Tuesday, 8 February 2022

सोनाखान के सपूत-वीर नारायण सिंह

 सोनाखान के सपूत-वीर नारायण सिंह



छत्तीसगढ़ के पहली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गरीब मन के सुनैईया,जब्बर देशभक्त,माटी के लाज रखईया,साहसी,वीर अउ न जाने कतको नाम ले जनईया सोनाखान के चमकत हीरा वीर नारायण सिंह हमर राज बर कोनो पहिचान के जरूरत नई हे। अपन मातृभूमि बर जेन-जेन काम करिस,अपन जनता के सेवा करे के सबो उदिम करिस अउ जीवन घलो वार दिन। अइसन सपूत बेटा ल पाके माता-पिता,गांव,समाज देश ह घलो धन्य हो जाथे। अइसन वीर पुरूष मन के नाम-शोर चंदा-सुरूज के रहत ले जगमगात रही।


पोठ जमींदार--

वीर नारायण सिंह मन सोनाखान के जमीदार बिंझवार राजपूत रिहिन। इंकर पुरखा मन  पिता रामराय अउ बबा रामराजे हर जमीदारी शुरू ले करत रिहिन। 35 साल के उमर म अपन पिताजी रामराय के बीते के पीछू 1830 में जमीदारी के भार संभाले के शुरुआत करिन। अंग्रेज मन सोनाखान के जमीदारी ले अब्बड़ चिढे अउ इरशा भाव रखे रहय,काबर के इहा ले कोई कर ओमन ल नई मिले। 303 रुपये 12 आने के राजस्व हर साल जमा होय। फेर कोई भी टकोली कर के नाम म अंग्रेज मन ल फूटे कौड़ी नई मिले। सोनाखान में बिंझवार वंश के लगभग चार सौ साल ले जमीदारी चलत रिहिस। मने सोनाखान पक्का पोठ अउ परतिस्थित जमीदारी रिहिस।


कलचुरी राजा ले इनामी--

इंकर जमीदारी कलचुरी मन के बिलासपुर शाखा के अंतर्गत आय। ये जमीदारी रतनपुर के कलचुरी राजा बाहरसाय  ले वीर नारायण के पूर्वज मन ल उँकर सैनिक सेवा के इनाम के रूप म करमुक्त जागीर के रूप म दे गे रिहिस। मने सोनाखान सैनिक शासन के अंर्तगत रिहिस। ते पाय से अंग्रेज मन ल कोई कर वसूल करत नई बने। त अंग्रेज मन अब्बड़ दुश्मनी रखे रहय। इलियट सोनाखान के प्रति शोषण के भाव रखे अउ इहाँ अंग्रेजी कोषालय ल कहि नई देके फैसला करे रहय।


वीर के पदवी--

सत्रहवीं सदी म सोनाखान जमीदारी के स्थापना होइन,इंकर पूर्वज मन पहली सारंगढ़ के जमींदार के वंशज रिहिन। पहली सोनाखान के नाम सिघगढ़ होत रिहिस। क़ुररूपाट डोंगरी में नारायण सिंह के वीरगाथा घलो दफन हे, ओकर कर एक ठन स्वामिभक्त घोड़ा रहय जेमे सवार होके अपन राज के शोर-खबर लेय। एक दिन पता चलिस की सोनाखान के तीर म एक ठन नरभक्षी सेर आतंक मचावत हे, फेर तो परजा के सेवा बर आघु रहैया वीर तुरते अपन तलवार निकालिस अउ सेर के जगह म जाके मार डारिस। ओकर बहादुरी के सेती ब्रिटिश सरकार ह वीर के पदवी ले सम्मानित करिस।


परजा के लोकप्रिय--

वीर नारायण सिंह ल जनहित के काम म रुचि रहय,ये कारण अपन परजा म लोकप्रिय नंगत के रहय। एक बार 1856 मे येही सेत्र म अब्बड़ के अकाल पड़ गे, आदमी मन दाना-दाना बर तरसे लगिस। अरजी-विनती ले काम नई बनिस त जम्मो किसान भाई मन ल संग म लेके कसडोल के अनाज बेपारी माखन के अनाज गोदाम ल लूट के भुखाय परजा में बांट दिस। ये काम के सूचना रायपुर के डिप्टी कमिश्नर चाल्स इलियट ल दिन फेर ये काम ल कानून विरोधी मानके गिरफ्तारी के वारंट दे दिस। अपन जनता के दयनीय दशा अउ शासन के कमजोर काम के कारण नारायण सिंह ल अइसन कदम मानवता बर उठाय रिहिस। एमे कोई गुनाह के बात नई हे। पर अत्याचारी अंग्रेज मन ल दया,धर्म,मानवता ले का करना हे। रायपुर ले कटक तक सबो अधिकारी मन ल नारायण सिंह ल पकड़ ल लाय बर भेज दिस। उँकर घर म एक सैनिक के टुकड़ी भेजिस अउ 24 अकटुबर सन 1856 के सोनाखान म अब्बड़ परेशानी करत सेर वीर नारायण सिंह ल बंदी बनाके रायपुर लाइन अउ लूटपाट, डकैती के आरोप लगाके रायपुर जेल म डाल दे गिन। पर चोट खाय बघवा ल  पिंजरा मन रहवई पसंद नई आय।


छ.ग. में क्रांति--

इहि समे 1857 के क्रांति के आगी छत्तीसगढ़ तक पहुँचीस। वीर पुरूष के वीरता उफान मारे लगिस अउ 10 महीना 4 दिन के बाद वीर नारायण सिंह जेल ले भाग गे। अपन सोनाखान पहुचे के बाद 500 सैनिक मन के सेना तैयार करिस। येति लेफ्टिनेंट नेपियर अउ लेफ्टिनेंट स्मिथ सेना लेके खोजे बर निकलिस,देवरी के जमीदार नारायण सिंह के कका खानदानी शत्रु रिहिस वोहा अंग्रेज मन ल साथ दिस,अउ भटगांव, बिलाईगढ़ के जमींदार मन घलो इंकर सहयोग कर दिन। सोनाखान के तीर नरवा कर चारो मुड़ा घमासान लड़ई मात गे,पहली तो अंग्रेज मन के दम भर हो गे। फेर हर बार के सही यहु दारी हमर बीच के मन अंग्रेज मन के साथ देके वीर नारायण सिंह के सेना ल कमजोर करे लगिन। पर वीर ह हार नई मानिस, दुनो दहन ले गोली चले परिस। लड़त-लड़त पहाड़ी तीर मेर अंग्रेजी सेना मन वीर नारायण सिंह के सेना ल घेर डारिन। अब बहादुर नारायण पकड़ म आगे। फेर उही जेल म डाल दिन, देशद्रोह के मुकदमा दायर करिन। स्मिथ अपन रिपोर्ट में लिखिस- नारायण सिंह ल क्षमा दान देना सबसे बड़े अपराध होही।


बलिदान दिवस--

छत्तीसगढ़ डिविजनल रिकार्ड्स पत्र क्रमांक 286, दिनांक 10 दिसम्बर 1857 ई. के अनुसार- नारायण सिंह ल 10 दिसम्बर 1857 के फांसी के सजा दे गिस अउ डिप्टी कमिश्नर ह सोनाखान के जमीदारी ल खालसा ताल्लुक म बदले के अनुमति दिस। नारायण सिंह ल सजा वर्तमान रायपुर के जयस्तंभ चौक म तोप ले उड़ा के दिस। ये बात के जानकारी सबो डहन फैल गे कि सोनाखान के रण केशरी, छत्तीसगढ़ माटी के सच्चा सपूत,निर्भीक, स्वाभिमानी, प्रजाप्रिय,देशभक्त जमीदार नारायण सिंह 10 दिसम्बर 1857 के शहीद हो गे। बैरी अंग्रेज स्मिथ घलो लिखे हे--वीर नारायण सिंह ल उत्कट शौर्य,साहस अउ उत्साह के साथ हमर मन संग गोरिल्ला पद्धति ले मुकाबला करिस।


डाक टिकट--

वीर नारायण सिंह के याद अउ सम्मान म सरकार ह पीछू सन 1987 म डाक टिकट घलो जारी करिन।


