Monday, 5 January 2026

नवा साल मा का नवा........

 नवा साल मा का नवा........


                   मनखे मन कस समय के उमर एक साल अउ बाढ़गे, अब 2025 ले 2026 होगे। बीते समय सिरिफ सुरता बनगे ता नवा समय आस। सुरुज, चन्दा, धरती, आगास, पानी, पवन सब उही हे, नवा हे ता घर के खूंटी मा टँगाय कलेंडर, जेमा नवा बछर भर के दिन तिथि बार लिखाय हे। डिजिटल डिस्प्ले के जमाना मा कतको महल अटारी मा कलेंडर घलो नइ दिखे, ता कतको गरीब ठिहा जमाना ले अलेण्डर कलेण्डर नइ जाने। आजकल जुन्ना बछर ला बिदा देय के अउ नवा बछर के परघवनी करे के चलन हे, फेर उहू सही रद्दा मा कम दिखथे। आधा ले जादा तो मौज मस्ती के बहाना कस लगथे। दारू कुकरी मुर्गी खा पी के, डीजे मा नाचत गावत कतको मनखे मन घुमत फिरत होटल, ढाबा, नही ते घर-छत मा माते रहिथे। अब गांव लगत हे ना शहर सबे कोती अइसनेच कहर सुनाथे, भकर भिकिर डीजे के शोर अउ हाथ गोड़ कनिहा कूबड़ ला झटकारत नवा जमाना के अजीब डांस संगे संग केक के कटई, छितई अउ एक दूसर ऊपर चुपरई, जइसन अउ कतकोन चोचला हे, जेला बरने मा घलो लाज आथे। 

              भजन पूजन तो अन्ग्रेजी नवा साल संग मेल घलो नइ खाय, ना कोनो कोती देखे बर मिले। लइका सियान सब अंग्रेजी नवा साल के चोचला मा मगन अधरतिहा झूमरत रहिथे, अउ पहात बिहनिया खटिया मा अचेत, वाह रे नवा साल। फेर आसाढ़, सावन, भादो ल कोनो जादा जाने घलो तो नही, जनवरी फरवरी के ही बोलबाला हे। ता भले चैत मा नवा साल मनाय के कतको उदिम करन, नवा महीना के रूप मा जनवरी ही जीतथे, ओखरे संग ही आज के दिन तिथि चलथे। खैर समय चाहे उर्दू मा चले, हिंदी मा चले या फेर अंग्रेजी मा, समय तो समय ये, जे गतिमान हे। सूरुज, चन्दा, पानी पवन सब अपन विधान मा चलत हे, मनखे मन कतका समय मा चलथे, ते उंखरें मन ऊपर हें। समय मा सुते उठे के समय घलो अब सही नइ होवत हे। लाइट, लट्टू,लाइटर रात ल आँखी देखावत हे, ता बड़े बड़े बंगला सुरुज नारायण के घलो नइ सुनत हे। मनखे अपन सोहलियत बर हाना घलो गढ़ डरे हे, जब जागे तब सबेरा---- अउ जब सोय तब रात। ता ओखर बर का बाइस अउ का तेइस, हाँ फेर नाचे गाये खाय पीये के बहाना, नवा बछर जरूर बन जथे।आज मनखे ना समय मा हे, ना विधान मा, ना कोनो दायरा मा। मनखे बलवान हे , फेर समय ले जादा नही।

           वइसे तो नवा बछर मा कुछु नवा होना चाही, फेर कतका होथे, सबे देखत हन। जब मनुष नवा उमर के पड़ाव मा जाथे ता का करथे? ता नवा साल मा का करही? केक काटना, नाचना गाना, पार्टी सार्टी तो करते हे, बपुरा मन। वइसे तो कोनो नवा चीज घर आथे ता वो नवा कहलाथे, फेर कोनो जुन्ना चीज ला धो माँज के घलो नवा करे जा सकथे। कपड़ा,ओन्हा, घर, द्वार, चीज बस सब नवा बिसाय जा सकथे, फेर तन, ये तो उहीच रहिथे, अउ तन हे तभे तो चीज बस धन रतन। ता तन मन ला नवा रखे के उदिम मनखे ला सब दिन करना चाही। फेर नवा साल हे ता कुछ नवा, अपन जिनगी मा घलो करना चाही। जुन्ना लत, बैर, बुराई ला धो माँज के, सत, ज्ञान, गुण, नव आस विश्वास ला अपनाना चाही। तन अउ मन ला नवा करे के कसम नवा साल मा खाना चाही, तभे तो कुछु नवा होही।  जुन्ना समय के कोर कसर ला नवा बेरा के उगत सुरुज संग खाप खवात नवा करे के किरिया खाना चाही। जुन्ना समय अवइया समय ला कइसे जीना हे, तेखर बारे मा बताथे। माने जुन्ना समय सीख देथे अउ नवा समय नव आस। इही आशा अउ नव विश्वास के नाम आय नवा बछर। हम नवा जमाना के नवा चकाचौंध  तो अपनाथन, फेर जिनगी जीये के नेव ला भुला जाथन। हँसी खुसी, बोल बचन, आदत व्यवहार, दया मया, चैन सुकून, सेवा सत्कार आदि मा का नवा करथन। देश, राज, घर बार बर का नवा सोचथन, स्वार्थ ले इतर समाज बर, गिरे थके, हपटे मन बर का नवा करथन। नवा नवा जिनिस खाय पीये,नवा नवा जघा घूमे फिरे  अउ नाचे गाये भर ले नवा बछर नवा नइ होय।

               नवा बछर ला नवा करे बर नव निर्माण, नव संकल्प, नव आस जरूरी हे। खुद संग पार परिवार,साज- समाज अउ देश राज के संसो करना हमरे मनके ही जिम्मेदारी हे। जइसे  कोनो हार जीते बर सिखाथे वइसने जुन्ना साल के भूल चूक ला जाँचत परखत नवा साल मा वो उदिम ला पूरा करना चाही। कोन आफत हमला कतका तंग करिस, कोन चूक ले कइसे निपटना रिहिस ये सब जुन्ना बेरा बताथे, उही जुन्ना बेरा ला जीये जे बाद ही आथे नव आस के नवा बछर। ता आवन ये नवा बछर ला नवा बनावन अउ दया मया घोर के नवा आसा डोर बाँधके, भेदभाव, तोर मोर, इरखा, द्वेष ला जला, सबके हित मा काम करन, पेड़,प्रकृति, पवन,पानी, छीटे बड़े जीव जन्तु सब के भला सोचन, काबर कि ये दुनिया सब के आय, पोगरी हमरे मनके नही, बिन पेड़,पवन, पानी अउ जीव जंतु बिना अकेल्ला हमरो जिनगी नइहे। बहर हाल सरी दुनिया मा जनम मरण, दिन तिथि इही अनुसार चलत हे ता, नवा बछर के बधाई बनबेच करथे, सादर सादर बधाई -----जोहार


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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गीत-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


नवा बछर मा नवा आस धर,नवा करे बर पड़ही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


साधे खातिर अटके बूता,डॅटके महिनत चाही।

भूलचूक ला ध्यान देय मा,डहर सुगम हो जाही।

चलना पड़ही नवा पाथ मा,सबके अँगरी धरके।

उजियारा फैलाना पड़ही, अँधियारी मा बरके।

गाँजेल पड़ही सबला मिलके,दया मया के खरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


जुन्ना पाना डारा झर्रा, पेड़ नवा हो जाथे।

सुरुज नरायण घलो रोज के,नवा किरण बगराथे।

रतिहा चाँद सितारा मिलजुल,रिगबिग रिगबिग बरथे।

पुरवा पानी अपन काम ला,सुतत उठत नित करथे।

मानुष मन सब अपन मुठा मा,सत सुम्मत ला धरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


गुरतुर बोली जियरा जोड़े,काँटे चाकू छूरी।

घर बन सँग मा देश राज के,संसो हवै जरूरी।

जीव जानवर पेड़ पकृति सँग,बँचही पुरवा पानी।

पर्यावरण ह बढ़िया रइही, तभे रही जिनगानी।

दया मया मा काया रचही,गुण अउ ज्ञान बगरही।

द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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नवा बछर के बहुत बहुत बधाई


घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


             1

बिदा कर गाके गीत,बारा मास गये बीत।

का खोयेस का पायेस,तेखर बिचार कर।।

गाँठ बाँध बने बात,गिनहा ला मार लात।

पच्चीस के अटके ला,छब्बीस मा पार कर।।

बैरी झन होय कोई,दुख मा न रोय कोई।

तोर मोर छोड़ संगी,सबला जी प्यार कर।।

जग म जी नाम कमा,सबके मुहुँ म समा।

बढ़ा मीत मितानी ग,दू ल अब चार कर।।


              2

गुजर गे बारा मास,बँचे जतके हे आस।

पूरा कर ये बछर,हटा जमे रोक टोंक।।

मुचमुच हाँस रोज,पथ धर चल सोज।

बुता काम बने कर,खुशी खुशी ताल ठोंक।

दिन मजा मा गुजार,बांटत मया दुलार।

खाले तीन परोसा जी,लसून पियाज छोंक।।

नवा नवा आस लेके,दिन तिथि खास लेके।

हबरे बछर नवा,हमरो बधाई झोंक।।


              3

होय झन कभू हानि,चले बने जिनगानी।

बने रहे छत छानी,बने मुड़की मिंयार।।

फूल के बिछौना रहै, महकत दौना रहे।

जीव शिव प्रकृति के,सदा मिले जी पिंयार।।

आदर सम्मान बढ़े,भाग नित खुशी गढ़े।

सपना के नौका चढ़े,होके घूम हुसियार।।

होवै दिन रात बने,मनके के जी बात बने।

नवा साल खास बने,भागे दूर अँधियार।।


               4

सबे चीज के गियान,पा के बनो गा सियान।

गाँव घर देश राज,छाये चारो कोती नाम।।

मीठ करू खारो लेके,सबके जी आरो लेके।

सेवा सतकार करौ,धरम करम थाम।।

खुशी खुशी बेरा कटे,दुख के बादर छँटे।

जिनगानी मा समाये,सुख शांति सुबे शाम।।

हमरो झोंको बधाई,संगी संगवारी भाई।

नवा बछर मा बने,अटके जी बुता काम।।


                5

अँकड़ गुमान फेक,ईमान के आघू टेक।

तोर मोर म जी मन, काबर सनाय हे।।।

दुखिया के दुख हर,अँधियारी म जी बर।

कतको लाँघन परे, कतको अघाय हे।।।

उही घाट उही बाट,उही खाट उही हाट।

उसनेच घर बन,तब नवा काय हे।। ।।।।

नवा नवा आस धर,काम बुता खास कर।

नवा बना तन मन,नवा साल आय हे।।।।


जीतेंद्र वर्मा""खैरझिटिया

बाल्को,कोरबा

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गजल- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया


बिछे जाल देख के मोर उदास हावे मन हा।

बुरा हाल देख के मोर उदास हावे मन हा।।1


बढ़े हे गजब बदी हा, बहे खून के नदी हा।

छिले खाल देख के मोर उदास हावे मन हा।2


अभी आस अउ बचे हे, बुता खास अउ बचे हे।

खड़े काल देख के मोर उदास हावे मन हा।।3


गला आन मन धरत हे, सगा तक दगा करत हे।

चले चाल देख के मोर उदास हावे मन हा।।4


कती खोंधरा बनावँव, कते मेर जी जुड़ावँव।

कटे डाल देख के मोर उदास हावे मन हा।5


धरे हाथ मा जे पइसा, उही लेगे ढील भँइसा।

गले दाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।।6


कई खात हे मरत ले, ता कहूँ धरे धरत ले।

उना थाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।7


जे कहाय अन्न दाता, सबे मारे वोला चाँटा।

झुके भाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।8


नशा मा बुड़े जमाना, करे नाँचना नँचाना।

नवा साल देख के मोर उदास हावे मन हा।9


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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बधाई नवा बछर के(सार छंद)


हवे  बधाई   नवा   बछर   के,गाड़ा  गाड़ा  तोला।

सुख पा राज करे जिनगी भर,गदगद होके चोला।


सबे  खूँट  मा  रहे  अँजोरी,अँधियारी  झन  छाये।

नवा बछर हर अपन संग मा,नवा खुसी धर आये।

बने चीज  नित नयन निहारे,कान सुने सत बानी।

झरे फूल कस हाँसी मुख ले,जुगजुग रहे जवानी।

जल थल का आगास नाप ले,चढ़के उड़न खटोला।

हवे  बधाई  नवा  बछर  के,गाड़ा  गाड़ा  तोला----।


धन बल बाढ़े दिन दिन भारी,घर लागे फुलवारी।

खेत  खार  मा  सोना  उपजे,सेमी  गोभी  बारी।

बढ़े बाँस कस बिता बिता बड़,यश जश मान पुछारी।

का  मनखे  का  जीव जिनावर, पटे  सबो सँग तारी।

राम रमैया कृष्ण कन्हैया,करे कृपा शिव भोला-----।

हवे  बधाई  नवा  बछर के,गाड़ा  गाड़ा  तोला------।


बरे बैर नव जुग मा बम्बर,बाढ़े भाई चारा।

ऊँच नीच के भेद सिराये,खाये झारा झारा।

दया मया के होय बसेरा,बोहय गंगा धारा।

पुरवा गीत सुनावै सबला,नाचे डारा पारा।

भाग बरे पुन्नी कस चंदा,धरे कला गुण सोला।

हवे बधाई नवा बछर के,गाड़ा गाड़ा तोला---।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


नव वर्ष उछाह मंगल धरके आये...सपरिवार सादर बधाई

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छत्तीसगढ़ के दलहन-तिलहन फसल- खैरझिटिया

 छत्तीसगढ़ के दलहन-तिलहन फसल- खैरझिटिया


                 चिप्स चाकलेट बिस्कुट मा कइसे देह आही, बड़ मरना हे, बिगन दार के लइका भातेच नइ खाय। रोज रोज दार घर मा चुरे घलो कइसे? सैकड़ा ले आगर पइसा खरचबे तब जाके एक किलो राहेर दार आथे। अइसनेच कहानी तेल के तको हे। ले ले के खवई मा बड़े छोटे सबे हख खागे हे। सुरसा कस मुँह उलाय महँगाई मा, हड़िया पउला भरबे नइ करे अउ इती खीसा उन्ना ऊपर उन्ना होवत जाथे। आजकल खवइया जादा हे, उपजइया कम,  ता खांव खांव तो होबे करही, चाहे चांउर, दार होय या तेल। जिहाँ पहली मनमाड़े उन्हारी घटकत रिहिस, तिहाँ आज सोवा परगे हे, भर्री भांठा तो दिखबे नइ करे। रीता भांठा भर्री मा  महल अटारी अउ अंधाधुन बनत कालोनी तिलहन दलहन फसल के घेच ल धर लेहे। कतको फसल तो चुक्ता सिराय के कगार मा तको आगे हे। हमर छत्तीसगढ़ धान के कटोरा कहिलाथे, फेर तिलहन दलहन फसल मा तको पहली बड़ सजोर रिहिस, आज किसनन्हा मन  पइसा के लालच मा भर्री भाँठा ला व्यपारी मन तीर बेच देवत हे, बचे खोचे भुइयाँ कल कारखाना के भेंट चढ़ जावत हे। सड़क तीर के खेत खार मा बड़े बड़े उद्यमी मनके कब्जा होगे हे, जेमन  सिरिफ समय के फसल बोय हे, जे दिन ब दिन बढ़त(दाम) जावत हे। उनला का चिंता? चिंता तो किसान ल हे। चारो कोती चमचम ले तार रुँधा गेहे। ओनहा कोनहा के किसान बपुरा मन के मरना होगे हे। गाय गरुवा तको छेल्ला होंगे हे। किसनहा मन करे ता का करे? गाय गरुवा कोनो पालना नइ चाहत हे, काबर कि न तो चरावन हे अउ न परिया। पैकेट के दूध दही अउ ट्रेक्टर हार्वेस्टर उंखर महत्ता ल खागे। गोबर छेना तो नवा जमाना के चीजे नइ रहिगे। खैर छोड़ ये सब बात ल, आज छत्तीसगढ़ मा होवइहा दलहन अउ तिलहन सफल के बारे मा विचार करबों। छत्तीसगढ़ मा फसल जादा मात्रा मा छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाका मा होथे। पठारी पहाड़ी कोती तको होथे फेर कमती। अउ व्व कोती मोटा अनाज कोदो, कुटकी, जव,जई,राई होथे, दलहन तिलहन, चाऊंर, गहूँ मैदानी छत्तीसगढ़ मा उपजथे। आवन छत्तीसगढ़ के मैदान मा दलहन तिलहन फसल के बारे मा जानन।

                   आजकल वइसे डोली खेत दिखे बर मिल जथे, फेर भर्री कमसल होवत जावत हे। दलहन तिलहन फसल ज्यातर भर्री मा घटकथे। पहली समय  के सुरता करबे ता चक के चक राहेर, तिली,चना,तिवरा, अरसी, सोयाबीन, मसूर,  सरसो देखत मन गदगद हो जावत रिहिस। फेर आज एकात ठन भर्री या डोली मा दिख गे ता खुद ला भागमानी जान। धान के फसल मा जतेक महिनत लगथे ,ओखर ले बड़ कमती महिनत उतेरा उन्हारी बर लगथे, तभे तो हाना रहय "बो दे गहूँ अउ निकल जा कहूँ"। फेर आज ये हाना लागू नइ हो सके, कीरा कांटा, गाय गरुवा, बन बेंदरा के मारे कहूँ नइ धियान देबे ता एको बीजा घलो देखना नोहर हो जही। पहली जिहाँ तक नजर जाय उतेरा उन्हारी घटके रहय, जादा रखवारी लगे न कीरा कांटा। फेर आज जे किसान कुछु बोवत हे ओखर मरना हे।

                हमर छत्तीसगढ़ मा तिलहन फसल के रूप मा मुख्य रूप ले सोयाबीन, सरसो, तिली, अरसी, मूंगफली अउ सूरजमुखी बोय जाथे। सोयाबीन एक समय सबे कोती कन्हार भुइयाँ मा उपजे ,फेर एक बेर  उड़ के चाबे वाले सांप के अफवाह के कारण कतको जघा बंद होगे। ता कतको जघा लुवे टोरे के बेरा पानी बादर के कारण।  सोयाबीन भर्री मा उपजथे, फेर धीरे धीरे भर्री डोली बनगे या उधोगी मनके नियत डोलगे। सोयाबीन खरीफ के फसल आय, इही मौसम मा उरीद, मूंग,राहेर जइसे दलहन फसल के खेती तको होथे। एक समय घरों घर अरसी के तेल बउरे जावत रिहिस, फेर आज के लइका मन का अरसी जाने अउ का ओखर तेल। अरसी बोवइया किसान बिरले दिखथे। अरसी के तेल बड़ गुणकारी होवय, रांधे खाय, चुपरे बर पहली खूब चलत रिहिस, एखर खरी घलो लाभकारी रहय। तिली के बोवइया तको जादा नइ दिखे। सरसो कहूँ न कहूँ कोती माँघ फागुन मा मन मोहत दिखी जथे। तिलहन मा सोयाबीन, मूंगफली,तिली खरीफ़ के ता सरसो अरसी रबी फसल के रूप मा बोय जाथे। कहूँ कहूँ कोती मूंगफली अउ सूरजमुखी खरीफ रबी दोनो मौसम मा बोवत दिखथे। धान बोय के बाद भर्री भांठा मा किसान मन सोयाबीन, राहेर, मूंग, उड़द, मुंगफली बोथे। ये फसल मन बर धान ले कम महिनत अउ कम उपजाऊ भुइयाँ घलो चलथे। तिलहन फसल के कम पैदावार, आज के लागत के हिसाब ले दाम नइ मिले के कारण अउ बिचौलिया मन के कारण, तेल के दाम आसमान छूवत हे।

                किसान मन धान लुवाय के बाद नमीयुक्त धनहा डोली मा लाख, लाखड़ी, मसूर उतेरथे ता भर्री मा चना, गहूँ ,सरसो, मसूर,अरसी ओनारथे। चना, तिवरा, मसूर, मूंग, उड़द,राहेर, मटर, मोठबीन, जिल्लो, ग्वार, खेसारी ये सब दलहन फसल आय। जेमा कुछ ला खरीफ फसल अउ कुछ ला रबी फसल के रूप मा बोय जाथे। तिवरा के खेत मा जिल्लो अपने आप खरपतवार के रूप मा उगे। पहली के किसान मन एखरो दार खायँ, अब तो काये तेला बनेच मन जाने घलो नही। चना, मसूर, अरसी,मटर,  सरसो,तिवरा रबी फसल के शान रहय। चना के खेत मा  छीताय बीच बीच मा सरसो के पिंवरा फूल अउ धनिया के सफेद फूल देखत जउन आत्मीय आनन्द मिलथे, वोला लिख के बयां नइ करे जा सके। अरसी के  घमाघम माते मसरंगी फूल जन्नत के सैर कराथे। ये सबके रखवारी करे बर जेखर बूता लगे, उंखर दिनचर्या सरग बरोबर लगे। रंग रंग के फूल,फर, गावत भौरा, नाचत तितली, चहकत तीतुर,मैना अउ बहकत पुरवइया, आ हाहाहा का कहना। खेत के मेड मा बने कुंदरा मा बइठे बइठे चिरई चिरगुन के गीत सुनत, कागभगोड़ा अउ खेत खार ला निहारत, बोइर अमली झडक़त कब चना,गहूँ, सरसो, मसूर, अरसी पक जथे पता नइ चले। फेर आज रखवार बन बेंदरा के मारे मर जावत हे, अउ बाँचे खोचे आस, चोरहा मनखे मन के मारे नास हो जाथे। एक अनार सौ बीमार के स्थिति कई गांव मा देखे बर मिलथे। आजो कई डहर चक के चक चना गहूँ माते दिखथे, फेर अब धीरे धीरे कमती होवत जावत हे। 

                 अरसी, जिल्लो,उरदानी,सोयाबीन के बोवइया कमतिच बचे हे। अइसन कुछ फसल मा नँदाय के कगार मा हें।  दलहन तिलहन फसल घर मा खाय,बउरे के साथ बाजार मा अच्छा दाम तको देथे। आज दलहन अउ तिलहन फसल के प्रति किसान मन के  कम रुझान चिंतनीय हे, अइसने रही ता आघू अउ सबे चीज महँगाही। शहर लहुटत गांव टेस टेस मा अपन असली धन दौलत (खेत किसानी) ला बरोवत जावत हे, अउ आधुनिकता के चंगुल मा फँसके, चार  पइसा नकदी कमाके, अभी हाँसत हे, फेर काली का होही तेखर चिटको संसो नइ करत हे। सरकार एक समय दलहनी फसल ल बढ़ाये बर पीली क्रांति लाय रिहिस आजो वइसने कुछु उपाय के जरूरत हे, ताकि धान के कटोरा कहिलइया हमर छत्तीसगढ़ दलहन तिलहन के डलिया तको कहाय।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

नवा साल ---------

 (लघुकथा )


नवा साल

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सीमा--सीमा --बिट्टू --दरवाजा खोलव ना-- राकेश ह आवाज देइस।

अरे कोन अच बाबू अतेक रात के आवाज देवत हस। 11बजगे हे तइसे लागत हे। अगोर खोलत हँव काहत सियनहा रामसुख हा आके दरवाज खोल देइस त सामने म वोकर दमाँद ह खड़े राहय।

राकेश हा पाँव परिस, तहाँ ले दूनों झन आके परछी म बइठगें। अतका बेर म वोकर पत्नी सीमा जेन साल भर होगे मइके म बइठे हे,सास रामप्यारी अउ तीन साल के बेटा बिट्टू ह तको जाग के आगें।

रामसुख हा पूछिस--कइसे आये हच बाबू?

काली नवा साल ये बाबू जी। बिट्टू, सीमा अउ आप मन से मिले बर आये हँव--राकेश कहिच।

"का नवा साल --पाछू बछर इही दिन आय न जब पी खाके सीमा संग मारपीट करे रहे।"

"वोकर मोला बहुत पछतावा हे बाबू जी। वो दिन के बाद दारू ल छुये तक नइ अँव।मोला क्षमा कर देवव।"

"हम कोन होथन क्षमा करइया। क्षमा माँगना हे त सीमा सो क्षमा माँग"--रामसुख हा आँसू ढारत खड़े बेटी सीमा ल देखत कहिस।

अचानक राकेश ह उठिस अउ सीमा के पाँव ल धरके मोला क्षमा करदे-- अइसन गलती अब कभू नइ करौं काहत आँसू ढारे ल धरलिस।

मोर गोड़ ल छोड़व अइसन काबर करत हव।मोला पाप झन लगावव।

तुहीं मन तो लेगे बर एको पइत नइ आयेव। मैं तो चल दे रहितेंव।

घडी ह रात के 12बजे बताये ल धरलिच।बस्ती कोती नवा साल के स्वागत म फटाका फूटे ल धरलिच। खुशी धरे नवा साल आगे।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र

 छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र


                          कृषि हमर राज के जीविका के साधन मात्र नोहे, बल्कि संस्कृति आय, काबर कि खेती किसानी के हिसाब ले हमर परब संस्कृति अउ जिनगी दूनो चलथे। उही कड़ी के एक परब आय, छेराछेरा। जे पूस पुन्नी के दिन मनाय जाथे। ये तिहार ला दान धरम के तिहार केहे जाथे। वइसे तो ये तिहार मानये के पाछू कतको अकन किवदंती जुड़े हे, फेर ठोसहा बात तो इही आय कि, ये बेरा मा खेत के धान(खरीफ फसल) लुवा मिंजा के किसान के कोठी मा धरा जावत रिहिस, उही खुशी मा एक दिन अन्न दान होय लगिस, जेला छेरछेरा के रूप मा पूरा छत्तीसगढ़ मनाथें। हमर छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज हरे, येती छेराछेरा परब ला, घोटुल मा रहिके सबे विधा मा पारंगत होय, युवक युवती मनके स्वागत सत्कार के रूप मा मनाये जाथें, अउ दान धरम करे जाथें। पौराणिक काल मा इही दिन,भगवान शिव के पार्वती के अँगना मा भिक्षा माँगे के वर्णन मिलथे। सुनब मा आथे कि भगवान शिव अपन विवाह के पहली माता पार्वती तिर नट के रूप धरके उंखर परीक्षा लेय बर गे रिहिस, अउ तब ले लोगन मा उही तिथि विशेष मा दान धरम करत आवँत हें। 

                     ये दिन ले जुड़े एक पौराणिक कथा अउ सुनब मा मिलथे, कथे कि एक समय धरती लोक मा भयंकर अंकाल ले मनखे मन दाना दाना बर तरसत रिहिन, तब आदि भवानी माँ, शाकाम्भरी देवी के रूप मा अन्न धन के बरसा करिन। वो तिथि पूस पुन्नी के पबरित बेरा पड़े रिहिस। उही पावन सुरता मा, माता शाकाम्भरी देवी ला माथ नवावत, आज तक ये दिन दान देय के पुण्य कारज चलत हे। भगवान वामन अउ राजा बली के प्रसंग घलो कहूँ मेर सुनब मा आथे।

                रतनपुर राज के कवि बाबूरेवाराम के पांडुलिपि मा घलो ये दिन के एक कथा मिलथे, जेखर अनुसार राजा कल्याणसाय हा, युद्धनीति अउ राजनीति मा पारंगत होय खातिर मुगल सम्राट जहाँगीर के राज दरबार मा आठ साल रेहे रिहिस, अउ इती ओखर रानी फुलकैना हा अकेल्ला रद्दा जोहत रिहिस। अउ जब राजा लहुट के आइस ता ओखर खुशी के ठिकाना नइ रिहिस, रानी फुलकैना मारे खुशी मा अपन राज भंडार ला सब बर खोल दिस, अउ अन्न धन के खूब दान करें लगिस, अउ सौभाग्य ले वो तिथि रिहिस, पूस पुन्नी के। कथे तब ले ये दिन दान धरम के  परम्परा चलत हे।

                  कोनो भी तिथि विशेष मा कइयों ठन घटना सँघरा जुड़ सकथे, जइसे दू अक्टूबर गाँधी जी के जनम दिन आय ता शास्त्री जी घलो इही दिन अवतरे रिहिन, दूनो के आलावा अउ कतको झन के जनम दिन घलो होही। वइसने पूस पुन्नी के अलग अलग कथा, किस्सा, घटना ला खन्डित नइ करे जा सके। फेर सबले बड़का बात ये तिथि ला, दान पूण्य के दिन के रूप मा स्वीकारे गेहे। अउ दान धरम कोनो भी माध्यम ले होय, वन्दनीय हे। छेराछेरा तिहार मा घलो वइसने दान धरम करत,अपन अँगना मा आय कोनो भी मनखे ला खाली हाथ नइ लहुटाय जाय, जउन भी बन जाये देय के पावन रिवाज चलत हे, अउ आघु चलते रहय। ये परब मा देय लेय के सुघ्घर परम्परा हे, छोटे बड़े सबे चाहे धन मा होय चाहे उम्मर मा आपस मा एक होके ये परब मा सरीख दिखथें। लइका सियान के टोली गाजा बाजा के संग सज सँवर के हाँसत गावत पूरा गांव मा घूम घूम अन्न धन माँगथे, अउ सब ओतके विनम्र भाव ले देथें घलो। छेरछेरा तिहार के मूल मा उँच नीच, जाति धरम, रंग रूप, छोटे बड़े, छुवा छूत,अपन पराया अउ अहम वहम जइसे घातक बीमारी ला दुरिहाके दया मया अउ सत सुम्मत बगराना हे। फेर आज आधुनिकता के दौर मा अइसन पबरित परब के दायरा सिमित होवत जावत हे। बड़का मन कोनो अपन दम्भ ला नइ छोड़ पावत हे, मंगइया या फेर गरीब तपका ही माँगत हे, अउ देवइया मा घलो रंगा ढंगा नइहे। *एक मुठा धान चाँउर या फेर रुपिया दू रुपिया कोनो के पेट ला नइ भर सके, फेर देवई लेवई के बीच जेन मया पनपथे, वो अन्तस् ला खुशी मा सराबोर कर देथे। एक दूसर के डेरउठी मा जाना, मिलना मिलाना अउ मया दया पाना इही तो बड़का धन आय। छेरछेरा मा मिले एक मुठा चाँउर दार के दिन पुरही, फेर मिले दया मया, मान गउन सदा पुरते रइथे।* इही सब तो आय छरछेरा के मूलमंत्र। कखरो भी अँगना मा कोनो भी जा सकथे, कोनो दुवा भेद नइ होय। फेर आज अइसन पावन परम्परा देखावा अउ स्वार्थ के भेंट चढ़त दिखत हे, शहर ते शहर गांव मा घलो अइसन हाल दिखत हे। ये तिहार मा ज्यादातर लइका मन झोरा बोरा धरे, गाँव भर घूम अन्न धन माँगथे, सबे घर के एक मुठा अन्न धन अउ मया पाके, उंखर अन्तस् मा मानवता के भाव उपजथे, उन ला लगथे, कि सब हम ला मान गउन देथे, छोटे बड़े,धरम जाति, ऊँच नीच, गरीब रईस सब कस कुछु नइ होय, अइसनो सन्देशा घलो तो हे, ये परब मा। छोट लइका मनके मन कोमल होथे, दुत्कार अउ भेदभाव देखही सुनही ता निराश हताश तो होबे करही।

                 छेरछेरा अइसन पबरित परब आय जे गांव के गांव ला जोड़थे, वो भी सब ला अपन अपन अँगना दुवार ले, दया मया देवत लेवत अन्तस् ले, दान धरम ले या एक शब्द मा कहन ता मनखे मनखे ले। ये खास दिन मा जइसे माता पार्वती अँगना मा नट बन आये शिव जी ला सर्वस्व न्योछावर कर दिन, राजा बली भगवान वामन ला सब कुछ दे दिस,माँ शाकाम्भरी भूख प्यास मा तड़पत धरतीवासी ला अन्न धन ले परिपूर्ण कर दिस, रानी फुलकैना अपन परजा मन ला अन्न धन दिस, अउ किसान मन अपन उपज के खुशी ला  थोर थोर सब ला बाँटथे, वइसने सबे ला विनयी भाव ले अपन शक्तिनुसार दान धरम करना चाही। लाँघन, दीन हीन के पीरा हरना चाही, अहंकार दम्भ द्वेष, ऊँच नीच ला दुरिहागे सबे ला अपने कस मानत मान देना चाही, मया देना चाही।

*दान धरम अउ मया पिरीत के तिहार ए छेरछेरा।*

*मनखे के मानवता देखाय के आधार ए छेरछेरा।*


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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छेरछेरा(सार छंद)


कूद  कूद के कुहकी पारे,नाचे   झूमे  गाये।

चारो कोती छेरिक छेरा,सुघ्घर गीत सुनाये।


पाख अँजोरी  पूस महीना,आवय छेरिक छेरा।

दान पुन्न के खातिर अड़बड़,पबरित हे ये बेरा।


कइसे  चालू  होइस तेखर,किस्सा  एक  सुनावौं।

हमर राज के ये तिहार के,रहि रहि गुण ला गावौं।


युद्धनीति अउ राजनीति बर, जहाँगीर  के  द्वारे।

राजा जी कल्याण साय हा, कोशल छोड़ पधारे।


आठ साल बिन राजा के जी,काटे दिन फुलकैना।

हैहय    वंशी    शूर  वीर   के ,रद्दा  जोहय   नैना।


सबो  चीज  मा हो पारंगत,लहुटे  जब  राजा हा।

कोसल पुर मा उत्सव होवय,बाजे बड़ बाजा हा।


राजा अउ रानी फुलकैना,अब्बड़ खुशी मनाये।

राज रतनपुर  हा मनखे मा,मेला असन भराये।


सोना चाँदी रुपिया पइसा,बाँटे रानी राजा।

रहे  पूस  पुन्नी  के  बेरा,खुले रहे दरवाजा।


कोनो  पाये रुपिया पइसा,कोनो  सोना  चाँदी।

राजा के घर खावन लागे,सब मनखे मन माँदी।


राजा रानी करिन घोषणा,दान इही दिन करबों।

पूस  महीना  के  ये  बेरा, सबके  झोली भरबों।


ते  दिन  ले ये परब चलत हे, दान दक्षिणा होवै।

ऊँच नीच के भेद भुलाके,मया पिरित सब बोवै।


राज पाठ हा बदलत गिस नित,तभो होय ये जोरा।

कोसलपुर   माटी  कहलाये, दुलरू  धान  कटोरा।


मिँजई कुटई होय धान के,कोठी हर भर जावै।

अन्न  देव के घर आये ले, सबके मन  हरसावै।


अन्न दान तब करे सबोझन,आवय जब ये बेरा।

गूँजे  सब्बे  गली  खोर मा,सुघ्घर  छेरिक छेरा।


वेद पुराण  ह घलो बताथे,इही समय शिव भोला।

पारवती कर भिक्षा माँगिस,अपन बदल के चोला।


ते दिन ले मनखे मन सजधज,नट बन भिक्षा माँगे।

ऊँच  नीच के भेद मिटाके ,मया पिरित  ला  टाँगे।


टुकनी  बोहे  नोनी  घूमय,बाबू मन  धर झोला।

देय लेय मा ये दिन सबके,पबरित होवय चोला।


करे  सुवा  अउ  डंडा  नाचा, घेरा गोल  बनाये।

झाँझ मँजीरा ढोलक बाजे,ठक ठक डंडा भाये।


दान धरम ये दिन मा करलौ,जघा सरग मा पा लौ।

हरे  बछर  भरके  तिहार  ये,छेरिक  छेरा  गा  लौ।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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छेरछेरा

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धान धराये हे,कोठी म।

दान-पून  के,ओखी म।

पूस    पुन्नी    के   बेरा,

हे गाँव-गाँव म,छेरछेरा।


छोट - रोंठ  सब  जुरे  हे।

मया दया गजब घुरे   हे।

सबो के अंगना  - दुवारी।

छेरछेरा मांगे ओरी-पारी।

नोनी   मन   सुवा   नाचे,

बाबू   मन  डंडा    नाचे।

मेटे    ऊँच  -  नीच    ल,

दया  -  मया   ल   बांचे।

नाचत   हे  मगन   होके,

बनाके     गोल     घेरा।

पूस    पुन्नी     के   बेरा,

हे गाँव-गाँव  म,छेरछेरा।


सइमो- सइमो करत  हे,

गाँव   के   गली   खोर।

डंडा- ढोलक-मंजीरा म,

थिरकत    हवे     गोड़।

पारत              कुहकी,

घूमे      गाँव         भर।

छेरछेरा   के   राग    म,

झूमे    गाँव          भर।

कोनो  केहे  मुनगा  टोर,

त   केहे ,  धान  हेरहेरा।

पूस    पुन्नी    के    बेरा,

हे गाँव-गाँव म, छेरछेरा।


भरत   हे    झोरा  - बोरा,

ठोमहा - ठोमहा  धान म।

अड़बड़   पून   भरे   हवे,

छेरछेरा    के    दान   म।

चुक ले अंगना लिपाय हे।

मड़ई  -  मेला   भराय हे।

हूम - धूप - नरियर धरके,

देबी - देवता ल,मनाय हे।

रोटी - पिठा  म  ममहाय,

सबझन      के       डेरा।

पूस    पुन्नी     के    बेरा,

हे  गाँव-गाँव  म,छेरछेरा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


छेरछेरा परब की आप सबला बहुत बहुत बधाई

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 छेरिकछेरा


दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।

जतके देहू ततके बढ़ही, धन दौलत शुभ बेरा।।


पूस पाख मा पुन्नी के दिन, बगरै नवा अँजोरी।

परब छेरछेरा हा आँटै, मया पिरित के डोरी।।

लइका लोग सियान सबे मिल, नाचै गाना गायें।।

धिनधिन धिनधिन ढोलक बाजे, डंडा ताल सुनायें।

थपड़ी कुहकी झांझ मँजीरा, सुनत टरै दुख घेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।


दया मया के सागर लहरै, नाचै जीवन नैया।

गोंदा गमकै घर अँगना मा, गाय गीत पुर्वैया।।

करे जाड़ जोरा जाये के, मांघ नेवता पाये।

बर पीपर हा पात झराये, आमा हा मउराये।।

सेमी गोभी भाजी निकले, झूलै मुनगा केरा।।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।


मीत मया मन भीतर घोरत, दान देव बन दाता।

भरे अन्न धन मा कोठी ला, सबदिन धरती माता।।

रांध कलेवा खाव बाँट के, रिता रहे झन थारी।

झारव इरसा द्वेष बैर ला, टारव मिल अँधियारी।।

सइमो सइमो करै खोर हा, सइमो सइमो डेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।

खैरझिटिया

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 छेरछेरा अउ डंडा नाच


                     डंडा नाच हमर छत्तीसगढ़ के प्रमुख नाच मा शामिल हे। जेला अधिकतर  पूस पुन्नी याने छेरछेरा के समय मा नाचे जाथे। ये नाच मा मुख्यतः धँवई या तेंदू के छोट छोट डंडा के प्रयोग होथे, काबर कि एखर लकड़ी मजबूत अउ बढ़िया आवाज करथे। डंडा के आवाज के ताल मा ही नचइया मन गोल घेरा मा घूम घूम एक दूसर के डंडा ला एक निश्चित लय ताल मा बजाथें, अउ कमर मुड़ी ला हला हला के झुमथें। कुहकी पारना घलो डण्डा नाच के विशेषता आय। आजकल डंडा के संग ढोलक,झांझ अउ मन्जीरा तको ये नाच मा देखे बर मिलथे। ये नाच के एक विशेष लय ताल युक्त गीत होथे। डंडा नाच ला मुख्य रूप ले लड़का मन द्वारा किये जाथे। ये नाच मा लगातार घूम घूम के नाचे अउ डंडा टकरावत गीत ला दोहराए बर घलो लगथे। जब किसान मन के खेत के धान घर के कोठी मा धरा जथे ता दान पुण्य के ओखी मा मनाए जाथे छेरछेरा के तिहार, अउ इही बेरा घर घर जाके डंडा नाचत लइका सियान मन अन्न के दान पाथें। हमर छत्तीसगढ़ मा होरी के समय घलो डंडा नाचे जाथे, जेला डंडारी नाच कहिथे, फेर दुनो नाच अलग अलग बेरा व अलग अलग हावभाव के नाच आय। डंडारी विशेषकर पहाड़ी क्षेत्र मा होली के बेरा नाचे जाथे। मैदानी भाग मा डंडा नाच अउ पहाड़ी भाग मा इही सैला नृत्य कहे जाथे। जनश्रुति के अनुसार आदिवासी मन आदि देवाधिदेव महादेव ला मनाए बर येला नाचथे ता मैदानी भाग मा भगवान श्रीकृष्ण के रास नृत्य के रूप मा नाचे गाये जाथे। आदिवासी मन येला अपन पारम्परिक नृत्य मानथे। सुनब मा यहु आथे कि एखर शुरूवार राम रावण युद्ध के बाद राम विजय के समय आदिवासी  मन राम जी के स्वागत मा नाचिन, ता कहूँ कहिथे के एखर शुरुवात कृष्ण के रास लीला के समय होइस। ये नाच मा राम कॄष्ण के गीत के संग संग  शुरुवात मा भगवान गणेश, मां सरस्वती अउ गुरु वन्दना करे जाथे। पंडित मुकुटधर पांडेय जी हा ये नृत्य ला छत्तीसगढ़ के "रास नृत्य" घलो कहे हे। कतको झन मन एला छत्तीसगढ़ के डांडिया घलो कहिथे।

                      डंडा नाच मा समयानुसार साज सज्जा मा बदलाव होवत दिखथें। पहली धोती कुर्ता, कलगी, पागा,मोरपंख, कौड़ी, घुंघरू नचइया मनके सँवागा रहय, जे पारम्परिक रूप ले अभो दिखथे, फेर आजकल सुविधानुसार नचइया मन अपन अपन सँवागा के व्यवस्था करथें। ढोलक,झांझ मंजीरा संग मांदर, हारमोनियम,बासुरी  व अन्य कतको वाद्य यंत्र आज डंडा नाच के शोभा बढ़ावत दिखथे। नाचा पार्टी या फेर  हमर संस्कृति संस्कार ला देखाय के बारी आथे ता ये नाच ला कभू भी कलाकार मन मंच के माध्यम ले लोगन बीच परोसथे। नाच के बीच परइया कुहकी ला कइसे लिख के बतावँव? उह उह एक लय मा अउ एक विशेष बेरा मा नचइया मन एक साथ चिल्लाथें। देखत सुनत ये नाच बड़ मनभावन लगथे। आजकल डंडा नाच मा कतको प्रकार के करतब तको कलाकार मन करत दिखथें। आजकल बांस के डंडा घलो चलन मा आगे हे। डंडा नाचे बर सम संख्या मा नर्तक होथे, जिंखर दुनो हाथ मा  एक एक डंडा होथे। गोल घेरा मा डंडा ला दाएं बाए नाचत साथी मनके डंडा ला ठोंकत ये नृत्य ला करे जाथे।

                    वइसे तो डंडा नाच मा बड़ अकन गीत गाये जाथे, सबके वर्णन करना सम्भव नइहे, तभो कुछ पारम्परिक गीत ला लमाये के प्रयास करत हँव। सुमरनी ले ये नृत्य चालू होथे। गणेश वंदना, सरस्वती वंदना, रामकृष्ण अउ माता पिता गुरु के वन्दना घलो ये नृत्य मा सुने बर मिलथे।। सुमरनी गीत के एक बानगी,---

'पहिली डंडा ठोकबो रे भाई, काकर लेबो नाम रे ज़ोर,

गावे गउंटिया ठाकुर देवता, जेकर लेबो नाम रे ज़ोर।

आगे सुमिरो गुरु आपन ला, दूजे सुमिरों राम रे ज़ोर,

माता-पिता अब आपन सुमिरों गुरु के सुमिरों नाम रे ज़ोर।'


कुछ अउ गीत, ज्यादातर गीत के शुरुवात "तरीहरी नाना रे नाना रे भाई" काहत चालू होथे, जेखर बीच मा कहानी, कथा अउ बारी बखरी, खेती-खार संग परब तिहार के वर्णन रहिथे।


1, "एकझन राजा के सौ झन पुत्र,

    उनला मँगाइस हे मुठा मुठा माटी।"


2,  ओरिन ओरिन मुनगा लगाएंव।

     वो मुनगा फरे रहे लोर रे केंवरा, 

      तैं डँगनी मा मुनगा टोर।


3,   मन रंगी सुआ नैना लगाके उड़ भागे।

      उड़ि उड़ि सुवना, घुटवा पे बइठे।

      घुटवा के रस ला ले भागे, मन रंगी


4,  मैं बन जा रे लमडोर,

     नेकी मैं बन जा।


5,   हाय डारा लोर गे हे न।


6, तहूँ जाबे महूँ जाहुँ, राजिम मेला


ये सब पारम्परिक गीत के आलावा आजकल नवा नवा गीत भी देखे सुने बर मिलथे।

                  डंडा नचइया मन दुनो हाथ मा डंडा लेके, गोल किंजरत अलग अलग प्रकार के डंडा नाचथे। डंडा नाच के कतको प्रकार हे, एखर बारे मा हमर पुरखा कवि डॉ प्यारेलाल गुप्त जी मन अपन पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़"मा घलो विस्तार ले लिखें हें। गुप्त जी अनुसार दुधइया नृत्य, तीन डंडिया, पनिहारिन सेर, कोटरी झलक, भाग दौड़, चरखा भांज आदि कतको रूप प्रचलित हे। एखर आलावा सियान मन आधा झूल, टेटका झूल,पीठ जुड़ी, समधी भेंट, घुचरेखी आदि प्रकार के डंडा नाच के बारे मा घलो बताथे। ये सब नाच ल नाचे के अलग अलग तरीका हे, कहे के मतलब सबके अलग अलग परिभाषा हे,नाच शैली हे। 

जइसे.........

*तीन डँड़या- तीन झन संग डंडा टकराना

*आधा झूल-एक झन आदमी दुनों डंडा एक आदमी ले टकराथें।

*टेटका झूल- एक आदमी अपन आजू बाजू के आदमी ले डंडा टकराथे।

*पीठजुड़ी-पीठ जोड़के दांया बांया डंडा टकराना

*सम्बंधी भेंट-दांया बांया बारी बारी से डंडा मारना

*घुचरेखी-ऊपर अउ घुंच के नीचे डंडा मारना


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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छेरछेरा- परब अन्नदान

 छेरछेरा- परब अन्नदान


हमर छत्तीसगढ़ ह किसान, मजदूर अउ बनिहार मन के धरती आय। खेती किसानी म रमे छत्तीसगढ़ के लोक जीवन म तीज-तिहार के अपन एक अलग महत्व अउ पहचान हवय। तिहार ह कहूँ किसानी तिहार मने लोक के तिहार हो जाय त का अउ पूछना हे। छत्तीसगढ़ म तिहार मतलब जन-जन के अंतस म समरसता और मंगल भावना के उदात्त स्वरूप।अकती, जुड़वारो, सवनाही, ऋषि पंचमी, हरेली, पोरा, नवापानी (नवाखाई) , सुरहुत्ती, देवारी के संगे संग एक ठन हमर बिशेष तिहार जेमा सबो तिहार ले कतको जादा समता  के भाव हा देखब मा आथे, जेकर नाम हवय छेरछेरा।येला पूस महीना के पुन्नी शुभ तिथि म मनाय के विधान हवय। 

      किसान ह दुनिया के भूख भगाय के काम करथे, इही उदीम मा असाढ़ महिना म धान बोंवई ले लेके पूस महिना म धान मिंजाई तक किसान बर सात महिना हर जाॅंगर टोर कमाई के बेरा रहिथे। तब हाड़ाटोर काम मा थके तन अउ मन ला बीच- बीच म सुस्ताय बर अइसन तीज तिहार के महत्तम ह कई गुना बाढ़ जथे।

हरेली के शुभ बेला म चारो मूड़ा हरियर-हरियर खेत-खार ह देखके किसान के अंतस म कई ठन नवा सपना ह जनम धरथे त जुन्ना सपना ह उदूप ले हरियर घला हो जथे। गरभाही बखत धान ल पोटरी पान खींचत देखके ओकर सपना ह  उम्मीद के पाखी पहिरे दूर गगन म विचरण करथे।जब खेत मा पिंयर-पिंयर सोन कस झूमरत धान ला देखथे तब देवारी तिहार बर कोठी ल लीप-बहार के धान पान के अगोरा करत किसान के माथा म सपना के सपूरन होय के आस अउ खुशियाली के भाव ह जगजग ले दिखन लगथे।

सात महिना ले सेवा जतन के पाछू जब फसल ह कोठार डहर ले अन्न के रूप म कोठी म अमरथे तब किसान के अंतस ह खुशी के मारे कुलकन लग जथे।

              बीजा(धान) ल कोठी ले निकाल के खेत म बोंवई अउ खेत ले कोठी तक अमरई के बीच म कई ठन कहानी हे जे साॅंझर-मिंझर होके किसानी नामक उपन्यास बनके हमर बीच म आथे अउ येकर एक-एक ठन मरम ल हम सबला समझाथे।

अषाढ़ ले शुरू होके पूस महिना तक मुख्य पात्र किसान के काम होथे बरोबर-बरोबर सबला हिस्सेदारी बाॅंटना , चाहे वोहा पौनी-पसारी होय नइ ते कन्हो अउ। सेर-चाउर , बीजकुटनी (हरेली के पौनी मन बर अन्न दान) अउ सुखधना ( देवारी/ जेठोनी म हाथा अउ सोहई खातिर बरदिहा-बरदिहीन बर अन्न दान) हर तो पौनी मन के हिस्सा आय। किसान के कमई म बाम्हन-बसदेवा, भठरी ,हरबोलवा अउ मगंइया-झगंइया के घलव हिस्सा लिखाय रहिथे।चिरई-चिरगुन बर झालर, लइका मन बर सीला , आखरी लुवई म बढ़ोना, आखरी कोठार ( मिंजाई के आखरी दिन जब धान के हरेक दाना हर कोठी म पहुॅंच जथे) म बढ़ोना।

थोरिक पुरातन काल म लहुटके इतिहास के पन्ना मन ल खोधियाय म हमला बहुत कुछ जाने बर मिलथे , अपन अउ समाज के संपत्ति के बिसकुटा।

आखेट युग म जब मनखे मन कबिला म रहय तब उनकर मन म अपन-तूपन के भाव नइ रहय, शिकार ल आगी म भूंजत चारों मुड़ा म बैठके सबोझन बरोबर-बरोबर बाॅंट-बिराज के खावँय। मोर-मोर वाले थोरको सुवारथ नइ रहय। जब सभ्यता ह

पशुपालन युग म प्रवेश करिस तब मनखे-मनखे के सोच म तोर-मोर के भाव ह जनम धरिस। फेर आइस कृषि युग जेमा सुवारथ के घात बोल-बाला होगे।समाजिकता ह व्यक्तिगत सुवारथ म बदलगे। येकर ले गरीब मन रोटी बर मोहताज होय लगिन, समाज म असंतुलन के बीज बोंवागे, गरीब अउ धनी म असंतुलन बढ़गे, मने पूंजीवाद के जन्म होगे। आज पूंजीवाद के कारण समाज के बीच म सामूहिकता के भाव ल सिरावत आप खुदे देख सकथव। फेर येकर ले उलट व्यक्तिगत सुवारथ ले दूरिहा समाजिकता के भाव ह हमर लोक के तीज-तिहार म आजो देखे बर मिलथे। तब इतिहास अउ वर्तमान के तुलना करत हम कहि सकथन कि आखेट युग के बराबर-बराबर बाॅंटे के गुण ह हमर लोक-परब मन म आज घलव साफ-साफ दिखाई देथे। एक महापरब के रूप मा छेरछेरा के दिन येहा अउ स्पष्ट हो जथे। 

आज के दिन बिहनिया च ले का लइका अउ का सियान जम्मों झन घरों-घर छेरछेराय बर निकल जाथें। अलग-अलग टोली बनाके निकल जथें छेरछेरा माॅंगे बर।बिहनिया ले लेके रतिहा तक छेरिक-छेरा छेर मरकनिन छेर-छेरा के शोर मा गाॅंव-गली ह गमकेन लगथे। डंडा-नाच अउ सुआ-नाच सही कई ठन दल मन ह खुशी खुशी ले ये तिहार ल मनाथें। जेन घर के चौखट म छेरछेरइया मन पहुॅंचथे ओ घर वाले मन ले जतिक बन पड़थे ततिक दान-दक्षिणा देके सबला बिदा करथें। अउ वोहर अपन ईश ल सुमिरन करत गरब महसूस करथे कि मोर मेहनत के फल म जादा नइ ते कमती सबके  हिस्सेदारी हे।

                    तब हम कहि सकथन पूस पुन्नी मा अन्न दान के महापरब के दिन किसान हर अपन ॲंगना म आय चेलिक-चेला ( छेरिक छेरा) मन ला हाॅंसत- हाॅंसत  अवइया बरस म समे-सुकाल के मंगलकामना करत अन्न के दान- महादान के पूर्णाहुति करथे।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

एक खंभा पोस्टर के नाम*. ब्यंग (टेचरही).

 *एक खंभा पोस्टर के नाम*.           

                           ब्यंग (टेचरही). 


         जेन आदमी के छइँहा खूदे के मन नइ करे ओकर फोटू ला बिहनिया अखबार के पहिली पन्ना मा देखे ला परथे।माने तब जान ले कि दिन खराब। देखइया मन यहू कहत होहीं कि कनवा ला भाय नहीं अउ कनवा बिना रहय नहीं। मँय ये सोचके अखबार नइ मँगाववँ कि एमा देश दुनिया के नवा ताजा खबर पढ़े बर मिलही। नहीं, एला मोर गुमटी के भजिया लपेट के बेचे बर मँगाथौं। ओइसे भी कार्टूनिस्ट मन के फोटू मा ही खबर सार रथे। अखबार के पहिली पन्ना आरक्षित कोटा के रथे। जेमा आदरणीय माननीय सम्मानीय जी मन के फोटू सोभायमान रथे। अइसन पनौती मन के बधाई संदेश रोजे देख ले। हम ये सोचत रथन कि कभू तो इँकर श्रद्धांजलि खबर आतिस। फेर का करबे कउँवा के दाँत कटरे ले ढोर लँगड़ा खोरवा तक नइ होवय। मरे के तो बाते छोड़ दे। बदकिस्मती तो ये हे कि नेताजी के शुभकामना संदेश के पोस्टर के बिना होली देवारी घलो शुभ नइ होवय। मोर आत्मा ला तब शांति मिलथे जब पहिली पन्ना ला ही चीर के भजिया चटनी के बोहनी करवाथौं।

             अभी हाले हाल एक झन माननीय जी के जनम दिन रिहिस। बारा पेज के अखबार मा आठ पेज मा  बड़का फोटू के सँग बधाई संदेश ले भरे मिलिस। बाँचे चार पेज मा चोरी दुसकरम सड़क दुर्घटना अउ राशिफल मा उज्वल भविष्य बर ज्योतिष सलाह। जादा हे तौ उही माननीय मन के स्वच्छ भारत बर झाड़ूदार फोटो। इही एकाद झाड़ूदार मन के महतारी के नाम  पेंड़वा लगावत फोटू जेला होत बिहनिया दतुवन समझ के छेरी मन दाँत साफ कर डारे रिहिन ।

                  एक झन राजभक्त स्वामिभक्ति मा बूड़े गिराहिक राजधानी के माननीय जी के जनम दिन मनाये बर काम-धाम छोड़के चउँक मा केक काटे के तइयारी मा जावत रिहिस। मोला लगत रिहिस कि दुवारी मा खड़े बराती ला बइठारे बर दरी माँगे बर जावत होही। भजिया खाये बर मोरे टपरी मा रबकगे। संजोग ले बधाई संदेश के फोटू वाले पन्ना उपर भजिया चटनी बाँधके दे डारेवँ। ओकर आत्मा ला अइसे ठेस लगिस जइसे कि किरिया खवाय पगला दिवाना प्रेमी ला छोड़के कोनो सुंदरी दूसर सँग बिहाव रचा डारिस। वोला यहू लगत रिहिस कि वोकर इष्ट देव के मूर्ति ला खंडित करत हें। वोकर दीनता ला देखके यहू लगिस कि तीन पुरखा के पुरखौती मकान मा बुलडोजर चलत हे। विरोध के दबे जुबान मा किहिस! आजे एकर जनम दिन हे अउ आजे एकर बारा हाल करत हावस भाई। मँय कहेँव! तोर नेताजी हमर बर हवा महल बनवात रथे, तँय ये कागज ला सकेल अउ कागजी महल बना। यहू समझाएवँ कि तोर किसमत अच्छा हे कि तँय वो नहीं तो वोकर फोटू सँग भजिया खावत हस माने वोकरे सँग खावत हस। जब ये मन साबर के नाम लेके सूजी धराथें तभो हम पाय मान लेथन ओइसने तहूँ मान ले। तोर इज्जत बाढ़ जाही। अखबार के का हे परब विशेष मा बिना भगवान देबी देवता के फोटू के तो अखबार नइ छपे। फेर मँय जे काम बर मँगाथौं वोला तो नइ छोड़वँ। फोटू सकेले बर पठेरा तो घलो होना चाही। जे काम के हे वोकर तो मुरती मड़ा देय हवँ। 

         जेकर तइयारी मा लगे हावस तोर आस्था कतका हे, सड़क बाजू के बिजली खंभा मा झूलत पोस्टर बतावत हे। बिचारा देव रूप गिराहिक चटनी सान के देश के अर्थ तंत्र ला चाँटे कस चाँट खाइस, अउ कागज ला  बाजू मा फेक दिस। भारतीय आम नागरिक जइसे आसा भरे नजर ले देखत कुकुर बइठे रिहिस। फेके कागज के चटनी पोताय माननीय जी के मुँहूँ ला चाँटके सफा करिस तब हमर दूनो के आत्मा ला शांति मिलिस।

         रायपुर से लेके दिल्ली तक के कोनों ना कोनों के जनम दिन, शहर आगमन अउ फीता काटे के खबर भर ले भरोसा नइ होवय कि सही मा आवत हे या जनम दिन हे कि नही। इँकर फोटू शहर गली सड़क के बिजली खंभा मा झूलत पोस्टर ले ही पक्का सबूत मिलथे कि हा ये सच हे। बिजली विभाग वाले मन के उदारता आय कि अइसन खबर ला बोहे बर खंभा सउँप देय हे। या कि खंभा हर इन मन ला गोद ले लेय हे। एकर यहू कारन हो सकथे कि रात मा घलो मनहूस करिया करतूत वाले के दरसन बल्ब अँजोर मा होवत रहय।

    पोस्टर टाँगे के नाम मा पेड़ लगाना स्थाई समाधान नोहे। महतारी के नाम मा पेड़ लगावत पोस्टर भर मा जागिस। बाप असन जंगल कटत हे वोकर दुख कोनो पोस्टराधिश मन ला नइये। जे मन विरोध के सँग दुख मनावत हें उँकर बर उजरे जंगल के फोटू टाँगे बर खंभा खाली नइ मिलत हे।अउ जे काम तंत्र के संरक्षण मा होवत हे तब जे महतारी के नाम पेड़ लगाए वोला का जवाब दिहीं। चउँक मा होर्डिंग के खूँटा हे तो ओकर ऊँचाई गिरौधपुरी के जैतखाम ले कम नइ रहय। जेकर ले चार कोस दुरिहा के अँधरा घलो देख जान लेवय कि आज---------।

           कोनो जनम के श्राप ला बोहे खंभा सोचत रथे कि कभू तो हमू ला हरू मिलतिस। फेर एक झन के उतरे के पारी आये नइ रहय दूसर के शहर आगमन के पोस्टर के तइयारी हो जथे। माने ये धरती के बोझ हें उँखर बोझा ला बारो महिना बोहे ला परथे। एको झन के श्रद्धांजलि के पोस्टर ले खुशी होतिस कि चलो अच्छा हे एकर तो आखरी होइस। जम्मो चिंता ले बाहिर भक्तराज मन खंभा के धन्यवाद मनाके जन्मोत्सव मनाये बर डीजे बजाहीं फटाका फोरहीं। जेकर ले परियावरण मा धमाकादार ममहाई तो बगरही । बस एक खंभा माननीय जी के पोस्टर के नाम आरक्षित रहना ही चाही। बिजली भले कटौती करके आय फेर खंभा पोस्टर के नाम हाथ खड़ा झन करे। खंभा हे तब पोस्टर हे अउ पोस्टर हे तब खंभा हे। 


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनांदगांव।

सकट चतुर्थी

 सकट चतुर्थी

       


              भारतीय संस्कृति मा चंदा, सुरुज के संग ग्रह नक्षत्र के पूजा पाठ बारो महीना चलते रथे। वइसने एक पूजा या व्रत होथे, सकट तिहार। ये तिहार के दिन चौथ के चंदा मा भगवान गणेश ला विराजे मानके। ओखर दर्शन करके दाई, बेटी, बहिनी मन, अपन निर्जला ब्रत ला तोड़थें, अउ अपन लइका लोग के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये सन्दर्भ मा एक कथा आथे कि, भगवान शिव हा, पार्वती द्वारा मइल ले बनाय गणेश जी के मुड़ी ला काट देथे, जेखर ले पार्वती बहुत दुखी हो जथे, अउ जब गणेश जी ला जिंदा करे बर कथे, ता ओखर मुड़ मा हाथी के मूड़ लगाथे। पावर्ती देख के खुश होथे, फेर जब अपन लइका के पहली वाले कटे मुड़ी ला देखथे ता विलाप करे लगथे। पार्वती ला विलाप करत देख, ओखर प्रण, व्रत अउ इच्छा अनुसार वो मुड़ी ला चन्द्रमा मा, शिव जी हा शुशोभित कर देथें, अउ उही दिन ले सकट तिहार के चलागन माने जाथे। माता पार्वती अपन लइका गणेश के पुर्नजीवन अउ कटे मुड़ी के संसो बर निर्जला व्रत रहिके, भगवान शिव ला अपन बात मनवाथे। तपोबल ले प्रभावित भगवान शिव, चन्द्रमा मा मुड़ ला स्थापित करे के बाद, ये आषीश देथें कि सकट के दिन जउन भी महतारी मन, चाँद ल देखत पूजा पाठ करहीं, उंखर लइका लोग के सब संकट दुरिहा जही। उपास धास के ये सिलसिला आदि समय ले अभो सरलग चलत आवत हे।    

                 

                     छत्तीसगढ़ मा ज्यादातर ये उपास ला लोधी अउ कुर्मी समाज के बेटी माई मन रहिथे। पहली कस आजो ये तिहार मा, बेटी माई मन, अपन मइके मा जुरियाके सबो सँवागा सजाके रतिहा चंदा ला नमन करत अपन निर्जला व्रत ला तोड़थें अउ लइका लोग घर परिवार के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये दिन माटी के खिलौना, जेमा डोंगा, बाँटी,भौरा के साथ साथ पापड़, तिली लाड़ू, कोमहड़ा पाग, पूड़ी, खीर, अइरसा आदि पकवान बनाये जाथे, अउ भगवान चन्द्र गणेश ला भोग लगाय जाथे। भगवान  चंद्र गणेश ला कच्चा दूध, फूल, पान, नरियर ,अगरबती, हूम धूम आदि चढ़ाए जाथे। ये परब ला सकट चतुर्थी घलो कथे। कुछ मन चौथ के चाँद के जघा तीज के चाँद ला घलो भगवान चन्द्र गणेश मानके सकट उपास रथे।  ददा भाई मन ये तिहार के पहली अपन बेटी बहिनी ला घर ले आथे। बेटी माई मन मइके मा ये उपास ला रथें। व्रत तिहार कोनो भी होय सबके मूल मा सुख समृद्धि के कामना जुड़े हें, वइसनेच मया मेल, सुख- समृद्धि के परब आय सकट चौथ।।

          

                         उपास धास कभू भी देखावा नइ होय, ओखर मूल मा सुखसमृद्धि के कामना ही रथे, फेर आज सोसल मीडिया के युग मा लगातार नवा नवा फिजूल चोचला चिंतनीय हे। कथे भगवान भाव के भूखा ए, तभे तो सकट उपास मा  महंगा मेवा मिष्ठान के जगह महतारी मन तिल गुड़ के भोग लगाके भगवान चंद्र गणेश ला मनाथें, अउ देख देखावा ले दुरिहा रथें। सकट उपास मा, कुछ जगह सकट माता के घलो जिक्र होथे। सकट माता मां दुर्गा के ही रूप आय, जेला चौथ माता भी कहिथे। राजस्थान मा चौथ माता के कई मंदिर भी मिलथे। वइसे छत्तीसगढ़ मा सकट के दिन चंद्र दर्शन के ही चलागन हे। चंदा मा भगवान गणेश के प्रतिमूर्ती मानके पूजा पाठ करथें। उपास ले भक्ति भाव के संग तन के स्वस्थता घलो बने रथे। ते पाय के ये सब तिहार बार के बहाना उपास जेखर से भी बन सकथे, रहना चाही। उपास सुख समृद्धि के साथ जुड़ाव के काम घलो करथे। ये सब उपास मइके, ससुराल के संग पारा, परोसी मा प्रेम बढ़ाथे। जय भगवान चंद्र गणेश,जय सकट माता।


सकट तिहार-कुंडलियाँ


मइके मा जुरियाय हें, दीदी बहिनी आज।

सकट तिहार मनात हें, थारी दिया सजात।

थारी दिया सजात, हवैं बेटी माई मन।

लाड़ू पापड़ खीर, बनावत हें दाई मन।।

माँगे मया दुलार, गजानन ले व्रत रइके।

हाँसत खेलत रोज, रहै ससुरार अउ मइके।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)