Wednesday, 2 September 2020

भूत मन के माँग पत्र*-चोवाराम वर्मा


*भूत मन के माँग पत्र*-चोवाराम वर्मा

                    (व्यंग्य)


यमपुर म यमराज ह इतवार के दिन जनदर्शन के आयोजन करे राहय ।दू किलोमीटर ले जादा लाइन लगे रहिसे तेमा सबले पहिली भूत मन खड़े राहयँ।वोमन दू दिन पहिली ले आके लाइन लगाये रहिन हें ।उँकर पाछू जइसे सरकारी राशन दुकान म एक,दू रुपिया अउ फोकट के चाउँर बर या सहकारी बैंक म पाँच सौ के अनुदान के रुपिया ल निकाले बर या एम्स म इलाज खातिर रजिस्ट्रेशन करवाये बर जूता चप्पल ल मढ़ा के लाइन लगे रहिथें तइसने लम्बा चौड़ा लाइन लगे राहय।

         जइसने बारा बजिस ओइसने दरबार हाल के दरवाजा खुलिच तहाँ ले धक्का मुक्की चालू होगे।सिकरूटी गार्ड मन ले दे के स्थिति ल सम्हालिन ।दू झन चपरासी मन आके भूत मन के हाथ म सेनेटाइजर डारिन अउ सोशल डिस्टेंसिंग बना के चलव, मास्क ल बने लगा लव काहत भूत मन ल प्रवेश कराइन।

      दरबार म पहुँच के भूत मन यमराज जी ल मूँड़ नवाइन।

सब ले पहिली भूत मन के मुखा दर्शन के बोहनी होवत देख के यमराज जी ह थोकुन नराज होवत ,मूँह कान ल अँइठ के कहिस--बोलव तुमन कइसे आये हव?

  भूत मन के नेता भूतनाथ ह हाथ जोर के बोलिस--माँग पत्र देये ल आये हन मालिक।

  हूँ ,जा वोला मोर सेकेटरी चित्रगुप्त ल दे दे।वो ह पढ़के सुनाही।यमराज कहिस।ओतका ल सुनके भूतनाथ ह माँगपत्र ल चित्रगुप्त ल जाके दे दिस।चित्रगुप्त ह माँग पत्र ल खड़ा होके पढ़िस,जेमा लिखाय राहय।

श्रीमान यमराज जी।

  सादर प्रणाम।

 सनम्र निवेदन हे कि हमन मृत्युलोक म बहुतेच परशान हाबँन। मनखे मन अतलंग करत हें।हमर रहे बसे के जगा नइ बाँचत ये।वोमन जबरदस्ती मरघट्टी म घलो बेजा कब्जा करत हें।दू चार साल म चुनाव आथे तहाँ ले वोमन ल परमानेंट सरकारी पट्टा तको मिल जथे। नरवा कोती दस बीस परिवार राहन  तेनो ह नइ बाँचिस।सतनच्चा मन उहू ल चपल के धनहा डोली बना डरिन। तरिया के पार तको नइ बाँचत ए। 

      अमली, डूमर, गस्ती अउ सेम्हरा जइसे बड़े बड़े जुन्नहटहा पेंड़ मन म राहन तेनो खोजे नइ मिलय।बोइर के तो नामो निशान मिटागे। अब तो इँकर छै लेन ,आठ लेन के छिहीं छिहीं सड़क बनइ म जम्मो पेंड़ कटावत जात हे। कहाँ राहन तइसे होगे। हमर तो मरे बिहान हे।

   सूनसान भाँठा मन म राहन तिहों नवा नवा कालोनी अउ शहर बसत जात हे। इहाँ के रहइया मनखे मन अतका खतरनाक हें वोमन थोरको नइ डर्रावयँ। भलुक हमीं मन उँकर डर म भागे भागे फिरत हन। जंगल पहाड़ म रहिबो कहिथन त उहाँ नक्सली अउ आतंकवादी मन कब्जा जमाये बइठे हें। हमर तो मरना होगे हे।

       अतः आप ले निवेदन हे कि नीचे लिखे अनुसार हमर दू ठन  प्रमुख माँग हे तेला जल्दी से जल्दी अउ हो सके ते आजे पूरा करे के असीम कृपा करहू।--


1 हमन ल मृत्यु लोक म भटकत कई कई साल होगे हे।कई झन तो सन् 1947 के पहिली ले भटकत हें।यमलोक म नागरिकता के अधिकार हमर बहुत पहिली ले हे जेकर ले हमन वंचित हन।अतः तत्काल इहाँ के नागरिकता दे जाय।

2 हमर मन बर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अवास योजना सहीं यमराज अवास योजना के तहत स्वर्गलोक म सर्वसुविधायुक्त अलग से कालोनी बनाये जाय।

