पेट्रोल अऊ घमंड
- डुमन लाल ध्रुव
गांव के चौपाल मा बुजूर किसान मन बइठे रिहिन। कोनो बीड़ी फूंकत रिहिस त कोनो हा अपन पुरखा मन के जमाना ला सुरता करत रिहिस। उही बेरा गांव के सबले बुजूर आदमी मनराखन ददा हा किहिस -
“अरे भइया, वो जमाना कुछ अउ रिहिस। जब हमन साइकिल ले हाट बाजार जात रेहेन, खेत जात रेहेन त शरीर मा जान रिहिस। अब देखव हर घर मा मोटर साइकिल, गाड़ी, पेट्रोल अउ डीजल के धुआं… मनखे त मशीन बन गेहे।”
सब झिन चुपचाप सुनत रिहिन।
गांव के जवान लइका सुकांत हा अपन चमचमात मोटर साइकिल मा आइस। आतेच किहिस - “ददा, अब जमाना बदल गेहे। साइकिल ले काबर जाबो ? मोटर गाड़ी मा टाइम बचथे।”
मनराखन ददा मुस्कराइस - “टाइम त बचथे बेटा फेर जिनगी घटत हे। पेट्रोल के भाव सुनके तो अब कलेजा कांपत हे।”
सब हंस परिन, फेर हंसी के भीतर चिंता लुकाय रिहिस।
आज के समय मा गांव होवय या शहर, हर आदमी पेट्रोल के भरोसा मा चलत हे। खेत के पंप, ट्रैक्टर, बाइक, बस, कार… सब कुछ तेल के ऊपर टिके हे। फेर तेल के दाम हा अइसने बढ़त जात हे जइसे आगी मा घी डार देय।
सुकांत के बाबू, जीवन लाल किसान, हर महीना हिसाब लगावत थक जाथे। खाद महंगा, बीज महंगा, ऊपर ले डीजल महंगा। ट्रैक्टर चलाना भारी पड़त हे।
एक दिन जीवन लाल हा अपन बेटा सुकांत ला किहिस - “बेटा, अब बिना जरुरत बाइक नइ निकालना। खेत तक साइकिल ले चल जाया कर।”
सुकांत हा हंस दिस - “का बाबू! गांव वाले हंसही त।”
जीवन लाल गुस्सा होगे - “हंसय दे। जब पेट्रोल सौ - दू सौ के पार जाही तब सबके हंसी निकल जाही।”
बात मजाक मा टलगे, फेर समय हा धीरे-धीरे अपन रंग दिखाना शुरु कर दिस।
कुछ महीना बाद पेट्रोल के भाव फेर बढ़गे। गांव के चौक मा लोगन के भीड़ लगगे। पेट्रोल पंप वाला बोर्ड बदलत रिहिस।
एक आदमी किहिस - “लगथे अब बाइक मा हवा भराके चलाना पड़ही।”
दूसर हा किहिस - “अब तो साइकिल वालेच मन राजा बनही।”
गांव के मास्टर साहब, जे पढ़े-लिखे अउ समझदार रिहिन, किहिन - “देखव भाई, प्रकृति हा सबके हिसाब बराबर करथे। जब मनखे जरुरत ले जियादा भागथे तब समय ओखर औकात दिखाथे।”
मास्टर साहब के बात सबके मन ला छू दिस।
गांव के बुजूर सियान मन बतावत रिहिन कि पहिली के समय मा लोगन दस-दस कोस साइकिल चलाके हाट बाजार जावय। शरीर मजबूत रहय। बीमार कम पड़त रिहिन। अब मोटर गाड़ी के चलते आदमी आलसी होगे। पांच कदम चलना भारी लगथे।
पहिली बिहान होतेच गांव के गली मा साइकिल के घंटी सुनाई देत रिहिस। अब मोटर के कर्कश आवाज गूंजथे।
पहिली हवा साफ रिहिस। अब धुआं भर गेहे।
पहिली आदमी हा खेत मा मेहनत करय। अब मोबाइल मा आंखी गड़ाके बइठे रहिथे।
गांव के डॉक्टर हा भी कहे लागिस - “शुगर, ब्लड प्रेशर, मोटापा… ये सब नई बीमारी नोहय। ये आलसी जिनगी के परिणाम आय।”
एक दिन गांव मा भारी बरसात होइस। सड़क खराब होगे। कतको मोटर साइकिल फंसगे। तब मनराखन ददा हा अपन पुराना साइकिल निकालिस अउ आराम ले निकलगे।
लोगन हा देखके हंसे भी अउ सोच मा पड़ गेन।
मनराखन ददा किहिस - “देखव, साइकिल पेट्रोल नइ मांगय। बस आदमी के ताकत मांगथे।”
धीरे-धीरे गांव के कुछ जवान मन फेर साइकिल चलाना शुरु करिन। कोनो बाजार जाय त साइकिल ले जाय। कोनो स्कूल जाय त पैदल निकल जाय।
फेर दुनिया अतका जल्दी सुधरथे का ?
