Friday, 20 November 2020

छत्तीसगढ़ी अउ पत्रकारिता-नीलम जायसवाल

 *छत्तीसगढ़ी अउ पत्रकारिता-नीलम जायसवाल

     सबले पहिली पत्रकारिता का हरे ये जानना जरूरी हे। सीधा-सीधा कहँव त समाचार के संकलन, प्रसारण, विज्ञापन के गुर अउ समाचार के व्यवसाय हर पत्रकारिता आय। पत्रकारिता हर एक कला आय,ये हर व्यवसाय के संगे संग जनसेवा घलो आय। अउ जेन हर पत्रकारिता करे वो हर पत्रकार आय।

   पत्रकारिता हर  एक साहित्यिक काम हरे। अधिकतर देखें जाथे कि पत्रकार मन साहित्यकार घलो होथें, या साहित्यकार मन पत्रकारिता बने ढंग ले करथें। 

   पत्रकारिता केउ किसिम के होथे,  जइसे खोजी पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता, ग्रामीण पत्रकारिता, व्याख्यात्मक पत्रकारिता, राजनीति या संसदीय पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता, रेडियो पत्रकारिता, दूरदर्शन पत्रकारिता, फोटो पत्रकारिता आदि आदि,अनेक किसिम के होथे।

  भारत म पत्रकारिता नारद मुनि के समय ले होवत हे,उन हर एक संवाददाता के रूप म पत्रकारिता करत रहिन। ओखर बाद राजा मन के समे म शिला लेख,सूचना पत्र,अथवा हाका के माध्यम ले खबर दिए जाय यहू मन पत्रकारिता के प्रकार आय। आधुनिक भारत म गुलामी के समय ले देशभक्ति के रूप म क्रान्ति जगाए बर, शुरू होइस, ओ समय पत्रकारिता करना बहुते कठिन की साहस वाले काम रहय।

  वर्तमान म पत्रकारिता ल अधिकार प्राप्त हे। येहर समाज के लोकतांत्रिक व्यवस्था म चौथे स्तंभ के रूप म स्थापित हवय। पत्रकारिता जनजागरण बर उपयोगी होथे। कोनो प्रकार के वैचारिक क्रांति म सहायक होथे। एखर साथे साथ मनोरंजन के क्षेत्र म घलो पत्रकारिता के योगदान हावय।

      पत्रकारिता कई चरण म पूर्ण होथे, जइसे कि समाचार संकलन, लेखन, मुद्रण, प्रसारण आदि। पत्रकारिता मुख्य रूप से समाचार पत्र के रूप म होते किंतु आजकल प्रिंट मीडिया ले ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ज़माना है। पत्रकारिता म विज्ञापन के महत्त्वपूर्ण भूमिका रथे। 

   पत्रकारिता के अनेक सम्बंधित विषय ल जानना भी जरूरी हे, जइसे कि संपादकीय, रिपोर्ताज या रिपोर्ट्स। साथ ही साक्षात्कार ह पत्रकारिता के अहम हिस्सा होथे। साथ ही अनुसंधानात्मक पत्रकारिता के महत्व भी कम नइ हे। आजकल फालोअप पत्रकारिता यानी अनुवर्तन समाचार संकलन के चलन बाढ़ गे हे।

   हर आम आदमी ल सूचना के अधिकार प्राप्त हे, त पत्रकारिता के दायित्व,अउ अधिकार घलो व्यापक हवय। पत्रकारिता के स्वतंत्रता अधिकार बर कानून बने हवय।

  छत्तीसगढ़ी म पत्रकारिता के संभावना ले इनकार नइ करे जा सकय।ये संभावना छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग के संगे संग बढ़ही घलव। ये हर रोजगार बर अच्छा विकल्प हे।


