Wednesday, 20 October 2021

हमर जमाना मा* मनोज कुमार वर्मा

 *हमर जमाना मा*

मनोज कुमार वर्मा

     *हमर जमाना मा* अइसन जब गोठ होथे त निश्चित ही बदलाव होय हे अइसे जान पर्दे अउ ये बदलाव पीढ़ी के संग संग रिती-नीती, संस्कृति, संस्कार, रहन-सहन, वेवहार, खान-पान, मनोरंजन के साधन, खेल-कूद आदि सबों जिनिस मा होय परिवर्तन ला बताथे कि ओ बेरा मा ये सब जिनिस कइसे रहिस हे अउ अभी कइसे हावय। हमर जमाना कहिबो त हम तो जादा दिन के लइका नोहन हम अभी तो उपज के खड़ा होय हन फेर हमर सौभाग्य हे कि हम दूनो जुग चिठ्ठी पतरी ले मोबाइल के संदेश, बांटी, भॅंवरा, डंडा-पचरंगा, भोटकुल, तिग्गा, साॅंप-सिढ़ी, खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डंडा आदि आदि ले मोबाइल गेम, आनलाइन गेम तरिया के छू-छूवउल ले घर के नल मा नहवई, छुट्टी ल नाना-नानी, दीदी-फुफा घर बितात ले घर के टीबी, मोबाइल मा बितावत  बाढ़े हन। कहन त हमर पिढ़ी के लइका मन आखरी हरन जेन जिनगी वास्तविक जुग के पुरातन खेल ल बिदा करत नवा जुग काल्पनिक खेल के अगवाई करे हन।

     हमर जमाना कहिथन त सुरता आथे हमन जब नान-नान लइका रहेन त पूरा गॉंव भर एक परिवार बरोबर रहय सब लइका सबके लइका रहय अउ सबो दाई ददा सबके दाई ददा कोनो भी लइका काखरो घर दिन भर रहिजय खा-पी लय अउ कोनो भी दाई ददा अपन अउ दूसर के लइका मा भेद नइ समझय जतका लइका अपन घर के ल नइ डरावय ओकर ले जादा दूसर ल डरावय अउ मया घलो पावय। तब परिवार बड़े बाबू-दाई, कका-काकी सबो भाई बहिनी संग रहे के सेती बड़े-बड़े रहय दादी-दादा के किस्सा-कहानी संस्कार भरय अउ चौक-चौराहा मा बइठ के बड़े बुजुर्ग मन के गोठ-बात ल सुन के छोटे-बड़े के संस्कार मिलय अब तो सब मनखे अपन मा मगन होगे घर बड़का होगे मन छोटे, घर सजगे मन मा काई रचगे, धन कम गरब-गुमान जादा हमागे ऐमा नवा पिढ़ी के कोनो दोष नइ हे दोष हमर मा हे सुवारथी हमन होगे हन जेन सॉप के बिला कस घर मा खुसरे हन पद के गरब मा। लइका ऊपर बंधन लगाके रखे हन बाहर नइ जाना हे, दाई-ददा, भाई--बहिनी ले दुरिहा पता नइ हमन कइसन समाज के रद्दा गढ़त हन नवा लइका ल काय दत हन, चकाचौंध खोजत आॅंखी ल अॅंधरिया डरत हन सुख के दिन अकेल्ला बित जाथे फेर दुख के दिन सगा संबंधित, घर परिवार, रिसतादार बिना नइ बितय।


मनोज कुमार वर्मा

बरदा लवन बलौदा बाजार

हमर जमाना म-जी पी साहू

हमर जमाना म-जी पी साहू


 *"हमर जमाना" के सुरता करके कूछु गोठ- बात करे ले या संस्मरण लिखे ले हम ला अईसन लगथे-"जाना के हमन सतजुग,त्रेता, द्वापर,कलजुग चारों जुग ला देख चुके हन, जी चुके हन अउ "चिरंजीवी जामवंत" सहीं   जिनगी के अनुभव के विशाल भंडार भरे हवय*

     *ये क्षणभंगुर जिनगी म निस-दिन,हर पहर,हर घड़ी,हर पल असंख्य प्रकार के इच्छा,मनोकामना उत्पन्न होवत रहिथे | तेकरे सेती असंख्य प्रकार के  दुख-सुख, हंसी-खुशी, अम्मट-मीठ,करू-कस्सा के अनुभूति होवत रहिथें*

     *अगर फसलें ख्वाब की तैयार हों,तो समझो फिर वक्त आ गया है-"दुख के बीज बोने का", इस शेर का संदेश अकाट्य सत्य है*

     *अपन संस्मरण ला आत्मने पद म लिखे बर पड़थे,जेमा प्रथम पुरूष-मैं, मोर,मोला, शब्द से वाक्य के सुरूआत होथे |जब मैं तीन बच्छर के रहेंव,तोतली भाषा म गोठियावत रहेंव,मोर पाठ के छोटे बहिनी कौशिल्या ह साल भर के हो गए रहिसे,तब भी मैहा दाई के दूध पीयत रहेंव*

     *हमर घर एक पहटिया के लाईक गाय-भैंस रहिसे, रोज बड़े बिहनिया ले राऊत जेला बईहा राऊत कहत रहेन,गाय-भैंसी दुह के बाल्टी भर दूध मुड़हर घर के दुवारी म रख देवत रहिसे,तब ऊपरे-ऊपर के दूध जेमा गजगजा भरे रहय,तऊने म के मैं अउ मोर बहिनी कौशिल्या एक-एक कटोरा निकाल के पोगरिया लेवत रहेन,तऊने कुनकुन गरम दूध म दाई हा एक-एक पसर लाई अउ मधुरस डार देवत रहिस,एही हमर बिहन्हे के नास्ता होवत रहिस*

     *वो बाल्टी भर दूध ला एक कौड़ा म छेना के आगी म धीरे-धीरे चुरोवत रहिस,रोटी असन मोट्ठा साढ़ी परत रहिस,तब अंगाकर रोटी के संग अउ भात के संग दाई ह फेर दूध भात देवत रहिस, ये किसम के नानपन के दूध,दही,मही,घी के सुरता अब सिरिफ सपना हो गे ! अब तो चाय बर आधा पौवा दूध खोजें ले गांव भर म आध पौवा दूध नइ मिलै,कभू मिल भी जाथे,तौ आधा दूध-आधा पानी |  अब घचर-पचर के जिनगानी,आधा तेल-आधा पानी"अब गाय के सेवा करैया तो"सत म सती कोट म जती"असन हो गए हवय ! शहर के डेयरी दुकान म देखबे,तव बड़े-बड़े गंजा म लबालब दूध दही भरेच रहिथे, पता नही कहां से कईसे ये दूध दही भरे रहिथै ?*

     *वो बखत हमर घर  अउ गांव-बस्ती म अत्तेक दूध-दही होवय के "बटकी भर भात म बासी असन दूध भर के खावत रहेन, तव हमर वो बचपना ह जाना के "द्वापर म जिनगी जीये हन | "द्वापर म दूध-दही,त्रेता म घी,अब कलजुग म लाल चाय फूंक-फूंक के पी"*

    *हमर समय के संपतराम,सुखीराम,आनंदराम मन पेट भर  दूध दही घी खा-पी के एकदम शेर सहीं दहाडैं,अउ बड़े-बड़े मुसीबत ला पछाड़ैं ! कई कोस कांवर बोहि के रेंगते जावत-आवत रहिन,कभू थकासी के नाव नइ लेवत रहिन,अब के लईकन मन एक कदम जाना होथे,तब मोटरसाइकिल दौड़ावत जाथें,चाहे पेट्रोल के भाव ह कतको आगी लगत जावत हवय !|अब के मनखे मोंटू,पींटू टींकू अउ बीपतराम मन दारू,गुटका,तम्बाखू खा के पेट म अल्सर,गर म कैंसर अउ नाना प्रकार के बीमारी के शिकार हो गईन ! अब्बड़ेच दुख लगथे-पहिली के सियान मन आशीष देवत रहिन-"दूधो नहाओ" तऊन आशीर्वाद ह अब गलत साबित होवत हे !*

 

दिनांक-२०.१०.२०२१


     (क्रमशः-२)


आपके अपने संगवारी

  *गया प्रसाद साहू*

     "रतनपुरिहा"

मुकाम व पोस्ट-करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर

हमर जमाना मा - सियान मन ला पोठ डररावन* मयारू मोहन कुमार निषाद*

 *हमर जमाना मा - सियान मन ला पोठ डररावन* 

मयारू मोहन कुमार निषाद*

आज के विषय म गोठ आइस अपन जमाना के तव मोला अपन ननपन मा लइकापन के सोनहा सुरता मन के खियाल आथें । कि जब हमन छोटे राहन त घर के सियान का गाँव के सब बड़े ददा कका बाप मन ला घलो पोठ डररावत रहेन । काबर सियान तो सियान होथें घर के काहवँ चाहे बाहर के , वो समे के बात अलगे रिहिस हें । आज कल के लइका मन ला तो अपने दाई ददा मन घलो नइ बरज सकय , त बाहिर वाला मन के तो गोठ ही छोड़व । बचपन म तरिया नंदिया मन म नहाय के मजा अलगे रिहिस हे , मोला सुरता आथे हमर गाँव के नंदिया के जेमा हमन बिहनियाँ अउ मंझनिया पोठ डुबक - डुबक के नहावत रहेन । अउ तब सियान मन के बरजे मा ही निकल के घर आवत राहन तव कई दिन मार घलो खावत राहन ।


 ओइसने दू जघा के सुरता मोला आवत हे ननपन के जब गाँव के एक झन सियान अउ स्कुल के गुरूजी ह हमन ला सोटियाय राहय । गरमी के दिन राहय अउ मंझनिया कुन हमन सबो संगी साथी जाके नंदिया के रेती मा खेलन अउ पोठ डुबक - डुबक के नहाँवन । वो समे नंदिया उथली रिहिस हें बड़ मजा आवय । एक दिन ओइसने नहाँवत राहन त हमर गाँव के एक झन बड़े ददा हमन ला देख डरिस अउ हमन निकल के कपड़ा लत्ता धरके भागतेन तेखर पहिली ही वो हा हमर पेंठ कपड़ा मन ला धरलिस । फेर दू - चार चटकन सबो झीन ला दिस अउ समझावत किहिस मंझनी मंझना झन नहाय करव रे नंदिया मा हंडा हे कहिके । तब ले हमन हंडा के डर मा अकेल्ला दुकेल्ला नंदिया नरवा म नहाय ला जाय बर छोड़े राहन ।


 अब लइकापन अउ ननपन मा तो उदबिदहा उतलंगहा सबो रहिथें हमू मन रहेन , स्कुल मा पढ़े बर पास के गाँव गोढ़ी मा जावन रेंगत रेंगत । रस्ता मा एक ठन खदान पड़य हमन पहिली तो वोमा पोठ नहातेन तेखर बाद स्कुल जातेन । ओइसने एक दिन खाना छुट्टी होइस गरमी के दिन राहय स्कुल मा पंखा तको नइ राहय वो समे , मनमाड़े गरमी करत राहय हमन तरिया चल देन अउ पोठ  नहाँवत राहन । गाँव के कोनो जाके बतादिस गुरूजी तोर लइका मन तो तरिया मा जाके मार डुबकत हे कहिके । अब गुरूजी पोठ बगियाय तरिया आवत राहय , हमन दुरिहा ले देख डरेन अउ चिन डरेन गुरूजी आय कहिके । वो तुरते कपड़ा लत्ता धर के हमर मन के भगान नइ बनिस सब के सब वो दिन पल्ला भाग गेन । दूसर दिन गुरूजी हा सबो झीन ला चिन डर राहय अउ स्कुल गेन ताहन पोठ ठठाइस अउ समझाइस अब कहुँ जाहू नइते मार पड़ही बेटा हो कहिके ।


 *वो जमाना मा वीसीआर टीवी देखे के सुरता : -* हमन छोटे - छोटे राहन गाँव म एक्को ठन टीवी नइ रिहिस , जब काखरो घर छट्ठी होतिस त हमन वो दिन जान डरन आज वीसीआर आही रे कहिके , अउ हमर खुशी के तो फेर झन पूछ ठिकाना नइ राहत रिहिस । आज तो रात भर देखना हे कहिके तईयारी करतेन फेर सियान मन हा चलव रे घर जाँव सुतहुँ कहिके चेचकार के रातकुन खेदार  देवत रिहिन हें । वो दिन संझा होतिस तहा ले हमन कतेक दुरिहा पहुँचे हे वीसीआर वाले मन हर कहिके देखे बर रद्दा मा पहुँच जवत रहे हन । भले काखरो घर टीवी नइ रिहिस हें फेर गाँव भर लइका सियान बुढ़वा जवान सब एक जघा सकला के वीसीआर देखें के वो समे मजा अलगे रिहिस हे ।  


                  *मयारू मोहन कुमार निषाद*

                  *छंद साधक सत्र कक्षा - 4*

                  *गाँव - लमती , भाटापारा ,*

हमर जमाना ल याद करत* नान्हेंपन के बड़ सुरता आथे विजेन्द्र वर्मा

 *हमर जमाना ल याद करत* नान्हेंपन के बड़ सुरता आथे

विजेन्द्र वर्मा

लइकन पन के सुरता आज मन ला मतावत हे।आज के समे मा नान्हें लइका मन ला देखथन त पढ़ई लिखई अउ बस्ता के बोझ मा अइसे दबे हावै बपुरा मन खेलईच ल भुला गेहे।बस एके ठन खेल जानथे, मोबाइल जेमा रात दिन पढ़थे अउ उही मा खेलथे तको। दिन भर घर मा धँधाय देखबे ते सोगसोगावन असन फेर काय करबे इही माहौल हे सबो कोती।हमन लइकन पन के सुरता करथन त लागथे हमर मन सरीक कोनों मजा नइ उड़ाय होहीं।न तो पढ़ई के चिंता न खवई के,न बस्ता के बोझा।घर ले निकलन सुग्घर बासी पेज खा के, स्कूल के घंटी बाजय त दउँड़त सबो संगवारी मन स्कूल पहुँचन।ओ समे स्कूल के घंटी ह घड़ी के काम करय।घंटी ला सुनके ही जानन, पेशाब पानी बर छुट्टी,हाफ टाइम लेजर के छुट्टी अउ घंटी दस पन्द्रह बार बजतिस ते पूरा छुट्टी होगे कइके।पूरा छुट्टी कहूँ होइच ते खुशी के ठिकाना नइ राहय धरा रपटा बस्ता धरके घर कोती जम्मो संगवारी भागन।बस्ता ला घर मा पटक खेले बर चल दन।अपन अपन गड़ी बना के किसम किसम के खेल, गिल्ली डंडा,भौंरा बाँटी,

छु छूवउल,बिल्लस,पिठ्ठूल,

डंडा पचरंगा खेलन।इतवार के दिन तो तरिया,बाँधा बउली मा घंटो तक डूबकन।एक दूसर ल देख के नान्हें पन मा तउँरे बर सीख जान।आज के लइका मन ला तउँरे बर नइ आवय।माँ बाप हा तैराकी सिखोय बर लइका मन ल कोर्स करवाथे तब कहूँ जा के सीखथे।पहिली के समे मा सबो काम ला देखा देखी मा ही सीख जान।ओइसने गाँव गँवई मा तिहार मनावय त तिहार के मजा सबले जादा हमी मन लेवन।हरेली तिहार के समे गेड़ी के मजा,तरिया नरवा तको गेड़ी मा चढ़े चढ़े जान।संझा बिहनिया गेड़ी चढ़न,ये तिहार के अगोरा राहय काकर गेड़ी कतका ऊँच बनही,काकर जादा रेच रेच बाजही कइके। नागपंचमी के दिन सपेरा मन गाँव मा आवय नाग देवता ल पिटारा मा रखे राहय देख के बड़ डर्रावन तभो ले देखे बर तुकतुकाय राहन। स्कूल मा तो स्लेट मा नाग के चित्र बना के फूल पान धरके बिहनिया स्कूल जान नाग देव के पूजा बड़ विधि विधान ले गुरुजी मन करवावय। पन्द्रह अगस्त अउ छब्बीस जनवरी के तको बड़ अगोरा राहय बिहनिया ले प्रभात फेरी मा शामिल होके गाँव भर बेंड बाजा के साथ बजावत घूमन।भाषण बाजी कविता पाठ मा पहला 

