Saturday, 23 October 2021

व्यंग्य-हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा गिरना अऊ गिराना

 व्यंग्य-हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

गिरना अऊ गिराना 


                हमर देश म अइसे कोनो काम बुता या विषय नइये जेकर बर कानून नइ बने हे । फेर मोला आकब होथे के .. कानून रचइया मन के समे म गिरे गिराये के कोनो बुता नइ होवत रिहीस होही तेकर सेती इही विषय म ओकर मन के ध्यान नइ गिस होही अऊ ओमन येकर बर कोनो कानून के निर्माण नइ कर सकिस । ओमन का जाने के भविष्य में गिरना अऊ गिराना हा बहुत महत्व के बुता अऊ विषय बन जही । फेर अतेक अकन कानून म संशोधन होवत हे अऊ नावा नावा चरित्तर बर नावा नावा किसिम के कानून बनत हे तभो ले गिरना गिराना उपर अभू घला काकरो ध्यान नइ जाना हा हमर कस नानुक दिमाग वाले मनखे बर बहुत अचरज के विषय आय । 

               हमर देश म गिरने वाला मन के संख्या .. हमर कुल जनसंख्या ले थोरको कम नइहे ... येकर मतलब हरेक मनखे गिरत हे या गिरे बर आतुर हे तभो ले .. गिरे म प्रतिबंध लगाये बर कोई कानून काबर नइ बने हे ... बड़ आश्चर्य के विषय हे । गिरना हा मनखे के दिनचर्या म अतेक पान संघर चुके हे जतका पान .. दैनिक जीवन म .. खवई पियई अऊ सुतई .. । खवई पियई सुतई हा हमर निजी बुता आय तभो ले सरकार हा प्रतिबंध लगा देथे के ... येदे चीज ला नई खा सकस .. येदे ला सार्वजनिक नइ पी सकस .. फेर येदे मेर नइ गिर सकस या येकर उप्पर नइ गिर सकस अइसे काबर नइ कहय । अऊ तो अऊ ओकर बर उमर तको तै नइ करे हे । बिहाव करे बर उमर .. नौकरी बर उमर .. चुनाव लड़े बर उमर ... फेर गिरे बर उमर काबर तै नइये ... गउकिन येकरो बर एको कनिक तो कन्हो ला चेत आतिस गा .. । जवानी तक गिरना हा तभो शोभा देथे फेर कब्र म एक गोड़ पहुँच जाये के बावजूद घला कुछ मन गिर जथे । फेर जगा ला तो देखनाच नइ रहय । बड़े बड़े धार्मिक स्थल के संत महंत मुल्ला पादरी गुरूजी मन अइसे गिर जथे के ... शरम लाग जथे बताये बर ... । कानून जिंहा बनथे तिहों बिगन गिरे … पहुँचे के परमिशन कोनो ला नइहे । गऊकिन इहाँ गिरके पहुँचने वाला या पहुँचके गिरने वाला हा .. लाज शरम कभू नइ जानिस अऊ उपराहा म नाक ला ऊँच करके किंजरत रहिथे । खैर .. ये हा तो बड़े बड़े जगा के गोठ होइस ... नानुक जगा .. अपन गाँव अपन समाज म घला कतको झन ला गिरत देख पारथन । फेर इनला देख .. न शरम कर सकन .. न रोका छेंका ... काबर के येला डर्राथन के .. यहू मन ... हमन कति मेर गिरेके ताक म लगे हन .. तेला खोजे बर झन लग जाय । परिवार म कोनो ला गिरे बर मना कर देतेन फेर का मुहुँ म मना करबोन ... हमन ओकर नजर म खुदे गिरे हुये मनखे आन । परिवार के हरेक जुम्मेवार मनखे हा .. अपनेच भाई बंधु पति पत्नि ला अतेक गिरे समझथे के .... झन पूछ । संगवारी मन घला गिर जथे फेर ओला हमीमन पंदोली देथन अऊ तो अऊ ओकरे संग गिरे बर घला जोम देथन । गिरई हा घला अलग अलग स्तर बना डरे हाबे । कोनो बहुत छोटे स्तर म गिरथे कोनो बहुत बड़े ... फेर स्तर के छोटे बड़े होय के पैमाना बर कोई नियम कानून या गणित नइ बने हे । खैर ... गिरना हमर संस्कृति सभ्यता नोहे फेर कुछ बछर ले लोक बेवहार के अभिन्न अंग बन चुके हे । जेला जब मौका मिलथे ... कतको झिम झाम देख के अऊ कतको झन बेर उज्जर गिरे बर .. अपन आप ला झोंक देथे अऊ बिगन उचे ... कालर ला ऊंच करत मसक देथे । गिरे के बेवहार म केवल एके खामी हे .... येला कोनो डंके के चोंट म बता नइ सकय .. के मेंहा गिर गे हँव .. गऊकिन गो ... गिरई ला वैध करे के कानून बन जतिस त यहू बुता बर लोगन मन कबके लकलकाये बईठे हे । 

