Saturday, 5 October 2024

कौव्वे का भोजन (लघुकथा )

 कौव्वे का भोजन (लघुकथा )

आज माँ का श्राद्ध है। राजीव परेशान है। पंडित जी ने कहा है गाय  और कोव्वे को खिलाना जरुरी है। गाय तो यहाँ रोज आती है पर कौव्वे ने तो शहर ही छोड़ दिया है।

रमा कहती है "तुम्हे याद है हम लोग पुरी जा रहे थे तो रास्ते में चाय पीने रूके थे वहाँ पर पीपल का पेड़ था। जिसमें सैकड़ो कौव्वे थे जो बहुत कांव कांव कर रहे थे।"

" अरे हाँ पर वह तो यहाँ से करीब चालीस किलोमीटर दूर है।"

"अरे तो क्या हुआ? साल मे एक दिन की बात है। माँ ने हमको इतना प्यार दिया है तो उनके लिये इतनी दूर छाना कौन सी बड़ी बात है।" 

"चलो हम सब चलते हैं। यहाँ का काम निपटा देती हूँ। आप छुट्टी ले लो। पंडित के लिये खाना टिफिन में मंदिर में पहुँचा दो।"

"ठीक है चलो ग्यारह बजे निकलेंगे। खीर पुड़ी कुछ ज्यादा रख लेना। वहाँ किसी को बाँट भी देंगे।"

"हाँ, ठीक है"

रमा ने पंडित के लिये टिफिन तैयार किया। बड़ा पूड़ी, तोरई की सब्जी, भिंडी की सब्जी, दाल और भात। राजीव टिफिन उठा कर मंदिर चला गया। गाय का हिस्सा निकाल कर रख दी। गाय समय पर ही आती है। दस बजे गाय आई और उसके सामने पत्तल में भोजन रख दिये। दो पूड़ी उसके ऊपर खीर रखा जाता है। बड़ा और सब्जी दाल भात। पूरा भोजन आराम से खा कर गाय चली गई। वह रोज आती थी और एक रोटी खाकर चली जाती थी। 


दोनों पति पत्नी तैयार होकर दो तीन पत्तल और टिफिन में खाना रख कर कार से निकल जाते हैं।रास्ते में भी देख रहे थे कि कहीं कौव्वा थिख जाये पर आज तो जैसे कौव्वौं ने हड़तार कर रखी थी। जब उस ढाबे तक पहुँचे तब वहाँ कौव्वौ की तेज काँव काँव की आवाज आने लगी। 


राजीव अपनी कार रोक दिया। ढाबे वाले के पीछे आँगन में पेड़ था।राजीव ने ढाबे वाले से बात की तो उसने बोला आप पीछे आँगन में जाइये। दोनो पति पत्नि खाना लेकर जाते है जैसे ही फत्तल पर खाना  रखते हैं । कौव्वै पेड़ से एक एक उतरते जाते हैं और खाने लगते है। तीनों पत्तल में खाना रख देते हैं और एक किनारै बैठ कर देखते हैं। जब खाना खतम हो जाता है तो कौव्वे राजीव.के पास आ जाते है औऋ काँव काँव करते है। राजीव को लगता है कि माँ भूखी है उसे और खाना चाहिये। राजीव के आँखो से आँसू झरने लगते हैं।पति फत्नि दोनों हाथ पकड़ कर चुप खड़े रहते हैं। माँ का चेहरा सामने आ जाता है। जैसे माँ और खीर माँग रही है। यादों को समेटते दोनो वापस आ जाते है। कौव्वा संदेश वाहक है.वह.माँ को बतायेगा कि हमने अच्छे हे खाना खिलाया है। माँ के प्रति श्रद्धा बनी ही रहेगी।

सुधा वर्मा, 29/9/2024

तातेतात चहा के भौतिक सत्यापन (महेंद्र बघेल)

 तातेतात चहा के भौतिक सत्यापन 

                       (महेंद्र बघेल)


सूत उठके बिहनिया ले साहेब-सुभा मन अपन मुँहुँ कान ल धोय चाहे झन धोय का फरक पड़थे, ओमन तो साहेब हरें भई,ककरो नौकर-चाकर थोड़े हरे जेमा उनला मुँहुँ ल धोयेच ल पड़ जाय। साहेब सुभा मन अपन मरजी के मालिक होथें, उनकर मन म जो आ जाय ओमन वइसनेच कर सकत हें।चाहे मुँहुँ ल धोय के पहली चहा ल पीये चाहे मुँहुँ ल धोय के पाछू। ये तो उनकर बर राज के बात आय।हव जी मामूली मनखे मन ल बिहिनिया च ले मुँहुँ कान ल धोना जरूरी हो जथे नइते कतको मन गवँइयाँ, फुसमुँहा घलव कही देथें।साहेब-सुभा मन अपन दसना म सुते-सुते बिहनियाच ले चहा पानी पीये के अब्बड़ मजा उड़ावत रहिथें, फेर ककरो हिम्मत तो हो जाय उनला असदहा, फुसमुँहा कहे के।हमर असन मामूली मनखे मन उपरवाले ले विनती घलव करत रहिथन कि हे भगवान अइसन आदत आचरण ल ये आदरणीय साहेब-सुभाच मन बर रिजर्व करके राखे रहव, मामूली मनखे मन डहर बिछलन झन देव। कभू-कभू तो अइसे लगथे कि ये आदत-आचरण ह खुदे वीआईपी टाइप के मनखे मन ल चारो मुड़ा ले भाँडी मार के राखे हे का..।चमकत कप-बसी म ताते-तात  चहा ल देखके काकर जीव ह चुहके बर नइ ललचावत होही भला। फेर साहेब मन के बातेच ह अलग रहिथे। ओमन तो चहा ले अतिक मया-मोहब्बत करथे कि दसना म सुते-सुते तीन चार कप ल तुरते चुहक डारथें।

                ऑफिस के करमचारी मन अपन काम-बूता ल उरकाय के आगू-पाछू चहा ल चूहके के कई घाँव मजा ले डरथे। कन्हों सरकारी बजट म चहा-पानी के बेवस्था हो जाय तब तो बाते अलग हे।काबर कि एकर ले जेमन बाप पुरखा चहा के चहक अउ चुहक ल नी जानत रहँय वहू मन फोक्कट म चहा ल चुहके बर अपन ओंड़ा ल डार दे रहिथें।सरकारी पैसा म जतका पीना हे ततका पीओ, ककरो दाई-ददा के थोरे जही, सरकार के जही उही ल खजवही। आज ले बीसक साल पहिली रायपुर विश्वविद्यालय म पेपर जँचई के पईत चार-पाँच लाख रुपया के चाय-पानी के खरचा ह ककरो ले छुपे नइहे। जेती देखबे तेती डबकत चहा के उड़त भाप के कहर ले वातावरण के हवा-पानी ह घलव चहइन-चहइन होगे हे।ऑफिस म चपरासी ले लेके साहेब मन के एक्के ठन बोल चलो जी चहा-पानी पी लेथन असकट लागत हे,सुस्ती लागत हे। जनता जनार्दन के सेवा बर बने ये कारयालय के अपन एक अलगे कहानी हे। कारयालय म करमचारी अउ हितग्राही के बीच म कामकाज ल निपटाय के गोठ-बात ह सबले पहिली चहा-पानी के छरा देवई ले शुरू होथे।जेन आस्ते-आस्ते मिठई डब्बा कोति ले नाहकत- नाहकत करेंसी के थप्पी  म जाके थेम्हाथे।एती ऑफिस के अगल-बगल के सरकारी भुइयाँ म बढ़िया ढंग ले पान ठेला अउ चाय ठेला तो खुली गेहे।येकर ले हमर सरकार ल जबर्दस्त फायदा घलो होवत हे,काबर कि कतको बेरोजगार साथी मन बीए, एमए, पीएचडी करके चहा- पानी बेचे के धंधा खोल डहे हे। ऑफिस के तीर-तखार के सरकारी जमीन ह छेंकई अउ अतिक्रमण म गीस ते गीस सरकार के खजाना ले सरकारी पैसा ह तो कम से कम नी सिरावत हे।

                 हमर बहिनी-महतारी मन के बंदन करे बर सरकार ह उनला हजार रूपया हर महिना देथे।उही महतारी बंदन के हजार के पाँच परसेंट ल सरकार डहर ले कन्हों चहा-पानी म खरचा करे बर रिजर्व कर दिए जाय ते चहा बेचइया बेरोजगार साथी मनके भाग ह चमक जही। चहा बर लोगन मन के अगाध मया ल देखके अब सरकार ल खुदे आगू आके ये दिशा म अपन जुम्मेदारी निभाना चाही।चहा ल सुप-सुप चूहकत मनखे मन थोरको भी अंदाजा नी लगा पाँय कि चहापत्ती ह ओरिजनल हरे कि डुप्लीकेट। एती उपभोक्ता समाज ल टेस मरई ले फुरसत मिले तब न । कते ह दूधे-दूध के मलई मारे वाले चहा ल ढोंकत हे त कते ह लिमऊ निचोवत लेमन टी ल चुहके म मगन हे।अपन-अपन सवाद अउ इच्छा के महिमा बघारत सिगसिगहा टाइप के चहेड़ी मन ग्रीन टी के झंडा फहराय म मस्त हें। उपभोक्ता मन ल जागरूक करे बर सरकार ह कतको उदीम करत हे। फेर मनखे मन ल चहा के सवाद बतइया ओकर जीभ के सेंसर ह मीठ-मीठ चहा के आगू म खुदे सिट्ठा परके रहि जथे। त कहाँ ले असली अउ नकली के भेद ल जान पही।

