॉं तक पढ़ही तिहॉं तक पढ़ाय के संकल्प लेवत ओकर खेल प्रतिभा निखारे बर प्रशिक्षण के बेवस्था तक कर दीस  । अब रज्जू दिन रात एक करके पढाई अउ खेल प्रतिभा निखारे के प्रयास में लगगे। घर काम में अपन मॉं के हाथ बँटाई ओकर दिनचर्या में शामिल रीहिस। 

         एक दिन मोर संगवारी राधे अक्करहा दऊंड़त हमर घर अइस, खैरपा ला भड़ाक ले पेलके परछी में ले दे के रुकिस तभोले पठेरा के आँट में ओकर मुड़ी लागिचगे। भड़भिड़-भड़भिड़ भड़ाकले बजई में हमर घर कोहराम मचगे, सब कोई जतर कतर ले दऊँड़त अईन। 

सबे मन पूछिन_ "का होगे "? काये बाजिसे तेहा?

     सबे मन इही सोंचत रीहिस "मरखंडा बछवा फेर खूंटा ला टोर दीस"! ओतका बेर मेंहा बासी खावत रेहेंव, राधे के मार हफरत दऊँड़त अवई ला देखके महूँ हड़बड़ागेंव। हॉत के कॉंवरा हाथे में । 

राधे हफर-हफरके अपने बतईस _ "रज्जू घर बड़ मैनखे सकेलाय हवे, मोला तो ओकर दाई मरगे तइसे लागथे।" 

      तुरते हॉत ला अँचोके जैसने राधे दऊँड़त आय रीहिसे वइसने महूँ हा सपरट दऊँड़त रज्जू घर गेंव, मोर पाछू राधे अउ हमर घर के सब कोई दौंड़त अइन, अइसने पूरा गाँव सकेलागे, एकेचकनी में हमर स्कूल के सबे लइका मन आगे। 

          आठवी के वार्षिक परीक्षा के पहिली ओकर दाई निर्मला हुरहा बीमार परगे रीहिसे। अस्पताल में पॉंच छै दिन भरती रहे निर्मला कतको जतन के बाद भी नइ चेतिस। रज्जू के जिनगी में दुख के पहाड़ गिरने। आठवीं परीक्षा शुरू होयके दू दिन पहिली महतारी के मौत हा रज्जू ला पथरा बनादिस।अपन पास के एक झन बहिनी पारो अउ भाई राजू के बोझा अब रज्जू ऊपर आगे। ओमन ला पोटारे रज्जू अपन दाई ला मरघट्टी लेगे के तैयारी ला बोट-बोट देखत रीहिसे। विधाता के पटके ये दुख के पहाड़ ला सगा-सोदर, पारा परोस अउ गॉंव भरके मन महसूस करत रीहिन। जे देखिस सुनिस तेकर मुहूँ सुखागे। सबे मन एक दूसर ले काहय अब का होही येे लइका मनके। 

          स्कूल में प्रार्थना के संग श्रद्धांजलि सभा के बाद छुट्टी करे गीस, तहॉंले हेडमास्टरिन, गुरूजी अउ लइका मन संघरा रज्जू के घर आइन। मुड़ी धरे मुड़सरिया में बइठे, एक टक अपन दाई के पींवरा परे मुहूँ ला देखत रज्जू हुरहा हेडमास्टरिन, गुरूजी अउ संग में पढ़ैया लइका मनला देखिस त पहाड़ कचारे बरोबर बोम फारके रो डरिस, काकरो मन धीरज नइ धरिस, सब रो डरिन। 

     बड़े मेडम हा ढाढस बंधावत कीहिस_"तैं फीकर झनकर बेटी हमन तोर संग हन, अपन आपला अकेल्ला झन मान ,  हमन सब डाहन ले तोर सहयोग करबो।"

            अउ अपन पर्स ले अब्बड़ अकन रुपिया निकाल रज्जू के हाँथ में धरादिस। डारा ले गिरे बेंदरी के पीला जइसे अपन महतारी ले लिपट जथे, वइसने रज्जू हा बड़े मेडम संग लिपटगे, ये बेरा पूरा घर चिरो-बोरो रोवई में गूंजगे। 

           रज्जू के माँ के तिजनहावन कार्यक्रम के दिन हमर मनके पहिली पेपर हिन्दी राहिसे। बड़े मेडम ये पेपर ला बाद में देवायके बेवस्था पहिलिच ले कर दे रीहिसे। दुसरैया पेपर  एक दिन के आड़ में रीहिसे। गुरूजी मन रज्जू ला मना भुरियाके पेपर देवाय बर राजी कर डरिन। रज्जू हा जीवन के संघर्ष- यात्रा बर तैयारी करके परीक्षा देवाय लागिस ।

              

             

               (2) 


           परीक्षा उरकगे अउ सगा सोदर मन देय रीहिस तेन  धान चॉंवुर पैसा सब उरकगे। अब रज्जू ला अपन आगू के जिनगी अउ अपन भाई बहिनी मन के भविष्य के फीकर सताय लागिस, कहॉ ले पैसा आही, काली का खाबो, ये फीकर ओला रात भर सूतन नइ दीस। ठंडा सॉंस भरत, बाखा बदलत, आगू जिनगी के योजना बनात,दयालू चोला के मनखे खोजत, गौंटनिन दाई मेर जाके मन थिराइस अउ नींद परगे।

          पहाती उठ गाय गरू के गोबर कचरा डार, पेरा भूँसा दे के पानी कांजी भर डरिस अउ बेरा उत्ती गौंटिया घर जाके गौंटनिन दाई ला अरजी करीस_"दाई मेंहा तुंहर पानी कांजी भर दुहूं, गोबर कचरा कर दुहूं, मोला काम देदे दाई, मोला काम देदे, मोर अरजी ला सुन ले।"

         गौंटनिन दाई ओकर सोगसोगान मुहूं ला देखके रोवॉंसी होके कीहिस _"तैं नानचुन लइका मैं तोला काय काम करवाहूं बेटी, ले कियॉंरी मन में पानी डार देबे अउ कोटना में आधा कोटना पानी भरके ऊपर टंकी में पानी चढ़ा देबे" कहिके पंप ला चालू करदिस। आधा घंटा में काम निपटाके रज्जू गौंटनिन दाई मेर खड़े होगे तब गौंटनिन दाई हा ओला खनखनात पानरोटी अथान अउ पचास रुपिया देके कीहिस-"बड़ सुंदर कमाय बेटी तें अब रोज आ जायकर अउ आज जतका कमाय हस अतकी बुता रोज करदेबे मेंहा तोला अतकी रुपिया रोज के देहूं।" 

         सुनके रज्जू खुश होगे, अउ गौंटनिन दाई के पॉंव परके कथे_

तैं मोरबर भगवान अस दाई, तोर एहसान ला मेंहा कभू नइ भुलॉंव। "

        गौंटनिन दाई के घर ले अपन घर जावत रज्जू के गोड़ खुशी के मारे भुईयॉं में नइ माड़त रीहिस। अब ओकर रोज बिहनिया के इही दिनचर्या रीहिसे। 

           रज्जू ला आधा घंटा कमई  के अत्तिक पैसा पावत देखके अउ कमैया मन कसकसागे राहय । एक दिन ऊँकर घर के झाड़ू पोंछा करैया कथे_

