Thursday, 28 May 2026

पेट्रोल अऊ घमंड - डुमन लाल ध्रुव

 पेट्रोल अऊ घमंड 

                          - डुमन लाल ध्रुव 

गांव के चौपाल मा बुजूर किसान मन बइठे रिहिन। कोनो बीड़ी फूंकत रिहिस त कोनो हा अपन पुरखा मन के जमाना ला सुरता करत रिहिस। उही बेरा गांव के सबले बुजूर आदमी मनराखन ददा हा किहिस -

“अरे भइया, वो जमाना कुछ अउ रिहिस। जब हमन साइकिल ले हाट बाजार जात रेहेन, खेत जात रेहेन  त शरीर मा जान रिहिस। अब देखव हर घर मा मोटर साइकिल, गाड़ी, पेट्रोल अउ डीजल के धुआं… मनखे त मशीन बन गेहे।”

सब झिन चुपचाप सुनत रिहिन।

गांव के जवान लइका सुकांत हा अपन चमचमात मोटर साइकिल मा आइस। आतेच किहिस - “ददा, अब जमाना बदल गेहे। साइकिल ले काबर जाबो ? मोटर गाड़ी मा टाइम बचथे।”

मनराखन ददा मुस्कराइस - “टाइम त बचथे बेटा  फेर जिनगी घटत हे। पेट्रोल के भाव सुनके तो अब कलेजा कांपत हे।”

सब हंस परिन, फेर हंसी के भीतर चिंता लुकाय रिहिस।

आज के समय मा गांव होवय या शहर, हर आदमी पेट्रोल के भरोसा मा चलत हे। खेत के पंप, ट्रैक्टर, बाइक, बस, कार… सब कुछ तेल के ऊपर टिके हे। फेर तेल के दाम हा अइसने बढ़त जात हे जइसे आगी मा घी डार देय।

सुकांत के बाबू, जीवन लाल किसान, हर महीना हिसाब लगावत थक जाथे। खाद महंगा, बीज महंगा, ऊपर ले डीजल महंगा। ट्रैक्टर चलाना भारी पड़त हे।

एक दिन जीवन लाल हा अपन बेटा सुकांत ला किहिस - “बेटा, अब बिना जरुरत बाइक नइ निकालना। खेत तक साइकिल ले चल जाया कर।”

सुकांत हा हंस दिस -  “का बाबू! गांव वाले हंसही त।”

जीवन लाल गुस्सा होगे -  “हंसय दे। जब पेट्रोल सौ - दू सौ के पार जाही तब सबके हंसी निकल जाही।”

बात मजाक मा टलगे, फेर समय हा धीरे-धीरे अपन रंग दिखाना शुरु कर दिस।

कुछ महीना बाद पेट्रोल के भाव फेर बढ़गे। गांव के चौक मा लोगन के भीड़ लगगे। पेट्रोल पंप वाला बोर्ड बदलत रिहिस।

एक आदमी किहिस - “लगथे अब बाइक मा हवा भराके चलाना पड़ही।”

दूसर हा किहिस - “अब तो साइकिल वालेच मन राजा बनही।”

गांव के मास्टर साहब, जे पढ़े-लिखे अउ समझदार रिहिन, किहिन - “देखव भाई, प्रकृति हा सबके हिसाब बराबर करथे। जब मनखे जरुरत ले जियादा भागथे तब समय ओखर औकात दिखाथे।”

मास्टर साहब के बात सबके मन ला छू दिस।

गांव के बुजूर सियान मन बतावत रिहिन कि पहिली के समय मा लोगन दस-दस कोस साइकिल चलाके हाट बाजार जावय। शरीर मजबूत रहय। बीमार कम पड़त रिहिन। अब मोटर गाड़ी के चलते आदमी आलसी होगे। पांच कदम चलना भारी लगथे।

पहिली बिहान होतेच गांव के गली मा साइकिल के घंटी सुनाई देत रिहिस। अब मोटर के कर्कश आवाज गूंजथे।

पहिली हवा साफ रिहिस। अब धुआं भर गेहे।

पहिली आदमी हा खेत मा मेहनत करय। अब मोबाइल मा आंखी गड़ाके बइठे रहिथे।

गांव के डॉक्टर हा भी कहे लागिस - “शुगर, ब्लड प्रेशर, मोटापा… ये सब नई बीमारी नोहय। ये आलसी जिनगी के परिणाम आय।”

एक दिन गांव मा भारी बरसात होइस। सड़क खराब होगे। कतको मोटर साइकिल फंसगे। तब मनराखन ददा हा अपन पुराना साइकिल निकालिस अउ आराम ले निकलगे।

लोगन हा देखके हंसे भी अउ सोच मा पड़ गेन।

मनराखन ददा किहिस - “देखव, साइकिल पेट्रोल नइ मांगय। बस आदमी के ताकत मांगथे।”

धीरे-धीरे गांव के कुछ जवान मन फेर साइकिल चलाना शुरु करिन। कोनो बाजार जाय त साइकिल ले जाय। कोनो स्कूल जाय त पैदल निकल जाय।

फेर दुनिया अतका जल्दी सुधरथे का ?

शहर के चमक-दमक गांव तक पहुंच गे रिहिस। हर आदमी ला नई बाइक चाही, नई कार चाही। शादी-बियाह मा गाड़ी के लाइन देखाके लोगन इज्जत माने लगिन।

सुकांत घलो सोचत रिहिस - “अगर मोर पास बड़ी बाइक रही त गांव वाले मान बढ़ाहीं।”

ऊधारी लेके बाइक खरीद लीस।

पहिली कुछ दिन मजा आइस। गांव मा घूमिस, दोस्त मन के संग फर्राटा भरिस। फेर जब हर हफ्ता पेट्रोल भरवाना पड़िस, तब समझ मा आइस के गाड़ी खरीदना आसान हे, चलाना कठिन हे।

एक दिन पेट्रोल पंप मा लंबा लाइन रिहिस। सुकांत अपन जेब टटोलिस। पइसा कम पड़गे।

उही बेरा पीछे खड़े एक बुजूर सियान हा किहिस -  “बेटा, पेट्रोल अब गरीब मन के बस के बात नइ रिहिस।”

सुकांत के मन मा मनराखन ददा के बात गूंजे लागिस।

दूसर दिन वो साइकिल निकालके खेत गीस।

पहिली-पहिली शरम लागिस। फेर हवा लगिस। शरीर हल्का महसूस होइस।

रद्दा मा कतको लोगन  हंसिन -  “का सुकांत ! बाइक बेच डारे का ?”

सुकांत मुस्कराइस - “नइ रे, पेट्रोल हा हमन ला बेच डारिस।”

सब ठहाठा मार के हंस परिन।

फेर बात सिरतोन रिहिस।

धीरे-धीरे गांव के लोगन समझे लागिन के जिंदगी के असली सुख दिखावा मा नइ, संतुलन मा हे।

गांव के स्कूल मा मास्टर साहब हा एक दिन बच्चा मन ला पढ़ावत किहिन -  “बच्चों, धरती मा तेल सीमित हे। एक दिन ये खत्म हो जाही। तब आदमी ला फिर अपन पुरखा के तरीका अपनाना पड़ही।”

एक बच्चा पूछिस -  “सर, तब का फेर साइकिल चलाही ?”

मास्टर साहब मुस्कराइन -  “हो सकथे अउ पैदल घलो।”

बच्चा मन हंस परिन।

फेर ये हंसी के भीतर भविष्य के सच्चाई छुपे रिहिस।

अब गांव के कई किसान मन सोलर पंप के बात करे लगिन। कतको लोगन इलेक्ट्रिक गाड़ी के चर्चा करे लगिन। फेर बिजली खुद महंगी होवत रिहिस।

समस्या सिरिफ पेट्रोल के नई रिहिस। समस्या आदमी के लालच के रिहिस।

जतका सुविधा बढ़िस, ओतके जरुरत बढ़त गे।

पहिली आदमी दू जोड़ी कपड़ा मा खुश रिहिस। अब अलमारी भर कपड़ा होके भी दुखी हे।

पहिली गांव के लोगन मिलके काम करय। अब हर कोई अपन मोबाइल मा खोए हे।

मनराखन ददा एक दिन चौपाल मा किहिस -  “मनखे हा प्रकृति ले दूर होगे हे। अउ जब आदमी प्रकृति ले दूर होथे  तब दुख करीब आ जाथे।”

सब चुप रिहिन।

सच बात कड़वा होथे।

गांव के नौजवान अब शहर भागत रिहिन। शहर मा नौकरी, पैसा, गाड़ी के सपना देखत रिहिन। फेर शहर के जिंदगी मा चैन कहां रिहिस ?