                 लेन-देन के काम म उस्ताज ऑफिस के  करमचारी- अधिकारी मन नकली चहापत्ती अउ सिंथेटिक दूध के कारोबार के बारे म कतका जानथे तेला उही मन जाने।राष्ट्रीय चहा संगोष्ठी के कार्यक्रम म एक पईत चहेड़ी गिरोह के एक झन सरगना ह अपन वक्तव्य म बताय रहिस कि बड़े-बड़े होटल म घेरी-बेरी खौलाय गय चहापत्ती ल पहिली सूखोय जाथे।अउ उही ल औने-पौने दाम म फेर बेचे के काम करे जाथे। चहा के नशा म बउराय चहेड़ी छाप मनखे मन उही चहापत्ती ल थोकिन सस्ता म बिसा-बिसा के सिन्थेटिक दूध संग डबका-डबका के चुहकत चहावीर बने के भोरहा म जीयत रहिथें। ये परबुधिया मन ल का मालूम हे कि घेरी-बेरी डबकल चहापत्ती अउ सिंथेटिक दूध के गठबंधन ले रऊत समाज के रोजगार ह छिनावत हे। चहा उद्योग ले मिलइया राजस्व ले सरकार ह चुक्ता भोसावत हे ते अलग।जनता जनार्दन मन सब जानत हें कि जतका देश म दुधारू गाय-गरु नइहे ओकर ले जादा इहाँ दूध के उलेंडा पूरा आय हे। एती एआई-एआई के पागलपंथी चलत हे।जनो-मनो ये एआई ह दुधारू गऊ सही  दूध ल पनका डारही तेमे।एती डुप्लीकेट चहापत्ती अउ सिंथेटिक दूध ले तैयार ठगतुल्य चहा ल पी-पीके जनता मन ठगावत हें फेर उनला ठगाय कस नी लगे। अउ उपराहा म ये चहा के दुनिया म अमृततुल्य चहा के खटाखट एन्ट्री।फेर अमृत तुल्य चहा के नाम म मेछा वाले चँदवा बबा के साँघर-मोंघर कप म छटाक भर अमृततुल्य चहा के कहानी ह रहस्य अउ खब-डब ले भरे हुए हे। असली अउ नकली के मझोत म तातेतात चहा ह खुलेआम टेस मारत हे अउ चहेड़ी मन चहा म बोहावत हें। मने चहेड़ी बर चहा मीठ।एती देश के जम्मों सड़क, रद्दा-बाट म गाय-गरू के कब्जा होगे हे अउ बेलाटी कुकुर ह बेड रूम म अपन पूछी डोलावत हे।ओती मंदिर के पट म गाय घीव के जगा, ओकर चर्बी ह परसादम-परसादम खेलत हे अउ हम अपन टोटा संग परछी-दुवार ल खल-खल ले धोय म मस्त हन।

             चाय बर मनखे मन के दीवानापन ल देखत देश भर म हस्ताक्षर अभियान घलव चलना चाही। जेकर ले नीति आयोग ह "नवा चहा नीति " बनाके विदेशी निवेश पाय बर मजबूर हो जाय।हम तो यहू कहिथन कि सन् 2025 ल चहा बरस घोषित कर देना चाही। अउ एकाद झन चहेड़ी टाइप के नेता मन के जनमतिथि ल चहादिवस के रुप म मान्यता देवावत एक दिन के सरकारी छुट्टी अउ गाँव-गाँव म चहा-तिहार मनाय के घोषणा हो जतीस ते हम धन्य घलव हो जतेन।तोर घर सगा आय चाहे ककरो घर सगा आय सबले पहिली उनकर मन बर चहा-पानी के बेबस्था ल करना च पड़थे, जरूरी गोठ-बात ह भला चूल्हा म जाय। मनखे-मनखे के अंतस म चहा बर गजबेच मया ल देखत ग्राम पंचायत तहसील अउ जिला स्तर म "चहा ओलंपिक" प्रतियोगिता के आयोजन घलव होना चाही। जेमा पहिली अवइया ल "चहेड़ी नंबर वन" अउ दूसरइया ल "परम चहावीर" के  सम्मान ले सम्मानित करे जाय। बाकी प्रतिभागी चहेड़ी मन ल एक कप चहा पीयाके धन्यवाद ले सम्मानित करत चहा-धरम निभाय के बूता करे जाय। चुनाव के हारे-हपटे विधायक प्रत्याशी होय चाहे मुँहफूलोय बड़े कद के कार्यकर्त्ता, एकाद झन ल 'चहा आयोग' के अध्यक्ष बनाके लाल बत्ती ल बुगुर-बुगुर जलवाय के एक ठन बड़का काम घलव करवाय जा सकत हे। 

                   गाँव-गँवई ल कहस चाहे शहर ल सबे डहर घरो-घर म बिहनिया ले चूल्हा म आगी सिमच जथे अउ चहा ह डबक जथे। चहा ह तो जइसे हमर देवता-धामी बरोबर होगे हवय जी। हमन येला पीये के पहिली  न तो घर ले निकलन, न बूता-काम करन अउ न बहिर बट्टा जावन।अब तो लोगन मन देवता-धामी म हूम-धूप देय बर  भला भूला जहीं फेर चहा पीये बर कभू नी भूलाय। सियान ते सियान लइका मन कप-बसी म छलकत चहा ल देखके पीये बर जोम देथें अउ मीठ-मीठ के रोस म चहा के संग खादा ल घलव बजेड़ देथें। बाद म खर्रू-खस्सू भला हो जाय का फरक पड़थे। प्राथमिक अउ माध्यमिक स्कूल म मिलत मध्यान्ह भोजन ह सरकार के एक ठन लोक कल्याणकारी योजना आय। येकरे तरज म लघु विश्राम के समय ठँउक्का तीनक बजे ल चहाकाल घोषित करत स्कूल मन म "चहा -पानी" के नवा योजना के बोहनी करे जाय।जेकर ले स्कूल के लइका मन बर एक कप चहा के बेबस्था हो सके। कुरसी म गोड़ लमा के उँघावत गुरुजी के अल्लर परे काया बर येहा रामबाण के काम घलो करही। कुल मिलाके लइका संग गुरुजी मन ल चुस्ती अउ फूर्ति के चहात्मक अनुभो जरूर होही।

         ओमन बड़ भागमानी होही जिंकर किस्मत ह चहा के भरोसा म चमक गीस होही।फेर गाँव-शहर के जगा-जगा म बेचावत चहा ल देखके अंतस म अपने-अपन कई ठन सवाल  उठ जथे। ये चहा म डराय चहापत्ती ह असली आय ते नकली, दूध ह जैविक आय ते सिंथेटिक, प्लास्टिक के कप म गरमागरम चहा पीये ले नफा होथे ते नुकसान। येकर जाँच-परख बर कोई विभाग हवय कि सरी बेवस्था ह ठन ठन गोपाल हे। जब मंदिर के लाड़ू म चर्बी होय के जाँच-परख हो सकत हे तब खुलेआम बेचावत चहा-पानी के जाँच-परख काबर नी हो सके। फेर काला कहिबे इहाँ के हालात ह कुछ अइसे हे कि आयुर्वेदिक अउ एलोपैथिक के दवई-गोली मन खुदे बीमार हें।एती मनखे मन डुप्लीकेट चीज-बस ल खा-पीके अइसे सजोर होगे हवँय कि एकाद दिन कहुँ ओरिजनल ले पाला पर जाय ते ये कंचन काया ह फोक्कटे म जोरंग घलव जही।  चारो मूड़ा ल देखबे तब अइसे लगथे कि ठगुल के चहापत्ती अउ ठगुल दूध के कारोबार ले होवइया नुकसान ले आम-आदमी ल पाँच पैसा के मतलब नइहे। उनला तो चाही बस एक कप तातेतात चहा।अब ओ दिन ह जादा दूर नइहे जब असदहा,फुसमुँहा साहेब-सुभा बरोबर आम-आदमी मन घलव बिना मुँहुँ धोय चहा पीये के नवा संस्कृति ल अपन आदत-बेवहार म संजो डारही। तब जेमन कभू चहा नी पीये तेमन खिल्ली उड़ावत तो कहिबे च करहीं न..।                              

ठगुल के चहा ठगुल के दुध,

एक कप चहा बर ठगागे बुध।


महेंद्र बघेल

"पं मुकुटधर पाण्डेय जी " आज जयंती 30सितंबर

 सुरता आथे  -

"पं मुकुटधर पाण्डेय जी "

आज जयंती 30सितंबर 


     सन 1981म हमर पहिली छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह "गुरतुर चुरपुर " (कवि द्वय मुरारी लाल साव  एवं संतराम साहू )प्रयास प्रकाशन  बिलासपुर ले  प्रकाशित होइस l  डॉ विनय कुमार पाठक जी भूमिका  लिखें हे l 

   गुरतुर चुरपुर के प्रति ला  पाके   30 सितंबर 1981  म पं मुकुट धर पाण्डेय जी रायगढ़ ले ख़ुशी  व्यक्त करत छत्तीसगढ़ी म नान्हे नान्हे आखर ले पोस्ट कार्ड म लिखके अपन आशीर्वाद देवत लिखें रहिन  "गुरतुर चुरपुर "   

    "हास्य व्यंग्य के काव्य संग्रह हे  जेमा जीवन के अनुभूति हे अउ कमजोरी ऊपर  करारा ताना बाना हे l                      आशा हे,,छत्तीसगढ़ी साहित्य म अपन जघा बनाही  l " 

ओ समे उंकर  उमर  86 बच्छर के होगे रहिन l ओमन  हिंदी के छायावाद के प्रवर्तक कवि के रूप म स्थापित होगे रहिन l   छत्तीसगढ़ी भाषा  बर उंकर कलम  चलत रहिस l साहित्य के बढ़ोतरी म उंकर योगदान उल्लेखनीय हे l

बहुत बड़े चिंतक अउ गंभीर विचारक रहिन l उंकर सोच बड़का रहिस l नवा नवा नेवरिया लिखय्या मन दिशा घलो देवत रहिन l 

     आज उकंर प्रेरणा 

अउ असीस ले 

कलम सरलग चलत हे l  

अपन जनम दिन के मोला पाती भेजे रहिन l       

    उंकर  पंदोली देये के बूता 

हमर भाखा बर बैदराज बरोबर रहिस l

द्वितीय काव्य संग्रह "मिरचा पताल  "  म उंकर  हाँथ ले लिखे चिट्ठी पाती छपे हे ले 

      एखर सेती हम नई भुला सकन अइसन महापुरुष ला  जौन छत्तीसगढ़ी म लिखें के रद्दा बताइन l  नवा नवा लिखय्या मन के पाती के उत्तर छत्तीसगढ़ी म पाती लिख के देवय l जेखर ले हमर ऊर्जा  बने हे l  

आज उंकर जयंती हे सुरता करत 

श्रद्धा सुमन -सादर नमन

🌹🌹🌹🌹🙏🙏

मुरारी लाल साव 

कुम्हारी

जनकवि कोदूराम "दलित" जी के काव्य मा गाँधी बबा

 जनकवि कोदूराम "दलित" जी के काव्य मा गाँधी बबा


आज हमर देश महात्मा गाँधी के 155 वाँ जनमदिन मनावत हे। संगेसंग दुनिया के आने देश में मा घलो बापू जी के जयंती मनत हे। ये मंगल बेरा म छत्तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम "दलित" जी के रचना के सुरता करना प्रासंगिक होही। दलित जी के अनेक रचना मन मा महात्मा गाँधी के महातम ला रेखांकित करे गेहे। उनकर विचार ला छत्तीसगढ़ी कविता के माध्यम ले बगराए गेहे। विशेष उल्लेखनीय बात ये हे कि दलित जी परतंत्र भारत ला देखिन, आजादी ला देखिन अउ आजादी के बाद के भारत ला घलो देखिन। आजादी के पहिली आजादी पाए के संघर्ष, आजादी के दिन के हुलास अउ आजादी के बाद नवा भारत के नवा सिरजन बर उदिम, उनकर रचना मन मा देखे बर मिलथे। उनकर रचना मा महात्मा गाँधी के विचार के अनेक झलक देखे बर मिलथे। उनकर रचना मन मा जहाँ-जहाँ गाँधी जी के उल्लेख होइस हे, संबंधित पद ये आलेख मा रखे के कोशिश करे हँव। पूरा रचना इहाँ देना संभव नइ हो पाही। 


