Sunday, 11 December 2022

वीरनारायण सिंह जइसन दद्दा देखइया कब आही

 वीरनारायण सिंह जइसन दद्दा देखइया कब आही 


          भारत देश के अजादी बर लड़इया छत्तीसगढ़ के पहिली शहीद छत्तीसगढ़िया वीर नारायण सिंह ला आज कोन नइ जानय। छत्तीसगढ़ के लइका लइका ,चेलिक जवान मन अब ओकर गाथा अउ वीरता के गीत गावत हे।वीर नारायण सिंह के नाम ले के गरीब छत्तीसगढ़िया,अउ आदिवासी मन के छाती घलाव फूल जाते। छत्तीसगढ़ के मजदूर, किसान, आदिवासी अउ संघर्ष के दद्दा मा रेंगइया,शोषण के खिलाफ लड़इया मन वीर नारायण सिंह ला आदर्श मानत अउ जुलूस हड़ताल मा ओकर फोटू के पूजा करके कसम खाथँय कि अन्याय के खिलाफ लड़बो अउ जीतबो।

     वीर नारायण सिंह के जनम कसडोल जनपद के गांव सोनाखान मा माने जाथे। ओला गोंड़ राजा के कुल के माने जाथे फेर आदिवासी बिंझवार जाति के मानता जादा हवय। उँखर कुल देवता, राजदेवता डोंगरी मा बिराजे कुर्रुपाट ला बताय हवय।कुर्रुपाट देवता वीरनारायण सिंह के सबले बड़का देवता रहिन जिहाँ उँखर संस्कृति परम्परा के संगे संग अंग्रेज मन के गुलामी ले मुक्ति बर संघर्ष के खरी डराय रहीस।इही कुर्रुपाट मा चेलिक नारायण के दिन शुरु होवय अउ दिन बीतय। अपन चितकबरा घोड़ा मा बइठ के गाँव ले आय फरियादी, किसान, वनवासी, आदिवासी मन के दुख पीरा ला हरे बर गाँव गाँव घुमय। कहे जाथय के ओला हिम्मतवाला मन ले अड़बड़ मया रहय।कोनों अंग्रेज संग लड़ई झगरा करके अउ एकोझन अंग्रेज ला दू चार चटकन मारके गांँव ले खेदार के आवय ओखर मनके पीठ मा हाथ रखय अउ डरपोकना मनखे ला चिटको नइ भावय।

        जमीदार रामराय के घर जनमे वीर नारायण के मुँड़ मा जमीदारी के बोझा चेलिक उमर मा आ गय रहीस जब ओकर ददा हा ए दुनिया ले चल दीन। कम उमर ले ओकर हिरदे मा जनता के भलाई करे उनला ला सुखी देखे के सपना देखय। नारायण सिंह अंग्रेज मन के दलाल साहूकार मन के बैरी बने लगिन। एक बेरा देश मा करिया अंकाल परगे। मनखे खाय पीयेबर दाना दाना बर तरसे लगिन।गाय गुरु मवेशी मन घलाव पैरा भूसा बर तरसे लगिन।जनता त्राहि त्राहि होगे। क्षेत्रभर के जनता मन अपन समस्या लेके नारायण सिंह के तीर आय लगिन।भूख ले तड़पत अउ मरत मनखे मन के दुख ला नारायण सिंह देख नइ सकिस।ओहा साहूकार माखन के गोदाम मा भराय अन्न के भंडार लूट के जनता मा बँटवा दीन।एखर जनाकारी अंग्रेज मन ला होइस ता ओला पकड़ के जेल मा डार दिन अउ किसान बनिहार मन उपर अइताचार करे लगिन।जेल मा ए बात नारायण ला जनाकारी होइस ता रातेचकुन जेल के तारा टोर के जनता कर आगे अउ चेलिक जवान मोटियारी मन ला सकेल के  दू किसम के दल बनाके गाँव के रक्षा दल अउ अंग्रेज मन संग लड़इया दल मा बाँटके क्षेत्र मा अंग्रेज मन के दखल ला दुरिहाइन। अंग्रेज मन नारायण सिंह के नाम ला सुनत काँपे लगिन।इही बखत ले जनता ओला बहादुर नारायण सिंह कहे लगिन।

         अंग्रेज मन अपन हाथ ले दुरिहात क्षेत्र ला कब्जियाय बर अउ बहादुर नारायण सिंह ला पकड़े बर नवा नवा दद्दा खोजिन अउ नवा नवा अंग्रेज अफसर इलियट अउ स्मीथ संग सिपाही मंगाइन। बिना विभिषण रावण नइ मरे वइसने अंग्रेज मन ओकर बहिन दमाद ला लालच देके बहादुर नारायण सिंह ला पकड़ डारिन।कछेरी अदालत सब उँखरे रहिस ता 19 दिसम्बर 1857 के दिन फांसी मा टांगे के सजा सुनाइन। नारायण सिंह उपर जनता के मया अतका रहिन कि ओकर बर अपन प्राण दे देतीन। जेल मा हमला करके ओला छोड़ा डारतीन। अंग्रेज मन ला एखर भान हो गे रहिस। एखर सेती वीर नारायण सिंह के नाव ले डर्राय अंग्रेज सरकार हा सजा के दिन ले नौ दिन पहिलीच 10 दिसम्बर 1857 के रायपुर मा जिहां आज जयस्तम्भ चौक हवय उहां फाँसी देय पाछू तोप मा बांध के उड़ा देईन। जनता के हित बर लड़इया वीर ला जनता ले सदा सर्बदा बर दुरिहा देईन।

     वीर नारायण सिंह के इतिहास ला अंग्रेज मन संदूक मा तारा देके लुका दे रहिन। अजादी मिले पाछू घलाव ओखर बलिदान के शोर खबर कोनों ला नइ रहिस।एक बेरा मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी ला अपन जेल यात्रा के बखत वीरनारायण सिंह के इतिहास गजेटियर मा पढ़ेबर मिलीस पाछू ओमन वीरनारायण सिंह के जन्मभूमि सोनाखान गीन अउ उँखर वंशज मन ले मिल के जनाकारी ले के आइन अउ अपन मजदूर संगठन के संगवारी मन संग मिलके शहीद दिवस मनाय के शुरुआत करीन। गरीब किसान बनिहार ला अपन हक बर लड़े बर जगाइन।पाछू सरकार घलाव एखर हियाव करिन अउ 10 दिसम्बर के वीरनारायण सिंह के शहीद दिवस मनाय के परंपरा के शुरुआत होइस।  

         आज देश आजाद होगे हवय फेर सत्तर बच्छर पाछू देश दू भागा मा बँटाय हवय अमीर अउ गरीब, पूंजीपति अउ बनिहार, शोषक अउ शोषित। आज घलो गरीब के लहू पीयइया अउ अपन तिजोरी भरइया, भ्रष्टाचारी मन बड़हर बनत जावत हे। बड़े बड़े अधिकारी मन इलियट अउ स्मीथ बनत हवय। किसान के खेत खार कंपनी, उद्योगपति मन कब्जियावत हे।ओकर फसल के सही दाम नइ मिलत हे, उत्पादन ला औने पौने मा दलाल मन लेवत बेचत हे। कारखाना मा बेरोजगार नवजवान मन के लहू चुहकत हे। जाति धरम में बाँट के एक दूसर ला लड़ावत अपन राज करत हे। अपन हक बर लड़इया ला जेल,पुलिस अउ गोली मा टीपत हे। टेक्टर अउ मोटर गाड़ी मा रउँदत हे।कृषि कानून के विरोध करइया मन उपर अइताचार करत हें, एखर बर वीर नारायण सिंह जइसन दद्दा देखइया कब आही।


हीरालाल गुरुजी "समय"

छुरा,जिला-गरियाबंद

Monday, 5 December 2022

एकठन लंबा कहिनी -रामनाथ साहू: -



 


एकठन लंबा कहिनी -रामनाथ साहू: -



                   *कलाकार*

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        -रामनाथ साहू      



                     *(1)*



           पानी हर पोठ बरसे रहय।सबो कोती हर  गिल्ला... पलल- पिया करत रहय। मनखे मन कन्हरहा माटी के पैडगरी म,  खोभ के पांव मढावत ,रेंगत रहिन।



              जगदीश घर कोती ल तिंवरा कउले के कहर हर जबरदस्ती नाक म पेलत रहय। सलोनी के महतारी हर लखाड़ी तिंवरा म बने नुन- पानी  ल मोय के घाना म ओइरे होही । अतका गुनतेच रहिस हर नारायण के, वोकर  नाक म अब मूंगफली कउले के कहर पेले लागिस।



            चल हटा..तिंवरा रहय के मूंगफली ,के वो दुनो मन ।वोहर सलोनी अउ वोकर सियान- जगदीश के ही पुरता आय।



      नही ...नही  ...अइसन बात नइ ये !कभु घर पहुंच जाबे तब बराबर एक एक मुठा सबो जिनिस हर मिलही ।फेर वोला अभी तो  नाक अउ जीभ के सुवाद ल छोड़ के, यह दे कान  के सुवाद ल पूरा करे बर जाय बर हे। कान अउ कान ल कहुँ जादा मन ।अउ मन ले जादा  कहुँ हृदय।अउ हृदय ल कहुँ जादा आत्मा के आनन्द ल पूरा करे बर वोहर जावत हे।



          भजनहा, हर सरपंच- दाउ बहादुर सिंग के बैठक -खोली म अपन तमुरा ल बजावत -रंग रंग के भजन गावत हे  ।


सरपंच दाउ मतलब बहादुर सिंग हर गांव के गौटिया - दाउ तो पहिलीच ल हे।अउ कइसनों भी करके- डरा के धमका के पइसा म खरीद के जीत जाथे तब जितीच जाथे अउ तीन पंचवर्षीय होंगय गांव म एक छत्र राज करत हे।


वोकर कहना हे-



गउँटी गिस तब    लउठी गिस


फेर हमर कुछु नइ  बिगडिस ।



अब तो-



सील आ गय ठप्पा         आ गय


कौरा गिस  त अब गप्पा आ गय ।



         पूरा गांव म वोकर  दबदबा हे।दिन म कम से कम दु पइत ,वोहर अपन ढक... ढक ... करत बुलट -फटफटी म गांव के चक्कर जरूर लगा लेथे। कुछु भी करथे ,फेर एक घरी भजनहा  के भजन  घलव सुन लेथे।



          फेर पानी गिरे हे आज।सब कोती नरवा पूरा -संय... मोय ...संय ...मोय करत हें।अइसन म ब्लॉक जनपद जिला के चक्कर लगाना तो नइ बनय।तेकर सेथी आज घर म है।



      अउ भजनहा हर तो अपन तम्बूरा ल धर के घरों- घर किंजरत हे। पानी गिरे के करा... !वोला फरक नइ पड़ना  ये।वोहर मांगे -जांचे बर नइ जाही तव फेर...?



         सरपंच...माफी सरपंच दाउ- बहादुर सिंग हर वोला अइसन झक्खर म घरो -घर भटकत देखिस तब हुकुम देय रहिस के आज इहाँ बइठ तीर म अउ तम्बूरा बजावत बढ़िया ...बढ़िया भजन सुना कहके।ये पाय के,आज भजनहा  हर दाउ के बैठकी खोली म ही बइठ के भजन गावत हे।वोकर भजन हर  बनेच धुरिहा ल सुनावत हे।



          अउ  नारायण हर वोइच भजन मन ल सुने के नाव म सरपंच खोली कोती सरनटावत जात रहिस-ये चिखला माटी म लटपटात ।



          सरपंच खोली म अउ बनेच झन मनखे ठुलाय रहंय।ले दे के नारायण घलव एक ठन कोनहा म ठउर पाइस।


नारायण के आंखी म कुछु तो नइ दिखिस ।फेर नाक हर तो बतात रहिस के अभी अभी ये जगहा म बम भोले  चले हे।गांजा के कहर हर पूरा बैठकी भर गमगमात रहे।


" चल भजनहा, अब ब्रम्हानन्द के एको ठन भजन जान दे।"बहादुर सिंह के ठनकत आवाज निकलिस।


"मोला ब्रम्हानन्द के भजन मन बने लागथें ,बिहारी..!"वो अब तीर म बइठे बिहारी ल साखी देवत कहिस।



'नारायण जिनके परिपालक


तिनको कोउ दुखाय सके रे।


प्रह्लाद भक्त को डारा अगन में


रोम न एको जलाय सका रे।


          


          - भजनहा किल्ली गोहार पारत गावत रहय।फेर तमुरा हर वोकर पूरा साथ देवत रहय।  पाके तुमा के मुड़ बाँस के हाथ -गोड़ ।दु तीन तार के कसावट।फेर हाथ के घुंघरू बंधाय लोचनी म  छेड़े जाय, तब नाद ब्रम्ह हर साक्षात अवतरे भजनहा के हाथ ले।



      बिना कॉपी- कलम के सौ सैकड़ा पद मुँह जबानी याद।कतको बेरा -कनहुँ करा गवा ले।एको पद आन -तान नइ होय। बिना पढ़े -गुने घलव वोला राग- रागिनी मन के बढिया समझ।आन कनहुँ गवइया मन ल जरा भी येती- ओती बहकत सुनथिस तब वोला हाँस के सँवार लेय।अउ कंठ म तो सरस्वती साक्षात बइठे रहिस। असली सरस्वती रहिस वोकर रोज के गायकी।भले ही भीख -भवन मांगत हे, फेर ये बुता म हर रोज वोहर चार- छै घण्ठा कण्ठ साधना कर डारे। जाने अनजाने वोहर रियाज कर डारे।



"वाह.. भजनहा ! मजा आ गय...! चल तोर भीख पक गय एके घर म ।"सरपंच दाउ कहिस।


"गौटिन...!"वोहर घर कोती अवाज दिस,"ये भजनहा बर पव्वा दु पव्वा चऊर लांन दे।तिपो खाही अपन डेरा म।"



    अब दउ येती ठुलाय सुनइया मन ल सुनावत कहिस,"येला आज चिखला- पानी म लटपटात देखें ग ।तब मोला शोगासिन लागिस।चल कहाँ ....कहाँ भटकही सियान जात कहके मंय कहेंव,चल आज जुवार भर इहेंच बइठ अउ गावत रह ।तोर भीख के पुरता ल मंय अकेल्ला देवा दिहां तोला घर कोती ल।"


"का होइस बढ़िया करे सरपंच दाउ जी।" महेत्तर कहिस।


"ये दे अउ देवत घलव हंव।"सरपंच बहादुर सिंग कहिस,"गौटिन...!"