नीलम जायसवाल, भिलाई, छत्तीसगढ़।

पत्रकारिता-नीलम जायसवाल

पत्रकारिता-नीलम जायसवाल

 *फालोअप पत्रकारिता या अनुवर्तन समाचार संकलन* - 


फालोअप या अनुवर्तन के शाब्दिक अर्थ आय - पीछा करना।

   आजकल जब एक समाचार ल पाठक पढ़थे, या दर्शक समाचार देखथे। त कोनो घटना के बाद का होइस ये जाने के साध बाढ़ जथे। अउ आगे के समाचार ल  जानना चाहथे। पत्रकार मन ला बने बनाए विषय मिल जथे। तो उहू मन के समाचार के आदि से अंत ले पीछा करथे,अउ ओखर पल पल के जानकारी जनता ल देवत जाथे। जइसे कोनो चोरी-डकैती या हत्या काण्ड के घटना के बाद पुलिसिया कार्रवाई के जानकारी, अपराधी पकड़ाइन कि नहीं, ओखर जानकारी।ओला हवालात लेगिन कि कोर्ट लेगिन ओखर जानकारी,जमानत होइस कि सजा ओखर जानकारी।अइसना सरलग समाचार देवत जाथें। अइसना करके समाचार के सीरियल जनता बर बाँध के रखें के काम करथे। ये हर उत्तम पत्रकारिता के उदाहरण हरय। कुछ दिन पहिली,घटे आरुषी हत्याकांड एखर एक उचित उदाहरण हरे। जेखर, रिपोर्टिंग या कहें जाय समाचार संकलन सभे मीडिया म सरलग चलिस। चाहे ओ दूरदर्शन होय या समाचार पत्र। अउ अभी के ज्वलंत उदाहरण बर मुंबई के सुशांत सिंह राजपूत के समाचार ल ले सकथन जेमा हर पत्रकार,ओखर बारे म हर पल के समाचार देवत रहय अभी भी ओ केस के पत्रकारिता जारी हवय। 

  ये मन कुछ फालोअप जर्नलिज्म या अनुवर्तन पत्रकारिता के उदाहरण हवँय।

 सादर।🙏

नीलम जायसवाल, भिलाई, दुर्ग, छत्तीसगढ़।

छत्तीसगढ़ी अउ पत्रकारिता-पोखनलाल जायसवाल

 *छत्तीसगढ़ी अउ पत्रकारिता-पोखनलाल जायसवाल

     

      जउन संबंध किसान अउ किसानी म हे तउने संबंध पत्रकार अउ पत्रकारिता म हाबय। किसान परहित बर सोचथे। किसानी बूता ल सेवा के बूता कहे जाथे।वइसने पत्रकारिता एक व्यवसाय तो हरे फेर जन सेवा ले जुरे हावय। ए व्यवसाय बर रेडियो, टीवी के सरकारी अउ निजी चैनल, समाचार पत्र अउ आज के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ह उपयुक्त जगह हाबय। जेन ए व्यवसाय करथे, उही ला पत्रकार कहे जाथे। आज पत्रकारिता के कतको क्षेत्र हाबय जेकर चर्चा ऊपर करे जा चुके हाबय। सबो पत्रकार सबो प्रकार के पत्रकारिता नइ कर पावय। सब के अपन एक शैली अउ क्षेत्र के संगेसंग विषय के प्रति रुचि होथे। अइसे बात नइ हे कि पत्रकार ल पूरा/जम्मो पत्रकारिता नइ आय। जब पत्रकारिता के अध्ययन करथे त सबो विषय अउ क्षेत्र के जानबा पत्रकार मन ला रहिथे। जब पत्रकारिता के क्षेत्र म पाँव रखथे त अपन रुचि के मुताबिक क्षेत्र के चुनाव करथे। आज पत्रकारिता विशुद्ध व्यवसाय के रूप म स्थापित होगे हावय। जेकर ले रोजगार के संभावना देखत आज के युवा ए दिशा म आकर्षित होवत हे। छत्तीसगढ़ म घलो एकर बहुते संभावना हे। आज के पीढ़ी के ए क्षेत्र म आकर्षण के तीन ठन कारण हावै, एक उँखर जोश, जे वर्तमान व्यवस्था ले लड़ना चाहथे, दूसर अपन आप ल रेडियो टीवी चैनल अउ समाचार पत्र म स्थापित करे के सपना अउ तीसर बड़े कारण रोजगार के नवा संभावना।

       पत्र पत्रिका अउ समाचार पत्र के प्रकाशन ले शुरू पत्रकारिता अब नवा आयाम पागे हावै। समाचार पत्र म आसपास के सबो प्रकार घटना-दुर्घटना के जानकारी पढ़े बर मिलै अउ मिलथे। ए जानकारी मन ल समाज अउ क्षेत्र ले बटोर के अपन लेखनी ले रोचक अउ तथ्यात्मक प्रस्तुत करे के काम पत्रकार करत आवत हें। समाज म चेतना के सुर जगाय खातिर ए ला लोकतंत्र के चौथा स्तंभ कहे जाथे।व्यवस्था के खिलाफ समाज ल संगठित करे अउ समाज म नवचेतना लाय के ताकत पत्रकारिता म होथे। एकर ताकत ले सत्ता घलो सोचे धर लेथें। सच्ची पत्रकारिता बर पत्रकार ल सच्चाई बर लड़े अउ अपन जान ल हाथ म लेके चले परथे। आजादी के लड़ाई म भी पत्रकारिता के आने आने स्वरूप के जानकारी मिलथे। एक ठन स्वरूप *रोटी अउ कमल फूल* पहुँचे के अपन मायने रहिस, जे सिरीफ क्रांतिकारी मन ल संदेश पहुँचाय के काम करिस। मोर नजर म यहू एक तरह के पत्रकारिता रहिस।

