Tuesday, 28 October 2025

लघुकथा) हाँसी

 (लघुकथा)



हाँसी

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मोला देखते साठ दुकानदार हा मुस्कावत कहिच---

"आव कका आव। आप मन बर ये दरी दर्जन भर ले जादा रिमोट लाके रखे हँव।"

"ठीक करे हच बाबू।हर महिना दू-तीन ठो तो लेगबे करथवँ।कभू  टिंग-टांग रेंगत छोटे नाती हा पानी मा बोर देथे त कभू वोकर ले बड़े नाती हा कार्टुन देखे ला नइ मिलय त पटक देथे ,कभू इनकर मारे सिरियल देखे ला नइ मिलय त नतनिन हा अपन रिस ला रिमोटे उपर उतारथे। का करबे तइसे होगे।"--मैं कहेंव।

"ठीक हे कका ।एमा दुख मनाये के बात नइये।इही तो लइका मन के लिल्ला ये। अइसन लइका घरो घर होना चाही। ले बता के ठो देववँ।" थोकुन हाँसत वो कहिच।

" नहीं।आज रिमोट नइ लेगवँ। ये देला बनही त बनवा दे नहीं ते नवा टीवी दे दे।ये ला लइका मन के बाप हा पटके हे।बोरी मा भराये फूटे टीवी ला उलदत कहेंव।"

वो हा खलखला के हाँसत नवा टीवी धरादिच।


चोवा राम वर्मा 'बादल '

सोहाई* चन्‍द्रहास साहू

 *सोहाई*

                                    चन्‍द्रहास साहू

                                  मो 8120578897

बिहनिया ले उठगे आज ओ नोनी हा। काबर नइ उठही ? आज दुसरइया दिन आवय। जम्मो जीव-जिनावर भक्तिभाव मा बुड़े रहिथे। पहिली दिन जोरा-जारी, हियाव-नियाव, स्वागत-सत्कार मा निकल जाथे। बच्छर मा एक बेरा आथे कुवार नवराति हा।.. अउ संग मा आथे सौहत देबी हा…। जोत-जेवारा, डांग- डोरी धजा -पताका .. ।

रिकम-रिकम के बरन-बईगा- गुनिया, चेला-चंगुरी, डीही-डोंगर, देवी-देवता के, दरसन-परसन, सेवा-सटका करे बर। ओला तो आने गाॅंव जाना हावय आज। अपन कला देखाय बर , आदिवासी लोक नृत्य देखाये बर। ओखर दल बेरा परब मा नाचके, झुमके जम्मो दुख पीरा अउ जिनगी के थकासी ला बिसरा लेथे अपन गाॅंव मा। फेर आने गाॅंव के नेवता मा कला देखाये बर घला चल देथे।

             जम्मो लोकनृत्य मा भगवान आराध्य, इष्टदेव के महिमा, ओखर जस अउ ओला उछाह करे के गोठ रहिथे । चाहे करमा, सरहुल, गौरानृत्य, मांदरी, डंडा, रहस, पंथी, गेड़ी, राउत नृत्य होवय। लोकनृत्य घला भक्ति के माध्यम आवय । शहर के ओन्हा ओढ़ईया कस्बा अउ बड़का शहर मा ये गाॅंव महुआटोला के नाव के सोर अब्बड़ हावय ।

            मन मंजूर अउ गोड़ मिरगा के होगे हे आज ओखर । भिनसरहा भईसा मुॅंधियार रिहिस तभो ले कतका बुता कर डारिस। गाय बछरू के जतन पानी । गोबर-कचरा, बरतन-बासा .. जम्मो बुता । बम्बर बारके परछी ला करिया मा, अउ लाल घेरू माटी मा कोठ ला खुंटिया डारिस । उपका डारिस काली के बाचे खोचे ला ..। माटी के घर खपरा वाला अउ छानी के टिप मा बइठे सोनचिरई ..। सिरतोन कुम्हार हा अभिन लान के मड़हा देय हावय अइसे लागत हावय। बढ़ई अभिन घर ला बनाये होही। सरई अउ बीजा लकड़ी के काड़-कगड़ी, खिड़की-कपाट, खइरपा तक हा सुघ्घर उज्जर नवा -नवा दिखत हाबे। सुरुज नरायेन सोनहा अंजोर बगरावत हे ..। सीत बरसे ले सुघ्घर लागत हे। ससन भर देखिस अपन घर ला मुचकावत । सुरहीन गाय के गोबर ले लिपाये अंगना ला, झूलत खीरा कुंदरू के  बारी ला। धोवाये बरतन के मइलाहा पानी ला आरमपपई म रिकोइस। कोंवर-कोंवर आमा पाना के ममहासी ला सूंघीस । कुम्हड़ा नार ला कोठा के छानी मा चड़ाइस। नहा के छाती बाॅंधे – बाॅंधे दरपन के आगू मा ठाड़े होइस तब सिरतोन उही लजागे, अपन बरन ला देख के। सांवर गोरी झक्क दमकत चेहरा । खीरा बीजा कस दाॅंत । उल्हा-उल्हा कोंवर सरई पत्ता कस होठ-गुलाबी । डोमी कस सुघ्घर बाल अउ कजरारी आँखी हा …।

         जादा तारीफ झन कर फुलगजरा अपने आप के । मनेमन ओहा फुसफुसाइस । चेथी मा चपत मारिस अउ महुआ झरे कस खनखनावत हाॅंसे लागिस।

