Thursday, 23 May 2024

*भाव पल्लवन*

 *भाव पल्लवन*



बीमारी के जर खोखी,झगरा के जर ओखी

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बारंबार खोखी मतलब खाँसी आना या फेर उल्टी होना ला तको कोनो ना कोनो बीमारी पैदा होये के जर अर्थात एकर  ले कोनो बड़े बीमारी पैदा होये के कारण माने जाथे।खाँसी ला अलवा-जलवा नइ समझना चाही भलुक जल्दी चेत करके ईलाज करवाना चाही।एकर ठीक नइ होये ले गला, फेफड़ा अउ छाती के बड़े-बड़े रोग हो जथे। निमोनिया टी० बी० जइसे जीव लेवा रोग राई के पता इही खाँसी ले चलथे।

      जइसे बीमारी के जर खोखी होथे ठीक ओइसनहे बहुत अकन झगरा-लड़ई के जर ओखी मतलब कोनो ला ताना मरई घलो होथे। घर-परिवार ,समाज मा कोनो ला भी अपन बर ताना हा घोर अपमान लागथे। द्रोपदी के दुर्योधन ला "अंधा के बेटा अंधा" कहिके मारे ताना के सेती भयंकर महाभारत युद्ध होगे जेमा लगभग सवा करोड़ योद्धा मौत के मुँह मा समागें।

   ये ताना हा देवर -भउजी के ठिठोली सही छोटकुन बात रहिसे फेर कतका घातक होइस।अइसने ताना कसई मा, उल्टा-सीधा दिल्लगी करे  मा --- कोनो ला देख के ठोलियाय असन,ईरखा मा खाँसे--खखारे ले झगरा मात जथे।कोनो सहिगे त सहिगे नहीं ते लड़ई मात जथे। बनगे ते बनगे नहीं ते तनगे हो जथे। सास-नँनद के ताना मा बहू त,बहू के ताना मरई मा सास-नँनद, रिसा जावत हें।बाप के ताना मा बेटा त, बेटा के ताना मा बाप तनिया जावत हें। कहूँ पति पत्नी मन आपस मा ओखी-ओखी के खेल खेले ल धरलिन त तलाक के नौबत आ जथे। परिवार मा झगरा मात जावत हे। ओखी के सेती परोसी-परोसी के,संगी-सँगवारी के --कहाँ तक कइबे एक नेता के दूसर नेता ले नइ पटत ये।

ये खोखी अउ ओखी दून्नों बेकार होथे।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी कहानी डर्टी गर्ल

  Chandrahas Sahu धमतरी: डर्टी गर्ल

                                चन्द्रहास साहू

                          मो  8120578897


एक झन टूरा आय ओहा ।

एक झन टूरी आय यहुॅं हा ।

टूरा वइसने रिहिस जइसे आने टूरा मन रहिथे नान्हे चुन्दी वाला कुरता जिंस के पेंट अउ गोड़ मा चमकत बूट।

टूरी घला वइसने रिहिस जइसे आने टूरी मन रहिथे कुरता फ्राक लम्बा चुन्दी लाल फीता दू बेनी गथाएं अउ टुटहा चप्पल पनही।

 टूरा के चेहरा दमकत रिहिस।

टूरी के चेहरा घला दमकत रिहिस अपन पुरती।

टूरा चूक ले पावडर लगाये रिहिस।

टूरी घला पावडर लगाये रिहिस- चोरोबोरो।

टूरा काजर अंजाये रिहिस- चूक ले।

टूरी घला काजर अंजाये रिहिस-चोरोबोरो,लिपिस्टिक घला चोरोबोरो।

टूरा ला ओखर दाई तियार करे रिहिस।

टूरी ला घला ओखर दाई तियार करे रिहिस।

टूरा बारा बच्छर के।

टूरी घला बारा बच्छर के।

टूरा मोर  परोसी आय नवा कॉलोनी के बंगला वाला घर के ।

टूरी घला  परोसी आय जुन्ना घर के खाल्हे बस्ती के ।

                    आज इतवार आय। दूनो कोई गंगरेल जावत हावय अपन - अपन गाड़ी मा। मंदिर मा दूध पियईया दाई असन  बइठे अंगारमोती दाई । तभे तो दुनिया- दुनिया के माइलोगिन मन आथे कोरा हरियाये बर।  धजा- पताका ले साजे मंदिर । मंदिर मा झूलत घंटी - घन्टा अउ उहा ले आरो आवत ठिन ठिन...ठनन -ठनन ...अब्बड़ सुघ्घर। दाई के पाॅंव पखारत, जलरंग - जलरंग करत अथाह बाॅंध । सुरुज अंजोर पानी मा परथे तब अब्बड़ सुघ्घर दिखथे। लहर - लहर लहरावत पानी । .......अउ ओमा खलबिल - खलबिल करत, उबुक- चुबुक होवत मछरी । नजर भर देख ले पानीच पानी। ओमा तौरत डोंगा अउ पानी जिहाज जइसन डोंगा दूर- दुरिहा मा धुन्धरहा दिखत पहार- परबत जंगल- झाड़ी । अगास टंगाये  हावय ओमा।

सुघ्घर गार्डन। गार्डन मा मनभावन रिकम- रिकम के फूलपत्ती पेड़ - पौधा । पथरा ला रच के बनाये  नदी पहार  के सुघराई ..अब्बड़ सुघ्घर। फिसल पट्टी,भांवरी, झूला, चढ़े- उतरे खेले के लोहा के जिनिस।  गदबदावत लइका मन अउ गमकत गंगरेल।

"ऐ..ऐ... डर्टी गर्ल ...!''

टूरा आवय देखते साट आरो करिस।

टूरी घला अब चिन्ह डारिस। 

पाछू दरी देवदुत बनके आये रिहिस इही टूरा हा।

 डोकरी दाई के पहिराए ताबीज़ मा हाथ मड़ाइस अउ मंतर पढ़ीस।

 "अन्नपूर्णा दाई अपन नानचुन परी बेटी ला जेवन करा, खाना दे । बेटी लांघन हावय ।'' 

जोर - जोर ले चिचियाबे ताहन देवदूत  ला पठोही अन्न्पूर्णा दाई हा । अइसना तो केहे रिहिस टूरी के डोकरी दाई हा। जब लांघन रहिथे तब इही मंतर ला चिचियाथे। आज सिरतोन मंतर काट करिस । टूरी मंतर पढ़ीस।  टूरा हा अब मटर पनीर अउ सोहारी के प्लेट ला धर के आइस अउ टूरी ला  दे दिस । 

... अउ टुरी हा । बदला मा झूलना झुलावत हावय टूरा ला। ससन भर झूलना झुलिस टूरा हा। ... अउ टूरी के पारी आइस तब कान मा आरो आइस ।

"व्हाट आर यू डूइंग माई लिटिल किंग ? ये हमारे सोसायटी के बराबर के नही है। किप डिस्टेंस फ्रॉम डर्टी गर्ल ..।''

 टूरा के मॉम रिहिस । टूरा ला बरजिस अउ चेचकारत लेग गे। टूरी भलुक आखर ला नइ जानिस फेर भाव ला समझ गे।

"ऐ..  ऐ...डर्टी गर्ल !''

टूरी आरो ला सुनिस । छिन भर के सुरता ले निकलिस अउ टूरा के तीर मा अमरगे।

टूरा फेर झूलना मा बइठ गे अउ टूरी ला झुलाये बर आरो करत हावय।

"ओ दिन के मटर पनीर सोहारी सुघ्घर लागे रिहिस । आज घलो लाने हस का मोर बर देवदूत बनके ?'' 

टूरी पुछिस जीभ ले होठ ला चाटत ।

नो ..आई हैव....। टूरा अंग्रेजी छोड़के छत्तीसगढ़ी मा गोठियाइस। छत्तीसगढ़ी भाखा सीखोये रिहिस न काम वाली बाई हा।

" नही ..नइ लाने हंव।''

 "झूलना झूला न !''

 टूरी झूलना झुलाये लागिस।

टूरी झुलावत हावय अउ टूरा झूलत हे चुई.. चुई..सुई...सुई...सरर...सरर..झूलना ले आरो आवत हावय। दूनो के गोठ बात हा.. हा.. ही..ही..।

"तोर बाबू का करथे ।'' 

टूरी किहिस।

"मोर डैडी झिल्ली के बुता करथे । बड़का बड़का फैक्ट्री हावय सड़क तीर मा, पालीथिन प्लास्टिक खुरसी मेज दरवाजा ड्रम  बनाये के। '' 

टूरा बताइस अउ पुछिस घला।

"तोर बाबू का करथे ?''

"मोरो ददा हा झिल्ली के बुता करथे। बड़का बड़का हुंडी हावय जुन्ना झिल्ली टूटहा प्लास्टिक खुरसी मेज दरवाजा अउ ड्रम के।''

टूरी बताइस अउ पुछिस घला।

"तोर दाई का करथे।'' 

"मोर मॉम हा बुता करथे। फोरव्हीलर गाड़ी मा जाथे पर्स टिफिन धर के।''

 टूरा बताइस अउ फेर पुछिस चटाक ले।

"...अऊ तोर दाई हा ?

" मोर दाई हा घलो  फोरव्हीलर.... टूटहा ठेला मा जाथे कमाये बर। दाई हा ठेला ढूलावत- ढूलावत थक जाथे तब कभू- कभू ददा हा मोला अउ दाई ला  बइठार के ठेला ला ढ़केलथे।

"स्कूल जाथस ?

"हा। अब्बड़ बड़का हावय  हमर स्कूल । बड़का बिल्डिंग, बड़का  क्लासरूम, बड़का टॉयलेट अउ बड़का खेल मैदान।''

"..अऊ तेहा ?''

"हंव, अब्बड़ बड़का हावय मोरो स्कूल हा।बड़का बिल्डिंग खपरा वाला । परेवा गुटूर - गुटूर करत रहिथे । बड़का  हाल, छेटवी ले आठवी तक एक संघरा बइठथन । टॉयलेट छोटे अउ मैदान बड़का जिहा आमा अमली के पेड़ हाबे अउ......।''

टूरी बताइस अउ पुछिस।

"बड़का होके का बनबे ?''

डैड कहिथे प्लास्टिक के चार फैक्टरी ला चालीस ठन बढ़ाबे अउ चालीस हजार नौकर चाकर राखबे। अइसने सपना हावे  डैडी के।''

"तेहां का बनबे ?''

टूरी बताइस

"मोर ददा कहिथे चार आखर पढ़ ले । रांध गढ़ के चार झन ला खवा लेबे । माइके ससुरार के चार झन के आगू अपन नाव के अंजोर बगराबे अइसना सपना देखथे ददा हा।''

 टूरी बताइस अउ पुछिस।

"तोर घर कोन- कोन हावय ?''

"मे, डैडी अउ मॉम।''

"बस.. तीने झन......।'' 

हो हो ....टुरी हाॅंसे लागिस। पुछिस।

"तोर घर ?''

"मे, दू झन मोर बहिनी, मोर भाई ,कका -काकी, ओखर बेटी -बेटा, डोकरी दाई अउ डोकरा बबा...। टोटल छब्बीस झन। ''

अंगरी मा गिन के बताइस टूरी हा।

"तोर डोकरी दाई हा नरी मा नइ बांधे हे ताबीज। तोर भूख भगाये बर... ? अन्न्पूर्णा दाई के मंतर... अउ कभु- कभु देवदूत ला भेज के जेवन पठो देथे.....। पाछू दरी आये रेहेस न तेहा मटर पनीर धर के । 

"अरे मोला खाये ला नइ भाइस तब कुकुर कर फेके ला जावत रेहेंव। तोला देख पारेंव अउ तोर आगू मा डार देंव।''

टूरा किहिस चटाक ले।

"त... देवदूत...?''

 टूरा के चेहरा ला देखत रिहिस टूरी हा।

"देवदूत नइ होवय, सब अंधविश्वास आय ।'' 

टूरा किहिस।

"तोर डोकरी दाई अउ डोकरा बबा नइ हे का ..? ओखरे सेती अइसना काहत हस। कहाॅं गेहे ?''

 टूरी पुछिस।

"मोर डोकरी दाई अउ बबा हा महारानी अउ महाराजा बनगे हे। बड़का - बड़का हाथी- घोड़ा, नौकर -चाकर, तलवार - तोप, बंदूक -भाला सब हावय। खाइ - खजाना, पिज्जा - बर्गर, इडली - डोसा, काजू -बादाम, खोवा- जलेबी सब मिलथे उहाॅं । टीवी के रामायेन सीरियल मा देखे हस बड़का-बड़का महल बिल्डिंग ला, वइसने हावय मोर डोकरी दाई बबा के घर हा।''

 टूरा गरब मा फुलत रिहिस।

"तेहां देखे हस जम्मो ला ?'' 