      पत्रकारिता के मूल उद्देश्य जनमानस तक संदेश पहुँचाना हरे। जे वैचारिक होथे। आज भारत म कतको विचारधारा चलत हें। ए विचारधारा के संगठन हे। सबो संगठन अपन विचारधारा ल लेके पत्रकारिता करत हावय। सब अपन आप ल श्रेष्ठ बताय म तुले हाबय। सब विचारधारा एक प्रकार के राजनीति ले प्रभावित हाबय। आज कोनो भी राजनीति के प्रभाव ल अछूता नइ हे। कहूँ न कहूँ ओकर से पाला पड़े ले कोनो दल के विरोधी बने हे त कोनो अउ दल के समर्थक। अइसन म आज पत्रकारिता ऊपर ऊँगली उठना नवा बात नइ रहिगे।

        आज राजनीतिक दल मन अपन पार्टी के समाचारपत्र प्रकाशित करथे। अपन विचारधारा  ल लेके पत्रकारिता करना अउ अपन राजनीतिक उद्देश्य ल हासिल करना, पत्रकारिता के दिशा भटकाना आय। स्वतंत्र पत्रकारिता जउन आज निजी चैनल मन ले चलत हाबय, वहू सत्ता के डर अउ लोभ भटकत नजर आथे। चैनल मन म आजकाल डिबेट के नाँव म पत्रकारिता के कालम पूर्ति होवत हे अइसे लागथे। पत्रकार अउ प्रवक्ता मन के संवाद ले आखिर म कोनो निष्कर्ष नइ निकलना इही बात के इशारा करथे।

     पत्रकारिता म नवा पीढ़ी व्यवस्था ऊपर प्रहार करत सत्ता ल ठेंगा दिखा अपन निर्भीकता अउ सच्चाई बर पत्रकारिता करही। छत्तीसगढ़ म घलो एक दिन नक्सली समस्या, बेरोजगारी, छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के बराबर दर्जा देवाय, नाना प्रकार के भ्रष्टाचार ले उबरे बर पत्रकारिता होही के आशा हाबय।

*पोखन लाल जायसवाल*

*पलारी बलौदाबाजार*

पत्रकारिता के खेल-शोभामोहन श्रीवास्तव

 पत्रकारिता के खेल-शोभामोहन श्रीवास्तव

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पत्रकारिता उपर अनुभव के बात आय सन् २००२मा माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल ले इलेक्ट्रॉनिक मिडिया पर्सन के कोर्स करे के बाद मैं अपन आपबीती अनुभव ला आप सबके आगू रखत हँव ताकि आप सब झन असली पत्रकारिता कइसे होथे तेला जान सकव ।


पत्रकारिता हर समाज मा एक प्रतिष्ठित पेशा के रूप मा स्थापित हे, जेन समाचार पत्र मा छपथे अउ जेन समाचार चेनल मन देखाथे वो हर सत्य घटना होथे अइसे लोगन के मानना हे फेर बहुत दुख के साथ कहे बर परत हे कि ओमा के ७०% समाचार ला न्यूजरूम मा 

बइठे संपादक मन डिजाइन करथे कि अमुक समाचार ला कइसे  देखा के चैनल ला या अपन गिरोह ला का फायदा देवाना हे ।  

समाचार पत्र अउ समाचार चैनल ऊपर आँखी मूँद के भरोसा कभू झन करौ । ये सब समाचार एजेन्सी अउ चैनल मन नेता मंत्री के विज्ञापन अउ उँकरे चेला चँगुरिया मन के मिलीभगत ले चलाय जाथे । पत्रकारिता मा सीधा सरल सच्चा ईमानदार के कोई कीमत 

नइ हे, पत्रकारिता मा ग्लेमर अउ तामझाम बहुत हे फेर ओ ग्लेमर अउ उपलब्धि के फिलिंग तक पहुँचे के बाद मनखे अपन संग नजर नइ मिला सकै ।  


मैं दू महीना बड़ मुश्किल से एक न्यूज चैनल मा काम करेंव ।  पत्रकार हर कोनो ठउर ले कइसनो रिपोर्ट बना के लाने , साँझ के ओ समाचार के चीफ एडिटर हर ए. सी. आफिस मा बइठे बइठे नरेशन बदल देथे । समाचार बनाय के पइसा लेहीं अउ समाचार नइ बनाय के घलो पइसा लेहीं । 