पुरुस्कार--

छत्तीसगढ़ सरकार के आदिम जाति कल्याण विभाग ह उँकर याद म पुरुस्कार के स्टापना करे हे। राज्य के अनुसूचित जनजातियों में सामाजिक चेतना जागृत करे बर अउ उत्थान के क्षेत्र म बढ़िया काम करईया आदमी निहिते स्वैच्छिक संस्था मन ल 2 लाख रुपये नकद राशि अउ प्रशस्ति पत्र देके परावधान हावे हे।


वीर नारायण सिंह के वीरता के शोर जन-जन म आज फैले हे। नारायण सिंह के नाम सुनते साठ मन म एक वीर भाव,अउ पहलवान जइसे जोश के जन्म हो जथे। उँकर नाम आज सबो राज्य के मन बड़े गरब के साथ लेथे अउ श्रद्धा ले सिर झुक जथे। अइसन वीर रिहिन जेकर वीरता,बहादुरी, साहस,के बैरी मब घलो तारीफ करथे। धरती अउ आकाश के रहत ले वीर नारायण सिंह के नाम सुकवा के अंजोर जइसे चमकत रही।



                         हेमलाल सहारे

                       मोहगांव(छुरिया)

आजादी के लड़ाई मा छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद -वीर गेंद सिंह

 आजादी के लड़ाई मा छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद -वीर गेंद सिंह 


हमर छत्तीसगढ़ मा बस्तर क्षेत्र के आदिवासी संस्कृति के कारण एक अलग पहिचान हे. बिक्कट जंगल- पहाड़ ले घिरे बस्तर संभाग हा पहिली एक स्वतंत्र राज्य रीहिस हे जेकर राजधानी जगदलपुर राहय. 

  बस्तर राज्य मा कई ठक छोटे- छोटे जमींदारी रिहिस हे. इही मा एक ठक जमींदारी रिहिस हे परलकोट अउ परलकोट के जमींदार कहलाय - भूमिया राजा. 

भूमि माने धरती ,जमीन, भुइयाँ. 

भूमिया राजा मन के गिनती सप्त माड़िया राजा मन के प्रमुख राजा के रुप मा होय. 

  उन्नीसवीं शताब्दी के शुरु मा बस्तर मा एक कोति मराठा मन घेरी -बेरी आक्रमण करत रीहिस हे ता दूसर कोति अंग्रेज मन हा अपन कूटनीतिक तिकड़म ले बस्तर ला अपन कब्जा मा लेके काम चालू कर दे रीहिस हे. बस्तर उपर मराठा अउ अंग्रेज मन के शोषण हा सिर ले उपर जात रीहिस हे. बस्तर के जनता मन उपर तरह -तरह के कर (टैक्स) लगाय के चालू कर दिस .  येहा आदिवासी मन बर दूब्बर बर दू आसाड़ जइसे होगे. सँगे- सँग जल- जंगल-जमीन ले जुड़े आदिवासी मन के संस्कृति ला घलो खतरा होगे. काबर कि इही जल- जंगल -जमीन हा उंकर रोजी -रोटी के साधन रीहिस हे अउ अभो घलो हे. 


   आदिवासी मन के नैतिक, आर्थिक अउ सामाजिक शोषण हा दिनों दिन बाढ़त गिस. अइसन स्थिति मा बस्तरिया मन हा मराठा अउ अंग्रेज मन ले बदला लेय बर ठानिस. अउ इतिहास गवाह हे कि अब्बड़ सीधा सादा, अपन संस्कृति मा जियइया- रमइया आदिवासी मन ला जब -जब छेड़े गे हवय तब -तब अपन हक अउ  संस्कृति के रक्षा खातिर अपन जान के बाजी लगा दिस हे. बइरी मन ला अपन बीरता के दर्शन कराय हे. समय समय मा बइरी मन ला मार- कांट के हलाकान करे हवय. 

 अउ अइसने होइस 1824 मा एक क्रातिकारी घटना 

जेहा इतिहास मा दर्ज हो गे हवय.


  वो समय मा परलकोट के जमींदार रीहिस हे गेंद सिंह. वोहर 

अब्बड़ बहादुर, बुद्धिमान, न्याय प्रिय अउ दूरदर्शी जमींदार रीहिस हे. वोकर इच्छा राहय कि वोकर जमींदारी मा सबो प्रजा सुखी अउ 

संतुष्ट राहय. जनता के कोनो प्रकार ले शोषण झन होय. पर उंकर ये कारज मा अंग्रेज के पिट्ठू बने व्यापारी , उंकर कर्मचारी अउ मराठा शासक मन बाधक बनत रीहिस हे.तब गेंद सिंह हा बस्तर ले अंग्रेज मन ल खदेड़े खातिर आदिवासी मन ला संगठित करे के काम करिस. 

    गेंद सिंह के अगुवाई मा 24 दिसंबर 1824 मा अबूझमाड़ मा एक बड़का सभा के आयोजन होइस. गाँव -गाँव मा धावड़ा रूख के टहनी भेज के गोरा मन ले लड़े बर तइयारी करे के खबर पठोय गिस कि पत्ता मन के सूखे ले पहिली विद्रोह ठउर मा पहुंच जाहू. 

बस्तर के आदिवासी मन हा स्वभाव ले गजब सीधा -सरल होथे पर जब अत्याचार हा बाढ़ जाथे ता ये भोला भाला वनवासी मन खूंखार होके बइरी मन के खून ले होली खेले बर नइ छोडयँ. अइसने होइस 4 जनवरी 1825 मा जब हजारों आदिवासी मन अस्त्र -शस्त्र लेके परलकोट मा इकट्ठा होइस. इही दिन ले गोरा मन के विरुद्ध विद्रोह शुरु होगे जेहा सरलग पंद्रह दिन तक चलिस. 

     सीधा सरल आदिवासी अपन शान्त स्वभाव ला छोड़ के मारे अउ मरे बर कूद गे. ब्रिटिश खजाना ला लूट के विद्रोह के शुरुवात होइस. अंग्रेज अधिकारी अउ कर्मचारी मन ला पकड़ -पकड़ के पीटिस अउ कतको के जान ले डरिस. सरकारी भवन मा आग लगाय के काम करिस. अत्याचार करइया व्यापारी मन के गोदाम अउ दुकान ला लूटिस. अलग -अलग समूह मा बंट के आदिवासी वीर विद्रोही मन के अगुवाई करत रीहिस हे. 


     ये विद्रोह ले डर्रा के अंग्रेज अफसर एगन्यू हा अपन अधिकारी मन के बैठक रखिस. विद्रोह ल कूचले बर योजना बनाइस. चांदा के पुलिस अधीक्षक कैप्टन पेबे हा आदिवासी मन के विद्रोह ला कूचले बर सामने आइस. 

  कैप्टन पेबे हा अपन भारी सैनिक ला लेके परलकोट मा धावा बोलिस. आदिवासी अउ ब्रिटिश सेना मा नंगत के लड़ाई चलिस. आदिवासी मन हा अपन धनुष -बाण ले तीर के बौछार करत अंग्रेज सेना ले लड़िस. अपन पूरा शक्ति लगा दिस पर आधुनिक शस्त्रों, 

अंग्रेज मन के बंदूक के सामने कब तक टिकतिस. 

     20 जनवरी 1825 मा विद्रोह के अगुवाई करइया नेता व परलकोट के जमींदार गेंद सिंह ला अंग्रेज सेैनिक मन गिरफ्तार कर लिस. ओखरे महल के सामने कैप्टर पेबे के आदेश मा वोला फांसी के फंदा मा लटका दिस. 

   अपन मातृभूमि अउ स्वभिमान बर लड़इया वीर शहीद गेंद सिंह छत्तीसगढ़ के तरफ ले स्वतंत्रता के लड़ाई मा शहीद होवइया मा सबले पहिली बलिदानी (शहीद) माने जाथे. ये विद्रोह ले गोरा मन के विरुद्ध अंदर- अंदर चिंगारी फूटे ला लागिस अउ आगू चल के 1857 मा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शंखनाद होइस. 

  अपन मातृभूमि खातिर अपन परान गंवइया छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर गेंद सिंह ला शत् शत् नमन हे. 