भारी ट्रैफिक। धुआं। महंगाई। तनाव।

एक दिन सुकांत के दोस्त मानू शहर ले लहुटिस। थकान ओखर चेहरा मा साफ दिखत रिहिस।

मानू किहिस -  “भाई, शहर मा पइसा त मिलथे फेर सुकून नइ मिलय।”

सुकांत पूछिस - “गाड़ी खरीदेस ?”

मानू हंसिस - “गाड़ी खरीदे हंव फेर पेट्रोल भरवात-भरवात जेब खाली हो जाथे।”

सब हंस परिन।

फेर गांव के बुजूर सियान मन के आंखी मा चिंता रिहिस।

समय बदलत रिहिस। पेट्रोल के दाम बढ़त रिहिस। जिंदगी कठिन होवत रिहिस।

एक दिन गांव मा बइक बुलाए गीस। मास्टर साहब, किसान, नौजवान सब जुटिन।

विचार होइस कि गांव मा जादा साइकिल उपयोग करे जाही। नजदीक काम बर पैदल जाही। पेड़ लगाय जाही। जरुरत ले जियादा गाड़ी नई चलाय जाही।

कतको लोगन मजाक उड़ाइन -  “ए सब ले का होही ?”

मनराखन ददा किहिस - “बूंद-बूंद ले घड़ा भरथे।”

गांव के स्कूल मा साइकिल रैली निकले लागिस। बच्चा मन नारा लगाइन -

“पेट्रोल बचाओ, धरती बचाओ।”

धीरे-धीरे गांव के वातावरण बदले लागिस।

सुकांत अब रोज बिहान साइकिल चलाय लगिन। शरीर तंदरुस्त होगे। खरचा कम होगे। मन शांत रहय लागिस।

एक दिन वो अपन बाबू ला किहिस - “बाबू, तुमन सही कहत रेहेव।”

जीवन लाल मुस्कराइस -  “समय सबला सिखाथे बेटा।”

मनराखन ददा अब बुजूर होगे रिहिस। फेर गांव वाले आज भी ओखर बात धियान ले सुनथे।

एक दिन संझौती बेरा ओहर किहिस- “समय हा सबले बड़े गुरु आय। आदमी चाहे कतको उड़ ले  आखिर धरती मा उतरना पड़थे।”

गांव मा हवा बहत रिहिस। कहीं दूर साइकिल के घंटी बजत रिहिस।

जइसे पुरखा मन के आवाज फेर लहुटत होवय।

आज दुनिया तेज भागत हे। गाड़ी के रफ्तार बढ़त हे। फेर आदमी के मन खाली होत जात हे।

पेट्रोल के भाव सिरिफ जेब नई जलावत हे ये आदमी के सोच ला भी बदलत हे।

शायद आने वाला समय मा फेर वो दिन आही जब लोगन सादगी के कीमत समझही। जब साइकिल चलाना शरम नई, गरब के बात होही। जब प्रकृति संग जीना आधुनिकता माने जाही।

काबर के आखिर मा समय हा अपन औकात जरुर दिखाथे।

अउ समय के आगे, ना पेट्रोल टिकथे, ना घमंड।

               - डुमन लाल ध्रुव 

            मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

                पिन - 493773

लघुकथा - " भूलऊ राम भुलागे "

 लघुकथा - 

" भूलऊ राम भुलागे "


सबो बात सब जघा सुरता नइ आवय l सुरता आही त ओ बेरा  नइ रहय l भूलऊ राम घलो सुरुज भूल्हा ताय l 

मिलगे बिहनिया ले भूलऊ मुखारी धरे तरिया कोती जात l 

पूँछ परेंव -" काली के गोठ ला नइ बताएस गो? "

"का बात ला?" 

"गंगा जल के कसम खवाये रहेस ओला!"

"हाँ, हाँ  ओला भुलागेँव बताये बर फेर  बताना घलो उचित नइ समझेंव l

"काबर  गो?" 

मोरो टुरा उही कोचिंयाई गिरी म लगे हे l चार पइसा कमावत हे l भुला जा अब l

"बने बेराआवत हे कइसे भुला जबो? हमन अब पियन  खान दन  बारी बखरी  दैहान म l

कमांडो तही चलावत रहेस ना भूलऊ l  तोला सुरता हम देवाबो l " 

सुखऊ के गोठ ला सुनत भूलऊ भूलवारे धर लीस 

"अरे भाई  तोला लेगहूँ, तैयार रहिबे अच्छा जघा लेघहूँ  अब सुरता नइ भुलावय बने आदमी बन के आबे l"

सुखऊ जान डरिस राजधानी 

धुरिहा नइ हे l कभू कभू नाम घलो  काम बना देथे l

लघुकथा - " हलो भइय्या " - मुरारी लाल साव

 लघुकथा - " हलो भइय्या "

            -  मुरारी लाल साव 


मोबाईल बाजिस तुरत उठाइस "हलो भइय्या.... I "

  "हलो.. I 

"लड़की देखत हव का भइय्या बिहाव करे बर "

"हव "!  "कइसन लड़की देखत हव?" हमरो रिश्ता म एक लड़की हे पढ़े लिखे हे l "

"का करत हे तुंहर इहाँ के लड़का ह?" 

" अभी अइसने  ठलहा हे l "

"का उमर चलत हे?"

"35-36के होगे हे नौकरी देखतहे !"

" एहु लड़की के उमर ओइसने 34के होगे हे लड़का देखत l" 

नौकरी करत हे अलवा जलवा l

"त..  आके देख लो l"

"नोनी बने हे पढ़े लिखे हे काम बूता म हुशियार हे l "

"ले बताबो l"

ठीक हे भैय्या l"

अइसने मोबाईल ले कतको रिश्ता खोजत खोजत थक गे बुधिया ह अपन बहिनी के लड़की बर l  अचानक बहुत दिन के बाद मोबाइल आथे -"हलो 

हाँ हलो भैय्या "

"तुंहर इहाँ लड़की हे बर बिहाव के लाइक l" 

बुधिया कुछ नई कहि सकीस ए दफे l  दुःखी मन ले कहिस -" भइय्या, लड़की  ऊपर कोती चल दिस l कोनो लड़का देखे l नइ आइस l "

"ओहो!बड़ दुःख होइस l

हास्य व्यंग्य "बने करेस भगवान...!"

 हास्य व्यंग्य 

"बने करेस भगवान...!"

