Saturday, 20 February 2021

विश्व महतारी भाषा दिवस” - छत्तीसगढ़ी*



 *“विश्व महतारी भाषा दिवस” - अरुण कुमार निगम*

*छत्तीसगढ़ी *


घर के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध - तइहा के जमाना के हाना आय। अब हमन नँगत हुसियार हो गे हन, गाँव ला छोड़ के शहर आएन, शहर ला छोड़ के महानगर अउ महानगर ला छोड़ के बिदेस मा जा के ठियाँ खोजत हन। जउन मन बिदेस नइ जा सकिन तउन मन विदेसी संस्कृति ला अपनाए बर मरे जात हें। बिदेसी चैनल, बिदेसी अत्तर, बिदेसी पहिनावा, बिदेसी जिनिस अउ बिदेसी तिहार, बिदेसी दिवस वगैरा वगैरा। जउन मन न बिदेस जा पाइन, न बिदेसी झाँसा मा आइन तउन मन ला देहाती के दर्जा मिलगे।


हमन दू ठन दिवस ला जानत रहेन - स्वतंत्रता दिवस अउ गणतन्त्र दिवस। आज वेलेंटाइन दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस, राजभाषा दिवस, पर्यावरण दिवस अउ न जाने का का दिवस के नाम सुने मा आवत हे। ये सोच के हमू मन झपावत हन कि कोनो हम ला देहाती झन समझे। काबर मनावत हन ? कोन जानी, फेर सबो मनावत हें त हमू मनावत हन। बैनर बना के, फोटू खिंचा के फेसबुक मा डारबो तभे तो सभ्य, पढ़े लिखे अउ प्रगतिशील माने जाबो।


एक पढ़े लिखे संगवारी ला पूछ पारेंव कि विश्व मातृ दिवस का होथे ? एला दुनिया भर मा काबर मनाथें? वो हर कहिस - मोला पूछे त पूछे अउ कोनो मेर झन पूछ्बे, तोला देहाती कहीं। आज हमन ला जागरूक होना हे। जम्मो नवा नवा बात के जानकारी रखना हे। जमाना के संग चलना हे। लम्बा चौड़ा भाषण झाड़ दिस फेर ये नइ बताइस कि विश्व मातृ दिवस काबर मनाथे। फेर सोचेंव कि महूँ अपन नाम पढ़े लिखे मा दर्ज करा लेथंव।

फेसबुक मा कुछु काहीं लिख के डार देथंव। 


भाषा ला जिंदा रखे बर बोलने वाला चाही। खाली किताब अउ ग्रंथ मा छपे ले भाषा जिंदा नइ रहि सके। पथरा मा लिखे कतको लेख मन पुरातत्व विभाग के संग्रहालय मा हें फेर वो भाषा नँदा गेहे। पाली, प्राकृत अउ संस्कृत के कतको ग्रंथ मिल जाहीं फेर यहू भाषा मन आज नँदा गे हें  । माने किताब मा छपे ले भाषा जिन्दा नइ रहि सके, वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही।


भाषा नँदाए के बहुत अकन कारण हो सकथे। नवा पीढ़ी के मनखे अपन पुरखा के भाषा ला छोड़ के दूसर भाषा ला अपनाही तो भाषा नँदा सकथे। रोजी रोटी के चक्कर मा अपन गाँव छोड़ के दूसर प्रदेश जाए ले घलो भाषा के बोलइया मन कम होवत जाथें अउ भाषा नँदा सकथे। बिदेसी आक्रमण के कारण जब बिदेसी के राज होथे तभो भाषा नँदा सकथे। कारण कुछु हो, जब मनखे अपन भाषा के प्रयोग करना छोड़ देथे, भाषा नँदा जाथे। 


छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर घलो खतरा मंडरावत हे। समय रहत ले अगर नइ चेतबो त छत्तीसगढ़ी भाषा घलो नँदा सकथे। छत्तीसगढ़ी भाषा के बोलने वाला मन छत्तीसगढ़ मा हें, खास कर के गाँव वाले मन एला जिंदा रखिन हें। शहर मा हिन्दी अउ अंग्रेजी के बोलबाला हे। शहर मा लोगन छत्तीसगढ़ी बोले बर झिझकथें कि कोनो कहूँ देहाती झन बोल दे। छत्तीसगढ़ी के संग देहाती के ठप्पा काबर लगे हे ? कोन ह लगाइस ? आने भाषा बोलइया मन तो छत्तीसगढ़ी भाषा ला नइ समझें, ओमन का ठप्पा लगाहीं ? कहूँ न कहूँ ये ठप्पा लगाए बर हमीं मन जिम्मेदार हवन। 


हम अपन महतारी भाषा गोठियाए मा गरब नइ करन। हमर छाती नइ फूलय। अपन भीतर हीनता ला पाल डारे हन। जब भाषा के अस्मिता के बात आथे तब तुरंत दूसर ला दोष दे देथन। सरकार के जवाबदारी बता के बुचक जाथन। सरकार ह काय करही ? ज्यादा से ज्यादा स्कूल के पाठ्यक्रम मा छत्तीसगढ़ी लागू कर दिही। छत्तीसगढ़ी लइका मन के किताब मा आ जाही। मानकीकरण करा दिही। का अतके उदिम ले छत्तीसगढ़ी अमर हो जाही?


मँय पहिलिच बता चुके हँव कि किताब मा छपे ले कोनो भाषा जिंदा नइ रहि सके, भाषा ला जिन्दा रखे बर वो भाषा ला बोलने वाला जिन्दा मनखे चाही। किताब के भाषा, ज्ञान बढ़ा सकथे, जानकारी दे सकथे, आनंद दे सकथे फेर भाषा ला जिन्दा नइ रख सके। मनखे मरे के बादे मुर्दा नइ होवय, जीयत जागत मा घलो मुर्दा बन जाथे। जेकर छाती मा अपन देश बर गौरव नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन गाँव के गरब नइये तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन समाज बर सम्मान नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर छाती मा अपन भाषा बर मया नइये, तउन मनखे मुर्दा आय। जेकर स्वाभिमान मर गेहे, तउन मनखे मुर्दा आय। 

जउन मन अपन छत्तीसगढ़िया होए के गरब करथें, छत्तीसगढ़ी मा गोठियाए मा हीनता महसूस नइ करें तउने मन एला जिन्दा रख पाहीं। 


अइसनो बात नइये कि सरकार के कोनो जवाबदारी नइये। सरकार ला चाही कि छत्तीसगढ़ी ला अपन कामकाज के भाषा बनाए। स्कूली पाठ्यक्रम मा एक भाषा के रूप मा छत्तीसगढ़ी ला अनिवार्य करे। अइसन करे ले छत्तीसगढ़ी बर एक वातावरण तैयार होही। शहर मा घलो हीनता के भाव खतम होही। छत्तीसगढ़ी ला रोजगार मूलक बनावय। रोजगार बर पलायन, भाषा के नँदाए के एक बहुत बड़े कारण आय। इहाँ के प्रतिभा ला इहें रोजगार मिल जाही तो वो दूसर देश या प्रदेश काबर जाही? छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार, लोक कलाकार ला उचित सम्मान देवय, उनकर आर्थिक विकास बर सार्थक योजना बनावय।


छत्तीसगढ़ी भाव-सम्प्रेषण बर बहुत सम्पन्न भाषा आय। हमन ला एला सँवारना चाही। अनगढ़ता, अस्मिता के पहचान नइ होवय। भाषा के रूप अलग-अलग होथे। बोलचाल के भाषा के रूप अलग होथे, सरकारी कामकाज के भाषा के रूप अलग होथे अउ साहित्य के भाषा के रूप अलग होथे। बोलचाल बर अउ साहित्यिक सिरजन बर मानकीकरण के जरूरत नइ पड़य, इहाँ भाषा स्वतंत्र रहिथे फेर सरकारी कामकाज बर भाषा के मानकीकरण अनिवार्य होथे। मानकीकरण के काम बर घलो ज्यादा विद्वता के जरूरत नइये, भाषा के जमीनी कार्यकर्ता, साहित्यकार मन घलो मानकीकरण करे बर सक्षम हें।


छत्तीसगढ़ मा अब छत्तीसगढ़िया सरकार आए ले हमर उम्मीद घलो बाढ़ गेहे। हमर उम्मीद नवा सरकार ले ज्यादा रही। सरकार छत्तीसगढ़ी बर जो कुछ भी करही वो एक सहयोग रही लेकिन छत्तीसगढ़ी ला समृद्ध करे के अउ जिन्दा रखे के जवाबदारी असली मा छत्तीसगढ़िया मन के रही। यहू ला झन भुलावव कि जब भाषा मरथे तब भाषा के संगेसंग संस्कृति घलो मर जाथे।


“स्वाभिमान जगावव, छत्तीसगढ़ी मा गोठियावव”


*लेखक - अरुण कुमार निगम*

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Sunday, 14 February 2021

सुरता-सुशील भोले


 सुरता

छत्तीसगढ़ी सांचा म पगे साहित्यकार टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा

   छत्तीसगढ़ी साहित्य के बढ़वार म जेकर मन के नांव आगू के डांड़ म गिने जाथे, वोमा टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा के नांव अगुवा के रूप म चिन्हारी करे जाथे. उंकर नाटककार के रूप म सबले जादा चिन्हारी हे, काबर ते उन हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी म सैकड़ों नाटक लिखिन. फेर कविता, कहानी, व्यंग्य लेखन म घलो उंकर वतकेच योगदान हे, जतका नाटक विधा म हे. 

