Saturday, 16 August 2025

छत्तीसगढ़ी रंग नाटक* (हिंदी आलेख)

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                *छत्तीसगढ़ी रंग नाटक*

                      (हिंदी आलेख)



          यहां मैं दो अति विशिष्ट नाटकों का जिक्र करना चाहूंगा । उनमें प्रथम है डॉक्टर नंदकिशोर तिवारी द्वारा लिखित और डॉक्टर योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित,और रँगदल ' गुड़ी  'द्वारा प्रदर्शित नाटक - रानी दई (रानी दई डभरा के ) 



              नारी विमर्श के चरमोत्कर्ष को अपने आप में सहेजे इस नाटक की कथावस्तु ,नारी के ह्रदयऔर प्राण दान, और पुरुष के द्वारा उसे भोगवादी एक वस्तु (कमोडिटी) माने जाने के बीच संघर्ष की  कथा है । अत्यंत संक्षिप्त में कथा सूत्र के रूप में कहा जा सकता है- डभरा रियासत का जमीदार या राजा, अपने संबलपुर प्रवास के दौरान वहां किसी रूप लावण्यवती तरुणी के साथ संबंध स्थापित कर लेता है ।और अपना काम समेट कर वापसी के समय उसे 'भोग्या' मानकर वहीं छोड़ देना चाहता है । पर वह साथ चलने के लिये अड़ जाती है । राजा कुटिलता के साथ उसे लाते हुए बीच रास्ते में  तलवार से गर्दन काटकर उसकी हत्या कर देता है। किंतु वापसी में अपराध बोध या (?)से उसकी दस्तक- धमक हर जगह सुनाई देती है ।और उसे वह दिखती भी है। सचमुच में देवी के रूप में उसका डभरा में आगमन हो चुका था । मगर उसने किसी भी प्रकार का प्रतिशोध नहीं लिया ।उसकी बस एक ही सोच थी कि मैं जिसको अपना कह चुकी हूं । वह मेरा है। भले ही उसने मुझे इसके बदले मौत दिया पर  वह मेरा अपना है ।और उसका प्रत्येक अपना भी मेरा अपना है। 


            और वह माता आज आराध्या होकर डभरा में जाग्रत देवी के रूप में विराजमान हैं ।उसका संकल्प वही है...  तुम मेरे अपने हो ।तुम्हारा हर चीज मेरा अपना है। ना केवल आज बल्कि आने वाले सभी समय में  भी । जहां जो व्यक्ति  इस धरा को स्पर्श करेगा ,वह मेरा अपना अपमान है । इस घटना को लेखक द्वारा अत्यंत सरलता के साथ दृश्यों में उसे उकेरा है । उसे तो  गुड़ी के द्वारा मंचित और डॉ योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित इस नाटक को प्रत्यक्ष  देख कर ही अनुभव किया जा सकता है।




               ' रानी दई डभरा के '  एक सम्पूर्ण नाटक है।इसमें नाटक के सभी तत्व मौजूद हैं



1.कथावस्तु-

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  नाटक में तीन प्रकार की कथाओं का उल्लेख किया जाता है –


१ प्रख्यात


२ उत्पाद्य


३ मिश्र प्रख्यात कथा



       इस विश्लेषण में यह उत्पाद्य होते हुए भी ' मिश्र- प्रख्यात ' कथानक है।जनश्रुति और किवदंती को सहारा लेकर लेखक की कल्पना का  भी योगदान है।



             इन कथा आधारों के बाद इस नाटक में  'मुख्य' तथा 'गौण ' अथवा 'प्रासंगिक '  भी मौजूद है, जो मुख्य कथानक को अभिसिंचित करते हुए चलता है  ।  इसमें  प्रासंगिक के भी आगे 'पताका ' और 'प्रकरी ' भी  हैं । है। इसके अतिरिक्त नाटक की कथा के विकास हेतु कार्य व्यापार की पांच अवस्थाएं -प्रारंभ ,प्रयत्न , प्रत्याशा, नियताप्ति और कलागम  सभी मौजूद है।



             इसके अतिरिक्त इस नाटक में पांच संधियों  को भी चिन्हित किया जा सकता है।



2.पात्र और चरित्र चित्रण

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        ' रानी दई डभरा के ' एक नायिका प्रधान नाटक है । प्रतिनायक या खलनायक की जगह  पारंपरिक जमीदार है जिसके समक्ष स्त्री -वीर भोग्या वसुंधरा  की तर्ज पर वसुंधरा ही बन कर खड़ी है , जिसे जो चाहे अपनी बाजूओं के बल पर भोग ले ।



 नाटक में पताका और प्रकरी के प्रचलन के लिए बहुत सारे पात्र आते- जाते रहते हैं ।पर राजा के बेटे के रूप में एक सह नायक भी उपस्थित होता है  जिसके ह्रदय में नारी के प्रति श्रद्धा का प्रथम अंकुरण होता है । क्योंकि वह उसके वात्सल्य से अभिभूत है ।पात्रों का संयोजन अत्यधिक समीचीन है   जिसे योग्य निर्देशक ने अपनी कल्पना प्रवणता के बल पर थोड़ा मोड़ा फेरबदल  भी कर लिया है ।



3.संवाद

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              इस  नाटक के  संवाद सरल , सुबोध , स्वभाविक तथा पात्रअनुकूल छत्तीसगढ़ी में हैं जिसमें मिट्टी की सुगंध आप आसानी से पकड़ सकते हैं ।नीरसता के निरावरण तथा पात्रों की मनोभावों  को व्यक्त करने के लिए   स्वगत कथन तथा गीतों की योजना भी है।



4.देशकाल और वातावरण-

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          देशकाल वातावरण के चित्रण में नाटककार युग अनुरूप  चित्रण करने मे  विशेष सतर्क  रहा है। पश्चिमी नाटक के देशकाल के संकलनत्रय- समय, स्थान और कार्य की कुशलता  के बीज भी यहाँ उपस्थित है।



         इस नाटक में स्वाभाविकता , औचित्य तथा सजीवता की प्रतिष्ठा के लिए देशकाल वातावरण का उचित ध्यान रखा गया है।  पात्रों की वेशभूषा, तत्कालिक धार्मिक , राजनीतिक , सामाजिक परिस्थितियों  के अनुरूप है।



            पर एक दृश्य में नायिका का दोहरा गेटअप- सधवा और विधवा स्त्री का अद्भुत आकर्षण की उत्पत्ति करता है । वह विधवा की तरह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं ,जबकि सधवा की तरह मांग में सिंदूर है ।इस प्रकार निर्देशक और लेखक की आत्मा  का एकालाप होते हुए  अद्भुत फंतासी की रचना हो जाती है और नाटक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है ।



5. भाषा -शैली

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नाटक  'रानी दई डभरा के ' की  भाषा शैली सरल , स्पष्ट और सुबोध  है । जिससे नाटक में  विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न होता है। बोलचाल की छत्तीसगढ़ी में रची गयी इस नाटक से प्रेक्षक सहजता से जुड़ जाते हैं।



6. उद्देश्य 

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यह नाटक नारी विमर्श को केंद्र में रख कर प्रस्तुत होता है। पुरुष पहले स्त्री को उपभोग की सामग्री मानकर उसका उपभोग करता है। यहां तक कि उसकी हत्या भी कर देता है ।और कालांतर में, उसी को देवी मानकर  उसकी आराधना भी करता है । पुरुष के इस दोहरे और दोगले चरित्र को यह नाटक बखूबी उजागर करता है । ना केवल छत्तीसगढ़ अभी तो भारत के कई भूभाग पर ऐसे मिलते -जुलते वृतांत वाले कई किस्से मिल जाते हैं । जिसमें पहले पुरुष अनाचार, दुराचार ,अत्याचार सब करता है। बाद में आराध्या बनाकर  उसका उपासक बन जाता है ।आज नारी सशक्तिकरण के इस युग में किसी नारी के प्रति ऐसे अत्याचार की पुनः पड़ताल की जा रही है । और नाटककार  का यही प्रतिपाद्य विषय वस्तु भी है । नारी विमर्श को प्रस्तुत करना नाटककार का मूल उद्देश्य  है ।



