Monday, 10 October 2022

नवमी मा नवा खाय के तिहार...

 नवमी मा नवा खाय के तिहार...


         हमर छत्तीसगढ़ राज्य मा हर परंपरा ल तिहार सही मनाये के अलगे महत्व हे। तिहार प्रेमी इहा के लोगन मन के उत्साह के तार भीतरी हिरदे ले जुड़े हे। इहाँ नवरात्रि के तिहार जब्बर ढंग ले मनाये जाथे। श्रध्दा भक्ति करईया मन नौ दिन ले मातृ-शक्ति के निमित उपवास करके नवमी के दिन समापन करथे। हमर कोती इहि दिन नवा खाय के तिहार घलो मनाथे। अलग-अलग क्षेत्र मा अपन हिसाब से, निहिते सियान मन के हिसाब ले चलागर रूप में कोई तय दिन में नवा खाथे। पर जादा मन नवमी के दिन नवा खाये के तिहार ल मान डारथे।


नवा खाय के तिहार नवा फसल के आये के खुशी म सबो किसानी करईया मन अब्बड़ उत्साह ले मनाथे। हरुना धान, सांटीया धान जरूर ये दिन के आत ले तैयार हो जाये रथे।


नवाखाई के दिन घर-दुवार ल बिहिनिया ले लीप-पोत डारथे। माता देवाला म तेल हरदी लेजे के बाद बैगा पूजा-पाठ, हुम-जग देके गांव के सुख-समृद्धि बर माता जी ले अरजी-विनती करथे। बैगा के हुम के देवात ले पानी भरना मना रथे। 


ये दिन छत्तीसगढ़ वासी मन बर अब्बड़ महत्व के हे, कमाए-खाये ल गे रथे, घर के दुरिया रहैया मन घलो अपन घर मे नवा खाय बर पहुंच जाथे।


सांटिया धान जेहर करिया रंग के होथे,ओकरे चाऊंर के नवा खाय जाथे। ये धान के चाऊंर एककनि ललहु रंग के होथे। येला भात में डारके, खीर बनाके, रोंट बनाके खाये जाथे। जादा आदमी मन रोंट बनाथे। कोई-कोई गांव म गांव भर बर माता देवाला म एक संघरा बनाथे। नवा धान के चाऊंर ल निकालके दूध में मिलाके घर के सियान हा प्रसाद सही सबो घर के सदस्य मन ला देथे। प्रसाद खाय के बाद घर के सबो छोटे मन बड़े के पांव परके आशीष पाथे।


रोंट ला घर के सियान हा सेना के आगी म अलग से देवता खोली म बनाथे। येला गहुँ पिसान मा शक्कर, गुड़, घी, दूध मिलाथे अउ सानके सुंहारी सही गोल-गोल बनाके सेना आगी म डार देथे। फेर चूरे के बाद निकाल लेथे जेहा देवता-धामी मा चढ़ाये जाथे। येला प्रसाद के रूप में खाय मा अब्बड़ सुवाद रथे। सियान ह अपन घर के देवधामी म चढ़ाथे,संग म नवा धान के बाल ल तिरशूल-बाना रथे तेमन धजा निम्बू चढ़ाके संगे-संग पूजा करथे।


नवा खाय के तिहार के दिन सबो परिवार मन घर में सकलाथे। घर में अईसन बेरा अब्बड़ खुशियाली के रंग जमे रथे। परिवार में आपसी प्रेम-भाव, आदर-सत्कार, लइका मन बर मया-दुलार सियान मन के हिरदे ले कुलकत रहिथे।


                                            हेमलाल सहारे

                                        मोहगांव(छुरिया)

अन्तस् के रावण कब मरही..?*

 *अन्तस् के रावण कब मरही..?*


दशहरा म हर बछर रावण ल मारे बर जाथन। रावण ल मार के गज़ब खुशी मनाथन । दूसइया बछर रावन फेर जिंदा हो जाथे आखिर कइसे..? त्रेता जुग म रावण होइस,त्रेता के बाद द्वापर अउ अब कलयुग आगे फेर रावण आज तक नइ मर पाइस । यदि मर जाय रहितिस तब हमन दुबारा वोला मारे बर अउ ओकर पुतला जलाय खातिर काबर जातेंन ? अब  ये चिंता के बात हवय कि आखिर मा ये रावण कब अउ कइसे मरही...?


दरअसल हमन बुराई ऊपर अच्छाई के जीत के प्रतीक के रूप रावण ल जला तो देथन फेर ये संदेश ला या तो हम समझ नइ पावन या जानबूझ के अपन जीवन मे उतारना नइ चाहन। बुराई तो मनखे के भीतर भरे हवय। नाना प्रकार के कुकर्म, चोरी,डकैती, हत्या, लूटपाट,बलात्कार, पर नारी के प्रति गलत भावना रखना ये सब रावणत्व के रुप आय। रावण के दस हाथ,दस मूड़ी अउ बीस आँखी रहिस तभो ओकर नजर केवल एक नारी  ऊपर रहिस। फेर वाह ले कलजुगी मनखे एक मूँड़ी  दू आँखी होके न जाने कतका नारी ऊपर नजर गड़ाये रहिथे। इन तो त्रेता के रावण ले घलो बड़का होगे हवय।


देश मा रोजिना बलात्कार के घटना होत रहिथे। ये बलात्कारी मन  रावण ले भी जादा निर्दयी हे। रावण तो सीता ल अपन महल म राखिस जरूर फेर वोला हाथ तक नइ लगाइस । फेर वाह रे कलजुगी रावण हो तुमन तो रावण ले वो पार होगे हावव। ये कलजुगी रावण मन समाज बर अभिशाप हे। नारी के सतीत्व ले खिलवाड़ करने वाला मन ला रावण ले भी बुरा मौत देना चाही।  आखिर समाज मे अइसन कुत्सित विचार रखने वाला अतेक रावण कहाँ ले पैदा होगे ये चिंता के बात हे। 


रावण के मृत्यु के एक अउ बड़े कारण रहिस अहंकार। महाज्ञानी, महाशक्तिशाली, त्रिलोक विजेता होय के बावजूद रावण के अहंकार वोला ले बूड़िस। फेर आज हमन ये बात ले सीख लेथन का..? नहीं । जब तक हम लोभ,मोह,मद,अउ अहंकार मा बूड़े रहिबों तब तक हम अपन भीतर के रावण ल नइ मार सकन । रावण के पुतला जलाए ले कुछु नइ होना हे, काबर रावण बाहिर म नहीं भीतर म हवय वोला मारना जरूरी हवय। 

दूसर के हक ल छीनना, दुख देना,धन अउ बल के घमंड, चारी चुगली, अन्याय, अत्याचार ये सब रावणत्व के प्रतीक आय। येला अपन भीतर ले जब तक नइ निकालबो राम के वास हमर घट म नइ हो सकय। घट घट में है राम बसे .. ये तो सबो सुने हव फेर अइसन दुराचारी मनखे मन के भीतर राम नहीं रावण वास करथे। 