शहर के चमक-दमक गांव तक पहुंच गे रिहिस। हर आदमी ला नई बाइक चाही, नई कार चाही। शादी-बियाह मा गाड़ी के लाइन देखाके लोगन इज्जत माने लगिन।
सुकांत घलो सोचत रिहिस - “अगर मोर पास बड़ी बाइक रही त गांव वाले मान बढ़ाहीं।”
ऊधारी लेके बाइक खरीद लीस।
पहिली कुछ दिन मजा आइस। गांव मा घूमिस, दोस्त मन के संग फर्राटा भरिस। फेर जब हर हफ्ता पेट्रोल भरवाना पड़िस, तब समझ मा आइस के गाड़ी खरीदना आसान हे, चलाना कठिन हे।
एक दिन पेट्रोल पंप मा लंबा लाइन रिहिस। सुकांत अपन जेब टटोलिस। पइसा कम पड़गे।
उही बेरा पीछे खड़े एक बुजूर सियान हा किहिस - “बेटा, पेट्रोल अब गरीब मन के बस के बात नइ रिहिस।”
सुकांत के मन मा मनराखन ददा के बात गूंजे लागिस।
दूसर दिन वो साइकिल निकालके खेत गीस।
पहिली-पहिली शरम लागिस। फेर हवा लगिस। शरीर हल्का महसूस होइस।
रद्दा मा कतको लोगन हंसिन - “का सुकांत ! बाइक बेच डारे का ?”
सुकांत मुस्कराइस - “नइ रे, पेट्रोल हा हमन ला बेच डारिस।”
सब ठहाठा मार के हंस परिन।
फेर बात सिरतोन रिहिस।
धीरे-धीरे गांव के लोगन समझे लागिन के जिंदगी के असली सुख दिखावा मा नइ, संतुलन मा हे।
गांव के स्कूल मा मास्टर साहब हा एक दिन बच्चा मन ला पढ़ावत किहिन - “बच्चों, धरती मा तेल सीमित हे। एक दिन ये खत्म हो जाही। तब आदमी ला फिर अपन पुरखा के तरीका अपनाना पड़ही।”
एक बच्चा पूछिस - “सर, तब का फेर साइकिल चलाही ?”