सिद्धांतवादी अउ सज्जन मनखे पत्रकारिता मा कभू नइ टिक सकै, आज पत्रकारिता लोकतंत्र के चौथा स्तंभ नइ रहिगे हे, एक लुटेरा लुटियन गिरोह बनगे हे जेकर सफाई होना समाज अउ देश के हित बर बहुत जरूरी हे ।


शोभामोहन श्रीवास्तव

१०/११/२०२०

देवारी तिहार, जन मान्यता अउ वैज्ञानिकता-पोखनलाल जायसवाल

 देवारी तिहार, जन मान्यता अउ वैज्ञानिकता-पोखनलाल जायसवाल

      भारत भुइँया ल तीज-तिहार के देश कहे जाथे। अपन सँस्कृति, संस्कार अउ मान्यता ले हमर देश संसार भर अपन अलग चिन्हारी राखथे। ए भुइँया ऋषि-मुनि अउ तपस्वी मन के भुइँया आय। ए धरतीपूत किसान घलो कोनो तपस्वी मन ले कम नइ रेहे हे, न कम हावै। अपन मेहनत ले ए धरती ला सदा दिन सजाय अउ सिरजाय के बूता करे हे अउ करते हे। दिन रात खेत म गड़े रहिथे। कभू सुरताय के नाँव नइ लै। एक बूता पूरा होइस, त दूसर बूता के जोखा माढ़ जथे। अभीच देख लौ, धान-पान ल बटोरत हे अउ ओनहारी उतेरे अउ बोय के जोखा करत हावै। ओनहारी सियारी सकेले के पाछू थोरकेच दिन म खातू-पाला पालथे। इही बीच मेड़ पार म ढेलवानी घलो दे डारथे। ए तरह ले देखन त किसान मनखे मेर फुरसुदहा बइठे बर बेरा बाँचबे नइ करै। उन ला कोनो दिन छुट्टी नइ मिलै।

      तइहा जुग म थके-हारे मनखे मन अपन आप ल आराम दे हे खातिर उपाय करे रहिन। मुहाचाही गोठियाय बतियाय बर अउ सुरताय बर उदीम करिन। इही उदीम अउ उपाय हर तीज तिहार आय। जे मा एक बूता ल करे के पहिली अउ करे के बाद मन म नवा उछाह अउ उमंग ले बूता ल शुरु करे के सोचिन हे, कहे बानी लगथे। उछाह शब्द उत्साह के छत्तीसगढ़ी रूप कहे जा सकथे। इही उत्साह ले उत्सव शब्द के उत्पत्ति विद्वान मन माने हें। कोनो भी उत्सव के आय ले काम बूता ले छुट्टी मिल जथे। छुट्टी याने छूट मतलब दू छिन काम नइ करे के बखत। फेर हमर पुरखा मन अइसन बखत के चुनाव करें हावैं कि कोनो बूता म बाधा होबे झन करै। आप गुनान करके देख लौ, कोनो तिहार आप ल अइसन नइ मिलै, जे काम बूता म बाधा बनै। बहुत अकन तिहार म आप ल वैज्ञानिक आधार भी देखे म मिलही। ए आधार आप खुदे खोजे के कोशिश करौ।

      तिहार मन म अइसने देवारी तिहार घलो हे। जेन म लक्ष्मी दाई के पूजा, गोवर्धन पूजा अउ भाईदूज प्रमुख माने जाथे। धनतेरस घलो शामिल होथे।

     लक्ष्मी जेन ल हिन्दू रीति-रिवाज ले धन के देवी कहे या माने जाथें। धन के नाँव लेते साठ मन म संपत्ति, दौलत, जमीन जायदाद अउ धान-पान के भाव आथे। धरती पूत के मेहनत ले उपजे खेत के लक्ष्मी के घर म स्वागत ही लक्ष्मी पूजा ले जाने जाथे। इही स्वागत म दीया बारे जाथे। ए दीया कुम्हार ले बिसा के उँखर अँधियार जिनगी म अँजोर बाँटे के उदीम होथे। ए दिन के एक मान्यता ए हवै कि इही कातिक अमावस्या के दिन भगवान राम चौदह बछर के वनवास ले लहुटे रहिन। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम आसुरी शक्ति मन के नाश करिन, जन कल्याण करिन। ते पाय के राम जन-जन के पूज्यनीय बनिन। ओकरे स्वागत म अयोध्या नगरी म ओरी-ओर दीया बारे गे रहिस। एकरे सेती एला दीपावली कहे जाथे। छत्तीसगढ़ राम के ममियारो आय, ते पाय के छत्तीसगढ़ म अपन भाँचा के जिनगी म अच्छा दिन लहुटे के खुशी अउ राज मिले के आस म घरोघर अँजोर बाँटथे। सुरहुति दिया बारथे। दूसर मान्यता यहू हवै कि धन के देवी लक्ष्मी ए रात के धरती के विचरण करथे। अपन कृपा प्रसाद ले कतको मन ल तारथे। जेकर ऊपर कृपा बरसथे, ओकर घर समृद्धि आथे। इही पाय के साफ-सफई के जतन घरोघर करे जाथे। साफ-सफई ले रहे ले जिहाँ तन बने रहिथे, उहें बने बने बिचार आय ले दिल अउ दिमाग के पोषण होथे। जेकर ले समृद्धि के दुआर खुलथे। ए दिन ल लेके अउ कतको मान्यता अउ विश्वास जुड़े हावैं।

