Friday, 12 November 2021

छत्तीसगढ़ी कहानी )*

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          *(  छत्तीसगढ़ी कहानी )*




              *आधा पूरे कहानी*

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-रामनाथ साहू




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                        *1.*


"जनकलाल के मुंड़ ल कलशराम हर फोर देय हावे ।"

"वो काबर ग...?"

"अरे अब तहूँ नई जानत अंव अइसन गोठियाथस ! पीयई -खवई म कुछु ऊंच- नीच हो जाथे ,तब अइसन हर सधारण बात आय ।"

"चल होही !बने जतनवा लेय शहर जाके ।"

"अरे वो तो होबे करिही, जेकर मुंड़ म आगे तउन हर अब निबटबे करिही ;फेर सिरतो म बनेच लग गय हे का ?"

"अरे बनेच लगे हे तभे पद परत हे बाबू, नही त मतवार मन के का मार पिटान के का गिरई -कुचरई !थोर-मोर हर तो वोमन बर सधारण आय ।रोज के जिनिस ये ।"

"फेर कब तक चलही अइसन... ?" बस स्टैंड के छपरी वाला परसार म बइठे सरवन अउ विश्राम ये गोठ ल करतेच रहिन । विश्राम के चेहरा म जनकलाल के पीरा हर दिखत रहे तब सरवन  के आँखी म वो धान के बोरा हर  झूलत रहे जउन हर बनिया दुकान म इकन्नी दुअन्नी म बेचाय रहिस  अउ वो इकन्नी -दुअन्नी हर घर नई आके आन डहर चल देय रहिस ।

"का अइसन सब समे सब जुग म चलही ?" विश्राम फेर कहिस ।

"इहाँ तोर हमर उदक मरत हवन अउ जउन मगन हवें, तउन मन के मौज हे।"

"कहत तो तँय ठीक हस, फेर हमन का कर सकत हावन ।कुछु कहिबे तब... अरे चुप ! हम  अपन कमई ल खात हन । तँय कोन होत हस बोलने वाला कहिके चुप परवा दिही ।" विश्राम कहिस , तभे वोमन के आगु म शहर जाने वाला बस आके खड़ा हो गय ।

"चल चल वोह दे बस आके ठाढ़ हो गय अउ हमन गोठ म माते रहि गेन ।" सरवन कहिस अउ अपन जगहा ल उठ खड़ा हो गिस । वोमन शहर पेशी जात रहिन । वोमन सरकारी गवाहा बने रहिन, जब आबकारी विभाग हर ये  गांव म आके कार्रवाई करे रहिस । तब पूरा गांव के कनहुँ मनखे गवाहा बने बर तैयार नई रहिन । अइसन समे म ये दुनों मनखे हिम्मत करके सरकारी गवाहा बने रहिन ।


          सरकारी गवाहा बने के सेती बाकी मनखे मन येमन ल नफरत करे के शुरू कर देय रहिन ।गांव म महुआ के कच्चा दारू बनाय के बुता हर अघोषित कुटीर -उद्योग असन पनपत रहिस । का डउकी का लइका सब के सब ये बुता म लगे रहिन, फेर एको औरत ' बहादुर कलारिन ' नई बन सकिन ।काकरो देह म रत्ती- माशा भर गहना -गुरिया नई चढ़े सकिस । अतकी जोरदार ये धंधा चलत रहे तब वो कमई हर कहाँ जात रहे येकर पता न पीने वाला ल रहे न पिलाने वाला ल ।बस... ये बूड़त उबुक- चुबुक होवत गांव म सिरिफ ये दुनों मनखे रहिन,जेमन हिरदे कमल ल ...आत्मा के अतल गहराई ले चाहत रहिन कि कछु भी करके ये दारू बनाय के धंधा हर बन्द हो जाय । ये बुता के सेथी विश्राम ल अंधीयारी कारी रात म अनजान मनखे के हाथ दु रहपट खाय बर पर गय रहिस अउ सरवन के  घर तीर म तो गारी -गुप्ता के होरी- सार गडेच रहे ।


                         *2*


"आज हर तीसर पेशी रहिस । अउ कै पेशी आय बर लागही सरवन ...?" सरवन घर ल लाने अंगाकर के आधा कुटी विश्राम कोती बढोत कहिस ।

"भई न तँय जानत अस न मैं..."विश्राम बिना कुछु संकोच के वो रोटी कुटी ल लेके सुक्खा लीलत कहिस । वोकर नजर आगु के केंटीन म वोमन के वकील  सहाब जउन  हर  अभी  चहा पीयत रहिस हे ,तेकर ऊपर बरोबर रहिस।

" एक लम्बरी नई बाँचे । पचास ओकील के... बीस आती बीस जाती अउ दस लइका मन बर चना-फुटेना ...होगे एक लंबरी के हिसाब ।" विश्राम फेर कहिस ।

" ये पईत के जुगाड़ कोन कोती ल करे रहे विश्राम ?"सरवन पूछिस विश्राम ले , वोला अइसन लागत रहिस,जइसन ये खचित गोठ ल वोहर अतेक बेर ल कइसन नई पूछ पाय रहिस ।

"धंवरी गाय हर तो अब बकेना हो गय हे, तब ले भी दु पव्वा देत हे गोरस ल । तोर भौजी वोला बिना नागा दुहाय के बाद पटवारी घर दे आथे। एकोरंच टइम-टेबुल हर एती -वोती होथे कि पटवारी घर के पटवरनीन आ धमकथे लोटा ल धरके...कइसे नई दुहाय ये अभी ल कहत । भई राम !ये लंबरी हर वोइच गोरस बेचा पइसा ये ।"

"दूध के पइसा मंद -मउहा के गवाही म सिरात हे...बढ़िया हे...!"सरवन कहिस अउ खलखलाके हांस परिस ।

"अउ तोर हर ...?"अब विश्राम पूछिस सरवन ल।

"समझ ले मोर हर बताय के लइक नई ये ...!" वो कहिस ।

"वो काबर जी ?"     

" येहर तोर बहुरिया के पैसा ये ।  तेंदू पाना के पाय छेवर पैसा ?"सरवन तरी मुड़ करके कहिस ।

"चल निभ तो गय आज हर!" विश्राम कहिस ।


             कूदत -धाँवत अइन तब फेर लहुटती के बस ल पा गिन । बस म दुनों एके सीट म बइठे रहिन फेर वोमन के बीच म कुछु गोठ -बात नई होइस । दुनों के दुनों अपन अपन  विचार म डूबत -उतरत रहिन । बस वोमन के अपन ठउर पहुंच गय ।

"सरवन ...!"

"हां भइया...!" विश्राम पूछिस तब सरवन ओझी दिस ।

"कइसे करबो अब ...?"

"अउ कइसे करबो !जतका कर सकत हन वोतका बरोबर करबो । जरूर अउ जरूर... अवइया काल के दिन हमर मनखे मन ये बात ल जरूर समझहीं । मनखे के रूप म ईश्वर हर अवतार देय  हे तब वो रूप ल थोरकुन शुद्ध रूप म राख । मनखे जनम लेके के कुकर शूकर कस नाली म झन परे रह ! अउ येकर बर ये मउहा पानी हर ही जिम्मेवार हे ।"

"तब  फेर ...?"

"लड़बो ये मउहा पानी के लड़ई  ल  ! हरकबो बरजबो ...पानी बनाने वाला मन ल पकड़वाबो सरकारी गवाही बनबो ।"

"फेर उहाँ ले तो ये सब नाम मात्र के डाँड़ -जुर्माना भर के छूट ऑथें ।"

"वोमन के ल वोमन जानें हमर बुता ल हम जानबो...!"सरवन कहिस जइसन येहर वोमन के अटल फैसला रहिस ।

"हां... फेर एकठन बुता ल करे बर हे ।"

" वो का...?"

"हमन ल हमीं मन कस अउ मनखे मन ल जुरियाना हे ।"विश्राम कहिस अउ चुप हो गय।एक घरी ल चुप्पी छाये रहिस । दुनों संगवारी   चुपे चाप चलत रहिन ।

"भाई ददा !अनमोल वचन कहे तँय । बस बस एईच हर रास्ता आय बस एईच हर रास्ता आय । हमनल लड़ाई लड़े बर जनबल बढ़ाय के जरूरत हे । जोरबो अउ जोरबो हमरेच असन अउ मनखे मन ल जरूर जोड़बोन , जब हमर ये दु के लड़ाई हर सबके लड़ाई हो जाही तब हमन जरूर सफल होबो ।" सरवन हर विश्राम के ये गोठ ल सुनके कुलक उठे रहिस । वोला लागत रहिस कि बोहत नदिया म वोमन ल ये विचार के खोभा मिल गय ...अंधियारी कारी रात म मशाल बर गय ।


       वोकर हाथ जुड़ गय रहिस काबर के चलत चलत वोमन विश्राम के खोल- मुहाटी म आ गय रहिन ।

"चल चल घर भीतर ...!एक कप चहा चाहे गोरस पी के जाबे ।" विश्राम कहिस ।

"पटवरनिन ...?" सरवन प्रश्नावाला नजर ले देखत कहिस ।

"वो बिहना वाला ल अभी के ल नहीं ।"विश्राम हांसत कहिस ।



*रामनाथ साहू*

*देवरघटा डभरा

*जिला -जांजगीर चम्पा (छ.ग.)*

 



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छत्तीसगढ़ी लोककथा

छत्तीसगढ़ी लोककथा



                 *पान अउ ढेला*

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         *(छत्तीसगढ़ी लोककथा)*


-रामनाथ साहू



                 ये जगह म ,आज  खेत  नइये। बहुत पहिली...बहुत- बहुत पहिली,येकरा एक ठन खेत रहिस।येकर संग म अउ बहुत अकन ,खेत रहिन । 