7. मंच-ध्वनि-प्रकाश-अभिनेता

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           निर्देशक डॉ योगेंद्र चौबे  रूप , आकार , दृश्यों की सजावट और उसके उचित संतुलन , परिधान , व्यवस्था , प्रकाश व्यवस्था आदि का पूरा ध्यान रखते हुए इसे आधुनिकता से लबरेज रखते हैं।  लेखक की  भी दृष्टि रंगशाला के विधि – विधानों की ओर विशेष रुप से  है। इन सब में  इस नाटक की सफलता निहित है।



            ऐसे ही 'पहटिया '  भी पूर्ण सिद्ध नाटक है।भूमकाल आंदोलन -गुण्डाधुर को जिस सहजता के साथ मंच पर उतारा जाता है वह डॉ0 योगेंद्र चौबे की व्यक्तिगत उपलब्धि है । मिर्जा मसूद के रेडियो रूपक को इसमें उन्होंने अपनी कथा का आधार बनाया है ।और एक नवीन नाटक की रचना की है । 'पहटिया ' के बहाने समग्र छत्तीसगढ़ के  प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन का एक सशक्त बानगी हम मंच पर देख लेते हैं ।यह डॉक्टर योगेंद्र चौबे की एक निर्देशक के रूप में निर्देशित की जाने वाली श्रेष्ठ नाटकों में शुमार है । रंगमंच के सभी तत्वों को सभी नोर्मों  को पूरा करते हुए अत्यंत सारगर्भित एवं प्रभावशाली प्रस्तुति देखने को मिलती है । या छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों की दास्तान है जिसमें गेंद सिंह , वीर नारायण सिंह से आगे चलकर गुंडाधुर तक कथा विस्तार पाता है पर केंद्र में एक पहटिया है जिसके द्वारा  कथा विस्तार होता है । 


        इसी क्रम में डॉक्टर योगेंद्र चौबे के द्वारा पं0 द्वारका प्रसाद तिवारी' विप्र '  के कई नाटकों का भी मंचन किया गया है ।



          इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी सिद्ध नाटकों की श्रेणी में और कई नाम शामिल हैं। जिसमें राकेश तिवारी द्वारा निर्देशित नाटक- राजा फोकलवा, अजय आठले के प्रसिद्ध नाटक  'बकासुर', घनश्याम साहू  का अघनिया प्रमुख है  । प्रख्यात रंगकर्मी मिनहाज असद, मिर्जा मसूद ,सुनील चिपड़े जैसे कई रंग निर्देशकों ने कुछ अनुदित छत्तीसगढ़ी नाटकों का भी मंचन किया है और छत्तीसगढ़ी भाषा की श्री वृद्धि की है । 



              लोक कथा शैली के अद्भुत रचनाकार श्री विजय दान देथा की मूल कहानी पर आधारित डॉक्टर योगेंद्र चौबे का 'बाबा पाखंडी '  दूसरा 'चरणदास चोर' बनने की राह पर चल निकला है । लोक नाट्य शैली नाचा और पंडवानी गायन को अपने आप में आत्मसात करते हुए यह यह नाटक 70 से भी अधिक बार  मंचित किया जा चुका है । नाट्य लेखन, परिकल्पना और निर्देशन प्रसिद्ध रंग निर्देशक और रंगकर्मी डॉक्टर देवेंद्र चौबे  का है ।आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ,दिल्ली के उत्पाद हैं ।



         बाबा- पाखंडी ,एक प्रकार से जन नाटक ही है। इसमें रंग जगत की तकनीक कम, कला और कौशल के साथ ही व्यक्ति का जीवन प्रमुखता से उतरा है । बाबा पाखंडी वह नाटक है जो लोग की चिंता करता है ।जन की चिंता करता है ।और राजनीति के चाटुकार प्रवक्ता मीडिया की मुखालफत  भी करता है। और बाबा पाखंडी जैसे अवांछनीय तत्व को गधे की सवारी प्रदान करने का दुस्साहस भी करता है । और गधा भी कोई ऐसा वैसा नहीं, परम सत्यवादी , जो अपने हृदय परिवर्तन के उपरांत विद्रोही हो जाता है ।और अपने मालिक बाबा के खिलाफ मुंह खोलता है ।तब- गधे ने किया कमाल, जी सच का लिया है नाम... जैसे गीत की मंत्रमुग्धकारी सामूहिक प्रस्तुति होती है । एक प्रकार सदैव सत्ता से पंगा लेने वाले और आखिरी सिरे पर खड़े हुए 'आदमी ' की तलाश में भटकने वाला- एक्टर इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन का जननाट्य धर्मी तेवर इसमें कहीं ज्यादा प्रखरता से दिखाई देते हैं ।धर्म ,अंधविश्वास और धन को राजनीतिकारों ने अपना हथियार बना रखा है । बाबा पाखंडी की रचना करने वाले ने बाबागिरी के धंधे को कारपोरेट जगत से भी ज्यादा लोकलुभावन और संपन्न पाया । अपने तमाम कूटनीतिक दांव पेंच लगा  विश्वास, खेल ,रिश्ता, लोक, भयदोहन ,सत्ता प्राप्त करने की अभीप्सा  के बीच -बाबा पाखंडी का अवतार होता है । और एक ही आवाज में यह बहुत कुछ कह जाता है । रामनाथ साहू के नाटक- जागे जागे सुतिहा गो !   में भी यही बुना गया है । गांव का भ्रष्ट कोटवार कोटवानंद बन जाता है । यह नाटक तत्कालीन पढ़े-लिखे ,संभ्रांत कुलीन जैसे बड़े-बड़े शब्दों से विभूषित किए जाने वाले समाज में भी बाबाओं की गहरी पैठ पर सीधा प्रहार करता है कि संबंधित व्यक्ति तिलमिलाने के सिवा और कुछ नहीं कर पाता है । नाटक का मुख्य पात्र रंग बदलने वाला गिरगिट जिसे छत्तीसगढ़ी में 'टेटका' कहा जाता है । यह राजनीति और बाबागिरी की जो दुरभि संधि है,उसे  पूरी तरह से परत दर परत  उखाड़ता है। जमीन पर पड़े हुए आखरी तृणमूल व्यक्ति से मंदिर के कंगूरे जैसा सत्तासीन होने का जो प्रपंच और छल है उसे यह नाटक प्रदर्शित पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत करता है ।



          यद्यपि सिनेमा नाटक एवं रंगमंच की इतर वस्तु है ।इसके बावजूद भी डॉ योगेंद्र चौबे के निर्देशन चमत्कार को हम 'गांजे की कली ' में देख चुके हैं । 



        इस प्रकार छत्तीसगढ़ी नाटक भी अपनी पूरी क्षमता के साथ किसी भी रंगमंच पर  अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम  हैं । 




*रामनाथ साहू*



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समालोचना ग्रन्थ*

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             *समालोचना ग्रन्थ*


  *छत्तीसगढ़ी साहित्य: दशा और दिशा*

       *(डॉ. नन्दकिशोर तिवारी )*


                 *म*


 *पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे के नाटक 'पीरा' के अंश*

  