      मान्यवर ! हमला पूरा विश्वास हे कि आप हमर जायज माँग ल जरूर पूरा करहू। अउ कहूँ पूरा नइ करहू त हमन आँदोलन ,भूख हड़ताल अउ तोर दुवारी म धरना प्रदर्शन करे बर मजबूर हो जबो।तब बद्दी झन देहू।


                    प्रार्थी

                    मृत्युलोक के जम्मो भूतगण।

       इतवार-30 अगस्त2020 

        आवेदन ल पढ़के चित्रगुप्त ह बइठगे तहाँ ले यमराज ह भन्नावत कहिस--अरे भूत हो तुमन मोला आवेदन देवत हौ के धमकी देवत हौ रे। तुहँर माँग ल पूरा नइ करहूँ त काय कर लेहू। तभो ले तुमन मोर वोट बैंक सही आव तेकर सेती सहानुभूति पूर्वक बिचार करहूँ। 

   फेर एक बात साफ साफ काहत हँव-- स्वर्ग लोक म कालोनी के माँग ल तुमन भूल जव काबर कि नरक ह मृत्यु लोक के अस्पताल सही फूल होगे हे। मनमाड़े एक्सीडेंट या दारू पीके नहीं ते फाँसी लगा के ,नहीं ते कोरोना म असमय मरके  अवइया मन के मारे जगेच नइये। तेकरे सेती स्वर्ग लोक ल तको कोरनटाइन सेंटर सहीं बना दे हँव। अइसे भी सरग लोक ह जगा जगा बने खंडहर लहुटत सरकारी भवन जइसे  होगे रहिसे। अइसे भी उहाँ रहे के लाइक जीवे नइ आवत रहिसे। अब कुछ तो उपयोग होवत हे।कुल मिला के उँहो जगा नइये।

    यमराज कहिस--अउ सुनौ।ले अब जावव।लाकडाउन म मजदूर मन जइसे दुखम सुखम जींयत हें ओइसने तहूँ मन मृत्युलोक म अपन रहन बसन करौ।

    अतका ल सुनके भूत बपरा मन दुच्छा हाथ झर्रावत,आँसू ल पोंछत लहुटगें।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

     हथबंद, छत्तीसगढ़

व्यंग्य-संतोष साहू

 व्यंग्य-संतोष साहू

(छोटे अउ चिरहा कपड़ा)


एक दिन के बात हरे सुकालू मोला अचानक पुछिस-कहिथे भइया!मोला ये बता पहिली के जमाना बने रिहिस कि ये जमाना बने हे।मँय केहेँव कोन मामला मा कहिथस सुकालू,अगर कपड़ा पहिरई के मामला मा काहत होबे तब ये जमाना बने हे कहूँ कहूँ मनखे छोटे छोटे कपड़ा पहिर के घूमत हे बढ़िया। छोटे कपड़ा मा खर्चा तको कम हे अउ धोय बर निरमा साबुन तको कम लगथे अउ कहूँ कोती जाथस तब बड़े मोटरा धरे के जरूरत तको नइये अउ ते अउ छोटे कपड़ा ले तन ला बने हावा तको मिलथे अउ बने दिखत हे किके कतको लहूट के तको देखथे अउ अतकेच नही अउ चिरहा तको ठीक हे जिँस के माड़ी अउ जाँग चिराहे तभो वोहा सोला आना हरे वोहा गरीबहा नइ कहाय।मोर बात ला सुन के सुकालू एकदम खुश होगे अउ किहिस बने बताय भइया महू हा चार साल पहिली जुन्ना होगे किके मुरसरिया बना देहँव अब ओकर उपयोग करहूँ।ओकर बाद सुकालू मुरसरिया मे भराय कपड़ा ला निकाल डरिस अउ माड़ी अउ जाँग के जगा ला चिर डरिस अउ एती वोती घूमन लगिस ।फेर कुछ दिन बाद सुकालू मोर से अउ भेँट होगे तब कथे बने बताय भइया कपड़ा के बदले जमाना ला मँय मुरसरिया ले निकाले कपड़ा ला माड़ी अउ जाँग करा चीर फाड़ के  पहिरेँव अउ घुमेँव तब एकझन मोला कथे आप कोन कालेज मे हव, त एकझन कथे नमस्ते सर जी और क्या हाल चाल तब एकझन कथे हलो भाई साहब किके हाँथ मिलईस अबड़ सम्मान मिलिस मोला अइसे सब सुकालू मोला बतइस तब मे केहेँव अब जाने सुकालू कपड़ा के मामला मे ये जमाना बढ़िया हे।