        अब जान डारे होहु रूपषोडसी मोटियारी ला । महानदी के निरमल पानी ला कछोरा भिरके तौरे हे। परसा फूल के आगी मा तन ला सेके हे । झरत महुआ ला ओली मा झोंके हे । सरई-सइगोना, बर-पीपर के कोरा मा डंडा पचरेंगा खेलइया ये नोनी आय – फुलगजरा । रुप षोडसी मोटियारी फुलगजरा । चातर राज, बस्तर राज अउ उड़िया राज जिला धमतरी, जिला कांकेर कोंडागांव अउ जिला नवरंगपुर के लोक परब अउ संस्कृति के मिंझरा सियार आय ये गाॅंव – महुआटोला हा। जगन्नाथ भगवान ला पाॅंव परके गजामूॅंग खा लेथे । पचहत्तर दिन के दसेरा मनावत सल्फी लांदा ला चुहक लेथे। तब गौ लछमी ला गोबरधन खुन्दाके, सोहाई पहिराके, खिचरी खवाथे । नगरी सिहावा के कर्णेश्वर मड़ई मा डांग-डोरी ला गिदबिद-गिदबिद नचा घला लेथे। अउ भाखा ग्यान …उड़िया छत्तीसगढ़ी, हिन्दी, हल्बी, भतरी सब गोठिया लेथे अपन पीरा ला बताये बर। जइसन भेष तइसन भाखा ।

” तुई तो तियार होऊन गेली से रे फुलगजरा ? पूजा पाठ करतोर काजे शीतला दाई बले जावतोर आसे।''  (तेहा तियार होगेस का फुलगजरा ? शीतलामाता मा पूजा करे बर घला जाये के हे ।)

” हॅंव री होऊन गेली ।'' (हॅंव , बस हो गेंव।)

हिरौदी, मानकुंवर, सुकारो, सुकधनिया, दुलारी आयतिन , रमौतीन, नीलम, रेखा अउ मधु जम्मो कोई आगे दोरदिर ले। जहुंरिया मन के गोठ ला सुनके किहिस। माड़ी ले लाल लुगरा, फुग्गा पोलखा, रूपियामाला, सुता ,नागमोरी करधन, अइठी, बाहा भर चुरी , माथ मा कौड़ी के मथौड़ी, मोरपंखी खोपा …गजब सुघ्घर बरन। संगी मन देखते रहिगे।

दुलारी इतरावत किहिस

“आजी तो तुई हुॅंचो जीव च नेऊन जहुआस कसन आले!''  (तेहा तो मार डारबे आज !)

“को चो ? ” (कोन ला ?)

” हुनि ” (उही)।

“को हुनि ”(कोन उही)।

“अऊर को मोके चलासित, गहिरा लेका के ।” (अउ कोन , मोला चलाथस । गहिरा टूरा ला कहत हँव।)

फुलगजरा अब लजागे । बातिक बाता नइ कर सकिस।

हा… हा …खी.. खी.. के आरो आइस। शीतला दाई के अंगना घला गमकत हावय अब।

           फुलगजरा अपन टोली के मुखिया डांसर आवय। गहिरा टूरा बलराम हा मांदर बजाथे तब सब मात जाथे । आज टेक्टर मा जोरा के मांदरी नृत्य देखाये ला जावत हे गरियाबंद।

” सेठ पिला के फोन आये रिहिस। रायपुर बलात हावय। एलबम मा बुता दुहूॅं कहिथे । जतका पइसा कबे ओतका दुहूॅं कहत रिहिस। मेंहा तो जाहू मोला हीरोइन बनना हे। तहुं चल फुलगजरा ।”

मानकुंवर किहिस मुचकावत।

“ओ चतुरा मन के बुध मा झन आ बहिनी । न घर के रहिबे, न घाट के । सेठ-साहूकार आदिवासी, छत्तीसगढ़िया के भला करे हे…. ? हुसियार फुलगजरा समझाइस। ओखर आँखी अगियावत रिहिस।

          आज बलराम हा दुकान ले बिसाके लाये मोरपांख ला ओरियावत रिहिस। बबा ढेरा मा परसा डोरी ला आटत हावय। अउ बाबू हा, सोहाई के छोटकुन बंडल बनात हावय। 

“बलराम तेहां का करत हस ? प्रैक्टिकल कापी देना तोर ?”

बलराम देखते रहिगे फुलगजरा ला आज  अपन घर मा।

“बइहा देखते रहिबे कि कुछू बताबे।”

“सोहाई बनाथन फुलगजरा ! (सोहाई पशुधन के नरी मा बांधे जाथे जौन हा मोर पांख, परसा के डोरी ,छोटकुन रिकम-रिकम के कपड़ा ला सुघ्घर सजाके बनाथे । येहा मनमोहनी हार आय।) ये परसा के जड़ ला लान के कुचरथन। छालटी निकाल के एक-एक रेशा ला हेर के ढे़रा मा आटथन। ये सादा डोरी ला हर्रा अउ चिखला माटी मा चिभोर के करिया करथन। सादा करिया डोरी मोरपांख अउ नान-नान कुटका चिकमिकी ओन्हा बाॅंधके बना लेथन सोहाई।”

बलराम बताइस फुलगजरा मुचकावत रिहिस ।

“हाॅं, सुघ्घर बनाये हॅंव रिकम-रिकम के।”


“हॅंव ! येहा दुहर सोहाई आय । झक्क सादा । येला देबी-देवता, गोर्रैया, ठाकुर देव अउ नन्दी महराज मा, डीही-डोंगर अउ दुधारू गाय में बाॅंधथे। पचेड़ी सोहाई आय पचरंगा । गाय भईस मा बाँधथन। ये करेलिया सोहाई पाॅंच लर के। ये गोल्लर अउ बड़का गर वाला गौलछमी मा बँधाथे। मंजुरहा सोहाई मा जोरदरहा मोरपंखी डारके बनाथन दुधारू गाय बर। सुघ्घर मंजूरपंखी के चांदा ला देखत रिहिस फुलगजरा हा। 