         दूसरइया दिन देवारी जेला अन्नकूट या गोवर्धन पूजा के नाँव ले जानथन। ए दिन कतको परिवार नवा खाय बर अपन कुलदेवता ले असीस लेथे, उन ल नवा चाउँर के बने रोटी-पीठा (रोंठ)चढ़ा के पूरा परिवार हली-भली ले नवा खाथे। नवा खाना मतलब नवा फसल के अनाज/अन्न ल पका के भरपूर आदर भाव ले सपरिवार उपभोग करना आय। अइसे मान्यता हवै कि आज के दिन ही कृष्ण भगवान गोवर्धन परबत ल उठा के गोकुल वासी मन के रक्षा करे रहिन हे। तिही पाय के एला गोवर्धन पूजा घलो कहे जाथे। ए दिन गाँव-गाँव म साँहड़ा देव चौक म गोबर के गोवर्धन बना के राउत बंधुमन कोति ले पूजा करे जाथे, जेमा गाँव के सबो समाज के मनखे जुरियाथें अउ एक दूसर ल बधाई देथे, शुभकामना देथे। 

      आज के बदलत समय म कतको विचार धारा इहाँ पनप गे हे। जेन मन दीपावली देवारी के अपन ढंग ले व्याख्या करथें। इही नवा विचारधारा ले प्रेरित एक वर्ग हे जउन मन देवारी तिहार ल गरीब मजदूर अउ किसान ल लूटे के षड़यंत्र बताथे। बैपारी वर्ग के षड़यंत्र हरे कहिथें। ए मन वैज्ञानिकता के नाँव ले गरीब अउ अशिक्षित मन के आस्था ल भटकाय के बूता करथे। बने होतिस कि संस्कार, संस्कृति, अउ रीति रिवाज के वैज्ञानिक पक्ष खोजतिन अउ उन ल बाँटे के साजिश नइ करतिन। मैं अतका जानथौं कि जेन लुटाना चाहथे तेने ल कोनो लूटथे। आज कतको धोखाधड़ी होवत हे, सुनत हें, पेपर म पढ़त हें, तभो ले मनखे लालच म पड़ के लुटेरा मन के चंगुल म फँस जथे। आज जमाना अइसे होगे हवै कि फोकट म कोनो ल एक रूपया देवइया नइ मिलै, त इनाम अउ लाटरी के नाँव म कोन दानी ह हम ला दान दिही? सोचे के बात हे। बैपार के मतलब सोज-सोज कहन त लेन-देन आय। ए तो तब ले चले आवत हें, जब ले मानव जीवन के विकास यात्रा शुरु होय हे। बजार-हाट अउ मँड़ई-मेला बैपार ल बढ़ाय के जगह आय। मँड़ई-मेला अउ हाट-बजार के जानकारी पुरातत्व वेत्ता मन देथे। सिरपुर म घलो खनन के बाद ए बात के प्रमाण आजो देखे जा सकत हे। बैपारी दू पइसा कमाबे करही। ए अलग बात आय कि आज मनखे के सइता नइ रहिगे हे। सकेलो-सकेलो होगे हे। इही चक्कर म जादा मुनाफा कमाय धर ले हे। आबादी बाढ़े पाछू बैपार घलो बाढ़े हे। आज बजार म सबो जाति अउ वर्ग के बैपारी हवै। अइसन म तिहार-बार ल बैपारी मन के षड़यंत्र बताना समाज ला तोड़े के प्रयास मानथौं। हमर सियान मन के सियानी गोठ हे, पाँव ओतके पसार जतका लम्बा चद्दर हे। मैं तिहार के आड़ म उदाली मारत जादा खरचा करिहौं त नुकसान तो मोरे होही। करजा बोड़ी करहूँ त छूटे ल मुही ला परही। अब *पर भरोसा तीन परोसा*, के जमाना नइ हे। ए सबो जाने धर ले हे। 