संतोष कुमार साहू

रसेला छुरा

व्यंग्य - गुलामी

 व्यंग्य - गुलामी 


      एक दिन मनखे कुछु बूता करत रहिस कि ओकर हाथ ले एकठन नानकुन मशीन बन गए,जेन ओखर कहे मा बुता करय अउ ओखर गुलामी करय।  जइसे पार्वती हा अपन मइल निकाल के गणेश ल बनाय रहिस।ओहा पार्वती के कहे मा मोहाटी मा रखवार बनके ओखर सब बात ला मानय।अइसनेच मशीन हा मनखे के सबो बुता मा अपन हाथ लगा के ओखर बुता लघियात कर देवय। मशीन के रहे ले घर के टेड़ियहा सदस्य मन ला मनाय के अउ हाथ गोड़ जोड़े के जरुरत नइ परय। फेर मशीन के रहे ले घर के सबो मनखे खुश रहय।काबर कि कोनों ला बुता के झेल नइ परय।मशीन के सेती अब ओ मनखे के मान गउन बाढ़े लगिस।एला देख के मशीन ला इरखा होगे।ओहा एक दिन परोसी घर बइठे चल दिस।उखरो बूता ला झटकुन निपटा दिस। परोसी एला देखिस तब इरखा करे लगिस। एला मशीन आकब कर लिस अउ ओखर कान मा कुछु कहिस.....। खुश परिवार ला देख मशीन ला घलाव मनखे ले इरखा होय लगिस कि एमन परिवार संग अबड़ खुश रहिथे एक दुसर के दुख सुख मा संग देथय, तब काबर महूँ हा अपन परिवार बढ़ाय के नइ सोंचव? मशीन हा अपन मालिक मनखे के कान मा लालच देवत कुछू कहिस.... अब लालच तो मनखे के भीतरेच मा रहिथे,ओ बाहिर निकलगे। मनखे बूझ नइ पइस अउ मशीन के संग पा के मशीन बनाय अउ बेचे के धंधा शुरू कर दिस।ओला बनेच आमदनी होगे। घर के सदस्य मन के सहयोग बिन मशीन संग अबड़ अकन मशीन बना के बेच डरिस।

          सबो घर अब मशीन आय लगिस।तब घरो घर मनखे ला अराम मिले लगिस। मनखे गुनिस कि एकठन मशीन ले अतका अराम मिलत हे तब सबो बुता करे बर काबर मशीन नइ बनाय जाय? अइसने परोसी मन घलाव गुनिन। सबो मन अलग अलग बुता करइया मशीन अपन जरुरत के हिसाब ले बनाय अउ बेचे लगिन।सबो मनखे ला अबड़ फायदा होय लगिस।अब नानम किसिम, अउ गुण, ताकत वाला   मशीन बने लगिस।एती मशीन के जनसंख्या घलाव बाढ़े लगिस।जीखर घर मशीन बिसाय नइ सकय उँखर घर परोसी के मशीन हा जाके एकोझन के कान फूँक देय ताहन रोज झगरा होवय।मशीन के आय ले अब कमाइया मन ला जादा झेल नइ परय।एखर ले सब खुश रहय।काम कम फायदा जादा।

        एती मशीन के जनसंख्या जादा होय ले ओहा राजनीति मा कूद गे। मनखे मन के ललचहा असन नेता ला अपन काबू मा कर लिस अउ अपन परभाव ला बढ़ाय बर गोहार करिस। नेता ला तो कमीशन से मतलब रहय, चाहे मनखे देवय चाहे मशीन। चुनाव पइत नानम परकार के मशीन देहँव कहिके घोषणा कर दिस। जइसन जइसन मनखे वइसने मशीन। का लइका, का चेलिक जवान, का बुढ़वा सियान, मोटियारी, महतारी सब ला मशीन मिलही कहिदिस।ओखर देय लालच मा जीता घलाव डारिन। नेता पाछू बताइस मोर जीते मा मनखे के जादा हाथ नइ हे,मैं तो मशीन के भरोसा जीते हँव।

      सब अपन अपन मशीन पा के खुश होगे।अब घर के दूसर सदस्य ले कोनों ला लेना देना नइ हे। सब बुता मशीन करत हे , ताकत वाला मनखे घलाव ठेलहा दूसर मशीन संग बइठे हे।अब मनखे के संगवारी मनखे नइ हे मशीन ला संगवारी, सगा बना डरे हे। सब रोजगार ला मशीन नंगा डारिस।एती मशीन खुश होगे हवय। पहिली मँय  मनखे के नउकर रहेंव,गुलामी करत रहेंव। फेर अब मनखे ला अपन गुलाम बना के राख डरे हँव। मोर बिन ओहा एक पाँव नइ रेंग सकत हे।अब तो ओखर सोंचे समझे पढ़े लिखे के सबो ताकत ला मँय हा अपन जगा गिरवी राख डारे हँव। अब मनखे झगरा लड़ई घलो मशीन मा होवत हे।पहिली मनखे ला गुनवान विद्वान कहे जाय।मनखे अपन बुद्धि अउ साथी मनखे के ताकत ले मशीन बनाय,लड़य अउ राजा महराजा बनय।अब मशीन के ताकत ले मनखे के ताकत के आकब करे जावत हे।सच अउ झूठ के निरनय बर मशीन हा संग देवत हे। अब मशीन ला मनखे बनाय के ठेका मिलत हे।वो दिन दुरिहा नइहे जब सत्यवादी, दानवीर, ईमानदार मनखे बनाय बर मनखेच मन ला मशीन के हाथ गोड़ जोड़े पर परही।


