Thursday, 23 May 2024

रील के ऊपर निबंध*

 *रील के ऊपर निबंध*

(व्यंग्य)

ननपन म हिंदी विषय म निबंध लिखन,गाय विषय के ऊपर।गाय एक पालतू जानवर है...ये वाक्य ले निबंध के शुरुआत होवय अऊ अबड़ अकन विशेषता बताय के बाद लिखन.... इसलिए गाय को गौमाता भी कहा जाता है।आज मोला रील अऊ रील बनैय्या महान कलाकार मन ऊपर निबंध लिखे के मन होवत हे।त आज्ञा होही त शुरू करन...!

रील बनाना आज के जमाना के एकदम जरुरी बुता आय।ये हर लोगन मन के भीतरी उम्हियावत कलाकारी ला दुनिया ला जनवाय अउ देखवाय के जरुरी माध्यम हरै।वइसे तो ए बुता म बचपन से पचपन तक के भयंकर कलाकार मन माते हवै,फेर नवजवान नोनी बाबू मन विशेष रुप से अतलंग करत हे।

लोगन के भीतर के कलाकार ल उभारे मा टीकटाक नाम के एक विदेशी बीमारी के विशेष योगदान रिहिस जेकर कोरोना काल में राम नाम सत्य होगे।

एकर बाद इंस्टाग्राम नांव के नवा बीमारी बगरिस जेकर चपेट में पूरा देश आय हे।नदिया-नरवा,मंदिर-देवाला,रेल स्टेशन से बस स्टेशन तक ए बीमारी के मरीज मन दिखत रहिथे।जेकर देख तेकर रील बनैय्या नचकार दिख जथे।शादी बिहाव, छट्ठी बरही, स्कूल कालेज सबो जघा एमन पर्याप्त मात्रा में पाए जथे।एसो राजिम मेला मा एकझन गोल चकरी वाले घलो आय रिहिस जेहर एक गाना के रील बनाय बर पचास रुपया लेवय अऊ शौकीन मनखे मन झपाय परत रिहिन।हम रील के शौकीन नो हन फेर फोकट के नाचा गम्मत देखे मा विशेष रुचि लेथन।

रील बनाय के बहुत अकन फायदा हे अउ भविष्य में एकर विशेष उपयोग हो सकथे अइसे मोर बिचार हे।रील बनाय से कलाकार मन के चिन पहिचान बढ़थे अउ लोगन ला जानबा होथे कि फलाना ढेकाना घलो दिखब मा घुरघुरहा घुरघुरही टाईप लगथे फेर तगड़ा कलाकार हरै। रील बनैय्या कलाकार मन ला लाईक मिले से उही प्रकार के खुशी मिलथे जइसे अंधरा मनखे ला आंखी मिले के बाद मिलथे।भविष्य में लोगन ला रिश्ता जोरे मा घातेच सुविधा होही। गांव गांव टुरी टुरा खोजे बर भटकना नी परही अइसे मोर अनुमान हे।फलाना इंस्टा आईडी वाले छोकरा अउ फलाना आईडी वाली छोकरी के जानकारी घर बइठे मिले से भटकना नी परै। कुंडली मिलान के जघा आईडी मिलान से कारज बनही।बिहाव कार्ड में घलो गोत्र के जघा आईडी नंबर लिखाय रही।

रील बनाय के फायदा होय के संगे संग नुकसान घलो होवत हे यहू समाचारपत्र मन में पढ़े बर मिलथे।कोनो कलाकार नदिया के मझधार में रील बनावत बोहा जाथे त कोनो रेल के चपेट में आवत हे।कोनो डोंगरी ले खसल के मरत हे त कोनो सड़क में रौंदा जावत हे।अइसन जघा में कलाकारी देखाय से रील बनाने वाले मन ला बचना चाहिए।जब जिनगी रही तब उमर भर रील बनाय जा सकथे।जब नांव बुता जही त कोन रील बनाही।

रील बनावत कलाकार मन ला थोरिक मान मर्यादा के ध्यान घलो रखना चाहिए।कलाकारी के नांव मा कुछ भी कचरा परोसना ठीक नोहै।

रील बनाना अब के पीढ़ी के मौलिक अधिकार हे ओमन ला एकर भरपूर सदुपयोग दुरुपयोग करे अधिकार हे।आजकल छट्ठी के दिन ले लइका मन मा रील बनाय के संस्कार डारे जावत हे।राम रमायन अउ सोहर गीत वाले छट्ठी नंदावत हे।ढमक ढमक नाच वाले गाना बजाना के दिन आय हे।ननपन के दे संस्कार हा जवानी मा रील कलाकारी ले जगजाहिर होवत हे।इही प्रकार ले आजकल के घेंच मा सूंता कस ईयरफोन ओरमाय वाले कलाकार पीढ़ी ला वंदन करत रील बनाय के घेरी बेरी शुभकामना ....


