Thursday, 30 April 2026

लघुकथा - " बोहनी अउ पुरउनी " -मुरारी लाल साव

 लघुकथा - 

        "  बोहनी अउ पुरउनी "

               -मुरारी लाल साव 

 बजार आवत मेडम ला देख के भाजी बेचय्या डोकरी दाई बलाके कहिस " आना मेडम भाजी ले ले l " मेडम आके कहिथे " कइसे देवत हस भाजी ला दाई l" 

लेना सस्ता लगाहूँ बोहनी कर दे l" 

"10रुपिया जूरी ताय -लाल भाजी l"

'कुढ़ोनी खट्टा भाजी हर "

"दस रुपिया भाग ए l"

मेडम भाजी ल हाथ म गुर्मेटत कहिस -" उल्लर हे पुरो ना l"

"ले पुरो देथँव l"

"अउ पुरो ना "

" महंगा के भाजी ए मेडम  "

"ले ना अउ पुरो -तभे लुंहू l" 

"लेना हे त ले मेडम " जी के क़रलई ला तोपत कहिस -"

मेडम तै अतेक तनखा पाथस?लइका मन ला कतेक पुरो पुरो के पढ़ा थस?बेरा के बाद आथस बेरा के पहिली चल देथस l बेरा ले जादा हो जथे तोर जी कइसे करलाथे? 

मोर तो पइसा के नुकसानी अउ तै फोकट म  पावत हस l" डोकरी दाई  अइसन कहिके दूसर डहर देखे ला धर लीस l बोहनी घलो होगे मेडम ला पुरउनी घलो दे दिस l

छत्तीसगढ़ी काव्य मा - छत्तीसगढ़ के बासी*

 *"विश्व स्वास्थ्य दिवस" -*


*छत्तीसगढ़ी काव्य मा -  छत्तीसगढ़ के बासी*


कहूँ पढ़े रहेंव कि अमरीकन न्यूट्रीशन एसोसियेशन के कहना हे कि ‘बासी भात’ मा आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम तथा विटामिन घलो मिल जाथे। एमा विटामिन बी 12 घलो रहिथे।.बासी के वैज्ञानिक अउ अंग्रेजी नाम हे - होल नाइट वाटर सोकिंग राइस। अमरीका के शोध कहिथे कि बासी खाए ले गर्मी और लू नइ लगय। हाइपरटेंशन अउ बीपी घलो नियंत्रण मा रहिथे। नींद बर घलो ए बढ़िया होथे। अमेरिका का कहिथे, हम ला का लेना देना हे ? हमर छत्तीसगढ़ मा बासी एक परम्परा बन गेहे। कुछ शहर वाला मन टेस बताए बर भले नइ खाँय फेर बहुत झन शहर मा अउ जम्मो झन गाँव मा नेत नियम ले बासी खाथें।


छत्तीसगढ़ के कवि मन घलो अपन कविता मा बासी के महिमा ला गावत रहिथें। आवव कुछु कवि मन के कविता के झलक देखे जाय - 


सब ले पहिली लोकगीत ददरिया सुनव - 


बटकी मा बासी अउ चुटकी मा नून

मँय गावsथौं ददरिया, तँय कान दे के सुन।


जनकवि कोदूराम "दलित" के कुण्डलिया छन्द मा बासी के सुग्घर महिमा बताए गेहे - 


बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव।

ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला पुष्ट बनाव।।

तन ला पुष्ट बनाव, जियो सौ बछर आप मन

जियत हवयँ जइसे कतको के बबा-बाप मन।

दही-मही सँग खाव शान्ति आ जाही जी - मा

भरे गजब गुन हें छत्तिसगढ़ के बासी मा।।  


जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी के सुप्रसिद्ध गीत चल चल गा किसान बोए चली धान असाढ़ आगे गा, मा बासी के वर्णन हे -

 धंवरा रे बइला कोठा ले होंक रै।

खा ले न बासी बेरा हो तो गै।।


भिलाई के कवि रविशंकर शुक्ल के सुप्रसिद्ध लीम अउ आमा के छाँव, नरवा के तीर मोर गाँव के एक पद बासी ला समर्पित हे - 


खाथंव मँय बासी अउ नून, 

गाथंव मँय माटी के गुन। 

मँय तो छत्तीसगढ़िया आँव।।


खुर्सीपार भिलाई के कवि विमल कुमार पाठक के कविता मा बोरे बासी के सुग्घर प्रयोग देखव - 


छानी चूहय टप टप टप टप

परछी मं सरि कुरिया मा।

बोरे बासी रखे कुंडेरा मा, 

बटुवा मं, हड़िया मा।।


गंडई के लोकप्रिय कवि पीसी लाल यादव के गीत मा गँवई के ठेठ दृश्य देखव - 


चँवरा में बइठे बबा, तापत हवै रऊनिया।

चटनी बासी झड़क़त हे, खेत जाय बर नोनी पुनिया।।


शिक्षक नगर, दुर्ग के कवि रघुवीर अग्रवाल "पथिक" के कविता मा बासी के प्रयोग देखव - 


जनम धरे हन ये धरती मा, इहें हवा पाए हन।

गुरमटिया चाँउर के बासी, अउ अँगाकर खाए हन।।


छन्द के छ परिवार के कवि मन घलो अपन रचना मा बासी के वर्णन करिन हें - 


कचलोन सिमगा के छन्द साधक मनीराम साहू "मितान" के रचना मा पहुनाई ला देखव -


हाँस के  करथे पहुनाई ,

एक लोटा पानी  मा।

बटकी भर बासी खवाथे,

नानुक अथान के  चानी।

कभू तसमई कभू महेरी,

भाटा खोइला मही मा कढ़ी जी ।


चंदैनी बेमेतरा के छन्द साधक ज्ञानुदास मानिकपुरी के घनाक्षरी के अंश मा बासी के महिमा देखव - 


नाँगर बइला साथ, चूहय पसीना माथ

सुआ ददरिया गात, उठत बिहान हे।

खाके चटनी बासी ला,मिटाके औ थकासी ला

भजके अविनासी ला,बुता मा परान हे।


सारंगढ़ के छ्न्द साधक दुर्गाशंकर इजारदार कहिथें कि चैत के महीना मा सबो झन बासी खाथें - (रोला के अंश)


