Monday, 9 December 2024

बइगा के चक्कर

 बइगा के चक्कर


गनपत साठ साल तक कभू सुई-पानी ल नइ जानिस। गियानी मन कहिथे-कि उमर के संग-संग शरीर घलो जवाब दे लगथे। उही गनपत के संग घलो होइस।

       गनपत अउ परषोत्तम बचपन के संगवारी आवय। संगे खेलिन-पढ़िन। बर-बिहाव घलो दुनों के एके साल होइस। खेती-किसानी मा एक-दूसरा ल जरूर पूछी-के- पूछा होवय। धान-पान के मिंजाई-कुटाई करे के बाद एक-दूसरा के घर झरती जरूर खाये। 

           वो दिन परषोत्तम के मिंजाई के झरती रिहिस। गनपत ल खाये बर बुलाइस। खा के आइस अउ ओकर दुसरइया दिन गनपत के पेट पीरा उमड़गे। गनपत के गोसाइन सुकवारो फ़नफनाये ल लागिस। हाँ, अउ जा बने टोंटा के आवत ले खाबे। कभू तो खाये नइ हस न। जइसन करनी, तइसन भरनी। कतको बरजे हँव, भागबती के मनखे संग संगति मत कर। उँकर घर मत जा, लोगन मन भागबती ल गजब सुगाथे। फेर कहना ल नइ माने। अब भुगत। बात बढ़ाये ले बात बाढ़थे। इही सोच के गनपत चुप सुन लिस।

          सुकवारो, गनपत ल चैतू बइगा कर लेगिस। चैतू बइगा कर वइसे तो गजब दुरिहा-दुरिहा के मनखे मन अपन समस्या लेके आवय। चैतू बइगा गनपत ल  फूँकीस, भभूत दिस अउ सात सम्मार ले उपास रहे के सलाह दिस। बोलिस कि तोर ऊपर टोना करे हे। देवी पूजा के खरचा डेढ़ हजार लगही। मँय सिध करके मुँदरी देहुँ वोला पहिरबे। गनपत हव किहिस। फेर सात सम्मार के पूरत ले दुखी मनखे शांत कइसे बइठ पातीस। गनपत, सुकवारो ल किहिस- सुकवारो, मँय हर नांदगाँव जा के डॉक्टर ल देखाये रहितेव। स्मार्ट कार्ड तो हावेच। कुछ रुपया आये-जाए अउ दवई- बूटी बर दे दे रहितेस। सुकवारो किहिस- कोई बीमारी होये हे का? टोना-जादू ल बइगच मन सुधारही। अउ बीमारी घलो होय होही ते फूँक-झार करवाये बिना डॉक्टर के सुई-पानी घलो काम नइ करे। रामकली के ल नइ सुने हस का? जब मूँड़ पीरा उमड़िस तब कई झन डॉक्टर मन कर इलाज करवाइस। रुपया खोवार करिस। जब अंकालू बइगा कर फूँकवाइस तभे बने होइस। तहूँ जा पहिली अंकालू बइगा कर फूँकवा के आ।

       गनपत अंकालू बइगा कर चाँउर अउ नींबू धरके गिस। अंकालू किहिस- जबरदस्त तोर पाछु परे जी। फेर तँय चिंता झन कर मँय हँव न। वो कइसन सोधे हरे तेन ल मँय देख लेहुँ। थोरिक खरचा लगही, पूजा के समान बर। गनपत पूछिस- कतका लग जाही? अंकालू बइगा किहिस- जादा नहीं, तीन हजार लगही। तोर घर ल घलो बंधेज करे ल पड़ही। वो सब इही रुपया मा हो जाही। अउ तोला पाँच बिरस्पत ले उपास रहना हे। गनपत मरता सो का नइ करता। हव किहिस। 

          गनपत घर मा आइस, तब सुकवारो पूछिस- कइसे कमल के बाबू, बइगा का किहिस? गनपत बइगा के कहे जम्मो बात ल दुहराइस। सुकवारो किहिस- ये दे होइस न, एक काँवरा खायेस अउ लगादेस तीन हजार के चूना। अब वोकर बताये नियम ल कर। गनपत किहिस- चैतू बइगा तो सम्मार के उपास कहे रिहिस वोला कइसे करंव? सुकवारो किहिस- वहू दिन उपास रही जा। का होही। कते दिन के फल मिल जाही कोन जानत हे। गनपत सम्मार अउ बिरस्पत दुनों दिन उपास रहे लागिस। फेर गनपत के पेट पीरा ठीक नइ होइस। तब सुकवारो, गनपत ल फत्तू बइगा कर लेगिस। फत्तू बइगा देवी खरचा बर एक हजार लगही किहिस। दुख मा परे मनखे का करे, फत्तू बइगा ल घलो एक हजार रुपया दिस। फत्तू बइगा गनपत ल शनिच्चर के उपास रहे के सलाह दिस। अब गनपत हप्ता में तीन दिन, सम्मार, बिरस्पत अउ शनिच्चर के उपास रहे लागिस। तभो पेट पीरा बने नइ होइस।  