मास्टर साहब मुस्कराइन - “हो सकथे अउ पैदल घलो।”
बच्चा मन हंस परिन।
फेर ये हंसी के भीतर भविष्य के सच्चाई छुपे रिहिस।
अब गांव के कई किसान मन सोलर पंप के बात करे लगिन। कतको लोगन इलेक्ट्रिक गाड़ी के चर्चा करे लगिन। फेर बिजली खुद महंगी होवत रिहिस।
समस्या सिरिफ पेट्रोल के नई रिहिस। समस्या आदमी के लालच के रिहिस।
जतका सुविधा बढ़िस, ओतके जरुरत बढ़त गे।
पहिली आदमी दू जोड़ी कपड़ा मा खुश रिहिस। अब अलमारी भर कपड़ा होके भी दुखी हे।
पहिली गांव के लोगन मिलके काम करय। अब हर कोई अपन मोबाइल मा खोए हे।
मनराखन ददा एक दिन चौपाल मा किहिस - “मनखे हा प्रकृति ले दूर होगे हे। अउ जब आदमी प्रकृति ले दूर होथे तब दुख करीब आ जाथे।”
सब चुप रिहिन।
सच बात कड़वा होथे।
गांव के नौजवान अब शहर भागत रिहिन। शहर मा नौकरी, पैसा, गाड़ी के सपना देखत रिहिन। फेर शहर के जिंदगी मा चैन कहां रिहिस ?
भारी ट्रैफिक। धुआं। महंगाई। तनाव।
एक दिन सुकांत के दोस्त मानू शहर ले लहुटिस। थकान ओखर चेहरा मा साफ दिखत रिहिस।
मानू किहिस - “भाई, शहर मा पइसा त मिलथे फेर सुकून नइ मिलय।”
सुकांत पूछिस - “गाड़ी खरीदेस ?”
मानू हंसिस - “गाड़ी खरीदे हंव फेर पेट्रोल भरवात-भरवात जेब खाली हो जाथे।”
सब हंस परिन।
फेर गांव के बुजूर सियान मन के आंखी मा चिंता रिहिस।
समय बदलत रिहिस। पेट्रोल के दाम बढ़त रिहिस। जिंदगी कठिन होवत रिहिस।
एक दिन गांव मा बइक बुलाए गीस। मास्टर साहब, किसान, नौजवान सब जुटिन।
विचार होइस कि गांव मा जादा साइकिल उपयोग करे जाही। नजदीक काम बर पैदल जाही। पेड़ लगाय जाही। जरुरत ले जियादा गाड़ी नई चलाय जाही।
कतको लोगन मजाक उड़ाइन - “ए सब ले का होही ?”
मनराखन ददा किहिस - “बूंद-बूंद ले घड़ा भरथे।”
गांव के स्कूल मा साइकिल रैली निकले लागिस। बच्चा मन नारा लगाइन -
“पेट्रोल बचाओ, धरती बचाओ।”
धीरे-धीरे गांव के वातावरण बदले लागिस।
सुकांत अब रोज बिहान साइकिल चलाय लगिन। शरीर तंदरुस्त होगे। खरचा कम होगे। मन शांत रहय लागिस।
एक दिन वो अपन बाबू ला किहिस - “बाबू, तुमन सही कहत रेहेव।”
जीवन लाल मुस्कराइस - “समय सबला सिखाथे बेटा।”
मनराखन ददा अब बुजूर होगे रिहिस। फेर गांव वाले आज भी ओखर बात धियान ले सुनथे।
एक दिन संझौती बेरा ओहर किहिस- “समय हा सबले बड़े गुरु आय। आदमी चाहे कतको उड़ ले आखिर धरती मा उतरना पड़थे।”
गांव मा हवा बहत रिहिस। कहीं दूर साइकिल के घंटी बजत रिहिस।
जइसे पुरखा मन के आवाज फेर लहुटत होवय।
आज दुनिया तेज भागत हे। गाड़ी के रफ्तार बढ़त हे। फेर आदमी के मन खाली होत जात हे।
पेट्रोल के भाव सिरिफ जेब नई जलावत हे ये आदमी के सोच ला भी बदलत हे।
शायद आने वाला समय मा फेर वो दिन आही जब लोगन सादगी के कीमत समझही। जब साइकिल चलाना शरम नई, गरब के बात होही। जब प्रकृति संग जीना आधुनिकता माने जाही।
काबर के आखिर मा समय हा अपन औकात जरुर दिखाथे।
अउ समय के आगे, ना पेट्रोल टिकथे, ना घमंड।
- डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन - 493773