गोल सादा सोहाई येला गईठा कहिथे येला बईला भईसा बछरू ला बाँधथे ।”

बलराम के ददा देखाये लागिस ओरी-पारी ।

“अभी ले बनाबो बेटी ! तब देवारी बर पुर सकबो ओ ! गाॅंव भर के गौलछमी बर।”

“येला सोहाई काबर कहिथे बबा ? ”

फुलगजरा किहिस

“सोहाई माने शोभा बढ़ानेवाला । पशुधन के शोभा मुकुट पहिरे राजा कस बाढ़ जाथे। पसीना ओगरा के हमर किसानी कारज मा पंदोली देवइया गौलछमी अउ प्रकृति ला मान देथन। सोहाई के मंजूर पांख भगवान किशन अउ सादा डोरी ला राधारानी घला कहिथे।”

बलराम बतावत रिहिस ।

फुलगजरा देखत रिहिस ओखर सांवर बरन ,फडकत भुजा, चाकर छाती, नरी मा करिया रेशम ला …।

“मोरो घर के शोभा बढ़ाबे का मोर जिनगी मा आके ? सोहाई कस सतरंगी कर देबे का ? मोर रानी ..! मोर सोहाई…।”

बलराम के आँखी गोठियाये लागिस । फुलगजरा घला हुंकारु दिस पलक झपक के। सब बिसरागे रिहिस जात धरम, रीति रिवाज, चाल चलागन , गाॅंव समाज ला । चन्दा-सुरुज, नरवा -डोड़गा , ताल-तरिया, सरई, महुआ रुख तक भेद नइ करिस। तब मया मा का के भेद….?

मोर राजा.. मोर बलराम !

मोर रानी .. मोर सोहाई..!

आँखी गोठियावत रिहिस । मुक्का भाखा, मूक सम्प्रेषण फेर सब गोठिया डारिस दुनो कोई प्रेक्टिकल कापी के बहाना। दुनो कालेज मा हावय।

चिरई-चिरगुन नानकुन रहिथे घर के शोभा बढ़ाथे । अउ उड़ियाये लागथे तब डर समा जाथे । कोनो शिकारी झपट्टा झन मारे अइसे । फुलगजरा के दाई ददा ला संसो होये लागिस। मया तो गोरसी के आगी आय उप्पर ले बुताये कस अउ तरी-तरी धधकत रहिथे। मया तो स्प्रिंग घला आय जतका दबाबे ओतकी उछलथे। ….अउ कोनो उछलथे तब दुरिहा के शिकारी कइसे फाॅंसथे, फॅंसइया ला आरो नइ होवय। 

                येहाॅं जंगलिहा गाॅंव गवई आय जतका सुघ्घर हावय ओतकी भयानक घला। मीठ चार तेंदू के रुखवा मा कोन कोलिहा बईठे हावय..? महुआ मा कोन परेत हावय…? आमा अमली के बौर मा कोन राच्छत लुकाये हे ..? मूसली सतावर सर्पगंधा मा कोन सांप लपेटाये हे..? कोंन गली ले रायफल पिस्तौल लेके निकलही ..? कोन पैडग़री मा टिफिन बम होही .? कोन सड़क उखड़ जाही..? कोन रेलवाही छिही बिही हो जाही….? कोनो नइ जाने।

फुलगजरा अउ बलराम पढ़ई मा हुशियार रिहिस । अउ गोठ बात मा सब मोहा जाही..। फेर आज तो उही मन मोहागे हावय । जल जंगल जमीन आदिवासी के हित गोठियइया मीठ लबरा मन मा। अधरतिया के वर्दी पहिन के मइलाहा सोच के दल मा वहु मिंझर गेहे। लाल सलाम के झंडा बुलंद करत हावय।


मुरलीवाला किसन कन्हैया की ….जय !

राऊत भाई मन जयकारा बोलाइस।

अरा ररा रे…….

घर घर दीया जलाओ संगी, आगे देवारी तिहार रे।

मोर सांहाड़ा देव बर राखे हॅंव, नरियर फुलगजरा हार रे।।

डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……।

दफड़ा बाजा तान मारिस


राउत भाई मन दोहा पारिस अउ बजनिया मन लहस-लहस के बाजा बजाइस। टिमकी मोहरी सिंगबाजा दफड़ा गुदुम झांझ मंजीरा झुमका ।

      सुघ्घर सवांगा राउत मन के । माड़ी ले पीयर धोती, लाल छिटही सलूखा , मोरपंखी के कमर बाजूबंद , मुड़ी मा खुमरी, खुमरी मा खोसाये चंदैनी गोंदा । बंगला पान के लाली ले मुॅॅंहू रंगे। अब्बड़ सुघ्घर बरन हावय गहिरा टोली के। ठोमहा भर तेल पियाईया तेन्दुसार के चिकचिकावत लउठी अउ आनी बानी के रेशम सुत चिकमिकी मा सजाये लउठी ला उप्पर उठा-उठा के नाचत हावय। गाॅंव के गौटिया पारा जावत हावय सोहाई बाॅंधे बर। पहिली गौटिया बेड़ा-बड़का मंझला, नान्हे गौटिया घर के गौलछमी ला सोहाई बाँधही ।