               मोरो बात म विषयांतर होवत हे ... कहाँ प्रतिबंध अऊ रोक टोक के बात करत रेहेंव अऊ कहाँ ओला वैध करे के समर्थन म उतर गेंव । का करबे ... कभू कभू गिरे के हमू मन ला सऊँख लागथे .. मौका घला मिल जथे अऊ गिरे के प्रयास घला करथन फेर ... एको बेर कोनो हमर गिरई ला मान्यता नइ दिन न एको बेर ये किहीन के .. बने करे बाबू ... गिर गेस ते ... बल्कि इही किहीन के .... कम से कम गिरे के बुता ला तो ठीक से करते बाबू । बने बुता बर तो आज तक कोनो हमला शाबासी नइ दिन ... ओकरे सेती इही बुता म शाबासी पाये के जगा खोजत गिरे ला वैध बनाये के पक्ष म उतर आथन । अइसे भी .. आगू बढ़े बर गिरे ला परथे अऊ आगू बढ़ना कोन नइ चाहे । जेला जतेक आगू जाना हे तेला ततेक गिरे बर लागथे । गिरना जरूरी घला हे ... वइसे भी गिरना हा हमर जन्म सिद्ध अधिकार आय अऊ गिराना हा जन्मसिद्ध कर्तव्य ... फेर दुनों ला सँविधान म जगा नइ मिले हे .. । लोगन ला मेहा केंडल मार्च ... ये मार्च ... ओ मार्च ... कतको असन अधिकार के मांग बर करत देखे हँव ... फेर कोनो बैरी ला येकरो तो सुरता आतिस अऊ येकरो बर सेंडल मार्च कर लेतिन । गउकिन एक बेर गिरना ला कानूनन अधिकार मिल तो जाय ... महूँ गिरतेंव अऊ गिरके अपन नाव ला रोशन करतेंव ।  

               हमर इहाँ गिरे म मरे के रिवाज नइहे ... मरनाच हे त ओकर बर हमन ... हपट शब्द बनाये हन । तेकर सेती हमन हपटके मरिस कहिथन ... गिर के मरिस नइ कहन । गिरना माने मरना थोरेन आय गा .. फेर जागत जागत गिरना अऊ जानबूझ के गिरना ... एमन तो आगू बढ़े के निशानी आय । एक दिन मोर इही बात हा उपर तक पहुँचगे ... । कानून के दुकान म एक दिन .. गिरना गिराना बर कानून के प्रावधान करे बर .. बहस शुरू होगिस । एक झन प्रश्न करिस – गिरे के का उमर होना चाहि .. । जवाब काकरो तिर नइ रिहिस ... ककतो झन जवानी ले बुढ़ापा आये के बाद भी गिरत हे अऊ गिरे बर आगू घला आतुर हे । उमर के कालम ला मेटा दिन । एक प्रश्न अइस - कोन कोन ला गिरे ले छूट रहि ... ? जवाब अइस - पूरा देश म हरेक मनखे एके बरोबर हे तेकर सेती गिरे के छूट सबो ला बरोबर रइहि .. । प्रतिप्रश्न अइस – अइसन म गिरइया के संख्या म कोई फरक नइ परही त कानून के मतलबेच का होइस .. । बहस चले लगिस – गिरे बर आरक्षण के पालन होना चाहि .. । कोनो कहय जनसंख्या के अनुपात म गिरे के प्रतिशत के निर्धारण होना चाहि .. । कोनो कुछु अऊ कहय । मामला ला सुलझाये बर एक ठिन सर्वदलीय कमेटी के गठन कर दे गिस । कुछ दिन पाछू ... सर्वदलीय कमेटी के रिपोट अइस – गिरना तो अच्छा बात आये .. येला कोनो ला रोकना ठीक नइहे ... फेर सबो एके संघरा गिर जही त देश म अराजकता बगर जहि ... काकरो हाथ छोलाही .. काकरो माड़ी कोहनी फूटही ... । सबो ला थोरेन मालूम के गिरना के मतलब ... चरित्र ले गिरना हे ... ईमान ले गिरना है ... नैतिकता ले गिरना हे ... धर्म अऊ कर्म ले गिरना हे ... । बिगन जाने सुने जतर कतर गिर जही तब ... देश म आफत पसर जहि ... तेकर सेती गिरे के अधिकार केवल उही मन ला रइहि .. जेमन ला येमा महारत हासिल रहि .. । ताकि कोनो गिरइया उपर अंगुरी झन उचाये सकय । गिरे बर महारत केवल उही मनला हासिल रहय जेमन कानून बनाये बर अधिकार सम्पन्न रिहीन । कानून बनगे .. । दू चार प्रतिशत के गिरे के आरक्षण बर महूँ तरस गेंव ... । गऊकिन महूँ कहाँ कहाँ लिख पारेंव ... कम से कम एकाध बेर तो गिरत रेहेंव फेर सरी आरक्षण एके कौम बर होगे तेकर सेती ... मेहा यहू बुता ले वंचित पिछवाये सुसवाये .. अपन करम म लिखाये बुता ला जुम्मेवारी से निर्वहन करे बर मजबूर हँव । 

