Sunday, 13 March 2022

गरमी म चिरई-चिरगुन बर पानी...

 गरमी म चिरई-चिरगुन बर पानी...


अब गरमी ह दिनों दिन नंगत के बाढ़त हे। अइसन बेरा म नदी,नरवा, तरिया अउ कई ठन पानी के नान्हें-नान्हें सरोत मन घलो ठकठक ले सूखा हो जथे। कतको जीव-जंतु,गाय-गरवा, चिरई-चिरगुन संग सबे जीव मन ल पानी बर अब्बड़ कसट करे ल पड़थे। 


पानी सबो जीव के आधार आये। येकर बिन जिनगी के कल्पना करना बिरथा हे। गरमी के बाढ़त बेरा म हमन अपन घर के तीर बाहिर म धमेला म, छत के ऊपर, कोनो पेड़ म ठेका बांध के,मटका म पानी रख के चिरई-चिरगुन अउ दूसर नांन्हे जीव मन बर पानी भर के रख के जीव दया भाव के करतबय निभा सकत हन। जेमे कोनो खरचा घलो नई हे। ये सब समान मन घर म रहे रथे।


गरमी के दिन म जादा चिरई मन पियास ले अचेत सड़क,रदा म पड़े दिखे ले मन म अब्बड़ दुख होथे। ये मन ह नांन्हे अउ बड़ नाजुक जीव हरे। थोरको पीरा ल नई सहे पाये,अउ रुख के सुख्खा पाना बरोबर पुट ले गिर जाथे। येकर जीव बचाये बर हमन पानी अउ हो सके ते दाना के बेवस्था घलो कर सकत हन। जेकर ले येमन ल कुछु राहत जरूर मिलही।


येमन अइसन बेवस्था ल देख के जरूर खुश हो जाहि। उंकर मन कतका गदगद होही उही मन जानहि। अईसे तो चिरई-चिरगुन मन हमरे आसपास रहवइया परोसी जीव तो आय। बिपत परे म पोठ परोसी मन काम नई आहि त कोन आहि। हमन ल बिहिनिया बेरा अपन सुहावन कलरव ले गीत सुनाथे, हमन ल सोये म जगाथे। बिहने ले नवा उमंग, आशा,अउ दिन भर के बुता करे बर नवा बल इंकरे ले तो मिलथे। अतकी म मन परसन्न हो जाथे।


आमा खात कोयली, निभौरी खात पडकी मैना,कोवा ल खात मिठ्ठू,धान के झूल म झूलत गोड़ेला,उच्ची, परेवा,रमली के बोली मन ल मोहित कर डारथे। अइसन गुरतुर बोली ले वातावरण ल गमकैया जीव मन ल कतको झन निसमझि मन ह गुलेल गोटी धरके पेड़ पेड़ म घुमत रथे। ये काम कोई भी तरीके ल सही नई हे। ये निर्बाद गीत गैवैया,मासूम,नाजुक,निरदोस जीव मन ककरो का बिगाड़ करे होही। सजग मनखे मन ल रोके के परयास बर आगू आय ल पड़हि नहिते इंकर भाखा-बोली बर तरसे ल पड़ही।


गरमी म कतरो जंगल के नांन्हे जीव मन पानी के तलास म गांव तरिया, नदिया,नाला तक पहुँच जथे। इंकर मन मे कभू गांव के कुकुर,कभू मनखे मन हमला कर देते। यहू बने बात नोहे। पियासे जीव ल पानी, भूखे ल जेवन हमर मानव संसकिरिती आये। जेकर जब्बर पालन हम सब ल करे के धरम होना चाही। तभे तो सब जीव एक समान के भाव मजबूत होही।



           हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगांव

Sunday, 6 March 2022

6 मार्च जयंती म सुरता// छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला महाकवि कपिलनाथ कश्यप



 

6 मार्च जयंती म सुरता//

छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला महाकवि कपिलनाथ कश्यप

   आज अलग छत्तीसगढ़ राज अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के बने के बाद छत्तीसगढ़ी लिखई के संगे-संग पढ़ई घलो ह पांखी लगा के उड़ियाए ले धर लिए हे, तेमा वैज्ञानिक आविष्कार के चलत इंटरनेट के माध्यम ले आए  सोशलमीडिया ह एमा सोन ऊपर सोहागा चढ़ा दिए हे. एकरे सेती आज छत्तीसगढ़ी ल अपन माटी राज छत्तीसगढ़ के संगे-संग दुनिया भर म थोक-बहुत तो पढ़ेच जावत हे. फेर आज के उड़ान के जनम कइसे गढ़न होइस. एकर नेंव म कोन मन अउ कतका मिहनत ले पखरा रचिन तेनो ल तो सरेखे जाना जरूरी हे. 

   छत्तीसगढ़ी के नेंव ल टमड़े ले जानबा मिलथे, के जे मन के एमा जबड़ बुता हे, वोमा महाकवि कपिलनाथ कश्यप जी के नांव सोन आखर म लिखाय दिखथे. कपिलनाथ कश्यप जी ल छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला महाकवि के रूप म चिन्हारी करे जाथे, जे मन वो बेरा छत्तीसगढ़ी भाखा म तीन महाकाव्य श्री रामकथा, श्री कृष्ण कथा अउ  श्री महाभारत कथा लिख के छत्तीसगढ़ी भाखा के भंडार ल पोठ करे हें. ए तीनों महाकाव्य के संगे-संग हीरा कुमार (खण्ड काव्य), सीता के अगनी परीछा (खण्ड काव्य), अब तो जागौ रे (काव्य संग्रह), डहर के कांटा (काव्य संग्रह), नावा बिहान (एकांकी), अंधियारी रात (एकांकी), गोहार (एकांकी), गुरावट बिहा (एकांकी), ग्राम सुधार (एकांकी), पापी पेट (एकांकी), निबंध निसेनी (निबंध) लिख के छत्तीसगढ़ी के कोठी ल लबालब भरे के बड़का बुता करे हें.

   6 मार्च 1906 म जांजगीर-चांपा जिला के गाँव पौना के संपन्न किसान शोभानाथ अउ महतारी चन्द्रावत देवी के घर जनमे कपिलनाथ कश्यप जी के लगाव छात्र जीवन ले ही साहित्य डहार रिहिस. फेर उंकर लेखन राजस्व विभाग के नौकरी म आए बाद चालू होइस. तब उन हिन्दी म ही साहित्य रचना करंय. 

    इहाँ ए बात म चर्चा करे के मन होवत हे, के एक छत्तीसगढ़ी महतारी भाखा वाले मनखे हिन्दी म लिखे के शुरुआत काबर करथें? पहिली के जम्मो पुरखा साहित्यकार मन के संगे-संग हमू मन अइसने करेन. एकर असल कारन आय, शिक्षा के माध्यम. भले हमर मनके महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी आय, फेर हम सबके स्कूली पढ़ई हिन्दी माध्यम ले होए हे, तेकर सेती साहित्य लेखन के शुरुआत घलो हिन्दी ले होए हे. एकरे सेती हमन महतारी भाखा म प्राथमिक शिक्षा होना चाही कहिके सरकार जगा गोहरावत रहिथन. अभी के केन्द्र सरकार ह तो जेन नवा शिक्षा नीति के घोषना करे हे, तेमा महतारी भाखा के माध्यम ले ही प्राथमिक शिक्षा होना चाही कहे हे, फेर राज सरकार ह अभी एती चेत नइ कर पाए हे. वइसे राज सरकार के मुखिया ह घलो एक पइत कहे रिहिन के महतारी भाखा के माध्यम ले ही प्राथमिक शिक्षा चालू होही कहिके फेर ए कथन ह अभी स्कूल मन म जमीनी रूप ले लागू नइ हो पाए हे. भरोसा करथन, के अवइया बेरा म अइसन हो पाही, तब छत्तीसगढ़ी महतारी भाखा वाले मन घलो साहित्य लेखन के शुरुआत ही छत्तीसगढ़ी ले करहीं.

    कश्यप जी के जुन्ना पोथी मनला देखे ले जानबा मिलथे, के उनला लेखन खातिर प्रेरणा वो बेरा के प्रतिष्ठित एकांकीकार रहे उंकर गुरु रामकुमार वर्मा जी ले इर्विन क्रिश्चियन कालेज इलाहाबाद म पढ़त खानी ही मिलिस, जिहां ले उन सन् 1931 म स्नातक परीक्षा पास करिन. अउ फेर राजस्व विभाग के नौकरी म आए के बाद नौकरी ले कुछ बेरा निकाल के साहित्य साधना म लगावंय. तब उन वैदेही विछोह, युद्ध आमंत्रण, बावरी राधा, श्रीराम जानकी विवाह अउ राम राज्य आदि खण्ड काव्य के सृजन करिन. ए सबो खण्ड काव्य हिन्दी म रहिन. उंकर पहला रचना के प्रकाशन 1968 म "विदेही विछोह" के रूप म होइस, जे ह प्रयास प्रकाशन ले छपे रिहिसे. 

   सन् 1968 के बेरा ह उंकर जीवन के महत्वपूर्ण बेरा आय. इही बखत उंकर जीवन म बड़का बदलाव घलो आइस. राजस्व विभाग के नौकरी ले सेवानिवृत्त होए के बाद उन बिलासपुर म रहे लगिन, तब ए क्षेत्र के साहित्यकार मन संग उंकर मेलमिलाप बाढ़िस. इही मन म वो बखत एमए करत विनय कुमार पाठक, बलराम पांडेय आदि मन संग भेंट होइस. फेर इंकरे मन के कहे अउ प्रोत्साहित करे म उन छत्तीसगढ़ी म लिखे के शुरुआत करिन. फेर मन म इहू गुनत रहिन, के छत्तीसगढ़ी म लिखहूं त विद्वान अउ गुनी साहित्यकार मन का गुनहीं सोचहीं? आखिर बड़ सोच-विचार के अपन ईष्ट देव ल सुमर के "श्रीराम कथा" महाकाव्य के रचना करिन.

    छायावाद के प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पांडेय जी कश्यप जी के 'श्रीराम कथा' ल देख के दंग रहिगें. अउ वोला सिरिफ आठेच दिन म पूरा पढ़ डारिन. संग म भूमिका लिखिन. जेमा उन लिखिन- "कविवर कपिलनाथ कश्यप का मैं अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जिनकी वजह से मुझे छत्तीसगढ़ी में 'श्रीराम कथा' पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ

 इसमें पद-पद पर उनकी रामभक्ति का परिचय मिलता है. कवि ने अपने जीवन भर की कमाई श्री राम के चरणों में चढ़ा दी है, भगवान भावग्राही हैं, उसे अवश्य स्वीकार करेंगे. कवि का जीवन धन्य हो गया. उनकी लेखनी सफल हो गई."