अरे हा… ,

नेवरिया घर घला बाँधही सोहाई ला। नेवरिया-नवा-नवा आये हे ये गाॅंव मा। चार पाॅंच बच्छर होवत हे फेर अतका धाक हावय गाॅंव मा …कि अब ये गाॅंव मा नेरवा गड़े सियान दाऊ के घला कुछु नइ चले । कोन जन का मोहनी मंतर जानथे ते …. लइका सियान जम्मो मोहा जाथे । जवनहा मन तो अपन दाई ददा के पाॅंव भलुक नइ परे अउ ओखर आगू मा डंडा सरन हो जाथे। अइसे हावय नेवरिया हा। अड़गड़ा पल्ली बड़गड़ा … टार अइन्ते तइन्ते हो जाही । बिचित्तर नाव हे। महुं ल लेये ला नइ आवय ओखर नाव ला। ओखरे सेती नेवरिया कहिथो सोझहा।


राउत नाचा अउ गौरी गौरा के बाजा बजनिया के पइसा नेवरिया कोती ले रहिथे। गाॅंव समाज वाला मन ऐखरे सेती तो मिलाय हावय अपन गाॅंव समाज मा। अउ सोहाई …? पइसा वाला के पाॅंव कोन नइ परे..?


देवारी के दिन दाऊ बेड़ा मा । जेठाऊनी के दिन बीच पारा के किसान मन घर अउ पुन्नी के दिन आबादी पारा के नान्हे किसान मजदूर के गौलछमी मा सोहाई बाँधथे। 

"अभी सोहाई बाॅंधे के पाछू काछन निकलही जल्दी करो गहिरा भाई मन ।"

गाॅंव के सियान मन किहिस।

डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……डंग। दफड़ा बाजा ताल दिस।

अरा ररा रे…….

जय महामाई रतनपुर के, अखरा के गुरु बैताल हो...।

चौसठ जोगनी पुरखा के, बइहा मा होबे सहाय हो..।।

बड़े दाऊ घर गिस सोहाई बाॅंधे बर सुमिरन करत राउत टोली हा। गाॅंववाला मन उछाह मा रिहिस अउ गौलछमी.. वहू मन अब्बड़ गमकत हावय।

अरा ररा रे…….!

मन मैला तन उजला , बगुले जैसा भेष हो।

इन सब ले कागा भला, भीतर बाहर एक हो।।


गहिरा मन दोहा पारिस नाचत कूदत । अउ गाॅंव के निकलती मसान घाट जाए के रस्दा, जंगल ले लगे झुंझकुरहा खेत मा बसे नेवरिया घर कोती रेंगे लागिस।

चार आँखी सब ला देखत रिहिस । जॅंगल मा हुआ-हुआ करइया आज गाॅंव आये हे। करिया बरन ला हेर के उज्जर बरन धर के। राउत मन तो जइसे कौआ अउ बगुला बर नही ..ऐखरे बर दोहा पारिस। आज दुनो एक दुसर के हाथ ला धरके मसकत रिहिस। आदिवासी के हित के गोठ करइया मन, जल जॅंगल जमीन बर न्याय के गोठ करइया मीठलबरा मन के कथनी अउ करनी ला जान डारे रिहिस। सड़क पुल पुलिया बिजली स्कूल कालेज बर बाधा बनइया ला जान डारिस।….असल गोठ ला जान डारिस।

           हमर संगठन हा पातर होवत हावय । अपन संगी संगवारी मन ला दल में जोर। पुलिस प्रशासन हमर कुनबा ला नाश करत हावय। घर लहुटे अभियान लोन वर्राटू हा कनिहा ला मुरकेट डारे हावय। लोगन मन घला अब नइ डर्रावय। नाच गान दल ले प्रमोशन होगे तुंहर । परीक्षा के घड़ी आवय । अब गाॅंववाला मन के बीच एसो के देवारी मा अइसे फटाका फोड़ कि रायपुर भोपाल दिल्ली अउ देश के कोना कोना तक आरो जाना चाही। इही तुंहर परीक्षा आवय । इही तुंहर  टास्क आवय।

              अइसना तो केहे रिहिन ओखर आंका हा। ओखरे सेती अइसे बम धरे हावय लुका के, कि काछन देखइया , गोबर्धन खुन्दवइया गाॅंव भर दहल जाही। हाहाकार मच जाही। ये चार आँखी बलराम अउ फुलगजरा के आय।

               सिरिफ बलराम अउ फुलगजरा भर नइ आये हे आज । ओखर संग आये हे सोमारू, आयतु, मड़का, श्रीनिवास, वेंकटेश, कुमारलू देवारी मनाये बर। लाखो करोड़ो इनाम हे ऐखर मन उप्पर प्रशासन डाहर ले। नेवरिया आय न नेवता देये हे, देवारी के कांदा कोचई खाये बर। देवारीच देखे बर नइ आये हे ऐमन। बम के धमाका सुने बर घला आये हावय। राउत मन नाचत हे फेर उछाह सब के चेहरा मा हावय। बुढ़वा-जवान, लइका-पिचका, जीव-जिनावर सब मगन हावय। सब गमकत हावय। फटाका बर बिटोवत लइका। मंद महुआ पीके भकवाय कका, खोड़खोड़ी खेलइया टुरा मन, ठेठरी खुरमी बनावत दीदी मन । हाथा देवइया राउताईन मन ,पान खा के इतरावत नाती बबा…..।


सब मर जाही … ? सिरतोन सब मर जाही…? सब जुच्छा हो जाही …? सब सुन हो जाही… ? सब मरे ले आदिवासी ला अधिकार अउ न्याय मिल जाही..? ये गाॅंव के सिधवा मन के का कसूर …? फूल कस लइका काही नइ जाने…ओखर का होही….?


फुलगजरा अउ बलराम ला ओखर नान्हेंपन सुरता आगे । जम्मो कोई नत्ता गोत्ता लरा जरा लागत हावय कका काकी दाई महतारी दीदी बहिनी …। …गुने लागिस । ….जी काॅंप गे। रुआँ ठाड़े होगे।


बाजा बाजत रिहिस। राउत मन नेवरिया घर तीर अमरगे।


“फोड़ो रे फटाका मोर बैरी बड़का दाऊ के कान फूटना चाहिये। बीच बस्ती ला घला जानबा होना चाही नेवरिया घर के सोहाई बँधागे अइसे।”

नेवरिया आय। अपन अंगना मा राउत मन ला नचवाये लागिस। सौ सौ के गड्डी ल फेकिस अउ कोठार के कुंदरा कोती चल दिस । सोमारू आयतु मड़का श्री….. जम्मो के उहिन्चे डेरा रिहिस। बलराम अउ फुलगजरा घला गिस टिफिन ला धरके । दुनो के हाथ मा रिहिस टिफिन, अउ टिफिन मा रिहिस देवारी के कलेवा काॅंदा कोचई बरा सोहारी सलगा बरा ठेठरी खुरमी ……।

राउत मन बिधुन होके नाचत हे अउ दोहा घला पारत हावय ।


अरा ररा रे…….

सोहाई बनायेव अचरी पचरी, गाॅंठ दियो हर्रेइया रे..।

जउन सोहाई ला छाटही, ओला लपेट लागे गोर्रैइया रे.. ।।


बलराम आय दोहा परइया। वहू तो आय गहिरा टूरा। सुकधनिया (सूपा मा धान दीया अउ सोहाई मड़ाये रहिथे ।)मा माड़े धान मा गोबर के लोई ला लोटाइस अउ कोठी मा सुघ्घर छपाये हाथा के बीच मा थोपिस। सोहाई ला निकाल के करिया गाय ला सोहाई बाँधत पारिस दोहा।

फट फट फट फट …..धड़ाम…। नेवरिया के दुवारी मा फटाका फूटत रिहिस फेर…. सब कोई देखे लागिस कुंदरा कोती ला। जतका फटाका फूटत रिहिस ओखर ले लाख गुना जादा आरो ले कोठार के कुंदरा मा फुटिस …फटाका… बमफटाका। चीख चित्कार करलई के आरो आइस सोमारू आयतु श्री …….सब्बो कोई के ।

ये बड़का फटाका सही जगह मा फूटे हावय आज । 


फुलगजरा मुचकावत रिहिस। ओखर चेहरा मा गरब रिहिस कर्तव्य के परीक्षा मा पास होये के। चाक्कर छाती मा गुमान रिहिस बलराम ला गाॅंव लहुटे के।


दुनो के नजर अटकगे करिया गाय मा। कतका सुघ्घर लागत हावय …चपर-चपर दूध पियत बछरू …। पीठ ला चटर-चटर चाटत गाय …अउ गाय के गर मा बॅंधाये सुघ्घर दिखत सोहाई….। सोहाई मा साजे चाक्कर मोर पंखी…अउ मोर पंखी मा सतरंगी ….चाॅंदा । अउ चाॅंदा मा दुनो के …..गमकत सोहाई कस सपना। अउ सपना मा….!


-चन्द्रहास साहू

(द्वारा श्री राजेश चौरसिया)

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

मो. क्र. 8120578897

दीया"

 "दीया"


मंगलू के दूझन बेटा रिहिस। घर में कोनो चीज के कमी नई रिहिस। बेरा के संग-संग लईका मन बाढ़े लगिस। मंगलू अपन बड़े बेटा बरातू के बिहाव पड़ोसी गांव के बिमला के संग बडिहा धूम-धाम अऊ ठाठ बाठ ले करिस। कोन दाई ददा ला बबा बने के सऊक नई राहय, फेर मंगलू के परिवार मा अइसन कुछ नी होईस। गांव पड़ोस मा आनी बानी किसम किसम के गोठ होय लगिस। रद्दा बाट म तरिया बोरिंग म "आ इ-दू, तीन-तीन बछर बीत में फेर कहीं न कुछू।" कहिथे न फूटहा करम के फूटहा दोना" विमला के ऊपर दुख के पहाड़ टूटगे। बईगा कर जाए त कहाए तुंहर घर म फलाना फलाना के साया हे एला भगाय बर ए बाटल मन्द, दुगोडिया, एकाईस उन लीम्बू, चना-मुर्रा, सुपली चरिहा, धजा, अमका ढमका। डॉक्टर के घलो उही रंगा ढंगा, दुनिया भर के दवई दारू लिख देवे अऊ ठोक बजाके अपन फीस ले लेवे। अइसे तइसे कतको पईसा खुवार होगे। कतरो ईलाज पानी कराइस, बईगा गुनिया देखईस फेर कोनो काट नी करिस। बिमला के रोवई संसो करई म आधा मुहरन घटगे। बरातू ला संगवारी मन ठोसरा मारे, फेर क करही, बिचारा मन ल सवांस के रहे।


मंगलू छोटे बेटा के बिहाव करके नवा बहुरिया लानिस। घर म हंसी खुशी के दिन बिते लगिस। मंगल के छोटे बेटा कोमल दाई-ददा के आज्ञाकारी रहे। मंगलू के मन म फेर बबा बने के पिकी फूटिस अऊ व दिन आगे जब सरोज ह सुध्धर अकन बेटा ल जनम दीस। गांव घर के मन ह अडबड खुशी मनाइस। सरोज हा का जानत रिहिस के इही खुशी ओकर दुखी होयके कारण बनही।