रीझे यादव टेंगनाबासा

*भाव पल्लवन*

 *भाव पल्लवन*



कहूँ के बेरा कहूँ जाय, खाय के बेरा पहुँच जाय

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ये शरीर रूपी गाड़ी ला चलाये बर भोजन जरूरी होथे।भोजन ले शरीर ला ताकत मिलथे। जादा दिन ले भोजन नइ मिले ले मौत हो जथे। ये सृष्टि के जीवधारी मन ला कोनो ना कोनो चीज ला भोजन के रूप मा भक्षण करे बर लागथे।पेड़-पौधा मन ला हवा-पानी अउ सुरुज के अँजोर चाही ता पशु-पक्षी मन ला चारा-पानी।कोनो जानवर माँसाहारी होथे ता कोनो काँदी-कचरा मा काम चला लेथे।

    मनखे के बात करे जाय ता वोकर पाँच प्रकार के मुख्य भोजन- कंद-मूल,फल-फलहरी, साग-भाजी दूध-दही अउ नाना प्रकार के अन्न जइसे गहूँ,चाँवल,कोदो-कुटकी,ज्वार-बाजरा,मक्का, चना-बटरी --अइसने जम्मों ओनहारी ला बताये जाथे। कतेक झन माँस-मछरी ,अंडा तको खाथें काबर के उहू मन ले शरीर बर पौष्टिक तत्व मिलथें।का भोजन करना हे ये तो अपन रुचि के उपर होथे।पुरखा मन कहे हें--" पर के रुचे   कपड़ा(पहनावा),अपन रुचे भोजन।"

   भोजन ले शरीर ला फायदेच बस मिलही अइसे बात नइये।कभू-कभू गलत-सलत भोजन करे ले, पेट के फूटत ले खाये ले,बेरा-कुबेरा भोजन करे ले कब्ज,एसिडिटी, पेट दर्द जइसे बहुत कस बिमारी हो जथे।जहरीला भोजन ले इंतकाल तको हो जथे। तेकरे सेती हमर पुरखा मन अउ आजकल के डाक्टर-वैज्ञानिक मन घलो भोजन के बहुत कस नियम बनाये हें जेकर ले भरपूर लाभ मिलय।एमा के एक ठन बहुतेच बढ़िया नियम हे-- नियत समे मा भोजन करना चाही।मतलब ये हे के दिन मा जे बजे नाश्ता करना हे, जे बजे खाना हे,रात मा जे बजे खाना हे ,रोज-रोज वोतके बेर भोजन करना चाही।एकर ले शरीर हा भोजन ला पचाये के अपन टाइम-टेबल बना लेथे अउ खाना हा बढ़िया पचथे।

     दिन मा नाश्ता-पानी,भोजन हा तो समय-परिस्थिति के सेती कुछ एती-वोती होके ये नियम के पालन हो जथे।मजदूर,कर्मचारी,विद्यार्थी मन ला तको निर्धारित समे मा खाना छुट्टी मिल जथे। फेर आजकल रात के खाना के समय हा सबके गड़बड़ावत जावत हे,इहाँ तक के बारा बजे,एक बजे,दू बजे रात ले पार्टी चलत हे भलुक एमा जादा चेत करना चाही। नींद नइ परई ले लेके बहुत कस रोग-राई तो एकरे सेती होवत हे।

    घरो मा देखबे ता कोनो कतको बेर आके खावत हे---कोनो कतको बेर--कुछु के ठिकाना नइये।आजकल के लइका मन तो बियारी अउ सोवा परती के बेरा ला जानबे नइ करैं।

  हमर पहिली जमाना के भितरहीन मन रात के सात -साढ़े सात बजे भोजन बनै तहाँ ले एती- वोती खेलत लइका मन ला,गुड़ी या कोनो चौंरा मा बइठे घर के सियान मन ला बलवा के चुम्मुक ले एक सँघरा बइठार के जेवन करवावैं।जेन समे मा नइ आवै तेला सियान-सियनहिन मन फटकारैं - "समे मा आके खाले कर भले कहूँ जाये रा।" उन सिखौना दँय-- "कहूँ के बेरा कहूँ जाय, खाय के बेरा पहुँच जाय।"

फेर का करबे सब आधुनिकता के भेंट चढ़त जावत हें। हमर संस्कार,पुराना रीति-रिवाज मन मा छुपे अच्छाई मन ला समझना जरूरी हे।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

पनही

 पनही 

                     गुरूजी के पनही , ओकर पहिचान आय । नानुक रिहीस तब ओकर ददा , जे पनही ल पहिने , उही पनही ल गुरूजी घला पहिरथे । खियात ले पहिर डरीस , फेर वा रे पनही , टूटे के नाव नइ लिस । येहा , खानदानी गुरूजी पनही आय , जेमा कभूच कभू नावा डोरी धराये बर परय । ओकर उप्पर भाग , हमेशा चकाचक रहय । ओमा कभू कन्हो पालिस नइ रंगीस , मइलइस निही त , फरिया घला रेंगाये नइ परिस । कतको झिन ओकर पनही ल देखे , संहराय घला फेर , तरी के बदहाली दिख जाय म , बदले के सलाह घला देवय । 