               मेहा सोंचेंव ... कम से कम हमन ला गिरे के अधिकार नइ देहव तो का होइस .. गिराये के अधिकार ला दे देतेव । कानून बनइया मन किथे – तूमन ला गिराये के अधिकार तो कानून के जन्म जन्मांतर ले दे हाबन .. फेर तूमन ओकरो पालन आज तक नइ कर सकव ... तेकर सेती यहू ला हमीं मन अपन तिर म राख डरेन । अब हम जेला चाहबो तेला गिराबो ... । में जनहित याचिका लगा देंव .. सरी अधिकार अउ कर्तव्य तुँहरे तिर रइहि त हमन झक थोरेन मारबो जी ... ? फैसला आ गिस – कोनो ला उचाये के अधिकार ... केवल हमन ला मिलिस ... । हरेक पांच बछर म जेला मरजी परथे तेला उचा देके अधिकार पा गेन .... । ऊँच म जवैया अऊ रहवइया मन गिरे अऊ गिराये के अधिकार अऊ कर्तव्य ला मुड़ी म धारण कर लिन ... । तबले जेकर पाथे तेकर ऊँच म रहवइया मन हबरस ले गिर जथे ... जेला पाथे तेला गिरा देथे ... इँकर अलावा ... दूसर गिरीस ते बदनाम अऊ दूसर गिरइस तभो बदनाम ... । का करबे ... हमरे मन के कलम हा ... गिरना गिराना ला इँकर जन्मसिद्ध अधिकार अऊ कर्तव्य बना दिस । 


हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

तुलसी चौंरा के दिया-चोवा राम वर्मा ' बादल'

 तुलसी चौंरा के दिया-चोवा राम वर्मा ' बादल'

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(लघुकथा)

कौशिल्या घर वोकर बेटी के बिहाव मा सगा-सोदर मन सकलाये रहिन। भाँवर के तइयारी होवत रहिस। परछी मा बइठे माई लोगिन मन अपन घर-दुवार, लोग-लइका अउ जिनगी के सुख-दुख ला गोठियाये मा मस्त रहिन।

     कौशिल्या के डेड़सास के बेटी नैना जेन दिल्ली मा रहिथे, कई साल बाद अइसन पारिवारिक कार्यक्रम मा सँघरे रहिस तेकर संग गोठियावत कौशिल्या बोलिस---

कस वो बहिनी तोर बेटा सूरज ल तको नइ लाने रहिते।वोला नानपन म देखे रहेंव।अभी काय काम-बूता करथे वोहा ?

वो कहाँ आये सकही दीदी। दिल्लीच आये दस साल होगे हे। वो तो अमेरिका के सोलर लैंप बनइया बहुत बड़े मल्टी नेशनल कम्पनी मा सी० ई० ओ० हे जेन हा सरी दुनिया मा अँजोर बगराये के काम करथे।थोकुन गरब करत नैना हा कहिस तहाँ ले पूछिस---

तोर बेटा दीपक हा काय करथे दीदी?

हमरे संग घरे म रहिथे अउ खेती-किसानी के काम करथे बहिनी।

वो तो पढ़े-लिखे हे न? नौकरी-चाकरी नइ मिलिस का?

कृषि म एम० एस० सी० हे बहिनी। सरकारी नौकरी तको मिलगे रहिस फेर वोला छोड़के अपन खुद के बीस इक्कड़ खेत संग गाँव के अउ किसान मन ल सँघेर के वैज्ञानिक तरीका ले फल-फूल उपजाथे। हमर गाँव के संतरा, पपीता ,अनार, चीकू अउ आमा-बिही के सरी दुनिया म माँग हे।

वाहह बहुतेच बढ़िया बात हे दीदी। तोर बेटा तो तुलसी चौंरा के दिया सहीं हे। खुश होवत नैना कहिस।


चोवा राम वर्मा ' बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

हमर जमाना म- "घर लिपई"-डॉ बी नंदा जागृत

 हमर जमाना म- "घर लिपई"-डॉ बी नंदा जागृत 

  सबले पहिली एडमिन मन ल हिरदे ले धन्यवाद जेनमन सुग्घर सूग्घर विषय ल छांट निमार के लाथें ।

    हमर जमाना के गोठ करे ल धरथव त मोला ये दे गीत के सुरता आथे- 

 "नान चुन रेहेव दाई घर लिपे ल सिखेव वो पोतनी म" 

   वो काहे कि पहीली गांव म जादा कच्चा घर रहाय त घर ल गोबर म  लिपन ।

लिपत - लीपत  पोतनी ल धरे - धरे कभू - कभु मेहर सोचव कि 'कभू घर लिपेके घलों प्रतियोगिता होतिस त कतका मजा आतिस मय तो सबले अव्वल अयिच जातेव' फेर कभू घर लीपेके प्रतियोगिता नई होइस अव मन के बात मन

 म रहिगे।

  येती तिहार- बार आइस के लिप्यी -  पोत ई के बुता ह सुरु हो जाय। घर लिपयी घलो एक ठन कलाकारिच आय कोनो -  कोनो मन गोबर म लीपे त कोनो -  कोनो मन पेरा ल लेस के, ओला बुता के ओकर करिया राख ल पानी म मिला के लिपय ।