          ओमप्रकाश साहू" अंकुर "


          सुरगी, राजनांदगांव

क्रांतिकारी वीर, छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे, ठाकुर हनुमान सिंह* -------------------------------------

 *क्रांतिकारी वीर, छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे, ठाकुर हनुमान सिंह*

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क्रांतिकारी कहे म उन देशभक्त वीर मन के छवि, मानस पटल म उभरे ल धर लेथे जे मन भारत माता के परतंत्रता के बेड़ी ल काटे बर अत्याचारी ब्रिटिश हुकूमत संग अपन जान के बाजी लगाके, मूँड़ म कफन बाँध के लड़िन। क्रांतिकारी मन के सीधा सिद्धांत रहिस--''जिन्ह मोहि मारा,ते मैं मारे"।ईंट के जवाब पत्थर ले देना चाही--इँकर मूल मंत्र रहिसे। अत्याचारी मन के निर्मम हिंसा के जवाब,हिंसा ले देये म इन पीछे नइ हटत रहिन हे। ब्रिटिश शासन के अत्याचारी गोरा मन ल रद्दा ले हटा के ,आजादी के मारग ल इन चतवारना चाहत रहिन हें।धन्य हें ये क्रांतिकारी मन।

        हमर देश म आजादी के लड़ाई जेकर से जइसे बन परिस तइसे--कई मोर्चा म लड़े गिस। ये लड़ाई म पढ़ईया लइका, सरकारी नौकरी करइया, वकील, किसान, गृहणी, साहित्यकार, राजनैतिक दल, क्रांतिकारी युवा अउ अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिक मन के अनमोल योगदान रहिसे।

     छत्तीसगढ़ महतारी के भुँइया म तको आजादी के लड़ाई के कतकोन इतिहास भरे हे। सन् 1857 के गदर ल प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भले कहे जाथे फेर इहाँ के आदिवासी मन अलग-अलग कारण ले एकर पहिलीच ले ब्रिटिश हुकुमत ले विद्रोह करके अपन प्राण न्योछावर करें हें।

      इही क्रांतिकारी मन में एक झन सोनाखान के शेर सपूत छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह रहिसे। जब वोला पकड़के 10 दिसम्बर 1857 के रायपुर (वर्तमान जय स्तंभ चौक ) म अंग्रेजी शासन ह सरे आम फाँसी दे दिस त सरु छत्तीसगढ़िया मन के आत्मा खउलगे। जगा-जगा विरोध होइस।चारों कोती अशांति फइलगे।ये विरोध के आगी ल लेफ्टिनेंट स्मिथ के फौज ह बंदूक के नोक म लटपट म बुझाइस फेर चिंगारी तो  दहकते रइगे--भारतीय सिपाही मन के छाती म।

        इही म रायपुर के अंग्रेजी हुकुमत के सैनिक छावनी के बहादुर सिपाही ठाकुर हनुमान सिंह के छाती के चिंगारी ह धधकत दावानल बनगे।जब ले वो सुने रहिस के क्रांतिकारी ,गरीब मन के हितवा जमींदार वीर नारायण सिंह ल फाँसी दे दे गेहे ,तब ले वो व्याकुल होगे रहिस।वोकर हिरदे अँग्रेज मन बर नफरत अउ गुस्सा ले भरगे रहिस।वो ह दाँव खोजत रहिस के कब लेफ्टिनेंट जनरल स्मिथ जेन ह वीर नारायण ल पकड़ के लाये रहिस अउ वोकर अंग्रेज आफीसर मन ल काट के कुढ़ो दवँ। वो ह मौका के तलाश म रहिस।

    कहिथे न - ' चहाँ चाह है वहाँ राह है '।  हनुमान सिंह ल वीर नारायण सिंह के फाँसी के 40 दिन पाछू वो अवसर मिलगे। साँझ के गहिरावत अँधियार म 18 जनवरी 1858 के उही लगभग 7:30 बजे तलवार धरे लेफ्टिनेंट  सार्जेट मेजर सिडवेल के बंगला म धावा बोल के वोला कुटी-कुटी काट के कुढ़ो दिस तहाँ ले खून म सनाये तलवार ल लहरावत शस्त्रागार कोती दउँड़गे। उहाँ जाके सैनिक मन ले विद्रोह बर पुकार करिस, देखते देखत 17 झन आजादी के परवाना सैनिक जिंकर नाम--शिवनारायण(गोलची), पन्नालाल (सिपाही), मतादीन(सिपाही), ठाकुर सिंह(सिपाही), बल्ली दुबे(सिपाही), ल ल्ला सिंह(सिपाही), बुद्धु सिंह (सिपाही),परमानंद(सिपाही),शोभाराम (सिपाही), गाजी खान(हवलदार),अब्दुल हयात(गोलची), मल्लू(गोलची), दुर्गा प्रसाद(सिपाही),नजर मोहम्मद(सिपाही), देवीदास(सिपाही)अउ जय गोविंद(सिपाही) मन भारत माता के जै बोलावत दउँड़ के आगें तहाँ ले जम्मों झन बंदूक अउ कारतूस मन ला अपन कब्जा म कर लिन।अगर कहूँ अँगरेजी फौज के जम्मों भारतीय सिपाही आ जतिन त छत्तीसगढ़ ले उही दिन अँग्रेज मन के नामो निशान मिट जतिस फेर कुछ डरपोकना अउ घुचपुचिया मन गोरा मन के पाछू म जाके लुकागें।

       इही बीच सिंडवेल के हत्या अउ सैनिक विद्रोह के खबर पूरा छावनी म फइलगे।लेफ्टिनेंट रैवट अउ लेफ्टिनेंट सी० एच०एच० लूसी ह अपन सैनिक मन संग विद्रोही सैनिक मन ल घेर लिस।लगभग छै छंटा ले मुकाबला होइस। विद्रोही मन के गोली सिरागे, बंदूक के मुँह बंद होगे तहाँ ले अंग्रेज मन सबो विद्रोही क्रांतिकारी सैनिक मन ल पकड़लिन फेर वोमा वीर हनुमान सिंह नइ रहिस।वो तो अंग्रेजी फौज के चंगुल के बोचक के कती गिस तेकर पता कोनो ल नइ चलिस।

     पकड़ाये सबो 17 क्रांतिकारी सैनिक मन उपर झटपट मुकदमा चलाके रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट के आर्डर ले सैनिक छावनी (वर्तमान पुलिस लाइन मैदान रायपुर) म 22 जनवरी 1858 के फाँसी म लटका देइन। उपर ले इन अमर शहीद मन के परिवार जन उपर जुल्म ढावत, उँकर सम्पत्ति ल जप्त कर ले गिस।

    वोती ठाकुर हनुमान सिंह ल जिंदा या मुर्दा पकड़े बर 500 रुपिया के इनाम के घोषणा कर दे गेइस फेर  बैसवाड़ा (वर्तमान अवध क्षेत्र, उत्तर प्रदेश) म 1922-23(निश्चित तिथि ज्ञात नइये) म जन्मे 35 साल के गबरू जवान ,राजपूत देशभक्त, मतवाला ठाकुर हनुमान सिंह कभू ककरो हाथ नइ अइच।

अइसे भी बताये जाथे के वो ह 24 जनवरी 1958 के रात म उही अंग्रेज मन के खून के प्यासा तलवार ल धरके कमिश्नर इलियट के बंगला म जिंहा स्मिथ तको सुते रहिस हे, दूनों झन ल काटे बर दीवाल फाँद के कूदे रहिसे फेर पहरादार मन के चिल्लाये ले सब बिरथा होगे अउ वीर हनुमान सिंह ह लहुटगे।वो दिन ले वो कहाँ गिस, कहाँ रहिस, कब अमर लोक गमन करिस---कोनो ल पता नइये।

  धन्य हे भारत के लाल क्रांतिकारी ठाकुर हनुमान सिंह जेला छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे पुकारे जाथे---धन्य हे--धन्य हे----धन्य हे।


जय हिंद। वंदेमातरम।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

सुरता- श्यामलाल चतुर्वेदी जी



 2 फरवरी जयंती म सुरता//

श्यामलाल चतुर्वेदी : मंदरस घोरे कस झरय जेकर बानी ले छत्तीसगढ़ी

    पद्मश्री श्यामलाल चतुर्वेदी जी एक अइसन साहित्यकार रिहिन हें, जेला सरलग सुनतेच रेहे के मन लागय. मोला तो कई पइत अइसनो जनावय के उनला कविता पाठ करत सुने ले जादा एक वक्ता के रूप म सुनत रेहे जाय. अइसन कई बखत अवसर आवय जब उनला मन भर सुनई ह गजब भावय. 