जइसे पानी बिना मछरी तडपथे वइसने लइका वर भैया-भऊजी हा छटपटावत रिहिस। बरातू अऊ बिमला के मन के आस पूरा होय लगिस। लईका कुम्हार के माटी के लोंदा कस आय। जइसे गढ़वे तइ बनहीं। बरातू विमला अपन देवरानी के लइका गोलू ल अपन लईका कस अपन तीर राखे लगिस । ऐती सरोज अपन लइका ला अपन ले दुरिहावत देख बढ़ दुखी होईस एकर बर बाता चीता घलो होगे। फेर सरोज के सास-ससुर एको नई सुनिस। मंगलू कहिथे "का ऐ तोरे लईका ये, हमर लईका नोहे"। कही सुना कले चुप होगे। बिना सावुन सोडा के सरोज के न नहाये के ठिकाना न धोय के। साबुन सोडा नोहर होगे आन जात कस हांडी चुल्हा ला छोडा दिस। सरोज घर के पहाटनीन कस होगे। सरोज के दुख अऊ घर बेवहार ल देख ओकर दाई-ददा आये जाये बर छोड़ दिस।


दू बछर मा सरोज के पांव अऊ भारी होगे। फेर का दूबर बर दू असाद ओकर दूसर लईका आते साठ गंवागे। मंगलू कहिथे-"कोन जनि कते नछतर म जनम घरे हे कलमुही ह जब ले हमर घर अईस...।'"


कोमल दाई ददा के गोठ ल सुन थूक ल लील के रहिगे। महतारी के दुख ल महतारी ह जानही।  लईका अऊ दुरिहागे । भरे देवारी के रात आय। जम्मो अंगना, देहरी, गली खोर दीया के अंजोर जगमगावत हे। फेर सरोज के मन मे कुलूप अंधियार है, सरोज के दीया ओकर ले दुरिहागे। अंधियार सरोज के आंखी डाहर ले टप टप आँसू चुचवावत हे अऊ सिसक-सिसक के रोवत भगवान ल कोसत कहिथे भगवान का बीगाड करे हों, जेकर अतिक बड सजा देवत हस। मे महतारी होके अपन लईका ल दुलार नई सकों। जेन ल नौ महीना अपन कोख म राखेव ओला संग म घुमा फिरा नई सकों। एक महतारी होके मोला बांझ बना देस। का इही तोर विधि के विधान आय। का इही तोर लीला आय।


सरोज अपन कुरिया म सुते सुते रोवत राहय। तभे बरत छुरछुरी ल घरे गोलू खोली म आइस। छुरछुरी ल ऊही जगा फेंक के ओ हा अपन दाई के कोरा म खुसरगे। कथे "दाई, दाई ते काबर रोवत हस चल न खोर डाहर खेलबो। गली म दीया मन कतिक जगमागात हावे। सरोज के ममता हा बइहा पूरा कस ऊमडगे । लईका ला पोटार के जकही मन सही चूमें चाटे लगिस। हिरदे के सबो संताप जुडागे। पाछु ले विमला आथे । सरोज तीर जाके कथे "बहिनी तोर लईका तोरेच रही। तै मोला अतेक चंडालिन समझगेस कि तोर लईका


ला में तोर ले नंगा लेहूं। चल कुरिया ले निकल, मिलजुल के सुरहोती के दीया ला जलाबो।"


सरोज के मन के ओनहा कोनहा में जइसे दीया जगमग जगमग बरे लागिस। जेठानी के पांव म गिर के कहिथे - " दीदी तै मोला छिमा कर दे। मै तोला समझ नई सकेंव। लइका तो खुद दीया समान होथे।


जिहा रहिथे, अंजोर बगराथे। गोलू के असली दाई तो तही आस।"


दोनो बहिनी गोलू के एक-एक हाथ ला घर के हांसत- हांसत कुरिया ले निकलत रिहिस। गोलू हा हाथ ला झटकार के कहिथे "दाई तुमन दीया ला जलात जाओ, मे हा गली अंगना में राखत जाथो।"


मंगलू के घर हा दीया के अंजोर म जगमगाय लागिस ।


फकीर प्रसाद साहू "फक्कड" पूर्व प्रचार - प्रसार सचिव साकेत साहित्य परिषद् सुरगी ग्राम व पोष्ट - सुरगी


जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

लघु -व्यंग -सरकार


लघु -व्यंग -सरकार


गाय मन अड़बड़ बोंबियावत राहय में योकिन

उखर भाखा ल ओरखे (परखे) के परियास (कोशिश) करत कहेंव का होगेरे तुमन ल आज बड़ बोंबियावत हो। आज बड़ उछाह के दिन आए मालिक, सुने में आए है अब हमरो गोबर ल सरकार बिसाही। सरकार मन के बड़ चोचला ताए मालिक। न्या-नवा सरकार के नता-नवा ढर्रा (योजना) । कोनो काहत हे सुवच्छ भारत बनाना हे। कहिके घुरवा गांगर ल पाटत हे, त कोनो गौठान ल पाठ‌शाला कस बनावत हे। पैरा इहे । पानी इहे, मध्यान भोजन कस होगे। ये सरकार घला बड़ विचित परानी आए मालिक ऐला बुझना समझना बड़ दिक्कत के काम भए ।कोन जनी तुमन (पतानहीं) कईसे झेलथव ।फेर आज मन गद‌गद होगे मालिक । काश सरकार पहिली ले ऐसन ढर्रा (योजना) निकालतिस त का गोसईया मन हमनल कटनी म देतिस का जंगल में छोइतिस?


तहू मनखे मन गुन के न जस के हमरे गोबर खातू म कईसे ठसठस  ले धान उपजावत रेहेव अब जादा के चक्कर म दवई-बुटई (रसायनिक खातू)  म मोहागव अऊ धरती माता ल हलाकान कर डारेव। कभू देखे रेहव, तना छेदक , महु, ब्लास्ट ल। हमरे दूध ले तुहर लाईका मन ठस-ठसले फुन्नाय राहय । अब तो जनम देते साठ डेटाल के साबुन, आनी बानी के मालिस तेल सिरप । अऊ का कहिबे मालिक, अब उबरों मन के पता चल ही मालिक जेकर देहरी  म गाय गरबा नइ हे। जेन देवारी म अंगना लिपे बर, पुजा के गौरी-गणेश बनाए बर हमर गोबर ल बिसाही । कहिथे न नवा बईला के नवा सिंग चल रे बईला टिंगे  टिंग ।देखभन अहु "सरकार "ल हमर गोबर कतिक दिन संग दिही।


फकीर  प्रसाद साहू

    सुरगी

26-6-2020

छत्तीसगढ़ के तिहार मा सामाजिक समरसता

 छत्तीसगढ़ के तिहार मा सामाजिक समरसता

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छत्तीसगढ़ के पावन भुँइया मा समरसता के धारा गाँव-गाँव मा सदाकाल ले कलकल-छलछल बोहावत आवत हे इही कारण हे के इहाँ आजो सुख-शांति ,प्रेम अउ भाईचारा के दर्शन होथे।छत्तीसगढ़ महतारी के दामन मा अंते जइसे कभू दंगा-फसाद के दाग देखे ल नइ मिलय।

        समरसता के मतलब होथे--सम रस होना अर्थात सबके सुख-दुख ला एक समझना,मिलजुल के एक-दूसर के सुख-दुख मा शामिल होना,दूसर के खुशी ला अपनो खुशी समझना।रस के मतलब होथे--आनंद। बिना कोनो धार्मिक, जातिगत, गरीब-अमीर ,ऊँच-नीच के भेदभाव के समानता के भाव ले सामूहिक रूप ले आनंद के अनुभव करना हा समरसता आय। 

        रस के एक अउ अर्थ भाव या विचार होथे। वो जम्मों भाव जेमा 'वसुधैव कुटुम्बकम" ,मनखे-मनखे एक समान, सबो जीव हा एके परमात्मा के अंश आय के भावना समाये रइथे ,समरसता कहे जा सकथे। समरसता मा 'सर्वे भवंतु सुखिनः ' के उद्घोष होथे अउ वोकरे अनुसार आचरण बनाके व्यवहार करे जाथे।

           समरसता के उपर कहे गे सबो लक्षण हमर छत्तीसगढ़ के तिहार मा साफ-साफ देखे ला मिलथे। धन्य हे हमर वो पुरखा मन जेन मन अनेकता मा  एकता लाये बर नाना प्रकार के लोक पर्व ,तिहार मनाये के रीति-रिवाज बनाये हें। अलग-अलग रंग के फूल मन ले बहुतेच सुंदर गुलदस्ता कइसे शोभा पाथे तेला छत्तीसगढ़ के तिहार मा देखे जा सकथे। छत्तीसगढ़ के तिहार मन तो समरसता के साक्षात दर्शन ये।

         छत्तीसगढ़ मा अइसे कोनो तिहार नइये जेला सब झन मिलजुल के नइ मनावत होहीं। जग जेंवारा, संत गुरु घासीदास के जयंती, हरेली,पोरा, सवनाही, माता पहुँचनी, गाँव बनाना, कमरछठ, गणेश पूजा, दुर्गा पूजा ,दसेरा,देवारी आदि लोक पर्व,तिहार मन ला सब कोई बिना भेदभाव के मिलजुल के मनाथें। ये तिहार मन ला मनाये बर गाँव मा हाँका परथे, कहूँ-कहूँ तो वो दिन काम बूता तको बंद रहिथे जेकर पालन सब झन करथे।

  महमाई मा जेंवारा बोंवाथे ता नरियर चढ़ाये ला बिना कोनो भेदभाव के सब जाथें।वो गाँव भर के महमाई होथे।कखरो घर जेंवारा बोंयाये रहिथे ता सेवा करे बर आनो मन जाथे।गाजा -बाजा के संग जेंवारा ठंडा, गणेश विसर्जन, दुर्गा विसर्जन करे बर सब जाथें। होली हा तो प्रेम, भाईचारा के बड़का तिहार मानेच जाथे। देवारी के समिलहा आनंद ला भला कोन भुला सकथे? गोवर्धन पूजा के दिन जब राउत मन गोबर के पहाड़ बना के पूजा करथें अउ गाँव भर के बरदी(गाय-गरुवा) ला  वोमा ले नँहकाथें  तहाँ ले वो गोबर के टीका बस्ती के सकलाये लोगन एक दूसर के माथा मा लगाके मिलथें-जुलथें।सबके चेहरा मा खुशी अउ निर्मल प्रेम झलकत रहिथे।राउत मन वो गाँव मा रहइया सबो जाति-धरम के लोगन घर जोहारे ला जाथें। मातर गाँव भर के मन मिल के जगाथें।एक जगा बइठ के पान-परसाद पाथें।बखत परे मा सब झन चंदा तको दे के मड़ई-मेला के आयोजन करथें। मँड़ई के उछाह के का कहना? गौरी-गउरा के पूजा मा कोनो प्रकार के आड़-छेप नइ राहय। कोनो-कोनो गाँव मा ताजिया निकलथे ता सब झन देख के खुश होथें।

      कुल मिलाके देखे जाय ता छत्तीसगढ़ के तिहार मन कृषि संस्कृति ले जुड़े हें अउ समरसता के सबले बड़े उदाहरण आयँ। ये समरसता ला शिक्षा के द्वारा  बहुतेच बढ़ाये जा सकथे काबर के शिक्षा हा वैज्ञानिक सोच पैदा करके पाखंड, रुढ़िवाद ,जातिवाद ला दूर करके एकता ला, समानता ला बढ़ाये के काम करथे। 


चोवा राम वर्मा 'बादल '

सुरता भाई दुइज के

 सुरता भाई दुइज के 

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      सबो सुरता मीठ मीठ नइ होवय जी ...इही देखव न मोला आज ओमप्रकाश शर्मा के सुरता आवत हे ...ओकर गोरिया माथा ले बोहावत लाल लहू , नवा कुरता ल भिंजोवत रहिस फेर वो हर रोवई छोंड़ के बड़े बड़े आँखी ले बटर बटर हमन ल देखत रहिस । 

   ओ दिन घलाय भाई दुइज रहिस ..दिवाली छुट्टी सिराये के दिन ...त स्कूल जाए के तियारी ...। नरोत्तम राठौर सर अब्बड़ अकन अंक गणित , बीजगणित के सवाल बनाये बर देहे रहिन मोर पिरोहिल संगवारी गौरी ...मोटल्ली , अलाल ..नकल मार के मोर कॉपी ल लहुटाये आइस । 

सुशीला , गंगोत्री मिल गिन फेर का चारों झन भीमा पार के ऊंच विष्णु मंदिर के अंगना मं अंकरी दुकरी खेले लागेन । 

    हमन संग पढ़इया ओमप्रकाश , गजेंद्र अउ शंकर आइन  कॉपी मांगिन ...नइ देवन कहें त कॉपी ले के भागे के उदिम करिन ....हरके बरजे ल कोन सुनय ? पथरा के बिल्लस मोर जेंवनी गोड़ मेरन रहिस उही ल उठा के फेंके देहेवँ ...गजेंद्र अउ शंकर तो बांच गिन फेर ओमप्रकाश के माथा मं बिल्लस परिस माथा ले तर तर तर तर लहू बोहाये लगिस । 

 ओमप्रकाश रोवत नइ रहिस ...डर के मारे मैं रोये लागेंव ..। ओमप्रकाश के बाबूजी जनपद अस्पताल जांजगीर के डॉक्टर रहिन ...उहां पंहुचते  साथ मरहम पट्टी कर दिन ...छिन भर मोर कती देखत रहिन ...फेर बलाइन ..मोर जीव सुखा गे ..मारहीं त मार खा लेहौं फेर कका , भैया मन ल बता देहीं त ..नहीं त छोटकी दाई ल बता देहीं त हाई स्कूल के डेहरी लांघे नइ पाहौ ...काल ले स्कूल जवाई बंद ..। 

मोर रोनहुत मुंह ल देख के डॉक्टर साहब मोर मूड़ मं हाथ राखिन ...हांस के कहिन " लइकाई के झगड़ा , लड़ाई होवत रहिथे फेर आज के भाईदुइज तुम दुनों झन ल जियत भर सुरता रहिही ..। " 

   आज ओमप्रकाश कहां हे , नइ जानवं ...। मेट्रिक के बाद ओहर एम . बी .बी .एस करे भोपाल चल देहे रहिस ...रिटायर हो के डॉक्टर साहब जांजगीर छोड़ दिहिन ..। आज के भाई दुइज मीठ नहीं चिटिक करू सुरता ले के आए हे फेर सुरता कइसनो होवय समय पा के मीठ हो जाथे । 

    सरला शर्मा

ऊँट के नाव चिट्ठी

 ऊँट के नाव चिट्ठी 

प्रिय ऊँट , 

लकर लकर बिगन कन्हो परेशानी ले रेंगे बर ... मेंहा अपन क्षेत्र ल मरूस्थल बना देहूँ । तूमन भरपेट चर सकव तेकर बर ... अपन क्षेत्र म बोईर अऊ बम्भरी के रुख रई लगवा देहूँ । रेंगत रेंगत तुमला लगइया पियास ल बुझाय बर अऊ अपन पेट के टाँकी ल भरके राखे बर ... तुँहर बर जगा जगा म आस्वासन के बांध हमेशा कस छलकत रइहि तेकर घला गारंटी देवत हँव ।

फेर मोरो एक ठन अर्जी है । तहूँ मन मान लेतेव ... करवट ल मोरे कोति लेके बइठ जतेव । हमर मन के राहत के मंगल बेला आय येहा । चारों मुड़ा म तुमला टकटकी लगा के अबड़ झन देखत हें .. तुम दूसर कोति झन पलटहू । तुँहर करवट हमर भविष्य अऊ तुँहर अतीत आय । 

मोर परम आदरणीय ऊँट ... मोला विश्वास हे आप मन सोच समझ के करवट बदलहू । जिनगी भर तुँहर उपकार के आभारी रहिबोन । 


काकरो भी निही ... शायद तुँहर भी निही – 

फलाना राम 

प्रत्याशी , सार्वजनिक चारागाह क्षेत्र क्रमांक 420