Thursday, 5 August 2021

टूटहा हाथ

 टूटहा हाथ 

                    को जनी का होइस ना का .... कन्हो ढपेलिन के अपने अपन घट गिस .... एक दिन घर के बाहिर म किंजरत भोलाराम हा चिखला म गिरगे । गिरिस घला अतेक धीरे के , येकर जगा अऊ कन्हो होतिस त , नानुक खरोंच तको नइ आतिस । फेर भले मानुस के हाड़ा म कतेक दम ........ भाजी कोदई खवइया के हाथ म कतेक ताकत , बपरा के हाथ टूटगे । हाथ के टूटना कोई बहुत बड़े दुर्घटना नोहे । फेर हाथ टूटे के बाद , ओकर ले कतको बड़े बड़े दुर्घटना होवत देखे रिहिस भोलाराम हा , इही ला सुरता करके , फिकर म जहू तहू बेहोश हो जाय वोहा । अस्पताल म सियानिन नर्स के अलावा कोई शुभचिंतक नइ दिखय । एक दिन सेवा जतन करत , सियानिन हा , फिकर के कारन पूछिस । भोलाराम बतइस - बहुत समे पहिली के बात आय काकी .... एक झिन संगवारी के हाथ का टूटिस , बपरा के सरी गै । टूटहा हाथ म , रहि सहि संपति ला सम्हाले नइ सकिस , रिश्तेदार मन अपन अपन ले नंगा डरिन । दूसर संगवारी के संग तो येकरो ले बिचित्तर घटना होइस । ओकर सुवारी बड़ सुंदर रिहिस । कतको दूसर संगवारी मन के नजर गड़गे । बपरा के करम फूटगे । तीसर के तो बारा हाल होगे । हाथ का टूटिस , खुरसी छूटगे । टूटहा हाथ धरे अस्पताल म निही जेल म समे काटत रहय ।   

                     सियानिन नर्स किथे – जइसना संगवारी मनके नाव गिनाये हस , तइसना तोर तिर काये हे ? तोर तिर न पइसा हे , न तोर बई सुंदर हे , न पद हे , न प्रतिस्ठा ........ फेर तैं काबर फिकर करथस । भोलाराम किथे – अरे काकी दई , येमन मोरो तिर होतिस त , तोर अस्पताल म मोला देखे बर अवइया के , रेम नइ लगे रहितिस या .... ? नर्स किथे – अस्पताल म तोला देखे बर रेम लगे हे के निही , तै काला जानबे । तोर बर अवइया मनखे के सेती , अस्पताल के कर्मचारी मन थर्रा गेहे । भोलाराम किथे – मोला देखे बर मनमाने मनखे आथे कहिथस , फेर मोर तिर तो एको झिन नइ अमरे हे अभू तक । नर्स किथे – तोर तक काला अमरही बाबू ........ , जे आथे ते , अस्पताल के दरवाजा म पहुंचके फोटू खिंचवा के निकल जथे । एक दू झिन भितर निंगे के प्रयास करिन फेर सरकारी अस्पताल के महक म बेहोश हो गिन , ओमन ला तुरते प्राइबेट अस्पताल म भरती करे लगिस । तोर बड़ बदनामी होइस । भोलाराम किथे – अस्पताल बस्साही , तेमा मोर का बदनामी .......... ? नर्स किथे – जे आथे ते इही सोंचथे के , तोरे सेती अस्पताल बस्सावत हे । भोलाराम किथे – मोर सेती कइसे बस्साही या काकी अस्पताल हा ? नर्स किथे – कोरी खइरखा कस भरती रहू त अस्पताल तो बस्साबे करही । भोलाराम किथे – खसखस ले चांटी फांफा कस बियाये के बेर तूमन ला कहींच नइ लागिस काकी , अऊ सरी होय के पाछू हमन ला दोस देथव या ............ । ओमन काबर मोर तिर नइ आये तेला में जानत हंव । नर्स पूछिस – काबर ? भोलाराम बतइस – ओमन मोला चिन डरही कहिके नइ आवय । नर्स पूछिस – तैं चिन डरबे तेकर का डर ........ ? भोलाराम किथे – में कहूं उगल दुहुं के , इही मन हाथ ला टोरे हे .... । नर्स किथे – अई ......... , में नइ जानत रेहेंव बाबू । फेर ये मन दिखथे बहुत भला आदमी , तोर बड़ फिकर घला करथे , काकरो हाथ म कइसे नीयत गड़ही ........ ? भोलाराम किथे – फिकर के बूता उपजाये बर , छद्म सहानुभूति जताये बर , हाथ टोरे के उदिम रचथे बिया मन ........ । 

                     नर्स पूछिस – ओमा येमन ला का फायदा हे तेमा ? भोलाराम किथे – फायदा हे काकी , तभे करथे । येमन जानथे के , हमर हाथ सही सलामत रइहि , त येमन ला अपन व्यभिचार के तुरते दंड भुगतना पर जही । हमर हाथ सलामत रइहि त , हमर देश के तरक्की म बाधक मनखे के जीना हराम हो जही । तेकरे सेती हमर हाथ ला टोर के बइठार देथे । नर्स किथे – तोर हाथ मजबूत नइ होही तभे तो , जेन आथे तिही तुंहर हाथ के बूता बना देथे । भोलाराम किथे – हमर मेहनतकस हाथ हा , पहिली बहुतेच मजबूत रिहिस काकी , फेर मुफत के माल हा हमर सरी देहें ला खोखला कर दिस । ये बैरी मन नइ चाहे के हमन मेहनत करके , मजबूत बनन । येमन हमर छीनी उंगरी ला जबरदस्ती बड़का मई उंगरी के बरोबर लाने बर , आरक्षण के फरिया ला लपेटके छीनी उंगरी संग , पूरा हाथ के ताकत ला खतम कर देथे । बिगन बूता काम के , मुफत म चऊंर देके , देहें के लहू म , आलस के वाइरस घुसेड़ देथे । इही वाइरस हा देहें के लहू ला चुचर देथे । उपर ले ससता म मिलत सोमरस हा , हमर दिमाग ला अइसे भरमा देथे के , हमन समझे लग जथन के , इही मन हमर तारन हार आय । 

                   नर्स किथे – ओ तो ठीक हे बाबू , अतेक जानत हस तभो , येमन ला काबर अपन तारनहार समझथव ? भोलाराम किथे – हाथ टूटे के पहिली समझेच नइ आवय के , कोन हमर तारनहार आय काकी , फेर एक बात महू ला समझ नइ अइस आज तक , हाथ टोर के बइठार दिस , कोलवा करके मरीज बना दिस , अस्पताल म भरती कर दिस फेर , हमन ला घेरी बेरी देखे बर काबर आथे ? नर्स किथे – येकर जवाब मोर तिर हे बाबू , तूमन मर झिन जावव ताकि , इंकर दुकान निर्बाध चलत रहय कहिके , घेरी बेरी देखे बर आथे । मोला ओकरेच बर तो राखे हे बेर्रा मन । एक कोती , में तूमन ला मरन नइ दंव , त दूसर कोती , येमन तूमन ला ठीक से जिये बर , तुंहर हाथ ला ठीक घला नइ करन देवय । येमन सहींच म जानथे के , एक बेर हाथ ठीक होगे तो , तूमन इंकर बारा बजा दुहू ..... । 