    कश्यप जी के छत्तीसगढ़ी म लिखे ए पहला महाकाव्य ल 'मानस चतुस्ती शताब्दी समारोह समिति' ह बरिस 1974 म छपवाइस, जेला मध्यप्रदेश साहित्य परिषद ले बरिस 1975 म लोक साहित्य के प्रतिष्ठित "ईसुरी पुरस्कार" ले सम्मानित करे गिस. 

     कश्यप जी जेन बखत ये सब रचना मनला सिरजाईन तब आज के जइसन प्रचार-प्रसार के गंज अकन साधन उपलब्ध नइ रिहिस, जेकर सेती लोगन उंकर साहित्य के गरिमा ल वतका नइ टमड़ पाइन जतका टमड़े जाना रिहिसे. उन श्रीराम कथा, श्रीकृष्ण कथा महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता जइसन पोथी पुराण ल छत्तीसगढ़ी म लिखके बड़का संत ऋषि मन जइसे तपस्या करे हें. 

   आज मैं "कपिलनाथ कश्यप जयंती आयोजन समिति" ले दूनों हाथ के दसों अंगरी ल जोर के अरजी करत हंव, के उन श्रद्धेय कश्यप जी के ए जम्मो धरोहर मनला पोथी के रूप म जादा ले जादा छपवाए के संगे-संग वोमा के प्रमुख प्रसंग मनला संगीतबद्ध करवा के जन-जन म बगराए के घलो बुता करय. एकर ले जे मन पोथी-पतरा पढ़े नइ पावंय उहू मनला संगीत के माध्यम ले भगवान कथा अउ अध्यात्म के अमरित पान करे के भाग मिल जाही.

    आवव कश्यप जी के पहला छत्तीसगढ़ी महाकाव्य 'श्रीराम कथा' के डांड़ देखिन-

होनहार हर होबे करथे चाहे लाख उपाय करा.

बिना बलाय जबरन आथे, चाहे कतको बांध धरा..


जब काकरो पतन होथे त वोकर बुद्धि भ्रष्ट हो जाथे ए बात ल कतका सुग्घर लिखे हें-

जब जेकर जात्ती आ जाथे वोकर बुद्धि नठा जाथे.

काम बिगड़ जाये के पाछू मुड़ पटक के पछताथे..


   'श्रीराम कथा' के बाद कश्यप जी 'श्री कृष्ण कथा' के सिरजन करिन. ए महाकाव्य के संदर्भ म छायावाद के प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पाण्डेय लिखथें- ' कश्यप जी ने छत्तीसगढ़ी में कृष्ण कथा सुलभ कर दी, कथा का आधार भागवत पुराण है. यह उनके पूर्व जन्म के पुण्य का ही फल है. कश्यप जी ने इस महाकाव्य का सृजन कर अध्यात्म की ओर प्रवृत होकर परलोक को सुधारने के लिए श्री कृष्ण की बाल लीला का वर्णन बड़े ही तन्मयता से किया है-

ठग ठग दूध पियाथस मोला 

चूंदी छू के कहय कन्हइया,

कतक बेर ले दूध पियाबे

चिटको अबले बढ़िस न मइया.


उधो अउ गोपी मनके प्रसंग के चार डांड़ देखव, जेमा उधो के निरगुण ज्ञान ल ठुकरावत दू आखर कहि देथें-

बिन सोंचे समझे उधो तू ब्रज म आया

महुरा भरे स्याम संदेशा इहा सुनाया

लेगे ठग के कान्हा ला अक्रुर इहाँ ले

अइसे लगथे जाहव अव प्रान इहाँ ले.


गीता म भगवान कृष्ण कर्म के संदेश देवत कहे हें- 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' एला कश्यप जी छत्तीसगढ़ी म कतका सुग्घर कहे हें-

करम जोग निस्काम बीज के अरजुन नास न होवय.

उल्टा वोकर साधक ला, चिटको फल दोस न होवय..


यदा यदा ही धर्मस्य... वाले श्लोक के छत्तीसगढ़ी रूप देखव-

जब जब होथे हानि धरम के, अधरम बढ़ जाथे संसार.

तब तब रच के रूप अपन मैं परगट होथंव ले अवतार..


    धार्मिक महत्व के तीनों महाकाव्य के संगे-संग अउ जम्मो विषय म अपन लेखनी ल रेंगइया कश्यप जी के प्राथमिक शिक्षा अपन बड़े भाई हीरालाल जी के छांव म राहत गाँवेच म होइस, तेकर पाछू मिडिल के पढ़ई बिलासपुर म करिन, फेर नवमी ले लेके उच्च शिक्षा ल इलाहाबाद म 1931 म पूरा करिन. छात्र जीवन के बेरा उन स्वाधीनता आन्दोलन म घलो संघरिन, जेकर सेती जेलयात्रा घलो करे ल परिस. राजस्व विभाग के कतकों पद म राहत उन बछर 1961 म दुरुग जिला ले सेवानिवृत्त होके साहित्य के अथाह साधना म मगन होगिन. हिन्दी अउ  छत्तीसगढ़ी साहित्य संसार ल गौरवान्वित करत ए महाकवि महामानव ह 2 मार्च 1985 के नश्वर देंह के त्याग करत परमधाम के रद्दा रेंग देइन.

उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी... सेवा जोहार 🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

Thursday, 3 March 2022

बिहाव तोला झूलना झूले बर नइ आवय दुल्हा बाबू

 बिहाव

तोला झूलना झूले बर नइ आवय दुल्हा बाबू


- दुर्गा प्रसाद पारकर 


बर बिहाव हमर लोक संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग आय। जउन ह हमला विरासत म मिले हे। बर बिहाव वंश बढ़ोतरी के संगे संग आदिम प्रेम, परस्पर सहयोग अउ सहज आकर्षण के किताब आय। किताब के पन्ना ल जेठउनी (तुलसी बिहाव) ले पढ़े ल धर लेथे। राम नउमी पाख अउ अकती म जादा भांवर परथे। अकती ल देव लगन माने गे हे।

सबले पहिली घर के सियान ह अपन घर के बहु बने के लइक लड़की टटोलथे। जान पहिचान रिश्ता नाता मन सगा जोड़े म सहयोग करथे पहिली तो मुखिया ह लड़की देख लेथे। ओखर बाद बेटा ल लड़की देखे बर भेजथे। मान ले लड़का ह लड़की ल पसंद कर डरिस ताहन फेर गोठ बात ल आगु बढ़ाथे। बिहाव के दौरान सटका (मध्यस्थता करइया) के महत्वपूर्ण भूमिका रथे। सुरु म लड़का के बाप ह नोनी ल पइसा धरा के बात ल पक्का कर लेथे। जिहां पांच परमेश्वर जरुर रहिथे। इही दिन फलदान के दिन ल तय कर लेथे। आघु जमाना म तो जऊन ल सियान ह पसंद कर लिस बहु बनाए बर उही ल बेटा के टोटा म घंटी बांध देवत रीहिन हे। मान ले बात पक्का होय के बाद अउ सगा उतरथे उन ल लड़की के बाप ह हाथ जोड़ के कहि देथे मंय तो फलाना जघा बेटी ल हार डरें हंव सगा। मान ले लड़की पक्ष वाले मन ल लड़का पसंद नई आवय या बर बिहाव करे के ताकत नइ राहय या अउ कोनो कारण से बिहाव नइ कर सकय तब सगा ल कहि देथे येसो तो मोर हिम्मत नई हे सगा बिहाव करे के। मान ले लड़की सुन्दर हे, गोरी हे अउ ओखर होवइया पति बिलवा हे, ये बात ल जान के नोनी के जी ह उदास हो जथे। बिहाव करे बर ओखर मन थोरको नइ तियार होवे। अइसन स्थिति म नारी परानी मन समझाथे-तोर सही भागमानी कोनो नई हे नोनी, भगवान कस जोड़ी फबे हे तुंहला। राम, विष्णु, शंकर अउ कृष्ण ह तो सांवला रीहिस हे फेर सीता, लक्ष्मी, पारवती अउ राधा ह तो गोरी रीहिस हे। तोर ले किस्मत वाले कोनो नइ हे जेन ल भगवान कस सांवला पति मिले हे। रही बात रंग के त फेर सुन-महतारी के कोख ह कुम्हार के आवा ताय कोनो करिया हो जथे त कोनो पड़री।


करिया गोरिया बिटिया झन कांही कहिबे

करिया हे सिरी भगवान हो

माई के कोख कुम्हार के आवा

कोई कारे कोई गोरे हो


फलदान के दिन लुगरा-पोलखा, चूरी-चाकी, तेल-फूल अउ हरदी, सुपारी धर के लड़का पक्ष वाले मन लड़की के घर जाथे। अंगना ल लीप पोत के धान के चऊंक पुरथे। उपर म फुलकसिया लोटा म पानी भर के नांदी म तोप देथे। तोप के नांदी के ऊपर दीया बार के कलस के स्थापना करथे। कलस म आमा पाना खोंचाए रहिथे। वर पक्ष डहर ले लाने सामान ल चऊंक के तीर म मड़ा देथे। गौरी पूजा होथे। हवन होथे। दूनो पक्ष हवन करथे। हवन के बाद दूनो समधी एक दुसर के कान म दूबी खोंच के समधी भेंट कर के जै जोहार बनाथे। वर पक्ष डाहर ले लाए श्रृंगार के जिनीस ल सुबासिन ह लड़की करा लेगथे। इही लुगरा पोलखा ल पहिरा के लड़की ल पांव पराए बर निकालथे। पांव परौनी सगुन के रूपिया धराथे। फलदान के खुसी म वर पक्ष वाले मन पर्रा बिसाथे जेमा एक पर्रा चना रहिथे चना म गुड़ मिला के ठोमा ठोमा लोगन ल बांटथे। फलदान ल आधा बिहाव मान लेथे। फलदान ल लोक भासा म चूरी पटका लेगई अऊ चुमा चाटी लेवई कहिथन। मंगनी जचनी के बाद फलदान अऊ फलदान के बाद नेवता बटई चालू हो जथे जइसे वर चि. मनराखन आत्मज रामाधार संग वधु सौ. का. दुकलहीन बाई आत्मजा थनवार। दूनो झिन परिणय सूत्र म बंधत हे। हमर दुवारी म पधार के वर-वधु ल असीस देहू।