टूरी पुछिस।

"नही ... मॉम बताथे ।''

"का नाव हावय ओ राज के  ?''

"वृद्धाश्रम राज नाव हावय । जब बड़का होहु न तब मॉम डैड ला उही राज मा पठोहूं। वृद्धाश्रम राज के मॉम हा महारानी रही अउ डैड हा महाराजा रही।''

 टूरा जइसे भीषम किरिया खावत किहिस।

झूलना अपन गति मा फेर बाढ़गे। हवा मा तौरे लागिस टूरा संग। 

टूरी गुनत रिहिस चाहे कही हो जावय मोर डोकरी दाई बबा ला कोनो राज नइ पठोवंव। हाथी- घोड़ा, राज- पाठ मिलही तभो ले......अपन ले दुरिहा नइ करो। 

झूलना फेर अपन गति मा चलत हावय।

"व्हाट आर यू डूइंग माय लिटिल किंग । '' 

टूरा के दाई आइस बंबियावत। टूरा ला बरजिस, खिसियाइस।

" दिस पिपल आर नॉट इक्वल टू अवर सोसायटी। मत खेला करो इन लोगो के साथ। न संस्कार ,न तमीज ...हुं....रियली डर्टी गर्ल  ...।'' 

मुॅॅंहू  बिचकावत किहिस मॉम हा।

टूरी डर्रागे टूरा के मॉम के बरन ला देख के। दउड़त अपन डोकरी दाई करा गिस अउ पोटार लिस। वहुं हा झिल्ली बिनत रिहिस आने डर्टी गर्ल मन संग ।



चन्द्रहास साहू

द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब के पास

श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़

493773

मो.  -  8120578897

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: *डर्टी गर्ल: लघु समीक्षा*


छत्तीसगढ़ के नैसर्गिक समाज में उच्च नीच का भेदभाव पहले कभी नहीं रहा। किंतु विगत कुछ वर्षों में आर्थिक असमानता के परिणाम स्वरूप यहां के मूल निवासियों में भी आर्थिक भेदभाव की भावना दिखने लगी है, ऐसा  कथाकार का मानना दृष्टिगोचर होता है। कहानी  शुरुआत से ही अपनी कथ्य-शैली के कारण पाठक को न केवल बाँध कर रखती है बल्कि उसको आगे पढ़ने के लिए उत्सुक बनाये रखती है। यहाँ एक अलग तरीके का प्रस्तुतिकरण देखने को मिलता है। कहानी का शीर्षक और उस शीर्षक की  बार बार होने वाली पुनरावृत्ति कथ्य के रहस्य का निर्माण कर पाठक को किसी न किसी अनुमान के प्रति उलझाये रखते हैं। कहानी की शुरुआत में तो यह उलझन गहरी और कड़ी लगती है। कहानी के केंद्रीय पात्र दो बच्चे है जिनका बोध उनके अबोध पर हावी है। वर्तमान कालखण्ड के बड़ों के आइ....... की पृष्ठभूमि पर बालमन का सुंदर चित्रण करती इस कहानी में कई आधुनिक तत्व हैं जिनपर विस्तृत समीक्षा में ही चर्चा सम्भव है। कथाकार चन्द्रहास साहू को बधाई। और वे इसके हकदार भी हैं। 


डॉ चन्द्र शेखर शर्मा

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समीक्षा

ओम प्रकाश अंकुर: समाजिक विसंगति ल उजागर करत कहानी -  डर्टी गर्ल 


युवा कहानीकार चंद्रहास साहू जी के अपन एक अलगेच शैली हे जेकर खातिर उंकर कहानी ह पाठक वर्ग म उत्सुकता जगाथे कि येकर बाद कहानी म का मोड़ आही। कहानी के उद्देश्य ल बिना कहे बता देथे। चंद्रहास साहू अपन कहानी म ठेठ छत्तीसगढ़ी के संगे संग पात्र के अनुसार हिंदी अउ अंग्रेजी शब्द मन के प्रयोग सहज भाव ले करथे । अइसने पाग म सनाय कहानी हे - डर्टी गर्ल।

    कहानीकार ह महानदी अउ अंगारमोती मंदिर के माध्यम ले प्रकृति के सुघ्घर चित्रण करथे। अंगारमोती दाई के प्रति लोगन मन के आस्था अउ मंदिर परिसर म लगे नाना प्रकार के दुकान के संगे संग गार्डन ठउर के सजीव चित्रण देखे ल मिलथे जेहा कहानी बर सुघ्घर वातावरण तइयार करथे।

  हमर समाज म अमीरी अउ गरीबी के कत्तिक खाई हे। गहरा के बात करन त कुवां ले जादा गहरा नजर आही। ये कहानी के माध्यम ले कहानीकार इही गहरा ल उजागर करथे कि धनवान मनखे मन के जीवन शैली कइसे रहिथे अउ गरीब मनखे मन कइसे सुविधा बर तरसत रहिथे।

धनवान मनखे अपन लईका ल बड़का प्राइवेट स्कूल म पढ़ाही पर दाई - ददा बर घर म जगा नइ हे। दाई -ददा ल वृद्धाश्रम म छोड़े हावय। जइसन करनी तइसन भरनी कहे गे हावय। वो धनवान मनखे के लईका के माध्यम ले ये कहलवाना कि मोर दाई -ददा ह जब डोकरा - "डोकरी हो जाही त महू ह जिहां अभी हमर डोकरा बबा अउ डोकरी दाई रहिथे उंहचे पठोहू। "येकर माध्यम ले कहानीकार संदेश देवत हावय कि जइसन बोहूं वइसने तो पाहू। बंभरी जगाबे त आमा थोरे पाबे। आज समाज म कतको धनवान मनखे मन के अइसने हाल - चाल हावय। अपन लईका ल बढ़िया से पढ़ाही। सबों किसम के सुख -सुविधा दिही। अउ उही लईका ह हमर भारत देश म बने नौकरी नइ मिलत हे कहिके विदेश कोति अपन पांव ल पसारथे अउ धीरे ले उंहचे के हो जाथे। दाई-ददा मन कलपत रहि जाथे कि-" मोर दुलरवा बेटा तंय ह हमर भारत देश के कोनो भी प्रदेश म नौकरी कर ले रे! तोला नइ रोकंव। पर बेटा ल तो विदेश के चस्का लगे हावय। जाना  हे सात समंदर पार इही होगे हावय आज के नवाचार। ये कोति दाई - ददा मन होगे हे लाचार।

   कहानी के प्रमुख पात्र एक टुरा अउ टूरी हावय। दूनों के उमर बारह बछर हावय।टूरा धनवान घर के हरे त टूरी ह गरीब घर के। टूरा घर एकल परिवार हे त टूरी घर संयुक्त परिवार हे।टूरा ह कान्वेंट स्कूल म पड़थे त टूरी ह सरकारी स्कूल म। इहां कहानीकार ह अमीर अउ गरीब मनखे मन के रहन -सहन अउ उंकर बेवहार ल सुघ्घर ढंग ले पिरोय हावय। धनवान मनखे मन अपन लईका ल गरीब मनखे के लईका मन संग खेलन नइ दय। येला अपन शान के खिलाफ समझथे. ये सब के पोठ वर्णन कहानीकार ह करे हावय। 


   कहानी सुघ्घर शैली म लिखे गे हावय। पात्र के अनुसार भाषा के उपयोग करे गे हावय। कहानी छत्तीसगढ़ी भाषा के पाग म बने सनाय हे जेकर महक सुघ्घर ढंग ले ममहावत हे। कहानीकार ह टूरा के दाई बर अंग्रेजी भाषा के उपयोग करे  हावय। वोकरे संवाद के माध्यम ले कहानी के शीर्षक - 'डर्टी गर्ल ' ह चरितार्थ होथे। ये कहानी ह धनवान मनखे मन गरीब मनखे मन बर कइसे हीन भावना लाथे अउ अपन बेवहार ले  पीरा पहुंचाथे वोकर सच्चाई ल उजागर करथे।


भाषा सरल, सहज अउ सरस हे। कहानी म कोनो प्रकार ले रूकावट  नजर नइ आय अउ महानदी के धार कस कल - कल करत आगू बढ़थे।नवा पीढ़ी के कहानीकार चंद्रहास साहू ल गाड़ा -गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना हे कि नवा ढंग ले कहानी के शीर्षक दे हावय अउ सुघ्घर सामाजिक ताना - बाना बुनके कहानी के शीर्षक ल सार्थक करे हावय।


      ओमप्रकाश साहू" अंकुर"

       सुरगी, राजनांदगांव

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सच म बाल मन, मन के सफ्फा रहिथे। लइका मन मन म कोनो किसम के भेद राखॅंय न भेदभाव ल जानॅंय। सब ल बरोबर जानथें। सबो ल अपने सहीं मानथें अउ समझथें। मन ले मन मिलथे अउ संघरा खेलथें कुदथें अउ गोठियाय लगथें। दुनियादारी ले दुरिहा रहिथें। अइसनहे बालपन के गोठ ल समोय अउ समाज के तथाकथित पढ़े-लिखे सुसभ्य कहावत लोगन ल चेतवना देवत कहानी आय डर्टी गर्ल।


       ए कहानी आर्थिक रूप ले समाज के वर्ग भेद ऊप्पर व्यंग्यात्मक शैली म लिखे गे कहानी आय। जेमा बिल्कुल सरल सहज भाषा म समाज अउ बेवस्था ऊपर टंट मारे म कहानीकार सफल हे। दूनो लइका पात्र मन के गोठ बात जीवंत हे। एकदमेच सहज हे, सरल हे। बालमन के सुग्घर छाप घलव देखब ल मिलथे।


      कहानी के शुरुआतेच म टुरा अउ टुरी के रूप वर्णन ह आर्थिक विषमता ल दरसाय बताय बर काफी हे। जे ए कहानी के मूल कथानक आय।


       गंगरेल बाँध जउन छत्तीसगढ़ बर कोनो बरदान ले कमती नइ हे, इहाँ के फोटू(चित्रण) बिल्कुल हुबहू हे। उहाँ ले आय मनखे के आँखीं आँखी म झूल जही। अउ जेन पाठक उहाँ नइ गे हे तेकर मन एक पइत गंगरेल जाय के करही। ए कहानीकार के भाषा अउ चित्रण कुशलता के कमाल आय। अंगारमोती के महत्तम ल उकेरई ह साँस्कृतिक अउ सामाजिक मान्यता ल सहेजे के दिशा म कहानीकार के जुड़ाव ल बताथे। लोक ले जुरे मान्यता ल स्थापित करे म कहानीकार संवाहक बने हे। इही ह कहानी के अपन बेरा अउ परिस्थिति के आरो देथे। कल्पना के गहिर सागर ले निकाले कोनो मनगढ़ंत बात नोहय के, सबूत आय।


       संवाद मन पात्र के संग नियाव करत उँकरेच बर लिखे गे हवय। अँग्रेजी शब्द मन ल बउरना (प्रयोग म लाना) कहानी म लालित्य लाय हे। 


      सहज अउ सरल भाषा म कहे गे ए संवाद ल देखव-- "....अब्बड़ बड़का हावय मोरो स्कूल ह....बड़का हाल हे जेमा छेटवीं ले आठवीं तक सँघरा बइठथन।..." 