                    भोलाराम हमर देश के जनता आय , जेकर देखरेख करइया नर्स , हमर देश के लोकतंत्र आय , जेहा जनता ला मरन तो नइ देवय , फेर ठीक से जिये बर कहींच नइ कर सकय ।   

 हरिशंकर गजानंद देवांगन . छुरा

तइहा के सावन के सुरता*


*विषय*-- *तइहा के सावन के सुरता*

हमर महान भारत देश ला नाना प्रकार के पर्व तिहार जयंती और पुण्यतिथि मनइया आध्यात्मिक- धार्मिक प्रवृत्ति के पावन देश के रूप में जाने जाथे। इहाँ जतका प्रकार के पूजा- पद्धति अउ धार्मिक अनुष्ठान होवत होही,वोतका दुनिया मा अउ कहूँ नइ होवय।

         वैदिक भारतीय संस्कृति जेला कई झन सनातन संस्कृति तको कहिथें के रीति रिवाज -परंपरा म बारें महीना म अलग-अलग ग देवी-देवता के पूजा संग महिमा के बखान करे गेहे। जइसे चइत-कुँवार म दुर्गा देवी के पूजा-अराधना,कातिक म श्री विष्णु जी अउ माता लक्ष्मी के पूजा ,सावन महीना म आदिदेव, भूत भावन, आशुतोष, गंगाधर भगवान ,भोलेनाथ शिव शंकर -महादेव के पूजा करे जाथे। सावन महीना ल बड़ पावन अउ फलदायी माने गे हे। ओइसने हप्ता के सातों दिन कोनो न कोनो देवी देवता के दिन माने जाथे अउ वोकर ले आशीर्वाद पाए बर वो दिन खास व्रत- पूजा, अनुष्ठान आदि करे जाथे। जइसे सोमवार ल महादेव जी के, मंगलवार महावीर बजरंगबली के, बुधवार विघ्नहर्ता श्री गणेश जी के,  गुरुवार श्री विष्णु जी और माता लक्ष्मी के, शुक्रवार माता संतोषी अउ दुर्गा देवी के ,शनिवार श्री शनिदेव अउ रविवार भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव के दिन माने जाथे।  ये सातों दिन के संबंध ग्रह मन ले जोरके उँखर शांति खातिर पूजा-अर्चना करे जाथे ।

        ये बारों महिना म ,सावन महिना अइसे आय जेला पूरा महीना भर , वोकर जम्मों  सोमवार के दिन गिरिजापति महादेव के पूजा-पाठ करे जाथे ।कतकों श्रद्धालु भक्त मन सबो सावन सोमवार के उपास तकों रहिथें। हमू ल अपन सोमवार के दिन उपास रहे के सुरता हे।

     जादा बछर पहली के बाद नोहय। ये कोरोना बिमारी आये के पहिली सावन सोमवारी ल कतकों लोगन विशेष रूप  ले मनावत रहिन हें।

     सावन सोमवार के दिन बड़े बिहनिया पाँच -छै बजे ले शिव मंदिर में शिव भजन माइक में बाजे ल धरलय तहाँ  पता चल जय के आज सावन सोमवारी हे। उपास रहइया मन नहाँ-नुहाँ के बेल पत्ता, दूध- दही, गंगाजल  अउ नरियर धरके शिव मंदिर म पूजा पाठ करयँ। अइसे तो सब अपन-अपन समे के अनुसार मंदिर म पूजा करयँ फेर कुंवारी कन्या बेटी मन के शिव पूजा म विशेष उत्साह रहय।लईका मन प्रसाद के लालच म मंदिर कोती सकलाये राहयँ। सावन सोमवार के दू-चार दिन पहिले ले हर-हर महादेव, बम बम भोले के जयघोष करत काँवरिया मन  दल के दल कोनो पवित्र नदी ले जल लाए बर सजे-धजे काँवर म कलशा बाँध के पैदल जावत नहीं ते जल भरके आवत  दिख जँय।  येमा नवयुवक  मन के संख्या जादा राहय। संगी जहुँरिया मन संग कहूँ आये जाये के आनंद अलगेच होथे। 

      सावन सोमवार के संझाकुन मंदिर मन मा खास चहल-पहल राहय। कई ठो   शिव मंदिर के दरवाजा ल माटी-पथरा म थोकुन उँच रुँधके गाँव भर के श्रद्धालु मन शिवलिंग ल जल अर्पित करके पूरा बुड़ो दँय। कतको गाँव म सावन भर रोज सवनाही रमायेन तको होवय।  बर-पीपर ,नहीं ते आमा के रुख म झुलना बाँधके नोनी मन झूलत-झूलावत तकों दिखयँ।

    लइकापन ,विद्यार्थी जीवन म हम ला तो सावन सोमवारी के अगोरा राहय काबर के वो दिन आधा जुवर छुट्टी हो जय।

       फेर सब तइहा के बात होगे। आज तो पश्चिमी अपसंस्कृति के हवा लगे ले जम्मों तिहार मनाये म गिरावट आगे हे। उही हाल सावन सोमवारी के तको होगे हे। कोरोन संकट काल ल छोंड़ दन त अभो मंदिर मन म पहिली ले जादा भीड़ अउ तामझाम दिखथे। फेर ये सब दर्शन कम प्रदर्शन जादा जइसे लागथे। काँवर यात्रा फटफटी अउ मोटर-बस म निकले ल धर लेहे।  भजन-कीर्तन के जगा म डीजे अउ पाप संगीत चलत हे, भक्त-अभक्त मन नाँचत हे धन उधम मँचावत हें--समझ नइ आवय।

    गुड़ी चौंरा म बइठे सियान मन के कथा -कहानी अउ सवनाही रमायेन ल टी० वी० सिरियल अउ आनी-बानी के फिलिम ह सिरवा दिस। अइसे लागथे के हमन घरखुसरा होवत जावत हन। अइसे भी-- अब न तो गुड़ी ये न तो चौंरा ।

  नवा जमाना के नवा रंग-ढंग हे। कतको  उटपुटांग चाल चलन हे। सोंचथँव त एक ठन हाना के सुरता आ जथे--


तइहा के बात ल बइहा लेगे, सुन गा राजा भील।

 लोहा ल घुना खादिस, लइका ल लेगे चील।।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

सुरता,तइहा के सावन-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


 

सुरता,तइहा के सावन-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

   