हीरालाल गुरुजी "समय"

छुरा, जिला-गरियाबंद 



   

शब्द-शक्ति-अरुण कुमार निगम

 शब्द-शक्ति-अरुण कुमार निगम


हर शब्द के एक खास अर्थ होथे, भाव होथे। कोनो वाक्य ला समझे बर अर्थ अउ भाव ला समझना जरूरी होथे। अर्थ अउ भाव मा शब्द के शक्ति होथे। 


*शब्द-शक्ति के तीन प्रकार होथे*

अभिधा, लक्षणा अउ व्यंजना


*अभिधा* -

जइसन शब्द के अर्थ अउ भाव होथे, वइसने जब समझे जाथे, वो अभिधा कहे जाथे।

उदाहरण - 

अभिधा - मँय छत्तीसगढ़िया अँव जी


ये वाक्य मा पता चलत हे कि कोनो अपन परिचय बतावत हे। अपन आप ला "छत्तीसगढ़ के रहवइया" बतावत हे। 


माने वाक्य के हर शब्द के उही अर्थ आय जइसे शब्दकोश मा लिखे मिलथे।


*लक्षणा* 

शब्द के अर्थ कुछु अउ होथे फेर आने अर्थ निकलथे अउ भाव बदल जाथे। 

उदाहरण - 

लक्षणा - मोर राजा दुलरुवा बेटा

मोर, दुलरुवा अउ बेटा...ये तीन शब्द के उही अर्थ हे जइसे शब्दकोश मा लिखे हे फेर *राजा* शब्द के अर्थ बदलगे। राजा के अर्थ होथे कोनो राज या देश के मुखिया, मालिक फेर ये वाक्य मा राजा के कुछु अउ अर्थ निकलत हे। बाप बर ओकर दुलरुवा बेटा राजा ले कम नइ रहे (सही मा वो राजा नोहय)


*व्यंजना* 

जब शब्द के अर्थ अउ भाव अलग-अलग मनखे बर अलग अलग होथे, उहाँ शब्द-शक्ति व्यंजना कहे जाथे। 


उदाहरण - 

व्यंजना - धरती म आए बिना दाना पानी पाबे कहाँ रे


ये वाक्य के साधारण अर्थ निकलथे कि चिरई-चिरगुन मन कतको अगास मा उड़ान भर लेवैं, दाना-पानी चुगे बर धरती मा आना पड़ही। विशेष अर्थ अइसन मनखे मन बर हे जउन मन भौतिक सुख सुविधा के फेर मा घर-दुवार, रिश्ता-नाता ला बिसरा के आने शहर या देश मा चल देथें। भौतिक सुख अपार मिलथे बंगला, गाड़ी, नाम, प्रसिद्धि, रुपिया-पइसा फेर *आत्मिक-सुख* इही हर मनखे के जिनगी बर असली दाना पानी आय, तभे मिलथे जब वो अपन घर-दुवार, रिश्ता नाता के बीच मा आथे। ये वाक्य मा धरती अउ दाना-पानी के प्रयोग व्यंजना कहे जाही। 


व्यंजना के एक सरल उदाहरण अउ देखव - 


*बिहिनिया के आठ बज गे*


ये वाक्य साधारण अर्थ मा समय बतावत हे। कारखाना के कर्मचारी बर ये वाक्य के अर्थ होही - ड्यूटी जाए के बेरा होगे, 8 बजगे।

विद्यार्थी बर इस्कुल जाए के अर्थ निकलथे।

गृहणी बर घर के कामकाज करे के बेरा होगे। लोकल ट्रेन मा अपडाउन करइया मन बर ट्रेन पकड़े बर ग़ल ले निकले के टाइम होगे। आकाशवाणी बर - *बिहिनिया के आठ बज गे* अब आप फलाना फलाना से समाचार सुनव।