काकरो लीपे सोजे - सोज  रहे त ककरो टेढ़गा - मेढ़गा  हो जाय ।कोनो -  कोनो तो तीन अंगुरिया चीनहारी बना के लीपय।

   हमर डाहर पंडरी छुही , पिवरी छुहि  अव लाल छुंही के खदान हवयसबे गजब दुरीहा-  दुरिहा हावय फेर कोनो मन बईला गाड़ी म त कोनो  रेगते  - रेंगते छुहीं  डोहारे ।

   घर के पोतई पंडरी छुंहि म करके ,पाछु लाल छूही के किनारी बनान तहां फेर पीवरी छूहि म खुटिया न  तेखर पाछू गोबर म जम्मो घर ल लीपन ।अंगना - दुआर ल घलो लीपन अव चाऊंर पिसान के चौक पुरन ।

     अब के जमाना म चूना , डिस्टेंपर , पेंट त वाल पेपर  आगे हे कोई तो ओकरो  ले अच्छा कहिके एलिवेशन टाइल्स लगात  हावय । जेकर गांठ म जोर हे तेहर भारी उन्नति कर  डरीस हे ।फेर गोबर अऊ गरीब के नत्ता ह नई टूटे हे।

  डॉ बी नंदा जागृत 

   

हमर जमाना म"-गया प्रसाद साहू* "रतनपुरिहा"

 

*"हमर जमाना म"-गया प्रसाद साहू*

       "रतनपुरिहा"

        (भाग-३)

*जहां सुमति तहां सम्पत्ति नाना*

*जहां कुमति तहां बिपत्ति निधाना*

      *ये संस्मरण म एक "संयुक्त परिवार" के सुख-दुख अउ सोरा आना सत्य घटना ला बतावत हौं- सन् १९७६ से १९७९ तक हमन मिडिल स्कूल म पढ़त रहेन, अंग्रेजी विषय के हमर गुरूजी श्रद्धेय रामखेलावन कश्यप जी ग्राम गिधौरी, थाना रतनपुर जिला बिलासपुर के रहैया रहिन | वो बखत ऊंकर संयुक्त परिवार म लगभग ६०-७० लोगन एक साथ रहत रहिन, तव ऊंकर परिवार के नान्हें-नान्हें लईकन ला घलो कोनो"रे-बे" नइ कहे सकत रहिन | जन बल, धन बल, बाहु बल, यश-कीर्ति बल के भंडार रहिसे | बड़े भिनसरहे ले लगभग १०-१५ बेटी-पतोहू मन रसोई बनाए बर जुट जावत रहिन,अउ देर रात तक भट्ठी जलते रहय | "परिवार म कोनो ज्यादा कमाने वाला, तव कोनो कम कमाने वाला रहिबेच करथैं,लेकिन जम्मो सदस्य बर सिर्फ एक समान भोजन के व्यवस्था रहिस, खान-पान, रहन-सहन, ओढ़ना-दसना बर किसी प्रकार भेदभाव नइ होवत रहिस*

      *लगभग २०-३० लोगन खेती-किसानी के बूता करत रहिन,बाहिर के बनिहार के जरूरत ही नहीं,कई लोगन व्यापार-धंधा करत रहिन,कई लोगन बड़े-बड़े  अधिकारी, कर्मचारी रहिन, कुछ लोगन गांव-बस्ती अउ रिश्ते-नाते के दुख-सुख म शामिल होवत रहिन,कुछ लोगन  घर के बीमार सदस्य के इलाज अउ सेवा-जतन करत रहिन | अईसन मौका ही नइ आवत रहिसे-के फलाना के अनुपस्थिति म कोनो काम अटक जाही ! जम्मो मनखे अटूट सुमता-सलाह से रहत रहिन अउ मुखिया के इशारा म सब काम तत्काल कर डारत रहिन*

   *मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान को एक*

     *पाले-पोंसे सकल अंग,तुलसी सहित विवेक*

     *गांव-बस्ती अउ ऐतराब भर ऊंकर सुमता-सलाह, ताकत, ऐश्वर्य सुख-समृद्धि के मान-बड़ाई होवत रहिसे*

     *आज-कल बेटा के बिहाव होत्ते ही बहुरिया संग अलग रहे बर नाना प्रकार के विवाद अउ लड़ाई-झगड़ा सुरू हो जाथे !*

     *खूब त्याग-तपस्या करे,दाई-ददा अब का हे तोर?*

      *आईस रे मुड़ढक्की रोग,बाढ़े बेटा छीन लेईस तोर !!*

     *अब के बहुरिया मन चार दिन घलो आत्मिक भाव से सास-ससुर ला जेवन रांध के नइ देहे सकैं*