अड़बड़ लगथे घाम, चैत जब महिना आथे

रोटी ला जी छोड़, सबो झन बासी खाथें।


बलौदाबाजार के छन्द साधक दिलीप कुमार वर्मा के कुण्डलिया छन्द के अंश मा बासी के प्रयोग -


खा के चटनी बासी रोटी अब्बड़ खेलन।

गजब सुहाथे रोटी बेले चौकी बेलन।।


डोंड़की,बिल्हा के छन्द साधक असकरन दास जोगी के उल्लाला छन्द मा बासी के स्वाद लेवव - 


बोरे बासी खास हे, खाना पीना नीक जी।

गर्मी लेथे थाम गा, होथे बोरे ठीक जी।।


हथबंद के छन्द साधक चोवाराम "बादल" के रोला छन्द मा बासी के महिमा - 


बासी खाय सुजान, ज्ञान ओखर बढ़ जावय

बासी खाय किसान, पोठ खंती खन आवय।

बासी पसिया पेज, हमर सुग्घर परिपाटी

बासी ला झन हाँस,दवा जी एहा खाटी।।


बाल्को मा सेवा देवत ग्राम खैरझिटी के छन्द साधक जितेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" बासी गीतिका छन्द मा देखव - 


चान चानी गोंदली के, नून संग अथान।

जुड़ हवै बासी झड़क ले, भाग जाय थकान।।

बड़ मिठाथे मन हिताथे, खाय तौन बताय।

झाँझ झोला नइ धरे गा, जर बुखार भगाय।।


खैरझिटिया जी के आल्हा छन्द के एक अंश - 


तन ला मोर करे लोहाटी, पसिया चटनी बासी नून।

बइरी मन ला देख देख के, बड़ उफान मारे गा खून।।


धमधा मा कार्यरत ग्राम गिधवा के युवा छन्द साधक हेमलाल साहू के गीतिका छन्द के अंश देखव - 


लान बासी संग चटनी, सुन मया के गोठ गा।

खा बिहिनिया रोज बासी, होय तन हा पोठ गा।।


एन टी पी सी कोरबा के छन्द साधिका आशा देशमुख के चौपाई के एक अर्द्धाली मा बासी अउ अथान के संबंध के सुग्घर बखान - 


आमा लिमउ अथान बना ले।

बासी भात सबो मा खा ले।।


बिलासपुर के छन्द साधिका वसंती वर्मा के चौपाई छन्द के एक अर्द्धाली मा बासी के प्रयोग -  


लाली भाजी गजब मिठाथे।

बासी संग बबा हर खाथे।।


नवागढ़ के छन्द साधक रमेश कुमार सिंह चौहान के एक गीत के हिस्सा मा बासी के प्रयोग देखव - 

 

जुन्ना नाँगर बुढ़वा बइला, पटपर भुइँया जोतय कोन।

बटकी के बासी पानी के घइला, संगी के ददरिया होगे मोन।।


दुरुग के छन्द साधक अरुण कुमार निगम के छन्द मा बासी के महिमा देखव - 


मँय  बासी हौं भात के, तँय मैदा के पाव।

मँय  गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव।। 

(दोहा)


बरी बिजौरी के महिमा ला।पूछौ जी छत्तिसगढ़िया ला।।

जउन गोंदली-बासी खावैं। सरी जगत बढ़िया कहिलावैं।।

(चौपाई) 


छत्तिसगढ़िया सबले बढ़िया , कहिथैं जी दुनियाँ वाले।

झारा-झार नेवता भइया , आ चटनी-बासी खा ले।।

(ताटंक)


माखनचोर रिसाय हवे कहिथे नहिं जावँ करे ल बियासी

माखन, नाम करे बदनाम अरे अब देख लगे खिसियासी 

दाइ जसोमति हाँस कहे बिलवा बिटवा तँय छोड़ उदासी  

श्री बलराम कहे भइया  चटनी सँग खाय करौ अब बासी

(सवैया)


छत्तीसगढ़ी भाषा के हर कवि के एक न एक रचना मा बासी के वर्णन जरूर मिलही। आज मोर करा उपलब्ध रचना मन के उन डाँड़ के संकलन करे हँव जेमा "बासी" शब्द के प्रयोग होए हे।


*आलेख - अरुण कुमार निगम*

संस्मरण - दुख के रतिहा काट संगी, सूख बिहनिया आही रे ... - डुमन लाल ध्रुव

 संस्मरण -

दुख के रतिहा काट संगी, सूख बिहनिया आही रे ...

                     - डुमन लाल ध्रुव 

छत्तीसगढ़ के लोकजीवन मा गीत-संगीत सिरिफ मनोरंजन के साधन नई होवय  ये मन जिनगी के दुख-सुख, संघर्ष अऊ आस के सच्चा गवाही घलो देवय। गांव के माटी, खेत-खार, नदी-नाला, मेला-ठेला अऊ लोकपरंपरा ले उपजे ये गीत मन सीधा मन ला छू लेथे। जब कोनो लोकगायक अपन सजीव स्वर मा ये गीत मन ला गाथे त वो सिरिफ सब्द नई रहय  एक जीते-जागते अनुभव बन जाथे। अइसने अनुभव के धनी रिहिन छत्तीसगढ़ी लोकगीत के अमर गायक-गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया जी , जेन के गीत मन मा छत्तीसगढ़ के माटी के सुवास अऊ लोकजीवन के गहिर संवेदना साफ झलकथे।

सन् 2003 के वो रात आज घलो मोर स्मृति मा उज्जर होके चमकत हवय। जगह रिहिस धमतरी जिला के ग्राम मुजगहन। उहां साहित्य संगीत सांस्कृतिक मंच मुजगहन के अगुवाई मा “सुरता नारायण लाल परमार” केन्द्रित एक खास सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन करे गे रिहिस। ये आयोजन सिरिफ एक कार्यक्रम नई रहिस  छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ संस्कृति बर प्रेम अऊ सम्मान के एक बड़का उत्सव जइसने लगत रिहिस।