       तीज-तिहार के आय ले परिवार अउ समाज जुरमिल के उछाह मनाथे, मनखे एक दूसर ले सुख-दुख ल बाँटे के मौका पाथे। ए तीज-तिहार के पाछू के मरम मनखे ल नैतिक रूप ले अच्छा चरित्रवान बनाथे। काम-बूता के हरहर-कटकट ले थोकिन आराम करे अउ खुश होय के मौका लाथे। जेन ल ए सब नी भाय ओमन रंग मा भंग डारे खातिर नवा-नवा उदीम खोज तइहा के चलागन ला फालतू बताय के कोशिश करथे। तीज तिहार मन घर-परिवार अउ गाँव मा एका के कारण बनथे।  जे मन नी चाहे कि गाँव अउ समाज म सुमता अउ एका राहै, ओमन कतको मनगढ़ंत गोठ बना भेंगराजी डारथे अउ अपन काम निकालथे।

       मौसम/ऋतु परिवर्तन के बाद चिखला माटी सूखा जथे। घर-अँगना, बारी-बखरी अउ तीर तखार के साफ-सफाई जरूरी हो जथे। ए सब तिहार के नाँव लेके हो पाथे। एक तरह ले देवारी तिहार स्वच्छता ले  तइहा के जुड़े हावै। आज स्वच्छता के महत्तम ला सबो जाने धर ले हें। साफ-सफई रहे ले बेमारी के फैलाव नइ होय। जेकर ले तन ल कोनो कष्ट नी मिलै। धन के बचत घलो होथे। मन चंगा घलो रहिथे। अइसन मा समृद्धि घर म आथे। ए बात के जानबा हमर पुरखा मन ल रहिन हें तभे देवारी तिहार मा साफ-सफई, लिपई-पोतई के नेंग राखे रहिन। इही ए तिहार के वैज्ञानिक आधार आय कहे जा सकत हे। 

        भाई-दूज देवारी तिहार के आखिरी दिन आय। जेन भाई-बहन के प्रेम के उद्गार आय। भाई-बहन एक-दूसर के हित बर सोचथे। ए जग कल्याण के भावना ले भरे परब आय। हो सकत हे हमर पुरखा मन अज्ञानता ले जेन ल भगवान के दरजा देइंन उन ल हम भगवान नइ मानन। भगवान जइसे कोनो जिनीस नइ होय काहन। फेर ओकर पीछू के मंगल भावना जग कल्याणकारी हे। ए ल जरूर सोचे के जरूरत हे। 

       हाँ! समय के संग बदलाव जरूरी हे। बदलाव प्रकृति के नियम ए। जे बदलाव जिनगी मा खुशी भरै। जिनगी मा रंग भरै। वो बदलाव होना चाही। बदलाव के नाँव म आँखीं मूंद के अपन पुरखा मन के रीति-रिवाज ल छोड़े नइ जा सकै। ए बात के खियाल राखे ल परही।


*पोखन लाल जायसवाल*

पलारी बलौदाबाजार

9977252202

मोर देवारी-चोवाराम वर्मा"बादल"

 मोर देवारी-चोवाराम वर्मा"बादल"


रेल्वे स्टेशन के सुविधा अउ बने बड़े स्कूल म परिवार के लोग लइका मन ल पढ़ाये के लालसा म लगभग 35 बछर होगे हे अपन जन्मभूमि ले लगभग 12किमी दूरिहा कस्बानुमा गाँव हथबंद म घर बनाके राहत। इहाँ बसे के अबड़ फायदा होइस काबर के संयुक्त परिवार के जम्मो भतीजा-भतीजिन मन ल उच्चशिक्षा मिलिस।मोरो लइका मन पढ़िन-लिखिन।

 बसे बर हथबंद म भले बस गेंव फेर एको तिहार आज तक इहाँ नइ मनाये अँव। छोटे ले लेके बड़े तिहार तको ल अपन छोटे से जन्मभूमि गाँव जेन सिरतो म सरग ले बढ़के लागथे उहें मनाथँव। बाहिर म कतको मान सम्मान  मिल जथे फेर अपन जन्मभूमि के संगी संगवारी मन ले , सियान मन ले,दीदी दाई ,बहिनी भाई मन ले मिले निश्छल प्रेम मया-दुलार,आशिर्वाद के बाते निराला होथे।जन्मभूमि के चंदन कस धुर्रा के मोल हीरा मोती ले आगर होथे। मन के पठेरा ले कोनो सुरता निकल के जब आँखी म झुले लगथे,कोनो ह गुदगुदाये हँसवाये ल धर लेथे अउ कोनो कोनो ह चिटिक रोवा तको देथे त वो आनंद के वर्णन नइ करे जा सकय। 