     ए संवाद सरकारी स्कूल के बेवस्था ऊपर टंट मारे गे हे। आज भले अइसन स्थिति कमतीयागे होही। फेर नकारे तो नइ जा सके।


    समाज के गरीब तबका के सपना अउ सोच ल देखव जे ह सोला आना सिरतोन आय।


" मोर ददा कहिथे चार आखर पढ़ ले। राँध गढ़ के चार झन ल खवा लेबे। ....अपन नाव के अंजोर बगराबे अइसना सपना देखथे मोर ददा ह।"


    अभाव म जिनगी जियत मन बहलाव के गोठ करत डोकरी दाई के देवदूत आय वाला भरम ल टोरत टुरा के गोठ अंधविश्वास के जड़ी ल उखाड़ देथे।


"अरे मोला खाय ल नइ भाइस तब कुकुर कर फेके....तोर आगू म डार देंव।"


"कोनो देवदूत नइ होवय।"


     अवइया बेरा के फोटू खींचत ए संवाद सब के चेत ल हजा दिही फेर एकर नजरअंदाज करई घलव सही नइ होही। समाज ल सावचेत करे के उदिम म लिखे संवाद देखव-


"वृद्धाश्रम राज नाव हावय। जब बड़का होहूँ न तब मोर मॉम डैड ल उही राजम पठोहूँ....।"


     इही संवाद म लुकाय संदेश ह कहानी लिखे के मूल लागथे।


     गार्डन के झूलना म बइठना अउ झूलत झुलावत गोठ बात करना सरल अउ सहज चित्रण आय। 


      कहूँ सास-ससुर ल वृद्धाश्रम म छोड़ के मजा उड़ावत जिनगी जिएँ के उदिम करइया बहू अभाव म जियत मइलाहा कपड़ा लत्ता अउ सँवागा देख के कोनो टुरी ल डर्टी गर्ल कइही। त अइसन सोच पाठक ल गुने बर मजबूर करथे कि असली म कोन डर्टी गर्ल आय। सच म कहानी अपन ए नाँव/शीर्षक के संग अपन उद्देश्य ल पूरा करथे।

       सामाजिक अउ आर्थिक विषमता के संग शिक्षित मनखे के अंतस् कतेक साॅंकुर हो जथे, ए कहानी म देखे मिलथे। चाहे गरीब मजदूर के लइका के प्रति मन म उपजे हीन भाव होवय ते अपने दाई ददा ल वृद्धाश्रम भेजे के। संगे संग आम आदमी के गोठ बात म शामिल ॲंग्रेजी शब्द मन ल कहानी म बउरना उपयुक्त हे। व्यंग्यात्मक शैली के सुग्घर कहानी डर्टी गर्ल बर चंद्रहास साहू जी ल नंगत अकन बधाई अउ सुग्घर सुग्घर कहानी लिखत रहय इही शुभकामना देवत हँव।


पोखन लाल जायसवाल


पठारीडीह(पलारी)

Saturday, 4 May 2024

गरमी मा गजब सुहाथे बासी ह-*

 *गरमी मा गजब सुहाथे बासी ह-*


            गरमी के दिन अइस तहन जेवन म बासी ह अब्बड़ सुहाथे। रातकुन तो कइसनो करके भात ल खा डारबे फेर दिनमान बासीच ह बने लगथे। गरमी दिन म भात ल खाय म मन नई भरे। कहूं बासी मिलगे त ससन भरले खवाथे। रतिया के बचे भात ल पानी म बोर के रखे ले, बिहने के होत ले बासी बन जाथे। अउ भात म तुरते पानी डार के खाथे तेला बोरे बासी कहिथे। येकर संग म चेंच भाजी, पटवा भाजी, सुकसा भाजी अउ अमारी के भुरका, गोंदली होगे तहन फेर का कहना हे। बासी म एककनी नून डारे ले सबो पसिया ह सपसपले पिया जाथे। सियान मन पहली कहय जेहा जादा पसिया पीथे ओकर चुन्दी ह जल्दी बाढथे। कोनो मुंडा रहय तेला पसिया पीये बर जादा जोजियाय।  बासी ह आजकल के दिन म अमृत बरोबर लगथे। पेट अघा जाथे,मोर छत्तीसगढ़ के  बासी म।


पहली लोगन मन बासी के खवईया मन ल अनपढ़ अउ गंवार गंवईया मन के जेवन समझे। वोमन ल का पता होही, छत्तीसगढ़ के बासी के गुण ह। जबले वैज्ञानिक मन ह बासी बर शोध करके बताईस हवे कि  बासी म कतका विटामिन हवे। तबले ऐदे कतको हिनमान करईया मन के मुरझा मरीस हे। अउ बासी के गुण ल जनिन-मानिन हे। हमर सियान मन वैज्ञानिक मनले पहली के कहत हवे कि बासी म अब्बड़ विटामिन भरे हवे। फेर कोनो नई मानत रिहिन। सड़े हुए खाना कहिके मजाक उड़ावत। हमर सियान मन कोनो वैज्ञानिक के कम नई रिहिन। अब पता चलिस हवे कि सियान मन के गोठबात ह धियान देके लईक होथे। 


हमर घर आज घलो सबो झन बासी खाथन। लईका मन बासी खाये बर अगवाय रथे। कहूं एकात झन बर कम होथे त बासी ल खाये बर झगरा घलो होथे। मोर दाई ह बारो महीना बासी ल बने कथे। बरसात अउ ठंडा दिन म बासी बांचथे तेला कोई ल खावन नई देय। गरमी दिन आये के बाद दिनमान एको दिन भात नई खाये, बासीच ल खाथे। कोनो दिन बासी बर रतिया के भात नई बांचे त अपन बहु मन ल अब्बड़ खिसियाथे। महुवा बीने ल जावन त बासी ल धरके जान अउ मंझनिया महुआ के छैईया म बैठ के बासी ल झड़कन। अउ साग बर कटोरी के जरूरत नई होय,महुआ के पाना म साग ल धर के खावन।


छत्तीसगढ़ राज के सपना देखईया  डॉ. खूबचंद बघेल जी घलो बासी के गुण गावत केहे रिहिन--


बासी के गुण कहुँ कहाँ तक,

इसे न टालो हाँसी में,

गजब बिटामिन भरे हुये हैं,

छत्तीसगढ़ के बासी में।


बासी म ब्लडफ्रेसर घलो बने होथे। शरीर के तापमान ल बरोबर करे के काम करथे। गरमी के दिन म बासी खवईया मन ल झोला-झांझ घलो नई धरे। बासी ह अब्बड़ पाचुक होथे। कोनो-कोनो मन तो दही-मही ल मिलाके घलो खाथे। बासी बर साग के घलो जरूरत नई होय। निरवा नून संग खवा जाथे। नहिते पलपला म भूंजे सुक्खा मिरचा काफी हे। कढ़ी साग होगे तहन अउ झन पूछ, बासी के सुवाद ल। कच्चा मिरचा अउ गोंदली संग अब्बड़ गुरतुर लगथे बासी ह।


जनकवि कोदूराम दलित जी ह अपन कविता म बासी के गुणगान करत महतारी-बेटा के गोठबात ल सुघ्घर ढंग ले लिखे हवे-


दाई! बासी देबे कब? बेटा पढ़ के आबे तब।


पढ़ लिख के दाई, मैं ह हो जाहूँ हुसियार,

तोला देहूं रे बेटा, मीठ-मीठ कुसियार,

खाबे हब-हब,

मजा पाबे रे गजब,

बेटा, पढ़ के आबे तब,

दाई,बासी देबे कब....


दिनभर काम करईया मन बर बासी ह जादा पुस्टई होथे। घर ले दुरिहा काम मे जवईया मन टिपिन म  बासी अउ साग संग आमा के चटनी धरके जाथे। मंझनिया के खाये के बेर हाथ-गोड़ लमा के बासी जइसे अमृत के स्वाद लेवत अघात ले खाथे।


देखा-सीखी हम नइ खावन, खाथन बारा मासी।

गजब मिठाथे छत्तीसगढ़ के, गुरतुर बोरे बासी।।


बासी दिवस के बधाई...🙏🌹🌷🌻


           हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगाँव

किताब - छत्तीसगढ़ी का सम्पूर्ण व्याकरण



किताब - छत्तीसगढ़ी का सम्पूर्ण व्याकरण 


( छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग ले प्रकाशित)


संस्करण - 2024 ( तीसरा)

प्रकाशक - वदान्या पब्लिकेशन, नेहरू नगर, बिलासपुर 

लेखक -  डा. विनय कुमार पाठक 

              डा. विनोद कुमार वर्मा 





छत्तीसगढ़ी के संपूर्ण व्याकरण के तीसरा संस्करण हे खास 


किताब हमर  मितान  जइसे होथे। येकर ले जउन मितानी कर लिस वोहा अकेला नइ राहय। किताब म नाना प्रकार के जानकारी मिलथे। किताब ले हमर गियान म बढ़ोत्तरी होथे। बने किताब हमर जिनगी ल सही रस्दा म ले जाथे त अश्लील साहित्य जिनगी ल नरक कोति ढकेल देथे। त हमला बने किताब पढ़ के बुधियार बनना चाही न कि गलत किताब पढ़ के मूरख बनना चाही।  


  छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी शब्दकोश, व्याकरण ले संबंधित कतको किताब पढ़े ल मिलथे। अइसने एक सुघ्घर किताब हावय  - छत्तीसगढ़ी का सम्पूर्ण व्याकरण ( छत्तीसगढ़ी व्याकरण के मानक मार्गदर्शिका) के तीसरा संस्करण। येकर लेखक हे आदरणीय डा. विनय कुमार पाठक जी अउ आदरणीय डा. विनोद कुमार वर्मा जी। ये किताब ह छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग ले प्रकाशित होय हे। ये किताब ह प्रतियोगी परीक्षा के तैयारी म लगे लइका मन  बर अब्बड़ उपयोगी हावय त साहित्यकार अउ साहित्यप्रेमी मन बर घलो बने काम के चीज हावय। ये किताब ह 388 पेज के हे अउ 9 खंड म बंटे हावय।


  ये किताब म छत्तीसगढ़ी के उत्पत्ति के विकासक्रम, छत्तीसगढ़ के भाषिक स्थिति अउ छत्तीसगढ़ म लिपि के इतिहास, छत्तीसगढ़ी भाषा अउ देवनागरी लिपि, छत्तीसगढ़ के प्रमुख बोलियां, शब्द साधन , संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, वाच्य,अव्यय/ अविकारी शब्द,कारक,काल, लिंग, वचन, छत्तीसगढ़ी म विराम चिह्न मन के प्रयोग, छत्तीसगढ़ी म सन्धि,समास,रस, छंद, अलंकार, लोक साहित्य अउ लोकोक्तियां,हाना, मुहावरा,जनउला , छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ भाषा के विकास म समाचार पत्र -पत्रिका, रेडियो अउ सिनेमा के भूमिका ,छत्तीसगढ़ी भाषा ले संबंधित थोरकुन जरूरी सवाल - जवाब,छत्तीसगढ़ी के महिला साहित्यकार अउ  उंकर रचना ,छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार अउ उंकर , लोक व्यवहार म छत्तीसगढ़ी ,पाद टिप्पणी (टिप्पण लेखन ),विलोम शब्द, अनेक शब्द मन बर  एक शब्द छत्तीसगढ़ी भाषा: तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज, संकर शब्द ,लोक व्यवहार म प्रयोग होवइया जरूरी शब्दावली: हिंदी -अंग्रेजी -छत्तीसगढ़ी,  संख्याएं, छत्तीसगढ़ी -हिंदी _संस्कृत_- अंग्रेजी,  छत्तीसगढ़ी शब्दकोश, प्रशासनिक शब्दकोश: हिंदी- अंग्रेजी- छत्तीसगढ़ी के सुघ्घर समावेश करे गे हावय। 

किताब म हिंदी के 52 वर्ण ल छत्तीसगढ़ी म घलो बउरे पर जोर दे गे हावय। अपभ्रंश शब्द के उपयोग ले बांचे बर बल दे गे हावय। येमा उदाहरण देके समझाय गे हावय कि कइसे अपभ्रंश के उपयोग ले अर्थ के अनर्थ हो जाथे। ये किताब म एक चीज अउ हट के हे वोहे छंद के बारे म। किताब म छ्न्द के बारीकी पक्ष के बारे म जानकारी दे गे हावय जउन ह आने छत्तीसगढ़ी शब्दकोश म नइ देखे ल मिलय। कतको छत्तीसगढ़ी छंद के नियम उदाहरण सहित बताय गे हावय। छंद के छ आंदोलन के बारे म चर्चा हावय अउ येकर ले जुड़े खास छंदकार मन के किताब अउ उंकर प्रमुख रचना के उल्लेख हावय। ये अंक म छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी के जुन्ना पीढ़ी के संगे -संग नवा पीढ़ी के साहित्यकार मन के हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी म योगदान के उल्लेख करे गे हावय।  किताब के ये तीसरा संस्करण  खास हे।  त बुधियार साहित्यकार अउ अउ प्रतियोगी परीक्षा के तैयारी म लगे लइका मन ल ये किताब ल जरूर पढ़ना चाही। छत्तीसगढ़ी के संपूर्ण व्याकरण के तीसरा अंक खातिर भाषाविद आदरणीय डा. विनय कुमार पाठक जी अउ आदरणीय डा. विनोद वर्मा जी ल गाड़ा -गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना हे।


        ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

     सुरगी, राजनांदगांव

कहानीकार डॉ. पदमा साहू पर्वणी

 कहानीकार 

डॉ. पदमा साहू पर्वणी

     खैरागढ़ 

जिला के. सी. जी (छ.ग.)