      मुरारी लाल साव 

भगवान के गोड़ ला छुके पाँव परे के आदत तो नइ रहिस फेर कोशिश म लगे रहिथंव  उंकर दुनों गोड़ टमरा तो जतिस एको घा l उंकर गोड़ म धुर्रा नइ माढ़े होही l "मंदिरवा म का करे जइबो घट ही के देव ला मनाइबो... I 

फोटू म उंकर चेहरा मुँहरन हाथ पाँव सब दिखथे l गोड़ छूवे के रिवाज हे माने ला परही l जेन गोड़ छूही उही ला मिलथे कइथे सब l कोनो नइ बाँचे हे एकाध झन होही जेन पाँव नइ परत होही l जोन जइसन पाँव परे हे ओला ओइसने फल /जीवन /ज्ञान / मुक्ति /सुख समृद्धि मिले हे l 

माँ बाप कोती धियान नइ जाय l भगवान ले बढ़के हे सौहें दिखत हे l माँ बाप सब कुछ तोरेच बर करथे l तोरेच बर करत करत मर घलो जथे l ए ज्ञान ला देये बर गुरु महात्मा साधू संत आके बताथे l माँ बाप ला भगवान  जान l माँ बाप के गोड़ छुओ सुबह शाम l प्रवचन ताय  कहना ओकर काम l कोनो सुनत नइ हे, कोनो धरत नइ हे सोला आना बात ला l माँ बाप के गोड़ के धुर्रा के कोनो धोवइय्या नइ हे l जुग बीतत हे l मूरख ला कोन समझाही गुरु l चेताये समझाये अउ सिखाये बर गुरु आघूवाइस l गुरु के  गोड़ ला धरो सेवा करो चपको  तभे ज्ञान अउ भगवान मिलही l श्री गुरु चरन सरोज रज.... I गुरु घलो छाँट निमार के चेला ला सही काम बूता म लगाके पोठ बनाथे l उही पोठ चेला तहाँ अपन  खुद गुरु बने म लग़ जाथे l  आश्रम मोटर गाड़ी  म चेत  रखथे l गुरु गरु अस लगथे l गुरु गुड़ रही जथे,चेला शक़्कर हो जथे l गुरु के गोड़  धुर्रा म लद्दी म बोजागे हे, पाँव परे के मन नइ होवय l 

जतका गुरु हे ओतका भगवान  बनगे l भगवान घलो अकक्ल उही मन ला दीस l जतका गुरु के जतका चेला पाँव पराये बर आघू होगे हे गोड़ ला लमाके के बइठे हे l पाहन पूजे हरि मिले 

तो मै पूंजू पहाड़... I 

जेने मिलिस तेकर गोड़ ला बिन देखे पाँव परेंव l कोन जनी कब   भगवान के गोड़ आघू म आ जही तरे के मौका मिल जाय l 

बने करेस भगवान  हमला मइनखे बना के राखेस l राक्षक प्रवृत्ति झन बाढ़े l अंहकार झन बाढ़े मर्यादा म सब रह

नशा सोशल मीडिया के

 नशा सोशल मीडिया के


आजकल सूचना अउ संचार के जमाना मा सरी दुनिया के शोर-खबर हा घर बैठे मिल जथे। ये साधन हा हम सब के बीच  मा अपन पहुँच बना डरे हे। फेर मनखे-मन के आदत हा पड़ोसी घर ला ताँके-झाँके के जादा रहिथे। पुरखा-सियान मन के कहना रहिस कि कभू अपनो घर ला झाँक के देख ले करव रे बाबू हो। शुरू-शुरू मा हमला ये बात के रहस्य हा समझे मा नइ आत रहिस। फेर सोशल मीडिया ला झाँके मा जम्मों बिसकुटा के खइरपा हा अपने-अपन खुलत गीस।तब समझ मा आइस येकर बुखार हा कतका नशीला हे। आजकल कन्हों जरूरी संदेश ला एक आदमी ले दूसर आदमी तक पहुँचाय बर सोशल मीडिया के एकतरफा उपयोग होवत हे।सोच-समझ के बउरे मा येकर लाभ तो हे फेर अनर-बनर बउरे मा शारीरिक, मानसिक अउ आर्थिक हानि के संभावना घलव हे। येमा एके ठन मेसेज ला एके घाँव मा कतको झन ला भेजे के वेवस्था हावय।आज देश के बहुत बड़े आबादी के हाथ मा स्मार्टफोन के पहुँच हे। कतको पढ़ईया लइका-मन अपन घर बैठे आनलाइन एजूकेशन एप ले जुड़के पड़ई-लिखई जैसे महत्वपूर्ण काम ला करत हें। बड़े-बड़े कंपनी वाले मन अपन आफिस के कई ठन काम ला अपने घर मा बैठ के आनलाइन निपटाय के उदीम करत रहिथें। कोरोना के समय मा येकर उपयोग ला भला कोन हा भुला सकथे। तब आफिस के सरी काम घर बैठे होवत रहिस। येकर ले आय-जाय के खरचा के संग समय के बचत हो जाय। कला जगत हा घलव एकर ले अछूता नइ हे। देश होय चाहे विदेश इहाँ ले लेके उहाँ तक छोटे ले लेके बड़े कलाकार-मन अपन कला के प्रदर्शन बर इही माध्यम ला चयन करके दूर-दराज तक अपन पहुँच बनाए मा सफल होवत हे।

           ओ गुजरे दिन के सुरता ला समोख के रखना घलव जरूरी हे जब मनखे-मन सिरिफ टेलिफोन के नाव ला सुने बस रहिन। अखबार, पोस्टर अउ सनीमा के चित्र ला देख के टेलिफोन के शकल-सूरत ला जानिन। जब शहर डहर जाना होइस तब लोगन-मन सेठ-साहूकार-मन ला उनकर दुकान मा गोठियावत देख के येकर मुखा दर्शन कर पाइन। फेर एक लंबा समय निकले के बाद विज्ञान अउ तकनीक के क्षेत्र मा समाज हा बहुत बड़े बदलाव के अनुभव करिस। नब्बे के दशक मा टीवी हा निम्न मध्यम वर्गीय परिवार तक अपन पहुँच बनाइस। आबादी के हिसाब ले बड़े गाँव मन मा टेलिफोन तार के माध्यम ले संचार सेवा के शुरुआत हो गे रहिस। फेर येकर लाभ कस्बा अउ शहर के आसपास के गाँव-मन ला ही मिल पाइस। इक्कीसवीं सदी के शुरुआत मा संचार-सेवा के क्षेत्र मा एक क्रांतिकारी बदलाव आइस। जिहाँ किफायती दर मा लगभग प्रत्येक गाँव बर एक मोबाइल टावर के संग डब्ल्यूएलएल के एक सेट देय के योजना लांच करे गीस। ये योजना ले सूचना-संचार के क्षेत्र मा व्यापक परिवर्तन होइस।

            फेर येकर माध्यम ले दूर-दराज के मनखे-मन ले सीधा बातचीत अउ आवश्यक जानकारी तुरत प्राप्त कर के सुविधा मिलिस। फेर मनखे के जिनगी मा तेजी ले बदलाव लाइस ये मोबाइल हा। शुरूआती दौर मा मनखे के जिनगी मा बातचीत के काम ला आसान करे बर मोबाइल हा कीपैड मा सवार होगे हमर बीच मा आइस। समय के साथ नवा-नवा तकनीक के अविष्कार ले साफ्टवेयर अपग्रेड होवत गीस अउ आज एन्ड्राइड अउ आईफोन जैसे स्मार्टफोन हा हम सब के हाथ मा आगे हे।आज के दौर मा येकर बिना दुनिया हा अधूरा हे। इतिहास ला खोधियाय मा पता चलथे कि येकर अविष्कार अमेरिका के इंजिनियर मार्टिन कूपर हा 1973 मा करे रहिस।धीरे-धीरे कंप्यूटर अउ सॉफ्टवेयर के विकसित जुगलबंदी ले मोबाइल फोन हा नवा-नवा एप के माध्यम ले ज्ञान-विज्ञान के दुनिया मा अपन डंका बजावत हे। येमा अपन पसंद के कई ठन एप ला अपलोड करके जानकारी के संग दिनचर्या ला सरल बनाय जा सकथे। मौसम के जानकारी हा किसान भाई मन बर बड़ महत्व के होथे। कब पानी गिरही, कब सुक्खा रही अउ कब पाला पड़ही येकर जानकारी मौसम के एप ले समय रहत मिल जथे। तब किसान हा फसल के बोनी अउ कटाई ला समय रहते सफलतापूर्वक निपटा डारथे। अइसने ढंग ले बैंक मा पैसा-कौड़ी के लेन-देन बर यूपीआई , गुगल पे, फोन पे, अनजाना शहर मा मैप के जरिए ट्रेफिक के जानकारी, रेडियो, टीवी, घड़ी, कलेंडर,पंचांग अउ ट्विटर कई ठन एप हवय।वाट्सएप,फेसबुक, यूट्यूब अउ इंस्टाग्राम ले अपन अभिव्यक्ति ला आडियो, विडियो अउ लिखित रूप मा दुनियाभर मा सेकंड भर मा पहुँचा सकथन। 