*सास-ससुर ले अपन गोसईया ला छीने बर असंख्य प्रकार के तिकड़मबाजी अपनाथैं*

     *ससुरार आते सांठ आजकल के बहुरिया मन  मनमौजी खाना,मनमौजी पहिरना,मनमौजी कहीं भी जाना-आना,हर काम मनमानी ढंग से करना चाहथैं ! जबकि हमर जमाना म "बहुरिया" नहीं, "पतोहू" कहा्वत रहिन, मईके-ससुरे दुनो कुल के सैकड़ों-हजारों लोगन के अपेक्षा के पालन करते हुए इज्जत-मर्यादा अउ मान-सम्मान ला बचाए बर शत-प्रतिशत संकल्पित भाव से काम करत रहिन | तेकरे सेती कई सास-ससुर मन पतोहू ला बेटी ले जादा मान-सम्मान दे्वत रहिन | कतको पतोहू तो अत्तेक मर्यादित रहिन-"उम्मर भर गांव के बाज़ार-हाट ला नइ देखे रहिन ! यहां तक पारा-मुहल्ला के जेठ नता मन पतोहू के मुंह ला जिनगी भर सौहें नजर नइ देखत रहिन, उघरा मुड़ी करके न तो गली-खोर म रेंगत रहिन,न ही चौंरा-दुवारी म बईठत रहिन, वाह-वाह ! इतना मर्यादित अउ सुशीला बहू रहिन*

     *खैर, समय परिवर्तन शील होथे | आजकल  बेरोजगारी,मंहगाई, भौतिकवादी युग,भ़ोगवादी प्रवृत्ति, दिन-रात असंख्य प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कार के फलस्वरूप असंख्य प्रकार के इच्छापूर्ति के प्रयास खातिर पतोहू मन घर से बाहिर निकलना सुरू कर देहिन*

     *गांव-गांव में स्कूल,हर  १०-२० कि.मी. में कालेज खुलते जावत हवंय,तेकरे सेती बेटी मन अब उच्च शिक्षा ग्रहण करत जा्वत हवंय,ये ह अब्बडे़च खुशी के बात आय,लेकिन "अभी के शिक्षा पद्धति म नैतिक शिक्षा के अभाव म युवक-युवती मन सिर्फ पढ़़त हवंय,कढ़त नइ हवंय !*

      *आजकल के युवक-युवती मन किताबी डिग्री का हासिल कर लेथैं ? अपन घर, कुल-परिवार के रहन-बसन, तीज-त्योहार,परंपरा के विरोध करना सुरू कर देथैं ! दाई-ददा के त्याग-तपस्या,उम्मीद,विश्वास ला चकनाचुर करे म ज़रा भी संकोच नइ करैं, तऊन बदलाव ह बहुत दुखद होवत जाथे*

    *आज सारी दुनिया विज्ञान, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र म आश्चर्यजनक तरक्की करत जाथे:- विज्ञान के आविष्कार से आज धरती ह आकाश ले ऊपर टंगा गे,आकाश ह धरती म आ गे ! समुंदर के गहराई ला नाप सकत हन ! नइ हे दूरिहा-चंदा,सुरूज,नौ ग्रह, दूरिहावत जाथे- मानवीय मूल्य अउ मानवता ! आधुनिकता अउ देखावटी के चकाचौंध म मनखे बौरावत जाथैं !*

    *जैसे कौंवा-गिधवा नंदावत जाथैं,तईसने नता-गोत के अपनापन नंदावत जाथैं ! छल,प्रपंच, भ्रष्टाचार ह "सुगर बी.पी. बीमारी जैसे बाढ़ते जाथे !*

     *चिकित्सा विज्ञान,कृषि विज्ञान म आश्चर्यजनक तरक्की होवत जाथे ! "हरित क्रांति,श्वेत क्रान्ति गे ! ये सब निश्चित रूप से महान उपलब्धि  कहे जाही !*

       *सदियों तक हमर भारत देश विश्व गुरू रहिस, भारतीय संस्कृति,सभ्यता,रहन-सहन, आचार-विचार ला पश्चिमी देश के लोगन बहुत श्रद्धाभाव से अपनावत जाथैं,लेकिन हमर भारतीय युवक-युवती मन पश्चिमी संस्कृति अपनावत जाथैं,ये अंधानुकरण ह हमर भारतीय संस्कृति बर अकथनीय घातक होवत जाथें !*

    *"हमर जमाना म" दाई-ददा ह अपन बेटा-बेटी के बिहाव खूब जांच-पड़ताल करके,कुल-खुंट,कुंडली मिलान करके संबंध तय करत रहिन,दु कुल के संबंध केवल पति-पत्नी के मिलन बर नइ करत रहिन, बल्कि दू आत्मा के साथ दू कुल के संबंध ला कम से कम पांच-सात पीढ़ी ला एकसूत्र म जोड़े बर अउ धार्मिक रीति-रिवाज के पालन करे बर करत रहिन*

      *आजकल हमर भारत देश के बड़े-बड़े शहर में युवक-युवती मन अपन दाई-ददा के इच्छा के विरुद्ध सिर्फ हाय-हलो करके "लिव रिलेशनशिप" के नाम से बिना बिहाव करे कई बच्छर तक रहना सुरू कर दिए हवंय ! जब मन भर जाथे,तब एक झटका म अलग-अलग हो जाथें ! ये पश्चिमी अंधानुकरण से हमर भारतीय संस्कृति,वैदिक रीति-रिवाज प्रथा,"विवाह संस्कार" खूब खतरा म पड़त जाथै !*