                       *ठगड़ी*

 

        "बारह बछर ले हमर घर के ये अंँगना लइका के किलकारी सुने बर तरसत हाबे। कोन जनी ये अंँगना दुवारी मा कब हमन अपन लइका के पीछू-पीछू दउड़बोन? कब वोकर तोतरी भाखा ल सुन के ठहाका मार के हाँसबों? कोन जनी हमर भाग मा भगवान ह लइका के सुख लिखे हे धुन नहीं ते?" मँझनिया के बेरा भोला परछी मा बइठे अपन मयारू जानकी संग गोठियावत हे।

    तुमन काबर अतेक गुनत हव मोहन के भैया। जउन ह हमर भाग मा लिखाय होही उही होही। भगवान के मर्जी के आगू हमर मन के नइ चलय। का होइस हमर लइका नइ हे त,फेर मोहन ह तो हमर लइकच बरोबर हे न। जब ले में ये घर मा आय हों तब ले मोहन ल अपन लइका समझ के पाल-पोस के बड़े करे हों अउ तुमन वोकर ददा बनके पढ़ई-लिखई सबके धियान रखे हो। आज वो बड़े होगे हे। अब वोकर बरबिहाव करबोन त वोकर लोग लइका आही तही मा अपन लोग लइका के परछई देखबोन।

       तें सिरतोन काहत हस जानकी फेर जब तोला लोगन मन ठगड़ी कहिथे त मोर करेजा फट जथे। वो दिन हमर डीहवार घर हमन बिहाव मा गे रहेन त उहाँ डीहवारीन सन परोसीन परेमा गोठियावत रहिस के ये जानकी ठगड़ी ठाठी ताय अपन नवा बहू ऊपर येकर छाँव झन परन देबे। वोमन मोला उही कर देख के सुकुरदुम होगे। फेर येला सुनके मोर लहू उबाल मारत रहिस। में अपन आप ल कइसे रोके हों तेला मिही जानथों।

    जानकी कहिथे "मोला तो अइसन सब सुनत-सुनत दस बछर होगे। अब अइसन ताना के कोनो फरक नइ परय जी। में एक कान ले सुनके दूसर कान ले निकाल देथों। तहूँ मन धियान मत दे करव। लोगन मन कखरो अंतस के दुख ल चिटिक नइ समझे।"



        इही बीच भोला के दीदी भाटो हा उदुप ले उँकर घर पहुँचथे। भोला कहिथे –"अतेक मंँझनी-मंँझना कोन डाहर ले आवत हो भाटो? आहा दे लइकामन पछीना मा थपथपा गेहें। आवव पंखा के तीर मा बइठो हवा लगही।"

सबों झन पंखा के हवा तीर बइठथें। जानकी सबों झन बर करसी के ठंडा-ठंडा पानी अउ संग मा बेल के शरबत बनाके देथे अउ कहिथे –"पहिली ले फोन करके बता देतेव त बासी पेज के तियारी करके रखतेंव।"

   लेव दीदी तुमन बइठो अपन भाई संग गोठियावव। भाँचा-भाँची मन भूख मरत होही में जल्दी-जल्दी जेवन बनावत हों। अतका मा जानकी के डेढ़सास संतोषी हा हमन खा पी के आवत हन हमर भाँची घर के बिहाव मा गे रेहेंन तिहाँ ले कहिके जेवन बनाय बर मना कर देथे।

भोला के भाटो कहिथे –"मोहन नइ दिखत हे कहाँ हे ?"

भोला कहिथे –"अपन संगवारी रामदास के बरात गेहे भाटो।

वोकर जीजा संतोष कहिथे–"अब मोहन के घलो बिहाव करे के उमर होगे हे भोला।"

   हव भाटो सही काहत हस। मोहन घलो बिहाव बर राजी हे। कोनों डाहर वाेकर बर लड़की देखबे हमन तो देखतेच हन काहत भोला अउ जानकी अपन दीदी भाटो के आय के पहिली जउन गोठ-बात करत रहिन उही ल अपन दीदी भाटो तीर भोला फेर गोठियाथे। वो दुःख ल सुनके संतोष हा कहिथे –

   "भोला तुमन कतको बईगा गुनिया तीर देखाय हो फेर कोनो बड़े डॉक्टर कर आज ले नइ गे हो। मोर बात ल मानहू त रायपुर मा बड़े-बड़े अस्पताल हे जिहाँ बड़े-बड़े डॉक्टर हे, एक बेर जाके देखव।दूनों के जाँच करवावव। अपन डाहर ले झन चुको।"

भोला –"हव भाटो ये दरी रायपुर के बड़का अस्पताल मा जाबो।"

      गोठ-बात करत दिन पहागे। रतिहा मा मोहन बरात ले घलो आगे। वोकरो ले भेंट होगे। एक रात गुजार के दूसर दिन बिहनिया संतोष अउ संतोषी अपन दूनाें लइकामन ल वोकर ममा-मामी तीर गर्मी के छुट्टी मनाय बर छोड़ के अपन घर चल देथें। बड़े फजर  मोहन घलो अपन इलेक्ट्रेशियन के काम मा जाय बर निकलथे। जानकी मोहन के हाथ मा खाना डब्बा ल देवत कहिथे – "बेरा मा रोटी ल खा लेबे अउ फटफटी ल देख के चलाबे अबड़ दुर्घटना घटत हे।" 



भोला हा जानकी तें बासी धरके आबे काहत बनिहार मन ला धरके काँटा खुटी बिने बर बिहनिया खेत चल देथे। जानकी घर के काम बुता ल निपटा के अपन भाँचा-भाँची ल खवा-पिया के बासी धर के खेत जाय बर निकलत रहिथे त दुवारी  के आगू मा अनबोलहीन, झरझरहीन परोसिन सोनबती ह मुंँह ल मुरेरत जानकी ल देख के अपन नवा नेवरनीन दूनों बहू ल कहिथे –"ये भोला के बाई हरे रे। ये ठगड़ी बकठी हा आज ले एकोझन लइका नइ जने हे। येकर तीर मा आहू-जाहू झन। दुरीहा घुच के रहीहव। येकर छाँव बने नइ हे।"



"देख काकी मोर भाग मा भगवान का लिखे हे तेला उही जाने। तें मोला ठगड़ी-वगड़ी मत केहे कर। मोर मोहन हा मोर लइका आय अउ सुन मोला तोर बहुमन ले कोनो लेन-देन नइ हे। फेर भगवान करे उँकर पाँव जल्दी भारी हो जाय।" काहत जानकी अपन खेत चल देथे।



दूसर परोसीन दरगहीन हा कहिथे– "देख सोनबती बिचारी जानकी ल अइसन झन बोले कर। लोग लइका के हाथ-बात हा किस्मत के खेल आय। हमर पारा परोस के सबो लइकामन ल वो अपन लइका समझ के कतका मया दुलार करथे तें नइ देखस का?"



"तोला वोकर घर के आले-आले खाय ल मिलथे त तें वोकरे तीर गोठियाथस।" काहत सोनबती अपन घर मा खुसर जथे।

     ये डाहर जानकी बासी धरके खेत मा पहुंँचथे त वोला देख के भोला कहिथे –"का होगे जानकी काबर तोर थोथना ल ओरमाय हस?"



जानकी कहिथे–"उही सोनबती काकी के ताना।"



भोला कहिथे–"छोड़ न वोला।हमर दूनों मा मया प्रेम हे त हमन एक दूसर के सुख-दुख ल समझथन। येकर ले बड़ के अउ का चाही?"



जानकी के मन ल मड़ाय बर भोला छोड़ न कही दीस फेर ये दुख हा वोकर मन मा घुमरत रहिथे। खेत ले आके जानकी रांध-गढ़ के अपन भाँचा-भाँची संग खा पी के सो जथे। 

     तीन चार दिन बाद भोला जानकी ल धर के रायपुर के बड़का अस्पताल मा बड़का डॉक्टर तीर मिलके दाई-ददा बने के अपन मनसा ल बताथे त डॉक्टर दूनाें के जाँच करथे। डॉक्टर जाँच के रिपोर्ट हप्ता दिन बाद मिलही कहिथे त भोला हप्ता दिन मा रिपोर्ट बर आथे। डॉक्टर भोलासन गोठ-बात करके रिपोर्ट ल दे देथे। रिपोर्ट ल धरके भोला अपन घर आ जथे। जानकी रिपोर्ट के का होइस, डॉक्टर का बतइस कहिके पूछथे त भोला महीना दिन बाद मिलही कहिके लबारी मार देथे। मोहन पूछथे डॉक्टर का कहिस भैया कहिके त वहू ल रिपोर्ट महीना दिन बाद आही कहिके लबारी मार देथे।      

    सब अपन-अपन काम बुता मा लग जथें। फेर अब ले भोला उदास अउ चुप-चुप डर्राय असन रहे ल लगथे। जानकी कई बखत येकर कारन ल पूछथे त भोला बात ल टार देथे। ये डाहर चईत के निकलती मा मोहन के मंगनी-जोरनी अउ बिहाव घलो माढ़ जथे। संतोष, संतोषी ल धर के चार दिन पहिली अपन ससुरार आ जथे। भोलासन बिहाव के लेन-देन करथे। इसी बीच संतोषी भोला के सुभाव ल देख के कहिथे–"तें काबर चुप-चुप रहिथस भाई?"


भोला हाँस के कुछु नहीं दीदी बिहाव के तियारी करना हे न कहिके बात ल टार देथे। जानकी  के मइके वाले मन घलो मोहन के बिहाव मा आथें। १० एकड़ के जोतनदार,पढ़े-लिखे भोला अउ जानकी अपन बेटा बरोबर मोहन के ददा-दाई बनके वोकर धूमधाम ले बिहाव ल करथें। जानकी मोहन के मऊर सोंपके बरात भेजथे। घर मा नवा बहू आ जथे। बिहाव झरथे तहान संतोषी सबो भाई-भउजी मन जुरमिल के रहू  काहत अपन लइकामन ल धरके अपन घर चल देथे। जानकी के मइके वाले मन घलो चल देखें।

       हंँसी खुशी मा समय कइसे गुजरीस पता नइ चलीस। आज मोहन के बहू मंजू के दू महीना मा पाँव भारी हो जथे। जानकी अपन देरानी मंजू के बेटी बरोबर धियान रखथे। घर मा नान्हे लइका के किलकारी गूंजे के खबर ल सुन के भोला अउ मोहन बड़ खुश रहिथें। आज संझा बेरा चाय पीयत दुवारी मा बइठे भोला हा कहिथे–"जानकी असाढ़ लगे मा दू दिन बांँचे हे बादर ह घुरुर-घारर करे के शुरू कर देहे खेती किसानी के दिन बादर आगे। अब नागर-बइला, बांँवत-बख्खर के तियारी करे ल लगही।" 


जानकी साग ल सुधारत कहिथे–"हव मोहन के भईया खेती किसानी  के तियारी तो करेच ल परही।"


रात बियारी के पाछू मोहन अपन कुरिया मा जाके खटिया मा सुते-सुते डॉक्टर के रिपोर्ट वाले बात ल गुनत रहिथे वोतकी बेर जानकी मंजू सन बर्तन-भांडा ल मांँज धोके कुरिया मा जाथे। भोला जानकी ल देख के ठिठक के कहिथे –"में तोर ले एकठन बड़का सच छुपाय हँव जानकी तोला कइसे बतावँव के,,,,,,,"


जानकी भोला के कुछु बताय के पहिली तुरते कहिथे –"तुमन ल मोर ले कुछु कहे के कोनों बात नइ हे मोहन के भईया में सब जानत हों। में बिहाव बर कुरिया के साफ-सफई करत रेहेंव त रिपोर्ट ल देख डरे हों अउ डॉक्टर  ले फोन मा पूछ डरे हों। तेकर सेती तुमन ल रिपोर्ट के बारे मा घलो अउ कभू नइ पूछेंव। तुमन कोनों बात के संसो झन करव। जइसे पहिली जिनगी बीताहन वइसने आगू घलो बिताबों।" अतका ल काहत-काहत जानकी भोला ल पोटार के रो डरथे।

भोला कहिथे– "सबो सच ल जाने के बाद घलो तें मोर ले अतका माया पिरित करथस जानकी। में तोर जइसन मयारू पिरोहिल ल पाके धन-धन होगे हों।" कहिके भोला घलो रो डरथे।