सब ले पहिली सुराज के बेरा मा भारत के नागरिक मन ला संबोधित गीत के अंश देखव -


(1)"जागरण गीत"


अड़बड़ दिन मा होइस बिहान।

सुबरन बिखेर के उइस भान।।


छिटकिस स्वतंत्रता के अँजोर।

जगमगा उठिस अब देश तोर।।


सत् अउर अहिंसा राम-बान।

मारिस बापू जी तान-तान।।


आजादी के पहिली सत्याग्रह करे के आह्वान करत सार छन्द आधारित कविता के अंश - 

(2) "सत्याग्रह"

अब हम सत्याग्रह करबो।

कसो कसौटी-मा अउ देखो,

हम्मन खरा उतरबो।

अब हम सत्याग्रह करबो।।


जाबो जेल देश-खातिर अब-

हम्मन जीबो-मरबो।

बात मानबो बापू के तब्भे

हम सब झन तरबो।

अब हम सत्याग्रह करबो।।


चलो जेल सँगवारी घलो आजादी के पहिली के कविता आय, सार छन्द आधारित ये कविता के एक पद -

(3) "चलो जेल सँगवारी"

कृष्ण-भवन-मा हमू मनन, गाँधीजी साहीं रहिबो।

कुटबो उहाँ केकची तेल पेरबो, सब दुख सहिबो।।

चाहे निष्ठुर मारय-पीटय, चाहे देवय गारी।

अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल सँगवारी।।


आजादी के बाद आत्मनिर्भर बने बर गाँधी जी स्वदेशी अपनाए आह्वान करिन। चरखा अउ तकली के प्रयोग करे बर कहिन। इही भाव मा चौपई छन्द आधारित कविता के अंश - 

(4) "तकली"


सूत  कातबो   भइया , आव।

अपन - अपन तकली ले लाव।।


छोड़व आलस , कातव सूत।

भगिही  बेकारी  के भूत।।


भूलव  मत  बापू के बात।

करव कताई तुम दिन-रात।।


तइहा के जमाना मा खादी के टोपी के खूब चलन रहिस। इही टोपी ला गाँधी टोपी घलो कहे जात रहिस। खादी टोपी कविता के कुछ पद - 


(5) "खादी टोपी" 


पहिनो खादी टोपी भइया

अब तो तुँहरे राज हे।

खादी के उज्जर टोपी ये

गाँधी जी के ताज हे।।


येकर महिमा बता दिहिस

हम ला गाँधी महाराज हे।

पहिनो खादी टोपी भइया !

अब तो तुम्हरे राज हे।।


गाँधी बबा कहँय कि भारत देश ह गाँव मा बसथे। उनकर सपना के सुग्घर गाँव के कल्पना ला कविता मा साकार करिन दलित जी - 


(6)  सुग्घर गाँव के महिमा"

सब झन मन चरखा चलाँय अउ कपड़ा पहिनँय खादी के।

सब करँय ग्राम-उद्योग खूब, रसदा मा रेंगँय गाँधी के।।


आज के सरकार "गरुवा, घुरुवा, नरवा, बारी" के नारा लगाके छत्तीसगढ़ के विकास के सपना देखता हे। सरकार ला दलित जी के "पशु पालन" कविता ला पूरा जरूर पढ़ना चाही। ये कविता मा उनकर सपना साकार करे के मंत्र बताए गेहे। यहू कविता सार छन्द आधारित हे - 


(7) "पशुपालन"

पालिस 'गऊ' गोपाल-कृष्ण हर दही-दूध तब खाइस 

अउर दूध छेरी  के, 'बापू-ला' बलवान बनाइस।।


लोकतंतर के तिहार माने छब्बीस जनवरी के हुलास के बरनन हे ये कविता मा, एक पद देखव - 

(8) "हमर  लोकतन्तर"

चरर-चरर गरुवा मन खातिर, बल्दू लूवय काँदी।

कलजुग ला सतजुग कर डारे,जय-जय हो तोर गाँधी।।

सुग्घर राज बनाबो कविता के ये पद मा गाँधी के संगेसंग देश के महान नेता मन के मारग मा चलके समाजवाद लाए के सपना देखे गेहे - 


(9) "सुग्घर राज बनाबो"

हम संत विनोबा, गाँधी अउ नेहरु जी के 

मारग मा जुरमिल के सब्बो झन चलीं आज।

तज अपस्वारथ, कायरी, फूट अउ भेद-भाव

पनपाईं जल्दी अब समाजवादी समाज।।


धन्य बबा गाँधी गीत सार छन्द आधारित हे। चौंतीस डाँड़ के ये गीत महात्मा गाँधी ऊपर लिखे गेहे। कुछ पद देखव - 


(10) धन्य बबा गाँधी  


चरखा -तकली चला-चला के ,खद्दर पहिने ओढ़े।

धन्य बबा गाँधी, सुराज ला लेये तब्भे छोड़े।।


सबो धरम अऊ सबो जात ला ,एक कड़ी मा जोड़े।

अंगरेजी कानून मनन- ला, पापड़ साहीं तोड़े।।

चरखा -तकली चला-चला  के, खद्दर पहिने ओढ़े।

धन्य बबा गाँधी, सुराज ला लेये तब्भे छोड़े।।


रहिस जरुरत  तोर  आज पर चिटको नहीं अगोरे।

अमर लोक जाके दुनिया-ला दुःख  सागर मा बोरे।।

चरखा -तकली चला-चला  के ,खद्दर पहिने ओढ़े।

धन्य बबा गाँधी, सुराज ला लेये तब्भे छोड़े।।


एक के महातम कविता दलित जी के सुप्रसिद्ध कविता आय। यहू कविता मा गाँधी जी के चर्चा होइस हे - 


(11) एक के महातम

एक्के गाँधी के मारे, हड़बड़ा गइन फिरंगी।

एक्के झाँसी के रानी हर, जौंहर मता दे रहिस संगी।।

एक्के नेहरु के मानँय तो, दुनिया के हो जाय भलाई।

का कर सकिही हमर एक हर ?अइसन कभू कहो झन भाई।

जउन "एक" ला  हीनत रहिथौ, तउन "एक" के सुनो बड़ाई।।

आजादी ला पाए बर कतको नेता मन प्राण गँवाइन, अघात कष्ट सहिन। ये आजादी बड़ कीमती हे। इही भाव आधारित ये कविता के कुछ अंश देखव - 

(12) "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय"

फाँसी मा झूलिस भगत सिंह

होमिस परान नेता सुभाष।

अउ गाँधी बबा अघात कष्ट 

सहि-सहि के पाइस सरगवास।।

कतकोन बहादुर मरिन-मिटिन

तब ये सुराज ला सकिन लाय। 

बहुजन हिताय बहुजन सुखाय।।

ये कविता मा सत्य-अहिंसा के संदेश के संगेसंग भारत भुइयाँ ला गौतम अउ गाँधी के कर्म-भूमि निरूपित करे गेहे -

(13) वो  भुइयाँ  हिन्दुस्तान आय 

लाही जग-मा सुख शांति यही,कर सत्य-अहिंसा के प्रचार।

अऊ आत्म-ज्ञान,विज्ञान सिखों के देही सब ला यही तार।।

गौतम-गाँधी के कर्म भूमि , जग के गुरु यही महान आय।

वो  भुइयाँ  हिन्दुस्तान आय ।।


गुलामी का जमाना मा राष्ट्र प्रेम के बात करे के मनाही रहिस। वो जमाना मा दलित जी इस्कुल के लइका मन के टोली बनाके छत्तीसगढ़ी भाषा मा राऊत नाचा के दोहा के माध्यम ले गाँव गाँव मा जाके गाँधी जी के विचार बगरावत ग्रामीण मन मा राष्ट्र प्रेम के भावना भरत रहिन। ये काम आजादी के बाद घलो जारी रखिन। छत्तीसगढ़ी के राऊत नाचा के दोहा छन्द शास्त्र के दोहा विधान ले अलग होथे अउ सरसी छन्द जइसे होथे फेर बोलचाल मा दोहा कहे जाथे - 

(14) "राऊत नाचा के दोहा"

गाँधी-बबा देवाइस भैया  , हमला  सुखद सुराज।

ओकर मारग में हम सबला ,चलना चाही आज।।


(15) "राऊत नाचा के दोहा"


गाँधी जी के छापा संगी, ददा बिसाइस आज।

भारत माता के पूजा-तैं, कर ररूहा महाराज।।


(16) "राऊत नाचा के दोहा"


गोवध - बंदी  सुनके  भैया, छेरी बपुरी रोय।

मोला कोन बचाही बापू, तोर बिन आफत होय।।


(17) "राऊत नाचा के दोहा"

गाँधी जी के छेरी भैया, में में में नरियाय रे।

एखर दूध ला पी के संगी बुढ़वा जवान हो जाये रे।।

दलित जी के लोकप्रिय गीत छन्नर छन्नर पैरी बाजे, खन्नर खन्नर चूरी, उनकर धान लुवाई कविता के एक हिस्सा आय। सार छन्द आधारित यहू कविता मा गाँधी बबा के सुरता करे गेहे - 

(18) "धान लुवाई"

रहय न पावय इहाँ करलई,रोना अउर कलपना।

सपनाए बस रहिस इहिच,बापू- हर सुन्दर सपना।।


सुआ गीत, छत्तीसगढ़ के लोकगीत आय। एकर लोकधुन मा घलो दलित जी राष्ट्र-प्रेम अउ भाईचारा के संदेश देवत गाँधी जी ला स्मरण करिन हें - 


(19) "तरि नारि नाना"


भाई संग लड़ना कुरान हर सिखाथे ?

कि भाई संग लड़ना भगवान हर सिखाथे ?