एक वाक्य के अर्थ अउ भाव अलग अलग मनखे बर अलग अलग हो उहाँ व्यंजना शब्द शक्ति होथे।


*अरुण कुमार निगम*

व्यंग्य रचना-आशा देशमुख

 व्यंग्य रचना-आशा देशमुख


पितर नेवता


आवव पितर हो आज तुंहर बर बरा सोंहारी तसमई बने हे ,का होइस पहिली तुमन ला खाय बर नइ मिलिस त आज खा लेवव ।जीयत के दुःख ला भुला जावव वो समे के बात अलगे रिहिस दाई ददा हो ,जवानी म तुंहर बहु के मूड़  तुमन ला देखत पिरावय अउ तियासी बासी अउ चार दिन के भरे पानी ला देवय पर अब बने होंगे हे,तुंहर बर फुलकसिया थारी लोटा अउ पीढ़ा मा रोजे आरुग पानी मढ़ाथे ।

अउ बोली भाखा हा घलो बने होगे हे ,डोकरी डोकरा ले अब सियान सियानिन कहे लग गेहे ।

अब गारी नइ देवय गा इँहा तो पंडित ल बुलाके भागवत भी करात हावन ।

अब्बड़ अकन दान पुन बर जिनिस बिसाय हावन।

पहिली के बात ला भुला जावव दाई ददा हो,

भले तुमन एक एक चीज बर तरसे हव पर आज वो चीज मन ला पूजा मा चढ़ावत हावन।

तुमन जीयत रहेव त तुमन ल देखइया आवय पहुना मन हा तुमन ला बीमार हे कहिके तब उचाट लागे ग ,पर अब हमन हा पहुना नेवते हावन तुंहर पितर मान बर ।अउ तुंहर चिरहा दसना ल फेंक के तुहंर बर फूल के बिछौना बनाय हावन ।

                   आ जावव दाई ददा हो ,मोर लइका हा ये पितर मान ला देख देख के खुश होवत हे । मोर ददा बढ़िया हे कहिके ।

आ जावय।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य बिरवा वीरेन्द्र सरल

 आलेख

छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य बिरवा

वीरेन्द्र सरल

कोन्हों भी भाषा के महत्व के मूल्यांकन ओखर साहित्य ले करे जाथे। साहित्य जतका पोठ होही, भाषा ह वतकी रोठ होही। छत्तीसगढ़ी साहित्य के संदर्भ म मैं जब विचार करथंव तब मोला लागथे कि इहाँ पद्य में तो बहुत काम होय हावे फेर गद्य के कोठी अभी उन्ना हे। छत्तीसगढ़ी के गद्य साहित्य के उप्पर जब चर्चा होथे तब कुछ गिने चुने नाम आथे। कहानी, लेख ,  उपन्यास, निबंध अउ गद्य के आने विधा के बाद जब व्यंग्य के बात आथे तब तो फेर लेखक मन के संख्या ह अंगरी म गिना जाथे। सम्भव हे मोर विचार ह गलत होही काबर कि मैं साहित्य के अध्येता नहीं बल्कि विद्यार्थी अंव। एक बेर मोला एक झन विद्वान ह पूछे रिहिस छत्तीसगढ़ी व्यंग्य म आप अपन आदर्श लेखक कोन ल मानथव। मैं अकबका गेंव। मैं क्षमा माँगत कहेव मोर अध्ययन ह कम हे भैया जउन पढ़े हंव ओमा विशुद्ध व्यंग्य कम अउ हास्य ज्यादा पाय हंव। हास्य ल व्यंग्य माने बर मोर जीव गवाही नई देवत हे। आजकल तो हास्य के नाव म चुटकुलेबाजी चलत हे, अश्लील, फूहड़,  दोअर्थी चुटकुला म घला बड़े बड़े सम्मान मिल जावत हे अउ सम्मान पवैया ह हास्य व्यंग्यकार होय के तमगा पहिरे इतरावत हे। भाई विदूषक अउ साहित्यकार म कहीं अंतर होथे कि नहीं।

छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य लेखन के कमी के एक बड़का कारण मोला लगथे कि इहाँ थोड़ बहुत व्यंग्य तो लिखे गिस फेर व्यंग्य उप्पर विमर्श नई होय पाइस। व्यंग्य उप्पर सभा संगोष्ठी विचार के कमी के कारण लिखे के शौख करैय्या लेखक मन ल हास्य अउ व्यंग्य लेखन के दिशा नई मिल पाइस। पढ़े के रुचि के अभाव के सेती लेखक मन घला कोन्हों परसाई, जोशी, श्रीलाल शुक्ल , लतीफ घोंघी जइसे बड़का लेखक मन के लिखे ल पढ़ नई पाइस। भले ये बड़का लेखक मन हिन्दी म व्यंग्य लिखे हे फेर व्यंग्य लेखन के तासीर ल जाने समझे बर इंखर लेखन ल पढ़ना जरूरी हे, तभे उत्तम व्यंग्य लिखे के कोशिश करे जा सकत हे। 