   चलव सुतव मोहन के भईया नवा सुरुज हमर घर परिवार बर नवा उजियारा लावय कहिके जानकी सुत जथे।

     नवा सुरुज के अगुवानी करत भोला अउ जानकी खेती किसानी के काम मा लग जथें। में जब-जब घर मा नइ राहँव त तोर बने धियान रखे कर कहिके मंजू ल जानकी सावचेत करथे। मोहन घलो मंजू ल मोर भाई-भउजी मोर दाई-ददा के बरोबर हें इही मन  पाल-पोस के, पढ़ा-लिखा के मोला लायक बनाय हें । मंजू तें इनकर मान-सनमान मा कोनों कमी झन करे कर काहत काम मा चल देथे।

अतका ल सुन के मंजू बड़बड़ावत –"जब देखबे तब भईया-भउजी, भइया-भउजी करत रहिथे।” कहिके जरमरावत चूल्हा मा आगी ल हुरसथे। अउ बहिरी निकल के सोनबती के बहू सन गोठियाय ल धर लेथे। 


    जब-जब जानकी ह घर मा नइ रहय त मंजू सोनबती के बहूमन सन गोठ-बात करे बर उँकर घर चल दे अउ सोनबती वोकर कान ल भरे।

सोनबती एक दिन मंजू ल काहत राहय –"तें मोहन ल तोर पट मा राखे कर। रात दिन भउजी -भउजी करत रहिथे। तोर लइका आही तहू ल वो ठगड़ी ल धरन झन देबे। नहीं ते लइका घलो जानकी ल बड़े दाई-बड़े दाई करत रही।"


ये गोठ ल सुन के दरगहीन दाई मंजू ल समझाथे–"तें घरफोड़ही सोनबती के बात मा झन आ बेटी। ये तोर रचे-बसे घर ल टोर दिही।" 


मंजू नइ समझे अउ परबुधनीन, अपन जेठानी जानकी के बिरोध मा आ जथे फेर वो जानकी के आगू मा कुछु  नइ काहय। ये बात ल जानकी घलो जान डरथे।

      अइसे-तइसे अब छै महीना बीते के बाद आज रतिहा मंजू के छेवारी पीरा उठगे। जानकी दरगहीन दाई ल बुला के लाथे। पीरा म जानकी मंजू ल हिम्मत बंधाथे फेर मंजू भीतरे भीतर जानकी बर जरमरावत रहिथे। होत बिहनिया घर मा लइका के केंव-केेंव रोवई सुनाथे। दरगहीन दाई बाबू लइका ल धो पोंछ के जानकी के हाथ मा देवत रहिथे वइसने मा मंजू ह कहिथे –"मोर लइका ल वो ठगड़ी के हाथ मा झन दे। लइका जने के पीरा का होथे तेला ये ठगड़ी का जानही। येला तो बस दूसर के लइका अंगियाय बर आथे। पारा परोस के लइका अउ मोहन कस मोर लइका ल घलो अंगिया डरही।"


मंजू के गोठ ल सुनके जानकी ठाढ़ सुखा जथे। दरगहीन दाई कहिथे –"तें सोनबती के बोली झन बोल मंजू।"


परछी मा बइठे भोला मंजू के गोठ ल सुनके मर्यादा के डेहरी ल नाहकत अपन भाई बहू ल कहिथे–"छोटकी तें जानकी ल ठगड़ी झन कहा। ठगड़ी जानकी नइ हे ठगड़ा में हावँव। मोर ऊपर अंँगरी उठा। तें वाेकर तियाग अउ प्रेम ल का जानबे? अरे डॉक्टर के रिपोर्ट मा कमी मोर मा हे जानकी  मा नइ।"  

ये भेद ल जानकी जाने के बाद घलो कोनों ल नइ बतावन दीस ये कहिके के–"दुनिया तो मोर ऊपर ठगड़ी के ठप्पा लगा डारे हे। जिनगी के राहत ले ये ठप्पा नइ मिटय तुहर भेद ल भेद राहन दव।" 


भोला कहिथे–"जानकी मोला दूसर बिहाव कर ले घलो कहिस फेर में अपन बसे बसाय घर ल उजारना नइ चाहेंव। अपन अंतस मा ये पीरा ल दबाय में कइसे जीयत हंँव तेला मिही जानथँव। मोर कारन अतका दिन ले जानकी ठगड़ी होय के ताना सुनीस फेर अब नइ सुनय।" 

ये बात ल सुनके मोहन रो डरथे अउ मंजू ल जानकी ले माफी मांँगे बर कहिथे। मंजू पश्चाताप के आंँसू मा रोवत लइका ल जानकी के गोदी मा डारे बर कहिथे। अउ जानकी के पाँव छूवत कहिथे–"मोला माफी दे दे दीदी। में पर के बुध मा आके तोर ऊपर जहर उगल डरेंव।" 

     जानकी अपन छाती मा लगे बोली के बान ल भूलाके मोहन कस नान्हे लइका के जतन करथे अउ सब झन जुरमिलके हंँसी-खुशी ले रहिथें।


कहानीकार 

डॉ. पदमा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य

कहानी: .......तोर अगोरा मा !

 कहानी: .......तोर अगोरा मा !

                      

                                चन्द्रहास साहू

                             मो- 8120578897


तन ले भलुक सांवरी रंग हाबे फेर मन ले उज्जर हावय। कद काठी ले भलुक बुटरी हाबे फेर कदम पोठ उठाथे। आँखी मा जलरंग करत आँसू हाबे फेर सपना समंदर ले गाहिर हाबे। काया दुबर-पातर फेर अंतस ले पोठ हाबे। ...... फेर कतको पोठ हो जावय जिनगी मा भांवर उठथे तब बुध पतरा जाथे। आगी कस अंगरा मा घला राख के परत चढ़ जाथे। बस अइसनेच तो हाबे वोकर जिनगी हा। 

          मोटियारी अहिल्या के गोठ करत हॅंव मेंहा। वोकरो जिनगी मा भांवरी उठे हाबे। कोनो न देखिस, न गुनिस, मनन नइ करिस। नित-नियाव नइ करिस सोज्झे फैसला होगे। 

"तोला जिए के अधिकार नइ हाबे अहिल्या जा पथरा हो जा।'' 

                 अहिल्या के आँखी मा अंधियारी छागे। लहू के संचार बाढ़गे। रुआ ठाड़ होगे। धक ....धक..... धड़कन चले लागिस। अंधियारी आँखी मा बिजली चमकीस अउ बुतागे। ...धड़ाम होगे। जझरंग ले गिरगे पथरा लगे दुवारी मा "पथरा'' हा। जियत-जागत मनखे सिरतोन पथरा बनगे। मुहूँ ले बक्का फूटे न आँखी ले आँसू गिरे। कतका रोही बपरी हा ...? एक-एक आँसू के हिसाब लिही ते समुंदर के खारो पानी कमती हो जाही। एक-एक पीरा के हिसाब लिही ते पोथी  कमती हो जाही। एक-एक दरद ला जोड़ही ते दुनिया कमती पड़ जाही।

           अइसने तो एक बेरा अउ होए रिहिन। मनचलहा इंद्रदेव हा बहिरूपिया बनके आए रिहिन लार टपकावत। बिचारी अहिल्या देवी का जानही.....? गोसइया के भोरहा मा अपन मया ला दे दिस इंद्र देव ला। .... अउ गोसइया ला जानबा होइस तब ....? जम्मो के दोषी देवी अहिल्या होगे। 

"जा पथरा बन जा......।'' 

डांड़ दे दिस। सौहत पथरा बनगे देवी हा। 

तब अउ आज में का बदलिस नारी के जिनगी हा ? आज वइसने यहू अहिल्या होगे।

"जा पथरा बन जा......।'' 


                  टूरा मन कहांचो किंजर लेवय काही पहिन लेवय सब आजादी फेर टूरी मन बर पहरेदारी ? 

जम्मो तन ढंके राहय, अदब मा राहय। ... अउ थोकिन उघरा होगे तब गिधवा के का कमती ?  जंतु वैज्ञानिक मन भलुक गिधवा ला विलुप्त होवत प्रजाति कहिथे फेर अपन प्रयोगशाला ले  बाहिर निकल के तो देखो साहब ! मरी खवइया मन भलुक कमती होगे फेर जियत खवइया मन बाढ़गे हाबे। तभे तो फ्रीज मा पैंतीस कुटका मा बेटी मन मिलत हाबे, रोड मा घसीटत लेगत हे। छिहीबिही होगे जियत बेटी हा। मांस हाड़ा अउ लहू के रंग मा रंगाये सड़क होगे हे। कोनो माइक्रोस्कोप ले तड़प सुसकन ला देख सकथे का ? ....नही। अहिल्या भलुक भाव शून्य होगे हे फेर मन मा बादर गरजत हाबे।

अहिल्या एक दिन जींस टॉप पहिर के शहर ले का आइस दाऊ पारा के जवनहा के आँखी लहुटगे। दाऊ के बड़का टूरा हा अहिल्या ला रौंद डारिस।

"तोर गलती हाबे अहिल्या ! ..... सिरिफ तोर।''

परोसी सोज्झे कहि दिस। .... अउ पंचायत मा पंच परमेश्वर मन घला इही बला लगावत हाबे। आज जम्मो कोई गाँव के एकता चौक मा सकेलाये हावय दाऊपारा अउ खाल्हे पारा के माते झगरा ला देखे बर।

                 अहिल्या खाल्हे पारा के बढ़ई के टूरी आवय अउ भानू हा बड़का दाऊ के टूरा आवय। बड़का दाऊ भलुक भैरा हाबे फेर कोनो भैरा कहि दिही वोतकी मा खंडरी उधेड़ दिही। छोटका दाऊ घला सांय - सांय करत हाबे आज। खाल्हे पारा के अगवा बने हाबे बोचकू माहंगू अउ गंगू हा।

"हमर भुईयां मा जम्मो ला जिए के अधिकार हाबे एकर मतलब अब गाँव गंवई के टूरी मन जींस टॉप पहिरके थोड़े किंजरही ? अइसन मा हमर संस्कृति के नाश नइ हो जाही ..? ये टूरी अहिल्या ला शहर के हवा लगगे हावय। जींस टॉप पहिर के गाँव मा किंजरत हाबे तब देखइया के का गलती ?''

मंझला दाऊ बइटका के मूल गोठ ला चतुराई ले किहिस।

"कोनो हा रोटी ला झुलात रेंगही तब कोनो कुकुर हा झपट्टा तो मारबे करही ? ...... येमा कुकुर के का दोष ....?''

बड़का दाऊ अब मंझला के गोठ मा पॉलिश लगाइस।

"तोर बेटा भानू हा कुकुर हो सकथे दाऊ ! फेर हमर बेटी बहिनी अहिल्या हा रोटी नइ हो सके कि कोनो कुकुर देखही अउ झपट्टा मार लिही।''

गंगू किहिस।

दाऊ रखमखागे। 

"जबान सम्हाल के बात कर गंगू ! हमर जूठा-काठा मा पलथो तुमन तब कुकुर तुमन होए।''

"मेंहा मानथो तुहर घर के बनी भूती ले खाल्हे पारा के गुजारा चलथे। तुहर जूठा-काठा ला खा घला लेथन फेर ऐकर मतलब  हमर परवार के नोनी बाबू के इज्जत ला तुहर घर के खेलउना नइ बनावन दाऊ ! ..... अउ हमर बेटी कोती गंदला नजर ले देखबे ते तुहर आँखी ला कोचक देबो। अब जमाना बदलगे दाऊ.....! तेंहा चार मुटका मारबे ते महूँ हा दू मुटका मार के मरहू फेर हार नइ माने खाल्हे पारा के मन घला।''

बोचकू किहिस अपन लुहंगी मा गठान पारत।

"नइ होवन देवन अइसन अनित।''

अब खाल्हे पारा के जम्मो कोई चिल्लाए लागिस।

"शहरी स्टाइल मा पहिर-ओढ़के के गली-गली किंजरत रिहिस अहिल्या हा। दाऊ के टूरा के नियत डोलगे ते का होइस...? वोकर तन ला छू दिस ते खीया थोड़े गे ? हमर दाऊ बेड़ा मा तो सबर दिन अइसन होवत आवत हाबे कोनो टूरी संग दिल लग जाथे ते ठठ्ठा कर लेथन।''

दाऊ फेर किहिस अपन मइलाहा सोच ला उजागर करत।

"सबर दिन हमन ला जानवर समझे हस फेर हमू मन मनखे आवन दाऊ ! अउ हमू मन अब तुहर बेटी बहिनी संग ठठ्ठा करबो तब कइसे,...... बनही का ?''