       अलग-अलग जगह मा दूर-दराज मा बैठे सब मनखे-मन ले आडियो अउ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए गोठबात के सुविधा हा बहुत बड़े इनाम घलव आय।नवा पीढ़ी के लइका-मन मोबाइल के बारे मा एक-एक ठन जानकारी ले अपडेट रहिथें। तेपाय के पचास साल के सियान-मन हा पाँच साल के लइका के आगू मा पानी भरत नजर आथें। येकर अतिक नशा कि लइका-मन के हाथ ले कहुँ मोबाइल ला नँगा लेबे ते वोमन टेंशन मा आ जथें। अरे काला बताबे मरे-मारे बर  जोम देथें। येकर नशा अतिक कि थोरको भी खयाल नइ रखे कते हा माँ हरे अउ कते हा बाप हरे।अभी मोबाइल के इही महिमा ला देखते रहेन कि विज्ञान के दुनिया मा एआई हा मेछरावत आके अपन धमक कायम कर दीस। येहर तो अइसे करिश्मा आय जेकर कन्हों जुवाब नइहे। 

             गोठ ला आगू बढ़ाबे तब येती मोबाइल मा आडियो-विडियो देखे-सुने के तकनीक हा लोक कला के मंचीय बेवस्था के पाया ला हिला के रख देहे। गाँव-गँवतरी मा नाचा-गम्मत, पंथी, पंडवानी अउ भरथरी जइसन लोक कला के अंकाल परे कस होगे हे। मोबाइल मा मिलने वाला मनोरंजन के सामग्री-मन मंचीय प्रस्तुति ले बहुत सस्ता हे। तेकर सेती सब येकरे पाछू-पाछू भागत हें। खास बात तो यहू हे कि येला जब समय मिले तब देखे जा सकथे। साथ ही समय के बचत बोनस मा। दृश्य-श्रव्य मनोरंजन के क्षेत्र मा येहा सिनेमा उपर सबले जादा प्रभाव डारे हे। आज आम जनता-मन सिनेमा घर मा बैठके फिलिम देखना पसंद नइ करें। तेकर सेती कई सिनेमा घर बदहाली के शिकार हे। आज सोशल मीडिया हा समाज ला अपन गिरफ्त मा ले डरे हे। गूगल, इंस्टाग्राम, फेसबुक ,यूट्यूब, ट्विटर अउ व्हाट्सएप्प जइसन एप हा ज्ञान के खजाना तो आय। फेर येकर ले समय जैसे मूल्यवान चीज के बरबादी घलव हे। जब येला देखना शुरू करबे ते तँय देखते रहि जबे। मोहनी-थापनी डारे कस समय कइसे पहाथे कुछु समझे मा नइ आय। ये दिशा मा होवत शोध ले यहू पता चले हे कि स्मार्टफोन चलइया दीदी-भैया मन चौबीस घंटा मा औसतन तीन घंटा अपन मोबाइल में व्यस्त रहिथें।

 विडंबना ला देखव ये मोबाइल के सेती आजकल हुशियार मनखे-मन घलव डिजिटल अरेस्ट के शिकार होवत जात हें। अउ घबराहट मा अपन मेहनत के गाढ़ी कमई ला गवाँवत हें। विद्वान-मन के कहना हे कि सोशल मीडिया के सेती दुनिया के दूरी हा सिमट के मोबाइल मा समा गे हे ।फेर घर भीतरी के किस्सा-कहानी हा कुछ अलगेच हे। इहाँ तो एक ठन सोफा मा तीर-तीर मा बैठे परिवार वाले मन हा गजब दूरिहा होगे हें। काबर कि सबके हाथ मा एन्ड्राइड मोबाइल हे। अउ सबे मन मोबाइल के विशाल समुंदर मा खुसर के तउँरे के आनंद लेना चाहत हें।

             मार्केट मा किसम-किसम के मोबाइल के आय ले नवा पीढ़ी के बहुत लइका-मन मा येकर मनमाने बुखार चढ़े हवय। येमन जरूरी काम-धाम ला छोड़ के मोबाइल खरीदे मा अपन ध्यान लगा देथें। तेकर कारण उनकर आर्थिक स्थिति के ऊपर भी बहुत फरक पड़त हे। ये लइका-मन छोटे-छोटे वीडियो देखके, रील बनाय मा अपन कीमती समय बर्बाद करत हें। अउ अपन पढ़ाई-लिखाई ले दूर होवत जात हे।सही कहिबे ते अभिव्यक्ति के आजादी के नाम मा इही सोशल मीडिया हा आजकल धरम-जात अउ वर्ग-भेद के नवा अध्याय वाला अखाड़ा घलव बनगे हवय। येकरे आड़ मा दबंगई के खुलेआम खेल चलत हे।गाली-गलौच के उत्पादन अउ वितरण केंद्र के रूप मा येकर इस्तेमाल हद ले जादा होवत जात हे। मनखे समाज मा अब समरसता के भाव हा खंडित होय कस जनाथे। काबर कि कोई ला जातिगत गाली देना हे, तलवार लहरावत प्रदर्शन करना हे तेकर बर अब ये धरती हा बड़ उर्वरा होगे हे। कते हा प्रधानमंत्री जैसे पद मा बैठे व्यक्ति ला जातिगत गाली देवत समाज मा अपन विशिष्टता प्रमाणित करे के होड़ मा लगे हे। कते हा बाबा अंबेडकर ला गरियावत हे, त कते हा समाज-सुधारक महापुरुष मन के मान-मर्दन करके अपन औकात दिखावत हे। तब लिल्हर लुरू-बुटु मन के का हालत होवत होही तेकर सहज अंदाजा लगाय जा सकथे।समझ मा ये नइ आवय कि येमन ला अइसन करे के साँस-पानी कहाँ ले मिलत हे। तलवार लहरावत कोई भी ला मारे-काटे के फतवा जारी करे के हिम्मत हा तो जगजाहिरे हे। अउ कमजोरहा मनखे-मन अंगरीच दिखा दिही ओतकीच मा अइसे ओइला देथे ते ओकर जमानत मिलना मुश्किल हो जथे। कते हा हिंदू देवी-देवता उपर अभद्र टिप्पणी करत हें ता कते हा दूसर धरम उपर घटिया टिप्पणी करके सुर्खी बटोरत हे। इहाँ संविधान अउ धार्मिक ग्रंथ मन ला चीर-फाड़ करे ले बाज घलव नइ आत हें।महापुरुष मन के मूर्ति-मन ला खंडित करके धौंस जमाय के नवा संस्कृति के उदय होवत  हे। ये सब  असमाजिक घटना ला सोशल मीडिया मा वायरल करके ये मन बड़े शान के साथ अपन धृष्टता के परिचय घलव देवत हें।

         यूट्यूब ला देखे मा ये मनोरंजन अउ ज्ञान के खजाना आय। ओकरे संगे-संग येहा मिथ्या सूचना-समाचार के भंडार घलव आय। जेन ला जो मन लगीस वो वइसने वीडियो बनाके यूट्यूब मा अपन तमाशा देखावत हे। कभू-कभू अइसे लगथे मानो ये बउराय यूट्यूबर-मन अपन विशिष्टता सिद्ध करे बर धमा-चौकड़ी मचावत होही का। आप मन खुदे अनुमान लगा सकथो कि इनकर बिगड़ेपना ह डिजिटल इंडिया के नवाचार आय कि अत्याचार। इही कड़ी मा व्हाट्सएप, फेसबुक अउ इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म-मन हा यूट्यूब ले जादा तो नइ फेर थोरको कम घलव नइ हे।अइसे भी देश के जनता-मन अपन कीमती समय के मूल्यांकन कहाँ कर पावत हे। अपन तीर-तखार के मनखे-मन ला मोबाइल मा घंटो धुनी रमाय देख के आप-मन येकर खुदे परछो पा सकथो। ये मोबाइल के नशा हा छोटे-बड़े ,अमीर-गरीब सबके चेत-बुध  ला चीथ डरे हे। कोई भी नशा होवय हद ले जादा हा नाश  के कारण बन जाथे। सही कहिबे ते डिजिटल युग के ये नशा हा भविष्य बर खतरनाक संकेत घलव देवत हे। तेकर कारण जागरूक रहना बहुत जरूरी हे। आशा हे बुधियार अउ गुणी-ज्ञानी जनता-मन ये नशा ला अपन तीर मा कभू ओधन नइ दीहीं। अउ घर-परिवार, समाज के सुख-समृद्धि, देश के विकास अउ मानवता बर सदा संकल्पित रइहीं।