   मोला उनला सबले पहिली देखे अउ सुने के अवसर दिसम्बर 1987 के आखिर म तब मिले रिहिसे जब दाऊ महासिंग चंद्राकर जी के 'सोनहा बिहान' के बैनर म बिलासपुर जिला के एक गाँव म 'लोरिक चंदा' के प्रस्तुति होए रिहिसे. संयोग ले दाऊजी मोला अपन संग उहाँ अपन कार्यक्रम देखाए खातिर लेगे रिहिन हें, अउ आदरणीय चतुर्वेदी जी ल घलो उहीच मंच म सम्मान करे खातिर घलो आमंत्रित करे रिहिन हें. ठउका वोकर पंद्रहीच पहिली छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन 9 दिसम्बर के होए रिहिसे, जेकर पहला अंक ल धर के  मैं वो कार्यक्रम म संघरे रेहेंव अउ आदरणीय चतुर्वेदी जी ल उहीच मंच म सम्मान करत भेंट करे रेंहेंव. 'मयारु माटी' के ए अंक म चतुर्वेदी जी के कहानी 'जंगो के जोमर्दी' ल हमन छापे घल़ो रेहेन. चतुर्वेदी जी घलो तब मोला अपन कविता संकलन 'पर्रा भर लाई' ल भेंट करे रिहिन हें. लोगन के फरमाइश म उन तब अपन सम्मान के आभार प्रकट करत वक्तव्य संग 'बेटी के बिदा' कविता के पाठ घलो करे रिहिन हें.

   बिलासपुर जिला (अब जांजगीर-चांपा) के गाँव कोटमी म 2 फरवरी 1926 के जनमे चतुर्वेदी जी के जिनगी म एक अइसन अद्भुत संयोग घलो आए हे, जब उनला अपन खुद के लिखे कविता ऊपर परीक्षा म जुवाब लिखे बर परे रिहिसे. बिरले लोगन के जिनगी म अइसन संयोग आवत होही. बात सन् 1976 के आय. तब उन एम.ए. (हिन्दी) के परीक्षा म ऐच्छिक विषय के रूप म छत्तीसगढ़ी भाखा के रूप म छत्तीसगढ़ी भाखा के पाठ घलो संघरे रिहिसे. चतुर्वेदी जी तब अकबकागें जब उन देखिन के  उंकर प्रश्न पत्र म उंकरेच कविता के बारे म पूछे गे रिहिसे.

     चतुर्वेदी जी साहित्य अउ पत्रकारिता दूनों के माध्यम ले एक कलमकार के कर्तव्य ल पूरा करिन हें. संगे-संग उन एक निर्विरोध सरपंच के रूप म घलो आदर्श जीवन के गाथा गढ़े हें. सन् 1965 म उन अपन गाँव कोटमी के निर्विरोध सरपंच बने रिहिन हें. तब वो मन गाँव वाले मनला संगठित कर के शराब बंदी, जंगल के संरक्षण, सड़क बनई, कुआँ खनवाए के संग तरिया मन के साफ-सफाई करे के ठोसलग बुता करे रिहिन हें.

     हमन अक्सर सुनथन के आजादी के आन्दोलन के बखत पत्रकार मन के जीवन एक ऋषि तुल्य जीवन राहय. वो मन तब एकेच संग अबड़ अकन भूमिका निभा लेवंय. पत्रकारिता के संगे-संग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक, स्वदेशी अउ स्वावलंबन के उपासक राहंय. चतुर्वेदी जी म घलो ए जम्मो रूप के दर्शन होवय. फेर अब के पत्रकार मन म अइसन दर्शन दुर्लभ होगे हवय. चतुर्वेदी जी नई दुनिया, युगधर्म, हिन्दुस्तान समाचार के संगे-संग छत्तीसगढ़ के अउ कतकों समाचार पत्र मन म सरलग समाचार भेजत राहंय. सन् 1949 ले वोमन पत्रकारिता के श्रीगणेश करिन माखनलाल चतुर्वेदी के कर्मवीर के संवाददाता के रूप म करिन. महाकौशल, लोकमान्य, नवभारत, नवभारत टाइम्स, युगधर्म, जनसत्ता आदि समाचार पत्र मन म प्रतिनिधि के रूप म जन-समस्या मनला उठावत राहंय. सन् 1981 म हिन्दुस्तान समाचार के श्रेष्ठ संवाद लेखन खातिर तब के मुख्यमंत्री द्वारा उनला सम्मानित घलो करे गे रिहिसे. 

   चतुर्वेदी जी के साहित्यिक कृति के रूप म कविता संकलन 'पर्रा भर लाई', कहानी संकलन 'भोलवा भोलाराम बनिस' अउ लघु खण्डकाव्य 'राम-बनवास' उल्लेखनीय हे. छत्तीसगढ़ी संस्कृति मन ऊपर आधारित उंकर विभिन्न विषय के लेख कतकों पत्र-पत्रिका मन म सरलग छपत राहय. आकाशवाणी केन्द्र मनले घलो बेरा-बेरा म उंकर वार्ता सुने बर मिलत राहय. 

   छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सन् 2008 म गठित करे गे 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग'  के प्रथम अध्यक्ष बने के गौरव घलो आदरणीय चतुर्वेदी जी ल मिले हे. 2 अप्रैल 2018 के उनला तत्कालीन राष्ट्रपति जी के हाथ ले पद्मश्री के सम्मान घलो मिलिस. 

   अद्भुत प्रतिभा के धनी अउ सहज-सरल स्वभाव के ऋषि तुल्य जिनगी जीयइया साहित्य पुरोधा ह 7 दिसम्बर 2018 के ए नश्वर देंह ल के त्याग कर परमधाम के रद्दा रेंग दिन.

उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी 🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


छत्तीसगढी ब्यंग---- ===पसरा काॅदा भाजी के====

 छत्तीसगढी ब्यंग----


===पसरा काॅदा भाजी के====


       डाक्टर साहेब हर कहि देय रहय कि तयॅ भाजी पाला के साग जादा खाय कर। तोर पेट सफा रही। आॅखी तेज अउ बग बग दिखही। जे नइ दिखे ओहू दिखही। मॅजे हुए राजनीतिक असन दुरदर्शिता अउ पारदर्शिता आही। अइसन सलाह अंकलहा बर संत के अमर संदेश असन होगे। अंकलहा के भीतर कंजूसी सुभाव ले कम लागत मा जादा खरीददारी के अर्थशास्त्री गुण भरे हे। ओकर कंजूसी चरचा मा रथे। काकरो सुभाव ओकर ले मेल खाथे तब कहि घलो देथे कि कब ले अंकलहा बनगेस? नाम भले अंकलहा हे फेर भरे बोजे चीज बस वाले हरे । ओइसे भी धनिक धनवान मन ही जादा कोचरू रथे। सूंघ के देख के जीने वाला के ये दुनिया मा कमती नइये। 

        लाल पालक मेथी चौलई भथुवा असन भाजी मा ए बी सी डी सबो किसम के बिटामिन भरे रथे। भाजी घलो सोच के खुश रथे कि चना मसाला आलू मटर गोभी पनीर के जमाना मा हमर साख कमती नइ होय हे । एक कप चाय मा गाॅव के कोटवार पट जाथे ओइसने भाजी घलो लसुन मिरचा के फोरन मा जम जथे। तेलहा मसाला के चमचागिरी के जरूरत नइ परे। राजनीति मा कोनो कोनो नेता के सुभाव अपराधिक सुभाव के रथे ओइसने चेंच अउ खोटनी भाजी के रथे। जादा जमाए ले पेट मा गुड़गुड़ी करके झारे उतारे मा कमती नइ करे। कोंवर कोंवर अमारी माने सतसंग मा बइठे सुन्दर नारी परानी जेकर उपर नामी संत महात्मा के नीयत गड़े रथे। अइसन रूप गुनकारी अमारी बर समय देखके झपटी झपटा मचे रथे। 