कार्यक्रम के तैयारी गांव मा कई दिन पहिली ले शुरु होगे रिहिस। गांव के लोगन बड़े उत्साह अऊ लगन ले ये आयोजन के बाट जोहत रिहिन। मंच ला बढ़िया ढंग ले सजाय गे रिहिस, चारों कोती रोशनी के इंतजाम रिहिस अऊ दूर-दराज ले आवत साहित्यकार अऊ कलाकार मन के स्वागत बर गांव के लोगन के मन मा भारी उत्सुकता रिहिस।

ओ बखत छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ लोकसंगीत के माहौल घलो बहुत जीवंत रिहिस। नवा-नवा कवि उभरत रिहिन अऊ पुरखा साहित्यकार मन के परंपरा ला आगू बढ़ाय के कोशिश होवत रिहिस। इही संदर्भ मा “सुरता नारायण लाल परमार” केन्द्रित ये कार्यक्रम एक तरह ले साहित्यिक सुरता अऊ सांस्कृतिक संगम के रुप ले दिखाय देत रिहिस।

छत्तीसगढ़ के कई नामी-गिरामी कवि अऊ साहित्यकार ओ कार्यक्रम मा भाग लेय बर मुजगहन पहुंचिन। मंच मा जब कवि सम्मेलन शुरु होइस  त श्रोता मन के भीड़ उत्साह ले 

भरगे रिहिस। एक-एक कर कवि मन मंच मा आके अपन रचना सुनावत रिहिन। हास्य, व्यंग्य, श्रृंगार अऊ समाजिक विषय मन ऊपर आधारित कविता सुनके श्रोता मन कभी मुस्कुरावत रिहिन, त कभी गम्भीर होके सुनत रिहिन।

रात धीरे-धीरे गहरावत जात रिहिस  फेर कार्यक्रम के उत्साह कम होय के नाम नई लेत रिहिस। पूरा गांव के माहौल साहित्य अऊ संगीत के सुर मा सराबोर होगे रिहिस। इही बीच मंच मा जब छत्तीसगढ़ी लोकगीत के अमर गायक-गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया जी के आगमन होइस, त पूरा वातावरण एक अलग किसिम के भाव ले भरगे।

उनकर व्यक्तित्व बहुत सादा अऊ सहज रहिस  फेर उंखर आवाज मा एक अद्भुत आकर्षण रिहिस। जइसे वो माइक पकड़िन श्रोता मन मा एक अलग किसिम के उत्सुकता देखाय देय लगिस। कतको लोगन मन उनला सही ढंग ले देखे अऊ सुने बर खड़े होगे रिहिन।

कुछ ही पल बाद वो बिना कोनो औपचारिकता के अपन प्रसिद्ध गीत के पंक्ति ला गुनगुनाय लगिन -

“दुख के रतिहा काट संगी,

सूख बिहनिया आयी रे…

रो के गा के पढ़,

एके अरथ बताही रे…”

बस, इही वो पल रिहिस जब पूरा माहौल बदलगे। उनकर आवाज मा अइसने मिठास अऊ भाव रिहिस के जेन लोगन खड़े होके देखत रिहिन  वो घलो धीरे-धीरे चुपचाप बइठ गइन। अइसे लगत रिहिस जइसे पूरा मुजगहन गांव ओ गीत के भाव मा डूबगे हवय।

ओ गीत मा सिरिफ सुर नई रिहिस  जिनगी के एक गहिर संदेश घलो छिपे रिहिस। गीत के हर पंक्ति जइसे ये कहत रिहिस के जिनगी मा दुख के रात चाहे कतको लंबा काबर न होवय आखिरकार सुख के बिहनिया जरुर आवत हे।

उंखर आवाज मा लोकजीवन के पीरा घलो रिहिस अऊ उम्मीद के उजाला घलो। इही सेती श्रोता मन मंत्रमुग्ध होके सुनत रिहिन। कोनो शोर नई, कोनो बातचीत नई सबो मन मा सिरिफ गीत के गूंज रिहिस।

ओ रात मुजगहन के वो छोटे से मंच छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति के एक बड़े केन्द्र बनगे रिहिस। मंच मा गीत, कविता अऊ लोकभावना के अद्भुत संगम दिखाई देत रिहिस।

कवि सम्मेलन देर रात तक चलत रिहिस। एक-एक कर कवि मन मंच मा आवत रिहिन अऊ अपन रचना सुनावत रिहिन। श्रोता मन घलो रात भर बइठे रिहिन। थकान के कोनो नामोनिशान नई रिहिस। अइसे लगत रिहिस जइसे साहित्य अऊ संगीत के ऊर्जा सबो मन ला जागत रखे हे।

गांव के बूढ़ा-बुजुर्ग, जवान अऊ लइका सब्बो ये आयोजन के हिस्सा बनगे रिहिन। ये दृश्य अपन आप मा बहुत प्रेरणादायक रिहिस। ओ रात ये महसूस होइस के  छत्तीसगढ़ के संस्कृति सिरिफ शहर तक सीमित नइहे गांव के माटी मा घलो ओतकेच गहिराई ले जिंदा हे।

खास करके जब लक्ष्मण मस्तुरिया जी के गीत के गूंज 

फइलत रिहिस  त अइसे लगत रिहिस जइसे पूरा वातावरण लोकभावना ले भरगे हवय। उनकर आवाज मा छत्तीसगढ़ के धरती के आत्मा बोलत रिहिस।

आज जब ओ कार्यक्रम के याद करथों  त मन मा एक गहिर संतोष अऊ आनंद के भाव उमड़ परथे। वो सिरिफ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नई रिहिस  छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ लोकसंगीत बर लोगन के प्रेम के जीते-जागते उदाहरण रिहिस।

समय बीतगे, कई कार्यक्रम आइन-गइन  फेर मुजगहन के वो रात आज घलो मोर स्मृति मा ओहीच ताजगी ले बसे हवय। ओ रात के माहौल, कवि मन के रचना, श्रोता मन के उत्साह अऊ खास करके लक्ष्मण मस्तुरिया जी के वो गीत सब्बो आज घलो कान मा गूंजथे।