          गनपत के सारा राकेश ल गनपत के पेट पीरा के  पता चलिस। तब देखे खातिर गनपत के गाँव आइस। बोलिस- का भाँटो तँय मोला पहिली खबर नइ करेस। मोर गॉंव तीर मा बिसम्भर नामी बइगा हे। कतको के बीमारी ओकर फूँके ले ठीक होय हे। टोनही मन ओकर देखे काँपथे। खरचा ल झन डर्रा। जान हे तब जहान हे। सुकवारो किहिस- अई हव गा राकेश तँय सिरतोन कहत हस। मँय भुलावत रेहेंव। जातो तँय अभिचे जा। ये तीन हजार ल रख। राकेश तोर भाँटो ल ले जा अपन संग। 

       गनपत, बिसम्भर बइगा कर गिस दू हजार के खरचा बताइस। नींबू काटिस अउ एक ठन तावीज ल पहिना दिस। हवन करे के आश्वासन दिस। इक्कीस मंगल ले उपास करे बर किहिस। अब सम्मार के उपास रहय। रात मा खाये अउ मंगल के फेर उपास रहय। बुधवार के खाये। बिरस्पत के उपास शुकरार के खाये शनिच्चर उपास। जादा उपास रहे ले गनपत के शरीर  दुबराय लागिस। हाड़ा-हाड़ा दिखे लागिस। गनपत ल लगिस कि अब वो नइ बाँचही। तब गनपत सुकवारो ल किहिस- सुकवारो तोर कहना मा बहुत बइगा-गुनिया कर डरेंव। अब एक घाँव डॉक्टर ल  घलो देखाये के मोर इच्छा होवत हे। मोला डॉक्टर कर ले चल। सुकवारो घलो बइगा ल देखात-देखात थकगे रिहिस। दूसरा दिन दुनो परानी नांदगाँव के सरकारी अस्पताल मा गिन। सोनोग्राफी होइस। पेट मा एक गाँठ पाये गिस। डॉक्टर ऑपरेशन के संगे-संग खून के घलो बेवस्था करे बर किहिस। सुकवारो अउ गनपत घर मा आइस तब गनपत के आँसू रहि रहि के झरत रहय। सुकवारो घलो अपन गोसइया के मया मा रोये लागिस।उही समय गनपत के संगी परषोत्तम गनपत ले गजब दिन होगे मुलाकात नइ होय हे सोच के मिले बर आइस। तब गनपत सबो बात ल फरिहा के बताइस। किहिस कि एक बॉटल खून कमल दे बर तियार हे, फेर डॉक्टर दू बॉटल खून केहे हे। एक बॉटल खून अउ कोनों दे बर तियार हो जातिस, तब कालीचे ऑपरेशन हो जातिस। परषोत्तम किहिस- तैं फिकर झन कर गनपत भाई। मोर उमर जादा होगे हे। मँय तो खून नइ दे सकँव फेर मोर बेटा राजू के खून देवइया मन ले गजब पहचान हे। वो कोनों ल भिड़ा लिही। तँय बस काली अस्पताल जाए के तियारी कर। गनपत अपन बेटा राजू ल सब बात बताइस। तब राजू तुरते अपन संगी मन ल खून दे बर तियार करिस। दूसरा दिन नांदगाँव मा गनपत के सफल ऑपरेशन होइस। तीन दिन के बाद छुट्टी कर दिस। गनपत, सुकवारो ल किहिस- देखे सुकवारो, तैं जेकर गोसाइन ल सुगात रहे आज उही काम आइस। बइगा मन के चक्कर मा कतको रुपया खोवार होगे। वो दिन ले गनपत अउ सुकवारो बइगा-गुनिया के चक्कर मा पड़े ले कान चाब के चेतगे। सुकवारो अब गनपत ल परषोत्तम घर जाए ले नइ रोके । आज घलो दुनों के घर कस सम्बन्ध हे।


             राम कुमार चन्द्रवंशी

              बेलरगोंदी (छुरिया)

             जिला-राजनांदगाँव

लघुकथा - " लड़न्ककीन "

 लघुकथा -

         " लड़न्ककीन "


"तोरेच करा मुँह हे, जइसे पाये वोईसे बोलत जा l सुनत हे तौन पखरा हे l"बहेसर अपन बाई ला कहत रहिस l ओकर बाई तीखार तीखार के पूछतीस घेरी पइत पूछातिस कहिस -" तोला कोन कहत हे सुने बर पखरा घलो सुनही तै तो पथरा ले गये गुजरे हस l"

"मूरख  संग का बात करना बुद्धि भस्ट करना हे "

" तोर करा कहाँ बुद्धि हे भकला गतर l

तोला बुद्धि  नइ मिले हे परबूधिया l "

इही बीच म ओकर टुरा  रेखू आगे l

"जब देखो तब खींचीर खींचीर का तुमन ला अइसने गोठ म मजा आथे? तुमन ला बने ढंग ले गोठ बात करत नई सुनेव l"

ओकर माँ कहिस -" अरे बेटा रेखू,परबुधिया ला का जानबे, काकर बुध म चलत हे l"

