Monday, 9 December 2024

राज भाषा छत्तीसगढ़ी कइसे आघू बढ़ही?

 राज भाषा छत्तीसगढ़ी 

कइसे आघू बढ़ही?


राज्य तो बनगे छत्तीसगढ़ l

ओकर भाखा ला राज भाषा  राज्य ह बना दीस l केंद्र म जाके अटक गे  कइसे ओला भाषा के दर्जा मिलही? 

उहू विषय म अपन पक्ष ले विचार दे दिये गये हे, ओला मानही कब? गुने ला परगे l 

         हमर भाखा महतारी भाखा हे हमला का करना हे?

अइसन कहे म बात कइसे बनही l

जन भाषा हे तभो ले अतेक गोहार पारे ला काबर पड़त हे?सोचे के बात हे l 

पूरा छत्तीसगढ़ म बोलत हन सुनत समझत  हन l  फ़ेर लिखत हन  लिखावत हे अउ बाकी मन काबर नई लिखय? सरकारी काग जात के आवेदन ल  l हमला अइसन बूता ला करना हे l छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढ़ी विज्ञापन /विग्यप्ति भी निकाल के देखय l 

   नान्हे लइका के मन के पढ़ाई ल

शुरू ले हमर भाखा म  कर दिये जाय l पढ़बो पढ़ाबो लिखबो  लिखाबो  सब होही l

मानकी करण होगे हे दिक्क़त घलो नई हेl 

कोनो विधा अब बांचे नई हे जेमा जोरदरहा नई लिखाये हे l

पोठ लिखत हे बढ़िया लिखे बर उमहियावत हे फ़ेर आयोग बने सरेखा नई कर पावत हे l

  जेन ओकर दुवारी म जात हे तेने ला चिन्हथे l जतका अखवार हे भाखा बर पन्ना देहे l विशिष्ट अंक निकालत हे सुगघर सुगघर रचना छापत हे रचनाकार मन के बढ़वार होवत हे l आयोग काला सकेले हे  का सकलवत हे उही जानही? फेर लिखय्या मन हताश नई हे l प्रिंट मिडिया वाले मन गर्व से कहत हे भाखा के जतन हम करत हन l भाखा दिवस के बधाई हम उही मन ला पहिली देबोन l छत्तीसगढ़ी म कतका झन बने लिखत  हे छपत हे,छपवावत हे अपन पुस्तक तेखर मन के बनाये होही सूची त आज उजागर करय आयोग  भाखा दिवस बेरा म l

एखर ले उंकर बूता दिखही घलो अउ रचनाकार मन आघू आही उत्साहित होही, बढ़वार  होही l आयोग  बूता करय  

हर विधा म लिखवाये के l नवा नवा उदिम करय  लिखय्या मन ला मान दय सम्मान दय l 

थोर बहुत अइसने लिखा जथे उपराहा झन लेहू l अंचिनहार हन आयोग बर  l भाखा दिवस हमू मनावत हन सुरता आगे आयोग के l आज जाने ला मिलही l

भाखा दिवस के अंतस ले आप सबो सियान जवान भाई दीदी मन ला बहुत बहुत  

बधाई l 


 तुहरेंच 

मुरारी लाल साव 

सियान सदन कुम्हारी

लघुकथा) *मोहल्ला के भाई*

 (लघुकथा)

*मोहल्ला के भाई*

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असो पहिली बार होये हे के तीजा मनाये ला  मइके आये सावित्री ला अपन ससुराल लहुटे मा अठुरिया ले जादा होगे हे।लइका मन के स्कूल हा तको खुलगे।आन साल वो हा बासी खाये के बिहाने दिन वापिस आ जवत रहिसे। वोकर गोसइया जितेंद्र ले बर आवय नहीं ते मनहरण हा अपन बेटी ला अमराये बर आ जवय फेर ये साल नवा-नवा रेडीमेड के दुकान खोले जितेंद्र हा पहिली ले चेता दे रहिसे के मैं हा असो ले बर नइ आ सकवँ--  बाबूजी ला कहि देबे वो हा तोला छोड़ दिही।

सावित्री के ससुर हा तको तीजा लिहे बर आये वोकर बाबू मनहरण ला कहे रहिस--" समधी जी! आपे मन तीजा के एक-दू दिन पाछू छोड़े ला आ जहू।नाती के स्कूल खुल जा रइही पढ़ई-लिखई मा नुकसान झन होवय। आपके गाँव हा इहाँ ले अस्सी-नब्बे किलो मीटर दूरिहा एकदम इंटेरियल में बसे हे।फटफटी के छोड़ आये-जाये के कोनो साधन नइये नहीं ते महीं हा आ जातेंव फेर वोतेक दूरिहा फटफटी नइ चला सकवँ।"

        पाछू दू-तीन दिन ले सावित्री हा बनेच परेशान हे। तीजा के बिहान दिन ताय वोकर बाबूजी मनहरण के एक्सीडेंट मा पैर के हड्डी टूटगे तेकर सेती प्लास्टर चढ़े हे। गाड़ी चलइ तो दूरिहा हे हले-चले तको नइ सकय।अब पहुँचाये बर जावय ते जावय कोन? सास ससुर अउ जितेंद्र हा नराज होगे होहीं अइसे सोच-सोच के वो अबड़े परेशान हे। वोकर चिंता ला भाँपके वोकर दाई हा कहिस--" बेटी !तैं जादा परेशान झन हो। हमर मोहल्ला के बाबू धर्मेंद्र ला कहि देथँव वोहा अपन गाड़ी मा काली बिहनिया ले तोला पहुँचा देही।वोकर खर्चा-पानी ला दे देहूँ।"

हव दाई मैं बिहनिया ले झटकुन तइयार हो जहूँ। वोला चेता दे रहिबे गाड़ी ला बने चलाही।

      ग्यारा बजे रहिस होही सावित्री हा अपन ससुराल पहुँचगे। धर्मेंद्र हा चाय पियिस तहाँ ले लहुटगे। सावित्री ला जनइस के सास हा बने बोलत नइये।ससुर हा तको गुसियाये बानी लागत हे।

    अचानक वोकर ससुर हा पूछिस-- "वो कोन टूरा ये जेन तोला छोड़े ला आये रहिस। तोर ददा नइ आइच का?"

 " बाबूजी के एक्सीडेंट होगे हे तेकर सेती फटीफटी नइ चला सकय। आये रहिसे तेन हा हमर मोहल्ला के भाई ये।"--सावित्री बताइच।

" अच्छा आजकल मोहल्ला मा तको भाई होथें का?" गुस्सा मा सवालिया नजर ले देखत ससुर जी कहिस।

वोकर बात ला सुनके सावित्री अवाक रहिगे।


चोवा राम वर्मा ' बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

लघुकथा - भोरहा

 लघुकथा -

             भोरहा 

दूनो बइठ के गोठियावत रहिस  परेमा अउ परभू l

बचपन के दोस्त हे l मिलगे अचानक छट्टी के कार्यक्रम म l 

छट्टी घर म का होथे कांके पानी 

लइका देखई अउ नेग  देवाई l

सगा पहुना संग मिल भेंट  गोठ बात अउ हाल चाल पूछई l

बेरा कती जाथे  गम नई मिले l

परभू -" सुरता नई करस मोला l" तै मोला सुरता करे हस l"

" सुरता करके का करबे, तहूँ अपन घर म मस्त  l महूँ अपन घर म तरस्त l"

"का तरस्त? तरसे ले जिनगी नई चलय l"

परभू -"परेमा, प्रेम ला सब नई जानय l पूछथे भर आपस म हे कि नहीं, ओ तो दिखथे l"

परेमा -" दिखय नहीं लोगन देखथे,भरम भूत  म l"

परभू -" बने बने हस ना l"

"बने बने हे सब फ़ेर सुरता आथे भोरम देव घुमाये हस तेन l" परभू -थोकिन मुड़ी हलावत 

" भोरहा म झन रहिबे  पूरा जिनगी म सीखे जाने के गुर हेl प्रेम अउ काम अलग अलग हे l' परेमा थोकिन हाँस के 

ढाई आखर प्रेम के पढ़े.... I"

परभू हाँस के -" मूरख होय l

उही बेरा सुवासीन आगे लइका ला धर के l  तुमन का करत हव देख बाबू भुवन ला l इही नाँव  धरे गिस l बड़ सुगघर हे l 



एखरे सुरता करत रहेंन  भोरम देवl

 हमू मन ला कब दिही? परेमा l


-मुरारी लाल साव 

कुम्हारी

बिंसवास

 बिंसवास


बिंसवास वो दीया आवय। जेकर अँजोर मा मनखे जिनगी भर जगमगावत रहिथे। दसों दिशा मा ओकर  सोर होवत रहिथे। बिंसवास के बिना जिनगी अँधियार होथे। बिंसवास ले बिंसवास बाढ़थे, दुश्मन घलो दुश्मनी त्यागथे। बिंसवास मनखे ल महान बना देथे, पखरा ल घलो भगवान बना देथे। जिनगी के रद्दा मा बिंसवास के होना बहुत जरूरी हे। 

             बिंसवास के बिना कोनों कारज सफल नइ होवय। कोनों भी कारज ल करे के पहिली मनखे ल अपन आप मा बिंसवास होना चाही। बिंसवास ले कतको बड़े संकट ले उबरे जा सकथे। उजड़े दुनिया मा अँजोर लाये जा सकथे। मनखे ईमानदारी से काम करके दूसर के बिंसवास जीत सकथे। जिहाँ बिंसवास होथे, उहाँ सम्मान विराजथे। मनखे ल जिनगी मा सदा बिंसवास के अँचरा ल थामे चलना चाही।