            इसी काल खण्ड में डॉ. सुरेन्द्र दुबे का नाटक 'पीरा' और रामनाथ साहू का नाटक 'जागे-जागे सुतिहा गो' प्रकाशित हुआ ।


          डॉ. सुरेन्द्र दुबे का नाटक 'पीरा' छत्तीसगढ़ लोक थियेटर और आधुनिक

नाटकों की समन्वित शैली का आस्वाद देता है। इस नाटक की मूल चेतना

छत्तीसगढ़ का शोषण है। अकाल, पर्यावरण का विनाश, पलायन, अंधविश्वास

इत्यादि समस्याओं को एक साथ यह नाटक उठाता है। रामनवमीं की खुशी दुःख

में बदल जाती है जब अंजोर कहता है।" दिन बादर काकरो रोके नइ रुकय ।

भगवान का जानही हम ऐंठा के डोरी होगे हन। 'पीरा' के लेखक बाजारवाद

का समाज पर पड़ रहे प्रभाव को उद्घाटित करता है। कैसे हमारी इच्छाएँ बाजार

के इशारे पर बनती हैं। उदाहरण के रूप में मनबोधी का यह कथन कि-

मनबोधी -मोला बीस ठन रुपिया दे तो ददा !

पकला-का करबे बीस ठन रूपिया के

मनबोधी- पज्जी बिसाहूं

पकला- सेठ दुकान ले, ले आन डंडहा कपड़ा

मनबोधी - में ह डंडहा पज्जी नइ पहिरॅव। मे ह रेडिमेड पहिरथँव डोरा के ।


         इसी तरह देश के बंटवारे का दुःख भी इस नाटक में व्यक्त हुआ है।पकला का बंटवारा मांगने पर उसका पिता कहता है “सौ साल पूरगे मोर' मे ह देस ल बंटत देखेंव, तहाँ प्रदेस ल बंटत देखेंव। ऊंखरे चाल ल सीख के तहूँ बाटा बर ठेंगा उठात हस रे।" इस नाटक में आकर छत्तीसगढ़ी नाटक ने एक अव्यक्त

दर्द को व्यक्त किया है। उसकी तासीर और जमीन भी बदली है।

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छत्तीसगढ़ी साहित्य दशा और दिशा / 103


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लघु कथा - " चिंनगारी " -मुरारी लाल साव

 लघु कथा -

         " चिंनगारी "

       -मुरारी लाल साव 

चूल्हा म भात चूरत रहिस l छेना लकड़ी जलत रहिस बीच बीच म चिंनगारी छटक जाय एला देख के केकती अपन नोनी बीना ला  चेतावत कहिस -"

देख के नोनी चिंगारी ले बाँच के राह l कतका जोर कती लुक कती आ जही l कपड़ा लत्ता ले बचा के राख lआगी ले जादा चिंगारी ले डर लगथे l धुरिया रहिबे l "

बीना नोनी  चूल्हा मेऱ साग सुधारत  गुनत घलो रहीस l बीना ला अपन मइके म आये छै महीना होगे रहिस l सब पूछय घलो बीना नोनी बइठ गे हे का? ओकर ससुरार वाले मन आके लेगत नइ हे l जेखर ऊपर पहाड़ टूटथे उही जानथे l 

बीना सुन सुन के तर तर आँसू के रेला बोहातीस l जेने पातिस तेने पूछत्तीस l  सास मन के चलथे बहू के कोन सुनथे?काकर सो झगरा होगे हे अतेक तेमा तोला लेगत नइ हे? बीना के छाती म पखरा कचारे अस घात लगय l

इही चिंता म दिनों दिन मुराझावत जात रहीस चेहरा ह ओकर l 

      एक दिन अपन मौसी सास ला  बताइस -

"मय ककरो सो लिगरी लाई के गोठ नइ करेव हँव l उल्टा मोर ननद शकुन हा लबारी गोठ करके भड़का देहे l 

कोनो कुछु लेवय कुछु देवय  मोला का करना हे l 

फेर जेला मै नइ जानव त का बताहूँ l  

अपने मन पइसा कौड़ी धरथे अपने मन ओरमांथे गहना ला l अपने मन पहिरथे कोन मेऱ कहाँ मढ़ाथे?हम का जानबो दाई l 

इल्जाम लगाथे मोरे ऊपरl सहन नइ होवय l 

इही लिगरी लाई ला सुन मोर पति  समझावत कहिस -"घर म चिंगारी के लुक धर लेहे  आगी लग गे हे  भभके  भर बर बाँचे हे एखर ले पहिली अभी अपन मइके म कुछ दिन राह l

मय तोला जइसे छोडत हँव ना ओइसने लेगे बर घलो आहूँ l

टेंशन म रहिबे  त तोर कोंख बर बुरा असर होही l


दाई बहिनी अउ गोसाईन के जंजाल म फँसे केशव रस्ता निकालीस l चार महीना अइसने म सिरागे l

एक दिन केशव के दाई कहिथे -" बेटा तै ले अतेस बहू ला l

जादा दिन कोनो बहू ला ओकर मइके म नइ रखय l"

इही बीच ओकर बहिनी कइथे-" एके जघा म रहिबे त पूछा पाछी म कुछ बात निकल जथे l भउजी के बिना घर सुन्ना लगत हे l

मोर सो गलती होगे हे माफ़ी मांग लुंहू l "

चिनगारी  छटकत रहिस l झोइला होगे आगी के संग l

"चल बहिनी, बीना ला लेके आबो l अपन घर बार ला अपन संभालय l"

अइसने कहत केशव अपन ससुरार लाये बर निकल जथे l

पसहर चाउर* -चन्द्रहास साहू

 *पसहर चाउर*


                                    -चन्द्रहास साहू




“दोना ले लो ओ …!”

“पतरी मुखारी ले ले ओ..!”

“लाई ले ले ओ…. !”

दुनो मोटियारी ओरी-पारी आरो करत हावय। आज झटकुन उठ गे हावय दुनो कोई। मुड़ी मा गुड़री , गुड़री मा पर्रा , पर्रा मा टुकनी , टुकनी मा लाई दोना-पतरी,दतोन-मुखारी हाबे। छोटे दाऊ पारा ला चिचिया डारिन। थोकिन बेच घला डारिन। अब तेली पारा जावत हावय। जम्मो बच्छर बेचथे जम्मो नेग – जोग के जिनिस ला अपन गाँव अउ आने दू चार गाँव मे। दोना पतरी ला नवइन रेवती बेचत हावय अउ केंवटिन हा लाई ला बेचत हे । .......फेर आज तो रेवती के अन्तस मा जइसे कोनो पथरा लदकाय हावय।

“का होगे दीदी ! आज तबियत बने हावय न ?”

“हव बहिनी ! बने हावंव।”

रेवती हुंकारु दिस फेर मन मा अब्बड़ बादर गरजत रिहिस। गौरा चौरा करा अब थिरागे दुनो कोई। पारा के आने माईलोगिन मन सकेलागे रिहिन। पर्रा के दोना पतरी ला निमारे लागिस।

” मेंहा देवत हंव बहिनी तुमन झन छांटो।"

"आ बहिनी रमेसरी ! नेग जोग के जिनिस ला बिसा ले।”

रेवती अउ केंवटिन दुनो कोई किहिस।

रमेसरी दुवार लिपत रिहिस। खबल – खबल हाथ धो डारिस। भीरे कछोरा मा आइस महुआ झरे कस हाँसत।

“का होगे या ..?”

"अब्बड़ खुलखुल हाँसत हस बाई ।"

केवटिन के आरो ला सुनके किहिस रमेसरी हा।

“अई तुमन मोर घर मा आये हव तब हाँसहु नही, तब रोहू या…। अब्बड़ धुर्रा होगे रिहिस बहिनी तेखर सेती दुवार लिपत हंव। फेर ..।”

“फेर..का  ?” 

समारिन किहिस।।

“फेर अउ का.....  ? पानी गिरत हावय नइ देखत हस ?”

अब छे सात झन उपासिन मन सकेलागे रिहिन। जम्मो कोई हाँसे लागिन रमेसरी के गोठ ला सुनके। पारा भर गमकत हावय अब।

” सिरतोन काहत हस दीदी ! ये अखफुट्टा इंदर देव हा अइन्ते – तइन्ते बुता करथे । चौमासा मा घाम टड़ेरथे अउ गरमी मा पूरा बोहाथे। तेखर सेती राच्छस मन नंगतेहे कूटथे ओला ओ..।”

बिसाहिन किहिस अउ फेर खुलखुल हाँसीस।

“ओ  इंदर भगवान के गोठ तो झन कर दीदी ! पर के गोसाइन बर नियत डोला दिस। कुकरा बन के पर घर खुसरगे। भगवान मन अइसने नियत खोंटा करही तब मइनखे मन के का होही ..?”

धरमिन आय। ओखरो गोठ अब मिंझरगे रिहिस। 

गघरा भर पानी मुड़ी मा बोहो के आवत रिहिस। छलकत पानी अउ पानी मा मिंझरे मांग के लाली कुहकू जतका खाल्हे उतरत हावे ओतकी रंग कमतियावत हावय अउ मन मा उछाह के रंग चढ़े लागिस। माथ ले नाक , नाक ले नरी अउ नरी ले उतरके छाती मा हमागे कुहंकू ले रंगे पानी हा।

           एमन गाॅंव के अप्पढ़ माई-महतारी आवय। नित-नियाव बर अपन कोनो पुरखा ला घला ना छोड़े तब भगवान बर कइसे अंगरी नइ उठाही....? इही तों लोकमान्यता आवय अउ लोक ले बड़का का हो सकत हाबे ? 

“पसहर चाउर बिसाहू बहिनी…?”

“वहु तो अब सोना होगे हावय वो ।”

“धरमिन अउ रमेसरी गोठियावत रिहिस।

कामे तौलही रेवती दीदी हा। तोला मे.., किलो में.., कि पैली मे.. ?”

जम्मो कोई फेर हाँसे लागिस।

” पबित्तर जिनिस हा मँहगा तो रहिबे करही दीदी !” केवटिन किहिस।

” लइका लोग सब बने- बने हावय न बेटी रेवती !”

महतारी कस मंडलीन डोकरी के गोठ सुनके रेवती अब दंदरे लागिस। आँसू के बांध अब रोहो – पोहो होगे। पीरा छलकगे। घो..घो..हि.. हि… हिचकी मार के .. अउ अब गोहार पार के रो डारिस। रेवती के बेटी रितु हा काली मंझनिया ले बिन बताये कही चल देहे। कुछु बताये के उदिम करिस रेवती हा फेर मुँहू ले बक्का नइ फूटे।

“ओ काला बताही ओ ! रेवती के टूरी हा अनजतिया टूरा संग उड़हरिया भगा गे हे तेला।”

कोतवाल आवय। ओखर बीख गोठ ला सुनके झिमझिमासी लागिस रेवती ला।

“कलेचुप रहा कका ! सरकारी दस एकड़ खेत ला पोटारे हस तेखर सेती आनी-बानी के उछरत हावस। माईलोगन के मरजाद ला नइ जानस। गरीबीन ला ठोसरा मारे के टकराहा हस ।”

” कुकुर के पूछी कहा ले सोझियाही।”

रमेसरी अउ धरमिन आवय झंझेटत रिहिन।

                        रेवती भलुक गरीबीन रिहिस फेर अब्बड़ दुलार अउ मया पाये रिहिस माइके मा। कोनो महल अटारी के नही भलुक कुंदरा के राजकुमारी रिहिस रेवती हा। राजकुमार मिलिस तब तो सिरतोन के राजकुमार बनगे रेवती बर। ....फेर गरीबीन के भाग मा उछाह नइ लिखाये राहय । मंद महुआ पियईया राजकुमार हा टूरी के छट्ठी के पार्टी बच्छर भर ले मनावत रिहिस। पार्टी नइ सिराइस फेर राजकुमार सिरागे।

आँसू के एक- एक बूँद ला सकेलतीस ते समुन्दर ले आगर हो जाही..। कतका दुख के पहार ला छाती मा लदके हावय कि हिमालय कमती हो जाही। कतका ठोसरा अउ अपमान सहे हे …कोनो नइ जाने। बेटी के कल्थी मारत ले बइठत तक। बइठत ले मड़ियावत तक । मड़ियावत ले रेंगत तक। ......अउ  रेंगत ले उड़ाहावत तक। …अउ उड़हाये लागिस तब तो झन पुछ ..! काखर आँखी मा नइ गड़े लइका हा..। पांख ले थोड़े उड़ाथे बेटी मन ..? अपन मिहनत मा सब ला जानबा करा देथे। गोड़ तिरइया मन उही मेर भसरंग ले मुड़भसरा गिर जाथे।

बेटी बारवी किलास मा पूरा राज मा पहेला आये हावय। पेपर छपिस जयकारा होइस। 

“बेटी ! तिही मोर जैजात आवस। न गाँव मा दू कुरिया के घर बिसा सकत हंव, न खार मा खेत । .. अउ घर, खेत रहे ले मइनखे पोठ हो जाथे का ? जैजात आवस बेटी ! तोला देख के मालगुजार कस महुं हा छाती फुलोथो। ...अउ अइसना फुलत रहूँ सबरदिन।

फेर आज फुग्गा फुटगे। गुमान टुटगे। हवा निकल गे ।

“भागना रिहिस ते हमर जात सगा के का दुकाल रिहिस ओ ? पठान टूरा संग…छी छी…।” 

कोतवाल फेर बीख बान छोड़त रेंग दिस।

रेवती के मन गवाही नइ दिस फेर गाँव के पटवारी कका बताइस तब कइसे नइ पतियाही ? उही तो आय पुरखा घर के एक खोली ला अतिक्रमण हाबे कहिके टोरवाये रिहिन। पटवारी के लिखा ला भगवान ब्रम्हा घला नइ कांट सके तब रेवती वोकर गोठ ला कइसे नइ पतियाही..?

“मेहाँ देखे हंव रेवती बेटी ! बड़का अरोना बेग ला पीठ मा लाद के ओ टूरा संग भुर्र होगे तेला।” 

पटवारी फेर किहिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।

“इंजीनियरिंग कालेज के तीर मा मोटियारी टूरी के लाश मिलिस दू चार दिन पाछू। बदन के जीन्स टी शर्ट जम्मो चिरागे रिहिस। पुलिस केस मा पता चलिस – कबाड़ी वाला के बेटा आवय सलमान । टूरी ला अपन मया मा फँसाये के उदिम करिस अउ नइ फँसिस तब चारो कोई ओरी पारी.... ... छि... छी.....।”

पटइल कका आवय। गोठ सुनके अंतस मा गाज गिरगे।रेवती के जी कलप गे। मुँहु चपियागे टोटा सुखागे फेर पानी के एक बूँद नइ पियिस।

“आजकल नवा चरित्तर उवे हे भइयां ! लव जिहाद कहिथे। आने जात के मन मया मा फँसा लेथे। टूरी ला मुनगा चुचरे सही चुचर लेथे। खेत जोतके बीजा डार देथे अउ छोड़ देथे ..खुरचे बर। ये जम्मो डंफायेन हा बड़का शहर मा चले । अब हमर गाँव देहात मा घला आ गेहे। धन हे श्री राम जी..! तिही बता भगवा रंग ला कइसे अइसन खतरा ले उबारबो तेला?”

पुजारी आय मंदिर ला माथ नवावत किहिस।

रेवती काला जानही घरखुसरी हा, लव जिहाद – फव जिहाद ला। अपन बुता ले बुता राखथे। उही पुजारी आवय जौन हा डांग-डोरी, देवी-देवता, देव- आंगा देव ला नचा लेथे।

रेवती बम्फाड़ के रो डारिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।

अभिन बारवी पढ़ के निकले हावय कइसे मया के मेकरा जाला मा अरहज जाही ? अरहज सकथे न !, नेवरिया घर बारवी पास नइ होवन पाइस अउ बिहाव कर दिस।.. अउ ओ खोरवा मंडल के दसवीं पढ़इया नतनीन.. अब्बड़ आनी-बानी के गोठ सुनथो। ओमन अइसन करत हावय तब मोर बेटी…? अब्बड़ गुनत-गुनत अंगरी मा गिन डारिस। लइका हा छे बच्छर मा बड़े स्कूल मा भरती होइस। बारा बच्छर ले पढ़ीस । बारा छे अट्ठारा..।

“अई”

रेवती के मुँहु उघर गे। लइका संग्यान होगे। इही उम्मर मा ओखर खुद के बिहाव होये रिहिस।

रेवती के आँसू भलुक सुक्खागे रिहिस फेर आँखी उसवागे रिहिस।

“कोन पठान टूरा आवय रे ..? हमर गाँव के बहु बेटी ला बिगाड़त हे। अभिन थाना मा फोन करथंव । भगवा रंग वाला मन ला घला सोरियावत हंव । ओ पठान टूरा के बुकनी झर्रा दिही ओमन।”

सरपंच आवय रखमखा के आइस अउ तमकत हे।

” महूँ देखे हंव ओ रितु नोनी ला । कोन आय तेला नइ चिन्हे हंव फेर टूरा हा सादा कुरता पैजामा अउ मुड़ी मा हरियर टोपी पहिरके तहसील ऑफिस कोती जावत रिहिस।”

गाँव के डॉक्टर आय।

” मोला तो कोर्ट मैरिज करे बर जावत रिहिस अइसे लागथे।” 

सरपंच फेर किहिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय अभिन घला।


                      रेवती घर अमरगे रिहिस अब। अउ घर ले दोना पतरी ला उपासिन मन ला बेचत हाबे। फेर मोटियारी बेटी के संसो मा काला धीरज धरही ? कभु डॉक्टर करा जातिस कभु वकील करा, कभु बइगिन करा तब पहटनीन करा । कतको बेरा फोन घला लगाइस फेर स्विच ऑफ आइस बेटी के फोन हा। 

            जेखर संग मया कर तेखर संग बिहाव घला करना चाही । नही ते..? मया ही झन कर। महाभारत मा रूखमणी हा भाग नइ सकिस तभे भगवान किसन ला भगाये बर किहिस । अउ रूखमणी ला हरन करके लेगगे किसन जी हा। रितु हा महाभारत देखत- देखत केहे रिहिस अउ रेवती बरजे रिहिस । नानचुन टूरी अउ आनी – बानी के गोठ करथस। जइसे पढाई मा हुशियार हावय वइसने खेलकूद लड़ई झगड़ा सब मा अगवाये हाबे…अउ मया मा भागे बर…?


धिरलगहा पतियावत- पतियावत अब सिरतोन पतियाये लागिस रेवती हा.. ।

बेरा चढ़गे अब। महुआ पत्ता के दोना पतरी ला कतको झन ला बेचिस अउ कतको झन ला फोकट मा घला दिस। कतको झन ला छे किसम के अन्न राहर जौ तिवरा चना बटरा अउ लाई दिस। छे किसम के खेलउना बनाइस बाटी भौरा गिल्ली डंडा धनुष बाण गेड़ी। पसहर चाउर (लाल रंग के धान जौन पानी के स्रोत मा अपने आप जाग जाथे। सुंघा/कांटा रहिथे। बाली ला सुल्हर लेथे दीदी मन अउ रमंज के चाउर निकालथे । इही लाल रंग के चाउर  ला पसहर चाउर कहिथे ) ला रांधिस बिन जोताये खेत ले छे किसम के भाजी सकेल डारिस अमारी मुनगा कुम्हड़ा लाल पालक बथवा भाजी। गाँव के डेयरी ले दूध मही घीव ले आनिस। अउ अब जम्मो तियारी करके गौरी – गौरा चौक मा रेंग दिस।

                मंडप साजे हे। सगरी बने हावय सुघ्घर अउ पार मा खोचाये हे चिरइया फूल कनेर कांसी दूबी अब्बड़ सुघ्घर। दाई माई बहिनी मन घला अपन जम्मो सवांगा पहिरे- ओढ़े । मेहंदी मा रंगे हाथ अउ आलता माहुर मा गोड़। चुरी वाली अउ  बिन चुरी वाली सब बइठे हावय संघरा। लइका के उज्जर भविस बर असीस मांगत हावय जम्मो उपासिन मन कमरछठ महारानी ले।

“अब तोरे आसरा हावय ओ कमरछठ दाई !” 

रेवती के ऑंसू बोहागे महराज के पैलगी करत। दिन भर के निर्जला उपास । जम्मो कोती अँधियार लागिस। लटपट घर अमरिस अउ सुन्ना घर मा समावत पारबती भोले नाथ के फोटू ला पोटार लिस। बेसुध होगे।


उदुप ले मोहाटी के कपाट बाजिस अउ नोनी हा खुसरिस भीतरी कोती। बटन ला मसक के लट्टू बारिस।


“दाई ! ”

ये आखर रेवती बर संजीवनी बूटी रिहिस। झकनका के उठिस अउ  लइका ला पोटार लिस। नोनी रितु के नरी मा झूल गे।

“गाँव भर नाच नचा डारे। पदनी-पाद पदो डारे । जिहाँ जाना हे, बता के जाना रिहिस तोला कब बरजे हंव बेटी ! झन जा कहि के । ”

रेवती अगियावत रिहिस अउ रोवत किहिस।  रितु के गाल घला झन्नागे दाई के चटकन ले।

“दाई रायपुर गे रेहेंव। अब तोर बेटी हा मेडिकल कालेज मा पढ़ही ओ !”

मुचकावत रिहिस रितु हा।

“अउ पइसा ? ”

“लोन लेये हंव, शिक्षा लोन। फरहान भइया जम्मो बेरा पंदोली दिस फारम भरे अउ लोन निकाले बर। मोर संगी रुखसाना के भाई आय ओ ! फरहान हा। रायपुर दुरिहा हे तेखरे सेती अगुवाके काली गे रेहेंव मेहां, रुखसाना अउ फरहान भइया तीनो कोई। आजे आखरी दिन रिहिस काउंसिलिंग के । मोबाइल घला मरगिस तब का करहु। जाथो कहिके पटेलीन डोकरी ला घला बताये रेहेंव । भैरी सुरुजभूलहिन नइ बताइस ? नानचुन गोठ बर झन संसो करे कर। रितु मुचकावत रिहिस अउ रेवती के ऑंसू पोंछत रिहिस।

टूरा के जेवनी कोती अउ टूरी के डेरी कोती पोता मारे के विधान हाबे। नानकुन कपड़ा ला पिवरी छुही मा बोर के रितु के डेरी कोती पोता मारे लागिस रेवती हा। छे बार पोता मारके आसीस दिस खुलखुल हाँसत रेवती हा अब।

बिन जोताये खेत मा उपजे चाउर कस पाबित्तर लागत रिहिस अब रितु हा। अउ  गाल मा उछाह के रंग दिखत रिहिस सिरतोन पसहर चाउर कस  लाल-लाल।


चन्द्रहास साहू

द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब के पास

श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़

493773

कमरछठ के महता* डॉ पद्‌मा साहू *पर्वणी*

 *कमरछठ के महता*

                   डॉ पद्‌मा साहू *पर्वणी* 


हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति हा बड़ समृद्ध हे। इहाँ के लोक नृत्य, लोकगीत, तिहार-बार सबो हमर धरोहर के रूप मा जाने जाथे। लोगन देवारी, दशहरा, नवा खाई, आठे गोकुल, तीजा पोरा, जोत जँवारा जइसन तिहार ला बड़ धूमधाम ले मनाथें। अइसने इकठन तिहार आथे दाई-माईमन के जेला *कमरछठ* कहिथे। 

       भादो महीना के अंधियारी पाख के छठ के दिन भगवान बलराम जेन ला हलधर कहिथे वोकर जनम होय रहिस अउ वोकर जनम दिन ला कमरछठ (हलषष्ठी) के रूप मा मनाय जाथे। भगवान बलराम हा एक समृद्ध  किसान रहिस अउ वो पशु पालन के काम  करयँ। एक किसान के रूप मा वो नांगर ला अपन प्रमुख अस्त्र माने। तेकर सेती ये परब ला हलषष्ठी घलो कहिथें। एकर महता अउ नियम बड़ खास हे। ये दिन उपसहीन मन हलधर के अस्त्र हल (नांगर) के सनमान मा नांगर चले वाले खेत-खार, रद्दा मा नइ चले। उपसहीन महतारी मन ये उपास ला अपन संतान के लंबा उमर अउ अच्छा स्वास्थ बर रखथें। महिला मन कमरछठ के दिन बिहनिया ले सुत उठ के घर के साफ सफई करके नहा धो के तियार होथें। ये दिन उपसहीनमन महुआ के दतवन करथें काबर कि महुआ भगवान बलराम के मनपसंद चीज आय। कमरछठ के पूजा मा सगरी (तरिया के प्रतीक) के बहुतेच महता हे। ये सगरी मा उपसहीन मन शुद्ध जल भरथें। येकर चारो कोती पार बनाके काशी, बोरझरी बोइर, परसा (पलास) के डारा ला सजाथें। सगरी के जघा ला पवित्र करे बर गोबर ले लिपथें। सगरी हा सुख समृद्धि अउ बलराम जी के प्रतीक आय। 

        सगरी के तीर मा भगवान बलराम के संगे संग छठ माई, शिव भोले अउ गौरी गणेश के माटी के मुरती बना के आसन मा बइठाथें अउ पूजा के विधान शुरू करथें। पूजा मा भैंइस के दूध, दही, घी अउ सात जात के अनाज ला चढ़ाथें। जइसे कि पसहर चाउर, धान, महुआ, राहेर, जौ, गहूँ अउ हूम-धूप, चंदन-बंधन, फूल-पान, नरियर, सुपारी संग धान के लाई के सात ठन दोना भरथें। भँवरा बाँटी ला लइका मन के खेलउना बना के पूजा मा चढ़ाथें। पंडित जी मंत्र के संग कमरछठ ले जुड़े छै ठन कहानी सुनाथे। कहानी के बाद आरती पूजा करके दाई महतारी मन सगरी के सात भाँवर घूम के सात लोटा पानी सगरी मा डारथें। सब झन हाथ जोड़ के भगवान ला अपन-अपन लइकामन के सुख समृद्धि अउ दीर्घायु होय के कामना करथें। आखरी मा नवा-नवा, नान्हे-नान्हे चेन्दरी ला सगरी मा डूबा के अपन-अपन लइका मन के कनिहा मा पोता मारथें। एकर पाछू ये मान्यता हे कि एकर ले लइका मन के स्वास्थ हा अच्छा रहिथे। गाँव मा येला (कमरछठ) सब लइका-सियान, दाई-माई मन एक जघा जुरियाके बड़ धूमधाम ले मनाथें। सब ला लाई नरियर के प्रसाद देथें।

         पूजा-पाठ के बाद उपसहीन मन छै जात के भाजी के साग बनाथें, पसहर चाउर के भात राँधथें अउ दही संग महुआ पाना के पतरी मा खाथें अउ अपन निर्जला उपास ला टोरथें। साँझ होय के पहिली सब झन मिलके पूजा के हवन-धूप, पान-पतरी ला तरिया नदिया मा जाके ठंडा (विसर्जित) करथें। ये प्रकार ले कमरछठ के तिहार हमर समृद्ध संस्कृति के पहिचान आय। जेला छत्तीसगढ़ के संग-संग बिहार, मध्यप्रदेश के माईलोगिन मन बड़ उछाह के संग नियम के पालन करत संतान के लंबा उमर खातिर उपास ला सब रखथें। अइसने तिहार मन हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति ला समृद्ध करथे। अभी नवा पीढ़ी के बहू-बेटी मन घलो कमरछठ के उपास ला आस्था अउ बिस्वास के संग अपन अवैया संतान बर हँसी-खुशी ले रखथें। एकर ले हमर रीति रिवाज परंपरा हा आगू बढ़थे।  


डॉ पद्‌मा साहू *पर्वणी* 

खैरागढ़

गुल्लक* (छत्तीसगढ़ी लघुकथा)

 .                    *गुल्लक* (छत्तीसगढ़ी लघुकथा)


                              - डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


            दस बरस के अंशु के छुट्टी चलत रहिस। आज शुक्रवार के दिन हे। महीने के आखिरी तारीख घलो। पापा आफिस जाय बर निकलत रहिस कि अम्मा कहिस- ' वापसी मा थोरकुन साग ले अइहा। '

        मम्मी की बात ला पापा अनसुना कर दीस। ओही समे अंशु दउड़के पापा के लक्ठा मा आइस अउ अपन एक हाथ ला फैलाके बोलिस- ' पापा पैसा? आज मैं पचास रूपया लेहूँ। मोला अपन दू सहेली ला घलो गुपचुप खिलाना हे!' 

         ' बेटा, बीस रूपिया ले लेबे। '

         ' नहीं, पापा, पचास रूपिया लेहूँ! सहेली मन के आघू मोर कुछु इज्जत हे कि निहीं? मँय ओमन ला बोल डारे हँव! '

       ' ठीक हे। '

       पापा अपन पीछे पाकिट मा हाथ डारिस। उहाँ पर्स नि रहिस। 

      ' बेटा, पर्स आलमारी मा रह गे हे। ओला ले आ तो जरा। '

      अंशु दउड़के गइस अउ पापा के आलमारी ले पर्स निकालके ओला खोलके देखे लगिस। ओमा केवल पचास रूपया रहिस। .....  ओला सुरता आइस कि पापा के बस के आय-जाय के टिकट तीस रूपया लगही। बाकी बीस रूपया मा एक-आध बार चाय पीही! 

      ' ओह आज तो महीने के आखिरी तारीख घलो हे! पापा मोला पइसा कहाँ ले दिही!  ' - अंशु के आँखी भर आइस। आँसू पोंछत अपन मिट्टी के गुल्लक ला तोड़िस अउ ओमा जतका भी नोट रहिस सब ला पापा के पर्स मा भर दिस। एकर बाद वोहा पापा ला पर्स देके तुरते वापस आ गइस अउ फूटे गुल्लक के टुकड़ा मन ला  समेटे लगिस। 

       पापा अपन पर्स ला खोलके देखिस अउ नोट मन ला गिनती करे के बाद अंशु के अम्मा ले बोलिस- ' तँय मोर पर्स मा एक सौ बीस रूपया अउ डारे हस का? '

       ' नहीं तो! '

        पापा तुरते कमरा के भीतर लौटिस त देखिस कि अंशु फूटहा गुल्लक के टुकड़ा मन ला इकट्ठा करत हे। पापा सब कुछ समझ गइस अउ लगभग दउड़त अंशु के लक्ठा मा गइस। अंशु जइसे ही  पापा ला अपन तीर मा देखिस वोहा लिपट गिस अउ रोवत-रोवत बोलिस- ' पापा! आप मोला काबर नि बताया कि आपके पैसा खतम हो गे हे! मोर गुल्लक मा पइसा तो रहिस न! '

                             समाप्त 

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ग्राम्य जीवन के यथार्थपरक कहानी संग्रह* संदर्भ: डाॅ जयभारती चंद्राकर कृत 'शहीद के गाँव'


 .

.        *सरसिज के मधुर मुस्कान ला समेटे* 

   *ग्राम्य जीवन के यथार्थपरक कहानी संग्रह*

संदर्भ: डाॅ जयभारती चंद्राकर कृत 'शहीद के गाँव'


                         - डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


.        ' शहीद के गाँव ' डाॅ जयभारती चंद्राकर के सद्यः प्रकाशित (2024) छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह हे जेमा 23 कहानी संकलित हे। डाॅ जयभारती चंद्राकर के लेखन मा छत्तीसगढ़ के माटी की सौंधी-सौंधी सुगंध मन ला मोह लेथे। कहानी मन मा छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक परम्परा अउ मुहावरा के दिग्दर्शन होवत हवय। ये कहानी मन व्यक्तिपरक न होके समाज ला दिशा देखावत प्रतीत होवत हें। एकर साथ एमा छत्तीसगढ़ के अस्मिता के दिग्दर्शन होवत हे।

            छत्तीसगढ़ी गद्य अउ पद्य साहित्य के पुरोधा साहित्यकार संत पवन दीवान जीवन भर छत्तीसगढ़ के अस्मिता  बर लड़िन। ओमन लिखे हवँय- 


छत्तीसगढ़ में सब कुछ है 

पर एक कमी है स्वाभिमान की 

मुझसे सही नहीं जाती है 

ऐसी चुप्पी वर्तमान की।


              डाॅ जयभारती चंद्राकर के कहानी मन एही चुप्पी ला तोड़त हें। साहित्य सृजनशील अउ रचनात्मक प्रक्रिया हे। साहित्य कभू निष्पक्ष नि होवय फेर वोहा मानवता के पक्षधर होथे। डाॅ जयभारती चंद्राकर के कहानी मन  घलो निष्पक्ष नि हें फेर वोहा मानवता के पक्षधर हे। उँकर कहानी मन मा सद्साहित्य के बिंब स्पस्ट झलकत हे। सद्साहित्य का हे?- एला समझे बर पानी अउ जल के अंतर ला समझे बर परही। वइसे पानी और जल एक-दूसर के पर्यायवाची हे फेर एक-दूसर ले अलग घलो हे। काकरो पैर धोय या प्यास बुझाय बर पानी शब्द के प्रयोग उचित हे फेर गंगा जी से हम पानी नि लावन बल्कि गंगाजल लेके आथन। जब पानी के संग आस्था अउ विश्वास जुड़ जाथे तब वोहा जल हो जाथे। सूर्य ला हमन जल चढ़ाथन पानी नि चढ़ावन। डाॅ जयभारती चंद्राकर के कहानी मन मा आस्था अउ विश्वास जुड़े हुए हे एकरे सेती वोहा जल के समान हे। 

.       कहानी संकलन के पहलिच  कहानी  ' शहीद के गाँव ' साहस, बलिदान अउ त्याग के कहानी हे। सीआरपीएफ के जवान भृगुनंदन छह नक्सली मन ला मारे के बाद अपन साथी मन ला बचावत शहीद हो जाथे। ओला भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत कीर्ति चक्र प्रदान किये जाथे। एही गाँव सढ़ौली के दु अउ सिपाही डिगेश्वर शाँडिल्य अउ कालेश्वर चौधरी घलो नक्सली मन के साथ मुठभेड़ मा शहीद हो जाथें। एकरे सेती ये गाँव ला शहीद के गाँव के नाम ले जाने जाथे। छत्तीसगढ़ के सुदूर दक्षिण मा फैले घना दरख्त अउ वन्य पशु-पक्षी मन के शरणस्थली अउ आदिवासी जनजातीय लोक संस्कृति के ध्वजवाहक ' बस्तर के पठार ' घलो आज नक्सली मन के कहर ले कराहवत हे। वसन्ती वर्मा हर अपन कविता ' बस्तर ' मा ठीकेच  लिखे हे-


कोनो ला कइसे समझाओं आज, 

बस्तर के फेर लुकागे भाग।

इहाँ सबो डहर, चारों पहर,

दीमक कस बगरे हे,

गोली-बारूद के कचरा। 

जेमा जरत हे, 

छत्तीसगढ़ महतारी के अँचरा।


.       कहानी ' एँहवाती ' विधवा विवाह के क्रांतिकारी अउ मार्मिक कहानी हे। इकलौता बेटा के बिहाव के सिर्फ एक बरस बाद अकाल मृत्यु हो जाथे। त फूलकेसर के ससुर बहू ला बेटी बनाके ओकर पुनर्विवाह कर देथे। सामाजिक ताना-बाना मा जकड़े ससुर बर ये सब बूता सरल नि रहिस। बिदाई के बेरा बहू फूलकेसर फफक-फफक के रोवत कहिथे- ' बाबू, मे हर अपन मइके ले बिदा हो के तुँहर अँगना म बहुरिया बनके आय रेहेंव। आज मोर नोनी संग मोला विदा कर देव, मोर सुख बर अपन करेजा म पथना रख के समाज अउ बिरादरी के डाँड़ सह के, समाज म नवा अंजोर लाय हो। इही दुवारी म बहू बन के आय रेहेंव अउ आज बेटी बन के बिदा होवय हँव,एँहवाती बनके बिदा होगेंव। कइसना ये भाग पाय हँवव ....।' फूलकेसर के चरित्र चित्रण अउ संवाद न केवल मार्मिक हे बल्कि लाजवाब घलो हे।

       ' डाँड़ ' अंतरजातीय बिहाव के कारण समाज ले बहिष्कृत होय के पीड़ा ला उजागर करत मार्मिक कथा हे। सावित्री के मृत्यु हो जाथे त पारा-परोसी तो आ जाथें फेर कांधा देवइया लरा-जरा, सगा-संबंधी मन नि आवँय। ए तरा वोहा मृत्योपरान्त घलो बहिष्कृत रहि गे। सामाजिक ताना-बाना म गूँथे ये कथा हर ग्रामीण कुरीति के एक यथार्थपरक उदाहरण हे।

        ' आसा अउ किरन ' वन के विनाश के कारण वन्य जीव-जन्तु खासकर जंगली वनभैसा के क्षीण होवत संख्या ला रेखाँकित करत  ' बेटी बचाओ ' के संदेश देवत हे।

       ' चढ़व निसयनी ' एक गरीब परिवार के बेटी गीता के मार्मिक अउ शिक्षाप्रद कहानी हे जेन अपन बलबूता मा पढ़-लिख के शिक्षिका बन जाथे अउ अपन छोटे भाई-बहन मन ला घलो पढ़ा-लिखा के स्वावलंबी बना देथे।

       ' किसान के पीरा ' न्यायप्रिय राजा जयपाल अउ एक किसान के मार्मिक कथा हे। किसान ला खुशहाल देखके राजा जयपाल किसान मन उपर भारी कर लगा देथे जेकर कारण किसान मन के जिनगी बदहाल हो जाथे। बाद में राजा ला अपन गलती के एहसास होथे अउ कर वापस लेके किसान मन के कर्जा ला माफ कर देथे।

        ' झोला वाला बबा ' एक ठग गिरोह के कहानी हे जेन धन ला दो गुना करे के लालच देके गाँव के भोला-भाला लोगन के धन-संपति ला ठगके भाग जाथे। एहा अइसन ठग मन ले बचे के संदेश देवत यथार्थपरक कथा हे। 

       ' अन्नदाता ' मा एक पौराणिक गाथा ला आधार बनाके ये सिद्ध करे गे हे कि मेहनतकश किसान ले बड़े भगवान भक्त अउ कोनो दूसरा नि हे। नारद घलो किसान ले छोटे भक्त हे जेन हर चौबीस घंटा नारायण-नारायण कहत रहिथे! भलेहि कोनो किसान भगवान के भजन करत ध्यान करके बइठे नि रहे।

          कहानी संग्रह ' शहीद के गाँव ' के विवेचन-विश्लेषण बर  सबो कहानी मन उपर टिप्पणी करे के जरूरत नि हे। हाँड़ी में पकत चाँउर के कुछ दाना ला अंगुरी मा मसलके ही ये पता लगाय जा सकत हे कि चावल पके हे कि निहीं। डाॅ जयभारती चंद्राकर के कहानी मन आदर्शोन्मुख के साथ ही यथार्थपरक घलो हे अउ समाज मा व्याप्त कुरीति अउ विसंगति मन ला उजागर करे मा सफल रहे हें।

.       छत्तीसगढ़ी मा कहानी लेखन के इतिहास बहुत पुराना नि हे। डाॅ विनोद कुमार वर्मा के संपादन मा प्रकाशनाधीन ग्रंथ  ' छत्तीसगढ़ी के समकालीन कथाकार ' मा छत्तीसगढ़ी के 36 समकालीन साहित्यकार मन के प्रतिनिधि कहानी संकलित हे। येहा छत्तीसगढ़ी कहानी के प्रतिनिधि संकलन हे। 

         खण्ड (01) छत्तीसगढ़ी के 06 पुरोधा साहित्यकार मन के कहानी उपर केन्द्रित हे जेन मन छत्तीसगढ़ी कहानी संसार मा सुकवा तारा जइसन प्रकाशवान हें। एमा केयूर भूषण, डाॅ परदेशीराम वर्मा, डाॅ पालेश्वर प्रसाद शर्मा, डाॅ विनय कुमार पाठक, पं श्यामलाल चतुर्वेदी अउ डाॅ सत्यभामा आडिल के कहानी शामिल हे।

         खण्ड (02) मा शामिल साहित्यकार मन के लेखन अभी गतिशील हे अउ ' सुरुज ' की तरह  किरण विखेरके नया लेखक मन ला  मार्गदर्शन करत हे। एमा अंजली शर्मा,  डाॅ अनिल कुमार भतपहरी,  कमलेश प्रसाद शर्माबाबू , कामेश्वर, कुबेर, चोवाराम वर्मा ' बादल ', दुर्गा प्रसाद पारकर, परमानन्द वर्मा, डाॅ बलदाऊ राम साहू,  डाॅ बिहारी लाल साहू, बन्धु राजेश्वर खरे,  रामनाथ साहू, डाॅ विनोद कुमार वर्मा,  वीरेन्द्र सरल, शकुन्तला तरार, डाॅ शैल चंद्रा, सुधा वर्मा,  डाॅ सुधीर पाठक,  सुशील भोले,  हरिशंकर देवांगन के संग डाॅ जयभारती चंद्राकर के कहानी ' एँहवाती ' घलो शामिल हे।

        ' शहीद के गाँव ' कहानी संकलन मा रूपायित डाॅ जयभारती चंद्राकर के छोटे-छोटे 23 छत्तीसगढ़ी कहानी मन हमर जीवन अउ समाज के सच्चाई ला उजागर करे के सामर्थ्य रखथें। जीवन के अत्यंत छोटे-छोटे प्रसंग ला कथा केन्द्र मा प्रतिष्ठित कर ओला कथा के रूप मा ढाले के कौशल कहानीकार के विशिष्टता के परिचायक हे। डाॅ जयभारती चंद्राकर के कहानी लेखन के अपन एक अलग शैली हे। उँकर विषयवस्तु के चयन मा मनुष्य के संरक्षा के भाव अन्तर्निहित हे। उँकर छत्तीसगढ़ी कहानी मन मा नारी के मनोभाव अउ ग्राम्य जीवन के दिग्दर्शन होथे। 

        वह अपन कहानी मा छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक छटा अउ ग्राम्य जीवन ला दर्शित करके ओकर पल-पल परिवर्तित रूप के न केवल लेखा-जोखा रखथे बल्कि रीति-रिवाज, आचार-विचार आदि ला प्रादर्श के रूप मा प्रस्तुत करके, संस्कार अउ रिश्ता-नाता के अनुभव ला बाँटत अउ अध्यात्म के आधारशिला ला सहेजके रखथे। एकर साथ ही वह ग्राम्य जीवन मा व्याप्त कुरीति ला न केवल उजागर करत हे बल्कि ओकर उपर प्रहार घलो करत हे। 

        ओकर कहानी मन के भाषा भाव, विचार अउ कल्पना ला सहयोग करत हे अउ मुहावरा-कहावत अउ सांस्कृतिक शब्द मन ला संजोके गँवई-गाँव मा रहइया लोगन के चरित्र ला ही वोहा प्रकारांतर मा प्रस्तुत करत हे।

        अपन आसपास के परिवेश के प्रति संवेदनशीलता अउ अभिव्यक्ति के सहजता  कहानी मन ला न केवल पठनीय बनावत हे बल्कि ओला बड़ प्रभावी ढंग ले सम्प्रेषित करे मा घलो सफल हे।  सीधे-सादे सहज प्रतीत होवइया  पात्र मन ला अपन कलात्मक कौशल ले महत्वपूर्ण बना देहे मा घलो कहानीकार सफल रहे हें। 

         डाॅ जयभारती चंद्राकर के कहानी के वितान बहुत लम्बा-चौड़ा नि हे। वह अपन कथा-वस्तु के सीमित आयतन मा रहके घलो मनुष्य-मन के गहराई ला पूरा विश्वसनीयता के साथ व्यक्त करे मा सफल हें। कहानी कहे के अनुपम शैली ला साधत रचना के मर्म ला सहजतापूर्वक उद्घाटित कर देना कथाकार के महत्वपूर्ण विशेषता हे। मानवीय बेहतरी, ओकर ले जुड़े सोच अउ भावना ओकर कथा मन के मूल प्रतिपाद्य हे। यद्यपि उँकर कहानी मन मा विन्ध्याचल के उच्चता नि हे  फेर वन-श्री के हरीतिमा हे-सहज सरिता के तरंग हे अउ सरसिज के मधुर मुस्कान हे। शुभाशंसा हे कि कथाकार डाॅ जयभारती चंद्राकर के सारस्वत साधना के मार्ग प्रशस्त होवय अउ पुण्य-पंथ होवय। 

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 *समीक्षक* 

                       *डाॅ विनोद कुमार वर्मा* 

                       बिलासपुर (छत्तीसगढ)

मो- 98263 40331

ईमेल- vinodverma8070@gmail.com