मिल के रहव जी, छोड़व लेड़गाई

जीयत भर तुम्मन-ला गाँधी समझाइस।

अउ जीयत भर तुम्मन ला नेहरू मनाइस।।


"पढ़इया प्रौढ़ मन खातिर" रचना एक लंबा रचना आय जेला चौपाई छन्द मा लिखे गेहे। आजादी के तुरंत बाद दलित जी अपन संगी गुरुजी मन के साथ आसपास के गाँव मा प्रौढ़ शिक्षा के कक्षा लगावत रहिन। उनकर अधिकांश रचना मा गाँधी जी के जिक्र होए हे - 


(20) "पढ़इया प्रौढ़ मन खातिर"


बने रहव झन भेंड़वा-बोकरा।

यही सिखाइस गाँधी डोकरा।।

वो अवतार धरिस हमरे बर।

जप तप त्याग करिस हमरे बर।।


(21) "दोहा"


गाँधी जी के जोर मा, पाए हवन सुराज।

वोकर बुध ला मान के, चलना चाही आज।।


दलित जी कभू श्रृंगार रस के कविता नइ गढ़िन। उँकर रचना मा प्रकृति चित्रण, देश अउ समाज निर्माण, सरकारी योजना के समर्थन अउ सामाजिक बुराई मिटाए बर जागरण के बात रहिस। मद्य निषेध कविता ला मध्यप्रदेश शासन के प्रथम पुरस्कार मिले रहिस। यहू काफी लंबा रचना हे। अइसन रचना मन मा घलो गाँधी जी के उल्लेख होइस हे - 


(22) "मद्य-निषेध"


काम बूता कुछु काहीं, तेमा मन ला लगाहीं

जर-जेवर बनाहीं, धोती लुगरा बिसाहीं वो

मनखे बनहीं, अब मनखे साहीं, खूब

मउज उड़ाहीं, गाँधी जी के गुन गाहीं वो।।


(23) "पियइया मन खातिर"


मँद पीए बर बिरजिस गाँधी महाराज जउन लाइन सुराज।

ओकर रसदा ला तज के तँय, झन रेंग आज, झन रेंग आज।।

का ये ही बुध मा स्वतंत्र भारत के राजा कहलाहू तुम ?

का ये ही बुध मा बापू जी के, राम-राज ला लाहू तुम ?


आजादी के बाद देश के नवा निर्माण होइस। सब झन भारत ला बैकुंठ साहीं बनाये के सपना सँजोये रहिन। अइसने एक कविता मा गाँधी जी ला देखव - 


(24) "भारत ला बैकुंठ बनाबो"


अवतारी गाँधी जी आइन

जप-तप करिन सुराज देवाइन

हमर देश ला हमर बनाइन

सुग्घर रसदा घलो देखाइन।

उँकरे मारग ला अपनाबो।

भारत ला बैकुंठ बनाबो।।


दलित जी रवींद्रनाथ टैगोर, लोकमान्य गंगाधर तिलक, जवाहर लाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, विनोबा भावे जइसे अनेक महापुरुष ऊपर घलो कविता गढ़िन हें। तिलक के कविता मा घलो गाँधी जी के उल्लेख होइस है - 


(25) "भगवान तिलक"


बापू जी जेकर चेला।

श्रद्धांजलि अर्पित हे तेला।।


दलित जी के रचना मन मा गाँधी के विचार के संगेसंग दीगर महापुरुष जइसे संत विनोबा के भूदान यज्ञ असन आंदोलन के उल्लेख दीखथे - 


(26) "हम सुग्घर गाँव बनाबो"


गाँधी बबा बताइस रसदा, तेमा रेंगत जाबो।

संत विनोबा के भूदान-यज्ञ ला सफल बनाबो।


देश के विकास मा छुआ-छूत सब ले बड़े बाधा आय। ये कविता काफी लंबा हे, इहाँ घलो गाँधी जी के विचार देखे बर  मिलथे।1


(27) "हरिजन उद्धार"


गाँधी बबा सबो झन खातिर, लाए हवय सुराज।

ओकर प्रिय हरिजन मन ला, अपनाना परिही आज।।


देश मा किसान अउ मजूर के राज होना चाही, इही भाव के कविता आय सुराजी परब, कविता के कुछ अंश -


(28) "सुराजी परब"


घर-घर मा हो जाही सोना अउ चाँदी।

ए ही जुगत मा भिड़े हवै गाँधी।।

किसान मँजूर मन के राज होना चाही।

असली मा इँकरे सुराज होना चाही।।

गाँधी बबा ये ही करके देखाही।

फेर देख लेहू, कतिक मजा आही।।


.

ददरिया राग आधारित कविता बापू जी के दू डाँड़ - 


(29) "बापू जी"


बापू जी तोला सुमिरौं कई बार।

आज तोर बिना दीखथे जग अँधियार।।


किसान अउ मजूर मन ला जगाए खातिर लिखे कविता मा गाँधीवादी विचार देखव - 


(30) "जागव मजूर जागव किसान"


बम धर के सत्य अहिंसा के

गाँधी जी बिगुल बजाइस हे।

जा-जा के गाँव-गाँव घर-घर

वो जोगी अलख जगाइस हे।।


आही सुराज के गंगा हर

झन काम करव दुखदाता के।

जय बोलव गाँधी बाबा के

जय बोलव भारत माता के।।


गाँधी जी गृह उद्योग अउ कुटीर उद्योग के समर्थक रहिन। उनकर विचार ला जन-जन तक पहुँचाए बर दलित जी के घनाक्षरी के एक हिस्सा देखव - 


(31) "गाँधी के गोठ"


गाँधी जी के गोठ ला भुलावव झन भइया हो रे

हाथ के कूटे पीसे चाँउर दार आटा खाव।

ठेलहा बेरा मा खूब चरखा चलाव अउ

खादी बुनवा के पहिनत अउ ओढ़त जाव।।


अंग्रेज के राज मा उँकर सेना मा हिंदुस्तानी मन घलो रहिन। अइसन सिपाही मन ला गाँधी जी के रसदा मा चले बर सचेत करत कविता झन मार सिपाही के चार डाँड़ - 


(32) "झन मार सिपाही"


फेंक तहूँ करिया बाना ला, पहिन वस्त्र खादी के।

सत्याग्रह मा शामिल हो जा, चेला बन गाँधी के।।

तोर नाम हर सोना के अक्षर मा लिक्खे जाही

हम ला झन मार सिपाही।।


जनकवि कोदूराम "दलित" जी के छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी भाषा ऊपर समान अधिकार रहिस। अब उनकर हिन्दी के कविता देखव जेमा गाँधीवादी विचारधारा साफ-साफ दिखथे - 


"दलित जी के हिन्दी कविता के अंश जेमा महात्मा गाँधी के उल्लेख हे"


आजादी मिले के बाद देश के नेता मन लापरवाह अउ सुखवार होवत गिन, उँकरे ऊपर व्यंग्य आय ये कविता - 


(33) "तब के नेता-अब के नेता"


तब के नेता को हम माने |

अब के नेता को पहिचाने ||

बापू का मारग अपनावें |

गिरे जनों को ऊपर लावें ||


महात्मा गाँधी के महातम बतावत कविता विश्व वंद्य बापू, दोहा अउ चौपाई छन्द मा लिखे गेहे - 


 (34) विश्व वंद्य बापू

दोहा

जय-जय अमर शहीद जय, सुख-सुराज-तरु-मूल।

तुम्हें  चढ़ाते  आज हम , श्रद्धा  के  दो फूल।।

उद्धारक माँ - हिंद के, जन - नायक, सुख-धाम।

विश्व वंद्य बापू तुम्हें , शत् -शत् बार प्रणाम।।


चौपाई

जय जय राष्ट्र पिता अवतारी।जय निज मातृभूमि–भय हारी।।

जय-जय सत्य अहिंसा -धारी। विश्व-प्रेम के   परम पुजारी।।

जय टैगोर- तिलक अनुगामी।जय हरि-जन सेवक निष्कामी।।

जय-जय कृष्ण भवन अधिवासी। जय महान , जय सद्गुण राशी।।

जय-जय भारत भाग्य-विधाता। जय चरखाधर,जन दुख: त्राता।।

जय गीता-कुरान –अनुरागी। जय संयमी ,तपस्वी, त्यागी।।

जय स्वातंत्र्य -समर -सेनानी। छोड़ गये निज अमर कहानी।।

किया देश हित जप-तप अनशन। दिया ज्ञान नूतन , नव जीवन।।

तुमने घर-घर अलख जगाया। कर दी दूर दानवी  माया।।

बापू एक बार  फिर आओ। राम राज्य भारत में लाओ।।

अनाचार - अज्ञान मिटाओ। भारत भू को स्वर्ग बनाओ।।

बिलख रही अति  भारत माता। दुखियों का दु:ख सुना न जाता।।

दोहा

दीन-दलित नित कर रहे, देखो करुण पुकार।

आओ मोहन हिंद में  , फिर लेकर अवतार।।

विश्व विभूति, विनम्र वर,अति उदार मतिमान।

नवयुग - निरमाता, विमल, समदरशी भगवान।।


मादक पदार्थ के त्याग करे बर निवेदन करत ये कविता के कुछ पद देखव - 

(35) "स्वतंत्र भारत के राजा" 

बापू के वचनों को न भूल

मादक पदार्थ मतकर  सेवन।

निर्माण कार्य में जुट जा तू

बन सुजन, छोड़ यह पागलपन।।


सुराजी परब के बेरा मा गाँधी अउ संगी महापुरुष ला सुरता करत ये कविता मन के कुछ डाँड़ - 

(36) "पंद्रह अगस्त"

आज जनता हिन्द की, मन में नहीं फूली समाती

आज तिलक सुभाष गाँधी के सुमंगल गान गाती।

(37) "पंद्रह अगस्त फिर आया"

जिस दिन हम आजाद हुए थे

जिस दिन हम आबाद हुए थे

जिस दिन बापू के प्रताप से 

सबल शत्रु बरबाद हुए थे

जिस दिन घर घर आनंद छाया।

वह पंद्रह अगस्त फिर आया।।

(38)  आठवाँ पन्द्रह अगस्त

इसी रोज बापू के जप तप ने आजादी लाई थी।

इसी रोज नव राष्ट्र ध्वजा, नव भारत में लहराई थी।

बापू के पद चिन्हों पर चलना न भुलावें आजीवन।

आज आठवीं बार पुनः आया पंद्रह अगस्त पावन।।

(39) "स्वाधीनता अमर हो"

हम आज एक होवें। कुल भेदभाव खोवें।।

बापू का मार्ग धारें। सबका भला विचारें।।


बापूजी के महिमा के बखान ये चरगोड़िया मा देखव - 

(40) "मुक्तक (चरगोड़िया) छत्तीसगढ़ी"

