Sunday, 13 November 2022

व्यंग "तड़कफांस"

 व्यंग "तड़कफांस"

बरदीहा मन  पहाट ल बढ़ हियाव ले राखथे। पाहट म रंग बिरंगी नाना परकार के गाय गरु रहिथे।  अलग-अलग गली मोहल्ला के तभो ले चीन डारथे उंकर नजर कोनो नेता ले कम थोड़ी आए दूरियां ले जान डारथे ये  दे फलाना घर के हरही गाय आए। उंकर कामे काए जी? वहुमन ल बरदी चराए के एक्सपीरियंस रहिथे।  हर्रे थुर्रे काहत दिन भर पहा देथे, अउ जईसे संझा होथे गरुवा मन अईसे भागथे  जईसे कोनो नेता के रैली होथे,अउ आदमी मन पुड़ी सब्जी बर टूट पड़थे। बरदिहा मन के बढ़ ताकत एके ही इसारा काफी रहिथे। बारवाही के समे कतको  मरखडीं , हड़बड़ही राहय  सहिला -साहिला के दुहूं डारथे । फेर गरवा मन ऊपर आज बिपत आन पड़े हैं तरिया के पानी सूखागे,   खेतखार म चारा नई हे, गरवा मन बोंबीयावत हे। न तो बरदीहा छेंकत हे न गोसइया,। सब दूरिया ले  आंखी सेंकत हे।मोला लागते ये बीमारी तड़कफांस ले  जादा खतरा हे।

           फकीर प्रसाद   

            "फक्कड़"🙏

           २५-५-२०२०लाकडाउन

मोर शहर नांदगांव

 मोर शहर नांदगांव

जेकर पूरा नांव राजनांदगांव हवे ।राजा- नंद- ग्राम से बने राजनांदगांव बड़ अकन विशेषता ल समेटे नानपन ले हमर गरब के आधार रहे। हमर रायपुर वाले जीजाजी के भाई बहिनी संग अपन गांव-शहर के गोठ-बात  होय त हमर नांदगांव अघुवा जाय ।  भरोसा नईए हे न , त सुनव - आज से चालीस-पचास साल पहिली के गोठ आय मोर नांदगांव कना बी.एन.सी.मिल रिहीस, अउ अतिक बड़ रायपुर शहर कना अइसन कोनो कपड़ा मिल हवे का । नान -नान रेहेन त महतारी के अंचरा धरे विश्वकर्मा जयंती म घुमे रेहेन। इंहा के मच्छर दानी बड़ फेमस रहिस।आज भी ये मिल म धागा बनई- रंगई अउ कपड़ा बनत देखे के सुरता महतारी के अंचरा सही गठियाय हे।

     नांदगांव म वो जमाना के सरकारी प्रिंटिंग प्रेस रहिस यहू म रायपुर का पीछवाय हमर जहुरियां मन भी पीछवा जाय अउ हमर मन के गरब थोरकन अउ बाढ़ जाय ।

     इंदिरा गांधी कला विश्वविद्यालय खैरागढ भी वो ज़माना म हमर राजनांदगांव के शान रहिस। अहा! सुंदर गोठ-बात  के वो दिन,संगी-जहुरिया संग जीत के वो भाव , अइसे लगथे जइसे कले के बात हे ,फेर  आज नांदगांव कना एमन कुछु नइ रहिगे,आरूग सुरता के ।

     हां ! हमन ला अपन कालेज उपर भी बड़ा गरब रहिस एक तो राजा दिग्विजय सिंह के दरबार, उपर ले एक डहर रानीसागर त एक डहर बुढ़ासागर ,बीच म शीतला माई के मंदिर। महतारी बताय के पहिली इंहां भूलन बाग रहिस जइसने नाम तइसने गुण,मनखे बिन सहायता के नइ निकल पाय ये भूलन बाग ले । अतिक सुंदर कालेज ल कोई कइसे भूलाही ,सुरता तो रहिबे करही ।

     डोंगरगढ़ बमलाई के आशीष म आगू बढ़े, कइसे ओकर उपर गरब नइ होही ।उपर पहाड़ म बिराजे बमलाई दाई ले खाल्हे झांकबे त रेलगाड़ी के डब्बा मन भी माचिस डिब्बी बरोबर दिखे । ऐकरे आशीष म राजनांदगांव सबर दिन फूले -फले हे ।

     संगी-जहुरिया संग गोठ म यहूं बात आय कि तुंहर शहर म अइसे कोई मंदिर हे जिंहा चप्पल पहिन के जा सकत हन का।

हमर शहर म हे -मानव-मंदिर । इंहां के पोहा -जलेबी सबे सुरता करे हे अउ रसगुल्ला, रसगुल्ला तो रसगुल्ला ही रहिस हे । बड़ नाम रहिस हे ये मानव-मंदिर के।

     आज अपन शहर के सुरता करत सब सब गोठ-बात आघु-आघु आवत हे  ,जइसे बहुत अकन विशेषता ह राजनांदगांव से दुरिहा गे हे ,वइसने हमुमन बर-बिहाव कि नौकरी-चाकरी म इंहा ले दुरिहां गे हन,बेटी अन इंहां के त सबो सुरता धराय के धराय हे ।