      *"मोला तो अईसे अपार दुखद चिंता होवत हवय-आने वाला पचास साल बाद कोई दाई-ददा ला अपन बेटी-बेटा के बिहाव करे बर नइ मिलही !!! सब लड़की-लड़का अपन इच्छानुसार "लिव रिलेशनशिप" अपनावत जाहीं ! भारतीय वैदिक विवाह मरणासन्न हो जाही !!! अउ पैदा होने वाला अधिकांश संतान मन वर्णशंकर होवत जाही !!!*

     *"हमर जमाना" के बात ला सुरता कर के अउ बदलते रहन-सहन, रीति-रिवाज, चाल-चलन के संबंध म आज लिखे बर मजबूर हो गए हौं-"गए बात गनगत के" अउ "तईहा के बात ला बईहा ले गे" !*

       जै जोहार

       (दिनांक-२२.१०.२०२१)


आपके अपनेच संगवारी

   *गया प्रसाद साहू*

       "रतनपुरिहा"

मुकाम व पोस्ट-करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)

 मो नं-९९२६९८४६०६

Wednesday, 20 October 2021

कातिक नहाय के चुलुक मा बिहनिया उठे बर सीखेन*

 *कातिक नहाय के चुलुक मा बिहनिया उठे बर सीखेन*


         कहे जाथय संस्कार अउ परंपरा ला एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी मा लेगे बर पीछू के पीढ़ी अउ आगू के पीढ़ी ला जोड़इया के बूती होथे। जब तक ये जोड़इया नइ रहय कोनों संस्कार आगू नइ बढ़य। जौन मन लइकापन ले चेलिक होवत जाथे ओमन अपन संग नान्हे लइका ला संघेर के कोनों परंपरा ला सिखोथे ता आगू उही हा ये परंपरा ला बढ़ाथे। चेलिक मन ला सियान मन चाहे घर के होवय कि गांव के उनला संघेर के कोनों परंपरा जइसे पहुंचानी, गाँव बनई, मड़ई मा देवता धामी के नेवता पूजा मा लगइया जिनिस मनला बताही ता अवइया बेरा मा इही चेलिक हा गाँव के सियानी करही अउ परंपरा ला निभाही।घर मा पितर ला पानी देवई, अक्ती मा दोना चढ़ई , हरेली के पूजा अउ अपन जाति के परंपरा ला आगू बनाय राखेबर रिकिम रिकिम के चलागन। राउत बरदिहा मन सोहई बनाय बर चेलिक ला नई सिखाही ता सिंधी के दुकान मा बेचाई, जइसे प्लासटिक के सुपा टुकना बेचावत हवय।

          फेर आज न लइका मन चुलुक(ललक) करत हे न चेलिक मन बलावत हे अइसने न चेलिक मन सियान संग संघरे के चुलुक करत हे न सियान मन चेलिक जवान ला संघेरत संग मा बइठावत हे। एखर फल हमन ला अपन घर अउ गाँव के परंपरा मा देखेबर मिलत हे। पढ़े लिखे नोनी मन तो मोबाइल ले दुरिहावत नइहे, कुरियइ ले नई निकलत हे। बर बिहाव मा नेंग के गाना गवइया नइ मिलत हे, चुलमाटी से टिकान अउ बिदा के गीत गाय के ठेका डीजे माइक वाला मन ले डरे हे।मैन नाचा,नकटा नाचा, बरात परघनी, लाल भाजी, टिकान सब डीजे मा चलत हे। हमर अप्पड़ डोकरीदई ला सब गाना आवय। हमर दाई ला गउरा गीत गावत देखे अउ सुने हँव। हमर गोसाइन 12 वी पास फेर एको ठन परंपरागत गीत ला गाय बर कबे ता छू लम्बा..। काबर कि कभू अपन बड़े मन संग बइठे नइ रहिस। अइसने कतको पढ़ लिख मास्टरिन, डाक्टरिन, अधिकारी बनगए फेर संस्कार अउ परंपरा मा फोकला। बबा जात मन तो एखरो ले गय बीते। गाँव के बइगई ला अनपढ़ नइते कम पढ़े लिखे सियान हा करही। पढ़े लिखे मन अतिथि बनबो कथे। एखरे सेती कतको परंपरा हा अब छुटत अउ बंद होवत हे।