        "कथे न तइहा के गोठ ल बइहा लेगे" सिरतोन म उसनेच, तइहा के सावन के सुरता सिरिफ अन्तस् म समाय हे, आँखी म अब तो सहज दिखे घलो नही। अइसन म का- सावन पहली कस नइ हे? सावन तो पहलिच कस हे, हाँ फेर मनखे मन पहली कस नइ हन। अब आन ल का कहँव मिही खुद लइकुसहा रेहेंव त,सावन के अइसन कोनो बौछार नइ रिहिस होही, जेमा नइ भींगे होहूँ, फेर अब तो तरिया, नन्दिया के  जुड़ पानी घलो सहे नही, त सावन के झड़ी म भींगे के बात ल तो छोड़िच दे। सियान त सियान आजकल के लइका मन घलो घर भीतरी धँधा गेहे। जमाना बदलत जावत हे। मनखे सावन म नही, नवा जमाना के बरसा म भींगत हे। मनखे मनके दिमाक बाढ़त हे, फेर दिल .......। रंग रंग के पहिनावा अउ देख दिखावा आगे हे, फेर तन अउ मन पहली के मनखे मन कस ठाहिल नइहे। भले अभी शहर म रहना होवत हे, फेर मोर तइहा के सावन गाँव म बीते हे। उही सब सुरता आजो सावन के बौछार देख, नजरे नजर म झूलथे। आषाढ़ के पानी पाके धरा, तरिया नन्दिया, पेड़-पात अउ जमे जीव जंतु हिता जाथे, अउ जब सावन हबरथे त उन सबके खुशी दुगुना हो जथे। अइसने हाल हमरो रहय, आषाढ़ म हिताय अन्तर मन कोनो तरिया नरवा कस, सावन ल पाके  उमंग म छलके लगे, सरसर सरसर चलत पूर्वाही म पेड़ पात संग नाचे लगे। भले खीसा उना रहय फेर तन अउ मन कोटकोट ले भरे रहय। खेत-खार, बन-बाग, तरिया-नरवा,संगी-साथी अउ घर परिवार के मया दुलार ले बड़खा कोनो धन नइ रिहिस। छत्ता,मइनकप्पड़,कमरा,खुमरी बूता करइया मन बर रहय, अइसन म हम सब ठलहा लइका मनमाड़े भींगत किसम किसम के खेल खेलन। कागज पात बोहाना, धार ल माटी पथरा सकेल के रोकना, गिरना-उठना, भींगना, कपड़ा मइलाना रोज के बूता रहय। जतका खुश हम लइका मन रहन, ओतके खुश दाई ददा बबा कका मन घलो रहय।


तिहार बार के सुरता-

 लबालब भरे ताल तलैया, हरियर हरियर पेड़ पात, लहरावत धान-पान, बारी बखरी के साग भागी,चिरई-चिरगुन के चिंव चाँव, झींगुरा अउ मेचका के बोली सबे ल देख सुन मन अइसने अघा जाथे, वोमा सम्मारी, इतवारी,हरेली, सवनाही, नँगपाँचे, राखी तिहार मिंझरिस ताहन का कहना...। हर सम्मार के सांझ सुबे तरिया के पार म भोले बाबा के मंदिर के आघू संगी संगवारी मन संग प्रसाद खाय के अलगे मजा रहय।

जमे तिहार मन म उमंग भरे, लइका सियान सब मतंग रहे। गांव म ये सब तिहार आजो मनाये जाथे, फेर पहली कस नही। तिहार मनखें मन के मन म मया घोरे के काम करथे, फेर स्वार्थ अउ आपा धापी के जिनगी म सब धीर लगाके कमती होवत जावत हे। पहली बेटी माई मन आसाढ़ सावन लगत अपन ददा दाई दाई घर सकला जावत रिहिस, आज तो राखी तिहार बर घलो एक दू घण्टा बर आथे। सवनाही, सम्मारी, इतवारी, हरेली म पूरा गाँव के गाँव झूमे नाचे।  हरेली म, नरियर फेंक, खो-कबड्डी, बइला दॅउड़, गेंड़ी दॅउड़,फोदा, झूलना,नदी पहाड़, ये खेल कहूँ- कहूँ गाँव म आजो धूमधाम ले मनाये जाथे, फेर ज्यादातर नेंग मात्र होगे हे। तिहार बार बर घलो मनखे  मन टेम नइ निकाल पावत हे। *गाँव म सावन का दया मया घलो दावन म बँधा गेहे जेला,विदेशी संस्कृति के लेवाल नजर गड़ाय देखत हे।* शहर कोती तिहार बार आज देखावा के रूप म पहुँचत जावत हे, जे हरेली ल पेड़ प्रकृति के संग पूरा गांव झूम के मनात रिहिस, ते शहर म *हरेली मिलन* के रूप म एक समूह म मनावत दिखथे। पेड़ पौधा के हरियाली नइहे त हरियर ड्रेस कोड अउ सावन के लोक लुभावन झूला सजे दिखथे।फेर आज कुछ नही म, यहू घलो बढ़िया उदिम आय। हरेली के दिन नांगर अउ गाय गरुवा धोय के अलगे मजा रहय, अउ जब हाथ म गेंड़ी आय ताहन का कहना। *सावन आजो झूम के आथे, फेर मनखे मन अपन स्वार्थ, देखावा अउ पद पैसा के अहंकार म नइ झूम पाये।* बम्हरी, करंज, बर के झूला, डण्डा पचरंगा, तरिया के पार ल बिच्छल करके फिसलना, लोहा गड़उला जइसन किसिम किसिम के खेल कोनो तिहार बार ल कमती नइ लगत रिहिस, कहे के मतलब रोजे तिहार रहय। स्कूल, घर,खेत, खेलकूद, गाँव-

गौतरी सबे चीज बर बरोबर टेम निकल जावत रिहिस, फेर आज लइका मनके खेलकूद के सँउक घलो कमती होवत हे। नवा जमाना लइका सियान सबके हाथ म मोबाइल धरा देहे, सब अपने म मगन हे। *आज सेल्फी के दौर म, हजारों फोटू ले घलो सुघ्घर सुरता अन्तस् म् समाये हे।*


सावन मा स्कूल के सुरता- 

आषाढ़ सावन महीना रझरझ रझरझ बरसत पानी म स्कूल जाये के अलगे मजा रहय, खुद भले भींग जावन फेर पट्टी बस्ता ल झोला भीतरी झिल्ली म रखन। कई बेर तो हरेली के बाद गेंड़ी म घलो स्कूल चल देंवन। बरसत पानी म घलो 15 अगस्त के तैयारी बनेच ढंग ले करन। सार्फ़ सफाई, साज सज्जा, गीत कविता अउ प्रभात फेरी म गाये गीत आजो सुरता आथे। स्कूल म कोनो कक्षा चुँहै त, खपरा  ल छाये बर घलो छानी म चढ़ जावत रेहेंन। नांगपंचमी के दिन जमे कक्षा के ब्लैकबोर्ड म नाँग साँप बनाके नरियर फूल चढ़ाना, गीत कविता पढ़ना सुनना, बड़ मन भाये। जादा पानी गिरे त कोनो दिन हमन स्कूल नइ जावन त कोनो दिन गुरुजी मन नइ आवय। एक दू झन भर गुरुजी आय त सबे कक्षा के लइका मन एक हाल म बइठ के, कहानी किस्सा अउ गीत कविता सुनन, सुनावन।



सावन मा खेत खार- 

सावन के फुहार म खेत खार, तरिया नरवा कुँवा बवली, पेड़ पात अतेक मनभावन लगे जेखर बरनन करना मुश्किल हे।  सावन म बियासी हबरे रथे, चारो कोती खेत म मनखेच मनखे, अउ ओह तो। निंदई म लगे दाई, दीदी मनके कर्मा ददरिया अउ कहानी किस्सा सुने के घलो मौका मिले हे, एक घण्टा दू घण्टा के घलो कहानी कमइयां मन मुखाग्र सुनावय। अउ कहूँ मूँगेसा, कोलिहापुरी, फूट, फोटका, फूटू मिल जाय त तो खुशी के ठिकाना नइ रहय। चिखला म चप्पल नइ लहे, अइसन म गोड़ म काँटा रोजे गड़े, संझा रोजे रो रो के हेरवान। बइला ल छेंक के लाना, चराना, बन निंदना,खेतेच म बासी पेज खाना, पार बइठे खेत खार ल नजर भर निहारना, सरग के सुख देवय। 