महेन्द्र बघेल

गीत, ग़ज़ल अउ कविता के फुलवारी: छतनार*

 

*गीत, ग़ज़ल अउ कविता के फुलवारी: छतनार*


पोखन लाल जायसवाल 

'छतनार' काव्य संग्रह राजकुमार चौधरी 'रौना' के चउथइया किताब आय। जेन हर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहन ले बछर 2025 मं प्रकाशित करे गे हे। साहित्यिक दृष्टि ले कृति ऊपर गोठ-बात करना सही रहिथे। पर कृतिकार के जिनगी ला झाॅंकत रचना संसार मं उतरे के अपन एक अलगे आनंद हे। मजा हे। भाव समझे के सुभिता घलव।

राजकुमार चौधरी 'रौना' छत्तीसगढ़ी साहित्य बर एक समर्पित नाम हे। जौन मन तीन कोरी ले आगर सावन देख चुके हें। उन ला ए सावन मन कभू हरियर होय के सुख नइ पहुॅंचाइन। उॅंकर जिनगी मं सावन हा हरदम पूरा बन के आइस। जब आवय, तब ओकर बर दुख-पीरा अउ अभाव के काप छोड़ चल देवय। उन कतको जतन करिन, उदिम करिन, फेर उॅंकर किस्मत उन ला कभू संग नइ दिस। उन बड़ मिहनती हें, करम करे ले कभू नि ढेरियाइन। बड़ फजर ले सुरुज नरायन ल परघावत अपन बुता मं लग जथें अउ बेरा आछत ले भिंड़े रहिथें। हाथ मं कतको रेखा हें, लकीर हें। फेर फ़कीर के लकीर। भाग के रेखा कभू चमकिस नहीं। भाग के जब्बर रेखा जइसे उॅंकर लाखा मं नइ परिस। तभो जिनगी ले हारिन नइ, न घबराइन। उन ल ओकर (जिनगी) ले कोनो शिकायत नइ होइस। संतोषी सुभाव के रौना हरदम खुश रहिथें। जेन हे, तेन मं खुश रहना, उॅंकर सब ले बड़े खासियत आय। कखरो ले न जलना अउ न कोनो कॉम्पीटिशन। बड़े बने के कोनो सउॅंक नहीं। ...ससन भर अगास मं उड़े पाछू आना तो भुइॅंया च म हे। बस अपन बाॅंटा के बुता मं लगे रहिथें। अपन व्यंग्य अउ कविता मन ले उन आजो छत्तीसगढ़ी साहित्य के बढ़वार मं चेतलगहा बुता कर हावॅंय।

'छतनार' उही उदिम के एक ठिन चिन्हारी आय। छतनार के ए फुलवारी मं गीत, छंद, ग़ज़ल, मुक्तक अउ नवा कविता के रकम-रकम के फूल फूले हें। जेमा जिनगी के रंग हे। माटी के ममहासी हे। बेरा के व्यथा हे। प्रगतिशीलता हे। जागरण के आरो हे, संदेश हे। मया-पीरा के कथा घलाव हे। प्रकृति के सुघराई हे। 

मनसे जब महतारी के गोदी म रहिथे, तौ ओकर मन लोरी सुन के बहल जथे। कहे के मतलब हे कि गीत ले हमर जुराव ननपन ले रहिथे। गीत आनंद देथे, जिनगी मं रस घोरथे। चाहे गीत लोरी, सोहर, बिहाव, ददरिया, करमा, जइसन कोनो भी गीत होवय। ए संग्रह के पहिली खंड गीत ले सजे हावे। रकम-रकम के 31 गीत हें। जेन म प्रकृति चित्रण के संग मया-पिरीत के गीत हे। जेन मं मिलन के सुग्घर सुर मिलथे त बिरहा के पीरा घलाव।

पहलइया गीत मं मैना ले मुॅंहाचाही करत रौना लिखथें-

जेन करे जंगल अजार

ओ तो पाही दुख अपार

कर ले भुॅंइया के सिंगार मैना मीठ-मीठ गा ले

तोर भाखा हवे मज़ेदार मैना....

      

सिरतो तो हरे कि जब जंगल उजर जही त दुख-पीरा के पूरा आही। जिनगी संकट मं पर जही। खाड़ी मं युद्ध के चलत कहूॅं तेल नि आही/नइ मिलही त का होही, कल्पना कर सकत हन। जेन हम ला कॅंपा देथे। जंगल के रहे ले जम्मो सुख हे। बिन जंगल के जिनगी के जम्मो रंग फीका हे। फेर समझत कहाॅं हन? बस विकास के सरग निसैनी मं चढ़े जात हन। सरग छुआही कि नहीं एकर ठिकाना नइ हे। काबर कि मन पंछी उड़े ले नि छोड़य।

      

दूसर कोती जंगल मं एक डर हे। जेहर रोज रोवाथे। नक्सली मन के करतूत ले काकर अंतस् रोवत नइ होही। बेकसूर अउ आम आदमी के लहू ले रॅंगत भुइॅंया के पीरा ला रौना लिखथें-


रोज़ हमर धरती लाले लाल होवथे।

नक्सल के मारे माटी, लाले लाल होवथे।


ए पीरा के बादर कब छटही कोन जनी। इही मेर ओ गोहार लगाथे कि 'वो दिन कौने दिन आही'

ए गीत मं विकास के अगोरा मं हमर स्वाभिमान के गिरवी धराय के पीरा हावय। मन मं इही भरोसा राखे कि कोनो दिन हमरो आही। इही सपना देखत लिखथें-


खान खदानों धन दोगानी उहिच मन पोगरावत हें 

तुॅंहरो ठेंगा फरसा भाला धरे-धरे भोथरावत हें 


मुड़ी अपन गड़ियाना छोड़, चेथी ला खजुवाना छोड़

अपने छाती ला तनियाही रे....


हमर इहाॅं उवत बेरा के पैलगी करे के चलन हे। धरती मं जिनगी सुरुज के वरदान आय, काबर कि ओकरे ऊर्जा ले ये दुनिया संचालित हे। सुरुज ला लेके 'रौना' के लिखे मानवीकरण अलंकार के एक उदाहरण आप मन के पढ़े बर रखत हॅंव, जेन मं आशा के एक किरण हमर घर पहुना बन के रोज आथे। सुख सकरात लाथे।


पहिली किरन सुरुज देव के, भाॅंड़ी चढ़ के आवत हे।

आस जगावत 

नवा किसम के, सुख सुमता बगरावत हे।


'ये पिंजरा के पोसे सुवना' विरह के गीत आय। फेर ए गीत मं छायावादी गीत के ममहासी हे। दर्शन हे। आत्मा अउ परमात्मा के बीच संवाद हे। 


सतरंगी कविता (कविता खंड) मं गर्मी अउ बरसात के सुग्घर चित्रण हे। बेटी कविता के प्रवाह, भाव अउ शिल्प अतेक बढ़िया हे कि पाठक गरीब अउ मिहनतकश बाप के अंतस् के पीरा संग अगाध मया के सगरी ले तर-बतर होय बिगन रहे नइ सके। आखिरी पद देखिहौ-


खाई लेके खाबे कहिके/ अठन्नी दे मनाये हॅंव/ पेट बिकाली हवे जरूरी/ लकर-धकर तब आये हॅंव/ वो मोर मया के झॅंपली ए/ प्यार के संदूक पेटी ए/वो मोर मयारू बेटी ए।