               विद्यार्थी जिनगी मा जइसे पढ़ई के महता हे, वइसने पढ़ई मा बिंसवास के घलो बड़ महता हे। बिना बिंसवास के पढ़ई समय बरबादी ही होथे। कतको पढ़ ले याद कहाँ होथे? बिंसवास के बिना कोनों अपन लक्ष्य ल नइ पा सकय। ये बात कभू नइ भुलाना चाही कि बिंसवास सफलता के निसेनी होथे। जउन मनखे के   बिंसवास तगड़ा होथे, वो सदा जिनगी मा बाजी मारथे। 

                बिंसवास मा अइसन जादू हावे कि कतको मुश्किल काम ल सहज बना देथे। तेकरे सेती बिंसवास पात्र मनखे के बात ल कोनों इंकार करे के हिम्मत नइ करे। मालिक के हिरदे ल जीतना हे, तब नौकर ल मालिक के बिंसवास पात्र बनना पड़थे। जेन नौकर अपन मालिक के बिंसवास पात्र बन जथे। वो नौकर के जिनगी मा सुखेच सुख होथे। अपन मालिक बर वइसन मनखे, नौकर नहीं, बल्कि घर-परिवार के एक सदस्य के बरोबर होथे। बिंसवास पात्र मनखे सदा मया-दुलार के हकदार होथे। 

          संसार मा बिंसवास पात्र बने बर थोरिक समय जरूर लगथे। फेर कहे जाथे न, 'कोशिश करइया के कभू हार नइ होवय।' मनखे ल सदा बिंसवास पात्र बने के कोशिश करना चाही। बिंसवास बहुत नाजुक होथे। थोरिक गलती ले टूट भी सकथे। तेकर सेती सदा ये धियान रखना चाही, कि कोनों भी परिस्थिति में ककरो  बिंसवास नइ टूटना चाही। 

       बिंसवास परिवार अउ रिश्ता के आधार होथे। बिंसवास के टूटे ले घर-परिवार मा झगरा अपन पाँव जमाये ल लगथे। सात जनम तक संग दे के वचन देवइया पति-पत्नी के रिश्ता छिनभर मा टूट जाथे। अच्छा रिश्ता बिंसवास के बिना कभू संभव नइ हे। बिंसवास पक्का होय ले घरेच-परिवार नहीं, परोसी घलो अपन घर के ताला-चाबी ल सौंप देथे। जिनगी मा बिंसवास के मोल होथे, मनखे के नहीं। 

            संसार मा बिंसवास पात्र मनखे सम्मान पाथे। लोगन मन सदा गुन गाथे। कभू धन के जरूरत पड़ जाथे तब वोला लुलवाये बर नइ परे। हर कोई बिंसवास पात्र के मदद करे बर तियार हो जाथे।मनखे चाहे तो संसार मा सबके बिंसवास ल जीत के सरग के सुख भोग सकत हे, अउ बिंसवास तोड़ के अपन जिनगी ल नरक ले बदतर घलो बना सकत हे। 

         बिंसवास कोनों दुकान मा नइ मिलय। फेर दुकान ल चलाये बर बिंसवास काफी होथे। ग्राहक ल जब ये बिंसवास हो जाथे कि फलाना दुकानदार अच्छा माल बेचथे अउ वाजिब कीमत लगाथे। तब ग्राहक वो दुकान के नाँव ल पूछत सँउहत चले आथे। दुकानदार ल घलो ये धियान रखे ल पड़थे कि कोन गिराहिक बिंसवास के लायक हे अउ कोन नहीं। बिंसवास के लायक गिराहिक ल ही उधारी दिये जा सकथे। अपन धंधा ल बनाये रखे बर दुकानदार ल बिंसवासी अउ अबिंसवासी मनखे के परख करना जरूरी होथे।

      धन के खातिर कभू ककरो बिंसवास नइ टोरना चाही। बिंसवास, धन ले बड़े होथे, धन बिंसवास ले बड़े नइ होवय। धन ल खो के दुबारा पाये जा सकत हे। फेर बिंसवास के टूटे ले दुबारा बिंसवास पात्र बनना बहुत मुश्किल होथे। 

         बिंसवास के ताला ईमानदारी के चाबी ले खुलथे। तेकर सेती जिनगी मा सदा छल-कपट अउ बइमानी ल तियाग के लोगन मन के बिंसवास जीते के कोशिश करना चाही। 


               राम कुमार चन्द्रवंशी

               बेलरगोंदी (छुरिया)

                जिला-राजनांदगाँव

पाँच करोड़* (नानकुन कहिनी) - विनोद कुमार वर्मा

 [12/3, 7:25 PM] +91 98263 40331: .           *पाँच करोड़* (नानकुन कहिनी)


                      - विनोद कुमार वर्मा 


                             ( 1 )


         दादा जी प्रादेशिक छत्तीसगढ़ी समाचार के अगोरा म आधा घंटा पहिली ले रेडियो ला चला के बइठे रहिस। अनुपूरक बजट के समाचार अवइया रहिस। छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण अउ संवर्धन बर छत्तीसगढ़िया साहित्यकार मन पाँच करोड़ के माँगपत्र सरकार ला सौंपे रहिन, जेमा बीस हजार आदमी मन के दस्तखत घलो रहिस। साहित्यकार मन के सोच रहिस कि ' तोप माँगबो त तमंचा तो मिलिच्च जाही!.... कम से कम एक्को-दू करोड़ तो मिलबेच्च करही। ' ए माँगपत्र बनाय म दादा जी के प्रमुख भूमिका रहिस। बजट म पैसा बढ़ जातिस त दादा जी के रसूख घलो बाढ़ जातिस। परोसी जलन के मारे कतकोन झन ला कहत रहे- ' मुख्यमंत्री करा एकर कोनो जान-पहिचान नि हे! जबरदस्ती बड़े आदमी बनत फिरत हे। एकर कस सैकड़ों आदमी मुख्यमंत्री के आघू-पाछू किंदरत हें त का सबो के काम ला कर देही ! '

      बुड़ती बेरा ' हमर हाथी हमर गोठ ' रेडियो म शुरू हो गे। दादा जी रेडियो के वाल्यूम ला बढ़ा दीस अउ लइका मन ला डाँटिस- ' इहाँ ले भाग जावव नालायकों! नइ तो पिटाई कर देहूँ! '

       फेर पाँच मिनट बाद छत्तीसगढ़ी समाचार सुनाई परिस- ' ये आकाशवाणी रायपुर हे। अब आप मन रामलाल ले समाचार सुनव।..... बिलासपुर म सिटी ई बस टर्मिनल कांप्लेक्स बर अनुपूरक बजट म 12 करोड़ स्वीकृत करे गे हे। रायगढ़ म नालंदा परिसर बिकसित किये जाही। उहाँ स्मार्ट अउ हाईटेक लाइब्रेरी बर 20 करोड़ के आवंटन करे गे हे। दुर्ग म तीन किलोमीटर के स्मार्ट रोड बर 15 करोड़ रूपिया के आवंटन अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग बर  ......' एही बेरा लइका मन के झगरा-लड़ाई म रेडियो के आवाज दब गे। दादा जी वाल्यूम बढ़ाय के जतन करिस त अंते-तंते बटन घुम गे अउ स्टेशन बदल के रेडियो ह घों-घों करे लगिस! थोरकुन देर बाद दादा जी मन मार के घर ले बाहिर निकलिस अउ चौंकी-परसार म बइठ गे। 

        ' जै जोहार सरपंच जी! ' परोसी के गोठ ला सुन के दादा जी हड़बड़ा गे। 

       ' सरपंच काबर कहत हस पटेल जी! मैं तो सरपंच पति हों! ' - दादा जी परोसी के कुटिल हँसी ला देख के सफाई दीस। 

         ' एकेच्च बात हे! आज के छत्तीसगढ़ी समाचार सुने हव का ? ' - परोसी के चेहरा म व्यंग के भाव रहिस। 

         ' नइ सुन पाँय पटेल जी। कुछु खास बात हे का ? '

         ' बधाई हो, आपके माँग अनुसार पाँच करोड़ रूपिया छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग बर मुख्यमंत्री जी स्वीकृत कर देहें हें!' - दादा जी चौंक गीस अउ परोसी कोती देखिस त पटेल जी दूसर कोती मुहूँ कर के मुचमुचावत रहे। 

     ' सच कहत हौ पटेल जी! आपके मुँहू मा घी-शक्कर। '

    ' अरे! मैं लबारी काबर मारहूँ। कालि के पेपर म पढ़ लिहा। '   परोसी के चेहरा ला देख के दादा जी ये समझ नि पावत रहिस कि ओकर बात ला सच माने कि झूठ!


                               ( 2 )


         दादा जी रात के आठ बजे खाना खा के सुते बर अपन कमरा म चल दीस। आज रात दादा जी ला ठीक से नींद नि आवत रहिस। सोचत रहिस- ' सचमुच पाँच करोड़ रूपिया के आवंटन हमन ला मिल जाही त का करबो?...... कतकोन पुराना छत्तीसगढ़ी ग्रंथ मन ला इकट्ठा करके रिप्रिंट करवाबो जेमन इहाँ-उहाँ परे हें अउ नष्ट होवत हें। तहसील जिला अउ राज्य स्तर मा बड़े-बड़े सम्मेलन अउ वर्कशाप करइबो। छत्तीसगढ़ी लिखइया साहित्यकार मन ला खाली प्रमाणपत्र अउ मोमेन्टो देके सम्मानित नि करन बल्कि  ओकर साथ धनराशि घलो देबो। ........' अइसने कतकोन बात सोचत-सोचत दादा जी के नींद परगे। 

       दूसर दिन अखबार आइस त दादा जी ला कोनो मेर शुभ समाचार नि दिखिस। चौंकी-परसार म बइठे-बइठे सबो पन्ना ला दू-तीन बार पलट दारिस। 

        ' सातवाँ पेज के नीचे कोती ला देखव। आप मन के नानकुन समाचार छपे हे! ' - परोसी के व्यंग भरे आवाज सुनाई परिस। ये हा छाती म मूँग दरे वाला बात रहिस! अब परोसी घलो चौंकी-परसार म आ के बइठ गे! 

        दादा जी साँतवा पेज ला पलट के देखिस त नानकुन समाचार छपे रहय - ' छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कर्मचारियों-अधिकारियों को वेतन देने के लिए पैसे कम पड़ रहे थे इसलिए अनुपूरक बजट में 20 लाख रूपयों का आवंटन किया गया है। '

         दादा जी मने-मन परोसी ला गारी दीस- ' हरामी कालि झूठ बोले रहिस! अउ अभी मोर  मुड़ उपर आ के बइठे हे! '- फेर  दादा जी के चुचुवाय मुँहू ला देखत परोसी मुचमुचावत खिसक गे। एही देखे बर तो कालि लबारी मारे रहिस! हस्ताक्षर अभियान म परोसी पटेल जी घलो शामिल रहिस फेर दादा जी के धुर बिरोधी रहिस। एकर एक कारण एहू रहिस कि सरपंची चुनाव म परोसी के घरवाली हारे रहिस तेकर सेती बेरा-बेरा म दादा जी ला टोंचे त ओला मानसिक सुख मिले। 

          थोरकुन देर बाद ये सोचत-सोचत दादा जी के मन हा कलपत रहिस अउ पीरा म भर के आँसू टपके लगिस कि हमर छत्तीसगढ़ी भाषा ह एक ठिन स्मार्ट रोड के पुरता घलो नि हे!

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[12/4, 7:14 PM] ओम प्रकाश अंकुर: आदरणीय विनोद वर्मा जी आप मन "पांच करोड" कहिनी के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के संगे- संग बजट के कमी के कारण छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के दुर्दशा के सजीव चित्रण करे हावव।

अभी संस्कृति विभाग के अधीन छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के स्थिति अउ सोचनीय होगे हावय। सिर्फ कवि, लेखक मन के किताब ह छपत हे। कृतितकार मन ल बस बीस किताब देय जावत हे जउन ह 'ऊंट के मुंह म जीरा' बरोबर हावय। बेचारा कवि,लेखक मन अपन किताब ल कोन ल देय अउ कोन ल नइ देय थथमरा गे हावय। साहित्ययिक आयोजन बर संस्कृति विभाग के पास एको कनक बजट नइ हे। आवेदन देते सात संस्कृति विभाग के सचिव के एके टप्पा बोल रहिथे -" हमारे संस्कृति विभाग के पास साहित्यिक आयोजन के लिए बजट ही नहीं है। हम कुछ नहीं कर सकते?" 

पाछू छै बछर ले छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के स्थिति एकदम खराब होगे। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग डहन ले जउन प्रांतीय सम्मेलन होय वहू ह बंद होगे। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कुर्सी ह छै बछर ले अपन अध्यक्ष के अगोरा करत छटपटावत हे कि कब तक मोर हीनमान होवत रहि। छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के आत्मा ह कलपत हे। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ल एक स्वतंत्र संस्था होना अब्बड़ जरूरी हे। संस्कृति विभाग के अधीन रहिते छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग   अउ छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन ल बने मान -सम्मान नइ मिल सकय।28 नवंबर के दिन छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस म माई पहुना के रूप म पधारे मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय जी ह छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ल एक स्वतंत्र संस्था के रूप म राखे जाहि कहिके घोषणा करे हावय। देखव एला कब लागू करते! छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष पद म नियुक्ति घलो बहुत जरूरी हे। पाछू सरकार ह पांच बछर म कोनो ल अध्यक्ष नइ बना के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग अउ छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन ल अब्बड़ नुकसान पहुंचाइस। यहू सरकार ल बछर भर होगे। अब सुनई देवत हावय कि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ल जल्दी अध्यक्ष मिल जाहि। बने बात हे। सबो छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन ल अपन मुखिया के अगोरा हे। काकरो मुंड़ म पागा बंधा जातिस त छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के काम काज म अउ बढ़वार होतिस। नानकुन कहिनी के माध्यम ले बेवस्था पर जमगरहा चोट करे हावव।🙏🏻🙏🏻🌷🌷🌹🌹

कहानी: बड़ोरा


कहानी: बड़ोरा

पोखन लाल जायसवाल

        मनखे रोवत आथे त दुनिया हाँसथे। जब जाथे, त दुनिया ल रोवा के जाथे। दुनिया के ए  आवाजाही म मुठा बाँधे आथे अउ हाथ पसारे जाथे। बँधाए मुठा अइसे लगथे कि कोनो बड़का संकलप ले के मनखे आय हावे। पसारे हाथ बताथे कि भगवान मोर ले चूक होगे। जम्मो संकलप ल भुलागेंव। मोला क्षमा दिहा भगवान!। मैं तोर सरण मं आवत हँव। मोला तार दिहा... भग...वान।

        मनखे भवसागर मं आ घमंड करे लगथे। नाना परकार के घमंड मं ओहर पाँव ले मुड़ी जात सना जथे। सब कुछ इहें के आय अउ इहें च रहि जाना हे। तब ले घमंड मं बुड़े मनखे खुद ल भगवान ले बड़े समझे धर लेथे। रुपवान अउ धनवान होगे त तो अउ ....भुला जथे कि रूप चार दिन के चाँदनी फेर अँधियारी रात सहीं होथे। पइसा तो हाथ के मइल आय। अभी हे, त हे...नइ.. ते...भइगे। एक बड़ोरा आथे अउ सबो... उड़ा जथे। कुछु नइ बाँचय। मनखे के जिनगी घलव दुख-पीरा के बड़ोरा ल ठेलके आगू बढ़थे। 

        जिनगी ल चलाय बर धन दौलत जरूरी हे। फेर जतिक भी नगदी रहिथे, वो कब खिरथे, कुछुच पता नइ चलय। इही बात आय कि लोगन 'चल' ले जादा 'अचल' सम्पत्ति ल मान देथें। नगदी थोरको जादा होइस कि गहना-गुँठा अउ जमीन म लगा देथें। जउन ह अड़चन घरी काम आथे। दू पइसा आगर देथे, वो अलगे...निमगा ठगे तो नइ। एकर रेहे मनखे संबल पाथे। दूसर मेर हाथ फैलाए के नौबत नइ आवय। फेर... गरब घलव करथे। बिरथा के गरब। तहान घमंड।

        लोगन समधी सजन के नता जोरत खानी घर-कुरिया अउ खेती के हिसाब लगाथें। एक किसम ले जुरत नता बर सुरक्षा निधि होथे। सुरक्षा निधि। जमीन सबो झन बिसा तो नइ सकँय, त गहना-गुँठा कोति चेत करथें। सुनहर अउ रमसीला सोनार दूकान गे रहिन। बहू बर गहना बिसाए। बिहाव के अकताहा बिसा-बिसा के राखत हावँय। कोनो भी बड़का कारज के जोरन अइसने तो धीरे-धीरे जोरे ल परथे। दू दिन के काज रही, फेर ओकर जोगासन  बर कतको दिन पूर जथे।

       हाँ ! सुनहर तो नाँव हावे, सियान कका के। रेगहा-कुता मिला के पाँच छे एकड़ के किसानी कर लेवय ओहर। ओकर संग म वोकर गोसाइन रमसीला काकी घलो बने मरे-जिए ले कमावय। खेती अपन सेती, नइ ते नदिया के रेती। इही गोठ ल जिनगी म गठरी बाॅंधे दूनो परानी रात-दिन खेते च म गड़े राहय। अपन दूनो लइका ल बने चेत करके पढ़ाइन। अब तो हाई स्कूल खुल गे हावय, गाॅंव म। वोकर पढ़े के दिन म प्राइमरी स्कूल के रहे ले पांचवी भर पढ़ पाय रहिस हे,वोहर। तहान ले बइला-भैंसा चराय म भुलागे। ...तब वोकर बबा मन पाँच भाई रहिन। बँटावत-बँटावत सब बँटागे। माया अउ मया दूनो खिरे लग गे। बाँटे भाई परोसी बनगिन।....सुनहर तिर आज चार एकड़ हावय। दू एकड़ ल बिसाये हे अउ दू एकड़ पुरखौती के आय। ओकर ददा मन दू भाई रहिन। वहू मन पाय बाँटा ल मिहनत के परसाद एक ले दू एकड़ करे रहिन। सुनहर कका अपन बाप के इकलौता हरे।

       सुनहर कका कमती पढ़े हावे त का होगे? पढ़ई के मरम ल जानथे। तभे तो दूनो बेटा कोति बने धियान दिस। उॅंकर मन भर उन ल पढ़ाइस। सबे च ल नौकरी मिल जाय, अइसे कहाँ संभव हे।

       सबो पढ़ाथें। जतका झन पढ़थें, सरकारी नौकरी बर परीक्षा घलाव देथें। फेर... नौकरी पाये बर मेरिट लिस्ट म ऊपर आय ल पड़थे। तब कहूँ नौकरी पक्का होथे। नौकरी पक्का होय ऊप्पर ले खेल घलव होथे। पोस्टिंग के खेल। उत्ती के ल बुड़ती मुड़ा। रक्सेल के ल भंडार छोर। माने ...जिला बदर। जइसे सौदा नइ करइया ह ...कोनो ...अपराधी आय।... मुख्य लिस्ट...फेर ... वेटिंग...जम के खेल। वेटिंग लिस्ट म घालमेल के गुंजाइश बनावत अफसर मन बड़ चतुरई करथें।...जेकर ले कुछ के जिनगी म घुप्प ॲंधियारी हो जथे। 

       अब के दाई-ददा मन पढ़ई-लिखई के नाॅंव म लइका ले कोनो बुता नि करावॅंय। सबो खेती किसानी ले दुरिहा रहय कहिके सोचथें। अइसन म आखिर खेती कोन करही? यहू सोचे ल परही। अब के लइका मन तो आड़ी-काड़ी नि करॅंय। कटाय अँगरी म नइ मूतँय। जिहाँ खेले कूदे रही, पछीना बोहाय रही, तिहाँ बर मनखे के हिरदे म जुड़ाव रही। मोर आय कहिके लगाव रही। नइ ते खेती भुइयाँ माटी के कुटका बस जनाही। जब चाही तब...बेच... खाही।

       एक समय रहिस, जब लइका मन रोपा लगाय जावॅंय। रोपा लगई के पइसा ले कापी-किताब बिसावॅंय। गणपति पूजा करॅंय। धान लुवई घरी बोझा डोहारॅंय। सिला बिनॅंय। वहू ल स्कूल जाय के पहिली अउ स्कूल ले आय के पाछू। सिला बिने धान के मुर्रा अउ मुर्रा लड्डू दूनो बिसावँय। जादा बिने ले कोनो चिन्हारी बिसावँय। बढ़ोना मिला के उखरा पाँव बर बने सरिख जूता-चप्पल लेवँय। गाँव-गँवतरी जाए बर कपड़ा लत्ता। अब के लइका मन टीवी अउ मोबाइल म मुड़ी गड़ियाय रहिथें। जड़ ले कटत हावँय। अइसन म खेती-बुता जानॅंय, न अउ आने बुता ल जानँय। तव जिनगी तो ॲंधियार होबेच करही। तइहा के बात ल बइहा लेगे। 'जनम दे हे ल जाने हन, करम ल थोरे देबोन', कहिके पिंड छुड़ाय नइ जा सकय। करम करे बर सिखाय ल परही...वहू ल नेक करम। नइ ते अपने लइका बिन मारे मरही। हमीं ल पदोही...हमरे मुड़ म मुतही। पक्का हे। एक दिन हमर जाँगर थकही त उन ल कमाय बर परही। यहू बात आजे बताय के हे।

०००

          कमा-कमा के जाँगर एक दिन थकबे करथे। अउ उमर जइसे-जइसे खिरकत जाथे, अपन परभाव दिखाबे करथे। जाॅंगर जुवाब देहे ल धर लेथे। घंटा दू घंटा के बुता करिस, तहान थके लगथे। मउसम बदलिस नहीं के, फट ले जुड़-खांसी घलव अपन डेरा बना लेथे। अइसने सुनहर के थके जाॅंगर उमर के संग जवाब दे ल धर ले राहय। रमसीला काकी के बुता अउ बाढ़े लगिस। कभू-कभू दूनो झन मं खटपिट होवय। 

        "महूँ ल थकासी लागथे। तहीं भर नइ कमावस। महूँ ह कमाथँव। मोरो जाँगर थकथे। मैं तो बाहिर ले आके, घर म घलव खटथँव।" रमसीला काकी के कहना सोला आना आय। ओकर तन ह लोहा-पखरा के तो नइ बने हावय, के नइ थकही। थकबे करही।

        मशीन गरम झन होवय, कहिके चलत मशीन ल थोकिन बंद करथे। जुड़ावन दे कहिथें। जब मनखे ल मशीन के अतिक संसो रहिथे। त रमसीला काकी के अपन बर संसो करई कोनो गलत नइ हे। सबो ल सुरताय बर लागथे। रमसीला काकी सुरताना चाहथे त एमा ओकर का दोष? 

       रेगहा-कुता के तीन एकड़ खेती जेकर भरोसा कभू कखरो आगू हाथ फैलाय के नौबत नइ आइस। ढलती उमर मं जाॅंगर थके ले उही खेती अब अजीरन लागत हावय। 

        बने होइस कि दू बछर पहिली खेत मालिक किसुन ह शहर ले लहुटे पाछू कुता के दू एकड़ खेती के सौदा वापिस ले ले रहिस। जेन ह अपन परोसी के दू एकड़ सँघार के बने मन लगा के किसानी करत हावय। शहर मं मोटर-गाड़ी, राइसमिल अउ बड़े-बड़े कारखाना मन के धुँगिया, मच्छर अउ नाली के बस्सउना हवा नइ सहाइस। गाँव के शुद्ध हवा मं रहइया किसुन घेरी-बेरी बीमार परे लगिस। जतका कमाय, ततका दवा-दारू मं लग जावय। हाथ कुछ नइ बाँचत राहय। दूनो परानी म मनमुटाव बाढ़े लगिस। जिहाँ पइसा-कौड़ी के खॅंगती होथे, उहें उटका-पैरी अउ झगरा होथे। घर के सुमता(एका) छरियाय लागिस। किसुन सुजानिक रहिस। ओला समझ मं आगे रहिस कि शहर आके ओहर बड़ जंजाल म फॅंसगे हावय। बड़ बिचारिस। एकर ले मोर गाॅंव बने हे। इही बिचार संग एक दिन शहर ले अपन गाँव, अपन छाॅंव लहुट के आगिन। जब ले शहर ले लहुटे हावँय, उँकर जिनगी सुलिनहा लागत हे। उँकर जिनगी के हाँसी-खुशी लहुट गे हे। दिन बने-बने बीते लगिस। झगरा के नाँव बुता गे हावय। जउन ह शहर म उँकर जिनगी म जहर-महुरा घोरत रहिस।

०००

       .... सुनहर अउ रमसीला अपन दूनो बेटा के बिहाव के सोचे लगिन। दू-चार जघा बात जनाय रहिन। कहूँ मेर बने सरिख नोनी होही त आरो देहू। तीन-चार महीना बीत गे कहूँ कोति ले कोनो सोर नइ आइस।... परोसी दरी साँप नि मरय, कहि सुनहर दू-चार झिन सगा घर गिस। पूछिस। फेर कहींच कोनो आरो नइ मिलिस। ...चार महीना बर बिहाव के नेत नइ जम पाइस।.....आसो ले दे के दूनो बेटा बर नोनी मिल पाइस। सिरतोन बिहाव ह कोनो ठठ्ठा दिल्लगी नोहय। संजोग वाले होहीं, तिंकरे चप्पल बिहाव के नाँव मं नइ घिसावत होही। दूनो डाहर ले तार जुरई बड़ मुश्किल आय। कोनो खेल-तमाशा अउ घरघुंदिया नोहय, बर बिहाव ह। जे ल मन नइ आय म दू चार दिन बाद बिझार दे। 

         सुनहर बहू खोजत ले थक गे रहिस। बड़ परेशान हो गे रहिस। संसो मं दुबराय ल धर ले रहिस। ...कहूँ मेर सुनहर के मन आवय, त बेटा मन के मन नइ आवय। कहूँ मेर दूनो के मन आतिस, त लड़की वाले मन ल मन नइ आय। कभू दूनो कोति जमे बानिक लगय त बात रास-बरग मं आ के अटक जय। कुछ न कुछ बाधा परय। अइसे-तइसे माघ ले चइत बीत गे। 

        गाँव के मनखे मन, जे मन म आवय ते गोठ करँय। जे मुँह, ते गोठ। लोगन मन गोठियाय लागिन कि सुनहर ह बने दाइज डोर के लालच म बने बने नता ल हीनत हावय। हड़िया के मुँह ल परई म तोप लेबे, फेर मनखे के मुँह ल कामा तोपबे? .....लगती बइसाख म सिध परिस।

       .... बिहाव के दिन आइस। बड़ धूम-धड़ाका ले बिहाव होइस। इंजीनियरिंग करे बेटा के आघू सुनहर के एक नइ चलिस। पइसा ल पानी बरोबर बोहावत गिस। गाँव-गोढ़ा म जइसन कभू नइ होय राहय, तइसन करिस। बफर सिसटम म खवाना। गाँव म नेंग-जोंग के बेरा गड़वा बाजा...बरात बर डीजे। बरात बर दर्जन भर गाड़ी। बरतिया मन के पूरा खियाल। जेन ल जे चाही, उही ब्रांड के...। साज-सज्जा के तो पूछ झन। महाराजा सेट।... कुछू बर टोंकय त बेटा काहय- "शादी एक बार होनी है, बार-बार नहीं। लोग क्या कहेंगे? एक इंजीनियर की शादी और...." मोबाइल के घंटी बाजे ले बात ल आधा ए छोड़ मोबाइल म भुलागे।  

       सुनहर ह बेटा के गोठ सुन.. बुदबुदाइस भर। "पइसा कमाबे तब पता चलही बाबू.... कतिक मिहनत ले पइसा आथे।....बाप के कमई उड़ाय म का जियानही।" आज सुनहर के मन टूट गे राहय। बिहाव के नाँव ले उपरछवा हाँसत भर हावे। भीतर ले बड़ रोवत हे। रोही काबर नहीं, जब लहू-पछीना के कमई पानी सहीं बोहावत रही अउ चाह के सकला नइ कर पाही।

०००

       ....सुख के छइहाँ म समय कब बीतथे, पता नइ चलय। दुख के घाम रहे ले एक छिन ह बड़ जियानथे। काटे नइ कटय, चाबे ल कुदाथे। घाम रहय ते छाँव, जिनगी तो जिए ल परथे। रो के जी, चाहे हाँस के। जिए के नाँव तो जिनगी आय। समय निकलत गिस। मुठा म हमाय रेती बरोबर।

         बहू हाथ के पानी पिए के साध, साध रहिगे, सुनहर अउ रमसीला के। दू महीना बीते नइ पाइस। अवई-जवई नइ जमत हे, कहिके बड़े बेटा-बहू शहर के रस्ता धर लिन। 

         छोटे बेटा बड़े बेटा ले जादा खर निकलिस। जेन ह नज़र मिला के गोठ नइ कर सकत रहिस। ओकर मुँह उले लगिस। उछरत हावे। आगी ले अँगरा ताव दिखावत हावे। 

       "मोर नाँव के खेती ल मैं सौदा कर डारे हँव। रायपुर म फ्लेट बिसाहूँ कहिके। उहें कमाहूँ-खाहूँ, खेती म का धरे हावय? कागज पत्तर ल कति लुकाय हस, तेन ल दे देबे मोला। नइ ते मेंह थाना-कछेरी के रस्ता रेंगाहूँ। घी निकाले ल आथे मोला।"

          रजधानी म राहत दू साल होय हे बाबू ल, उहाँ के हवा लग गे। गाँव के धुर्रा-माटी ल भुलागे। अउ खेती सोन के अंडा होगे। जेन ल बेच फ्लैट के सपना म सवार हे। वाह रे कलजुग... दू नया पइसा नइ लगाये ए अउ खेती के मालिक बनगे...।

         सुनहर के भरम टूटगे। बड़ गरब रहिस दू झिन बेटा हावे कहिके। ...ओकर संग का होवत हे? समझ नइ पावत हे। का सोचे रहिस अउ का होवत हावे? काँहीं च समझ नइ आवत हे ओला। बिहाव पाछू मुड़ ऊपर चार लाख रूपया के चढ़े करजा ....

         मोहलो-मोहलो म बहू मन बर गहना-गूँठा बिसाय रहिन। सबो अइसन करथें। का जानय अइसन होही? भल ल भल समझत सपना सँजोय रहिन हें दूनो परानी। थोर बहुत राखे पइसा घलव खिरक गे राहय। संसो बाढ़े लगिस। कभू करजा ल जाने नहीं, तउन आज करजा म लदा गे हे। खपलाए करजा ए। बेटा मन तो हाथ खींच ले हावय। खेती भरोसा करजा उतारे परही। 

         संसो म बुड़े गुनान करत हावे कि बिसाय जमीन ल हाथ ले बिहाथ कर डारेंव। मोर आँखी मूँदे पाछू बेटा मन के होबे करतिस। अभी मोर नाँव म रहितिस त मोर बियाय लइका मोला आँखी नइ दिखातिस। बस इही गोठ रहिगे-अब पछताए का होत हे, जब चिरई चुग गे खेत।

        सुनहर अपन लहू-पछीना के कमई ले बिसाये दूनो एकड़ ल दूनो बेटा के नाँव म चढ़ाए रहिस। तब रमसीला के बरजई ल एको नइ धरिस। सरवन कुमार समझत रहिस हे ...दूनो बेटा ल। अउ निकलिन का...भुलागे रहिस कि कलजुग आय।

        वोकर जिनगी म बड़ोरा अवई ह अभी अउ बाकी रहिस। पुरखौती तीनों खेत के रस्ता चारों मुड़ा ले रुँधागे। सड़क के खाल्हे दू खेत पार के खेत मन मं धन्ना सेठ अउ दलाल मन के नजर गड़े हावे। तभे तो धन्ना सेठ मन मुहाँटी ल बिसा के घेरा बंदी कर डारिन। विकास के बड़ोरा म अइसने कतको खेत परिया परत हावँय। धान के कटोरा उरकत जावत हे। गरीबी म जीयत मनखे जमीन के भाव देख चउँधिया गे हे। पुरखौती पूँजी ल बेच महल टेकावत हे। किसानी भुइयाँ नाँव ले उतरे पाछू चढ़ै नहीं, एकर कोनो ल चेत नइ हे। सब ल पइसा के धुन सवार हे। ...सड़क म आवत हावे। सड़क हे कि सुरसा बने लीले बर दाँव लगाय हे। ...फोर लेन सिक्स लेन....आज नइ ते काली... लीले बिना राहय नहीं। पक्का ए।

        आय किसानी के दिन म....। करय ते करय का? कुछु च सूझत नइ हावय। अब का होही भगवान ?...संसो सँचर गिस। इही संसो म बुड़े कब नींद परिस ते सुरता नइ हे।... बिहनिया उठथे त देखथे कि वोकर एक ठन हाथ उठत नइ हे। मुँह ले आरो नइ निकलिस। उठे के कोशिश म खटिया ले उतरत खानी भकरस ले गिर परिस। कुछु गिरे के आरो सुन रमसीला आइस त बोमफार रो भरिस। ....परोसी मन आइन। लउहा-लउहा बिगन देरी करे अस्पताल लेगिन। अटैक के संग लोकवा हे। इही तो बताइस हे। लकठा के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ह। अउ कहिस," हायर सेंटर ले जाइए।" अउ तुरते रिफर कर दिस। 

       रायपुर के प्राइवेट अस्पताल लेगिन। डॉक्टर मन सुनहर कका के हालत ल देख झटकुन आई सी यू म भर्ती करिन। ऑपरेशन करे परही काहत रमसीला काकी ले कागजात म दसखत करवाइन। आयुष्मान कार्ड के भरोसा भर्ती होगे रहिस। दू लाख रुपया अउ खर्चा आही। हाथ जुच्छा रहिस। कति ले पइसा आतिस। रमसीला खेत ल बेच पइसा दे हे के भरोसा देवाइस। अउ ऑपरेशन करे के विनती करिस, तीन दिन मं दू लाख रुपया अउ जमा करे के मोहलत मिलिस।

        बड़े बेटा अपन नाँव म चढ़े खेत बेचे बर तियार नइ होइस, त रमसीला काकी अपन माँग के लाली बचाए बर उही दलाल ल फोन करत हावे, जेन ल चारे च दिन पहिली सुनहर कका ह मोर पुरखौती भुइँया ल जीयत भर नि बेचँव कहे रहिस। दलाल ह मौका के फायदा उठाय के मूड म दिखत हावे। अनाप-शनाप रेट बोलत हावे। 

       सुनहर कका के जिनगी म आए बड़ोरा विकास के बड़ोरा आय‌। कोन जनी थमही कि नइ थमही ते? सब ल बहारत-बटोरत उड़ा के, तो नइ ले जही, ए बड़ोरा बैरी ह? बड़ोरा के मन म काहे ? कोन जानत हावे? 

       कुछु होवय रमसीला काकी ल ए बड़ोरा थमे के अगोरा हावे। वोकर अंतस् ले एके आवाज आवत हे- ए बड़ोरा उँकर जिनगी ले जुच्छा हाथ लहुटही।

            ---०---

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला- बलौदाबाजार भाटापारा छग.हाँसथे। जब जाथे, त दुनिया ल रोवा के जाथे। दुनिया के ए  आवाजाही म मुठा बाँधे आथे अउ हाथ पसारे जाथे। बँधाए मुठा अइसे लगथे कि कोनो बड़का संकलप ले के मनखे आय हावे। पसारे हाथ बताथे कि भगवान मोर ले चूक होगे। जम्मो संकलप ल भुलागेंव। मोला क्षमा दिहा भगवान!। मैं तोर सरण मं आवत हँव। मोला तार दिहा... भग...वान।

        मनखे भवसागर मं आ घमंड करे लगथे। नाना परकार के घमंड मं ओहर पाँव ले मुड़ी जात सना जथे। सब कुछ इहें के आय अउ इहें च रहि जाना हे। तब ले घमंड मं बुड़े मनखे खुद ल भगवान ले बड़े समझे धर लेथे। रुपवान अउ धनवान होगे त तो अउ ....भुला जथे कि रूप चार दिन के चाँदनी फेर अँधियारी रात सहीं होथे। पइसा तो हाथ के मइल आय। अभी हे, त हे...नइ.. ते...भइगे। एक बड़ोरा आथे अउ सबो... उड़ा जथे। कुछु नइ बाँचय। मनखे के जिनगी घलव दुख-पीरा के बड़ोरा ल ठेलके आगू बढ़थे। 

        जिनगी ल चलाय बर धन दौलत जरूरी हे। फेर जतिक भी नगदी रहिथे, वो कब खिरथे, कुछुच पता नइ चलय। इही बात आय कि लोगन 'चल' ले जादा 'अचल' सम्पत्ति ल मान देथें। नगदी थोरको जादा होइस कि गहना-गुँठा अउ जमीन म लगा देथें। जउन ह अड़चन घरी काम आथे। दू पइसा आगर देथे, वो अलगे...निमगा ठगे तो नइ। एकर रेहे मनखे संबल पाथे। दूसर मेर हाथ फैलाए के नौबत नइ आवय। फेर... गरब घलव करथे। बिरथा के गरब। तहान घमंड।

        लोगन समधी सजन के नता जोरत खानी घर-कुरिया अउ खेती के हिसाब लगाथें। एक किसम ले जुरत नता बर सुरक्षा निधि होथे। सुरक्षा निधि। जमीन सबो झन बिसा तो नइ सकँय, त गहना-गुँठा कोति चेत करथें। सुनहर अउ रमसीला सोनार दूकान गे रहिन। बहू बर गहना बिसाए। बिहाव के अकताहा बिसा-बिसा के राखत हावँय। कोनो भी बड़का कारज के जोरन अइसने तो धीरे-धीरे जोरे ल परथे। दू दिन के काज रही, फेर ओकर जोगासन  बर कतको दिन पूर जथे।

       हाँ ! सुनहर तो नाँव हावे, सियान कका के। रेगहा-कुता मिला के पाँच छे एकड़ के किसानी कर लेवय ओहर। ओकर संग म वोकर गोसाइन रमसीला काकी घलो बने मरे-जिए ले कमावय। खेती अपन सेती, नइ ते नदिया के रेती। इही गोठ ल जिनगी म गठरी बाॅंधे दूनो परानी रात-दिन खेते च म गड़े राहय। अपन दूनो लइका ल बने चेत करके पढ़ाइन। अब तो हाई स्कूल खुल गे हावय, गाॅंव म। वोकर पढ़े के दिन म प्राइमरी स्कूल के रहे ले पांचवी भर पढ़ पाय रहिस हे,वोहर। तहान ले बइला-भैंसा चराय म भुलागे। ...तब वोकर बबा मन पाँच भाई रहिन। बँटावत-बँटावत सब बँटागे। माया अउ मया दूनो खिरे लग गे। बाँटे भाई परोसी बनगिन।....सुनहर तिर आज चार एकड़ हावय। दू एकड़ ल बिसाये हे अउ दू एकड़ पुरखौती के आय। ओकर ददा मन दू भाई रहिन। वहू मन पाय बाँटा ल मिहनत के परसाद एक ले दू एकड़ करे रहिन। सुनहर कका अपन बाप के इकलौता हरे।

       सुनहर कका कमती पढ़े हावे त का होगे? पढ़ई के मरम ल जानथे। तभे तो दूनो बेटा कोति बने धियान दिस। उॅंकर मन भर उन ल पढ़ाइस। सबे च ल नौकरी मिल जाय, अइसे कहाँ संभव हे।

       सबो पढ़ाथें। जतका झन पढ़थें, सरकारी नौकरी बर परीक्षा घलाव देथें। फेर... नौकरी पाये बर मेरिट लिस्ट म ऊपर आय ल पड़थे। तब कहूँ नौकरी पक्का होथे। नौकरी पक्का होय ऊप्पर ले खेल घलव होथे। पोस्टिंग के खेल। उत्ती के ल बुड़ती मुड़ा। रक्सेल के ल भंडार छोर। माने ...जिला बदर। जइसे सौदा नइ करइया ह ...कोनो ...अपराधी आय।... मुख्य लिस्ट...फेर ... वेटिंग...जम के खेल। वेटिंग लिस्ट म घालमेल के गुंजाइश बनावत अफसर मन बड़ चतुरई करथें।...जेकर ले कुछ के जिनगी म घुप्प ॲंधियारी हो जथे। 

       अब के दाई-ददा मन पढ़ई-लिखई के नाॅंव म लइका ले कोनो बुता नि करावॅंय। सबो खेती किसानी ले दुरिहा रहय कहिके सोचथें। अइसन म आखिर खेती कोन करही? यहू सोचे ल परही। अब के लइका मन तो आड़ी-काड़ी नि करॅंय। कटाय अँगरी म नइ मूतँय। जिहाँ खेले कूदे रही, पछीना बोहाय रही, तिहाँ बर मनखे के हिरदे म जुड़ाव रही। मोर आय कहिके लगाव रही। नइ ते खेती भुइयाँ माटी के कुटका बस जनाही। जब चाही तब...बेच... खाही।

       एक समय रहिस, जब लइका मन रोपा लगाय जावॅंय। रोपा लगई के पइसा ले कापी-किताब बिसावॅंय। गणपति पूजा करॅंय। धान लुवई घरी बोझा डोहारॅंय। सिला बिनॅंय। वहू ल स्कूल जाय के पहिली अउ स्कूल ले आय के पाछू। सिला बिने धान के मुर्रा अउ मुर्रा लड्डू दूनो बिसावँय। जादा बिने ले कोनो चिन्हारी बिसावँय। बढ़ोना मिला के उखरा पाँव बर बने सरिख जूता-चप्पल लेवँय। गाँव-गँवतरी जाए बर कपड़ा लत्ता। अब के लइका मन टीवी अउ मोबाइल म मुड़ी गड़ियाय रहिथें। जड़ ले कटत हावँय। अइसन म खेती-बुता जानॅंय, न अउ आने बुता ल जानँय। तव जिनगी तो ॲंधियार होबेच करही। तइहा के बात ल बइहा लेगे। 'जनम दे हे ल जाने हन, करम ल थोरे देबोन', कहिके पिंड छुड़ाय नइ जा सकय। करम करे बर सिखाय ल परही...वहू ल नेक करम। नइ ते अपने लइका बिन मारे मरही। हमीं ल पदोही...हमरे मुड़ म मुतही। पक्का हे। एक दिन हमर जाँगर थकही त उन ल कमाय बर परही। यहू बात आजे बताय के हे।

०००

          कमा-कमा के जाँगर एक दिन थकबे करथे। अउ उमर जइसे-जइसे खिरकत जाथे, अपन परभाव दिखाबे करथे। जाॅंगर जुवाब देहे ल धर लेथे। घंटा दू घंटा के बुता करिस, तहान थके लगथे। मउसम बदलिस नहीं के, फट ले जुड़-खांसी घलव अपन डेरा बना लेथे। अइसने सुनहर के थके जाॅंगर उमर के संग जवाब दे ल धर ले राहय। रमसीला काकी के बुता अउ बाढ़े लगिस। कभू-कभू दूनो झन मं खटपिट होवय। 

        "महूँ ल थकासी लागथे। तहीं भर नइ कमावस। महूँ ह कमाथँव। मोरो जाँगर थकथे। मैं तो बाहिर ले आके, घर म घलव खटथँव।" रमसीला काकी के कहना सोला आना आय। ओकर तन ह लोहा-पखरा के तो नइ बने हावय, के नइ थकही। थकबे करही।

        मशीन गरम झन होवय, कहिके चलत मशीन ल थोकिन बंद करथे। जुड़ावन दे कहिथें। जब मनखे ल मशीन के अतिक संसो रहिथे। त रमसीला काकी के अपन बर संसो करई कोनो गलत नइ हे। सबो ल सुरताय बर लागथे। रमसीला काकी सुरताना चाहथे त एमा ओकर का दोष? 

       रेगहा-कुता के तीन एकड़ खेती जेकर भरोसा कभू कखरो आगू हाथ फैलाय के नौबत नइ आइस। ढलती उमर मं जाॅंगर थके ले उही खेती अब अजीरन लागत हावय। 

        बने होइस कि दू बछर पहिली खेत मालिक किसुन ह शहर ले लहुटे पाछू कुता के दू एकड़ खेती के सौदा वापिस ले ले रहिस। जेन ह अपन परोसी के दू एकड़ सँघार के बने मन लगा के किसानी करत हावय। शहर मं मोटर-गाड़ी, राइसमिल अउ बड़े-बड़े कारखाना मन के धुँगिया, मच्छर अउ नाली के बस्सउना हवा नइ सहाइस। गाँव के शुद्ध हवा मं रहइया किसुन घेरी-बेरी बीमार परे लगिस। जतका कमाय, ततका दवा-दारू मं लग जावय। हाथ कुछ नइ बाँचत राहय। दूनो परानी म मनमुटाव बाढ़े लगिस। जिहाँ पइसा-कौड़ी के खॅंगती होथे, उहें उटका-पैरी अउ झगरा होथे। घर के सुमता(एका) छरियाय लागिस। किसुन सुजानिक रहिस। ओला समझ मं आगे रहिस कि शहर आके ओहर बड़ जंजाल म फॅंसगे हावय। बड़ बिचारिस। एकर ले मोर गाॅंव बने हे। इही बिचार संग एक दिन शहर ले अपन गाँव, अपन छाॅंव लहुट के आगिन। जब ले शहर ले लहुटे हावँय, उँकर जिनगी सुलिनहा लागत हे। उँकर जिनगी के हाँसी-खुशी लहुट गे हे। दिन बने-बने बीते लगिस। झगरा के नाँव बुता गे हावय। जउन ह शहर म उँकर जिनगी म जहर-महुरा घोरत रहिस।

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       .... सुनहर अउ रमसीला अपन दूनो बेटा के बिहाव के सोचे लगिन। दू-चार जघा बात जनाय रहिन। कहूँ मेर बने सरिख नोनी होही त आरो देहू। तीन-चार महीना बीत गे कहूँ कोति ले कोनो सोर नइ आइस।... परोसी दरी साँप नि मरय, कहि सुनहर दू-चार झिन सगा घर गिस। पूछिस। फेर कहींच कोनो आरो नइ मिलिस। ...चार महीना बर बिहाव के नेत नइ जम पाइस।.....आसो ले दे के दूनो बेटा बर नोनी मिल पाइस। सिरतोन बिहाव ह कोनो ठठ्ठा दिल्लगी नोहय। संजोग वाले होहीं, तिंकरे चप्पल बिहाव के नाँव मं नइ घिसावत होही। दूनो डाहर ले तार जुरई बड़ मुश्किल आय। कोनो खेल-तमाशा अउ घरघुंदिया नोहय, बर बिहाव ह। जे ल मन नइ आय म दू चार दिन बाद बिझार दे। 

         सुनहर बहू खोजत ले थक गे रहिस। बड़ परेशान हो गे रहिस। संसो मं दुबराय ल धर ले रहिस। ...कहूँ मेर सुनहर के मन आवय, त बेटा मन के मन नइ आवय। कहूँ मेर दूनो के मन आतिस, त लड़की वाले मन ल मन नइ आय। कभू दूनो कोति जमे बानिक लगय त बात रास-बरग मं आ के अटक जय। कुछ न कुछ बाधा परय। अइसे-तइसे माघ ले चइत बीत गे। 

        गाँव के मनखे मन, जे मन म आवय ते गोठ करँय। जे मुँह, ते गोठ। लोगन मन गोठियाय लागिन कि सुनहर ह बने दाइज डोर के लालच म बने बने नता ल हीनत हावय। हड़िया के मुँह ल परई म तोप लेबे, फेर मनखे के मुँह ल कामा तोपबे? .....लगती बइसाख म सिध परिस।

       .... बिहाव के दिन आइस। बड़ धूम-धड़ाका ले बिहाव होइस। इंजीनियरिंग करे बेटा के आघू सुनहर के एक नइ चलिस। पइसा ल पानी बरोबर बोहावत गिस। गाँव-गोढ़ा म जइसन कभू नइ होय राहय, तइसन करिस। बफर सिसटम म खवाना। गाँव म नेंग-जोंग के बेरा गड़वा बाजा...बरात बर डीजे। बरात बर दर्जन भर गाड़ी। बरतिया मन के पूरा खियाल। जेन ल जे चाही, उही ब्रांड के...। साज-सज्जा के तो पूछ झन। महाराजा सेट।... कुछू बर टोंकय त बेटा काहय- "शादी एक बार होनी है, बार-बार नहीं। लोग क्या कहेंगे? एक इंजीनियर की शादी और...." मोबाइल के घंटी बाजे ले बात ल आधा ए छोड़ मोबाइल म भुलागे।  

       सुनहर ह बेटा के गोठ सुन.. बुदबुदाइस भर। "पइसा कमाबे तब पता चलही बाबू.... कतिक मिहनत ले पइसा आथे।....बाप के कमई उड़ाय म का जियानही।" आज सुनहर के मन टूट गे राहय। बिहाव के नाँव ले उपरछवा हाँसत भर हावे। भीतर ले बड़ रोवत हे। रोही काबर नहीं, जब लहू-पछीना के कमई पानी सहीं बोहावत रही अउ चाह के सकला नइ कर पाही।

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       ....सुख के छइहाँ म समय कब बीतथे, पता नइ चलय। दुख के घाम रहे ले एक छिन ह बड़ जियानथे। काटे नइ कटय, चाबे ल कुदाथे। घाम रहय ते छाँव, जिनगी तो जिए ल परथे। रो के जी, चाहे हाँस के। जिए के नाँव तो जिनगी आय। समय निकलत गिस। मुठा म हमाय रेती बरोबर।

         बहू हाथ के पानी पिए के साध, साध रहिगे, सुनहर अउ रमसीला के। दू महीना बीते नइ पाइस। अवई-जवई नइ जमत हे, कहिके बड़े बेटा-बहू शहर के रस्ता धर लिन। 

         छोटे बेटा बड़े बेटा ले जादा खर निकलिस। जेन ह नज़र मिला के गोठ नइ कर सकत रहिस। ओकर मुँह उले लगिस। उछरत हावे। आगी ले अँगरा ताव दिखावत हावे। 

       "मोर नाँव के खेती ल मैं सौदा कर डारे हँव। रायपुर म फ्लेट बिसाहूँ कहिके। उहें कमाहूँ-खाहूँ, खेती म का धरे हावय? कागज पत्तर ल कति लुकाय हस, तेन ल दे देबे मोला। नइ ते मेंह थाना-कछेरी के रस्ता रेंगाहूँ। घी निकाले ल आथे मोला।"

          रजधानी म राहत दू साल होय हे बाबू ल, उहाँ के हवा लग गे। गाँव के धुर्रा-माटी ल भुलागे। अउ खेती सोन के अंडा होगे। जेन ल बेच फ्लैट के सपना म सवार हे। वाह रे कलजुग... दू नया पइसा नइ लगाये ए अउ खेती के मालिक बनगे...।

         सुनहर के भरम टूटगे। बड़ गरब रहिस दू झिन बेटा हावे कहिके। ...ओकर संग का होवत हे? समझ नइ पावत हे। का सोचे रहिस अउ का होवत हावे? काँहीं च समझ नइ आवत हे ओला। बिहाव पाछू मुड़ ऊपर चार लाख रूपया के चढ़े करजा ....

         मोहलो-मोहलो म बहू मन बर गहना-गूँठा बिसाय रहिन। सबो अइसन करथें। का जानय अइसन होही? भल ल भल समझत सपना सँजोय रहिन हें दूनो परानी। थोर बहुत राखे पइसा घलव खिरक गे राहय। संसो बाढ़े लगिस। कभू करजा ल जाने नहीं, तउन आज करजा म लदा गे हे। खपलाए करजा ए। बेटा मन तो हाथ खींच ले हावय। खेती भरोसा करजा उतारे परही। 

         संसो म बुड़े गुनान करत हावे कि बिसाय जमीन ल हाथ ले बिहाथ कर डारेंव। मोर आँखी मूँदे पाछू बेटा मन के होबे करतिस। अभी मोर नाँव म रहितिस त मोर बियाय लइका मोला आँखी नइ दिखातिस। बस इही गोठ रहिगे-अब पछताए का होत हे, जब चिरई चुग गे खेत।

        सुनहर अपन लहू-पछीना के कमई ले बिसाये दूनो एकड़ ल दूनो बेटा के नाँव म चढ़ाए रहिस। तब रमसीला के बरजई ल एको नइ धरिस। सरवन कुमार समझत रहिस हे ...दूनो बेटा ल। अउ निकलिन का...भुलागे रहिस कि कलजुग आय।

        वोकर जिनगी म बड़ोरा अवई ह अभी अउ बाकी रहिस। पुरखौती तीनों खेत के रस्ता चारों मुड़ा ले रुँधागे। सड़क के खाल्हे दू खेत पार के खेत मन मं धन्ना सेठ अउ दलाल मन के नजर गड़े हावे। तभे तो धन्ना सेठ मन मुहाँटी ल बिसा के घेरा बंदी कर डारिन। विकास के बड़ोरा म अइसने कतको खेत परिया परत हावँय। धान के कटोरा उरकत जावत हे। गरीबी म जीयत मनखे जमीन के भाव देख चउँधिया गे हे। पुरखौती पूँजी ल बेच महल टेकावत हे। किसानी भुइयाँ नाँव ले उतरे पाछू चढ़ै नहीं, एकर कोनो ल चेत नइ हे। सब ल पइसा के धुन सवार हे। ...सड़क म आवत हावे। सड़क हे कि सुरसा बने लीले बर दाँव लगाय हे। ...फोर लेन सिक्स लेन....आज नइ ते काली... लीले बिना राहय नहीं। पक्का ए।

        आय किसानी के दिन म....। करय ते करय का? कुछु च सूझत नइ हावय। अब का होही भगवान ?...संसो सँचर गिस। इही संसो म बुड़े कब नींद परिस ते सुरता नइ हे।... बिहनिया उठथे त देखथे कि वोकर एक ठन हाथ उठत नइ हे। मुँह ले आरो नइ निकलिस। उठे के कोशिश म खटिया ले उतरत खानी भकरस ले गिर परिस। कुछु गिरे के आरो सुन रमसीला आइस त बोमफार रो भरिस। ....परोसी मन आइन। लउहा-लउहा बिगन देरी करे अस्पताल लेगिन। अटैक के संग लोकवा हे। इही तो बताइस हे। लकठा के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ह। अउ कहिस," हायर सेंटर ले जाइए।" अउ तुरते रिफर कर दिस। 

       रायपुर के प्राइवेट अस्पताल लेगिन। डॉक्टर मन सुनहर कका के हालत ल देख झटकुन आई सी यू म भर्ती करिन। ऑपरेशन करे परही काहत रमसीला काकी ले कागजात म दसखत करवाइन। आयुष्मान कार्ड के भरोसा भर्ती होगे रहिस। दू लाख रुपया अउ खर्चा आही। हाथ जुच्छा रहिस। कति ले पइसा आतिस। रमसीला खेत ल बेच पइसा दे हे के भरोसा देवाइस। अउ ऑपरेशन करे के विनती करिस, 

जिला- बलौदाबाजार भाटापारा छग.


बइगा के चक्कर

 बइगा के चक्कर


गनपत साठ साल तक कभू सुई-पानी ल नइ जानिस। गियानी मन कहिथे-कि उमर के संग-संग शरीर घलो जवाब दे लगथे। उही गनपत के संग घलो होइस।

       गनपत अउ परषोत्तम बचपन के संगवारी आवय। संगे खेलिन-पढ़िन। बर-बिहाव घलो दुनों के एके साल होइस। खेती-किसानी मा एक-दूसरा ल जरूर पूछी-के- पूछा होवय। धान-पान के मिंजाई-कुटाई करे के बाद एक-दूसरा के घर झरती जरूर खाये। 

           वो दिन परषोत्तम के मिंजाई के झरती रिहिस। गनपत ल खाये बर बुलाइस। खा के आइस अउ ओकर दुसरइया दिन गनपत के पेट पीरा उमड़गे। गनपत के गोसाइन सुकवारो फ़नफनाये ल लागिस। हाँ, अउ जा बने टोंटा के आवत ले खाबे। कभू तो खाये नइ हस न। जइसन करनी, तइसन भरनी। कतको बरजे हँव, भागबती के मनखे संग संगति मत कर। उँकर घर मत जा, लोगन मन भागबती ल गजब सुगाथे। फेर कहना ल नइ माने। अब भुगत। बात बढ़ाये ले बात बाढ़थे। इही सोच के गनपत चुप सुन लिस।

          सुकवारो, गनपत ल चैतू बइगा कर लेगिस। चैतू बइगा कर वइसे तो गजब दुरिहा-दुरिहा के मनखे मन अपन समस्या लेके आवय। चैतू बइगा गनपत ल  फूँकीस, भभूत दिस अउ सात सम्मार ले उपास रहे के सलाह दिस। बोलिस कि तोर ऊपर टोना करे हे। देवी पूजा के खरचा डेढ़ हजार लगही। मँय सिध करके मुँदरी देहुँ वोला पहिरबे। गनपत हव किहिस। फेर सात सम्मार के पूरत ले दुखी मनखे शांत कइसे बइठ पातीस। गनपत, सुकवारो ल किहिस- सुकवारो, मँय हर नांदगाँव जा के डॉक्टर ल देखाये रहितेव। स्मार्ट कार्ड तो हावेच। कुछ रुपया आये-जाए अउ दवई- बूटी बर दे दे रहितेस। सुकवारो किहिस- कोई बीमारी होये हे का? टोना-जादू ल बइगच मन सुधारही। अउ बीमारी घलो होय होही ते फूँक-झार करवाये बिना डॉक्टर के सुई-पानी घलो काम नइ करे। रामकली के ल नइ सुने हस का? जब मूँड़ पीरा उमड़िस तब कई झन डॉक्टर मन कर इलाज करवाइस। रुपया खोवार करिस। जब अंकालू बइगा कर फूँकवाइस तभे बने होइस। तहूँ जा पहिली अंकालू बइगा कर फूँकवा के आ।

       गनपत अंकालू बइगा कर चाँउर अउ नींबू धरके गिस। अंकालू किहिस- जबरदस्त तोर पाछु परे जी। फेर तँय चिंता झन कर मँय हँव न। वो कइसन सोधे हरे तेन ल मँय देख लेहुँ। थोरिक खरचा लगही, पूजा के समान बर। गनपत पूछिस- कतका लग जाही? अंकालू बइगा किहिस- जादा नहीं, तीन हजार लगही। तोर घर ल घलो बंधेज करे ल पड़ही। वो सब इही रुपया मा हो जाही। अउ तोला पाँच बिरस्पत ले उपास रहना हे। गनपत मरता सो का नइ करता। हव किहिस। 

          गनपत घर मा आइस, तब सुकवारो पूछिस- कइसे कमल के बाबू, बइगा का किहिस? गनपत बइगा के कहे जम्मो बात ल दुहराइस। सुकवारो किहिस- ये दे होइस न, एक काँवरा खायेस अउ लगादेस तीन हजार के चूना। अब वोकर बताये नियम ल कर। गनपत किहिस- चैतू बइगा तो सम्मार के उपास कहे रिहिस वोला कइसे करंव? सुकवारो किहिस- वहू दिन उपास रही जा। का होही। कते दिन के फल मिल जाही कोन जानत हे। गनपत सम्मार अउ बिरस्पत दुनों दिन उपास रहे लागिस। फेर गनपत के पेट पीरा ठीक नइ होइस। तब सुकवारो, गनपत ल फत्तू बइगा कर लेगिस। फत्तू बइगा देवी खरचा बर एक हजार लगही किहिस। दुख मा परे मनखे का करे, फत्तू बइगा ल घलो एक हजार रुपया दिस। फत्तू बइगा गनपत ल शनिच्चर के उपास रहे के सलाह दिस। अब गनपत हप्ता में तीन दिन, सम्मार, बिरस्पत अउ शनिच्चर के उपास रहे लागिस। तभो पेट पीरा बने नइ होइस।  

          गनपत के सारा राकेश ल गनपत के पेट पीरा के  पता चलिस। तब देखे खातिर गनपत के गाँव आइस। बोलिस- का भाँटो तँय मोला पहिली खबर नइ करेस। मोर गॉंव तीर मा बिसम्भर नामी बइगा हे। कतको के बीमारी ओकर फूँके ले ठीक होय हे। टोनही मन ओकर देखे काँपथे। खरचा ल झन डर्रा। जान हे तब जहान हे। सुकवारो किहिस- अई हव गा राकेश तँय सिरतोन कहत हस। मँय भुलावत रेहेंव। जातो तँय अभिचे जा। ये तीन हजार ल रख। राकेश तोर भाँटो ल ले जा अपन संग। 

       गनपत, बिसम्भर बइगा कर गिस दू हजार के खरचा बताइस। नींबू काटिस अउ एक ठन तावीज ल पहिना दिस। हवन करे के आश्वासन दिस। इक्कीस मंगल ले उपास करे बर किहिस। अब सम्मार के उपास रहय। रात मा खाये अउ मंगल के फेर उपास रहय। बुधवार के खाये। बिरस्पत के उपास शुकरार के खाये शनिच्चर उपास। जादा उपास रहे ले गनपत के शरीर  दुबराय लागिस। हाड़ा-हाड़ा दिखे लागिस। गनपत ल लगिस कि अब वो नइ बाँचही। तब गनपत सुकवारो ल किहिस- सुकवारो तोर कहना मा बहुत बइगा-गुनिया कर डरेंव। अब एक घाँव डॉक्टर ल  घलो देखाये के मोर इच्छा होवत हे। मोला डॉक्टर कर ले चल। सुकवारो घलो बइगा ल देखात-देखात थकगे रिहिस। दूसरा दिन दुनो परानी नांदगाँव के सरकारी अस्पताल मा गिन। सोनोग्राफी होइस। पेट मा एक गाँठ पाये गिस। डॉक्टर ऑपरेशन के संगे-संग खून के घलो बेवस्था करे बर किहिस। सुकवारो अउ गनपत घर मा आइस तब गनपत के आँसू रहि रहि के झरत रहय। सुकवारो घलो अपन गोसइया के मया मा रोये लागिस।उही समय गनपत के संगी परषोत्तम गनपत ले गजब दिन होगे मुलाकात नइ होय हे सोच के मिले बर आइस। तब गनपत सबो बात ल फरिहा के बताइस। किहिस कि एक बॉटल खून कमल दे बर तियार हे, फेर डॉक्टर दू बॉटल खून केहे हे। एक बॉटल खून अउ कोनों दे बर तियार हो जातिस, तब कालीचे ऑपरेशन हो जातिस। परषोत्तम किहिस- तैं फिकर झन कर गनपत भाई। मोर उमर जादा होगे हे। मँय तो खून नइ दे सकँव फेर मोर बेटा राजू के खून देवइया मन ले गजब पहचान हे। वो कोनों ल भिड़ा लिही। तँय बस काली अस्पताल जाए के तियारी कर। गनपत अपन बेटा राजू ल सब बात बताइस। तब राजू तुरते अपन संगी मन ल खून दे बर तियार करिस। दूसरा दिन नांदगाँव मा गनपत के सफल ऑपरेशन होइस। तीन दिन के बाद छुट्टी कर दिस। गनपत, सुकवारो ल किहिस- देखे सुकवारो, तैं जेकर गोसाइन ल सुगात रहे आज उही काम आइस। बइगा मन के चक्कर मा कतको रुपया खोवार होगे। वो दिन ले गनपत अउ सुकवारो बइगा-गुनिया के चक्कर मा पड़े ले कान चाब के चेतगे। सुकवारो अब गनपत ल परषोत्तम घर जाए ले नइ रोके । आज घलो दुनों के घर कस सम्बन्ध हे।


             राम कुमार चन्द्रवंशी

              बेलरगोंदी (छुरिया)

             जिला-राजनांदगाँव