          अंकलहा बड़का झोला ला खाॅध मा टाॅगके बजार जाथे तब लगथे कि सैनिक जंगल कोती नक्सली सर्चिग मा बंदुक टाॅगके जावथे। अइसन अनुभवी ला झरती बजार मा जाय ले जादा सुख मिलथे। वोटिंग बूथ मा आवत मनखे ला देखके नेता मन सोंचत रथे कि मोला वोट दिही अइसे लागथे कहिके। ओइसने भाजी पसरा वाली आवत गिराहिक ला कातर भाव ले निहारत रथे। कोनोभाजी के भाव पूछके रेंगथे तब लगथे कि नक्सली परचा फेंक के जावथे। कतको झन कट्टरपंथी धार्मिक नेता कस भाजी पसरा ला सोज नइ देखे। कोनो मन सड़क मा परे टिफिन बम असन घूरत रथे। दू चार झन निरदली किसम के मन जीते ना जितन देय माने लेय ना लेवन देय। सिरिफ वोट काटे के काम करत रथे। फेर ओला का मालूम कि लसून मिरचा के फोरन मा जब भाजी बनथे तब गोसइंया से लेके झगरहिन सास घलो मइके जाय के प्रस्ताव ला चटकार ध्वनी ले पारित कर देथे। समझले सर्व संमति ले विधेयक पास। कतको झन संसद अधिवेशन सत्र मा बइठे कस पसरा के आगू मा पसर के प्रश्नकालिन सत्र शुरू कर देथे। कतिक के भागा आय? कब के टोरल हरे? जतका के लेना निंही ओकर ले जादा बहस। झरती पसरा माने सून्यकाल जेमे सबो ला मलोवन धरले वाले हिसाब । भाजी पसरा मा कतको झन पुरोनी बर अइसे लड़त रथे जइसे कोनो मजदूर किसान के नेता बोनस अउ समर्थन मुल्य बर लड़त रथे। फेर सरकार सही भाजी वाली ला मलूम रथे कि एक मुठा पुरोइच देहू त एक कनी अउ दे कही। माने पांच ठन माॅग मा एके ठन छूटही तभे चलही।  अंकलहा असन मन सरकार गिराय कस भाजी के भाव गिराय बर मुद्दा तलासत रथे। अॅइलागेहे, जुरहा होगेहे, भागा कमती हे जइसन मुद्दा ला हथियार बनाथे। चोंगियाहा के पाॅच रूपिया मा तीन ठन बीड़ी आथे एक ठन उपराहा नइ माॅग सकस। फेर भाजी वाली ला वोट मॅगइया नेता कस रूंगत लड़हारत रथे। अंकलहा सधे हुए राजनेता के बाप कस आय। भाजी के भाव गिराना सरकार गिराके वोटर ला कइसे फूसलाना सब एकर ले सीखव। मोर रचनात्मक सोंच ले प्रभावित होके जलनखोर  सॅगवारी कथे---------कस यार तॅय भाजी कोती हवस कि राजनीति कोती? समाजशास्त्र अउ राजनीतिशास्त्र मा डिलिट करे शोधार्थी असन समझाएंव। भितरी ले सोच; भाजी अउ भाजी पसरा के रहस्य ला समझ गेय माने राजनीति समझ गेस। आठ आना कम हे अवइया हप्ता बजार मा अउ लेहूं तब देहूं के मतलब ला समझथस?  फोकट आश्वासन देके अवइया चुनाव के जीतत ले भुलवारत रह।आम जनता अउ भाजी वाले अतके मा जागरूक होय हवे। भाव गिराबे तब काॅटा मारे बर नइ छोड़े। दारू पानी के खातरी कम होइस त दू झन के वोट मा एके वोट पाबे।

          पाच रूपिया भागा के भाजी ला उपजारत ले किसान अॅइला जथे। हिसाब पूछबे त आधा बीजा खातू के, आधा दवई मजदूरी मे चलदिस ।बाॅचिस कड़हा सरहा उही ला चार साग खायेन ओतकेच तो आय। जमानत जप्त होय नेता कस  किसान के हालत रथे। ओइसने बजार ले लहुटत बेरा भाजी वाली के  थोथना उतरे रथे। फेर अंकलहा असन मन भाजी पसरा ले घर लहुटती मा लगथे कि सैनिक सर्जिकल स्ट्राईक ले सफल होके लहुटत हे। 

           चेंच अमारी काॅदा भाजी बारी के अउ बजार के शान आय। मोर गॅवई गाॅव के बारी मा भाजी उपजथै। फेर यहू एक ठन सच आय कि सहरी संसकार के गमला मा नकाबपोश नकटी नकटा मन के पैदावार जादा हे । मोर अमारी अउ काॅदा भाजी के पाॅच रूपिया भागा हे। फेर मनखे अपन आचरण ले पाॅच पइसा मे मांहगा होवत हे। पाॅव परबे त पनही छुवै ला परथे। नेता ले मिलना हे त चमचा के पूछी धरे ला परथे। कांदा खाबे त काॅदा भाजी जगाय ला परथे। भाजी पैदा करना अउ संसकारी लइका पैदा करना कठिन काम आय। भाजी पसरा अउ राजनीतिक पचड़ा एक समान होथै। हमर धियान सवाद उपर रथे। जे नइ मिठाय,,,,,,माने समझगेस न? ओला जर मुंड़ ले उखान के फेकव न रहे काॅदा न खावन काॅदा भाजी ।


राजकुमार चौधरी 

टेड़ेसरा राजनादगाॅव🙏

झन्नाटा तुम्हर द्वार

 झन्नाटा तुॅंहर द्वार


       महेंद्र बघेल



बड़े होय चाहे छोटे, अमीर होय चाहे गरीब, मालिक होय चाहे नौकर, लमगोड़वा होय चाहे बठवा, सियान होय चाहे जवान ,गोरा होय चाहे सावरा सॅंउक तो सॅंउक हरे जी। अंतस के सॅंउक ल भला कोन ह मार सकथे। सॅंउक ले बढ़के अउ का हे ये दुनिया म। समय के संगे-संग सॅंउक के वेराइटी हर घलव अपडेट होवत (बदलत) रहिथे।

            पहिली मनखे अपन जरवत के मुताबिक जिनिस ल बउरे अब सॅंउक के हिसाब ले चीज-बस ल बउरथें।नवा जमाना हे त सॅंउक ह घलव हाईटेक होगे हे।इही सॅंउक बर चिंतन करत देश के चिंतक मन ह सत्ता के विकेंद्रीकरण अउ उदारीकरण के नीति ला देश के हित में बताथें। ठंडा दिमाग म जब ये बात ल सोचबे त लगथे, सही म येकर प्रत्यक्ष प्रमाण सरकार के आबकारी नीति हर आय।

           बच्चा ले लेके बम्फर तक अलग-अलग ब्रांड मा झन्नाटा अउ पाउच-पानी आकर्षक वेरायटी मा गाॅंव-गली, मोहल्ला मा सहज अउ सुलभ ढंग ले उपलब्ध हो जथे। नान्हे रहेन तब सुनन येहा पहिली कस्बा अउ शहर म मिले, एक कनी बाढ़ेंन तब पता चलिस ये बड़का गाॅंव (जादा आबादी वाला गांव)म   मिलथे, आजकल गांव गांव म मिलथे। अघोषित रूप म ग्राम पंचायत, गांव प्रमुख अउ उर्जावान झन्नाटा बेचइया (कोचिया) के बीच मा लेन-देन अउ जोहार-भेंट जइसन एक ठसलग गठबंधन तैयार होथे। फेर भीतर-भीतर होय सेंटिंग- सहमति के बाद आबकारी विभाग के आदरणीय अधिकारी कर्मचारी मन के परसादे अलग-अलग पाउच, डब्बा अउ शीशी मा जब्बर गुणवत्ता वाले झन्नाटा ला आम उपभोक्ता बर घर बैठे जुगाड़ करवा देथें। मनखे के सॅंउक ल पूरा करे बर जब सरकारे ह अपन कनिहा कस लेथे तब गांव-गांव म गली-गली म झन्नाटा ह उपलब्ध होइ जथे।

        मने गांव अउ पंचायत के सक्रियता ले सरकार के हर भावी योजना हर समाज के आखरी मनखे तक पहुंच बना पाथे।तब हम कहि सकथन कि शासन प्रशासन के जुम्मेदार पद मा बइठे नीति बनइया मन आम उपभोक्ता तक पीये-खाय के सामग्री ला अमराय बर " झन्नाटा तुॅंहर द्वार" जइसे राजस्व जुगाड़ू योजना अउ पंचायती राज के सपना ला साकार करत हें।

गांव-गांव के कतरो हमर दीदी बहिनी मन येकर विरोध करिन, कमांडर बनके ,टोपी पहिरे लउठी उबावत अउ सिरसिरी पारत खूब धमकी चमकी लगईन। धर-पकड़ ल देखके कोचिया मन के सुकुड़दुम होय लगिस।

थोरिक दिन बर दुकान-पानी बंद होगे।।

फेर उपभोक्ता समाज म येकर  जबरदस्त साइड इफेक्ट आना शुरू होगे, अक्खा मंदहा मन तो हफर-हफर के हाय-हाय करत कइसनो करके जीना सीखगे। फरक पड़िस उनकर घर के ओ लइका मन ल जेन बिहनिया च ले शीशी के भरोसा डबल रोटी बिसाय आज वोमन एक ठन शीशी गतर बर मोहताज होगे, गोसइन मन दू-फर साग अउ सुरवा बर तरसगें। का ये दरद के अनुभो कोई मनखे समाज ल हे, आखिर यहू मन तो सामाजिक प्राणी हरे का, इनकर मौलिक अधिकार के रक्षा भला कोन ह करही।

फेर कहे गेहे जेकर कोई नइ रहय ओकर उपर वाले होथे। समय अइसे पल्टी खाइस कि उपर वाले मन इनकर उद्धार करे बर कैबिनेट म पहुंचगे।

फेर का पूछना हे,शिक्षित बेरोजगार मन के चिंता करत ओ समय के सरकार हा एक ठन कल्याणकारी योजना जनता जनार्दन मन बर लागू कर दिस। अउ नवा बजट-साल मा एक अप्रैल ले सब्बो प्राभेट ठेकादारी ला बंद करवा के उच्च गुणवत्ता के चौबीस कैरेट वाले सरकारी झन्नाटा दुकान खोल दिन। बड़े-बड़े बस्ती के चौरस्ता मा नवा-नवा बिल्डिंग बनाय गीस।

           सार्वजनिक वितरण प्रणाली सही कर्मचारी राखे बर नौकरी के विज्ञापन निकाल दिस, देखते देखत फारम भरे बर बेरोजगार मन के भीड़ उम्हियागे।सबले ज्यादा नंबर पवइय्या  बेरोजगार साथी मन के चयन घलव होगे, अउ शुरू होगे सरकारी झन्नाटा दुकान।

   दुनिया मा अपन आदर्श वादी पहिचान बनाय खातिर सरकार हर भट्ठी के सुचारू संचालन बर पढ़े लिखे होनहार कर्मचारी मन के भर्ती करिस, जेकर ले मंदहा मन ला सही डिग्री वाले झन्नाटा मिल सके।फेर हरेली,पोरा, देवारी, होली, मेला-मड़ई, सगई, बिहाव, छट्ठी , पिकनिक, जनमदिन, जइसन कार्यक्रम के समय मा मिलावट वाले मंद (जहरीला दारू) बेचाय के खबर ला सुनके सरकार बेचैन हो जथें।

आबकारी मंत्री के नींद उड़ जथे, ओ रात दिन इही चिंता मा बुड़े रहिथे कि हमर प्रदेश के गउ कस जनता मन ला तिहार बार मा कइसे ओरिजनल झन्नाटा के सुविधा देवा पाबो।

       मनखे समाज मा अपन खास पहिचान रखने वाला येकर उपयोग करइया कका- भइया मन जब सरकारी आईटम (झन्नाटा) ला सबले पहिली चिखिन तब ओकर ओरिजनल सवाद अउ झन्नाहट ला पाके बड़ खुशी मनाइन।

     फेर छन्नू ला नवा मटेरियल के सवाद हा थोरको भी पसंद नइ अइस अउ अपन मन के बात ला मन्नू कर कहिस- कस भाई हमला अतिक दिन होगे हे येला बउरत फेर आज ले अइसन नी लगे रहिस, कहुं डुप्लीकेट माल ला तो नी दे देहे।

मन्नू कहिस- हत कॅंहिके बइहा अइसन बात नोहे, जब बिक्कट दिन ले डुप्लीकेट चीज-बस ला बउरत रहिबे न, तब वोहा डिट्टो ओरिजनल कस अनुभो होथे। अउ कहुं हुरहा ओरिजनल ले पाला पड़ जथे तब सवाद अउ हाजमा दूनो के खराब होय के डर ह सतात रहिथे, संग मा डुप्लीकेट के भोरहा घलव हो जथे भाई, का करबे।

          नवा वेवस्था मा जब ओरिजनल झन्नाटा के शोर-खबर हा हर मंदहा भाई मन तक पहुचिस तब सरकार के खूब वाहवाही होइस। खुशी मनावत सबे मन एक-एक दूदी पैग उपराहा पीके सरकार के प्रति आभार व्यक्त करिन, रंगझाझर खुशी मनाय के चक्कर मा कई हितग्राही मन कोमा में घलव पहुंचगे, कई झन नाली मा झपावत हाड़ा-गोड़ा टोरके अपन समर्पण भाव ला सरकार तक घलव पहुचाइन।

सरकारी आइटम के प्रति लोगन मन के बइहा-भूतहा कस मया-दुलार  पाके सरकार हर मने मन बड़ खुशी मनाइस। 

    अउ येकर भरोसा कई ठन जन कल्याणकारी योजना बनाय बर सोचिस।

          गजब के झनझनाहट ला देखत तीज-तिहार, बर-बिहाव, नेंग-जोग मा येकर डिमांड बाढ़गे, उही साल नचइया मन होली तिहार म चिखला मता-मता के, घोलंड-घोलंड के झूम-झूम के नाचिन।

            आजकल देखब म आथे फलदान (सगई) के बूता ल निपटाय के पाछू ओ सगा-सील जेन मन झन्नाटा के उपभोक्ता माने जाथे( चालू भाषा म मंदहा टाइप के सगा) उनकर मन के बीच भारी वेवस्था के दौर शुरू हो जथे। मुंधिहार होते साट येमन तुरते खसक जथें , घरवाले मन खाना खवाय बर  घेरी-बेरी चिचियात रहि जथे फेर येमन अइसे कल्टी मारथे कि घंटों इनकर गम नइ मिले। येमन जब आथें ते चुपर-चुपराके हालत-डोलत आथें। येमन जब पंगत म बइठथे त इनकर नाज-नखरा शुरू हो जथे, बरा अउ डार, पापड़ अउ दे ,सलाद लान, भात ठंडा होगे हे, गरम-गरम लान ,अरे रकम-रकम के बरतिया फरमाइश ले जीव हलाकान हो जथे।बस येमन खाना कम घोरना जादा करत रहिथें। ले देके खाहीं-पीहीं त हाथ-गोड़ ल लोम देथे अउ उही मेर पसर जथें। सकुशल घर वापसी ल ध्यान म रखत घरवाले मन इन ला थक-हार के चेचकारत, खींचत-खांचत मोटर गाड़ी म जोरके ,धन्य मनाथे।

         मनखे समाज म यहूं बूता ह आजकल अपन जबरदस्त जगा बनावत हे। घरवाले मन कतका सात्विक हे, तात्विक हे, आध्यात्मिक हे येहा कोई मायने नइ रखे। जतका नेवतार सगा  होथे ओमन अपन मनमर्जी के मालिक होथें, काकरो चेहरा म थोरे लिखाय रहिथे अंतस के इच्छा ह जेला टप ले पढ़े जा सके। कुलमिलाके पंगत के आखरी दौर म अइसन पीयाक सगा मनके सबो भेद ह फरिहर होइ जथे..।

          सगई (फलदान) के गोठ ल कतिक लमियाबे , दूसर नेंग-जोग के बेर एकर सुरता नइ आय का..? बिहाव म तो घलव अइसने च ढंग ले चित्रहार देखे सुने बर मिलथे। 

मायन नचइया  मन (मेन नाच) सरकारी आइटम के ओरिजिनाल्टी अउ झन्नाहट के अइसे दिवाना रहिथे कि इनकर मन बर हर हाल म वेवस्था करना पड़थे, नइते फुलहा फूफा सही रिसा जथे।

             मोटर ले उतरते साट बरतिया मन अपन अपन ले जुगाड़ मा लग जाथे, सबले पहिली पान ठेला मा जाके झन्नाटा बेचइया के नाम पता ,मोबाइल नंबर , गली नंबर माॅंग लेथें। फेर इतरावत, मटमटावत बरतिया पावर के इस्तेमाल करत पव्वा-खव्वा के वेवस्था कर पाथें।

 रूचि अउ खपत ला ध्यान मा रखत  मयारू पियाक मन ला देशी अउ विदेशी नाम के दू गुरूप मा रखे जा सकथे।