चुरमाटी के दिन नेवतहार सगा मन बिहतरा घर पहुंच जय रहिथे। चुरमाटी झोंके बर ममा-मामी मन लुगरा लानथे। इही लुगरा म चुरमाटी झोंके जाथे। फूफू ह तेल चघनी कपड़ा लानथे। इही कपड़ा (सादा) ल पहिरा के तेल हरदी चघाथे। चुरमाटी कार्यक्रम म संघरे बर गांव भर ल नेवता देथे। पिसान के घोल, भात के मुठिया अउ गोबर धर के चुरमाटी बर सगा सोदर मन बाजा गाजा के संग जाथे। साबर म धोती ल खोंच के खांध म बोहे रहिथे। ओला ढेड़हा कहिथन। बजनिया मन रेंगनी पार बाजा बजाथे ताहन सब चुरमाटी लाने बर आगु तनी बढ़थे। बीच-बीच म देवी देवता  मन करा पिसान के घोल के आचमन कर के दू-दू ठन भात अउ गोबर के मुठिया मड़ा के हुम धूप देथे। कार्यक्रम ल सिद्ध पारे बर बिनती करथे। चुरमाटी ठउर म हुम धूप दे के सुवासा सहित पांच झिन साबर ल हाथ लगा के माटी कोड़थे जेला ममा मामी डहर ले लाने लुगरा म झोंक के पर्रा म राखथे, माटी कोड़े के बेर ढेड़हा ल भड़थे -


तोला साबर धरे ल नइ आवय मीर

धीरे-धीरे तोर पागा ल तीर

तोला माटी कोड़े ल नइ आवय मीर

धीरे-धीरे अपन कनिहा ल तीर

तोला माटी जोरे ल नइ आवय मीर

धीरे-धीरे तोर धोती ल तीर


चुरमाटी जोराए के बाद चिला अउ फरा ल सेकलाए जन समूह ल बांटथे। घर तनी गाना गावत जाथे - तंय बलाए अउ मंय आयेंव, तोर घर के मुहाटी ल पुछत आयेंव होरे-होरे...। बाजा रे बाजे डमऊ नइ हे, तोर घर के मुहाटी म समऊ नइ हे होरे-होरे...। डेरौठी म लोटा के पानी ल ओरछ के स्वागत करथे। चुरमाटी ले आए के बाद तेल पियाए के नेंग होथे। इही ल तेलमाटी-चुरमाटी कहीथन।

मायन के दिन डूमर के डारा, आमा के पाना के मड़वा छाथे। एक बिहाव म दू मड़वा। गड्ढा करके तांबा, रूपिया डार के एक जोड़ी बांस ल एक-एक जघा गड़ियाए जाथे। घर के मुहाटी के दूनो ओर मड़वा गड़ियाथे जेखर उपर कांसी बंधाए रहिथे जेमा पापड़, मिरी, छेना, बरा, सोंहारी, आलू अउ गोंदली ह गुंथाए रहिथे। चुरमाटी ल बढ़िया सान के मड़वा म चबुतरा कस बना के धान ल खोंच-खोंच के सुग्घर सजा लेथे। करसी म छींद के मऊंर ल बांधे जाथे। मड़वा म सील ल ओधा देथे। इही सील  म हरदी ल पीस के हरदी चढ़ाए के क्रम के सुरूआत हो जथे। ढेड़हीन के अंगरी ल वर/वधु धर के मड़वा के चारो मुड़ा किंजरथे ओखर पीछू - पीछू पर्रा म हरदी धर के बेटी माई मन किंजरथे। भांवर पूरा होय के बाद फूफू/दाई/डोकरी दाई के आघु माड़े पीढ़हा म उखरू बइठ जथे। फूफू ह अपन लुगरा के अचरा ल वर/वधु के मुड़ी म टेका के असीस देथे। बिहाव के निपटत ले वर/वधु ल सुता पहिराए के परम्परा ह पहिलीच ले चले आवत हे।

बइगा घर दतेला नाचे बर जाथे। एखर बाद डूमर के मंगरोहन परघाथे। धोबी घर ले आगी लान के चुल जला के भात रांधथे ताहन फेर मैन मांदी परथे। नेंग ह चलते रहिथे। तेल उतारथे। पर्रा म बइठार के मुड़ी उपर पर्रा राख के उपर म पानी रिको के वर/वधु ल असनान कराथे। नहवाए के बाद दूल्हा ल चद्दर ओढ़ा के सात भांवर नाचत गावत किंजारथे।

बरतिया भात खाए बर नेवतहार मन ल बलाथे। सेर चाऊंर झोंका के घलो बरात जाय बर अपन स्वीकृति दे सकथे। गाड़ा बाजा वाले मन सम्हर के नाचथे-कूदथे। ओती खवई पोरसई चलत रहिथे एती दूल्हा के सवांगा करथे। धोती कुरता पहिरा के मोजा जूता पहिरा देथे। आंखी ल काजर म आंज के माई मऊंर ल पहिरा देथे। मऊंर सऊंपे के क्रम चलथे। दुल्हा के हाथ ल माथ म टेका के अउ दीया म हाथ ल सेंक के मऊंर सऊंपथे। बरात निकले के बखत महतारी ह थनौरी देथे। वधु बिहाय के बात  ह जतका बढ़िहा लोक गीत म मिलही ओहा अउ कोनो जघा सुने बर नइ मिलय जइसे -


दे तो दाई, दे तो दाई

असी ओ रूपइया कि असी ओ रूपइया

कि सुंदरी ल लानिहौं बिहाय


जवाब म महतारी कथे -


'सुंदरी - सुंदरी तुम झन रटव बेटा

कि सुंदरी के देस बड़ दूर

कि अरे बाबू सुन्दरी के देस बड़ दूरÓ


बरात बिदा के बाद माइलोगन मन खुशी के मारे नाचे कूदे बर धर लेथे। इही ल नकटा नाच के नाव ले जानथन। बरात के निकलती म भरे हण्डा म रूपया - दू रूपया सगुन के रूप म डारथे। बइला गाड़ी के डाड़ी म झांपी बंधाए रहिथे। जेन गाड़ी म दुल्हा राजा ह बइठथे ओहा कोनो रथ ले कम नइ दिखय। बरात ह जनकपुर पहुंच जथे। बराती मन के भारी सुआगत सतकार होथे। बाजा - गाजा के संग परघाए बर आथे। समधी भेंट होथे ताहन फेर लड़की के ददा ह लड़का के ददा के अंगरी ल धर के घरतिया मन बरतिया ल लेगथे। ओती मड़वा छुआए के कार्यक्रम होथे। जेवनास म पहुंचते भार घरतिया मन बरतिया मन के गोड़ धोथे ताहन दुल्हा राजा ल जेनवास म लेग जथे। एखर बाद नेगेंच-नेंग। लाल भाजी खवाथे। लड़की के सिंगार के सामान ल घरतिया मन लेगथे। गोधूली बेला म पाणिग्रहण होथे। भांवर परे के बाद टिकावन के कार्यक्रम होथे। टिकावन के बखत गाना गवइया मन ल घलो रूपया - दू रूपया देथे। तभे तो उमन नता देख के बने गीद गाथे -


इही धरम ले धरम हे ग

अ ग मोर ददा फेर धरम नइ तो पाबे ग

लागत रेहे छूटी डारे ग

अ ग मोर ददा

चना खाए बर पइसा देबे ग -


जनम-जनम गांठ जोरि दे, ए जोतसी जनम-जनम गांठ जोर दे। गांठे के बंधना झनि छूटे, ए जोतसी जनम-जनम गांठ जोरि दे। इही गीत के चलतेच घरतिया के आंखी ह डबडबा जय रहिथे फेर बेटी बिदाई के समय तो आंखी के आंसू ह दुख के गंगा बोहा देथे। महतारी जब मऊंर सऊंप के भेंट लागथे ततका बेरा के दृश्य जिनगी भर म सब ले भारी लागथे। बेटी अपन बात कहि के रोथे-मोला सगा आवत हे कहिबे दाई ए हें हें...। अइसने कतनो बात के सुरता करथे। महतारी तो बियाकुल हो जथे, जब अपन करेजा के टुकड़ा ल घर ले बिदा करथे। फेर एक तो प्रकृति के नियम आय निभाएच ल परथे। लड़की के भाई सगुन स्वरूप गुर पानी पिया के बिदा देथे। दुल्हा दुल्हिन चाउंर ल पीछू डाहर फेंकत घर ले निकल जथे। एकर बाद तो ए बात ह सिरतोन लागथे कि बेटी ह तो पर के धन हरे ग।

बरतिया मन हंसी-खुशी दुल्हिन ल बिहा के अपन गांव आथे। परघाथे ताहन संझा कना धरम टीका के कार्यक्रम होथे। ओइसे तो आजकल गरजरावन के नेंग ल बिहाव बखत टोर देथे। बिहान दिन लड़की ल लेगे बर चौथिया आथे। उहें समधीन भेंट के नेंग ह निपट जथे। मान ले कोनो कारण समधीन भेंट ह रूक जथे त फेर छ_ी के बखत समधीन भेंट ह होथे। ओइसे तो बिहाव तीन किसम के होथे : (1) ठीका बिहाव (2) मंझली बिहाव (3) बड़े बिहाव। ठीका बिहाव म सबो कार्यक्रम ह लड़का वाले घर निपटथे। मंझली बिहाव म चद्दर ओढ़ के लगिन लागथे अउ बड़े बिहाव म साखोचार पढ़ाए जाथे। छत्तीसगढ़ के जन जीवन म बिहाव संस्कार के पद्धति ह श्रीराम कथा उपर आधारित हे। तभे तो बिहाव बखत वर ल राम अउ वधु ल सीता माने गे हे। ससुरार ल जनकपुर के नाव ले संबोधित करके गर्व महसूस करथे। युग-युग के वातावरण भले बदल जही फेर संस्कृति के मूल भावना ह नइ बदले। ओखर वातावरण भले बदल सकथे फेर ओखर भीतरी निहित भाव इही रही एला स्वीकार करे ल परही।

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दुर्गा प्रसाद पारकर

व्यंग्य- ररुहा सपनाये दार भात …….

व्यंग्य- ररुहा सपनाये ……. 