"हाँ...ये दे ले आने  हंव।" गौटिन दार -चाउर  ल मढावत कहिस।



       किलो अकन चाउर,एक ठोमहा दार, थोरकुन आन- आन तरकारी अउ पाँच सात आलू।


"अरे गौटिन ,तोला एको पव्वा चाउर लाने बर कहें रहंय।अउ तँय तो इहाँ गुरु बबा के चढोतरी असन जिनिस लांन के गदो देय न ।" सरपंच थोरकुन कंझात कहिस,"चल... चल ये तोर दार -आलू मन ल फ़िरो !"



    सरपंचीन कुछु नइ कहिस ।अउ वोकर देखउ म चाउर ल ना दिस, भजनहा के झोली म ।सरपंच अनते मुँहू करिस तब फेर वो सब  जिनिस ल भजनहा के झोली म रितो दिस।



          भजनहा अपन विदाग़री लेके विदा हो गय । फेर येती गउटिन चहा - पानी लानिस अउ वोकर आँखी हर येती ओती खोजिस-


"कोन भजनहा ल खोजत हावस ,गउटिन ..?"दाउ हाँसत कहिस ।


"हाँ...! जुवार भर ल गला के  नस ल टोरत रहिस।ये तिपत चहा हर वोहू ल बने लागे रइतिस ।"


"वोहर तो अब अपन घर पहुँच गय होही ।"


"बोपरा...!"


"गउटिन , छोटे मनखे ल जादा मुंड म नइ चढ़ाय...समझे। गउटिया घर के चहा -पानी बिहारी असन मन बर ये ।भजनहा बर तोर डेहरी ल बस दु मुठा भीख भर निकलत रहय ...सदाकाल।"दाउ हर खाली कप- प्लेट ल  टेबल म मढ़ावत कहिस ।



         गौटिन वापिस चल दिस फेर भजनहा ल अइसन झँखरहा म बने तिपत चहा नइ पिया पाये के मलाल वोकर चेहरा म परछर दिखत रहय ।



"बिहारी...!"गउटिया  तीर म बइठे बिहारी ल साखी देवत कहिस ।


" हाँ दाउ...!"


"ये साले भजनहा हर घलव बड़ विचितर हे ।"


"का हो गय वोला ...!"


"भले ही जान चल दिही फेर वोकर तमुरा ल कोई ल नइ छुवन देय ।"


"हाँ...येहर तो सच  गोठ आय ।" बिहारी घलव गौटिया के गोठ के समर्थन करिस।




                       *(2)*



             सरकार -दुआर ल अवइया जम्मो नावा जिनिस योजना मन दाउ सरपंच घर  म पहिली उतरथें ।सरपंच दाउ राखे के लइक बने -बने जिनिस मन ल राख लेथे वोमन  ल अउ निकलन नइ देय ।



              बड़े बड़े ग्यानी -गुनी कलाकार मन संघर्ष करिन तब सरकार हर गांव ग्राम के दुखी -भुखी कलाकार मन बर मासिक वृत्ति देय के घोषणा करिस हे।



              फेर अइसन सुपात्र  हक्कदार मनखे मन ल खोझे बर  - ये पंचायती राज वाले मन ल छोड़ के, अउ आन दूसर कौन हे ?



               दाउ सरकारी फरमान ल पढ़ीस । तुरतेच वोकर फैसला हो गय-


लोकगायक अउ लोकनर्तक पद बर  कोन - कोन फार्म भरिहीं।



" गउटिन, लोक गायक अउ लोक नर्तक कोन ...?"गउटिया रात के  गउटिन करा कहिस ।


"भजनहा अउ पीतर देवारीन... अउ कोन ।"गउटिन ,गउटिया के पांव म तेल मलत कहिस।


"तँय निच्चट भकर- भोली अस ।जिंदगी भर चार पइसा  मिले के गोठ हे। गांव के लोक गायक तोर बेटा उदयप्रकाश ...अउ लोक नर्तकी तोर बहुरिया कंचन समझे ...! बस ,अब चुप कर अउ सुत...! " गउटिया कहिस अउ घर्र... घर्र नाक बजावत सुत गय  ।



       येती  गउटिन के आँखी म नींद कहाँ...! वोकर आँखी के आगु म ब्रम्हानन्द के भजन ल जोर- जोर से गावत भजनहा हर कभु दिखे त कभु ...गौटिन तोर जुन्ना फेर बने साड़ी ल दे न  ओ ...कहत  पीतर देवारीन हर ।



        गौटिन बनेच नजर कर के  सुतत दाउ कोती ल देखिस-घर्र... घर्र नाक बजावत  मोठहा गरदन वाला बेडौल काया... जेकर रुंवा... रुंवा म ले  स्वार्थ के अमरवेल हर बगरत हे ।





                    *(3)*



"उदय प्रकाश...बेटा ,समझे न मंय का कहें तउन ल...!" सरपंच अपन पूत ल समझावत कहत रहिस।


"हाँ...। मंय समझ गंय बाबू जी ...।"उदय प्रकाश कहिस अउ शहर कोती चल दिस  अपन दुपहिया वाहन ले।



              दूसर जुवार जब वोहर वापिस आइस तब वोकर संग म  गरदन म आला- माला असन  कैमरा मन ल ओरमाय  एक झन फोटोग्राफर हर रहिस ।



               जेवन- पानी करत रात हो गय । अब फोटोग्राफर हर सरपंच दाउ करा गोठ- बात म मात गय ।


    


              येती उदयप्रकाश हर लुकात- छिपत निमगा चोरी -लुका सपटत ... सपटत भजनहा के कुरिया कोती जावत रहिस ।


"कइसे ननकी दाउ ...!आज रात ये पारा...!" कनक लाल वोला अइसन दबे सहमे येती आवत देखिस तब पूछिस।


"दाउ के हुकुम हे... गांव के पब्लिक के हाल -चाल देखे बर कभु कभु अइसन करे बर लागथे ।"उदयप्रकाश कहिस।



      कनकलाल हर दाउ के दूर -दृष्टि के कायल हो गय।दाउ हर ये जगह म अदृश्य रहिस, तभो ले वोकर  बर दुनों हाथ हर जुडिच्च गय ।



             येती उदयप्रकाश अपन मिशन म लग गय। योहर दबे पांव  भजनहा के डेरा म पहुंच गय। भजनहा तो कच्चा- पक्का चुरो- पको के नारायन अर्पन करत  परसाद पाके थिरा गय रहय ।


हाँ...तमुरा हर वोइच खूंटी म टँगाय रहिस।



             उदयप्रकाश के आंखी हर अंधियार म घलव चमक उठिस । वोहर कलेचुप जा के  वो तमुरा  ल  खूंटी ल उतार लानिस ।



                  अंधियार म चोरी -लुका वइसनहेच भागत अपन हवेली म आ गय। वोला सफल देख के दाउ हर मुचमुचाइस ।



           देखते -देखत उदयप्रकाश अउ  कंचन के  वेश हर बदल गय। सात दिन के  नइ खाय असन उदयप्रकाश..!


हाथ म तमुरा ...! पचासों रकम के पोज । ठीक अइसन कंचन ... अभिच्चे गली खोल म ल नाच के आवत हे।वोकर पोज पचास ले अउ भी जादा ।



          बुता छेवर हो गय ।उदयप्रकाश पुरा सावधानी ले भजनहा के तमुरा ल जे लोक ल ले के आय रहिस, सम्मान के साथ फेर वोइच लोक म छोड़  आइस ।



        सब करत धरत ल  बिहनिया पहागे फेर का होइस ...दुनों के एप्पलीकेशन फ़ाइल हर देखे के लाइक रहिस ।


         


            ये फ़ाइल मन, अब यात्रा  म आ गइन।पंचायत प्रस्ताव...सब सील- मुहर -दफ्तर- हस्ताक्षर एक्के झन करा हे । फ़ाइल उड़िस ।गांव ल जनपद ...।जनपद ल जिला...। जिला ल राजधानी...!



        फ़ाइल के  पांख हर कभु कमजोर होत रहिस। तब अपन बनाय विधायक ल फोन करवा के, चाहे  पंजा  के हरियर पत्ती मन ले वोमे नावा ताकत भरवा देय।



           फ़ाइल हर अपन जन्म सफल कर लेय रहिस अब ।




                      *( 4  )*



          सरपंच दाउ हर आज थोरकुन खुश हावे। वो जउन बुता ल  शुरू करे रहिस तउन हर सुफल हो गय हे ।उदयप्रकाश अउ कंचन लोकगायक अउ लोकनर्तक के रूप म सरकार- द्वार म  चढ़ गय रहिन ।



          येई खुशी म सरपंच हर छोटकुन पार्टी कहले के खाना -पीना के आयोजन करे हावय। 



        दाउ हर बड़ा धार्मिक प्रवृत्ति के मनखे माने अपन आप ल।वोकर पूजा- आंचा ल देख के अउ आन मन घलव वइसन कहें ।ये पाय के खाना म  सादा खाना हर रहिस अउ पीना म ' वो ' तो रईबे नइ करिस । दाउ ल अपन सात्विकता अउ धर्माचरण  बर थोरकुन आग्रह तो रईबे करिस ।



       बनेच अकन पहुना नेवताय रहिन ।  खाना- पीना बने जोरदार चलिस ।अब वोमन के मनोरंजन बर पीतर बाई के  नाच रहिस  अउ भजनहा के भजन रहिस ।



          स्टेज तो जोरदार बने रहिस ।फेर पीतर ल वोमे नाचे म आनन्द नइ आईस । वो तो दु भंवरी मारे के बाद तरी  भुइँया म आ गय ...अब तो वोकर उद्दाम नृत्य हर नटराज बर चुनौती हो गय रहिस ।



            पीतर बाई तो अउ नाचहां कहत रहिस ।  छोटे दाउ अउ बहुरानी मन कुछु होइन हें...!अतका समझ तो बरोबर वोला रहिस। दाउ के अइसन खुशियाली के बेरा  म नइ नाचबे तब ...अउ कब नाचबे ?



       फेर समय ल देखत सरपंच दाउ हर बोला सौ के कड़कड़ात लम्बरी  नोट ल खोचत शांत होय बर कहिस ।



    अन्न -धन- गउ -लक्ष्मी-माल - कोष- खजाना सबके बढ़वार के आशीष देवत नृत्य के बाढ़- पूरा हर उतरिस ।



       अब भजनहा के बारी रहिस-



      वोकरो अन्तस् म तो दाउ मन बर मया- दुलार छलकत हे । तब वोकर स्वर साधना  हर कमसल कइसे होही  ? पीतर तो पूरा साज- बाज के संग म उतरे रहिस अउ येती ओहर अकेला हे ।अकेला हे ...त का होइस  ।



      भजनहा हर तो स्टेज ल छू बे नइ करिस ।अइसन ऊँच जगहा म तो दाउ हर बइठथे...


   


"चल चल ठीक हे , तँय भुइँया म ही बइठ के शुरू कर ...अपन भजन मन ल...!" दाउ हुकुम दिस ।



     भजनहा सबके आगु म शीश नवाइस-



         आनी के बानी 


         चेरिया के सुभा


          कइसे म   तो


           जाये      राम


           मन मोर   नइ 


          लागे तोर भजन म ।



           आनी के बानी 


            चेरिया के सुभा


             कइसे म   तो


             जाये      राम


             मन मोर   नइ


           रमे तोर कीरतन म ।



           चिरई  चुरगुन ल


          अगासे म उड़े के


           सुख देये     राम


          मछुरी मछुरिया ल


          नदियां म तउरे के


          सुख देये      राम



         भजनहा बर सुख


         हावे तोर भजन म ।




       भजनहा माते हे भजन म...! फेर गौटिन के नंजर तीर  म सजे - वोइच तम्बूरा के संग म वोकर पूत उदयप्रकाश  के फोटो उप्पर परत हे ।



    गौटिन के आंखी ले दु बूंदी चु गय ।



*रामनाथ साहू*  -

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समीक्षा-

 पोखनलाल जायसवाल:

 हमर देश राज म जेकर लाठी तेकर भइँस के चलागन अभियो देखे जा सकत हे। गउटिया के गउटियई चल दे हे, फेर लोकतंत्र के आय पाछू घलव उँखर रौब अउ धाक ह जस के तस बने हावय। उँखर धाक तरी दुबके गरीब ह दिनोंदिन अउ गरीब होत्तेच हे। गरीब बर बने योजना मन तो नाँव लेखा गरीब बर आय। असल म तो जम्मो योजना हुसियार अउ नेता गढ़न लोगन मन बर आय, नइ त उँखर लगवार मन बर आय।

      लोगन अपन पसंद के कला ल चुनथें अउ बड़ लगन अउ जतन ले कला ल एक पहिचान दिलाथें। सरलग रियाज करथें, नवा पीढ़ी ल सउँपे के उदिम घलव करथें। उँखर समर्पण अउ सेवा जन जन ल मोह लेथे। लोक म अपन नवा छाप छोड़ जाथे। कला के जौन सच्चा साधक होथे, तौन कोनो किसम के तीन पाँच ल नइ जानय। उँकर हिरदे म सिरिफ कला अउ कला रहिथे। कला के बढ़वार ले उन ल बड़ संतोष होथे। उँकर संतोषी प्रवृत्ति के चतुरा अउ लालची मनखे मन बड़ फायदा उठाथें। अइसन चतुरा मन गाँव के सियानी ल अपने हाथ म रखे म माहिर होथें। आज सरपंच बहादुर सिंग जइसे कतको हें जउन मन गरीब मन बर बने जम्मो योजना मन ल बिलई सहीं सपटे ताकत रहिथें। उँकर असली हकदार के पेट ल मार के डकार मारे बर एक पाँव म खड़े तियार दिखथें। योजना बने म देरी हो सकत हे, फेर ओला झपटे म चिटिक देरी नइ होय। बहादुर सिंग मन बहादुरी दिखात योजना बनतेच साठ असली कलाकारी दिखाथें। सगा सोदर ल रातों-रात स्टार बनाके दम लेथें। योजना ल गटक डरथें अउ हकदार मन प्यासे मरत रही जथे। 

     उहें कला के पारखी मन कलाकार के संग होवत अनियाव ल देखत  दंग रही जथे। अपन विरोध ल बुलंद नइ करँय अउ अनियाव के भागीदार बन जथे। पछतावा भर करत रहिथे।

       ए कहानी कला के साधक भजनहा जइसे कतको कलाकार के संग होवइया अनियाव ल उजागर करे के उदिम आय। जिंकर ले सरकारी योजना ल दबा के रख दिए जाथे। 

      कहानी म चरित्र के मुताबिक़ संवाद ल गढ़े म कहानीकार सफल हें।  

     "...गउँटिन! छोटे मनखे ल जादा मुड़ म नइ चढ़ाय... समझे।"   

       ए गोठ ह सरपंच के आम आदमी के प्रति उँकर अंतस् म का हे? एकर परछो करा देथे। रामनाथ साहू जी नेतामन के करनी अउ कथनी के भेद ल उघार के रख दे हें।

      उहें सरकारी योजना के भर्राशाही ल उजागर करत लिखथें..

...नावा जिनिस योजना मन दाउ सरपंच घर म पहिली उतरथें। सरपंच दाउ राखे के लइक बने बने जिनिस मन ल राख लेथे ओमन ल अउ निकलन नइ दय।

       कहानी ल जौन ढंग ले विस्तार दे गे हे वो ह आँखों देखा सहीं जनाथे। इही ह कहानीकार के चतुराई आय।

     भजनहा अउ पीतर बाई जइसन कलाकार ले जादा दाऊ बहादुर सिंग के लालच अउ स्वारथ के चालबाजी, चतुरई अउ कलाकारी ह कहानी के शीर्षक ल सार्थक करथे।  उदयप्रकाश के महत्वाकांक्षा ह नवा पीढ़ी के विचार ले मेल खावत दिखथे, जे पीढ़ी ह कम मिहनत ले जादा कमई अउ प्रसिद्धि चाहथें।

   सुग्घर भाषा शैली म लिखे गे कहानी पाठक के मन मोह लेथे।  भ्रष्टाचार के पोल खोल के रखे म कहानीकार सफल हावय। बेवस्था के विरुद्ध सांकेतिक विद्रोह के सुर ल साजे कहानी बर कहानीकार रामनाथ साहू जी ल बधाई



पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी

Sunday, 4 December 2022

कहिनी "अनजतनीन"

 कहिनी

               "अनजतनीन"

कोनो चीज ल जादा मया-दुलार नई करना चाही,नही ते जादा मया जी के जंजाल हो जाथे।रमेश ओकरे फल आज भोगत हे।रमेश के दू झन बेटा अऊ एक झन एकलवतिन बेटी रिहिस भाग म कमाए रिहिस बिचारा त नौकरी म लगे रिहिस तभे अपन परिवार ल सम्हाले रिहिस।लईका मन ल ननपन ले बड़ सेज -संवार के राखे रिहिस।उखर जम्मो  जरुरत ल आगू ले आगू पूरा करे।बड़े बेटा राहुल ,ओकर बाद बेटी सोना ,अऊ छोटे बेटा लाला।पढ़ई म राहुल के कोनो मन नई राहय,फेर बाप के मन कहाँ मानही ,कतको  चमकाए-धमकाए ओकर कान म जूँआ तक नई रेगय। बाप के मन ताय बने पढ़लिख जाही त अपन पांव म खड़ा हो जाही।

             सोना एकझन एकलवतिन बेटी,दू झन भाई के एक झन बहिनी।दाई -ददा अऊ भाई मन के मया पलपलात राहय।सरकारी आदमी के काहां ठिकाना कभू इहां कभू उहां। गाव ,शहर भटकना  जईसे इंखर भाग लिखाय रहिथे।फेर लईका मनके जिनगी ल संवारे बर शहर के कवाटर म रिहिस ।सोना,ननपन ले ओखरो पढ़ई-लखई म कोनो कमी नई करिस।कहिथे बेटी लक्ष्मी बरोबर होथे।ओसने सोना के आए ले परमोसन ऊपर परमोनसन होईस।सोना पढ़ई

म बड़ चन्ट रिहिस।अब तो वो ह बारहवी पास करके कालेज जाए लगिस।अब के लईका मन पहिली असन नई रहीगिस,बड़ उदूकबूचहा(चंचल)मन के होथे।अब के संगी संगवारी मन का टूरी का टूरा सब एकमई।पढ़ते-पढ़त हम उमर के आनजात टूरा संग मन हारगे।इकर पढ़ई संग मया घला बाढ़े लगीस।ण 

         ऐती रमेश  बेटी के पढ़ई-लिखई म बड़ बड़ खुश राहय,अऊ रहि काबर नही भई बेटी घर के जम्मो काम- बूता म दाई के हाथ घला बंटाय।बोलचाल म घलो संसकारित राहय।बेटी ल दूसर के(पराया)धन कहिथे।उही धरम ल ददा निभाय बर नता गोता फरियाथे।फेर ननजतनीन अपन अंतस के गोठ ल मन म मोटरी कस बाँध लिस कोनो ल नई बताइस।सगा एक आवत आवत हे,एक एक जावत हे।कहूँ ठसा नई परत हे काबर ओकर मन म दूसर बर मया पलपलावत हे।कहीथे मया के आँखी म सब अँधियार होथे।ननपन के दाई-ददा के मया भाई के दुलार आज सब अबिरथ

फकीर साहू

छत्तीसगढ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा //*

 *//छत्तीसगढ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा //*

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     विगत चार दिन ले छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर साहित्यिक वाट्सएप पटल म बहुत महत्वपूर्ण विषय -" छत्तीसगढ राजभाषा आयोग ले मोर अपेक्षा" के संबंध म विमर्श जारी हवय,ये विमर्श म कई साहित्यकार मन खूब सुग्घर अउ उपयोगी विचार लिख के पटल म भेजीन हवंय,हिरदय ले साधुवाद |

      *सब ले पहिली -"छत्तीसगढ़ या छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग" के संबंध म एक निष्कर्ष तय करना जरूरी हवय | "छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग कहना सही हवय ? " के  "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग कहना सहीं हवय ?" कोई भी शब्द के हरेक मात्रा के खूब महत्व होथे,एक मात्रा गड़बड़ होथे,तौ अर्थ के अनर्थ हो जाथे,कभी-कभी तो शब्द के अर्थ म जमीन-आसमान के अंतर हो जाथे, जैसे :- कोटा शब्द के "ओ"  मात्रा के बजाय "आ" लिखा जाथे, तव "काटा" हो जाथे ! जैसे:-- हिन्दी शब्द के "दी" के बजाय "द" लिख देहे ले "हिन्द" हो जाथे, अर्थात भाषा ला व्यक्त नहीं करके "स्थान/देश" ला परिभाषित करथे | तईसनेच "छत्तीसगढ़ी" शब्द के "ढ़ी" के बजाय "ढ़" लिख देहे ले "छत्तीसगढ़" हो जाथे, अर्थात "भाषा" ला व्यक्त नहीं करके "स्थान/राज्य" ला परिभाषित करथे*

     *तेकरे सेती मोर मति अनुसार -छत्तीसगढ़ राजभाषा नहीं, बल्कि "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग ही होना चाही | कोनो भी मनखे या स्थान के नाम म एक मात्रा के अंतर या एक डाट ...के अंतर होए ले गूगल के सर्वर ह स्वीकार हरगिज  नइ करै या फिर "छत्तीसगढ़ के राजभाषा आयोग (करण कारक "के" प्रयोग ) होना चाही* |

      *सब से महत्वपूर्ण बात हवय- गूगल के सर्वर म "छत्तीसगढ़ भाषा" ला सर्च करबो,तव का दिखाई देही ? हरगिज नहीं, जबकि "छत्तीसगढ़ी राजभाषा" सर्च करबो,तब खच्चित दिखाई देही,हालाकि गूगल सर्वर म कोई भी बात ला साफ्टवेयर इंजीनियर,प्रोग्रामर या फिर जानकार मनखे ही अपलोड करथैं,तव सहीं अपलोड होना चाही*

       *छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग कहे म सरगुजिहा,बस्तरिहा भाई मन सहमत होहीं के नहीं ? अईसन समस्या नहीं हवय | काबर के रायगढ़ से ले के राजनांदगांव,अउ सरगुजा से ले के बस्तर तक हम छत्तीसगढ़िया भाई मन एक हवन*

     *जैसे- राष्ट्र भाषा हिन्दी के सहयोगी उपभाषा-बघेली, बुंदेलखंडी,अवधी,ब्रज भाषा हवंय,तईसनेच "राजभाषा छत्तीसगढ़ी" के सहयोगी -कुडुक,सादरी ,गोंडी,हल्बी ला पूरा सम्मान सदैव मिलही*

      *२८ नवंबर/२००७ के दिन "छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग संबंधी विधेयक सर्वसम्मति से पारित होईस,तब से ले के छत्तीसगढ़ी साहित्य के हर विधा म लेखन अउ प्रकाशन म तेजी आए हवय,साथ ही उच्च स्तरीय साहित्य सृजन होवत हवय*

    *छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के उद्देश्य :- १. राजभाषा ल संविधान के ८वीं अनुसूची म शामिल करवाना | २. छत्तीसगढ़ी भाषा ल राज-काज के भाषा के रूप में उपयोग मे लाना, ३. त्रिभाषायी भाषा के रूप म शामिल करवाना, इंकर अलावा "माई कोठी" अउ"बीजहा" योजना घलो संहराए लाईक हवंय*

     * *छत्तीसगढ़ राजभाषा  आयोग के उद्देश्य/लक्ष्य ह तभे सफल होही,जब सरकार ह अन्य महत्वपूर्ण विभाग के क्रियान्वयन बर जैसे करोड़ों, अरबों-खरबों रूपीया के बजट  आबंटित करथें, तईसनेच भरपूर बजट स्वीकृत करही,लेकिन साहित्य,कला, संस्कृति के उन्नयन अउ विकास बर सरकारी बजट "ऊंट के मुंह में जीरा के समान रहिथै,अर्थात "तैं खड़े रह,मैं आवत हौं" कथन चरितार्थ होथे,तऊन बहुत दुखद बात आय*! 

     *भाषा, साहित्य, संस्कृति के संरक्षण अउ संवर्धन बर सरकार ला अन्य अति आवश्यक सेवा विभाग के भावना से काम करना चाही | भाषा, साहित्य,कला, संस्कृति के विकास होही,तब राज्य ह स्वयं विकसित अउ गौरवान्वित होही | प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर जी ह छत्तीसगढ के साहित्य,कला, संस्कृति ला दुनिया के कई देश म प्रस्तुति दे के लोकप्रिय अउ गौरवान्वित बनाईस, पद्मश्री स्व. देवदास बंजारे के पंथी नृत्य, पद्मविभूषण डाक्टर तीजन बाई के पंडवानी गायन हा दुनिया भर में खूब लोकप्रिय होईस,ढोला-मारू,लोरिक-चंदा,भरथरी,कर्मा,ददरिया,सुवा नृत्य ह देश-विदेश म खूब लोकप्रिय हवय*

      *तईसनेच छत्तीसगढ़ी साहित्य के देश-विदेश म एक विशिष्ट पहचान होना चाही, लोकप्रिय होना चाही,तब "छत्तीसगढ़ी राजभाषा ह संविधान के 8वीं अनुसूची म स्वमेव जघा बना लेही | छत्तीसगढ़ी साहित्य बर लिपि के समस्या बिल्कुल नहीं है,साथ ही  उल्लेखनीय विशिष्ट साहित्य सृजन होवत जाही,तब मानकीकरण भी स्वमेव होवत जाही*

      *एक महत्वपूर्ण प्रयास करना जरूरी हवय-छत्तीसगढ म जत्तेक कम्प्यूटर,लेपटाप, मोबाईल उपयोग म लाए जाथे,ऊंकर बिक्री के पहिली से ही साफ्टवेयर म छत्तीसगढ़ी डिक्शनरी,व्याकरण,हाना इत्यादि अपलोड कर देना चाही,एकर से छत्तीसगढ़ी साहित्य के सृजन अउ बोल-चाल म आश्चर्यजनक ढंग से सुधार होही,साथ ही कम्प्यूटर,लेपटाप, मोबाईल म छत्तीसगढ़ी भाषा म टाईप करे से डिफाल्ट हिन्दी शब्द स्वमेव आने-ताने टाईप हो जाथे,तऊन समस्या से निजात मिल जाही*

     *एक अउ महत्वपूर्ण सुझाव देना चाहत हौं - छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष, सदस्य के नियुक्ति दलगत राजनीति से पृथक होना चाही |  सिर्फ ०२ सदस्य "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग म नियुक्त करें जाथे,तऊन संख्या ला बढ़ा के हर जिला म एक सदस्य के नियुक्ति होना चाही,तब  २८ जिला बर नियुक्त सदस्य मन अपन-अपन जिला के साहित्यकार लोककलाकार के सर्वांगीण विकास बर समर्पित भावना से काम करहीं,तब "छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग" के कामकाज हा सफल होही*

    *अन्य आयोग,मंडल, बोर्ड में सत्ता पार्टी के ब्यक्ति ला नियुक्त कर देथैं,जबकि साहित्य,कला, संस्कृति के उत्थान बर दलगत राजनीति से हट के योग्य व्यक्ति ला नियुक्त करना चाही*

    *साहित्यकार, लोककलाकार के आर्थिक सुधार करे बर पर्याप्त बजट स्वीकृत करना चाही, प्राथमिक, माध्यमिक कक्षा में मातृभाषा (दूध के बोली) छत्तीसगढ़ी माध्यम से ही पढ़ाई होना चाही, शिक्षक छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य में पारंगत होना चाही | अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में भी एक विषय छत्तीसगढ़ी अनिवार्य होना चाही |साहित्यकार लोककलाकार के उत्थान बर कल्याणकारी योजना जैसे:- बीमारी, दुर्घटना, मृत्यु के स्थिति में तत्काल आर्थिक सहायता मुहैया कराना चाही, साहित्यकार लोककलाकार ला यथायोग्य रोजगार के साथ ही पेंशन सुविधा उपलब्ध कराना चाही*

       *छत्तीसगढ़ी भाषा में बोलचाल शासकीय,अर्धशासकीय,निजी संस्थान के कार्यालय में अनिवार्य करना चाही | जैसे :- कोई उड़िया,बंगाली,गुजराती,मराठी, राजस्थानी,मलयालम,तेलगू,कन्नड़,तमिल भाषी लोगन अपन राज्य के लोगन से मातृभाषा में  ही बात करथैं,तईसने हम सब छत्तीसगढ़िया ला हाट-बाजार,बस स्टेंड, रेलवे स्टेशन,शापिंग माल,कस्बा,शहर में अपन भाषायी मनखे संग सिर्फ छत्तीसगढ़ी में ही बात करना चाही,तभे छत्तीसगढ़ी भाषा ह जन-जन के भाषा साबित होही*

      *छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के गठन होए लगभग साढ़े तेरह बच्छर हो गए हवय,लेकिन अपेक्षित उपलब्धि बहुत कम नजर आवत हवय | अभी हाल में ही छत्तीसगढ के कई मंडल, बोर्ड,आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य मन के नियुक्ति करे गईस हवय, लेकिन छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष, सदस्य के नियुक्ति करे बर का दिक्कत होवत हे ? समझ से परे हवय ? यथाशीघ्र योग्य व्यक्ति ला नियुक्त करना चाही*

      *आखिर म भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के लिखे दोहा के उल्लेख करना चाहत हौं :-*


*निज भाषा उन्नति अहै*

*सब उन्नति को मूल*

*बिन निज भाषा ज्ञान के*

*मिटत न हिय की सूल*


(सर्वाधिकार सुरक्षित)

दिनांक-२९.०७.२१


*गया प्रसाद साहू*

  "रतनपुरिहा"

(कवि, लेखक, गीतकार एवं गायक)

मुकाम व पोस्ट-करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)


🙏🏼🖕✍️❓✍️👏

व्यंग्य - कुकुर कटायन

 व्यंग्य - कुकुर कटायन


राम रमायण तिहाँ कुकुर कटायन। जिहाँ शुभ काम के शुभारंभ होथे, उहाँ कुकुरमन के पहुँचना जरूरी होथे। कुकुर मन के अइसन शुभ पदार्पण ल देखके कभू-कभू सुग्घर भरम होय लगथे कि हमर बसेरा सरग म हे। 


कभू-कभार खोपड़ी म ये प्रष्न अभर-उभर जथे कि शुभ-अशुभ कोनो किसम के बूता होवय, इन्कर बिना असंभव हे का ? जइसे छट्ठी होवय कि मरनी, नाचा होवय कि रामलीला नेता मन के उद्घाटन करे बिना व्यर्थ, गारद अउ असंभव होथे। 


कोनो मेर दू चार झिन मिलके बने विचार-विमर्ष करत रहिबे। ओतके बेरा इन आके अलकरहा झगरा होवत विचार के बाँधा ल बाधा बन फोर-भंगला देथे। बने-बने सोचत-गुनत कलेचुप अपन रस्ता म जावत रहिबे। इन आगू म आके अपने -अपन भूँके लगथे। 


गाड़ी म रहिबे तभो दूरिहा के जावत ले भूँकत दऊड़ाथे। जानो-मानो अवइया-जवइया हँ सत्ता पार्टी के हरे अउ अपन हँ विपक्ष के कोनो कद्दावर खद्दरधारी। बिन मुद्दा के हुद्दा लगाए बर सरीदिन लुकपुकाए रहिथे। जतके भागबे उन ओतके भूँकथे-कुदाथे। कहूँ ‘चुप्प-बे’ कहिके दबकार देबे, ताहेन ‘सट्ट-ले’ चुप होके पूछी ल हलावत झटपट सुटुर-सुटुर रेंगे लगथे। 

अब ये भूँकना-डरवाना हँ दुनिया के रीत-चलागन होगे हावय । जे मनखे जतके डर्राथे दुनिया हँ वोला ओतके डरवाथे, भूँकथे, कुदाथे, हबकथे -चाबथे। 


छूटभइया पीलवा कुकुरमन के तो बाते झन पूछ ! रस्ते-रस्ता म लुहुर-तुकुर होवत रहिथे। तैं सोचते रहिबे वोहँ ओती जाही कहिके अउ वो जवान उदुप ले आके तोर गाड़ी म झपा जही। ताहेन उल्टा चिचियाके तोंही ल गारी-गुप्तार देना सुरू कर देही - ‘कमीना ! हरामजादा !!  कोन जनी अउ का का ?  देखके गाड़ी नइ चला सकस रे।’

लोगन मन गाड़ी वाले ल दोस देथे।


हमर डोकरी दाई कहय-‘कुकुर बिलई अउ छेरी-बछरू ले देख-बाँचके चलना चाही। मनखे ल उन्कर रस्ता नइ काटना चाही। कुकुरमन ल मनखे अउ मनखे के रस्ता दूनो ल काटे के जन्मसिध्द अधिकार होथे।’ 

सही बात ल कहय।


येमन लार बोहावत जीभ ल लमाके लपलपावत, टेड़गा पूछी ल सोझियाए हलावत आथे। जनम के सरू अउ भीखमँगा कस बोट-बोट देखत दुवारी म खड़ा हो जथे। वो बेरा इन ल देखके चुनाव के सुरता हँ मन म हलोर मारे लगथे। राजपथ के नेवरिया पथिक मन ल दुम हलाए के कला कुकुरमन ले सीखना चाही। 


इन्कर ऊपर कहुँ तरस खाके एक घँव बासी-रोटी देस, ताहेन येमन दुवारी ल छोडबे नइ करय। तैं काँही करले। जइसे फायदावाले पद ल पाके मनखे जात छोड़े के नाम नइ लेवय। 


कुकुर हँ बिना खाए दुवारी ले जाबे नई करय, त मनखे हँ बिना पाँच साल बिताए दुवारी म आबे नइ करय। इही सुभाव भर म मनखे अउ कुकुर मन के बीच थोरिक फरक पाए जाथे। ध्यान रहय अभीन जे मनखे के बात होवत हे वोहँ उँच कोटि के आईएसआई मार्का कोटधारी नीच प्रवृत्ति के मनखे के बारे म होवत हे। 


कहूँ खाए बर नइ दिए त इन बदला ले बर घलो नइ छोड़य। नवा-नवा चमकत गाड़ी ल लान के दुवारी म खड़ा कर दे। इन स्वागत-सत्कार खातिर पहिली पानी ओरसे बर तीन टाँग त तियार खड़े रहिथे।

 

इन मनखे जात के सहनसीलता के बड़का परीक्षक तको होथे। दुवारी म बइठे कुकुर ल दुए चार दिन झन धुत्कार। स्टाम्प ल लिखाके ले लौ। देख लेहू कहूँ के मरी के हाड़ा-माँस ल लानके बीच मुँहाटी म छोड़ दिही।


मनखे तो मनखे इन भगवानो ल नइ छोड़य। कोनो जगा सुघ्घर ले सुघ्घर मुरति के थापना कर दे। चाहे वोहँ शनिदेव के होवय चाहे गुस्सेलहा शंकर के। जल चढ़ाए बर इहीमन अगुवा रहिथे। भगवानो हँ खुष होके अवइया जनम म इन ल मनखे बना देथे। मनखे अउ कुकुर के सुभाव म एकरे सेती गजब समानता देखे बर मिलथे।


पहिली कुकुरमन गजब स्वामीभक्त अउ ईमानदार होवय। जेन हँ अब खर्रू होके लुप्त होए के कगार म खड़े हे। बाचे-खुचे स्वामीभक्त कुकुरमन के हाईब्रीड तियार हो गे हावय। वोमन ल बड़े-बड़े कोठी-बंगला म संरक्षित करके राखे के उदीम-उपाय होवत हे। बाढ़त बिरोधी ल छापा मारके डरवाए, चाबे, गिराए बर इन्कर उपयोग गजब सुग्घर, सुलभ अउ सहज रूप म करे जा सकथे। 


कुकुर दू किसम के होथे- पालतू अउ फालतू। येला हरू अउ गरू घला कहि सकथन। इन्कर रूप अउ गुन म गजब बिरोधाभास देखे बर मिलथे। बल्कि बिरोधाभास ल उल्टनहा सबद कहिबो तभो कोनो किसम के अतिबकर अउ लपरही-चटरही -टेचरही गोठ नई होही। 


पालतू कुकुर एकदम हरू होथे, फेर पद, पावर, खान-पान-मान सबो म गरू होथे। उही किसम फालतू कुकुर गरू होए बर होथे फेर बाकी पद, पावर, खान-पान-मान सबो म हरू होथे।

 

कुकुर कोनो किसम के होवय सबके अंतआर्त्मा बरोबर होथे : इरखाहा (ईर्ष्याहा), जीछुट्््््टा, चापलूस अउ भूँकर्रा। एक कुकुर दूसर कुकुर ल खावत कभू नइ देख सकय। चाहे वोहँ अपने सग भाई-बाप काबर न हो जय। सेम-टू-सेम मनखे तको एक मनखे ल बाढ़त नइ देख सकय।

 

जूठा पतरी ल फेंक दे। सबके सब किचकिचावत दऊड़ परथे। एक खावत रहिही त दूसर ओला गुर्रावत रहिथे। कभू-कभू झूमा-झटकी घलो होए लगथे। 


कोनो-कोनो कुकुर हँ बड़ सिधवा, डरपोकना अउ लो बीपी के बीमरहा किसम के होथे। जब वोला दूसर कुकुर मन हबके-चाबे बर घेरे-धरे-झपटे लगथे त वोहँ पूछी ल पीछु कोती छपटाके खुदो छपट जथे। मुड़ी ल थोरिक तिरछा करके जीभ ल ओरमा देथे। सबो दाँत ल दँतला कस ‘खबखब-ले’ निकाल लेथे। नागिन डॉन्स के स्टाइल म अपने जगा खड़े-खड़े तीन पइत अइँठ जथे। जना-मना बैरी कुकुर मन ल एको नई बँचाही।

 

फेर हुँकय न भूँकय। छपटे, छपटाए, तिरछा ओरमाए, खबखब ले निकाले, रेचका कस एकंगु खड़े देखत भर रहिथे। जादा होथे त बिन धकियाए अपने-अपन उलन्ड-घोलन्ड जथे। ओतका बेरा वो कुकुर ल देखके अइसे लगथे जना-मना कोनो सभा के मनोनीत सदस्य हरे। 