                       गुरूअईन घला , खियाय पनही ले बड़ चिढ़य । स्कूल जाये के बेर  भलुक पहिरन देवय फेर , संग म मइके जातिस त , ओला झनिच पहिर कहय । एक बेर घुस्सा के मारे उही पनही ला , बाहिर म फटिक दिस । खोर म परे रिहीस , कन्हो लेगिन घलो निही । ग्राम सेवक के कुकुर , एक दिन उही पनही ला सूंघ पारिस , उही दिन ले , ग्राम सेवक के रोटी खाये बर चुमुक ले बंद कर दिस । मोठ डांट कुकुर के हाड़ा हाड़ा दिखे लगिस । तीन दिन पाछू को जनी  ,  कोन ओकर दुआरी म , पनही ला फेर वापिस , फटिक दिस । ये पनही ल बरोये के , गुरूअईन नावा उपाय करिस । एक दिन  मंदिर ले वापसी म , हमर पनही नोहे कहिके , मंदिर के दरवाजा म छोड़वा दिस । उही दिन ले गुरूजी के गोड़ अनते तनते माढ़हे लागिस ..... का करबे ...... बिगन पनही के रेंगे के आदत नइ रहय , नावा पनही बिसाये के नौबत आगे , पइसा सकलइस तहन चल दिस पनही दुकान ।

                     पनही दुकान वाला पहिली बेर , गुरूजी ल अपन दुकान म देखिस , ओला बड़ अचरज लागिस । पनही देखा कहितीस तेकर पहिली , तोला उधारी नइ देवंव , कहि दिस । गुरूजी किहिस - पइसा धर के आहंव जी पनही बिसाये बर , तब दुकानदार हा गुरूजी ला , पुलिस कस अतका सवाल पूछिस के ...... जान दे । कभू पूछय , कतिहां ले पइसा अइस तोर कना ? कभू कहय , जुन्ना पनही ल उतारके फेंक दे हाबस का ? गुरूजी किथे - जुन्ना पनही ल नइ फेकें हंव बाबू , का बतांवव , गुरूअईन , मोर जुन्ना पनही ल , कनहो लेग जाय कहिके , मंदिर म छोंड़वा दिस , तेकरे सेती नावा बिसाये बर आये हंव , उधारी नइ करंव गा नगदी देहूं , नगदी ...... । घेरी बेरी , नगदी के बात सुनिस , ततके बेर ले , गुरूजी हा , पनही बेंचइया के कका बनगे । दुकानदार पूछे लगिस - कइसना पनही देखावंव कका ? गुरूजी किथे - मोर पनही ल देखेच होबे बेटा , उइसनेच देखा । दुकानदार किथे - उइसनेच पनही नइ मिल सकय , फेर ओकर ले सुघ्घर अऊ सुख देवइया पनही देखावत हंव । छांट छांट के देखाये धरीस । फेर गुरूजी के दिमाग म जुन्ना पनही के चमक छाये रहय , नावा काला भाही । तभो ले मन मार के देखे लागिस । पनही बेचइया बतावत रहय – अइसन पनही ल एकेच महीना पहिली , बीडीओ साहेब लेगे रिहीस । पहिरीस तेकर पंद्रही म , कार बिसा डरीस । उपयंत्री ला , एदइसने पनही दे हंव , चार दिन म , जुन्ना टेलीबिजन बदलगे , कम्प्यूटर अऊ नावा बुलेट ले डरिस । पटवारी ल तो जानतेच होबे , उहू मोरे करा के पनही लेघथे , जब लेगथे , ओकर सुआरी , आधा तोला सोना जरूर बिसाथे । तैं पहिली घांव मोर दुकान म , आये हाबस गुरूजी , पहिली आते ते तहूं ला , मोर पनही , मालामाल कर देतिस । गुरूजी जनम के सिधवा , अड़हा अऊ निच्चटेच मनखे ताय गा । साध लागगे वहू ल अइसन पनही के , जे पनही हा मनखे ल , मंडल बना देथे । गुरूजी किथे - ओकर ले अऊ अच्छा देखा । दुकानदार किथे – येकर ले अच्छा अऊ महंगा पनही ला , सिर्फ देख सकत हस , बिसा नइ सकस , तोर औकात निये गुरूजी । औकात सब्द सुनके , गुरूजी के हाथ नारी जुड़ागे । अपन औकात टमरे लागिस अऊ वापिस औकात म उतरगे । औकात पुरतीन पनही हा , उप्पर ले बड़ चमकत रहय , फेर पेंदा फटहा । गुरूजी किथे ..... अइसन चिरहा फटहा पेंदा के पनही तो मोरो तिर रिहिस ..... थोकिन बने वाला ला नइ देखातेव जी ? बाजू के दुकान म , अपन छुरा टेंवत नऊ मारिस टप्पले – एक तो तोला तीन चार महीना म एक घांव तनखा मिलथे । उहू म बीओ आपिस के लार चुचवाथे । ले देके जे हाथ आथे , तेला नंग़ाये बर किराना वाला आफिस के आगू ठाढ़हे मिल जथे । महीना के आखिरी उन्तीस दिन , एक लांघन एक फरहर करके गुजरथे अऊ तेंहा महंगा पनही के साध करथस गुरूजी ? ओकर गोठ गुरूजी ल जंचगे , इही ल बिसाये के सोंच डरिस । किम्मत पूछीस त , पनही बेंचइया किथे – ये पनही कुछ समे ले मोर दुकान के शोभा बढ़हावत रिहीस , येकर बर उचित मनखे के तलास पुरगे , एकर का किम्मत , अइसने फोकट म लेगजा । या ……. गुरूजी घला , इही दुकान के पनही पहिरे ला धर लिस कहिके , कनहो झिन जानय , तेकर सेती , पनही ल छाती म लुकाके ले आनिस ।