                    सरग म ब्रम्हाजी के पाँच बछर के कार्यकाल पूरा होगे । नावा ब्रम्हा चुने बर मंथन चलत रहय । सत्ताधारी इंद्र अपन पार्टी अऊ सहयोगी मन के बीच घोषणा कर दिस के , ये पइत दलित ला ब्रम्हा बनाना हे । जबले ब्रम्हा चुनई के घोषणा होये रहय तबले हमर गाँव के मनखेमन मरे बर मरत रहय । जल्दी मरबो सोंचके , खेती किसानी के समे , काम बूता .. खाये पिये ला घला त्याग दिन अऊ दसना म परे परे यमदूत के अगोरा करे लागिन । कतको झिन बिन पारी के अइसन घुट घुट मरे के बजाय , एके घाँव म मर जाये के तरीका अखतियारे लागिन । कुछ मन मरे बर , घेरी बेरी सरकारी अस्पताल के चक्कर लगाये लागिन । एक झिन महराज के पूछ परख बढ़गे । उही टिकिस दिही कस , ओकर घर मनखे के रेम लगे रहय । परोसी ला पूछ पारेंव – काबर रोज महराज घर के चक्कर लगाथव ? वो किथे – तैं नइ जानस जी , महराज बताये हे के , ये दारी सरग म दलित मनखे ला ब्रम्हा बनाये जाही । उही दिन ले , ब्रम्हा बने के टिकिस पाये बर , महराज करा अनुस्ठान करवावत हँव । जे दिन अनुस्ठान पूरा हो जही ते दिन खत्ता म टिकिस मुहीच ला मिलही । मे केहेंव – अरे भइया , चुनई सरग म हे , तैं धरती म रहिथस , तोला कइसे टिकिस मिलही । परोसी किथे – सरग जाये बर छिन भर नइ लागे , जतका बेर पाबो ततका बेर उठ अऊ रेंग , जे दिन टिकिस के गारंटी होही .... सरग बर निकल जहूँ । मे पूछेंव - तुहींच ला टिकिस मिलही तेकर का गारंटी ? का तिहींच भर दलित आवस , हमर गाँव म अऊ कतको दलित हे । वो किथे – भलुक अऊ कतको दलित हमर गाँव म हे , फेर ब्रम्ह सत्ता सबके भाग म निये । महराज के बिचार म मोर नाव वाला दलित मनखे ला टिकिस मिलही , तेकर सेती घेरी बेरी , महराज के आशीर्वाद पाये बर .. ओकर .. एक चक्कर मार लेथन । अइसे भी मोला जे सपना आये हे , तेकर मतलब महराज बतइस के , मोरे चाँस जादा हे .....। 

                    महराज ला पूछेंव । महराज किथे – तैं मोर माली हालत ला जानत रेहे । खाये बर दाना अऊ पहिरे बर कपड़ा नइ रिहीस .... घर के छानी के खपरा , जगा जगा ले टूटे फूटे रहय । का करँव , कइसे करँव , कतिंहा मुड़ी ढाँकंव । रोज के आवश्यकता ला कइसेच पूरा करँव ? को जनी काये बात के सजा देबर , भगवान हमन ला , बामहन घर जनम दिस होही । न मोर नाव के राशन कार्ड म चऊँर मिलय , न चुनई म कपड़ा लत्ता , न घर बनाये बर सरकारी सहायता । परिवार चलाये बर , कुछ न कुछ काम बूता करेच बर लागही । मेहनत के बूता कर नइ सकँव , सत्यनरायण के कथा पूजा म कतेक चढ़होत्तरी ..... ? तेकर सेती , अपन पुस्तैनी धंधा ला सुरू करे हँव । में सहींच म किंदर के देखेंव ..... महराज घर के खपरा खदर छानी ला टोर के , पक्का सीमेंट छड़ के छत बनाये बर , केऊ झिन मनखे लगे रहंय । बोरा बोरा चऊंर , महराज के घर म अमरावत देखेंव , ओकर घर म नावा कम्प्यूटर अऊ ओकर हाथ म बड़े जिनीस कंपनी के बड़े जिनीस मोबाइल । मे केहेंव – पुस्तैनी धँधा तो ठीक हे महराज फेर , गरीब मनखे मनला काबर ठगथस ? महराज किथे – भगवान कसम , मे कन्हो ला नइ ठगँव । में पूछेंव - तैं का केहेस येमन ला ? महराज किथे – अतके केहेंव के , ये दारी सरग म , दलित मनखे , ब्रम्हा चुने जाही । पता निही का समझिन , उही दिन ले सेवा करे लागिन । में झिड़केंव – गरीब के जिनगी काबर बिगाड़त हस महराज ? काबर ओमन ला अतेक बड़े सपना देखावथस ? काबर ओकर मनके भाग रचथस ? महराज के जी रोवासी होगे – जे अपन भाग नइ रच सकय ते दूसर के का रचही । जे अपन भविष्य ला नइ पढ़ सकय ते , दूसर के भविष्य के का गणना करही । महराज के आँखी ले टप टप बोहावत आँसू , मोला अऊ कुछु पूछे के आज्ञा नइ दिस । 

                     वापिस घर निंगत , परोसी ला फेर देख पारेंव । में केहेंव - काबर काकरो बात म आथव जी तूमन ? महराज , वइसन थोरहे केहे हे ? वो किथे – महराज बिचार के केहे हे । ओकर पोथी पतरा लबारी हो सकत हे , फेर अखबार अऊ मोबाइल थोरहे लबारी मारही ? मे केहेंव - महराज तूमन ला बरगला के स्वारथ पुरती करत हे ? वो फेर किथे – महराज केहे हे के , दलित ला टिकिस मिलही , माने मिलहीच ? में फेर पूछेंव – महराज के अनुसार , ब्रम्हा चुनई म तोला टिकिस मिलही फेर , हमर गाँव के एक झिन मई लोगिन ला घला , अपनेच पिछोत के परसार म , अनुस्ठान काबर करवावत हे महराज हा ...... । परोसी किथे – तहूँ कहींच नइ जानस जी , सत्तापक्ष के मन एक झिन ला ठड़ा कराही , त विपक्ष के मन दूसर ला .....। महराज केहे हे , एक कोती बाबू जात त , दूसर कोती , मई लोगिन ला टिकिस मिलही । को जनी काकर भाग म , ब्रम्हा बने के जोग .....। मे फेर पूछेंव – कनहो मई लोगिन ला ब्रम्हा बनत देखे हव जी तूमन .... . महराज तूमन ला लूटे बर ......  मोर बात पूरा नइ हो पइस , परोसी सुरू होगे – आज तक जे ब्रम्हा बनथे तेमन मई लोगिन कस तो रहिथे , इंद्र जे कहि दिस तिही ला , घर के मई लोगिन कस हाँ में हाँ मिला देथे ..... एको बेर तो मना करतीस । अइसन म सहींच के मई लोगिन , यदि ब्रम्हा के खुरसी म बइठ जही त , कनहो ला काये फरक परही । 

                   परोसी किथे - तैं मोला बहुत पूछ डरे , अब तैं बता , हमर गाँव छोंड़ , हमर देश म , दलित मनखे अऊ कतिंहाँ हे ? ओकर एके सवाल म , चक्कर आये बर धर लिस । मुड़ी म पानी थोपिस त जवाब देंवत केहेंव – केवल हमरेच गाँव म दलित मनखे रहितिस त ओ मन ला , जित्ते जियत हमरेच देश म , कतको राज्य के मुखिया बने के चाँस नइ मिलतिस जी...... । 

                     बीते चुनई के सुरता आगे ओला । मुहुँ के पानी थोकिन उतरे लगिस । मेहा ओला समझावत केहेंव - देश के कतको जगा म दलित मन रहिथे बइहा ...... । परोसी किथे – रहत होही ...... फेर हमर कस कतिंहाँ हे तिहीं बता ... ? सरलग केहे लागीस - हमर नाव के रासन कार्ड बनथे जरूर , फेर पारी पारी ले चऊँर ला ... सरपंच अऊ मुखिया लेग जथे । हमर लइका के स्कालरशिप म , गुरूजी के बेटा पढ़थे अऊ साहेब बन जथे । हमर नाव के भुइंया म , गऊँटिया खेती करथे । पेट्रोल पम्प हमर नाव ले खुलथे फेर , मालिक हमर बिधायक होथे । हमर बर आवास के आये पइसा म , इंजीनियर के घर शहर म खड़ा हो जथे । हमर बर कागज म केऊ बेर सुक्खा कुवाँ खनाथे , हमर सरकारी पम्प , दाऊ के खेत म सिचई करथे । हमर लइका जे स्कूल म पढ़थे तिंहाँ , गुरूजी नइ रहय , रहिथे तेमन , सरकार ला जानकारी देबर व्यस्त या हड़ताल म .....। अस्पताल म गाय गरू कस हमर इलाज होथे ..। मंदिर अऊ मस्जिद हमर प्रार्थना के जगा नोहे , हमर लहू म इरखा द्वेष भरे के जगा आय । धान हमन उपजाथन , बोनस कोचिया पाथे । तैं सुन नइ सकस ....., बलात्कार करके बड़े मनखे निकल जथे , जेल म हमर लइका सरथे । डाका पुलिस डरवाथे , चोरी म हमन फंसथन । हमर पढ़हे लिखे होशियार लइका मजदूरी करे बर मजबूर हे , बड़का मनके गदहा पिला मन , बड़े जिनीस अफसर बन जथे ...... । अब बता , हमर गाँव के मनखे , दलित आवय के निही अऊ महराज मुताबिक सरग के प्रथम नागरिक बने के अधिकार हे के निही ...... ? 