   इही सब कारण मन ल सोंच के मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ह कहे रहिस होही---जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी--

    जइसने कोनो तिहार लकठियाथे ओइसने मन ह गाँव घर जाये बर दू चार दिन पहिली ले तुकतुकाये ल धर लेथे। इहू साल सुरहुत्ती के एक दिन पहिली ले तैयारी होगे रहिस। भइया अउ संगवारी मन के फोन आये ल धर ले रहिस। हथबंद के घर म संझा 7 बजे पूजापाठ करके पारा परोस म परसाद बाँट के अउ परोसी सियान कका ल चार दिन बर दियबाती अउ रखवारी के जिम्मेदारी देके पहुँचगेन अपन जन्मभूमि।

   उहाँ के आनंद ल का कहिबे ।पूरा बस्ती म चारों खूँट रिगबिग रिगबिग दिया के जोत।रहि रहि के दनाका फटाका के जयघोष। रात भर चहल पहल। गौरी गौरा के बिहान के होवत ले बिहाव ।तहाँ ले नहा धोके दस बजे ले दू बजे तक विसर्जन। संझा बेरा गोवर्धन पूजा। गोबर के टीका लगा के एक दूसर ले मेल मिलाप।

  बिहान भर मातर तिहार। उमंगे उमंग। चार दिन कइसे पहाइच पतेच नइ चलिस। 

   ए साल के देवारी तिहार म एक फरक देखे ल मिलिस कि कुछ मनखे मन कोरोना के डर म मास्क लगाये रहिन फेर अधिकांश मन पालन नइ करिन। मातर के दिन खीर के परसाद बँटय तेन ए साल कोरोना के सेती नइ बाँटे गिस।राउत नाचा म आधुनिकता के रंग चढ़े दिखिस त ए साल पिछू साल ले जादा पिये खाये लड़भड़ावत मनखे मन ल देख के बहुत दुख तको लागिस।

      

चोवा राम 'बादल' 

हथबंद, छत्तीसगढ़

जेठवनी ले जुड़े लोक मान्यता के वैज्ञानिक पहलू- पोखनलाल जायसवाल

 जेठवनी ले जुड़े लोक मान्यता के वैज्ञानिक पहलू- पोखनलाल जायसवाल

     

       अइसे कोनो मनखे नइ हें, जेन कार्तिक महीना के महत्तम ले  परिचित नइ होहीं। छत्तीसगढ़ म दशराहा माने के बिहान भर ले कार्तिक नहाय अउ रामधुन के संग प्रभात फेरी के रिवाज तइहा ले चले आवत हें। आज के नवा पीढ़ी के रामधुनी पार्टी ले नइ जुड़े से ए नँदावत हे। अब कतको गाँव म प्रभात फेरी नइ होवय। महीना भर कार्तिक स्नान करे के पाछू पुन्नी स्नान के संग आँवला छाँव तरी खीर पका के प्रसाद बाँटे जाथे। लोक मान्यता हवै कि कार्तिक स्नान ले कुँवारी कन्या ल मनवांछित वर के प्राप्ति होथे। ए स्नान के बहाना बेरा उए के पहिली जागे के आदत बनय। जउन पढ़इया लइका मन बर बने रहिथे। मुँधरहा शांत वातावरण म पढ़े ले पाठ के तियारी बने होथे माने जाथे। मन एकाग्र रहिथे तभे कोनो भी बुता म मन रम थे अउ बुता सफल होथे। बिहनिया के नवा किरण नवा ऊर्जा के संचार करथे।मन म नवा उत्साह भरथे। तभे सूरज ल प्रकृति के पोषक माने गे हे। इही धरती बर ऊर्जा के मूल स्त्रोत आय।

       कार्तिक अमावस के दिन दीपावली अउ बिहान भर देवारी माने जाथे। अँजोरी पाख के एकादशी के दिन जेठवनी/देवउठनी परब  माने जाथे। ए तरह ले कहे जाय त कार्तिक महीना तीज परब अउ बड़ महत्तम के महीना होथे।