'रेला के झाला' कविता प्रतीकात्मकता रूप मं मनखे के जीवन के संघर्ष ला रेखांकित करे मं सफल हे। रेला/रेरवा/बया/दर्जिन पक्षी मानव के प्रतीक आय। कविता मं जीवंतता हे। 

    

साहित्य, संस्कार अउ संस्कृति के पोषक आय। फेर इही साहित्य समाज बर सचेतक के भूमिका अदा करथे। समाज मं व्याप्त विसंगति, विद्रुपता के संग पाखंड अउ आडंबर के विरुद्ध मुखरित हो के समाज ला एक दिशा बोध कराथे। रौना के लेखनी समाज मं व्याप्त हर कुरीति अउ विसंगति ऊपर चलथे।  

देश धर्म ला ताक मं रख आपस मं जात-धरम के नाॅंव ले लड़इया मन ऊपर उॅंकर गुस्सा देखव-


रोजे झगरा जात धरम के, मंदिर मस्जिद माथा फोर।

सूते जठना सिसकी पारे, देश धरम के कनिहा टोर।। (पृ. 59)


बिम्ब अउ प्रतीक विधान संग्रह ला नवा उॅंचास देथें। भाषाई दृष्टि ले शब्द चयन लाज़वाब हे। ध्वन्यात्मक अउ जोड़ा शब्द (युग्म) मन संग्रह के सुघरई बढ़ाथें। हाना-मुहावरा मन के प्रयोग मनभावन हे। गीत कविता ला नवा उॅंचास देथें। अलंकार के बिगन काव्य रचना संभवे नइ हे। एकरे सेती अलंकार के गोठ-बात करना ज़रूरी नइ समझत हॅंव। गीत मन मं माधुर्यता हे। शृंगार के संग सामाजिक सरोकार घलाव हे। 

 

ग़ज़ल मं व्यंजना अउ व्यंग्य दूनो के पुट मिलथे। ग़ज़ल मन बह्र मं लिखे गे हें, ग़ज़ल के कहन उॅंकर ग़ज़ल संग्रह 'पाॅंखी काटे जाही' के तुलना मं इक्कीस हे। कहन अउ बुनावट मं कोनो समझौता नइ दिखिस। उॅंकर ग़ज़ल पटरी मं दौड़े ला धर लेहे। 

जाॅंगर टोर कमइया मजदूर अउ किसान ला समर्पित एक ग़ज़ल के मतला अउ एक शेर आप मन बर बतौर नज़राना पेश करत हॅंव-


हवा घाम पानी म जाॅंगर छरे हन।

तभे भात रोटी के सथरा धरे हन।


सधे ना किसानी करम हा सहज मा

खपाके बदन चाम करिया करे हन। (पृ.96)


व्यवस्था मं बाधा परत मन ला ताना मारत उन शेर कहिथें


झूठ लबरा सियानी करे देश मा

दोगला ला न तो बातबानी हवे। (पृ.92)


मन के करिया मनखे ऊपर उॅंकर शब्द बाण देखव


बैर भरे हे जेकर भीतर

भूॅंजत हें वो मन दाॅंवा ढिल।


'मुक्तक रौना के' खंड मं उॅंकर 47 मुक्तक शामिल हें। जौन मन प्रभावी हें। भाव पक्ष अतेक प्रबल हे के पाठक पढ़त खानी एक नवा दुनिया मं विचरे लगथे। चित्रण गज़ब के हे।


बीपत के ऑंसू ला हम पीये बर सीखे हन।

घाम-छाॅंव मा जिनगी ला जीये बर सीखे हन।

झन देखव रे तुम तन के तुनहा ओनहा ला,

हम तो फटहा मन हिरदे ला सीये बर सीखे हन।


नता-गोता, मनसे, अउ घर-परिवार के नैतिक मूल्य मं गिरावट ऊपर उॅंकर मन के पीरा ए मुक्तक मं झलकथे-


छप्पर छानी घलो बदलगे जेमा बरखा घाम सहन।

धरे कटारी वो किंजरत हे जेला भाई राम कहन।

बाॅंटे भाई परोसी होगे परछी मा नेंग निभाथे

बदल गये घर के परिभाषा जेला चारों धाम कहन। (पृ.90)


मृत्यु ए संसार के आखरी सच आय, फेर माया के टोपा पहिने मनखे ले उन सवाल पूछथें-


छूट जही इहचे सबो गठरी जबर जैजाद के।

छोड़ दे अभिमान तन के शान ला औलाद के।

काल जब सोरियाही तब कहाॅं तैं भागबे

लेगही मरघट मं रौना चार संगी लाद के। (पृ.89)


ऊपर के ए मुक्तक मं जिनगी के दर्शन हे, सच्चाई हे।

रौना छंद अउ ग़ज़ल के जानकार हें, मुक्तक बढ़िया लिखथें। मुक्तक छंद या ग़ज़ल के शिल्प मं होथे। अइसन मं कुछ मुक्तक मन मं शिल्पगत सुधार के ज़रूरत हे। जेन ला उन कर सकथें। अवइया संस्करण मं ए कसावट दिखही ए आशा करत हॅंव।


लेखन मं समय के संग प्रगतिशीलता दिखना चाही। एके ढाॅंचा/खाॅंचा/पटरी अउ कथानक मं चले ले नीरसता आथे। इही ला सरेखत रौना एक सवैया लिखथें-


कतका दिन ले बड़ गात रहिबे रखिया मुनगा बर गीत सखा।

भरमार लिखे हस देव मया जस तीज तिहार फलीत सखा।

बितगे जुग बात नवा कर ले हित मान जगे नव रीत सखा।

लिख मानवता जग व्यापकता रस राग जिये धर पगीत सखा।


तुलसी दास जी मन अपन लेखन ल स्वांत: सुखाय बताय रहिन।  आजो बहुत झन उही सुख के अनभो करथें अउ लिखथें। रौना घलव अपन मन के भाव ला लेखन मं उतारे के फकत एक उदिम कहे हे। उॅंकर ए उदिम ला नमन करत हुए उॅंकरे लिखे मुक्तक उन ला समर्पित करत हॅंव -

पेड़ पथरा मा फूल पान चढ़ा लेथन हम

उथली तरिया मा डूबकी लगा लेथन हम

का लिख पाबो हम गीत पोथी रचना ला

कागज करिया करके मन मड़ा लेथन हम।


छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहर ले प्रकाशित ए कृति के मुखपृष्ठ आकर्षक हे, आयोग डहर ले प्रकाशन के ए सुविधा रचनाकार ला प्रोत्साहित करथे। 'छतनार' मं बहुत अकन वर्तनी त्रुटि हे। जेकर ले आयोग के साख दाॅंव मं लगथे। छवि खराब होथे। आयोग डहर ले छपे किताब मन मं वर्तनी त्रुटि मिलना भाषा बर काम करइया आयोग कतेक गंभीर हे, ए सवाल खड़ा करथे। ए त्रुटि मन ले छुटकारा पाए बर प्रकाशन विभाग ला छत्तीसगढ़ी के जानकार ले प्रकाशन के पहिली दुबारा जाॅंच कराना चाही।

०००

काव्य संग्रह: छतनार 

कवि: राजकुमार चौधरी 

प्रकाशक: डॉ अभिलाषा बेहार, सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 

प्रकाशन वर्ष: 2025

पृष्ठ: 108

स्वामित्व: छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग 

000

पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह)

जिला बलौदाबाजार-भाटापारा छग 

मोबाइल 9977252202

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनजीवन मा तीज तिहार के महत्व अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोण*

 *छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जनजीवन मा तीज तिहार के महत्व अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोण*