     श्रीमती गीता साहू

     10.11.22

व्यंग्य- अच्छे दिन के तलाश

व्यंग्य- अच्छे दिन के तलाश


          अच्छे दिन कब आही गा ? लइका अपन बाप ला पूछत रहय । बाप बतइस – आही बेटा । अभी उँकर मन घर म अच्छे दिन हा पहिली गेहे जेमन कहत रिहिन अऊ जेमन ला ओकर जादा आवश्यकता रिहिस । उँकर समस्या के समाधान हो जही तब हमर कोति अच्छे दिन हा रुख करही । लइका फेर पचारिस – हमर समस्या ले घला रोंठ अऊ काकरो समस्या हो सकत हे का बाबू ? बाप किहिस – हमर काये समस्या हे तेमा बाबू .. हम कमावत हन तब खावत हन ... पहिरत हन .. ओढ़हत हन । समस्या उँकर मन घर म हाबे बाबू जेमन दूसर के कमई ला खावत भुकरत हे .. तेकर सेती अच्छे दिन ला ओकरे मन घर जाये बर मजबूर होय ला परे हे । 

          चार दिन पाछू ... लइका हा अपन बाबू ला फुरसत म देख पूछ पारिस – अच्छे दिन के अवई लकठियागे हे अइसे अभी अभी सुने म आहे बाबू .. । कतेक धुरिहा म आये हाबे ते .. लाने ला जावँव का । बपरा हा रद्दा मद्दा झन भटक जाये । बाप किथे – तैं काये करबे जी अच्छे दिन ला .. मारो मारो खेती किसानी के दिन म ओकरे पाछू परे हस । लइका किथे – तैं नइ जानस गा । हमर घर अवइया अच्छे दिन ला अऊ कोनो झन लेग जाय कहिके ओला लाने बर चल देतेंव सोंचथँव । कति मेर अमरे होही बपरा हा ते ... । बाबू किथे – हमर घर के नाव म अच्छे दिन हा बीते पछत्तर बछर ले निकले हे । फेर ओला भेजइया मन देखावटी भेज के अपने तिर लुकाके राख लेथे । बेटा किथे – उहीच ला तो महूँ कहत हँव बाबू .. तेकरे सेती लाने बर चल देतेंव । एक बेर हमरो घर आतिस .. हमरो दुख दरद ला देखतिस अऊ समाधान करतिस । बाबू किथे – अच्छे दिन हमर मन घर नइ आवय बेटा । हमर मनके घर म का समस्या हे तेमा ... ? सरी समस्या ला देश के चलइया चारों खुरा मन ओढ़के खुसरे हे । समस्या ला अपन बाहाँ म पोटारके धरे हे .. । जब समस्या हा उँकर तिर म हाबे त अच्छे दिन तो उँकरे तिर म रहिबेच करही । अच्छे दिन के प्रादुर्भाव हा समस्या के निपटारा बर होय हे .. बिगन समस्या के हमर तिर काबर आही बपरा हा ? लइका किथे – हमर तिर समस्या कइसे निये कहिथस बाबू .. न खाये बर पेट भर अनाज .. न तन भर कपड़ा .. न रेहे बर बने असन कुरिया । बाबू किथे – येहा कोनो समस्या नोहे बाबू । हमन केवल अपन बर सोंचथन । हमर तिर काँही नइये तेमा कोनो बात नइये । पारा मोहल्ला गाँव म अऊ काकर काकर तिर काये काये नइहे ... इही ला सोंचना हा समस्या आय अऊ इही सोंच सोंच के बपरा मन पचास ले सौ किलो हो जावत हे । तेकर सेती अच्छे दिन हा ओकरे कोति रुख अख्तियार कर लेथे । 

          लइका के मन हा अच्छे दिन ले मिले खातिर बड़ चुटपुटावत रहय । दू दिन नहाकिस तहन फेर पूछ पारिस – हमर घर अच्छे दिन कइसे आही गा ? बाबू बतइस – बड़ मेहनत करे बर लागथे बेटा । लइका किथे – तैं अऊ बबा .. अतेक मेहनत करत हव  .. फेर अच्छे दिन के दर्शन हमर घर कभू नइ होइस । बबा किथे – हमन अपन संग दुनिया के धोंध भरे बर मेहनत करथन बेटा .. । अइसन मेहनत म अच्छे दिन भगवान हा खुश नइ होवय गा । अच्छे दिन ला अपन घर लाने बर चुनाव लड़े बर परथे अऊ जीते बर परथे अऊ जीत के सरकार बनाये बर परथे । जेकर जेकर सरकार बनथे .. तेकरे मन घर अच्छे दिन हा खुसरथे । पछ्त्तर बछर ले देखत हन .. हमर गाँव गोढ़हा म चुनाव लड़के जतका झन जीतिन अऊ सरकार बनइन .. सब अच्छे दिन ला कब्जिया डरिन । 