                    ओकर बात म बहुत दम रिहिस , फेर ओकर भ्रम ला टोरना रिहिस । में केहेंव – ये तोर दलित होये के प्रमाण नोहे बाबू ।  ये लक्षण तो जनता के आय । दलित बने बर बहुत योग्यता चाही ......? वो सुकुरदुम होके किथे - का .. ? ओकरो बर पढ़हे लिखे लागथे का जी .... गऊकिन हम बाप पुरखा नइ जानत रेहे हन ? मे केहेंव – ओतके ले काम नइ चलय , जेकर तिर , बंगला , मोटर गाड़ी अऊ हाली मोहाली हालत डोलत रहिथे अऊ जे कतको पइसा के असामी होथे , ते मनखे सरग म दलित कहलाथे । दलित बने बर भारी तपस्या करे बर लागथे । कतको पीढ़ी ला कुर्बानी देबर लागथे । समझिस निही , फोर के बतायेंव – दलित नाव पाके ... पद पदवी अऊ पइसा झोंके बर उदिम करे बर लागथे .. सबले पहिली .. लबारी मारे म उस्तादी हासिल होना चाही । जब पाये तब , जात धरम देश बदले के काबिलियत होना चाही । बइमानी करके मीठ मीठ बानी म , एक दूसर ला रिझाये के गुन होना चाही । अतके म बात नइ बनय । सत्ता के डोंगा पार लगाये बर , जेकर थोथना म पतवार बने के क्षमता होथे , उही हा दलित होय के सुख पाथे । अऊ तैंहा बिगन पढ़े लिखे .. बिगन पइसा धरे अपन आप ला दलित कहिथस ... तोला शरम नइ लागे । सत्ता निसेनी के पकति आव तूमन .. जेकर उपर गोड़ मढ़ा के चघइया हा दलित होय के इनाम झोकथे । तूमन अपन आप ला दलवइया आव ... दलित नोहो .. । अपन जब तक दलावत रहू , सरग म घला , धरती कस आखिरी नागरिक रहू , जब दलइया के दल म शामिल हो जहू तब , सरग के प्रथम नागरिक बने के सपना देखे के काबिल हो जहू । ओ किथे - अतका करत ले हमर कतको पीढ़ी गुजर जही , जनता ले दलित बने बर अतका ढमढम करे बर लागही कहिके , हम नइ जानत रेहे हाबन । अइसन म हमन ला ब्रम्हा बने बर सोंचना भी नइ चाही । में बाहिर म ठड़ा होके अऊ कुछू केहे सुने बर अगोरतेच हँव .. ओहा लकर धकर घर म निंगिस । फेंटा मारिस , चोंगा धरिस , खुमरी ओढ़ , खेत डहर , सुआरी संग , बासी अथान धरके , अपन नानुक पेट के नानुक सपना ला पूरा करे बर ददरिया गावत मसक दिस । मे पूछेंव – कहाँ ? परोसी किथे – ररुहा ला दार भात ले जादा सपनाये के बारे म नइ सोंचना चाही ......।      

    हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

2 मार्च पुण्यतिथि म सुरता//




 

2 मार्च पुण्यतिथि म सुरता//

छत्तीसगढ़ी अस्मिता बर समर्पित रहिन पवन दीवान ...

   छत्तीसगढ़ी कला, साहित्य के संगे- संग छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन म लइकई उमर ले रुचि रखे अउ संघरे के सेती संत कवि पवन दीवान जी के नांव अउ काम ले तो मैं आगूच ले परिचित रेहेंव, फेर उंकर दर्शन पहिली बेर तब होइस, जब उन पृथक छत्तीसगढ़ पार्टी के बैनर म रायपुर लोकसभा ले गाड़ी छाप म चुनाव लड़िन.

  तब मैं पढ़त रेहेंव. मोला सुरता हे, वो बखत हमन रायपुर के अमीनपारा म नव दुर्गा चौक म राहत रेहेन. दीवान जी अपन चुनाव प्रचार खातिर शीतला मंदिर डहर ले रेंगत रेंगत सब झन ल जोहार करत महामाया मंदिर डहर आवत रहिन. हमर घर दूनों मंदिर के बीच म रिहिसे, तेकर सेती दीवान जी ल देखइया अउ भेंट करइया मन के ए जगा भारी भीड़ होगे राहय.

  हमूं मनला जब जानकारी होइस, के दीवान जी इही डहार रेंगत रेंगत आवत हें, त हमूं मन घर ले निकल के बाहिर आगेन. उन माईलोगिन मन ल हाथ जोर के जोहार करंय अउ आदमी जात मन संग हाथ घलो मिला लेवंय. मन तो मोरो होइस के हाथ मिलाए जाय, फेर नइ मिला पाएन.

   जब हमन पढ़त राहन त हर शनिच्चर इतवार के छुट्टी म अपन गाँव नगरगांव जावन. दीवान जी ल रायपुर म चुनाव प्रचार करत देखे के बाद जब गाँव गेंव, त उहों इही चुनावे के गोठ होवत राहय. गाँव म हमर पारा के जम्मो सियान मन सकला के दीवान जी ल ही वोट दे के बात करत रहिन. हमूं मन उंकर चुनाव प्रचार करे के नांव म अपन गाँव के संग म तीर तखार के अउ गाँव मन म जाके उंकर चुनाव चिनहा 'गाड़ी छापछाप' बनावन.

   बाद म जब साहित्य जगत म आएन, तेकर पाछू तो फेर कतकों जगा उंकर संग मेल भेंट होवय. तहाँ ले तो अइसनो बेरा आइस, के उंकर संग एके मंच म बइठ के कविता पाठ घलो करे ले मिल जावय.

    तब के रायपुर जिला (अब गरियाबंद) के गाँव किरवई म 1 जनवरी 1945 के जन्मे पवन दीवान जी के चिन्हारी कवि, साहित्यकार के संगे-संग भागवत के प्रसिद्ध प्रवचनकार के रूप म घलो रिहिसे. उंकर आध्यात्मिक नांव स्वामी अमृतानंद सरस्वती रिहिसे. फेर हमला उंकर भागवत प्रवचन सुने के मौका तो नइ मिलिस. हां, एक पइत जरूर उंकर भागवत कथा के अंतिम बेरा के पांच मिनट देखे बर मिलिस.

   हमन मीर अली मीर, संजय शर्मा 'कबीर' अउ मैं कवि सम्मेलन म संघरे खातिर रायपुर ले थान खम्हरिया जावत रेहेन. रद्दा म जानबा होइस, के आदरणीय दीवान जी के भागवत आगू के एक गाँव म होवत हे. हमन आपस म चर्चा करेन, चलौ दीवान जी ल घलो अपन संग म ले चलथन, कवि सम्मेलन के गरिमा बाढ़ जाही.

   गाँव के भांठा म स्कूल तीर भारी पंडाल लगे राहय. हमन वो मेर पहुंचेन, त कथा समापन के पाछू आरती होवत राहय. आरती के पाछू दीवान जी व्यास गद्दी ले खाल्हे आइन. एती हमन ल देख के अपन परिचित शैली म उन हांसिन, अउ कहिन- अरे तहूं मन भागवत सुने बर आए हव, अतेक दुरिहा? हमन उंनला बताएन के कवि सम्मेलन म जावत हन, बीच रद्दा म आपके भागवत के जानकारी मिलिस, त गुनेन आपो ल संग म ले चलिन. उन हांसिन अउ कहिन, अरे का बतावंव, भागवत चलत हे तेकर ए, नइते सिरतोन म चल देतेंव. मोला तो कवि सम्मेलन म जादा मजा आथे.

    वइसे तो उंकर संग चारों मुड़ा अबड़ संघरन. मैं उनला हमर समाज के कार्यक्रम म घलो बलावंव. छत्तीसगढ़ राज के स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद बघेल के जयंती के बेरा म हमर समाज द्वारा रायपुर के तात्यापारा वाले कुर्मी बोर्डिंग म  एक सप्ताह के अलग अलग कार्यक्रम रखे जावय. एकर साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रम के संयोजक मुंही ल बना देवंय. तेकर सेती एमा छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के संगे-संग संगोष्ठी अउ कुछू आने कार्यक्रम घलो राखन, त दीवान जी ल पहुना के रूप म बलावन. एक बछर इही मंच म डॉ. परदेशी राम वर्मा जी मोला डॉ. खूबचंद बघेल अगासदिया सम्मान दीवान जी के हाथ ले देवाए रिहिन हें, अउ संग म मोर कविता संकलन 'सब वोकरे संतान ए संगी' के विमोचन घरो करे रिहिन हें.

   अपन जिनगी के संझौती बेरा म उंकर डॉ. परदेशी राम वर्मा जी संग भारी मयारुक संबंध रिहिस. कहूँ जावयं त दूनों, कुछू करयं त दूनों. वोमन भगवान राम के महतारी माता कौशल्या के नांव ले एक ठन समिति 'माता कौशल्या गौरव अभियान समिति' घलो बनाए रिहिन हें. एकर जगा-जगा कार्यक्रम करंय. तब मैं सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ म रेहेंव. वोमन दूनों समाचार दे खातिर प्रेस मन म घलोक पहुँच जावंय. हमर प्रेस म आवंय, त मोला पहिलिच के फोन कर देवंय, हमन नीचे म खड़े हावन तैं जल्दी आ अउ ए समाचार ल आजेच छपवा देबे.

   माता कौशल्या गौरव अभियान वाले कार्यक्रम म आदरणीय दीवान जी एक बात ल हर मंच म कहंय- 'बंगाल के मन अपन देवता ल धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. गुजरात के मन अपन देवता ल धर के आइन हम उंकरो पांव परेन. उत्तर प्रदेश अउ बिहार के मन अपन देवता धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. पंजाब अउ महाराष्ट्र के मन अपन देवता धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. भइगे चारों मुड़ा के देवता मन के पांव परई चलत हे. फेर मैं पूछथौं, अरे ददा हो, भइगे दूसरेच मन के देवता के पांव परत रहिबो त अपन देवता के कब पांव परबो? वोकर देवता मनके पांव परई म हमर माथा खियागे, अउ वो परदेशिया मन इंकरे आड़ म इहाँ के जम्मो शासन-प्रशासन म छागें.'

   मोला उंकर ये बात बहुत अच्छा लागय. सिरतोन आय, हम दूसर सब के सम्मान करथन ए तो बने बात आय, फेर उंकर चक्कर म अपन देवता, अपन परंपरा, अपन इहाँ के पारंपरिक उपासना अउ जीवन पद्धति मन के उपेक्षा करई ह तो सही नोहय न?  इही बात ल लेके हमूं मन इहाँ के मूल आध्यात्मिक संस्कृति, पूजा उपासना के विधि अउ जीवन पद्धति मनला के प्रचार प्रसार खातिर एक समिति 'आदि धर्म जागृति संस्थान' बनाए हवन, अउ वोकर बेनर म मैदानी काम घलो करत रहिथन.

   अइसने सब बात मन के सेती हमन जब राजिम के प्रसिद्ध पारंपरिक पुन्नी मेला के नांव ल बदल के 'राजिम कुंभ' कर दिए गे रिहिसे, तेकर नंगत विरोध करन. कतकों पत्र-पत्रिका म लेख अउ समाचार घलो छपवाए रेहेन. एकर संबंध म आदरणीय दीवान जी मोर तारीफ करे रिहिन हें. उन काहंय, ए परदेसिया मन हमर परंपरा अउ संस्कृति के सत्यानाश करत हें. इहाँ के मूल संस्कृति खातिर उंकर मन म वाजिब म भारी पीरा रिहिसे.

   राजिम कुंभ के नांव ले जेन आयोजन होवय. वोमा संत समागम घलो होवय. एक पइत हम दूनों उहाँ संघर परेन. मैं दैनिक छत्तीसगढ़ के साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबार' के संपादन ल वो पइत  देखंव. वोमा राजिम ऊपर विशेषांक निकाले रेहेन, तेकर विमोचन उही मंच म होना रिहिसे. तेकर सेती प्रेस ले मोला भेज दे गे रिहिसे, अउ दीवान जी ल राजिम के रहवइया होए के सेती हाथ-पांव जोर के बलाए गे रिहिसे. संत समागम के ए मंच म विशेषांक के संपादन करे के सेती मोर सम्मान घलो करे गे रिहिसे.

   बाद म जब दूनों मिलेन त हांस डरेन. उन कहिन-' का करबे सुशील, तैं प्रेस म नौकरी करथस तेकर मजबूरी म इहाँ आए हस, ठउका अइसने मैं इहाँ रहिथंव, त बरपेली हाथ पांव ल जोर के मोला इहाँ तीर के लान लेथें.'

  आदरणीय दीवान जी 2 मार्च 2016 के ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले के परमधाम के रद्दा धर लेइन. हमन ल मीडिया ले जानबा मिलिस, के गुरुग्राम (हरियाणा) के एक अस्पताल म उन आखिरी सांस लेइन. बिहान दिन मंझनिया करीब 2 बजे उंकर राजिम आश्रम म उनला  समाधि दिए जाही. मैं ए खबर ल सुनते डॉ. परदेशी राम वर्मा जी ल फोन करेंव, त उन बताइन के हव खबर ह  सिरतोन आय. हमन राजिम जाए बर निकलगे हवन. तब महूं ह उनला आवत हंव कहिके तुरते राजिम बर निकल गेंव. 

   जावत-जावत रद्दा म मोर मन म उंकर बर श्रद्धांजलि के ए चार डांड़ गूंजे लागिस-

आंधी का रूप दिखाकर क्यों शांत हो गये पवन

तेरे ठहाकों से गूंज रहा है, अब भी धरा-गगन

काम अभी भी कई शेष हैं, जो तुमने प्रारंभ किए

छत्तीसगढ़ियों के सपनों को कुछ कुछ पूर्ण किए

उन्हें पूर्ण करने का हम तो, अब देते हैं वचन

यही हमारी श्रद्धांजलि है, शत-शत तुम्हे नमन

   उन महान आत्मा के सुरता ल डंडासरन पैलगी 🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

मुफ्तखोरी के लत ------------------------

 मुफ्तखोरी के लत

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    मेहनत के कमई ह पूरथे कहइया अउ कर्म ल पूजा मान के हमर देश के जेन निवासी मन जीतोड़ मिहनत करके अपन जिनगानी चलावयँ तेन मन अब मुफ्तखोरी के नशा म दिनोंदिन चूर होके चुराचूर होवत जावत हें।

       जइसे कोनों अक्खड़ दरूहा ह , धन अउ तन ल फूँक के चलाक बन जथे अउ भविष्य म फोकट के खाये पिये ल मिलही सोचके कोनो दूसर ल कुछ दिन ले अपन पइसा म खवाथे-पियाथे --- जब वो मनखे ह पिये ल सीख जथे --नशेड़ी हो जथे तहाँ ले कहना चालू करथे-- ले न जी बेवस्था कर। अब वो नवाँ-नवाँ नशेड़ी बने ह बेवस्था करे ल धर लेथे अउ अपन धन ल बर्बाद करे म भिंड़ जथे। इहू ह कोनो ल सिखोथे अउ ये फोकट म जुगाड़ के चैन तइयार हो जथे। नशा के सौदागर मन तको इही काम करथें ।लोगन ल कइसनों करके नशा के लत परवाथें अउ अपन उल्लू सीधा करथें।

         ओइसने आजकल जम्मों राजनैतिक दल मन जनता जनार्दन ल मुफ्तखोरी के नशा म ढकेलत हें। मुफ्तखोरी के लालच देके वोट अउ बहुमत पाके सत्ता के सिंहासन म बइठके राज्य या फेर देश के खजाना ल दूनों हाथ ले लूटे के जुगाड़ म लगे हें। अपन नाना प्रकार के करे झूठ-मूठ के वादा ल पूरा नइ कर पाइन त अब मुफ्त म बाँटे के नवाँ रसता निकाले हें। देश के धन ल बरबाद करके फोकट म बाँटे ल भला काला नइ आही ? देश भले गड्ढा म गिर जय--अर्थव्यवस्था भले चौपट हो जय--वोमन ल काबर गम होही। कोन मार उँकर घर के जाथे। कइसनो करके सत्ता चाही।

        आजकल ककरो भी घोषणा पत्र- या संकल्प पत्र ल देख लव रंग-रंग के मुफ्त बाँटे के वादा ले भरे परे हे। कोनो मुफ्त म चाँउर-दार, चना-गहूँ,नून-तेल, साबुन -सोडा देबो काहत हे त कतको मन  मुफ्त म बिजली-पानी, घर-दुवार, शौचालय, फोकट म रुपिया-पइसा, बेरोजगारी भत्ता, माइलोगिन मन के खाता म मुफ्त के पइसा देबो काहत हें त कतको मन पेंशन, लेपटॉप, मोबाइल, साइकिल, स्कूटर, कर्जामाफी, मुफ्त गैस सिलेंडर के लालच देवत हें। जम्मों झन के घोषणा पत्र ल मिला के देखे जाय त जनम ले लेके मौत तक मनखे ल कुछु करेच के जरूरत नइ परय। बस बइठे- बइठे उसर-फुसर के, मुसुर-मुसुर खाना हे। 

        सचमुच म जनता ल मुफ्तखोरी के लत परत जावत हे।ये मुफ्तखोरी के नशा ह दिन दूना-रात चौगुना फइलत जावत हे। नशा ह तो नशा होथे--चाहे कुछु चीज के नशा होवय---नुकशान तो करबे करही। मुफ्तखोरी के नशा ह लोगन ल अलाल अउ निकम्मा बनावत  हे। बेरोजगारी हे ---बेरोजगारी हे चिल्लाये ले का होही ? जनता ह जानबूझ के खुदे बेरोजगार बनत हे। खेत म काम करइया मजदूर नइ मिंलयँ। कतको फेक्ट्री मन तको बंद हो जावत हें।

      ये मुफ्तखोरी के सेती उत्पादन बाढ़त नइये ,उल्टा जिनिस मन के माँग ह सुरसा के मुँह कस बाढ़त हे त सोचे के बात ये मँहगाई ह बाढ़बे करही ।नाना प्रकार के समस्या पैदा होबे करही अउ सबले जादा मध्यम वर्ग ह पिसाबे करही।

      ये मुफ्तखोरी के नशा के चक्रव्यूह ल समझे म हमर मन ले भारी चूक होवत हे तइसे लागथे काबर के इही मुफ्तखोरी के सेती देश अउ राज्य मन कर्जा म बूड़त जावत हें। कर्जा उपर कर्जा ले लेके फोकट म बाँटे के बूता होवत हे। खाली खजाना ल भरे बर टेक्स उपर टेक्स लगत हे। पेट्रोल-डीजल अउ कतको समान मन के भाव मनमाँड़े बाढ़त जावत हे।

           कोनो कहि सकथे के सरकार ह जन कल्याणकारी होथे तेकर सेती मुफ्त म बाँटथे। फेर ये कइसन जन कल्याण जेन ह उल्टा श्राप लहुट जय, लोगन ल अलाल अउ बेकार बना दय, मँहगाई ल बढ़ावत जावय, अर्थव्यवस्था चौपट होवत जावय,देश कर्जा म बूड़त जाय, बैंक मन डूबत खाता म लदकावत जावयँ?

        असली जन कल्याण ह तब होही जब जनता ल मूलभूत सुविधा सहज रूप म मिलही। स्वास्थ्य अउ शिक्षा के व्यवस्था म सुधार होही , किसान ल कम रेट म खातू-माटी, बिजहा अउ दवाई -पानी मिलही। लोगन ल ईमानदारी ले नौकरी-चाकरी मिलही।रोजगार-धंधा म बढ़ोत्तरी होही। जेन सचमुच गरीब हे वोकर जीवन स्तर ऊँचा उठही। फोकट म राशन अउ गैजेट बाँटे ले जन कल्याण नइ होवय। 

         कुल मिलाके ये मुफ्तखोरी के नशा बड़ घातक हे येमा तुरंत कानूनी रूप ले रोंक लगना चाही। राजनैतिक दल मन के लोकलुभावन घोषणा म रोंक लगना चाही।


चोवा राम 'बादल '

हथबंद, छत्तीसगढ़

सुशील भोले: कहानी// ढेंकी



सुशील भोले: कहानी//   ढेंकी

   अगास के छाती म मुंदरहा के सुकुवा टंगा गे राहय. सुकुवा के दिखते सुकवारो के पॉंव खटिया छोड़ माटी संग मितानी बद लय. तहाँ ले सबले पहिली वोकर बुता होवय अपन पहाटिया ल जगाना, तेमा वो बेरा राहत बरदी लेके दइहान जा सकय. फेर पाछू वो लिपना-बहारना, माँजना-धोना करय. आजो अपन पहाटिया ल जगाए के पाछू तिरिया धरम के बुता म भीड़गे.

      सुकवारो रतिहा के जूठा बर्तन मनला रखियावत राहय, ततके बेर पहाटिया ह मुंह-कान धोके कोला-बारी तनी ले आईस अउ पंछा म मुंह पोंछत कहिस- 'पहाटनीन थोरिक चाय बनाना, आज बुजा ह थोरिक जाड़ असन जनावत हे.'

   'ले राहन दे तुंहर चोचला ल, रोजेच तो आय कुछू न कुछू ओढ़र करके चाहे पीयई. ये रोज के ताते-तात म तुंहर पेट नइ अगियावय तेमा?' सुकवारो बर्तन धोवत कहिस.

     सुकवारो के गोठ म पहाटिया थोक मुसकाइस, तहाँ ले बेलौली करे अस कहिस- 'अओ नेवरनीन... जब ले आए हस भइगे हुदरे असन गोठियाथस.. कभू तो...

     पहाटिया के बात पूरा नइ हो पाइस, अउ पहाटनीन बीचे म बोल परिस- 'नहीं त.. तुंहर संग लेवना लगाय सहीं गोठियावौं.'

     'त का हो जाही.. पहाटिया के जात, दूध-दही.. लेवना सहीं गोठिया लेबे त.'

    'ले राहन दे.. ये सब काम ल कोन लगवार आय तेन कर दिही? तुंहर का हे, सूत के उठेव तहाँ ले चाहे पीयई... तहाँ ले माखुर झर्रावत बरदी कोती रेंग देथौ. ये लोगन के बुता ल कभू देखे हौ? कतका मरथन-खपथन तेला हमीं जानथन, फेर तिरिया के काम.. नाम के न जस के.' काहत सुकवारो बर्तन धोना ल छोड़ के चाय बनाए बर चल दिस.

     पाछू पहाटिया ल बिदा करके फेर बर्तन-भांड़ा म भीड़गे. घर के जम्मो बुता जब झरगे, तब काठा भर धान लेके वोला ढेंकी म कूटे लागिस. ढेंकी के पूछी ल पॉंव म चपके के बाद वोकर मुसर लगे मुंह के उठई अउ फेर बाहना म गिरई के साथ जेन सुघ्घर सुर अउ ताल निकलय तेकर संग सुकवारो गुनगुनाय लागिस-

   रोपा लगाये कस हमूं लग जाथन

   मइके ले खना के ससुरार म बोवाथन

   फर-फूल धरथे फेर हमरो परान

   कइसे तिरिया जनम तैं दिए भगवान

   ' ...सुकवारो.. ये सुकवारो... अई भैरी होगे हस का?' बाहिर ले मनभरहा भाखा सुनाइस. लागिस के वोला कोनो हुंत करावत हे. सुकवारो ढेंकी कूटे ल छोड़ के बेंस हेरे बर चल दिस. फरिका ल तिरियाइस त आगू म भागा ल खड़े पाइस.

    'आ भागा आ.. भीतर आ' काहत पाछू लहुटगे.

    भागा भीतर आवत कहिथे- 'भारी बिधुन होके ढेंकी कूटथस दई तहूं ह. तोर फरिका के संकरी ल हला-हला के मोर हाथ घलो पिरागे.. फेर कोन जनी.. कान म काय जिनिस के ठेठा बोजे रहिथस ते?'

    भागा डहार ल देख के सुकवारो मुसका दिस, फेर कहिस कुछू नहीं. अॅंगना नहाक के फेर दूनों ढेंकी कुरिया म आगें. अउ आते सुकवारो भागा ल बइठे बर कहिके फेर ढेंकी कूटे बर भीड़गे.

    बाहना तीर धान खोए बर बइठत भागा फेर कहिथे- 'तोला ये रोजे-रोज के भुंकरूस-भुंकरूस ढेंकी कुटई ह बने लागथे वो सुकवारो? हम तो दई.. एकर भाखा ल सुनथन ततके म हाथ-पांव म फोरा परगे तइसे कस जनाए लागथे.'

    'एमा बने अउ गिनहा के का बात हे भागा?'

     'तभो ले दई.. गाँव म धनकुट्टी आगे हे, तभो ले तैं हंकरस-हंकरस करत रहिथस?'

    'काय करबो बहिनी... हमर पहाटिया ल धनकुट्टी म कूटे चाॅंउर के भात ह नइ मिठावय त?'

    'अई, भारी रंगरेला हे दई तोरो पहाटिया ह. हमर पहाटिया के आगू म जइसन परोस दे, तइसन खा लेथे.' भागा अपन पहाटिया के सिधई ल बताइस.

    सुकवारो अउ भागा के जोड़ी एके पहाट म लगे राहयं, तेकर सेती भागा अउ सुकवारो अपन ठाकुर मन घर संगे म पानी भरंय, तेही पाय के भागा रोज बिहन्चे सुकवारो घर आवय, तहाँ ले दूनों कुआँ कोती चले जायं.


* * * * *

    'छत वाले मन आज काय जिनिस पाले हें ओ, तेमा भारी खुलखुलावत हें?' पहाटिया रतिहा के जेवन करत सुकवारो मेर पूछिस. 

    सुकवारो कहिथे- 'वोकर बेटी-दमांद मन शहर ले आए हें न, तेकर सेती थोरिक जोरहा भाखा सुनावत हे.'

    'हूँ.. कब आइन हें?'

    -आजे सॉंझ किन तो आइन हें. लेवौ न, तुमन जल्दी-जल्दी खावौ.. नींद लागत हे, हमूं बोर-सकेल के सूतबोन... वोती मुंदरहा ले उठे बर लागथे, अउ एती रात ल अधिया देथौ. बने गतर के नींद घलो नइ परय- सुकवारो जम्हावत-जम्हावत कहिस.

    -खातेच तो हौं- काहत पहाटिया जल्दी-जल्दी खाए लागिस... रात जादा गहराय नइ रिहिसे, फेर गाँव म कोलिहा नरियावत सांय-सांय करे बर धर लेथे. छत वाले घर ले अभो हांसे-भकभकाए के भाखा सुनावत राहय. सुकवारो ए सबले अनचेत खटिया म पांव पसार डरे राहय. बपरी ल बिहाने उठ के जम्मो बुता करे बर जेन लागथे. पहाटिया घलो चोंगी चुहकत खटिया म धंस गे. चोंगी ल आखरी चुक्का तिरिस तहाँ ले भुइंया म रगड़ के बुता दिस. फेर कथरी ओढ़ के सुकवारो के सपना म समागे.


* * * * *

     सुकुवा के दिखते सुकवारो रोजे कस खटिया ले उठिस अउ तिरिया धरम म बूड़गे. पहाटिया ल चाय पिया के बिदा करिस तहाँ ले काठा भर धान लेके ढेंकी संग जूझे लागिस. थोरके पाछू लागिस के बाहिर ले कोनो बेंस ल बजावत हे. सोंचिस भागा होही, पानी भर बर आए होही. वो ढेंकी कूटे ल छोड़ बेंस ल हेरे बर चल दिस.

    बेंस ल हेर के देखिस त छत वाले घर के सेठइन ल आगू म पाइस. सुकवारो ल उनत बनिस न गुनत, काबर ते सरी जिनगी बीतगे फेर सेठइन कभू मरे-परे म घलो एती झांके बर घलो नइ आए रिहिसे, फेर आज कइसे चेत लहुटगे ते? तभो सुकवारो कथे- 'आवा सेठइन भीतर आव, का जिनिस के सेती अटक गे रेहेव ते, आज भिनसरहेच एती भुला परेव?'

     सुकवारो के बात पूरे नइ पाइस, अउ सेठइन वोकर ऊपर बंगबंगाए बर धर लिस- 'कस रे भड्डो! तैं भकरस-भकरस ढेंकी कूट के हमर नींद के तो सरी दिन सइतानास करथस. आज तो कम से कम एला सुरतातेस. जानस नहीं.. हमर बेटी-दमांद मन पहिली बेर शहर ले इहाँ आए हें, तोर सेती उंकर नींद उमचगे हे.'

    सेठइन के उदुपहा गोठ म सुकवारो अकचकागे, तभो ले बात झन बाढ़य अइसे गुन के कथे- 'का करबे सेठइन.. तुंही मालिक मन घर ले काठा-पइली पाथन, तेने ल अतके बेर कूट-काट के राखथन, तभे घर के चुल्हा बरथे... तहाँ ले तो दिन भर बुतेच-बुता.. बइठे तक के फुरसुद नइ मिलय.'

    सुकवारो के सरल सुभाव सेठइन ल जुड़ नइ कर पाइस, अउ तिल ले ताड़ बनगे. देखते-देखत अरोस-परोस के मन अपन-अपन घर ले निकल के वो मेर सकलाए लागिन. सेठइन के सेठ, वोकर बेटी-दमांद जम्मो जुरियागें. सबो सुकवारो ल चुप रेहे बर काहयं, फेर सेठइन के फुहर-फुहर के गारी देवई ल सुन के घलो वोला चुप रेहे बर कोनो नइ कहे सकयं. कहिथें न सिधवा के सुवारी ल सबो भौजी कहि देथें, फेर बदमाश बर एको देवर नइ मिलय, तइसे कस.

    सुकवारो भभका आगी म पानी रितोएच के उदिम करय, फेर सेठइन माटी तेल कस बानी उगलय. फेर अब तो वोकर बेटी घलो हुमन म धूप-दशांग डारे बर धर ले रहय. फेर सुकवारो कोती कोनो नइ बोलय. अउ ते अउ भागा पानी भरे खातिर वोला बलाए बर आगे राहय, फेर उहू सुकुरदुम खड़े राहय. सेठइन अउ वोकर बेटी मिलके सुकवारो के चूंदी ल धर के हपट डारिन, छाती म चढ़ के गाल ल अंगाकर रोटी कस पो डारिन, हाथ-पांव के हांड़ा ल भरवा काड़ी सहीं टोर डारिन, फेर वाह रे जनता.. कोनो ल पइसा वाले जान के कइसे तुंहला लकवा मार देथे.. अउ ते अउ तुंहर जीभ घलो नइ फड़फड़ाए सकय...!


* * * * * 

    बरदी के धरसते पीपर पेंड़ के खाल्हे लोगन सकलाए लगिन. देखते-देखत पंचइती चौंरा खचाखच भरगे. कतकों मनखे चौंरा म जगा नइ मिलिस त एती-तेती जेने कोती जगा मिलिस तेने कोती बइठगे. कतकों फूलपेंठ वाले जवनहा छोकरा मन ठाढ़े-ठाढ़ घलो राहयं. चारों मुड़ा मार सैमो-सैमो. सरपंच बुद्धूराम संग जम्मो पंच मन घलो अपन-अपन जगा म बइठगें. सुकवारो के पहाटिया किंजर-किंजर के जम्मो झन ला चोंगी-माखुर बांटत राहय. फेर सेठ अभी ले नइ पहुंचे हे. इही बात ल लेके लोगन खांसे-खखारे कस गोठियाए घलो लागयं- 'बड़का मनखे आय न.. हमन होतेन त अतेक देरी होगे कहिके डांड़-डुड़ा देतीन, फेर वोला.. राम कहिले.. पूछयं तक नहीं काबर देरी करेस कहिके.'

    पहिली के गोठ ल सुनके दूसर कथे- 'जानत हन गा.. ए बड़का मनके चाल ल! वो पहाटनीन बपरी ल अतका मारे-पीटे हे, तभो ले सबो एक होके अनीत ल वोकरेच डहार खपलहीं. ए पहाटिया बपुरा के दू-चार सौ अउ खंगे हे तेला रपोटहीं!' तभे छत वाला सेठ ह दू-चार लठेंगरा मन संग वो मेर आइस, तहाँ ले पंचइती शुरू होगे.

    सरपंच ह पहाटिया ल पूछिस-' कस जी पहाटिया, काय खातिर पंचइती सकेले हस?'

    पहाटिया हाथ जोर के अपन जगा म खड़ा होइस अउ बिहन्चे पहाटनीन संग ढेंकी कूटे के नांव म होए जम्मो बात ल फोरिया के बता डारिस.

    वोकर जम्मो बात ल सुने के बाद एक झन पंच ह पूछथे-' तैं वो मेर रेहे का?'

    -'नइ रेहेंव मालिक, मोर पहाटनीन जइसे बताइस, तेला तुंहर मन जगा कहि देंव.'

    पंच फेर कथे-' हम तोर बात ल कइसे मान लेइन पहाटिया, जा तोर पहाटनीन ल ए मेर बला के लान, उही बताही के सेठइन अउ वोकर बेटी सिरतो म वोला मरीसे धुन नहीं ते?' 

    पहाटिया कहिस-' वोला तो ए मन अधमरा कर देहें पंच ददा, वो बपरी तो खटिया ले उठे नइ सकत हे, त ए मेर आवय कइसे?'

    पहाटिया के बात ल पंच मन नइ मानिन त बपुरा ह अपन पहाटनीन ल खटिया म सूता के चार झन मनखे संग बोह के लानिस. पंच मन पहाटनीन जगा खोधर-खोधर के पूछयं, फेर बपरी तो अचेत बरोबर परे राहय, हूँ-हाँ केहे के लाइक घलो नइ राहय. 

    गाँव के कुछ पढ़े लिखे जवनहा मनला ये सब देख-सुन के अचरज लागिस, के एक झन ह लास बरोबर परे हे, तेकर संग पंच मन कइसे बेवहार करत हें? वोकर मन से ये सब नइ सहे गिस, त खिसिया के एक झन लइका ह बोलेच डरिस-' सेठइन अउ वोकर बेटी ल घलो इहाँ बला के पूछव न, के ढेंकी कूटे जइसन मामूली बात म ए बपरी ल कइसे कूटे-छरे बरोबर कर डारे हें.'

    वो जवनहा छोकरा के गोठ ह सेठ ल बने नइ लागिस. वो कथे-' हमर घर के बहू-बेटी मन पंचइती-संचइती म नइ आवयं.'

    दू-चार पंच मन घलो वो सेठ कोती मुड़ी हलाइन. फेर जवनहा छोकरा मन के आवाज एक ले दू अउ दू ले चार होवत गिस. उन अंड़ी दिन के सेठइन ल अपन बेटी संग इहाँ आएच ले परही. जवनहा मन के बल पा के पहाटिया के घलो मेंछा अंटियाए लागिस, उहू अपन मुड़ भर के लउड़ी ल धर के गरज परीस- 'जब मैं ह अपन पहाटनीन ल यहा दसा म घलो खटिया म बोह के लान सकथौं, त सेठ के बेटी-गोसइन ल घलो इहाँ आना चाही. अरे वोकर घर म कुल-मरजाद के बात हे, त मरो बर मोर मरजाद ह सबले बढ़के हे.'

    सरपंच बुद्धूराम चारों मुड़ा ले उठत सत् के भाखा के मरम ल समझगे, के अब मोर गाँव जागे बर धर लिए हे. अइसन म अन्याय के पक्ष लेंव, ते सरबस नास हो जाही. आखिर वोला बोले ले परिस-' सेठ तोला अपन बेटी अउ सुवारी ल इहाँ बलाएच बर लागही, अउ कहूँ नइ बलाबे त एके पक्ष के बात ल देख-सुन के लिए निरनय ल तोला माने बर लागही.'

    सेठ ल सरपंच ऊपर अइसन भरोसा नइ रिहिस. फेर का करबे समय बलवान होथे. उहू बेरा के बात ल टमड़ डारिस के एकक करके सत् के जोत जेन बरे बर धर लिए हे, तेला मशाल बने म जादा जुवर नइ लागय. अउ जब कोनो सत् के जोती ह मशाल बन परथे त वोमा झूठ-फरेब, सोसन-अत्याचार के कतकों घनघोर घटा राहय, सबके नास हो जाथे.

    सेठ अपन जगा म बइठेच कहिथे-' वो घटना के बेरा तो महूं रेहेंव भई, जेन होइस तेला देखे-सुने हौं, मैं अपन बेटी अउ सुवारी कोती ले माफी मांगत हौं, जेन भी सजा दे जाही वोला मानहूं.'

    पंच-सरपंच मनला सेठ के अइसन सुभाव ऊपर बड़ा अचरज लागिस, फेर सेठ के मुड़ नवई गोठ म वोकरो मनके हिम्मत बाढ़ीस, तहाँ ले उन झट फैसला सुना दिन-' सेठ ह पहाटनीन ल दवाई-दारू के खरचा खातिर पाॅंच सौ रुपिया देवय, अउ पंचइती म घलो अतके अकन जमा करय.' संग म इहू चेताय गिस के ये हर तुंहर घर के पहिली गलती आय, ते पाय के जादा कुछू नइ करत हन, फेर आगू कहूँ कोनो किसम के आरो मिलही, त अउ बड़का सजा दे जाही.'

    जनता पंचइती के फैसला सुन के चिहुर पारे लागिन, अपन गाँव म सत् अउ न्याय के अंजोर बगरत देख के मनभरहा चिल्लाए लागिन-' बोलो पंच परमेश्वर के जय..  पंच परमेश्वर के जय...'

    (1990 के दशक म लिखे गे कहानी मन के संकलन 'ढेंकी' ले साभार)

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

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समीक्षा

 पोखनलाल जायसवाल: गँवई-गाँव म भारत के असली दर्शन होथे। रीति रिवाज, परम्परा, संस्कृति अउ मया दुलार गाँव म पोषित होथे। सामाजिकता जेन भारतीयता के एक ठन नगीना आय गँवई गाँव म  आरा-पारा अउ चउँक चउँक म देखे बर मिल जथे। लिखरी-लिखरी आयोजन अउ नेंग म घलव एकर दर्शन होथे। पौनी-पसारी एकर सबले  बड़का उदाहरण आय। गँवई गाँव म तब कोनो किसम के रोजगार धंधा नइ रेहे ले इही पौनी पसारी ह जीविका के साधन रेहे हे। सुख-दुख अउ कोनो झगरा-फसाद के बखत बइठका म घलव कोनो किसम के अलगाव नइ दिखे। सबो समाज के, जाति के मनखे के जुरियाव होना, सामाजिकता के ए सुग्घर धरोहर, थाती सिरिफ गाँव म मिलथे। चार ठन बरतन म टिकी लड़े ले आवाज तो आबे करथे। वइसने कभू-कभार कोनो बिषय म विचार नइ मिले ले दू मनखे, दू परिवार के बीच अनबन हो जथे। जउन स्वाभाविक आय फेर चार सियान के बीच बात जाय ले सुलझ जथे। कोर्ट कछेरी के चक्कर म कोनो नइ पिसावय। गाँव के झगरा गाँव म निपट जथे। कखरो जादा नकसान नइ होवय। सब ले बड़े बात मन के मइल समाज गंगा म डूबकी लगाय ले धोवा जथे। 

         समे के फेर होथे। कुछ सियान मन के मन म लालच अउ बड़का मनखे (धन्ना सेठ) मन के खिलाफ नइ जाय के सोच ले गँवई-गाँव के सुमता सुलाव ल गरहन धर लेथे। फेर गरहन भला कोन मार सदाकाल बर धर थे। कुछ पहर के बीते गरहन के परभाव नइ दिखय। इही किसम ले पढ़े लिखे नवजुवान मन म सही ल सही अउ गलत ल गलत कहे के हिम्मत आथे। अनियाव के खिलाफ आवाज उठइया के सुर म सुर मिलइया मिल बे करथे। अभियो कतको गाँव हें, जिहाँ दाऊवाद अउ नेतागिरी के चलत मनमानी होथे। नियाव ह नियाव बर तरस जथे। फेर शिक्षा अउ नवा पीढ़ी के नवा सुरुज के अँजोर ल कब तक कोनो ह पोटारे रख पाही। पानी अउ अँजोर तो अपन रस्ता बना लेथे। नियाव अउ सच ह इही पानी अउ अँजोर सही होथें, जेन ल जादा बेर ले रोके नइ जा सकय। 

        कुछ अइसन संदेश देवत कहानी आय ढेंकी।

ढेंकी तब के समाज के एक पहचान आय। अइसन समाज जे रोजे कमावयँ अउ रोजे खावयँ। ढेंकी ल गरीबी के पर्याय घलव कहे जा सकत हे। गाँव के भूमिहीन मनखे रोजगार के अभाव म जब दू जुवार कमा लय त पेट भरे के लइक धान जुगाड़ सकय। उही ल होत बिहनिया नइ त मुँदरहा के बेरा (सुकवा उवत) कूट के पेट भरे के उदिम करय। 

      ढेंकी गाँव गरीब के चिन्हा आय। ढेंकी कुरिया गरीब के जम्मो दुख पीरा ल भुलाय के जगा आय। जिहाँ ले जिनगी बर आशा जुरे रहिथे।

     कहानी के भाषा के सुघरई देखते बनथे। हाना मुहावरा ले भाषा के सुघरई बाढ़गे हे। कहानी के घटना प्रधान होय ले कोनो चरित्र उभर के नइ आय हे। फेर कहानी के उद्देश्य पूरा होवत हे। संवाद मन मन ल भाथे, पात्र मन के चरित्र के अनुकूल संवाद ह कहानी ल पढ़े के लइक बनाथे। कोनो कोनो संवाद ह अतेक स्वाभाविक हे कि कभू कभू अपने घर दुआर के भरम करा देथे। जइसन कि.... 'पहाटनिन.... बुजा ह थोरिक जाड़ असन जनावत हे'... 'ले राहन दे तुँहर चोचला ल, रोजेच तो आय ..।'

       'तोला ये रोजे-रोज के भुंकरूस भुंकरूस ढेंकी कुटई ह बने लागथे वो सुकवारो?'

         कहानी के छेवर जेन ढंग ले होय हे वोहर आज के छल-कपट, भाई-भतीजावाद, बिकऊ होवत जावत तंत्र के ऊपर नियाव के उम्मीद के नवा किरण जगाथे। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी के कहानी पंच परमेश्वर के सुरता देवाथे अउ उहाँ केहे गे कथन ल सही साबित करथे। जेन आज के जरूरत हे।

   अइसन सुग्घर कहानी बर आदरणीय सुशील भोले जी बधाई देवत हँव।

पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह (पलारी)

9977252202