दूसर बात यहु आय कि कोई भी लेखन ह एकदम से उत्कृष्ट नई हो जाय। करत करत अभ्यास के मामला सबो जगह फिट अउ हिट हे। कोई भी कला ल छोटे बन के ही सीखे जा सकत हे। सर्वोच्चता अउ सर्वज्ञता के दम्भ ह विकास के रद्दा ल बंद कर देथे अउ हमन सबो झन इही बीमारी ले ग्रस्त हन। कोन्हों कोन्हों अतेक ग्रस्त हो जथे कि उठे बइठे बर नई सकय। सशक्त होय के चक्कर म अशक्त हो जथे।

व्यंग्य ह कोन्हों नवा बात तो नोहय। हमर छत्तीसगढ़ी के हाना अउ ठेही भर ल एक नजर देख लेबो तब व्यंग्य के भंडार नजर आही। एक लाइन म तगड़ा व्यंग्य। जउन ल आजकल व्यंग्य म वन लाइनर कहे जावत हे उदाहरण बर एक उदाहरण निकम्मा पन बर व्यंग्य देखव , हाथ म घड़ी कान म सोन, तेखर बुता ल करही कोन। छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति अउ मुहावरा म व्यंग्य विषय म एक लंबा अउ ठोस लगहा लेख लिखे के विचार मन म आवत हे। बाद म लिखहूँ।

व्यंग्य ल सुशिक्षित मस्तिष्क के विधा माने जाथे। व्यंग्य ल समझे बर संवेदना अउ समझ के जरूरत होथे। व्यंग्य ह समाज सुधार के विधा आय तिही पाय के कबीर ल भक्त कवि होय के पहिली समाज सुधारक माने गे हावे। व्यंग्य ह करुणा के कोख ले उपजथे। समाज के असमानता, विसंगति, विद्रूपता ल देख बे तब मन ह आक्रोशित हो जथे तब नियामक सत्ता ल फटकारे के अउ अपन आक्रोश ल व्यक्त करे के सबसे उत्तम माध्यम व्यंग्य ह बनथे।

कबीर साहेब किहिन कि साधो जग बौराना, साँच कहे तो मारन धवायै, झूठे जग पतियाना। सोज सोज सच बात ल कहिबे तब लोगन पागल समझथे। फेर उही करु बात ल हास्य के चासनी म बोर के दे बे तब गटक जथे तिही पाय के व्यंग्य के संग हास्य के जरूरत होथे। व्यंग्य उप्पर विचार करे के मौका लोकाक्षर समूह ह दिस। महू अपन मति अनुसार अपन विचार रखेव तब हमर नवा संगवारी मन के सुघ्घर व्यंग्य समूह म आय लगिस। नवा संगी मन के व्यंग्य ल पढ़ पढ़ के मन गदगद होगे। लिखइया के कमी नई हे, जरूरत बस व्यंग्य लेखन के समझ विकसित करे के हावे। आवव हम सब मिलके समय समय म व्यंग्य के बारे मे अपन समझ ल साझा करन। व्यंग्य के नवा नवा जानकारी खोजन, व्यंग्य के बढ़िया बढ़िया किताब पढ़न अउ अपन लेखन के खाद पानी दे के व्यंग्य के बिरवा ल छत्तीसगढ़ी व्यंग्य के विशाल रखवा बनाय बर जी जान ले जुट जावन।

वीरेन्द्र सरल

बोडरा, मगरलोड

जिला धमतरी, छत्तीसगढ़।

व्यंग्य-अश्वनी कोसरे

 व्यंग्य-अश्वनी कोसरे


*तोर नाव का हे* 


*आबे आबे गो .....**आबे आबे गो .....पंचु के कका दाई कोदो पैरा के खरही म चढ़ के रोजे दस इग्यारे बजती म अपन डोकरा ल हुँतकारय | जुन्ना माइक के भाखा कस आरो लागय ,माने कोनो पुलुस वाला  हर चोंगा मा रेरियावत हे के कोनो उदबिरिस होय हे | मंत्री दास बबा हर सुत उँच के रोजे ,बिहनिया ले खार डहर घुमे ल जावँय|

उकील सँग भेट होवय त कचहरी कस कोनो भी मुद्दा म, माने कानून के बने जानकार असन बहस होवय|चेर लगा लगा के एक दूसर ल पुछँय ,घंटो के गोठ बात ले कुछु हाँसिल नइ होवय | फेर कथत मथत ओखियावत जबर पागा म बँधाय चिलम निकाले अउ अँगौछी के एक लर म बंधाय गठियाय चकमक ला लोहाटी पटिया संग कपसा ल चट ले मार  के ठढ़ियायँ के सिपचाँय | घेरी बेरी खखलुआ गाल ल बजावत चिलम ल तिरँय सक सक कुहरा अइसे निकरे जनामना भेलई के लोहा कारखाना म लोहाचुरे ले निकरत हे| कोनो मजकहा लइका मन कहँय वहिदे रे डीजल इँजन के कुहिरा उड़ावत हे अउ छुक छुक बाजत हे|

डोकरा मोठडाँट फेर छोटे कान के राहय डोकरी के रेरपरई ल सुने नइ पावय | त उकील ह बतावय तोर छइँहा टिंह टिहावँत हे ले एक दम दे तहाँ छुपल्ला|लकर धकर जाय लगीन उकील कथे आज तोर सही नाव परमुख मंत्री कुदरी ,कुदरा, रांपा, गैंती , झउँहा ,पट्टा , अवास बाँटे बर डोंगरीपट म आवत हे |नहा खा के जल्दी चलदेबे |

 **सरपंचीन हा ताते तात खवाही|सरपंचपति*के मारे काहीं हाँथ नइ आवय उकील* , *तँय काहीं कहिले|पंचायत म कही कुछु **भी सरकार के योजना* *म आथे त सबले पहली ओखर चेला* 

*चपाटी  लंगुरवा मन ल मिलथे|*** ओदरी पनही बांटीन त मोला ऐसे नंबर वाला ल दे रहिन के पहिने म गोड़ म नइ अइस| रामचंद के नवा बूट ल तुरते नगा लिन | *नहीं नहीं ये दरी सबो जीव परानी मन ल पान परसाद बरोबर बाँटे जही| बड़े बड़े कनकट्टा , जेबकतरा ओहदा वाले मन घलो आय हें|*


         तोर नाव पहली नंबर म हे| नरवा म नहा खोर के बबा घर पहुँच गे | लउहा लकर खा डरिस| अपन छाता अउ गोटानी ल धरे धीरे धीरे रेंगे लगिस| गाँव के बनेच झन जावत राहँय | बड़े मंचान ब इठिका बर का गजब तोरन पताका फूल माला ले काहरत राहय|| सजउटी बिभाग वाले मन राजा कस महल ,पंडाल सजाय रहँय| सरग ले अपसरा मन नाँचे बर बुलाय गे रहिन | ताकि परमुख के आवत ले मनसे मन के भीड़ सकलाय रहय|बबा सभास्थल म पहुँच गँय| बने दुरिहा ले लकड़ी ,बाँस-बल्ली  के घेरा बने राहय |  मँचान हर लाल किल्ला कस जगबग ले सजाय गे राहय |गोठकाहर मन बर बड़ेच धियान देके रइपुर ले साउंडसर्बिस मँगाय गे रहिस जेकर ले कोसभर म बगरे मनसे मन ल सरकार के गोठबात के, अउ सरकारी घोषणा के जानकारी होजय| 

कइ लाइन के टेबल खुर्सी मन मा कई विभाग केओहदादार पदबी बाले मनबर जमे हे| साहेब सुबहा मन अजगर मन बरोबर अइठे गोइठे बैठे राहँय|  टेबल भीतर के होय कमई ल कइ झन मन पान संग पगुरावत राहँय|

 *अउ नवा बोकरा के तलाश म मन लगाय रहँय ताकि आफिस बुला* *के नवा चोंचला के नाम ले टेंटी गरम जा सकय|उँकर जीव छटपटात रहपय मलाई बर|हितगराही मनल डसे बर जीभ निकाले घड़ियाल अउ अजगर मन मँचान तीर सोफा म फसरेराहँय |डोमी अउ कोबरा किसिम के सेवादार,सेवक चाकर मन बर मंचान के बीच म सादा अलवान वाले टेबिल घलो लगे राहय|* बिखहर मनबर अलग से मुसवा भठइला के फाँदा लगे रहय|

हाथी कस लावलसगर वाले  मन बनझार के साल सैगोन ल उजार के जउन हरियर खेती धनहा के संदेश देबर आय रहँय,अउ भारीभरकम  सरीर वाले रसद पानी बिभाग के साहेब मन बैठे राहँय|  बड़े हुँशियार बिभाग बाले साहेब मन  सफेद सफेद घोड़ा असन सजे राहँय उन ल अपन विभाग के दौड़ ल जीते के भारी संसो राहँय | *उमन घोड़ा कस बड़ हिनहिना हिनहिना के किसान मन ल सीखोवँय, रिझावँय ,समझावँय* | के तुरते ताही किसान ल नफा होव इया हे|कुछ मन तो सहिच मा हाँथी कस राहँय , उँकर खाय के दाँत आने अउ देखाय के आने राहँय | आज ओमन भी| *सरपंच पति तो आज 

बड़ झन कुकुर -माकर मन ल सकेले ये टेबल ले वो टेबल दौड़त हे के वो कर पंचायेत के जम्मो समसिया झर जही|कुछ मन खा पी अउ चाँट पूँछी डोलावत राहँय | ते कुछ मन जे नइ खाय नइ पाय  रहँय उँकर  लार टपकत रहय|