माहंगू किहिस अब अगियावत।

दाऊ ला मिर्ची लाग गे।

"हमर गाँव मा अइसन नइ होवन देवन।''

दाऊ पारा के युवा मन गरियाए लागिस। एक कोलिहा नरियाइस अउ जम्मो कोती हुंवा-हुंवा। 

अहिल्या हा नवा फैशन के ओन्हा पहिरके किंजरथे उही गलती हावय। गाँव के इज्जत बचाना हाबे तब पाबंदी लगाए ला लागही।

"टूरी मन का पहिरही, का नइ पहिरही के नियांव होवत हाबे पुरुष मन के बइटका मा। ये भारत हा दुनिया के सबसे बड़का लोकतंत्र के भुईयां  आवय अउ जम्मो कोई ला अपन सुभित्ता अनुसार सब पहिरे के आजादी हाबे।.....अउ इही बस्ती मा दाऊ के बेटी मन अपन मन से ओन्हा पहिर सकथे तब हमर खाल्हे पारा के बहिनी मन काबर नइ पहिर सकही ? टूरी मन का पहिरही का नइ पहिरही के नियाव ले जादा बड़का गोठ आवय अहिल्या के तन संग काबर खेलिस दाऊ के टूरा भानू अउ उकर संगवारी मन ? एकर नियाव होना चाहिए पंच परमेश्वर हो।''

खाल्हे पारा के सियान गैंदलाल किहिस। जइसे सिरतोन मा जम्मो कोई आज के नियाव के मूल गोठ ला बिसरगे हाबे। अहिल्या के अनाचार होए हे तेकर नियाव करे बर सकेलाएं हाबे जम्मो कोई अउ होवत हाबे टूरी का ओन्हा पहिरही तेखर। 

"अहिल्या ला बलाके  हियाव-नियाव करो तब बनही जी !  .....अउ दाऊ के टूरा भानू ला घला बलावव।''

खाल्हे पारा के सबले बड़का सियान किहिस।

अहिल्या अपन दाई के तीर मा अब बेसुध बइठे हाबे।

"अहिल्या हा भलुक ये बइटका मा आही फेर दाऊ के टूरा हा अपन इज्जत उतारे बर नइ आवय।''

अब बड़का दाऊ हा किहिस।

"दाऊ के कुकरा होवय कि टूरा अब्बड़ जल्दी नजर लागथे। मोर होनहार बेटा ला नजर लगगे। अपन मोह फांस मा फंसा डारिस ये टूरी हा। रुपिया पइसा धन दौलत ला देख के लूटे के उदिम करत हाबे। तन ला बेचके मजा उड़ावत हाबे ये बेसिया हा। आज मोर बेटा फंसगे मोह जाल में, काली तुंहर बेटा मन फंस जाही......! अइसन टूरी ला तो गाँव मा घला नइ रहना चाही। बचाओ ये गाँव ला।....बचाओ ये गाँव के जवनहा मन ला।''

दाऊ कोती ले बड़का सियान किहिस।

"हाव ! सिरतोन कहात हाबे बबा हा।''

"भगाओ.... भगाओ.....!'' 

आरो आए लागिस। जम्मो कोई अब एक सुर होगे।

"कहां जाही बपरी हा ? वो तो अपन रद्दा मा रेंगत रिहिस अउ ....। गाँव ला छोड़ही ते दाऊ के टूरा हा छोड़े। अहिल्या इहिंचे जिहि इहिंचे मरही। ... अउ कोन निकालही मोर लइका ला देखथो मेंहा।''

खाल्हे पारा के  सियान बबा किहिस। 

बबा के भीष्मप्रतिज्ञा ला सुनके बइटका मा अब जम्मो कोई कांव-कांव हांव-हांव करे लागिस। एकता चौक मा बवाल होगे। नित-नियाव के जगा गारी- बखाना चलत हाबे। मार कांट बर उमिहावत हावय। ..... अहिल्या अउ वोकर दाई अब उदास रोवत  अपन घर चल दिस।

                   सिरतोन पहिली पंच परमेश्वर बनके गाँववाला मन नित-नियाव कर लेवय फेर अब जब ले एकता चौक के नाव धराये हाबे तब ले एको नियाव नइ होए हाबे। कभु ऊंच-नीच, कभु जाति-धर्म, पंत अउ अब तो राजनीति के नाव मा मार पीट हो जाथे चौक मा। जिहा सर्वसम्मति ले चुनई होवय उही अब बिन कछेरी अदालत जाय बिना नइ होवत हाबे। 

"अहिल्या तहु चल कछेरी.....?''

सियान किहिस अउ रद्दा मा रेंगे लागिस। थाना अमरे नइ रिहिस अउ उदुप ले गाँधी चौरा मेर अमरगे दाऊ हा। वोकर संग गाँव के बड़का सियान पलटू राम घला रिहिस - शांति दूत बनके आए रिहिन।

"कहां थाना-कछेरी जाथो दीदी ! जम्मो पुलिस वाला मन तो दाऊ के भक्त आवय। कोन सुनही तुंहर गोठ ला ?''

"कोनो तो होही भईया ! ये गरीबीन के सुनइया। दुख ला बताबो ते कोनो तो नियाय करही...।''

अहिल्या के दाई किहिस।

"ये सब तो आम बात आय बहिनी ! बड़े घर के लइका मन जवानी के जोश मा अइसन सब कर डारथे। येहां कोनो बड़का गोठ नोहे आज के बेरा मा।''

दाई के आँखी अगियावत रिहिस। बोले बर अब्बड़ रिहिस फेर गोठ मुहूँ मा रहिगे।

"टूरी मन तो बोझा ढोये बर आए रहिथे बहिनी ! ये दुनियां मा। मुड़ी ऊपर घर भर के बोझा- पानी, लकड़ी, घास के बोझा अउ पेट भीतरी लइका के।'' 

"सबो ला सहे ला सीख वो ! नानकुन गोठ बर दोरदीर -दोरदीर थाना झन जा। पेट मा जौन बोझा हाबे तेकर उतारे बर जौन कीमत मांगबे देये बर तियार हावन।''

मूल गोठ ला दाऊ किहिस पल्टू राम के पाछू।

"बढ़िया बइदराज करा लेगबो। ऊंचा-ऊंचा जड़ी बूटी खवाबो  अहिल्या ला....तहान न रही बांस न बनही बांसुरी।

"अब बइदराज मन के दुकान बंद होवत हे दाऊ ! अब बड़का नर्सिंग होम मा अइसन बुता होथे। भलुक जादा पइसा लेथे फेर सादा ओन्हा पहिरइया मन येला सुघ्घर करथे गारंटी के साथ। अहिल्या ला नर्सिंग होम पठोबो।''

पल्टू राम किहिस।

"...... अउ सुन !,  बुता के नागा होही तेकर सेती सौवा के कड़क एक बंडल  के लेग जाबे। समुंदर ले एक लोटा पानी निकालबे ते थोड़े कमती हो जाही ...?  ....अउ हमू मन गरीब के मुहूँ मा थूक देन कहिके भुला जाबो ।''

दाऊ मेंछा मा ताव देवत छाती फुलोवत अहिल्या के कोख के बोली लगाए लागिस।

"हाव, दाऊ बने काहत हे। मान जा।''

सियान पल्टू राम फेर किहिस

"तोर बेटी के संग अइसने होतिस तब मान जातेस का पल्टू भईया !''

अहिल्या के दाई किहिस रट्ट ले। पल्टू राम के बक्का नइ फूटिस।

                      अहिल्या तो बेसुध रिहिस। पथरा कस होगे रिहिन न हुंके न भुंके। ... अउ दाई घला इकर मन के गोठ सुनके रो डारिस। तभो ले कछेरी के डेरउठी ला खुंदिस फेर पुलिस वाला घला हड़का दिस अब। 

"मजा लेये बर ये सब करथो।.... अउ मन भरथे तहान रिपोर्ट लिखाए बर आ जाथो माई पिल्ला। इहां पुलिस स्टॉफ के कमती हाबे अउ तुहर मन के मजा के चक्कर मा हम फंस जाथन। भागो इहां ले। रोज के कतका रिपोर्ट लिखबो ?'' 

थानादार धमका दिस। 

का करही बपरी सियनहिन हा। अहिल्या ला धरके लहुटगे अब। जी हतास होगे। न गाँव मा इज्जत बाँचिस न कोनो काम बुता दिस अब। गोसाइया तो पहिलीच बितगे रिहिस।जम्मो नियाव के सभा हा अब कौरव के सभा होगे। धृतराष्ट्र तो अंधरा रिहिस फेर आँखी वाला जम्मो कोई घला अंधरा बनगे। कोन हे अब गाँव मा ? 


शहर चल दिस अहिल्या ला धरके अज्ञातवास मा सियनहिन दाई हा। अब नवा चिन्हारी के संग जिनगी जिए ला लागिस दाई हा अहिल्या के संग। 

                  बेरा पाॅंख लगा के उड़ावत हाबे अउ दाई के संसो बाढ़त हे। अहिल्या के कोख के बेटी हा आज मोटियारी होगे हे।

                        दूरपति के एक आरो मा आगेस किसन ! लाज बचाए बर। मोर देश राज ला बचाले दाऊ ! अब्बड़ झन दुस्शासन किंजरत हाबे छेल्ला। छत्तीसगढ़ के दुलरवा भाँचा राम तहुं हा शबरी दाई के आरो मा आगेस। ....मीठ बोईर ला खाके कहां लुकागेस।  ....आ तोरो अगोरा हाबे बचा ले ये छत्तीसगढ़ ला ! अब्बड़ अनित होवत हाबे ये भुईयां मा। रावण अउ मारीच ले जादा मायावी होगे हाबे इहां के मनखे मन हा। फोक्कट पांव भर परवाते रहिबे कि दरस घला देबे ये छत्तीसगढ़ मामी ला। अब तो आ जाना लबरा भाँचा !

 रोज अइसना गुनथे अब अहिल्या हा।

.......अउ सिरतोन मोहाटी के कपाट बाजिस अउ उदुप ले मोटियारी हा आके नहानी कुरिया मा खुसरगे सोज्झे सबरदिन बरोबर । जी हाय लागिस लइका ला देख के। अब्बड़ बेरा के अगोरा करत रिहिस बेटी माधुरी के। अहिल्या जम्मो ला गुन डारिस शहर के कुरिया मा बइठे अपन बेटी माधुरी के अगोरा करत। भलुक बड़का-बड़का महल अटारी बनगे आज फेर मनखे के सोच तो नइ बदलिस। महाभारत रामायण काल मा घला नारी अपन इज्जत ला बचाए बर छटपटावत रिहिन अउ आज घला। बेटी माधुरी संग कभु कोनो अनित झन होवय अब्बड़ डर लागे रहिथे अहिल्या ला। वोकर अंतस के पीरा तो आज घला हरियर हाबे कोट कछेरी चलत हाबे। कोन जनी कब नियाव होही ते...? वोकरे सेती अउ जादा डर्राथे अहिल्या हा। 


"जनक दुलारी, देवी तुल्य,वीरांगना, राजमाता रानी अहिल्या बाई के चेहरा मा उदासी कइसे दिखत हाबे आज। ....अउ ममतामयी करुणामयी जगत के पालनहार मोर नानी कही नइ दिखत हाबे।''

अहिल्या के बेटी माधुरी मुचकावत आइस अउ दाई अहिल्या ला पोटार के इतरावत किहिस। अहिल्या लजागे।

"टार रे ! तोर आनी बानी के गोठ ला। ....तोर नानी हा परोसी काकी घर कोती बरी अमराये बर अभिनेच गिस हाबे। आ जाही झटकुन।''

गिलास भर पानी देवत किहिस दाई अहिल्या हा। 

"बता तोर आज के दिनचर्या कइसे रिहिस।''

"हमर बुता का हे दाई ! मार-काट,चीर-फाड़। जीभ के अकड़ होवय कि हाड़ा के अकड़। सब्बो ला सोझियाये के बुता करथन महतारी ! हमर तो रोज के बुता आवय दरद पीरा मा कहारत मनखे ला देखे के। दर्द भी हम है और दवाई भी हा...हा....।

माधुरी बताइस हाँसत। अदरक वाली चाय आगे रिहिस अब। 

"के महीना अउ बांचिस तोर इंटर्नशिप हा ?''

"बस दू महीना अउ मोर राजमाता !  तहान ....अपन दुनियां,....... अपन अगास, अपन उड़ान.....। डॉक्टर माधुरी ला सरी दुनिया देखही दाई ! तोर बेटी अब्बड़ नाव कमाही, सब के ईलाज करही, रिसर्च करही वो संसो झन कर। ''

आँखी नचावत हाथ ला मटकावत किहिस माधुरी हा। सिरतोन अहिल्या के सपना पूरा होए बरोबर लागत हाबे। तपस्या के फल मिलइया हाबे अब। अब्बड़ दुख पीरा सहे हाबे अहिल्या हा माधुरी के जीवन ला सिरजाये बर। प्राइवेट स्कूल मा काम वाली बाई के नौकरी करके बेटी ला डॉक्टर बनाए के सपना देखिस अउ लोन लेके जगदलपुर मेडिकल कॉलेज मा भर्ती करिस। अहिल्या के अंतस मा मया के इंद्रावती हिलोर मारे लागिस अउ अरपा पैरी आँखी मा उतरगे। दूनो हाथ उठाके आसीस दिस बेटी ला।

.... अउ बेटी ? वो तो फेर मसखरी करे लागिस।

"डोंट बी  इमोशनल मेरी जान ! आई हेट टियर पुष्पा ! ये जो तुम्हारे आंसू है न ! वो आंसू नही, मोती है रे...! और इन मोतियों को सम्हाल कर रखो पुष्पा मेरी जान....!''

राजेश खन्ना के नकल करत किहिस माधुरी हा। वो तो जानथे दाई ला कइसे हँसाना हाबे तौन ला। अब दाई घला मुचकाये लागिस।

"दाई !  आज अस्पताल के एक गोठ सुनावत हावंव।"

"का...?"

"एक झन सियान भर्ती होए हाबे वो हमर मेडिकल कॉलेज अस्पताल मा। अब्बड़ दुख पीरा मा बुड़े हाबे। शुगर लेवल बढ़गे हाबे। काया कांटा होगे हाबे अउ गोड़ में लागे जुन्ना घांव गैंगरिन बनगे हे। जम्मो गोड़ सरत हाबे। वोकर गोड़ ला कांटे ला लागही।  बुधवार के अपॉइंटमेंट हाबे।''

माधुरी बताए लागिस।

"दाई ! मेंहा वोकर वार्ड मा जाथो तब अब्बड़ रोथे। कभु-कभु तो मोर गोड़ मा गिर जाथे अउ माफी मांगथे। पीरा के संग अहिल्या कहिके जोर से चिचियाथे। मोला माफी दे दे अहिल्या कहिके गिड़गिड़ावत रहिथे। ते मोर बेटी आवस कहिके दुलार करथे। आसीस देथे। अहिल्या बरोबर नैन नक्श हाव भाव चाल ढाल कहिके तारीफ करथे वो सियान हा। फेर....  वोकर घर के कोनो मनखे देखे ला घला नइ आवय। जरहागाँव के दाऊ भानुप्रताप नाव बताथे अपन नाम ला।''

अहिल्या के जी धक्क ले लागथे। छाती मा झूलत मंगलसूत्र मा हाथ जाम जाथे अउ मांग के कुहकु कोती धियान देथे। खनकत चूरी के आरो सुने लागथे।

"मोर बाबूजी आवय न दाई वो सियान हा। तेंहा सबरदिन मोला लबारी मारस न ! तोर बाबूजी हा परदेस गेहे खाए कमाए ला कहिके। बताना दाई ?''

अहिल्या अकचकागे बेटी के गोठ सुनके। सिरतोन कतका  अपमान करे हाबे दाऊ के टूरा भानू प्रताप हा। कछेरी मा अभिन घला केस दर्ज हाबे। भलुक पइसा के दम मा फाइल ला बंद करवा देहे फेर ....? भगवान शिव ला हलाहल पीए हाबे कहिथे फेर अहिल्या हा अपमान के कतका बीख पीये हाबे कोनो नइ जाने....? बिन बिहाये महतारी बने हाबे कहिके जौने जाने तौने हा बुरी नियत राखे। कतको बेरा फभित्ता सुने ला मिले। सोनपुतरी कस सम्हरे के उम्मर मा कोनो मेकअप नइ करे। कोन जन कोन कुकुर हा लार टपकावत आ जाही....? संसो करे।  खाली प्लॉट अउ भरे प्लॉट के ताना घला सुने। का करही बपरी हा ...? बिन बिहाव करे टूरी …....?  मंगलसूत्र चूरी अउ मांग मा कुहकू डार के  गिधवा मन ले बाचे के उदिम करे रिहिन अहिल्या हा।

"दाई !''

समुंदर के लहरा बरोबर जम्मो के सुरता आगे छिन भर मा। नोनी माधुरी के आरो ले चेतना लहुटिस अहिल्या के।

"दाई ! अइसन बेरा मा देवी-देवता के आरो लगाथे अपन दाई-ददा के आरो करथे फेर वो हा तोर आरो करत हाबे। भलुक अब्बड़ दुख - पीरा मा बुड़े हाबे फेर रात-दिन तोर अगोरा करत हाबे दाई। भलुक वोकर मुहूँ नइ देखे के किरिया खाए हावस फेर जीवन भर वोकर नाव के सवांगा तो पहिरे हावस न दाई ! ....पान परसाद खवाए बर चल दे वोतकी मा वोकर जी जुड़ाही।''

"कइसे जावंव बेटी ? आज जब कोनो नइ हे तब सुरता आवत हाबे वोला मोर । लाचार परे हाबे तब सुध लेवत हाबे। तेंहा नान्हे रिहेस तब बस्सावस अउ आज जब तेंहा सबल होगे हस तब अपन बेटी कहिके अधिकार जतावत हाबे। ...... तेंहा मोर बेटी आवस पोगरी । मोर अउ सिरिफ मोर...!

अहिल्या रो डारिस।

"हा...! डॉक्टर आवस तेंहा, सुघ्घर ईलाज कर। कोनो जिनिस के कमती झन करबे। न पईसा के,न दवाई पानी बर। डॉक्टर के धरम ला निभाबे।'' 

गाल मा ढूंलत आँसू ला पोछीस अहिल्या हा।

"......फेर वोकर आगू मा मेंहा कभू नइ जावव। अपन गलती मान के अपना लेवय कहिके जीवन भर अगोरा करेंव फेर जब सुघ्घर रिहिन तब कभु हीरक के नइ देखिस अउ अब......? भलुक मेंहा जीवन भर वोकर अहीत हो कहिके कभु नइ गुनेंव फेर सबरदिन मोर अउ तोर अहीत हो कहिके उदिम करे। भलुक मनखे मन नियाव झन करे फेर  भगवान के घर नियाव होथे सिरतोन।'' 

अहिल्या रोवत कुरिया मा खुसरगे।


अब तोरे अगोरा हाबे राम ! शबरी अउ अहिल्या ला तारे हावस वइसना मोर छत्तीसगढ़ के भाग जगा दे। कब तक माथा के खियावत ले पांव परावत रहिबे भाँचा ! अब मामी छत्तीसगढ़ के उद्धार कर दे। मेंहा तो उबर गेंव ये दुख के बेरा ले फेर कतको झन अभिन घला सुसकत हाबे...

झटकुन आबे भाँचा राम ! दुराचारी रावण मारीच ला मारे बर। अब रद्दा देखत हंव.........तोर अगोरा मा।

अहिल्या गुनत हाबे।

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

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समीक्षा

 पोखनलाल जायसवाल: ....

'तोर अगोरा मा' शीर्षक पढ़ के कहानी के कथानक अइसे लगिस कि मया म बिछुड़े मनखे के कोनो प्रेम कहानी होही। कभू-कभू कहानी के शीर्षक पाठक ल तुरते कहानी पढ़े बर विवश कर देथे। मया पिरीत के अइसने कोनो कहानी होही, गुन के तुरते पढ़े लगेंव। कहानी के भाषा शैली अउ प्रवाह अइसे हे कि पूरा कहानी पढ़ डारेंव। मन भटकिस नहीं। आखिर ले ऊपर के दूसरइया पैरा ल छोड़ दे जाय त मया के कहानी तो कहे च नी जा सकय। ए कहानी स्त्री विमर्श के कहानी आय। जेन म नारी-परानी के संघर्ष हे। पौराणिक प्रसंग मन के समाव ले कहानी विस्तार पाबे करथे, वर्तमान घटना मन ले नारी के शोषण अउ दुर्दशा के तुलनात्मक आरो घलव मिलथे। कहानीकार समाज म घटत घटना के विवरण संग स्वीकारथें कि 'तब अउ अब' म नारी के हाल अभियो जस के तस हे। जउन सोला आना सच आय। नारी सशक्तिकरण के जुग हे, फेर कागज म। जेकर लाठी तेकर भैंस चरितार्थ होत्तेच हे। नारी के पक्ष म खड़ा होवइया के कमी हे। बाहुबल अउ धनबल आजो व्यवस्था ल ठेंगा देखावत हे। बेरा म सही नियाव गिने-चुने ल मिलत हे, खासकर नारी हिंसा के मामला म। समाज म ए सब देखे सुने जावत हे।

         नारी मन ईश्वर के प्रति अगाध आस्था अउ विश्वास रखथें। वो मन पति ल परमेश्वर मानथें। कभू अनबन होय पाछू डेरउठी म ऑंखी गड़ियाय उॅंकर अगोरा म बइठे रहिथें। ए कहानी म अइसन बात नइ हे। धन बल के मद म बउराय मनचला टूरा के काला करतूत के पीरा ले जिनगी भर दॅंदरत नारी अहिल्या के संघर्ष हे। पौराणिक अउ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ले कथानक के विस्तार म व्यंग्य के सुर मुखर होय हे। व्यंग्य के अइसन धार बिरले कहानी म मिलथे। संस्कार अउ परम्परा के तथाकथित रखवार मन ऊपर जम के ठेसरा मारे गे हे।       

         दबे-कुचले के आवाज बने गंगू नवा जमाना के आरो आय। शोषक ल अब संभल के रहे के बेरा आगे हे। युग बदलगे हे। अनियाव ल अब कोनो नइ सहे। ए चेतवना हे।

        मइलाहा मनखे मन बर अपन घिनहा करतूत ल छुपाय के ठिकाना बने अस्पताल ऊपर घलो कटाक्ष करत सिरतोन गोठ लिखे गे हे -.... 'सादा ओनहा पहिरइया मन सुग्घर करथे गारंटी के साथ।' थाना-कछेरी के बढ़िया खबर ले गे हे।

         कहानी ये संदेश दे म सफल हे कि मनखे पाप कहन चाहे अनियाव या कहन कि अत्याचार कर के लौकिक संसार म धनबल ले बरी तो हो सकत हे, फेर अपन आत्मा ले उबर नी पावय। ऊपर वाले के नियाव ल बदल नइ सकय। ऊपर वाले के लाठी के गुॅंज भले कोनो ल नइ सुनावय। वार दिखथे जरूर। जिनगी के सॅंझाती बेरा धनबल बाहुबल काम नइ आय। यहू बात रखे म कहानी सफल हे।

        कलयुग के अहिल्या ल राम के अगोरा हे। मनखे मया-पिरीत ले विलग कहॉं रहि पाथे। मया च ले तो जिनगी म खुशी हे, सुख हे अउ सरी आनंद। इही आशा म अहिल्या ल अगोरा रहिस कि भानुप्रताप गलती मान अपना लय। फेर... अहिल्या ल ए बात के पीरा जादा रहिस कि बने दिन म भानुप्रताप धनबल के घमंड म उन ल हीरक के नइ देखिस। उॅंकर मरजाद नइ रखिस। जोर जबरदस्ती ले मन ल तार तार कर के सुलिनहा जीयन नइ देइस। अइसन भानुप्रताप के भरोसा छोड़ अहिल्या राम ले नता जोरत ओकर अगोरा म हे। छत्तीसगढ़ के लोक मान्यता के मोती ल गुॅंथ कहानी के समापन शीर्षक ल व्यंजना प्रदान करथे। 

       कहानी के संवाद लोक अंचल के जीवंत दृश्य ल रेखांकित करथे। अइसन संवाद गढ़ लेना कहानीकार के वाकपटुता अउ चतुरई आय। जे कहानी म जान फूॅंकथे। सुघर कहानी बर कहानीकार चंद्रहास साहू जी ल हार्दिक बधाई अउ शुभकामना।

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पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी

Saturday, 27 April 2024

श्रीराम नवमी म विशेष श्रीरामचन्द्र जी अउ छत्तीसगढ़ - ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

 श्रीराम नवमी म विशेष 


श्रीरामचन्द्र जी अउ छत्तीसगढ़ 


                 - ओमप्रकाश साहू "अंकुर"


    हमर भारतीय संस्कृति म मान्यता हे कि जब-  जब ये भुइंया म पाप नंगत बाढ़ जाथे तब भगवान ह मनखे रूप म अवतरित होके आथे अउ अत्याचारी मन ल मारके भक्तन मन के रक्षा करथे। त्रेता जुग म भगवान श्रीरामचन्द्र जी अवतरित होइस। श्रीरामचन्द्र जी भगवान विष्णु के सातवां अवतार माने जाथे।


त्रेता जुग म पवित्र सरयू नदी के तीर म बसे अयोध्या म महान प्रतापी राजा दशरथ राज करत रिहिन।  राजा दशरथ के पूर्वज मन के अब्बड़ सोर रिहिन हे। येमा  राजा रघु,राजा दिलीप, राजा शिवि, सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र, महा प्रतापी अज , भागीरथ अउ आने राजा के नांव सामिल हे। सूर्यवंशी राजा दशरथ के तीन झन रानी रिहिन जेमा कौशल्या सबले बड़की रिहिस। दू झन अउ रानी म   सुमित्रा, कैकैयी रिहिन। राज पाठ सुघ्घर चलत रिहिस। राज्य ह धन - धान्य ले संपन्न रिहिस पर राजा दशरथ के एको झन बेटा नइ रिहिन। इही हंसो  ह राजा ल घुना कस खाय जात रिहिन। अपन ये परेसानी ल अपन कुल गुरू  वशिष्ठ के पास रखिस त राजा ल सलाह दिस कि राजन् येकर बर पुत्रेष्टि यज्ञ कराव। ये यज्ञ करे बर सबले बने महान तपस्वी श्रृंगि ऋषि रहि। ये ऋंगि ऋषि छत्तीसगढ़ के सिहावा पहाड़ी क्षेत्र म तप - जप म मगन राहय। ये इही सिहावा पहाड़ी आय जिहां ले छत्तीसगढ़ के जीवनदायिनी नदी महानदी निकले हे। राजा दशरथ ह ऋंगि ऋषि कर जाके कलौली करिन कि हे महान तपस्वी आप मन मोर बिनती ल स्वीकार करके पुत्रेष्टि यज्ञ करहू त मंय ह आप मन के जिनगी भर आभारी रहूं। श्रृंगि ऋषि ह राजा दशरथ के घर जाके पुत्रेष्टि यज्ञ करिन येकर फलस्वरूप बड़की रानी  कौशल्या ह 

रामचंद्र लला, कैकैयी ह भरत अउ सुमित्रा ह लक्ष्मण अउ शत्रुघ्न जइसे हीरा बेटा पाइन। येमा राम ह भगवान विष्णु के सातवां अवतार 

 अउ लक्ष्मण ह शेषनाग के अवतार माने जाथे। 

कतको इतिहासकार मन के मानना हे कि हमर छत्तीसगढ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के महतारी कौशल्या के मइके हरे। छत्तीसगढ़ के जुन्ना नांव कोसल रिहिस अउ इहां के भाषा ल कोसली कहे जाय। कौशल्या के नांव भानुमति रिहिन जउन ह दक्षिण कोसल के महाप्रतापी राजा भानुमंत के बेटी रिहिन। अयोध्या के महाप्रतापी राजा दशरथ ले वोकर बिहाव होइस। भानुमति कोसल प्रदेश के होय के कारन आगू चलके कौशल्या कहलाइस। आदिकाल म छत्तीसगढ़ महाकोसल के नांव ले प्रसिद्ध रिहिस हे। श्रीराम के जनम भूमि अयोध्या हरे अउ ननिहाल छत्तीसगढ़ के चंदखुरी (आरंग)गांव हरे। हर लइका बर ममा गांव के अब्बड़ मया रहिथे त भगवान राम ल कइसे नइ रहि। येमा दू मत होय नइ हो सकय कि भगवान राम ह अपन नाना गांव नइ आइस होही।कतको बार नानपन म आइस होही। ये स्भाविक बात ये। त हम देखथन कि भगवान राम अपन नानपन म हमर छत्तीसगढ म आके अपन बाल सुलभ लीला चंदखुरी गांव म घलो दिखाइस। ये चंदखुरी गांव म महतारी कौशल्या के बड़का मंदिर हे। ये जगह ह लोगन मन के आस्था के बड़का केन्द्र हरे अउ अब पर्यटन स्थल के रूप म अपन एक अलग पहिचान बना लेहे।


 हमर छत्तीसगढ के महत्तम मअउ बढ़वार जाथे जब ये जाने ल मिलथे कि भगवान राम ह अपन  चौदह बछर बनवास म दस बछर तो इहि छत्तीसगढ़ ( सिहावा) राज्य म वो समय के सप्त ऋषि क्षेत्र म बिताय रिहिन। त ये प्रकार ले हमर छत्तीसगढ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरनरज ले पवित्र होय हे। तेकर सेति हमर छत्तीसगढ म भगवान राम ल भांचा राम कहे जाथे। अउ येकर असर हमर छत्तीसगढ के संस्कृति म देखे ल मिलथे। इहां के लोगन मन अपन भांचा - भांची ल भगवान कस मानथे। चरन छूके प्रनाम करथे। बिहाव से लेके कोनो खुशी के आयोजन हो या जिनगी के अंतिब बेरा होय भांचा - भांची ल अपन शक्ति अनुसार दान जरूर करथे।


 संत कवि पवन दीवान जी महतारी कौशल्या के जनम भूमि चंदखुरी के उद्धार अउ माता कौशल्या शोध पीठ बनाय बर अब्बड़ उदिम करिन। दीवान जी ह काहय कि - " भगवान राम हमर छत्तीसगढ के भांचा आय। चंदखुरी वोकर ममा गांव आय। तभे तो हमन   कहिथन -"कइसे भांचा राम। सब बने बने भांचा राम। ले तूही मन बताव ग कोनो मन कहिथे का कइसे भांचा कृष्ण। अउ मानलो कहूं कोनो अइसने कहि दिस त वो कहइया ह ल कहू !" अइसे कहिके दीवान जी ह जोरदार ठहाका लगाय।

  हमर छत्तीसगढ म भगवान राम ह जन -जन अउ सबके मन म बसे हे। इहां राम भगवान ले जुड़े कतको आयोजन होथे। छत्तीसगढ़ के सबो गांव म रामायण मंडली हावय जउन मन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गुनगान अपन सामर्थ्य अनुसार करथे। अउ ये प्रकार ले गोस्वामी तुलसीदास बाबा के रामचरित मानस के संदेस ल जन - जन तक पहुंचाथे।नवा मकान म गृह प्रवेश होय,षट्ठी होय या दशगात्र बेरा राम नाम के चर्चा रामायण मंडली के माध्यम से या रामधुनी मंडली के माध्यम ले होथे। जिहां गीत- संगीत ले वातावरण ह भक्तिमय हो जाथे त दूसर कोति मानस टीकाकार मन राम के चरित्र के गुनगान कर परिवार,समाज अउ देस हित बर संदेश देथे। हमर छत्तीसगढ म रामधुनी प्रतियोगिता, राम सत्त , मानस गान स्पर्धा/ मानस सम्मेलन, नवधा रामायण, राम लीला के आयोजन कर भगवान राम काबर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाथे।भगवान राम ह वर्तमान बेरा म काबर प्रासंगिक हे।ये सब बात ल जोड़ के लोगन मन ल सही रस्दा म चले बर सीख देय जाथे। ये सब आयोजन के आधार महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण, गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस अउ आने भाषा म रचित रामायण हरे।हमर छत्तीसगढ म रामनामी संप्रदाय के लोगन मन अपन पूरा शरीर म राम दनाम के गोदना गोदाय रहिथे। अत्तिक आस्था हे भगवान राम बर। भगवान राम सबके हरे। महर्षि बाल्मीकि अउ गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार राम सगुन रूप म हे। जब- जब समाज म अतियाचार बाढ़ जाथे। जब- जब अपन महान धर्म ल हीनमान करे जाथे त भगवान विष्णु ह नर रूप म अवतार लेके पापी मन ल मारथे अउ हमर महान धर्म अउ संस्कृति के रक्षा करथे।

त दूसर कोति देखथन कि कबीर के राम निर्गुण हे। कबीर के राम कोनो मंदिर अउ पथरा म नइ हे वो तो घट -घट म विराजमान हे। निराकार हे। सबो जगह वोकर उपस्थिति हे। कबीर ह धर्म के नांव म दिखावा करइया अउ येकर आड़ म

 म लड़वइया पाखंडी मन ल जम के लताड़िस।


  राम सबो झन के हरे। वो कौशल्या के राम हरे त कैकेयी बर भगवान हरे। राजा दशरथ के घलो परान हरे। वोहा अयोध्या के मान हरे। भाई भरत , लक्ष्मण, शत्रुघ्न बर महान हरे। केंवट , सबरी माता, अहिल्या, जटायु के उद्धारक हरे। ऋषि - मुनि अउ सज्जन मन के रक्षक त अत्याचारी ,पापी मन बर महाकाल हरे। 

हनुमान के भगवान हरे त सुग्रीव अउ विभीषण के सुघ्घर मितान हरे। ताड़का, मारीच, बाली, कुंभकरण, रावण जइसन राक्षस अउ अहंकारी मन के संहारक हरे। जनकनंदिनी सीता के मर्यादा पुरुषोत्तम राम हरे।जेकर मान राखे बर अहंकारी रावण ल संहारे। राम कैकेयी,मंथरा ल ढांढस बंधवइया वो राम हरे जेहा दूनों ल ये श्रेय देथे कि राम ल मर्यादा पुरुषोत्तम बनाय म तुंहर मन के हाथ हे नइ ते मंय तो सिरिफ अयोध्या के राजा बस कहलातेंव।

    हमर छत्तीसगढ म उत्तर दिशा के सरगुजा ले लेके  दक्षिण दिशा के सुकमा तक भगवान राम ले जुड़े ठउर अउ जुन्ना अवशेष मिलथे जेमा लोगन मन के आस्था जुड़े हावय। हमर राज्य म भगवान राम ले जुड़े पछत्तर ठउर मन के पहिचान करे गे हावय।येमा सीतामढ़ी - हरचौका ( कोरिया), रामगढ़ ( सरगुजा), शिवरीनारायण ( जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया ( बलौदाबाजार - भाटापारा), चंदखुरी ( रायपुर), राजिम( गरियाबंद), सिहावा सप्त ऋषि आश्रम ( धमतरी), जगदलपुर ( बस्तर) व रामाराम ( सुकमा) सामिल हावय‌। भगवान राम के बनवास ले जुड़े कतको ठउर मन ल सहेजे अउ पर्यटन स्थल के रुप म बढ़वार करे खातिर पहिली के कांग्रेस सरकार ह श्रीराम वन गमन पर्यटन परिपथ परियोजना बनाय रिहिन। काम घलो चालू करिन।

    बाइस जनवरी 2024 के दिन भगवान राम के जनम भूमि अयोध्या म श्रीरामलला के मूर्ति के प्रान प्रतिष्ठा करे गिस। मोदी - योगी के शासन काल म होवत ये बड़का आयोजन ले सिरिफ अयोध्या ह नइ पूरा देस के संगे -संग आने देस मन घलो राममय होइस ।

 अइसन सुघ्घर बेरा म भगवान राम के ममा ठउर छत्तीसगढ़ ह कइसे अछूता रहितिस। छत्तीसगढ़ ह अपन भांचा राम के मूर्ति ल मंदिर म करीब पांच सौ बछर बाद फिर से स्थापित करे के बेरा म उछाह होइस। भगवान राम के ननिहाल हमर छत्तीसगढ ले अयोध्या म आयोजित बड़का भंडारा खातिर बासमती चउंर , किसम- किसम के सब्जी के संगे- संग सहयोग राशि पठोय गिस। इहां के सबो शहर अउ सब गांव राममय होगे । श्रीराम हमर भारत देश के सच्चे नायक हे। राम एक आदर्श बेटा, आदर्श शिष्य, आदर्श पति,आदर्श मितान, आदर्श राजा के रूप में जनमानस में प्रतिष्ठापित हे।


। जय सिया राम।


           ओमप्रकाश साहू "अंकुर"

         सुरगी, राजनांदगांव