                    खेत रहिन, तब रुख- राई मन रहिन ,एकदम गझिन...सघन वन ..अइसन । अउ जब रुख राई मन रहिन ,तब  पान-पतइ मन गिरबे करें । खेत म माटी के एकठन ढेला रहिस ।वोकरे तीर म एक ठन  चौड़ा थारी असन  पान हर आ गिरीस। दुनों के दुनों ,एक दूसर ल पसन्द करे लॉगिन । अउ आपस म सुख-दुख गोठियाय लॉगिन । धीरे- धीरे वोमन के  मित्रता हर परवान चढ़े लागिस,अउ वोमन आपस  मितान घलव बद डारिन ।मितान बनिन।संग म जिये मरे के कसम खाईन । 



               एक दिन बड़ जोर से बड़ौरा आइस,अउ  पान हर उड़ियाय कस करिस। तब ...मोर रहत ले तुंहला कुछु नइ होय मितान...कहत ढेला,पान उप्पर चढ़ के बोला लदक दिस । पान उड़ियाय ले बांच गय । पान वोला हृदय कमल ले आभार दिस ।



                           अइसनहेच एक दिन रटा -तोड़,मूसलाधार वर्षा होइस । ढेला के मूड म एक बूंदी गिरीस के,पान हर तुरतेच वोकर उप्पर म चढ़ गिस ।ढेला हर घूरे ले बांच गइस  ।   


                  अइसन  सुख -दुख म एक दूसर के काम आवत,वोमन बड़ दिन ल हाँसी -खुशी रहिन । फेर एक दिन,विधाता के लीला...!गर्रा-धुंका, आंधी-तूफान...बरसात...सकल पदारथ  एके संग म आइन। ढेला हर कूद के पान उप्पर चढ़ गय।फेर पानी के मोठ... मोठ बूंदी ले वोकर अङ्ग -भङ्ग होय लागिस।वोहर गले के शुरू हो गय रहिस । मितान...!मोर रहत ल तुंहला कुछु नइ होय, कहत पान, वोकर उप्पर चढ़ गय।तभे जोर से गर्रा वोला,उड़ियाय लागिस।मितान... मोर रहत ल तुंहला कुछु नइ होय ।ढेला ललकारिस अउ पान उप्पर फेर चढ़ गय। कभु पानी...कभु ....गर्रा -धुंका।कभु  पान तरी,ढेला उपर त कभु ,त कभु पान उप्पर म ढेला ल बचावत । पान चिथात गिस, अउ ढेला घुरत...!फेर जीवन अउ मृत्यु के ये  जंग ल दुनो मिल के बहादुरी के साथ लड़त, छेवर म पान चिथा-पुदका के उड़ गय, अउ अपन मित्र ल बचाते -बचात ढेला घूर गय ।                        

             अउ ये कत्था हर पुर गय ।

      



*छत्तीसगढ़ के लोकप्रसिद्ध लोककथा*

*प्रस्तुति - रामनाथ साहू*


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 अउ पड़की

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नदिया के तीर एक ठन पेड़ म कउवा अउ पड़की रहय।कउवा बड़ घमंडी अउ पड़की रहय ते सिधवा ।उकर दुनों के मितानी होगे।एक दिन के बात आय कउवा कथे मितान पड़की भूख के मारे मोर पोटा ऐंठत हे मेहा तोर पीला ल खाहु तभेच मोर भूख मिटाहि।

  पड़की सोच म परगे फेर कहिस :-मितान तै खाए बर तो खाबे फेर मोरो एक ठन बात हवय।तै हा पहिली अपन चोंच ल धो के आ जातेस।

   कउवा उड़ावत-उड़ावत नदियाँ कर गिस।नदियाँ के पानी म जइसने मुँहू धोय लागथे नदिया कथे तैहा चोंच ल मोर पानी म बोरबे त मोर पानी ह जूठा हो जाही तेकर ले तइहा कुम्हार तीर के करसा लाले अउ पानी डुम के अपन चोंच ल धो डार।

    कउवा उड़ावत-उड़ावत कुम्हार कर गिस अउ कहिन- भइया मोला करसा बना के देव।

 कुम्हार पूछिस करसा ल कइसे करहु कउवा भाई।

 कउवा कहिस-

    लेगबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच...

   कुम्हार कहिस ठीक हे भाई मैं करसा तो बना देहु फेर तँय माटी लान दे।

    कउवा माटी कर गिस अउ किहिस-

   "खनबो माटी बनाबो करसा,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच"

    माटी कइथे मोर कर माटी तो हवय फेर तय कोड़बे कइसे।

    कउवा उड़ावत-उड़ावत हरिणा कर गिस अउ कइथे-

 "लेगबो सींग, कोड़बो माटी,लेगबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच"...

      हरिणा कइथे भइया कउवा ये सबो तो बने हे फेर सींग ल उखानबे कइसे।

  कउवा हरिन के बात सुन कुकुर कर गिस अउ कइथे:-

     "लेगबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

    कुकुर ह कहिस बात तो तय बने कहत हस फेर मोला ताकत बढ़ाये बर दूध पिये ल लागहि।

    कुकुर के बात सुन के कउवा नीलगाय तीर गिस।कउवा कहिस-

  "लेगबो दूध,पियाबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

       नीलगाय कथे ये सब तो बने हे फेर दूध दे बर मोला कांदी लाग ही।

  कउवा कांदी के तीर पहुँचगे अउ कथे-

"लेगबो कांदी, खवाबो गाय, निकालबो दूध,पियाबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

   कांदी किहिस बात तो बने आय फेर तय मोला लुबे कामे ।कउवा उड़ावत-उड़ावत लोहार कर गिस।अउ कहिथे भैया लोहार:-

" बनादे हँसिया ,लुबो कांदी, खवाबो गाय, निकालबो दूध,पियाबो कुकुर,लुभाबो हरिना,तोड़बोन सींग, कोड़बो माटी,बनाबो करसा ,बोरबो चोंच,पिबो पानी

धोबोन चोंच,खाबो चिरई ,मटकाबो चोंच."

    लोहार हँसिया बना देथे।कउवा जइसे हँसिया ल धर के उड़ाथे कउवा के चोंच ल जर जाथे।अउ कउवा के नाश हो जाथे।विश्वासघाती कउवा के नाश होय ले पड़की अउ उकर परिवार के जिनगी बाँच जाथे अउ हँसी खुशी ले उकर जिनगी चलथे।

              🙏

        छत्तीसगढ़ी लोककथा से साभार...

    द्रोणकुमार सार्वा

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           *डोकरी अउ अगास*

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        *( छत्तीसगढ़ी लोक कथा )*





                             अभी तो अगास हर कतेक न कतेक धूर म हावे । पहिली अइसन नि रहिस । पहिली अगास हर मनखे के अमरउ म रहिस । मनखे मन के, जइसन मन लागे तइसन अगास के तारा -जोगनी मन ल छू लेंय । वोमन ल एती - वोती हलचल कर लेंय । वोमन ल अपन मन मुताबिक सजा लेंय । सुरुज हर घलव तिरेच ल नाहके। वो बखत  वोहर थोर -थोर सुलगे के शुरू होय रहिस , तेकर सेती वोमे कम अंजोर अउ अउ कम गर्मी रहिस ।


                  आन मनखे मन के पीठ हर बने रहिस फेर डोकरी के पीठ हर कुबरी हो गय रहिस । एक दिन वोहर अपन ठूठी बहिरी ल धरके अंगना ल बाहरत रहिस खुरूर... खुरूर...!


                        तभे वोकर पीठ के कूबड़ ल अगास हर छू दिस ।डोकरी ल पिराईस तब वो रिस म भर गय अउ अगास ल अपन ठूठी बहिरी के मूंठ म मार दिस अउ कहिस -जा रे... जा ! बहुत धूर छिंगल जा !


                       तब ले अगास हर बड़ धूर छिंगल गय वोहर भाग पराइस ।



*संकलन* - 


*रामनाथ साहू*


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-: *लालच के फल*  (छत्तीसगढ़ी लोक कथा)

एक गाँव मा एक झन मरार डोकरा अउ मरारिन डोकरी रिहिस ।दुनो झन बखरी मा साग-भाजी बोंय अउ बेंचे।मरार डोकरा ह रोज बखरी ल राखे बर जाय । इन्द्र भगवान के घोड़ा ह डोकरा के बखरी मा रात के बारा बजे रोज आय अउ साग-भाजी ल चर देय।

मरार डोकरा अपन डोकरी ल बताथे - काकर गरवा ह आथे वो अउ बखरी ल चर के चल देथे।

मेहर पार नइ पावौ।

डोकरी कथे-डोकरा तैंहर आज दिन भर अउ रात भर बखरी मा रबे ।डोकरा हव काहत बखरी मा चल देथे।रात के बारा बजे इन्द्र के घोड़ा आइस अउ चरे लागिस,डोकरा उनिस न गुनिस अउ वोकर पुछी ल रब ले धरिस।घोड़ा उड़ावत डोकरा ल इन्द्र लोक ले जथे।

इन्द्र लोक मा बइठे डोकरा ल सैनिक मन पूछथे -ए डोकरा इहां ते काबर आय हस?तब डोकरा कथे-जा तोर मालिक ल बता देबे अन्नी लेय बिना मेहर इहां ले नइ जावव ,काबर कि तोर मालिक के घोड़ा हर मोर बखरी ल चर देय हे।

सैनिक,इन्द्र भगवान ल जाके सब बात ल बताथे अउ कथे मृत्यु लोक ले एक झन डोकरा आय हे तेहर अन्नी लेय बिना नइ जावव काहत हे।इन्द्र भगवान कथे -अरे सैनिक, डोकरा ल एक काठा हीरा मोती देके घोड़ा ल पहुंचाय बर भेज दे।

घोड़ा डोकरा ल मृत्यु लोक पहुंचा के चल देथे।डोकरी ह डोकरा के रद्दा देखत रथे,ओतकी बेरा डोकरा घर पहुंचथे,अउ अपन खोली के कोनहा मा काठा के हीरा मोती ल रख देथे।

हीरा मोती चमके लागिस ।मरार डोकरा ,डोकरी नइ जानै कि येहर हीरा -मोती आय।डोकरी कथे -ए तो चमकत हाबे डोकरा ।

डोकरी कथे-जा दू ठन ल धर ले अउ साहूकार के दूकान मा दे देबे कहूं खाये पीये के  समान दे दिही ते।साहूकार के दुकान मा डोकरा जाथे अउ देखाथे।साहूकार देख के जिन डारथे कि ये तो हीरा -मोती आय।साहूकार झट ले डोकरा ल पूछथे -काय-काय लागही ग।डोकरा खुश हो के खाय पीये के समान ल मांग डारथे।सामान ल धरके डोकरा ह घर मा आथे अउ डोकरी ल बताथे।डोकरी सुनके खुश हो जथे।अइसने -अइसने दिन बीतत गीस।

एक दिन साहूकार डोकरा ल पुछथे- कस ग तेहा  येला कहां पाय हस?