कुछु करे धरे नइ सकिस त आखिर म जगा-जगा अपन नकामी ल दबाए-छुपाए-लुकाए बर बयानबीर बने घूमथे कि राजपाठ हँ मोला रास नइ आइस। येहँ मनखे अउ कुकुर दूनो के महानता अउ उदारता के महान लक्षण हरे जऊन अपन कमजोरी ल उघारके देखावत अपन गलती स्वीकार कर लेथे।

 

हपाटे-झपटे,खाए -दबाए अउ चाबे-चमकाए के मामला म येमन अपन-बीरान नइ चिन्हय। कुकुरमन के ये गुन हँ मनखे म डिक्टो-म-डिक्टो पाए जाथे। मनखेमन के ये आदत हँ प्रमाणित करथे के मनखे हँ मनखे जनम ले के पहिली कुकुर रिहिस होही।

 

कुकुर योनि ले मनखे योनि म तुरते-ताही आए रहिथे तेकर पाय के वोला नइ भूलाय राहय। ओकरे सेती जब मनखे-मनखे झगरा होथे त एक दूसर ल ‘तैं कुकुर-तैं कुकुर’ कहिके आषीर्वचन देथे। 


कभू-कभू सुअर घलो कहि देथे। कभू कोनो ल ‘उल्लू के पट््ठा’ तको काहत सुनथन। येकर मतलब मनखे हँ कुकुर जनम धरे के पहिली सुअर रिहिस होही। सुअर के अउ पहिली उल्लू रिहिन होही। तेकर सेती उल्लू के पट््ठा बहुतेच कम सुने बर मिलथे। काबर के वोहँ दूरिहा के बात होगे।


जइसे मनखेमन के पीछु जनम ले जुड़ाव हो जाय रहिथे। तइसे कुकुर मन के आगू जनम ले लगाव हो जाय रहिथे।

मनखे हँ सब जिनावर ले जादा सुख-सुविधा अउ एसो-अराम से रहिथे। येला देखके मृत्युलोक-सरगलोक सबो लोक के वासीमन मनखेच् जनम धरे के साध मरथे। 


मोला बड़ इच्छा होइस के मनखे-मनखे लड़थे त, ‘तैं कुकुर तैं कुकुर’ कहिथे। कुकुर-कुकुर लड़त होही त का काहत होही ? ये बात ल जाने खातिर मैं एक दिन घर ले मुँड़ म राख डारके निकल गेवँ। रेंगे-रेंगे मुन्सीपाल्टी के कचरा डब्बा तीर जाके खड़े-खड़े चुपचाप देखे लगेवँ । 


एक ठिन कुकुर हँ डब्बा म थोथना ल घुसेरे खवई म मगन राहय। जइसे आजकाल के मनखे मन बफर सिस्टम म थोथना ल हुबेस के उत्ता-धुर्रा बोजई म मगन रहिथे। ओतके बेरा दूसर कुकुर हँ मार किटकिटावत किचकिच-किचकिच दऊड़त आइस। 


पहिली कुकुर संभल गे। दूसर कुकुर आते साथ चमकाइस- ‘अरे सुरा ! येमा मोरो बाँटा हे।’ 

पहिली कुकुर सुरा के नाम सुनके सुरा ले अउ आगु वाले जनम म कूद दिस। 

कहिस-‘आना त रे उल्लू के पट्ठा ! तँहू खा ले। कोन मना करत हावय।’

दूसरा कुकुर अपन जगा म खड़े-खड़े खुरच-खुरचके कचरा ल खदर-बदर गदर-फदर खदबदाए-गदफदाए लगिस। सोचिस होही अँटियावत-सनियावत देखके डर्राही ते डर्रई जही। 


कुछु उदबत्ती नइ जलिस, त कहिस - ‘घूँच अब। अपन बाँटा ल तैं खा-चाँट डरेस। अतका ल मैं अकेल्ला बोजहूँ।’ 

पहिली कुकुर तको मनखे बरोबर जिद्दी निकलिस, कहिस -‘हाँ ! ठेंगवा ल खाबे।’

सुनके दूसर कुकुर भड़क गे-‘जादा मत लगा। नइ तो मोर मइंता भड़कही त एकात गफ्फा लगा देहूँ।’

 

पहिली कुकुर घला थोरिक पहुँच, पावर अउ पइसावाला रिहिसे। कान ल टेंड़के चारो गोड़ ल अँड़िया के खड़ा हो गे- ‘लेत मार ! लेत मार ‼ लेन मार रे !!! कतका दमवाले हस देख लेथवँ।’ 


पहिली कुकुर के बेद्दम दम ल देखके दूसरइया कुकुर थोरिक सोंच म पर गे। लाली रिहिसे ते चेहरा के रंग हँ पींवरागे। तभो ले एक घँव अउ काँख के जोर से भूँकिस-‘तैं कहाँ घूँचबे रे घेक्खर ! अप्पत मनखे हो गे हावस।’


मनखे नाम सुनके पहिली कुकुर बमक गे-‘तैं मनखे, तोर ददा मनखे, तोर पूरा खानदान मनखे रे नीच !’

दूसर जुवाब दिस-‘नीच कहि लेस ते कहि लेस रे कमीना ! ‘नीच मनखे’ काबर कहेस रे ! ओतका म दूनो पाल्टी के एकक दूदी झन सगा-सहोदर, भाई-बंधु अउ चेला-चपाटी मन आ गे रहय। 

उन खड़े-खड़े देखत-ताकत-परखत राहय कि कोन जादा पोठलगहा हावय ? वोकरे कोती ले कूद-फाँद, भूँक-चाब अउ लड़-झगर के गदर मताए जाही।

 

पहिली कुकुर ल भरम होगे के मोर संगवारी जादा आए हावय। वोहँ गरजिस- ‘कहिबोच्च। एक घँव नहीं दस घँव कहिबो। तैं खातस त हम तो कुछु नइ काहन। हमार जूठा अउ बाँटा पतरी म तैं काबर झपटस रे अनदेखना ! कायर ‼ जेन पहिली आइस तेन पहिली पाइस रे हरामजादा ‼ 


अइसे तइसे उन्कर झगरा बाढ़ गे। तैं चोर, तैं मंदहा, तैं गँजहा, तैं भाई, तैं तहसील-कलेक्टर के बाबू, तैं अधिकारी, तैं दलाल करत-करत एक झिन के मुँह ले -‘तैं नेता’ निकल गे। नेता के नाम सुनिस ताहेन एक कुकुर के पारा असमान चढ़ गे। वोहँ आव देखिस न ताव अउ ‘तैं नेता-तैं मंतरी’ काहत झपट्टा मारके कूद परिस। 


दूनो कुकुर गुथ्थम-गुथ्था हो गे। सकेलाए कुकुरमन अपन-अपन सकऊ कुकुरमन ऊपर कूदके हला-हलाके हबके-चाबे लगिन। वो जगा पूरा गदफद मात गे।


एक्का दुक्का डरपोकना कुकुरमन दुरिहा ले खड़े-खड़े मोरे कस झगरा के मजा ले लगिन। मोला अइसे लगे लगिस मानो मैंहँ कोनो मंत्रिमंडल के कार्यवाही देखत खड़े हाववँ।

 

घर म आके देखथवँ त टीबी म उन्कर सीधा प्रसारण होवत राहय।


धर्मेन्द्र निर्मल

9406096346

विकास के डोंगा➖➖ब्यंग (टेचरही)

 ➖➖विकास के डोंगा➖➖ब्यंग  (टेचरही)

         पाना पतेरा ला कनिहा मा लपेट के मरजाद ढँकइया मनखे आज अतका उन्नति कर डारे हे कि जतका ढाँकत हे ओतके उघरत हे। ये तो बने हे कि तन के ढाँके कपड़ा ला छेरी नइ चगलत हे नइते आजो हम उही आदि मानव ले कम नइ हन। पैडगरी अउ धरसा के जगा फोर लेन हाइवे के सँग मेट्रो ट्रेन दँउड़त हे। ठूठी बाहरी के खरीदी आन लाईन होवत हे। तब लाइन मा लग के राशन खरीदना ये सदी के अपमान ही आय। आज हम विकसित ले विकासशील राष्ट्र के नागरिक हवन। चहुंमुखी विकास के डोंगा बीच धारा मा लहरा के चलत हे। पीपर तरी बइठके गाँव ला आगू बढ़ाए अउ सुधारे के गोठ करे ते मन डिजिटल बैठक लेके मन के गोठ करत हे। एकर ले फायदा यहू हे कि सुन सकथस सुना नइ सकस। पसरा पसरा घूमके छाँटके बंगाला बिसाने वाला आन लाईन मँगाये बर एप लोड करत हे। आन लाईन पढ़ाई अउ अनुदान अंक ले पास के तालमेल बहुत बढ़िया हे। हर सवाल के जवाब बर गुरुजे के जगा गूगल काम करत हे। तब तो फेल होय के सवाले नइ उठे। विकास के डोंगा उथली धार मा घलो सरपट भागत हे। फेर कते डिलवा मा झपाही कहे नइ जाय। हमर हाथ मा सब कुछ हे। हम बजार ला जरूरत समझगे हवन। आत्मनिर्भर होयके शंखनाद होगे। स्वाभिमान अउ अभियान ले मनखे हम के जगा मँय मँय काहत मयखाना तक चल दिन। एक झन मितान के चिमनी उपर अतका श्रद्धा हे कि ओकर अस्तित्व ला बचाय बर जन जागरण के गीत बनाके गावत हे। ये तो उही गोठ होगे कि छत्तीसगढ़ी ला बचाय बर सब झन ला उकसाव अउ घर मा हिन्दी बोल के लइका मन ला अँगरेजी इसकुल मा पढाव। तभो ले हम नइ पूछन कि डोंगा मा छेदा विद्वान मन काबर करत हे। सहर हर गांव ला अतका लदक डारे हे कि भाषा के असर बोलचाल मा देखते बनथे।हम तेरे से कमती हैं क्या? अतके कथे तभे समझ जाथन कि ये हर खाँटी हे। 

        छै महिना मा नवा सड़क उखड़ जथे। एके बरसात मा नवा पूल बोहा जथे ये चिन्ता के विषय नोंहे। काबर कि येला हम उपलब्धि मान सकथन। हम सड़क मा रेंगत हावन ये बड़े बात आय। नँदावत जिनिस ला संग्रहालय मा सजा डारेन। जीव जिनावर ला बिदेश ले मँगावत हवन। तब पितर पाख बर भठत कँउवा के माँग सरकार ले तो करि सकथन। भठावत नँदानत प्रजाति ला इही बहाना संरक्षण करे के चेतना तो जागही। उवत सुरूज ला पैलगी करके सुखी जीवन जीने वाला मनखे आज भक्ति भावना मा अतका बूड़ गेहे कि डाक पोस्ट ले गंगा जल मँगाके नहाथे तब सीता हरण के चौपाई ला गाथे।  जेमन सबो सुख सुविधा मा जीयत हे उही मन चिचियावत हे कि डोंगा धारे धार जावत हे कहिके। हमर देश तकनीक अउ विज्ञान मा अतका आगू बढ़गे हे कि मशीन अउ मिसाईल खुद बनाथे। ये अलग बात हे कि बीड़ी सिपचाय बर लाईटर चीन ले मँगाथन।

           डोंगा मा सवारी दस के होलय कि सौ के जब तक ओकर खेवनहार कोनो राजनीतिक दल के नेता नइ रही पार नइ हो सके। समाज सेवा बर कोनो महात्मा गांधी मदर टेरेसा नइ आय। आही तो बिगड़े छबि ला राजनीति के चद्दर मा ढाके प्रतिभा सम्पन्न मनखे हर ही आही। राज्य केन्द्र ले केन्द्र हर विश्व बैंक ले करजा ले ले के विकास के डोंगा खेवत हे। जेकर ले देश आत्मनिर्भरता के मोहाटी मा तक आ गेहे। मोफत के चाँउर अउ मनरेगा के मजदूरी सब मा लाल बत्ती वाले मन के नजर हे। हमर देश सबके साथ सबके विकास के हाना उपर काम करत हे। एक झन सफेद दाढी चूँदी वाले भीष्म प्रतिज्ञा ले के बइठे हे कि खाववँ न खावन देंव। ओकरे नतीजा आय कि सी बी आई ईडी सीडी वाले मन वोकर दूध के धोवल सँगवारी मन ला छोड़ के परोसी मन घर छापामारी ले फुरसत नइये। ओती एक झन हर दाढी तो बढावत हे फेर प्रण लेय बर हाना जुमला नइ खोज पावत हे।