आसाढ़ सावन म चुँहत छानी के संसो, खेत म धान ल बढ़ाये बर गिरत पानी ल देख छू मंतर हो जावय।


सावन मा खेलकूद-

वइसे तो सावन के रिमझिम फुहार म भीगई अब्बड़ खुसी देवय तभो अपन दक्षता देखाय बर छोट छोट झिल्ली मन ल जोड़के बरसाती बनाके पहिरे रहन। गिरत पानी म धार ल रोकना, कागज पात के नाव चलाना, लोहा गड़ाना, मछरी धरना, तरिया म तउरना, झूला झूलना, नदी पहाड़ खेलना, रद्दा ल बिच्छल करना, फुरफुन्दी पकड़ना, फिलफिली उड़ाना, अउ बाढ़त उमर के संग खो, कबड्डी, डंडा पचरंगा, छू छुवउल ये सब किसम किसम के खेल अन्तस् के तिजोरी म सुरता बरोबर धराय हे। आजो रिमझिम फुहार देख बचपन हिलोर मारथे-------


बचपना हिलोर मारे रे,रिमझिम बरसात मा।

घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा......।


कागज के डोंगा बना धार मा,बोहावन।

घानी मूँदी खेलन,अड़बड़ मजा पावन।

पाछू पाछू भागन,देख फाँफा फुरफुंदी।

रहिरहि के भींगन, झटकारन बड़ चुंदी।

दया मया रहय,हमर बोली बात मा.......।

घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा...।


घर ले निकलन,ददा दाई ले बचके।

धार  ल  रोकन, माटी पथरा रचके।

तरिया  के पार में,बइठे गोटी फेंकन।

गोरसी के आगी में,हाथ गोड़ सेंकन।

मन रमे राहय,माटी गोटी पात मा........।

घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा..।


बरसा के बेरा,करे झक्कर झड़ी।

खेलेल  बुलाये,संगी साथी गड़ी।

रीता नइ राहन,हमन एको घड़ी।

खोइला मिठाये,भाये काँदा बड़ी।

सबे खुशी राहय,गाँव गली देहात मा....।

घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा..।


झूलन बंभरी मा,खेत खार जावन।

नदी पहाड़ खेलन,लोहा गड़ावन।

बिच्छल रद्दा मा, मनमाड़े उंडन।

माटी ह  गाँवे के,लागे जी कुंदन।

बिन माँगे मया मिले,वो दरी खैरात मा...।

घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा...।


              पहली घलो जइसे ही पानी बादर के दिन हबरे आषाढ़ सावन आय त साग भाजी के पैदावार घट जावत रिहिस, अउ दाम बढ़ जावत रिहिस। प्रकृति सबे चीज के व्यवस्था बरोबर ढंग ले करे हे। आसाढ़ सावन म साग भाजी के रूप म धरती ले रंग रंग के लमेरा जेमा जरी, खोटनी, काँदा भाजी, गुमी भाजी,चरोटा भाजी, करील  अउ फुटू मिलय।मछरी खवइया ल मछरी घलो सहज मिल जावय। पहली झक्कर झड़ी बर घर म सेमी, भाँटा, कॉन्दा अउ भाजी के खोइला रहय, जेखर कारण साग भाजी बर जादा बाजार के मुंह घलो नइ ताके बर लगे। फेर आज मनखे के मुँह चिक्कन चिक्कन खाके टकरहा होगे हे, भाजी-खोइला ल जाने घलो नही, फुटू, फोटका बर जाँगर नइहे। सब के सब बाजार भरोसा हन, पैदावार कम अउ खवइया जादा, त तो मंहगाई बढ़बे करही।

                     सावन आथे त लइका सियान सबके मन म उमंग भर जाथे, जुन्ना सुरता आँखी म झूले लगथे---


सावन आथे त मन मा,उमंग भर जाथे।

हरियर हरियर सबो तीर,रंग भर जाथे।


बादर  ले  झरथे,रिमझिम  पानी।

जिया जुड़ाथे,खिलथे जिनगानी।

मेंवा मिठाई,अंगाकर अउ चीला।

करथे झड़ी त,खाथे  माई  पिला।

खुलकूद लइका मन,मतंग घर जाथे।

सावन आथे त मन मा-------------।


भर जाथे तरिया,नँदिया डबरा डोली।

मन ला लुभाथे,झिंगरा मेचका बोली।

खेती किसानी,अड़बड़ माते रहिथे।

पुरवाही घलो ,मतंग  होके   बहिथे।

हँसी खुसी के जिया मा,तरंग भर जाथे।

सावन आथे त मन मा,---------------।


होथे  हरेली  ले,मुहतुर तिहार।

सावन पुन्नी आथे,राखी धर प्यार।

आजादी के दिन, तिरंगा लहरथे।

भोले बाबा सबके,पीरा  ल हरथे।

भक्ति म भोला के सरी,अंग भर जाथे।

सावन आथे त मन मा--------------।


चिरई चिरगुन चरथे,भींग भींग चारा।

चलथे  पुरवाही, हलथे  पाना  डारा।

छत्ता  खुमरी  मोरा,माड़े रइथे दुवारी।

सावन महीना के हे,महिमा बड़ भारी।

बस  छाथे मया हर,हर जंग हर जाथे।

सावन आथे त मन मा--------------।


अब तो सावन, सावन जइसे नइ लगे ,, बल्कि तइहा के सावन के सुरता गजब मनभावन लगथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

टिप्पणी -सरला शर्मा

 टिप्पणी -सरला शर्मा

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        सोशल मीडिया के आये ले पहिली भी  टिप्पणी / प्रतिक्रिया देहे जात रहिस । टिप्पणी कहे ले पहिली बात मन मं आथे  आफिस के फाइल मन ऊपर लिखे कामकाज के टिप्पणी जइसे तुरंत कार्रवाई , अग्रेषित आदि । 

 तइहा दिन मं कोनो पोथी , पत्रा ऊपर टिप्पणी करे जावय ताकि लोगन ल विषय वस्तु ल समझे मं सुविधा हो सकय जेला संस्कृत मं भाष्य , भाषा टीका कहे जाथे  एतरह के टिप्पणी ल  व्याख्या भी कहे जाथे । एहर टिप्पणी के आदि स्वरूप आय जइसे पाणिनि के सूत्र मन के पतंजलि के भाष्य । हिंदी मं लाला भगवान दास के तुलसी दास के रामचरित मानस के भाषा टीका । 

  आलोचना हर भी बड़का टिप्पणी च तो आय फेर ये विधा के संज्ञा रूप हर चिटिक भोथरा गिस अउ क्रियापद रूप हर चले लागिस जेकर से टिप्पणी हर कमी बेशी ल उजागर करे के माध्यम बन गिस लोगन आपसी कसा कसी के कारण सिरिफ कमी डहर धियान देहे लगिन । 

   अइसन समय मं बुधियार लिखइया मन टिप्पणी मं गुन - दोष , कमी- बेशी  सबो डहर धियान देके टिप्पणी करे लगिन जेहर समालोचना के नांव से जाने गिस । तभो टिप्पणीकार मन ल कुछ कमी दिखत रहिस त गुन दोष के सम्यक विवेचना ऊपर जोर देहे  गिस एतरह समीक्षा के जनम होइस जेला आज हमन समीक्षा शास्त्र कहिथन फेर ये सबो के मूल तो टिप्पणी च हर आय । 

  लोकाक्षर पटल मं एकर चर्चा गद्य के विधा मन के चर्चा करत समय आप सबो झन करे रहेव । 

     कोनो भी कृति या रचना ऊपर टिप्पणी देवत समय असहमति , विरोध , सहमति आदि ल तार्किक ढंग से , प्रमाण सहित रखना चाही फेर एहर तो पत्र , पत्रिका , किताब लिखे के बेर काम आही फेर हमन ल तो ध्यान देना हे सोशल मीडिया मं प्रस्तुत विषय ऊपर टिप्पणी कोन तरह से करे जाय ? 