       "हमरो बनी ला बढ़ादे गौंटनिन दाई रज्जू ला रोज आधा घंटा कमई के पचास रुपिया देथस, हम अइसन अन्याय ला नइ सहि सकन।"

     तब गौंटनिन दाई कीहिस _"तुंहर जवानी ला धिक्कार हे रे, तुमन नानचुन लइका के हिजगा करथो, मेंहा वो लइका के कमई के नहीं, ओकर अपन परिवार ला चलायके हिम्मत अउ अपन जिनगी में कुछू करे के हौसला के कीम्मत देथँव। देख लेना ये नानचुन लईका अपन जिनगी में सिर्फ बनिहार बनके नइ राहय, जरूर कुछू करही अउ कुछू बनके रही, ये मोर आत्मा काहथे। मैंहा वो लइका बर सब कुछ कुर्बान कर सकथँव, तुमन कोन होथो बोलने वाला।" 

        फेर गौंटनिन दाई थोकिन चुप रहिके शांत होके कीहिस_" देख बेटी भानू वो लइका टूट गेहे वो, ओकर दाई ददा दुनो नइहे, ओला सहारा के जरूरत हे। रुपिया पैसा हा जिनगी बर सब कुछ नोहे, दूसरा के जिनगी ला सहारा देबर कुछू करेके प्रयास ला तुमन टोरव झन। महूं अतिक निरदइ नइ हँव, तहूँ मनला जी खोलके देथँव, फेर तुमन ये नानचुन लइका के हिजगा झन करो, चलो अपन काम में लग जाव।"

        गौंटनिन दाई के बात ला सुनके सबे कमैया मन मानगे अउ अपन-अपन काम-बुता मा लगगे। रज्जू हा ऊँकर मन के बीच के गोठ-बात ला सुनत रीहिसे, वो जानगे कि गौंटनिन दाई हा ओला ओकर मेहनत ले जादा पैसा देवथे। अब रज्जू हा गौंटनिन दाई के घर, कोठा,बाड़ी बखरी के छोटे छोटे काम बुता करे लागिस। घर में आये सगा-सोदर मन करा चाय पानी लेगई के बुता रज्जू को पोगरी होगे। थोरिक दिन में घर के सबे सदस्य अउ कमैया मन के मन ला जीत डरीस, हमेशा गुमशुम रहैया रज्जू अपन मॉं ले बिछड़े के पीरा ला भुलाके जीवन के उतार चढ़ाव मा सम्हलके रेंगे लागिस। 

          परीक्षा के रिजल्ट आगे यहू साल रज्जू अपन स्कूल में अव्वल आइस। अइसन बिपत के बेरा में धीरज बनाके रखे के सेती स्कूल के सबे मास्टर मास्टरिन मन ओकर बड़ बड़ाई करीन। 

           हाईस्कूल हा गॉंव ले छै किलोमीटर दुर्हिया रीहिसे, संगवारी मन संग जाके रज्जू हाई स्कूल में भरती होगे। अब रज्जू रोज बिहनिया ले संझा तक घर ,स्कूल अउ गौंटनिन दाई के घर के बुता में बेंझवाय लागिस, ओला एकोकनी पढ़े के बेरा नइ मिलत रीहिसे, हप्ता, पंदरही में रज्जू करियागे। गौंटनिन दाई रज्जू के मन के पीरा ला जान डरीस। एक दिन कीहिस_"जब ले मोर नोनी शिखा के बिहाव होय हे बेटी, ये साइकिल हा माड़ेच हवे, जा बेटी ये साइकिल ला लेजा, तोर बेरा मों स्कूल जायके काम आही। मन लगाके पढ़ अउ जिनगी के सुग्घर रद्दा गढ़।"

          नवा टायर,तारा, घंटी, फुंदरा लगे चुक-चुकले, नवॉं दुलहिन बरोबर सजे साइकिल ला  देखके रज्जू खुश होगे, फेर थोरिक उदास होके कीहिस -"एकर कोनो जरूरत नई रीहिस दाई, मेंतो दौंड़त चल देथों, फेर बता के पैसा दुहूं। "

         तब गौंटनिन दाई कीहिस "मैं कोनो बैपार करथँव वो, जेमे तोला पैसा में दुहूं" अउ रज्जू ला छाती में ओधाके कीहिस, _"माड़े माड़े सबे खराब होगे रीहिस बेटी, तोरेच बर एला बनवाय हँव, लेजा एमा स्कूल जाबे त मोरो मन माड़ही। "

         तब रज्जू हा ओला पोटारके कीहिस_"मेंहा तोर कब काम आहँ दाई, तोर ये सबे करजा ला कब छुटहूं वो। "

      रज्जू बर ये साइकिल हा कोनो सूरज चंदा ले कम नइ रीहिस, जेकर सपना देखई तक पहाड़ रीहिसे, वहू हा गौंटनिन दाई के किरपा ले पूरा होगे। अब सबे काम बेरा में हो जाय । नौंवी कक्षा में अभिभावक के रूप में गौंटनिन दाई के नाम लिखवाय रीहिसे। एक दिन ओकर स्कूल के प्राचार्य हा  गौंटनिन घर मेर रुकके पूछिस_"रज्जू घर में हवे का।" गौंटनिन दाई ओतिक बेरा घर में नइ रीहिस, ओकर बेटा आरो ला सुनके बाहिर आवत कीहिस

-"ओकर घर थोरिक दुरिहा में हवे, मैंहा बुलवा देथों, आप मन बैठो।" अउ लइका मनला भेजके रज्जू ला तुरते  बलवादेथे। चाय पानी के पीयत ले रज्जू अंगरी फोरत आगे अउ कीहिस

-"का बात आय भैया मोला कइसे बलवाय हव। "

     अउ अपन स्कूल के प्राचार्य ला चिन्ह के प्रणाम सर कहिके पॉव परीस, ओतकी बेरा गौंटनिन दाई तक पहुंचगे, अउ कीहिस

_ तोर स्कूल के गुरूजी मन आय हे बेटी चल चाय पानी पिया। "

     गुरूजी कीहिस _"हमन पी डरे हन, एक ठन खुशखबरी देय बर आय हन, हमर विधायक महोदय के अनुशंसा ले, तुंहर गॉव के होनहार बेटी रज्जू के चयन शहर के बड़का स्कूल में सरकारी खर्चा में पढ़े बर होगे हवे, जेमा छात्रवृत्ति तक मिलही।"

         अतका सुनके रज्जू चहकगे अउ ताली पीटत कूदत अपन खुशी व्यक्त कर डरीस, फेर अपन बहिनी भाई के सुरता आते भार बुझाय दीया बरोबर रुआँसू होके कीहिस_

         "नहीं सर में कहुंचों पढ़े ला नइ जॉव, मोर नान नान भाई अउ बहिनी मनके का होही।"

    तब गौंटनिन दाई के बेटा विधायक करा तुरते फोन लगाइस अउ कीहिस_ विधायक महोदय रज्जू के नान्हे नान्हे भाई बहिनी मनके घलो कोनो बेवस्था करदेतेव ताकि तीनो झन एके जघा रहिके पढ़ सके। "

         विधायक महोदय हा रज्जू के जिनगी के उतार-चढ़ाव ला जानत रीहिसे, वो तुरते कीहिस_"मोला सब मालूम हे दाऊजी, मेंहा ऊँकरो मनके व्यवस्था कर डरे हँव। तुंहर गॉव के ये होनहार लइका मनला तुमन सम्मानपूर्वक शहर भेज देव, बाकी सबे बेवस्था ला में देख लुहूँ।" 

        बिहान दिन गॉंव के सरपंच पटैल, ग्राम प्रमुख, गौंटनिन दाई अउ ओकर बेटा संग गॉंव भरके मैनखे जुरियाय, रज्जू ओकर भाई अउ बहिनी ला, बड़का शहरके बड़ेजन स्कूल में अमराके आगे। 


                    3

               

          आज बारा बछर होगे.....


      बड़े बिहनिया कोतवाल हा हॉंका पारिस_ "आज हमर गॉंव में सब काम धाम बंद हे, बारा बजे पंचायत चौंक मेर सकेलात जाहू हो.......!"

 सब कोई पूछे_" का होगे कोतवाल ? का बात बर गॉंव बंद हे ? "

कोतवाल कीहिस_"में नइ जानों ददा, ऊप्पर ले शासन के आदेश आय हे।"

गॉव के मन पटैल कर गीस, सरपंच करा गीस, कोनो ला कुछू नइ मालूम, अतका भर पता चलिस कि हमर गॉंव में बड़े जन साहब अवैया हे। सब गॉंव भरके मन अगोरा करत राहय, सबे मन सोंचत राहय कोन साहेब होही? 

            बेरा उत्ती बड़े बड़े मशीन गॉंव के कच्ची सड़क ला डामरीकरण करे बर आगे। 10के बजत ले गॉंव के कच्ची सड़क डामर के होगे । पूरा गॉंव डामरे डामर महमहावथे। पंचायत के आघू के बिगड़हा बोरिंग बनगे। गौरा चॉंवरा कराके बोरिंग में पंप फिट करके बीच गली के आवत ले चार पॉंच जघा नल लगगे। वृक्षारोपण करे बर पौधा पटकागे, अब्बड़ अकन गड्ढा खनागे। पंचायत के आघू मा मंच तैयार होगे, पंडाल तनागे, अब्बड़ अकन कुर्सी सजगे, माइक बाजे लागिस, देशभक्ति के गीत गूंजगे_"मेरे देश के धरती सोना उगले, उगले हीरा मोती, मेरे देश के धरती.....। "

      ग्यारा बजे अब्बड़ अकन कार आके पंचायत के आगू में रुकिस, पूरा गॉंव सकेलागे, हमर गॉंव में बड़ेज्जन साहब आगे। सरपंच, पटैल, पंच अउ गॉंव वाले मन जाके फूल माला में कार ले उतरते भार साहब मनके अगुवानी करीन। चमचमाती कार उतरैया मन तक शूट बूट में, पूरा गॉंव भरके सकेलाय मनखे मन खुसुर-फुसुर करथे, फेर फूल माला देवैया मनला वो साहब मन कहिदिन_

"अरे हमन नोहन भैया, बड़े साहब बाद में आही, हमन बेवस्था देखे हर आय हन। "

      अब पूरा गॉंव के सबे बेवस्था के निगरानी करे गीस - बिजली, पानी, सड़क, साफ सफाई  सब चकाचक.....! 

       पूरा गॉंव के मन ये साहब अउ सबे विभाग के कर्मचारी मनके चाय पानी के बेवस्था में लगगे। सवा ग्यारा बजे एक ठन अउ कार अइस, गॉंव भरके मन अउ पहिली आय रीहिस ते साहब मन उत्ता-धुर्रा वो कार डाहर दौंड़िन, गिरत हपटत वो साहब के तीर में जावत ले कार में बैठे साहब हा कार के रुके के पहिलिच ले कार के दरवाजा खोलके उतरत गिर परीस, अउ पहिली ले आय साहब मनला खिसियाके कीहिस_

       "पागल हो तुमन ईहॉं चाहा पीये ला आय हव, मोला नौकरी ले निकलवा दुहू का, गॉंव के बाहिर में स्वागत गेट कोन बनवाही। "

   अब सब कोई ला सुरता अईस, टेंट वाले ला कहिके जल्दी-जल्दी सुन्दर गेट बनवाय गिस, अउ पेंटर ला कहिके, सफेद कपड़ा के बेनर में स्वागत हे कहिके लिखवाय गिस। गॉव के स्कूल के हेडमास्टर ला कहिके तुरते लइका मनके सांस्कृतिक कार्यक्रम तैयार करवाय गिस। 

         अब तो पूरा गॉंव आश्चर्य में परगे हमर गॉंव में अइसन कोन साहब अवैया हे, जेकर बर हमर गॉंव के अत्तिक साज सिंगार होवथे। 

        ठीक बारा बजे मेन रोड ले गॉंव के धरसा में नवॉं बने सड़क डाहन आठ नौ ठन गाड़ी के काफिला मुड़िस, वॉंऊँ-वॉंऊँ, वॉंऊँ-वॉंऊँ गाड़ी के शायरन दुर्हिया ले गूंजगे। गाड़ी में बैठे मोर मन अपन बचपना के फोटो  खींचत रीहिस। जीवन के संघर्ष यात्रा में तपके निखरे रज्जू हमर जिला के कलेक्टर बनगेहे। 

          ***

           

लेखक_ डॉ.अशोक आकाश

ग्राम -कोहंगाटोला पो.ज.सॉंकरा, 

तहसील जिला बालोद, छत्तीसगढ़

मोबाईल नंबर_ 9755889199

बेवस्था ल पटरी म लहुटाय के बुता करही: तुतारी पोखन लाल जायसवाल


 

बेवस्था ल पटरी म लहुटाय के बुता करही: तुतारी

पोखन लाल जायसवाल 

          आज के बेरा म नवा पीढ़ी कलम थामे सरलग आगू बढ़त हे। जादातर मन कविता के लाइन धरे हें, एक ले बढ़ के एक गीत-कविता लिखत हें। छत्तीसगढ़ी साहित्य के बढ़ोतरी बर माथा म संसो के जेन लकीर खिंचाथे, वो गद्य साहित्य के कमी के लकीर आय। फेर जेमन कलम थामे हें, वो मन गीत-कविता च म भुलायॅं हें। मगन हें। जेन ल देखबे, तेने सोशल मीडिया के वाह वाह के मायाजाल म फॅंसे नजर आथें। सोशल मीडिया जरूरी हे। पर लिखइया मन ल पद्य के संग गद्य के संसो घलव करना चाही। यहू सही बात हे कि सबो ह सब ल नइ साध सकय। यहू बात हे कि जेन लिखइया ए, उॅंकरे ले आस बॅंधथे, उॅंकरे ले भरोसा करे जा सकत हे। गद्य विधा ल सजोर आखिर लिखइया च मन कर पाहीं। गद्य के कोठी म चाहे कहानी, निबंध, व्यंग्य के पोठ दाना भरय, चाहे संस्मरण, उपन्यास के होवय ते अउ आने कुछु के दाना। भरे ल परबे करही। इॅंकर ले भरे बिगन छत्तीसगढ़ी साहित्य उन्ना च लागही। छत्तीसगढ़ी के हिनमान करइया मन इही ल बहाना करहीं अउ पूछहीं छत्तीसगढ़ी म गद्य कतेक हे? एकर जवाब देये बर ही सही फेर गद्य तो लिखे ल परही। इही क्रम म कहानी लेखन ले छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य ल मजबूत करइया अउ छत्तीसगढ़ी कहानी के नवा पीढ़ी के चर्चित कहानीकार चंद्रहास साहू के कहानी किताब तुतारी के गोठ करहूॅं।

          पुरखा मन के थाती ल संजोये स्थापित अउ  हमर जुन्ना कहानीकार मन असीस अउ मया दुलार मिलबे करही। बस हम उॅंकर ले असीस लन।आज सरला शर्मा, सुधा वर्मा, सुशील भोले,पीसीलाल यादव, डॉ विनोद कुमार वर्मा, रामनाथ साहू, बिहारी लाल साहू, मंगत रवींद्र, चोवाराम बादल जइसन कतको कहानीकार के मया-दुलार ले छत्तीसगढ़ी कहानी बर नवसिखिया लिखइया मन ल पंदोली मिलत हे। 

          अभी के बेरा म छत्तीसगढ़ी कहानी ल धर्मेन्द्र निर्मल, डॉ. चुन्नी लाल साहू, टिकेश्वर सिन्हा, अशोक आकाश, चंद्रहास साहू, जितेन्द्र वर्मा खैरझिटिया, पोखन लाल जायसवाल मन नवा दिशा अउ मुकाम देवत हें। निमगा कहानी के क्षेत्र म लेखन करइया चंद्रहास साहू के योगदान सराहे के लइक हे। उन मन सरलग कहानी लिखई म लगे हें। तीन ठन किताब तिरबेनी, तुतारी अउ करिया ॲंग्रेज छप चुके हें। पत्र-पत्रिका मन म कहानी छपत रहिथें। उड़िया भाषा म अनुवाद के अलावा आपके कहानी आकाशवाणी रायपुर ले प्रसारण होवत रहिथे। सरकारी नौकरी म रहत हुए कहानी लेखन बर आपके समर्पण बंदनीय हे। 

          चंद्रहास साहू के दूसरइया कहानी संग्रह 'तुतारी' आय, जउन म उॅंकर 16 कहानी हें। आपके कहानी के सबले बड़े खास बात ए रहिथे कि आप कहानी के जम्मो पात्र के चरित्र संग पूरा-पूरा नियाव करथव। आपके द्वारा जरूरत के मुताबिक कतकोन ॲंग्रेजी शब्द के प्रयोग करे गे हे। जे ह पात्र अउ समय के संग फिट बइठथे। भाषा सरल, वाक्य म प्रवाह, जीवंतता देखे मिलथे, अउ शब्द संयोजन के संग कहावत अउ मुहावरा मन पाठक के हिरदे म ठउर बना लेथे। कई-कई जघा उत्तम पुरुष एकवचन के बलदा मध्यम पुरुष एकवचन ह पाठक के पढ़ई म बाधा परत दिखथे। एला टंकण त्रुटि कहिके बचे नइ जा सकय, काबर कि अइसन त्रुटि एकाध जघा रहिथे। आपके कहानी म गॅंवई-गाॅंव के मनभावन चित्रण मिलथे। आम आदमी अउ उपेक्षित लोगन के दुख-पीरा, संघर्ष, नारी-विमर्श, भ्रष्टाचार, लोक परम्परा ल छूअत, बेवस्था के खिलाफ अउ छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान जइसे कथानक आपके कहानी म मिलथे। आप सामाजिक चेतना ले जोरत कहानी ले अपन सामाजिक सरोकार ल पूरा करे हव।लोक संस्कृति ले जुरे चिन्हारी मन के चित्रण आपके कहानी के देशकाल अउ वातावरण के गाथा कहि डारथे। कथातत्व के दृष्टि ले आपके कहानी कोनो मेर कमती नइ जनावय। कवर पृष्ठ कहानी तुतारी के अगुवाई करत हे अउ आकर्षक हे। कोनो-कोनो कहानी के शुरुआत अतेक लाम होगे हे कि कहानी के मूल कथानक के शुरुआत बिलम होय ले पाठक ल उबासी लगे धर सकत हे। लेखन अउ भाषा शैली के कमाल आय कि पाठक पढ़े ले नइ उबय। फेर आगू कहानीकार के प्रति मोह भंग होय के डर जरूर हे। अन्य वर्णन ल कमती करे जा सकत रहिस हे। ए बात मोर ए लेखन बर भी लागू हो सकत हे। फेर मैं ह अभी छत्तीसगढ़ी कहानी के कमती लेखन बर अपन पीरा अउ संसो ल रखत हुए ही आगू बढ़े के कोशिश करे हॅंव। चलव आप ल बिना बिलमाय किताब के कहानी डाहर ले चलवॅं।     

               किताब के पहिलीच कहानी 'जकही' जकही के मानवीय संवेदना ले सराबोर हे। महतारी देवकी होय ते यशोदा, ओकर मया अउ ममता का होथे? ओला एके लाइन ह समझा देथे-

       "दू दिन का दूध पिया देस, अतका मया पलपलागे....जकही नहीं तो!" पृ 23

        समाज जेन ल जकही कहिके उपेक्षा करथे, उही समाज के मनचलहा मन उही जकही के का गति करथे यहू ल देखव- 

         "मनचलहा मन तो लाश ल नइ छोड़े....। येखर तो जाॅंगर चलत हावय। कइसे बाॅंच जाही राक्छस मन ले? धिक्कार हे अइसन मरद ल।" पृ 16

          इन्दरानी म नारी के संघर्ष अउ नारी-अस्मिता अउ स्वाभिमान ल बचा के रखे के संदेश इन्दरानी के माध्यम ले दे गे हे। ए कहानी म एक कोती अबला नारी ऊपर नीयत गड़ाय दलाल भीखम जइसे राक्षस के चालबाजी, दूसर कोती गुरुजी मन के मान, जिनगी के दू धारी फॅंसे इन्दरानी के द्वंद्व हे, त नवा पीढ़ी के झूठी शान अउ सेखी मारे बर अपन दाई-ददा ले दुर्व्यवहार हे। ए सब कुछ ल बड़ सुघरई ले शामिल करे गे हे। दाई-ददा के आशा कइसे धरे धरे रहिथे यहू हवय ए कहानी म।

         हिरदे ल तार-तार करइया संवाद देखव-  "शहर म मोर अब्बड़ इज्जत हावय, मोर संग झन भेंट करबे दाई!" पृ .33

         कहानी के छेवर म जिनगी के दर्शन हे।  मोटियारीपन म अपन काया के गरब रहिस अब वहू ह सरहा होगे।... खटिया म परे इन्दरानी के गुनान आय।

           किताब के नाॅंव 'तुतारी' कहानी के ऊपर हे, जउन म भ्रष्टाचार के पोल खोलत सर्वहारा वर्ग किसान के पीरा हे। भ्रष्टाचार म तरी मुड़ ले बुड़े साहब के लालच अउ निसरमापन ल परत दर परत उघारे म कहानीकार कमी नइ करे हे।

        किसान के पीरा अउ विनती के एक बानगी- 

        "ये जस के बुता तोरे हाथ म होही अइसे लागथे साहब! मोर बनौती बना दे। हाथ जोरत हॅंव साहेब।" पृ 39

        साहब के चाल अउ नीयत के बानगी घलव देखव-

       ‌"परदेसी! तोर गोसाइन के बाहा के पहुंची ह मोर घर पहुॅंचही..। तभे तोर खेत म बिजली पहुॅंचही, इमान से।" पृ 40

          आखिर म साहब के बहाना बाजी ले थक हार के गुस्साय परदेसी के अधिकार के गोठ संग कहानी के शीर्षक तुतारी ल घलव सार्थक करथे।

           देवारी तिहार के साॅंस्कृतिक मूल्य ल सहेजे प्रेमी जोड़ा के प्रेम कहानी आय सोहाई। ए जोड़ा समाज के मुख्यधारा ले भटक के नक्सल मन के चंगुल म फॅंसे अपने लोगन मन के बइरी बन गे रहिन। फेर गाॅंव के माटी के ममहासी, लोक संस्कृति म रंगे लोगन ले मिले ननपन के मया दुलार के सुरता ऑंखी ल खोल देथे। अपन हित अनहित ल समझ लेथे। धरती ल लाल करइया मन ले मुक्ति दिलाथे।

           परसा फूल म बहू बेदू शहर ले गॉंव आना नि चाहय अउ आय के बाद सास-ससुर के सेवा जतन करे बर समर्पित हो जथे। शहर लहुटना नइ चाहय।

            परेमा नोनी कहानी ह अपन डीह डोंगर तिर नौकरी नइ मिले ले बस्तर म जाके नौकरी करइया मन के मनोवैज्ञानिक कहानी आय। जेमन नवा नौकरी के आस धरे शहर कोती लहुटे के रटन धरे रहिथें। फेर बस अउ तर जा, इही तो बस्तर आवय, काहत परेमा नोनी बस्तर म बसी जथे। उहाॅं के लोगन ले जुड़ाव ल छोर नवा नौकरी के मोह छोड़ देथे।

            उपेक्षित अउ शोषित लोगन के पीरा ल सरेखत नारी अस्मिता संग खेलवार करइया मन के मुॅंह म थपरा मारत कहानी हे- थपरा। जेन नारी सशक्तिकरण के आवाज ल मुखर करथे। ओहदादार मन मजबूर अउ कमजोर माइलोगन ल का का नइ कहिथे। उॅंकर करतूत ल उघार देथे।

      थानेदार के गोठ ल देखव-  "मोला खुश कर दे, ताहन तहूॅं उछाह म रहिबे जीवन भर।"

       "जिस्म के सुख में छुआछूत नहीं होता पगली! चल जल्दी...." पृ 93

        भ्रष्टाचार के अंधेर जेन आजकल चरम म हे। ओ एक ठन सरूप ए कहानी म देखे ल मिलथे। तभे तो थाना म थानेदार के दराज ले चालीस हजार रुपिया निकल जथे। कइसे अउ काबर? ए तो कहानी पढ़े ले समझ आही।

           छत्तीसगढ़ के बस्तरिहा भुइयाॅं आय दिन लाल रंग म रॅंगत रहिथे , उही भुइयां के प्यास बुझावत कहानी हे माटी के करजा। 

            'पाठ पीड़हा' गरीबी अउ बेरोजगारी के चलत दूसर राज गे परिवार के शोषण के कहानी आय। गरीब अउ मजबूर मनखे के संग बाहिर म का का बीतथे? एकर लेखा-जोखा हे अउ कोन हालत म लहुटथे, अपन डीह डोंगर यहू कहानी म हे। पढ़े के पाछू अइसे लगथे कि ए तो हमरे तिर के कोनो गरीब के राम कहानी आय।

           सरबस पूंजी लगा के पढ़ाय बेटा के नौकरी नइ लगे ले हताश अउ निराश संघर्षरत मनखे के कारुणिक कहानी 'अलहन' हे। अपने राज म छत्तीसगढ़िया मन रोजगार बर तरसत हें अउ परदेसिया मन ल नौकरी मिल जावत हे। ए समस्या ल उघारत ए कहानी के शुरुआत अउ विकास बढ़िया हे। फेर अंत जेन ढंग ले करे गे हे ओ ह विचारणीय हे। एकर ले समाज म बढ़िया संदेश नइ जाय। हो सकत हे, सत्य घटना के ऊपर ए कहानी लिखे गे होही, लेकिन रचनाकार ल एला कुछ अउ मोड़ देना चाही। तभे तो साहित्य के सार्थकता समाज हित म बने रही।  

           बेवस्था म लगे लोगन कमजोर मन ऊपर कइसे डंडा चलाथे अउ धाक वाले मन के मुहटा म कइसे पानी भरथे। उॅंकर चाकरी करथे। एला फरी करत 'चढ़ोतरी' कहानी ए बताय म सफल हे कि आफत म अवसर खोजइया लालची के का गति होथे। 

            मोला ए किताब के सबले बढ़िया कहानी 'चिरई चुगनी' लगिस। जउन म छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान अउ अस्मिता बर चंद्रहास साहू जी के संसो हर छत्तीसगढ़िया के होना चाही। परदेसिया मन इहाॅं आके परछी म रहे के आश्रय माॅंगत हमरे घर के मालिक कइसे बन जथे? अउ हम सरबस लुटा जथन।  सोशल मीडिया ले जुरे दू प्रेमी मन के मया कहानी के मुहरन म गढ़े ए कहानी अवइया समय म अपन छाप छोड़ही, सुते छत्तीसगढ़िया मन के चेतना जगाही। सोशल मीडिया ले बने रिश्ता कतेक सही हे? एकर भरम टूटही। ए कहानी स्वाभिमान जागरण के प्रतिनिधि कहानी म शुमार होही।

            'तुतारी'  म शामिल जम्मो कहानी म छत्तीसगढ़ के माटी के ममहासी हावय। छत्तीसगढ़ियापन हे। मोला पूरा अजम हे, विश्वास हे कि तुतारी बेवस्था ल पटरी म लहुटाय के बुता करही। शोषक मन कुकुर के पूछी सही सोज तो नइ होवय। जनता ल जागे ल परही, अपन विरोध मुखर होके जताय ल परही। ए दिशा म तुतारी अपन बुता करही।=============

किताब : तुतारी

कहानीकार : चंद्रहास साहू 

प्रकाशक : सर्वप्रिय प्रकाशन दिल्ली

पृष्ठ: 160

मूल्य 200.00 रूपये

कापीराइट : लेखकाधीन

================= 

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार भाटापारा छग

मो . ६२६१८२२४६६

संस्मरण मोर कालेज जिनगी

 संस्मरण 

                     मोर कालेज जिनगी 


हमर जिनगी मा पढ़ई जीवन के गजब महत्व हे. इही वो समय रहिथे जेकर उपर भविष्य हा निर्भर रहिथे. जइसे एक मजबूत मकान बनाय बर मजबूत नेंव चाही. वइसने जिनगी रुपी मकान मा हम बने बने रहि सकन तेकर खातिर पढ़ईरूपी नेंव ला बने पोठ बनाय ला पड़थे. तब कहीं जाके हमर जिनगीरूपी गाड़ी के चक्का हा ये दुनियारुपी सड़क मा बने चल पाथे. 

       जहां तक मोर पढ़ई लिखई के बात हे ता मेहा प्राइमरी स्कूल से बारहवीं तक मोर गांव सुरगी मा ही पढ़े हंव. हमर गांव हा राजनांदगांव से अर्जुन्दा मार्ग मा राजनांदगांव ले 13‌ किलोमीटर दूर हे. येहा बड़का गांव हे जिहां बीस के दशक मा प्राइमरी स्कूल अउ 1961 मा हाईस्कूल खुल गे रिहिन हे. 

       1994 मा शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला सुरगी ले कामर्स विषय मा द्वितीय श्रेणी मा परीक्षा उत्तीर्ण होय के बाद शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय राजनांदगांव मा प्रवेश लेंव. इहां आर्ट विषय लेंव काबर कि वो समय मोर घर के स्थित -परिस्थिति अइसे रिहस कि मोला ये आभास होगे रिहिस कि मेहा सरलग कालेज नइ जा पाहूं. आर्ट मा गेप करके कालेज जाहूं तभो चलही. कालेज जिनगी मा जब हमर खेती -किसानी डहर बुता राहय ता मेहा कालेज जवई ला भूल जांव. सप्ताह - पंद्रह दिन मा एकाध दिन जावौं.


         कालेज के मोर पहिली बछर गुमनामी मा बीतगे. कोनो नइ जान पाइस कि इहां ओमप्रकाश साहू नांव के कोई छात्र पढ़थे जेकर  अब्बड़ रुचि साहित्य, वक्तृत्व कला, निबंध लेखन अउ सामान्य ज्ञान मा  हे. जबकि शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला सुरगी मा इही सब रुचि के कारन मोर अलगे पहिचान बने रिहिस हे. मेहा खुद पहिली साल कोनो रचनात्मक गतिविधि मा भाग नइ लेंव. कभू- कभू ता कालेज जांव ता आने गतिविधि डहर धियाने नइ देंव. 


    रिजल्ट आइस ता बी.ए. प्रथम साल ला पास होगेंव. सेकण्ड इयर मा पढ़त खानि शुरूच मा एन. एस. एस. (राष्ट्रीय सेवा योजना) ले जुड़ गेंव. वो समय राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी बुधियार साहित्यकार, भाषाविद अउ सरल,सहज,सरस व्यक्तित्व के धनी डा. नरेश कुमार वर्मा (भाटापारा-बलौदाबाजार ) रिहिन हे. रासेयो मां  हमर गांव के अब्बड़ प्रतिभाशाली छात्र अउ मोर संगवारी दिलीप कुमार साहू "अमृत "हा पहिली ले जुड़े रिहीन हे. वोमन सीनियर छात्र रिहिन हे. वोहा मोर प्रतिभा ले परीचित रिहीन. 


     बछर 1996 मा  एक दिन दिग्विजय कालेज के नवीन सभागार मा " नशा और युवा वर्ग" विषय मा परिचर्चा आयोजित करे गिस. येमा मोर नांव मोर मितान दिलीप कुमार साहू हा लिखा दिस अउ बताइस कि तोला ये विषय मा बिचार रखना हे. एक बछर गुमनामी मा बीतगे रिहिस हे अउ मोरो अंदर के प्रतिभा हा वो दिन कुछ अइसे करे बर उछाल मारत रिहिस कि ये कालेज मा एक अलग पहिचान बन जाय. अउ वइसने होइस. दर्जन भर ले जादा वक्ता मन अपन बिचार राखिन. जउन दू -चार वक्ता मन के वक्तव्य ला जादा पसंद करे गिस वोमा महू हा शामिल रेहेंव. छत्तीसगढ़िया शैली मा देय गे मोर भाषण ले सभागार मा उपस्थित विद्यार्थी अउ प्राध्यापक वर्ग हा बने प्रभावित होगे. ताली के गड़गड़ाहट ले नवीन सभागार गूंजगे.कालेज के विद्यार्थी मन मोर वक्तव्य ले खुश होके मोर ले हाथ मिलाके बधाई अउ शुभकामना देइन. परिचर्चा कार्यक्रम के संचालक प्रो. त्रिपाठी हा घलो गजब प्रसन्न होना .इही दिन ले दिग्विजय कालेज मा एक वक्ता के रूप मा मोर अलग पहिचान बनगे.अउ बाद मा मोर कविता लेखन ,निबंध लेखन , मंच संचालन अउ सामान्य ज्ञान ले घलो परीचित होइन. कालेज मा पढ़त खानि मोला  गुरुदेव डा. नरेश कुमार वर्मा(भाटापारा-बलौदाबाजार)प्रो. मेजर खड्ग बहादुर सिंह, डा. चंद्र कुमार जैन, डा. के.एल. टांडेकर,प्रो.आर. पी. दीक्षित, प्रो. तंबोली , प्रो.शैलेन्द्र सिंह हा गजब प्रोत्साहित करिन .


        बछर 1996 -97 मा हमर कालेज मा आयोजित भाषण,वाद -विवाद परिचर्चा, निबंध लेखन अउ सामान्य ज्ञान स्पर्धा मा बढ़ चढ़ के भाग लेंव . ये सब विधा मा कभू न कभू अव्वल आके मेहा जिला स्तरीय प्रतियोगिता में अपन कालेज के प्रतिनिधित्व करेंव. साल 1996 अउ 1997 मा महाविद्यालयीन निबंध प्रतियोगिता में प्रथम आयेंव अउ शासकीय कमला देवी राठी महिला महाविद्यालय मा आयोजित जिला स्तरीय निबंध प्रतियोगिता मा अपन कालेज के प्रतिनिधित्व करेंव. दूनों बछर जिला मा दूसरा स्थान प्राप्त करेंव. एक साल खैरागढ़ कालेज के भवानी सिंह ठाकुर अउ दूसरा बछर कमला कालेज के छात्रा ह अव्वल स्थान हासिल करिन.ये समय कमला कालेज मा विदुषी डा. हेमलता मोहबे जी हा प्राचार्य रीहिन. मेडम जी हा घलो मोला आगू बढ़े बर प्रोत्साहित करिन."  एक साल  निबंध के विषय रिहिन -" आतंकवाद: मानवता के लिए एक अभिशाप "  


   उच्च शिक्षा मा चुनौतियां" विषय मा आयोजित म परिचर्चा मा महाविद्यालयीन स्तर मा अव्वल आके अंबागढ़ चौकी कालेज मा आयोजित जिला स्तरीय प्रतियोगिता मा अपन कालेज के प्रतिनिधित्व करेंव. इही समय वाद विवाद स्पर्धा मा पक्ष- विपक्ष मा हमर गांव के ही दिलीप कुमार साहू अउ प्रखर वक्ता चंद्रशेखर शर्मा राजनांदगांव ( अब डा. चंद्रशेखर शर्मा) हा दिग्विजय कालेज के प्रतिनिधित्व करिन. डा. चन्द्रशेखर शर्मा हा संस्कारधानी राजनांदगांव के बुधियार साहित्यकार अउ इतिहासकार 

स्व. गणेश शंकर शर्मा के सुपुत्र हरे . मोर साहित्यिक मितान हरे. 


  वर्ष 1997 मा महाविद्यालयीन स्तर मा आयोजित प्रश्न मंच स्पर्धा मा  अव्वल आके डोंगरगढ़ मा आयोजित जिला स्तरीय प्रतियोगिता मा अपन दिग्विजय कालेज के प्रतिनिधित्व करेंव. हमर कालेज मा द्वितीय स्थान मनोज कुमार साहू हा आइस जउन हा गांव रेंगाकठेरा के रहवासी रिहिन.  जिला स्तरीय प्रतियोगिता मा संगीत नगरी खैरागढ़ कालेज के छात्र विवेक गुप्ता अउ ओकर जोड़ी हा प्रथम आइस वो समय सामान्य ज्ञान मा राजनांदगांव के मोर मितान अशौक पचौरी, रोशनी लाल देवांगन अउ राजीव शर्मा हा अब्बड़ प्रसिद्ध रिहिन हे. वो समय दैनिक सबेरा संकेत राजनांदगांव ( प्रधान संपादक अउ बुधियार साहित्यकार श्रद्धेय शरद कोठारी जी ) अउ दैनिक अरुणादित्य राजनांदगांव ( प्रधान संपादक अउ बुधियार साहित्यकार - श्रद्धेय आदित्य प्रसाद वर्मा जउन सुरगी हाईस्कूल के प्राचार्य रिहिन) के द्वारा सामान्य ज्ञान के साप्ताहिक)/पाक्षिक प्रतियोगिता आयोजित करे जाय. येकर माध्यम ले हमर जनरल नालेज हा बाढ़य. संस्कारधानी राजनांदगांव मा वो समय कतको संस्था मन घलो सामान्य ज्ञान अउ वाद विवाद स्पर्धा आयोजित करै जेमा मेहा भाग लेंवव अउ पुरस्कृत होंव. 

    1995 मा मेहा कविता लेखन के शुरूआत करेंव. येकर श्रेय दैनिक सबेरा संकेत राजनांदगांव ला जाथे. येकर प्रधान संपादक श्रद्धेय शरद कोठारी जी रिहिन. येकर ले पहिली दैनिक सबेरा संकेत के ही आपके पत्र स्तंभ मा अपन विचार ला भेंजव अउ प्रमुखता ले प्रकाशित होय.  सबेरा संकेत हा नवा रचनाकार मन ला सामने लाय बर बछर 1995 मा "पहल"अउ "सृजन" स्तंभ शुरू करिन जेमा चार लाइन के कविता लिख के भेजना राहय. ये स्तंभ मा हर सप्ताह करीब दो दर्जन  नवोदित रचनाकार मन रचना भेजय जेमा प्रथम तीन चयनित कविता अउ दू -तीन झन के विशेष कविता मन ला प्रकाशित करै. मोरो रचना हा कई बर चयन होके प्रकाशित होय. येकर ले मोला विश्वास होइस कि मेहा कविता लिख सकथंव. सबेरा संकेत के संगे -संग दैनिक भास्कर के स्तंभ" जन- जन के स्वर" अउ आने आने अखबार मन मा घलो कविता अउ लेख प्रकाशित होइस. दैनिक नवभारत  द्वारा एक निश्चित विषय उपर परिचर्चा राखे जाय जेमा चयनित लेख ला प्रकाशित करे जाय. येमा मोरो लेख ला स्थान मिलय.


 वो समय राजनांदगांव मा पत्र लेखक मंच राहय जेकर माध्यम ले मासिक काव्य गोष्ठी अउ साहित्यक परिचर्चा आयोजित करे जाय. कालेज जिनगी मा मेहा साहित्यिक गोष्ठी मा भाग लेना शुरू करेंव.  वो समय साहित्यिक गोष्ठी मा आचार्य सरोज द्विवेदी, डा. नरेश कुमार वर्मा, शायर अब्दुस्सलाम कौसर,डा. दादू लाल जोशी, बंशी लाल जोशी, कुबेर सिंह साहू, गजानन तिवारी,

आत्मा राम कोशा अमात्य, शतीश भट्टड, शत्रुघ्न सिंह राजपूत, नारायण सिंह ठाकुर, वीरेन्द्र बहादुर सिंह, गिरीश ठक्कर, शोभा श्रीवास्तव, दुर्गेश सिंह तोमर, इकबाल सिंह छाबड़ा, शैलेष कुमार गुप्ता, चंद्रशेखर शर्मा अउ आने साहित्यकार मन के सक्रियता देखते बने. 


बछर 1997 आजादी के स्वर्ण जयंती अउ मध्यप्रदेश के स्थापना के 40 वीं वर्षगांठ रिहिन हे. अइसन सुग्घर मउका मा कालेज मा निबंध लेखन,वाद विवाद, परिचर्चा अउ सामान्य ज्ञान स्पर्धा  आयोजित करे गिस जेमा मेहा भाग लेके तीसरा से लेके प्रथय स्थान हासिल करेंव. "स्वतंत्रता संग्राम मा महात्मा गांधी का योगदान " विषय मा आयोजित निबंध प्रतियोगिता मा तृतीय स्थान प्राप्त करेंव अउ कार्यक्रम के माई पहुना प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ, पद्मश्री पुखराज बाफना द्वारा सम्मानित होयेंव.  राजनांदगांव जिला मा वो समय छात्र वक्ता मन मा लोकेश शर्मा, आशीष कुमार शर्मा, चंद्रशेखर शर्मा, दिलीप कुमार साहू,ओमप्रकाश साहू अंकुर,विवेक गुप्ता खैरागढ़ , तेजेश राहुल,सुनील जायसवाल, लुमन साव,सरोज कुमार मेश्राम, सुश्री गौरी शर्मा, सुश्री नयनी शुक्ला, दीपक तिवारी, संतोष कुंजाम, राजू सोनी,रोम लाल चंद्राकर,सेवक राम साहू, ध्रुवेन्द्र साहू, हिरवानी ( मुजगहन वाले) , गणेश पटेल,प्रवीण गोटेकर प्रसिद्ध रिहिन. 


 मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित राज्यस्तरीय स्तरीय सामान्य ज्ञान स्पर्धा में राजनांदगांव जिला मा तीसरा स्थान प्राप्त करेंव. येमा राजनांदगांव जिला के विभिन्न कालेज अउ स्कल ले लगभग 600 सौ विद्यार्थी मन भाग लेय रिहिन. येमा मोला स्नेह राशि अउ संस्कृति मंत्री विजय लक्ष्मी साधौ के हस्ताक्षर युक्त प्रमाण पत्र मिलिस. ये स्पर्धा मा खैरागढ़ कालेज के विवेक गुप्ता अव्वल, कमला कालेज के छात्रा पारुल हा दूसरा स्थान मा रिहिन. वो समय प्रथम, द्वितीय अउ तृतीय के संगे संग पचास चयनित प्रतिभागी मन ला प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भोरमदेव अउ आने पर्यटन स्थल मन के भ्रमण कराय गे रिहिन  


  बोलथस  बने पर  कुछ कमी हे - मेजर सिंह 


 साल 1996 के बात हरे.एक  बार जब मेहा प्राध्यापक कक्ष डहर ले गुजरत रेहेंव ता इतिहास विभाग के प्राध्यापक मेजर खड्ग बहादुर सिंह हा मोला देखके कहिस कि " ओमप्रकाश तंय हा भाषण, परिचर्चा अउ वाद विवाद मा बोलथस बने पर कुछ सुधार के जरुरत हे". सर जी ला मेहा प्रणाम करेंव अउ अपन खामी के बारे मा जानना चाहेंव ता कहिस कि-" अभी तो तोर कमी ला नइ बताव.बाद मा मिलहू."चार -पांच दिन बाद जब फेर कालेज गेंव ता सर जी ले भेंट होइस. सर जी ले पाछू दिन के संबंध मा चर्चा करेंव कि - "सर जी आप वो दिन काहत रेहेव कि मोर भाषण कला मा कुछ कमी हे. मोला बताय के कृपा करहू तेकर ले मेहा अपन गलती ला सुधार कर सकव."ं


   सबले पहिली तो कहिस कि " तंय अपन कमी ला सुधार करे के संबंध मा दुबारा मिले बर आय हस तेकर सेति मंय हा खुश हौ. तोर कमी के बारे मा तो मेहा उही दिन बता सकत रेहेंव. पर मेहा जान बूझ के नइ बतायेंव. काबर कि मंय हा जानना चाहत रेहेंव कि तोर मा कत्तिक इच्छा हे वक्तृत्व कला मा आगू बढ़े के. अउ दूसरा तोर पास धीरज हे कि नइ येकर परीक्षा लेय खातिर वो दिन बात ला नइ बतायेंव. अउ मोर परीक्षा मा तंय पास होगेस."


   फेर कहिस कि -"तोर वक्तव्य बने रहिथे . तोला ये सुधार करना हे. तंय बोलथस ता अपन हाथ के माध्यम ले जो प्रतिक्रिया देथस वोहा जादा हो जाथे. येकर ले श्रोता वर्ग अउ निर्णायक के धियान तोर वक्तव्य मा  कम अउ तोर हाथ डहर जादा हो जाथे. ये तोर माइनस पाइन्ट हे जेमा सुधार करके अपन भाषण कला मा अउ निखार ला सकथस. हाथ से हाव भाव नइ देना हे ये मेहा नइ काहत हंव पर अतिरेक ठीक नइ हे " . दूसरा व्याकरणिक गलती ला सुधार करव. इही बात एक बार मोर प्रेरणा स्रोत डा. नरेश कुमार वर्मा जी हा घलो कहिस कि-" बोलत समय जो व्याकरण संबंधी जो त्रुटि होथे वोमा सुधार करके अपन भाषण कला ला अउ बेहतर बना सकथस. " बाद मा दूनों गुरुदेव जी के सुझाव ला अमल करे के प्रयास करेंव .

 

  

 1997 मा आजादी के स्वर्ण जयंती समारोह के बेरा मा कालेज मा एक परिचर्चा अउ काव्य पाठ के आयोजन होइस. येकर माई पहुना संस्कारधानी राजनांदगांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रद्धेय कन्हैया लाल अग्रवाल रीहिन. "आजादी के 50 वर्ष: का पायेन,का खोयेन" विषय मा माई पहुना अग्रवाल जी के संगे संग कुछ प्राध्यापक वर्ग मन अपन बिचार व्यक्त करिन. ये परिचर्चा कार्यक्रम मा छात्र वर्ग के प्रतिनिधित्व मेहा अउ सरोज कुमार मेश्राम हा करेन. इहां मोला कविता पाठ के घलो मउका दिस. कार्यक्रम के संचालक डा. चंद्र कुमार जैन हा करिन. जैन जी हा मोर वक्तव्य कला अउ कविता पाठ के तारीफ करके प्रोत्साहित करिन. बाकी प्राध्यापक मन घलो मोला अउ मोर मितान सरोज कुमार मेश्राम ला बधाई अउ शुभ कामना दिस. 

  

     प्रेस प्रभारी के भूमिका मा


सुरगी हाईस्कूल मा पढ़त रेहेंव उही समय ले मेहा अखबार बर समाचार

बनाव. चाचा जी अउ पत्रकार समारू राम दीपक हा समाचार लिखे बर प्रोत्साहित करै. मोर लेखन कला मा रूचि ला परख के एन. एस. एस. अधिकारी डा. नरेश कुमार वर्मा हा मोला प्रेस प्रभारी के दायित्व सौंपिन. 

1995 मा कोहका अउ 1996 मा गठुला मा आयोजित 10 दिवसीय रासेयो शिविर के विभिन्न गतिविधि के समाचार बनाव जउन हा कई ठक अखबार मा प्रमुखता ले प्रकाशित होइस. 1997 मा ही 5 दिवसीय साहसिक अभियान मा भाग लेंव. येमा अचानकपुर - ज़ंगलपुर से पैदल चलते हुए जंगली मार्ग ले मोहगांव,पैलीमेटा, साल्हेवारा तक यात्रा करेन. येमा 40  छात्र शामिल रेहेन. 1996 मा डा. नरेश कुमार वर्मा अउ 1997 मा  प्रो. के. एल. टांडेकर  हा राष्ट्रीय सेवा योजना के अधिकारी रीहिन. दूनों गुरुदेव जी हा मोला अब्बड़ प्रोत्साहित करिन. रासेयो शिविर मा परिचर्चा,वाद विवाद स्पर्धा,मंच संचालन,कविता पाठ के संगे संग अभिनय मा घलो उतरौं. मेहा मास्टर ,डाक्टर, सरपंच , पत्रकार अउ एक जागरूक युवा के रोल करौं. कुछ प्रहसन के निर्देशन घलो कर लेंव. 



   26 जनवरी 1998 मा मेहा विभिन्न रचनात्मक कार्य - युवा मन मा जन जागृति, संगठन,खेल, सांस्कृतिक गतिविधियां  ला बढ़ावा देय खातिर" जिला युवा अवार्ड -1997" ले सम्मानित होयेंव. मध्यप्रदेश के वो समय के आदिम जाति कल्याण मंत्री भगत राम उईके हा दिग्विजय स्टेडियम राजनांदगांव मा आयोजित एक भव्य अउ गरिमामय समारोह मा मोला 

प्रशस्ति पत्र अउ स्नेह राशि भेंट करिन. 


    1997 मा रायपुर के पुलिस ग्राउंड मा आयोजित भव्य स्वतंत्रता दिवस समारोह मा दिग्विजय कालेज डहर ले जिला के प्रतिनिधित्व करत उहां एन.एस. एस . के संगवारी मन संग आदिवासी नृत्य प्रस्तुत करेन. 



   9 मई 1997 मा मोर शादी होगे. बी.ए. द्वितीय श्रेणी मा पास होगेंव.कालेज के मोर नियमित पढ़ई छूट गे अउ दिग्विजय कालेज मा स्नातकोत्तर तक रेगुलर पढ़ई के मोर सपना टूटगे! मोर जिनगी के धारा बदलगे अउ परिवारिक जिम्मेदारी ला निभाय बर  राजनांदगांव के  एक प्राइवेट कंपनी के आफिस मा काम शुरू करेंव. 


     ओमप्रकाश साहू अंकुर

     सुरगी, राजनांदगांव

    मो.7974666840