अपन अंतस मा राम के वास कराना हवय तब रावणत्व के दुर्गुण ल छोड़ के राम के सदगुन ल अपनाय बर परही। खाली रामलीला करके रावण के पुतला जलाए ले का मिलही ? यदि राम के आदर्श ल अपन जीवन म नइ उतारबो तब राम के आराधना घलो व्यर्थ ही जाही। राम अउ सीता के जीवन चरित्र ला जीवन म उतारना ही सही मायने मा भगवान राम के पूजा होही। जब तक राम के आदर्श आम जन के भीतर मा नइ बसही तब तक कलजुगी रावण के विनाश असंभव हवय। मनखे तो सब एक आय ओकर चरित्रहीनता ही मनखे ल रावण बना देथे अउ सर्वनाश डहर धकेल देथे। 


रावण ल वरदान रहिस कि वोला तीनो लोक मा सुर या असुर कोनो भी नइ मार सकय। तब वोला श्रीराम जी मारिन जो कि मानव रूप म रहिन। वइसने रावण ल मारना हवय त राम के आदर्श ला अपन जीवन म उतारे बर परही। वो राम जेन अपन पिता के वचन निभाये खातिर बिना कोनो सवाल करे राज पाठ छोड़ के 14 बछर बर वनवास चल दिन। अउ आज हमन अपन माता-पिता के बात ल कतका मानथन, कतका सम्मान करथन ये सवाल अपन करेजा मा हाथ रख के पूछ्व जवाब मिल जाही। 


*अजय अमृतांशु*

भाटापारा

6 अक्टूबर जयंती म सुरता// छत्तीसगढ़ी लेखन ल अध्यात्म संग जोड़े बर जोर देवंय स्वामी आत्मानंद..

 


6 अक्टूबर जयंती म सुरता//

छत्तीसगढ़ी लेखन ल अध्यात्म संग जोड़े बर जोर देवंय स्वामी आत्मानंद..

   स्वामी आत्मानंद जी के जनमभूमि ग्राम बरबंदा अउ मोर पैतृक गाँव नगरगांव एक-दूसर के परोसी हे. हमर दूनों गाँव के खार ह आपस म जुड़े हे. फेर मोला स्वामी जी संग पहिली बेर संग म बइठ के गोठियाए के सौभाग्य सन् 1988 के दिसंबर महीना म तब  मिले रिहिसे, जब  हमन छत्तीसगढ़ी भाखा साहित्य प्रचार समिति के प्रादेशिक जलसा रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म करे रेहेन.

   ए समिति के संयोजक छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी रहिन. अध्यक्ष भाषाविद डा. व्यास नारायण दुबे जी अउ मैं सचिव रहेंव. तब मैं अपन नांव सुशील वर्मा लिखत रेहेंव. बाद म आध्यात्मिक दीक्षा ले के बाद गुरु आदेश ले जातिसूचक शब्द के जगा अपन इष्टदेव के नांव ल जोड़ेंव. हमन ए समिति के बइठका म तय करे रेहेन  के ए जलसा के मुख्य अतिथि स्वामी आत्मानंद जी ल बनाबोन कहिके. 

   इही जोखा के सेती हम तीनों रायपुर के विवेकानंद आश्रम गे रेहेन स्वामी जी ले  कार्यक्रम म आए के अनुमति ले खातिर. उही दिन मैं स्वामी जी संग पहिली बेर बइठ के गोठियाएंव. संग म बइठ के गोठियाएन त आत्मा ह तृप्त होए असन लागिस. कार्यक्रम के होवत ले दू-तीन पइत भेंट होइस. स्वामी जी हमर मन  संग आरुग छत्तीसगढ़ी म गोठियावंय गजब नीक लागय. वइसे तो स्वामी जी के प्रवचन सुने के अवसर कतकों जगा मिलत रहय. कभू विवेकानंद आश्रम के वाचनालय म अखबार पढ़े खातिर जावन त दरस मिल जावय. एकाद-दू पइत आकाशवाणी म घलो दरस हो जावय, जब वोमन चिंतन कार्यक्रम के रिकार्डिंग खातिर पहुंचे राहंय अउ महूं कोनो कार्यक्रम के सिलसिला म तब. फेर संग म बइठ के गोठियाए के अवसर  उही जलसा के आयोजन बखत मिले रिहिसे.

   जलसा म मुख्य अतिथि के रूप म कहे उंकर एक बात के मोला आज तक सुरता हे- उन कहे रिहिन के "छत्तीसगढ़ी लेखन ल जन-जन म लोकप्रिय बनाना हे, त एला अध्यात्म संग जोड़व. उन उदाहरण देवत कहिन के  तुलसीदास जी, सूरदास जी, कबीरदास जी अउ मीराबाई जइसन मन के रचना आज घलो सबले जादा पढ़े अउ सुने जाथे, एकर असल कारण आय, एकर मन के अध्यात्म संग जुड़े होना. जबकि साहित्यिक दृष्टि ले देखहू, त  एकर मन ले श्रेष्ठ रचना अउ दूसर मन के लेखन म आप मन ला देखे बर  मिल सकथे, फेर जेन लोकप्रियता ए मनला मिलिस, वो ह दूसर मनला मुश्किल हे."

    स्वामी आत्मानंद जी के जनम 6 अक्टूबर 1929 के गाँव बरबंदा, थाना- धरसींवा जिला- रायपुर म होए रिहिसे. बचपन के उंकर नांव तुलेन्द्र रिहिसे. उंकर सियान धनीराम वर्मा जी उही तीर के बड़का गाँव मांढर म तब गुरुजी रिहिन हें. कुछ बेरा के पाछू धनीराम जी के चयन उच्च शिक्षा के प्रशिक्षण खातिर वर्धा म होगे रिहिसे. एकरे सेती वोमन पूरा परिवार सहित वर्धा चले गे रिहिन हें. इहाँ ए जानना महत्वपूर्ण हे के स्वामी आत्मानंद जी के छोटे भाई अउ हमर छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार अउ राजगीत के रचनाकार डा. नरेंद्र देव वर्मा जी के जनम धनीराम जी के वर्धा म राहत ही वर्धा म होए रिहिसे.

   वर्धा म ही स्वामी आत्मानंद जी (बालक तुलेन्द्र)  सेवाग्राम आश्रम म महात्मा गाँधी जी के संपर्क म आइन. तुलेन्द्र बचपन ले ही बहुत प्रतिभा संपन्न रिहिन. उन बड़ मयारुक ढंग ले भजन गावंय. एकरे सेती उन गांधी जी के बड़ मयारुक होगे रिहिन. वर्धा आश्रम ले कुछ दिन बाद धनीराम जी अपन परिवार संग फेर वापस रायपुर आगे रिहिन अउ इहाँ के शक्ति बाजार म श्रीराम स्टोर खोल के जीवनयापन करे लागिन.

    इहाँ तुलेन्द्र ह सेंटपाल स्कूल ले प्रथम श्रेणी म हाईस्कूल के परीक्षा पास करीस अउ उच्च शिक्षा खातिर नागपुर के साइंस कालेज चले गेइन. उहाँ छात्रावास म उनला रेहे खातिर जगा नइ मिलिस, त उन उहाँ के  रामकृष्ण आश्रम म रेहे लागिन. इहें ले तुलेन्द्र के मन म स्वामी विवेकानंद के आदर्श ह संचरे लागिस. तुलेन्द्र नागपुर ले गणित म एम. एससी. के परीक्षा पास करीस. अउ संगवारी मन के सलाह म आईएएस के परीक्षा म शामिल होगें, जेमा उन दस झन पास होए लोगन म शामिल रिहिन. फेर मानव सेवा अउ विवेक दर्शन के जेन जोत उंकर मन म जलगे रिहिसे, तेकर सेती नौकरी के मोह म नइ परिन. आईएएस के मौखिक परीक्षा म शामिल नइ होइन.