पहिली बात के टिप्पणी संक्षिप्त रहय माने छोटकुन, नहीं त बाबू ले बहुरिया गरु वाला बात हो जाही । दूसर बात टिप्पणीकार के विचार सफ्फा सफ्फा विषय के गुन दोष के विवेचना कर सकय । तीसर बात सन्दर्भ , प्रसंग सहित टिप्पणीकार अपन विचार ल सरलग लिखय । 

वस्तु परक मूल्यांकन के संगे संग पक्ष विपक्ष दूनों के तर्क संगत , उदाहरण ,उद्धरण , परिणाम के ध्यान रखे जावय । सबले जरूरी बात के टिप्पणी मं सूक्ष्म विश्लेषण रहय फेर लोकहित ल ध्यान मं रखके कोनो मनसे , लेखक , विचारक ऊपर सरासरी अंगरी झन उठाये जाय । 

     आजकल कई ठन पटल मं सटीक , सार्थक टिप्पणी मन ल संजो के रखे जाए लगे हे । 

साहित्य के नवा विधा मं चिट्ठी पत्री हर पत्र विधा के रूप मं त रोजनामचा हर डायरी विधा के रूप मं जघा पा गए हे अइसनहे  सोशल मीडिया के चलते टिप्पणी हर भी एक दिन अपन जघा बना लेही । ओकर सबले बड़े कारण एहर बनही के आजकल सबो झन तीर समय के कमी हे , मोबाइल हर दिन भर के संगी बन गए हे जेकर छोटे , बड़े ग्रुप मं आये पोस्ट मन ल मनसे थोरको  फुरसत मिलिस तहां पढ़ सकथे अउ तुरते ताही  छोटकुन टिप्पणी देहे सक  जाथे । 

  धियान देवव के सारगर्भित टिप्पणी हर मूल विषय ल नवा विस्तार देथे ...अइसन टिप्पणी  हर पाठक ल रुचथे त टिप्पणीकार के पहिचान भी बनथे अउ टिप्पणीकार के अध्ययन , चिंतन मनन के साखी होथे । बुधियार पढ़इया , लिखइया मन से मोर बिनती हे टिप्पणी देवत समय चिटिक सावधान रहंय ...। 

   सरला शर्मा

विमर्श के विषय--टिप्पणी*

 

*विमर्श के विषय--टिप्पणी*


           सचमुच म टिप्पणी लिखना कोई सरल बात नोहय। एकर बर जेन रचना उपर हम ला टिपप्णी करना हे वोला पढ़के वोमा रचनाकार के व्यक्त विचार ल पकड़े ल परथे अउ वोकर निचोड़ निकाले ल परथे। एही निचोड़ ह वो सृजन के केंद्रीय भाव होथे। एही केंद्रीय भाव ल अपन समझ के अनुसार टिप्पणी के रूप म लिखे बर परथे। 

     ए टिप्पणी सटीक तभे होथे जब वोमा संक्षिप्तता के गुण रथे मतलब अनावश्यक विस्तार झन राहय। इहाँ संक्षिप्तता के मतलब काम टरकाऊ दू चार शब्द के टिप्पणी -लाजवाब, सुंदर, बढ़िया---आदि ले नइये।

       एक सटीक टिप्पणी म रचना के केंद्रीय भाव के संग वोकर गुण अउ दोष(अगर हे त) के उल्लेख सांकेतिक रूप म , बिना बढ़ाये चढ़ाये या रचनाकार के  दिल  ल बिना दुखाये होना चाही। इही मेर टिप्पणी कार के भाषा संबंधी ज्ञान के तको थाह मिलथे के वो कतका गहिर हे। इही मेर एक टिप्पणी कार ल लिखे म परशानी होथे अउ वो ह सुंदर, बढ़िया----आदि लिखके कन्नी काट लेथे।

       आजकल सोशल मिडिया म सृजन के भरमार हे  जेमा कतेक झन अपने बीच के जानकर संगी साथी मन के होथे। ए पोस्ट मन म बहुत कस जन्मतिथि, विवाह के वर्षगाँठ, शोक संदेश, सम्मान ,कोनो आयोजन --आदि के होथे ।एमन मा टिप्पणी करना एकदम सरल होथे। टिप्पणी के असली परीक्षा तो कोनो लेख या कविता म टिप्पणी करे के बखत होथे। ए समे घलो सोशल मिडिया म जान पहचान वाले के सृजन के भरमार म टिप्पणी लिखे के बेरा परशानी होथे। 

    टिप्पणी लिखे म एक अउ विचारधारा देखे म मिलथे----तैं मोर सृजन म टिप्पणी करे हस त मैं तोर सृजन म टिप्पणी कर देथँव। कभू कभू अइसन टिप्पणी हास्यास्पद हो जथे जब टिप्पणी कार ह कौवा ल कोयल अउ कोकड़ा ल हंसा बता डरथे या एकर उल्टा कर डरथे।

      टिप्पणी ह अब्बड़ संवेदन शील होथे तेकर सेती ईर्ष्या, द्वेष वश टिप्पणी नइ करना चाही।नहीं ते आ बैल मोला मार -- वाले बात होवत देरी नइ लागय। कई झन झगराहा अउ विघ्न संतोषी मन हाथ धोके अइसन टिप्पणी अउ टिप्पणी कार ल खोजत रहिथें।एफ आई आर तको हो जथे।

     फेर एक विचारवान टिप्पणी कार ह तोर-मोर नइ करय अउ वोला जेन रचना म वास्तविक म कोनो विषेशता (गुण/कमी) दिखते त वो ह स्वत: प्रेरणा ले टिप्पणी करे बर मजबूर हो जथे ।एही मेर टिप्पणी के सार्थक रूप के दर्शन होथे।

        हमर विचार ले टिप्पणी  जबर्दस्ती ,मन नइये त नइ करना चाही। 


चोवा राम वर्मा 'बादल'