बापू हर  हमर सियान आय।

बापू हर हमर महान आय।

अवतरे रहिस हमरे खातिर।

बापू हमर भगवान आय।।


ये मुक्तक मा आजादी के बाद के हकीकत ला देखव - 

(41) "मुक्तक (चरगोड़िया) छत्तीसगढ़ी"

बबा मोर गाँधी, ददा धर्माधिकारी।

चचा मोर नेहरू अउ भारत महतारी।

कथंय मोला - "तँय तो अब बनगे हस राजा",

पर दुःख हे, के मँय ह बने-च हँव भिखारी।


कविता के ये चार डाँड़ , बापू के सीख के सुरता देवावत हें - 

(42) "राह उन्हीं की चलते जावें" -

बापू जी की सीख न भूलें

सदा सभी को गले लगावें

सत्य अहिंसा और शांति का

जन-जन को हम पाठ पढ़ावें।


गाँधी जी के सहकारिता के समर्थन करत घनाक्षरी छन्द के अंश देखव - 

(43) सिर्फ नाम रह जाना है -

सहकारिता से लिया गाँधी ने स्वराज्य आज

जिसके सुयश को तमाम ने बखाना है।

उसी सहकारिता को हमें अपनाना है औ

अनहोना काम सिद्ध करके दिखाना है।।


कविता के इन डाँड़ मा लोकतंत्र ला बापू के जिनगी भर के कमाई बताए गेहे - 

(44) हो अमर हिन्द का लोकतंत्र-

जो बापू की अमर देन

जो सत्य अहिंसा का प्रतिफल

उपहार कठिन बलिदानों का 

जिसका स्वर्णिम इतिहास विमल

परम पूज्य बापू जी के जीवन

भर की यही कमाई है

नव उमंग उल्लास लिए

छब्बीस जनवरी आई है।


दलित जी के बाल-साहित्य मा नीतिपरक रचना के संगेसंग राष्ट्रीय भाव ला जगाए के आह्वान घलो मिलथे - 

(45) बच्चों से -

अब परम पूज्य बापू जी का

है राम राज्य तुमको लाना 

उनके अपूर्ण कार्यों को भ

है पूरा करके दिखलाना।


गाँधीवादी कवि कोदूराम "दलित" गाँधी जी ला अवतार मानत रहिन - 

(46) बापू ने अवतार लिया - 

भारत माता अति त्रस्त हुई

गोरों ने अत्याचार किया।

दुखिया माँ का दुख हरने को

बापू जी ने अवतार लिया।।

पद-चिन्हों पर चल कर उनके

हम जन-जन का उद्धार करें।

अब एक सूत्र में बँध जाएँ

भारत का बेड़ा पार करें।।


गो वध के संदर्भ मा कविताई करत दलित जी ला गाँधी जी के सुरता आइस - 

(47) "गोवध बन्द करो"

समझाया ऋषि दयानन्द ने गो वध भारी पातक है

समझाया बापू ने गो वध राम-राज्य का घातक है।


जनकवि कोदूराम "दलित" जी के कविता "काला" अपन समय के बहुते प्रसिद्ध कविता रहिस ओकरे दू डाँड़ देखव - 

(48) "काला"

काला ही था रचने वाला पावन गीता।

बिन खट-पट के काले ने गोरे को जीता।।


नीतिपरक ये कविता मा बताए गेहे कि बापू के मार्ग मा चले ले हर समस्या के समाधान होथे - 

(49) "होता है उसका सम्मान"

बापू के मारग पर चल,

करें समस्याएँ अब हल।


वह मोहन और यह मोहन कविता मा "वह मोहन" माने कृष्ण भगवान अउ "यह मोहन" माने मोहनदास करमचंद गाँधी के कर्म अउ चरित्र के समानता बताए गेहे। यहू बहुत लंबा कविता आय। इहाँ कुछ पद प्रस्तुत करत हँव - 

(50) "वह मोहन और यह मोहन"

वह मोहन था कला-काला

यह मुट्ठी भर हड्डी वाला।।

कारागृह में वह आया था।

कालागृह इसको भाया था।।

उसका गीता-ज्ञान प्रबल था।

सत्य-अहिंसा इसका बल था।।

दोनों में है समता भारी।

दोनों कहलाते हैं अवतारी।।

इनके मारग को अपनाएँ।

लोकतंत्र को सफल बनाएँ।।


ये आलेख एक शोध-पत्र असन होगे। जब बाबूजी के गाँधी जी के उल्लेख वाला कविता खोजना चालू करेंव तब अधिकांश कविता बापू के उल्लेख वाला मिलिस। पचास कविता के उदाहरण खोजे के बाद मँय थक गेंव। मोर जानकारी मा छत्तीसगढ़ी मा अइसन दूसर कवि अभिन ले नइ दिखिस हे जिनकर अतका ज्यादा रचना मा गाँधी बबा के उल्लेख होइस हे। आपमन के नजर मा अइसन कोनो दूसर कवि हो तो जरूर बतावव। 

बहुत पहिली छत्तीसगढ़ के विद्वान साहित्यकार हरि ठाकुर जी, जनकवि कोदूराम "दलित" ऊपर एक आलेख लिखे रहिन जेकर शीर्षक दे रहिन - गाँधीवादी विचारधारा के छत्तीसगढ़ी कवि - कोदूराम "दलित"। आज मोला समझ में आइस कि हरिठाकुर जी अइसन शीर्षक काबर दे रहिन। 

महात्मा गाँधी के 155 वाँ जनम दिन बर ए आलेख ले सुग्घर अउ का लिख सकत रहेंव ? मोला विश्वास हे कि छत्तीसगढ़िया पाठक मन ला ये आलेख जरूर पसंद आही।


आलेख के लेखक - अरुण कुमार निगम

सुपुत्र श्री कोदूराम "दलित"

आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

कोख खोजत गांधी

 कोख खोजत गांधी 

मोर देश के हालत बहुतेच खराब हे , एक घाँव कइसनो करके भारत म फेर जनम धरन दव , आंदोलन निपटाके तुरते लहुँट जहूँ .... गांधी जी हा सरग म गोहनावत रहय । चित्रगुप्त किथे - उहाँ अवइया हजारों बछर तक , कोख के एडवांस बुकिंग चलत हे , कन्हो खाली निये , काकरेच कोरा म डारँव । ब्रम्हाजी समाधान निकालत किहिन - गांधी जी धरती म जाही माने धरती के भला होही , एला अपन मन मुताबिक कोख पसंद करन देवव , बाकी ला में बना लुहूँ । गांधी जी खुश होके धरती म पहुँचगे , उचित कोख के तलाश म ।

रेंगत रेंगत एक जगा ठोठकके गांधीजी सोंचे लगिस .. येदे घर हा बड़े जिनीस मनखे के आय कस लागत हे । आंदोलन बर पइसा के आवश्यकता परथे , येकरे घर जगा मिल जतिस ते बने होतिस , काकरो तिर स्वतंत्रता आंदोलन कस , हाथ लमाये बर नइ परतिस । बनइया महतारी ला गांधी जी पूछे लागिस - दई ! तोर कोख म आना चाहत हँव जगा देबे का या ? दई पूछिस - तैं कोन अस बेटा ? गांधीजी जवाब दिस .. गांधी अँव दई । दई फेर पचारिस - कोन गांधी ? गांधी किथे - ये देश म आजादी लनइया गांधी अँव दई । दई किथे - हमर देश तो अभू आजाद हे बेटा , तैं इहाँ आके काये करबे ? अऊ मोरे तिर काबर आहूँ कहिथस बेटा । गांधी बतइस - में तोर दुख दूर कर दूहूँ दई । गरीब मजदूर मन ला मुड़ी उचाके जीना सिखा दुहूँ । दई किथे - मोला कहीं दुख निये बेटा । तोर ददा के अतेक अकन कारोबार हे , अतका पइसा , नौकर चाकर हे , मोला काके दुख । तें फोकट झिन आ । बलकि तैं जब मोर कोख म आबे त दुख हमर घर म , उही बेरा ले खुसर जही । गांधी अवाक होके पूछथे - कइसे दई ? दई किथे - तैं आबे तहन हमर अतेक बड़ कारोबार ल सम्हाले छोंड़ , गरीब मजदूर मन ला हक देवाये बर , हमरे खिलाफ भड़काबे , जगा जगा आंदोलन चलाबे , हमरे पइसा उड़ाबे , हमीं ल बरबाद करबे । सही सही टेक्स पटाबे , हमर पुरखा के कमाये चीज बस ला फोकटे फोकट एला वोला बाँटबे , तहन तैं तो चैन के नींद सुत जबे , तोर ददा के का होही , चार दिन के जिअइया तोर बबा हा दूये दिन म ढलंग दिही , तैं दूसर कोख देख ले बेटा । 

गांधी सोंचत रेंगत रहय .. बड़े जिनीस कारोबारी घर जनम धरे म सहीच म ,कहूँ ओकर कारोबार म फंदागेंव त वाजिम म मोर जनम धरे के मकसद पूरा नइ हो पाही ... भगवान मोला बचा लिस । येदे घर थोकिन छोटे कारोबारी वाला आय .. इँहें देखथंव । दई देख के गांधी पूछे लागिस - दई तोर कोख म जगा देबे का या ? मय गांधी अँव दई ,तोर जम्मो दुख के निवारन कर देहूँ । दई किथे - रहा बेटा , तोर ददा ल पूछन दे , तंहँले बतावत हँव । थोरिक बेर म भितरि डहर ले निकलके दई किथे - मोर कुछ सवाल के जवाब दे ,तभे बता पाहूँ बेटा । गांधी किथे - पूछ न दई पूछ । दई किहिस - तोर ददा पूछत हे , हमरे असन ,जनता ला मिलावटी अऊ नकली माल बेंच सकबे का ? गांधी हा निही किहिस । दई फेर पूछिस - झूठ गोठिया बता के टेक्स बचा सकबे का ? गांधी निही कहत ... मुड़ी डोलइस । दई फेर पचारिस - पुलुस ले अपन ददा ला बचाबे का ? गांधी किथे - में गांधी अँव दई , मोर से अइसन उम्मीद काबर । दई किथे - बने करे बेटा , आये के पहिली पूछ ले , में तोर पाँव परत हँव , तैं दूसर कोख देख ले । 

गांधी मने मन सोंचत रहय ..बैपारी मन मोर ले नराज हें कस लागथे । अंग्रेज मन बैपार करे बर इहाँ आय रिहिन ,उही मन ला भगा देन , त ओकर संगवारी मन के नराज होना वाजिब आय । कन्हो बात नइये .. एक बेर में जनम तो धर लँव .. जम्मो ठीक हो जही । बड़े अधिकारी के बंगला म खुसरके दई देखके पूछिस - तोर कोख म आहूँ या .. जगा देबे का .. ? मय गांधी अँव गांधी । दई सवाल उठइस - तैं काये करबे बेटा ? ये देश म अभू कहींच समस्या निये । अऊ जे हाबे , तेकर बर हमर साहेब हे न । बड़का ले बड़का समस्या ल चुटकी म निपटा देवत हे । तोर आवश्यकता निये । तैं आबे , ईमानदारी जताबे , करिया धन सकेले बर मना करबे , भ्रष्टाचार करन नइ देबे , त देश म समस्या अऊ कतको गुना बाढ़ जही । अऊ हमरे कस हो जबे अऊ करिया धन कमा कमा के बिदेश म बनाये कोठी म भरबे , तब इही चक्कर म परेशान होवत रहिबे । तोर आय ले कहूँ हमीं मन बदल गेन , त हमन परेशान रहिबो , हमरे सुख ला गरहन तिर दिही । नानुक फरिया पहिर के , गमछा लपेट के देंहे देखावत किंजरबे तब तोला कोन हाँसही , हमन ल हाँसही , हमरे घर आके हमरे नोनी मन के कमती कपड़ा पहिरे के अधिकार  ल नंगाबे । तेकर ले , कन्हो दूसर दरवाजा देख ले बेटा । 

गांधी सोंचिस ... बड़का साहेब मन समस्या विहीन हे । नानमुन कर्मचारी के घर खुसरहूँ , उही मन रात दिन समस्याग्रस्त रहिथें । पूछतेच साठ दई केहे लागिस - सरकार हमन ला , अतेक तनखा नइ देवय बेटा के , तोर जइसे बड़े आदमी ला पढ़ा लिखा पाल पोस सकन । गांधी किथे - दई .. मय देश के बेवस्था सुधारे बर आहँव .. पढ़हे लिखे खाये पिये बर निही । दई पूछथे - बिन खाये पिये ,बिन पढ़हे लिखे का कर डारबे ? हमर ताकत , तोला सरकारी स्कूल म पढ़हाये के हे , जिंहा न कहींच सीख सकस , न जान सकस , त कायेच आंदोलन खड़ा कर सकबे । प्राइवेट स्कूल म भरती करे बर पइसा कतिहाँ ले आही  ? अपन पेट ला कतेक काटबो ? हम तो दई ददा आवन , तोर खातिर यहू ला कर लेतेन फेर तोर अऊ दूसर भाई बहिनी मन का खाही अऊ काये पहिरही ? दू चार पइसा एती वोती ले कमातेन , तहू ल तैं नइ कमावन देबे , तब तोर डोकरी दई के दवई कइसे आही । तैं दूसर दुवारी देख , जिंहा तोर शिक्षा दीछा बने होये ,अऊ आंदोलन चला सकस ।  

गांधी रेंगत रेंगत सोंचत रहय .. इहाँ के मनखे मन कतेक समझदार होगे हे , दई बपरी हा ठीके कहत हे .. कस लागथे । महल कस खइरपा हा फेर ललचा दिस गांधी के मन ला । शुरू के अनुभौ के सेती झिझकिस घला , फेर अपन काम बर धन के समस्या के सुरता आतेच भार खुसरगे । पहिली सोंचिस ..  बिन पूछे खुसरहूँ .., पूछथँव त मना कर देथे । फेर मन नइ मानिस , पूछ पारिस - दई तोर कोख म आतेंव का या ? दई किथे - तैं मंगइया गांधी अस का बेटा । हमन सरी दुनिया ल चंदा बाँटथन , तैं एती वोती चंदा मांगत किंजरके , हमन ल बदनामी देबे । तोर ददा ला ठेकेदारी के नावा नावा तरीका सिखाबे , घर बनाबे ते टूटही निही , सड़क बनाबे तेमा खँचका नइ परही , बांध बनाबे ते बोहाही निही । अतका ईमानदारी देखाबे त एके बछर म हमर घर टूट जही , हमी मन सड़क म आ जबो । हमन बेंचा जबो  त तोर बर काये बचा पाबो .. तैं कृपा कर , दूसर गर्भ देख ले बेटा । 

गांधी सोंचे लागिस ... देश म कानून बेवस्था ठीक रहितिस  त समस्या अइसने खतम हो जतिस । न्यावधीश के घर खुसरगे । दई ला पूछिस - दई मोला जनम देबे का या ? दई किथे - हव बेटा तोला खत्ता म जनम देहूँ फेर ..। गांधी ल पहिली बेर कन्हो हव किहिस .. वो खुश होतिस तेकर पहिली फेर शब्द हा ओकर माथ ल ठनका दिस । गांधी पूछथे - फेर काये दई ? दई बतइस - अइसे कन्हो दिन नइ होय , जब तोर ददा ला , कन्हो नइ धमकाये या पइसा के लालच नइ देवय । तैं धमकी सुन नइ सकस , पइसा लेवन नइ देवस । तोर ददा हा , न्याव करथे त सरग के रसता खुल जथे । जमीर बेचथे त , धरती म सरग बन जथे । तैं धरम के  न्याव के रद्दा म रेंगइया अस , जेला पहिली जनम म घला सिर्फ ओकरेच सेती , मार दे गे रिहिस । एक घाँव फेर कन्हो महतारी के कोरा सुन्ना झिन होय , कन्हो सोहागन के मांग झिन उजरे , तैं मोर कोरा म झिन आ बेटा । अपन जान म खेल के ,न्याव के रद्दा अख्तियार करी लेबोन , तब देश चलइया , शायदे कनहों मनखे  जेल के बाहिर रहीं , तब ये देश ल कोन चलाही ? तैं अकेल्ला चला डरबे ? तोर ईमान ल घरिया अऊ मोर गर्भ म खुसर या मोर गर्भ के रसता छोंड़ अऊ दूसर बर रसता बना । कलेचुप निकलगे गांधी जी । 

गांधी सोंचे लगिस .... मोर सोंचना गलत हे का ? एकर माने देश के बेवस्था के गड़बड़झाला के पाछू कन्हो अऊ हे । ठीक हे .. महूँ गांधी अँव .. हार नइ मानो । पुलुस के घर जनम धरहूँ , इँहे पता चलही , कोन धमकाथे । दरोगिन महतारी देख गांधी पूछे लगिस - दई .. में गांधी अँव .. तोर कोरा म जनम धरतेंव या ... .तोर आज्ञा होतिस ते ? दई किथे - वा ... अतेक बड़ मनखे , कहूँ बने घर नइ देखते बेटा । तोला जनम दे मा , कते महतारी गरब के अनुभौ नइ करही । गांधी किथे - दई , में भ्रस्टाचार , अत्याचार अऊ व्यभिचार ल मेटाये करे बर आये हँव या । मनखे मन कतेक ससता म बिकत जावत हे , ऊँकर असली किम्मत बताये बर आये हँव । जमाखोरी  हरामखोरी अऊ नशाखोरी ल जर ले मेटाये बर आय हँव । दई किथे - वा .... तोर ददा घला अइसनेच सोंचथे बेटा । वाह .. मोर तलाश पूरा होगे कस लागत हे .. गांधी मने मन खुश होवत केहे लागिस - त में खुसरत हँव दई । दई किथे - गोठ बात ला पूरा होवन दे तहन आबेच निही गा । फेर तोर कस मनखे ला ये देश म , लुकाके रेहे बर परही । गांधी पूछिस - काबर दई ? मय कन्हो अपराधी थोरेन अँव । दई बतइस - बेटा तैं अपराध करबे तभे तोर नाव उजागर होही । गांधी पूछथे - त अइसनेहे  कन्हो नाव कमाही या ? अइसन मनला धर के जेल म नइ डारे का हमर ददा हा । दई बतइस - इहीच मन ल संरक्षण देना ,ऊँकर बूता अऊ कर्तव्य आय । गांधी मुहुँ ला फार दिस .. का .....। दई किथे - तिहीं अभीच्चे केहेस ना के मनखे ल ओकर सही किम्मत पहिचाने बर आना चाही । तोर ददा एमन ले अपन सही किम्मत वसूलथे । गांधी किथे - ये तो गलत हे दई । गांधी के जवाब सुन दरोगिन तरमराके भड़कगे अऊ केहे लगिस - का गलत अऊ का सही , तेला तेहा सिखाबे रे .... निकल मोर दरवाजा ले , निही ते अभीच्चे अंदर करा दूहूँ । 

गांधी जी मने मन बिचारे लगिस ..... बुरई के जर कहूँ अऊ हे तइसे लागथे । ध्यान अइस बीते जनम के संगवारी अऊ उँकर लइका मन के । गांधी जइसे पहुँचिस .. दई घोलंड के ओकर पाँव परिस । गांधी सोंचिस .. अब पहुँचेंव सही जगा म कस लागत हे । खुशी के मारे पूछिस - दई .. मोला तोर बेटा के रूप म जनम देबे का या ? दई खुश होके किथे - गांधी मोर संतान बने एकर ले बढ़के , मोर बर का हो सकत हे । तोरे कारन तोर बबा , कतका बछर ले राज करिस । तोरे कारन तोर बाबू आज भी राज करथे । तोरे नाव के सेती ,सात निही सत्तर पीढ़ही बर , धन दोगानी जमा कर डरे हाबन । चाहे हम पक्ष म रहन या बिपक्ष म , तोर नाव ले कतको असम्भव बूता छिन म हो जथे । हम चारा खाथन तभो नइ पकड़ावन । तोप खाथन तभो नइ उड़ावन । कोइला खाथन तभो मुहूँ नइ करियाये । स्प्रेक्ट्रम खाथन तभो नेटवर्क बने रहिथे , जम्मो तोरे नाव के प्रभाव आय । ते हमर हथियार अस बेटा , लघियाँत खुसर , तोर ददा एक ठिन घोटाला म फँसे हे , सेट नइ होवत हे , ते आबे त यहू ठीक हो जहि , तंहँले तोर ददा के खुरसी अऊ सत्ता तोरेच ताय , हमर काय ..आज के रेहे काली के गे । खुरसी अऊ सत्ता के नाव ले गांधीजी के पोटा काँपगे । आजादी के पहिली घला अइसनेच लालच देखइन फेर सत्ता सम्हाले के दिन , गली गली भटके बर छोंड़ दिन । गांधी किथे - में सत्ता पाये बर , खुरसी म गोड़ मढ़हाये बर नइ आवथँव , भ्रष्ट मनला जेल म डरवाये बर आवत हँव । दई किथे - तैं सत्ता पाये बर नइ आवथस त मोर कोख म काये करे बर जनम धरबे । सत्ताधारी के लइका सत्ताधारी नइ बनही त ओला ओकर घर जनमना नइ चाही । समे के पहिली बता दे ठीक करे ,तोर जइसे बेटा पाये के सपना देखे रेहेंव फेर तें मोर आँखी उघार देस । हमर उन्नति बर तोर नावेच काफी हे , तैं कन्हो जनता के घर जा , उँहे तोर आवश्यकता हे । दई अपन गर्भ के मुहूँ ल तोप दिस । 

हार खावत सोंचत हे गांधी हा ... जनता के घर जाहूँ अऊ कहूँ उहू मना कर दिही तब । सरग म कइसे मुहूँ देखाहूँ ? आखिरी प्रयास करीच लेथँव । दई ला पूछिस - में गांधी अँव .. तोर कोख म जनम धरतेंव या ? दई किथे - आ बेटा आ , पहिली बेर मोला पूछ के आवत हे मोर संतान हा , निही ते जेकर जब मरजी होथे चले आथे , हमन रोके के कतको उपाय करथन तभो । गांधी पूछथे - का ... ? दई बतइस - हाँ बेटा , सरकारी अस्पताल म परिवार नियोजन करवाथन तभो साल दर साल खसखस ले लइका बिया डरथन । प्राइवेट म कन्हो गर्भ निकालथें ,कन्हो किडनी तेकर सेती उहाँ जाये के हिम्मत नइ होय । फेर तेंहा मोर घर आके काये करबे तेमा ? गांधी बतइस - अमीरी अऊ गरीबी के बीच के खँचका ल पाटे बर आथँव दई । दई किथे - तब ते कुछू नइ कर सकस बेटा । ये खँचका हमर लाश म पटाथे ,तहूँ लास बन जबे तब हमर कष्ट ला कब मेटाबे । मोर पहिलीच ले अतका औलाद हे जेला पोसे पाले बर ,कतका पापड़ बेलथँव तेला मिहीं जानहूँ । तोर इंतजाम कइसे होही ? तैं ठहरे बड़े आदमी । बड़े मन संग तोर दोस्ती । गरीबी भुखमरी अऊ लचारी मन हमर संगे संग रहिथे , इँकर म वो ताकत निये जे तोला खड़ा कर सकय । हमरे कस तहूँ गुमनामी म झिन सिरा जास .. डर लगथे । तोर आये के बड़ खुशी हे बेटा .. फेर तोर जनम के खुशी मनाना तो दूर .. तोला बिहिनिया बियाहूँ .. संझा तोर दूध बर .. कमाये बर जाहूँ । तोला बियाना मतलब केवल नाव कमाना हे बेटा । तोर नाव ले जनता के पेट नइ भरय । में कमाहूँ तभे मोर रंधनी खोली ले कोहरा निकलही , तब तोर हाथ ले कऊँरा उठही । तोर कस कपड़ा पहिर के तोर नाव ले खवइया बहुत नंगरा देखे हन हमन । तोर बर खाये के लानहूँ तब , तोर नाव ले यहू मन खावतहे कहिके .. कन्हो बदनाम झिन करय । यदि ते सहींच के गांधी होबे तब तोला जनता के बेटा आस कहिके , तोर अगुवाई ल कोन स्वीकारही ? ओकर सेती तोला मय अपन गर्भ म धारन जरूर करिहँव  फेर उहाँ ले बाहिर नइ आवन दँव । अपन भीतर गांधीपन के अहसास करत जी लेहूँ । गांधी पूछिस - जनम धरके बाहिर नइ आहूँ तब तोर तकलीफ ला कइसे मेटाहूँ ? दई किथे - सच बताँवव बेटा , तोर पहिली कतको झिन गांधी बनके , मोर गर्भ म अइन फेर बाहिर आके नाथू बन गिन । घेरी बेरी गांधी बन के आथे , सपना देखाथें फेर खुदे सपना हो जथें । हमन मुहूँ फार के ताकथन ,वो लात मार के निकल जथे । वो भुला जथे हमन ला जब पंचइत अऊ संसद के देहरी म पहुँच जथे । में नइ चाहँव , तहूँ बाहिर आ , पंचइत अऊ संसद के हिस्सा बन अऊ भुला जा हमन ला । मोर शर्त मंजूर हे त मोर गर्भ के दरवाजा तोर बर खुल्ला हे , तैं खुसर .. । में तुरते अपन गर्भ के मुहूँ ल अइसे चमचम ले मूंदहूँ के तोला मोर ले कन्हो अलग झिन करे सकय । डर्रागे गांधी जी हा अऊ पल्ला भागिस ..... । एक कोती दई समझिस के गांधी आना नइ चाहत हे अऊ दूसर कोती गांधी जान डरिस के जनता हा गांधी ला बियाना नइ चाहत हे तेकर सेती रात दिन दुख म डूबे परे हे । 

पहिली बेर हताश अऊ निराश रिहिस गांधी जी हा । अभू ओहा गर्भ निही बल्कि शांति तलाशे लागिस । तभे आश्रम के फुलवारी म ,एक झिन दई बने लइक दिखगे । सोंचिस .. एक प्रयास अऊ ... । कलेचुप पिछू पिछू ओकर कुरिया म खुसरगे । जइसे मौका मिलिस .... बिगन पूछे गर्भ म खुसरगे । कुछ दिन पाछू .... दई ल जइसे पता चलिस के .. वोहा पेट म हे .. अब्बड़ेच रोये लगिस । पेट भितरी ले .. गांधीजी केहे लगिस - दई ... तैं झिन रो । में आगे हँव , तोर दुख ल मेटा देहूँ । दई पूछिस - तैं कोन अस बेटा ? गांधी किथे - मय गांधी अँव दई गांधी । दई किथे - तोर आयेच के तो दुख हे बेटा । तैं .... अवैध संतान अस गा । गांधी अवाक होके पूछिस .. अवैध कइसे दई । जे दाढ़ही वाला तोर तिर आथे , तउने मोर ददा आय का ? दई बतइस - जेला ते ददा कहत हस ,ओहा काकरो ददा मदा नोहे बेटा , सिर्फ आश्रम के मुखिया आय बेटा । ओ नइ चाहे के तैं जनम धर । ओहा तोर जनम ला स्वीकार नइ करय , तोला पेट भितरी म मार दिही बेटा । लुका छिपा के तोर रक्षा करिच डरहूँ तब बाहिर आय के पाछू , तोला तोर ददा के काय नाव देहूँ बेटा ? दई डेंहक डेंहक के रोय लगिस । अन्याय देख .... गांधी अपन रंग देखाना शुरू करिस अऊ केहे लगिस - चल थाना .. रिपोट करबो । पेट भितरी के मनखे ला मरइया , अइसन मन ला ,चैन ले जियन नइ देन । आँसू पोंछत दई किथे - का कर लेबो बेटा । दू चार दिन जेल म रहि , बाहिर आही , फेर कन्हो अबला के पेट ले खेलही । मोरे बदनामी होही ,ओकर काये बिगड़ही । इंसाफ के मिलत ले , तोर मोर पीढ़ी , दुनिया ले चल दे रइहि । एती दाढ़ही वाला जान डरिस के दई पेट म हे । उही रात , दई के भात म , दवई मिला के खवा दिस । पेट भीतरि .. गांधी जी छटपटाये लगिस .. पेट पीरा म दई रात भर तड़फिस । बिहिनिया ... जब दई ल होश अइस तब ... गांधी जी .. चौक म खड़े अपन पुतला म खुसरके सुसकत रिहिस । गांधी अब न सरग जा सकय .. न ओला कन्हो बियाये बर तियार । अभू घला ये शहर ले ओ शहर .. ये गाँव ले वो गाँव .. ये पारा ले वो पारा .. ये चौराहा ले वो चौराहा ... किंजरत हे .. कन्हो कोख म जगा पाये के उम्मीद म । 

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन .. छुरा

चलौ महात्मा गाँधी जी ल खोजन

 (प्रसंगवश)


 

चलौ महात्मा गाँधी जी ल खोजन


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प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आईंस्टीन हा कहे हे--"आने वाली नस्लें यह मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान भी धरती पर कभी आया था।"


       वोकर उद्गार सिरतो म कतका सच हे के हमर जइसे पीढ़ी जेन ह न तो स्वतंत्रता आंदोलन ल देखे हावन ,न तो राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ल,सिरिफ फोटू म देखे अउ किताब म पढ़े हावन वोला विश्वासे नइ होवय के ये घोर कलयुग म जिहाँ चारों कोती स्वार्थ,छल-छिद्र, हिंसा, झूठ-फरेब बगरे हे उहाँ 155 साल पहिली अहिंसा अउ करुणा के मूर्ति, सत्यवर्ती ,भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अजेय योद्धा, सच्चा समाज सेवक मोहनदास करमचंद गाँधी नाम के मनखे जनम लेये रहिसे।

इही बालक आगू चलके जगत वंद्य बापू कहाइस।

उन अइसे महापुरुष रहिसे के जेन काहय तेला अक्षरशः करके देखावय।जेकर मानना रहिसे के क्रोध ल क्रोध ले नहीं भलुक प्रेम ले बुझाये जा सकथे। हिंसा ल हिंसा ले नहीं बल्कि अहिंसा ले मिटाये जा सकथे।जेन ह आन ल कुछु शिक्षा देये के पहिली खुद अपनावय चाहे वो सत्याग्रह के बात होवय ,चाहे अहिंसा के बात होवय,चाहे उपवास, शाकाहार या प्राकृतिक चिकित्सा ल अपनाये के बात होवय।


     सच ह तो सच होथे ।सिरतो म  विश्व वंद्य अइसन हाड़-मास के पुतला, गाँधी जी के रूप म, हमर महतारी भुँइया भारत म जनम लेये रहिस हे। अक्सर अइसे देखे-सुने म आथे के मनखे के मूल्यांकन वोकर मरे के पाछू होथे फेर गाँधी जी तो अपन जीते जी संसार म बहुतेच प्रसिद्ध होगे रहिस हे। गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ह उन ल 'महात्मा' कहिके विभूषित करिन। ये शताब्दी म गाँधी जी जइसे सच्चा धार्मिक अउ करुणा ले भरे हिरदे के, दीन -दुखी, रोगी, कोढ़ी -अपाहिज के  निस्वार्थ सेवा करइया खोजे नइ मिलय।


         सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया-परोपकार, सेवा इही मन तो असली धर्म आयँ जे मन आदिकाल ले ये सृष्टि म सुखी समाज के अधार आँय तेकरे सेती कहे जाथे के सत्य धर्म हा सनातन अउ अजर- अमर होथे। अतका जरूर हे समे के गर्त म ये ह जब दबे असन हो जथे तब कोनो महान आत्मा ह अपन कर्म ले वो धुर्रा ल हटाके वोला पुन: स्थापित करे के काम करथे। पूज्य गाँधी जी वोइसने महान आत्मा रहिस जेकर एक आह्वान म लाखों नर नारी अपन सब-कुछ न्योछावर करके, आजादी के समर म कूदे बर तइयार राहयँ।वाणी म अइसन चमत्कारिक प्रभाव बिना कठोर साधना अउ संयम के नइ आ सकय।


       परम पूज्य बापू जी के जीवनी ल पढ़े ले पता चलथे के वोकर उपर उनकर धार्मिक स्वभाव के महतारी पुतलीबाई, मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथ नंदन श्रीराम, भक्त प्रहलाद अउ सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के संगे संग सदग्रंथ गीता के गहिर छाप परे रहिस। एकर परछो बापू के जम्मों कार्य म करे जा सकथे चाहे वो उनकर प्रिय भजन -वैष्णव जन तो तेणे कहिए-----,रघुपति राघव राजाराम ---,अछूतोद्धार, चरखा काँतना, मितव्ययता ,सर्व धर्म समभाव सहित ,आजादी के वोकर द्वारा चलाये गे सबो आंदोलन मा।


   संसार म गाँधी जी जइसे क्षीणकाय फकीर अउ कोनो नइ मिलय जेन अपन अहिंसा,असहयोग अउ सत्याग्रह के बल म देशवासी ल जगाके ,  बंदूक ,बम -बारूद वाले शक्तिशाली अत्याचारी, सम्राज्यवादी अँग्रेज मन ल पराजित कर दिस।


        गाँधी जी निष्काम अउ निस्वार्थ सेवा के जीता जागता उदाहरण रहिस। वो चाहतिस त स्वतंत्रता मिले के बाद खुद प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकत रहिन फेर वो ये सब ल ठुकराके बिना कोनो राजनीतिक पद के समाज सेवा ल अपन कर्तव्य चुनिस।


       सत्यमार्ग म चलने वाला के हर युग म विरोधी होथेच। राम बर रावण त कृष्ण के विरोधी शिशुपाल अउ कंस मिली जथे। पांडव मन उपर अत्याचार करइया कौरव मन के कहाँ कमी हे ?गाँधी जी के विचार धारा के विरोध करइया तको रहिसे। एक झन अइसने विचारधारा के विरोधी नाथू राम गोड़से के गोली मारे ले पूज्य महात्मा गाँधी ह 30जनवरी 1948 के  अपन प्राण त्याग के स्वर्गलोक गमन करे रहिस।


         महात्मा गाँधी जी के काया भले माटी म मिलगे फेर वोकर अजर-अमर विचार धारा जिंदा हे। फेर अइसे लागथे के वो ह राजनैतिक छल-छंद, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, जात-पात, शोषण आदि के कचरा म गँवागे हे। ये विचारधारा के आड़ लेके कतको झन सिरिफ अपन राजनैतिक रोटी सेंके के काम करत हें त कतको झन इही विचारधारा के मुखौटा लगाके आडंबर करत हें। गाँधी जी के नाम तो याद हे फेर काम बिसरा गेहे।गाँधी जी अउ राम राज के भारी हल्ला होवत हे।


      सचमुच म अगर हम ये संसार ल स्वर्ग सहीं बनाना चाहत हावन, भारत म राम राज अउ खुशहाली लाना चाहत हावन त ईमानदारी ले महात्मा गाँधी जी के विचार ल अपनाये बर लागही।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

काली माई के दर्शन*

 छत्तीसगढ़ी लघुकथा : *काली माई के दर्शन*


                            - विनोद कुमार वर्मा 


               टेड़गूराम थाली म फूल पान अगरबत्ती धूप सिंदूर आदि ला सजा के बड़े सुबेरे 5 बजे नहा-धो के काली माई के मंदिर कोती जावत रहिस। घर ले मंदिर ह एक कोस दूरिहा म तरिया-पार म बने हे। मंदिर ह छोटकुन हे फेर ओकर महात्तम ह दूर-दूर तक फैले रहिस। टेड़गूराम नियम से रोज मंदिर जावय। गाँव-गँवतरी जाय तभेच्च नांगा परे। रस्ता म एक ठिन बड़े पीपर के पेड़ रहिस......ओई मेर थोरकुन सुस्ताय।

         ' राम राम रामप्रसाद भैया! का हालचाल हे? ' टेड़गूराम पूछिस।

        ' सब बने-बने हे भैया! महूँ घर ले  पूजा-पाठ करके निकले हौं। नवदुर्गा आज ले शुरू हो गे न! त आज पहिला दिन शैलपुत्री के पूजा करके निकले हौं। डोली कोति जावत हौं। अभी थोरकुन सुस्ताय बर पीपर पेड़ तरी आय हौं त तोर करा भेंट हो गे। '

        ' ले चोंगी पी ले! सुस्ती भाग जाही।....... त भैया ये तो बता रोज अलग-अलग देवी के पूजा करथस का ? '- टेड़गूराम पूछिस। 

        ' नई रे ! केवल नवरात्रि के समय दुर्गा देवी के अलग-अलग रूप के पूजा करथौं। फेर दुर्गा देवी अलग-अलग थोड़े हे! एकच्च् देवी दुर्गा के अलग-अलग नौ रूप हें। '

        ' फेर फिरंगी मन के तो दूये ठिन देवी-देवता होथे भैया.... गाड अउ गाडेस्! '- टेड़गूराम बोलिस।

        ' अरे! हमर इहाँ तो एक ठिन चीज के कई ठिन नाम होथे। फिरंगी मन अपन घरवाली ला वाइफ कहिथें फेर हमर इहाँ घरवाली के दू दर्जन ले जादा नाम हे! '

     ' ले तो बता का-का नाम हे ? '- टेड़गूराम पूछिस।

         ' त सुन.....पत्नी, जोरू, बहू, मेहरारू, बन्नो, बन्नी, दुलहन,  दुलहिन,प्रिया,जाया,दारा, वनिता, संगिनी, प्रियतमा, धर्मपत्नी, गृहलक्ष्मी, गृहस्वामिनी, अर्धाँगिनी, जीवनसंगिनी, प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी....का-का ला बताओं? '

      ' अरे भैया तैं तो बनेच्च्  ज्ञानी आदमी अस! '- टेड़गूराम बोलिस।

     ' फेर टेड़गू,  जतकी जादा शब्द हे न, ओतकी जादा सावधानी घलो जरूरी हे..... फिरंगी मन तो अपन महिला मित्र ला घलो डार्लिंग कहिथें फेर हमर इहाँ अइसन नि हे।......सावधानी हटी तहाँ दुर्घटना घटी! '

       ' अच्छा भैया, घर म रोज पूजा-पाठ करथस त भगवान के तोल दर्शन होय हे का? '

      ' देख भाई! मैं तो केवल दुर्गा माता के पूजा करथौं त ओकरे नौ अलग-अलग रूप के घर म  सऊहाँथ दर्शन बीच-बीच म होवत रहिथे! माता तो रूप बदल के दर्शन देथे न! ओला समझे ला परथे। तहूँ ला तो दर्शन होत होही न! ' -रामप्रसाद बोलिस।

       ' काली माई के अतका पूजा-पाठ करथौं फेर एको पंइत दर्शन नि होय हे भैया! '- टेड़गूराम उदास हो के बोलिस।

       ' तोरे संग म फिरतूराम घलो काली माई के पूजा करे बर मंदिर आथे न। ओही बतात रहिस कि काली माई के एक दिन साक्षात् दर्शन होय रहिस! ' -रामप्रसाद बोलिस।

         ' ओला दर्शन कइसे होइस भैया, महूँ ला तो बता, महूँ वइसनेच्च् करहूँ ! '- टेड़गूराम उत्साहित होके बोलिस।

         ' त सुन,बतावत हौं। ओ स्कूल के मास्टनिन हे ने। रोज साइकिल म पढ़ाय बर स्कूल आथे। त स्कूल म खुसरे के पहिली बाँस टाल के पास वाला टपरा म भजिया खाथे अउ चाय पीथे!' - रामप्रसाद बोलिस।

     ' हाँ हाँ भैया! ठऊका कहे। ओ गोरी-चिट्टी मास्टरिन बड़ सुग्घर हे। कई दिन ओला टपरा के कुर्सी म बइठे देखथौं त मोरो मन होथे कि भजिया खाय बर महूँ जाँव! फेर ओतका बेर हिम्मत नि होय भैया। '- टेड़गूराम अति उत्साहित होके बोलिस।

     ' अरे हिम्मत कर टेड़गू! हिम्मत कर ..... काली माई के दर्शन करना हे त हिम्मत कर!' - रामप्रसाद टेड़गू ला पंदोलत बोलिस।

      ' मास्टरिन ह एक दिन भजिया खावत रहिस त अटक गे। ओही बेरा फिरतूराम ह दउड़त गिस अउ एक गिलास पानी लान के ओला दीस। पानी पी के मास्टरिन ह ओला धन्यवाद दीस। '- रामप्रसाद कत्था-कहानी ला आघू बढ़ावत बोलिस।

     ' फेर का होइस भैया! '- टेड़गूराम के जी हा धक्-धक् करे लगिस मानो ओइच्च स्वयं पानी ला अमरे होही। 

     ' फिरतूराम ह अति उत्साह म धन्यवाद दुलहिन बोल पारिस! ..... हमर इहाँ  तो दुलहिन घरवाली ल बोलथें न! ......फेर तो झन पूछ .... गोरी-चिट्टी मास्टरिन के उपर साक्षात काली माई चढ़ गे!...... पास म पड़े पचहत्थी बाँस के फट्टा ला उठाइस। अउ दे दनादन! फिरतूराम कहत रहिस कि फट्टा के मार ले गिर गे रहे॔व अउ  मास्टरिन हा भुइयाँ म घुंडाल-घुंडाल के मारत रहिस! ओही बेरा भागें त हाफपेंट ला पकड़ लीस। झन पूछ भैया हाफपैंट हा ऊहें छूट गे!' - रामप्रसाद कत्था ला आघू बढ़ावत बोलिस!

      ' भैया, फिरतूराम तो अंडरवियर नि पहिने, फेर तो नंगरा भागिस होही! '

      ' त अउ का रे! काली माई के दर्शन अइसनेच्च तो होथे!.... देख ले, तहूँ ला दर्शन करे बर होही त ! '


                 - विनोद कुमार वर्मा