बबा एक झन कनकट्टा बेकाबू  मेर अभर गे कहे लगिस मोर आवास ल दे| *मुँह मटकावत * * बेकाबू पूछिस तोर का नाव हे? बबा* कहिस उकील बताय हे  मोर नाव आगू हे| बाबू फेर कहिस तोर का नाव हे?बबा ल गुस्सा आगे, मैं इसकूल म भर्ती होय ल आये हँव त नाव पूछत हस| देख बने देख उकील बताय हे मोर नाव ल |

उही ल बता *तोर नाव का हे?* 

बबा कहिस मंत्री | जोक किसिम के बहुतझन बेकाबू मन लहू पिये टकरहा घाँव खोजत राहँय |

सहिंच कहे गे हे| माछी खोजय घाँव राजा खोजँय दाँव | बबा के ताव देख के बड़े बड़े के सटइ बटइ खुशर जय | फेर बबा नाव के चक्कर परगे| ओकर नाव आवास म नइ राहय | बाबू नाव खोज डरिस | सिधवा गोरू बरोबर मुड़ी पुछी ल हिला दिस| अइसे बबा सरकारी चोंचला के सबो बिभाग म जा देखिच| सब के सब पूछिन तोर नाव का हे? बबा नाव पूछई म  अकलिया गे |फेर बबा भूइँया नाप जोख बिभाग डहन बढ़ गय | उँहा ढोढ़िया, मुलहेड़ी पिरपिटिया मन लमे राहँय| सनमुख  जरीब धरे अउ बाना बिंदरा बगराये भेट डरिस | कहे लगिस मोर आवास नइ आय हे ,अउ तैं तो मुआवजा मिलही कहे रहे न ओ चना के कहाँ हे|भूइँया बाले पूछिस *तोर नाव का हे?*  मंत्री कहिस बबा तिहाँ  ओला तोउही  समे साँप सुंघ गय हुकीच न भूँकीच बाजू साहेब डहन देखे लगीस| बबा कुबेर बिभाग म पहुँच गे बिभाग परमुख ह महमंडल कस खुरसी म.जीभ लमाये  बइठे राहय फूँसरत| न तो मोर आवास आये हे और न मुआबजॎ मिले हे तँय का बोले रहे गाँव म आके खेती बर किसानी रिण मिलही | पास करव मोला बहुते जरूरत हे| सीलहदार के कम्पुटर आपरेटर कथे *तोर का नाव हे?* पुँछते राहय के उड़नखटोला म बैठे,  अकाश मारग ले  परमुख मंत्री के उतरई होगे | कुकुर माकर मन जय कहिके बोमियाये ,अउ उपर कति हाथ डोलाय लगीन|

        सिम्बा कस ठाठ धरे परमुख अउ संगेसंग  हाँव हाँव करत एक दूठन सुनहर मन मँचान मा चढ़ गे|

 दू तीन मिनट ले चिचियाये लगीन| कुछ एक खिसोरी मन खाल्हे ले खिशोरत राहँय |आंतर तेल छिंत डरिन फूल माला सुवागत होगे| सेखीबघारे के समे होगे| अपन पीठ ल थपकत अपन गेंग ल पुचकारत ,सिम्भा दहाड़े ल धर लिच के हमर राज म सबो किसान जवाँन सरग कस झुला झुलत हवँय| कोनो जिनिस के कमी नइ  होही|आज बड़े बने के दिन आय दुख भूँख गरिबी खतम | सबो जिनिस बँटा गे|इही खुशी म सबो किसान ल एक एक झउँहा फोकट म बाँटे जाय मोर हाथ ले जे किसान पाही ओ सबले सफल किसान आय| तहाँ का पुछबे परमुख के भभकउनी म फोकट लालच म झउहा बर झपागें| बबा घलो अपन डोकरी के सुरता करत गोबर माटी म डोकरी सना जथे, के मया म नवा फोकटहा

झउहा गोबर उठाय बर माँगे चल दिस | लेकिन धक्का मुक्की म बबा चपका गे| सुरक्छा बेवस्था वाले मन लाठी भांजत भींड़ ल काबू कर लिन | लेकिन बबा भीड़ म दबगे राहय बेहोश परे राहय  | मुड़ म झउहा तोपा गे राहय |

स्वास्थ्य बिभाग के दू झन हंसकइना मन बबा ल उठा के लेगय पानी छित के जगाय के कोशिश करिन| नारी चलत रहय| थोर किन देर बाद बबा ल होश आगे | त हंसकइना मन पुछिन तोर नाव का हे|बबा धीरे कन करवट बदलत परलोक सिधार गे|यम के दूत  जीव आत्मा ल लेगे बर आगे|

 *यम के दूत मन घलो का आत्मा ल पुछिन तोर का नाम हे??* 


 व्यंग्य- अश्वनी कोसरे 

 कवर्धा कबीरधाम