             विकास सरकार अउ नक्सली दूनो चाहत हे। अंतर के सँग डर ये हे कि नक्सलवाद के सिराय ले दुनो अपाहिज हो जही। राजनीति के दुकान चलाय बर नक्सलवाद के खँचवा ला खँचवा रखना ही जरूरी हे। अउ फेर चुनाव बर मुद्दा अपन होके पैदा करे जाथे। खोजे नइ जाय। विकास के डोंगा ला पार लगाय बर हर छोटे बड़े खादी टोपी वाले वचनबद्ध हे। फेर वचन तभे निभथे जब तकनीक तरीका ले कमीशन के आवा जाही होथे। अभी हाल अइसन हे कि नेंव कोनों दूसर धरथे अउ नाँव कोनों दूसर के होथे। तरक्की के हिमालय मा बैसाखी धर के चलइया मन झंडा गाड़त हे। नाक रेहे ले साख रथे। इँहा नकटा के नाक कटे ले सवा हाथ अउ बाढत हे। मंदिर जाव चाहे मदिरालय आखिर जाना तो मसानेघाट हे। जरुरी नइये कि मरे के नाँव दारू पी के होवय चाहे धरम संप्रदाय के दंगा फसाद के नाँव। चुनाव मत पत्र निंहीं मशीन जीतत हे। जनता जुमला हाना मा जीयत हे। ओकरे सेती मनखे धरती ला छोड़ के चंन्द्र मंगल ग्रह मा मरे बर अढ़ई ढीस मील या तो अढ़ई गज जगा पोगराय बर एजेंट दलाल खोजे मा लगे हे। गिर के उठना बड़ साहस अउ हिम्मत के काम होथे। फेर जेन स्तर ले रुपिया गिरत हे ओकर ले अतका तो तय हे कि आने वाला समय मा सौ रुपिया के धनिया पान सूँघे बर ही मिल सकथे। 


राजकुमार चौधरी  "रौना" 

टेड़ेसरा राजनांदगांव ।

विमर्श के विषय: छत्तीसगढ़ी भाषा मा "आने भाषा" के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत*

 विमर्श के विषय: छत्तीसगढ़ी भाषा मा "आने भाषा" के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत*



 छत्तीसगढी गद्य साहित्य ला अपभ्रंश लेखन ले बचाना जरूरी हे, तभे छत्तीसगढी भाषा आघू बढ़ पाही। 21वीं शताब्दी म नवा छत्तीसगढ राज बने के बाद *छत्तीसगढी के मानकीकरण* उपर बहुत बूता होय हे। कालि 28 नवंबर के ' *छत्तीसगढी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका*' के प्रकाशन अउ विमोचन छत्तीसगढ राजभाषा आयोग द्वारा करे गइस हे। 150 पृष्ठ के पुस्तक के संपादन *डाॅ विनोद कुमार वर्मा* अउ *नरेन्द्र कौशिक 'अमसेनवी'* करे हँय। ये पुस्तक *22 जुलाई 2018* के दिन *छत्तीसगढ राजभाषा आयोग* द्वारा छत्तीसगढी के मानकीकरण बर आयोजित *प्रांतीय संगोष्ठी* में प्रदेश के विद्वान वक्ता मन के व्याख्यान के दू भाषा- *छत्तीसगढी* अउ *हिन्दी* म संकलन हे। ए संगोष्ठी के महत्व छत्तीसगढी भाषा बर बहुत जादा हे।  *एही संगोष्ठी म छत्तीसगढी भाषा बर देवनागरी लिपि के हिन्दी बर अंगीकृत 52 वर्ण ला स्वीकार करे के प्रस्ताव भाषाविद् डाॅ चित्तरंजन कर द्वारा रखे गइस अउ सर्वसम्मति ले पारित होइस।* 

       ये प्रांतीय संगोष्ठी म *सरला शर्मा, अरुण कुमार निगम, शकुन्तला शर्मा, डाॅ शैल चंद्रा,  डाॅ विनोद कुमार वर्मा, डाॅ चित्तरंजन कर, डाॅ विनय कुमार पाठक, डाॅ सोमनाथ यादव*  आदि विद्वान साहित्यकार मन के सारगर्भित व्याख्यान होइस। ए संगोष्ठी म लोकाक्षर परिवार के *चोवाराम बादल* अउ *वसन्ती वर्मा* ला ओमन के छत्तीसगढी साहित्य म योगदान बर सम्मानित किये गइस। 

      आदरणीय कोसरिया जी ले निवेदन हे कि छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के लाइब्रेरी म जा के ए पुस्तक के अध्ययन कर लें। ओखर बहुत सारा भ्रम दूर हो जाही। 


 *छत्तीसगढी बर प्रयुक्त सही शब्द* 


    *सही*             *अपभ्रंश*


# विकास                बिकास 

# पत्रिका                 पतरिका 

#  श्री                       सीरी 

# प्रकाशित              परकासित 

# प्रयास                  परयास 

# वइसने                 बइसने 

# शब्दकोश           सब्दकोस 

# रक्षा                     रछा 

# शिक्षा                  सिछा

    

    कोनो भी भाषा बहती नदी के तरह होथे। आघू बढ़ जाही त नदी  के बहाव ला पीछे नि लाए जा सके। हमन के नावा पीढ़ी 21 वीं शताब्दी म पलत-बढ़त हें। ओमन जेन छत्तीसगढी ला समझहिं अउ मान्य करहीं,  वोही हमर मातृभाषा होही। अब हमन भाषा के दृष्टिकोण ले 20 वीं या 19 वीं शताब्दी म नि लौटे सकन। 

      सुधा वर्मा दीदी, रामनाथ साहू, पोखन लाल जायसवाल,  शोभामोहन श्रीवास्तव आदि विद्वान/ विदुषी साहित्यकार मन के विचार अउ सुझाव ला माने ल परही। 🙏🌹


            - विनोद कुमार वर्मा

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धनराज साहू: छत्तीसगढ़ी भाषा म बावन अक्षर ल बउरत हन , जब बउरते हन तो ओला ओकर मूल रूप म ही स्वीकारन , ओला जबरदस्ती छत्तीसगढ़ी के नाँव म तोड़ मरोड़ के लिखबो वहू सही नइये ,भलुक एकर ले हमर हिनता होही। 

  कोनो भी भाखा के महत्ता तभे हे जब ओकर बउरने वाला ल ओ भाखा आसानी ले समझ आये। शुरुच ले हमर पुरखा मन घलोक अपन रचना मन म आन-आन भाखा के प्रचलित शब्द मन ल बउरे हें। 

  ये बात बिल्कुल सही हे कि क्षेत्रीय , जातिगत , अउ अशिक्षा के सेतीन भी उच्चारण म गलती होवय ,अब ओ गलती ल यदि हम छत्तीसगढ़ी मान लेबो तो कइसे बनही। 

  हमन ल भाखा के बढ़वार खातिर उदार होएच परही। जेन ल तेन सही बोले अउ लिखे परही ,ओमा संकोच करे के जरूरते नइये।

  जहाँ तक हो सके जुन्ना शब्द मन ल भी अधिक से अधिक उपयोग म लावन , संग म नवा-नवा शब्द मन खातिर भी मेहनत करन , एमा मोला कोई बुराई नइ दिखय।

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 सूर्यकांत गुप्ता : तारीख: 01/12/2022

दिन: गुरुवार

*विमर्श के विषय: छत्तीसगढ़ी भाषा मा "आने भाषा" के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत*



                    ए बंदा (सूर्य कांत गुप्ता)भाषाविद् ए न कोई बहुत बड़े विद्वान। हमर छंदगुरु श्रद्धेय अरुण निगम जी मन पटल मा आज सुंदर विषय रखिन हें; "आने भाषा के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत"। बहुत बढ़िया विषय।


                     भाषा का ए। अपन विचार, अपन भाव ल व्यक्त करे के माध्यम। अउ एकर सबले बड़े विशेषता आय एकर पोठ व्याकरण होना। एकर बारे म पहिली ही बड़े बड़े विद्वान मन अपन विचार व्यक्त कर चुके हें।

अभी अभी हमर छंद परिवार के दीवाली मिलन समारोह होइस त ए बात ऊपर शिक्षाविद् अउ तीन चार भाषा के जानकार सम्माननीय डॉ. चितरंजन कर जी द्वारा  जोर दे गइस, अउ सही भी आय उंकर जोर देना, के कोनो भाषा के प्रवाह ल बनाए रखना हे त आन भाषा ल ओमा शामिल करे ल परही। आदरणीय डॉ. कर साहब मन इहू बात म जोर दइन के वो भाषा के व्याकरण सम्मत होना जरूरी हे।  हमर राजभाषा छत्तीसगढ़ी के व्याकरण तो पहिली ले बने हुए हे अउ वर्तमान म आदरणीय डॉ. विनोद वर्माजी के भी किताब निकल चुके हे।

अब बात  आथे आन भाषा के शब्द ल ओकर मूल रूप म राखन के अपभ्रंश ल उपयोग म लावन। मोर मत के अनुसार तो ओ शब्द ल मूल रूप म लाना ही उचित रइही ओकर अपभ्रंश बना के ओकर  मान गिराना ठीक नइ  रइही। कोई भी शब्द के अपभ्रंश

बोली म सुने बर मिलथे। बोली अउ भाषा म अंतर होथे। बोली मतलब ओ क्षेत्र के रहइया जउन शिक्षित नइए उंकर द्वारा उच्चारित शब्द।  भाव समझ मा आवत हे। वर्तमान म बहुतायत म देखे जा सकत हे के गाँव गाँव म शिक्षण संस्थान खुल गे हे। जउन भाषा प्रचलन म हवै ओकर उच्चारण म भी तकलीफ नइ होवत हे।  ए विषय ऊपर हमर विदुषी दीदी आदरणीया सरला शर्मा जी के भी विचार पढ़े ल मिलिस...अउ भी बड़े बड़े साहित्यविद् मन के विचार पढ़े ल मिलिस। जम्मो झन ल मोर सादर प्रणाम।

सूर्यकान्त गुप्ता

सिंधिया नगर दुर्ग(छ.ग.)

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 निगम जी: *छत्तीसगढ़ी भाषा मा आने भाषा के शब्द ला अपभ्रंश रूप मा प्रयोग करना कतका न्यायसंगत*

 

छत्तीसगढ़ी भाषा के "मूल शब्द" के न तो उच्चारण मा दोष देखे बर मिलथे अउ न लेखन मा कोनो दोष दिखथे। फेर आने भाषा के शब्द जब बउरे जाथे तब उन शब्द मन के छत्तीसगढ़ीकरण लोगन अपन-अपन तर्क, बुद्धि अउ ज्ञान के अनुसार करथें। आने भाषा के शब्द मन भाव ला ज्यादा स्पष्ट करे बर "अमानत" के रूप मा प्रयोग मा लाए जाथे। अमानत मा ख़यानात तो बने बात नोहय! 

 

तइहा के जमाना मा स्कूल के कमी रहिस। बड़े-बड़े केंद्र मा बस स्कूल रहिन। शिक्षा के कमी के कारण बहुत बड़े जनसंख्या देवनागरी लिपि ला नइ जानत रहिन तेपायके जइसे सियान मन बोलँय, वइसे लइका मन बोलत रहँय। बोले मा कइसनो उच्चारण करके बोले जाय फेर लेखन मा देवनागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण के प्रयोग होना चाही। मौखिक मा "बोली" अउ लेखन मा "भाषा" अनुसार बोलना अउ लिखना चाही। शिक्षा के अभाव मा कई झन नुकसान ला "नुसकान" बोलथें। अब बोलत हे कहिके वोला सही शब्द नइ कहे जा सके। बबा सक्कर बोलत रहिस वोकर नाती शक्कर बोल लेथे। ये अंतर शिक्षा के कारण होथे। बबा अशिक्षित रहिस तो नाती हर शिक्षित होगे हवय। 

 

एक महत्वपूर्ण बात यहू हे कि वर्ण ले अक्षर बनथे अउ अक्षर ले शब्द बनथे। "शब्द" कभू निरर्थक नइ होवय। हर शब्द के अपन विशिष्ट अर्थ होथे। शुक्ला के अर्थ हे, सुकुल के कोनो अर्थ नइये। रामेश्वर के अर्थ हे, रमेसर के कोनो अर्थ नइये। लेखन मा हमेशा सार्थक शब्द होना चाही। कमल शब्द तीन अक्षर ले बने हे। क, म अउ ल। कमल के अर्थ हे। इही तीन अक्षर के शब्द आय - कलम, एखरो अर्थ हवय फेर मकल, लकम घलो इही तीन अक्षर ले बने हवँय  फेर इनकर अर्थ नइये। माने निरर्थक शब्द आँय। 

 

मोर मान्यता घलो हवय अउ निवेदन घलो हवय कि भाषा के साहित्य लेखन मा "निरर्थक शब्द" के प्रयोग नइ करना चाही। प्रकाश ला परकास, प्रयोग ला परयोग, परदेश ला परदेस, प्रकृति ला परकीरती जइसन तोड़ मरोड़ के नइ लिखना चाहिए। 

 

हमर सियान साहित्यकार मन स, श, ष, श्र जइसन अक्षर के प्रयोग बहुत पहिली ले करत हवँय। अनुकरण हमेशा अच्छा बात के होना चाही। अलग-अलग जमाना के साहित्यकार मन के कुछ अइसन अक्षर के प्रयोग के उदाहरण देखव जेन ला कुछ झन कहिथें कि छत्तीसगढ़ी मा केवल "स" अक्षर हे। श अउ ष नइये। 

 

*“क्ष”  के  प्रयोग -* 

 

*गाथा काल - (सन् 1000-1500 ई.)* 

 

बड़ सैइता धारी *लक्ष्मण* जती जोगी, बारा बरस जोग करेरे भाई


 ( *फुलबासन*) 

 

*आधुनिक काल (सन् 1900 ले 2018)* 

 

*यक्ष* एक हर अपन काम में, गलती कुछु कर डारिस ।

तब कुबेर हर शाप छोड़ अलका ले ओला निकारिस ।। 


( *मुकुटधर पांडे - मेघदूत छतीसगढ़ी अनुवाद*)

 

पिंगल शास्त्र न पढ़ेव कछु, *निरक्षर* अघधाम । 

अंध मंदमति मूढ़ हौं, जानत जानकि राम ।। 


( *नरसिंह दास – अपन परिचय*)

 

झाड़ें भाषण, *गो रक्षा* के नेता बन के ।

कभू बात पतियावव झन, इन अड़हा मन के।। 


( *कोदूराम “दलित”-  सियानी गोठ*)

 

जम्मो टूरा टूरी ल *अक्षर* पढ़न दे, जिनगी के कहानी नवा गढ़न दे।। 


( *चेतन भारती -   उन्नत के बीज*)

 

 “दलित” सहीं  *शिक्षक* मिल जातिन, जौन पढ़ातिन दिन अउ रात ।

  सब लइका मन मिल के गातिन, हो जातिस सुख के बरसात ।।


 ( *शकुंतला शर्मा - आल्हा छन्द*)

 

*शिक्षा* ले संस्कार जगय 

सुग्घर आचार व्यवहार पगय ।

रहन-सहन के बदले सलीका 

अउ दरिद्रता दूर भगय ।।


 ( *सपना निगम – विश्व  साक्षरता दिवस*)

 

ईश्वर के तो रूप अनेक। करैं काज उन जग बर नेक।।

पशु *पक्षी* नर वानर रूप। किसम किसम के तोर सरूप।।


 ( *सूर्यकांत गुप्ता - चौपई छन्द*)

 

*भिक्षा* दे दे द्वार खड़े हँव, कपटी ह गोहराय |

देखय साधू ला कुटिया मा ,सीता *भिक्षा* लाय ।। 


( *आशा देशमुख – सरसी छन्द*)

 

*“त्र” के प्रयोग -*

 

*भक्ति युग, मध्यकाल (सन् 1500 - 1900)* 

 

*जंत्र मंत्र* टोटका नहीं जानेव, नितदिन फिरत उदासी ।।


 ( *संत धरमदास*)

 

कहे नरसिंह *त्रिपुरारी* देखें स्वारी, धांवे भूले सब नहीं कोऊ बारे आगी चूलहा।


( *नरसिंह दास - कवित्त*) 


गंग के पानी म भंग घोटावत, बीष मिलाय पिये *त्रिपुरारी*।


 ( *नरसिंह दास – सवैया*) 

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

विश्व-शांति अब लाव , सबो के भला विचारो ।

*अस्त्र शस्त्र*,बम वम  सब ला सागर मा डारो ।।

 

पाई पाई जोर के, बनँय धनी कंजूस ।

चिरहा फटहा *वस्त्र* नित, पहिरँय मक्खीचूस ।।

 

रहव एक खातिर सबो, अउ सब खातिर एक।

*मूलमंत्र* सहकार के, आय यही हर नेक।।


 ( *कोदूराम “दलित”- सियानी गोठ*)

 

बी ए पास करे खातिर हम, मर मर हाड़ा टोरेन।

बने नौकरी पाबो ना कहिके, *सत्रह* बछर अगोरेन ।।


 ( *विमल कुमार पाठक - रे भैया हम खेती करबो*)

 

अँधियारी रात मा जी,दीया धर हाथ मा जी,

भूत  प्रेत  साथ  मा  जी ,निकले  बरात  हे।

बइला  सवारी  करे,डमरू  *त्रिशूल* धरे,

जटा जूट चंदा गंगा,सबला  लुभात हे ।। 


( *जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" -घनाक्षरी छन्द*)

 

साफ सफाई स्वस्थ रहे के *यंत्र*।

स्वच्छ रहे के आदत,होथे *मंत्र*।।


 ( *सुखदेव सिंह अहिलेश्वर – बरवै छन्द*)

 

*“ज्ञ” के  प्रयोग -*

 

*गाथा काल - (सन् 1000-1500 ई.)* 

 

सासे के बोलेव सास डोकरिया,कि सुनव सासे बिनती हमार

मोला *आज्ञा* देते सास, कि जातेव सगरी नहाय

घर हिन कुंवना कि, घर हीन बावलि

कि घर हीन करो असनांद, अहिमन झन जा सगरी नहाय ला ।। 

( *अहिमन गाथा*)

 

*भक्ति युग, मध्यकाल (सन् 1500 - 1900)* 

 (1)

सन्तगुरु हमरे *ज्ञान* जौहरी,, रतन पदारथ जोर देव हो।

धरमदास के अरज गोंसाई,, जीवन के बांधे डोर छोर देव हो।।

(2)

*ज्ञान* दुलीचा झारि दसाबो, नाम के तकिया अधर लगावो ।।

धरमदास विनवै कर जोरी, गगन मंदिर मा पिया दुलरावौ ।।


 ( *संत धरमदास*)

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

गुरु हरथे *अज्ञान* ला, गुरु करथे कल्यान ।

गुरु के आदर नित करो,गुरु हर आय महान ।।

ऋषि मन के *विज्ञान* , सबो ला सुखी बनाइस ।

सीखो सब  विज्ञान,   येकरे जुग अब आइस ।। 

 

( *कोदूराम “दलित”- सियानी गोठ*)

 

बनके  लछमी भरही घर जी बन शारद देहँय गा सब *ज्ञान*।

इँदिरा प्रतिभा सुषमा जइसे करही उँन कारज पाहँय मान ।।


 ( *मनीराम।साहू "मितान" - अरविंद सवैया*)

 

**श्र” के प्रयोग -*

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

मेकल *श्रेणी*  बनिस सिंघासन

भगिस सोन तब मस्ती मा।। 


( *प्यारेलाल गुप्त - छत्तीसगढ़ बर जीबो मरबो*)

 

जहाँ योगेश्वर कृष्ण चंद्र अउ जहाँ पार्थ गांडिवधारी।

उहाँ *विजय श्री* अउ विभूति सब अचल नीति हे सुभकारी।।


 ( *कपिल नाथ कश्यप -श्रीमद भगवत गीता*)

 

*श्रृंगी* भृंगी बाजत हावय, नाचे मरी समान।

ब्रह्मा जी हा बिनय सुनाइस, मौका ला शुभ जान।। 


( *चोवाराम “बादल” - शिव जी के लीला*)

 

गौरी सुत गणराज प्रभु, हे गजबदन गणेश ।

*श्रद्धा* अउ विश्वास के, लाये भेंट रमेश ।। 


( *रमेश कुमार सिंह चौहान - सुमरनी*)

 

आवव पेंड़ लगाइन,समय निकाल।

धरती ला सुघराइन, *श्रम* ला डाल।। 


( *दिलीप कुमार वर्मा – बरवै छन्द*)

 

*“श और ष” का प्रयोग -*

 

*(भक्ति युग, मध्यकाल) (सन् 1500 - 1900)* 


मैं तो तेरे भजन भरोसो *अविनाशी* 


( *संत धरमदास*)

 

*आधुनिक युग (सन् 1900 से आज)*

 

(1)

 

*जगदीश्वर* के पाँव मा, आपन मूड़ नवाय

सिरी *कृष्ण* भगवान के, कहि हौं चरित सुनाय।।

पँड़री पँड़री देह के, रूपस सबे अघात

*श्याम* मिले के *खुशी* में, फसफसात हे जात।।

 

(2)

 

रौताइन सब सुनत रिसाइन।

कब ले *श्याम* साव बन आइन।।

साँप घलाय सबो *पोषे* हौ।

सबो जगत आज मोर देहौ।।


 ( *पं. सुंदरलाल शर्मा - दान लीला*)

 

(1)

अणु ला नान्हें मत समझ, अणु ला तुच्छ न जान।

अणु मा *शक्ति*  अघात हे , अणु मन आयँ महान।।

(2)

बंधन –मां जतका हवयँ, सबला मुक्त कराव।

*पंचशील* ला मान के , *विश्व-शांति* अब लाव।।

(3)

बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव।

ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला *पुष्ट* बनाव।।

(4)

*नष्ट* करो झन राख-ला, राख काम के आय।

परय खेत-मा राख हर , गजब अन्न उपजाय।। 


( *कोदूराम “दलित” - सियानी गोठ*)

 

*दशरथ* बोलिस छोटी रानी, का दुख मा तंय करे गोहार ।

जौन माँगबे सब कुछ देहूँ, राजपाट मैं करंव निसार ।।


 ( *वसंती वर्मा – आल्हा छन्द*)

 

*शंभु* के बरात देखि जियरा डरावत।

डाकिनी *पिशाच* गीत लुलु लुलु गावत।। 


( *नरसिंह दास - कवित्त*)

 

साँप के सूत मा बिच्छु गुँथाइ, लगाइके झूल जटा अहिरे।

हाथ म पाँव म साँप के *भूषण, भूषण* साँप *शरीरहि*  रे।।


( *नरसिंह दास – सवैया*)

 

मंदिर कोती गै पुजेरी चला घंटी *शंख* ला हेरी।।

राजा *हरिश्चन्द्र* बड़ दानी। भरिन डोम के घर पानी।।

धरे रहिगै *धनुष* बान समय होथे बड़ बलवान।। 


( *द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र - बुड़ती बेरा*)

 

हमरे कमई में बसे हे *शहर*

हमरे भरोसा चलत हे पुतलीघर ।। 


( *कुंजबिहारी चौबे - बियासी के नागर*) 

 

सदा काल ले *दुष्ट* समय बर, जिनगी सहज सवारी बनगे।

ये दुनिया मा *महापुरुष* मन, कतको आथें कतको जाथें।। 


( *नारायण लाल परमार - हमर जिनगी*)

 

आँसों होरी मा सबो,धरव शांति के *भेष*।

मेल जोल जब बाढही,मिट जाही सब *द्वेष*।। 


( *अजय अमृतांशु - दोहा छन्द*) 

 

*शंकर* तांडव झुमरत नाचे,धरती दाई देख !

पटक-पटक के गोड़ दबाथे,छाती अपन सरेख !! 


( *असकरन दास जोगी - सरसी छन्द*)

 

माघी पुन्नी मा चलव, दामाखेड़ा धाम।

*दरशन* ले साहेब के, बनथे बिगड़े काम।। 


( *कन्हैया साहू "अमित" - दोहा छन्द*)

 

महँगा हवय *कीटनाशक* हा, गोबर खातू डारौ |

छोड़व रासायनिक खाद ला, करजा अपन उतारव ||


 ( *ज्ञानुदास मानिकपुरी*)


मोर विचार मा छत्तीसगढ़ी मा आने भाषा के शब्द के अपभ्रंश रूप के प्रयोग नइ करना चाही।


*अरुणकुमार निगम*

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+: *विचारोत्तेजक ज्ञानवर्धक आलेख* ........आदरणीय अरुण निगम जी द्वारा पुराना अउ नवा कवि मन के रचना के उद्धरण शोधपरक संकलन हे। छत्तीसगढ राजभाषा आयोग द्वारा 22 जुलाई 2022 के बिलासपुर म आयोजित प्रांतीय संगोष्ठी म ए आलेख के अधिकांश भाग के पठन आदरणीय निगम जी अपन व्याख्यान म करे रिहिन। जेन हर छत्तीसगढ राजभाषा आयोग द्वारा प्रकाशित अउ सद्यः विमोचित  ( 28 नवंबर 2022) पुस्तक *छत्तीसगढी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका* ( संपादक- डाॅ विनोद कुमार वर्मा ) म संकलित हे। एही संगोष्ठी म *देवनागरी लिपि के हिन्दी बर अंगीकृत 52 वर्ण के छत्तीसगढी लेखन म स्वीकार्यता के प्रस्ताव सर्वसम्मति ले पारित होय रहिस।* अधिकृत रूप ले ये तिथि  ( 22 जुलाई 2022 ) ल छत्तीसगढ़ी भाषा के बदलाव के बिन्दु माने जा सकत हे। हालाकि एखर पहिली से ही अनेक प्रबुद्ध छत्तीसगढी साहित्यकार मन देवनागरी लिपि के 52 वर्ण के प्रयोग अपन लेखन म करत रिहिन। *छन्द के छ* म शामिल सबो कवि/लेखक मन 2016-17 से ही 52 वर्ण के प्रयोग अपन लेखन  म करत रिहिन मगर पुराना विचारधारा ( 39 वर्ण के समर्थक ) के लोगन मन एखर पुरजोर विरोध घलो करत रिहिन। *वास्तव म छत्तीसगढी लेखन म 52 वर्ण के प्रयोग के  कारण ही छत्तीसगढी अपभ्रंश लेखन ले मुक्ति के मार्ग प्रशस्त होइस*। छत्तीसगढी भाषा के मानकीकरण अउ संरक्षण-संवर्धन  बर एखरे सबले जादा जरूरत रहिस। सादर......🙏🌹


            - विनोद कुमार वर्मा

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 गयाप्रसाद साहू जी: छत्तीसगढ़ी भाषा म आने भाषा के शब्द ल अपभ्रंश रूप म प्रयोग करना कतका न्याय संगत हवय ?

    *ये संबंध म आदरणीय निगम सर जी द्वारा प्रस्तुत आलेख खूब महत्वपूर्ण,संहराए लाईक अउ छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य,व्याकरण, के संबंध म जब भी चर्चा होही,उदाहरण देहे बर सहेज के राखे लाईक हवय*

     *छत्तीसगढ़ी भाषा म लिखे बर कतेक वर्णमाला होना चाही ?*

     *ये विषय के विमर्श म पिछले बार खूब विचार-मंथन होए रहिस, तेमा सर्वसम्मति से 52 वर्णमाला मान्य करे गए रहिस*

    *जब हमन छत्तीसगढ़ी भाखा बोलथन, तब हिन्दी भाषा के 52 वर्णमाला के उच्चारण खच्चित रूप से होबेच करथे | तव 52 वर्णमाला के उच्चारण ल लिखत बेरा कुछ वर्णमाला ल नइ लिखबो,तव बोलबो-गोठियाबो कईसे ? तब तो शब्द मन अधूरा हो जाही | 52 वर्णमाला से कुछ वर्णमाला ल काट देबो,तव छत्तीसगढ़ी भाषा के कई ठन महत्वपूर्ण शब्द मन कट जाही ! छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य ह विकलांग हो जाही! कनवा-खोरवा हो जाही ! तेकरे सेती मैं हाथ जोड़ के विनती करत हौं -"हिन्दी वर्णमाला म  बऊरे जाथे,तऊन सब 52 वर्णमाला के उपयोग लिखे-बोले बर खच्चित जरूरी हवय*

    *हां, एक बात बज्र गठिया के धरे लाईक हवय  - "हिन्दी के 52 वर्णमाला मन ल बऊरे के मतलब ये हरगिज नइ होय के छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी भाषा म अंतर होबेच नइ करय, हर हिन्दी शब्द ल जस के तस लिख दे ! तब तो खूब अलहन हो जाही ! "छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य काला कहिबो?*


     *सार बात तो विशेष रूप से खूब चेत करे बर परही के -हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दुनो सहोदर बहिनी होय के बावजूद दुनो के रूप-रंग, चाल-ढाल,  व्याकरण के दृष्टि से लिंग,वचन,कारक रचना के दृष्टि से,स्वरूप,संस्कृति,रहन-सहन,खान-पान, अउ मूल तासीर के दृष्टि से खूब अंतर हवय*

    *हिन्दी भाषा बड़े बहिनी आय, छत्तीसगढ़ी भाषा सग्गे छोटे बहिनी आय*

     *हिन्दी भाषा म साहित्य लेखन-वाचन अउ छत्तीसगढ़ी भाषा म साहित्य लेखन-वाचन के समय-काल के दृष्टि से भी हिन्दी भाषा बड़े बहिनी आय, जबकि छत्तीसगढ़ी भाषा छोटे बहिनी आय*

     *पैदाईशी काल गणना म  हिन्दी बड़े बहिनी आय, छत्तीसगढ़ी छोटे बहिनी आय*

   * *प्रयोग कर्ता के क्षेत्रफल अउ जनसंख्या के अनुपात म घलो हिन्दी बड़े बहिनी आय | छत्तीसगढ़ी छोटे बहिनी आय*

    *सबसे खास बात ये हवय-छत्तीसगढ़ी संस्कृति भाषा ह हिन्दी के संगे-संग चलथे,तभो ले छत्तीसगढ़ी भाषा के मूल तासीर म अंतर होथे | जब हम ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा म लिखथन, तव एक्के नजर पड़ते ही ये बात स्पष्ट हो जाथे -एहा छत्तीसगढ़ी भाषा म लिखाय हवय*

    *ये साहित्य ह हिन्दी भाषा म लिखाय हवय*

     *जैसे कोनो दू झन जुड़वा बहिनी होथे | ऊंकर रूप-रंग, आकार, डील-डौल, कद-काठी, आंखी के बनावट, चुंदी के साईज, एक्के जैसे रेशमी-चमकीली या घुंघरालू चुंदी होय के बावजूद एक बहिनी ल अम्मठ (खट्टा) पसंद रहिथे,तव दूसर बहिनी ला मीठा पसंद रहिथे | एक बहिनी ल नमकीन पसंद रहिथे,तव दूसर बहिनी ल चुरपुर (चटपटा) पसंद रहिथे | एक बहिनी ल नीला,पीलाअउ हल्का रंग पसंद रहिथे,दूसर बहिनी ला काला,लाल,भड़कीला,गहरा रंग पसंद रहिथे | एक बहिनी वाचाल रहिथे, तव दूसर बहिनी मितभाषी होथे | एक बहिनी ला बाग-बगीचा,हाट-बाजार जाना पसंद रहिथे, तव दूसर बहिनी ला अपन घर -अंगना ही पसंद रहिथे*

     *ठीक अईसनेच हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दुनो सहोदर बहिनी होय के बावजूद इंकर रूप-रंग,चाल-ढाल,स्वरूप व्याकरण के दृष्टि से, आकार-प्रकार म  बहुंतेच अंतर होथे*

     *हिन्दी उ छत्तीसगढ़ी के वर्णमाला अउ लिपि एक्के हवय, सोच के छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म हिन्दी भाषा के जम्मो शब्द ल जस के तस लिख देहे ले वोहा छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म हरगिज मान्य नइ होही, बल्कि वर्णशंकर स्वरूप माने जाही! तब लिखैया साहित्यकार ल दुख लागही, ओकर सब  मेहनत ह "आधा तीतर-आधा बटेर सहीं अउ गुड़-गोबर हो जाही!*

     *छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म साहित्य सिरजन करे बर छत्तीसगढ़ी ठेठ बोल-चाल के शब्द मन ल खूब पूछताज करके, दादी-नानी, बड़े ददा-बड़े दाई, कका-काकी के बोलचाल के शब्द मन ल खोजबीन करके वो शब्द मन के शोधपरक उपयोग करना जरूरी हवय, तभे हमर छत्तीसगढ़ भाषा-साहित्य ह अपन नवा वजूद बनाके देश-दुनिया म मान-सम्मान पाही*

     *एक महत्वपूर्ण प्रश्न हवय-"छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म आने भाषा के शब्द मन ल अपभ्रंश के रूप म कतेक बऊरे जाना चाही ?*

     *ये महत्वपूर्ण सवाल के उत्तर मोर मति अनुसार -छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म आने भाषा के शब्द ल तभे उपयोग करे जाय,जब वो शब्द ह हमर छत्तीसगढ़ के रीति-रिवाज,खान-पान, रूप-रंग, रहन-सहन म तालमेल बना सकै | अईसे हरगिज नइ होना चाही-हिन्दी के 52 वर्णमाला मन ल छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य बर स्वीकार करे जा चुके हवय, तव हर हिन्दी शब्द ला छत्तीसगढ़ी साहित्यिक म जबरन ठूंस-ठूंस के भर देही, तब वो साहित्य ल पढ़े म छत्तीसगढ़ी भाषा-बोली के नामोनिषान नइ रहिही ! तब ओ लेख-कविता ला छत्तीसगढ़ी के दर्जा कईसे देबो ? काबर देबो ? जउन रचना म छत्तीसगढ़ी भाखा-बोली के तासीर नइ मिलही, तेला छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य हरगिज मान्य नइ होही*

     *छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म हिन्दी के अलावा अंग्रेजी,उर्दू, संस्कृत,अरबी,फारसी,असमिया,अवधी,बुंदेलखंडी,भोजपुरी जम्मो भाषा के शब्द ल जस के तस लिखे जाय, जऊन बोलचाल म अईसे लगथे के एतो छत्तीसगढ़ी भाषा आय, लेकिन आने भाषा के अपभ्रंश शब्द मन ल छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य म समाहित करे के एक मतलब नइ होना चाही के छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य बर ओ शब्द मन नुकसान पहुंचाही !*

      * *हम छत्तीसगढ़िया भाई-बहिनी मन बंगाली,बिहारी,मद्रासी,ओड़ीया, तेलगू, मराठी मनखे आथें, "तव एक लोटा पानी अउ चार पहर रात बीताए बर खली-खोर के आंट म रहे बर दे देथन | एकर मतलब ए हरगिज नही होना चाही के जऊन बाहरी मनखे ल अलकर-सांकर म चार पहर रात बीताए बर गली-खोर के आंट ल दे देथन, तऊने मनखे धीरे-धीरे चापलूसी करके हुसियारी पूर्वक हमर घर म कब्जा करके हमी ल हमर घर से बाहिर निकाल देही !!*

     *ठीक अईसनेच हमर छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य म घलो आने भाषा के अपभ्रंश शब्द मन ल खूब सोच-विचार के शोध करके ओही शब्द मन ल शामिल करे जाय,जऊन हमर छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ल विटामिन प्रोटीन सहीं फायदा पहुंचाही, आगे चल के छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ला नुकसान झन पहुंचाही,वईसने शब्द ल शामिल करे जाय-जऊन छत्तीसगढ़ी दूध सहीं भाषा म मिस्री बन के घुलमिल जाय*

    *हमर छत्तीसगढ़ी लोक कला,लोक गीत, लोक गाथा, लोक नृत्य मन देस-विदेश म खूब मान-सम्मान पावत हवय, काबर के लोककला संस्कृति के प्रस्तुति ह देस-दुनिया म वाचिक परंपरा के द्वारा दुनिया के लोगन ल प्रभावित करथे*

    *लेकिन हमर छत्तीसगढ़ साहित्य ह, छत्तीसगढ़ी लोक कला जईसे सम्मान अभी तक प्राप्त नइ कर पाए हवय! एकर सब ले बड़े कारन हवय -" छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ह लिखित रूप म अपन मौलिक स्वरूप म नइ दिखत हवय ! छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ह अपन मौलिक अस्तित्व के रूप म खास पहचान नइ बनाए हवय !*

     *तेकरे सेती छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ल देस-दुनिया म अलग मान-सम्मान पाए बर ठेठ छत्तीसगढ़ी शब्द द्वारा ही साहित्य सिरजन करना खच्चित जरूरी हवय |*

     *छत्तीसगढ़ राज्य स्थापित होए के बाद ये 22 बच्छर म छत्तीसगढ़ी साहित्य के जम्मो विधा म खूब साहित्य सिरजन होवत हवय, तव मोला पक्का विश्वास हवय- अब छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य ह घलो छत्तीसगढ़ी लोककला संस्कृति सहीं जल्दी मान-सम्मान पाही | तभे छत्तीसगढ़ी भाषा ल भारतीय संविधान के आठवींअनुसूची म जघा अपने-आप पा जाही*


   *जै छत्तीसगढ़*

    *जै छत्तीसगढ़ी*


दिनांक-02.12.2022


आपके अपनेच संगवारी

*गया प्रसाद साहू*

    "रतनपुरिहा"

मुकाम व पोस्ट करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर (छ.ग.)

पिन कोड -495113

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अनुज : *छत्तीसगढ़ी भाषा अउ देव नागरी लिपि* 


मोर बिचार ले छत्तीसगढ़ी भाखा हा सत्तर प्रतिशत अपन आप मा पूर्ण हे अउ तीस प्रतिशत आने भाखा के भरोसा रथे।

*जइसे-* १. मैं किरिया खावत हँव तोर ले अबड़ मया हे।

         २. मैं स्कूल जावत हँव।

         ३. पर्यटन स्थल ला साफ रखव। 


   छत्तीसगढ़ी भाखा के लिपि देव नागरी ये तेखर सेती छत्तीसगढ़ी भाखा हा ज्यादातर हिन्दी भाषा मा निर्भर हे। लेकिन आजकल सोशल मिडिया, समाचार-पत्र अउ टीवी मा हिन्दी शब्द ला छत्तीसगढ़ी के संग तोड़-मड़ोर के प्रस्तुत करत हें।  बोल-चाल के भाखा अलग होथे अउ साहित्यिक भाखा अलग होथे अगर हम सब ला सम्मेटा लिख देबो ता छत्तीसगढ़ी भाखा के मानकीकरण कइसे हो पाही। पहिली जमाना मा कम पढ़े लिखे के कारण हिन्दी शब्द मन ला अपभ्रंश मा प्रयोग करँय लेकिन आज सबो शिक्षित हें। कोई भी भाखा के शब्द ला तोड़ मड़ोर के लिखे मा वो शब्द के अर्थ बदल अउ आत्मा खतम हो जथे।

*जइसे श्रम-सरम, प्रशासन-परसासन, प्रकृति-परकिरिति, क्रिया-किरिया* 

लेकिन हिन्दी के अइसे कई ठन शब्द जेन छत्तीसगढ़ी मा अपभ्रंश होगे हे लेकिन वोकर अर्थ बरकरार हे। अइसन शब्द ला प्रयोग कर सकथन।

*जइसे कैसे-कइसे, जैसे-जइसे, कारण-कारन, विचार-बिचार,  शर्म-सरम, वर्णन-बरनन* 

संज्ञावाचक शब्द ला जस के तस लिखना चाही

*संतोष ला संतोष ही लिखव न कि संतोस*


मोर बिचार ले छत्तीसगढ़ी भाखा मा हिन्दी के ५२ वर्ण के प्रयोग करना चाही अउ छत्तीसगढ़ी शब्द के रहत ले हिन्दी शब्द के जादा नइ करना चाही। जब हमन जादा से जादा छत्तीसगढ़ी शब्द के प्रयोग करबोन तभे नँदावत छत्तीसगढ़ी शब्द बाचही। 


*अनुज छत्तीसगढ़िया*

*पाली जिला कोरबा*

7999521614

7354390486

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