Tuesday, 8 February 2022

सुरता- पं दानेश्वर शर्मा जी


 

"हर मौसम में छंद लिखूंगा " कहइया अउ " तपत कुरु भाई तपत कुरु " लिखइया तो पंडित जी रहिन न ? हम सबो झन तो उनला पंडित दानेश्वर शर्मा पूर्व अध्यक्ष दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति दुर्ग , पूर्व अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के नांव से जानथन त तीन फरवरी के रात 8 बज के 10 मिनट मं उन सरग चल दिहिन । साहित्यिक , सामाजिक , धार्मिक संस्था मन श्रद्धांजलि देवत हें । 

   10 मई 1931 के दिन मेड़ेसरा  ( छत्तीसगढ़ ) के संस्कारवान दुबे परिवार मं जनमे पंडित जी  शिक्षा , वकालत , भिलाई इस्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग के कुशल प्रशासक , श्रीमद्भागवत के प्रवीण प्रवचनकार , लोकप्रिय मंचीय कवि , हिंदी , छत्तीसगढ़ी के बुधियार साहित्यकार के रुप मं प्रतिष्ठित रहिन । झर झर झरत झरना कस हांसी , नवोदित साहित्यकार मन ल असीस अउ मार्गदर्शन , पुरखा साहित्यकार मन ल जथाजोग सम्मान देवइया रहिन । रहिन माने अब नइये ...लिखत लिखत कलम ठोठक गिस ...। 

      26 दिसम्बर ले उन खटिया धर लेहे रहिन ...उमर के तकाजा शरीर थक गिस उही बुढ़ापा तो खुद एकठन जब्बर रोग आय , सांस थोरिक बोझिल होए लग गए रहिस तभो बोली बात सफ्फा , सुरता जस के तस रहिस । जांजगीर मं भैया , कका मन संग साहित्यिक गोष्ठी , आयोजन मन मं उनला देखत , सुनत आवत रहेवं उही समय से पंडित जी कहत आवत रहेंव । 

     सन् 1975 मं भिलाई आएवं तभो भिलाई इस्पात संयंत्र के साहित्यिक आयोजन मन मं उनला सुने , मार्गदर्शन पाए के मौका मिलत रहिस , समय के धारा बोहावत रहिस ...के पद्मनाभपुर मं रहे आएवं लकठे मं उंकर घर हे त दर्शन होवत रहय कई ठन आयोजन मं उंकर संग जावत घलाय रहेंव । अइसे लागय जाना पंडित जी के बाजू मं मोर लइकाई अभियो बइठे हे।  सन् 2004 / 05  मं मोर किताब वनमाला , बहुरंगी , सुरता के बादर के विमोचन पंडित करे रहिन । 2006 मं मोर किताब " पंडवानी और तीजन बाई " के भूमिका लिखे हें त 2019 मं ये किताब के दूसर संस्करण आइस त बड़ खुश होइन कहिन " सरला! तीजन बाई के प्रसिद्धि के छोटकन अंश तोहू ल मिल गे । " 

      छोटे , बड़े कतेक अकन सुरता हे आज पंडित जी के जाए ले मइके छूटे के दुख फेर हरिया गे । मोर छोट खाट साहित्यिक उपलब्धि बर , मोर लेख , किताब मन के प्रकाशन बर अब कोन मोला असीस देही ? कोनो आयोजन मं जाए के पहिली काला अपन बात , विचार सुनाहंव , काकर आशीर्वाद के कवच पहिर के माइक धरे सकिहंव । कोन कहिही " खूब पढ़े कर बड़े नोनी , जतके पढ़बे ओतके गुनबे अउ जतके गुनबे ओतके बढ़िया , गहन गम्भीर लिखे सकबे । " 

   आज आपके बड़े नोनी सिरतो बड़े होगे पंडित जी ....नहीं ..नहीं ..लइकाई गंवा के बुढ़ा गिस। 

कतका सुरता , कतका गोठ बात ...अब तो लिखत नइ बनत हे भाई , थकासी लागत हे ...दस बजे बिहनिया पंडित जी ल अंतिम प्रणाम करे जाना हे न ? 

     ये कइसन संजोग ए भाई के आज दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति दुर्ग के पूर्व अध्यक्ष पंडित जी ल श्रद्धाजंलि  देवत हे वर्तमान अध्यक्ष सरला शर्मा ...। 

   ॐ शांतिः


सरला शर्मा

खिख लइका*

 *खिख लइका*


  राजा देवा नगर भ्रमण कर घर आथे त देखथे उनकर रानी देवंतिन हर अपन बेटी ल आ मोर सोना बेटी अउ बेटा ल आ मोर हीरा बेटा कहिके बलाथे त राजा हर कहिथे ,कस रानी! तोर लइका मन हीरा - सोना ए त बाकी के मन का ए? त रानी कहिथे बाकी के मन 'खिख' ए | राजा कहिस अइसन बात ए रानी त चला पता करथन की बाकी के मन,,,,,

        राजा हर दूसर दिन कोतवाल ल बुलावा भेज सरि राज्य म मुनियादी करवा दिस की राजा के आदेस हे राज्य के सब जनता मन चौराहा भाठा म  'खिख लइका ' देखे बर सकलावत जावा हो,,,,, 

      कोतवाल के हाँका सुन सब मनखे मुंही के मुंहा गोठियावत चला तो कइसना 'खिख लइका ' होथे देखबो कहिके सब सकलाय लगिन| सब परिवार सहित आवत गिन बड़हरहा,गऊंटिया,गरिबहा,मंगइया|ओर -ओर अपन -अपन जहुंरिया करा बइठल गिन सब पूछे लगिन कहाँ हे 'खिख लइका' कब आही देखतेन हमुमन कहिके त राजा कहिस आवत हे ओकरो करा नेवता भेज दे हंव कहत राजा ओरी-ओर सबके लइका मन ल देख जाथे त आखरी छोर म एक झन मंगइया निच्चट कारी अउ ओकर लइका हर घलो भीम करिया आँखी अउ दाँत भर ह जुगुर-जुगुर दिखत राहय अउ नाक ले निकले रेमट हर हरियर- हरियर मुंह ल छुवत राहय तेला लइका हर लुबुर- लुबुर कर जीभ म चाटत राहय त राजा लइका करा पुछिस बाबू तँय का करे आय हस ग? त लइका फट ले कहिस 'खिख लइका'देखे | फेर राजा ओकर महतारी करा पुछिस कस दाई तोरलइका कइसने हे ?त ओ हर कहिस मोर हीरा बेटा ल कहे राजा साहब बड़ सुग्घर हे मोर सोन चिरइया ह|फेर ओ लइका ल बीच म खड़ा कर कहिस लेवा देखा 'खिख,,,,,'ल जी सब देख हांसे लगिन त लइका के दाई हर कहिस काबर हांसथव सब झन मोर बेटा ल देख के ?अतेक सुग्घर मोर सोन चिरइया मोर हीरा सरिख बेटा ल तुमन नजर मत लगावा |त देखइया मन कहिन देखत हव हो नाक -मुंह के ठऊका नइ हे बंदन के खइता |तेला हीरा, सोना, राजा बेटा कहत हे|


फेर राजा रानी कोती ल देखत कहिस देखे रानी मिलिस जवाब की कोनो के लइका हर 'खिख' नइ होय| सब बर सब के लइका हर राजा, हीरा, सोना होथे| सब अपन -अपन घर चल दिन राजा-रानी महल|


पार्वती वैष्णव 

तिल्दा, रायपुर(छत्तीसगढ़)

बजट

 बजट

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हम ठहरेन छोटकुन वेतन भोगी कर्मचारी।हमर घर के वित्तमंत्री हा हर महिना बजट पेश करथे तहाँ ले वोला लागू करे बर घानी के बइला कस जोंतावत रहिथँव।

    पिछू दू बछर ले वो ह महिना पुट कटौती उपर कटौती वाला बजट पेश करत हे।अब देख न मोरे कमाये पइसा के जेब खर्चा अउ पेट्रोल पानी बर पहिली दू  हजार अनुदान देवत रहिसे तेनो ह कटा-कटा के बुचड़ी होके अधियागे हे।अइसे लागथे के अब चार बजे रात के उठके मार्निंग वाक करत ड्यूटी जाये ला परही काबर के ये एक हजार ल पेट्रोल के दिन दूना रात चौगुना बाढ़े दाम ह पाके आमा कस चुहक देही त मैं ह कभू कभार चाय पानी ल कामा पी हँव।अइसे भी अबड़ दिन होगे हे चोंगी माखुर ल संगवारी मन सो माँग के खाये पिये ल परथे। हप्ता म दाढ़ी मेंछा बनवाववँ तेनो म कटौती होगे हे। सकल-सूरत बइहा कस दिखथे।

       कटौती के बात चलिस त हम का बतावन--पहिली किराना समान म चार किलो फल्ली तेल आवय तेन अब डेड़ किलो आथे। भितरहीन ह पानी के छिंटा मार-मार के साग ल भुंजथे तइसे लागथे।पापड़-सापड़ के बाते झोंड़ दव वोकर तो दरशने दुर्लभ होगे हे। सगा-सोदर आये म कभू तिहार मना लन तेमा अघोषित प्रतिबंध लगे हे। भाजी पाला म काम चल जथे। लइका मन कभू पिकनिक-सिकनिक बर देवता चढ़े कस घोंडइया मारथें त आलू चिप्स बर पाँच रुपिया देके कइसनो करके मना लेथन।ये पाँच-दस रुपिया तको भारी पर जथे।

            तुमन सोचत होहू--ये तो बने बात ये--भारी बँचत होवत होही।हाँ--महूँ अइसनेच सोचत रहेंव। हम तो ये मान के चलत रहेंन के बाई ह चरपी के चरपी दबिया के रखे होही।एक दिन मजाके मजाक में हम ये कहि परेन --तैं बँचा के दू चार हजार धरे होबे त दे न--काम हे। अतका ल सुनते वो भड़क के कहिस--तोला कुछु लागथे , धन नहीं।ये सेनेटाइर अउ मास्क लेवइ के मारे मोर टिकली-फुँदरी बर तको रुपिया- दू रुपिया नइ बाँचय अउ तैं ह दू चार हजार के गोठ करथच।ये काय नौकरी ये तोर-ठकठक ले तनखा बस ल लाके धरा देथस।हमीं जानबो के हम घर ल कइसे चलावत हन तेला।एक ठन नवा लुगरा लेये बर तरस जथँव। तोला कुछु चिंता-फिकर हे धन नहीं ते--कोरोना म बीमार परे रहेच त मोर मइके ले उधारी पइसा माँग के लाये हँव तेनो एको पइसा छुटाये नइये। हूँह---बँचत के बात करथस---तोर सबो पास बुक मन ल झर्राये म कतका झरे रहिस--उही पचास हजार। महिना पूरे नइ पावय--उधारी चढ़ जथे। दूध वाला के पाछू महिना के तको देवाये नइये।

       हम वोकर चंडी रूप ल देख के सकपकागेंन। अइसे लागिस के ये मजाक ह मँहगा परगे।हम समझगेन बँचत कहाँ ---इहाँ तो घाटे-घाटा के बजट हे।बँचत बिन बिकास कइसे---बेंदरा बिनास तो होबे करही। हम चुपेचाप गली कोती सरकगेंन।

        बिहान भर एक फरवरी रहिस। महिना भर  पहिली ले ये दिन ल टकटकी लगाये हम ओइसने जोहत रहेन जइसे कोनो प्रेमी-प्रेमिका मन एक दूसर ल जोहथें या फेर दाना-पानी मिलही सोच के चिरई के नान-नान पिलवा मन झाँकत रहिथे या फेर जइसे माँगन-जाँचन मन जोहथें। आशा रहिसे के ये दरी के केंद्रीय बजट म हमर कल्याणे-कल्याण होगी। इंकमटेक्स म छूट मिलही। फेर जब बजट आइस त पता चलिस के हमर बर पाछू बछर के मुरझाये फूल ल सूँघे बर मढ़ाये गेहे।आशा के डोरी रट ले टूट गे।हम ला अइसे लागिस के कल्याण सागर म बूड़के स्वर्गवासी हो जवँ।फेर का करबे मरना अतका सरल थोड़े हे? टी वी के कान ल कई पइत अँइठ-अँइठ के पूछ डरेंव के हमर लइक कुछू होही त बता न रे भाई? फेर उहाँ जेन भइया मन सुनावत रहिन तेन कुछु समझे नइ आइस।मूड़़ी -पूछी के पतेच नइ चलिस।अतके जनइस के संसद म झगरा माते हे।

      दूसर दिन साँझकुन गुड़ी चँवरा कोती बइठे ल गेंव त उहाँ बहुत झन सकलाये राहयँ। उहों बजटे उपर जुबानी खर्चा मतलब चर्चा होवत राहय। हम सोचेन ए मन ल, मोरे जइसे ,बजट के बारे म--वो कइसे बनथे--काबर बनथे --थोरको पता नइ होही फेर ये मन चिल्ल पों काबर मतायें हें।

    हमूँ जाके भेंड़िया धसान म कूद गेन।मंगलू कहिस--ये बजट म कुछ नइये। एकदम बेकार, फालतू हे।जीरो बटे सन्नाटा हे।

   वोतका ल सुनके झंगलू कहिस--'कइसे कुछु नइये।बने पावर वाले चश्मा ल ओरमा के पेपर ल पढ़। देख एमा धड़धड़ावत ट्रेन हे, ड्रोन हे, एंड्राइड फोन हे, चाँदी हे सोन हे। अउ ये नइ दिखत ये का-अँधरा के बेटा जिरजोधन--साठ लाख नौकरी हे, बरा हे, बरी हे, जिनिस सरी हे। स्टार्ट अप हे--वादा लबालब हे।सड़क हे-तड़क भड़क हे।' 

   अतका ल सुनके पंच पंचूराम ह ठोलियावत  कहिस--'हाँ ,कका बने बताये। सब कागज म अउ भाषण म दिखत हें फेर राशन म नइ दिखत ये।'

'वाह कइसे नइ दिखत ये। बिन पइसा के झोला-झोला चाँउर नइ दिखत ये का। बिन पइसा के कोरोना वेक्सीन नइ दिखत ये का।  पी एम, सी एम म बने घर-कुरिया नइ दिखत ये का। खाता म आये पइसा नइ दिखत ये का '-- सियनहा मेहतरु ह कहिस।

     बात के उत्तर बात म देवत रमेशर भिंड़गे-- सब टकटक ले दिखत हे बड़े ददा।  यूरिया, पोटाश के बाढ़े कीम्मत दिखथे। सुसाईट अउ सुसाईटी दिखथे। बोरा के किल्लत दिखथे--किसान के जिल्लत दिखथे। एम एस पी ल अगोरत अनाज दिखथे--बिगड़े सब काज दिखथे।'

इँकर तनातनी ल सुनके एक झन सियनहा हा समझावत कहिस- दैखौ बाबू हो तुमन धीर धरौ।धीर म खीर मिलथे। तुमन ल ये बजट म जेन थोड़-बहुत मिल जही उही म संतोष करौ। अइसे भी खाँटी रबड़ी तो बड़े-बड़े पेटल्लू मन ल मिलथे।वो मन ल कइसनों करके मिल जही। तुमन काबर नइ सोचव-- ये बजट भविष्य के सपना ये ,पच्चीस साल आगू ल देख के बनाये गेहे।'

सबके ल सुनत वो मेर बइठे बेरोजगार नवयुवक मनोज कहिस--वो तो सब ठीक हे फेर वर्तमान के का होही?

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चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

व्यंग्य- कुकुर सहिराये अपन पूछी

 कुकुर सहँराये अपन पुछी 


                    सोनाखान हा बहुत बड़े जमींदारी रिहिस । पूरा क्षेत्र म किसान अऊ मजदूर मनखे मन के जीविका के साधन खेती खार रिहिस हे । ये क्षेत्र के मन बहुतेच मेहनती रिहिन ...... समे म पानी बरसके साथ दे देवय तब तो अतका  फसल होय .... जेला रपोटे नइ सकय ....... अऊ पानी धोखा दिस तब अकाल दुकाल के नौबत पर जाय ........ । चतुरा घला रिहिस इहाँ के मनखे ..... । रात दिन के अकाल दुकाल के अतका आदत परगे रिहिस के ..... गरीब से गरीब मजदूर मनखे तको हा बहुत तकलीफ झिन होय सोंच , घर म कोठी बनाके धान चना ला छाब के राखे रहय । इहाँ के मन खाये बर केवल जुन्ना धान के उपयोग करय । नावा धान ला बियारा म सुखो के कोठी म छाब के राखे रहय । 

                    एक समे जबर अकाल परिस । पेरा तक नइ लू सकिन । फेर पूरा जमींदारी म कन्हो मनखे भूख नइ मरिस । कोठी म सकलाये धान हा सबके जीव ला बचा दिस । दूसर बछर तको उही हाल होगे । अब का करे ..... का नइ करे ........ । बिजहा बर बाँचे खोंचे धान हा कोठी ले निकले लगिस । बिजहा धान हा अतेक बाटुर के पेट नइ भर सके । भूख म मनखे के तड़फना सुरू होगे । समस्या बड़ गम्भीर होगे । सुलझाये बर गाँव गाँव म बइसका सकलागे । एक ठिन गाँव के मन समस्या के निदान बर हरेक दिन एक बेर सार्वजनिक रांधे खाये के सोंचिन ताकि कम से कम .... जेकर घर बिलकुलेच निये तहू ला एक टेम खाये बर मिलय । जेकर जेकर घर म अनाज बाँचे रिहिस तेमन अपन कोठी ला झार पोंछ के सार्वजनिक भंडारा म मदत करे लगिस । उही गाँव म एक झिन किराना दुकान वाला सेठ रिहिस । ओकर तिर म बहुत अकन बिसाये अनाज रिहिस । ओहा सोंचिस के अइसन बेवस्था हा जादा दिन नइ चल पाही ...... पाछू लूटपाट होना तय हे ...... डर हमागे ..... । अनाज बचाके बाहिर लेग सकना सम्भव नइ दिखत रिहिस । रातों रात पइसा ला धरके नौकर ला समझावत अइसे कहिके भागिस के , ओकर ददा हा बिमार परगे हे अऊ अबत तबक होगे हे । गाँव के मन ला यदि मोर गोदाम के अनाज के आवसकता परही तो जतका चाहे ..... निकाल के उपभोग कर सकत हे । नौकर ला कुची थमहा के चल दिस । 