नइते दूसरा ईनाम पाय के मजा अलगे राहय वो समे कापी,पेन,पेंसिल ईनाम स्वरुप मिलय,वो ईनाम ला आज के बड़का बड़का ईनाम से तउलबे ते आज के ईनाम बौंना लागथे,काबर अभी भी मन मा वो ईनामी जिनिस गाँठ बाँधे बइठे हे।राखी के दिन तो संगवारी मन के हद होजय काकर राखी कतका बड़े हे,के ठन गद्दी लगे हे बस इहीच मा मगन राहन।अउ जेकर जतके बड़े राखी वोतके वोहर अपन ठाँठ दिखावय। तीजा पोरा के समे मा ममा ह गाँव आही महतारी ल तीजा लेगे बर कइके मगन राहन,काबर  ममा ह खई खजेना अउ मिठई धरके आवय।अबड़ अकन पइसा तको दे दय ममा ह।हमर मन के खुशी के ठिकाना नइ राहय।पोरा तिहार मा तो नँदिया बइला ल सजा के दउँड़ावन अउ एक दूसर के नँदिया बइला ला आपस मा टकरावन।कखरो बइला के सिंग टूट जाय,ते ककरो बइला के चक्का टूट जाय तहाँ ले बिकट झगड़न।झगरा मा संगवारी संगवारी अनबोला तको हो जान फेर एकेच कनिक मा बोले बर तको धर लन।पोरा के दिन गाँव के भाठा मा खो खो,कबड्डी,बालीबाल खेलइया मन ला देख के मजा लेवन।आनी बानी के रोटी पीठा खुरमी,ठेठरी,खीर तसमई,सोहारी,बिड़िया,

खाजा,पपची,बरा,बोबरा,

चौसेला,अइड़सा ला देख मन भर जाय।कभू कभू तो खिसा मा आनी बानी के रोटी पीठा धरके अपन अपन संगवारी ला बाँटन अउ खान। गणेश चतुर्थी मा पंडाल सजा के गणेश जी रखन अउ गणेश जी ल रखे के पहिली घरो घर चंदा माँगे बर दल के दल लइका लइका मन जावन ग्यारह दिन ले रात मा पंडाल मा सोवन,नान्हें पन मा गणेश जी के पूजा हमर मन बर बड़का तिहार राहय।चंदा के पइसा ले रात मा वीडियो किराया कर मँगावन जेकर मजा लइका सियान सबो लेवय। गणेश जी के विसर्जन के बाद दुर्गा पूजा आवय दुर्गा पूजा गाँव मा बड़ जोर शोर से मनावय,सेवा गीत ला सुने बर सेवा करइया मन सन घूमन, अउ शीतला माई मेर रात रात भर जागन।दशहरा मा गाँव मा रामलील्ला होवय संझा कुन ले जगा पोगराय बर बोरा बिछा के आवन अउ अपन अपन जघा ल जा जा के रखवारी करन।रात मा बारा एक बजे तक लील्ला देखन,दस ग्यारह दिन ले चलय आखिरी दिन दशहरा होवय।भाठा मा रावन वध के लील्ला होवय,उही करा भाठा मा बजार तको भरावय।आनी बानी के खई खजेना,चना चरपटी के मजा उड़ावन।कातिक पुन्नी मा मुँदरहा ले उठई,अउ भोग ल खाय बर कँपकपी जाड़ मा तलाब मा नहाय के सुरता आथे।देवारी के समे तो गाँव भर के मनखे मन घर द्वार के लिपई पोतई साफ सफई मा लगे राहय त हमन नवा नवा कपड़ा सिलाय बर दाई ददा ला जोर देवन। फटाका मा लक्ष्मी फटाका,नान नान बम दनाका चुरचटिया,टिकली,चकरी,

छुरछुरी लेवाय बर रोंमियाँय राहन,जभे लेवातिस बड़ अकन फटाटा तभे मानन 

नइते दिन भर रिसाय राहन।नवा नवा कुरता पेंट पहिरे के बड़ अगोरा करन,सुरहुत्ती के दिन।फेर आवय धान लुवई अउ खेती बाड़ी के दिन, ओ समे 

बइला गाड़ी चढ़े के मजा अउ खेत मा शीला बिने के काम करत अतका धान सकेल डारन अउ उही धान ला बेच के मुर्रा लाड़ू,नड्डा,पीपरमेंट के मजा उड़ावन। धान मिंजई के दिन मा बियारा मा बड़ रौनक राहय,सबो के बियारा मा बेलन,दउरी,गाड़ा धान मिंजे मा लगे राहय तब बेलन अउ गाड़ा चढ़े के बाद रेसटीप अउ उलानबाटी खेले के मजा भूले नइ भुलावत हे।शरीर हा कतको खजवावय तभो ले घंटों भर पैरा मा खेलन।बोइर अउ तिंवरा के दिन मा झोला झोला बोइर तिंवरा,राहेर डोहारन,खेत मा तिंवरा अउ राहेर के बनाय चना चरपटी के सुवाद अभी तको जीभ ला याद हे। छेरछेरा के दिन मा घरों घर छेरछेरा माँगे ले जान ओ समे कोन अमीर कोन गरीब नइ देखय सब संगवारी झोला धरके धान सकेलन फेर बेच बाँच के पइसा पकड़ मेला मड़ई देखे बर जान।अभी भी मेला के धुर्रा फुतकी सुरता मा गुलाल असन उड़त अंतस ला रंगोवत हे।ओइसने होली तिहार मा पिचका खरीदे के जिद ला पूरा करवा डारन।होली भले जलाय बर नइ जात रेहेंन फेर स्कूल ले छुट्टी होवय त धरा पसरा जम्मो संगवारी होले के लकड़ी टोरे बर खेत खार घूमन अउ एक महीना पहिलीच ले लकड़ी के पहाड़ बना डारन। मेला मड़ई के दिन आय त ढेलवा,रहचुली झूलन,ओखरा,भेलवा लाड़ू,जलेबी भजिया के स्वादे  ह कुछ अलगे राहय।

गाँव मा कखरो घर बर बिहाव होतिस त बबा सन बरात जाय बर तुकतुकाय राहन।छींट बूंदी लाड़ू नइते करी सेव लाड़ू परोसय बरतिया मन ला ‌खाय मा भले दाँत पिरा जय फेर ओकरो अलगे मजा राहय। गरमी के दिन मा ममा गाँव मा छुट्टी मनाय के अलगे मजा राहय। ममा गाँव मा अइसन मान देवय सब मनखे भाँचा आय हे कइके बड़ मया करय। मँझनिया आम के बगइचा मा आमा चुरावन, गंगा इमली टोर ससन भर खावन।ममा गाँव मा गरमी के छुट्टी कभू नइ भुलावय।

*लइकन पन के बड़ सुरता आथे,*

*भौंरा-बाँटी,कंचा आज तको मन ला मताथे।*

*माटी के चुल्हा मा अँगाकर रोटी सेकावय,*

*जरय तभो महर महर ममहावय।*

ओ समे न तो अखबार रिहिस न तो घरों घर टेलीविजन बिजली कभू राहय ते कभू गोल होजय।चिमनी, कंडिल के अँजोर तको निक लागय।काबर हमर सियान मन अपन काम अउ बात बानी ले नान्हें लइका मन के अंतस मा अँजोर फइलात राहय।किस्सा कहिनी सुनत नींद पर जय,रात अँधियारी कब पहा जय पता नइ चलय।नान्हें पन के सुरता आथे त रोवासी आ जथे,कैची फाक सइकिल चलाय बर मुड़ गोड़ फूट जय फेर सीखे के अइसन ललक भुलाय नइ जात हे।स्कूल के छुट्टी होतिस त गनढ़ुली ढुलई,मँझनिया तीरी पासा भोटकुल खेलई,बर पीपर के छाँव मा अंधी चपाट,गाँव के शीतला माई के परसाद खाय बर,इमली पेड़ मा भूत हे कइके डराय के शैतानी कोन भूला सकही।आँवला नवमी मा पेड़ तरी खाना बना के पिकनिक मनई,अँगना बारी के भाजी पाला,रात रात भर जाग के वीडियो,नाचा गम्मत देखई, रिमझिम बारिश के पानी मा भिँजई,राउत नाच मा बेशरम लकड़ी धरके 

नचई,चिरइ चिरगुन ला पकड़ के रँगई,खुल्ला अगास मा उड़ान भरई,मोटर गाड़ी देखे बर मोटर के पाछू पाछू भगई,अउ आखिर मा गुरुजी मन के स्कूल मा हमर कान ला जोर के अइँठई अइसे लागत हे कालीचे के बात हरे।अपन देहातीपन हा आज तको शहर मा आय के बाद भुलाय नइ जात हे।गाँव के माटी के सौंधी खुशबू,हमर संस्कृति परंपरा,तीज तिहार,मया करइया जम्मो मयारुक सियान, डोंगरी, पहार,नँदिया,नरवा,कुआँ,

बउली,हरियर खेती खार,धान के सोनहा बाली ह आँखी-आँखी मा झूलत हे।बोइर,जाम,सीताफल,चार के पेड़ हा टोरे बर बुलावत हे।तरिया पार मा बने पचरी कूद के नहाय बर रद्दा निहारत हे। नान्हें पन के सुरता हा दौना पान कस आजो महर महर ममहावत अंतस मा समाय हवै।हाँसी खुशी ले सबो मनखे मन गाँव मा सुख दुख बाँटय अउ नान्हें लइका मन के इतरई मा तको मया ला लुटावय।आज  लइकन पन के सुरता कर अउ उही लइकन उमर मा जाय बर अंतस ह हिलोर मारत हे।


विजेन्द्र वर्मा

नगरगाँव(धरसीवाँ)

हमर जमाना कस-केवरा यदु "मीरा "

 हमर जमाना कस-केवरा यदु "मीरा "


हमर जमाना कस अब कुछु नइ होवय पहली नवरात में दुर्गा  नइ पधारत रिहिन।

वो जमाना में दस दिन ले रामलीला  होवय पहिली रोज रिहर्सल में  जावंय बाबू जी कका बड़े पिताजी।

बाबूजी राम बने कका लक्ष्मण बड़े पिता जी रावण फूफा जी परसुराम।

कका के महापरसाद हा सीता बने 

साते बजे जगा पोगरा ड़रें बोरा बिछा के दस के बजत ले रामलीला चले।

पहिली दिन राम जनम होवय 

दूसर दिन छोटे लइकन देखावंय थोकिन बड़े होय गुरूगृह देखा दंय 

सीता स्वयंबर में बहुत मजा आवय फूफा खड़ाऊ पहिने राहय तेला कूदइ के मारे रिसिया के पांव ल पटक पटक के खड़ाऊ ला टोर ड़रें ।

अतका भड़के राम  बर क्यों  तोड़ा धनुष को  कहिके।

राम कुछु नइ काहय बस मुड़ी निहार के पांव परे मेरे हाथों  से ही टूटा कहके।

फेर लक्ष्मण हा बने घुंसिया के काहय धनुष  पुराना है हाथ लगाते टूट गया ।

का पूछत हस लाल आँखी देखावय परसुराम हा।


अइसने होवत सीता हरण होवय बन बन खोजे तब बाबूजी बिलाप करे पेड़ पौधा ल पूछे सुसक सुसक रोवय त मोर बाबूजी रोवत हे कहिके मँहू रोवंव।

सबो नर नारी मन दुख मा रोवंयं।

बाद में युद्ध चले त सबो ल मारत जाय त खुस होवन ताली बजावन।

एक दिन लक्ष्मण ला शक्ति बाण लगे फेर विलाप चले मैं बहुते रोवंव कका मर कहिके काबर।बाबूजी फेर रोवत राहय तब हनुमान जी हा संजीवनी लाने बर जाय तब लक्ष्मण जिंदा होय तब खुसी के ठिकाना नइ राहय।

रावण मर जाय तेकर बाद आखरी अब्बड़ चढ़ोतरी होवय धान के ।ओ जमाना में माइक घलो नइ राहय तभो जोर जोर से बोल के अपन पाठ ल सुनावंय ।

घर में बाबूजी रोज पढ़े उही उही ला पंदरा दिन पहिली ले सुन के मोरो याद  हो जावय ।अइसने रामलीला 

बहुत  दिन ले होइस  बाद मे  कहिन लेना जी अब तहूँ मन सीखो तब दूसर लइका मन सीखिन तीन दिन बर तीने दिन रामलीला होवय।


ओकर पाछू एके दिन होय ला धर लिस मोर बेटा राम बनिस छोटे हा राम  अऊ मंझला  हा लक्ष्मण काबर छोटे हा उंच पूर हावय रावण मारे के बाद आरती करंय सबो झिन अऊ चढ़ौत्री चढ़ावय।

अपन घर भीतर चौक पूर के घरो घर आरती करे बर बुलावंय राम लक्ष्मण बर नरियर राखे राहंय नही ते पइसा धरावंय पांव परें चरण ल धोके पियंय अतका श्रद्धां भक्ति  राहय।

अब कहाँ पाबे रावण घलो नइ मारिन ये साल ।

कोनो साल फटाका ला भरके रावण बना देथें ।राम रावण बन के संवाद चलथे रावण ला बाण में आगी लगा के मार देथें ।

ओती  वहू रावण ल जला देथें फटाका भड़ाभड़ भुटगे।

जिकर लइका राम  लक्ष्मण बनथे उकरे घर आरती होथे बस।


मोबाइल के जमाना आगे  रोज रामायण देखत हें टी वी में रोज सिरियल देखत हन।

ओइसने गाँव म पहिली मड़ई होवय रइचुली लकड़ी वाला आवय रंग रंग  के खेलौना आवय किसम किसम के मिठई पेड़ा गुलाबजामुन बड़ा भजिया  बेचाय बर आवय सिर्फ मड़ई भर के दिन आवय तेकर सेती हमन ला अगोरा राहय कब मड़ई होही खई खजाना मिलही येती ले ओती संगवारी मन संग घूमबो कहिके खुश होवन।


रात होवय नाचा पार्टी आवय टीला वाला नाच काहत लागे ।

आजू बाजू के दस गाँव के आदमी सकलावंय।

कंबल चद्दर ओढ़ के देखन रात पहा जावय।

यहू साल अभी कुछ दिन पहिली नाचा होइस हे।

मँहू गेंव देखे बर सब कुछ  बदल गेहे नचइ कुदई हा।

अब तो माईलोगिन बने रथे तेमन माइक ला धर के गाना गाथें अऊ नाचथें पहिली बाजा वाला मन गावंयँ।

झलप तीर के नाच पार्टी हरे बने हे अभी भी हँसावत हें जोकर मन नजरिया माइक धर के आथे गावत गावत, ढंग बदल गेहे फेर छत्तीसगढ़ के संस्कृति ला बचाय तो हावयं।

अमेरिका में  रहिथे बेटी  रायपुर के तौन हा नाचा में  कोन कोन रहिथे उंकर नाम का रहिथे का कहिके पुकारथें कहिके पूछत राहय रायपुर के बेटी हा अपन संस्कृति ला उंहा बताय बर।

मँय कहेंव जोकर रहिथे दू  तीन  एक ला नजरिया  कहिथें ।

नारी पात्र ला दू से तीन परी रहिथें नाचने वाली बन के सभी।

पुरुष होते हैं ।

क्या करते हैं कहिस मँय केहेवँ कहानी पर आधारित नाटक करथें 

भाई भाई के झगरा ।

कभू दहेज उपर कभू माँ बाप उपर।


कभू सास बहू के झगरा हँसाना रोवाना उकंर काम हरे।

अब नाचा घलो  नंदावत हे।

पहिली छठ्ठी में दारू मंद नइ चले नाचा पार्टी बुलावंय बने घर के।मन बडहर मन बाकी मन हरिकीर्तन बुलायं रामायण आजो चलत हे।।

नाचा हा साल भरमें एक बार हो जथे नंदावत हाबे जमाना के संग सबो बदल गेहे।

सब कुछ अब सपना लागथे पहिली कतका मजा रिहिस लइका पन में ।



केवरा यदु "मीरा "

राजिम

धान मिंजई बखत कोठार मा उलानबाँटी के मजा* हीरालाल गुरुजी समय

 धान मिंजई बखत कोठार मा उलानबाँटी के मजा*

हीरालाल गुरुजी समय

         हमर जमाना के गोठ होथे ता गाँव गंवई, खेती खार, बारी बखरी(कोला बारी), कुँआ बउली, नरवा ढोड़गा, माटी के खपरा वाला घर, फर्रस पथरा ला रच के बनाय पटाव वाला घर के फोटू मन आँखी मा झूलथे। चौमासा के चिखला वाला गली मा लुगरा टाँगे अउ कछोरा भिर के खेत जावत दाई माई जौन मुड़ी मा बासी धरे रेंगत दिखय, गली ले बइला गाड़ी, भँइसा गाड़ी मा ओहो, तोतो हाँकत किसान के अवाज। आज उही गाँव मा जाबे ता गली मा ओ पाहरो के देखे एको ठन क्रियाकलाप अब नवा पाहरो मा नइ देखेबर मिलत हे।

          कोला बारी मा कुँआ अउ ओमा लगे टेड़ा जेमा पाछू मा बइठ के उपर नीचे होय मा रहिचुली के मजा ले लेवन। गरमी मा रतिहा बिन पँखा के अँगना मा सुते अउ डोकरी दई के अछरा के हवा मा नींद कतका बेरा पर जावय ता पता नइ चलय। भरे तरिया ला ए पार ले ओ पार छू छुवाउल खेलत हाँसी ठठ्ठा मा नहाक देवन। आज शहर ते शहर गाँव के लइका मन एखर मजा ले दुरिहावत हे। काबर कि गाँव गाँव मा बोरिंग, घर घर मा नल लगे ले अब लइका तरिया जायबर अनाकानी करथे।

          मोला तो सबले जादा मजा धान मिंजई बखत आवय। हमर पाहरो मा बीएसपी इस्कूल मा चालीस दिन के दशरहा देवारी अउ इतवार संघेर के आठ-दस दिन के शीतकालीन छुट्टी देवय। मिंजई के बूता हा जादा शीतकालीन छुट्टी मा होवय। हमर पाहरो मा धान मिंजई हा दँउरी अउ बेलन मा होवत रहिस। जब गाँव मा रहेंव तभो अउ इस्कूल मा भर्ती होय पाछू घलो मिंजई मा संघरँव। मोला शीतकालीन छुट्टी मा मिंजई बखत गाँव भेजय। संझा संझा पेर डारय अउ दू ठन बेलन गाड़ी चले। आगू बेलन मा कका अउ पाछू मा बबा बइठय।हमर डोकरा बबा ला बीड़ी पीये के चुलुक लगे ता मोला बेलन मा बइला हाँके बर बइठा देवय। जब बबा हा बेलन हाँकत रहय तब बेलन के पाछू पाछू उलानबांटी खेलन। पैरा हा गद्दा बरोबर रहय, कइसनो उलन ले लागे के डर न छोलाय के फिकर। बइला मन रेंगत रेंगत गोबर देवय ता ओला उठा के फेंके के बूता घलो हमरे रहय। कभू कभू दूसर बियारा मा दउँरी चलत रहय ता उहाँ घलाव उलानबांटी खेले बर चल देवन।गाँव मा अरोसी परोसी के जहुँरिया लइका मन संगवारी रहय।  एक पइत कोड़ियाय पाछू खाय के बेरा हो जावय। डोकरी दई हा नइते काकी हा कोठर मा जेवन पानी धरके आवय। सबो झन कोठार मा एक तीर मा खूँटा गड़ा के उपर मा पैरा छा के बनाय झाला मा नइते बइला गाड़ी के खाल्हे कंडील के अंजोर मा भात खावन। खाय पीये पाछू फेर बेलन चालू होवय। अरोस परोस के सबो कोठार मा इहीच बूता चलय।कभू कभू कोड़ियाय बर एक दूसर के मदद घलो करय। अधरतिया के पहिली बइला ला ढील के उही झाला मा नइते बइला गाड़ी के खाल्हे सुतेबर तियारी करन। पहिली पैरा जठावन उपर मा कथरी गोदरी। गद्दा बरोबर बन जावय। सुते पाछू चद्दर अउ कमरा ला ओढ़हन। कतको जाड़ शीत रहय पछीना छूट जावय।

           बिहनिया बबा हा लाल चहा कोठार मा बनावय नइते डोकरी दई हा घर ले लावय तब मोला उठावय। ओखर पहिली कका,बबा मन कब के उठ के बेलन हाँकत रहय ता मोला पतेच नइ रहय। मुंह धोके चहा पीये पाछू फेर बिहनिया के कसरत मा उलानबांटी शुरु हो जावय। मिंजाय पाछू पैरा हटाय अउ ओला पेरावट मा लेगत ले आज के योगा, कसरत दउँड़ भाग सब हो जावय। पाछू नहाय बर जावँव, आवत ले अँगाकर रोटी घीव नइते चटनी संग आ जावय। बबा, कका के दतौन मुखारी सब कोठार मा होवय। रोटी खाय पाछू धान ला सकेल के कोठार के एक तीर रास बनावय। बहारय बटोरय अउ उखर जाय रहय ता काकी हा गोबर मा लीपय। ओमा काँवर काँवर पानी डोहारे के बूता कका अउ मोर रहय। ए बूता हा आठ दिन ले आगर चलय।मोर शीतकालीन छुट्टी इही उलानबांटी के मजा लेवई मा बीतय।

       आज ना सुर मा भारा डोहरइया दिखय, न खरही रचाय दिखय, न बेलन दउँरी के हँकइया। नवा जमाना हे सब बूता हार्वेस्टर, थ्रेसर मा होवत हे।अब तो नवा टाइल्स वाला घर मा कोठी घलाव नइ बनात हवय। राउत ला हाथा देवाय बर जगा नइ हे। गाय बइला हा गरु होवत हे।एक बखत अइसे आही कि धान के कोठी अउ गरवा कोठा जौन गाँव घर मा होही ओला नवा पाहरो के लइका मन ला देखाय बर सरकार हा योजना निकालही।


हीरालाल गुरुजी समय

छुरा, गरियाबंद

हमर जमाना मा.....* अशोक जायसवाल

 . *हमर जमाना मा.....*

अशोक जायसवाल

                          हमर जमाना मा... कहिके सब मनखे अपन अतित ल सुरता करत रोमाँचित हो जाथे | युवा वर्ग भविष्य ल सुरता करके प्रफुल्लित होथे | लइका मन तो वर्तमान मा जियत रइथे ते पाया के सदा खुश रइथे | आज विज्ञान के युग आय , सबो मनखे के पास ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुख सुविधा हावय | तभो ले खिन्न पना अउ एकाकी पन हावय |

                 हमर समय म मनोरंजन के अइसना साधन नइ रहिसे | सुवा, कर्मा, पंथी, नाचा पेखन देख के समय पहावत रहेन | कोनो गाँव म परी वाले नाच होवत हे सुनाई परत त सइकिल  म जाके रात -रात भर नाचा देखन | देवारी के पहिली नोनी मन घरो घर अउ दुकान म घलो सुवा नाचे ल जावय , फेर अब कमतिया गेहे | देवारी के बाद हमु मन राउत नाचे ल जावन, अउ परी संग म सिटी बजा बजा के ददरिया गावन  तहाँ ले दोहा पारतेन | देवारी म गौरी गौरा पूजा ल उत्साह अउ सौहार्द पूर्वक मनावत रहेन, फेर आज के बेरा म तो छोटे बड़े सब मंद मउहा पीके डंगफाँद मचाथे | भाईचारा, अपनापन हा धीरे धीरे नँदावत जात हे |

                   जइसे बेरा करवट लिस तइसे विज्ञान ह अपन रूप बदलत  गिस |नाचा पेखन के जगा विडियो, टी वी आगे वो कर बाद मोबाइल | मोबाइल ले तो मनखे मानो एक कुरिया म धँधागे | मोबाइल धरे मनखे ल बाजु म बइठे मनखे है तको नइ चिन्हय| जइसे विज्ञान ह नवा नवा संसाधन जुटाइस तइसे रोजी रोजगार घलो बाढ़ीस  हे | पहिली तो काम धंधा हा कमतिच  रहिसे हे | किराना दुकान म काम म लगे बर सिफारिश ले के जाय बर लगय  | रोजी रोजगार नइ मिले ले बेरोजगारी के दंश झेलत कतको झन आत्महत्या घलो कर लिन | फेर अभी के समय म अइसना नइ हे, काम ज्यादा हे लेकिन कमइया नइ मिलत हे| 

                                      तइहा जमाना हा समय के चद्दर ओढ़त नवा रूप धर लेहे | छंद के छ परिवार हा साहित्य साधना में उत्कृष्ट योगदान देवत हे | पहिली तो हमन साहित्य के जानकारी बर साहित्यकार मन के पिछलग्गू राहन, अपन डायरी ल धर के सुधरवाय बर आगु पीछु घुमत राहन | काव्य गोष्ठी जायके पहिली दरी उठाय बिछाय के काम करतेन तब एको ठन कविता बोलन देतीच | फेर आज जमाना बदल गेहे , तइहा के बात बइहा लेगे, अब इहाँ सबो साहित्यकार छोटे बड़े एक मंच म आगे | सबो ल सही मंच उचित सम्मान मिलत हे| अब समय हे अपन आप ल निखारें के, लगन अउ मेहनत करेके | तब हमु मन कहिबो "हमर जमाना मा....... |


    अशोक जायसवाल

धुरंधर वार्ड भाटापारा छ. ग.

      साधक - सत्र 13