          लइका फेर पचारिस – त महूँ चुनाव लड़हूँ अऊ अच्छे दिन ला अपन घर म लानहूँ । बबा हाँसिस – तैं जीतबे थोरेन तेमा .. । मानलो कोनो काल के जीतिस गेस तब ... जब सरकार बनाबे तब अच्छे दिन हा तोला सुंघियाही बेटा । फकत जीत जाय म अच्छे दिन हा तोला नइ पूछय । लइकाफेर किहिस – जीत जहूँ तहन दूसर घर के समस्या ला जाके बहुत तिर ले देखहूँ ... तहन जगा जगा पचारहूँ .. तब चाहे सरकार म रहँव या विरोध म .. अच्छे दिन ला हमर कुरिया म आयेच ला परही । बबा किथे – निचट भोला अस जी । अभू तैं कच्चा हस । तोला जनाकारी नइहे । काकरो समस्या तभे दिखथे .. जब सरकार विरोधी चश्मा चघथे । सरकार म आये के पाछू .. ओकर आँखी के आगू समस्या नंदा जथे अऊ अच्छे दिन तिरिया जथे । मोर बेटा किहिस – जेला समस्या नइ दिखय तेकर घर .. अच्छे दिन हा काबर खुसरथे ? बबा बतइस – बेटा .. । सरकारी चश्मा जेला लग जथे .. ओकरे स्मार्टनेश देख .. अच्छे दिन हा ओकरे घर खुसरे बर मोहा के बइहा जथे अऊ बिगन मौका के तलाश करे बरपेली ओकरे मन के घर म खुसर जथे । 

          अच्छे दिन के चाह म लइका के मन बहुत उद्वेलित होवत रहिथे । ओहा सवाल उचइस – धँवावत का बबा ? बबा किहिस – का धँवाहूँ बेटा ... धँवा सकतेंव त हमरो घर अभू तक अच्छे दिन हा खुसर चुके रहितिस । काकरो समस्या ला कन्नेखी देख .. तहन तुरते सरकारी चश्मा पहिर .. तहन निवारण कर डरेन कहिके .. जगा जगा पचारत किंजर .. तब अच्छे दिन हा आके खुदे तोला घेर लिही ।  समस्या जस के तस हाबे कहत फकत चिचियावत रहिबे तब .. अच्छे दिन ला थोरेन पाबे । लइका हा बबा ला पूछिस – में ओला लाने बर जाहूँ .. तैं ओकर पता तो बता बबा । बबा हाँसत कहि दिस –   अच्छे दिन उही तिर म रहिथे बेटा जेकर धरती अऊ आकाश के मिलन होथे ।  

          लइका हा अच्छे दिन के अड्डा खोजत .. आकाश अऊ धरती के मिलन स्थान देखे बर बाहिर खुल्ला मैदान म निकलगे । हरेक दिन ओला लगय के अच्छे दिन के बहुत तिर पहुँच चुके हे ... फेर सांझ होवत ले जुच्छा के जुच्छा ... । कति तिर आकाश अऊ धरती के मिलन होथे ... अऊ कतका धूरिहा ओला रेंगे बर लागही ... तब अच्छे दिन ला अमराही .... ?  

 

हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

Thursday, 10 November 2022

लोक संस्कृति के ढेलवा-रहचुली मेला- मड़ई..


 

लोक संस्कृति के ढेलवा-रहचुली मेला- मड़ई..

    छत्तीसगढ़ के संस्कृति म मेला-मड़ई मनके घलोक महत्वपूर्ण स्थान हे। मड़ई के शुरूआत जिहां देवारी/मातर ले होथे, उहें मेला के आयोजन ह कातिक पुन्नी ले होथे, जेन ह महाशिवरात्रि (फागुन अंधियार तेरस) तक चलथे। छत्तीसगढ़ के भीतर जतका भी सिद्ध शिव स्थल हे, उन सबो म मेला भराथे जेमा राजिम, सिरपुर, शिवरीनारायण, रायपुर के महादेवघाट आदि मन पूरा प्रदेश भर म प्रसिद्ध हें जिहां चारों मुड़ा के मनखे सैमो-सैमो करत रहिथें। एकर छोड़े अउ कतकों जगा हे जिहां स्थानीय स्तर म अलग-अलग तिथि म मेला के आयोजन होवत रहिथे।


    खेत म खड़े धान के सोनहा लरी जब बियारा अउ बियारा ले मिसा- ओसा के घर के माई कोठी म खनके लगथे, तब ये मेला-मड़ई के शुरूआत होथे। एकरे सेती कतकों लोगन एला कृषि संस्कृति के अंग मानथें। फेर जिहां तक देखब म आथे के एकर संबंध कोनो न कोना किसम ले अध्यात्म संग जुड़े होथे। छत्तीसगढ़ आदिकाल ले बूढ़ादेव के रूप म भगवान शिव के उपासक रहे हे, एकरे सेती इहाँ जतका भी बड़का मेला के आयोजन होथे, जम्मो ह सिद्ध शिव स्थल म ही होथे। पहिली ए अवसर ए बधई (पूजवन) देके घलोक चलन रिहीसे। फेर जइसे-जइसे लोगन म शिक्षा के प्रसार होवत जावत हे वइसे-वइसे अब मरई-हरई के रीत ह कमतियावत जावत हे। बिल्कुल वइसने जइसे पहिली जंवारा बोवइया वाले मन अनिवार्य रूप ले बधई देवयं, फेर अब उहू मन सेत (सादा, बिन पूजवन के) जंवारा बो लेथें तइसने मेला-मड़ई म घलोक लोगन अपन मनौती ल सिरिफ नरियर आदि फल-फलहरी म भगवान ल मना लेथें। फेर कतकों मनखे अभी घलोक पूजवन के रिवाज ल धरे बइठे हें।

मेला संग जुड़े ये आध्यात्मिक रूप ह ए बात के जानबा देथे के एकर संबंध सिरिफ खेती-किसानी वाला नहीं भलुक आध्यात्मिक संस्कृति संग घलोक हे। फेर एकर गलत रूप म व्याख्या के संगे-संग एकर आयोजन के कारन अउ रूप ल घलोक बदले जावत हे जेला कोनो भी रूप म अच्छा नइ केहे जा सकय। उदाहरण के रूप म छत्तीसगढ़ के प्रयाग कहे जाने वाला राजिम के प्रसिद्ध पारंपरिक मेला जेला कुछ बछर पहिली कुंभ के रूप म प्रचारित करे जावत रिहिसे, तेला ले सकथन।


    मेला के कोनो भी बड़का आयोजन ल कुंभ के संज्ञा तो दिए जा सकथे फेर वोकर कारन ल बदलना ह अच्छा बात नोहय। छत्तीसगढ़ के संगे-संग देश म भरने वाला जम्मो मेला ह सिरिफ शिव स्थल म ही भरथे, एकरे सेती नानपन ले ये सुनत आये रहे हन के राजिम मेला ह कुलेश्वर महादेव के नांव म भराथे। फेर अब ले एकर नांव ल कुंभ कर दिए गे रिहिसे तब ले एकर कारन ल राजीव लोचन के नांव म भरने वाला बताए जावय। एहर इहाँ के मूल संस्कृति के संग खिलवाड़ आय जेला कोनो भी रूप म माफी नइ करे जा सकय। सरकार अउ कथित संस्कृति मर्मज्ञ मनला अपन अइसन गलती ल सुधारना चाही।


    राजिम मेला के संगे-संग इहाँ पंचकोसी यात्रा के महत्व घलो बताये जाथे, जेमा राजिम के संगम म स्थित कुलेश्वर महादेव के संगे-संग चंपेश्वर महादेव (चांपाझार या चम्पारण्य), बम्हनिकेश्वर महादेव (बम्हनी), फणिकेश्वर महादेव (फिंगेश्वर), अउ कमरेश्वर महादेव (कोपरा) के एके संग दरसन करे के रिवाज हे, तभे ये राजिम मेला के दरसन लाभ ह पूरा छाहित होके मिलथे।


    मेला चाहे कहूंचो के होवय, वोकर रूप ह बड़का होवय ते छोटका होवय। फेर जब तक वोमा ढेलवा, रहचुली अउ कुसियार के कोंवर-कोंवर डांग नइ दिखय तब तक मन नइ भरय। लोगन होत मुंदरहा मेला तीर के नंदिया-नरवा म नहा-धो के भगवान भोलेनाथ के पूजा-पाठ करथें। तेकर पाछू फेर चारों-मुड़ा कटाकट भराये मेला (बाजार) ल घूमथें- फिरथें। रंग-रंग के जिनिस बिसाथें। अउ जब मन भर के ढेलवा-रहचुली झूल लेथें, त फेर, कांदा, कुसियार, ओखरा झड़कत घर लहुटथें।


-सुशील भोले 

संजय नगर, रायपुर 

मो/व्हा.98269-9281

7 नवंबर जयंती म सुरता// मयारुक गीत मन के मयारु रचनाकार मुकुंद कौशल

 




7 नवंबर जयंती म सुरता//

मयारुक गीत मन के मयारु रचनाकार मुकुंद कौशल

    सन् 1980 के दशक ह छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के स्वर्ण काल रिहिसे. तब इहाँ मनोरंजन के मुख्य साधन आकाशवाणी ले बजइया गीत मन ही प्रमुख राहयं. तब तावा, जेला ग्रामोफोन काहयं, तेहू म बर-बिहाव अउ छट्ठी-बरही आदि मन म नंगत के छत्तीसगढ़ी गीत चलय. 

    वो बखत एक ले बढ़के एक छत्तीसगढ़ी के कर्णप्रिय गीत सुने ले मिलय. वो गीत मनमा-

 मोर भाखा संग दया मया के  सुग्घर हवय मिलाप रे

अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा कोनो संग झन नाप रे...

* * * * *

धर ले कुदारी गा किसान

आज डिपरा ल खन के डबरा पाट देबो गा..


 आदि गीत कतकोन गीत सुने बर मिलय. वो बखत छत्तीसगढ़ के मोहम्मद रफी के नांव ले चिन्हारी करइया केदार यादव के आवाज अउ मुकुंद कौशल के रचना के लगभग जुगलबंदी के मोहक रूप गजबेच सुने बर मिलय. मुकुंद कौशल जी मोला एक पइत बताए रिहिन हें, के उन अपन जम्मो गीत मनके धुन ल घलो खुदे बनावंय, जेमा थोड़ा-बहुत परिमार्जन कर के गायक-गायिका मन गा लेवत रिहिन हें.

    7 नवंबर 1947 के दुरुग के सोनी जेठालाल धोलकिया अउ महतारी उजम बेन के घर जनमे मुकुंद कौशल जी के चिन्हारी वइसे तो हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, गुजराती अउ उर्दू सबो भाखा म समान अधिकार रखने अउ लिखने वाला के रूप म रिहिसे, फेर मैं उंकर छत्तीसगढ़ी रूप, उहू म खास करके गीतकार रूप ले जादा प्रभावित रेहेंव. 

    मोर वोकर संग चिन्हारी वइसे तो 1983 म जबले मैं साहित्य जगत म पांव रखेंव तबले रिहिसे, फेर घनिष्ठता सन् 1987 म जब छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' निकाले के चालू करेन तब ले बाढ़िस. वो बखत मैं दुरुग-बघेरा दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ महासिंग चंद्राकर जी संग भेंट करे बर जावत राहंव, तब मुकुंद कौशल जी अउ वोकर दूकान के तीरेच म रहइया केदार यादव संग घलो भेंट करके आवत रेहेंव. फेर उंकर संग जादा बइठकी तब होइस जब 1993-94 म मैं छत्तीसगढ़ के पहला रिकार्डिंग स्टूडियो चालू करेंव. तब हमर स्टूडियो म मुकुंद कौशल जी के संगे-संग वो बखत के प्रायः जम्मो प्रसिद्ध गायक-गायिका, गीतकार अउ संगीतकार मन संग घंटों बइठना अउ विविध विषय म गोठियाना चलय. काबर ते उन सब रिकार्डिंग के बुता म कोनो न कोनो किसम ले संघरत रिहिन हें.

     मुकुंद कौशल जी साहित्य के संगे-संग ज्योतिष शास्त्र के घलो बने जानकार रिहिन हें. एक पइत मोला बताय रिहिन हें, पहिली उन मुकुंद लाल सोनी के नांव ले लिखयं. फेर उनला वतका सफलता नइ मिलिस, तब अंक ज्योतिष के अनुसार अपन जन्म मूलांक 7 के शुभांक खातिर मुकुंद  नांव ले लाल अउ सोनी ल निकाल के वोमा कौशल शब्द जोड़ देंव कहिके. ए प्रकार फेर उन अपन नांव मुकुंद कौशल लिखे लगिन. उन बतावंय के अंक ज्योतिष के अनुसार ए बदले नांव ले वोला साहित्य के संगे-संग रोजगार-व्यापार म घलो अच्छा सफलता मिले लगिस. 

     मुकुंद कौशल जी के पहला रचना उंकर पढ़ई करत बेरा ही सन् 1964 म 'प्रयास' नांव के स्मारिका म छपे रिहिसे. वोकर पाछू डाॅ. विनय पाठक के संपादन म छपइया तिमाही 'भोजली' म. उंकर पहला काव्य संकलन 'लालटेन जलने दो' 1993 म छपिस. फेर तो लगातार लेखन अउ प्रकाशन के सिलसिला चल परिस, जेमा करीब 18 किताब शामिल हें.  एमा के एक-दू छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी संग्रह के प्रूफ उन मोरो जगा पढ़वाए रिहिन हें, जेन वैभव प्रकाशन ले निकले रिहिसे. 

     मुकुंद कौशल जनता के कवि रहिन हें. उंकर रचना म ए बात जगजग ले दिख जावय-

जे बनिहारिन बर-बिहाव म 

बत्ती धर चलत रथे

ओकर अंधियारी जिनगी म

दीया बारौ तब बनही

* * * * * 

बिन सुरुज के जग अंधियारी, बिन परेम के दुनिया

बिना बजाए मया-पिरित के, नई बाजय हरमुनिया

आज संग नइ गा पाएन तौ अउ कब गाबोन वो

छिन भर कहुंचो बइठ क सुख-दुख ल गोठियाबो वो

     मुकुंद कौशल जी मोला एक पइत बताए रिहिन हें, मैं अपन रचना मनला तीनों भाखा म एक साथ लिख लेथौं. पहिली हिन्दी म लिखथौं, फेर गुजराती म अउ ओकर बाद छत्तीसगढ़ी म. मुकुंद कौशल जी एक अच्छा रचनाकार, अच्छा वक्ता के संगे-संग एक बहुत ही अच्छा कवि मंच के संचालन करइया घलो रिहिन हें. मोला उंकर संचालन म आकाशवाणी के संगे-संग कतकों कवि सम्मेलन के मंच मन म घलो कविता पाठ करे के अवसर मिले रिहिसे.

    मुकुंद कौशल जी संग मोर उंकर जिनगी के आखिरी बेरा तक संपर्क बने रिहिसे. ए दुनिया ले बिदागरी के ठउका पंदरही पहिली 19-20 मार्च 2021 के रायपुर के होटल क्लार्क इन म होए दू दिनी छत्तीसगढ़ी साहित्य के जलसा के पहला दिन हमन पूरा कार्यक्रम म एके संग बइठे रेहेन. हमर मनके संग म नंदकिशोर तिवारी जी अउ डाॅ. विनय पाठक जी घलो रिहिन. वो दिन हम चारों के ओ मंच ले एके संग सम्मान होए रिहिसे. तब जनावत रिहिसे, के मुकुंद जी के तबियत बने नइ चलत ए. विश्वव्यापी महामारी कोरोना के दौर चालू होगे रिहिसे, फेर मुकुंद जी मास्क नइ लगाए रिहिन हें. तब मैं पूछे रेहेंव- भैया... त उन कहे रिहिन हें- भाई मोला सांस ले म तकलीफ होथे, भारी अकबकासी लागथे, तेकर सेती मास्क नइ लगाए औं. अउ ठउका ओकर पंदरही के बीतते 4 अप्रैल के खबर आगे के उंकर देवलोक गमन होगे.

उंकर सुरता ल पैलगी.. जोहार 🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


मोर गाँव 'डोंगाकोहरौद'

 मोर गाँव 'डोंगाकोहरौद'

    जांजगीर-चाँपा जिला के बिकासखंड पामगढ़ ले 5 किमी दूरिहा रक्सहूँ दिसा म डोंगाकोहराउद नाँव के एक गाँव बसे हे। बस्ती के चारो मुड़ा म सरलग तलाब हे। धोबनी, अखरहा, डुमरिहा, जोखिया, डोंगिया, बंधवा, केरहा अउ पर्री। ए तलाब मन इहाँ के जीवनदाता आँय। घर-गिरहस्थी के काम बर, नहाय बर अउ खेत मन ल पलोए बर, जब भी पानी के जरूरत होथे, महतारी के गोरस सही ईंकर पानी ह तुरते मिल जाथे। इन सब्बो तलाब म जउन डोंगिया तलाब हे, ओकर खाल्हे बीच खार म एक ठन सिरीस के पेड़ हावै। कब के हावै, तेला कोनो नइ बता सकैं।

     ए गाँव म तइहा जमाना म डोंगा ले जुड़े एक ठन घटना घटे रहीस। ओकरे कारन ईंकर नाँव कोहराउद ले डोंगाकोहराउद परगिस। घटना अइसे हे कि राउत पारा के एक झन माईलोग, जेन ह देह म रहिस याने गरभैतिन रहिस, तीजा मनाए अपन भाई के संग अपन मइके जावत रहिस। ओकर मइके हर महानदी के ओ पार परै। भादो के महीना, महानदी म पाठी-पाठ पूरा आय रहै। ओ पार जाय बर जउन जघा म ओमन डोंगा चढ़िन, उही मेर शिवनाथ नदी ह महानदी म मिले हावै। एमन के डोंगा ह संगम म हबरिस त दूनो नदिया के धार बीच फँसगे। न आघू बढ़ै, न पाछू घूँचै। डोंगहार ल शंखा होइस कि डोंगा के देबी ह नराज होगे हे। ओहर कहिस- ए डोंगा म कोनो गरभैतिन बइठे होहौ, त कुछु बदना बदौ, नहीं त डोंगा ह लहुट (बूड़) जाही। सब झन के कहे म ओ रउताइन ह बदना बदिस, त डोंगा ह पार होइस।

       समे ह बछर दू बछर बीतगे। रउताइन ह बदना के बात ल भुलागे रहै। एक दिन ओ डोंगा ह नदिया के घाट ले निकल के भाँठा म घिसलत-घिसलत ए गाँव के तरिया म आके बूड़े रहै। ओ रउताइन ह गघरी म पानी भरे बर जब ए तरिया म आइस, त ओ डोंगा ह ओकर ऊपर म जाके खपलागे। रउताइन ह मरगे। ए बात के खभर मिलिस त ओकर गोसइया ह डोंगा ल कुटी-कुटी काट के नरवा म फेंक दिस। डोंगा के एक ठन खीला ह सिरीस के रहिस, जेहर गाँव के बहरा खेत जामगिस। बाद म ओहर सिरीस के पेड़ बनगिस।

      एइ घटना के सुरता कराए ब गवाही सही  ओ पेड़ ह उही जमाना ले खड़े हावै। पेड़ ह बुड़गाए के पहिली जरी ले नवा पिचका फेंक देथे अउ ओकर दलगत ले फेर नवा पेड़ तियार हो जाथे। सिरीस के एइ पेड़ तरी देबी दाई के बास हवै। काबर नइ रहही। पखना होवै कि रूख-राई। मनखे के आस्था अउ बिसवास ह जिहाँ टिकगे उहाँ कन-कन म बास करइया सक्ति मन उही मेर ठुलाकेअइसे असर देखाथे ं कि लोग-बाग मन ओला या तो ईश्वर के किरपा समझथें या फेर भगति के चमत्कार।सिरीस-पाठ घलो ह लोगन मन के मनोकामना ल पूरा करे के अधार आय।ऊँकर सरधा-भगति के ठउर आय।

      सिरीस-पाठ के चारो मुड़ा म खेत-खार हे। असाढ़ महीना म पहिली बारीस होत्ते-साथ किसान मन नांगर-बइला लेके धान बोंए बर अपन-अपन खेत म आ जाथें। ए बखत चारो मुड़ा म अर्र-तता के बोली के संगे-संग सुघ्घर गीत हवा म गूँजे लगथे। सावन महीना म जब धान मन बियासे के लइक हो जाथे, तब चौतरफा हरियरहूँ सुघराई ल देखके अइसे लागथे कि जाना-माना धरती दाई ह सिरीस-पाठ के ठउर ल सजाए खातिर हरियर-हरियर मखमली दरी दसाए हे। कुआँर के महीना म छटके धान के बाली अउ पकराए पान मन जब हवा के झँकोरा संग लहराथे, त लगथे कि धरती-दाई ह अपन बेटी अन्न-कुवारी ल सुघ्घर पोतिया पहिरा के अऊ ओकर मुँड़ म सोन के कलगी खोंच के माता के दरसन बर भेजे हवै, तेकरे सेती ओहर ढोंकर-ढोंकर के पाँ परत हे।

     नवरात बखत इहाँ लोगन मन के चहल-पहल बाढ़ जाथे।कुआँर अउ चइत दूनो महीना म एक हफ्ता पहिली ले जवा बोंवा जाथे। अंजोरी पाख के परिवाँ लगते भगत मन मांदर घिड़का-घिड़का के जस-गीत गाए लगथें। अपन मनोकामना ल पूरा कराए बर कोनो घी के, त कोनो तेल के जोत जरवाथें अउ कोनो माता के सिंगार चूरी-फुंदरी चढ़ाथें। धन्न हे ए देबी-देवता मन ल। भगत मन जउन ढंग ले ऊँकर पूजा-आँचा करथें, मौन-भाव ले उनला अपना के सुख-शांति देवत रइथें। तभे तो इहाँ आए म जेकर दुख-अलहन टर जाथे अउ मनोकामना ह पूरा हो जाथे, ओकर मुँह ले जबरन निकल जाथे- जै सिरीस पाठ, जै देबी दाई।

                     संतोष कश्यप

                     जांजगीर

मोर गांव छुरा ला जानव

 मोर गांव छुरा ला जानव


               स्वतंत्रता पाये के पहिली छ्त्तीसगढ़ म छत्तीस ठन राज रिहिस जेला गढ़ के नाव ले जाने जावय । उड़ीसा के सीमा म लगे छत्तीसगढ़ के दक्षिण भाग म बहुत बड़का जगा म विंद्रानवागढ़ नाव के राज रिहिस । ये राज के स्थापना के श्रेय बियाबान जंगल के आदिवासी धुरवा नाव के नवयुवक ला जाथे । धुरवा के वंशज होये के प्रमाण छुरा राजघराना के नंदावत धरोहर म आजो देखे जा सकत हे । 

               धुरवा हा बहुत साहसी बलकरहा जवान रिहिस । धुरवा हा घात सुंदर गुनवंतिन अऊ अपने कस साहसी धरमतराई ( धमतरी ) के राजकन्या कचनार नाव के नोनी ला अपन सुवारी बनाये बर पैरी नदी के ओ पार नहाकके कतको झन दुश्मन सैनिक ला मार गिरइस अऊ उहाँ के राजमहल म खुसरके कचनार ला धरके अपन घोड़ा म बइठार खड़दिक खड़दिक करत निकल गिस । कचनार मिलगे .. आनन फानन म मंदिर म जयमाला बिहाव घला होगे .. फेर धुरवा ला उहाँ ले भागे बर परगे । लहुँटत समे म कचनार के ददा के पठोये सैनिक अऊ प्रतिद्वंदी राजघराना के लइका मन संग मुठभेंड़ होगिस । उहू मन कचनार के रूप अऊ गुण के सेती ओला पाये बर मरत रिहिन । जइसे तइसे धुरवा हा बारुका के पहाड़ी तक पहुँच पइस .. तब ओला अपन सैनिक मनले पता चलिस के आगू पिछु दुनों कोति के रसता म दुश्मन के सेना तैनात हो चुके हे । ओमन पहाड़ी के टिलिंग म पहुँच गिन अऊ कचनार संग एक ठिन माड़ा ला अपन मुकाम बना लिन । बछर निकलगे । कचनार के गोदी म नानुक बाबू आगे । अब धुरवा ला अपन जुन्ना घर नवागढ़ के सुरता आये लगिस । सबो कोति खबर कर दिस । धुरवा के सैनिक मन धीरे धीरे चारों मुड़ा ले निकलके सकलावत गिन । उचित समे अऊ बेवस्था देख धुरवा हा आगू कोति के दुश्मन सैनिक मन उपर हमला कर दिस अऊ पिछु डहर के सेना के कमान कचनार ला दे दिस । चार महीना के नानुक दुधपिया बाबू ला अपन गुप्तचर मन के संग नवागढ़ भेज दिस । कचनार हा मई लोगिन के जात ... कतेक सकय तभो ले लड़त भर ले लड़िस .. ओला जिंदा पकड़ के लेगे के आदेश रहय ... ओहा जब लड़त लड़त अकेल्ला रहि गिस तभो ले भागिस निही । जब तक आखरी दुश्मन नइ मरिस तब तक ओहा लड़िस । लड़त लड़त ओहा बहुतेच घायल हो चुके रिहिस । ओला पानी पियइया तको कोनो नइ बाँचे रहय । धुरवा के सुरता करत अपन प्राण त्याग दिस । 

               एती धुरवा हा पैरी नदी के खँड़ म लड़त रहय । लड़त लड़त कभू पैरी नदी नहाकके चल देवय त कभू पिछू घुचत सिरकट्टी तिर पहुँच जाय । दुश्मन मन हा एती के जंगल झाड़ी ले अंजान रिहिन .. कुछ दिन म हार मान के भाग गिन । धुरवा हा जीत गिस फेर आगू नइ बढ़िस अऊ लहुँट दिस । वापिस अमरिस त पता लगिस के कचनार हा दुनिया म नइ रहिगे हे । ओहा ओकर सुरता म .. उही तिर मुड़ पटक के अपन प्राण दे दिस । आजो उही मेर .. राजिम ले गरियाबंद के बीच कचनार  धुरवा के नाव के मंदिर उही पहाड़ी म बने हाबे .. जिंहा आजो कदम ठिठक जथे अऊ माथ नव जथे । 

               नवागढ़ म कचनार धुरवा के नानुक बाबू हा धीरे धीरे बड़े होय लगिस । देखते देखत पाँच बछर के होगे । महतारी बाप के साहस ओकरो म कूट कूट के भरे रहय । बघवा भालू ला नइ डर्रावय । ओला इहाँ के राजा घोषित करके गद्दी म बइठार दिन अऊ राज के काम काज बर एक झन बहुतेच विश्वसनीय मनखे ला नियुक्त कर दिन । एक दिन बाल राजा हा अपन बर हथियार के मांग करिस । नानुन पाँच बछर के लइका हा बड़े जिनीस तलवार तो उचा नइ सकय तेकर सेती ओकर बर नानुक छुरा नुमा हथियार बना के धरा दिन । लइका राजा हा .. मरत ले ओ छुरा ला अपन ले अलग नइ होवन दिन । दिन भर अपन तिर म राखे रहय अऊ सुते दसना म तको सिरहाना तिर म मढ़हा दे रहय । पाछू इही राजा के वंशज मन .. छुरा नुमा हथियार धरई ला परम्परा बना लिन । 

                तीसर चऊथई पीढ़ी म .. राज के खुबेच विस्तार होइस । ओकर सीमा हा मैनपुर ले सरायपाली तक पहुँच गिस । कुछ दशक पाछू राजा मन भाई भाई झगरे लगिन । राज तीन भाग म बँटागे । गढ़फुलझर के राजधानी सरायपाली , सुअरमल के राजधानी कोमाखान अऊ विंद्रानवागढ़ के राजधानी के नाव नवागढ़ रिहिस । विंद्रानवागढ़ के राजा हा कुछ बछर पाछू अपन राजधानी ला सूखा नदिया के तिर म बना डरिस अऊ बड़े जिनीस राजमहल के निर्माण कर डरिस । 

               मराठा मनके आक्रमण के सेती इँकर अर्थव्यवस्था हा छिन्न भिन्न हो चुके रिहिस । अब यहू मन अंग्रेज मनले समझौता कर डरिन अऊ अंग्रेजी सरकार ला समय समय म लगान पटाये बर धर लिन । हरेक बछर लगान तै करे बर अऊ पिछला बकाया ला पटाये बर .. राजा मन के बइसका हा रायपुर म सकलावय । एक बेर अइसने बइठक म .. विंद्रानवागढ़ के राजा संग अंग्रेजी कमांडर के तू तू मै मै होगे । अंग्रेजी कमांडर हा ओला मारे बर बंदूक उचा लिस । विंद्रानवागढ़ के राजा हा कूदके ओकर बंदूक ला नंगा लिस । कमांडर भागे लगिस तब राजा हा अपन तिर लुकाके धरे हथियार ला फेंक के मारिस । कमांडर भागगे अऊ बाँचगे फेर ओ हथियार हा एक ठिन खम्भा ला अल्लग चिरत निकल गिस । 

               संगवारी राजा मन तिर म जाके देखिन तब ओ छोटे से हथियार के बारे म पता लगिस । ओ हथियार हा अऊ कुछ निही बल्कि छुरा रिहिस । ओकर ले छुरा धरे के कारण घला पता चलिस .. तबले विंन्द्रानवागढ़ के राजा ला छुरा वाला राजा केहे बर धर लिन । इही नाव हा राज के नावा राजधानी बर राजा ला सबले उपयुक्त लगिस अऊ राजधानी गाँव के नाव छुरा पड़गे । 

 

हरिशंकर गजानंद देवांगन  .. छुरा