                    बिहिनिया ले ओकर घर अऊ दुकान म संकरी तारा कुची लगे देख गाँव के मन सुकुरदुम होगे । ओकर नौकर ला पूछिस त नौकर हा सरी बात ला उइसनेच बतइस जइसे सेठ केहे रिहिस । कन्हो पतियइन ...... कन्हो नइ पतियइन । कतको झन मन गोदाम के पूरा अनाज ला गाँव के सम्पति घोसित करके उपभोग करे के सोंचिन । कन्हो कहय जानबूझ के भागे हे बिया हा ....... अऊ बहाना घला अइसे मारे हे ताकि गाँव के मन तरस खाके ओकर समान ला झन लूटे ..... । 

                    सियान मन फइसला करिन के चाहे भूख म परान निकल जाय फेर ओकर गोदाम म हांथ नइ लगाना हे । बपरा हा संकट म खुदे परे हे । इहाँ रहिके नइ देतिस त लूट मार सोंचतेन । रहत ले भले नइ दिस फेर जावत जावत सरी सम्पति ला बाँट सकत हव कहिके .... हमर उपर अहसान कर दिस । रहत ले अपन हांथ उचाके देतिस तब अलग बात रिहिस ...... । धीरे धीरे अकाल के विभीसिका हा बिकराल रूप धर लिस । अब दिन म एक बेर सार्वजनिक भोजन म घला मुश्किल होय लगिस । पोट पोट करत कुछ मनखे मन भूख के मारे परान त्याग दिन । सियान मन हारगे । सब मिलके तय करिन .... सेठ के गोदाम खोले के ........ । गोदाम खुलगे .......... बछर भर गाँव भर ला पाले के शक्ति रिहिस ओकर गोदाम के अनाज म ......... । अतेक अकन होही .. कन्हो सोंचे नइ रिहिन । सियान मन आवसकता के हिसाब से उहाँ के अनाज ला नाप नाप के उचइन अऊ गाँव म हरेक मनखे ला , जइसे चलत रिहिस तइसने केवल एके बेर , वहू म सार्वजनिक भंडारा म , भोजन दे के घोसना करिन । अमीर गरीब किसान मजदूर संग जम्मो मनखे एक बेर भोजन पाये लगिन । 

                    किसानी के दिन आगे । रझरझ रझरज गिरत पानी हा किसान मजदूर के मुहुँ म पानी लान दिस । सेठ के गोदाम ले बिजहा निकलगे । काम कमई म चार महिना कइसे निकलगे पता नइ चलिस । आगर के घाघर धान होइस । कोठी डोली छलछलाये बर धर लिस । जतका अनाज सेठ के गोदाम ले निकाले गे रिहिस तेला नाप नाप के वापिस भर दिन । एक दिन सेठ तक खभर अमरगे । ओहा गाँव वापिस का करे बर जाहूँ ..... कहींच नइ बाँचे होही सोंचत रिहिस ...... फेर अपन सम्पति बाँचे के बात सुन गाँव वापिस लहुँटगे । 

                    चौपाल म मनोरंजन बर तास के फड़ लीम चौंरा खालहे जमे रहय । सियान मन आपस म , भोगे दुख अऊ साथ देवइया संगवारी मन के गोठ गोठियावत रहय । सेठ घला बइठे रहय । ओहा सोंचत रहय के ओकरो योगदान के चरचा होतिस ...... । ओकर का योगदान रिहिस तेला हरेक मनखे जानत रहय ....... । ओकर नाव नइ लेवत देख , सेठ ले रेहे नइ गिस ......... । ओहा सीधा सीधा अपन नाव नइ लेके घुमा फिराके केहे लगिस के , गाँव के खुसियाली म अऊ बहुत झिन के योगदान हे ....... उहू मन के प्रसंसा करे अऊ नाव ले मा का हर्ज हे ......... । कन्हो मनखे ओकर बात ला महत्व नइ दिस । सेठ चुपचाप चल दिस । चौंरा तिर खड़े कुकुर भूँके लगिस । सेठ के जातेच भार चुपचाप खड़े रहिके पुछी हलाये लगिस ....... । सेठ के बात अऊ कुकुर के हालत पुछी के ... कोई महत्व नइ रिहिस .......। कुकुर सहँराये अपन पुछी .... कहत .... अपन अपन घर मसक दिन गाँव के सियान मन ...... । 


 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

कहानी- चिरई चुगनी

  चिरई चुगनी

                  

                             चन्द्रहास साहू 


                        Mo 8120578897


"मेहा किरिया खाके कहत हव दाई ! बिहाव करहू ते ओखरेच संग। मेहा जावत हव ओखर संग मिले बर।''

मोटियारी सुमन किहिस। आँखी के समुन्दर जलरंग -जलरंग करत रिहिस ओखर । जानकी तो ठाड़ सुखागे। हुंके न भूंके। आँखी के आंसू घला अटागे रिहिस। झिमझिमासी लागिस। मुहु चपियागे। दुवारी के बरदखिया खटिया मा हमागे अब । खटिया के तरी मा माड़े फुलकाछ के लोटा के पानी ला सपर-सपर पी डारिस। उदुप ले उठिस अऊ नानकुन झोला ला धरिस। अपन बेटी सुमन के हाथ ला धर के रेलवाही कोती चल दिस। टिकट कटा के रेलगाड़ी में बइठगे दुनो महतारी बेटी। गाड़ी दउड़े लागिस अपन गति मा अऊ जानकी के मन घला। भलुक मुक्का हावय तभो ले मन गोठियावत हावय। सुरता करत हावय अपन ननपन ला।

                 चौक के महाबीर ला पैलगी करथे। दूध पियावत गाय ला जोहार करथे। शीतला तरिया के पार ला चढ़के पिपराही खार मा जाथे, तब मन मोहा जाथे जानकी के। बम्बूर के पिवरी फूल मुड़ी मा गिरे तब अइसे लागथे जइसे प्रकृति हा स्वागत करत हावय। चिरई चिरगुन के चिव- चिव स्वागत गीत गाथे।  जानकी के मन गमके लागथे । बइला के घाँघरा अऊ टेक्टर के गरजना- सब सुहाथे।  खेत के नानकुन बखरी मा झूलत तोरई तुमा कुम्हड़ा  के लोई ला कुंदरा मा पीठइया चढ़ाथे। भाटा ला झेंझरी मा टोर के धर लेथे। दाई हा जिमीकांदा खनत हावय झौउहा भर । ददा हा मुही फोर के ये डोहरी ले ओ डोहरी पानी पलोवत हावय।  नान - नान बिता भर के लाल अऊ पालक भाजी फूलगोभी .…..। सेमी के नार मा फरे पोक्खा- पोक्खा सेमी , सादा फूल, फूल मा उड़ावत- बइठत रंग - बिरंगा  तितली  अऊ तितली के पांख......सुघ्घर । अइसे लागथे जइसे सब ला काबा भर पोटार लेवव। 

"बेटी ! ये जतका खेत दिखत हावय ते हमर आय। चालीस एकड़।''

ददा हा जानकी ला खेत देखावत रिहिस। जानकी बेरा-बेरा मा आथे खेत देखे बर। पाछू दरी पोरा मान के चीला चढ़ाये बर आये रिहिस।

"ददा माईलोगिन मन जब अम्मल मा रहिथे तब सात किसम के कलेवा ले सधौरी खाथे। अन्न्पूरना  के बरन धान जब गभोट होथे तब चाउर गहु के गुड़हा चीला खवाके इही मंगलकामना करथे- दाई तोर कोरा भरे राहय, तोर कोरा ले पोठ धान मिलही जौन हा हमर कोठी ला भरही अऊ गरीबी नइ आवन देवय।दाई अन्नपूरना हा सबके पालक आवय फेर आज किसान हा पालक बनके अपन बेटी ला सधौरी खवाथे ।''

"हाव सिरतोन काहत हस बेटी !''

ददा हुकारु दिस। सोनहा धान के बाली ला सिल्होए लागिस दुनो कोई । पोठ- पोठ लम्बा बाली नगरी दुबराज सफरी सरोना अऊ हाइब्रिड धान के । ये जम्मो धान के बाली के सुघ्घर झालर बनाथे जानकी हा । ओखर डोकरी दाई सीखोये हावय न । आड़ी - चौड़ी धान के बाली ला खोंच-खोंच के अइसे बनाथे कि दाना मन बाहिर कोती अऊ ढेठा भीतरी कोती। दाना ओरमत रहिथे। सुघ्घर दिखथे अब्बड़ सुघ्घर। गोल चकोर ईटा आकार के सुघ्घर झालर। झालर सेला झूमर चिरई चुगनी कुछु कहिले जिनिस उही आय। लछमी दाई के बरन घला आय येहाँ।  चिरई मन बइठथे अऊ दाना ला फोल - फोल के खाथे। चिरई के चिव- चिव, कुटूर- कुटूर ,गुटूर - गुटूर अब्बड़ सुघ्घर लागथे। मन मोहा जाथे। गौरइया सलहई पड़की परेवा मिठ्ठू मैना के संग परदेसी चिरई मन घला आ जाथे दाना चुगे बर .....!  चिरई दाना ला चुग के अपन वंश बढ़ाथे। धान के बाली अपन अस्तित्व ला मेटा देथे  चिरई मन बर।  तभे तो चिरई चुगनी कहिथे येला। अऊ बाचल पैरा ला गाय खाथे तब वहु अघा जाथे। जानकी अऊ ओखर  दाई हा बना डारे रिहिस सुघ्घर धान बाली के झालर ...चिरई चुगनी ।

"कतका सुघ्घर हावय ददा ! हमर छत्तीसगढ़ के परम्परा संस्कृति हा ..! अब्बड़ गुरतुर ।''

जानकी  किहिस अपन बनाये चिरई चुगनी ला देखावत । दाई ददा घला अब्बड़ उछाह हावय।

"कुंदरा के मियार मा.., मंझोत के डंगनी मा.. जाम के रुख मा.. कोन जगा बांधो चिरई चुगनी ला ..? नही .. । बोर के पाइप  मा मोर चिरई चुगनी ला बाँधहु।  ददा !  चिरई मन आही दाना ला खाही अऊ पानी घला पिही कतका सुघ्घर लागही चिव - चिव करत चिरई हा।'' 

 जानकी  किहिस अऊ अपन मुहु ला बजाए लागिस चिव- चिव ।

"हव बेटी बांध दे ।''

ददा किहिस अऊ  पंदोली दिस। 

"कतका सुघ्घर हावय ददा हमर बोर के पानी हा । मोर संगवारी घर के बोर फेल होइस अऊ हार्ट अटैक मा ओखर बाबू ....!''

"कलेचुप रहा बेटा अइन्ते- तइन्ते के गोठ झन गोठिया  बेटी !''

ददा बरजिस। 

" हमर किसमत मे कहा गंगा माई हावय बेटी ! ओ तो तोर पूजा करे के जगा मा बोर करवाय हव तब निकलिस भक्कम पानी । हमर पूजा करे वाला भुईयां के पानी अटागे रिहिस धुन हमरे हाथ छुतियाहा रिहिस ते ?   येहा पांचवी बेरा आय । पाछू दरी के चारो  बोर हा तो सुक्खा होगे। बोर पानी के लालच मा अब्बड़ करजा होगे हावय ओ ! कोन जन कइसे छूटाही ते  ? पांच एकड़ खेत बेचे ला लाग जाही अइसे लागथे।''

 ददा संसो करे लागिस।

                      जानकी तो फुरफन्दी रिहिस । ये घर ले ओ घर, ये पारा ले ओ पारा किंजरे । फेर जिनगी मा गरेरा कइसे समागे आरो नइ पाइस। ददा के टट्टागाड़ी मा बइठ के आइस जवनहा  परदेसी ओखर दाई अऊ ददा हुकुमचंद हा। ओखर राज मा दंगा फसाद होगे तेखर सेती पलायन करके आये हावय। सब सुघ्घर होही अऊ लहुट जाही...। अइसना किरिया खाये रिहिस । फेर नइ लहुटिस ।          

                      भलुक सड़क तीर ला पोगरा डारे हावय। बेसरम काड़ी झिपारी छा डारिस । बंदन पोताये पथरा माड़ गे अब। बंदन पोताये पथरा माड़  जाथे तब आस्था बिसवास  बाढ़ जाथे । 

 पार्षद पंच सरपंच कोनो नइ बरजिस । भलुक महाशिवरात्रि आथे तब दूध पीयाथे । नवराति दसेरा देवारी मा खीर पुड़ी .. । ईद , क्रिसमस मा कोल्ड्रिंक अऊ शरबत बाटथे। जम्मो धरम बर आस्था हावय तब का के डर...? कोन डरवाही ....? कोन भगाही...?

                        पथरा हा भगवान आय कि नही परमात्मा जाने फेर भीड़ हा तो भगवान आय जुझारू कर्मठ नेता माटीपुत्र मन बर। सुकालू करा राशनकार्ड नइ हावय। अऊ बुधारू करा मतदाता परिचय । फेर ये परदेसिया मन कर सब हावय अब । समारू के परछी भसके चार बच्छर होगे। आधार कार्ड के बिना कोनो योजना के लाभ नइ मिले अऊ...! 

               झिल्ली झिपारी वाला चार कुरिया हा अब संगमरमर लगगे तरी-तरी । चकाचक मन्दिर अऊ मन्दिर प्रांगण होगे। मंत्री जी उदघाटन करे हावय न।  

                     " जतका चर ले ..चर । जतका चुहक ले...चुहक। येहा तो छत्तीसगढ़ माने सी जी आवय। सी माने चारा अऊ जी  माने गाह आय.. चारागाह । जतका चर ले...।''

बाप  हुकुमचंद अऊ बेटा परदेसी खिलखिलाए लागिस गोठिया के। 

                      जानकी अऊ परदेसी हम उम्मर तो आय अऊ कब दुनो के अंतस मा मया के गोरसी रगरागये लागिस पार नइ पाइस। हुकुमचंद तो एखरे ताक मा रिहिस। बिलई ताके मुसवा।

"ददा परदेसी संग बिहाव करहु ।''

 अब्बड़ बरजिस फेर जानकी के अर्दली पन मा नवगे ददा हा । दु संस्कृति दु रस्म रिवाज ले बिहाव होगे। फेर गांव समाज के ठेकेदार हा जानकी के ददा ला छोड़ दिही का...?  नही  आनी बानी के हियाव - नियाव होये लागिस । बइठ - बइठका होये लागिस। कतक ला सहही माटी के चोला हा । एक दिन सिरागे ददा हा ।

    

                    परदेसी के साध पूरा होगे । चालीस एकड़ खेत जानकी के नाव ले कब परदेसी के नाव मा चड़ीस  पार नइ पाइस।

मीठ लबरा के बरन अब दिखे लागिस । ताना अपमान रोज के गोठ होगे अब ।  अऊ बेटी के जनम आइस तब ... सात जनम ले संग निभाहु, मया के किरिया खवइया ला जानकी अऊ ओखर बेटी सुमन बस्साये लागिस। निकाल दिस घर ले। कोन जन कुलदीपक, डेहरी के अंजोर करइया टूरा के जनम आतिस तब डिंगयहा के घर कतका महर -महर ममहातिस ते ....?

                  मामी ममा मरजाद ला राख लिस जानकी के। नही ते का होतिस ते .... ? भगवान श्री राम के जानकी कस यहु जानकी होगे दुखियारी....।  गोसाइया ले वियोगी । अब तो हुकुम चन्द हा सेठ हुकुमचंद होगे हे । धनबल बाहुबल सब ओखर । अइसन ससुर अइसन गोसाइया संग कइसे  लड़ो ... जानकी गोहार पार के रो डारथे।

               परदेसिया मन हमर  छत्तीसगढ़ मा उत्ती बुड़ती रकसहु भंडार जम्मो कोती के देश राज ले आये हावय कमाये खाये बर । कोन राज के नइ आय हावय  इहा ....? सब लोटा धर के आइस अऊ अतका जैजात सकेल डारिस।  बड़का होटल फेक्ट्री बड़का बिल्डिंग दुकान शॉपिंग मॉल पेट्रोल पम्प अऊ बड़का गाड़ी बड़का कालेज...सब  जिनिस तो हावय ओखर मन करा । .....अऊ हमर मन करा का हावय....? हमर करा हावय सुघ्घर नारा  - "छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया'' के।

जानकी गुनत -गुनत मुचकाये लागिस करू ..करेला अऊ लीम ले जादा करू मुचकासी ।

हा ! सब ले बढ़िया तो हावन हमन । लांघन ला जेवन करवाथन, पियासे ला पानी पियाना अऊ रहे बर छइयां देना। इही तो हमर सुघरई आवय फेर ....?  कड़ी मिहनत सरलग बुता अऊ टाइम मैनजमेंट ले अतका पोठ होवत होही परदेसिया मन कि ..... ? फेर छत्तीसगढ़िया मन घलो सिधवा हावय भोकवा नही..। अपन अधिकार ला लेये ला परही। 

जानकी गुनत- गुनत थाना कछेरी  चल दिस।  ससुर अऊ गोसाइया ले अधिकार पाये बर। बिसवास अतका रिहिस कि पथरा मा पानी ओगर जाही तब न्याय कइसे नइ मिलही..?

                     ददा के पनही बेटा के गोड़ मा आथे तब बेटा बड़का हो जाथे। पिकी फूटत दाड़ी मेंछा ला रोखा के लजाथे तब ..सिरतोन बेटा बड़का हो जाथे। अऊ बेटी ... ओ तो ननपन ले बड़का हो जाथे..। ठूबुक - ठूबुक रेंगत- रेंगत बहराये परछी ला अऊ बहारथे। धोवाये बरतन ला, अऊ मांजथे । रोटी बनावत पिसान ले सनाय ओन्हा अऊ कोवर- कोवर हाथ अंगरी ला मटकावत कहिथे

" दाई मेहा रोटी बनाहु तेन अब्बड़ मिठाही । खाबे । मेहा बड़े होहु तब तोला नइ कमाये ला लागे ।'' 

थके जानकी के माथ मा कोवर - कोवर हाथ ले मालिस करथे नानचुन  सुमन हा गोठियावत - गोठियावत तब जानकी के मन अघा जाथे । दू टीपका  आँसू गिर जाथे।


"दाई  अमर गेन रायपुर के रेलवे स्टेशन ला उतरबोन चल।'' 

सुमन के दुसरिया आरो कान मा गिस तब सुरता ले उबरिस जानकी हा। जिनगी के किताब के जम्मो पन्ना ला उलट - पुलट डारिस जानकी हा आज । आँखी के कोर के ऑंसू ला पोछिस अऊ उतरके बड़का होटल कोती चल दिस दुनो कोई।

सुमन के मन मंजूर बनके नाचत हावय। सपना के राज कुमार ले मिलही आज । बिदेशी ले मिलही आज। बिदेशी राम इही तो नाव हावय फेसबुकिया राजकुमार के। बच्छर भर के फोन फ़ेसबुक वाट्सअप के मया । ओमे तो गजब सुघ्घर दिखथे सिरतोन मा कतेक सुघ्घर लागत होही ....?  सुमन गमकत हावय। 

"बस आतेच हव।''

  फोन म किहिस बिदेशी हा अऊ कट जाथे कब आही ते ...?-आधा घंटा ...एक ..डेढ़  अगोरा करत हावय   होटल मा बइठ के। सुमन हा बिदेशीराम के।

" मेहा अब्बड़ सीखोये हव बेटी पैडगरी के कांटा खूंटी होवय कि जिनगी के बिच्छल सावचेती होके रेंगबे। बर बिहाव ठठ्ठा - दिल्लगी नोहे बेटी ! मया के विरोध नइ करो बेटी फेर टुरा ला अपन अनभव ले जाचहु अऊ मोर मन आही तब गोठ बात बनही । जादा झन सपना देख। जादा झन गुन ...।  दू घन्टा होगे कब आही ते पूछ फोन लगा के ।''

जानकी फेर बरजिस सुमन ला।

"नइ लगत हावय दाई फोन.....। स्वीच ऑफ आवत हावय... बैटरी लो होगिस होही दाई ..।'' सुमन  आस के संग किहिस।

" ओहा नइ आय बहिनी ! ओहा तो अपन राज भाग गे । तेहा अकेल्ला आतेस तब होटल के कुरिया मा लेगतिस। अऊ ...?  अऊ दाई संग आवत देख के पल्ला भाग गे।''

 रिसेप्शनिस्ट बताइस सुमन ला । सुमन अकचकागे...।

"सिरतोन काहत हस बहिनी ?''

"हाव ''

" ओहा हमर होटल मा आते रहिथे । जानथो मेहा ओला। अऊ...ओहा कोनो जवनहा नोहे । पचपन साठ बच्छर के डोकरा आवय ... डोकरा। फेसबुक वॉट्सअप मा आने जवनहा के फोटो ला स्टेटस मा डाल के....।

झटकुन मोबाइल निकाल के फेस बुक के चैटिंग देखिस सुमन हा।

 "गुड बाय'' 

 "ब्रेकअप ''

 करिया आखर ला देखत - देखत रो डारिस। भरम टुटगे रिहिस अब सुमन के। दाई जानकी के नरी मा झूलगे अब। 

                       ससन भर देखिस होटल ला । आदिवासी नृत्य मांदर खुमरी पंथी पंडवानी के पोस्टर ....छत्तीसगढ़ी संस्कृति के छप्पा ... जम्मो दिखावटी लागत रिहिस। 

छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़िया अऊ छत्तीसगढ़ी कोनो चिरई चुगनी नोहे ..। कोनो परदेसी चिरई आही अऊ चुग के चल दिही ...। कोनो जयचन्द ला आवन नइ देवन ये भुइयाँ मा...।

       मेन गेट मा झूलत सुन्ना झालर चिरई चुगनी ला देखिस ससन भर दुनो कोई । अऊ अपन घर चल दिस गुनत- गुनत । 

चिव- चिव, कुटूर- कुटूर ,गुटूर - गुटूर कान बाजत हे नवा उछाह के संग  जानकी अऊ सुमन के अब। मन गमकत हावय ।


चन्द्रहास साहू

द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब के पास

श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़

493773

मो. 8120578897

समीक्षा

 पोखनलाल जायसवाल: सोन के चिरैया भारत भुइयाँ ल लुटे बर कतकोन लुटेरा आइन। सबो लूटत गिन। अउ हमन परदेशिया मन ल अपने घर म जगा देवत अपन घर ले बाहिर होगेन। 'अतिथि देव भवः' के पुजारी बने गुलामी म फँसत गेंन। ए बने होइस कि स्वाभिमान जागे ऊपर ले गुलामी के बेड़ी टूटिस अउ आजादी पागेंन। जेकर बर बहुत कुर्बानी दे बर परिस। पुरखा मन ले मिले स्वतंत्रता के दिया ल बारे अपन स्वाभिमान ल बचाय रखे के जरूरत हे। आजो प्रवासी चिरई मन छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया कहिके हमर ऊपर राज करत हें अउ राज करे के कतको जतन करत हें। हमन छत्तीसगढ़िया सब ले बढ़िया के तमगा ल लटकाय अपन स्वाभिमान ल खूँटी म टाँगे गलती ल दुहराय म लगे हन। अनगइहाँ अउ अन्चिन्हार बर हमन दया दिखाथन। दया दिखाना अउ करना गलत नोहय, फेर अपन ले मुँह फेर के दया करई ह तो सरासर गलत आय। अनगइहाँ अउ परदेशी ल जगा देके अपने ल फूटे आँखीं नइ भाना कति मेर के नियाव आय। हमन काबर भुला जथन कि अपने ह काम आथे। अनगइहाँ अउ परदेशी ह तो चिरई आय बखत देख के उड़ा जथे। अपन सगा संबंधी ल कुछु साहमत करना त दूर, बात बात म ऊँकर ले झगरा मता देथन। अउ अनगइहाँ परदेशी बर सरबस लुटाय म अपन शान समझथन। हमर इही कमजोरी ल परदेशी मन भाँप के छत्तीसगढ़ ल चुगनी समझ गे हे। अउ चिरई बने इहाँ चारा चरे बर आथे। अउ हमर सरबस चरी कर डरथे, तब ले कोन जनी काबर ते हम चेत नइ करन। काबर ते अपन अस्मिता अउ स्वाभिमान ल मुरसरिया म रखे कुंभकरण सहीं नींद भाँजत रहिथन।

     इही स्वाभिमान अउ अस्मिता ल जगाय के उदिम म लिखे गे कहानी हरे चिरई चुगनी। जउन म नारी विमर्श के छाप घलव देखे ल मिलथे। ए कहानी आज के बेरा म सोशल मीडिया ले जुड़त नवा नता अउ ओकर सच्चाई ल उघारे म समर्थ हे।

      चिरई-चुगनी याने चारागाह जिहाँ ले पेट भरे के पाछू चिरई अपन ठउर लहुट जथे। वइसने रस चुहके के पाछू छोही बरोबर हम ल फेंके म चिरई मन बेरा नइ करँय अउ हम बेघरबार हो जथन। 

      कहानी के भाषा अउ शिल्प पाठक ल पढ़े म बड़ सहज अउ सरल जनाथे। भाषा म व्यंग्य के पुट देख के मन गदगद हो जथे। इही व्यंग्य ह ए कहानी म मजबूत बनाथे।

        पथरा ह भगवान आय कि नहीं तो परमात्मा जानय, फेर भीड़ ह तो भगवान आय जुझारू कर्मठ नेता माटी पुत्र बर।...

         जतका चर ले चर। जतका चुहक ले चुहक।....सी जी....याने चारागाह....।

         अइसन अउ दू चार ठन व्यंग्य ए कहानी म  पढ़े ल मिलथे। इही ह  कहानी के उद्देश्य ल अपन संगसंगे पाठक के हिरदे म छोड़त जाथे। ए व्यंग्य मन सुते स्वाभिमान ल जगाय म सफल हे कहे बानी लगथे। संवाद बढ़िया लिखे गे हे।

    ....दूनो के अंतस म मया के गोरसी रगरगाय लागिस, पार नइ पाइस।

         कहानी के अंत बढ़िया ढंग ले करे गे हे। कहानी के अइसन समापन ह आज के नवा पीढ़ी ल जिनगी भर कोनो भी नवा कदम उठाय के पहिली सोचे विचारे के संदेश देथे।

       चिरई चुगनी शीर्षक कहानी के सार्थकता ल घलव पूरा पूरा व्यक्त करथे। प्रवासी मन ल जब लगथे कि अब ए ठउर म ओला खतरा हे या फेर अब ऊँकर बर कुछु नइ हे तब वो ठउर ल छोड़ वइसने चल देथे,जइसे चिरई मन चुगनी ल छोड़ फुर्र उड़ा जथे। सुग्घर कहानी लिखे बर चंद्रहास साहू जी ल मँय बधाई देवत हँव अउ ओकर नवा कहानी के अगोरा करत नवा कहानी बर शुभकामना पठोवत हँव।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी

9977252202

व्यंग्य- दोस्ती

 दोस्ती

                एक गांव म आगी लगे रिहीस । चारों कोती अफरा तफरी मातगे रिहीस । जे दऊड़ सकय , तेमन दऊड़ के अपन प्राण बचा डरिन । अशक्त अऊ कमजोर मन आगी म लेसाए बर मजबूर रिहीन । फेर एक झिन अइसे मनखे घला रहय , जे कहींच अंग ले खंगे अऊ खिरे नइ रहय , न कन्हो कोती ले कमजोर  , फेर कतको जगा ओकर देहें म लेसाए भुंजाए के निशान रहय । पता करे गिस , तब जानिन के , ये वो मनखे आए जेहा .... कमजोर अऊ अशक्त मनखे मनला बचाए के फेर म लेसात – भुंजात रिहिस ।

              आगी हकन के लागे रहय । अभू अऊ भयंकर रूप ले डरिस । शहर ले गाँव , मैदान ले ब्यारा , परसार ले घरो घर तक अमरगे वो आगी ..... । एक झिन अंधरा रहय .... जेहा भागे बड़ जोर ले , फेर दिखय निही तेकर सेती ..... आगीच म झपा जाये । अंधरा खुदे जरे लगिस फेर दूसर ला जरत अऊ उंखर दरद अऊ आह सुन के .... अपन पीरा ल भुला जाये , ओहा एक्को बेर बचाये के गुहार नइ कर सकिस । आगी लगइया उही रहय ....... । बने मनखे हा जानत रहय अऊ ओला आगी लगाये बर घला मना करे रहय ....... ओकर दुष्परिणाम ल जनाबा करे रहय , फेर ओ अंधरा नइ मानिस । बने मनखे हा ..... अंधरा ला घला ....  तहूं देश के नागरिक अस कहिके ..... बचा डरिस ..... । समे के साथ आगी अपने अपन बुझागे .... ।  

               कुछेच दिन पाछू , अंधरा फेर तैयार होके पदोये लागिस । ए दारी आगी लगाना त बड़ चाहे , फेर बीते समे म , ले दे के अपन बांचे के कहिनी ओकर देहें ल पूस कस जाड़ कंपकंपा अऊ थरथरा देवय । बने मनखे संग दोस्ती करे के कोशिस करिस । कन्हो भाव नइ दिस । तभे ओला अंधरा अऊ खोरवा के दोस्ती के कहानी के सुरता आगिस के .... कइसे खोरवा ला .... अंधरा हा अपन खांध म बइठार के मड़ई देखाये बर लेगे रिहीस । मजा पाये के साध अऊ दूसर ल परेशान करे के ओकर तृष्णा जोर मारे लागिस । एक दिन ..... मौका पाके एक झिन बने मनखे ल खोरवा बना दिस । बने मनखे ओला जान नइ पइस । अंधरा ओकर इलाज करा दिस , बैसाखी धरा दिस । दूनो संगवारी बनगे । अभू खोरवा हो चुके बने मनखे हा ..... मने मन अंधरा के धन्यवाद करत , गुन गावत , ओकरे बिसाये बैसाखी ल धरके रेंगे लागिस । अब खोरवा हा , अंधरा के पिछलग्गू बनगे । अब अंधरा जइसे कहय , खोरवा तइसने देखय , तइसने सुनय अऊ तइसनेच कहय घला । अंधरा , कहूंच करा असानी ले आगी लगा देवय , कतको झिन ओ आगी म लेसा भुंजा जाये फेर , अंधरा ल कहींच नइ होये , ओहा इही खोरवा ल खांध म बइठार के ओकर बताये रद्दा म निकल भागे , अऊ बांच जाये । 

                 कुछ दशक बाद ..... पूरा देस ला आगी म उलझाके ..... अंधरा हा देस के कर्णधार बनगे । अंधरा के घर ..... अंधरा लइका पइदा होय लागिस । इंकर लइका बाला मन ला , आगी लगाये के गुन विरासत म मिले रहय । उही ला .... लइका मन घला ..... अपन बूता अऊ कर्तव्य समझ , जगा जगा , समे कुसमे आगी लगा के टरक देंवय , अऊ अपन बांचे बर केवल खोरवा तलासय । एती खोरवा के कुछ लइका अऊ चेला मन घला ..... अपन आप ला ...... खोरवा बनाना शुरू कर दिन । यहूमन ..... सरी मरम ल जान डरिन । अंधरा के खांध म चढ़हे के सुख के कल्पना अऊ बैसाखी धरके रेंगे के इच्छा इंकरो मन म पनपे लागिस । एमन जान डरिन के .... जे खोरवा होके रइही ..... तिही ल अंधरा अपन खांध के सवारी कराही ...... अऊ कतको कस सुख .... जइसे बड़े जिनीस पद …. इनाम ...... धन दोगानी सबेच दिहीं । एक बात अऊ ...... खोरवा मन के कन्हो सभा समागम बर साधन सुभित्ता घला इही अंधरा हा ..... मुहइया कराही । वर्चस्व अऊ नाम घला ..... अंधरा के खांध म बइठने वाला पाहीं ।

                 आगी लगते रहय । जरत , लेसात , भुंजात मनखे मन , आगी लगइया ल जान घला डरे रहय । फेर अभू कती गोहारे ? ओमन ल बचा सकइया मनखे मन , खोरवा बन के अंधरा के हाथ बेंचा के , ओखर खांध म बइठके , मजा लेवत घूमत हे । जेन बने हे , तेमन खोरवा हो जाये के जुगाड़ करत हे , या खोरवा हो जाये के अगोरा । आघू चलके इही अंधरा मन राजनीति के नाव ले अऊ खोरवा मन साहित्य के नाव ले जनाबा होगिन दुनिया म , जेकर दोस्ती वाजिम म जबर हे ।  

    हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

रेखा के लॉकडाउन ( छत्तीसगढ़ी कहिनी )

 रेखा के लॉकडाउन ( छत्तीसगढ़ी कहिनी )

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रेखा के जीवन म बदलाव ले के अइस लॉकडाउन ह। ये लॉकडाउन काबर रखे गे रहिस हे। आज भी सबके मन म विचार आथे। 21 फरवरी ले शुरु होय रहिस हे। ये ह चीन ले हवाई जहाज म उड़ा के आये कोरोना के कारण रहिस हे। ये कोरोना ह अपन कोप देखावत  रहिस हे अउ मनखे मन डर्रावत रहिन हें। सरकार ह आवागमन के साधन रेल बस हवाईजहाज ल बंद कर दे रहिस हे। सब कालेज स्कूल आफिस बंद होगे रहिस हे।


रेखा ये बात बर खुश रहिस हे के पूरा परिवार घर म हावंय। रघु ह सालों बाद घर म हावय रेखा के पति रघु कालेज म प्रोफेसर हावय। रेखा घलो स्कूल म शिक्षिका हावय। रेखा के एक बेटी हावय रंजना। रंजना ह सातवी म पढ़थे। घर के एक कुरिया म ओखर दादा दादी मन रहिथें। दादी तो गृहणी रहिस हे फेर दादा जी ह स्कूल म शिक्षक रहिस हे। पूरा परिवार शिक्षित  रहिन हे। 

अवकाश के बाद ले दादाजी अपन नतनिन रंजना ल पढ़ावय अउ घर के गार्डन के देखरेख करय। ये ओखर शौक रहिस हे। दादी तो पूरा जिनगी घर के काम अउ खाना बनाये म निकाल दिस। रेखा ल बहु बना के लइस त रेखा ह पूरा चौका ल अपन हाथ म ले लिस। रंजना होईस तभो ज्यादा आराम नइ करिस रेखा ह। अपन घर के जिम्मेदारी ल पूरा करत रहिस हे। ओखर बाद स्कूल जाये।

बिहनिया ले रंजना के अउ रघु के टिफिन तइयार करय। सब झन बर रोटी सब्जी बनावय सब ल नाश्ता करा के  सास ससुर बर कुकर  म दार भात तइयार करके रख देवय।

शाम के स्कूल ले आये के बाद तुरंत चौका म सब झन बर चाय अउ सूखा नाश्ता लान के देवय। सास ससुर ल हमेंशा अपन डायनिंग टेबल म संग म बइठार के ही खवइस। गार्डन म पानी डारे के काम सास ससुर के रहिस हे। ऊंखर ओतके तो काम रहिस हे , रंजना ल पढ़ाना, रंजना के संग म बात करना अउ क्यारी के देखभाल करना। रघु के घर म छोटे से गार्डन रहिस हे फेर भाजी ,धनिया, मिर्च घलो हो जावय। छोटे मोटे नार वाले सब्जी घलो हो जाये ये सब दादा दादी के शौक रहिस हे। रघु अपन माता पिता के बहुत ध्यान रखत रहिस हे। ओमन ल पूरा छूट रहिस हे के घर में जेन पहिली ले काम करत  आवत हव ओ सब ल करत राहव। अपन मनोरंजन के साधन म कोई कमी मत करना। 


लॉकडाउन म सब घर म रहिगें तब सबके काम म बदलाव अइस। ये बदलाव ल रंजना महसूस करत रहिस हे। बिहनिया के नाश्ता ल रघु बनाना शुरु कर दिस। रोज नवा नाश्ता खाये बर सबला मिलत रहिस हे। रघु ल देखके ओखर माँ बहुत खुश होवत रहिस हे। जेन रघु कभु पानी नइ निकाल पीयत रहिस हे तेन ह आज नाश्ता बनावत हावय। रोज सब ला अपन परस के नाश्ता देवय। रेखा ह जब काहय मैं ले लुहुं त कंधा ल धर के कुर्सी म बइठावय अउ पहिली कौर ल अपन हाथ म खवावय। घर म हमेंशा प्रेम रहिस हे फेर ये प्यार ल देखके रघु के माँ बाबूजी मन कोरोना ल धन्यवाद देवय। हा हा हा। " बने करेस कोरोना तोर आये ले मोर घर म प्रेम ह टपकत हावय।"


चाय बनाये बर रंजना ल कहे जाये। रंजना ह तो देखत राहय कब मैं चौका म जावंव। काबर के स्कूल के पढ़ाई अउ अपन स्वयं के जल्दी के कारण रेखा ह ओला चौका म नइ जावन देत रहिस हे। आज रंजना अपन पापा संग चौका म जाथे अउ काम म मदद भी करथे। सब नाश्ता करके बाहिर गार्डन म बइठ जथें। अब रघु ह स्वयं पेड़ पौधा म पानी डारथे। अपन बाबू जी ल आराम करे बर कहिथे। माँ बाबू जी रंजना संग गोठियावत रहिथें। माँ ह साग काटे बर दे दे कहिथे रेखा ल त रेखा कहिथे ----

" नहीं माँ तैं चार दिन तो आराम करके बाद म तो तोला भी काटना हे।"

रेखा सब संग गोठियावत साग ल सुधार लेथे। अब रघु आराम से पेपर पढ़थे अउ अपन बाबूजी ल समाचार सुनाथे। आजकल बाबूजी आराम करत हे। 

"कोन पेपर ल पढ़य उही कोरोना म मौत के संख्या बताथे।"

जेन समाचार रघु बताथे तेन म मजाक रहिथे। रघु अपन घर के वातावरण ल बहुत खुशहालीपूर्ण रखे हावय। सब झन थोरिक देर म अपन अपन कुरिया म चल देथें। सब झन नहा के तइयार हो जथें। तब तक रेखा खाना बना के टेबल म रख देथे। रेखा घलो नहा के तइयार हो जथे। माँ बाबू जी थोरिक आराम करे बर लेट जथें। रंजना अपन खेल म लग जथे। सातवी पढ़त लइका ह आज भी गुड्डा गुड़िया खेलथे।

गणित के सवाल हल करथे, कुछ पेंटिंग्स करथे। रंजना बहुत बढ़िया चित्रकारी घलो करत रहिस हे। रंजना जब भी समय मिलय त कुछ न कुछ काम करते राहय। रघु ह टेबल म सब झन बर पानी भर के रखथे अउ थाली कटोरी लाथे।


रेखा के तइयार के होवत ले एक बज जथे। सब झन साथ म खाना खाथें। रघु के मजाक चलते रहिथे।  खाना खा के सब झन आराम करथें। रघु अउ रेखा के फोन आवत रहिथे। रंजना अपन दादी तीर ही सुतथे। दादी ओला अपन समय के गोठ ल बतावत रहिथे। अपन स्कूल के जमाना के बात ल दादी सुनाथे। समय ह तो हाँसत खेलत बीत जथे।


शाम के  फेर रघु चाय बनाथे। सब झन टेबल म आ के बइठ जथें । रेखा नाश्ता बर पूछथे त जब खाये के मन होथे त बनाथे वरना सूखा नाश्ता चलत हे। माँ ह चिंता म आ जथे--" कब तक ये नाश्ता चलही? कब तक ये बंद चलही? कब ये लोगन के मौत ह रुकही? सब कुछ अनिश्चित होगे हावय।  घर के गेट म ताला लगे आज 14 दिन होगे। साग भाजी आना बंद होगे हावय। सब दुकान म सामान के अकाल परगे हावय। अब घर म खाना कइसे चलही"?


ओखर चेहरा ल देख के रघु तीर म आ के बइठ जथे अउ पूछथे----" माँ का होगे? "

"कुछु नहीं बेटा, मैं सोचत हावंव के ये राशन कब तक चलही? साग ह तो आना बंद होगे हावय। बिस्कुट नइये। रंजना अब रोटी खाथे। ये सब कब तक ठीक होही। हमन कब तक घर म बंद रहिबो। बस ,रेल हवाई जहाज सब बंद होगे हावय। आना जाना बंद हे त राशन कहां ले आही।?"

" तैं चिंता मत कर हमन बहुत झन आपस म बात करत रहिथन। सब ठीक हो जही। स्वयं सेवी संस्था हमर मदद करही।"

रात के खाना खाये के बाद सब झन बाहिर म बइठ जथें, तभे एक मनखे स्कूटर म आके एक बोरी आटा दे के जाथे। माँ ल अचरज होथे। ओला देखके रघु कहिथे मोर दोस्त के पहिचान के दूकान आये ऊंहा ले आटा भेजवाये आवय। काली बर अउ राशन आ जही। पइसा दूगना लेवत हावय फेर चिंता नइये। अभी पइसा नहीं जान बचाये के जरुरत हावय। 14 दिन बर फेर लॉकडाउन बाढ़ जथे। ऑनलाइन कुछ साग भाजी मिल जथे। 


जीवन के गाड़ी चलना शुरु हो जथे। अचानक पता चलथे के बुआजी के निधन होगे हावय। कारण कोरोना रहिस हे। ओखर परिवार म दो बेटा बहु, चार नाती सबो झन ल कोरोना हे। सब अस्पताल म हावंय। बुआजी के निधन ले बाबू जी बहुत दुखी हो जथे। माँ तो सिसक सिसक के रोना शुरु कर देथे काबर के दूनों झन सहेली असन रहिन हें। सुख दुख के साथी। फेर अतेक बड़ दुख म कोई साथ नइये।

अंतिम संस्कार नगर निगम वाले मन करिन। कोई नइ गीस। ओखर बारे म बेटा मन ल नइ बताये गे रहिस हे। दूसर दिन खबर आथे के बड़े बेटा गुजर गे। अब तो सदमा अउ गहिर होगे। एक बाप अपन बेटा के मरे के खबर सुनत हावय कइसे लगिस होही। बाबूजी तो जइसे पथरा बरोबर होगे। दू दिन म दू मनखे चल दिस बाप के दिल म कइसे गुजरिस होही। 


दूसर दिन रघु ह अपन माँ बाबूजी ल खुश रखे के कोशिश करत रहिस हे। दिनचर्या तो उही रहिस हे फेर घर म खुशी गायब रहिस हे। रंजना ही ऐती ओती चहकत रहिस हे। अचानक ऱचना ल एक चिड़िया तिनका उठाये दिख जथे। रंजना ह अपन दादी ल कहिथे -

"दादी देख तो ये गौरय्या कोनो मेर घोसला बनावत हावय। सब डाहर परेशानी हावय फेर पक्षी मन बहुत खुश हावंय।"

दादी कहिथे --" हाँ पूरा हवा साफ होगे हावय। गाड़ी मोटर के आवाज नइ आवत हे। तब तो पक्षी मन खुश होबे करहीं। कतेक चहकत हावय। अइसे लगथे के ये ह सामान कुरिया के रोशनदान म घोसला बनावत हावय। बसंत ऋतु आने वाला हे त ये मन अंडा दिहीं तभे घोसला बनावत हावंय। रंजना जाके देखथे तो सही म स्टोर रुम के रोशनदान म आधा ले ज्यादा घोसला बनगे रहिथे। दादी कहिथे --" चलो जीवन जावत हे त जीवन आवत भी हे। बहुत खुशी के बात आये।" दादा जी के चेहरा में भी खुशी दिखथे। 


रघु कहिथे --" बाबू जी आप अतेक मत सोचव ये तो फैलने वाला रोग आये। पूरा विश्व ल अपन बाहीं म जकड़ लेय हावय। अभी तो सब ल अपन जान बचाना हे। विदेश म फसे हमर देश के मन कइसे आहीं ये सोचना हे। लाखो मनखे अपन राज ले दूसर राज म कमाये खाये बर गे हावंय तेखर मन बर भी सोचना हे।"

" सही काहत हस बेटा " 

" अब रोज टी वी म भजन आथे तेन ल सुने करव।सबके जीवन बर प्रार्थना करव। अउ अपन जीवन ल खुश रखव।कहिथें न मनखे बीमारी ले नहीं डर म ज्यादा मरथें। हम सब ल एक दिन जाना हे। कोई आज जाही त कोई कल। सब बर बराबर के भावना रखव। आज पूरा विश्व परिवार बनगे हावय। आज अपन बर सोचे के समय नोहय।"


रोज रात के अब पूरा परिवार संग म बइठ के ताश खेलथें। 

एक दिन तो दादी अपन शादी के किस्सा सुनाथेक्षत  रंजना ह अचरज ले अपन दादी ल देखथे। दादी के बिहाव होये रहिस हे त गाँव के कुँआ म शक्कर डाल के शरबत बनाये गीस। उही ल गाँव भर बांटे गीस। ये अचरज भरे तो रहिस हे साथ ही अतेक बराती रहिन हे के आस पास के गाँव म रुके के व्यवस्था करे गे रहिस हे। हाथी में भी बरात आये रहिन हे। पहिली तो घोड़ा म बरात जाबे करत रहिन हें। पहिली बारात एक रात रुकत भी रहिस हे। दो बार के नाश्ता दो बार के खाना खिलाये जाये। कोई भी घर के बराती पूरा गाँव के बराती राहंय। सब झन सेवा करंय।


ये सब बात ल सुनके  रंजना तो सन्न रहिगे अउ बोलथे---

"अतेक खाना खिलावत रहिन हे। फेर रूके के भी व्यवस्था राहय। पहिली बहुत पइसा रहिस हे का दादी?"

दादा दादी हाँसे ले लग जथें। दादा जी कहिथे " अरे बेटा सब दिल से मदद करंय। पइसा भी राहय। सस्ता के जमाना रहिस हे।"


रघु कहिथे -" देख रंजना अब लॉकडाउन तक हमन रोज दादा दादी के जमाना के गोठ ल सुनबो। कहिनी असन लगही भी अउ हमन ल आज समय मिले हावय त ओ जमाना ल जानन तो।"


रेखा कहिथे --" सही बात आये ये लॉकडाउन अउ कोरोना के दहशत ले बाहिर ही रहना हे त हमन ल अपन आप में ही खुश रहना जरुरी हे। मोबाइल, समाचार, अखबार ले दूरिहा रहिके अपन परिवार के साथ घर म बंद राहन तभे ठीक हे। सुरक्षित रहिबो अउ मन भी ठीक रहिही।"


रंजना कहिथे -" मैं तो कभी भी सबके संग नइ रहेंव। सब अपन अपन काम म लगे राहत रहेव। आज पापा ल देख के बहुत अच्छा लगथे के ओ ह माँ के मदद करथे। पूरा दिन माँ घर के काम फेर बाहर के काम कर कर के थक गे रहिस हे अब ओला भी आराम मिलत हावय।"


दादी कहिथे " हाँ बेटा हमन तो नौकरी नइ करे रहेन त सब काम ल करके आराम भी कर लेवन। आज तो रेखा ल आराम ही नइ मिलय। पइसा कमाये के नाव म  सब दऊड़त रहिथे।  घर म सालों बाद सब झन हावन। एक दूसर के काम करत हन। हँसी मजाक करत हन सब बने लागत हे फेर दुनिया आज कहाँ चल दिस। जहाँ के तहाँ रुक गे हावय। हमन ल कुछ सीखना चाही।"


रघु -" हाँ माँ गुजरात डाहर तो जंगली जानवर मन शहर डाहर घूमे बर आ गे रहिन है। नदी साफ दिखत हे। पक्षी मन खुश हावंय,आकाश साफ हे।  हाँ माँ मोला भी घर के काम करके बहुत अच्छा लगत हे। आज मोला रेखा के तकलीफ के पता चलिस। अब हमन सब झन मिलके काम करबो।"

लॉकडाउन बढ़ते गीस। सामान के कालाबजारी घलो चलिस फेर मदद करने वाला मन के कमी नइ रहिस हे।

मनोरंजन बर पुलिस वाला मन भी गाना गावत रहिन हे।  काम अउ पढ़ाई लिखाई सब ऑनलाइन चले ले लगगे। रंजना आठवीं म आगे। बाहर पढ़ने वाला ,नौकरी करने वाला मन फंसे रहिगें। बहुत झन मन घर वापस आगे रहिन हें।

एक साल तक रंजना ल अपन माँ ,पापा, दादा, दादी के मया दुलार मिलिस। काम कइसे करथें तेनों ल देखिस। प्रकृति ल बहुत तीर ले देखिस। अपन दादा दादी ले साठ बछर पहिली ले गाँव के बारे म जानिस। सबले बड़े बात अपन पापा ल काम करत देखिस, माँ के मदद करत देखत रहिस हे।


रेखा के जीवन म बदलाव अइस। बिहाव के बाद ही नौकरी लग गे रहिस हे। तब ले ओ ह घर अउ सास ससुर ल अइसे अपना लिस के सब के काम ल स्वयं करे ले लगगे। रंजना होइस तब सास ओला रखत रहिस हे। फेर लइका ल छोड़ के जाना भी तो पीड़ादायक रहिस हे। ये सब के संग समझौता करत चलत रहिस हे। रघु तो अइसे के कालेज से आतिस त पानी भी ओला लाके देय बर परय। रेखा नइ रहितिस त ओखर माँ ह पानी देतिस। रेखा बर तो जीवन म पहिली बार अतेक खुशी आये रहिस हे। पति नाश्ता बनावत हावय त कभू सब्जी बनावत हावय। रोज रोज के आपाधापी ले रेखा ल राहत मिलत रहिस हे। कोरोना तो अपन रंग देखावत रहिस हे, बहुत परिवार दुख झेलत रहिन हें। ये सब दुख के बीच में भी प्यार बरसत रहिस हे। रेखा बहुत खुश रहिस हे। रेखा सरिख अउ परिवार भी खुश होही ।

आज रंजना घलो बहुत खुश हे। रंजना ह मोबाइल ले देख के केक बनाये हावय।

रंजना " दादी आओ, पापा आओ, माँ अउ दादा जी आओ आज हमन केक काटबो। "

रघु -" आज मोर बेटी केक बनाये हे। कोन खुशी म केक काटबो रंजना?"

"लॉकडाउन के खुशी म "

लॉकडाउन खुशी कइसे हो सकथे। सब तो घर म बंद हे, काम धंधा बंद हे।"

रंजना अपन पापा के गला से लग जथे अउ कहिथे " हम सब साथ साथ हावन। मैं बचपन से सबला अलग अलग देखत रहेंव। दादा दादी भी बहुत खुश हावंय। मम्मी भी बहुत खुश हावय। तैं अब माँ के काम म मदद करथस न पापा। अब सब झन बहुत प्रेम से एक साथ राहत हन। कोरोना के कारण ही न? कोरोना के कारण ही लॉकडाउन होये हावय अउ हमन सब ओखरे कारण से एक संग हावन।"

रंजना के बात सुनके रघु अउ रेखा के आँख म आँसू आ जथे। सब झन मिलके केक काटथें अउ हंसी खुशी के संग केक खाथें। 

सुधा वर्मा।


समीक्षा

पोखनलाल जायसवाल

: वैज्ञानिक शोध अतेक आगू बढ़ गे हावय कि सबो असंभव ह संभव लागे लगथे। तइहा के बात ल बइहा लेगे। यहू सिरतोन लागथे। फेर कभू कभू बबा पुरखा मन के उदिम अउ अउ उपाय ह हम ल नवा रस्ता देथे। अउ कहे बर परथे कि हमर पुरखा मन निच्चट अप्पढ़ नी रहे हे। पढ़े भले नइ रहिन हें फेर कढ़े रहिन हे। आज जब कोरोना ले बाँचे म वैज्ञानिक अउ डॉक्टर मन सोशल डिस्टेंसिंग के गोठ करथे, घेरी भेरी हाथ धोय के उदिम करे बर कहिथे, त लगथे हमर पुरखा मन के तइहा के गोठ अभियो प्रासंगिक हे। सुरता करन जब धूकी बेमारी के आय ले बचे के उन मन जेन उदिम करत रहिन। आज उँकर वो उदिम सोला आना सार्थक हे।  लॉकडाउन भले आज के नवा शब्द आय जउन  कोरोना के आय ले लोगन जाने सुने अउ का होथे एकर अनभो कर डरिन। फेर एहर तभो रेहे हे, जब बबा पुरखा मन ...।

       लोगन विकास के घोड़ा म सवार होके कति कोति जात हे। खुदे नइ सोचत हे। बस पइसा अउ बंगला गाड़ी के सपना ल पाले आगू बढ़त रहिस। मया परेम ल मुरसरिया म रख सुख दुख ल गोठिया के फुरसत घलव नइ दिखत रहिस। सिरिफ पइसा.. पइसा  अउ..पइसा दनजर आवत रहिस। फेर वाह रे कोरोना सबो के चेत हर लेस। सब ल मया परेम के बंधान कोति ढकेल देस। जिनगी के महत्तम सिखा देस। पइसा के पाछू भगइया दउड़इया मन ल घलव बता देस कि पइसा कुढ़ोय ले जिनगी नइ मिल पावय। पइसा के रेहे ले जिनगी बचाय जा सकत हे ए भरम ह टूट गे। सिरतोन जिनगी पानी के फोटका आय, फेर साबित होगे।साँस बर हवा बिसाय ल परही कोन सोचे रहिन हे। फेर यहू बात बर अभी के बेरा ह सोचे बर मजबूर कर दिस। 

      कोरोना काल के बेरा म जिनगी म कइसन बदलाव आय हे, इही सब के लेखा जोखा रखत सुग्घर कहानी हे रेखा के लॉकडाउन।

      आज जब नवा पीढ़ी ह हम दू अउ हमर दू के परिधि म सिमटत दिखत हे, उहाँ रेखा जइसन चरित्र ह समाज ल नवा दिशा दे म अपन अमिट छाप छोड़ही, अइसे कहे जा सकत हे। पढ़े लिखे अउ नउकरी पेशा नारी म ए समस्या जादा करके देखे म आथे। अइसन म रेखा आदर्श बहू के रूप म घर परिवार ल जोरे रखे म सफल हे।

     समय परिवर्तन ल धर के चलथे। परिवर्तन प्रकृति के नियम आय। शायद इही परिवर्तन ल लेके आय हे कोरोना काल ह। अउ वो परिवर्तन आय लोगन के मन म घर परिवार बर समय निकाले अउ सुख दुख ल लेके बइठ गोठियाय के। 

      ए कहानी अपन बेरा  के आरो देवत सबो किसम के रपट ल समोय हे। संवाद अउ भाषा  चरित्र मन के मुताबिक हे। भाषा म प्रवाह हे।

 "चलो जीवन जावत हे त जीवन आवत भी हे। बहुत खुशी के बात आय।" ...दादी के अइसन संवाद ह बिपत के घड़ी म जिनगी म नवा आशा अउ सकारात्मक सोच के संचार करही। कहे जाय त कोनो अबिरथा नइ होही। मोर मन ल  छत्तीसगढ़ी शब्द के रहिते हिंदी के शब्द बउरई ह थोकन खटकिस हे। प्रसंग के मुताबिक अँग्रेजी के शब्द मन ल जगा दे गेहे। जेकर ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के लालित्य बढ़ही। छत्तीसगढ़ी के शब्द कोष म बढ़ोतरी होही। 

     कहानी के कथानक अउ देशकाल लॉकडाउन के ऊपर हे। जउन ह कहानी बर नवा विषय आय। लॉकडाउन के बेरा म घर परिवार के बीच लाखों मनखे के  किस्सा रेखा जइसन रेहे होही। रेखा तो कहानीकार सुधा दीदी के गढ़े पात्र आय। जउन हमर तिर के हो सकत हे। शीर्षक घलव सार्थक हे। 

      सुग्घर कहानी बर सुधा दीदी ल बधाई देवत हँव।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी