Monday, 3 August 2020

मया-परेम के तिहार : राखी*

*मया-परेम के तिहार : राखी*

      अइसे तो भारत भुइँया किसानी प्रधान भुइँया ए। जिहाँ किसानी के सँगेसंग कतको तीज तिहार मनाय जाथे। जादा ले जादा तिहार मन किसानी ले जुड़े हवै। कोनो ह फसल बोय के पहिली पूजा-पाठ के रूप म त कोनो ह बोय के बाद फुरसुदहा म मेल-मिलाप करे बर त अउ कोनो ह फसल पाके(तियार होय के) के बाद घर लाने के खुशी म मनाय जाथे।
       अइसने सावन महीना म दू तिहार हरेली अउ राखी आथे। जेमा के हरेली छत्तीसगढ़ म रोपा-बियासी के बाद थके-माँदे बइला अउ गाय-गरू (गोधन) के रक्षा बर मनाय के रिवाज हे। जउन ल सावन अमावस्या के दिन माने जाथे।जे छत्तीसगढ़ के पहिली अउ बड़े तिहार आय।
     दूसर राखी तिहार जउन छत्तीसगढ़ के सँगेसंग भारत भर के बड़े तिहार आय। ए तिहार किसानी ले जुड़े नइ हे। ए भाई-बहिनी के मया परेम के तिहार ए।ए दिन बहिनी मन भाई के रक्षा के कामना करत अपन रक्षा के वचन लेथे, अउ भाई के कलाई म रक्षा सूत्र बाँधथे। भगवान ले अपन भाई के मंगल कामना करथे। भाई के स्वस्थ अउ खुशहाल जिनगी के कामना करत आरती लेवत बहिनी मन मंगल तिलक लगाथें। भाई मन बड़ उछाह ले बहिनी के मया दुलार के सम्मान करथें,  स्वागत करथें, अउ भाई-बहिनी के मया-परेम के तिहार म बहिनी ल भेंट देथे। ए मौका म हमर सँस्कृति के मुताबिक नरियर, चंदन, कुमकुम, पींयर-चाउँर,फूल अउ दीया मन ले थारी पूजा खातिर सजाय जाथे।
       ए तिहार माने के पाछू कतको पौराणिक कथा हे। ए कथा मन ले एक बात साफ हवै कि मदद खातिर गुहार करत स्नेह बँधना बाँधे गिस अउ इही बँधना राखी कहाइस।
     चाहे किस्सा इन्द्र अउ बलि के लड़ई के बखत इन्द्र के पत्नी सचि के भगवान विष्णु ले मदद माँगे वाला होय, चाहे असुर राज बलि ले विष्णु ल छुड़ाय बर माता लक्ष्मी के उदीम जउन म राजा बलि ल राखी बाँधिन अउ उपहार म उँखर ले विष्णु जी ल मुक्त कराइन के किस्सा होय। वइसने भगवान कृष्ण के कटे उंगली म द्रोपदी के बाँधे कपड़ा ले जुरे किस्सा हे।द्रौपदी के ए उपकार कृष्ण जी कौरव राज सभा म द्रोपदी चीरहरण के समय चीर(कपड़ा)बढ़ा के उपकार करिन।
       ए प्रसंग मन ले इही बात सीखे मिलथे कि भाई-बहिनी एक दूसर के मदद करत राहय। अउ उँखर मया-परेम ह बने रहय।
       अइसे तो पौराणिक काल के कथा मन म ए बात के जानबा नइ मिलै कि एकर चलन आगू सरलग रहिन।बिपत म परे ले मदद के गुहार संग राखी बाँधे बस के जानकारी मिलथे।
       आज भारतीय समाज म राखी के जउन चलन हे ओखर शुरुआत कइसे होइस होही सोचथँव त अतके सोच पाथँव के बर-बिहाव के बाद बेटी ससुरार चल दय।भाई-बहिनी के मया-परेम दुरिहा जय।भाई-बहिनी अलगे अलगे जिनगी जीयँय।तब भाई बहिनी मया-परेम ले जुरे राहय अउ बिपत परे एक-दूसर के मदद कर सकय। इही सोच के कहूँ हमर पुरखा मन के पुरखा मन ए रीत बना के रखिन होही। जिनगी म कोनो भी परकार के संकट ले उबरे बर भाई-बहिनी एक-दूसर के चिंता कर सकय।
         राखी के बहाना भाई-बहिनी एक दूसर ल सुरता करय। अउ नानपन के मया दुलार जुरे रहय।भाई-बहिनी के मया-परेम के बँधना राखी के अगोरा सावन के लगते शुरु हो जथे।
       आज जब लोगन के जिनगी जिएँ के स्तर उठे हवै, उँखर आवश्यकता बाढ़ते जात हवै, अइसन म अतका कमई नइ हो सकत हे के कोनो भी बड़का काम अपन तुरते के कमई ले कर सकय।अइसन म भाई-बहिनी के मिलके काम करे ले काम बात काहत निकल जथे। परोसी ल गम नइ मिले। मोबाइल के आय ले रोजेच गोठ बात होय ले भी नता-रिश्ता म दूरी कमतीयागे हे। फेर तइहा जुग म जोरे रखे बर अइसन कुछू नइ रहिन।
           आज राखी के महत्तम दिनोंदिन कलजुग म रावन के अवतरे ले समाज म बाढ़ गे हे। अइसन म राखी के मरम अउ महत्तम ल कमती नइ आँके जा सकय।
        राखी बाँधे के उपहार म नशा छोरे के कसम ले के समाज के कतको बुराई ल घलो मेटाय के काम हो सकत हे। खुदे नशा ले होवइया नाश ले बाँचही अउ दूसरो ल बचा सकत हे।ए बात ल राखी के दिन भाई मन बताय जाना भी संभव हे।
         अभी के समे संसार पर्यावरण असंतुलन ले प्राकृतिक आपदा म घेरी-बेरी फँस जथे। एक कोनटा म बाढ़ हवै त दूसर कोनटा म सूक्खा के रोना हे। ए सब ले बाँचे बर पर्यावरण संतुलन बर रुख राई बचाना जरूरी होगे हे, ए बात ल जानत कतको मन रुख राई ल राखी बाँधथे। जउन मानवता बर जरूरी भी हे। यहू आज राखी ल नवा महत्ता परदान करत हे। एकर स्वागत हिरदे ले करना चाही।

पोखन लाल जायसवाल
पलारी बलौदाबाजार 
छत्तीसगढ़

राखी तिहार'-ज्ञानु

राखी तिहार'-ज्ञानु
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              सावन महिना म पूर्णिमा  के दिन राखी तिहार मनाये जाथे। भाई- बहिनी के पवित्र रिसता के प्रतीक आय - राखी तिहार। हमर भारत देश म बड़ धूमधाम अउ हर्षोल्लास के साथ मनाये जाथे। राखी आवत सुनके भाई- बहिनी के चेहरा म खुशी के लहर दउँडे लगथे।
          रक्षाबंधन दू शब्द ले मिलके बने हे - रक्षा अउ बन्धन। संस्कृत भाषा के अनुसार अर्थ होथे अइसे बँधना जेन रक्षा प्रदान करथे. रक्षा के अर्थ होथे रक्षा करना अउ बन्धन के अर्थ होथे गांठ. एक डोर जेन रक्षा प्रदान करथे. ये तिहार बहुत खुशी प्रदान करथे. भाई ल ये सुरता देवाथे के ओला अपन बहिनी के रक्षा करना हे. 
              राखी तिहार ह एक भाई ल अपन बहिनी के प्रति कर्तव्य ल सुरता देवाथे. ये पबरित तिहार के दिन बहिनी हा अपन भाई के कलाई म राखी बाँधथे अउ भगवान ले अपन भाई के स्वस्थ्य अउ खुशी जिनगी बर कामना करथे. भाई घलो अपन बहिनी ल कुछ उपहार भेट देथे अउ ये प्रतिज्ञा करथे जिनगी भर तोर रक्षा करहू.
          पुराण म घलो राखी के उल्लेख मिलथे. असुर राजा बलि अउ देवता मनके युद्व म देवता मन हार जथे. तब इंद्र के पत्नि सचि भगवान विष्णु मेर जाके समाधान पूछथे. तब भगवान विष्णु एक धागा सचि ल देके कहिथे ये धागा राजा इंद्र के कलाई म बाँध देबे. बाद म  इंद्र ह राजा बलि ल हरा देथे.
         असुर सम्राट बलि भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त रिहिस. भगवान बलि के भक्ति ले अतका खुश होइस के ओखर राज्य के सुरक्षा करे बर पाताल लोक चले गिन. माता लक्ष्मी भगवान के विरह म दुखी होके एक ब्राह्मणी के रूप धरके रहे लग जथे. एक दिन राजा बलि ल राखी बाँधथे. कुछ मांगे बर बोलिस त उपहार म भगवान विष्णु ल माँगथे. ये भेद ल राजा बलि नइ जानत रिहिस. तब जाके भगवान विष्णु ल वापस  माता लक्ष्मी बैकुंठ धाम लेके आथे।
         भगवान कृष्ण राजा शिशुपाल के वध करिस त ओखर अँगूठा म चोट लग जथे। तब द्रोपती अपन वस्त्र ल चिर के कटे अँगूठा म बाँधे रिहिस जेखर ले खून बहे बर रुके रिहिस हे। उही समय भगवान खुश होके वचन देइस रिहिस बखत पड़े म तोर रक्षा करहू। जब कौरव राजसभा म दुस्सासन द्रोपती के चिर हरण करत रिहिस तब भगवान कृष्ण रक्षा करे रिहिस। अइसने बहुत अकन बात सुने बर मिलथे।
        राखी तिहार के दिन बिहना ले बहिनीमन उठके नहा धोके तियार हो जथे। भाईमन घलो तियार रहिथे। सुग्घर थारी सजाके  ओमा राखी, चंदन, कुमकुम, दीया, पिवरा चाउँर, नरियर अउ मिठई रखे रहिथे। अपन भाई ल पीढ़वा म बइठाके दीया जलाथे आरती करके माथा म तिलक लगाथे फेर कलाई म सुग्घर राखी बांधके मिठई खवाथे। भाई बड़े हे त पाँव परही नइते भाई ह अपन दीदी के पाँव परथे अउ कुछ भेंट देथे।

ज्ञानुदास मानिकपुरी
चंदेनी कवर्धा
छंद साधक-सत्र- ३

Friday, 31 July 2020

शकुन्तला शर्मा लघुकथा

शकुन्तला शर्मा
           लघुकथा
मीन मेख झन निकाल
"मीन मेख झन निकालव बहुरिया! आँखी कान हर नइ दिखय तभो ले, घर के कतको बुता ला सलटावत हावन। सास अन फेर बहुरिया बरोबर रहिथन। ए झन सोचिहव कि हमपढ़े लिखे नइ अन। हमुँ ग्यारहवीं पास हावन। गाँव म कालेज नइ रहिस तेकर सेती आगे नइ
पढ़े पाएन। तुँहर बाबूजी आज रहितिन तव, समय म हमर आँखी के आपरेशन घला हो जाए रहितिस, अउ हमला कहूँ के परबस नइ रहना परतिस।" कहिके दुर्गा हर जोर - जोर से रोए लागिस।

आलू ल निछ के मढ़ाए रहिस,तेला वोकर बहू कहि दिहिस,"कइसे नीछे हावस माँ! फोकला हर रहि गए हे।कइसे पौले हावस, कहूँ छोटे, कहूँ बड़े, कहिके निनास देथे।कइसे बहारेस ओ! कचरा हर रहि गय हावय।"

"अई!ओकर आँखी नइ दिखय कहिके जानत हावस! तभो पथरा कचारे कस बोलत हावस, तौन हर फभत हे नोनी?" बहू के महतारी हर अपन बेटी ला कहिस!

      शकुन्तला शर्मा 🙏🏻

वृक्षारोपण होत हवय ते फोटोसेशन*

*वृक्षारोपण होत हवय ते फोटोसेशन*

अबड़ समझे के कोशिश करेंव फेर समझे मा नइ आवत हे।मनखे मन पउँधा लगाथे ते फोटो खिचाथे।एक झन ला पूछ परेंव काय होवत हे बड़ेक जान पंडाल लगे हे गाड़ी मोटर गर्र गर्र दउँड़य हे।त ओमेर सकलाय रिहिन तेन मन बताथे वृक्षारोपण होही।मँय सोचेंव पेड़ लगाय बर अतेक ताम झाम बाजा गाजा अउ भाषण बाजी तको होथे।फेर मन मा बिचार आइस कहूँ भारी बड़े बड़े पेड़ लगाही तेकरे सेती सब ला मिठई,नाश्ता चाय पानी खवावत होही।फेर देख परेंव चार पाँच ठन कार रुकिस अउ ओमे ले सादा सादा कुरता पहिने मनखे मन उतरिस अउ मंच मा जाके बैइठिस।मोला लगिस नेता असन।मँय बड़ खुश होगेंव चलव हमर राज के नेता मन ला परकिरति अउ परयावरन के बिकट चिंता हवय।अउ होना भी चाही काबर बरसात मा ही पउँधा हा जल्दी लगथे अउ ओकर बढवार दिनों दिन होत रहिथे।अउ हमर सदियों से चलत आवत हे हमर पुरखा मन हा तको बरसात के समे ही पेड़ लगावय।जेकरे परताप ये गाँव मा जगा जगा बड़े बड़े पेड़ लगे हे अउ सालों से हमन ला अपन छइयाँ के साथे साथ फल फूल देत हवय।बड़ खुशी होइस हमर पुरखा के नाँव ला  इहूँ मन आगू बढ़ाय के दिशा मा काम करत हे।
फेर देख के दंग खागेंव कइ झन मनखे भाषण सुनके अउ नाश्ता पानी करके जाय बर धर लिस।नेता जी कहिते रिहिन अभी पेड़ लगाय के काम ला करना हे,धरती ला हरा भरा बना के,परयावरन ला साफ सुथरा रखना हे।फेर कतको झन मनखे मन अनसुनी करके चल दिन।तभो ले नेता हा तो नेताच होथे ओकर एक आवाज मा दरदिर ले मनखे फेर सकला जथे।सब पहिलीअपनेच दाँदर ला भरिन तब कहूँ जा के पेड़ लगाय बर तैयार होइन।बड़ बिकट स्थिति पइदा हो जथे जब एक ठन पेड़ ला घेर के पचासों मनखे खड़ा हो जथे।अउ पेड़ लगेच नइ राहय तभो ले फोटो खिचाये बर एक दूसर ऊपर झपाय पड़थे।लेद बरेद दस बीस ठीन पेड़ लगाथे अउ सौ ठक फोटो खिचाथे।अब कहूँ नेता जी के जाय के बेर होथे ते बाँचे खुचे मिठई अउ नाश्ता ला फेर झोरथे।अउ कुड़ा करकट रद्दी ला उँहे फेक सब फुर्र हो जथे।सवाल अब मन मा ये उठत हे कि लोगन मन खाय पीये बर गेहे ते कचरा फइलाय बर, ते नेताजी ला सकल देखाय बर, ते फोटो खिंचाय बर।पेड़ लगाय के नाँव तो येकर बादे आही।फेर शुरू होथे पत्र पत्रिकाओं मा मनमाड़े पेड़ लगाय के रिकाड।दस पन्द्रही दिन बाद जाके देखबे ते कतको पेड़ ला गाय गरु छेरी पठरु मन हा खा डरे रहिथे।बाँचे रीथे सिर्फ अउ सिर्फ फोटो खिंचाय रहिथे तेन हा जतनिया के मोबाइल नइते फोटो एलबम मा सजा के फोटो ला रखे रहिथे।ये फोटो सेशन हा आज एक परथा अउ फेशन बन गेहे,काबर कि फोटो खिचाना बहुते जरूरी हे,तभे मनखे मन जानही अउ एक होड़ बने रइही पौधारोपण के।
हमन ला आज चाही बिना ताम झाम के अउ सीमित संसाधन मा भी वृक्षारोपण अभियान ला अमलीजामा पहिनाय के।जेकर से अवैया पीढ़ी बर एक सबक होवय अउ शुद्ध वातावरण के संग परयावन भी शुद्ध होवय।
✍️
विजेन्द्र वर्मा
नगरगाँव जिला-रायपुर

किरिया-चोवाराम वर्मा बादल

किरिया-चोवाराम वर्मा बादल

(कहानी)


आज के ग्राम सभा विशेष रूप ले शिक्षा व्यवस्था उपर चर्चा करे बर बलाये गे रिहिस।ग्राम पंचायत भवन मा पंच सरपंच अउ पालक मन खचाखच बइठे हें।प्रायमरी स्कूल से लेके हाई स्कूल तक के जम्मों गुरुजी मन ल घलो बलाये गे हे। विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी तको आय हें। सब आपस म गलबल गइया करत हें।कोनो लइका मन के चौपट पढ़ई लिखई बर गुरुजी मन ल दोष देवत हें ,त कोनो सरकारी व्यवस्था ल। गुरुजी मन के अपन अलग अलग तर्क हे।
    सरपंच ह हल्ला गुल्ला ल शांत करावत गुरुजी मन ल सम्बोधित करत कहिच--हमर गाँव के लइका मन के पढ़ई लिखई एकदम कमजोर हे।अनुशासन नाम के चीज नइये।जेती देखबे तेती लइका मन घूमत रहिथें। तूमन स्कूल म बइठे-बइठे का करथव समझ म नइ आवय। पाँचवी के लइका ल अपन नाम तक लिखे ल नइ आवय।हेड मास्टर शर्मा जी ,ले तैं बता अइसन स्थिति काबर हे? गाँव के पालक मन तोर अबड़े शिकायत करथें। तैं तो स्कूल आबेच नइ करच।
    शर्मा जी अतका ल सुनके तमतमाये खड़ा होगे अउ पछीना ल पोंछत-पोंछत कहिच--ए बात ल सरकार ल पूछव मैं ह स्कूल काबर कम आथवँ।मैं स्कूल नइ आववँ ,अइसे बात नइये।रोज आथवँ,फेर आज इहाँ मीटिंग काल उहाँ मीटिंग।आज बर ए कागज बना के पहुँचाना हे ,काल वो कागज बना के पहुँचाना हे।मैं तो इही म चकरघिन्नी कस घूमत रहिथवँ।मोर स्कूल के गुरुजी मन शिक्षाकर्मी आँय ऊँखर हड़ताल चलत  रहिथे। अकेल्ला मैं का करवँ। जब जब पढ़ाई लिखाई के बेरा आथे  उँकर हड़ताल चालू हो जाथे। हेड मास्टर के बात ल सुनके एक झन जवान शिक्षाकर्मी गुरुजी ह नराज होगे अउ खड़ा होके कहिच-- हड़ताल करना हमर अधिकार ए। जतका दाम तकका काम। तीन चार महीना ले तनखा नइ मिले राहय।  कर्जा में डूबे रहिथन तेकर अलग टेंशन। काला पढ़ाबे काला लिखाबे। हमर संग भारी अन्याय हे। हेड मास्टर जी के तनखा हमर ले पाँच गुना जादा हे त ओला पाँच गुना जादा पढ़ाना चाही। अउ ए बतावव- पालक मन घर म कभू अपन लइका मन ल  पढ़े बर कहिथव। बस थारी  ल बजावत मध्यान भोजन ख़वाये बर भेज के छुट्टी पा लेथव।अतका ल सुनके एक झन पालक तमतमा के खड़ा होगे अउ कहे लगिच- नाच न जाने आँगन  टेढ़ा। पढ़ाये लिखाये ल आवय नहीं अउ हमला दोष देवत हच।तूमन ल तो रात दिन मोबाइल ले फुर्सत नइये।भेंडी कस मूँड़ी ल गड़ियाये उही म भुलाये रहिथव।
  सरपंच ह तू-तू , मैं-मैं ल बन्द करावत मिडिल स्कूल के है  हेड मास्टर साहू जी ल पूछिच--कस  साहू जी तोरो स्कूल के अब्बड़ शिकायत हे।गुरुजी मन कक्षा म जावयँ नहीं। ऑफिस में बइठे-बइठे पेपर पढ़त दिन ल पहा देथें। आठवीं कक्षा के लइका ल जोड़ घटाना तको बनाये ल नइ आवय।
 साहू गुरुजी खड़ा होके कहिच- अइसे बात नइये सरपंच जी । गुरुजी मन तो पढ़ाथें फेर लइके मन ल पढ़े ल नइ आवय। अतका ल सुनकें ,गुरुजी के बुद्धि उपर तरस खावत सब खिलखिला के हाँस डरिन।साहू गुरुजी ह थोकुन झेंपत कहिच--बिन परीक्षा के फोकट के पास होना हे त कोन पढ़ाही अउ कोन पढ़ही ।अउ दूसर बात जेन हाल ऊधो के तेन हाल माधो के।मोरो स्कूल के जम्मों आदरणीय गुरुजी मन शिक्षाकर्मी आयँ। सब बेहाल हें, बिगड़े चाल हे।कुछु बोलबे तहाँ ले जीव के काल हे, बस जंजाल म जंजाल हे।मैं तो मीटिंग, जनगणना अउ छेरी पठरू गिनइ म अधमरा होगे हँव।
       एक झन पंच खड़ा होके कहिच --ले बंद कर तोर भासन ल। दिनभर होटल म बइठे भजिया झोरत गपसप मारे बर तुँहर करा समे हे बस लइका मन ल पढ़ाये बर टाइम नइये।
        साहू जी बइठिच तहाँ ले हाई स्कूल के प्रचार्य सेंडरे जी के पारी आगे।सरपंच कहिच--ले सेंडरे जी तहूँ अपन रोना रोडर। ए अतराफ म हमरे हाई स्कूल के रिजल्ट पन्द्रा प्रतिशत आय हे। एकर मतलब हे तूमन एक चवन्नी के लायक नइ अव।तूमन ल तो चुल्लू भर पानी म डूब मरना चाही।
    सेंडरे जी ह पानी-पानी होवत कहिच--आदरणीय जी। मैं ह परसान हवँ। दस झन के स्टाफ हे।तेमा नव झन बाहिर ले आना जाना करथें।आइन तहाँ ले जाये के जल्दी रहिथे। नौ झन म पाँच झन महिला शिक्षाकर्मी हें, तेमा के चार झन मातृत्व अवकाश म हें। मैं का  करवँ ।गणित विषय के शिक्षके नइये।कई दिन तो स्कूल ल महीं ह खोलथवँ। चपरासी तको नइये। घण्टी ल तको मोही ल बजाये ल परथे। सरपंच कहिच--ए सब  बहाना बाजी नइ चलय सेंडरे जी। खूँटा में दम नइये अउ गेरवा ल दोष। आन स्कूल मन के रिजल्ट अच्छा आये हे,एकर मतलब हे,तोर व्यवस्था ठीक नइये।
     इही बीच एक झन सियान ह खड़ा होके कहिच-- देखव तूमन आपस म वाद-विवाद झन करव। ताली दूनों हाथ ले बाजथे। शिक्षक, पालक, बालक सबो झन मिलजुल के प्रयास करबो त हमरो गाँव के शिक्षा व्यवस्था सुधर जही। गुरुजी मन घलो सोंचयँ- गुरु ल भगवान कहे जाथे। वो मन ल अपन मर्यादा अउ मान सम्मान ल बँचाके रखना चाही। समस्या कहाँ नइये? सब जगा हाबय। ज्ञान दान सबसे बड़े दान आय ।ए पुण्य कमाये के अवसर भवगान ह गुरुजी मन ल देये हे।  चलव आज हम सब किरिया खाबो कि- अपन लइका मन के भविष्य ला बने गढ़े बर जी जान ले प्रयास करबो।
         सियान के बात सबो झन ल बढ़िया लागिच। सरपंच कहिच- कका ह बढ़िया सुझाव देहे। सब झन खड़ा होके अपन छाती म हाथ रखके किरिया खाबो कि मिलजुल के लइका मन ल पढ़ाबो लिखबो अउ उँकर भविष्य ल बने बनाबो।
        सबो झन किरिया खाइन अउ सभा समाप्त होगे ।
 एकेच साल म स्कूल के हालत सुधरगे ।जोरदार पढ़ाई लिखाई होये ल धरलिच।हाई स्कूल के रिजल्ट आइच त पता चलिच जिला म प्रथम आये हे।

चोवा राम 'बादल'
हथबन्द, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ मोहम्मद रफी"*

*"छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ मोहम्मद रफी"*

*$ सुरता - "अजी ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा ? $*

आज सुप्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफी के पुण्यतिथि हे। छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी के संग उनकर मया के नाता रहिस। सन् 1965 मा मोहम्मद रफी के आवाज मा पहिली छत्तीसगढ़ी गीत - 

"झमकत नदिया बहिनी लागे परबत मोर मितान",  

फ़िल्म कहि देबे संदेश बर रिकॉर्ड होए रहिस। इही फ़िल्म मा रफी साहेब के आवाज मा दूसर गीत 

"तोर पैरी के झनर झनर, तोर चूरी के खनर खनर" 

रिकॉर्ड होए रहिस। कहि देबे संदेश फ़िल्म के निर्माता मनु नायक आँय। गीत ला लिखे रहिन हनुमन्त नायडू जी अउ संगीतकार रहिन मलय चक्रवर्ती। ये फ़िल्म 1965 मा रिलीज होइस अउ कहि देबे संदेश के गाना मन जम्मो छत्तीसगढ़ मा धूम मचाइन। 1965 के दौर मा मोहम्मद रफी, गायिकी के सुपर स्टार रहिन। उनकर रेट घलो ज्यादा रहिस। मनु नायक जी जब मलय चक्रवर्ती के संग छत्तीसगढ़ी गीत गाये के अनुरोध कर बर रफी साहेब से संपर्क करके बताइन कि कहि देबे संदेश, छत्तीसगढ़ी भाषा मा पहिली फ़िल्म बनत हे, बजट बहुत छोटकुन हे। अगर आप मोर फ़िल्म मा गाना गाहू त ये आंचलिक भाषा के फ़िल्म ला नवा रद्दा दिखाए खातिर कदम साबित होही। उदार हिरदे के मालिक मो. रफी हाँस के कहिन - आप मन रिकार्डिंग के तैयारी करव, मँय जरूर गाहूँ। स्वीकृति मिले के बाद पहिली गीत के रिकार्डिंग होइस। ये गीत मोहम्मद रफी के गाए पहिली छत्तीसगढ़ी गीत के संगेसंग पहिली छत्तीसगढ़ी फिल्मी गीत बन गिस। तेकर बाद दूसर गीत के रिकार्डिंग होइस। मनु नायक जी अपन बजट के मुताबिक नाम-मात्र राशि के चेक सौंपिन जेला रफी साहब सहर्ष स्वीकार कर लिन। रफी साहेब के कारण मन्नाडे, महेंद्र कपूर आदि गायक कलाकार मन ला घलो मनु नायक जी के बजट अनुसार पारिश्रमिक मा संतोष करना पडिस। 

1965 मा कहि देबे संदेश के रिलीज होए के बाद घर-द्वार फ़िल्म के तैयारी चालू होइस जेमा मोहम्मद रफी के एक सोलो अउ दू ठन डुएट गीत के रिकार्डिंग होइस। गायिका रहिन सुमन कल्याणपुरी। ये फ़िल्म 1971 मा रिलीज होए रहिस। घर द्वार फ़िल्म के निर्माता विजय कुमार पांडेय रहिन। कवि, गीतकार हरि ठाकुर के लिखे गीत ला संगीत मा सँवारे रहिन संगीतकार जमाल सेन। घर द्वार मा रफी साहब के आवाज मा ये गीत मन रहिन। 

गोंदा फुलगे मोरे राजा
आज अधरतिहा मोर सून बगिया मा
सुन सुन मोर मया पीरा के सँगवारी रे

कहि देबे संदेश अउ घरद्वार फ़िल्म के गीत आकाशवाणी ले घलो सुने बर मिल जाथें। 

26 अप्रैल 1980 के दल्लीराजहरा के पं. जवाहरलाल नेहरू फुटबॉल स्टेडियम मा "शंकर जयकिशन नाइट" के आयोजन होए रहिस। ये कार्यक्रम मा संगीतकार शंकर, गायक मोहम्मद रफी, मन्नाडे, गायिका शारदा अउ उषा तिमोथी आये रहिन। चरित्र अभिनेत्री सोनिया साहनी कार्यक्रम के एंकरिंग करे रहिन। कार्यक्रम के शुरुआत मा स्वागत भाषण के औपचारिकता भिलाई निवासी राकेश मोहन विरमानी हर निभाये रहिन। भारत के भुइयाँ मा मोहम्मद रफी के ये आखरी स्टेज शो रहिस। ये कार्यक्रम के बाद 18 मई 1980 के श्रीलंका मा उनकर एक स्टेज शो घलो होए रहिस जेन हर रफी साहब के जिनगी के अंतिम स्टेज शो रहिस। दल्लीराजहरा मा आयोजित "शंकर जयकिशन नाइट" देखे के सौभाग्य मोला मिले रहिस। ये कार्यक्रम मा उनकर गाए दू गीत के सुरता करथंव तब अइसे लगथे कि ए गीत मन मा अंतिम विदाई के संदेश छुपे रहिस। एक गाना रहिस - बड़ी दूर से आये हैं, प्यार का तोहफा लाए हैं"। छत्तीसगढ़ के वासी मन बर मोहम्मद रफी ला साक्षात देखना अउ सुनना, कोनो अनमोल तोहफा ले कम नइ रहिस। दूसर गीत रहिस - अजी ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा, हमारे जैसा दिल कहाँ मिलेगा। ये गीत के बोल अटल सत्य बनगें। वइसन मौका फेर दल्लीराजहरा का, भारत के कोनो शहर मा नइ आइस अउ न मोहम्मद रफी के दिल असन कोनो दूसरा दिल मिल पाइस। दल्लीराजहरा के स्टेज शो, भारत के भुइयाँ मा रफी साहब के आखरी स्टेज शो बनके रहिगे। 31 जुलाई 1980 के ये महान गायक अपन पंचतत्व के काया ला पंचतत्व मा मिलाके रेंग दिस अउ दुनिया बर छोड़ दिस अपन अमर आवाज। 

*आलेख - अरुण कुमार निगम*

गुरुजी के दुलार- संस्मरण

गुरुजी के दुलार- संस्मरण


         बच्छर 1984 के वो दिन के सुरता आथे तब मोर आँखी, गुरुजी के पाय दुलार मा आज घलाव डबडबा जाथय। मँय ओ बखत दल्ली राजहरा मा बीएसपी इस्कूल नं 33 मा चौंथी कक्षा मा पढ़त रहेंव।हमर कक्षा मा दू झन हीरालाल साहू रहेन।दूनो झन अपन अपन घर के बड़का बेटा अउ दूनों के दाई ददा अप्पड़ रहिन।फेर हमन दूनों पढ़ई मा हुँसियार ,कोनों एक दूसर ले ओन्नाइस नइ रहेन।एक अंतर रहिस कि ओखर देहें पाव मोर ले बीस एक्कईस, जेकर ओला फायदा मिलय।इस्कूल मा मोर भर्ती घलाव एकरे सेती देरी मा होय रहिस। कुछु बूता बर गुरुजी मन उही ला आगू कहय।

       एक घाँव स्कूल मा सांस्कृतिक कार्यक्रम के नेवता आइस जेमा सामान्य ज्ञान परीक्छा, भाषण,वाद विवाद अउ नाच गाना के सबो कार्यक्रम मा स्कूल ला भाग लेना रहिस।चयन होय मा भिलाई मा ओखर प्रस्तुति होना रहिस। ओ बखत के हमर गुरुजी मन भारी कलाकार रहय।सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाव मा तो अउ आगू। पन्दरा दिन बाँचे रहय तेकर सेती लइका मन के चुनाव करके कोन-कोन कते-कते कार्यक्रम मा रही ,छाँट के अलग कर दीन। मोर नाम मीना, चैती, संतोषी,गांधीराम अउ कोमल संग समूह नाच वाले मन संग रहिस।सहिनाव के नाम सामान्य ज्ञान परीक्छा अउ वाद विवाद मा। काबर कि मैं भाषण देय बर खड़े होय मा लजकुरहा रहेंव। गुरुजी मन हमन ला खाना छुट्टी के पाछू नाचेबर सिखोवय। छत्तीसगढ़ी गीत "का तैं मोला मोंहनी डार दिये गोंदा फूल" मा तीन झन टूरा अउ तीनझन टूरी ला नाचना रहिस। हमर सबोझन के मटकई नचई ला देख के गुरुजी मन खुश हो जायव। उन ला भरोसा रहिस कि हमर चयन भिलाई बर हो जही।

      भिलाई मा भाग लेय के चयन बर कार्यक्रम दल्ली राजहरा मा होइस जेमा हमर इस्कूल ले छत्तीसगढ़ी समूह नाच अऊ सहिनाव के वाद विवाद विषय के चुनई होइस। सात दिन पाछू भिलाई जाना रहिस। गुरुजी मन अबड़ खुश रहिस।दूसर दिन साहू गुरुजी हा नाचेबर सिंगार करे के अउ नवा नवा जिनिस लाइस।भिलाई जायबर अउ जादा रिहलसल करवाबो कहिन। दू दिन बीतेच रहिस कि सहिनाव के तबियत बिगड़गे। गुरुजीमन परसान होगे।नाम तो ओखर भिलाई भेजा गे रहय।ओखर नाव दल्ली राजहरा के सबो इस्कूल के सेती रहय। एक दिन अउ बीत गे।अब वाद विवाद मा भिलाई जायबर कइसे गुरुजी मन ला करन कहिके चिंता होगे। आगू दिन हाजिरी होय के पाछू आफिस मा मोला बलाइन अउ एकठन कागज के पन्ना मा लिखाय शबदमन ला पढ़ेबर कहिस।बिना अटके सरसरात पूरा पढ़ देंव। मेश्राम गुरुजी हा साहू गुरुजी ला कहिस के एहा ठीक हे।

         साहू गुरुजी हा मोला दू दिन मा रट के बिन देखे सुनाबे कहि दिस। मैं सुकुड़दुम होगेंव। गुरुजी मन कर कुछू कही नइ सकेंव। छुट्टी पाछू घर जाके के रटे के तियारी करेंव।रतिहा कंडील अंजोर मा स्लेटपट्टी मा लिख लिख के आधा ले जादा ला रट डारेंव। ओ बखत हमर पारा बिजली नइ आय रहिस। दूसर दिन फेर हाजिरी के पाछू मेश्राम गुरुजी बला लीस अउ उही ला सुनाय ला कहिस। रात भर रटे वो वाद विवाद के शबद मन गुरुजी के आगू मा कहाँ उड़ागे समझ नइ आइस। ओतकीच बेर साहू गुरुजी आगे, सुनीस ता गुसिया के मोर गाल अउ पीठ ला अतका मारिस कि मोर सबो हुँसियारी के दही मही होगे। मेश्राम सर हा छोड़ा के मोला कक्षा मा भेज दिस।ओ दिन  नाच के रिहलसल मा मोर मन नइ लगिस तेला मेश्राम गुरुजी समझ गे।

        दू दिन बाँचे रहय तीसर दिन भिलाई जाना रहय।सहिनाव बनेच नइ होय रहय। आज मोर फेर पेसी रहय।मार के डर मा दिन रात एक करके सबो रटे ला साहू गुरुजी ला सुना देंव।सुनके कुछ नइ कहिस,अब मोला कते कर रुकना हे, कते करा जोर से बोलना हे एला बताइन।पाछू साहू गुरुजी हा मोला उही भाषण ला मोर डर भगाय बर तीसरी कक्षा के आगू मा सुनाय बर लेगीस। आगू मा खड़े हो के सुनाय बर खड़े होयेंव ता मोर टोंटा सुखागे, बक्का नइ फुटिस।अब साहू गुरुजी के थपरा फेर मोर गाल मा परिस,आँसू घलाव निकलगे।रोनहू होके भुलात भुलात आधा ला सुनाएंव। अब एक दिन रहय फेर नाच मा घलाव धियान लगाना रहय। 

     भिलाई जाय के दिन बिहनिया ले सर्बिस(बस) इस्कूल मा खड़े होगे।पहिली घाँव भिलाई सब लइका मन संग जावत रहँव।बड़ खुशी लगत रहय। बेरा मा भिलाई पहुंच गयेन। चहा पानी पीये के पाछू मंच ठऊर मा पहुंच गेन। उहाँ नाच के बीच बीच मा भाषण, वाद विवाद घलाव होही कहिके बताइन। हमन समूह नाच के पोषाग मा तियार होगेन। बनेच देरी पाछू हमरो नंबर आ गे।सबोमन बने थपरी(ताली) बजाइन। फेर ये का ! एक झन के पाछू वाद विवाद मा नाव घलाव चिल्ला दिस। साहू गुरुजी दउड़त मोर कर आ गे।मोर हिम्मत ला बढ़ावत कहिस- अब दूसर कपड़ा बदले के समय नइ हे, इहीच पोषाग मा मंच मा जाबे अउ बिना अटके जतका आही ओला बोलबे। भुलाबे तभो रुकबे झन समझे। मँय समझगे रहँव ए दरी भुलाहूँ तब कोन जनी कतका अउ कहाँ कहाँ मार परही।

       नांव पुकारिस तब साहू गुरुजी हा मंच के सीढ़िया तक अमरायबर गिस। मंच मा एक घाँव आ गे रहँव तभो ले अकेला खड़े होयेंव ता गोड़ काँपे लगीस।फेर हिम्मत बाँध के अपन विषय ला जोर जोर से पढ़ेंव।माइक मा अकेल्ला बोले के पहिली अनुभव रहय वहू आन गाँव मा। स्कूल मा कविता घलाव नइ बोले रहेंव।पूरा होय के पाछू जय हिन्द कहिके जब मंच के सीढ़िया ला उतरत रहेंव ता साहू गुरुजी हा आधच बीच ले मोला पा के उठा लीस अउ पीठ मा शबासी के थपरी पीटिस। ओतका बेर ओखर दुलार ला पाके मँय पाछू दिन के ओखर मार ला भुलागेंव।अउ काय काय कहिस ते सुरता नइ हे।भात खाय के बेरा कतको गुरुजी मन साहू गुरुजी ला पोटार पोटार के मोर डाहर अंगरी देखावत ओला कुछु काहय अउ हाँसय।
    भिलाई ले दल्ली राजहरा बर हमर सर्बिस हा चले लागिस तब साहू गुरुजी हा बस मा बइठे जम्मो लइका मन करा फेर एक घाँव मोर प्रस्तुति ला बढ़िया कहिस। एक हफ्ता के गुस्सा हा दुलार मा बदलगे रहय। भिलाई के ओ कार्यक्रम के नानपन के  सुरता मोला आज घलाव अपन इस्कूल के लइका मन ला देख आँखी मा झूलथे। सहिनाँव अउ गाँधीराम संग मा बच्छर दू बच्छर मा भेंट हो जाथय।ओमन नाती नतरा वाला हो गय हे। 

हीरालाल साहू "समय"
छुरा, जिला- गरियाबंद