      जेठवनी के दिन खुसियार के मँड़वा सजा के तुलसी महरानी अउ शालीग्राम के बिहाव रचाय जाथे। इही दिन ले खुसियार खाना शुरुआत करे जाथे। लोक मान्यता के मुताबिक ए दिन ल मंगल कारज बर-बिहाव के नेंग जोग,भवन निर्माण के पूजा-पाठ जइसे जम्मो नवा काज के शुरुआत बर उत्तम माने जाथे। ए दिन ल देवउठनी एकादशी के नाँव ले घलो जाने जाथे। देवउठनी मतलब देवता  धामी मन के जागरण के दिन। एक अउ मान्यता के अनुसार आसाढ़ शुक्ल एकादशी ल देवसुतनी एकादशी कहे जाथे, जेकर अनुसार ए दिन ले चार महीना देवता धामी मन धरती म विचरण नइ करे। विचरण नइ करना मतलब आराम करना अर्थात् सुतना/सो जाना आय। ए तरह ले ए एकादशी देवसुतनी एकादशी कहाथे। तब ले जेठवनी एकादशी तक कोनो भी काम के शुरुआत के मनाही रहिथे। देवता धामी मन के आशीर्वाद नइ मिलय जान के जम्मो नवा काम ल कुछ दिन बर स्थगित कर दे जाथे। ए समय के मौसम ऊपर धियान दे जाय त पता चलथे कि ए चार महीना ह चउमास के महीना होथे। जेमा खेती-बाड़ी के बड़ बुता रहिथें अउ सावन-भादो के बरसा ले घर-दुआर रोहन-बोहन रहिथें। तइहा के बेरा म गली-खोर म माड़ी भर गैरी माते राहय। आवाजाही बड़ मुश्किल हो जाय। कोनो भी कार्यक्रम करे म पहुना मन बर रहे-बसे के बेवस्था गड़बड़ात रहिन। पानी-काँजी म सबो के खान-पान के बरोबर बेवस्था नइ करे जा सकत रहिन, अइसे प्रतीत होथे। आज घलो एकर सहज कल्पना करे जा सकत हे। संगेसंग यहू विचार करे जा सकत हे कि बछर भर के खाय बर अन्न उपजाना अउ ओकर चिंता करना ले, बड़का अउ कोनो काम हो नइ सकय। इही कारण रहिन होही जे चउमास भर कोनो भी काम के शुरुआत करना ल तइहा म अच्छा नइ मानिन होही। आज सबो मौसम ले बाँचे बर नवा-नवा तकनीक आगे हे। सबो प्रकार के बेवस्था हो सकत हे। गली-खोर म चिखला-माटी नइ राहँय। बारहमासी आवाजाही के बेवस्था हे। कोनो प्रकार के दिक्कत के सवाले नइ हे। चउमास के बीते ऊपर ले चारों मुड़ा सुक्खा जउन रहिथे।

      खार के लक्ष्मी घर म पाँव धर डरे रहिथे...पाँव धरे के अगोरा रहिथे। नवा काज करे खातिर सबके हाथ कच्चा रहिथे। अजम हो जथे कि असो अमुक बुता ल करे म कोनो दिक्कत नइ होय। नोनी-बाबू के हाथ पिंवराए जा सकत हे। रहे-बसे बर छाँव के बेवस्था ल सुधारे जा सकत हे।

        जेठवनी के दिन कतको घर गाय ल सोहई बाँधे जाथे। सोहई बँधइया राऊत भाई ल अपन तरफ ले भेंट स्वरूप कपड़ा, धान, पैसा जउन बने दे के सुग्घर परंपरा चले आत हे। जेला पाके राऊत मन असीस देथें...अन्न धन ले भरे रहय भंडार। ए असीस म राउत जिहाँ किसान के भंडार भरे रहे के कामना करथे, उहें अपन पेट के चिंता घलो करथे। ए रीत ह किसान अउ राऊत के आपसी संबंध ल सजोर बनाथे। दूनो के खुशहाली के प्रतीक घलो बनथे। 

       अपन लोक संस्कृति, लोक परम्परा अउ लोक मान्यता मन ल अँधविश्वास, रूढ़िवादिता ए कहिके एक सिरा ले खारिज करे के पहिली सोचन। वोकर पाछू का भेद हवय?  तब अउ अब म जरूरत के जिनीस के उपलब्धता अउ पर्याप्तता म फरक ल समझन। समय के संग बदलाव जरूरी हे। फेर बदलाव के अर्थ ए नोहय कि पूरा के पूरा बदले जाय। विकास के नाव म जइसे कोनो भी वैज्ञानिक खोज म संशोधन कर परिष्कृत करे जाथे, वइसने लोक मान्यता, परम्परा अउ संस्कृति ल समय प्रासंगिक बनाना ही सही बदलाव रही। अइसन बदलाव के स्वागत भी करना चाही।


*पोखन लाल जायसवाल*

पलारी (बलौदाबाजार)