   देश ल आजादी मिले के बाद उन रामकृष्ण मिशन म जुड़ गिन. 1957 म रामकृष्ण मिशन के महाध्यक्ष स्वामी शंकरानंद जी ह तुलेन्द्र के प्रतिभा ले प्रभावित होके उनला ब्रम्हचर्य के दीक्षा देइन, अउ उंकर संन्यास जीवन के नांव धरिन स्वामी तेज चैतन्य. तेज चैतन्य ह अपन नांव के अनुरूप मिशन ल आलोकित करीस. सरलग विकास अउ साधना सिद्धि खातिर उन एक बछर तक हिमालय के स्वर्गाश्रम म रहिन. उहाँ कठिन साधना ल पूरा करे  के  पाछू फेर रायपुर आइन. इहाँ स्वामी भास्करेश्वरानंद  जी के संग म रहिके संस्कार के शिक्षा लेइन, इहें फेर उनला स्वामी आत्मानंद के नवा नांव मिलिस.

  आत्मानंद जी स्वामी विवेकानन्द जी के रायपुर म बीताए दिन के सुरता ल अविस्मरणीय बनाए खातिर रायपुर म विवेकानंद आश्रम बनाए के बड़का कारज चालू  करिन. फेर एकर खातिर वोमन मिशन ले विधिवत अनुमति नइ लिए रिहिन हें, तेकर सेती बेलूर मठ ले उनला एकर स्वीकृति नइ मिलिस. तभो उन आश्रम के कारज ल पूरा करिन. फेर बाद म उनला बेलूर मठ ले संबद्धता घलो मिलगे. वोमन शासन द्वारा अनुरोध करे म इहाँ बस्तर के घोर जंगल के बीच नारायणपुर म घलो उच्च स्तरीय शिक्षा के केन्द्र स्थापित करिन. 

  वोमन अपन पूरा जिनगी ल नर रूपी नारायण के सेवा अउ शिक्षा म बीता देइन. 27 अगस्त 1989 के उन जब भोपाल ले रायपुर सड़क के रस्ता ले आवत रिहिन हें, तब राजनांदगाँव के तीर सड़क दुर्घटना म अपन आखिरी सांस लेइन.

    स्वामी जी के परमधाम जाए के समाचार रायपुर के सबो पेपर मन म पहला पेज के खबर बने रिहिसे. हमन पहिली बेर इहाँ देखेन के सबो पेपर वाले मन ए समाचार ल रिवर्स माने पूरा के पूरा करिया रंग म छापे रिहिन हें. अइसन समाचार रायपुर के इतिहास म दुबारा तब देखे बर मिलिस जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्या होए रिहिसे.

    स्वामी जी ल समाधि दे खातिर जब इहाँ के महादेव घाट ले जाए गिस तभो जेन जनसैलाब  देखे गिस वो आज तक रायपुर के इतिहास म देखे ले नइ मिले हे, जेन ह स्वामी जी के जनमानस के बीच के लोकप्रियता ल बताथे. वो बखत विवेकानंद आश्रम ले लेके महादेव घाट तक सिरिफ लोगन के मुड़िच मुड़ी दिखय, एको जगा पांव राखे के जगा तक नइ दिखत राहय.

    बहुत आगू दिन बीते के बाद मोर मन म स्वामी जी के ऊपर कुछ भजन लिखे के विचार होइस, त आठ-दस ठन रचना लिख के मैं स्वामी जी के सबले छोटे भाई अउ विवेकानंद विद्यापीठ के सचिव डा. ओमप्रकाश वर्मा जी ल देखाएंव. उंकर अनुमति मिले के पाछू रामकुंड रायपुर के प्रसिद्ध भजन गायक सुरेश ठाकुर 'पंडा' के माध्यम ले वोला संगीत अउ स्वरबद्ध कर के कैसेट के रूप दे रेहेन. उही म एक रचना ए मेर स्वामी जी न नमन करत प्रस्तुत हे....


आत्मा म आनंद भरइया स्वामी आत्मानंद

तोर संग मिल के लागिस जइसे मिलगे परमानंद...

जय हो स्वामी आत्मानंद...


मन मोर मइलाए रहिस हिरदे रहिस करिया

चिक्कन-चांदन उज्जर करे धोके तैं ह बढ़िया

मोह-माया अउ कपट के छोड़ाए तैं दुरगंध... जय हो..


राग-रंग म बूड़े राहन नइ जानन कुछू सेवा

तरी-उप्पर नाचत राहय पंड़की अउ परेवा

मिरगिन कस उछलन-कूदन ठाढ़ेच अड़दंग.. जय हो...


नाचा-गम्मत खेल-तमासा जिनगी इही लागय

दया-धरम के पाठ-पढ़ौना एतीच-तेती भागय

तोर सुर म सुर मिलाए कस अब जुड़ागे सबो अंग.. जय हो...

(संस्मरण संग्रह "सुरता के संसार" ले साभार)

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

छत्तिसगड़िहा कबि कलाकार

 छत्तिसगड़िहा कबि कलाकार


पानी हॅ जिनगी के साक्षात स्वरूप ये। जीवन जगत बर अमृत ये। पानी हँ सुग्घर धार के रूप धरे बरोबर जघा म चुपचाप बहत चले जाथे। जिहाँ उतार-चढ़ाव, उबड़-खाबड़ होथे पानी कलबलाय लगथे। कलकलाय लगथे। माने पानी अपन दुःख पीरा, अनभो अनुमान अउ उछाह उमंग ल कलकल-कलकल के ध्वनि ले व्यक्त करथे। पानी के ये कलकल- कलकल ध्वनि हँ ओकर अविचल जीवटता, सात्विक अविरलता अऊ अनवरत प्रवाहमयता के उत्कट आकांक्षा ल प्रदर्सित करथे। ओइसने मनखे तको अपन सुख-दुख ल, अंतस के हाव भाव ल गा-गुनगुना के व्यक्त करथे। वोहँ अपन एकांत म जिनगी के पीरा अऊ उमंग ल गुनगुनाथे जेला मानव समाज संगीत कहिथे। 

धान के कटोरा हमर छत्तीसगढ़ हँ गीत अऊ संगीत के अथाह-अपार सागर म उबुक-चुबुक हे। इहाँ कोनो किसम के खानी नइहे बल्कि छत्तीसगढ़ ल कहूँ कला संस्कृति अउ गीत संगीत के अगम दाहरा कहे जाही त कोनो किसम के अतिशयोक्ति नइ होही। कला अऊ संस्कृति हँ छत्तीसगढ़ के नस नस म लहू बनके दउँड़त हे। येह एकर संस्कार बन गे हे। जेन आज छत्तीसगढ़ के लोकगाथा अऊ लोकगीत बनके जन-जन म बगरे हे। सुआ, करमा, ददरिया, चंदैनी, पंडवानी, भरथरी ये सब गीत संगीत के विभिन्न रूप हरे।

ये हँ अभी के बात नोहय। कला अउ संस्कृति के धार हँ आदम जुग ले धरती म प्रवाहित होवत चले आवत हे। तभे आजो घलो दुर्गम जंगल भीतरी ले आदिवासी गीत-संगीत सुने बर मिल जथे। संगीत हँ मनखे के मन ल झूमे बर मजबूर कर देथे।

संगीत हँ मन के अतल गहराई म उतर जथे। ओला भींजो भींगो डारथे। अपन रंग म चोरो बोरो कर डारथे। तभे तो मनखे संगीत ल सुनते ही झूमे लगथे। ओकरे सेती संगीत ल साधना माने गे हे। एक समे तानसेन हँ बादर ल बरसे बर मजबूर कर दे रिहिसे। ए हँ संगीत ल साधना अउ साधक के शक्ति के रूप म प्रमाणित करथे। माने साधक, शक्ति अउ साधना के त्रिवेणी स्वरूप ही संगीत हरे।

साधना मँ शक्ति समाहित रहिथे। उही शक्ति के असर के कारण मनखे का देवता घलो झूमे लगथे। कहिथे भगवान भाव के भूखे होथे। सुरमयी संगीत म शक्ति अउ साधना के इही भाव हँ अंतर्निहित होथे।

भाव हँ जइसे देखावा तड़क भड़क ले दूर रहिथे। ओइसने संगीत ल घलो देखावा अऊ तड़क-भड़क हँ फूटे आँखी नइ सुहावय। फेर आजकल देखे बर मिलथे के संगीत के नाम म देखावा, तड़क-भड़क अऊ फूहड़ता के प्रदर्सन जादा होय लगे हे। एक समे रिहिसे जब संगीत हँ कान के रस्ता मन म उतर के तन ल झूमा देवय। अब ओइसन बात नइ रहिगे। अब संगीत के नाम म फुहड़ता बिके लगे हे। अब अइसे होगे हे कि संगीत चालू होईस अऊ अड़म-गड़म नाच कूद। संगीत बंद होइस, के भूला जा। जबकि संगीत के सार्थकता उही म हे जेला सुनके मन झूमय नाचय तन भर नहीं। असल संगीत तनमन दूनों म रच बस जाथे। अमिट छाप छोड़ जाथे। जेन हॅ बेरा कुबेरा अकेला दुकेल्ला में अंतस ले फूट परथे। जेला हम दुख या सुख के बेरा गुनगुनाए लगथन। 

संगीत के नाँव म अब हवस के प्रदर्सन होय लगे हे। माने आजकाल संगीत हँ हवस के पर्यायवाची होगे हवय।  

पश्चिमी सभ्यता के फुहार, आधुनिकीकरण के बौछार अऊ गूगलबाबा के गुजगुजिया व्यवहार के चलते आज संगीत घलो अपन रद्दा ले भटक गे हे। एकर ऊपर कुसंस्कृति के प्रभाव परे लगे हे।      

लोगन कहिथे के जमाना बदल गे हे। जमाना नइ बदले हे। सोंच बदल गे हे। हमला अपन सोंच ल बदले के जरूरत हवय। आजकाल संगीत के नाँव म सोर सुने बर मिलथे। जबकि संगीत म सोर बर थोरको जघा नइ होवय। अऊ जघा रहना भी नई चाही। सबके अपन अपन मरजाद होथे। अऊ मरजाद म रहिके कुछू चीज के मरजाद बांचथे। जइसे मरजाद मे रही के ही राम मर्यादा पुरूषोत्तम होईस।        

छत्तीसगढ़ में अइसे-अइसे जोरदार अऊ असरदार गीत संगीत हे जे हँ मन म उतर जथे अऊ भींजो के चोरोबोरो कर डारथे। फेर देखे बर मिलथे के इन मन छत्तीसगढ़ के सीमा ल लांघ के अऊ दीगर प्रांत म सुने बर नइ मिलय ए हँ एक ठो गंभीर अऊ सोंचे के बूता हरे।

छत्तीसगढ़ म ही कई ठो दीगर प्रांत, बोली, भाखा के गीत हँ बेधड़क घुसर के इंहाँ ऊँहा सोर मचावत हे। रंगझांझर मचावत हे। इन ल सुनके हमर गीत संगीत गँवा गे हे अइसे लगथे। जबकि ओइसन बात नइ हे। एकर पाछू हमर मानसिकता, हमर कमजोरी हँ जुवाबदार हे। एकर मतलब हमी कमजोर हवन। हम कहूँ भी जावन त अपन भाखा ल बोले बर लजाथन। अपन प्रांत के गीत संगीत ल सुनेबर सकुचाथन, दूसर बोली भाखा के गीत ल सुन के भले झूम नाच लेवन। ओतका बेरा वो बेंदरा नाच म हमला लाज नइ लागय। एकर ले इही मतलब निकलथे के हम आजकल देखावा करे लगे हवन। देखावा उही मन करथे जेमन सही बात ल नइ जानय। नइ समझय। जइसे थोथा चना बाजे घना।

अइसे नइहे के इंहा कोनो किसिम के कमी हे। कमी थोरको नइहे बल्कि ये सब हमर कमजोरी हरे। कहूँ अइसन कमी कमजोरी होतिस त सास गारी देवय ननंद मुंहू लेवय गीत म बंबई के संगे संग पूरा भारत नइ झूमतिस। टूरा नइ जानय रे नई जानय सहीं गीत के होंठ ल कोनो होटल-बार नई चुमतिस।

आज कपड़ा फेंक के नंग धडंग नचइया के देखइया, सुनैया सबो होगे हे। उन्करे मान सम्मान तको होवत हे। बहकत समाज अउ बरगलैया राज म जम्मो प्रमाण पुरूस्कार इही फूहड़ अउ लंपटमन के ओली म जावत हे। फूल अउ पान के कोनो चिनहार नइ रहिगे हे। जउन जेने डारा ल अमर पावत हे उही ल बुरच बुरचके खाए परे हे। कर्नप्रिय संगीत तइहा के बात होए लगे हे। एकर जुमेदार हमर संस्कार हे। हम ओइसने संस्कार म पलत-जीयत हन अऊ भविस ल उही संस्कार देवत तको हवन। 

पीछू एक ठन अऊ जबर कारण देखे बर मिलथे के हमार संस्कृति अऊ समाज के ठेकेदार मन खुदे नई चाहय के हमर संस्कृति, गीत, संगीत देसराज के सीमा ल लांघ के अपन परचम लहरावय। उन ल सिरिफ अऊ सिरिफ पइसा चाही। जेन प्लास्टिक के कैसेट जतका बिक जाय उही असली संगीत हरे।  जेन केसेट ले हम जादा से जादा पइसा रपोट सकन उही असली संगीत हरे। संस्कृति अऊ गीत संगीत के ठेकेदार बने बइठे परदेसिया मन ल छत्तीसगढ़ से कोनो मतलब नइ हे। न ही उन ल इहाँ के संस्कृति अऊ संस्कार से मतलब हे। उन तो कमाए रपोटे बर ही इहाँ डेरा डारे हावय त काबर इहाँ के संस्कृति ल आगू बढ़ाही। ओकरे सेती उन छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के नारा निकाले हे। जेन नारा म उन छत्तीसगढ़िया मन ल बाँध-छाँद के इहाँ के धन-दोगानी ल लूट सकय। 

इहाँ के बयपारी मन छत्तीसगढ़ी गीत संगीत ल आगू बढ़ाही या एकर बिस्तार करही त बाहिर के कला पारखी मन इहां के कलाकार, गीत संगीत ल पूछे-परखे लग जाही। जब अइसन होही त इहाँ के कलाकार मन के पूछ परख बाहिर म बाढ़े लगही। अइसन स्थिति म इन बनिया बयपारी मन के गुलाम कोन कलाकार रहिही। बस इही सोंच हर इहां के गीत संगीत ल आगू नइ बढ़ावत हे। उन सिरिफ कमावत हे। दूहत हे।     

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया नारा हँ हमर cड़ई नोहय। बल्कि हमर मंघार म जबर ठोसरा हरे। जेला मारके उन मीठलबरा मन हमन ल चुप करा सकय अऊ जतेक हो सकय कमा -लूट सकय।

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के मतलब इहाँ के मनखे बढ़िया हे जेन दबे रहि सकथे। अपन हक बर नइ बोल सकय। इहाँ के माहौल बढ़िया हे जेमा बाहिर ले गैर कानूनी काम करके लुकाए-छिपे रहि सकथन। इहाँ प्राकृतिक सम्पदा भरपूर मात्रा म हे जेला बाहिर म बेंच के हम जादा ले जादा पइसा कमा सकथन, ए नारा के पीछू इंकर इही नीयतखोरी उजागर होथे। 

ए नीयत ल अब हमला पहिचान के फरियाए बर परही। ए नारा के ठोसरा ल उलटा उंकरे मंघार म मारे बर परही। अपन हक मरजाद खातिर मुँह उचाके जुवाब देबर परही। हमला अब दब के नइ रहना हे। बल्कि आँखी ल उघार के चारो मुड़ा देखे परखे बर परही अऊ साबधान रहे बर परही। तभे हमर संस्कृति बांचही। हमर छत्तीसगढ़ बांचही। हमर भविष्य बांचही। 


छत्तिसगड़िहा कबि कलाकार सुक्खा दीया के बाती ।

बरसिस बादर चुहिस चार दिन मु¡ह फारे ओरवाती।।


सीधवा मरगे ददा भाई म जेने जइसन पाइन जोतिन ।

काम सिरागे दुख बिसरागे नीचो निमउ कस छेछरा फेकिन।।

ये बीता भर पेट के खातिर उमर पहागे छोलत छाती।.............


पइसा सबले बड़े मदारी जस पा ले गा के चटुकारी ।

कतको झिन बंदूके म सटक गे कोनो सुरा संqदरी के दुवारी।।

ओगरत झिरिया ल पाट डरिन रहिगे धरे कला के थाती।.................


हरेक गाॅव म चार पाॅच झिन मिल जाही जी कबि कलाकार।

साधन संगी संगत नइहे दिन पहावथे घूमत खार।।

निकल परिस त चिन्हैया नइहे मॅंजइया मन होगे घाती।......................


चुहत पसीना घाम पियास म गोबरहिन हे जतका सुग्घर ।

ओतका ओग्गर हीरवइन नइ होय पोते पावडर उपर पावडर।।

भइगे परदा म नकल उतारथे बिहिनिया सांझ पहाती।...............................


         धर्मेन्द्र निर्मल


 मोबाईल नं. 9406096346

मानकीकरण के रद्दा म छत्तीसगढ़ी..

 मानकीकरण के रद्दा म छत्तीसगढ़ी.. 

    छत्तीसगढ़ी भाखा म साहित्य सिरजन तो सैकड़ों बछर ले होवत हे. आज हमर आगू म लोकसाहित्य मनके अथाह खजाना दिखथे, तेन ह वोकरे परसादे आय. फेर ए भाखा ल एकरूपता दिए खातिर उदिम थोर कमतिच दिखथे. एकरे सेती लोगन अपन-अपन सोच अउ उच्चारण के मुताबिक लिखत अउ बउरत रेहे हें, अभी घलो वइसने च बउरत हें.

     छत्तीसगढ़ी व्याकरण खातिर उदिम तो काव्योपाध्याय हीरालाल जी के सन् 1885 म लिखे 'छत्तीसगढ़ी बोली का व्याकरण'  किताब ले देखे बर मिलत हे. एकर पाछू अउ कतकों विद्वान मनके घलो किताब आइस, फेर सर्वस्वीकारिता कोनो ल नइ मिलिस. सन् 2000 म अलग छत्तीसगढ़ राज के गठन के बाद ए बुता म अउ जादा गति देखे बर मिलिस. खास करके 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग' के गठन के बाद एक भरोसा जागिस के सरकारी मंच के माध्यम ले जेन निर्णय लिए जाही, तेला सबो एक सुर म मानहीं, अउ वोकरे मुताबिक छत्तीसगढ़ी के लेखन करहीं.

    राजभाषा आयोग के पहला अध्यक्ष श्यामलाल चतुर्वेदी जी संग ए संबंध म गोठ करे गिस, त उन कहिन- 'मोला लागथे, के अभी हमन ल मानकीकरण ले जादा साहित्य के लेखन डहार जादा जोर देना चाही. जादा ले जादा साहित्य लोगन के आगू म आही. सब एक-दूसर के रचना ल पढ़हीं. वोमा के अच्छा-अच्छा शब्द मनला बउरत जाहीं, तहाँ ले अपने-अपन मानकीकरण हो जाही.

    राजभाषा आयोग के दूसरा अध्यक्ष दानेश्वर शर्मा जी संग घलो ए विषय म गोठ करेन, त उन हाँ एकर ऊपर तो ठोस बुता होना चाही, कहिन अउ सिरतोन म ए रद्दा म पाॅंव घलो राखिन. एक दिन पूरा प्रदेश भर के पोठहा साहित्यकार भाषाविद मनला सकेल के आयोग के ही हाल म एकर ऊपर चर्चा करवाइन. ए चर्चा म सबो विद्वान मन डहार ले एक बात ऊभर के आइस, के देवनागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण ल छत्तीसगढ़ी लेखन म बउरे जाना चाही, छत्तीसगढ़ी के लेखन म कहूँ दूसर भाखा के शब्द ल बउरथन त वोला जस के तस लेना चाही. वोमा कोनो किसम के टोर-फोर नइ करना चाही.अब शिक्षा के अंजोर के संग लोगन आने भाखा ले आने वाला शब्द मनके उच्चारण शुद्ध रूप म करथें, त लेखन म घलो शुद्ध रूप के ही उपयोग करना चाही.

    ए बइठका के पाछू एक अउ बइठका कर के वोमा मानकीकरण खातिर अंतिम निर्णय लेबोन कहे गिस, फेर दूसरइया बइठका के आरो शर्मा जी के कार्यकाल के सिरावत ले नइ मिलिस.