बिसेसर -" अरे रेखू तोला बीच म काबर लाथे lतै  कोन कोती रहिबे,l तहीं बता? फ़ेर तीखारन    

टप ले तानाबोली म -

ओहर का बताही? "

रेखू -" तुमन ना मोर माँ बाप असन नई लगत हव l"  बीच म फेर लबले तीखारन -

" तोर बाप नोहय रे तोर बाप होतिस त तोर मोर बर मंगल सूत्र आ जतिस l मय मंगलीन नई होतेव l  मोर गला म करिया धागा बर  हे l ओकर करा माँगत हँव, ओकर करा माँगत हँव पइसा त घर चलत हे l"

बिसेसर कंझाके के कहिस- " मंगल सूत्र बर झगरा  करत करत मंगल मय दिन सिरा गे l धागा म दुनिया बंधाये हे l  खूंटा म दम निये  गेरवा का करही? हर दम के लड़ई म दम सिरा जथे बेटा l अभी नानकुन हस l काकर पाला म पर गेंव रे    l  हताश होवत   बिसेसर " मोर पाला  पड़गे तुमा बीजा अस बाजत रहिथे फोकटे फोकट l

तहूँ ह चिन्हा हस अब उही धागा के  l अउ का मंगल सूत्र मंगलसूत्र चिल्लाथे l"

तीखारन ए दरी अउ जोर देके 

"दूसर के डउकी ला पहिराबे सांटी बिछिया l दू लाख के पूरती नई हँव का l

बिसेसर "तोर पुरती ला कोन करत हे? मही तो करत हँव ना?"

"तै का पूरती करत हस? ऊपर वाले देखत हे l

जतका गोठियाबे ओतका बढ़त जाथे l नई घेपय नई मानय नई तेखर ले मुँह नई लगना चाही l

घुनही बांसरी के धुन ला कोन सुन ही भला l  बिसेसर अपन बाई ले हार खाके  बैरागी  बन जथे l तमुरा बजावत 

तना नना हे ए घर के ना 

जिहाँ तिखारन  ओ घर के तना नना  ना.... I

गुड़ेरा-गुड़ेरी के झगरा*

 .                   *गुड़ेरा-गुड़ेरी के झगरा*

                                        

                              - विनोद कुमार वर्मा 


( *गुड़ेरा* चिरई ला कोनो जगा *गोड़ेला* चिरई त

     कोनो जगा *बाम्हन* चिरई  घलो कहिथें। )


        एक किसान परिवार गाँव म सुखपूर्वक रहत रहिस। दुनों जाँवर-जोड़ी म बहुत मया रहिस। ओमन के दू लइका रहिस जेमन प्राइवेट स्कूल मा पढ़त रहिन। किसान बड़े बिहन्चे खेत के देख-रेख अउ काम करे बर घर ले बाहिर निकल जाय अउ ओकर घरवाली घर के सबो काम-बूता ला जतन से निपटाय। दुनों लइका मन ला टिफिन-बाटल देके स्कूल भेजे।  कपड़ा-बरतन, झाड़ू-पोंछा, दाल-रोटी कतकोन काम घर के लगे रहे, रेले-रेस कस। फेर लइका मन ला स्कूल भेजे के बाद चिरई मन ला गेहूँ-चावल के दाना, मुर्रा-लाई अउ पानी देना कभू नि भूले। एकरे खातिर ओकर अँगना अउ कोठा के आसपास गुड़ेरा चिरई के दस जोड़ा अपन खोंधरा बना ले रहिन। लइकामन के स्कूल जाय के बाद गुड़ेरा चिरई मन के चीं-चीं के समवेत स्वर-ध्वनि कुछ रुक-रुक के तब तक गूँजत रहे जब तक किसान के घरवाली ओमन के दाना-पानी के इंतजाम नि कर दे।

          सब ठीके-ठीक चलत रहिस फेर एक दिन लइकामन के पढ़ाई ला लेके पति-पत्नी के बीच झगरा होगे। किसान दुनों लइका ला पढ़ाई बर शहर भेजना चाहत रहिस। एक ठिन प्राइवेट होस्टल मा ओमन के रहे अउ खाय-पीये के बेवस्था रहिस- उहाँ बातचीत घलो कर दारिस। ओमन के गाँव ले शहर हा 30 किलोमीटर  दूरिहा म रहिस। किसान के घरवाली ये बात ला सुनके भड़क गीस कि बिना ओकर सलाव के दुनों लइका ला बाहिर भेजे के फैसला कइसे कर लीस? गाँव के सरकारी स्कूल मा 12 वीं तक पढ़ाई होथे..... ओकर कहना रहिस कि आठवीं के बाद दुनों लइका ला प्राइवेट स्कूल ले सरकारी मा डार देबो फेर ओकर बाद कालेज पढ़े बर शहर भेजबो। कम उमर मा लइकामन  शहर के हवा मा बिगड़ जाथें। प्राइवेट स्कूल मा आठवीं तक के पढ़ाई होत रहिस। एती किसान के कहना रहिस कि सरकारी स्कूल म पढ़ाई कंडम हे। इहाँ पढ़ाय ले दुनों लइका के भविष्य खराब हो जाही! दुनों के बीच झगरा अतका बाढ़िस कि बोलचाल ही बन्द हो गे। घर के सबो काम सुचारू रूप ले चलत रहिस फेर दुनों लइका के स्कूल जाय के बाद अउ ओमन के वापिस आत ले घर हा सुन्ना-सुन्ना रहे। सबो गुड़ेरा मन घलो घर के सूनापन ले दुखी रहिन। 

       एक दिन खोंधरा मा एक गुड़ेरी अपन गुड़ेरा ले कहिस- ' मैं तो किसान के घरवाली कोती हों तैं कोन कोती हस?'

        गुड़ेरा जवाब दीस- ' मैं किसान कोती हों। ओहा ठीक कहत हे। पढ़े बर शहर मा लइकामन ला भेजना चाही। '

       एही बात ला लेके गुड़ेरा-गुड़ेरी के घलो झगरा हो गे अउ दुनों के बोलचाल बन्द होगे। कहे घलो गे हे कि खरबूजा ला देखिके खरबूजा रंग बदलथे! दू-चार दिन अइसने गुजर गे। ओकर बाद एक बुजुर्ग गुड़ेरा ओमन ला समझाय बर आइस। गुड़ेरी के गुस्सा अभी घलो कम नि होय रहिस। बुजुर्ग गुड़ेरा सवाल करिस- ' गुड़ेरा ये बता तोला बोट देह बर परही त कोन ला बोट देबे? किसान ला कि ओकर घरवाली ला? '

       ' किसान के घरवाली ला बोट देहूँ! '- गुड़ेरा जवाब दीस। 

       ' अब तो तुमन के झगरा खतम हो गे बेटी। दुनों एके कोती हावव त का बात के झगड़ा! '- गुड़ेरी ला समझावत बुजुर्ग गुड़ेरा बोलिस। 

      ' तैं किसान के घरवाली ला काबर वोट देबे? तैं तो किसान कोती रहे! ' - गुड़ेरी शक के नजर ले देखत गुड़ेरा ले सवाल करिस। 

       ' मैं किसान के बात ले सहमत हौं फेर बोट ओला नि दों! ' - गुड़ेरा जवाब दीस। 

      ' बोट काबर नि देस तेला ठीक से बता? ' - गुड़ेरी फेर सवाल करिस। 

      ' किसान के घरवाली हमन के बहुत ख्याल रखथे। ओकर से मैं बहुत ज्यादा मया करथौं! एकरे सेथी ओला बोट देहूँ! ' - गुड़ेरा के जवाब ला सुन के गुड़ेरी के जी हा कच्च ले करिस!

      ' मोर ले घलो जादा मया करथस का? ' - गुड़ेरी फेर सवाल करिस। 

       ' हाँ, तोर ले घलो जादा मया करथौं! तोला छोड़ देहूँ फेर किसान के घरवाली ला नि छोड़ सकौं! ' 

         गुड़ेरा के जवाब ला सुनके गुड़ेरी बिफर गे।  बुजुर्ग गुड़ेरा ले बोलिस- ' एला बोल दे कि दू हप्ता तक मोर लक्ठा मा झन आही! लक्ठा म आही  त चाब दिहों! बड़ आय हे किसान के घरवाली ला मया करने वाला! दू हप्ता बर एला तलाक देवत हौं! '

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कुकुर पोसवा समाज*. ब्यंग (टेचरही).

 *कुकुर पोसवा समाज*.         

                             ब्यंग (टेचरही).  

          सामाजिक नवाचार के नीत यहू हे कि घर के मोहाटी मा उँचहा नसल के कुकुर बँधे होना। कुछ नहीं तौ देसी खर्रू कुकुर ला डेहरी रखवार बना। अतको नइ कर सके माने वर्ग विभाजन के क्रम मा गरीबी रेखा के निचे वाले क्रम मा फेंके जाबे। समाज मा इज्जत पाना हे तौ कुकुर पोस। अउ यहू चेत रहे कि निँगती मोहाटी मा कुकुर ले सावधान के तख्ती लटके मिलना चाही। मान ले कुकुर नइ भी हे तभो झझक तो रही कि इहाँ कुकुर रथे। कुकुर रहिके घलो नइ भूँकिस तब समझ ले कि वो अपन कुत्ताईपना ला अपन स्वामी ला सउँप देय हे। अइसे भी घर बँगला के ठसन शान सौकत रूआब  ला देख के पता चलि जाथे कि इहाँ कुकुर ही रथे। शुद्ध शाकाहारी मन खटिया मा परे बाप के दवा लाने बर भुला सकथे फेर कुकुर के आहार लाने बर नइ भूले। एक झन हास्य कवि कुकुर पोषक ला कहि दिस कि, तोर कुकुर बढ़िया हे जी, कहाँ ले लाने हावस। कुकुर पोषक जोरहा गुर्राके किहिस तँय एला कुकुर झन बोल ये मोर बेटा असन हे। बतकड़ू कवि फेर एक ठन गोली दाग दिस अउ कहि दिस कि कुकुर तोर बेटा असन हे  तौ तोर बेटा काकर असन हे?

         सच तो इही हे कि कुकुर ला लइका असन पाले पोसे जावत हे, अउ लइका कुकुर बरोबर गली मा बिना सीख अऊ संस्कार के घुमत हे। बिना देख रेख के लइका बेँवारसपना मा गली के होके रहिगे हे। ये मन सरकारी पानी चघाके नाली सैया के सुख भोगत हें। एकर ले मान सम्मान मा कटौती नइ होवय। नाक तो तब कटथे जब मोहाटी मा कुकुर नइ बँधे मिले।

       कुकुर आदमी के सँग रहिके आदमीपना सीखत हे। अउ आदमी कुकुरपना ला। ओइसे भी आदमी ला कुकुर चरित्र अपनाए मा जादा दिक्कत नइ होवय। वो एकर सेती कि आज के परिधान मा मनखे हर दूसर मनखे के सुभाव मा कुत्तागिरी ला देखा सीखी मा सीख जाए रथे।

        मनखे चोर डाकू लुटेरा ले डरे। अब कुकुर ले डरथें। एक इही जीव तो हे जे मनखे अउ पशु के बीच के सभ्यता मा समानता लाथे। जेकर ले ईमानदारी अउ वफादारी के परिभाषा बाचे हे। बजार के बिसाय दस रुपिया के तारा उपर भरोसा हे फेर परोसी उपर नइये। कुकुर उपर भरोसा हे फेर हजार रुपिया के तनखाधारी चौकीदार उपर नइ रहय। सुविधा सम्पन्न मानवीय विकास यात्रा के डहर मा चलत कुकुर सभ्यता मा आके डेरा डारे हावन। हबकना भूँकना गुर्राना हम इही कुकुर मन ले सीखे हावन। ये अलग बात हे कि विज्ञान चन्दा मा चल दिस अउ हम तर्कशील होके नव राति चतुर्थी मनाए बर चंदा परची धरके मोहाटी मोहाटी किँजरत हावन। हमर कोती के रावन ला मारे बर घलो चंदा देना परथे। उपासना अउ जगराता तक ले घलो हमर कुकुरपना के निवारण नइ हो पावत हे। जौन रैबीज वैक्सीन तइयार हे अब काम नइ आवे। अब ये दू पाया मन अतका जहरीला होगे हें कि काटे के तो बात छोड़ गुर्रा दिहीं ओतके मा संक्रमण बगर सकते। तब अइसन मा डब्ल्यू एच ओ ला आवेदन देके सचेत करवा देना उचित समझथौं। जेकर ले नवा वैक्सीन के खोज चलत रहय।

     हमरो पारा मा एक ठन सम्मानित आदरणीय जी रथे। जेकर खसुवाहा होय के कारण अतके हे कि ये खसमाड़ू ह हर पंचवर्षीय मा मालिक बदलत रथे। एकर ले साफ हे कि वो स्वामी भक्त नइये। अपन ईमानदारी वफादारी ला चौपाया मन ला धरा देय हे। कर्तव्यनिष्ठ कर्मठ अउ जुझारूपन ले स्वामीभक्ति देखातिस  गुर्राये हबके के काम करतिस ते कम से कम सरपंच तो बने के संभावना तो रतिस।

         जेकर मा दम होथे वोमन चौपाया के सँगे सँग दू पाया घलो पोस के राखथें। इही पोसवा मन मा वो सब गुण भरे रथे जेकर ले कुकुर के इज्जत होथे। इन मन ला तोर हमर नुकसान से मतलब नइ रहय। मालिक के आदेश मिलत भर के रथे, फेर तो ये मन मालिक के जुट्ठा नमक खाय के करजा उतारे मा देरी नइ करे अउ शांति पारा के शांति ला भंग करके भगदड़ मचाके मालिक के साख बचाथें। अइसन बेरा मा मर कटगे तब नाम ला सहीद मनके सुचि मा जोड़वाए बर बाचे दू पाया मन धरना तो कर ही सकथें। कुकुर देव के मंदिर एकलौता बालोद जिला के मालीघोरी मा ही काबर रहय। आस्था के घंटाघर तो अबड़ बनत हे, फेर मालीघोरी के मंदिर कस भरोसा के चिनहा प्रतिक बर एक ठन एतिहासिक काम तो घलो होना चाही।

        आज हमर समाज ला कुकुर के बहुते जरुरत हे। नाम इज्जत अउ रुआब के साख बचाना हे तौ कुकुर पोसना जरूरी हे। हम ये नइ कहन कि  कुकुर चौपाया ही होय। बिना पट्टा सँखरी वाले घलो चलही।

       गाय सड़क मा हे अउ कुकुर बेडरूम मा, मनखे के लइका कुपोषित होवत हे अउ कुकुर दूध मलाई मा सनाय रोटी बिस्कुट खावत हे। पाठ भर पूरा पार करके लइका मन पैदल इस्कुल जावत हे, कुकुर कार मोटर के सँग हवाई जहाज तक मा सफर करत हे। कुकुर पोसवा समाज कुकुर ला गोदी मा लेय के जगा ओतके खरचा मा कोनो गरीब के लइका ला गोद ले लेतिस ते देन दिन येमन कुकुरगति के होही वो दिन हो सकथे मुखाग्नि तो नहीं कंधा देय बर खड़े मिलतिस। फेर हमला तो कुकुर पोसवा समाज के नाक साख ला बचाके ये परम्परा ला आगू पीढ़ी तक ढकेलना हे, कि हम उचहा दरजा के कुकुर पोसवा समाज के पोषक आवन। 


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनांदगांव।

हरू कइसे पारन?*

 *हरू कइसे पारन?*

पहिली के मनखे मन के विचारधारा हा कतका विस्तृत, सकारात्मक अउ पोठ राहय, आर्थिक रूप ले भले थोरिक कमजोरहा रहितिस फेर सोंच उंचहा अउ जमगरहा राहय...अउ उही मेर आज काल के मनखे मन के बारे म सोंचबे अउ गुनबे ते कतको पढ़ लिख ले हन, आर्थिक रूप ले घलो ओतेक कमजोर नइ हन फेर..कतको मनखे मन के सोंच अउ बिचार धारा आज घलो एकदम संकीर्ण अउ स्वार्थी प्रवृत्ति के रहिथे... आजकाल तो सिर्फ सामने वाला ला कसनो करके  *हरू कइसे पारन?*  वाले सिस्टम घलो चलत हे लगथे, संगवारी हो...जइसे कोनो पारिवारिक कार्यक्रम में जाय रहिबे ता काकरो काकरो मुहूं ले गोठ सुने बर मिलथे...सामने वाला मन अपन तरफ ले बनेच करे के पूरा पूरा परयास करे रहिथे..फेर...

कुछ खास किसम के प्राणी मन सिर्फ कमी निकाले अउ नीचेच गिराए (हरू पारे वाले बुता)मा ही लगे रहिथे ...अउ एक बात... अइसन किसम के प्राणी मन अपन जइसे प्राणी घलो खोज डरथे...काबर जब तक नइ गोठियाय राहय इंकर मुहुं खजवावते रहिथे अउ इनला आखिर म इंकर जइसे प्राणी मिल घलो जथे...ताहने सोने पे सुहागा हो जथे।

....बर बिहाव हो चाहे छट्ठी होय,चाहे घर पूजा होय या अउ आने कुछु परिवारिक कार्यक्रम मा...अधिकतर  सुने अउ देखे मा आथे ता वो हे ...... सामने वाला के चारी निंदा करना अउ सामने वाला ला *हरू कइसे पारन?*  वाला हिसाब किताब चलत रहिथे ...ताहने इंकर पुरोगराम शुरू..फलाना ला तो देख..बड़ घमंडी होगे हे लगथे, गोठियावन तक नइ सकत हे..?. इंकर घर में आए हन ता,नइ चिन्हत हे, ते हा बहिरी मा काला चिन्ही ...

ता कोनो अतेक पैसा कहां ले आइस होही ?

ता कोनो वा.. घर ला घलो कब-कब बने बना डारे हे?..

ता कोनो का बुता करथे?

ता..कतको के तो मुहुच फूले रहिथे...

ता कोनो ओकर लइका मन ला तो देख...

ता कोनो...साग ह तो ढल ढल ले हबे...

ता कोनो...नाश्ता तक बर नइ पुछ सकिस ? जी 

ता कोनो...लड्डू हा तो ठक ठक ले रिहिस.. दांत घलो टूट जही।

ता कोनो..गुलाब जामुन गठनहा  हवय...

ता कोनो..सोहांरी खड़खड़ ले रिहिस ..

ता कोनो...भात ह चिबरी हे..

ता कोनो साग दार धुंगियहा हो गेहे....

ता कोनो.. ओ ..तो.. हमन आएन ता सब सिरागे रिहिस..

ता कोनो दार भात भर ला खाएन...जी 

ता कोनो बइठे तक ला नइ किहिस गा अतेक.... हो गेहे...

ता कोनो...वा हमन ला तो देखिस ताहने मुहु ला ओति कर लिस... 

ता कोनो नानुक चेंदरी के पुरतिन नइहन...

ता कोनो चिन्ह चिन्ह के देत हे कहिथे...

ता कोनो ठिकाना नइ हे तेला देहे...

ता कोनो, वा..ते जानत हस अपन लइका ला वहादिहां पढ़ात हे कथे...

ता कोनो हमन ला तो फोटू खिंचवाय तक बर नि पूछ सकिस? 

ता कोनो.. खाय हस ते नइ खाय हस तक नइ पूछ सकिस जी? 

ता कोनो.. हमला तो नेवता दे बर तक नइ आन सकिस, दूसर करा भेजवाय रिहिस...तभो ले हमन आए हन ? ...

ता कोनो... हमर तो पांव तक नइ परिस ...?

ता कोनो...ओमन ला तो देख....(अपन मन भले कार म आय रही) ना फेर... दुसर किराए के कार म आ जाही तहु सहन....नइ होय.….

मतलब जमाना अइसन चलत हे 

जो कुछ राहय अपनेच करा राहय...

नौकरी लगे ते हमरेच लइका के..

फस्ट आय ते हमरेच लइका.. 

बने पहिरे ओड़हे ते हमरेच लइका..

हुसियार राहय ते हमरेच लइका.. 

संस्कारी राहय ते हमरेच लइका...

सुख के बेरा म मनखे मन गोठियाथे ते गोठियाथे... फेर.. कतको मन .....

दुख के बेरा मा घलो नइ चुके संगवारी हो...

भले अपन मन ,अपन दाई - ददा, सास - ससुर के एको दिन सेवा झन करे राहय फेर बात अइसे करही...जइसे... जानो मानो....भारी....।

बने सेवा जतन नइ होइस नहिते‌? सियनहा ,सियनहिन मन हा अउ जिये  रहितिस...

ता कोनो कहत हे...बने खाय बर घलो नइ देवत रिहिस कहिथे?...

ता कोनो..बने इलाज पानी घलो नइ करइस कहिथे? ...

अउ अइसने गोठियइया मन के घर कोनो हास्पीटल के आस पास रही अउ कोनो भरती हे कहिके कोनो डाहर ले जान डरे रही ना....ते देखे बर आना तो छोंड़िदेव....फोन तको नइ उठावय.....काबर ए तेला उहिच मन जानय....

भले अपन मन एक दिन देखे तक ला नइ आवन सके फेर सामने वाला ल *हरू कइसे पारन?*.... 

कोनो रिश्तेदार मन कोनो दुरिहा घुमे ल नहिते कुछू आने बुता ले चल दे रहिथे ...अउ इही बीच गोतियारी या नजदीकी मा कोनो बीत जथे, तेन समय के कथा परसंग ला सुनव.....

हमन आवन नइ सकन कहिके नइ काहय? अउ अंदर से आय के मन भी नइ राहय फेर सामने वाला ल *हरू पारना हे* ता कइसे करही? खबर कोनो ना कोनो डाहर ले मिल घलो जाय रही फेर...

आय रहितेन ते...

हमन ला तो खभरेच नइ मिलिस.. 

एक मुठा माटी ल तो दे रहितेन...

दुख के नेवता म घलो कारड के इंतजार....

कारड मिल जाही ता.. एक घांव फोन तक नइ कर सकिस...

ओतेक जिनिस परिस कहिथे फेर नानुक चेन्द्रा ला नइ जानेन?

मतलब जमाना अइसन चलत हे......अउ कुछ अकन के बात ल सुनहु ते  तो मुंहूंच फार दुहू.....

इंकर बात ला सुनहू ते तो....

दुनिया म जानो मानो इंकर छोंड़ कोनो ईमानेदार नइ होही... दूसर मन तो..कुछु जानेच नहीं......  संस्कारी हे...ता इंकरेच परिवार 

इन जेन बोलदिन तेने सही हे...  इंकर से तो कभु कुछु गलतिच नइ होय...सकय।

मतलब दूसर के सुखी अउ खुशी ला थोरको झेल नइ सकय 

फेर अपन आप ले एक घांव कभू नइ पुछ सकय?

कोनो‌ एक घांव नइ काहय?

 चल भला पूछ लेथन बिचारा बिचारी मन कहां ले अतेक करत होही?

अतका घलो नइ सोंचय... गोठियावत हन ते बात हा कोनो माध्यम ले ओकर तक पहुंच जाही ता का होही?

कुछु सहयोग के जरुरत रिहिस होही  का?

आने...........आने...?

.....................?

अमृत दास साहू 

ग्राम -कलकसा, डोंगरगढ़ 

जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

मो.नं-9399725588

लघुकथा) असली महतारी

 (लघुकथा)


असली महतारी

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रात दिन खेत मा खँटइया बहुतेच सिधवी  रामकली अपन सास के बाँझ के ताना ला सुनके मनमाड़े बिफर जावय। कइ पइत पारा-परोसी अउ रिश्तेदार मन के बाल-बच्चा   के बारे मा पूछे ले शेरनी सही गुर्राके झगरा कर डरय।अगर वोकर गोंसइया भला मानुष नइ होतिच त बहुत पहिलीच फाँसी मा झूलके मर जा रहितिच।

पंद्रा बछर के गृहस्थी के बाद तको संतान सुख नइ मिलिच त वो बेचारी के का दोष?वोकर पिताजी ह तो बड़े-बड़े नामी डॉक्टर मन सो इलाज मा लाखों रुपया खर्च तको करिस।सास के कहे मा कतकों बइगा- गुनिया मन के जड़ी-बूटी खाइच, झाँड़-फूँक तको करवाइच फेर गोदी हरियर नइ होइच।

    गाँव मा भयंकर अकाल परिच त डेड़ साल पहिली वो हा अपन पति संग ईंट भट्ठा मा काम करे बर इलाहाबाद आये  रहिस। अभी दसे दिन पहिली वो हा एक झन नवजात नोनी ला धरे हाँसत-कुलकत गाँव लहुटे हे। सासू माँ के तो खुशी के ठिकाना नइये। वो गाँव भर मा अपन दादी बने के खबर ला मिठाई के संग बाँटत हे। आज छठ्ठी के कार्यक्रम रखे गे हे। सगा-सोदर सकलायें हें।

वो लइका काकर ये तेन राज ला सिरिफ भगवान हा अउ कपड़ा मा लपटाय नार-फूल सहित झुंझकुर मा फेंकाये मिले रहिस तेला केवल रामकली अउ वोकर गोंसइया जानत हे।असली महतारी तो अब रामकली हरे।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

आखर के अरघ शहीद वीर नारायण सिंह

 आखर के अरघ 

    शहीद वीर नारायण सिंह 

             आज 10 दिसम्बर 2024 आय त सुरता आवत हे हमर गरब गुमान वीर नारायण सिंह के काबर के 10 दिसम्बर 1857 के दिन जब सुरुज मुंह लुकावत रहिस होही रायपुर मं अंग्रेज सरकार उनला फांसी देहे रहिस ...। 

  वीर नारायण सिंह के जनम सन् 1795 मं सोनाखान के जमींदार राम राय बिंझवार घर होए रहिस । जब उन जमीदारी सम्हारिन त गरीब गुरबा के दुख बिपत मं दिन रात खड़े रहैं ...।  सन् 1856 के दुकाल ल तो कभू भुलाए नइ जा सकय , मनसे पेज पसिया बर ललाये लगिन , हारी बीमारी मं कम तो भूख मं मनसे मरे लगिन । परोपकारी जमींदार वीर नारायण के करेजा फाटे लगिस त उन अपन कोठी के धान बांटे बर धरिन फेर कतका दिन गुजारा होतिस ? उन निकलिन सेठ साहूकार , आने जमींदार मन से सहायता मांगे बर फेर कोनो आगू नइ आईन । 

"सोनाखान के आगी " काव्य खण्ड मं लक्ष्मण मस्तुरिया वीरनारायण सिंह के बात लिखे हें .....

    " अन्यायी के अन्याय सहे ले 

      सबले बड़े होवय अन्याय ।

     काट के पापी ल खुद कट जावै 

    धरम करम गीता गुन गाय । " 

            गरजिन वीर नारायण अपन प्रजा बर अउ साहूकार के कोठी के दुआर खोल दिन .ओ समय उंकर संग 300 मनसे रहिन , संग देवइया बढ़त गिन फेर माखन साहूकार ओ समय के अंगेज कमिश्नर तीर फरियाद करिस अंगेज सरकार ल तो मौका मिलिस अउ वीरनारायण 24 अक्टूबर 1856  के दिन गिरफ्तार कर लेहे गिन । हितू पिरितू मन तो आगी अंगरा होगिन अउ 28 अगस्त 1857 के दिन उनला मुक्त करवा लिन फेर अंगरेज सरकार के हाकिम हुक्काम मन से बांचना जरूरी रहिस ते पाय के वीर नारायण कुरुपाठ के पहाड़ी मं अपन जुझारू संगी मन संग सरण लिहिन ।छापामार युद्ध ल अपनाना जरूरी रहिस एतरह अंग्रेज मन के नाक मं दम कर दिहिन । अंग्रेज मन संग तो लड़ना च रहिस फेर साहूकार मन के संग आने जमींदार मन से भी तो निपटना रहिस ..। हमर देश मं जयचंद मन के कमी तो कोनो दिन नइ रहिस । एती अंगेज सरकार गुनिस तोला नइ सकिहौं त तोर पेट के पिला ल तो देखी लैहौं ..फेर का दुखी भूखी जनता ऊपर अत्याचार बढ़ गिस , लोगन के घर दुआर ल जरो बरो देहे लगिन ...वीर नारायण अपन प्रजा ल अपन लइका असन जानयं , मानयं ..। चार झन संग सलाह करिन , गुनिन के मोर सेतिर मोरे अपन मन दुख सासत काबर सहयं तेकर ले मैं आत्म समर्पण कर देहौं ....धन्य हमर छत्तीसगढ़ के दाई , बहिनी , बहू बेटी मन 

दुख बिपत मं संग मं खड़े रहिथें तभे तो उंकर पत्नी घलाय आत्म समर्पण बर राजी होईन । एतरह वीर नारायण सिंह अंग्रेज सरकार तीर आत्म समर्पण कर दिन । " मोरे मन कुछ और है कर्ता के कुछ और " .....सुरता आवत हे सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के लपट छत्तीसगढ़ घलाय तो पहुँचबे करिस ...सरकार ल बहाना मिल गिस वीर नारायण सिंह ल राजद्रोही , विद्रोही नेता कहे के । 

   सबले बड़े दुख , लाज के बात  एहर आय के हमरे मनसे मन घर के भेदी लंका छेदी बन गिन । एकतरफा न्याय अउ काला कहिथे ...

10 दिसम्बर 1857 के दिन वीर नारायण सिंह ल रायपुर मं फांसी देहे गिस , जेन जघा मं छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी ल फांसी देहे गए रहिस आज हमन ओ जघा ल " जय स्तम्भ " के नांव से जानथन । 

  मन अउ कलम दुनों भरभरा उठिस जी ...

 शहीद वीर नारायण सिंह ल शत शत नमन 

       सरला शर्मा