जब जिनगी मा घलो कठिनाई अऊ निराशा के घड़ी आवत हे  त ओ गीत के पंक्ति अपने आप सुरता आ जाथे -

“दुख के रतिहा काट संगी,

सूख बिहनिया आही रे…”

ये गीत मा  जिनगी के एक गहिर दर्शन छुपे हे । ये हमन ला भरोसा दिलाथे कि दुख अऊ संघर्ष के बाद उम्मीद अऊ सुख के बिहनिया जरुर आवत हे।

मुजगहन, धमतरी के वो सांस्कृतिक संझा ए सेती घलो खास रिहिस के ओ साबित कर दिस छत्तीसगढ़ के संस्कृति अऊ साहित्य आज घलो लोगन के मन मा  ओतकेच मजबूती ले जिंदा हे जइसे पहिली रिहिस।

आज घलो जब ओ रात के स्मृति मन मा उभरथे  त अइसे लगथे जइसे वो गीत फेर हवा मा गूंजत हवय अऊ पूरा सभा ओही भाव मा डूबे हवय -

“दुख के रतिहा काट संगी,

सूख बिहनिया आही रे…”

मुजगहन के वो सांस्कृतिक संध्या सचमुच छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ लोकसंगीत के एक अनमोल धरोहर बनके आज घलो स्मृति मा जिंदा हावय ।

             - डुमन लाल ध्रुव 

        मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

            पिन - 493773

  दिनांक - 07.4.2026 मंगलवार

जर बुखार* समारु के मितान बुधारू बड़ धुमधाम ले अपन लइका के बिहाव

 [4/8, 5:36 AM] +91 83491 87430: *जर बुखार* 

समारु के मितान बुधारू बड़ धुमधाम ले अपन लइका के बिहाव करिस।

आनीबान के सजावट,माईक मंच डीजे ,खाय पीये बर बफे।सगासोदर मन बेवस्था ल देख के सहंरावत राहय।वतका ल सुनके बुधारू के छाती चौड़ा हो जाय।महिना दिन बाद बुधारु ल जर बुखार धर लिस।समारु मितान के आरो ले बर घर पहुंचिस अऊ कथे कस जी मितान का होगे तोला।बुधारु कथे बस कुछ नहीं मितान बिहाव के करजा म जर बुखार धर लेहे।

       *फकीर प्रसाद साहू* 

          *फक्कड़ सुरगी 🙏*

[4/8, 11:02 PM] +91 83491 87430: *फोकट के चंदन* 

         सुखऊ खुशी मनात राहय ओकर प्रधानमंत्री आवास आगे।अऊ होना घलो जायज हे। फोकट के चंदन घिस भाई नंदन।जोशे जोश म घर ल फोर डारिस।फोरेच म कतनो पईसा सिरागे ।नेव ल घलो जमगरहा असन धर पारिस।कहिबोन त चद्दर ले जादा पांव पसार डारिस।ले दे के छज्जा लेंटर के जात ले किश्त ले जादा उधारी होगे।सुखऊ के हालत अब न खात बने न उलगल अइसे होगे।हाली मोहाली (फिलहाल)रहेबर छांव रिहिस तहू उजड़गे।कहिथे मुड़ ले जादा ब्याज तइसे सुखऊ के पुरखा के किसानी जमीन घलो बिकगे घर ल सजाय बर।


    फकीर प्रसाद साहू 

        फक्कड़ सुरगी 🙏

हसदेव के डोंगर - डुमन लाल ध्रुव

 हसदेव के डोंगर

                  - डुमन लाल ध्रुव 

“हय्या रे हय्या … जोर लगा के हय्या…”

हसदेव जंगल के भीतरी डोंगर मा आवाज गूंजत रिहिस। साल, साजा अऊ बीजा के ऊंच-ऊंच रुख राई मन  हवा मा डोलत रिहिन अऊ मजदूर मन के हांफत हांफत सांस जइसे जंगल भर मा सुनाई देत रिहिस।

शिवरतन डोंगर के ऊपर खड़े रिहिस। वो अपन पांचो संगवारी मन ला हिम्मत देत रिहिस।

“चलव संगवारी मन… थोड़ा अउ जोर लगावव… बस थोड़ेच ऊपर रहि गे हे।”

नीचे खेमू, भैरव, सुखराम, लखन अऊ भीखू मिलके तीस फीट लम्बा लोहा के भारी खंभा ला डोरी ले खींचत रिहिन।

खंभा भारी रिहिस  जइसे सुते अजगर डोंगर मा पसार के लेटे हवय।

थोड़ा ऊपर खिसकथे…

फेर फिसल के नीचे आ जाथे।

“अरे ददा… अब नई होही…”

खेमू हा जमीन मा बइठत किहिस।

सबके बदन पसीना ले तर बतर होगे रिहिस।

काम के लालच

शिवरतन ला वो दिन याद आइस जब वो घटबर्रा गांव ले आवत रिहिस।

रद्दा मा एकठन जीप खड़े रिहिस। जीप ले उतरे ठेकेदार धीरेन्द्र बाबू पूछिन -

“काम करबे?”

शिवरतन पूछिस -

“का काम साब?”

“डोंगर मा खंभा चढ़ाना हे। ऊपर कारखाना बनही। तीन सौ रुपिया रोजी।”

तीन सौ रुपिया सुनके शिवरतन के आंखी चमक उठिस।

गांव मा त डेढ़ सौ रुपिया मा दिन कटथे।

वो तुरते किहिस -

“हम करबो साब… अऊ पांच आदमी अउ ला सकत हंव।”

ठेकेदार मुस्कुराइस -

“बस इही चाही।”

शिवरतन दौड़त गांव आइस अऊ अपन संगवारी मन ला काम के खबर दे दिस।

कठिन काम

सबेरे आठ बजे ले काम सुरु होइस।

ग्यारह बज गे -

पर एक खंभा घलो ऊपर नई पहुंचिस।

डोंगर खड़े रिहिस।

डोरी मा हाथ फोरा पर जात रिहिस।

ऊपर खड़े ठेकेदार चिल्लाइस -

“आज बीस खंभा ऊपर जाना चाही… समझे?”

मजदूर मन चुप।

डर घलो रिहिस।

सेठ के सलाह

सरी मंझनिया एक जीप आइस।

एकझन मोटा सेठ उतरिस अऊ ठेकेदार संग धीरे-धीरे बात करे लागिस।

दोनो कभू खंभा गिनथे, कभू मजदूर मन ला देखथे।

शिवरतन दूर ले देखत रिहिस।

थोरिक देर बाद सेठ चल दिस।

पर ठेकेदार के चेहरा बदल गे रिहिस।

अब वो मुस्कुरात रिहिस।

 “सुनव…” ठेकेदार आवाज लगाइस।

“आज घर नई जावव।

यहीं तंबू लगही।

मुर्गा बनही… दारु मिलही… अऊ जादा पइसा घलो देहूं।”

मजदूर मन एक-दूसर ला देखिन।

अइसे ठेकेदार पहली कभू नई बोलिस।

पर सब मान गेन।

दारु के ताकत

रात के सात बजिस।

देसी मुर्गा बन गे रहिस।

दारुल के बोतल खुलिस।

ठेकेदार घलो संग बइठके पीइस।

शिवरतन ला अचरज होइस -

आज ठेकेदार दोस्त जइसन व्यवहार करत रिहिस।

थोड़ी देर बाद वो खड़े होइस -

“चलव… अब काम करबो।”

मजदूर मन दारु के घूंट गटकिस।

फेर खंभा उठाइन।

अऊ अचानक जइसे शरीर मा आग भर गे।

वो दउड़त-दउड़त डोंगर चढ़ गे।

शिवरतन ला पता तक नई चलिस कब वो डोंगर के माथा मा खड़ा हो गे।

ठेकेदार हंसत किहिस -

“देखेव … तुंहर मन मा ताकत कम नई हे।”

दू दिन के चमत्कार

दारु पी-पी के मजदूर मन रात-रात भर काम करिन।

दिन मा आराम…

रात मा काम।

दू दिन मा सौ खंभा डोंगर मा खड़े हो गिन।

ठेकेदार बहुत खुश होइस।

असली नुकसान

काम एक महीना चलिस।

ठेकेदार दारु देत रिहिस।

धीरे-धीरे दारु मजदूर मन के आदत बन गे।

काम खतम होइस।

ठेकेदार चल दिस।

पर मजदूर मन के जिनगी बदल गे रिहिस।

अब बिना दारु काम नई होय।

मजदूरी के सब रुपिया दारु मा उड़े लागिस।

घर के टूटन

एक दिन शिवरतन के घरवाली किहिस  -

“सुनव जी…

पहिली जब काम करके आवत रेहेव त तुंहर पसीना महकत रिहिस।

मोला वो महक हा बहुत भाथे।

अब तो दारु के बास आवत हे।”

शिवरतन चुप रहिगे।

कुछ दिन बाद वो अपन मइके चल दिस।

दू महीना बाद शिवरतन अऊ ओखर साथी मन काम खोजत फिरत रिहिन।

एक दिन तालाब खोदई के काम मिलिस।

पर रापा कुदारी चलावत-चलावत हाथ कांपे लागिस।

ठेकेदार गुस्सा मा किहिस  -

“भागो इहां ले… कामचोर हो।”

शिवरतन धीर से किहिस -

“साब… थोड़ा दारु मिल जाही त दू दिन मा खोद देबो…”

ठेकेदार जोर ले हांस परिस -

“दारु ले तुमन खोखला होगे हवव।”

शिवरतन  चुपचाप खड़े रहिगे।

दूर डोंगर दिखत रिहिस।

ऊपर खड़े लोहा के खंभा चमकत रिहिन।

जइसे हांसत हवय।

तभे ओखर घरवाली के बात के सूरता आइस -

“मोला तुंहर पसीना के महक पसंद हे… दारु के बास नई।”

शिवरतन उदुपहा उठिस।

अऊ दउड़ परिस -

सीधा अपन ससुराल डहर ।

वो दउड़ना चाहत रिहिस…

इतना के शरीर ले पसीना बह जाय।

अऊ जब ओखर घरवाली देखे

त कहे -

“आज फेर …

तुंहर शरीर के पसीना हा महकत हे…

            - डुमन लाल ध्रुव

        मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

            पिन - 493773

बजारू पसरा मा विज्ञापन*. (ब्यंग)

 *बजारू पसरा मा विज्ञापन*.

                                (ब्यंग) 


        बजारवादी पसरा मा विज्ञापन शिलाजीत के काम करत बैपार मा यौनशक्ति बढ़ावत हे। गिराहिक के समझदारी ये हे कि तमड़ के छू के निमार के खरीदे के जगा मोबाईल मा फोटू देखके आनलाईन घर बइठे सौदा बिसावत हें। जे समान विज्ञापन के नोहे माने बजार के नोहे। अउ बजार के नोहे माने तोर काम के नइये। विज्ञापन ले ही इस्तेमाल करे के पहिली भरोसा जागथे। आदमी उपर विज्ञापन के असर अतका हे कि पाँच प्राण तत्व ला बचाए बर बजार के खजरी दायक विज्ञापन के सिरहाना के सहारा लेना पड़थे। ये तो बने हे कि टी वी वाले घर बइठे बजार घुमा देथे। हमला जेकर जरूरत नइये वोकरो जरूरत पैदा कर देथें। पसरा लमाके बेचइया के भले बोहनी झन होय फेर आनलाईन खरीदी ले बजार मंदा हे कहना माने दू बियाय अउ एक बताय।

          विज्ञापन के बैसाखी ले बजार चलत नइए उड़त हे। छानी मा होरा कोन भूँजिस होही नइ जानन, फेर वो भुँजइया जरूर विज्ञापन वाले असन रिहिस होही। इंडिया टीम ला जिताय बर अपन दिन भर के हाजरी गँवाके टी वी के आगू बरफ जमे असन जम गैंव। एती दू ठन चउवा छक्का का परिस, विज्ञापन वाले कूद कूद के देखाए के शुरू कर दिस कि अमूल दूध पीता है इंडिया। बस गली के मरहा बालर फिल्डर बाल के पीछू कम अमूल दूध के पीछू भागे मा लगगे। चार रन बनाके आउट होइस तब डा. आर्थो वाले बैट ला गोटानी बनाके पँहुचगे। एकर ले साफ हे कि नतो दूध पीये मे कामयाबी हे न तो आर्थो असरकारक हे। टीम इंडिया के हार मा गठिया बात वाले मन विज्ञापन के गुणवत्ता मा दोष निकाल डारिन। ये डहर इंदिरा आई व्ही एफ वाले मन नस्ल सुधार के वीधी ला हफर हफर के बतावत मिलिस। तब समझ मा आइस कि इंडिया टीम घेरी बेरी काबर हारथे। संतुष्टि ये सोच के करना परथे कि तुक्का के खेल जमगे तो जय श्रीराम, नइते गिल्ली डंडा तो राष्ट्रीय खेल है ही। जे मन सिफारिश मा जगा पाय हें वो मन के औसत रन रेट पँदरा प्लस अउ गिल्ली खेल के जोर अजमिस वो मन सतक ले चुकगे। क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष ला इंटरव्यू मा पूछेगिस कि बैट के मुठिया कते कोती होथे। तो जवाब मा किहिस कि अइसन गंभीर सवाल के जवाब गौतम गंभीर ही दे सकथे। या तो टी वी डिबेट के त्रिपक्षीय चरचा मा समाधान आ सकथे। अभी हमर टीम संकट के घड़ी ले गुजरत हे, हम संकटमोचन वाले विज्ञापन के अगोरा मा हावन।

       मोर घरवाली ला सीरियल देखे के मियादी बुखार हे। सिरियल मे का होइस नइ बता पाये। फेर विज्ञापन मा देखाय छूट वाले साड़ी के महासेल के सुरता जरूर रखथे। समाचार सुने के गरज ले टीवी मा मूड़ी खुसेरबे तब सबले पहिली हाजमोला वाले पेट सफा के शीशी ला रामबाण बताथे। काबर कि समाचार अपच अउ बदहजमी वाले रथे ये बात हाजमोला वाले घलो जानथे। हमू ला पता हे कि एकर असर समाचार सुनत ले रही। घरवाली एती खाना के सथरा धरके आथे अउ वोती टीवी मा हार्पिक धरके संडास धोवइया। अइसन संजोग आये दिन होवत रथे। एक दिन तो हार्पिक मा हग्नालय ला अतका धोइस कि साग मे फर वाले धनिया के सवाद दबगे। आधा खाना छोड़के उठना परिस। खुद के चवनप्रास ला खुदे रामदेव खाके घोड़ा सँग दँउड़त दिखिस। दूसर दिन च्यवनप्राश के जगा घोड़ा के दाम बाढ़गे। बिना विज्ञापन के अब दुलहा दुलहिन नइ मिले। फेर सोनार के सोना कतको कैरेट के रहय। बेंचही तो उँचहा दाम मा ही। खुद बनाय के जगा रेडिमेंट अवास उपर भरोसा एकर सेती रथे कि विज्ञापन मा शीशमहल देखे रथे। भले साल भर मा भाँड़ी भसक जाय। पानी केंट के शुद्ध होथे ये बात लइका मन के दिमाग मा विज्ञापन वाले मन ही भरे हे। करसा मटकी के विज्ञापन ले एसी फ्रीज कम्पनी वाले मन काठी कफन के समान तो नइ बेचे। फेर हाँ हमर तिर कालीचरण के दुकान के बोर्ड मा साफ लिखाय हे कि जनम से लेके मरनी हरनी तक के समान उचित मुल्य मे मिलथे। मरईया लाखों के सम्पत्ति छोड़के मरथे, तभो ले मरनी के समान बर उचित मुल्य के दुकान खोजे ला परथे। तभे तो कालीचरण के दुकान के पता सब जन  जानथे।

     बेटी के जोरन मा चकाचक वाले बीमबार जोरे ले बहू सास के ताना ले बाँच जही, ये बात बर्तन बार वाले खुलके नइ बताय। कभी सास भी बहू थी सीरियल के अगोरा मा बइठे सास के मन मा आसा रथे कि एम डी एच वाले मसलहा साग जीयत मर मिलत रहय। गुप्त खबर ये हे कि मसाला बेचइया सफेद मेंछा पगड़ी वाले बबा ला मसलहा ले परहेज हे वो खुद दलिया अउ मुसब्बी के जूस मा जीयत हे। तभो ले कसम खा डारे हे मसलहा खवाके जनता के बीपी बढ़ाए के। बजारू विज्ञापन के गोदाम मा अतका कचरा सकेला गेहे कि मुसवा काकरोच मन पहुनाई के ढीठपना ले आदमी के जिनगी मा डेरा जमा डारे हे। इन मन के बजार ला कुतरे के पहिली बजारवादी मन रेडहिट ला देखा डारिन। मुसवा दवा अउ रेडहिट ला घर मा स्टाक करके  रखना खतरा ले भरे हे। कारन कि पति हर पत्नी ला काकरोच अउ पत्नी हर पति ला मुसवा के नजर ले देखथें।

            आमदनी के बजार मा जेकर कीमत नइ बाढ़िस वोकर बर विज्ञापन के भूतहा कलाकार जे फिल्मी दुनिया के खूँटादार हे वोला धराके कुदवा दे। समान बजार मा कूदे लगही। धन्य हो वो माचिस जे हर विज्ञापन के बजारू पसरा मा अपन इज्जत ला नइ उतारे हे। कफ सीरफ के माँग अतका बढ़िस कि नशा अउ नाश दूनो बर खरा उतरगे। बिमारी जादा ही बढ़त हे तब आयुष्मान धारी मन अनुबंधित अस्पताल के विज्ञापन खोजत हें, कि कते अस्पताल मा पाँच लाख तक सीरफ मिलही। प्राण छूट जाय फेर उज्जर दाँत निपोर के मरे बर दंतकांति डेंटिस्ट मन पेस्ट धरके सलाह देवत मिलथें। सहानुभूति के आशोकारिष्ट मा बाँझपन दूर होथे। वोकर पहिली लइका बर कते क्रीम पाउडर डाइपर काम करही एकर जानकारी विज्ञापन ले लेके रखना परथे। 

    लँगोटी से लेके चड्डी तक के सफर आसान रिहिस फेर अब चड्डी अउ चायपत्ती कते ब्रांड के बउरना हे सोचनिय बिषय हे।सिलपट चटनी नइ मिठाय, बजार वाले सॉस के शीशी कैचप मिठाथे ये बात लइका लइका जानथे। सस्ता समान के जोरलगहा विज्ञापन ले दाम चार गुना बाढ़े लगथे। बजार वाले के चकाचक अउ आम जनता मँहगाई के नाम मा फोकट सरकार ला कोसत रथे। कबीरा खड़े बजार मा माने कबीर जी बजार मा पसरा लमाके लट्ठा कपड़ा बेचिस होही। फेर  विज्ञापन के अभाव मा कम बेचिस, तभे खिसिया के उलटबासी लिखिस होही। अब तो बस विज्ञापन मा पसरे बजार उपर नजर लगाके रखना सार हे। मौका हाथ ले झन छूटे। 


राजकुमार चौधरी "रौना" 

टेड़ेसरा राजनांदगांव।

कहिनी* *// पानी //* - *डोरेलाल कैवर्त*

 *कहिनी*

                       *//  पानी  //*

                        

                                         -  *डोरेलाल कैवर्त*


               "' *बिन पानी नि हे जिनगानी* " ए कहना सोलाआना सिरतोन आय । पानी के बिना जिनगी जिए के कल्पना घलो नि करे जा सके ? हमन सबो जानत हांवन भुइँया , पानी , आगी , अगास अऊ हवा ए पाँच जिनिस के मिंझरा ले मनखे देहें के सिरजन होए हावे । विज्ञान के मुताबिक मनखे के देहें म दस ले बाराआना तक पानी रहिथे ते पाय के पाँचो जिनिस के जरुरत परथे । एकोठन के कमतियाय ले जिनगी जिए बर मुसकुल हो जाथे । सांस लेहे बर हवा के जरुरत परथे , बिन हवा के जिनगी नि जिए जा सके ठीक ओइसनेच पानी के बिना घलो जिनगी बिरथा आय । एमा कोनों भरम के बात नि हे।

           हमर छत्तीसगढ़ राज म नल जल योजना शुरु नि होय रहिस तेकर पहिली के बात आय । एक बछर बारिस कम होय रहिस । सावन-भादो बरसा के महीना म घलो कमसलहा पानी गिरिस । अगास कोती ल निहारत कोनों गनेश चउंथ म पानी गिरही कहंय , कोनों पीतर पाख म पीतर मन पानी गिराही कहंय अऊ कोनों दुरगा-दसेरा म गिरबेच करही घलो कहंय । अइसे करत पूरा चम्मास के महीना बुलक गे फेर पानी तो ठगवा कस ठग दिस । बीच-बीच म देखा-ताखा ठांवां-ठिपका कभू ए मूड़ा त कभू ओ मूड़ा पानी गिर देवत रहिस ।

              अगास कोती निहारे म करिया बादर छाए रहय फेर बादर बिन बरसे आँखी ओलम हो जावय । बादर के गरजइ-घुमरइ ल देख के अइसे लागय कि पानी गिरबेच करही ।' *जेन ह गरजथे तेन नि बरसे* ' हाना सहिच होगे । बादर म सोखाबोर्रा (इन्द्रधनुष) घलो उवत दिखय फेर कोनों काम नि आवय । पानी ल सोख देवय अइसन लागय । गनेश चउंथ ले पानी गिरे बर छोड़े रहय । बरसा कम होय रहिस ते पाय के तरिया म जादा पानी नि भर पाय रहिस । कुआँ घलो नि अधियाय पाय रहिस । तरिया के ठेल धरे ले कुआँ म पानी भराय रहय ।

            कतको झन आल्हा पढ़े म पानी गिरथे कहिन । गाँव म महेत्तर कका जबर आल्हाइक रहिस ओहर सुग्घर आल्हा बांचय । बने ऊतार-चढ़ाव के मुताबिक कभू कड़क कभू सेवर स्वर म आल्हा पढ़य । उहाँ पानी गिराय के उदीम घलो करिन फेर कका के आल्हा पढ़े म पानी नि गिरिस । पानी नि गिरे के खातिर गाँव म अकाल जइसन होगिस ।

           गाँव म तरिया , डबरी , पयठू अऊ कुआँ के अलावा पानी के कोनों जरिया नि रहिस बस सरग के भरोसा रहंय । उहाँ सरग के पानी के भरोसा म खेती होवय । पानी थोरउचा गिरे के कारन ओ बछर लटपट बीजहा के पूरती धान होइस । कुंवार महीना के लगती ले पानी छोड़े रहिस ते पाय के भुइँया घलो दरगान हन दे रहिस । तरिया मन भरे रहंय त ओकर चुहका के कारन कुआँ मन भरे रहंय फेर तरिया नि भरे रहिस ते पाय के कुआँ म घलो पानी जादा नि रहिस।

             गाँव म पानी के स्रोत तरीच-तरी खाल्हे कोती चल दे रहिस ते पाय के कुआँ घलो जल्दी सुखा जावत रहिस । गाँव के बोरिंग ल टेड़त-टेड़त थक जांवय फेर तीन-चार गघरी पानी निकलय । गाँव तीर म एकठन घेंसरा नरवा बोहावत रहिस फेर ओहू एसो के थोरउचा पानी गिरे म एकोदिन पूरा नि आइस । कुआँ के सुखाय ले उही नरवा म गाँव के मनखे मन खंचवा खन के पानी पीवंय ।

               पानी के बिना गाँव म करलाई होय रहिस । बइसाख-जेठ के महीना लकलकावत जबर घाम धरती के अंतस घलो फाट गे रहिस । तलाव डबरी तो सुक्खा पर गे रहिस । खेत-खार के रुखराई मन सूरुज के कटही सांट ल ठाढ़े-ठाढ़ सहत रहंय । घाम के खातिर भुइँया म भोंभरा चट ले जरय । अइसे लागत रहय कि भुइँया म मुर्रा घलो फूट जाही । मंझनिया के झोलहा घाम कनपट ल मारे कस जनावत रहय । बेर बूड़े के पाछू थोरिक अँधियार होवय तभे गाल म घी चुपरे कस लागय ।

            बइसाख-जेठ के घाम म तरिया के पानी अटाय रहे त कोकड़ा मन के बतरे रहय । कोकड़ा मन इहीच मउका मिले हावे कहिके तरीच-तरी खुश रहंय । ओमन बर तिहार बरोबर होय रहिस । टपटपउन मछरी ल रोज खावंय । कुंवरहा सोहागी कांदी ल खाके गरुवा भइंसा मन चर के चिकनाय अऊ मोटाय रहिथे तइसनहे कोकड़ा मन घलो मोटावत रहिन ।

           चिराई-चिरगुन अऊ जानवर मन के पानी बिना टोंटा सुखा जावत रहिस । गाँव के उत्ती कोती दू कोस दूरिहा पहार के धरी म एकठन कोलिहामुड़ा बांध बधाय रहिस । पाछू बछर कस एसो बांध म पानी ओतका जादा नि भराय रहिस फेर तीर-तखार के मन ल गुजारा करे के पूरती भराय जरुर रहिस । उही कोलिहामुड़ा बांध ले टेंकर म पानी भर-भर के गाँव लानय । गाँव भर म एक दू टेंकर काय पूरतिस । *हाथी के मुँहू म सोंहारी* कस जनावय । सबोझन भंड़वा बरतन बाल्टी , डेगची , मरकी , डब्बा ल लाइन म लगाय सबो टेंकर के अगोरा म बइठे रहंय ।

            गाँव म पानी के जबर किल्लत रहय । टेंकर आतिस तहं ले पानी झोंकाय बर झपट परंय जइसे हाड़ा देख के कुकुर मन दउंड परथे । अपन-अपन भंड़वा बरतन ल धर के पानी झोंकाय बर कूद परंय ।कभू-कभू पानी झोंकाय बर झगरा घलो मात जावय । पानी के टेंकर म लिखाय रहय "*जल ही जीवन है,इसे व्यर्थ न गवांए* " फेर पानी के टेंकर के खाल्हे कोती छोटकून सांसी रहिस जेमा ले पानी ह थोर -थोर टपत रहय ।

             टेंकर ड्राइवर के सुभाव ओतका जादा अच्छा नि रहिस । ओहर जबर गुसेलहा रहय । ओकर चेहरा म कोनों किसिम के दया भाव नि झलकत रहिस । कभू अपन टेंकर ल जेन जघा म बरतन के लाइन लगे रहय तेन मेर नि खड़ा करय दूसर जघा म टेंकर ले जाके खड़ा कर देवय । बरतन के लाइन मेर लाने बर कहंय तभो ले ओहर नि लाने । जेन जघा म टेंकर खड़े करे हंव उहीच मेर आके पानी भर लेवौ कहय । 'मनखे ल समे अऊ परिस्थिति ल देख के काम करना चाही ।' 'मरता काय नि करता'।

              उही गाँव म एकझन डोकरी दाई रहय । जेकर कनिहा धनुष कस नेव गे रहिस । बिचारी ओहर लवठी धर के टेकत रेंगय । ओहू टेंकर ले पानी झोंकाय बर आय रहिस । टेंकर के खाल्हे ले नानचुक सांसी ले पानी थोर-थोर थीपत रहिस अऊ भुइँया म बगरत रहय । भीड़ ल देख के सियानिन दाई सोचिस अऊ अपन माटी के मरकी ल उही जघा म मढ़ा दिस जेन जघा टेंकर ले पानी गिरत रहिस । मरकी म पानी भर जाही कहिके डोकरी दाई खुश नजर आवत रहिस । टेंकर के नानचुक छेदा ले पानी मरकी म धीरे-धीरे भरत जावत रहिस । मरकी भरे बर थोरिक बांचे रहिस ।

            थोरिक समे के पाछू म ओ टेंकर के ड्राइवर आइस ओकर नजर जइसे टेंकर के खाल्हे म माढ़े मरकी म परिस चिल्लावत बोलिस-' काकर मरकी आय ' ?' कोन ए जघा म रखे हावय ' ?..डोकरी दाई अपन लवठी ल टेकत ओ मेर आइस,' मोर मरकी आय बेटा '!...डोकरी कहिस ।' सब लाइन म लगाय हावंय तेन ल नि देखत हस का ' ?...डांटत ड्राइवर फेरेच कहिस ।' पानी गंवात हावे कहिके मढ़ा पारेव बेटा !'..डोकरी दाई डरावत कहिस ।

         फेर का ओ निर्दयी ड्राइवर ह उनिस न गुनिस एकठन लवठी ल धर के जोर से मरकी ल मारीस ते पाय के मरकी फूट गिस अऊ ओमा आधा पानी भराय पाय रहिस होही ओहू भूइँया म बगर गिस । ओमेर जेतका लाइन म लगे रहिन सबो के मानसिकता ओ ड्राइवर पक्ष कोती दिखत रहिस , अऊ कोनों मन बढ़िया बनिस कहिके हाँसत घलो रहिन।

         ए डोकरी ल देखा तो रे कहिके कान म एक-दूसर संग फुसफुसावत घलो रहंय । डोकरी दाई के आँखी के दूनों कोर ले आँसू टपके लागिस । ' पानी चुहत रहिस तेन जघा मरकी ल मढ़ा दिस त का होगिस ' ?..एकझन सातवीं कक्षा म पढ़इया लइका डोकरी दाई कोती बोलिस ।' नि देखत हावस का '? टेंकर म बड़का आखर म अमोल बानी लिखाय हावे *" जल ही जीवन है* " बूंद-बूंद को बचाकर रखिए ".....पढ़इया लइका लिखना कोती इशारा करत कहिस ।

           भगवान ल सुमरत फेर लाइन म लगके डोकरी दाई अपन मन म गुनत-गुनत कहिस कि अपन मरकी ल मढ़ाके पानी बचा के गलती कर पारेंव का......?

✍️ *डोरेलाल कैवर्त*

       *तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*

***************************************