    हाँ, दानेश्वर शर्मा जी के कार्यकाल म राजभाषा आयोग डहार ले सलाना जलसा के बेरा एक स्मारिका छपवाए के उदिम घलो करे गिस. ए स्मारिका खातिर चार झन  साहित्यकार मनके संपादक मंडल बनाए गिस, जेमा- डाॅ. परदेशी राम वर्मा, जागेश्वर प्रसाद, रामेश्वर शर्मा अउ सुशील भोले ल संघारे गिस. वइसे तो संपादक मंडल म चार सदस्य रेहेन, फेर एकर जम्मो पोठहा बुता ल मोर जगा करवाए गे रिहिसे, तब मैं आयोग के अध्यक्ष, सचिव, जम्मो सदस्य अउ संपादक मंडल के सदस्य मनले स्मारिका के भाखा ल मानकीकरण खातिर होए बैठक चर्चा के अन्तर्गत रखे जाय का? कहिके पूछे रेहेंव, तब कहे गे रिहिसे- जब तक मानकीकरण के बुता ह सर्वसम्मति ले पूरा नइ हो जाय, तब तक लोगन जइसे लिख के दिए हें, वइसने छापे जाय कहे गे रिहिसे.

    मानकीकरण ले रद्दा म राजभाषा आयोग के तीसरा अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार पाठक जी के कार्यकाल म पोठहा बुता होइस. 22 जुलाई 2018 के दिन बिलासपुर म डाॅ. विनोद कुमार वर्मा जी के संयोजन म आयोजित राज्यस्तरीय संगोष्ठी म सर्वसम्मति ले प्रस्ताव पारित करे गिस- "छत्तीसगढ़ के राज्यपाल द्वारा 11 जुलाई 2018 के अधिसूचित राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 2007 (धारा 2) के संशोधन के अनुरूप छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण बर देवनागरी लिपि (वोकर 52 वर्ण मन) ल यथा-रूप अंगीकृत करे जाही, जेला केन्द्र शासन ह हिन्दी भाषा खातिर अंगीकृत करे हे.

    ए राज्यस्तरीय संगोष्ठी म छत्तीसगढ़ के जम्मो ठोसहा साहित्यकार अउ भाषाविद मन संघरे रिहिन हें. ए पूरा कार्यक्रम के लेखाजोखा राजभाषा आयोग के कार्यवाही रजिस्टर म लिखाय हे, तभो ले आज खुद राजभाषा आयोग अउ वोकर ले जुड़े लोगन काबर वोकर पालन या अनुसरण नइ करत हें? ए ह ताज्जुब के बात आय. काबर आज अध्यक्षविहिन आयोग के सचिव ह छत्तीसगढ़ी के व्याकरण अउ मानकीकरण खातिर एक-दू पइत अउ बइठका कर डारे हे. अभी राजभाषा आयोग द्वारा साहित्यकार मनला दिए जाने वाला प्रशस्ति पत्र म घलो 'जुन्ना ढर्रा' म लिखाय शब्द  मनके दर्शन होवत हे. तेन ह एकर सोर देवत हे. जबकि राजभाषा आयोग के 2018 के संगोष्ठी म पारित प्रस्ताव के मुताबिक वोकर जम्मो कारज होवत रहना रिहिस.

    मन म एक बात इहू उठथे- का सत्ता म आए बदलाव के संग पहिली के सरकार के बेरा म पारित प्रस्ताव घलो बदलगे या वोला राजनीतिक प्रस्ताव जइसन कचरा के संदूक म झपा दिए गिस? जबकि होना तो ए रिहिस, के वो प्रस्ताव ल शासन प्रशासन के संगे-संग जतका भी ठीहा य छत्तीसगढ़ी भाखा ल कोनो न कोनो रूप म बउरे जावत हे, सबो म लागू करवाय के उदिम करे जाना रिहिसे. भरोसा हे, जिम्मेदार लोगन के ए मुड़ा चेत जाही.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811

Saturday, 1 October 2022

व्यंग्य - पंडाल सजाए चंडाल

 व्यंग्य - पंडाल सजाए चंडाल

उप्पर वाले हँ एसो अइसे बरसइस के भूइँया के संगे-संग तन-मन-धन सबो के मइल बोहा-धोवागे। ‘छकछक-ले’ धोवाए मन म ‘भकभक-ले’ धरम के बिरवा फूटगे। कुंवार म ‘चकचक-ले’ देवी दरसन के चुलुक ‘खबखब-ले’ ठढ़ियागे। 

‘धन-दोगानी के बाढे ले साध अउ साधन दूनों के गोटानी बाढ़ जथे।’

अइसे साध अउ साधन दूनों के साँठगाँठ होए ले ही धरम के रद्दा पोठ होथे।

साध अउ साधन के अगिनकुंड म कहूँ सुविधा अउ सहयोग के समिधा मिलगे ताहेन मनखे के मुक्ति म कोनो दुविधा-बाधा नइ रहि जाय।

साध ल धर-पोटार फटफटिया उठाके चलेन सहर कोति। अभीन के समे म सहर के देवीमन सँऊहत जागरित अउ अबड़े फुरमानुक होथे कहिथे। जाके फटफटी ल खड़ा भर करे पाए रहेन, दूझिन कुंवारामुँहा टुरामन लाहकत तीर म आ गे। उन लाल-पिंयर परची के जीभ ल लमावत कहिन- ‘गाड़ी स्टेण्ड के परची कटा।’

‘गाड़ी स्टेण्ड के परची।’ हम अकबकाए-बकबकाए पूछेन-‘गाड़ी स्टेण्ड के का-कइसन परची भाई ?’

‘तुँहर देवी दरसन के करत ले गाड़ी के रखवारी हम करबोन।’

‘रखवारी के का जरूरत हे ?’

‘निच्चट भोकवा हस यार। तुमन ओति देवी दरसन म भुलाए रहू अऊ एति गाड़ी ल कोनो लेगे त ?’

‘अरे ! कइसे ले जही जी। सबो दरसन खातिर आए हे। इहाँ कोन गाड़ी के पीछू परे रहिही भई।’

‘श्रद्धालुमन सब दरसन करे म भुलाए रहिथे, चोर-ढोरमन ल थोरे दरसन-वरसन से मतलब रहिथे। हम ये मेरन फोकट छाप काबर खडे हन ?’

मोर ‘ठकठक-ले’ खलपट्टा मन म ‘खटखट-ले’ खपटहा विचार ‘खलबल-ले’ खलबलइस - ‘ये मन काबर खड़े हे ?’

मोला उन्कर मन के खड़े होए के कारण समझ म आ गे।

कउवाके दूठिन गुटका के पइसा वो कुंवरहामन ल देके फटफटी के परची कटाएन। फटफटी के ‘फटफट-ले’ जी छोड़ाके आगू बढ़ेन। अतका भीड़ कि मुड़ी-पूछी के चिन्हारी नइ रहय। 

उहाँ सिवजी के बराती बरोबर एक ले बढ़के एक जीव रिहिसे। गेंड़ी कस ‘ढंगढंग-ले’ दू पाँव के रहिते मन से विकलांग। ‘बटरंग-ले’ बड़े-बड़े आँखी के रहिते देखब के अँधरा, नीयत के निच्चट खोटहा अउ अबड़े छोटे आँखी के मनखे। तन ‘फकफक-ले’ ओग्गर अउ मन निच्चट बिरबिट करिया। किसम-किसम के सुरहा-बैसुरहा मनखे गा, अब काला बताववँ।

देवी के सुन्दर अउ सुग्घर रूप के दरसन खातिर सुर म जस गीत गावत मनुज तुल्य कुछ असुर-बैसुर। देवी के अँगना म नाचत-इतरावत-झूमत-गावत-रिझावत मनखे तुल्य लंगुर, सबो पधारे राहय।

ओइसनेहे साहर के देवी मन तको सजे-सँवरे मार लकलक-लकलक, चमचम-चमचम बरत-झूपत रहय। 

कइसनो करके पंडाल के तीर म पहुँचेन। उहाँ जाके देखेन, पंडाल के बाहिरे म दुवार तक जाए बर रस्ता अबड़े घुमावदार रिहिस। ‘चमचल-ले’ बाँस बल्ली बँधाए टेड़गा-बेड़गा साँप सहिन घूम के दुवारी तक पहुँचे रहय। जम्मो मनखे जिनावर उहाँ ओरी-ओरी लगे राहय। हमू सबके पीछू ल धर लेन। मुड़ी ल पेलत घुसरे लगेन। वो मेरन सेउक बने दू झिन अऊ बन के रक्सा बइठे रहय। वो बन के रक्सामन बाँस के अड़ंगा लगाए रहय। भगत अउ साऊ मनखे मन बर हरेक जगा अड़ँगा लगे रहिथे। वो अडँगा नइ होवय भलकुन भगत मन के भक्ति के परीक्षा होथे। वो रक्सा मन हमन ल देखके कहिस-

‘टिकिट देखाओ जी।’

हम सकपका गेन, पूछेन - ‘वो कहाँ मिलत हे भाई।’

‘वो देख, सोझ आगू म मिलत हे’ - वो हँ अंगरी देखावत कहिस।

उहाँ जाके का देखेन ? उहों दू किसम के टिकट। एक सुध्द भक्तमन बर दूसर असुध्द भक्त मन बर। शुध्द भक्त मन के टिकट 100-रू. अषुध्द भक्त मन के 10 रू.। टिकट बेचइयामन संतषिरोमणि-निर्माही महात्मा बरोबर परमभक्त स्वरूप रहय। जब हम उन्कर ले देवी दरसन खातिर टिकट के कारण जानना चाहेन त उन ‘रज्झ-ले’ सोझ कहिस - 

‘अरे उजबक ! देवी-देवतामन अइसनेहे फोकटइहाछाप दरसन नइ देवय। तपे बर परथे, खपे बर परथे। तुँहर सहीन ‘ऐरे-गैरे नत्थू खैरे’ मन ल अइसने दरसन दे देही, त ओकर महानता अऊ ओकर रचे माया के का महात्तम रही जही। भगवान कहूँ सोज-साहज मिले लगिस तब तो कर डरिस भगवानी ल। फेर हमार अतेक भक्तिभाव, साज-सिंगार अउ विग्यापन के दुकानी के का होही। निच्चट गँवार अउ भकलामन नइ समझव। समझदार होते त का करे ल अइते, अपन घट के ही देव ल मनइते।’

‘हम उन परमपुरूष मन के अमृतबानी ले परमग्यान के रसपान करके धन्यवाद देवत आगू बढ़ गेन।

टिकट ल तीन-चार परत मोड़-चिमोटके धरे हम अपन पारी के बाट जोहत लाइन म खड़ा होगेन। हमला खड़े-खड़े आधा ले एक घंटा होगे। पारी आएच् नइ रहय। जी कऊवागे रहय। हमर घुसरे के दुवारी के बाजू म शुध्द भक्त मन के घुसरे बर अलग दूवारी बने रहय। सुद्ध भक्तमन ल पारी लगाके बाट जोहे के जरूरते नइ परय। उन आवय अउ बुलुंग ले बुलक जाय। हम हालत-डोलत खड़े बोटोर-बोटोर देखते रहन।

ओतके बेरा मोला उन सिद्धपुरूसमन के संतवाणी सुरता आ गे- ‘अरे उजबक ! देवी-देवतामन अइसनेहे फोकटइहाछाप दरसन नइ देवय। तपे बर परथे, खपे बर परथे। तुँहर सहीन ‘ऐरे-गैरे नत्थू खैरे’ मन ल अइसने दरसन दे देही, त ओकर महानता अऊ ओकर रचे माया के का महात्तम रही जही। भगवान कहूँ सोज-साहज मिले लगिस तब तो कर डरिस भगवानी ल। फेर हमार अतेक भक्तिभाव, साज-सिंगार अउ विग्यापन के दुकानी के का होही। निच्चट गँवार अउ भकलामन नइ समझव। समझदार होते त का करे ल अइते, अपन घट के ही देव ल मनइते।’


हमर घुसरे के दुवारी मेरन एक ठो बडे जनिक रक्सा के मुड़ी बने रहय। वो रक्सा के मुड़ी हँ अपने-अपन अबड़े जोर-जोर से हाँसत राहय।

हम मुँह फारे सोचत ओला बोक-बाय देखते रहिगेन।

हमर मुँह फारे सोचई-गुनई अऊ मुँह फारके जम्हावत पारी के बाट जोहई ल देखके घेरी-बेरी वो सरलग हाँसत रहय- ही ही हा हा। ही ही हा हा। ओकर अपने-अपन हँसई ल देखके एक झन नानचिन नोनी अपन ददा ल पूछे लगिस-

‘ये घेरी-बेरी अपने-अपन काबर हाँसथे बाबू ?’

ओखर ददा कहिस - ‘हमन अपन घर के सँऊहत देवी-देवता, दाई-ददा के सेवई-पुजई ल छोड़के अपन मिहनत के कमई ल इन खखाए-भुखाए रक्सा मन के भूख मड़ाए बर फोकटइहा फेंकत हन तेकर सेति हाँसत हे बेटी। एहँ हमर मूर्खता ऊपर हाँसत हे।’

ओतके बेरा शुद्ध भगत मन के ओरी म खड़े एक झिन शुद्ध भगत पिला हँ तको अपन ददा ल  पूछ परिस - ‘ये घेरी-बेरी अपने-अपन काबर हाँसथे डैड ?’

वो मनखे के बुद्धि तो भ्रस्टाचार म भ्रस्ट होगे रहय। विकास के चक्कर म हँफर-हँफर के दँऊडत, एण्ड-बेण्ड करत वो ह धरम के डेडलाइन ल पार कर डारे रहय, त का जुवाब देवय बिचारा ह।


ओकर बगल म खड़े गरीब, गँवार अउ गदहा टाइप दिखत एक झिन दादाजी कहिस - ‘हमर फोकट अउ चंडाली के कमई हँ थैली म बोजाए-बोजाए अकबका-बकबका जथे। वो अकबकई-बकबकई म हमन झन अकबका-बकबका जान कहिके वोला पंडाल के चंडाल मन ऊपर चढ़ावा चढ़ाथन तेकर सेति हाँसत हे मोर बच्चा ! एहँ हमर महानता अउ अहम ऊपर हाँसत हे।’ 

उन्कर रोंठ-पोठ ग्यान-गोठ ल सुनके मोर अंतस के कुकरा जाग गे। बाँग देवत कहिस  - ‘सिरतोन काहत हे रे येमन हँ, अब तो चेत।’

कइसनो करके गिरत-अपटत झाँकी देखत दाई के दरसन करेन। बाहिर निकलके देखेन भंडारा लगे रहय। काँही बूता बर भले पीछुवा जावन, फेर खाए के नाम हमन अगुवा रहिथन। येहँ हमर भारतीय सोच, संस्कार अउ सभ्यता के परम पहिचान अउ प्रमाण हरे। हम उही कोति दऊड़ गेन। 


उहाँ जाके देखेन उहों मार मरे-जियो चिथो-चिथो माते रहय। कोनो कहय - हमू तो चंदा दे हन। कोनो कहय -हमर बेटा वालन्टियर हे। त कोनो ह खिसियावत रहय - हमर चंदा के चरन्नी के पुरति नइहे अतका खिचरी ह। चोरो-बोरो ल सुनके एक कोंटा म हमू मुड़-कान ल पेलत घुसर गेन। ऊहाँ का देखथन बँटइयामन मनखे चिन्ह-चिन्ह के खिचरी बाँटत हे। बने-बने मनखे ल बला-बलाके उन्कर टिफिन-डब्बा, कटोरा, बाँगा म भरत रहय अऊ हमर असन निजोर, भूखाय अउ गँवइहा मनखे मन ल धुत्कार के भगा देवय। हम सोच म पर गेन। यहा काय धरम ये गा ? जिहाँ भरे पेट ल मरत ले खवावत हे अऊ भूखन ल भगावत हे।


मोर कान म फेर वो संतवाणी गूँजे लगिस - ‘अरे उजबक ! देवी-देवतामन अइसनेहे फोकटइहाछाप दरसन नइ देवय। तपे बर परथे, खपे बर परथे। तुँहर सहीन ‘ऐरे-गैरे नत्थू खैरे’ मन ल अइसने दरसन दे देही, त ओकर महानता अऊ ओकर रचे माया के का महात्तम रही जही। भगवान कहूँ सोज-साहज मिले लगिस तब तो कर डरिस भगवानी ल। फेर हमार अतेक भक्तिभाव, साज-सिंगार अउ विग्यापन के दुकानी के का होही। निच्चट गँवार अउ भकलामन नइ समझव। समझदार होते त का करे ल अइते, अपन घट के ही देव ल मनइते।’


हम फेर एक बेर मुँह फारे सोचते रहि गेन। मैं कान ल धरत बुड़बुडाएवँ - ‘ये पंडाल ले दूसर पंडाल अब जाबेच् नइ करवँ।’

धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

ग्रामीण अर्थशास्त्र मा छत्तीसगढ़ के नारी के भूमिका- चोवाराम वर्मा बादल

 ग्रामीण अर्थशास्त्र मा छत्तीसगढ़ के नारी के भूमिका- चोवाराम वर्मा बादल

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हमर छत्तीसगढ़ राज्य ह कृषि प्रधान राज्य आय।इहाँ धान, गेहूँ,कोदो-कुटकी, तिली,राहेर , तिंवरा,तिली,ज्वार अउ गन्ना आदि के फसल पैदा करे जाथे। सबले जादा धान के फसल होथे तेकर सेती एहा धान के कटोरा के रूप म सरी दुनिया म प्रसिद्ध हे। 

    छत्तीसगढ़ के लगभग 70 --75% आबादी ह गाँव म रहिके खेती किसानी के बुता करथें। छत्तीसगढ़ के कुल रकबा के लगभग 35 % म फसल उगाये जाथे।इहाँ जीविका के मुख्य धरखंध खेती किसानी ह आय। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अर्थ व्यवस्था ह कृषि उपर टिके रहिथे। फसल बने होगे त अर्थव्यवस्था दँउड़े ल धर लेथे अउ कहूँ फसल कोनो भी कारण ले नइ होइस त चरमरा जथे,अर्थव्यवस्था बइठ जथे। 

    कृषि के एक अंग के रूप म पशुपालन ल तको गिने जा सकथे काबर के हमर छत्तीसगढ़ म दूध उत्पादन के संगे संग जैविक खाद गोबर बर, छेना के रूप म ईंधन बर अउ खेती किसानी के काम जइसे नागर जोते बर, गाड़ा-गाड़ी इँचे बर पशु पाले जाथे।

       कुल मिलाके देखे जाय त छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार कृषि(खेती-किसानी) ह आय जेमा आज के समे म हमर आधा आबादी नारी मन के मुख्य भूमिका हावय। उँकर बिना तो अब खेती किसानी होना संभव नइ रहिगे हे।

     गाँव के पुरुष मन दू पइसा कमाये बर शहर पकड़ लेवत हें। फेक्ट्री मन म रोजी-मजदूरी कर लेवत हें।बहुत झन तो भले बेरोजगार होके बइठे रहि जावत हें फेर खेत कोती ल हिरक के नइ निहारत यें। खेती किसानी बर पुरुष मजदूर खोजे नइ मिलयँ। अइसन विषम परिस्थिति म खेती किसानी के अधिकांश काम ल महिला मन पूरा दमखम ले करत हें। कहूँ वोमन अपन पूरा घरेलू काम ल करे के बावजूद खेती किसानी ल नइ समँहालहीं  त भूखमरी अउ गरीबी छा जही।

       जइसने असाड़ के आरो मिलथे तइसने गाँव के खेत मन म काँटा बिनई, दूबी-काँद छोलई अउ खातू बगरई के काम म किसनहिन महिला मन भिंड़े दिखथें। बिजहा छिंचे के काम जेला प्राय: पुरुष मन करैंं तेनों ल अब नारी परानी मन करत हावयँ।कहूँ कहूँ नारी के मजबूत हाथ म नागर के मुठिया तको दिखथे। खेत जोते-बोये के काम तको ल महिला मन अब ट्रेक्टर ले करवाये ल धर लेहें।

   खेती किसानी के अधिकांश काम जइसे--नाँखा-मूँही बाँधना,  रोपा लगई,पानी पलोइ ,निंदई-गुड़ई, धान कटई,मिंसई,उड़वई आदि ल नारी मन करत हें।पुरुष श्रम शक्ति के योगदान नगण्य होवत जावत हे।

     जिहाँ भी बड़े-बड़े फार्महाउस हें अउ उहाँ साग-सब्जी या कोनो फसल के उत्पादन होवत हे उहँचो अधिकांश मजदूर महिला हें। कम मजदूरी म पर्याप्त महिला मजदूर मिले के कारण ये फार्म हाउस वाले मन मनमाड़े लाभ कमावत हें।

          महिला मन अपन घर के बारी म तको साग सब्जी उगा लेवत हें ।ओइसने पाले पशुधन के गोबर कचरा,दाना-पानी के संग जतन करे के बोजहा ल तको नारी शक्ति  थाम्हें हें।

    छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अर्थव्यवस्था  ल सजोर करे म महिला स्वसहायता समूह मन के गतिविधि उल्लेखनीय अउ स्तुत्य हे। गरीब ग्रामीण महिला मन समूह बनाके सहकारिता के गुरुमंत्र ल अपना के  छोटे-बड़े उद्योग धंधा चलाके अच्छा लाभ कमावत हें अउ अर्थव्यवस्था ल मजबूती प्रदान करत हें।ये संबंध म सरकारी प्रोत्साहन ,अनुदान आदि ह खाद-पानी के काम करत हे। कतेक महिला मन कुटीर उद्योग तको चलावत हें ,मुर्गी पालन,बकरी पालन, मछरी पालन आदि तको करत हें जेकर ले उँकर बेरोजगारी ह दूर होबे करिस--आनो मन ल रोजगार मिलिस। महिला मन के अइसन उदिम ले परिवार ,समाज अउ गाँव म खुशहाली के अँजोर चुकचुक ले बगरत हें।


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़