       ‌कातिक महिना आगे। हमर पाहरो मा पांच बच्छर ले बारा तेरा बच्छर के नोनी बाबू लइका मन ला कातिक नहाय बर भारी चुलुक रहय। लइकाच मन चरबज्जी बिहनिया सुकुवा उवे के बेरा ले घरो घर जा के हाँका पारय.... चलो उठो, कातिक नहाय बर चलव। उठइया के पारी लगय... जेखर पारी रहय...वो अपन घर मा दाई ददा ला बताके सुतय कि मोला आज जल्दी उठाहू... मँय सब ला उठाय बर जाहूँ। एक घर ले दू, दू ले तीन करत गली भर ला किंदर के कोरी डेढ़ कोरी लइका होके सब तरिया पार अमरन। सबो मन ला उठावत ले एक घँटा ले आगर घलो जावय। सब झन अपन अपन ठउर देख के नहावन पाछू शंकर पारबती के निमित दिया अगरबती बार के थपरी पीट के आरती गावन।जौन मन देरी मा आवय ओमन आरती मा संघर जावय।बड़ेमन कतको झन दोना मा फूलबत्ती बना के दिया ला तरिया मा दान करय। अतका करत ले बेर उवे के बेरा हो जावय। पून्नी के दिन आँवरा भात के दिन रहय। सब घर ले चाँउर तेल शक्कर गहूँ पिसान सकेलन अउ तरियापार मा तसमई, सोंहारी बनावन। आधा लइका ला परसा पाना मंगावन अउ पतरी बनायबर लगन। सब के अलग अलग बूता जोंगाय रहय। अपन अपन बूता ला सब जिम्मेदारी ले करँय।  गाँव भर के आवय तौन ला परसाद बाँटन।आज घलो कतको गाँव मा होवत होही फेर ओखर सरुप बदलगे हावय। अब आँवरा भात हा पिकनिक होवत हे। चाहे कोनों कातिक नहाय चाहे नइ नहावय पइसा बरार करके भंडारा, पिकनिक जरुर होथे।

      

हीरालाल गुरुजी समय

छुरा, जिला गरियाबंद

शशि साहू: *हमर जमाना मा*

 शशि साहू: *हमर जमाना मा*


सुरता के दस्तावेजीकरण  बहुत सुग्घर नाम दे हवव। फेर येला लिखत समय मे मै अउ मोर के सम्भावना बड़ जाही। जेखर कोती चिटिक ध्यान झन देहू।  मन ल वर्तमान ले जादा भूतकाल ह भाथे। तभे तो वो अक्सर कहिथे हमर जमाना कतका अच्छा रिहिस। ननपन ले आज तक के बेरा बखत उपर नजर डारन त जुन्ना दिन सबले अच्छा लगथे अउ आज के समय घलो अच्छा हे।

फेर हमर जमाना (ननपन मा) मा मनखे के मन मा जौन सरलता रिहिस,जिनगी मा सादगी,दया मया,सरेखा के भाव रिहिस। वोइसन मनखे नँदावत जात हे लगथे।फेर

बने गिनहा अउ कृष्ण कंस तो हर जुग म होथे। तब

मनोरंजन के नाम म किताब रहे। चाहे वो धार्मिक पुस्तक हो या माँग के लाये या बिसाये साहित्य रहे। मिल बाँट के पढे़ के आनंद।मनोरंजन के कोई कमी नही रहे गाँव मा। साल म आधा दर्जन तिहार आय।मड़ई होय,नाचा होय।   हमर गाँव म गोविंद नवयुवक समिति रिहिस जेन मन साल भर मा कई ठन कार्यक्रम कराय।नोनी बाबू सब ल भाग ले के मौका मिले। पुराना साफ़-सुथरा धार्मिक या सामाजिक सिनेमा, सर्कस मीना बजार ये तीन चीज ल देखे बर दुरूग शहर जाय ल पड़े। 

आज जब पहिली अउ दूसरी के लइका मन मोबाइल ले आन लाइन पढा़ई करत हे।भले ये समय के माँग ये, फेर सुरता आथे पट्टी पेन्सिल के।घेरी बेरी लिखना अउ मेटाना। 

याद के याद हो जाय अउ अक्षर घलो सुग्घर  बने। तब ब्रम्हा बरोबर कर्तब्यनिष्ठ अउ ईमानदार गुरूजी मन के

पाहरो रिहिस। 

वो समय नशा के आज सरी विकृत रूप देखे के कखरो आँखी लआदत नइ रिहिस।नशा अउ मांसाहार ल जमो गाँव वाले हेय नजर ले देखे।गाँव ले तीन किलोमीटर दूरिहा 

तक कोनो दारू के दुकान नही रिहिस।जेन शहर जावय उही म इक्का दुक्का मन लुका चोरी पियँय।होली जइसे रंग के तिहार ल गाँव म जुरमिल के मनाय।

[10/20, 6:52 AM] शशि मैडम: आदमी -औरत लइका सियान बीच गाँव म जुरियाय।डंडा नाच चलत रहे एक कोती रंग घोराय रहे बड़े जन बर्तन म अउ एक आदमी लोटा लोटा महिला पुरूष सबके मुड़ मा रितोय। तब नशा के चलन नइ रहय त लड़ाई झगरा घलो नइ होय अउ शांति पूर्वक तिहार मना जाय। 

देवारी म सुरहुति  गौरी गौरा,देवारी के धजा,गोवर्धन पूजा मातर,राउत नाच सबो वो बखत बिना विध्न- बाधा के सम्पन्न हो जाय।

बड़ दुख होथे जब माँ काकी भाभी मन बताथें। अब होली म घर ले नइ निकलन।एक दूसर के घर खाये पिये ल घलो नइ जान। देवारी म का लड़ाई-झगरा ल देखे ल जाबे ।अब पहिली कस तिहार नइ रहिगे बेटी। माँ बताथे।आज गाँव के उत्तरी - बूड़ती म दारू के सरकारी दूकान खुल गे हे। देखे म उही ह मेला कस लागथे। रोज दारू तिहार मनाये जात हे। त कोन ह होरी देवारी मनाही।शहर तीर के गाव न गाँव रहे न शहर।जादा बिगड़े हुये रूप देखे म आथे।  

आठवी कक्षा तक गाँव म बिजली नइ रिहिस।आठवी के परीक्षा ल कंडिल म दे हँव।दूसर साल बिजली घलो आगे गाँव घर मा। एक ठन टेबल पंखा आगे। एम ए अंतिम के बाद घर म टेलिविज़न आइस।अउ बहुत बाद म छोटे 

 मोबाइल।अब जिनगी इन्टरनेट के जाल मा अरझे कस लागथे। वइसे इन्टरनेट ले काम म सुभीता होथे। तभो ले "अति सर्वत्र वर्जयेत्" । 

अगर हम तुलना करथन त मन इही कहिथे,नवा जमाना म 

 चैन अउ सुकून ह गँवा गे। बस भागत हन। कोन जनी काय पा लेबो? अब तो हवा पानी घलो मिलावटी लागथे। 

 दूध दही म जहर मिले हे। दार चांउर असली ये के नकली? 

 कतका चीज ल गिनावँव तेल नून शक्कर सब शंका के दायरा म। अस्पताल म गोड़ मढ़ाये के जगह नइये। महामारी हर रूप अउ नाम बदल - बदल के आवत हे । न जाड़ा म जाड़ लगे न जेठ मे गर्मी। अउ बारो बारो महिना सावन भादो।

हमर जमाना म प्रकृति घलो अनुशासित रहे। अपन बेरा बखत म हाजिर हो जाय।

बीते दिन लहुट के नई आय। फेर सुरता बहुत आथे। हम दोनो जमाना के सांक्षी हन। दोनो जमाना हमर ये। जय जोहार।


शशि साहू

हमर जमाना मा* मनोज कुमार वर्मा

 *हमर जमाना मा*

मनोज कुमार वर्मा

     *हमर जमाना मा* अइसन जब गोठ होथे त निश्चित ही बदलाव होय हे अइसे जान पर्दे अउ ये बदलाव पीढ़ी के संग संग रिती-नीती, संस्कृति, संस्कार, रहन-सहन, वेवहार, खान-पान, मनोरंजन के साधन, खेल-कूद आदि सबों जिनिस मा होय परिवर्तन ला बताथे कि ओ बेरा मा ये सब जिनिस कइसे रहिस हे अउ अभी कइसे हावय। हमर जमाना कहिबो त हम तो जादा दिन के लइका नोहन हम अभी तो उपज के खड़ा होय हन फेर हमर सौभाग्य हे कि हम दूनो जुग चिठ्ठी पतरी ले मोबाइल के संदेश, बांटी, भॅंवरा, डंडा-पचरंगा, भोटकुल, तिग्गा, साॅंप-सिढ़ी, खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डंडा आदि आदि ले मोबाइल गेम, आनलाइन गेम तरिया के छू-छूवउल ले घर के नल मा नहवई, छुट्टी ल नाना-नानी, दीदी-फुफा घर बितात ले घर के टीबी, मोबाइल मा बितावत  बाढ़े हन। कहन त हमर पिढ़ी के लइका मन आखरी हरन जेन जिनगी वास्तविक जुग के पुरातन खेल ल बिदा करत नवा जुग काल्पनिक खेल के अगवाई करे हन।

     हमर जमाना कहिथन त सुरता आथे हमन जब नान-नान लइका रहेन त पूरा गॉंव भर एक परिवार बरोबर रहय सब लइका सबके लइका रहय अउ सबो दाई ददा सबके दाई ददा कोनो भी लइका काखरो घर दिन भर रहिजय खा-पी लय अउ कोनो भी दाई ददा अपन अउ दूसर के लइका मा भेद नइ समझय जतका लइका अपन घर के ल नइ डरावय ओकर ले जादा दूसर ल डरावय अउ मया घलो पावय। तब परिवार बड़े बाबू-दाई, कका-काकी सबो भाई बहिनी संग रहे के सेती बड़े-बड़े रहय दादी-दादा के किस्सा-कहानी संस्कार भरय अउ चौक-चौराहा मा बइठ के बड़े बुजुर्ग मन के गोठ-बात ल सुन के छोटे-बड़े के संस्कार मिलय अब तो सब मनखे अपन मा मगन होगे घर बड़का होगे मन छोटे, घर सजगे मन मा काई रचगे, धन कम गरब-गुमान जादा हमागे ऐमा नवा पिढ़ी के कोनो दोष नइ हे दोष हमर मा हे सुवारथी हमन होगे हन जेन सॉप के बिला कस घर मा खुसरे हन पद के गरब मा। लइका ऊपर बंधन लगाके रखे हन बाहर नइ जाना हे, दाई-ददा, भाई--बहिनी ले दुरिहा पता नइ हमन कइसन समाज के रद्दा गढ़त हन नवा लइका ल काय दत हन, चकाचौंध खोजत आॅंखी ल अॅंधरिया डरत हन सुख के दिन अकेल्ला बित जाथे फेर दुख के दिन सगा संबंधित, घर परिवार, रिसतादार बिना नइ बितय।


मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार