Friday, 3 October 2025

छत्तीसगढ़ मा छन्द के अलख जगइया - जनकवि कोदूराम "दलित"

 58 वीं पुण्यतिथि पर सादर नमन.........

                                                                                                       

छत्तीसगढ़ मा छन्द के अलख जगइया - जनकवि कोदूराम "दलित" 


छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के हर मंच ले दुनिया मा कविता के सब ले छोटे परिभाषा ला सुरता करे जाथे “जइसे मुसुवा निकलथे बिल ले, वइसे कविता निकलथे दिल ले” अउ एकरे संग सुरता करे जाथे ये परिभाषा देवइया जनकवि कोदूराम “दलित” जी ला. दलित जी के जनम ग्राम टिकरी (अर्जुन्दा) मा 05 मार्च 1910 के होइस. उनकर काव्य यात्रा सन् 1926 ले शुरू होईस. छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी मा उनकर बराबर अधिकार रहिस. गाँव मा बचपना बीते के कारन उनकर कविता मा प्रकृति चित्रण देखे ले लाइक रथे. दलित जी अपन जिनगी मा भारत के गुलामी के बेरा ला देखिन अउ आजादी के बाद के भारत ला घलो देखिन. अंग्रेज मन के शासन काल मा सरकार के विरोध मा बोले के मनाही रहिस, आन्दोलन करइया मन ला पुलिसवाला मन जेल मा बंद कर देवत रहिन. अइसन बेरा मा दलित जी गाँव गाँव मा जा के अपन कविता के माध्यम ले देशवासी मन हे हिरदे मा देशभक्ति के भाव ला जगावत रहिन. दोहा मा देशभक्ति के सन्देश दे के राउत नाचा के माध्यम ले आजादी के आन्दोलन ला मजबूत करत रहिन. आजादी के पहिली के उनकर कविता मन आजादी के आव्हान रहिन. आजादी के बाद दलित जी अपन कविता के माध्यम ले सरकारी योजना मन के भरपूर प्रचार करिन. समाज मा फइले अन्धविश्वास, छुआछूत, अशिक्षा  जइसन कुरीति ला दूर करे बर उनकर कलम मशाल के काम करिस. 

जनकवि कोदूराम “दलित” जी के पहचान छत्तीसगढ़ी कवि के रूप मा होइस हे फेर उनकर हिन्दी भाषा ऊपर घलो समान अधिकार रहिस. लइका मन बर सरल भाषा मा बाल कविता, जनउला, बाल नाटक, क्रिया गीत रचिन. तइहा के ज़माना मा ( सन् पचास के दशक) जब छत्तीसगढ़ी भाषा गाँव देहात के भाषा रहिस कोदूराम दलित जी आकाशवाणी नागपुर, भोपाल, इंदौर मा जा के छत्तीसगढ़ी भाषा मा कविता  अउ कहानी सुनावत रहिन. छत्तीसगढ़ी भाषा ला कविसम्मेलन के मंच मा स्थापित करइया शुरुवाती दौर के कवि मन मा उनला सुरता करे जाही. दलित जी के भाषा सरल, सरस औ सुबोध रहिस. व्याकरण के शुद्धता ऊपर वोमन ज्यादा ध्यान देवत रहिन इही पाय के उनकर ज्यादातर कविता मन मा छन्द के दर्शन होथे. दलित जी के हिन्दी रचना मन घलो छन्दबद्ध हें.   पंडित सुंदरलाल शर्मा के बाद कोनो कवि हर छत्तीसगढ़ मा छन्द ला पुनर्स्थापित करिस हे त वो कवि कोदूराम "दलित" आय. 28 सितम्बर 1967 के दलित जी के निधन होइस। दलित जी के छन्दबद्ध रचना ला छन्द विधान सहित जानीं।

 

दोहा छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों पद आपस मा तुकांत होथें अउ पद के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 13 अउ 11 मात्रा मा यति होथे। कोदूराम दलित जी के नीतिपरक दोहा देखव -


संगत सज्जन के करौ, सज्जन सूपा आय।

दाना दाना ला रखै, भूँसा देय उड़ाय।।


दलित जी मूलतः हास्य व्यंग्य के कवि रहिन। उनकर दोहा मा समाज के आडम्बर ऊपर व्यंग्य देखव - 


ढोंगी मन माला जपैं, लम्भा तिलक लगाँय।

मनखे ला छीययँ नहीं, चिंगरी मछरी खाँय।।


बाहिर ले बेपारी मन आके सिधवा छत्तीसगढ़िया ऊपर राज करे लगिन। ये पीरा ला दलित जी व्यंग्य मा लिखिन हें – 


फुटहा लोटा ला धरव, जावव दूसर गाँव।

बेपारी बनके उहाँ, सिप्पा अपन जमाँव।।


टिकरी गाँव के माटी मा जनमे कवि दलित के बचपना गाँवे मा बीतिस। गाँव मा हर चीज के अपन महत्व होथे। गोबर के सदुपयोग कइसे करे जाय, एला बतावत उनकर दोहा देखव –


गरुवा के गोबर बिनौ, घुरवा मा ले जाव।

खूब सड़ो के खेत बर, सुग्घर खाद बनाव।।


छत्तीसगढ़ धान के कटोरा आय। इहाँ के मनखे के मुख्य भोजन बासी आय। दलित जी भला बासी के गुनगान कइसे नइ करतिन – 


बासी मा गुन हे गजब, येला सब मन खाव।

ठठिया भर पसिया पियव, तन ला पुष्ट बनाव।।


दलित जी किसान के बेटा रहिन। किसानी के अनुभव उनकर दोहा मा साफ दिखत हे – 


बरखा कम या जासती, होवय जउने साल।

धान-पान होवय नहीं, पर जाथै अंकाल।।


जनकवि कोदूराम "दलित" जी नवा अविष्कार ला अपनाये के पक्षधर रहिन। ये प्रगतिशीलता कहे जाथे। कवि ला बदलाव के संग चलना पड़थे। देखव उनकर दोहा मा विज्ञान ला अपनाए बर कतिक सुग्घर संदेश हे – 


आइस जुग विज्ञान के, सीख़ौ सब विज्ञान।

सुग्घर आविष्कार कर, करौ जगत कल्यान।।


सोरठा छन्द - ये दोहा के बिल्कुले उल्टा होथे। यहू दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों विषम चरण आपस मा तुकांत होथें अउ विषम चरण के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 11 अउ 13 मात्रा मा यति होथे।


बंदँव बारम्बार, विद्या देवी सरस्वती।

पूरन करहु हमार, ज्ञान यज्ञ मातेस्वरी।।


उल्लाला छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। विषम अउ सम चरण  या सम अउ सम चरण आपस मा तुकांत होथें अउ हर चरण दोहा के विषम चरण असन होथे। ये छन्द मा 13 अउ 13 मात्रा मा यति होथे।


खेलव मत कोन्हों जुआ, करव न धन बरबाद जी।

आय जुआ के खेलना, बहुत बड़े अपराध जी।। 

 

सरसी छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों पद आपस मा तुकांत होथें अउ पद के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 16 अउ 11 मात्रा मा यति होथे। दलित जी सन् 1931 मा दुरुग आइन अउ इहें बस गें। वोमन प्राथमिक शाला के गुरुजी रहिन। उनकर सरसी छन्द मा गुरुजी के पीरा घलो देखे बर मिलथे –


चिटिक प्राथमिक शिक्षक मन के, सुनलो भइया हाल।

महँगाई के मारे निच्चट , बने हवयँ कंगाल।।


गुरुजी मन के हाल बर सरकार ऊपर व्यंग्य देखव –

 

जउन देस मा गुरूजी मन ला, मिलथे कष्ट अपार।

कहै कबीरा तउन देस के , होथे बंठाढार।।


दलित जी अइसन गुरुजी मन ऊपर घलो व्यंग्य करिन जउन मन अपन दायित्व ला बने ढंग ले नइ निभावँय – 


जउन गुरूजी मन लइका ला, अच्छा नहीं पढ़ायँ।

तउन गुरूजी अपन देस के, पक्का दुस्मन आयँ।।


रोला छन्द - चार पद, दू - दू पद मा तुकांत, 11 अउ 13 मात्रा मे यति या हर पद मा कुल 24 मात्रा।

दलित जी के ये रोला छन्द मा बात के महत्ता बताये गेहे –


जग के लोग तमाम, बात मा बस मा आवैं।

बाते मां  अड़हा - सुजान  मन चीन्हें जावैं।।

करो सम्हल के बात, बात मा झगरा बाढ़य।

बने-बुनाये काम,सबो ला  बात  बिगाड़य।।


आज के जमाना मा बेटा-बहू मन अपन ददा दाई ला छोड़ के जावत हें। इही पीरा ला बतावत दलित जी के एक अउ रोला छन्द – 


डउकी के बन जायँ, ददा - दाई नइ भावैं।

छोड़-छाँड़ के उन्हला, अलग पकावैं-खावैं।।

धरम - करम सब भूल, जाँय भकला मन भाई।

बनँय ददा-दाई बर ये कपूत दुखदाई।।


छप्पय छन्द – एक रोला छन्द के बाद एक उल्लाला छन्द रखे ले छप्पय छन्द बनथे। ये छै पद के छन्द होथे। गुरु के महत्ता बतावत दलित जी के छप्पय छन्द देखव –


गुरु हर आय महान, दान विद्या के देथे।

माता-पिता समान, शिष्य ला अपना लेथे।।

मानो गुरु के बात, भलाई गुरु हर करथे।

खूब सिखो के ज्ञान, बुराई गुरु हर हरथे।।

गुरु हरथे अज्ञान ला, गुरु करथे कल्यान जी।

गुरु के आदर नित करो, गुरु हर आय महान जी।।


चौपई छन्द - 15, 15 मात्रा वाले चार पद के छन्द चौपई छन्द कहे जाथे। चारों पद या दू-दू पद आपस मे तुकांत होथें। 


धन धन रे न्यायी भगवान। कहाँ हवय जी आँखी कान।।

नइये ककरो सुरता-चेत। देव आस के भूत-परेत।।

एक्के भारत माँ के पूत। तब कइसे कुछ भइन अछूत।।

दिखगे समदरसीपन तोर। हवस निचट निरदई कठोर।।


चौपाई छन्द - ये 16, 16 मात्रा मे यति वाले चार पद के छन्द आय। एखर एक पद ला अर्द्धाली घलो कहे जाथे। चौपाई बहुत लोकप्रिय छन्द आय। तुलसीदास के राम चरित मानस मा चौपाई के सब ले ज्यादा प्रयोग होय हे। जनकवि कोदूराम "दलित" जी अपन कविता ला साकार घलो करत रहिन। उन प्राथमिक शाला के गुरुजी रहिन। अपन निजी प्रयास मा प्रौढ़ शिक्षा के अभियान चला के  आसपास के गाँव साँझ के जाके प्रौढ़ गाँव वाला मन ला पढ़ावत घलो रहिन। प्रौढ़ शिक्षा ऊपर उनकर एक चौपाई – 


सुनव सुनव सब बहिनी भाई। तुम्हरो बर अब खुलिस पढ़ाई।।

गपसप मा झन समय गँवावव। सुरता करके इसकुल आवव।।

दू दू अक्छर के सीखे मा। दू-दू अक्छर के लीखे मा।।

मूरख हर पंडित हो जाथे। नाम कमाथे आदर पाथे।।

अब तो आइस नवा जमाना।हो गै तुम्हरे राज खजाना।।

आज घलो अनपढ़ रहि जाहू।तो कइसे तुम राज चलाहू।।


पद्धरि छन्द - ये 16, 16 मात्रा मा यति वाले दू पद के छ्न्द आय। एखर शुरुवात मा द्विकल (दू मात्रा वाले शब्द) अउ अंत मा जगण (लघु, गुरु, लघु मात्रा वाले शब्द) आथे। हर दू पद आपस मा तुकांत होथे। दलित जी अपन जागरण गीत मा पद्धरि छन्द के बड़ सुग्घर प्रयोग करिन हें – 


झन सुत सँगवारी जाग जाग। अब तोर देश के खुलिस भाग।।

अड़बड़ दिन मा होइस बिहान। सुबरन बिखेर के उइस भान।।

घनघोर घुप्प अँधियार हटिस। ले दे के पापिन रात कटिस।।

वन उपवन माँ आइस बहार। चारों कोती छाइस बहार।। 


मनहरण घनाक्षरी - कई किसम के घनाक्षरी छन्द होथे जेमा मनहरण घनाक्षरी सब ले ज्यादा प्रसिद्ध छन्द आय। येहर वार्णिक छन्द आय। 16, 15 वर्ण मा यति देके चार डाँड़ आपस मा तुकांत रखे ले मनहरण घनाक्षरी लिखे जाथे। चारों डाँड़ आपस मा तुकांत रहिथे। घनाक्षरी छन्द ला कवित्त घलो कहे जाथे। जनकवि कोदूराम "दलित" जी के ये प्रिय छन्द रहिस। उनकर बहुत अकन रचना मन घनाक्षरी छन्द मा हें। कविता मा गाँव के नान नान चीज ला प्रयोग मा लाना उनकर विशेषता रहिस। ये मनहरण घनाक्षरी मा देखव अइसन अइसन चीज के बरतन हे जउन मन समे के संगेसंग नँदा गिन। चीज के नँदाए के दूसर प्रभाव भाजहा ऊपर पड़थे। चीज के संगेसंग ओकर नाम अउ शब्द मन चलन ले बाहिर होवत जाथें अउ शब्दकोश कम होवत जाथे। तेपाय के असली साहित्यकार मन अइसन चीज के नाम के प्रयोग अपन साहित्य मा करके ओला चलन मा जिन्दा राखथें। ये घनाक्षरी दलित जी अइसने प्रयास आय – 


सूपा ह पसीने-फुने, चलनी चालत जाय

बहाना मूसर ढेंकी, मन कूटें धान-ला।

हँसिया पउले साग, बेलना बेलय रोटी

बहारी बहारे जाँता पिसय पिसान-ला।

फुँकनी फुँकत जाय, चिमटा ह टारे आगी

बहू रोज राँधे-गढ़े, सबो पकवान-ला।

चूल्हा बटलोही डुवा तेलाई तावा-मनन

मिलके तयार करें, खाये के समान-ला।।


जब अपन देश ऊपर कोनो दुश्मन देश हमला कर देथे तब कवि के कलम दुश्मन ला ललकारथे। सन् 1962 मा चीन हर हर देश ऊपर हमला करे रहिस। दलित जी के कलम के ललकार देखव - 


चीनी आक्रमण के विरुद्ध (घनाक्षरी)


अरे बेसरम चीन, समझे रहेन तोला

परोसी के नता-मा, अपन बँद-भाई रे।

का जानी कि कपटी-कुटाली तैं ह एक दिन

डस देबे हम्मन ला, डोमी साँप साहीं रे ।

बघवा के संग जूझे, लगे कोल्हिया निपोर

दीखत हवे कि तोर आइगे हे आई रे।

लड़ाई लड़े के रोग, डाँटे हवै बहुँते तो

रहि ले-ले तोर हम, करबो दवाई रे ।। 


अइसने सन् 1965 मा पाकिस्तान संग जुद्ध होइस। दलित जी के आव्हान ला देखव ये घनाक्षरी मा –

 

चलो जी चलो जी मोर, भारत के वीर चलो

फन्दी पाकिस्तानी ला, हँकालो मार-मार के।

कच्छ के मेड़ों के सबो, चिखलही भुइयाँ ला

पाट डारो उन्हला, जीयत डार-डार के।

सम्हालो बन्दूक बम , तोप तलवार अब

आये है समय मातृ-भूमि के उद्धार के।

धन देके जन देके, लहू अउ सोन देके

करो खूब मदद अपन सरकार के।।


गाँव मे पले-बढ़े के कारण दलित जी अपन रचना मन मा गाँव के दृश्य ला सजीव कर देवत रहिन। उनकर चउमास नाम के कविता घनाक्षरी छन्द मा रचे गेहे। उहाँ के दू दृश्य मा छत्तीसगढ़ के गाँव के सजीव बरनन देखव – 


बाढिन गजब माँछी बत्तर-कीरा "ओ" फांफा,

झिंगरुवा, किरवा, गेंगरुवा, अँसोढिया ।

पानी-मां मउज करें-मेचका भिंदोल घोंघी,

केंकरा केंछुवा जोंक मछरी अउ ढोंड़िया ।।

अँधियारी रतिहा मा अड़बड़ निकलयं,

बड़ बिखहर बिच्छी सांप-चरगोरिया ।

कनखजूरा-पताड़ा सतबूंदिया औ" गोहे,

मुंह लेड़ी धूर नाँग, कँरायत कौड़िया ।।


जनकवि कोदूराम "दलित" के एक प्रसिद्ध रचना "तुलसी के मया मोह राई छाईं उड़गे" मा गोस्वामी तुलसी दास के जनम ले लेके राम चरित मानस गढ़े तक के कहिनी घनाक्षरी छन्द मा रचे गेहे। वो रचना के एक दृश्य देखव कि छत्तीसगढ़ के परिवेश कइसे समाए हे – 


एक दिन आगे तुलसी के सग सारा टूरा,

ठेठरी अउ खुरमी ला गठरी मा धर के।

पहुँचिस बपुरा ह हँफरत-हँफरत,

मँझनी-मँझनिया रेंगत थक मर के।

खाइस पीइस लाल गोंदली के संग भाजी,

फेर ओह कहिस गजब पाँव पर के।

रतनू दीदी ला पठो देते मोर संग भाँटो,

थोरिक हे काम ये दे तीजा-पोरा भर के।।


कुण्डलिया छन्द – ये छै डांड़ के छन्द होथे. पहिली दू  डांड़ दोहा के होथे ओखर बाद एक रोला छन्द रखे जथे. दोहा के चौथा चरण रोला के पहिली चरण बनथे. शुरू के शब्द या शब्द-समूह वइसने के वइसने कुण्डलिया के आखिर मा आना अनिवार्य होते. कोदूराम "दलित" जी  आठ सौ ले ज्यादा कविता लिखिन हें फेर अपन जीवन काल मा एके किताब छपवा पाइन - "सियानी गोठ"। ये किताब कुण्डलिया छन्द के संग्रह हे। कवि गिरिधर कविराय, कुण्डलिया छन्द के जनक कहे जाथें। उनकर परम्परा ला दलित जी, छत्तीसगढ़ मा पुनर्स्थापित करिन हें। साहित्य जगत मा कोदूराम "दलित" जी ला छत्तीसगढ़ के गिरिधर कविराय घलो कहे जाथे। गिरिधर कविराय के जम्मो कुण्डलिया छन्द नीतिपरक हें फेर दलित जी के कुण्डलिया छन्द मा विविधता देखे बर मिलथे। आवव कोदूराम "दलित" जी के कुण्डलिया छन्द के अलग-अलग रंग देखव – 


नीतिपरक कुण्डलिया – राख


नष्ट करो झन राख –ला, राख काम के आय।

परय खेत-मां राख हर , गजब अन्न उपजाय।।

गजब  अन्न  उपजाय, राख मां  फूँको-झारो।

राखे-मां  कपड़ा – बरतन  उज्जर  कर  डारो।।

राख  चुपरथे  तन –मां, साधु,संत, जोगी मन।

राख  दवाई  आय, राख –ला नष्ट करो झन।।


सम सामयिक  - पेपर

पेपर मन –मां रोज तुम, समाचार छपवाव।

पत्रकार संसार ला, मारग सुघर दिखाव।।

मारग सुघर दिखाव, अउर जन-प्रिय हो जाओ।

स्वारथ - बर पेपर-ला, झन पिस्तौल बनाओ।।

पेपर मन से जागृति आ जावय जन-जन मा।

सुग्घर समाचार छपना चाही पेपर-मा।।


पँचसाला योजना  (सरकारी योजना) - 

 

पँचसाला हर योजना, होइन सफल हमार।

बाँध कारखाना सड़क, बनवाइस सरकार।।

बनवाइस सरकार, दिहिन सहयोग सजाबो झन।

अस्पताल बिजली घर इसकुल घलो गइन बन।।

देख हमार प्रगति अचरज, होइस दुनिया ला।

होइन सफल हमार, योजना मन पँचसाला।।


अल्प बचत योजना - (जन जागरण)

अल्प बचत के योजना, रुपया जमा कराव।

सौ के बारे साल मा, पौने दू सौ पाव।।

पौने दू सौ पाव, आयकर पड़ै न देना।

अपन बाल बच्चा के सेर बचा तुम लेना।।

दिही काम के बेरा मा, ठउँका  आफत के।

बनिस योजना तुम्हरे खातिर अल्प बचत के।।


विज्ञान – (आधुनिक विचार)

आइस जुग विज्ञान के , सीखो  सब  विज्ञान।

सुग्घर आविस्कार कर ,  करो जगत कल्यान।।

करो जगत कल्यान, असीस सबो झिन के लो।

तुम्हू जियो अउ दूसर मन ला घलो जियन दो।।

ऋषि मन के विज्ञान , सबो ला सुखी बनाइस।

सीखो सब  विज्ञान,   येकरे जुग अब आइस।।


टेटका – (व्यंग्य) 


मुड़ी हलावय टेटका, अपन टेटकी संग।

जइसन देखय समय ला, तइसन बदलिन रंग।।

तइसन बदलिन रंग, बचाय अपन वो चोला।

लिलय  गटागट जतका, किरवा पाय सबोला।।

भरय पेट तब पान-पतेरा-मां छिप जावय।

ककरो जावय जीव, टेटका मुड़ी हलावय।।


खटारा साइकिल – (हास्य)


अरे खटारा साइकिल, निच्चट गए बुढ़ाय।

बेचे बर ले जाव तो, कोन्हों नहीं बिसाय।।

कोन्हों नहीं बिसाय, खियागें सब पुरजा मन।

सुधरइया मन घलो हार खागें सब्बो झन।।

लगिस जंग अउ उड़िस रंग, सिकुड़िस तन सारा।

पुरगे मूँड़ा तोर, साइकिल अरे खटारा।।


अउ आखिर मा दलित जी के ये कुण्डलिया छन्द, हिन्दी भाषा मा -

नाम -

रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार।

अतः सभी का कर भला, है इसमें ही सार।।

है इसमें ही सार, यार तू तज के स्वारथ।

अमर रहेगा नाम, किया कर नित परमारथ।।

काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है।

किन्तु सुनाम सदा दुनिया में रह जाना है।।


छत्तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम "दलित" जी अपन पहिली कुण्डलिया छन्द संग्रह "सियानी गोठ" (प्रकाशन वर्ष - 1967) मा अपन भूमिका मा लिखे रहिन- "ये बोली (छत्तीसगढ़ी) मा खास करके छन्द बद्ध कविता के अभाव असन हवय, इहाँ के कवि-मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करें। स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देवें। ये बोली पूर्वी हिन्दी कहे जाथे। येहर राष्ट्र-भाषा हिन्दी ला अड़बड़ सहयोग दे सकथे। यही सोच के महूँ हर ये बोली मा रचना करे लगे हँव"। 


उंकर निधन 28 सितम्बर 1967 मा होइस, उंकर बाद छत्तीसगढ़ी मा छन्दबद्ध रचना लिखना लगभग बंद होगे। सन् 2015 के दलित जी के बेटा अरुण कुमार निगम हर छत्तीसगढ़ी मा विधान सहित 50 किसम के छन्द के एक संग्रह "छन्द के छ" प्रकाशित करवा के दलित जी के सपना ला पूरा करिन। आजकाल छन्द के छ नाम के ऑनलाइन गुरुकुल मा छत्तीसगढ़ के नवा कवि मन ला छन्द के ज्ञान देवत हें जेमा करीब 300 ले आगर नवा कवि मन छत्तीसगढ़ी भाषा मा कई किसम के छन्द लिखत हें अउ अपन भाषा ला पोठ करत हें। 


आलेख - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़

महतारी के पीरा*

 *महतारी के पीरा*


मौसम के बिगड़े मिजाज के सेती दू दिन ले मोरो मिजाज बिगड़गे रिहिस।जुड़ सर्दी अउ खांसी ह जब घरेलू दवा मा नी माढ़िस त सरकारी अस्पताल गेंव।

बीमरहा मन के रोहो पोहो भीड़ के मारे अस्पताल गजगजात रहै। मनमाने भीड़ ला देखके थोरकुन वार्ड मन कोती घूमे ला चलदेंव।ता एक ठ वार्ड में केप केप करत मनखे के माथ मा हाथ रखत ओकर दाई कलपत रहै।

तें काबर दारु पीथस बेटा! अपन नान-नान लोग लइका के तो खियाल कर! 

त ओकर बेटा कहत रहै-दारु के संग अब ऊपर जहूं तभे छूटही दाई।हाथ गोड़ कांपथे एकर बिना।जीयत ले नी छूटे।

त वो सियानिन बखानत कथे-वो रोगहा सरकार के नांव बुता जाय जे दारु दुकान के ताकत में सरकार चलाथे।कतको घर के दिया बुताके अॅंधियार करत हे।का उंकर घर लोग-लइका नी होही??? 

ओकर वाजिब सवाल अउ दुख ला देखके महूं सोच मा परगेंव।का इंकर हाय कोनो ला लगत होही???? 


रीझे यादव 

टेंगनाबासा

फैशन

 *फैशन*

 

देवारी तिहार लकठावत हे ता लइका मन बर कपडा़ बिसाय बर कपड़ा दुकान जाना परगे।समय मा ओनहा कपड़ा बिसाबे त दर्जी मन खिले बर तैयार होथे।

कतको झन नम्मी के नवा खाथे त कपड़ा दुकान में गिराहकी लगे रिहिस।सेठ संग जय जोहार करे के बाद वो अपन कर्मचारी मन ला कपड़ा देखाय बर किहिस।उही बेरा मा एक झन सियान गिराहिक अपन जवनहा लइका बर बंगाली(कुरता)छांटत सेठ ला बतात राहय।

हम तो आजकल के लइका मन के मारे हलाकान हन सेठ! 

काली गांव में दुर्गा ठंडा होही।मोर टूरा के पूरा संगत एके रंग के बंगाली पहिर के दुर्गा बिसर्जन करबो किके योजना बनाय हे।टूरा नवा बंगाली बर फोन करदिस अचानक।रंग रंग के तमाशा चलत हे गा आजकल।सुते बर अलग कपड़ा।घूमे बर अलग कपड़ा।बिहा्व के अलग ड्रेस।में तो कथंव वाह रे टेस!!! 

मोर ऊमर एकठन लुंहगी पहिरत निकलगे गा।फेर का करबे।धान में बीमारी लगे हे तेकर खातिर दवाई बिसाय बर आय रेहेंव।फेर का करबे!!!दवाई उधारी मा लेगहूं ददा! उंकर फैशन ज्यादा जरुरी हे।

सियान के मजबूरी के गोठ सुनके में मुस्कावत रहिगेंव।


रीझे यादव टेंगनाबासा

लघु कथा -"बरदी के भोला "

 लघु कथा -"बरदी के भोला "

      -मुरारी लाल साव

जेन गाँव म जानवर रहिथे उहें बरदी होथे l बरदी माने चौपाया  समाज  l  बरदी दुटंगिया मन के गुलामी म रहिथे l 

      गाँव के दैहान म गाय गरु, गोल्लर छेरी पठरु  भैस भैंसा सकलाथे बरदी कहाथे l पहटिया के बिना बरदी नई चलय l फिरतू पहटिया जेखर मुड़ी म खुमरी के ताज फुलेती लाठी हाथ म चांदी के रुपया कनिहा म कौड़ी के करधन माला गर म पहिने चिल्लाथे -"अरे,खोरी हुत हुत l" खोरी गाय जान डरथे सुन डरथे  बरदी ले बाहिर नई जाना हे l पहटिया के लाठी म गोड़ टूटे रहिथे तभे खोरी हो जथे l जेन जेन पहटिया के लाठी खाये रहिथे उही फिरतू के बोली ठोली ला सुन के इसारा म रहिथे l उही बरदी म सिंग टूटे करिया गोल्लर  पहटिया ला दउड़ा दउड़ा के हुमेलय l बिजार रहीस l बिन बिजार के बरदी के पहचान नई बनय l फिरतू डर के मारे भोला नाँव धरे रहिस l "भोला भले भले कहय तहाँ भोला गोल्लर घलो अल्लर हो जावय l " 

मान सम्मान के भूखे रहिथे बिजार गोल्लर मन l धनऊ बड़ शान से कहय मोर ढीले गोल्लर ए l एक दिन

  बरदी म सन्नाटा पसरे देखे ला मिलिस l फिरतू बतावत रहिस -" आज भोला गोल्लर ला बरदी के चार पाँच सांड कुदा कुदा के भोला के गोड़ ला कुचर डरे हे l उठ नई सकत हे परे हे l तेखर सेती बरदी म शान्ति हे l धनऊ के मुड़ी घलो खालहे होगे हे l धनऊ फिरतू पहटिया ला पूछत रहिस -" भोला के दुर्गति होवत का करत रहेस? फिरतू बताइस -" जइसन करनी ओइसन फल मिलथे l जउन बरदी भर ला भय दिखा के रहीं l बरदी ले सांड घलो पैदा हो जथे l ओइसने होइस भोला के l "

मरखंडा मैनखे के घलो इही दुर्गति ले अन्त होथे l " 

बरदी के आघू  ककरो राज जादा दिन चलय l धनऊ के मुड़ी अउ तरी डहर होगे काबर उहू चार दिन आतंक मचाये रहीस l ओ दिन के सुरता देवाके फिरतू  ओकर घमंड ला तरी डहर बोज दिस l


मुरारीलाल साव

दसरहा के रावन"

  लघु कथा - 

    " दसरहा के रावन" 

         - मुरारी लाल साव  

गाँव के दसरहा के अलगे मजा आथे l किसानी के काम बूता हो जाये रहिथे l मनखे ठलहा हो जाये रहिथे l ओएसने परब  आथे l नवरात के आखिरी दिन दसरहा मनाये के तैयारी होथे l गाँव म

बैठक रखे गिस l रावन जलाबो रावन मारबो l दसरहा उतसव समिति बनाइस l राम लीला मंडली तैयार करे गिस l रामू पेटी मास्टर, मंगलू तबला, गिरी ढोलक अइसने सब जुर मिलके संगीत पार्टी बनिस l एके दिन के राम लील्ला करे बर  नाँव चुने गिस l रावण भाटा म कूदना नाचना हे रावन पार्टी बनाये गिस l दूनो दल के मेनेज्जर दाऊ दुखित रहिस l खर्चा करे बर तैयार रहिथे l मनेज्जर के मान सम्मान होथे l

राम दल बनिस ओमा हनुमान के रोल ओकर डायलॉग जान बुज के बड़े बनाये गिस l रावन दल म मेघ नाथ के डायलॉग ला बड़े लिखे गिस  l

रावन बनवाना मनेज्जर के हाथ म रहिस l रावन कोनो बने बर तैयार होवत नई रहिस l 

दुखित ह ख़ोज के दसरु ला रावन बने बर मनाइस l मने मन गाली देवत रहिस -" साले दसरु तोर भाव बढ़गे, सकलकरम तै करेस सकलकरमी,बईमान,चोट्टा दोगला,रावन तो तुहिंच ला बनाहूँ ओकरे लायक हस l " l इही बीच जगेसर आके पूछथे -" रावन बने बर तैयार  होइस? जगेसर घलो गारी देवत कहिस -"दोगला डरहवाके चमकाके बड़े आदमी बने हे दूसर के चीज हड़प के मेऊं बने हे l 

सँइंताहा हे,घमंडी ककरो संग ढंग से गोठियावय नहीं l बोचक के कहाँ जाही? " 

दुखित  बताइस -" 

मोर पालो परे हे l रावन घलो अइसन काम नई करे हे l तीन झन बाई बनाके छोड़ देहे l चीज के अंहकार हे ओला l"

दसरु रावन बनगे l पाठ मिलगे तैयारी बर l 

गाँव के लीला मंडली दसरहा मनाही l हाँका परगे l 

संझा कुन गाँव के चौक म लीला शुरू होगे l 

सज धज के दूनो दल के लीला पाठ चलत रहिस l 

रावन हनुमान संवाद निकले रहिस l हनुमान के पाठ करत 

बिसरु -" लंकेश , बात मान ले प्रभु राम के,सोजबाय म l"

रावन बने दसरु -" ओ बानर, 

लंका म आके मोला तै समझा झन l" 

बानर बिसरु - " हनुमान मोर नाँव हे 

उहू ल तै जान ले l" 

: ताकत ल मान ले l"

दशरू रावन -" तीन लोक के राजा रावन , पहचान ले l दस मुड़ी वाले "  

बिसरु -"हम चार झन, काफ़ी हन दसानन देख ले l "

पेटी मास्टर धुन बजाइस लड़ई के ल दसरु बेधून होके कूदे लागिस रावन के भेस म l  

मंच वाले आके चुपके से चेताइस जादा कूद झन मंच रच रच करत हे l रावन के भेस म रहिस ताव म रहिस -" रावन ल कुछ नई होवय -पंचू l "

पब्लिक के मजा के ठिकाना नई रहिस l मेघनाथ कुदत आइस -" आजा मोर से युद्ध कर पता चल जही कोन ललकारत हे तेन l  पूरा रावन दल कूदे ला धर लीस l मंच रच रचाके तरी डहर भसक गे l पाताल लोक म  गिर गे l भर भर पब्लिक म अफरा तफरी मचगे l राम दल के बानर  जय श्री राम जय श्रीराम  चिल्लावत रहिस l आखिर म भगवान राम रावन के बने कागज के पुतला म आगी लगा दिस l दसरु के संग दस झन सहित रावन दल ला अस्पताल भेजें गिस l एती राम अउ राम दल के आरती उतारे गिस l दसहरा उतसव मनाये गिस गाँव म l


मुरारीलाल साव

बिजली माता के महिमा वीरेन्द्र ‘सरल‘

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य 


बिजली माता के महिमा

वीरेन्द्र ‘सरल‘

गजब दिन बाद मय ममा घर गयेंव। ममादाई मोहाटी म बइठ के चउर निमारत रहय। मय पावं-पल्लगी करेंव। ममा दाई आशीष देवत किहिस- "खुशी रह बेटा तोर घर के सब्बो लट्टू बने बग-बग ले बरय। तोर घर के लाइन कभु गोल झन होवय अउ बिजली बिल निचट कमती आवय। "

 आशीष सुनके मोर दिमाग घूमगे। मन म गुनेंव, ममादाई कइसे अनर-बनर कहत हावे , बही भूतही होगे हे तइसे लागथे। फेर सोचेव, अरे! सियान मनखे हे। सियान मन कथे , साठ बुद्धि नाश। तिही पाय के अइसन कहत होही।

घर भीतरी पहुंचेव तब घर ह निचट सुनसुनहा लागिस। बारी-बखरी डहर ले काखरो गारी-बखाना दे के गोहार सुनावत रिहिस , मैं सोझे बखरी डहर चल देंवं। मामी ह अपन पड़ोसी संग झगड़ा होवत मनमाने बखानत रहय।  " जा रे बैरी, तोर घर के सबो लट्टू चरचर ले बुझा  जाय। तोर घर के लाइन सबर दिन बर गोल हो जाय। सबो लट्टू फ्यूज हो जाय। बिजली बिल मनमाने आ जाय। " ये सब ला सुनके मय दंग रहिगेव, पहली बेर अइसन शरापा-बखाना सुने बर मिलत रिहिस। मोर दिमाग घूमगे फेर मामला कुछु समझ में नइ आइस।

तभे मोर उप्पर मामी के नजर पड़िस। वोहा तुरते अपन दुर्वचन ला अइसे बंद करिस जइसे टी वी वाला मन ब्रेक ले बर कार्यक्रम ला बंद करथे। मामी मोर तीर में आके मोर पांव पड़िस अउ घर भीतरी जाके एक लोटा पानी लान के किहिस- " कतेक बेरा के आय हस भांचा? चल भीतरी मे बइठ ददा। "  मैहा भीतरी म आके बइठगेंव। मैंहा ममा कहां हे कहिके पूछेव तब मामी ह अछरा म अपन मुंहु के पछीना ला पोछ के भांचा आय हावे कहिके गोहार लगाइस। 

मामी के आवाज ला सुनके कुरिया भीतरी ले ममा निकल के अइस अउ पांव पड़के हाल-चाल पूछत कहिस- " अउ भांचा! सब बने-बने? घर के लट्टू मन सब बने बरत हे? तोर घर के लाइन ह तो गोल नइ होवत होही? बिजली बिल घला कमती आवत होही?" 

ये सब ला सुनके मोर जी बगियागे। मैहा गुसिया के कहेंव- " तुंहर सब झन के दिमाग खराब होगे हावे का ? जेला देखबे तिही बिजली के गोठ गोठियाथव। एखर छोड़ अउ कहि गोठ नइ हे का तुहर तीर? "

तब तक मामी चहा बना के लान डारे रहिस हावे। पहिली मैहा गटा-गट एक गिलास पानी पियेंव अउ गरम चहा ला सुड़के लगेंव। मोर गुस्सा ला देख के ममा ह तो कले चुप रहिगे फेर मामी ह किहिस- " जान दे भांचा ! ये बिजली के चक्कर म तोर ममा ह लटपट बांचे हे। "

मैहा ममा कोती ला देख के कहेवं- " मै तो येला पहिली ले समझाय रहेंव कि तोर पड़ोसिन बिजली के चाल-चलन मोला ठीक नइ लागे ममा! एखर चक्कर म झन फंसबे ना ,फेर मोर बात ला येहा माने तब ना? "

 मामी ममा डहर ला गुर्रा के देखिस ते ममा सकपकागे। मामी किहिस- " नही  भांचा! मैहा वो बिजली के बात नइ करत हवं। लाइन वाला बिजली के बात करत हवं। "

मैहा डर्रा के कहेव- " ममा बिजली म चटक गे रिहिस का मामी? "

मामी किहिस- " अरे नही ददा!  बिजली वाले मन एखर थोथना म चटक गे रिहिन। चालीस हजार के मनमाने बिल भेजे रिहिन तउन ला देख के येला हार्ट-अटैक आगे रिहिस। महीना दिन ले अस्पताल म भरती रिहिस। अभीच-अभी अस्पताल ले छुट्टी मिले हावे। देखत नइ हस भांचा तोर ममा कतेक कमजोर होगे हावे। अभी घला बिजली बिल के नाव सुनके अलकरहा झझक जथे अउ डर के मारे भीतरी म खुसर जाथें।"

 मैहा कहेव- " बाप-रे-बाप! मामी अतेक जब्बर घटना होगे अउ तुमन मोला शोर-संदेश कहीं नइ देव। " 

ये घटना ला सुनके मोरो जीव धुकधुकाय बर धर लिस। तब ले मैहा हिम्मत करके कहेंव- " मामी भारी बिजली बिल ला धर के आफिस म जाय रहितेव , हो सकत हे बिल ह धोखा म आगे रिहिस होही। साहब ला पूछे रहितेव ते बिल कमती हो जाय रहितिस।  " 

बिजली ऑफिस के नाव सुनके ममा के ब्लडप्रेयार फेर बाढ़गे। वोहा हफरत  किहिस- " नाव झन ले भांचा आफिस के , मोला बिल ला देख के अटैक थोड़े आय रहिस ददा! आफिस वाले मन के गोठ ला सुनके आय रहिस। बिजली ले जादा आफिस वाले मन झटका मारथे मोर बाप। मैहा आफिस में जाके साहब ला कहेंव, कस साहब मोर घर में तो एकल बत्ती कनेक्शन लगे हावे एकेच ठन लटटु बरथे फेर एकेच महीना में अहा चालिस हजार के बिल कइसे आगे हावे? "

 तब साहब ह आंखी ला मूंद के थोड़किन धियान लगा के देखिस अउ किहिस- " तोर पुरखा मन जउन मन मरके स्वर्गवासी होगे हे ओमन जुन्ना बिजली बिल ला नइ पटाय रिहन। उही सबो ह एक संघरा जुड़ के आय हे अउ कुछु पूछना हे? "

मैं बक खाके कहेंव-" साहब!  हमर पुरखा मन तो चिमनी- कंडिल में गुजारा करत सरग सिधार गे हावे, ओमन कहा ले बिजली खपत करिन होही। मैहा तो अभिच-अभिच नवा घर बना के कनेक्शन  ले हावों। मीटर घला मोरच नाव में हे तब मनमाने बिल में मोर पुरखा मन के काय गलती हे? "

तब साहब ह फेर आंखी ला मूंद के धियान लगाके देखिस, कुछ समें बाद ओखर समाधी ह टूटिस तब किहिस- " अरे! तोर पुरखा मन तो अभी घला सरग में रात-दिन मनमाने कुलर-पंखा चलात हावें। रात-दिन लटटु ला बारत हावे। सरग के बिल ला तोर बिल में जोड़े गे हावे। अब तिही बता , तोर पुरखा मन के बिल ला तै नइ पटाबे तब का मेहा पटाहूं? अब जादा दिमाग झन खा, सोझ बाय बिल ला पटा नही ते लाइन ला कटा, समझे? तोला कोन्हों मोर बात में विश्वास नइ हे तब मैहा अपन करमचारी मन ला तोर घर भेजत हवं। ओमन तोर घर ला खन-कोड़ के देखही। खनई में कोन्हो जुन्ना वायर, फूटहा लटटु के कांच , होल्डर अउ बटन मिलगे तब समझ जा तोर पुरखा मन बिजली के उपयोग करे रिहिन होही। 

अब काय बतावंव भांचा ,मैहा समझेव मैहा घर ला तो अभी-अभी बियारा म बनाय हवं ,उहां ले कइसे ये सब समान निकलही । महु जोशिया के कही पारेव ,भेज देना भेजबे ते हो जाना चाही दूध के दुध अउ पानी के पानी। "

मोर गोठ ला सुनके साहब घला ताव खागे अउ तुरते अपन करमचारी मन ला मोर संगे-संग भेज दिस। करमचारी मन आके मोर घर के मोहाटी ला खने के शुरू करिन, बस थोड़कुन खनइ होय रिहस अउ फूटहा होल्डर अउ वायर निकलगे। मै बक खागेव , " मन म गुणेव सिरतोन साहब ह अन्तर्यामी आय ददा। तीनो लोक ला संघरा देख डारथे। करमचारी मन ओ समान ला जप्ती बना दिन । पंचनामा करवा के लेगगे। अउ मोला चालिस हजार के बिल ला पटाय बर लागिस। बाद में मोला सुरता आइस ,ये जगह म पहिली घुरवा रिहिस ,मैहा घुरवा ला पटवाके मकान बनवाय रहेंव । पहिली घुरवा में कोन्हो फेक दे रिहिन होही ये समान मन  ला । मैहा साहब ला घेरी-बेरी गोहरा के ये बात ला बतायेंव फेर वोहा मोर बात ला मानबे नइ करिस । तभे मोला अटैक अइस भांचा। मोर नव ले दस नइ पूरे रहिस त बांचगेव ददा। "

अतका बता के ममा ह फफक-फफक के रोय लगसि। थोड़किन बाद वोला चक्कर आगे अउ वोहा बेहोश होगे। मामी अउ मै ममा ला चिंगिंर-चांगर घर के पूजा खोली में लानेन। पूजा खोली में आके मोर दिमाग चकरागे। महू बेहोश होत-होत लटपट म बाचेंव। काबर कि उहां दिवार म लिखाय रहय बिजली माता के भंडार सदा भरपूर रहय अउ बिजली माता जी सदा सहाय रहय। लकड़ी के पीढ़ा मे होल्डर फिट करके ओमें लटटु लगाय गे रिहिस। फुलकसिया लोटा म आमा के पान , तेखर उपर में नांदी तेखर उपर में जीरो वोल्ट के बल्ब बरत रहय । तीर में हुम देवाय रहय , अगरबत्ती बरे रहय। गुलाल-बंदन बुकाय रहय। नरिहर घला फूटे रहय। जुन्ना बिजली बिल ला धारमिक किताब सही ओरी-पारी राख के लाल कपड़ा में लपेट के माढ़य गे रहय। मेहा कई बेर घुम-घुम के कुरिया ला देखेवं, एखर छोड़ कोन्हो देवी-देवता के फोटो नइ रहय।

मैहा मामी ला पूछेव- " कस मामी! तुमन ये कोन देवी के पूजा-पाठ करथव?"

 मामी बताइस- " येहा बिजली देवी आय भांचा। काय करबे ददा बिजली बिल के डर के मारे जम्मो परिवार बिहिनया, मझंनिया अउ संझा तीन बेर बिजली माता के पूजा करथन। तोर ममा ह ये बिजली बिल मन के पाठ करथे । येला हमन बिजली चालिसा कहिथन। बिजली विभाग के एक झन भगत जी ह बिजली देवी के परकोप ले बांचे बर इही उपाय बताय हे। इहां जतका पइसा चढ़ाथन ओला उही भगत जी महीना में एक दिन आके सकेल के लेगथे। वोहा एक ठिन आरती घला लिख के दे हावे जउन ला पूजा करे के बाद हमन गाथन।"

 मैहा आरती ला पढ़ के देखेंव, ओमें लिखाय रिहिस-

 " श्री बिजली जी की आरती जो नर-नारी गावै।

दिन भर बिजली पावय, बिल कमती आवय।। "


वीरेन्द्र‘सरल‘ 

बोड़रा ,मगरलोड़

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

मो 7828243377

Wednesday, 10 September 2025

बिजली*

 *बिजली*

           बिजली के नाम सुनके दिल अऊ दिमाग हाल जथे।वईसे लेड़गा बतात रिहीस वोकर लेड़गा होय के पाछू बिजली के हांथ हे। बिजली आनी -बानी के सपना देखाइस संगे जीबो संगे मरबो कहिके किरिया खवाइस। ओकर रंग रूप म अइसे मोहागेंव के चारों मुड़ा बिजली आंखी म झूले लगिस।जईसे सावन म कोनो जोड़ा मन झुलना म झुलथे। सबके अपन -अपन दिन बादर होथे।जइसे कोनो ल भूत परेत धरेके बाद ओकर आंखी म उहीच -उहीच मन झुलथे।हम सबके आदत घलो पड़ जाय रहिथे नवा नवा कोनो जिनिस आय रहिथे त पुचपुचाय के।नवा नवा दमाद मन ल घलो बड़ पुचपुचाय के सऊंक रहिथे।हाय मोर सारा,हाय मोर सारी,हाय मोर ससुर।फेर जादा मया करबे त अइसने घलो हो जथे जइसे एक ठन गाना म कहिथे नीला दुपट्टा कुरती के रंग लाल जादा मया झन करबे हो जही जी के काल होईरे होईरे।

                   लेड़गा हम तोर दुख पीरा ल समझ सकथन।जस तोर हाल तस हमर हाल।लेड़गा पूछिस कईसे भईया? पहिली हमन चिमनी,कंडील,गोरी दिया ल जला के रही जात रेहेन।फेर जब ले बिजली ह आइस हमर दिमाग के बत्ती गोल होगे ।हमन एकर रंग रुप म मोहागेन। पहिली चालिस,साठ,सौ,वाट ल घलो झेलत रेहेन।कहिथे नवा बईला के नवा सिंग चल रे बईला टिंगे टिंग।सऊंके सऊंक म मीटर बर पईसा घलो देन अउ आज ले घलो देवत हावन। ये हर सरकार बर दान के दान अउ ईनाम के ईनाम वाला किस्सा आय।सबले पहिली हमन ल समझना चाहि बिजली करेंट ले चलथे अउ झटका घलो देथे। सरकार ह बिल म बिजली दिल म।थोकिन गरेरा चलिस बिजली बंद, पानी गिरिस बिजली बंद, गंदी बात।अतिक झटका दे बाद घलो मनखे मन नई सुधरे।जईसे कोनो सुवारी मन मनखे के कोनो नस ल टमड़के गुदेलथे,तईसे सरकार ह हमर नस ल टमड़के गुदेलथे। पहली चकरी वाले मीटर चलत रिहीस, फेर इलेक्ट्रॉनिक मीटर आईस, अब रिचार्ज के नंबर आगे। रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम,जतका(जितना) पईसा ओतका(उतना) काम।

                 बिजली बचाओ के नारा ननपन ले सुनत आवत हन जईसे गरिबी भगाओ के नारा। पहिली के झोलझोलह चड्डी के नारा नंदागे फेर------।मे हर एक झन गुरुजी ल पुछेंव पहिली के चालिस ,साठ ले अबके पांच सात वाट के बिल आधा छुट के बाद घलो काबर जादा आथे जी,त गुरुजी बताईस इही विकसित,नवा भारत आय जी जे हर घर मे घुंस के मारथे।


        *फकीर प्रसाद साहू*

               *फक्कड़*

           *सुरगी राजनांदगांव*