 हथबंद, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग-खैरझिटिया

 छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग-खैरझिटिया


                       छत्तीसगढ़ राज बने के बाद, छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर छत्तीसगढ़ी राज भाषा आयोग के बनना हम सब छत्तीसगढ़िया मन बर बड़ गरब के बात आय। राजभाषा आयोग ले, सिरिफ छत्तीसगढ़ी म लिखइया पढ़इया लेखक - कवि मनके ही नही बल्कि जम्मो छत्तीसगढ़िया मनके आसा बँधाय हे। अपन बोली अपन भाँखा के बढ़वार कोन नइ चाहही। जइसे हमर भारत वर्ष के अन्य भाँखा आठवी अनुसूची म शामिल हे, वइसने छत्तीसगढ़ी भाषा घलो मान पावय। लेखक कवि मन जेन भी भाँखा में पढ़थे लिखथे वो भाँखा के सँवाहक होथे, वोमन भाँखा के दस्तवेजीकरन म महत्वपूर्ण भूमिका अदा करथें, उन मन ला आयोग, परख के बरोबर बढ़ाये, ताकि हमर भाँखा म घलो उत्कृष्ट साहित्य दुनिया के आघू परगट होय। वैसे तो छत्तीसगढ़ी म तइहा जमाना ले साहित्यकार मन लिखत आवत हें, फेर छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद बनेच कवि लेखक मन ये बूता म लगे हे। कतको मन आत्म सन्तुष्टि बर, त कतको मन अपन अन्तस् के उदगार ल, त कतको मन लिख सकथन कहिके लिखत हे, उन सबला उचित मार्गदर्शन देके छत्तीसगढ़ी म कालजयी सृजन करवाये के बीड़ा आयोग ल उठाना चाही। 

            *आयोग छत्तीसगढ़ शासन के अभिन्न अंग आय जेन महतारी भाँखा के बढ़वार बर बने हे, अइसन म साहित्यकार मनके संगे संग समाचार पत्र अउ टीवी रेडियो म घलो छत्तीसगढ़ी पेज या फेर कार्यक्रम के सम्पादक-संयोजक मन ल घलो प्रोत्साहन देना चाही। राजभाषा आयोग ल साहित्यकार,सम्पादक, संयोजक अउ कलाकार सबला संग लेके चले बर पड़ही, तभे महतारी भाँखा दुनिया म मान पा पाही। राजभाषा आयोग साल भर छत्तीसगढ़ी भाँखा बर काम करथे, बड़े कार्यक्रम म  स्थापना दिवस अउ प्रांतीय सम्मेलन प्रमुख हे। संगे संग आयोग छत्तीसगढ़ भर म, छत्तीसगढ़ी बर समर्पित व्यक्त्वि मन ल जिला संयोजक के रूप म नियुक्त करे हे, जेन प्रशंसनीय हे। का अउ कइसे म महतारी भाँखा के माथ उपर होही, तेखर ऊपर सतत विचार गोष्ठी, जानकार मन ल सँघर के होते रहना चाहिये। आयोग साहित्यकार मनके पुस्तक  छपवाये बर अनुदान घलो देथे, जेन उम्दा उदिम आय, तभो जिहाँ राजभाषा आयोग के ठप्पा लगे उहाँ साहित्य के स्तर ऊपर काम जरूरी हे। शब्द, मात्रा, यति गति के संगे संग भावपक्ष अउ कलापक्ष ल घलो सँवारे के बूता करेल लगही।*

                राजभाषा आयोग सतत रूप ले महतारी भाँखा के बढ़वार बर बूता करत आवत हे, अउ आघू घलो करही। *आयोग म भाँखा साहित्य के जानकार मन सदा मान पावय*, जेन मन आने लेखक कवि के उदगार ल समझ सके अउ उँखर मार्गदर्शन कर सके, महतारी भाँखा बर समर्पित व्यक्त्वि अपन कस सिपाही सदा खोजते रहे। आयोग के सार्थक प्रयास ले छत्तीसगढ़ी कला साहित्य खूब फलही फुलही, अउ आठवी अनुसूची म मान पाही।

                महतारी भाँखा *सिरिफ गाँव के भाँखा झन रहे, शहर, दफ्तर ,स्कूल,कालेज अउ अस्पताल म घलो चले।* रोजगार के संग जुड़े, आन राजकीय भाँखा कस हमर महतारी भाँखा ल पढ़इया-बोलइया अउ जनइया ल घलो रोजगार मिलै। हल्बी, गोड़ी, सदरी, कुडुख अउ कतको कन भाषा हे, कहिके राजभाषा खुल के छत्तीसगढ़ी बर नइ बढ़ पावत हे, तहू सोचनीय हे, हमर महतारी भाँखा हिंदी कस संकट म फँसे दिखथे, फेर गोड़ी-गोड़ जनजाति, हल्बी-हल्बा जनजाति मनके भासा आय, जे संख्या बहुल जादा घलो हे, एखरो हल आयोग ल निकाले बर पड़ही, फेर पूरा छत्तीसगढ़ ल एक सूत्रीय भाषा म बाँधे बर यदि कोई भाषा हे ,त छत्तीसगढ़ी।

                  सबले बड़े खुशी के बात लोकाक्षर परिवार म सुशोभित *डाँ अनिल भतपहरी साहेब,* जेन भाँखा संस्कृति बर समर्पित हे, उन मन आयोग के सचिव के रूप म महतारी भाँखा के सेवा अउ बढ़वार के बीड़ा उठाये हे। सर जी के अघुवाई म महतारी भाँखा बिकट मान पाही। *वइसे तो मोर लिखे उक्त सबे बात ल आयोग बने ढंग ले बरोबर साधत आवत हे, तभो विषयानुरूप लिखे बर लगिस।* कुछु आन लिख परे होहूँ त, छोट लइका समझ के समझाये के कृपा करहूँ,,।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा*

 *छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा*


छत्तीसगढ़ राज्य के 80 %जनसंख्या के मूल भाषा छत्तीसगढ़ी आय। यानि माँ ले सीखे भाषा। आज के हिसाब मा करीब 2.5 करोड़ आबादी। 

राज्य के मध्य भाग यानि मैदानी हिस्सा संपूर्ण रूप मा छत्तीसगढ़ी भाषी हरे। ओडिशा के नुआपाड़ा जिला, महाराष्ट्र के गोदिया के सीमावर्ती हिस्सा , मध्यप्रदेश के मंडला सिवनी बालाघाट अउ सहडोल के ग्रामीण अंचल मन घलो छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रभाव क्षेत्र हरे। पूर्वी हिन्दी होय के कारण छत्तीसगढ़ी ला देश के करीब 40 %आबादी आसानी ले समझ सकथे। अइसे नइ हो सकय कि जउन भोजपुरी ला समझही वो छत्तीसगढ़ी ले अनजान रइही। *पद्मश्री फूलबासन ला जब 2008 मा बिड़ला सम्मान मिलिस तो मुंबई जइसे महानगर के मंच ओकर छत्तीसगढ़ी भाषा मा गोठ ला सुन के आँसू आ गए।* आधा रात के पूरा फिल्मी जगत अउ संभ्रांतजन के देर तक ताली के गड़गड़ाहट ए बात के गवाह हे कि झाँकना हम ला अपने अंदर हे। हमीं मन अपन संकुचित सोच ले छोटे बने फीरत हन। 


रायपुर बिलासपुर अउ दुर्ग संभाग के तहत रायपुर, महासमुंद, बलौदाबाजार-भाटापारा, गरियाबंद, धमतरी, दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, कवर्धा, राजनांदगांव, बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर - चांपा, मुगेली, अउ गोडेला-पेड्रारोड-मरवाही ये 15 जिला।सरगुजा संभाग के कोरिया, सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर अउ सुरजपर जिला के ग्रामीण अंचल हमरे जइसे छत्तीसगढ़ी बोलथे।हाँ जशपुर, सुरजपर अउ कोरिया के कुछ हिस्सा मा अन्य बोली प्रभावी हे फेर छत्तीसगढ़ी भाषा के मयारूक सबो स्थानीय लोगन हें। 

*छत्तीसगढ़ी अउ सरगुजिया के अंतर्संबंध ला ये सरगुजिया एल्बम मन के नाव ला पढ़ के आप मन खुद तय कर सकत हव-*

1.आगे रे सरगुजा के तिहार

2.हिये हिये हाय हाय धिरे धिरे माँदर बाजे

3.तोर गोदना के फूल

4.एक बोतल दारू नई पी आया, रात भर करमा नचाया सगा

5.हाय रे सरगुजा नाचे

6.सरगुजा भुइयाँ कर सरगुजा बोली 

गुरतुर हवे अड़बड़ मिसरी कर डेली

7.सरगुजा के छौंड़ी नाचे लसेर लसेर

8.चुनरी लहराबो दाई के सारा सोरो देवी धाम में

9.छैल छबीली मयारू सारी

10. ढिसिक ढिसिक बाजत हे रे डीजे नई नाचे रिझे रिझे


यानि संपूर्ण सरगुजा भू- भाग छत्तीसगढ़ी भाषा के क्षेत्र कहे जा सकथे। आम आदमी अउ ओकर संस्कृति मा सरगुजिया अउ छत्तीसगढ़ी के फरक करके देखना मुश्किल हे। 


आवौ अब बस्तर संभाग के बात करन। 

बस्तर यानि नारायणपुर, केशकाल अउ कांकेर मा छत्तीसगढ़ी के ही बोलचाल हे। कोण्डागांव अउ जगदलपुर मा छत्तीसगढ़ी समझने वाला मन के बहुत संख्या हे। हल्बी इहाँ के प्रमुख बोली आय। सुंदर बोली आय।एकर बोलने वाला मन बर छत्तीसगढ़ी बिलकुल पराया नोहय।

बस्तर के दंतेवाड़ा, गीदम अउ बीजापुर जिला मा गोंडी के प्रभाव हे। इहाँ के कस्बाई अउ शहरी क्षेत्र मा प्रवास करने वाला व्यवसायी अउ नौकरीपेशा मन जरूर छत्तीसगढ़ी जानथे।फेर ग्रामीण क्षेत्र अछूता हे शिक्षा अउ संपर्क के अभाव मा।

                  इतना लिखे के पिछे इही अभिप्राय हे कि छत्तीसगढ़ी इहाँ के सर्वमान्य जनसंपर्क भाषा के दर्जा रखथे अउ कामकाज के भाषा बने के संपूर्ण गुण एमा विद्यमान हे।

इहां बसे पर- प्रांतीय लोगन मन घलो छत्तीसगढ़ी ले परिचित हें।नइ बोलही जानही तो ओकर कतको काम नइ बनै।

छत्तीसगढ़ी हा प्रदेश के पूर्ण भाषा बने के अधिकार रखथे अउ इहाँ के सबो बोली ला सम्मान दे के क्षमता तको हे।नियत तो हमरे डोलथे। राजनीति बहुत टेढ़ी चीज आय। प्रशासन मा बइठे आदमी, कुटिल नेता अउ बिनपेंदी के लोटा कस ढुलमुल विद्वान मन सब कुछ छींही बीहीं कर देथें। जउन राष्ट्रभाषा हिंदी क्षमा करहू राजभाषा हिन्दी के साथ होय हे उही राजभाषा छत्तीसगढ़ी के साथ होवत दिखत हे। निर्विवाद चीज ला विवादित कर देना आम बात हरे। 90 विधायक यानि संपूर्ण सदन छत्तीसगढ़ी बर मया दिखाइन अउ आयोग के गठन करिन। छत्तीसगढ़ी के उन्नयन बर बढ़ - चढ़ के बात करिन। कसम खाइन। 28 नवंबर 2007 के छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के प्रस्ताव पारित होइस। इही दिन छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा मिलिस। 11 जुलाई 2008 के राजपत्र में राजभाषा (पारित प्रस्ताव) के प्रकाशन होइस अउ 14 अगस्त 2008 ले आयोग के काम चालू होइस।

जब राजपत्र के प्रकाशन होइस ए बीच मा उँगली करने वाला मन कुछ तकनीकी कारीगरी कर के अपन काम कर डारिन। छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़ शब्द मा खेल होगे। यानि ये मन पूरा जनमानस के साथ- साथ विधानसभा मा सर्वसम्मत निर्णय के अपमान करे मा घलो नइ हिचकिचाइस।तभे तो आज नवा परिभाषा के उदय होवत हे जउन हा भविष्य बर अच्छा संकेत नोहय।

*घोषित तौर मा हिंदी के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी ही इहाँ के राजभाषा आय। तब छत्तीसगढ़ी लिखाय कि छत्तीसगढ़ ज्यादा फर्क नइ पड़य बशर्ते कि विद्वान मन नवा - नवा परिभाषा झन गढ़ै।* लोगन मन ला लागही कि मैं डाॅ सुधीर शर्मा के बात मा प्रतिक्रिया देवत हँव।नहीं अइसन बात नोहय। बीच- बीच मा अइसन गोठ सुनते आवत हँव। आज के विषय उपर लिखत ये बात मन मा आ गे।अब विषय मा आय के कोशिश करत हँव। 


छत्तीसगढ़ राज्य बने ले छत्तीसगढ़ी समाज के मन मा उम्मीद जागिस कि अब प्रदेश बने के बाद राजकाज के काम बर इहाँ के भाखा बोली के घलो विकास होही। ये बीस साल मा निश्चित ही विकास होय हे।भाषा आयोग के गठन होइस। छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा के दर्जा मिलिस। शासन के कुछ कामकाज मा झलक घलो दिखिस। कामकाज अउ शासन प्रशासन के भाषा बनाय बर त्रिभाषा फार्मूला कस हिंदी - अंग्रेज़ी - छत्तीसगढ़ी शब्द कोश के प्रयास होइस। आयोग के वार्षिक प्रांतीय सम्मेलन के साथ साथ जिला मन मा घलो संयोजक नियुक्त कर के स्थानीय साहित्यकार अउ पढ़इया लिखइया मन ले संपर्क मजबूत किये गिस। समय- समय मा आयोजन, बैठका, कवि सम्मेलन अउ चर्चा- परिचर्चा घलो करे गिस ।पुस्तक के प्रकाशन बर साहित्यकार मन ला आर्थिक सहयोग मिलिस।वक्ता, कवि, साहित्यकार अउ नवोदित हस्ताक्षर मन ला घलो मंच प्रदान किये गिस। एकर सराहना होना चाही। संचार माध्यम मा छत्तीसगढ़ी के उपयोग बाढ़िस। रेल्वे मा उद्घोषणा, टीवी आकाशवाणी ले बुलेटिन, शुरु होइस। अधिकांश बड़े अखबार मन साप्ताहिक पेज बना एक दिन छत्तीसगढ़ी बर सुरक्षित करिन।ये सब बात बर कहीं न कहीं जन भावना के खियाल करे गिस या जन दबाव काम करिस। अउ एकर माध्यम आयोग घलो बनिस। जउन काम इमानदारी ले चाहे गे हे कि होवय तो जरूर होइस। अउ जउन काम मा शीर्षस्थ मन घुँचपेल करिन वो मन अटक- लटक गे। 

*छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रांतीय सम्मेलन लगातार जारी रहिस। भिलाई, रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, बेमेतरा, अउ राजिम के सम्मेलन मा शिरकत करे हँव। जम्मो साहित्यकार, विद्वान अउ आंचलिक साहित्य प्रेमी मन के सकलाय अउ विचार मंथन के जबर सुघर मंच बन गे रहिस। बहुत अकन मंचीय कमी अउ आलोच्य प्रसंग के बावजूद ये आयोजन के महत्ता अब समझ मा आवत हे जब सरलग तीन साल नाँगा होगे। हर छत्तीसगढ़ी साहित्यकार अउ आंचलिक बोली साहित्य के लिखइया पढ़इया ए दिन के अगोरा मा रहै।* मेल मिलाप अउ विचार मंथन के सुग्घर मंच बनगे रिहिस।सरगुजा ले लेके दंतेवाड़ा अउ कवर्धा ले रायगढ़ तक तमाम क्षेत्र के कवि साहित्यकार इहाँ सकलावैं अउ दो दिन के आयोजन मा अपन उपस्थिति ले छत्तीसगढ़ी बर अपन समर्पण ला पुख्ता करैं। आम आदमी के दुख- दर्द ला अपन- अपन कलम मा जगह देवइया मन इहाँ सकला के मंच के नीचे घलो अपन विचार ला आदान-प्रदान करैं। येकर एकदम रूक जाना पीड़ादायक हे। एक तो वर्तमान परिस्थिति अउ उपर ले राजनीतिक निर्णय मा देरी। गिने चुने व्यक्ति के उपस्थिति मा आयोजन घरघुँदिया ले ज्यादा कुछु नोहय।सिर्फ खानापूर्ति होही। आयोग मौन दिखत हे। जनता अउ साहित्य के दुनिया ले संपर्क टूट चुके हे। अभी- अभी आयोग के सचिव के नियुक्त होय हे फेर मुखिया के खुर्सी खाली हे। जइसे बिना मुख्यमंत्री के शासन के कल्पना नइ होवय अउ राज्यपाल के सत्ता हा आपात व्यवस्था होथे वइसने आयोग के अध्यक्ष बिन आयोग अधूरा ही कहे जाही। ओकर बिन मुल्यांकन नइ हो सकै। प्रशासनिक पद के बदौलत सबो काम नइ किये जा सकै। अध्यक्ष ही निर्णायक होथे। 


 दुर्भाग्य हरे कि मुख्यमंत्री चाह के भी छत्तीसगढ़ी मा शपथ नइ ले पाइस। वैधानिक प्रोटोकोल के आड़ ले के अधिकारी मन के द्वारा मना कर दिये गिस। एकर बर छत्तीसगढ़ी ला कम से कम 8 वीं अनुसूची मा दर्ज होना जरूरी बताये गिस।अइसे सुनब मा आइस।छत्तीसगढ़ी ला 8वी अनुसूची मा स्थापित करना एक बड़े बुता शासन बर आय जेकर प्रयास निरंतर होना चाही।


 साहित्यकार मन ला आर्थिक संरक्षण जरूरी हे।  ये सरलग जारी रहै। वर्तमान मा बढ़ना चाही सहयोग राशि। छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण बर लगातार विचार मंथन अउ बैठका होना चाही। छत्तीसगढ़ी भाषा, व्याकरण, लेखन गद्य, पद्य अउ साहित्य मा काम करइया आदमी मन ला आर्थिक सुरक्षा संबल अउ सम्मान निहायत जरूरी हे। आयोग बीच- बीच मा छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण अउ उत्थान बर लिये गए अपन निर्णय ले लेखक मन ला अवगत करावत रहैं। निर्णय ला सर्वमान्य तय कर के सुझाव देवै ।पथ प्रदर्शन करै। छत्तीसगढ़ी ला मानक रूप मा लिखे बर प्रोत्साहन देवै। अखबार मन मा छत्तीसगढ़ी कालम मा एकरूपता बर सम्पादक मन ला सुझाव अउ निर्देश देवैं। छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार ला मजबूत करे बर अउ अशुद्धि ले मुक्त करे बर कदम उठावय।जगह जगह छोटे- छोटे आयोजन के माध्यम ले साहित्यकार मन ला मंच प्रदान करै। आयोग के काम ला जन - जन तक पहुंचावै बर नवा नवा उदिम होते रहना चाही। तब आम आदमी के जुबान अउ लेखन घलो सुघरही।छत्तीसगढ़ी के मानक लेखन अउ बोलचाल बर प्रशिक्षण कक्षा चलावैं। जुन्ना पुरोधा अउ साहित्यकार मन के लेख - साहित्य ला संरक्षित करे के कदम उठावैं। राजभाषा आयोग के एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ये हरे कि अपन काम ले आम अउ खास मन ला विश्वास पैदा करै कि छत्तीसगढ़ी भाषा दुनिया के कोनों भाषा ले कम नइ हे। एक समय रिहिस जब अंग्रेज मन तक फ्रांसीसी अउ लेटिन मा शिक्षा ला ज्यादा महत्व देवँय। बेरा - बेरा के बात आय। आज अंग्रेजी दुनिया के सब ले शक्तिशाली अउ संपन्न भाषा बन गेहे। छत्तीसगढ़ी बर आत्मविश्वास जगाना आयोग के उद्देश्य मा उपर रहना चाही। 


भाषा बर भाव के अभाव नइ हे। प्रभाव अउ सुभाव के अभाव हे। छत्तीसगढ़ी मा संपूर्ण संप्रेषणीय भाषा बने के क्षमता मौजूद हे 

शब्द बिगाड़ के लिखइया मन ले तको सतर्क रहे के जरूरत हे। भाषा के विकास बर ये मन खतरा आय। देवनागरी के सबो लिपि ला अपना के दुनिया के तमाम भाषा ले संवाद किये जा सकथे। ये अच्छा बात हरे कि छत्तीसगढ़ी मा 52 अक्षर ला मान्य किये गे हे फेर अभो ए बात मा बहस होवत रहिथे। अपन मर्जी चलाने वाला अउ दुर्योधन ला जुजोधन लिख के छत्तीसगढ़ी के उद्धार करइया मन ले अब बाँच के रहे के चाही। आयोग के अब तक के कार्यकाल मा लिए गे निर्णय अउ काम ला आधार बना के आगू बड़ही तभे छत्तीसगढ़ी के महल अउ कलश कंगूरा दिखहीं। जेन आही तेन अपन मर्जी के नेंव खानत रइही तो अनगढ़ ही रही जाही। छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग ले बड़ उम्मीद हे मोला। आयोग के काम करे के उत्साह अउ प्रोत्साहन ले ही हमर जइसे लिखइया पढ़इया मन के लगन बने रइही। नइ तो अपन डफली अपन राग तो सब के चलतेच हे।

असंतोष के कोनों बात नइ हे। उतार - चढ़ाव चलत रहिथे।विश्वास हे अवइया दिन मा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के काम ला आगू बाढ़त देखबो।



(ये मोर निजी विचार आय, जेन मोर मगज मा पहिली ले मौजूद हे आज बखत पर गे तो कागज मा उतार दे हँव। मोर कोनों बात मा आप सब ला असहमति के पूरा अधिकार हे।) 


लेख:

बलराम चंद्राकर भिलाई