हमर छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा तिहार मन के विशेष महत्ता हे चाहे वो हरेली हो, राखी, अक्ती, देवारी, जेठौनी, छेरछेरा या तीजा तिहार हो। सबो तिहार के अपन-अपन महत्व हे। अइसने हमर, छत्तीसगढ़ अउ पूरा देश मा तीज तिहार के विशेष महत्व हे। तीज तिहार सिरिफ ब्रत उपवास नो हरे, ये तिहार नारी के सनमान के परब आय, नारी के आत्म स्वाभिमान के, सामाजिक ताना-बाना के परब आय। सादगी अउ सामूहिकता के परब, नारी के ‘अटूट संकल्प’ ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा-विश्वास के परब आय। अउ इही सामाजिक परिवेश मा नैतिक मूल्य, धीरज, प्रेम के तिहार आय। इहाँ के तीज-तिहार केवल मनोरंजन या रोटी-पीठा पकवान तक सीमित नइ हे। अगर हम एकर पाछू के छिपे परंपरामन के परत हटा के देखबो, त येमा गहरा वैज्ञानिक, पर्यावरनीय अउ मनोवैज्ञानिक रहस्य छुपे हे।


*आध्यात्मिक अउ वैज्ञानिक रूप* –    आध्यात्मिक रूप ले, जब तीज तिहार ल देखथन त एला ‘हरिततालिका तीज’ कहे जाथे। ये माता सती के (जेकर ददा प्रजापति दक्ष दाई प्रसूति) अग्निकुंड मा अपन प्रान के दाह करे के बाद लगभग 108 जनम के बाद पार्वती के रूप मा हिमालयराज ( हिमवान ) अउ मैनावती के बेटी के रूप मा जनम लिस। जेकर नाम पर्वत पुत्री के कारन पार्वती ( शैलपुत्री) कहाइस। पार्वती भगवान शिव ले अगाध भक्ति, प्रेम विश्वास रखे। जब होकर बिहाव भगवान विष्णु के संग होही कहिन, तब माता पार्वती घर ले दूर जंगल मा  गिन अउ भगवान शिव ल पति के रूप मा पाय बर त्याग-समर्पन के संग तपस्या करिन  एकरे सेती एला कहिथें ‘हरतालिका’, शाब्दिक अर्थ मा देखा जाय तब ‘हर’ मतलब ‘हरण’, ‘आलिका’ मतलब ‘सखी’, सखी के द्वारा पार्वती के हरन करके जंगल मा तपस्या करना। भौतिक सुख सुविधा ल छोड़ के आध्यात्मिक सुख के प्राप्ति करना ए हरे हरितालिका तीज-तिहार।

    हरतालिका  तीजा ल वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त कोनो भी  काम या लक्ष्य के प्राप्ति बर एकांत मा काम करना बहुत जरूरी होथे। जब हमन  कोनो कठिन अउ बड़का काम करथन त मन,  बुद्धि, विवेक ल शांत रखे बर एकांत अउ  शुद्ध वातावरण के जरूरत होथे। जेन हा, चिंतन, करे बर, साधना करे बर, बहुत जरूरी होथे।  एकरे ले कोनो भी कारज या लक्ष्य सही दिशा मा प्राप्त  होथे। एकरे  सेती माता पार्वती जंगल, निर्जन वन, प्राकृतिक पर्यावरन के बीच म रहिके अपन साधना करिन अउ अपन लक्ष्य ल पाइन ।

         तीज-तिहार हा ग्रामीण जनमानस मा अपन बहुत बड़े महत्व रखथे। भादो महीना के  अँजोरी पाख (शुक्ल पक्ष) तीज के  होथे ये तिहार। तीजा के एक हफ्ता पहिली कृष्ण जन्माष्टमी, पोरा ले  ददा-भाई मन बेटी बहिनी मन ल तीजा लिवाय बर जाथें। बेटी-माई मन हा ददा-भाई के अगोरा मा रद्दा जोहथ रहिथें कि कब ददा-भाई मन आही अउ कब हमन अपन मइके के घर-अँगना मा जाबो। ददा-भाई मन जब बेटी के ससुराल मा आथें त एक बेटी के ससुराल अउ मइके  के रिश्ता मजबूत होथे। हिरदे के भाव प्रगाढ़ होथे। 


*करु भात के महत्व वैज्ञानिक दृष्टि अउ आध्यात्मिक दृष्टि ले * – तीज तिहार मा करुभात के बड़ महत्व हे। करुभात के दिन करेला के साग बनाय जाथे। इही करु करेला ‘करुभात' आध्यात्मिक दृष्टि ले मन के शुद्धि,  बैराग, संयम के प्रतीक आय। कठिन निर्जला ब्रत के पहिली करेला के सेवन उपसहीन मन के भीतरी भाव मा सांसारिक मोह-माया अउ सवाद ले दूर हिरदे के बहिरी, भीतरी ला शुद्ध करे के  आध्यात्मिक साधना आय । |जिनगी के दुख ल सही के कड़वाहट ल सही के सुख के अगोरा मा आगू बढ़े के प्रतीक आय। जब तक जिनगी मा दुख नइ होय तब तक सुख के भान नइ होवय। 

      वैज्ञानिक रूप रूप मा देखे जाय त करेला के तासीर जुड़ होथे जब बेटी-माई मन तीन दिन के निराहार निर्जला तीजा उपास रहिथें तब ये करु करेला ओकरमन के शरीर मा ऊर्जा के काम करथे। अउ छोटे-मोटे शारीरिक रोग ल दूर करथे। शरीर के विषाक्त पदार्थ ला जलाय मा काम करथे।

           छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा करुभात के दिन बेटी-माई मन ए पारा ले ओ पारा दाई-ददा, कका-काकी, मीत-मितान घर  करुभात खाय बर जाथें त ये जनजीवन मा पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक एकता, सामाजिक समरसता के प्रतीक आय। कोनो, सबो घर जाके भात नइ खावँय फेर भाव रखथें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त बेटी-माई मन मइके मा आके अपन ससुराल के जवाबदारी ले दू-चार दिन बर सुस्ता के, घर परिवार के संग; सखी सहेली के संग मन के भारी पन ला हल्का करथें। मानसिक थकान ले मुक्ति पाथें। एक दूसर ले सुख-दुख, मया-दुलार बाँटथें। इही प्रेम भाव रिश्ता ल मजबूत बनाथे। फेर अब देखे सुने मा मिलथे कि तिहार बार मा घलो परिवार मा मनखे मन एकाकी होवत जावत हें। फोन मा बुलावा भेज देथें । बेटी-माई मन ल प्रेम से खायबर त खायबर बइठे बर घलो बुलाय मा जोर परे  धर ले हे, अना-कानी करे धर ले हें; अइसे दिन आवत हे। मनखे मन अब अपने-अपने घर मा अकेल्ला तिहार मना लेथें। एकर ले पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक समरसता कमजोर होवत हे। तिहार बार के महता घटे ल धर ले हे। तब समरसता, जोड़े पर अनायास मोर चार पंक्ति निकलगे।


चल-चल दीदी जाबो सबझन, खाए बर करुभात।

दाई-ददा कका-काकी ले, करबो सुख-दुख बात।।


मिलबो सखी सहेली  मनले, करबो  गुरतुर  गोठ।

होही मइके के  दया-मया, सगरो  दिन  बर पोठ।।


समरसता  के  मया  बहाबो, गाबो  मिलके  गीत।

सुम्मत के  डोरी  मा  रहिबो, होही  चोखा  प्रीत।।


       करुभात के बाद आथे बेटी-माई मन के निर्जला तीन दिन के उपास के बारी। आध्यात्मिक दृष्टिकोण देखे जाय तब तीजा उपास मा महिला / नारीमन नदिया या तरिया के रेती या करिया माटी ल ला के शिव-पार्वती के प्रतिमा बनाथे। चाउर पिसान के,  रंगोली के चौक पुरथें अउ घर ल सुग्घर सजाथें । ये दर्शाथे कि ईश्वर के भक्ति मा आडंबर के नइ बल्कि ये माटी के जइसे मन के सादगी,  पवित्रता के आवश्यकता हे। शिवलिंग बना के फुलेरा साजथें। जेमा पाँच धागा या बाँस के कमचील के पाँच डंडी मा आमा, बिही, कदम, गोंदा, तरोई के नार फूल ले सजाथें। ये हा हमर प्रकृति ले जुड़े रहे के शिक्षा देथे।

  वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले देखन त  नदिया के माटी ल लाके शिवलिंग बनाना प्रकृति ले जुड़े  रहे के सुग्घर हिस्सा आय।  बिना प्रकृति के जीवन संभव नइ हे। तरिया-नदिया के माटी पानी तन-मन ल जुड़ छाँव देथे। नदिया,  तरिया, माटी, पथरा, पेड़-पौधा, जीव-जंतु सबके सनमान करना, सुरक्षा करना, सफई रखना हमर फरज हे। चौक पुरना, गोबर ले लीपना। एकर पीछे कारन हे, घर मा नकारात्मक ऊर्जा  ल आय ले रोकना। ये ये गोबर, चाउर मा लीपना हा घर ला पवित्र करेथे। मन ल शुद्ध करेथे, पवित्रता के भाव जगाथे। जब तीजा तिहार के ए तीज उपास ल हमन आध्यात्मिक दृष्टि ले देखथन त  सांसारिक बंधन ले भौतिक सुख-सुविधा ले दूर परमात्मा के प्राप्ति के परब आय जेमा बहू-बेटी मन अपन पति के दीर्घायु सुख शांति बर ये उपास  रखथें। रात भर भजन-कीर्तन करथें। ये आस्था संसार के व्यावहारिक पति के संग असली पति असली प्रिया परमात्मा ल जाने के परब आय तीजा। निर्जला उपास रहिके नारी मन अपन इन्द्री ल, संयमित रखथें। अउ जेन मन  अपन इंद्रिय ल जीत के भूख-प्यास के तितिक्षा करथें। शारीरिक सुख के त्याग करके भीतर के,  परमात्मा ल जगाथें निश्छल भक्ति-भजन करके बुद्धि-विवेक के माध्यम ले; उही ल परम आनन्द के प्राप्ति होथे। जइसे माता पार्वती ल परम आनंद के प्राप्ति होइस। ये हरे सही उपास के अर्थ।

  

    अइसने  ब्रत, उपास ल जब वैज्ञानिक दृष्टिकोण, ले देखन त बरसात के मौसम मा हमर पाचन शक्ति धीमा हो जथे। तीजा के कड़ा उपास शरीर के पाचन तंत्र ल आराम देथे  अउ संचित टॉक्सिन्स (जहरीला तत्व) ल शरीर ले बाहिर निकालथे। एकर ले शरीर मा नवा ऊर्जा मिलथे। फेर आज ये सबो आध्यात्मिक अउ वैज्ञानिक दृष्टिकोन ल लोगन मन नइ समझ पावत हें। अवैया पीढ़ी मन ब्रत, तीज-तिहार के पाछू मा छुपे वैज्ञानिक दृष्टिकोन ल  अइसने मा कइसे जान पाहीं? एकरे सेती  आज जनमानस मा बेटी-माई मन ल वर्तमान के ढोल-ढकोसला ल छोड़ के अपन, वास्तविक संस्कृति अउ परंपरा, आध्यात्म दर्शन ल अपन नवा पीढ़ी  के लइका मन ल जनाय के जरूरत हे। तब अवैया समे मा तीजा के सार्थकता बने रही नइ  ते तीजा खाली घूमे-फिरे, खाए-पिए मौज-मस्ती अउ सेल्फी ले के दिन बन जही।


*सनमान के प्रतीक लुगरा के महत्ता* – उपास के पूरा होय  के बाद बहू-बेटी, दाई-माई मन मुन्देरहा ले उठ के नहा-धो के नवा-नवा लुगरा-कपड़ा पहिनथें। भगवान के पूजा-पाठ करके भोग प्रसादी लगा के अपन उपास के पारण करथें।  अउ सात्विक आहार छत्तीसगढ़ के पारंपरिक भोजन, पकवान ठेठरी, खुरमी, बरा सोहारी, सिंघाड़ा के संग ब्रत ल खोलथें। तीज तिहार के खारा-मीठा पकवान जीवन मा मधुरता घोलथे।  तब ये उपास मा सनमान के प्रतीक,  बेटी-माई मन ल मइके  ले लुगरा उपहार के रूप मा मिलथे। ये लुगरा नारी के सनमान, मइके के मान-मरियादा के प्रतीक आय। बेटी के ससुराल अउ मइके ल जोड़े के परम्परा आय। जेन ल दाई-ददा मन पाँव पोंछ लेहू बेटी कहिके देथें। जेकर भाव ल बेटी मन ही समझ सकथे। लुगरा ल देख के बेटी मन, मइके के सुरता, दाई-ददा, भाई- बहिनी के सुरता करथें जेमा प्रेम छुपे रहिथे। वो  मूल्यवान कीमती होथे। आजकल कतको देखे बर मिलथे कि भाईबंध मन संपन्न होय के बाद घलो बेटी-माई ल पाँव पोछे के लईक तक लुगरा कपड़ा नइ दे सकत हें उल्टा उँकर अधिकार ल छिनत हें। अपमान देवत हें। अउ कहिथें लुगरा पुरही का? लुगरा पूरे नइ वो तो मइके  के सनमान होथे जेन बेटी के ससुराल मा प्रदर्शित करथे कि बहू के मइके के भाव का हे। इही ल घर-परिवार के चार सदस्य मन  देखथें। बेटी-माई मन अपन मइके मा भाई-भउजी ले मीठ बोली के आसा रखथे। धीरे धीरे यहू भाव घटत जावत हे। जेकर ले पारिवारिक समरसता के जघा समाज मा दुरिहाव देखे बर मिलत हे। तभो कतकों बेटी मन मइके वाले के फभित्ता झन होय कहिके गम खावत हें।  अइसन स्थिति आज समाज मा बहुत देखे बर मिलत हावय जेन दुख के बात आय।


 *प्रकृति ले जुड़े हे तीजा-तिहार*- हम छत्तीसगढ़ के जनमानस मा, लोक संस्कृति मा, तीजा तिहार, धार्मिक अनुष्ठान या पारिवारिक लोक संस्कृति भर नो हरे, बल्कि ये मनखे अउ प्रकृति के अटूट अंतरसंबंध के तिहार आय। जेमा हरियाली चारों कोती कर देखे बर मिलथे।  खेत के हरियर-हरियर धान, हरिहर पेड़-पौधा मन मनखे के अंतस ल खुशी व उल्लास ले भर देथे। बाग-बगइचा मा तीज के झूला मा बेटी-माई मन झुलना झुलथें।  हवा मा फूल के महक, कोयल के कुक, हवा के सनसनाहट, प्राकृतिक नजारा के आनन्द अंतस ल ऊर्जा अउ उमंग ले भर देथे। ए तिहार प्रकृति ले जुड़े के अउ प्रकृति के संरक्षन के सीख देथे।  

   ये ढंगले छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति मा तीजा तिहार जनमानस के बीच आध्यात्मिक दृष्टिकोन, वैज्ञानिक दृष्टिकोन, सामाजिक समरसता, प्रकृति ले जुड़े के परब आय। इही हमर लोक संस्कृति के प्रान हरे। नारी स्वाभिमान के तिहार हरे। इही लोक संस्कृति मन, त्याग-समर्पन, प्रेम, नैतिकता के शिक्षा देथे। येला हमन ला अपन नवा पीढ़ी के लइका मन ल सिखाना बहुत जरूरी हे। तीज-तिहार हमर संस्कृति के गहना आय जेमा बेटी मन के आत्मसम्मान, त्याग-समर्पन, प्रेम के रूप झलकथे। तब मोरो भाव बेटी मन बर अइसन ढंग ले झलक थे-


    बेटी अँगना के फुलवा कस, महके बनके सदाबहार।

    मइके  आथे  आशा  धर  ये, पाये  बर  बड़ मया दुलार।।

    त्याग-समर्पन अउ जप-तप ले, बने रहै प्रभु अमर सुहाग।

    पानी-पसिया  गुरतुर  बोली, संग मिलै  मइके  के  राग।।


डॉ पद्‌मा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़