   एकर मन के छोड़े एक अइसे लेखन के मैं विशेष रूप ले इहाँ चर्चा करना चाहथंव, जेकर कोनो साहित्यिक चर्चा म उल्लेख नइ करे जावय. वो आय, एक हिन्दी के दैनिक अखबार म छत्तीसगढ़ी म सरलग कतकों बछर ले संपादकीय लिखना. 

   1 नवंबर सन् 2000 के जेन दिन अलग छत्तीसगढ़ राज के घोषणा होइस, उहिच दिन ले उन दैनिक अग्रदूत म छत्तीसगढ़ी म संपादकीय लिखे के चालू कर देइन. वो बखत अग्रदूत प्रेस म संपादकीय लिखे के बुता ल उही मन करत रिहिन हें. उन रोज दू संपादकीय लिखंय, एक राष्ट्रीय स्तर के मुद्दा ऊपर जेला उन हिन्दी म लिखंय, अउ एक क्षेत्रीय स्तर के मुद्दा म जेला उन छत्तीसगढ़ी म लिखंय. अइसन ऐतिहासिक बुता आज तक अउ कोनो आने साहित्यकार मन अभी तक नइ कर पाए हें.

     1 फरवरी सन् 1926 म दुरुग जिला के गाँव लिमतरा के शिक्षक पिता श्यामलाल जी के घर जन्मे टिकेन्द्रनाथ जी लइकई च ले पढ़ाकू अउ होशियार रहिन. उन पहिली खाद्य विभाग म सरकारी अधिकारी रिहिन. फेर वोला छोड़के लेखन (पत्रकारिता) ल अपन रोजगार के माध्यम बना लेइन. इही नवा रोजगार के ठीहा म मोर भेंट उंकर संग होइस दैनिक अग्रदूत प्रेस म. नवा नवा मैं अग्रदूत म सन् 1982 के आखिर म  काम करे (सीखे खातिर कहना जादा ठीक रइही) गे राहंव, वो बखत अग्रदूत ह साप्ताहिक निकलय, दू-चार महीना के पाछू सन 1983 म वो ह दैनिक होइस. तब महूं अलवा जलवा दू चार लाईन लिखे के उदिम करत रहंव अउ उहाँ के साहित्यिक संपादक, जेन अंचल के प्रसिद्ध व्यंग्यकार घलोक रिहिन आदरणीय विनोद शंकर शुक्ल जी, उनला देखावंव. उन वोमा कुछ जोड़ सुधार के छाप देवंय. मैं गदगद हो जावंव. 

  विनोद शंकर शुक्ल जी अउ मैं अग्रदूत प्रेस के ऊपर मंजिल म बइठन, तेकर सेती टिकरिहा जी संग मोर खास पहचान नइ हो पाए रिहिसे. काबर ते वोमन नीचे के कमरा म बइठंय. तब उहाँ संपादकीय आदरणीय स्वराज प्रसाद त्रिवेदी जी लिखंय. उन मोर साहित्यिक अभिरुचि ल देख के भारी मया करंय. एक दिन त्रिवेदी जी के कुरिया म बइठे रेहेंव, तभे खादी के झक कुरता पैजामा पहिर पातर देंह के सियान उहाँ आइन अउ त्रिवेदी जी ल अपन लिखे कागज ल देखाइन. त्रिवेदी जी वोमन ल कुर्सी म बइठे बर कहिन. अउ मोर डहर देख के पूछिन, तैं एमन ल जानथस का? त्रिवेदी जी मोर संग छत्तीसगढ़ी म गोठियाए के कोशिश करंय. तब तक मैं सिरतोन म टिकरिहा जी संग विशेष परिचित नइ होए रेहेंव. तब त्रिवेदी जी बताइन के ये छत्तीसगढ़ी के बड़का साहित्यकार टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी आंय. मैं जोहार पैलगी करेंव. 

   बाद म तो तहाँ ले रोज जोहार पैलगी होवय. फेर नीचे के कमरा म बइठंय तेकर सेती जादा गोठ बात नइ हो पावय. कुछ दिन के बाद अग्रदूत के भोपाल संस्करण चालू होइस, अउ आदरणीय स्वराज प्रसाद त्रिवेदी जी ल संपादक बना के भोपाल भेज दिए गइस, तेकर बाद फेर संपादकीय लिखे के जवाबदारी टिकरिहा जी के ऊपर आगे, तब टिकरिहा जी के ऊपर के संंपादकीय कमरा म अवई बाढ़गे, अउ एकरे संग मोरो उंकर संग मेल जोल अउ गोठ बात बाढ़गे. हमन एके समाज के होए के सेती घर परिवार गाँव गंवई के घलो गोठ करे लगेन. उंकर हांडीपारा वाले घर आना जाना करे लगेंव, उहू मन मोर संजय नगर वाले घर पधारिन. इही बीच उन मोला छत्तीसगढ़ी म लेखन करे खातिर प्रेरित करे लागिन. तब मैं हिन्दी म ही अलवा जलवा लिखत रेहेंव. उन बताइन के उहू मन पहिली हिन्दी म ही जादा लिखंय. बाद म डा. खूबचंद बघेल के प्रेरणा ले छत्तीसगढ़ी म सरलग लिखे के चालू करिन. उन बतावंय के डा. खूबचंद बघेल उंकर हांडीपारा वाले घर म आवंय, अउ उंकर सियान संग बइठ के छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी के संबंध म गोठ बात करंय. मैं वोमन ल ध्यान लगाके सुनंव. रायपुर के तात्यापारा वाले कुर्मी बोर्डिंग वो बखत स्वाधीनता आन्दोलन अउ वोकर बाद छत्तीसगढ़ राज आन्दोलनकारी मन के एक प्रकार के ठीहा रिहिस, जिहां सब जुरियावंय अउ आन्दोलन ल कइसे गति दिए जाय, एकर ऊपर चर्चा करंय.

  टिकरिहा जी बतावंय के उहू मन एकर मन के चर्चा म शामिल होवय. उंकर घर उहिच तीर हे, तेकर सेती आए जाए म सोहलियत परय. वोकरे मन के संगत के सेती मोर छत्तीसगढ़ी म छोटे छोटे नाटक लिखे के चलन बाढ़िस, अइसे बतावंय. छत्तीसगढ़ के दुख पीरा, समस्या, समाजिक असमानता जम्मो डहर कलम रेंगे लागिस.

   मोला उन साप्ताहिक अग्रदूत के जुन्ना फाइल मन ल घलो देखावंय. वोमा के हर अंक म टिकरिहा जी के कहानी, नाटक, व्यंग्य या कविता आदि कुछू न कुछू जरूर छपे राहय, अइसे एको अंक नइ राहय, जेमा टिकरिहा जी के रचना नइ राहत रिहिस होही. वोमन एक छत्तीसगढ़ी फिल्म 'मयारु भौजी' म कथा, पटकथा अउ संवाद लेखन घलो करे रिहिन.

    टिकरिहा जी भारी संकोची स्वभाव के घलो रिहिन. उन लिखंय पढ़य तो अबड़, फेर कोनो कार्यक्रम म खासकर के मंच म जवई ल भावत नइ रिहिन. महूं ल कई बखत काहय- गोष्ठी फोष्ठी म झन जाए कर समय के बर्बादी भर आय कहिके. हाँ उन आकाशवाणी जरूर जावंय. उहाँ ले उंकर कहानी अउ नाटक बहुत प्रसारित होवय. वोकर मन के कहे म महूं एक पइत अपन तीन चार छत्तीसगढ़ी कविता ल लिफाफा म भर के आकाशवाणी भेज देंव. थोरके दिन म उहाँ ले मोर जगा चिट्ठी आगे, के फलाना दिन तोर कविता के प्रसारण होही अतका बजे तैं आकाशवाणी पहुँच जाबे कहिके.

   वो बखत आकाशवाणी रायपुर के रतिहा प्रसारित होवइया चौपाल कार्यक्रम म छत्तीसगढ़ी कविता, कहानी आदि के प्रसारण घलो होवय. उहाँ बरसाती भैया (केशरी प्रसाद वाजपेयी जी), गुमान सिंह जी आदि चौपाल के उद्घोषक अउ प्रस्तुतकर्ता रहिन. मोला प्रसारण कमरा म उन अपन संग लेगिन. कार्यक्रम चालू होइस. बीच म मोला कविता पाठ खातिर आमंत्रित करिन. तब कार्यक्रम के सीधा प्रसारण होवय. तुमन बोलत जावव, अउ वोती प्रसारित होवत जाही. अब  तो पहिली ले  रिकार्डिंग कर लेथें, तेकर बाद फेर पाछू प्रसारित करथें.

   टिकरिहा जी ककरो कार्यक्रम म भले नइ जावत रिहिन हें, फेर मोर दू बड़का कार्यक्रम म उन जरूर गेइन. पहिली बार मोर द्वारा प्रकाशित संपादित छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन जेकर 9 दिसंबर 1987 के कुर्मी बोर्डिंग रायपुर म विमोचन होए रिहिसे. अउ दूसर मोर पहिली आडियो कैसेट 'लहर' के विमोचन जेन कुर्मी समाज के महाधिवेशन जेन पाटन क्षेत्र म होए रिहिसे उहाँ. वइसे उंकर घर ले दू कदम के दुरिहा म छत्तीसगढ़ी समाज कार्यालय म घलो हमर मन के साहित्यिक बइठकी, जेन साप्ताहिक छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी के संयोजन म होवय, तेनो म संघर जावंय, फेर उन सिरिफ श्रोता के भूमिका म रहंय.

   टिकरिहा जी वइसे तो छोटे बड़े सैकड़ा भर के पुरती नाटक लिखिन, वोमा दू चार बड़का नाटक घलो रिहिस. हमन उंकर एक बड़का नाटक 'गंवइहा' के मंचन रायपुर के रंगमंदिर म 1 जनवरी 1991 म करे रेहेन. पूरा तीन घंटा के प्ले रिहिसे. एला लोगन के भारी तारीफ मिलिस, त पाछू फेर भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित लोक कला महोत्सव म घलो प्रस्तुत करे रेहेन. 

   गंवइहा नाटक के निर्देशन ल राधेश्याम बघेल अउ राकेश चंद्रवंशी करे रिहिन, एकर मुख्य संयोजक रिहिस पूरन सिंह बैस जी. ए नाटक के जम्मो गीत मनला मैं लिखे रेहेंव, जेला बोरिया गाँव के कलाकार संगवारी गोविन्द धनगर, जगतराम यादव, खुमान साव आदि मन के संग मिलके संगीत बद्ध घलो करे रेहेन. एकर मुख्य पात्र म राधेश्याम बघेल, विष्णु बघेल, पूरन सिंह बैस, हरिश सिंह, संदीप परगनिहा, इंद्रकुमार चंद्रवंशी, अमित बघेल, राकेश वर्मा,   मंजू, अंजू टिकरिहा, चंद्रकांता टिकरिहा, रमादत्त जोशी, टाकेश्वरी परगनिहा, साधना महावादी आदि बहुत झन कलाकार साथी रिहिन. ' गंवइहा' के रंगमंदिर म मंचन के पाछू इही मंच म आदरणीय टिकरिहा जी के आयोजन समिति डहार ले सम्मान करे गिस. मोर सौभाग्य आय के उंकर स्वागत थारी ल धरे के मुही ल अवसर मिलिस.

   7 अक्टूबर सन् 2004 के दिन ल मैं अपन जिनगी म कभू नइ भुलावंव. तब मैं प्रेस के काम ल छोड़ के अपन खुद के रिकार्डिंग स्टूडियो चलावत राहंव. दिन भर इहें बइठंव, काबर ते चारों मुड़ा के कलाकार अउ साहित्यकार मन इहें मोर जगा आ जावंय, त मोला ककरो संग भेंट करे बर कहूँ जाए के जरूरते नइ परय. फेर वो दिन जाने कइसे मोला अपन स्टूडियो म बइठे के मने नइ होइस. तेकर सेती मैं उठाएंव गाड़ी अउ शहर कोती रेंग देंव. अचानक  अग्रदूत प्रेस जाए के मन होइस, गुनेंव अबड़ दिन होगे हे, वोती गे, चलो जुन्ना संगवारी मन संग भेंट कर लिया जाए.

   मैं सीधा अग्रदूत प्रेस जेन वो बखत मालवीय रोड म रिहिस उहाँ चल दिएंव. अंदर घुसरेंव त उहाँ के केशियर वर्मा जी तीर ठाढ़ हो गेंव. तब उन बताइन के टिकरिहा जी तो अब हमर बीच म नइ रिहिन. मैं कइसे गोठ करथव वर्मा जी कहेंव, त उन बताइन, अभी मुकेश के फोन आए रिहिसे. मुकेश, टिकरिहा जी के छोटे मंझला बेटा आय, वो बखत उहू ह अग्रदूत प्रेस म काम करत राहय. 

 वर्मा जी मोला कहिस के मैं मुकेश ल बोल दे हंव अंतिम संस्कार के पूरा व्यवस्था प्रेस डहार ले होही, तुमन कुछू लेहू झन कहिके.  वर्मा जी (तब वोमन घलो मोला वर्मा जी ही काहंय) तुमन बांस टाल जावव न उहाँ अंतिम संस्कार के जम्मो समान मिल जाथे, वोला ले के रिक्शा म जोर के हांडीपारा उंकर घर अमरा देवव. 

   मैं वर्मा जी के प्रेस डहार ले दे पइसा ल धरेंव अउ बांस टाल चल देंव. वोती वर्मा जी ह मुकेश ल बता दे राहय के सुशील वर्मा (भोले) ह अंतिम संस्कार के सब समान लेके आवत हे, तुमन बाकी सब तैयारी ल कर के राखव. मैं सब समान ल धर के हांडीपारा वाला घर  पहुंचेंव तब तक जम्मो नता रिश्ता अउ शहर के जम्मो पत्रकार साहित्यकार मन उहाँ पहुँचगे राहंय. तहाँ उनला अंतिम बिदागरी दे के काम चालू होगे.

   ए कइसे अजीब संयोग आय के जे आदरणीय टिकरिहा जी मोला छत्तीसगढ़ी लेखन खातिर रद्दा बताइन, उंकरे अंतिम बिदागरी के समान ल मैं अपन हाथ ले लेके गेंव. उंकर सुरता ल सादर नमन.. दंडासरन पैलगी.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

पुरखा साहित्यकार के सुरता*-अरुण कुमार निगम*


 

*पुरखा साहित्यकार के सुरता*-अरुण कुमार निगम*


 *श्री रघुवीर अग्रवाल "पथिक"* 


पथिक जी के जनम जन्म 4 अगस्त 1937 के ग्राम मोहबट्टा मा होइस। इनकर पिताजी के नाम नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, माता जी के नाम अरुंधति देवी अग्रवाल अउ धर्मपत्नी के नाम निरूपण अग्रवाल हे।

 पथिक जी हिंदी और अर्थशास्त्र मा एम. ए. करे रहिन। उन मन  "साहित्य रत्न" के परीक्षा घलो पास करे रहिन। 

बी.एड. करे के बाद दुर्ग अउ विद्यालय मा अध्यापन के कार्य करिन। अगस्त 1995 मा बीएसपी कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला सेक्टर 2 भिलाई ले वरिष्ठ उप प्राचार्य के रूप में सेवानिवृत्त होए रहिन। पथिक जी 15 फरवरी 2020 के हम सब ला छोड़ के ब्रह्मलीन होगिन।


पथिक जी सन 1956 ले लेखन प्रारंभ करे रहिन। अनेक कविसम्मेलन के मंच मा आप काव्य पाठ करे रहेव। दूरदर्शन अउ आकाशवाणी ले अनेक कविता प्रसारित होए रहिन। राष्ट्रीय प्रादेशिक अउ क्षेत्रीय पत्र-पत्रिका मन मा आपके रचना प्रकाशित होवत रहिन। कई काव्य संग्रह में रचनाएं संग्रहित।


पथिक जी के पहिली हिन्दी काव्य संग्रह "जले रक्त से दीप" 1970 मा प्रकाशित होए रहिस।  छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "उजियारा बगरावत चल" 2004 अउ 2009 मा प्रकाशित होइस। "काव्य यात्रा के 50 वर्ष" नाम के समीक्षात्मक पुस्तक 2011 मा प्रकाशित होइस। तेकर बाद "आही नवा अंजोर" नाम के  छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह 2015 मा प्रकाशित होइस। 


उत्कृष्ट लेखन बर पथिक जी ला अनेक संस्था मन सम्मानित करे रहिन। जइसे - 

प्रयास प्रकाशन एवं जिला छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति बिलासपुर द्वारा साहित्य सम्मान 2004 