           बरतिया सगा मन के बारे मा जतका गोठियाबे कम हे, फेर कहना तो पड़थेच, झन्नाटा के टोंटा मा उतरते उनकर हाव-भाव ह बदल जथे। जइसे-जइसे उनकर हाथ-गोड़ अउ तरवा म झुनझुनी दउड़ना शुरू होथे बस वइसने च उही रफ्तार मा खीसा ले सुहापी निकल जथे। तुरते ताहीं सुहापी हर बीन बन जथे अऊ नागिन धुन मा जम्मो बरतिया मन अपन-अपन तन-मन ला डोलावत भुइयाॅं मा घोंडइया मार-मार के ओरिजनल बरतिया के धरम निभाथें। जइसने च झुनझुनाहट के असर उतरथे, तुरते ताही रिचार्ज करे बर फेर झन्नाटा के शरणागत हो जथें। दूल्हा बाबू ला बरतिया मन डहर ले येकर ले बढ़के मितान श्रद्धांजलि भला का हो सकथे।मटमटहा बरतिया मन के बाते झन पूछ, आगू-आगू मा पुच-पुच कूदत मटमटावत, तेरा मन डोले मेरा तन डोले के धुन मा मड़वा मा चढ़ेच ल धरथें। नाचत-कूदत जइसने च बरतिया मन मड़वा मेर पहुचथे अउ दूल्हिन के संगी सहेली मन के दर्शन होथे ,फेर तो नागिन डांस पूरा सबाब मा पहुंच जथे।

              ये चाल-चरित ले का छ्ट्ठी -बरही ह बाचे हे कथस। अरे येमा तो जोश-खरोश ह दू गज अउ बाढ़ जथे।

         रात कुन कोनो हुरहा बम फटाका फूटिस तहान तॅंय समझ जा ,उॅंकर घर के पबरित ॲंगना मा अवइया छेंठवा दिन मा छट्ठी मनाना तय हे।तहाॅं देखले सुत उठके बिहान दिन छट्ठी खातिर बेवस्था बर एक ठन लिस्ट बनना शुरू हो जथे, जेमा तीली ,सोंठ-गुड़ , मिच्चर-मिठई, चाउर-दार, बरी-मुनगा, भाजी-पाला , पतरी-दोना, पोंगा-समियाना संग बहुआयामी डिस्पोजल गिलास हर लिखाय रहिथे । लिस्ट के आखिरी लाईन मा कुछ कीमती समान के नाम हर नइ लिखाय रहय फेर मीत-मितान अउ सगा- सुजान मन के विशेष रूचि के  मुताबिक वो समान ला हर हाल मा बिसाय के जुगाड़ करना च पड़थे।

                  घरवाले ले जादा सखा-सुजान अउ मीत-मितान मन छट्ठी हा कब आही कहिके दिन गिनत रहिथे।येमन पाहती च ले ददा अउ बबा बने के सेती फोन मा उसर-पुसर के बधाई अउ शुभकामना पठोवत रहिथें, घेरी-बेरी वेवस्था करे बर नोखियावत रहिथें।

           नवा लइका के आय ले भला कते ददा-बबा अउ कका-फूफा ला खुशी नइ होत होही, छेठवा दिन के आवत-आवत इही बबा जात मनके मुहुं मन घलव पंछाना शुरू हो जथे।उपर ले कोन्हो मन बेवस्था करे बर नोखिया दिस तब तो अउ का पूछना हे, सुर-सुराॅंट हर पूछी उठाके दौड़े बर धरथे।

           अइसन दिन ला परोसी मन घलव ठउॅंका तुकत रहिथे, कब छट्ठी होय त कब जुगाड़ होय।

तभे तो परोसी आशाराम ह अपन मन म आशा पाले आज छ्ट्ठी वाले घर मा बिहिनिया च ले टेंक देहे।

अंतस मा जुगाड़ के आशा मा चुलुक ला फिजोवत अपन मुखार बिंद ले तारीफ के बीजा छिचत हे।

        आशा राम - "बड़ सुग्घर मुहुर्त मा राजकुमार हर तोर दुवारी मा अवतरे हे भैया, लइका के मुहुं कान ह तो बापे सही हे फेर माथा के लकीर अउ ऑंखी के तेज ह डिट्टो तोरे च सही हावे 'बड़का' भैया।"

          एती नाती के संग मा अपनो तारीफ ला सुनके दयालु राम के मन ह गदगद होवत हे।

तारीफ ल सुनके कते मनखे के चोला म मया ह नइ पलपलात होही भला।

तभे तो तुरते ताही दयालु राम के बक्का फूटिस- का करबे आशा भाई ये तो सब उपर वाले के किरपा आय गा, फेर तोर गोठ ह सोला आना सच हावै 'छोटे'। आशा राम ह समझगे ओकर फेंके निशाना ह सही जगा म टिपाय हे, अपन बात ला फेर लमावत कहिस-" का भैया तहूं ह अतिक खुशियाली के बेरा मा थूके थूक म बरा चुरोवत हस,घर मा नाती आय हे तभो हाथ-पांव सकेलत हस।"

देखते देखते अंतस मा पलपलात चुलुक अउ परोसी धरम के बीच गठजोड़ होगे, येला तो होना च रहिस। दयालु डहर ले बियारी के जुगाड़ के घोषणा ,मुखारी करे के बेरा म होगे, असवासन पाके आशा ह धन्य मनइस कि आज ओकर आस ह खच्चित पूरा होही।उही कर छट्ठी साॅंवर बनावत नऊ ठाकुर ह दूनो झन के गोठबात ल कान टेड़ के सुनत रहिस अउ मौका पाते साट वहूं ह अपनो नाम ल लिस्ट म जुड़वा डरिस।

          बेर बुड़ती के टेम म कोंटा-कांटी डहर बबा (दादा) अपन सॅंगवारी संग अउ ददा,कका, ममा अउ फूफा मन अपन दल संग चखना, डिस्पोजल गिलास अउ झन्नाटा के संग छ्ट्ठी तिहार के आयोजन ल सफल बनाय म  लग जाथें।

            इहाॅं तक तो सब बने रहिस, फेर सभासद मन जस-जस झन्नाटा ल चुपरत गिन, तस-तस‌ अपन-अपन मुहुं ल अनसम्हार फरकावत गिन।

       ओती घर म बहनी-बेटी , दाई-दीदी अउ रमायण वाले मन सोहर गीत गावत हे त येती डिस्पोजल मैन मन ह फोहर-फोहर गरदा उड़ावत हें। नवा अध्याय के बोहनी इहे ले होइस जे रोशे-रोश म तेरे-मेरे धमतरी तक पहुंच बनाइस अउ धक्का मुक्की ले बुक्की , बुक्की ले पटकिक-पटका, बोजिक-बोजा या ये कहन कि मुड़ी-कान,माड़ी-कोहनी के छोलई-फूटई तक पहुंच बना के पूर्णाहुति ल प्राप्त करिस।

           बेरा-कुबेरा म मंदहा मन के  रूचि ल देखत हमर तो इही कहना हे कि अइसन मन ला बी. पी. एल. म शामिल करे बर सगई, बिहाव अउ छट्ठी वाले घर के बारे म शासन ल खास ध्यान देना चाही।अउ चाउर वितरण सही  सगा-सोदर के हिसाब ले पउवा,अद्धी , बाटल अउ मुरकू-मिच्चर खउवा के शासकीय अनुदान के वेवस्था करना चाही। अउ जेन सगा मन रूचि नइ ले (सात्विक) उनला ए. पी. एल. केटेगिरी म मानके उकर बर  फ्रूटी-माजा अउ बिस्कुट-पीपरमेंट आबंटित करे के प्रावधान होना चाही। मने काकरो मुहुं ल कोई काबर टुकुर-टुकुर देखत रहय । मने सबला मिले बरोबर न्याय, जनता पीये जनता खाय।

              येकर गुनगान करत अनुभवी मन बताथे कि येला बउरे ले कोंदा ह घलव पड़पड़- पड़पड़ बोलना शुरू कर देथे। जोजवा मनखे म हिम्मत आ जथे, खोरवा हर दउंड़ना शुरू कर देथे। अपन घनघोर अनुभो ले बड़ आत्म विश्वास ले ओ कहिथे कि येकर परसादे कई झन कलाकार मन राष्ट्रीय स्तर म अपन नाम बुलंद करे म सुफल हो सकत हें अउ कई झन मन अलग-अलग मंच म झंडा फहराके श्री-श्री नाम के पुरस्कार घलव पा सकत हें।त अइसन राष्ट्रीय महत्व के चीज ल कई झन नइ माने। ये सब उनकर संकुचित सोच ल बताथे। बल्कि अइसन मनखे मन के दिल ल तो बड़े होना चाही,अतका बड़े कि झन्नाटा हमा जाय। देख हमर सरकार के दिल ह कतका बड़े हे। शासन प्रशासन डहर ले एक घाॅंव मा सोला ठन खरीदी-बिक्री करे के उदारवादी नीति हर गली-गली मा पहुॅंच बनाके कल्याणकारी योजना के नवा ईबारत लिखत हे।

         तेकरे सेती तो बुधियार समाजशास्त्री विश्लेषक मन कहिथें ये मानव समाज बर अभिशाप आय,अरथशास्त्री मन कहिथें ये समाज के विकास के पर्याय आय। 

जेन भी माननीय मन सत्ता म बइठे रहिथे ओमन ल समाजशास्त्र के जगा अर्थशास्त्र के सुवाद ह जादा मीठ लगथे। त हमर असन सादा माथा वाले निपट कामन मैन मन बस इही कहि सकथन कि एती-ओती , चारो-कोती जब कागजी विकास के गुंगवा उड़त हे तब तो सत्ता सरकार हर उही विकास के फोसवा बाना म ढिठाही के धजा ल फहराबे करही। अउ जनता ल भरमाय बर आश्वासन के हवा ल अंदर-बाहर खींचत अनुलोम-विलोम करबे करही। भला खार-खाय जनता जनार्दन मन शीर्षासन करत रहॅंय।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

छत्‍तीसगढ़ के यशस्‍वी कवि दानेश्वर शर्मा


 

छत्‍तीसगढ़ के यशस्‍वी कवि दानेश्वर शर्मा

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हिन्‍दी अउ छत्‍तीसगढ़ी के यशस्‍वी कवि दानेश्वर शर्मा जी के जन्म 10 मई 1931 ग्राम मेडेसरा, जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़) (म.प्र.) मं होइस । पिता के नाम पं. गंगा प्रसाद द्विवेदी अउ माता श्रीमती इन्दिरा द्विवेदी।  दानेश्‍वर शर्मा,बी.ए. एल.एल.बी. वकालत के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र के संपादकीय विकास विभाग मं प्रबंधक के पद मा अपन सेवा दिस। हिन्‍दी, छत्‍तीसगढी ,अंगेजी अउ संस्‍कृत भाषा मं  सतत मौलिक लेखनी अउ मिलनसार व्यक्तित्व हा ओला अखिल भारतीय स्तर के साहित्यकार के रुप मं स्थापित करिस। 

शर्मा जी के साहित्य लेखन 1955 मं आरंभ होइस। उंकर पहली रचना #बेटी_के_बिदा 1966 ई. मं सबके सामने आइस।  लोककला ला मूल स्वरुप मं सकेले के उदिम वाले विचारधारा ही ओला चंदैनी गोंदा के सर्जक #दाऊ_रामचन्द्र_देशमुख अउ डाॅ. खूबचंद बघेल के समविचारिक बनाथे। बघेरा के काव्य गोष्ठी मं दाऊ जी संग एतिहासिक छायाचित्र (डाॅ. सुरेश देशमुख के किताब - चंदैनी गोंदा) मन एंकर पुष्टि करथे। 

दानेश्वर शर्मा जी के रचना के प्रकाशन अखण्‍ड ज्‍योति, 

नागपुर टाइम्‍स (अंग्रेजी दैनिक) साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान, ब्लिट्ज, धर्मयुग, स्‍थानीय पत्र-पत्रिका मनके संगे संग प्रसारण दूरदर्शन, आकाशवाणी केन्द नागपुर, रायपुर, भोपाल, इंदौर, रीवां, छतरपुर,  इलाहाबाद के  केन्‍द्र ले सरलग होवत रहिस।

 दैनिक भास्‍कर अउ नव-भारत दैनिक मं तीन साल ले  लोक दर्शन नाम ले उॅंकर ललित निबन्‍ध स्तंभ लेखन बड़ लोक प्रचलित होइस।


प्रकाशित पुस्‍तक--

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#छत्‍तीसगढ_के_लोक_गीत (विवेचना  सन् 1962), 

#हर_मौसम_में_छन्‍द_लिखूंगा (हिन्‍दी गीत संग्रह सन् 1993), 

#लव_कुश -(खण्‍ड काव्‍य सन् 2001), 

#लोक_दर्शन (अनेक धर्म दर्शन व परब-तिहार बर निबंध संग्रह, सन् 2003) 

#तपत_करू_भई_तपत_कुरू ( छत्‍तीसगढ़ी कविता संग्रह --2006) 

#गीत_अगीत  (हिन्‍दी काव्‍य संग्रह -सन्  2007)

रविशंकर विश्‍वविद्यालय के एम.ए. (हिन्‍दी) के लोक साहित्‍य विषय  निर्धारित छत्‍तीसगढी काव्‍य संकलन वर्तमान मं निर्धारित छत्‍तीसगढी भाषा अउ साहित्‍य किताब मन मं घलो शर्मा जी के कवितामन संग्रहित हावय।

शर्मा जी के लेखन के उजयारी छत्तीसगढ़ भारत मं तो हवय ही संगे संग देश ले बाहिर भी चमक छोड़े हे। जइसे शिकागो विश्‍वविद्यालय ले प्रका‍शित रिवोलुशनिज्‍म इन छत्‍तीसगढ़ी पोएट्री मं घलो मिलथे। शर्मा विश्‍व प्रसिद्ध संस्‍था फोर्ड फाउन्‍डेशन ले प्रकाशित 11 पुस्‍तक के संपादक सलाहकार घलो रह चूके हे।

छत्‍तीसगढ मं ग्रामोफोन रिकाडर्स के कैसेट के ओ समय भारी चर्चा रहिस जेमा शर्मा जी के सर्वाधिक गीत के रिकार्डिंग होय रहिस जेला स्वर देके बैतलराम साहू छत्तीसगढ़िया किशोर कुमार के नाम ले मशहूर होइस।

वो बेरा देश के सबले प्रसिद्ध कंपनी  हिज मास्‍टर्स वायस (कलकत्‍ता)।  म्‍यूजिक इंडिया- पोलीडोर (मुंबई),  सरगम- रिकार्डस -(बनारस) अउ वीनस कैसेट्स (मुंबई) मं छत्तीसगढ़िया रंग चढ़िस।

छत्तीसगढ़ी फीचर फिल्‍म मोर धरती मईया मं  इंकर गीत आपमन जरुर सुने होहा।

भिलाई इस्‍पात संयंत्र मं प्रतिवर्ष आयोजित #छत्‍तीसगढ़_लोक_कला _महोत्‍सव हा शर्मा जी के देश आय। इही मंच ले पंथी नर्तक देवदास, पंडवानी गायिका पदमभूषण तीजन बाई, रितु वर्मा जइसे अनेक कलाकार मनला देश-प्रदेश पहुचाॅंइस अउ राष्‍ट्रीय सम्‍मान इंकर झोला मं लाके रखिस। 

श्री दानेश्‍वर शर्मा जी श्रीमदभागवत महापुराण के श्रेष्ठ कथावाचक के रुप मं घलो देश में प्रसिद्ध रहिस, ओला

सन् 2006 मं  राष्‍ट्रपति के द्वारा साहित्‍य सम्‍मान प्राप्‍त होइस अउ सन् 2007 मं अमेरिका के न्‍यूयार्क शहर मं आयोजित आठवईयां विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन मं छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधित्व करें के अवशर मिलिस।


शर्मा जी के प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गीत--

१ दाई ओ ददा गो लइका बर फुग्गा ले दे...

२ मोर सारी परम पियारी....

३ लाखों मं एकझन हावै गा मोर समधिन..

४ तपतकुरु भइ तपतकुरु बोल रे मिट्ठू ...

श्री दानेश्वर शर्मा जी के साहित्यिक गुरु जनकवि कोदूराम दलित जी रहिन।

1955 ले साहित्य के सतत सेवा करत, छत्तीसगढ़ राजभाषा के पदेन अध्यक्ष (द्वितीय) के रुप मं छत्तीसगढ़ी के सेवा करके आज रतिहा दिनांक 03-02-2022 श्री दानेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ़ साहित्य संसार ले विदा होगे।


✍️मिलन मलरिहा

04/02/2022