डोकरा ह सब बात ल बता दिस ,त साहूकार कथे महूं जातेंव जी तोर संग ।डोकरा कथे चल न भइ मोला का हे।

साहूकार ह अपन घरवाली ल बताथे कि मे हा डोकरा संग जावत हंव,एक काठा हीरा -मोती हमरो घर आ जही।साहूकारिन कथे-साहूकार महूं तूंहर संग जातेंव ते दू काठा आ जतिस।ये सब बात ल सुनके साहूकार के बेटा कथे- महूं जातेंव ग तीन काठा आ जही।ओकर बहू कथे-महूं जाहूं तुंहर मन संग ,चार काठा आ जही ।हमन मंडल हो जबो,पूरा गाँव ल बिसा डारबो।चारो झन डोकरा संग गइन।डोकरा कथे ठीक अधरतिया के बेरा घोड़ा ह आथे,मेहा आही तंह ले रब ले घोड़ा के पुछी ल धरहूं अउ साहूकार मोर गोड़ ल धरबे,तोर गोड़ ल तोर घरवाली धरही ,तोर घरवाली के गोड़ ल तोर बेटा धरही ,वोकर गोड़ ल तोर बहू धरही।अइसे तइसे करत रात के बारा बजिस अउ घोड़ा आइस तंह ले रब ले डोकरा ह पुछी ल धरिस।येती साहूकार,वोकर घरवाली ,वोकर बेटा ,वोकर बहू सब एक दूसर के गोड़ ल धरिन।अब घोड़ा ह उड़ाय लगिस साहूकार पुछथे,- तोला देय रिहिस ते काठा कतका बड़ रिहिस डोकरा ?

डोकरा साहूकार के बात ल सुन के कथे-अतका बड़ रिहिस साहूकार कहिके घोड़ा के पुछी ल छोंड़ परिस।सबों के सबों भड़भड़ ले भुइंया मा गिरिस।डोकरा ह साहूकार के उपर लदागे अउ सब झन खाल्हे मा चपकागे।साहूकार के संग वोकर घरवाली ,बेटा,बहू सबों झन मर जथे,डोकरा भर बांच जथे।

येकरे सेती केहे गेय हे,फोकट के चीज बस के लालच नइ करना चाही।जादा लालच करई ह जिव के काल होथे।

दार भात चुरगे मोर कहिनी पुरगे


*भोलाराम सिन्हा डाभा*

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लोककथा रामनाथ साहू: -


                     *बिलई*

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            *( छत्तीसगढ़ी लोककथा )*


"कहाँ जात हस बिलई...?"

"बिरईन* काटे ।"

"बिरईन ल का करबे बिलई ?"

" चोरिया गाँथ हाँ ।"

" चोरिया ल का करबे बिलई ?"

"मछी धर हाँ ।"

"कइसे मछी धरबे बिलई ?

"छापा छींचहाँ...!"

"कइसे छापा छींचबे बिलई ?"

"खुपुल- खापल खुपुल -खापल ..."

"मछी धरके का करबे बिलई ?

" वोमन ल राँधहाँ...!"

"कइसे राँधबे बिलई  ?"

"चनन मनन चट के खाय के बेर गट ले..."

"मछी ल रान्ध के का करबे बिलई ?"

" खाहाँ गप गप ले "

"खा के का करबे बिलई ?"

"राजा के कोठी के गोड़ा तरी सुतहाँ !"

"सुत उठ के का करबे बिलई ?"

" नरियहाँ...!"

"कइसे नरियाबे बिलई...?"

"म्याऊँ...म्याऊँ ...भाकू...उंई... उंई भाकू...उंई... उंई...!


बस ...बस...बस...!


*प्रस्तुति* -

*रामनाथ साहू*

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 शशि साहू जइसन ला तइसन

एक ठन राज मा भीम नाम के राजा रहय। राजा बड़ धनवान रहय। बडे़-बडे़ महल अटारी मा खजाना के भंडार भरे रहय। तभो ले राजा के नीयत हर बेरा कुबेरा डोल जाय। राजा के परोस मा गरीब किसान रहय। छितका कुरिया मा कइनो गुजर बसर होय बपुरा के। फेर घर बनाहूँ

सोच के १० कुन्टल छड़ घलो मँगा लिस। फेर रखे कहाँ घर मा ठउर नइ रहे। वोला राजा के सुरता आइस, अतेक बड़ महल हे, छड़ मड़ाय के जघा मिल जाही, सोच के किसान राजा के महल पहुँचिस। कथे "महराज मँय घर बनावत हँव,मोर नानकन घर मा छड़ मडा़य के जघा नइये। किरपा करके अपन महल मा जघा दे देतेव मालिक।' राजा कथे 'जा कोठार मे मढ़ा दे'। किसान राजा के कोठार मे छड़ ला जतन देथे। येती किसान घर बनाये के शुरू करथे त छड़ के जरूरत परथे,किसान राजा के महल मे जाके कथे' महराज मोला अपन घर बर अब छड़ के जरूरत परत हे त मँय छड़ ला अपन घर ले जाना चाहत हँव। राजा कथे 'तोर छड़ ला तो घुना खा दिस जी' सुन के किसान दंग रहि जथे। कहूँ छड़ ला घुना खाही।अकबकाये किसान हा राजा के चाल ला समझ जथे।अउ मने मन सबक सिखाये के योजना बनावत कलेचुप लहुट जथे।किसान अपन बाई दुनो कुछु सोच बिचार करथे अउ दूसर दिन गाँव भर के लइका मन ला अपन घर खाना खाय के नेवता भेजथे। राजा के बेटा ला घलो भोजन के नेवता देथे। गाँव भर के लइका मन आथे किसान सबला पेट भर भोजन कराथे। राजा के बेटा घलो आथे। सब लइका खाना खा के अपन अपन घर चल देथे। 

येती किसान हर राजा के बेटा ला घर नइ जान दे अउ  पठौहाँ मे धाँध देथे। बेटा नइ लहुटे ले राजा ला चिन्ता हो जथे। वो अपन नौकर ला भेजथे किसान के घर। त किसान कथे राजा के बेटा ला तो चील लेगे। चील ले गे- - चील ले गे - - चारो कोती हल्ला हो जथे। राजा सुनथे ता बाय बियाकुल हो जथे।

शशि साहू

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 छत्तीसगढ़ी लोककथा--


*राजा के नियाव--*


एक सहर म एक राजा रहय। ओहा बने ढंग से राज-काज करत रथे। राजा के सारा ह राज दरबार के चपरासी रहय। एक दिन राजा अपन राज म नवा मंत्री बनाये बर अपन सारा चपरासी ह बलाथे अउ कथे। जा इहाँ के एक झन परमुख आदमी ल बलाके लानबे। जेला हमन अपन राज-दरबार म मंत्री बना सकन। राजा के बात ल मानके उंकर चपरासी गांव म जाथे अउ एक झन परमुख आदमी ल बुला के लानथे। राजा ओकर गुण-दोष ल अनताज के अपन नवा मंत्री बना देथे।


नवा मंत्री अब्बड़ गरीब रिहिस,फेर ओकर भरा-पुरा परिवार रहय,पांच झन बेटा,पांच झन बहु अउ पांच झन नाती घलो रहय। लंबा परिवार म सबो के पेट पलाई-पोसईम बड़ मुस्कल होवय। फेर का करबे राजा कर अपन इज्जत के सेती मंत्री अपन मेंछा म एक ठन भात ल हरदी ले रंगा के लगा ले अउ राज-दरबार म जावय। राजा ल भोरहा होवय कि मंत्री अच्छा भोजन करथे तभे तो ओकर मेंछा म रोज पिंयर-पिंयर भात ह लटके रथे। पर समस्या रहय येकर के दूसर।


एक दिन मंत्री के पांचों बहु मन घूमे बर जाए रथे त परोसी गांव म बने ढंग ले पेटी-तबला मन बाजत रहय जेहर अब्बड़ नीक लगत रहय। पेटी-तबला के सुघराई ल सुन ल बड़े बहु ल अपन देरानी मन कथे। अई! सुनतहो बहिनी हो, ये मरे गरवा के मांस हर कतका मिठावत हे। सबो देरानी-जेठानी मन घलो कथे हव  बहिनी अब्बड़ गुरतुर लागत हवे न! चलो न हमू मन एकात दिन अपन ससुर ल कहिबो अउ मरे गरवा के मांस ल मंगा के सुवाद लेथन। सबो देरानी-जेठानी मन एक सुर ल बड़े बहु के सुर म सुर मिलाइन।


ये सबो बात ल राजा के चपरासी सुनत रथे,राजा ल खुश करके इनाम पाए के लालच म ओहा राजा ल जाके सबो बात ल फोर-फोर के बता देथे। राजा बहिया जाथे के मोर राज म कइसे कोई मनखे मरे गरवा के मांस ल खा सकत हे। चपरासी कथे- नहीं महाराज अईसन होवईया हे,अउ कहि नई करहू ते हो कि रही। राजा चपरासी के अईसन बात ल सुनके कहिथे-जावव कोन अईसन गलती करत हे वोला मोर कर पेस करव भला। चपरासी कथे महाराज-अउ गलती ह सिद्ध होही त का इनाम रही! राजा -अगर ये बात सही हवे तो सिद्ध करईया ल पांच गांव इनाम म देय जाहि। अब तो पांच ठन गांव चपरासी के आँखी म झूलत रहय।


चपरासी मंत्री के घर जाके बहु मन ल बताथे की तुमन ल राजा साहब अभी बलात हे। का होगे हे चपरासी तेमे हमन ल राजा साहब बलाही! बड़े बहु चपरासी ल हड़काइस। तुमन वो दिन कइसे मरे गरवा के मांस खाबो कहत रेहेव-चपरासी वोमन धांदे के प्रयास करिस। कलबिल-कलबिल गोठबात ल सुनके घर के जम्मो झन जुरियागे। बड़े बहु कथे-का परमान हवे तेमे, कुछु बताबे। परमान हवे! में खुदे बड़े जनिक परमान हो,जे अपन कान से सुने हो। चलो तुमन सब राजा के पास। अब पता चलही तुमन। चपरासी अपन जीत के आस म अब्बड़ मने-मन खुश होवत रहय।


मंत्री के जम्मो बहु मन ल चपरासी राजा के तीर म पेस करिस। राजा कड़क के पूछिस- कइसे बहु हो! तुमन अपन ससुर ल मरे गरवा के मांस घर मे मंगा के खाबो कहत रेहेव, ये बात कतका सही हवे। येती चपरासी मुसमुसावत हवे कि अब तो मजा आही। बहु मन समझ जाथे कि येहा ललचाहा चपरासी के चाल आये। राजा ल कथे- महाराज तुमन एककन हमर संग दरबार ले दरबार ले बाहर निकलहु त सबो बात साफ-साफ हो जाहि। राजा अपन मंत्री मन सन तैयार होके निकल जाथे। मंत्री के बहु मन राजा ल परोसी गांव के तीर म सुनावत नाचा-गम्मत के आवाज तीर ले जाथे। उन्हा पेटी,तबला,ढोलक, मंजीरा के सुर-ताल बड़-नीक लगत रहय। जब-जब गीत के ताल म उतार-चढ़ाव आथे तबला अउ ढोलक वाले मन के हाथ बम-बम करत गुचकेलत आवाज निकालय। देखइया मनखे मन के मन गदक जाये,अउ झुमरे ल लगय। राजा संग सबो मनखे मन घलो अब्बड़ खुश होगे।


अब मंत्री के बड़े बहु ह राजा ल कथे-कस महाराज ये तबला अउ ढोलक के बम-बम के आवाज ह तुमन ल कईसे लगत हवे। राजा कथे-वाह वाह वाह! बहुत सुग्घर लगत हवे,बहुत सुघ्घर। बड़े बहु कथे- ये तबला अउ ढोलक म का छवाय हवे महाराज। राजा- ये तो मरे गरवा के मांस मन ताय बेटी। तहन फेर बहु ह कथे इही तबला अउ ढोलक के सुघ्घर धुन ल हमन सुनेन त सबो देरानी-जेठानी गोठियावत रेहेन कि देख तो बहिनी! ये मरे गरवा के मांस कतका मिठावत हवे,हमू मन एकात दिन हमर ससुर ल कहिके घर म इहि पेटी,तबला अउ ढोलक मंगा के इंकर सुवाद ल लेतेन। तेला ये चपरासी ह  हमन ल मरे गरवा के मांस ल खाबो किहिसे कहिके बताये हवय। अब तुहि मन नियाय करव महाराज! हमन का गलती कर परे हन।


राजा ल अपन आप म शर्मिंदा होय ल लागिस अउ चपरासी ल नंगत के दमकावत कथे-कइसे रे! तोर कान म बोजाय कनघौवा ल निकाल अउ आँखी ल घलो बने धो। कोन का किहिस अउ का ते सुने-समझे। राजा खिसियाके चपरासी ल ओकर पद ल छोड़ा देथे। बहु मन के बात म खुश होके इनाम के पांच गांव ल राजा साहब सौप देथे।


ककरो बात ल पूरा सुने अउ समझे बिना कोई दूसर मतलब लगाए ले अपने हानि होथे। हमन ल ककरो बात ल पूरा सुन अउ समझ के आगे काम करना चाही।




लोककथा--रामसिंग सेन

संकलन-- हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगांव

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सुरता// शीला बिनई अउ भक्का लाड़ू के खवई...

 सुरता//

शीला बिनई अउ भक्का लाड़ू के खवई...

    जाड़ के आगमन के संग छत्तीसगढ़ के खेत-खार म धान लुवइया मन के आरो मिले लगथे. जेती देखव तेती हंसिया डोरी धरे किसान परिवार के सदस्य अपन-अपन उदिम म भीड़े दिख जाथें. कोनो ओरी धर के धान लु-लु के करपा रखत दिख जथे, त कोनो करपा मनला सकेल-सकेल के बोझा बांधत, त कोनो ओ बंधे बोझा मनला एक जगा सकेल के छोटे खरही असन रचत. इही बीच म घर-परिवार के छोटे-छोटे लइका मन किंजर-किंजर के शीला बीनत.

    ए बड़ा मोहक दृश्य होथे. हर गाँव म अउ हर खार म अइसन मनभावन नजारा देखब म आथे. हमूं मन जब गाँव म राहन, त प्रायमरी ले लेके मिडिल स्कूल के पढ़त ले ए उदिम म मगन राहन. बिहनिया स्कूल जाए के पहिली तीर-तखार के खेत म धमक देवन, अउ संझा स्कूल ले लहुटे के पाछू थोक दुरिहा के खेत मन म घलो अभर जावत रेहेन.

   धान लुवई ले लेके शीला बिनई अउ बढ़ोना बढ़ोई ले लेके धान मिंज के ओसाई अउ ओला कोठी म सहेजई तक अइसन बेरा होथे, जब इहाँ के किसान मन म औघड़दानी के रूप सहज देखे जा सकथे. हमन जब शीला बीने बर जावन त ए जरूरी नइ राहय के अपनेच खेत म जावन. जेने खेत म बोझा बांधे के बुता चलत राहय, उहिच म अभर जावन. खेत वाले मन घलो हमन ल देखय, तहाँ ले पढ़इया लइका मन आए हे कहिके जान-बूझ के बोझा ले धान ल गिरा देवंय, तेमा हमन ल आसानी के साथ जादा ले जादा शीला मिल सकय. कतकों खेत वाले मन तो हमन ल आज अपन खेत ले बोझा डोहारबो कहिके अपनेच मन संग गाड़ा बइला म बइठार के लेग जावंय, अउ शीला बीने के बाद लहुटती म गाड़ा म बइठार के बस्ती डहार लान देवंय घलो. जेन दिन बढ़ोना बढ़ोवंय, तेन दिन तो बढ़ोना के पूजा-नेंग के बाद खीर सोंहारी चघावंय, तेला खाए बर घलो देवंय.

    स्कूल के छुट्टी राहय, तेन दिन हमर मनके गदर राहय. बस बिहनिये नहाए-धोए के बाद खेत के रद्दा. हमर मन के चार-पांच लइका के टोली राहय. इतवार या छुट्टी के दिन शीला बीने के संगे-संग खारेच म पिकनिक घलो मनावन. सबो लइका अपन अपन घर ले रांधे-गढ़े के जिनिस धर के लेगन. ए सीजन म तींवरा भाजी घलो बने फोंके-फोंक ल सिलहो के रांधे के लाइक हो जाए रहिथे, तेकर चिखना तो बनाबे करन. बोइर मन घलो गेदराए ले धर ले रहिथे, वोकरो मन के पोठ मजा लेवन. हमर गाँव म खार के बीचोबीच कोल्हान नरवा बोहाथे. एकर दूनों मुड़ा के कछार म जाम के कटाकट बारी हावय. अउ इही जाड़ के दिन ह एकर सीजन आय. जम्मो बारी मन म गौंदन मता देवत रेहेन. उहाँ साग-भाजी अउ कतकों जिनिस के खेती होवय. सबके मजा ओसरी-पारी लेते राहन.

     शीला बीने ले जेन धान मिलय, तेला बने गोड़ म रमंज-रमंज के मिंजन अउ सकेलन. कमती राहय तेन दिन पसरा वाली घर जाके कभू मुर्रा, त कभू मुर्रा लाड़ू अउ कभू लाई के बने भक्का लाड़ू के सेवाद लेवन, अउ कोनो दिन शीला ह थोक जादा सकला जावय, तेन दिन वोला दुकान म बेंच के इतवार के पिकनिक खातिर जोखा करन.

     फेर अपन लइकई के ए सब बात ल गुनथन, अउ आज के दृश्य ल देखथन त एमन अब सिरिफ सपना बरोबर लागथे, काबर ते आज वैज्ञानिक आविष्कार के चलत खेतिहर मजदूर मन के जगा बड़े बड़े ट्रैक्टर अउ हार्वेस्टर ह जगा ल पोगरा लिए हे. न तो खेत म बने गढ़न के धान लुवइया दिखय, न बोझा बंधइया अउ न शीला बिनइया. हाँ कभू-कभू उहू जुन्ना दृश्य मन घलो एती-तेती दिख जाथे, फेर बहुत कम संख्या म.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

फोकट के सलाह* - *लक्ष्मण मस्तूरिया*

 *फोकट के सलाह* -

 *लक्ष्मण मस्तूरिया* 


चाहे महामुरुख मनखे होय चाहे महापंडित, बिन मांगे सलाह के कभू कदर नहीं करैं। तभो ले फोकट म सलाह देवइया अपन सुमत-सलाह माने, ज्ञान बाँटे के काम म लगे रथें। अइसने काम लेखक कवि और कलाकार मन करथें। तइहा समे ले मनखे ल जिंदगी के नीत-नियाय सिखाए बर कतको बड़े-बड़े पोथी ग्रंथ लिखाए पड़े हें फेर मनखे के जात गुनबोरा, फोकट के सीख-सलाह ल माने बर तियार नइ हे। अमीर होय के गरीब, ज्ञानी होय के अज्ञानी, अपनेच मन के करथे। अपने मन मुताबिक गोठ-बात वाले ल पसंद करथे। तभो ले कहूँ गलती होंगे5, नुकसान होगे, ठोकर लागिस तहाँ दूसर के नाम लेके, अपन पय ल लुकाथें। कतेक जुग बीत गे, बड़े-बड़े संत-साधु, महात्मा, ज्ञानी-ध्यानी, तपसी-त्यागी मन ए मनखे जात ल सुधारे बर, सुमत-सलाह सीख भरे बेद-पुरान ले लेके, आज के हाँसी-ठट्ठा मा समाए ज्ञान-गोठ के रचना करे हें। फेर वाह रे मनखे चोला, सरहा डुमर खोला, तोर मन के भेद भगवान घलो नइ जान पाथे।

मनखे के मन ल बाँधे-छाँदे के काम जुन्ना रिसी-मुनि मन करत रहिन। तपस्या म लगे रहें। भूख-प्यास म मन अल्लर पर जाथे, फेर जेती रेंगाबे वोती रेंगथे। ए भेद ल तपस्वी मन जानथें।  मनखे ल सुधारना हे तब वोला पेट ले उबरन मत दौ। खाली पेट मुरुख अउ पंडित के अंतर ल पाट देथे। भूख म दुनों सिरिफ भोजन के गुन गाथें। भूख के घलो भारी महात्तम हे। ज्ञानी ल मुरुख अउ मुरुख ल ज्ञानी बनाये के काम भूख करथे। ज्ञान-विज्ञान सब पेट भरे के चोंचला होथे। मनखे ल सिखाना पढ़ाना हे तब पेट भरे के सुग्घर रद्दा गढ़ना परही। बिन मेहनत के भूख बाढ़त जाथे, नवा-नवा भूख जनमथे। बिन मेहनत के कमाई खाये म पेट फूलथे, अपच होथे अउ बिन मेहनत के खाथें वोमन ल नवा-नवा बेमारी घलो होथे। इही मन बर तुलसीदास जी लिखे हें - पर उपदेस कुसल बहुतेरे। मनखे ल जतके सुधारथें, वोतके बिगड़थे। एकरे बर सियान मन खुद के सुधार करे के काम ल महान काम बताथें। फोकट म सलाह लेना देना दूनो बेकार होथे। अपन मन के भड़ास ल निकाले बर कोनो कुछू सलाह देत हे, वोला भला कोन मानही? तोला अइसे करना चाही, तोला वइसे करना चाही कहइया मन ल खुद पता नइ रहे के वोला का करना चाही। सलाह के सार तभे हे जब कोनो वोकर मोल समझे, वोकर जरूरत जाने। सलाह लेना अउ देना बने होथे, फेर बिन मांगे फोकट के सलाह ले बचना चाही।


*लेखक - लक्ष्मण मस्तुरिया*

(छत्तीसगढ़ी गुनान गोठ ले साभार)

काखर संग बिहाव करबे? दुर्गा प्रसाद पारकर

 छत्तीसगढ़ी में पढ़े - व्यंग्य 

काखर संग बिहाव करबे?

दुर्गा प्रसाद पारकर

चिन्ता ले चतुराई घटे दुख ले घटे शरीर, पाप पुण्य ले लक्ष्मी घटे कह गये दास कबीर ह राम परसाद उपर उतर गे हे, तभे तो धन्धा के चिन्ता म रहेर रेगड़ा हो गे हे। वधु चाहिए, टूरा के रंग साफ, ऊंचाई-चार फूट पांच इंच, काम शिक्षा विभाग, वेतन चार अंको में, इच्छुक मनखे ये पता म संपर्क करें - राम परसाद मिलनसार, वर वधू भवन, अंगूठा बाजार, दामपुर। के विज्ञापन ह हजारों रुपिया के चुना लगा दे हे। विज्ञापन ल पढ़ के डाँक्टर ह अपन टूरी के बिहाव बर राम परसाद ले भेंट करीस। अंधरा का मांगे दू आंखी कस राम परसाद ल डाँक्टर ह मिलगे। कोनो न कोनो किसम ले ये संबंध ल जोड़ के दू जुवार के रोटी जुगाड़ करना रीहिसे। वर तनी ले परसाद त वधु तनी ले पंचामरीत। दाहिज के समझौता के बाद दोनों तनी ले राम परसाद ह अपन कमिशन ल निथार लीस। घोड़ी म चढ़ के दुल्हा डउका ह जनकपुर बराती संग गीस। बेटा बिहाव हरे मन भर के खरचा करीस दुल्हा राजा के ददा ह। बरात ल देख के लड़की पक्ष वाले मन दंग रहिगे। माईलोगन मन म खुसर-फुसुर होय ल धर लीस- डाँक्टर ह बने दमांद पाय हे दई, बड़हर हे, पढ़े लिखे हे अउ नौकरी म हे। येती डाँक्टर ह अपन नेवतहार अउ बराती मन बर बफर सिस्टम ले पार्टी के आयोजन करे रिहीसे। पार्टी के बखत डाँक्टर के दमांद-बेटी, राजा रानी खुरसी म बइठे टुकुर-टुकुर देखत राहय। जिनगी के सुख-दुख कस झालर संग बराती मन बुगबुगावत राहय। जतका खरचा म नेवतहार मन समान ल लाल कागज म लपेट के लाने राहय ओखर अवेजी म दू पइसा आगर पेट म भर-भर के जावत राहय।

      पार्टी के एक कोंटा म दुलहा के संगवारी मन खावत-खावत ही-ही भकभक करत रिहीस। अबे दुकलहा चपरासी ह कतेक बड़हर ससुरार पाय हे। दूसर ह कथे-दुकलहा के ससुर ह झेलही। जूठा प्लेट ल मढ़ा के तीसर ह कथे- छोड़ न यार ये तो दुकलहा चपरासी के बेवकूफी हरे। अरे भाई जतका जड़ चद्दर ओतके गोड़ ल लमाना चाही नही ते अइसन फुटानी ह खजवा के घाव करई हरे। दुकलहा के बाप ल घलो अपन जोड़ के समाधी बनाना चाही। अभी तो बने लागथे बाबू, जब नर्स भउजी ह दुकलहा के घंटी नइ बजा देही ते मँय मोर मुंछ ल मुडवा  देंहू। चौथा ह कथे- सुनो यार जनम, बिहाव अउ मरन ह ब्रम्हा के रेख हरे। नौकरी वाले बाई किस्मत वाले ल मिलथे। कुटहा बन के खीर खाय म का एतराज हे अउ येला तुमन तो जानतेच हव के दुहानु गाय के लात मिट्ठा। महूं ह दुकलहा के सटका ल अइसने ससुराल खोजे बर कहूं। रामचरण कथे- दुकलहा के बिहाव ल तो राम परसाद ल लगाय हे रे। ये सब बात ल डाँक्टर के संगवारी ह सुन परीस। डाँक्टर ल जा के कथे- तोर दमांद तो घंटी बजइया चपरासी हरे। ये गोठ ह जहर कस चारों कोती बगर गे। डाँक्टर के पारा गरम हो गे। बेटी बिदा नइ करंव कहि के डाँक्टर ह ताव देखाय बर धर लीस। ओतका म सावित्री कथे- नही पापा मय जेखर संग सात भांवर घुमे हंव ओला पति मान चुके हंव। एकाद भांवर कम रहीतिस ते भले देखे जातिस। अब तो पति ह पति होथे वोह चपरासी होय चाहे व्याख्याता।

    बेटी बिदा करे के बाद डाँक्टर ह रातो रात कार म बइठ के सोज्झे राम परसाद के घर जा के बगिया गे। अरे दोगला बईमान, तँय मोला दगा दे देच रे। मोर बेटी ल चपरासी के संग लगा दे, आघु ले काबर नइ बताय ये बात ल। राम परसाद खैनी ल पुरक के कथे- तँय ये सब पुछेस कहां डाँक्टर साहेब, तेमा बतातेंव। धकर-लकर तो तुंही ल होय रिहीसे। मँय तो व्याख्याता होही काहत रेहेंव। राम परसाद ल अब तो जीनगी  भर मुरगा के जघा म मुनगा ल चुचरे ल पर जही। ये कांड के बाद शहर म मुंह देखाय के लइक नइ रही गे। राम परसाद ह।

        राम परसाद ह रोजी-रोटी के खोज म एक शहर ले दूसर शहर पलायन करीस। इही समे पंचायत राज के सोर चलत राहय। राम परसाद नवा ढंग ले अपन धन्धा के शुरुआत करीस। गांव-गांव जा के कुंवारी लड़की मन ल पंच, सरपंच, जनपद सदस्य अउ जिला पंचायत के सदस्य बर उचका-उचका के चुनाव लड़वाए बर भीड़गे। उंखर चुनाव म अपन तनी ले धन लगइस। राम परसाद अपन रणनीति म प्रदेश म बारा आना सफल होगे। अब जम्मो नेता मन राम परसाद ल राम चाचा जिन्दाबाद कहिके नारा लगाय ल धर लीस। येमा राम परसाद के राजनैतिक पकड़ मजबूत होगे। राम परसाद ह जउन शहर ले मार खा के आय राहय ऊही मन ओखर अखंड भक्त हो गे। अब तो पांचो अंगरी घी म। काला खाय ते काला बचाय।

    महिना भर बाद गजट म विज्ञापन पढ़े बर मिलीस वर चाहिए, वधु योग्यता अनुसार संपर्क राम परसाद मिलनसार, दलाल कालोनी चुहकनपुर। ल पढ़ के बिहाव के लइक बाढे टूरा मन के भीड़ बाढ़गे। राम परसाद ह पोस्टर टांग के आफिस जमा के बइठ गे। अउ सबके एक के बाद एक साक्षात्कार लेवन लागे। सब टूरा मन अपन योग्यता प्रमाण पत्र धर के पहुंचे राहय। एक झन मास्टर ह अपन बिहाव के प्रस्ताव ले के राम परसाद के आफिस म ओइलिस। मास्टर के बात ल सुन के राम परसाद कथे- देख भई तोला कइसन वधु चाही? एक ठन फोटू देखा के कथे- ए नोनी ह नींदे कोड़े बर जानथे, भात साग रांधे बर जानथे, मछरी-अंडा नइ खाय फेर अपन परिवार के सुख के खातिर रांध-पोरस सकथे। गोरी हे, चाल चलन बने हे। दूसर फोटू ल देखा के कथे- ए नोनी ह आठवीं पढ़े हे नवा-नवा पंच बने हे। गोठियाए-बताय बर नइ आय तभो ले अपन देवर ल कहवा के पंच बने हे। तीसर फोटो ल देखा के कथे- ये नोनी ह सरपंच बने हे चौथी फेल हे ते का होइस बीस पंच के उपर सरपंच रीहि, योजना उपर खेलही, जइसे जवाहर रोजगार योजना, आवास योजना, निराश्रित पेंशन योजना। येखर पहिली नोनी के बाप ह सरपंच रीहिसे। फेर असो महिला आरक्षित के नाव ले के नोनी के करम ह जागिसे। येसो के पंचायती म गंज अकन अधिकार मिलही जउन भी येखर संग बिहाव करही ओहा गंज सुख पाही पंच मन ल ठेंगवा देखाही। तीसर फोटू ल देखा के कथे- ये नोनी ह जनपद सदस्य हे थोकिन चंट बानी के हे, एखर कमई कम हे फेर इज्जत जादा हे। येखर संग बिहाव करबे ते ओखर फाइल ल धर के सइकिल म बइठार के ब्लाक आफिस जाय ल परही। पांचवा फोटू ल देखा के कथे- येहा जिला पंचायत के अध्यक्ष हे निरक्षर हे ते का भईस, कलेक्टर के गोपनीय रिपोर्ट लिखही। राज्य मंत्री के दरजा मिले हे, लाल बत्ती के कार, बंगला, फोन, सबो के सुख। फेर येखर सन बिहाव करही ओखर बर एक ठन शर्त हे ओला मुड़ गड़ा के रेहे ल परही। राजनैतिक लड़की मन सन बिहाव करबे ते उंखर दाई ददा ल दहिज दे के उंखर सुरक्षा बर बांड भरे ल लागही। अब अपन अवकात ल देख के बता मास्टर काखर संग बिहाव करबे? अभी नइ बता सकत हवस ते काली तोर दाई-ददा ल पुछ के बताबे। मास्टर बिचारा बर-बिहाव म राजनीतिकरण ल देख के दुखी होगे अउ अपन फैसला ल सुनइस- मोला अइसन घरवाली चाही राम चाचा जऊन ह घर-दुवार, खेती खार के काम बूता ल जानय मोला पहिली फोटू पसंद हे, मँय ओखर संग बिहाव करिहंव। नेता मन सन बिहाव करके मोला न तो मुड़गड़ा बनना हे, न तो रजिस्टर धरना हे, न मोला फर्जी काम करवा के देश के पइसा ल खाना हे। हम दुनों परानी आम आदमी रही के देश सेवा करबों।

दुर्गा प्रसाद पारकर

भूख के जात -हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

 भूख के जात -हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

                     मरे के जम्मो कारन के कोटा तय रहय ….. फेर जब देखते तब , जइसे सरकारी दुकान ले दूसर के कोटा के रासन ला .... गाँव के सरपंच जबरन लेगय , तइसे भूख हा दूसर कोटा के मौत नंगाके मनखे ला मार देवय । भगवान के नियम म खलल परय । भगवान हा यमदूत ला अइसन नियमखोरी करइया ला खोज के लाने बर भेजिस । यमदूत मन धरती म अइसन भूख ला खोजत अइन । इहाँ अइन त देखथे के इहाँ तो भूख के कइठिन जात रहय ....... । ओमन सोंच म परगे .... भगवान कते भूख ला लाने बर केहे हे । सबे भूख ला धरके लेगे अऊ भगवान के दरबार म हाजिर कर दिस ।                    

                    एक ठिन भूख हा जइसे भगवान के आगू म खड़ा होइस तइसे ... भगवान बरस गिस ओकर बर । भगवान केहे लगिस - कस रे तोला कहीं लागथे ? जब पाये तब अऊ जेला पाये तेला .. ढनगा देथस । धरती के मनखे कस ... दूसर के बाँटा ला नंगा लेथस । तोर सेती कतका समस्या पैदा होगे हे । तैं जनता ला अइसने मारबे त .... हमर नियम धरम के काये आवसकता ? देख कतका अकन तोरे कोटा म .... मरके आये हें । भगवान के बड़े स्क्रीन वाले कम्प्यूटर म तरी उपर लास देख के भूख किथे – तोर कसम गो .... ये मन मोर मारे नोहे .... । हमला दूसर के बाँटा नंगइया नेता समझथस का भगवान .... ? गऊकिन .... अपन बर निर्धारित कोटा ले उपराहा एक ठिन मनखे नइ मारे हँव ...... । पहिली कस समे नइ रहिगे भगवान .... तैं का जानबे .... मनखे ला मारे बर कतेक उदिम लगाये बर परथे तेला ........ कतका पछीना ओगारथँव तेला मिही जानहूँ । भगवान किथे - लबारी मारथस रे ? भूख किथे - दईकुन गो ..... लबारी नी मारँव भगवान । उहाँ एक रूपिया किलो म चऊँर .. पिये बर सरकारी दारू अऊ रेहे बर घर मिलत हे । कोन मरही मोर ले भगवान ? अऊ बीते कुछ समे ले जनता के पेट भरे बर नावा किसिम के मोबाइल आगे हे ... जेकर बटन चपकतेच साठ ... अनाज के दाना झरझर झरझर गिरत हे .... मनखे के पेट कहाँ उना रइहि तेमा .... । चित्रगुप्त कोती देखिस भगवान  ……..  वहू अपन कम्प्यूटर म देखत ....... हाँ म हाँ मिलइस । पेट के भूख ला सनमान सहित वापिस लहुँटे के आज्ञा मिलगे । भगवान सोंचे लगिस .... कोन येकर नाव ले पाप करत हे ? भगवान हा प्रस्नवाचक मुहूँ बनाके चित्रगुप्त कोती देखिस त ओहा ... दूसर भूख ला खड़े कर दिस आगू म । 

                    चित्रगुप्त बताये लगिस - धरती म भूख के कतको धरम जात अऊ समाज बन चुके हे । काकर बूती ... बिन पारी के मनखे मरत हे तेला ... मोर कम्प्यूटर बता नइ सकत हे । जइसे येला जाने के कोसिस करथँव नेट बंद हो जथे ..... तेकर सेती सबो जात के मुखिया भूख मनला लाने गेहे । भगवान पूछथे – जात .......? येमन मनखे कस बिगड़ गेहे का रे .....? येमन ला जात बनाये के कोन आज्ञा दिस ? चित्रगुप्त किथे - भगवान , जात बनाये बर कनहो ला केहे नइ लागे , चार झिन जुरियइन तहन नावा समाज अऊ नावा धरम खड़ा हो जथे । जेकर सुआरथ पूरती नइ होये तिही मन राजनीतिक दल कस अपन जात खड़ा कर लेथें । ये जात हा मनखे के उपज आय , हमर रचना नोहे भगवान । भगवान किथे - येहा कोन जात के भूख आये ? भूख खुदे केहे लागिस – मोर सेती मनखे मरथे कहाँ भगवान तेमे मोला हथकड़ी पहिरा के ले आने हव ? मेहा तो अइसे जगा म रहिथँव जेला तोपे बर धरती के हरेक मनखे ला उदिम करे लागथे । भगवान पूछिस – का ...... पेट म नइ रहस तेंहा ? भूख किथे - मेंहा पेट म नइ रहँव भगवान .... पेट के खालहे म रहिथँव । भगवान मुहूँ फार दिस । चित्रगुप्त किथे – भूख के रेहे बर पेट म जगा बनाये हाबन ? तोला कोन पेट के तरी म रेहे के परमीशन दिस । भूख किथे – हमर जात के भूख ला रेहे बर काकरो परमीशन के आवसकता निये । पेट के खालहे म जगा दिखिस तहन ....... मन पटवारी .. के जेब गरम करके अपन नाव म खालहे पारा के रजिस्ट्री करवा डरे हाबन । भगवान हा चित्रगुप्त कोती कननेखी देखिस । चित्रगुप्त किथे – येहा मनखे के वासना के भूख आय भगवान ...... येकर ले मरथे तो बहुत कम फेर …….. फेर येकर बर कतको झिन मरथे .......। येला मेटाये बर कतको धरमगुरू साधु संत पादरी मौलवी मन बड़े बड़े असपताल खोल के बइठे हाबय । फेर अपने असपताल म उही मन इही भूख के सिकार हो जथे .........। यहू ला छोंड़ दिस ।

                     सुसकत खड़े दूसर भूख ला पूछत रहय भगवान - तैं कोन अस जी अऊ कते मेर रहिथस ? काबर रोवथस ? निच्चट दुब्बर पातर भूख हा सरम के मारे मुड़ी गड़ियाये रिहिस । हूँकिस ना भूँकिस । चित्रगुप्त किथे – ये भूख हा मनखे के कभू आँखी अऊ कभू दिल म रहिथे । ये प्रेम के भूख आय । येला दुनिया म जम्मो झिन अपन सुआरथ के सेती चाहथें । येकर मरम ला ना कनहो जानय । ना येकर करम ला कनहो निभावय । ये अपन अस्तित्व बर खुदे तरसत मरत हे ..... कनहो ला काये मारही । ये भूख अपन प्रजाति ला बचाये के गोहार करत रो डरिस । यहू छूटगे ।

                    अगला भूख हा सुघ्घर पहिरे ओढ़हे रहय । खुसरतेच साठ दरबार महर महर महमहाये लगिस । कतको झिन हाली मोहाली संग म अइस । इही दोसी भूख होही कहिके आते आत जमदूत के सोंटा लहराये लगिस ........ सेवा करइया मन भाग गिन । चित्रगुप्त किथे – येहा पइसा के भूख आय भगवान । येला मेटाये बर जतको खाबे ... येहा ततके बाढ़थे । येहा अपन बलबूता म बहुतेच काम कर सकत हे । दूसर के पछीना ला अपन देहें म चुपरके महकत मजा मारत किंजरत हें येमन । इही भूख के सेती मनखे मनखे म दूरी बाढ़त हे । इही भूख हा मनखे ला अपन नता रिसता के त्याग करे बर मजबूर कर देथे । येकर बर जे जादा मरथे तिही ला निपटाथे येहा ........। भगवान तिर येकरो अपराध सिद्ध नइ होइस । यहू बरी होगे । 

                    ये दारी के भूख हा ... जइसे दरबार म खुसरिस तहन ..... कितको झिन हाथ जोर के खड़ा होगे । ये भूख हा नाव के भूख आय । येला कोन नइ जानय । अपन नाव चलाये बर का का नइ करय .... । एके ठिन बात ला घोर घोर के केऊ ठिन मीडिया म बगरा के अपन नाव ला जनाये के उदिम लगावत रहिथे । ये भूख बहुत झिन उप्पर सवार होथे फेर बहुत कमती मन ला पार लगाथे । कितको झिन मरत ले नइ छोंड़य येला । येहा मनखे ला मारय निही फेर अपन नाव के उप्पर म या बरोबरी म कनहो ला झिन आय कहिके कतको उदिम म लगे रहिथे । इही भूख हा दूसर के नाव मेटाके अपन नाव ला जगजाहिर करे के डिगरी अऊ पी एच. डी. देवाथे । कतको कस पदम पुरूसकार इही भूख के सहारा अऊ भरोसा म मिलथे । चित्रगुप्त अइसन बतातेच हे तब तक भगवान हा यहू ला वापिस लेग जाये के इसारा कर दिस । 

                     खूनाखून दिखत भूख ला आवत देखिस त भगवान समझगे ... इही आय मौत के असली जुम्मेवार । हाथ म गोला बारूद बनदूक तलवार धरे रहय । भगवान खुद डर्रागे । भगवान काँपत पूछथे – तिंही हरस का जी ..........? डर के मारे आरोप घला नइ लगा सकत रहय भगवान । चित्रगुप्त ला तिर म बला के किहिस - तिहीं हकन के पूछना येला ...... । मेहा कहूँ त मुही ला झिन मार देवय । तैं पूछबे अऊ तोला मारीच दिही त मेंहा तोला फेर जिया दुहूँ अऊ मोला मार दिही त तैं भगवान कहाँ ले लानबे । भगवान के मन म डर हमागे । चित्रगुप्त किथे - रावन ... कंस अऊ हिरण्यकस्यप कस राक्षस मन ला चुटकी म मरइया भगवान के चेहरा म अइसन डर शोभा नइ दय । तूमन काबर डर्राथव भगवान ? भगवान किथे - राक्षस मन मोर संरचना रिहीस अऊ येहा मनखे के आय .... तेकर सेती डर लागत हे । चित्रगुप्त किथे – डर्रा झिन । येला जब तक बड़का भूख आदेस नइ देवय तब तक ..... ये कनहो ला नइ मारय । अपन जरूरत बर अभू तक काकरो शिकार नइ करे हाबय येहा । ये हिंसा के भूख आय । जब तक कनहो उकसाये निही तब तक ... येकर हाथ ले हथियार नइ छूटय । त ये लहू म सनाये कइसे दिखत हे ? भगवान फेर पचारिस । चित्रगुप्त किथे - येकर निवास स्थान लहू आय भगवान तेकर सेती .....। यहू छूटगे ।

                     भगवान किथे – चित्रगुप्त .... जतका अकन भूख अभू अइस तेमा .... कनहो भूख म अतेक अकन मनखे मारे के क्षमता निये । तूमन गलत रिपोट देके बपरा भूख ला काबर बदनाम करत हव । चित्रगुप्त किथे - एक ठिन भूख अऊ बाँचे हाबय । तभे भूख भइया की जय के नारा सुनई दिस । नारा लगइया मनला बाहिर म रोके नइ सकिस यमदूत मन । भूख हा ... संसद कस …… समर्थक संग ..... परिवारसुद्धा .... दोरदीर ले खुसरगे । भगवान किथे - तिहीं हरस रे .... अतेक कन मौत के जुम्मेवार । वो किथे - कोन कथे ....... ? कोन कथे ....... के मिही अतेक मनखे के मौत के जुम्मेवार आँव कहिके .... पूछ येमन ला ....... । देखा सबूत ...... । जुबान लड़ाये बर धर लिस अऊ बहुमत ले जीते कस भगवानेच के खुरसी कोती अमरे लागिस । चित्रगुप्त भगवान के कान म फुसुर फुसुर केहे लागिस – मोला समझ नइ आवत हे भगवान । मोर रिकाड म इही भूख के कोई लेखा जोखा निये । बिगन सुनवई सबूत के अभाव म यहू भूख हा नेता कस छूटगे । 

                 भगवान ला आखिरी वाले भूख उपर शक होगे । ओहा चित्रगुप्त संग कम्प्यूटर बिसेसज्ञ ला धरके इही भूख के पाछू पाछू धरती म पहुँचगे । तलास अऊ तफतीस म भगवान पइस के ..... ये भूख हा चित्रगुप्त के कम्प्यूटर म .... राजनीति नाव के अइसे वाइरस डार दे हाबय ..... जेहा  कभू काकरो पकड़ म नइ आ सकय ...... । ये भूख हा मनखे के दिमाग म रहिथे । मनखे के अकाल मौत के जुम्मेवार इही आय फेर येकर ताकत के डर म ..... येकर खिलाफ कन्हो गवाही देबर खड़ा नइ होय । भगवान जान डरिस के .... येहा सत्ता के भूख आय जेहा .... कतको लास बिछा के घला शांत नइ होय । इही भूख ला शांत करे बर ..... मनखे हा ..... कतको के दुरदसा कर देथे अऊ कतको ला मार के ढनगा देथे । ये अइसे भूख आय जेकर उप्पर बिजय पाये के बाद .... मनखे हा पहिली ले अऊ जादा भुखाके ..... तपनी तपे लगथे । इही भूख के साथ देवइया मन भुकुर भुकुर के खाथे अऊ बिरोध करइया मन इही भूख बर भुखा जथें ....... । भूख के इही जात ला खतम करे बर .... उही दिन ले सरग म भगवान हा ..... लांघन भूखन रहिके तपस्या म जुटगे ........ ।  

    हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा

Wednesday, 3 November 2021

मस्तूरिहा जी के तीसर पुण्य तिथि विशेष...





मस्तूरिहा जी के तीसर पुण्य तिथि  विशेष... 


 छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ल जगइया अमर गायक लक्ष्मण मस्तुरिया 









मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी... मंय छत्तीसगढ़िया अंव... पता दे जा रे गाड़ी वाला... पड़की मैना... मंगनी म मांगे मया नइ मिलय... मन डोले रे माघ फगुनवा... घुनही बंसुरिया... सोना खान के आगी... जइसे गीत के लिखइया जन कवि स्व. लक्ष्मण मस्तुरिया के  आज तीसरा पुण्य तिथि हरे.  मस्तुरिया जी हा अपन अपन गीत, कविता अउ गायन के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ला जगाइस अउ सुग्घर ढंग ले अपन हक खातिर लड़े के रद्दा बताइस. वोकर गीत मा एक डहर जिहां छत्तीसगढ़ महतारी के गजब बखान हे अउ दूसर कोति छत्तीसगढ़वासी मन के भोला पन के वर्णन के संगे संग किसान, मजदूर ला जगाय के उपाय हे. 

जिनगी भर छत्तीसगढ़िया मन के मान मर्यादा बर लड़इया अइसन क्रान्तिकारी कवि अउ गीतकार 

 के जनम बिलासपुर जिला के मस्तुरी गाँव म 7 जून 1949 के होय रिहिस हे. शुरुआत के जिनगी गजब संघर्ष ले बीतिस.वोहर  राजकुमार कालेज रायपुर 

म शिक्षक के रूप म अपन सेवा दिस. बाद म हिंदी विभागाध्यक्ष घलो रिहिस. 

   जउन मन ह दाउ रामचन्द्र कृत चंदैनी गोंदा ला अपन खूब मिहनत ले ऊँचाई तक पहुँचाइस वोमा लक्ष्मण मस्तुरिया  ह प्रमुख रिहिस. लक्ष्मण मस्तुरिया ह गीत अउ गायन पक्ष ल गजब सजोर बनाइस.

   मस्तुरिया जी के लिखे अउ गाये

गीत ह जनता के बीच गजब लोक प्रिय होइस . छत्तीसगढ़ के आकाशवाणी केन्द्र मन म उंकर गीत ह खूब चलिस. रायपुर दूरदर्शन म गीत प्रसारित होइस. उंकर गीत ल सुन के मन हा खुशी से झूमे लागय त कतको गीत ह छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान ल जगाइस. वोकर गीत के खूब आडियो अउ वीडियो रूप बनिस. पान ठेला, होटल के संगे संग बर बिहाव, षट्ठी, कोनो भी सार्वजनिक कार्यक्रम म मस्तुरिया जी के गीत रंग झाझर मंता देय. वोकर गीत ल सभा -संगोष्ठी म बजा के / गा के जनता म जोश भरे जाथे. स्कूल /कॉलेज के वार्षिक समारोह म मस्तुरिया के गीत ह कार्यक्रम म जान डाल देथे. 

  लक्ष्मण मस्तुरिया के बारे म डॉ. बल्देव जी ह लिखथे -"लक्ष्मण मस्तुरिया हमर अग्रज कवि हरि ठाकुर जइसन वीर अउ ऋंगार, क्रांति अउ पीरित के अद्वितीय गायक आय .कहूँ -कहूँ उन बहुत करीब हे, लेकिन शैली के थोर बहुत अन्तर तो रहिबेच करही."

 छत्तीसगढ़वासी मन के स्वाभिमान ल वो कइसे जगाइस वोकर उदाहरण देखव -


सोन उगाथौं माटी खाथौ ।

 मान ल देके हांसी पाथौ ।।

खेती खार संग मोर मितानी ।

घाम मयारु हितवा पानी ।।


मोर इही जिनगानी मंय नगरिया अंव ग 

किसन के बड़े भइया हलधरिया अंव रे ...

 झन कह मोला लेढ़वा डोमी करिया अंव ग

सिधा म सिधा नइ तो डोमी करिया अंव रे... 

  मैं छत्तीसगढ़िया अंव रे... 


मोर संग चलव गीत म वोहर छत्तीसगढ़िया मन ल जगाय के काम करथे. बिपत संग जूझे बर कहिथे. 

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी 

वो गिरे  थके हपटे मन अउ परे

 डरे मनखे मन 

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव ग 

बिपत संग जूझे बर भाई मंय बाना बांधे हंव ।

सरग ल पिरथी म ला देहू प्रन अइसे ठाने हंव ।।

मोर सुमता के सरग निसेनी जुरमिल सबो चढ़व रे.... 

मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी... 

मस्तुरिया जी के ऋंगार गीत ल सुन के मन ह मयूर जइसे नाचे ल लगथे. अंतस ह मगन हो जाथे. 


पता दे जा ले जा  गाड़ी वाला रे 

तोर नाम के तोर गाँव के तोर काम के... 

पता दे जा... 

जियत जागत रहिबे बयरी 

भेजबे कभू ले चिठिया 

बिना बोले भेद खोले रोये 

जाने अजाने पीरीतिया 

बिन बरसे उमड़े घुमड़े 

जीव मया के बयरी बदरिया 

पता दे जा रे गाड़ी वाला... 

अइसने "पड़की मैना "गीत ल सुनके  हिरदे ल गजब उछाह लागथे. 


वारे मोर पड़की मैना, तोर कजरेली नैना 

मिरगिन कस रेंगना तोरे नैना 

 मारे वो चोंखी बान, हाय रे तोर नैना... 


वियोग ऋंगार रस मा मस्तुरिया के गीत ल सुन के मया करइया मन के आंसू ह टपक जाथे. 


काल के अवइया कइसे आज ले नइ आये 

तोला का होगे, रस्ता नइ दिखे बइरी तोर... 

का कहूं रस्ता म काहीं अनहोनी होगे 

का कहूं छोड़ मया ल संगवारी जोगी होगे

घेरी बेरी डेरी आंखी कइसे फरकाये 

तोला का होगे, टीपकी टीपकी आंसू गिरे मोर... 


अइसने अउ उदाहरण प्रस्तुत हे.. 


सरी रतिहा पहागे तैं नइ आये रे 

तोला घेरी बेरी बइरी मंय सपनायेंव रे... 

अइसन का होगे काम 

भूलिगै देह ल परान 

का तो महि हौं अभागिन 

अपने होगे आन 

आ आ नींद बइरी आंखी ले उड़ि जाय रे... 


शोषण करइया मन ल मस्तुरिया जी खूब ललकारय .

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हम तो लूट गयेन सरकार तुंहर भरे बीच दरबार 

खुल्लम -खुल्ला राज म तुंहर अहा अत्याचार 

रइहो रइहो खबरदार... 

हाय विधाता दिन -दिन बाढै देस म अत्याचारी 

परमिट वाले डाकू भइगे जन सेवक सरकारी 

सुतरी सुतरी छांद फांद के लूटै पारी -पारी 

हांस रे लछमन करम ठठा नइ रोवे म उबार 

हम तो लूट गयेन सरकार तुंहरे भरे बीच दरबार...


मस्तुरिया जी ह "सोनाखान के आगी" म शहीद वीर नारायण सिंह के वीरता ल गजब सुग्घर ढंग ले प्रस्तुत करे हवय .


फेर सुरता आगे उही प्रन के ।

फरकिस भुजा बरन ललियाय ।।


आंखी जले लगिस लक लक ।

कटरै दांत, बदन अंटियाय ।।


नहीं नहीं संगी ये मरना तो ।

कायर अउ मन हारे के ।।

मोर जिनगी मोर परजा खातिर। 

जे मोला मुखिया माने हे ।।


जमींदार मंय सोना खान के ।

सोना उपजै मोर माटी म ।।

जिहां के भुंईधर भूख मरत हे ।

आग बरै मोर छाता म ।।


रचनायें... 

मस्तुरिया के रचना म हमू बेटा भुइंया के (काव्य संग्रह), 

चंदैनी गोंदा में लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत ,छत्तीसगढ़ के माटी (छत्तीसगढ़ दर्शन ),सोना खान के आगी, माटी कहे कुम्हार से (निबंध संग्रह) अउ घुनही बंसुरिया (गीत संकलन) प्रमुख हे. 

 मस्तुरिया जी ह सन् 2000 मा बने मोर छइंहा भुइंया, मंजरी सहित कतको छत्तीसगढ़ी फिलिम बर गीत लिखे के सँगे सँग गायन करिस. 

कछ बेरा तक लोकासुर मासिक पत्रिका के संपादन घलो करीस. 


सम्मान - 


     छत्तीसगढ़िया जन जागरण के अग्रदूत मस्तुरिया जी ल राज्य सरकार द्वारा जउन सम्मान मिलना रिहिस वो नइ मिल पइस. आंचलिक साहित्य म गजब लिखइया साहित्यकार मन ला शासन द्वारा पं. सुंदर लाल शर्मा सम्मान देय जाथे. वहू नइ देय गिस. जबकि मस्तुरिया जी के कई ठन गीत ह छत्तीसगढ़ के स्वभिमान गीत हरे. पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के समय मस्तुरिया के गीत मोर सँग चलव रे... मयँ छत्तीसगढ़िया अवँ ...ह शंखनाद के काम करिस. 


पर मस्तुरिया जी ह जनता के प्यार ल सबसे बड़े सम्मान माने. एक चैनल म इंटरव्यू देत खानि 

वोहा पूरा दम खम के साथ येला बोले रिहिस. ये इंटर व्यू देत समय 

सुप्रसिद्घ गीतकार जनाब मीर अली मीर जी घलो  उंकर संग रिहिस. 


हमर छत्तीसगढ़ के कतको साहित्यिक अउ सांस्कृतिक संस्था मन हा मस्तुरिया जी ल सम्मानित करिस. येमा छत्तीसगढ़ी काव्य भूषण, लोक स्वर, विशेष प्रतिभा सम्मान, स्व. ठाकुर प्यारे लाल सिंह सम्मान, छत्तीसगढ़ी विभूषण, सृजन सम्मान, रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान ।


रेडियो म मस्तुरिया जी के गीत ल ननपन ले सुनत हन. गिने चुने जउन गीतकार, गायक मन जनमानस म अपन अलग प्रभाव छोड़िस वोमा लक्ष्मण मस्तुरिया प्रमुख रीहिस. 


मस्तुरिया जी के कवि सम्मेलन म अब्बड़ मांग रहय. छत्तीसगढ़ के सबो प्रमुख शहर अउ कतको गाँव म वोहा काव्य पाठ करे हे.वोकर लोक प्रियता ल देख के भीड़ भाड़ ल रोके बर वोला आखिरी डहर काव्य पाठ कराय जाय.मेहा लक्ष्मण मस्तुरिहा ल लखोली, राजनांदगांव म आयोजित कवि सम्मेलन म काव्य पाठ करत सुने रहेंव.  छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कार्यक्रम म भेंट होय रीहिस हे. 


20 जनवरी 1974 म नई दिल्ली के लालकिले म गणतंत्र दिवस के अवसर म आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन म काव्य पाठ करीस. वोहा देश के नामी कवि/गीतकार गोपाल दास नीरज, बाल कवि बैरागी, इन्द्रजीत सिंह तुलसी, रामावतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी मन संग अपन प्रस्तुति दीस. वो समय मस्तुरिया जी के उम्र मात्र 25 साल रिहिस. येहर वोकर लोक प्रियता के सबले बड़े उदाहरण हे  .

 छत्तीसगढ़ के ये रतन बेटा ह 3 नवंबर 2018 म परम लोक चले गे.

मस्तुरिया जी ल उंकर तीसरा पुण्य तिथि म शत् शत् नमन हे. विनम्र श्रद्धांजलि. 🙏🙏💐💐

              ओमप्रकाश साहू" अंकुर "

        सुरगी, राजनांदगॉव (छत्तीसगढ़)