                      गुरूअईन ल सरप्राइज देहूं सोंच , कलेचुप अंगना म मढ़हा दिस । आरो पाके , कपाट म सपटके देखे लागिस , तभे ………. उहीच पनही ल देख , बखानीस अबड़ गुरूअईन हा । गारी बखाना सुन , कपाट के ओधा ले निकले के , गुरूजी के हिम्मत नइ होइस । काये करही पनही संग , अगोरे लगिस ...... , मन भर के बुड़बुडा के , लात मारत रेंगिस गुरूअईन दई ..... कपाट तरी सेंध म लुकाये गुरूजी के , गोड़ तिर , खुदे पहुंचगे पनही ....... । मोर भाग म इहीच पनही आय कहिके ..... हाथ म धर के , आंखी के पानी म भिजो डरिस , करेजा के टुकड़ा कस सहला डरिस , धिरलगहा अपन गोड़ म डारके , स्कूल पहुंचगे । वापसी म , गाजा बाजा भीड़ भाड़ देख के , थिराये गुरूजी ल , उही नऊ फेर मिलगे । नऊ किथे - गुरूजी ये पनही तुहींच ल फबथे ... दूसर ल नइ फबय । येला बीडीओ साहेब लेगिस , दूसरेच दिन ससपेंड होगिस , वोला वापिस करिस तभे बहाल होइस । उपयंत्री लेगिस , त नक्सली एरिया म ट्रांसफर होगे । जावत जावत पनही ल वापिस लान के मढ़हा दिस । पटवारी पहिरीस , त ओला , काकरो बूता काम ठीक से नइ कर सकस कहिके , आपिस अटेच कर दिन । उहू वापिस कर दिस । वाजिम म ये पनही , ये दुकानदार के नोहे , बहुत दिन पहिली , एक ठिन कुकुर लानके येकरे दुकान म मढ़हा दे रिहीस । ओहा एक दिन इही पनही के चमक के लालच म , इही ला पहिरके , प्रेस कान्फ्रेंस म जा पारिस । उहां सच बोले बर धर लिस । अपनेच मुखिया उप्पर , भ्रस्टाचार के कतको प्रमाण , जनता ल बता दिस । पार्टी ले निकाला होगे । एकर हालत बिगड़गे । तभो ले ये लालची राजनेता हा ..... दुकानदार बनके , यहू ल घेरी बेरी बेंचे के , प्रयास म लगेच रहय ..... फेर जे लेगय तेकरे हालत अइसे खराब होगिस के वापिस करे बर मजबूर हो जावय । आज बिहिनिया , जइसे ये पनही एकर तिर ले परमानेंट टरिस , मंझनिया पार्टी ले फेर बुलावा आगे , अऊ तिहीं देख ....... संझाकुन बिधानसभा के टिकिस हाथ म आगे ...... ओकरे बाजा गाजा बाजत हे .... । 

                     वाजिम म , ये ईमानदारी के पनही रिहिस , जेला हरेक मनखे नइ पहिर सकय । यहू पनही ल बेंचे के कोशिस म , कर्णधार मन लगे हाबय । बेईमानी के पनही पहिर के , भुकुर भुकुर के खा सकत हन , फेर ईमानदारी के पनही पहिरइया बर जिनगी भर हरहर कटकट ताय जी ...।   

 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

*उपन्यास अंश अउ वोकर सौंदर्य शास्त्र*


    *उपन्यास अंश अउ वोकर सौंदर्य शास्त्र*

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                   *सोनकमल*


                        (1)


         उपन्यास सोनकमल के पहले पृष्ठ म ही एक ठन बिम्ब हे।बिरिज(ब्रज) गौटिन के बहू जलकुंवर  (नायिका सोनकमल के मां) गाढ़ निंद्रा म  सुते  हे। अइसन नींद 'रति क्लांति (नैसर्गिक क्रीड़ा के बाद उपजे थकान,अल्लर होवई)' के बाद आथे। जलकुंवर एई अवस्था  म हे। वोला इहाँ बिहा हो के आय तीन बच्छर हो गे हे फेर आज तक कुछु(सन्तान) दिखे नई ये। येकर ले खुद,जलकुंवर के छोड़ सब ,थोरकुन फिकिर म हें। उपन्यास के दृश्य हर, वोकर शरीर भीतर म निषेचन अउ सन्तान सोनकमल के कोख म आय के दृश्य ये। जलकुंवर देखत हे वोकर देह हर, अनन्त ब्रम्हांड ये, उहां  सादा गोरस के धार लाख लाख तारा मन येती ल वोती कूदत हें(तेज गति ले भागत पुरुष पिंड शुक्र) अउ आगु रस्ता म,एकठन पींयर जोगिनी (मादा पिंड ओवम ) बइठे हे।एकठन बलखरहा ताकतवर तारा हर आके वो जोगनी के हाथ धरत वोकर भीतर म समा गिस हे(निषेचन पूर्ण)...


      "जल कुँवर देखत हे,  आज अगास हर  बड़  जगर -मगर करत हे । आज एके पइत कइसन अतेक तारा  मन  उपला गय हें अगास म !  ये कइसन गोरस के धार बोहात हे अगास म ...! ये गोरस के धार म वोहर तउरत हे बने मजा के । ये गोरस के धार कहाँ ले आवत अउ कहाँ जावत ,पता नइये । अब तो वोहर ये तारा- जोगनी मन ल  कुदा- कुदा के अपन ओली म धरत जाथे ; फेर येमन तुरंतेच वोकर ओली ल बाहिर निकल जावत हें । फेर वोहर तो कुदातेच हे, अब तो ये तारा -जोगनी मन घलव वोकर संग म खेले बर लग गईंन हें , वोमन खुद येला छकात हें । देखते- देखत  वोहर कतेक न कतेक बड़े हो गिस हे अउ ये गोरस कस सेत वरन धार हर  अभी तो वोकर भीतर म   बोहाय लागिस हे । सब ल देखत हे वोहर पांच-परगट ! ये सेत वरन धार भीतर म लाख लाख  -करोड़ ठीक वईसनहेच चमकत सितारा  मन चमकत हें । वोमन के गति के आगु म सब फीका हे । अतेक तेज फेर कतेक सुहावन हे येमन के ये गति हर ।  कतेक न कतेक गझिन  लागत हे, ये जगहा हर । ये तारा मन के डहर म एकझन जोगनी हर बइठे हे । तभे एकझन सबले बड़े  बलवान अउ तेज अउ तेज तारा हर  अइस हे अउ टप्प ले वो जोगनी के हाथ ल धर के वोकर भीतरी म समा गिस हे"


            जलकुंवर के सपना खंडित नई होय ये। अब वोहर देखत हे कि  वोहर एकठन  फुलवारी म आ गय हे, जिहां कतेक न कतेक  फूल  अउ तितली मन हें।  वो तितली मन म ले, एकझन तितली हर  उड़त उड़त आके, वोकर अंचरा म समा गिस हे, अउ अंचरा म समात, वोकर अंतस म समा गिस हे। वोकर गरभ म तितली (सोनकमल ) आ गिस हे...



      "ये अब कइसन वोहर घन वन -डोंगरी भीतर पहुँच गय ! चारो कोती कट कट... हरियर । अतेक कटकटात हरियर के, हरियर के  छोड़ अउ आन कुछु नई दिखत हे , फेर वो तो ये गहिल अउ गहिल जाते -जात हे । जावत हे  वोहर फेर अब  गहिल  -अंधियार ले ये नावा अंजोर कोती आ गय हे ।  फूल अउ फूल...तितली अउ... तितली ! जतेक वरन के फूल हाँवे, वोतकी  वरन के तितली -फिलफिली ! अउ वोकर तो बस वोइच बुता - अब कुदा -कुदा के ये तितली मन ल धरई । फेर वोमन हाथ नि आवत यें ।   तभो ले वोहर ये एकठन बड़ सुंदर तितली ल धर डारिस हे । अउ वो तितली वोकर अंचरा तीर म आइस हे । अउ अब  तो  वोहर ,वोकर अंचरा म आ गिस हे...! अरे  येहर तो अंचरा के भीतर जावत- जावत वोकर अंतस म समा गिस हे अउ बड़ मजा लेवत उहाँ जा बइठ लागिस हे।"


  

 (ये बरनन हर, कनहुँ ल अभद्र, भदेस अउ अप्रिय लागही; वोकर ले, लेखक हर,अगाहु माफी मांग लेत हे।



*रामनाथ साहू*



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*भाव पल्लवन*

 *भाव पल्लवन*



दुल्हा बर पतरी नइये बजनिया बर थारी

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आजकल हमर देश मा गाँव होवय चाहे शहर,चारों कोती इही देखे मा आवत हे के समिलहा परिवार(संयुक्त परिवार) जेमा कम से कम दू-तीन पीढ़ी एक संग रहिथें, जिहाँ सब झन बर एके चुल्हा मा जेवन चुरथे----बहुत तेजी ले छर्री-दर्री होवत हे। अब तो नौबत ये आवत हे के जिहाँ पति पत्नी बस अपन लोग लइका संग रहिथें --उहू मन अलग-बिलग रहे ला धर लेवत हें।समाज मा तलाक के बाढ़ आगे हे।

अइसन बर्बादी के पेंड़ी कारण कई ठो हो सकथे जइसे आपसी मनमुटाव, एक-दूसर बर ईरखा,अहम के भावना,घरेलू कलह, चरित्र मा दोष, स्वार्थ, कामचोरी, कोनो सदस्य के नशेड़ी हो जवई, एक दूसर ले विचार के नइ मिलना, मुखिया के माई-मौसी करई--अइसनहे अउ बहुत कस कारण हो सकथे।

  गोस्वामी तुलसीदास जी हा कहे हें--

"मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक।

पालै पोसे सकल मिलि, तुलसी सहित विवेक।"

  मतलब साफ हे के --परिवार के मुखिया ला मुख जइसे होना चाही। मुख हा भोजन करके वोकर फायदा ला बिना भेदभाव के शरीर के जम्मों अंग ला देथे वोइसने मुखिया ला अपन परिवार बर तको करना चाही।

  फेर आजकल अनुभो मा ये आवत हे मुखियेच हा स्वारथ मा बूड़के अपनेच मन बर भेवदाव करे ला धर लेहें।अइसनो होवत हे के परिवार के कुछ झन रात-दिन मिहनत-मजदूरी करत हें,घानी के बइला असन जोंतावत हें अउ कोनो ठलहा गली गिंजर-गिंजर के खावत हे। कोन जनी का स्वारथ मा मुखिया हा वोला कुछु नइ बोलत ये--वोकरे बढ़-चढ़ के सरेखा करत हे, उल्टा जेन हा परिवार ला सजोर करे मा लगे हे --मिहनत करत हे-ककरो बर अइली-सुधा जुबान नइ लहुटावत हे तेकरे बर तुतारी धर के पाछू परे हे। अइसन मा ये अन्याय भला कतका दिन ले चलही? रनाये-खताये लकड़ी सहीं परिवार हा टूटबे करही।

   अइसनहेच किस्सा देश-समाज मा तको चलत हे। मिहनत करइया मजदूर-किसान,गरीब मन ला ऊँकर वाजिब हक नइ मिलत। अँधरा बाँटै रेवड़ी,अपने मन ला देय होवत हे। भाई-भतीजावाद फुनगी मा चढ़के नाचत हे। जेन मन ला सही मा महत्व मिलना चाही वो मन ला तिरिया के काम के न धाम के ते मन ला सब कुछ मिलत हे। ये तो अइसे होवत हे के--

"दुल्हा बर पतरी नइये,बजनिया बर थारी।"

भलुक होना तो अइसे चाही के--सब बर पतरी मा जेवन पोरसावय या फेर सब बर थारी मा। भेदभाव नइ होके समानता होना चाही।



चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

*छत्तीसगढ़ी अउ रंग संसार*


        *छत्तीसगढ़ी अउ रंग संसार*

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             छत्तीसगढ़ी में भी, प्रदर्शनकारी रूपंकर कला 'नाटक ' के बड़ समृद्ध आयाम अउ परम्परा हे। नाचा अउ गम्मत जइसन एम्पीथियेटर मन म तो ,पूरा सइघो खोल हर रंगमंच बन जाथे, तब 'रहस(रास -रास लीला) खेले के बखत तो खोल का पूरा के पूरा गांव भर हर,थियेटर बन जाय रइथे। कभु कभु तो तीर तखार के एक दु गांव तक ,घलव रंगमंच हर बगर जाथे। अउ येकर ले जो रस सिद्धि रस परिपाक होथे,वोला तो भाष्यकार हर  'ब्रम्हानन्द सहोदर ' तक कह देय हे। छत्तीसगढ़ ही क़ाबर? बनारस के रामलीला अउ बरगढ़ (उड़ीसा) के कृष्ण लीला म घलव ये बात आथे। अउ ये सब मिलके समग्र भारतीय नाट्य वांग्मय बनथे।


          अब बात पारंपरिक डोर परदा वाला रंगमंच या आधुनिक प्रकाश अउ ध्वनि प्रभाव वाला रंगमंच के बात करथन तब भी, छत्तीसगढ़ी हर कमसल नई ये। इहाँ घलव वैश्विक अपील वाला नाटक सिरझे हे। नाटक के वैश्विक लीडर हर छत्तीसगढ़ी नाटक खेले हे अउ आन आन देश म, वोमन के विक्कट अकन प्रदर्शन होय हे। वो महामना के नाम हबीब तनवीर ये,फेर उँकर नांव लेवत देवदास बंजारे के नाम ल घलव लेत हावन, जउन हर नाटक के संगे संग अनुषांगिक रूप ले,पंथी नृत्य ल अप्रतिम ऊंचाई अउ लोकप्रियता  देवाइस। आज घलव डॉ.नन्दकिशोर तिवारी असन शीर्ष छत्तीसगढ़ी रंग लेखक,अउ डॉ. योगेंद्र चौबे असन प्रयोगधर्मी अउ सिद्धहस्त रंग निर्देशक मौजूद हें, जउन मन अपन पूरा क्षमता के साथ छत्तीसगढ़ी रंग ल संवारत हें, निखारत हें।


        छत्तीसगढ़ी नाटक मन घलव शास्त्रीयता के पूरा पालन करत हें। फेरआजकल छत्तीसगढ़ी असन देशज भाषा मन म, जउन नावा नाटक लिखे जात हें।वोमन म  संस्कृत नाटक मन के सबो नियमों के पालन या  वो विषय मन  ल  शामिल करई अनावश्यक समझे जात हे। भारतेंदु हरिश्चंद्र कहत हें -'संस्कृत नाटक की भाँति हिंदी नाटक में उनका अनुसंधान करना या किसी नाटकांग में इनको यत्नपूर्वक रखकर नाटक लिखना व्यर्थ है; क्योंकि प्राचीन लक्षण रखकर आधुनिक नाटकादि की शोभा संपादन करने से उल्टा फल होता है और यत्न व्यर्थ हो जाता है।' ये में  ये गोठ सामने आथे कि नाटक के शास्त्रीय विधान हर गौड़ ये,वोकर प्रभाव हर पहिली ये, मुख्य ये। प्रभाव दिखना आवश्यक है। प्रभाव हर बाधित हो जाही तब ,वोकर शास्त्रीय रूप के का मतलब रह जाही। छत्तीसगढ़ी नाटक मन म,बस एईच प्रभाव के चिंता करे जाथे। येकर सेती वोकर शास्त्रीय रूप हर थोरकुन कमसल भी लग सकत हे।शास्त्रीय नाटक मन के गोठ उघारे ले,  जुन्ना ग्रीस अउ रोम के नाट्य परंपरा ल ,आज बुड़ती डगर के (पाश्चात्य )  के कला समीक्षक मन आदर्श मानथें।  ग्रीस अउ रोम के नाटक मन अब्बड़ कड़ाई ले  नाट्य तत्व मन ल नाटक मन म गूँथत रहिन। अउ ये बुता के बढ़िया उतारा (प्रतिसाद) घलव मिलिस।


            भारतीय नाटक के  इतिहास ल झांकबे तब प्राचीन वैदिक काल म नाटक के संकेत मिलथे। येकर बाद येहर आधुनिक रंगमंच के परंपरा -चलागत ल  को आगु बढोथे। जुन्ना ग्रन्थ मन  म , पुराण, उर्वशी, यम और यमी, इंद्र-इंद्राणी, सरमा-पाणि और उषा सूक्तस के  संग जुन्ना  नाटक मन के शुरुआत ऋग्वेद के स्मारकीय स्रोत सामग्री के कारण होथे।



भारतीय नाटक के तत्व


    बनेच अकन नाट्यशास्त्री मन तरी लिखाय तत्व मन ल ,एकठन  सफल नाटक बर आवश्यक मानथें -

1.विषय-वस्तु

2.कथानक

3.देखईया (श्रोता/दर्शक)

4.संवाद

5.मंच सज्जा

6.सम्मेलन

7.चरित्र चित्रण

8.संगीत

9.तमाशा

10.विराधाभास -द्वंद

11.प्रतीक


             ठीक अइसन नाटक हर घलव तीन रकम के भेंटाथे -

1.कॉमेडी (हास्य प्रधान -सुखांत)

2.ट्रैजेडी (करुणा प्रधान -दुखांत )

3.मेलोड्रामा (आपत्ति विपत्ति ल बतात कथा)


छत्तीसगढ़ी के रंग संसार -


       छत्तीसगढ़ ल बड़ गरब हे कि दुनिया के सबले जुन्ना थियेटर ,वोकर रामगिरि के गुफा म हे।अउ आज ले घलव सुरक्षित हे।तईहा जमाना म ,वोमे बरोबर नाटक होवत रहिस होही।आधुनिक स्टेज सज्जा के बनेच अकन अंश उहाँ मौजूद हे। ये रामगिरि के रस्ता हर,तो कालिदास के यक्ष के घलव डहर ये। छत्तीसगढ़ के धरती म,सिंघनपुर ,कबरा सोनबरसा, बोतलदा के शैल गुफा मन म, आदिमानव के धमक मौजूद हे। वोकर करा चित्र बनाय के कलात्मक संचेतना रहिस तब बोहर अपन बर भासरी (भाखा) भी गढ़ लेय रहिस। ध्वनि मन ले जिनिस मन ल जोड़त वोहर वोमन के नामकरण करत रहिस।आगी ल खुंदिस तब बग्ग ल करिस तब वोहर आग्गी हो गय। गाड़ी जइसन जिनिस हर गड़गड़ ढुलिस तब वोहर गाड़ी हो गय। कहे के अर्थ हे प्राकृत ल आदि मानव प्रकृति से सँजोइस।अउ वो भी नाटक खेलत रहिस होही, ठग -ठियाली के अभिनय करत रहिस होही।  


छत्तीसगढ़ी म नाटक -


           सन् 1903 म जब हिन्दी नाटक मन के कोई खास चिन्हारी नई रहिस।तब चित्रोत्पला महानदी के खंड़ म स्थित बालपुर (चंद्रपुर जिला सक्ती ) म बइठ के छत्तीसगढ़ी भाषा में पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय जी हर  'कलिकाल' नाम से छत्तीसगढ़ी नाटक के रचना करे रहिन। येकर बाद तो, कतको लेखक मन हिन्दी-छत्तीसगढ़ी म नाटक लेखन  करिन। येमे मुख रुप ले डॉ. शंकर शेष, विभू खरे, डॉ. प्रमोद वर्मा, प्रेम साइमन मन के बड़ नांव हे । ये लिखाय नाटक मन ल सत्यजीत दुबे, हबीब तनवीर जइसन रंगकर्मी मन मंच म मंचित करिन। हबीब तनवीर हर तो आगरा बजार, राजतिलक, मोर नाम दामाद गांव के नांव ससुराल, चरणदास चोर जइसन गजब के नाटक करिन। ये  नाटक मन ले छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़  कलाकारों की पहचान पूरा दुनिया में कराईन। 


       छत्तीसगढ़ म आज अनुप रंजन पाण्डेय, योगेन्द्र चौबे, राजकमल नायक, सुभाष मिश्रा, मिर्जा मसूद , हीरामन मानिकपुरी, अजय आठले, उषा आठले,चंद्रशेखर चकोर अइसन नाम आंय, जेमन रंग निर्देशन के क्षेत्र म जगमगात हें। वहीं नाटककार मन के एक पूरा पीढ़ी हर अभी नाटक सृजन म लगे हे जेमा डॉ नन्दकिशोर तिवारी ( मोर कुंआ गंवागे, अथ श्री कचना घुरूवा कथा,अहिमन कैना, रानी दई डभरा के),डॉ सुरेंद्र दुबे (पीरा),  डॉ. परदेशी राम वर्मा ( मंय बइला नो हंव), रामनाथ साहू(जागे जागे सुतिहा गो !, हरदी पींयर झाँगा पागा ) मन के नांव लिए जा सकत हे।


          आज भी छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी म,बढ़िया नाटक लिखे जात हे, पढ़े जात हे अउ मंचित भी होवत हें।


*रामनाथ साहू*



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*भाव पल्लवन*

 *भाव पल्लवन*



बीमारी के जर खोखी,झगरा के जर ओखी

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बारंबार खोखी मतलब खाँसी आना या फेर उल्टी होना ला तको कोनो ना कोनो बीमारी पैदा होये के जर अर्थात एकर  ले कोनो बड़े बीमारी पैदा होये के कारण माने जाथे।खाँसी ला अलवा-जलवा नइ समझना चाही भलुक जल्दी चेत करके ईलाज करवाना चाही।एकर ठीक नइ होये ले गला, फेफड़ा अउ छाती के बड़े-बड़े रोग हो जथे। निमोनिया टी० बी० जइसे जीव लेवा रोग राई के पता इही खाँसी ले चलथे।

      जइसे बीमारी के जर खोखी होथे ठीक ओइसनहे बहुत अकन झगरा-लड़ई के जर ओखी मतलब कोनो ला ताना मरई घलो होथे। घर-परिवार ,समाज मा कोनो ला भी अपन बर ताना हा घोर अपमान लागथे। द्रोपदी के दुर्योधन ला "अंधा के बेटा अंधा" कहिके मारे ताना के सेती भयंकर महाभारत युद्ध होगे जेमा लगभग सवा करोड़ योद्धा मौत के मुँह मा समागें।

   ये ताना हा देवर -भउजी के ठिठोली सही छोटकुन बात रहिसे फेर कतका घातक होइस।अइसने ताना कसई मा, उल्टा-सीधा दिल्लगी करे  मा --- कोनो ला देख के ठोलियाय असन,ईरखा मा खाँसे--खखारे ले झगरा मात जथे।कोनो सहिगे त सहिगे नहीं ते लड़ई मात जथे। बनगे ते बनगे नहीं ते तनगे हो जथे। सास-नँनद के ताना मा बहू त,बहू के ताना मरई मा सास-नँनद, रिसा जावत हें।बाप के ताना मा बेटा त, बेटा के ताना मा बाप तनिया जावत हें। कहूँ पति पत्नी मन आपस मा ओखी-ओखी के खेल खेले ल धरलिन त तलाक के नौबत आ जथे। परिवार मा झगरा मात जावत हे। ओखी के सेती परोसी-परोसी के,संगी-सँगवारी के --कहाँ तक कइबे एक नेता के दूसर नेता ले नइ पटत ये।

ये खोखी अउ ओखी दून्नों बेकार होथे।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़