अधिक सम्मान छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायपुर 2008 

नारायण लाल परमार सम्मान धमतरी द्वारा प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर 2010 छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग द्वारा जगदलपुर में साहित्य सम्मान 2010 दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति दुर्ग द्वारा आदर्श शिक्षक सम्मान 1999 एवं हिंदी दिवस पर शब्द साधक सम्मान 2001 सामुदायिक विकास विभाग भिलाई स्टील प्लांट भिलाई द्वारा साहित्य सम्मान 2002 स्टेट बैंक आफ इंडिया मुख्य शाखा दुर्ग द्वारा राजहरा सम्मान 2002 गायत्री प्रज्ञा पीठ आश्रम पुलगांव दुर्ग द्वारा प्रज्ञा प्रतिभा सम्मान 2010 गांधी विचार यात्रा के अंतर्गत ग्राम पारा में साहित्यिक सम्मान 2002 निवास शिक्षक नगर चिन्हारी सम्मान छत्तीसगढ़ साहित्य समिति दुर्ग द्वारा 2012 हीरालाल का उपाध्याय सम्मान रायपुर में सितंबर 2012


रघुवीर अग्रवाल "पथिक" जी के हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी भाषा ऊपर समान अधिकार रहिस। उँकर हिन्दी काव्य-संग्रह के कुछ पंक्ति मा उँकर शैली अउ श्रेष्ठता के सुग्घर परिचय मिल जाथे -   


जलें रक्त से दीप उठे ,बलिदानों की आरती।

उठो जवानो आज देश की धरती तुम्हें पुकारती ।।

(कविता - जलें रक्त से दीप के अंश)

 

हर सुबह यही लिखता सूरज का उजियारा 

संदेश सुनाता यही रात को हर तारा।

भारत का है कश्मीर सिर्फ भारत का है

लो घूम घूमकर पवन लगाता है नारा।

(कविता - अंगार उगलने लगी सुबह की लाली भी, के अंश) 


नौजवानों फिर हमें दी है चुनौती दुश्मनों ने 

फिर दिखा देंगे उन्हें क्या शौर्य है तूफान का 

मर मिटेंगे पर न देंगे हम कभी कश्मीर उनको 

जान ले संसार ही संकल्प हिंदुस्तान का 

(कविता - संकल्प हिंदुस्तान का, के अंश) 


*मुक्तक*


पसीने से लिखो साथी नए युग की कहानी 

दफन कर दो क्षमता की सभी बातें पुरानी 

हमारा देश मांगे रक्त या श्रम हम उसे देंगे 

बढ़ो आगे कहीं कल तक न ढल जाए जवानी ।।


*मुक्तक*


क्या पार हमारे भारत से टकराएगा 

क्या अंधकार सूरज से आँख मिलाएगा 

पाकिस्तानी शासन की अर्थी पर बैठे 

भुट्टो साहब क्या ढोलक रोज बजाएगा।।


रघुवीर अग्रवाल "पथिक" जी चार डाँड़ के मुक्तक असन कविता खूब करंय। उनकर पड़ोस मा कोदूराम "दलित" जी के निवास रहिस। दलित जी उँकर चार डाँड़ के कविता ला "चारगोड़िया" नाम दे रहिन। पथिक जी ला छत्तीसगढ़ी-चारगोड़िया के प्रवर्तक माने जाथे। छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "उजियारा बगरावत चल" ले एक चरगोड़िया - 


*छत्तीसगढ़ी चारगोड़िया*


एक जन्म के नाता ला तुम टोरौ झन

सुनता के सुग्घर बँधना ला छोरो झन

बसे बसाई अपन देसला फोरो झन

बिख महुरा अलगाववाद के घोरव झन।


*छत्तीसगढ़ी दोहा* - 


राजनीति ल देख लौ, आजादी के बाद

संसद म टूटत हवै, संसद के मरयाद।।


ये मंदिर कानून के, बनिस अखाड़ा आज

मल्ल युद्ध नेता करें, देखे सकल समाज।।


हंगामा के होत हे, संसद म बरसात

धक्का मुक्की तो उहाँ, हे मामूली बात


*छत्तीसगढ़ी गजल*


गाँव सो कर मया दुलार संगी

गाँव चल देख खेतखार संगी।

देख आमा बगइचा के शोभा

धान के खेत कोठार संगी।। 

तैं गरीबी अउ अशिक्षा ला

देखबे गांव म हमार संगी।


*छत्तीसगढ़ी कविता*


कुर्सी फेंक, माइक टोर

अउ ककरो मूड़ी ल फोर

राजनीति म रोटी सेंक

पद अउ पइसा दुनों बटोर।

अतको म नइ काम बनय तौ

कालिख पोत दाँत निपोर

इही असीम ले हमर देश मा

जल्दी आही नवा अँजोर।


 आज पहिली पुण्यतिथि मा  आदरणीय रघुवीर अग्रवाल "पथिक" जी ला छत्तीसगढ़ी लोकक्षर परिवार के श्रद्धांजलि


*आलेख - अरुण कुमार निगम*

Saturday, 13 February 2021

कहिनी : बिसाहिन दाई*-पोखनलाल जायसवाल

 *कहिनी : बिसाहिन दाई*-पोखनलाल जायसवाल

         रायपुर के रक्सेल मुड़ा म तरिया पार म बसे एक ठन गाँव हे। आमा अउ पीपर के जुड़ छाँव तरी घाम पियास नि जियानय। नाहर के पझरा ले निकले नरवा गाँव बर बरदान बने हे। नाहर भरोसा ए गाँव कभू अकाल दुकाल नि जानिस। खेती किसानी सबो मन लगा करथे। मनखे मन बिहनिया बेरा सुत उठ के तरियाच म मुँह धोवत राम-राम करथे। तरिया पार म बसे ले काकर घर पहुना आवत हे, अउ कोन बन-ठन के बाहिर जावत हे, एकर घर मुँहाटी चउँरा म बइठे सोर मिल जथे। ए गाँव म लटपट डेढ़ सौ चूल्हा होही। जिहाँ मनखे मन म कोनो परकार के भेद भाव नइ हे। राजनीति के नाँव ले घलो अभी बँटे नइ हे। पंचइत चुनाव निर्विरोध हो जथे। लोकसभा अउ विधानसभा के चुनाव म सियान मन नवा अउ उत्साही लइका मन सिखौना देवत कहिथें - " ए नेता मन चुनाव के होवत ले आपस म लड़थे, इँखर लड़ई देखउटी आय। नेता मन ल हाथी के दाँत जानौ, खाय के आने अउ दिखाय के आने। हमन ल इँखर चाल म नइ फँसना हे। हम ल ए पार्टी ओ पार्टी के चक्कर म नइ पड़ना हे।" 

     कोनो अउ कहिथें - " हम ल आपस म बँटना घलो नइ हे। हमर कोनहो सुख अउ दुख के बेरा म कोनो बाहिर वाला आके खड़ा नइ होवय। हमीं मन एक-दूसर के दुख ल बाँटबो अउ सुख म अँगना नाचबो घलव। चुनाव जीते ऊपर ले नेता मन मुँहूँ दिखाय तको नइ आवै। दर्शन दुर्लभ हो जथे। चिह्नै घलव नइ। अपन वोट कोनो ल देवव, फेर गाँव ल मया परेम के छाँव अउ ठाँव बने गाँव रहन देहू। राजनीति के अखाड़ा झन बनन देहू।" 

       गाँव म सियान मन के बड़ मान हवय। नवा पीढ़ी के लइका मन घलो उँखर गोठ ल धियान देके सुनथें अउ मानथें घलो। गाँव म बड़ सुमता देखे मिलथे। दुखिया मन ल गम नइ मिले, कइसे दुख के काम निकल जथे। काकरो बेटी के बिदा होय, गाँव भर मिलके पहुना के पाँव पखारथें, दू बीजा चाउँर टीकके बेटी बिदा करथें।

        गाँव म नोनी-बाबू म फरक करइया घलो देखे ल नइ मिलय। अतका जरूर हे, नोनी मन ल कहिथे बताथे, तुमन सादा कपड़ा सरीख आव। अपन ऊपर कोनो दाग लगन झन देहू। बहुत अकन लोकलाज अपने हाथ म रहिथे। बचा के राखहू त दाई-ददा संग गाँव के मान मर्यादा बाँचे रही। बाबू मन ल नशा-पानी ले बाँचे के सीख देथे। उन ल बताय जाथे कि नशा नाश के जर होथे। नशा घर दुआर म कलहा के बीजा बोथे। एकर ले बाँचे म ही जिनगी म सुखेच सुख हवय, एला जान लेवव। ए तरह ले घरोघर नैतिक शिक्षा दे जाथे। इही बात मन रहिस जउन गाँव ल सुमता के गाँव के चिन्हारी दे राहय।

       बिन नारी परानी के दुकलहा घर एकसरविन बहू के पीरा उठ गे रहिस। पहिली पहिलावत रहिस। बहू बिचारी पीरा मं तालाबेली करत राहँय। बिसाहिन दाई ह आने गाँव गे रहिन, तेन अभीच अपन घर पहुँचे राहँय। उही बिसाहिन दाई जेन ल गाँव भर जचकी बखत बुलाय जाथे। दुकलहा के बेटा पइत घलो इही बिसाहिन दाई ह आय रहिस हे। जचकी के दिन ले सरलग कई-कई दिन तक बिसाहिन दाई सेवा बजाथे। सँझा-बिहनिया दूनो बेरा लइका अउ महतारी के सेवा करथे। कोनो ल बिसाहिन दाई ले कभू कोनो शिकायत नइ होइस। बिसाहिन दाई घलो सबो घर हरहिंछा आवय-जावय। ओकरो मन कभू छोट नइ होइस। बरोबर गोरस नइ आय ले महतारी बर जड़ी-बूटी घलो देवय। कतको झन ल एकर फायदा मिले हवय। तभे तो अड़ताफ भर ले आय दिन कोनो न कोनो ओकर घर आत्ते रहिथे। सरपंची बर महिला आरक्षण आय रहे म गाँव भर के मन निर्बिरोध सरपंच बनाना चाहीन, फेर बिसाहिन दाई कहिन " मैं अप्पड़ का सरपंची करहूँ, मोला इही म मजा आवत हे, जचकी करावत मोला सेवा करन दव।" 

         अभी घर म पाँव बरोबर माढ़े नइ पाय रहिस, बहू के देह उसलगे सुनके बिसाहिन दाई उत्ता-धुर्रा दुकलहा घर पहुँच गिस। बहू नोनी ल देखतेच खानी कहिथे, देखे के बेरा नइ हे। एला जतका जल्दी होय अस्पताल लेगे बर परही। लइका ह थोरकुन उलट गे हे कस जनावत हे। जचकी के बेरा आ घलव गे हे। धरा-पसरा गाड़ी मँगाके, बिना कोनो देरी के बहू ल तिर के सरकारी अस्पताल लेगे गिस। बहू मुँधरहा के उठे पीरा ले लरघिया गे रहिस। महतारी अउ सास के मया ल तरसत बपुरी ह अपन गोठ काखर मेर कहितिस। ताकत नइ लगा पात रहिस बपुरी ह। अस्पताल के डॉक्टरिन मैडम जाँच करे के पाछू तुरते ऑपरेशन करके जच्चा अउ बच्चा ल बचालिस। ऑपरेशन के बाद मैडम बोलिस - "अच्छा हुआ समय रहते यहाँ पहुँच गये, वरना थोड़ी देरी होती तो जच्चा-बच्चा दोनों को खतरा हो सकता था। फिलहाल दोनों स्वस्थ हैं।" 

        दुकलहा अतका सुनके बिसाहिन दाई अउ भगवान ल बार बार धन्यवाद दे लगिस। बिसाहिन दाई ल कहिस, "भउजी! तोरे रहिते आज मैं ह अपन बहू अउ नाती के मुख ल देख पात हँव।"

    बिसाहिन दाई कहिस, "नहीं बाबू! मोर तो कामेच आय सेवा। मैं  जचकी दाई हरँव, जच्चा अउ बच्चा बर सोचना मोर काम हरे। दूनो ल कोनो नुकसान झन होवै। इही तो मैं चाहथँव। मोला लागिस कि घर म रहना खतरा हे, मोर बस के बात नइ हे, ते पाय के इहाँ लाने बर कहेंव।"

      सिरतोन भउजी! तोर हाथ म जस हवय। आज तक तोर राहत ले गाँव ह कभू कोनो धोखा नी खाय हे। तोर रहिते गाँव के बहू-बेटी मन कोनो तकलीफ नइ पाय हे। 

        बाबू गोठियातेच रहिबे धन हमर देरानी के स्वागत म फटाका फोरबे। तोर घर म लछमी ह लहुट के आय हे। 

            मैं फटाका भर नि फोरँव भउजी!  मिठई घलो बँटवाहूँ, मोर लछमी के स्वागत मं। सही मं मोर लछमी मोर तीर लहुट के आय हे, काहत दुकलहा के आँखी भर जथे। दुकलहा समझ नि पाय ए आँसू का के हरे?

        

      पोखन लाल जायसवाल

पलारी बलौदाबाजार छग.

व्यंग्य -मथुरा प्रसाद वर्मा गुरुजी

 व्यंग्य -मथुरा प्रसाद वर्मा

गुरुजी


एक जगा दु झन गुरुजी मन गोठियावत रहय। गोठियातीन का?  अपन दुखड़ा रोवत रहय। कोरोना काल म बंद परे स्कूल अउ लइका मन के गिरत  शिक्षा स्तर ऊपर चर्चा होवत रहय। एक झन लइका ओती ले नाहकिस त " नमस्ते सर!  कहिस। फेर का हे चर्चा के विषय बदलेगे। गुरु जी राम राम!  जय हिंद गुरुजी! सुन के जे आनन्द आथे नमस्ते सर ! गुड़ मार्निग सर! म वो आनन्द कहाँ। 

   सुन के महुँ सोच म परगेव । गुरु के महिमा के बखान वेद पुरान म तको पढ़े-सुने बर मिलथे । तुलसी, सुर, कबीर जइसे बड़े बड़े कवि मन घलो बढ़चढ़ के गुरु महिमा के गुणगान करे हे। सुन सुन के मन गदगद हो जाथे। फेर आज के दौर म न अइसन गुरु मिलथे न चेला। आज कल तो गुरुजी मन के ऊपर किसम किस्म के चुटकिला घलो चलथे । मीडिया, पत्रकार अधिकारी सब इखरे पाछु लगे हे तइसे लागथे। अउ तो अउ  अनपढ़ नेता कहूँ पंच/सरपंच बन गे त ओहू  मन गुरुजी ल देख के अटियथे। कहूँ राम राम कहे बर भुलाइस तहाँन उखर ऐड़ी के रिस  तरुवा म चघ जथे। पहुंच जथे स्कूल। शुरू हो जथे जाँच पड़ताल। पहिली जाँच होथे मध्यान्ह भोजन के। ओखर बाद शौचालय अउ पानी के जाँच। ओमा कुछु नइ मिलिस तब लइका मन ले पाहड़ा , वर्णमाला, अंग्रेजी के इस्पेलिंग। कक्षा म कोनो लइका कमजोर मिलिस कि गुरुजी मन के खैर नहीं। कोनो भी ऐरे गैर नत्थू खेरे गुरुजी के पुरखा सुरता कराए म पाछु नइ रहय। बिचारा गुरुजी करय त करय का?/ काकर काकर जवाब देवय। अउ जब ले तनखा बढे हे तब ले गुरुजी लोगन के नजर म काँटा सही खटखट रहिथे। सब ल लगथे गुरुजी मन फोकट के तनखा लेवत हे। बइठे बइठे दिन पहावत हे। अउ तो अउ गुरुजी मन के हाथ के मोबाइल अउ फटफटी तो लोगन ल फूटे आँखी नइ सुहाय। कुल मिला के सबके कोप भाजन के अधिकारी इही मन हरय। 

    अइसे नइ हे कि गुरुजी मन के एमा कोनो दोष नइ हे। उखर मान सम्मान म आये कमी के लिए वो मन घलो ओतके  जिम्मेदार हे जातक समाज अउ सरकार। आज कल किसम किसम के गुरुजी हो गे हवय । जइसे जेखर करम तइसे तइसे मान गुन होवत रहिथे। मँय सोचथंव गुरुजी मन के घलो क्लासिफिकेशन होना चाही। अपन बुद्धि म जोर डारेंव त कई प्रकार के गुरुजी नजर आइन , कहूँ लोकल बाड़ी माने शिक्षाकर्मी ले बने गुरुजी। त कहूँ स्पेशल बाड़ी वाला जुन्ना गुरुजी। कहूँ ठेका गुरुजी माने संविदा शिक्षक । ये सब तो शासन के बनाये गुरुजी मन के प्रकार होगे। सबे के योग्यता अउ काम एके हे। काम के आधार म मोला मुख्य रूप से चार किसम के गुरुजी दिखथे। गुरुजी, गुरजी, गरु जी अउ गरूरजी। 

    अब आप मन जइसे बुद्धिजीवी मन ल ऐखर बारे में विस्तार से बताये के जरूरत तो नइ हे तब ले बात जे शुरू होय हे खतम तो करे बर परही। 

   पहिली प्रकार  हे *गुरुजी*  एखर बारे मे मँय का बतावव वेद शास्त्र म एखर बारे मा बहुत कुछु बताये गे हे। हर चेला ल अइसने गुरु के अगोरा रहिथे। इखरे खोज बर कवि कहे हे पानी पिवव छान के गुरु बनावव जान के। जेन ल जीवन म अइसन सद्गुरु मिल गे ओखर जीवन सफल होगे।  एखर महिमा के बखान यदा कदा गुरुजी मन खुदे कर कर के अपन भाव बढ़ाये के प्रयास करथे। फेर ये प्रकार के गुरुजी साल म केवल एक दिन शिक्षक दिवस के नजर आथे सब ल। ओखर बाद कोनजनि कहाँ नंदा जथे।

        दूसर प्रकार हे *गुरजी* जिसे नाँव तइसे काम। ये गुरुजी मन बढ़ मीठे मीठ गोठियाठे। थूके थूक म लाडू बाँध के सब ला खवाथे। नेता, अथिकारी, लइका सब के मन ल मोह के रखथे। ते पाय के कोनो इखरे शिकायत कभू नइ करे। भले वो कभू कभू आथे। कभू देरी ले आथे अउ जल्दी चल घलो देथे फेर का मजाल हे काखरो की कभू कोनो आँखी तरेर के देख घलो सकय। सबल रोज रामराम, नमस्ते करथे कोनो कोनो तो नेता अधिकारी अउ गाँव के दबंग मनखे मन के पाँव परे म घलो परहेज नइ करय। अतका विनम्र गुरुजी कोन ल नइ भाही। का होगे अपन विषय के बारे मा कुछु नइ जानय फेर लइका मन कभू नइ टोंकय। लइका स्कूल आय झन आय। पढ़य झन पढ़य। कतको उदबिरिस कर लय। अनुशासन बनाना तो हेडमास्टर के काम हरे कहिके पल्ला झाड़ लेथे। 

            तीसर हरे *गरुजी* ये बिचारा किसम के गुरुजी होथे। इखर कोनो नइ सुनय। ये मन सब के चुपचाप सुन लेथे । सियान मन इखरे बर कहे हे 'जे सुनते तेकर बनथे'। ये मन मन्दिर के घण्टी कस होथे जे आथे बजा के चल देथे।  बइठ त बइठ  गे खड़े हे त खड़हेच रही गे। कोनो आवथे कोनो जावत हे। सब देखत हे फेर कोनो ल कुछु नइ कहना हे। अपन काम म मगन हे। पढ़ावत हे त पढ़ावत हे कोनो लइका पढ़त हे तभो ठीक नइ पढ़त हे तभो ठीक । कोनो कोनो लइका हल्ला करत हे कोनो शरारत करत हे बिचारा सब ल सहत हे। हाजरी ले बर मुड़ी गाड़िया दिस त मुहँ ऊँचा देखनाच नइ हे;  काकर हाजरी कोन बोलत हे। ये बिचारा दर्द के मारा। इन्हें चाहिये हमदर्द का टॉनिक ...। अइसे किसम के।

          इखरे ले अलग एक अउ किसम के गुरुजी होथे। *गरूरजी* आज कल इखर संख्या बहुत बढ़त जावत हे। ये मन अपन आप ला भारी विद्वान समझथे। अपन आघु कोनो ल कुछु नइ समझय। ये मन नेता अधिकारी मन तक पहुँच वाला होथे।  बात बात म कोर्ट कचहरी के गोठ करथे। लइका तो लइका हेडमास्टर घलो इखर ले डारावत रहिथे। पूरा स्कूल के अनुशासन इखरे ऊपर निर्भर रहिथे। कक्षा म जावत देरी हे तहां एकदम 'पिन ड्राप साइलेंट!'  लइका का जानत हे ? का सीखत हे ? ये मायने नइ रखय। फेर इखर सामने लइका के आवाज नइ आना चाही, बस। 

       अइसने कई किसम के  गुरुजी हे। अउ कई किसम के चेला घलो हे। चेला मन के चर्चा बाद म करबो। फेर गुरुजी मन ल निपटाए के बाद एक बात सोंचे बर परही। समय के संगेसङ्ग सब बदलगे। गुरुजी घलो इही समाज के प्राणी हरे। जेन - जेन गुण-दोष समाज के दूसर मनखे मन मा हे, इखरो म रहिबे करही। जब सारी दुनिया के चाल चरित्तर बदलत हे त गुरुजी मन ऊपर एखर प्रभाव नइ परही का? काबर कि ये मन  कोनो दूसर दुनिया ले तो आय नइ हे। येहु मन इही समाज के हिस्सा आय। फेर आज भी गुरुजी मन के छवि हर  लोगन के मन बर एक आदर्श हे।  जुन्ना समय ले आज तक कुछ नइ बदले हे। वो मन जब गुरुजी ल देखथे त वेद पुराण के उही आदर्शवान गुरुजी के सुरता आ जथे। फेर अपन ल नइ देखय कि अपन मन कतका बदल गे हे। गुरुजी मन घलो पहिली जइसे सम्मान खोजथे आरुणि सही चेला खोजथे । जेन नइ मिल सकय। 

कुल मिला के गुरुजी अब शासन के वेतनभोगी कर्मचारी हो गे हे। शासन जइसे चाहत हे ओखर बात चाहे अनचाहे मने बर परही। तबो ले एक बात कहे जा सकत हे। जेन गुरुजी लइका मन के शिक्षा ऊपर  बने ध्यान देथे। उखर जीवन निर्माण बर  निस्वार्थ भाव ले काम करथे। लइका मन  जीवन भर ओला नइ भुलावय। जब भेटथे सम्मान करथें।


🙏🏻 मथुरा प्रसाद वर्मा

Thursday, 11 February 2021

कहिनी : बिसाहिन दाई*

 *कहिनी : बिसाहिन दाई*

         रायपुर के रक्सेल मुड़ा म तरिया पार म बसे एक ठन गाँव हे। आमा अउ पीपर के जुड़ छाँव तरी घाम पियास नि जियानय। नाहर के पझरा ले निकले नरवा गाँव बर बरदान बने हे। नाहर भरोसा ए गाँव कभू अकाल दुकाल नि जानिस। खेती किसानी सबो मन लगा करथे। मनखे मन बिहनिया बेरा सुत उठ के तरियाच म मुँह धोवत राम-राम करथे। तरिया पार म बसे ले काकर घर पहुना आवत हे, अउ कोन बन-ठन के बाहिर जावत हे, एकर घर मुँहाटी चउँरा म बइठे सोर मिल जथे। ए गाँव म लटपट डेढ़ सौ चूल्हा होही। जिहाँ मनखे मन म कोनो परकार के भेद भाव नइ हे। राजनीति के नाँव ले घलो अभी बँटे नइ हे। पंचइत चुनाव निर्विरोध हो जथे। लोकसभा अउ विधानसभा के चुनाव म सियान मन नवा अउ उत्साही लइका मन सिखौना देवत कहिथें - " ए नेता मन चुनाव के होवत ले आपस म लड़थे, इँखर लड़ई देखउटी आय। नेता मन ल हाथी के दाँत जानौ, खाय के आने अउ दिखाय के आने। हमन ल इँखर चाल म नइ फँसना हे। हम ल ए पार्टी ओ पार्टी के चक्कर म नइ पड़ना हे।" 

     कोनो अउ कहिथें - " हम ल आपस म बँटना घलो नइ हे। हमर कोनहो सुख अउ दुख के बेरा म कोनो बाहिर वाला आके खड़ा नइ होवय। हमीं मन एक-दूसर के दुख ल बाँटबो अउ सुख म अँगना नाचबो घलव। चुनाव जीते ऊपर ले नेता मन मुँहूँ दिखाय तको नइ आवै। दर्शन दुर्लभ हो जथे। चिह्नै घलव नइ। अपन वोट कोनो ल देवव, फेर गाँव ल मया परेम के छाँव अउ ठाँव बने गाँव रहन देहू। राजनीति के अखाड़ा झन बनन देहू।" 

       गाँव म सियान मन के बड़ मान हवय। नवा पीढ़ी के लइका मन घलो उँखर गोठ ल धियान देके सुनथें अउ मानथें घलो। गाँव म बड़ सुमता देखे मिलथे। दुखिया मन ल गम नइ मिले, कइसे दुख के काम निकल जथे। काकरो बेटी के बिदा होय, गाँव भर मिलके पहुना के पाँव पखारथें, दू बीजा चाउँर टीकके बेटी बिदा करथें।

        गाँव म नोनी-बाबू म फरक करइया घलो देखे ल नइ मिलय। अतका जरूर हे, नोनी मन ल कहिथे बताथे, तुमन सादा कपड़ा सरीख आव। अपन ऊपर कोनो दाग लगन झन देहू। बहुत अकन लोकलाज अपने हाथ म रहिथे। बचा के राखहू त दाई-ददा संग गाँव के मान मर्यादा बाँचे रही। बाबू मन ल नशा-पानी ले बाँचे के सीख देथे। उन ल बताय जाथे कि नशा नाश के जर होथे। नशा घर दुआर म कलहा के बीजा बोथे। एकर ले बाँचे म ही जिनगी म सुखेच सुख हवय, एला जान लेवव। ए तरह ले घरोघर नैतिक शिक्षा दे जाथे। इही बात मन रहिस जउन गाँव ल सुमता के गाँव के चिन्हारी दे राहय।

       बिन नारी परानी के दुकलहा घर एकसरविन बहू के पीरा उठ गे रहिस। पहिली पहिलावत रहिस। बहू बिचारी पीरा मं तालाबेली करत राहँय। बिसाहिन दाई ह आने गाँव गे रहिन, तेन अभीच अपन घर पहुँचे राहँय। उही बिसाहिन दाई जेन ल गाँव भर जचकी बखत बुलाय जाथे। दुकलहा के बेटा पइत घलो इही बिसाहिन दाई ह आय रहिस हे। जचकी के दिन ले सरलग कई-कई दिन तक बिसाहिन दाई सेवा बजाथे। सँझा-बिहनिया दूनो बेरा लइका अउ महतारी के सेवा करथे। कोनो ल बिसाहिन दाई ले कभू कोनो शिकायत नइ होइस। बिसाहिन दाई घलो सबो घर हरहिंछा आवय-जावय। ओकरो मन कभू छोट नइ होइस। बरोबर गोरस नइ आय ले महतारी बर जड़ी-बूटी घलो देवय। कतको झन ल एकर फायदा मिले हवय। तभे तो अड़ताफ भर ले आय दिन कोनो न कोनो ओकर घर आत्ते रहिथे। सरपंची बर महिला आरक्षण आय रहे म गाँव भर के मन निर्बिरोध सरपंच बनाना चाहीन, फेर बिसाहिन दाई कहिन " मैं अप्पड़ का सरपंची करहूँ, मोला इही म मजा आवत हे, जचकी करावत मोला सेवा करन दव।" 

         अभी घर म पाँव बरोबर माढ़े नइ पाय रहिस, बहू के देह उसलगे सुनके बिसाहिन दाई उत्ता-धुर्रा दुकलहा घर पहुँच गिस। बहू नोनी ल देखतेच खानी कहिथे, देखे के बेरा नइ हे। एला जतका जल्दी होय अस्पताल लेगे बर परही। लइका ह थोरकुन उलट गे हे कस जनावत हे। जचकी के बेरा आ घलव गे हे। धरा-पसरा गाड़ी मँगाके, बिना कोनो देरी के बहू ल तिर के सरकारी अस्पताल लेगे गिस। बहू मुँधरहा के उठे पीरा ले लरघिया गे रहिस। महतारी अउ सास के मया ल तरसत बपुरी ह अपन गोठ काखर मेर कहितिस। ताकत नइ लगा पात रहिस बपुरी ह। अस्पताल के डॉक्टरिन मैडम जाँच करे के पाछू तुरते ऑपरेशन करके जच्चा अउ बच्चा ल बचालिस। ऑपरेशन के बाद मैडम बोलिस - "अच्छा हुआ समय रहते यहाँ पहुँच गये, वरना थोड़ी देरी होती तो जच्चा-बच्चा दोनों को खतरा हो सकता था। फिलहाल दोनों स्वस्थ हैं।" 

        दुकलहा अतका सुनके बिसाहिन दाई अउ भगवान ल बार बार धन्यवाद दे लगिस। बिसाहिन दाई ल कहिस, "भउजी! तोरे रहिते आज मैं ह अपन बहू अउ नाती के मुख ल देख पात हँव।"

    बिसाहिन दाई कहिस, "नहीं बाबू! मोर तो कामेच आय सेवा। मैं  जचकी दाई हरँव, जच्चा अउ बच्चा बर सोचना मोर काम हरे। दूनो ल कोनो नुकसान झन होवै। इही तो मैं चाहथँव। मोला लागिस कि घर म रहना खतरा हे, मोर बस के बात नइ हे, ते पाय के इहाँ लाने बर कहेंव।"

      सिरतोन भउजी! तोर हाथ म जस हवय। आज तक तोर राहत ले गाँव ह कभू कोनो धोखा नी खाय हे। तोर रहिते गाँव के बहू-बेटी मन कोनो तकलीफ नइ पाय हे। 

        बाबू गोठियातेच रहिबे धन हमर देरानी के स्वागत म फटाका फोरबे। तोर घर म लछमी ह लहुट के आय हे। 

            मैं फटाका भर नि फोरँव भउजी!  मिठई घलो बँटवाहूँ, मोर लछमी के स्वागत मं। सही मं मोर लछमी मोर तीर लहुट के आय हे, काहत दुकलहा के आँखी भर जथे। दुकलहा समझ नि पाय ए आँसू का के हरे?

        

      पोखन लाल जायसवाल

पलारी बलौदाबाजार छग.

भूख के जात -हरिशंकर गजानंद देवांगन

 भूख के जात -हरिशंकर गजानंद देवांगन 

                     मरे के जम्मो कारन के कोटा तय रहय ….. फेर जब देखते तब , जइसे सरकारी दुकान ले दूसर के कोटा के रासन ला .... गांव के सरपंच जबरन लेगय , तइसे भूख हा दूसर कोटा के मौत नंगाके मनखे ला मार देवय । भगवान के नियम म खलल परय । भगवान हा यमदूत ला अइसन नियमखोरी करइया ला खोज के लाने बर भेजिस । यमदूत मन धरती म अइसन भूख ला खोजत अइन । इहां अइन त देखथे के इहां तो भूख के कइठिन जात रहय ....... । ओमन सोंच म परगे .... भगवान कते भूख ला लाने बर केहे हे । सबे भूख ला धरके लेगे अऊ भगवान के दरबार म हाजिर कर दीस ।                    

                    एक ठिन भूख हा जइसे भगवान के आगू म खड़ा होइस तइसे ... भगवान बरस गीस ओकर बर । भगवान केहे लगिस - कस रे तोला कहीं लागथे ? जब पाये तब अऊ जेला पाये तेला ढनगा देथस । धरती के मनखे कस ... दूसर के बांटा ला नंगा लेथस । तोर सेती कतका समस्या पैदा होगे हे । तैं जनता ला अइसने मारबे त .... हमर नियम धरम के काये आवसकता ? देख कतका अकन तोरे कोटा म .... मरके आये हें । भगवान के बड़े स्क्रीन वाले कम्प्यूटर म तरी उपर लास देख के भूख किथे – तोर कसम गो .... ये मन मोर मारे नोहे .... । हमला दूसर के बांटा नंगइया नेता समझथस का भगवान .... ? गऊकिन .... अपन बर निर्धारित कोटा ले उपराहा एक ठिन मनखे नी मारे हंव ...... । पहिली कस समे नी रहिगे भगवान .... तैं का जानबे .... मनखे ला मारे बर कतेक उदिम लगाये परथे तेला ........ कतका पछीना ओगारथंव तेला मिही जानहूं । भगवान किथे - लबारी मारथस रे ? भूख किथे - दईकुन गो ..... लबारी नी मारंव भगवान । उहां एक रूपिया किलो म चऊंर .. पिये बर सरकारी दारू अऊ रेहे बर घर मिलत हे । कोन मरही मोर ले भगवान ? अऊ अब तो जनता के पेट भरे बर नावा किसिम के मोबाइल आगे हे ... जेकर बटन चपकतेच साठ ... अनाज के दाना झरझर झरझर गिरत हे .... मनखे के पेट कहां उना रइहि तेमा .... । चित्रगुप्त कोती देखीस भगवान  ……..  वहू अपन कम्प्यूटर म देखत ....... हां म हां मिलइस । पेट के भूख ला सनमान सहित वापिस लहुंटे के आज्ञा मिलगे । भगवान सोंचे लगिस .... कोन येकर नाव ले पाप करत हे ? भगवान हा प्रस्नवाचक मुहूं बनाके चित्रगुप्त कोती देखीस त ओहा ... दूसर भूख ला खड़े कर दीस आगू म । 

                    चित्रगुप्त बताये लगिस - धरती म भूख के कतको धरम जात अऊ समाज बन चुके हे । काकर बूती ... बिन पारी के मनखे मरत हे तेला ... मोर कम्प्यूटर बता नी सकत हे । जइसे येला जाने के कोसिस करथंव नेट बंद हो जथे ..... तेकर सेती सबो जात के मुखिया भूख मनला लाने गेहे । भगवान पूछथे – जात .......? येमन मनखे कस बिगड़ गेहे का रे .....? येमन ला जात बनाये के कोन आज्ञा दीस ? चित्रगुप्त किथे - भगवान , जात बनाये बर कनहो ला केहे नी लागे , चार झिन जुरियइन तहन नावा समाज अऊ नावा धरम खड़ा हो जथे । जेकर सुआरथ पूरती नी होये तिही मन राजनीतिक दल कस अपन जात खड़ा कर लेथें । ये जात हा मनखे के उपज आय , हमर रचना नोहे भगवान । भगवान किथे - येहा कोन जात के भूख आये ? भूख खुदे केहे लागीस – मोर सेती मनखे मरथे कहां भगवान तेमे मोला हथकड़ी पहिरा के ले आने हव । मेहा तो अइसे जगा म रहिथंव जेला तोपे बर धरती के हरेक मनखे ला उदिम करे लागथे । भगवान पूछिस – का ...... पेट म नी रहस तेंहा ? भूख किथे - मेंहा पेट म नी रहंव भगवान .... पेट के खालहे म रहिथंव । भगवान मुहूं फार दीस । चित्रगुप्त किथे – भूख के रेहे बर पेट म जगा बनाये हाबन ? तोला कोन पेट के नीचे रेहे के परमीशन  दीस । भूख किथे – हमर जात के भूख ला रेहे बर काकरो परमीशन के आवसकता निये । पेट के खालहे म जगा दिखीस तहन ....... मन पटवारी के जेब गरम करके अपन नाव म खालहे पारा के रजिस्ट्री करवा डरे हाबन । भगवान हा चित्रगुप्त कोती कननेखी देखीस । चित्रगुप्त किथे – येहा मनखे के वासना के भूख आय भगवान ...... येकर ले मरथे तो बहुत कम फेर …….. फेर येकर बर कतको झिन मरथे .......। येला मेटाये बर कतको धरमगुरू साधु संत पादरी मौलवी मन बड़े बड़े असपताल खोल के बइठे हाबय । फेर अपने असपताल म उही मन इही भूख के सिकार हो जथे .........। यहू ला छोंड़ दिस ।

                     सुसकत खड़े दूसर भूख ला पूछत रहय भगवान - तैं कोन अस जी अऊ कते मेर रहिथस ? काबर रोवथस ? निच्चट दुब्बर पातर भूख हा सरम के मारे मुड़ी गड़ियाये रिहीस । हूंकिस ना भूंकिस । चित्रगुप्त किथे – ये भूख हा मनखे के कभू आंखी अऊ कभू दिल म रहिथे । ये प्रेम के भूख आय । येला दुनिया म जम्मो झिन अपन सुआरथ के सेती चाहथें । येकर मरम ला ना कनहो जानय । ना येकर करम ला कनहो निभावय । ये अपन अस्तित्व बर खुदे तरसत मरत हे ..... कनहो ला काये मारही । ये भूख अपन प्रजाति ला बचाये के गोहार करत रो डरिस । यहू छूटगे ।

                    अगला भूख हा सुघ्घर पहिरे ओढ़हे रहय । खुसरतेच साठ दरबार महर महर महमहाये लगीस । कतको झिन हाली मोहाली संग म अइस । इही दोसी भूख होही कहिके आते आत जमदूत के सोंटा परीस ........ सेवा करइया मन भाग गीन । चित्रगुप्त किथे – येहा पइसा के भूख आय भगवान । येला मेटाये बर जतको खाबे ... येहा ततके बाढ़थे । येहा अपन बलबूता म बहुतेच काम कर सकत हे । दूसर के पछीना ला अपन देहें म चुपरके महकत मजा मारत किंजरत हें येमन । इही भूख के सेती मनखे मनखे म दूरी बाढ़त हे । इही भूख हा मनखे ला अपन नता रिसता के त्याग करे बर मजबूर कर देथे । येकर बर जे जादा मरथे तिही ला निपटाथे येहा ........। भगवान तिर येकरो अपराध सिद्ध नी होइस । यहू बरी होगे । 

                    ये दारी के भूख हा ... जइसे दरबार म खुसरिस तहन ..... कितको झिन हाथ जोर के खड़ा होगे । ये भूख हा नाव के भूख आय । येला कोन नी जानय । अपन नाव चलाये बर का का नी करय .... । एके ठिन बात ला घोर घोर के केऊ ठिन मीडिया म बगरा के अपन नाव ला जनाये के उदिम लगावत रहिथे । ये भूख बहुत झिन उप्पर सवार होथे फेर बहुत कमती मन ला पार लगाथे । कितको झिन मरत ले नी छोंड़य येला । येहा मनखे ला मारय निही फेर अपन नाव के उप्पर म या बरोबरी म कनहो ला झिन आय कहिके कतको उदिम म लगे रहिथे । इही भूख हा दूसर के नाव मेटाके अपन नाव ला जगजाहिर करे के डिगरी अऊ पी एच. डी. देवाथे । कतको कस पदम पुरूसकार इही भूख के सहारा अऊ भरोसा म मिलथे । चित्रगुप्त अइसन बतातेच हे तब तक भगवान हा यहू ला वापिस लेग जाये के इसारा कर दिस । 

                     खूनाखून दिखत भूख ला आवत देखीस त भगवान समझगे ... इही आय मौत के असली जुम्मेवार । हाथ म गोला बारूद बनदूक तलवार धरे रहय । भगवान खुद डर्रागे । भगवान कांपत पूछथे – तिंही हरस का जी ..........? डर के मारे आरोप घला नी लगा सकत रहय भगवान । चित्रगुप्त ला तीर म बला के किहीस - तिहीं हकन के पूछना येला ...... । मेहा कहूं त मुही ला झिन मार देवय । तैं पूछबे अऊ तोला मारीच दिही त मेंहा तोला फेर जिया दुहूं अऊ मोला मार दिही त तैं भगवान कहां ले लानबे । भगवान के मन म डर हमागे । चित्रगुप्त किथे - रावन ... कंस अऊ हिरण्यकस्यप कस राक्षस मन ला चुटकी म मरइया भगवान के चेहरा म अइसन डर सोभा नी दय । तूमन काबर डर्राथव भगवान ? भगवान किथे - राक्षस मन मोर संरचना रिहीस अऊ येहा मनखे के आय .... तेकर सेती डर लागत हे । चित्रगुप्त किथे – डर्रा झिन । येला जब तक बड़का भूख आदेस नी देवय तब तक ..... ये कनहो ला नी मारय । अपन जरूरत बर अभू तक काकरो सिकार नी करे हाबय येहा । ये हिंसा के भूख आय । जब तक कनहो उकसाये निही तब तक ... येकर हाथ ले हथियार नी छूटय । त ये लहू म सनाये कइसे दिखत हे ? भगवान फेर पचारिस । चित्रगुप्त किथे - येकर निवास स्थान लहू आय भगवान तेकर सेती .....। यहू छूटगे ।

                     भगवान किथे – चित्रगुप्त .... जतका अकन भूख अभू अइस तेमा .... कनहो भूख म अतेक अकन मनखे मारे के क्षमता निये । तूमन गलत रिपोट देके बपरा भूख ला काबर बदनाम करत हव । चित्रगुप्त किथे - एक ठिन भूख अऊ बांचे हाबय । तभे भूख भइया की जय के नारा सुनई दीस । नारा लगइया मनला बाहिर म रोके नी सकिस यमदूत मन । भूख हा ... संसद कस …… समर्थक संग ..... परिवारसुद्धा .... दोरदीर ले खुसरगे । भगवान किथे - तिहीं हरस रे .... अतेक कन मौत के जुम्मेवार । वो किथे - कोन कथे ....... ? कोन कथे ....... के मिही अतेक मनखे के मौत के जुम्मेवार आंव कहिके .... पूछ येमन ला ....... । देखा सबूत ...... । जुबान लड़ाये बर धर लीस अऊ बहुमत ले जीते कस भगवानेच के खुरसी कोती अमरे लागीस । चित्रगुप्त भगवान के कान म फुसुर फुसुर केहे लागीस – मोला समझ नी आवत हे भगवान । मोर रिकाड म इही भूख के कोई लेखा जोखा निये । बिगन सुनवई सबूत के अभाव म यहू भूख हा नेता कस छूटगे । 

                 भगवान ला आखिरी वाले भूख उपर सक होगे । ओहा चित्रगुप्त संग कम्प्यूटर बिसेसज्ञ ला धरके इही भूख के पाछू पाछू धरती म पहुंचगे । तलास अऊ तफतीस म भगवान पइस के ..... ये भूख हा चित्रगुप्त के कम्प्यूटर म .... राजनीति नाव के अइसे वाइरस डार दे हाबय ..... जेहा  कभू काकरो पकड़ म नी आ सकय ...... । ये भूख हा मनखे के दिमाग म रहिथे । मनखे के अकाल मौत के जुम्मेवार इही आय फेर येकर ताकत के डर म ..... येकर खिलाफ कन्हो गवाही देबर खड़ा नी होय । भगवान जान डरीस के .... येहा सत्ता के भूख आय जेहा .... कतको लास बिछा के घला सांत नी होय । इही भूख ला सांत करे बर ..... मनखे मन हा ..... कतको झिन के दुरदसा कर देथे अऊ कतको ला मार के ढनगा देथे । ये अइसे भूख आय जेकर उप्पर बिजय पाये के बाद .... मनखे हा पहिली ले अऊ जादा भुखाके ..... तपनी तपे लगथे । इही भूख के साथ देवइया मन भुकुर भुकुर के खाथे अऊ बिरोध करइया मन इही भूख बर भुखा जथें ....... । भूख के इही जात ला खतम करे बर .... उही दिन ले सरग म भगवान हा ..... लांघन भूखन रहिके तपस्या म जुटगे ........ ।  

    हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा