Friday, 6 September 2019

आलेख-गणेश के दुब्बर मुसवा




व्यंग्य लेख-आशा देशमुख

*गणेश के दुब्बर मुसवा*

ये दरी तो गणेश भगवान के मुसवा
बड़ दुबराय कस लागिस,तब एक भक्त पूछ घलो डारिस,कइसे महाराज
आपमन के सवारी हा अब्बड़ दुबरा गये हे ।
खाय पीये बर नइ देवव का?
तब भगवान कहिथे
काय करबे भगत राज
न तो आजकल कोठी हे ,न डोली हे
कहाँ जाय मोर मुसवा हा,
काला फोलय ,
सबो जिनिस ला,देश ला,संस्कार ला तो मनखे मन फ़ोल के खावत हे।
काय बाँचिस हे अब,
कहे बर मोला दस दिन बइठार देथे,
पूजा के नाम से कान फोड़त गाना बजाथें, एकोठन समझ नइ आवय,
मोर दाई ददा मन सँग मा बइठे रहिथें,
अउ मनखे मन या अइसे अइसे गीत मन ला गाथें कि काय बतावँव।
मोर मुड़ी हा लाज के मारे खाल्हे डहर जाथे।
कतको कहिथे मोला
में बुद्धि के दाता हँव,पर इंखर बुद्धि ला नइ बदल सकत हँव।
मोर ददा के गर के नाग हा घलो लुकावत रहिथे,
एक दिन पूछ पारेंव ,कइसे गा भाई तक्षक नाग
ते मनखे मन ला देख के लुकावत रहिथस ,का बात हे भाई,
तब वो बोलिस ,का बतावँव भैया गणेश,
एक युग रहिस ,जब मोर देखत ही मनखे अउ सबो जीव मन जर जावत रहिस,अब तो उंखरे तन मन मा मोर ले ज्यादा जहर भराय हे,तेकर सेती शरम मा लुका जाथंव।

मोला ये धरती के करलई अब्बड़ पीरा देथे जी भगत राज।
कुछ साल बाद ये भुइँया मा मोरो आना बंद हो जाही ,लगत हे।
न तो मुसवा के खाय बर कुछु बाँचत हे ,न रहे बर कुछु हावय।

कहाँ जाय काला खाय कस होगे हे भगतराज।
तेकर सेती मोर मुसवा हा अब्बड़ दुबरा गये हे।


आशा देशमुख
एनटीपीसी तेलगांना

"राज्य शिक्षक सम्मान 2019" - चोवाराम "बादल"



"छन्द के छ" परिवार के गौरव, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, उत्कृष्ट शिक्षक,  "छन्द के छ" के वरिष्ठ साधक श्री चोवाराम वर्मा "बादल " जी ला 05 सितम्बर 2019, शिक्षक दिवस के शुभ अवसर मा छत्तीसगढ के राजभवन मा आयोजित "राज्य शिक्षक सम्मान 2019" ले सम्मानित करे गिस। ए गरिमामयी कार्यक्रम के
मुख्यअतिथि - महामहिम (सुश्री) अनुसुइया उइके जी
(राज्यपाल छत्तीसगढ़)
अध्यक्ष- माननीय भूपेश बघेल जी
(मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन)
विशेष अतिथि - डाॅ. प्रेमसाय सिंह जी
(स्कूल शिक्षा मंत्री, छ.ग.) रहिन। इनमन के हाथ ले "राज्य शिक्षक सम्मान 2019" प्राप्त करना चोवाराम "बादल" जी के संगेसंग हमर छंद के छ परिवार  बर अब्बड़ खुशी अउ गर्व के विषय आय। "छन्द के छ" परिवार डहर ले बादल जी ला गाड़ा-गाड़ा बधाई।

जीवन परिचय - श्री चोवाराम "बादल"
सुयोग्य शिक्षक अउ सुजानिक साहित्यकार - श्री चोवाराम "बादल"

श्री देवसिंग वर्मा अउ श्रीमती सोनकुंवर वर्मा के दुलरुवा बेटा चोवाराम "बादल" के जनम मई 1961 के ग्राम कुकराचुंदा, पो. मोहभट्ठा, तहसील सिमगा, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा म होइस। चोवाराम बादल जी एम.ए. (हिन्दी साहित्य, अर्थशास्त्र, संस्कृत, अंग्रेजी) के शिक्षा प्राप्त करिन अउ बी टी आई करे के बाद अध्यापकीय काम ला अपन जीविका के साधन बनाइन। आप वर्तमान मा शासकीय उच्चतर विद्यालय केसदा, विकासखंड - सिमगा, जिला - बलौदाबाजार-भाटापारा
मा व्याख्याता (प्र प्राचार्य) के पद मा शिक्षा के जोत जलावत हव।

बचपन ले बादल जी के रुचि साहित्य अउ कला के प्रति रहिस। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा मा इनकर समान अधिकार हे। ये दुनों भाषा मा कतको आलेख, कहानी, एकांकी, छन्द, गीत अउ गजल के सिरजन कर डारिन हें। बादल जी के रचना के प्रसारण आकाशवाणी व दूरदर्शन ले होते रहिथे। साहित्य सेवा मा बादल जी के अभी तक तीन किताब प्रकाशित हो चुके हे।
"रउनिया जड़काला के" छत्तीसगढ़ी कविता अउ गीत के संग्रह आय। "छन्द बिरवा" छत्तीसगढ़ी भाषा मा पचास ले अगर छंदबद्ध रचना के संग्रह आय जेमा हर छन्द के विधान तको बताए गेहे। "जुड़वा बेटी" किताब गद्य-संग्रह आय जेमा कहानी अउ निबंध के सुग्घर संकलन हे। साहित्यिक अवदान बर चोवाराम "बादल" जी ला कतको सम्मान मिल चुके हे -
मानस सम्मान (तुलसी मानस संस्थान, राजनाँदगाँव)
मधुर साहित्य सम्मान (डौंडीलोहारा) शिक्षक रत्न पुरस्कार (धमतरी) काव्यश्री सम्मान (छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद, बिलासपुर), वदान्या सम्मान (बिलासपुर)

छत्तीसगढ़ी मा छंदबद्ध काव्य संग्रह "छन्द - बिरवा" प्रकाशित करे बर बादल जी ला साल 2019 मा "छत्तीसगढ़ी छन्द रतन" सम्मान मिलिस हे। चोवाराम "बादल" जी, छत्तीसगढ़ी भाषा के समृद्धि बर "छन्द के छ" आंदोलन म जुड़ के छत्तीसगढ़ के नवा नवा रचनाकार मन ला छत्तीसगढ़ी मा छन्द विधान सिखावत हें।
आपमन बहुमुखी प्रतिभा के धनी चोवाराम "बादल" जी ला एसो 05 सितम्बर शिक्षक दिवस मा "राज्य शिक्षक सम्मान" मिले के खुशी मा अपन बधाई अउ शुभकामना पठो सकथव। बादल जी के पता हे -

चोवाराम "बादल"
ग्राम उड़ेला, पो हथबन्द(रेल्वे स्टेशन) तहसील सिमगा, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़ 493113

बादल जी के मोबाइल नंबर -  9926195747

प्रस्तुतकर्ता - अरुण कुमार निगम

Tuesday, 3 September 2019

आसाढ़ ले आस हे - श्री जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

                       
                                     



                                चौमास
आषाढ़ ले आस हे"

            लकलक लकलक जरत भुइयाँ मानसून के हबरे ले वइसने जुड़ हो जथे,जइसे कोनो भभकत अँगेठा या आगी म गघरा भर पानी उल्दा जथे।रिमझिम रिमझिम पानी जब आषाढ़ धरके आथे,तब सबले जादा खुशी किसान मन ल होथे।अउ काबर नइ होही?इही आषाढ़ म किसान मन अपन महिनत ले आशा रूपी धान के बिजहा ल धरती दाई के कोरा म छितथे।आसाढ़ के आय ले धरती महतारी हरियर सवांगा म सजगे मुचुर मुचुर मुस्कायेल लग जथे।डारा पाना पुरवाही म हाथ हला हला के नाचथे।बादर के गरजई घुमरई अउ कड़कड़ कड़कड़ बिजुरी किसान मन बर एक ताल के काम करथे,जेखर सुर  म किसान मन अपन जाँगर अउ नाँगर ल साज के धरती दाई के कोरा म,करमा ददरिया के तान छेड़त,ओहो तोतो के अउ खन खन बाजत बइला के घुँघरू संग ,मगन होके महिनत करत नाचथे।फेर आने मनखे मन बर आसाढ़ या मानसून सिर्फ गर्मी ले राहत आय।वो मन गर्मी ले हदास खा जथे,फेर किसान उही जरत,भभकत गरमी म,मानसून के रद्दा जोहत किसानी के जम्मो जोरा ल करथे।मेड़ पार अउ मुही ल बाँधना,खँचका-डिपरा ल बरोबर चालना,काँटा खूँटी ल बिनना,काँद दूबी ल खनना ये सबो बुता ल तो उही भभकत गर्मी म साजथे।अउ घर म घलो उही गर्मी म आषाढ़ के आये के पहली पैरा धरथे,परदा भाँड़ी म पलांदी देथे,बखरी बारी ल रंग रंग के साग भाजी बोय बर चतवारथे,नार बियार ल चढ़ाये बर ढेंखरा लानथे,चौमास बर लकड़ी छेना अउ कतको जरूरी चीज ल भितराथे,छानी परवा ल घलो उही गर्मी म छाथे।अइसन घर - बन के जम्मो बूता ल साध के किसान मन आशा के जोती बारे मॉनसून अउ आषाढ़ के अगोरा करथे।अउ जब पानी के पहिली बूँद मूड़ म परथे तब मार खुशी म नाचेल धर लेथे।ताहन का पूछना,भिनसरहा उठ के बइला ल खवा पिया के नाँगर धरके खेत कोती पाँव बढ़ाथे।बइला ल जब किसान भिनसरहा कोटना म पानी पियाथे तब ओखर गला के घण्टी अउ किसान के मुख ले निकले सुघ्घर सिसरी(सीटी) मनभावन लगथे।एखर आनंद उही ले सकथे जेन कभू गाँव म सुने होही या देखे होही।

           आसाढ़ म किसान सँग ओखर पूरा परिवार नाचत झूमत खेती किसानी म लग जथे।बाँवत के बेरा के वर्णन कोनो बढ़िया कैमरा ले फोटू खींचे कस लगथे।चारो मुड़ा खेत; खेत म सइमो-सइमो करत कमइया,टुकनी बोरी म माढ़े धान,हरिया भर नाँगर नाँस म बनत सुघ्घर कूँड़,बइला के गला के खनकत घण्टी,किसान के मुख ले बरसत करमा ददरिया अउ ओहो तोतो के आवाज,निंदईया महतारी मनके हाथ के खनकत चूड़ी,खार म रटत पपीहा,पड़की अउ तीतुर के सुघ्घर बोल मन ल मोह लेथे। नान्हे नान्हे लइका मन हाथ म कुदारी धरे मनमाड़े कूदत नाचत टोकन कोड़थे।ये सब दृश्य मन म अपार खुशी भर देथे।एखर आनंद भी उही मनखे उठा सकथे जेन बाँवत के बेरा म कभू सपड़े होही।लिख के कवि या लेखक घलो वो मनोरम दृश्य अउ आनंद ल नइ बता सकय।ये परम् आनंद के अनुभूति सिर्फ उही मेर मिल सकथे।कतको बूता करे कखरो तन मन म थकासी नइ दिखे।बिहनिया ले सँझा काम बूता म लगे किसान पाछू बरस के जम्मो दुख पीरा ल भुलाके आसाढ़ म नवा आस जगाके,जाँगर टोर महिनत करथे।

               आषाढ़ के पहली बारिस जब भुइयाँ  ल चुमथे तब माटी महतारी सौंधी महक म महकेल लग जथे।वो महक ल लिख के बया करना असंभव हे।उही पहली बारिस के संग भुइयाँ म पड़े जम्मो लमेरा,बन,बिजहा धीरे धीरे अपन आँखी उघारथे।जेमा रंग रंग के काँदी,चरोटा,लटकना,धनधनी, उरदानी,छिंद,परसा,बोइर,आम,जाम,अमली,बम्हरी,
कउहा,करंज,के फर पिकी फोड़के जागे बर धर लेथे। आषाढ़ मास म करिया करिया राय जाम पेड़ उप्पर कारी घटा कस दिखथे।लइका मन ओला टोरे बर टोली बनाके ए रुख ले वो चिल्लावत फेरा लगाथे।हाट बाजार म घलो ये फर अब्बड़ बिकथे।गाँव के गौठान म गरुवा गाय आषाढ़ के संग सकलायेल लगथे,काबर की डोली म धान पान बोवाथे।हरियर हरियर चारो मुड़ा चारा देखके गाय गरुवा के मन म घलो अपार खुशी होथे।गर्मी म लहकत लहकत दिन बिताये अउ सुख्खा काँद पात खाय के बाद आषाढ़ म हरियर चारा अउ पीये बर, पानी सबो जघा गाय गरुवा म मिलेल लगथे।

            धरती दाई आषाढ़ म अपन अन्तस् के पियास बुझावत ससन भर पानी पीथे। रझरझ रझरझ पानी बरसे ले तरिया,बाँधा, कुँवा बउली म पानी भरेल लग जथे।नरवा ,नँदिया,झरना,म धार बढ़ेल लगथे।चारो मुड़ा खोचका डबरा म पानी भर जथे।गली खोर म चिखला घलो मात जथे।कोनो साहब बाबू सूट बूट पहिरे चिखला पानी के डर ले पँवठा म पाँव मड़ावत धीर लगाके चलथे त उही म किसान मनखे बिन चप्पल के चभरंग चभरंग गीत गावत खुशी म बढ़थे। आसाढ़ सावन भादो ये चार मास पानी,बादर गरजई, घुमरई मा बीतथे, ये मास ला चौमासा कहे जाथे। जेखर जोरा अउ ये मास मा खेती बाड़ी कमइयां मन बड़ महिनत करथे।
लइका मन मनमाड़े खुशी म चिल्लावत चिल्लावत आषाढ़ के बरसा के मजा लेवत घड़ी घड़ी भींगथे।अउ रंग रंग के खेल खेलथे,गोल गोल घानी मूंदी घूमथे।बरसा के धार म पात पतउवा ल बोहा के थपड़ी पीटत अबड़ मजा करथे।फाँफा फुरफुन्दी के पाछू पाछू भागथे।अउ सबले खास बात जम्मो लइका मन खेलत खेलत "घानी मूंदी घोर दे,पानी दमोर दे कहिके"चिल्लावत फिरथे।इही मास म स्कूल घलो खुलथे। लइका मन ममादाई के घर गरमी छुट्टी बिताये के बाद कापी बस्ता धरके फेर स्कूल म पढ़े लिखे बर जाथे।

      घुरवा,डबरा तरिया,नरवा,कुँवा,बउली के पानी म मछरी मन मेछरायेल लगथे।तरिया के घठोंदा बाढ़े बर धर लेथे।कहे के मतलब ये की तरिया म पानी भरे ले घाट घठोंदा उपरात जाथे।मेचका अउ झींगुर रट लगायेल लग जथे।बरसा के पानी पाके तलमलावत साँप, बिच्छी ,केकरा अउ कतको कीरा मकोड़ा अपन अपन बीला ले बाहिर निकलथे।पिरपिटी साँप जोथ्था जोथ्था इती उती देखे बर मिल जथे।ये मउसम म ये सब जीव मनके अब्बड़ डर रहिथे।कभू कभू घर कुरिया म घलो घूँस जथे।रंग रंग के कीरा ये मउसम म जघा जघा दिखथे।बउग बत्तर रतिहा अँजोर ल देख अब्बड़ उड़ियाथे।संगे संग रंग रंग के फाँफ़ा फुरफुन्दी घलो उड़थे।झिमिर झिमिर बरसत पानी म कौवा काँव काँव करत पाँख फड़फड़ावत छानी म बइठे रहिथे।त गौरइय्या ह दल के दल अँगना म बरसा म भींगत भींगत चिंव चिंव करत दाना चुगथे।

        आषाढ़ ले सबला आस रहिथे।चाहे छोटे से छोटे जीव रहे या कोनो बड़का हाथी।आषाढ़ के बरखा सबला नवा जीवन देथे।आषाढ़ म किसान मन हम सबके पेट के थेभा धान के खेती करथे, उँखर महिनत ले ही सबके पेट बर दाना मिलथे।जइसे पेट भरे के बाद ही जीव मन आने काम ल सिधोथे वइसने खेती म ही दुनिया के आने सबो बूता टिके हवे।आषाढ़ आय के बाद किसान म अपन देवी देवता ल  मनाये  बर कतको अकन तिहार घलो मानथे।जेमा जुड़वास पहली तिहार होथे,जेन आषाढ़ मास के अँधियारी पाँख म अठमी के मनाये जाथे।ये दिन किसान मन अपन गाँव के शीतला दाई म तेल हरदी जघा के खेती किसानी अउ गाँव के समृद्धि बर बारम्बार पूजा अर्चना अउ वंदना करथे।ओखर बाद बारो महीना तीज तिहार के क्रम चलत रहिथे।हमर भारत भइयाँ म तिहार बार खेती के हिसाब ले चलथे।सावन महीना के हरेली ल पहली बड़का तिहार केहे जाथे।

आषाढ़ के बोहावत पानी  ल बचाये बर घलो हम सबला उदिम करना चाही ताकि भूजल  स्तर  म बढ़ोतरी होय,तरिया नदिया,बाँधिया म पानी भरे रहय। अउ बछर भर पानी के तंगई झन होय।आषाढ़ के बने बरसा बने किसानी के निसानी आय,अउ बने किसानी सुखमय जिनगानी के निसानी आय।

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को (कोरबा)

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य - अरुण कुमार निगम


“रेखा रे रेखा”……
(छत्तीसगढ़िया मन बर छत्तीसगढ़ी आलेख)

रेखा…...ए शब्द ला सुनके हिन्दी सिनेमा के खूबसूरत हिरोइन के सुरता आगे का ? मँय ओ रेखा के बात नइ करत हँव, गणित के रेखा के बात करत हँव। स्कूल के जमाना मन-गणित ले चालू होइस फेर अंक-गणित, बीज-गणित संग जूझत-जूझत रेखा-गणित तक आइस। रेखा-गणित मा गुरुजी पढ़ाए रहिस कि रेखा दू किसम के होथे। सरल-रेखा अउ वक्र-रेखा। सरल-रेखा के परिभाषा रहिस - दू बिंदु के बीच के कम से कम दूरी ला सरल-रेखा कहे जाथे। स्कूल छूट गे। कॉपी-किताब छूट गे। रेखा-गणित के कम्पास के संगेसंग स्केल, प्रकार, चाँदा, गुनिया, सीस अउ रबर तको छूट गे फेर रेखा के संग नइ छूटिस।

जिनगी मा जेती देखव तेती रेखा च् रेखा दीखथे फेर गुरुजी के बताए वो दू बिंदु नइ दिखैं जेकर बीच मा कम से कम दूरी नापे नापे जा सके, तिही पायके ये जमाना मा सरल-रेखा नइ दिखय। भाई-भाई के बीच, बाप-बेटा के बीच, पति-पत्नी के बीच, अड़ोसी-पड़ोसी के बीच, कहूँ मेर नाप के देख लव, कम से कम दूरी वाले सरल-रेखा नइ दिखे। हाँ, दिखावा बर कहू तो दुनों बिंदु जरूर एक दिख जाथे फेर ये आँखी के भरम के सिवा कुछु नइये। रेखा के बात चलिस तो लक्ष्मण-रेखा के घलो सुरता आगे। पंचवटी मा रेखा के भीतरी मा सीता मैया अउ रेखा के बाहिर मा साधु के भेस धरे रावण। ढोंगी साधू ऊपर सीता मैया भरोसा करके लक्ष्मण रेखा ला पार कर डारिस। बाकी के किस्सा ला आप मन जानत हव।

आज घलो अमीर-गरीब के रेखा खिंचाए हे। देश के आजाद होए के बाद अपन संविधान लागू होइस। हर नागरिक ला समान अधिकार मिलिस फेर अमीर-गरीब के परिभाषा कोन गढ़ डारिस ? मनखे-मनखे के बीच मा रेखा कोन खींच दिस ? अतको मा मन नइ माड़िस तब गरीबी-रेखा के नामकरण होगे। लोकतंत्र के एखर ले बड़े मजाक का हो सकथे कि इहाँ के स्वतंत्र नागरिक ला गरीबी-रेखा के कार्ड बनाना जरूरी होगे। जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन - लोकतंत्र के इही तो आय परिभाषा। का इही दिन देखे बर हम जन प्रतिनिधि के चुनाव करथन ? हमन जन प्रतिनिधि मन ला ये सोच के वोट दे रहेन कि एमन जनता के सेवा करहीं।कुर्सी मा बइठे के बाद इंकर तीने काम रहि जाथें - शिक्षा, स्वास्थ्य अउ सुरक्षा । एखर अलावा हमर कहे अनुसार सरकार चलावँय। लेकिन उल्टा होगे। कुर्सी मा बइठ के इन मन राजा होगें अउ इन मन ला कुर्सी मा बइठइया मन धुर्रा माटी।

गरीबी रेखा के कार्ड बनवावव, अमका कार्ड बनवावव, ढमका कार्ड बनवावव तब ये मिलही अउ वो मिलही। अच्छा एक बात अउ… गरीबी-रेखा कहे ले स्टैण्डर्ड नइ लागे तब ओखर अंग्रेजी मा नामकरण कर दिन “बी पी एल कार्ड”। ए कार्ड ला बनाने वाला मन खुदे नइ जानँय कि बी पी एल काला कथें। अजीब रिवाज चलत हे हमर देश मा। अपन जनता के सुध नइये अउ अमेरिका, जापान जइसन आने-आने देश ला नेवता देवत हें कि हमर इहाँ आवव,नवा नवा कारखाना अउ उद्योग लगावव। हमन सस्ताहा मजदूर होगेन। अपने देश मा आने आने मन ला मालिक मानत रहिबो। माने मालिकाना हक बिदेसिया के अउ हमन कुली-कबाड़ी। कभू सुरता कर लव कि गाँधी बबा हर बिदेसी कपड़ा के होली काबर जलाए रहिस?

कोनो चाँउर दे के काहत हे - *चल रे - खा* । कोनों चप्पल बाँटत हे, कोनो साइकिल बाँटत हे त कोनो लैपटॉप अउ मोबाइल बाँटत हे। अब तो नगदी रुपिया घलो खाता मा जमा करे के घोषणा होवत हे। हमरे पइसा ला हमीं ला बाँट के एहसान जतावत हे। झन दे भइया चाँउर, चप्पल, साइकिल, मोबाइल अउ लैपटॉप झन दे। किसान मन के खेत मा पानी भर के व्यवस्था कर दे, बाकी इही किसान मन अपन अपन गाँव मा ये सबो जिनिस ला बिसाए के लाइक हो जाहीं अउ बखत परे मा अपन कमाई ले बाँट तको दिहीं।

आप मन सोचत होहू कि बात तो रेखा के करत रहिस अउ रेखा कोन डहर भटक गे ? मन के पीरा हे भइया। पीरा मा बड़े-बड़े मन भटक जाथें, मोर गिनती कहाँ हे?
भटकाव आए जाथे भाई, जब “भारत” हर “इंडिया” बन जाथे, तब भटकाव आथे,जब “गरीबी रेखा” हर “बी पी एल” बन जाथे, तब भटकाव आथे। जब जन-सेवक हर एम पी, एम एल ए, मिनिस्टर, सी एम, पी एम बन जाथे, तब भटकाव आथे।

हाथ के रेखा, माथ के रेखा, पाँव के रेखा पढ़इया के कमी नइये, फेर लोकतंत्र बर किसान के चेहरा के रेखा ला पढ़ने वाला चाही, मजदूर के हाथ मा सुख के रेखा खींचने वाला चाही, बी पी एल के रेखा ला मिटाने वाला चाही। बिदेसी मन ला नेवता दे के जघा अपने बलबूता मा अइसन कारखाना अउ उद्योग लगाने वाला चाही जउन मा चेहरा के झुर्री मिटाए बर नइ, भारत के जनता के चेहरा ले चिन्ता के रेखा मिटाए वाला फेसक्रीम तैयार हो। जनता ला घलो अब तिर्यक रेखा बने ला पड़ही जउन हर दल के समानांतर रेखा ला अइसन काटय कि एकांतर अउ सम्मुख कोन असन अमीर अउ गरीब, बराबरी मा आ जावै।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
 

Monday, 2 September 2019

गणेश चतुर्थी तिहार - श्री महेन्द्र देवांगन "माटी"


पहिली पूजा गणेश जी के

हिन्दू धर्म में कोनों भी काम के शुरुवात गणेश जी के पूजा पाठ ले करे जाथे । काबर गणेश जी हा सबके मंगलकारी अउ विघ्न विनाशक देवता हरे। एकर पूजा करे बिना कोनों भी काम सफल नइ हो पाय ।

गणेश जी के अन्य नाम  ----
गणेश जी के अउ बहुत अकन नाम हे । जइसे  -- गणपति,  गजानन, लंबोदर, विघ्नहर्ता , गणनायक, विनायक , एकदंत ये प्रकार ले 108 नाम हे ।

गणेश उत्सव  -------
भादो महीना के अंजोरी पाख (शुक्ल पक्ष) चौथ ( चतुर्थी) से ले के चौदस (चतुर्दशी ) तक दस दिन ले पूरा भारत भर में  गणेश उत्सव धूमधाम से मनाय जाथे ।

गणेश स्थापना  --------
गणेश उत्सव मनाय के पहिली गणेश बइठारे बर ओकर आसन बनाय जाथे । बड़े - बड़े पंडाल लगाये जाथे । लाइट माइक के बेवस्था करे जाथे , ओकर बाद पंडित जी के द्वारा पूजा - पाठ करके माटी के गणेश के स्थापना करे जाथे ।
विधि विधान से पूजा करे के बाद आरती गाये जाथे अउ परसाद बाँटे जाथे ।

गणेश जी के वाहन -----
गणेश जी के वाहन मुसवा (चूहा ) हरे । कहीं भी  आना जाना हे त मुसवा में चढ़ के जाथे ।

अराध्य देव ---- गणेश भगवान ह हिन्दू मन के अराध्य देव हरे । कोई भी काम करे के पहिली एकरे पूजा करे जाथे ।
पुराण में एक कथा आथे के एक दिन माता पार्वती ह अपन शरीर के मइल ला निकाल के एक बालक बनाइस , ओकर नाम वोहा गणेश रखीस । जब माता पार्वती ह नहाये (स्नान)  करे बर गीस त गणेश जी ला पहरेदारी करे बर दरवाजा में खड़ा करा दीस , अउ बोलीस के - कोनों ला भी भीतर खुसरन झन देबे ।
माता के आज्ञा पा के गणेश जी ह दरवाजा में खड़ा होगे ।
थोकिन बाद में शंकर जी ह आ गे अउ भीतरी में खुसरे ला धरीस । त गणेश जी ह वोला रोक दीस । गणेश जी अउ शंकर जी दूनों झन में बहुत बहस चलीस । शंकर भगवान ह गुस्सा में  आ गे अउ अपन त्रिशुल से बालक के सिर ला काट दीस ।
जब माता पार्वती ला ए बात ह पता चलीस त वोहा बहुत नराज होगे अउ वोला जिंदा करे के जिद्द कर दीस ।
माता पार्वती के घुस्सा ला देख के सबो देवता मन डर्रागे । देवर्षि नारद के सलाह से माता जगदंबा के स्तुति करके पार्वती ला शांत कराये गीस ।
शिव जी के आदेश से विष्णु जी ह उत्तर दिशा में गिस अउ सबले पहिली मिले जीव हाथी के मुड़ ला काट के लाइस ।
हाथी के मुड़ ला गणेश जी के धड़ मा लगाइस , ताहन गणेश जी जिंदा होगे ।
गणेश जी के जिंदा होय के बाद सब देवी - देवता खुश होगे अउ सबझन आशीर्वाद दे के वोला गणनायक घोषित करीस ।
वोला सबले पहिली पूजा करे के वरदान मिलिस । तब ले गणेश जी के पहिली पूजा करे जाथे ।
गणेश जी के पूजा करे ले सब प्रकार के कष्ट  अउ बाधा दूर हो जाथे। घर में सुख शांति अउ समृद्धि आथे ।

महाभारत महाकाव्य के लेखक  ------------
जब महर्षि वेदब्यास जी ह महाभारत महाकाव्य रचना के तैयारी करत रिहिसे तब वोला एक अइसे लेखक के तलाश रिहिसे जेहा ओकर सोच के गति के साथ ताल मिला के उही गति में लिख सके । बीच में रुकना नइहे । अइसे प्रतिभावान लेखक के तलाश में वेदब्यास जी बहुत जगा घुमीस , फेर कोनों नइ मिलिस । अंत मे वोहा गणेश जी के पास गीस अउ सब बात ला बताइस । गणेश जी हा तैयार होगे ।
गणेश जी हा घलो शर्त रखीस के मेंहा लिखे के शुरु करहूं ते रुकंव नहीं,। बीच में तहूँ अटकबे झन । जब तक पूरा नइ हो जाय । मोर कलम एक बार रुकही ते आघू नइ बढय ।
महर्षि वेदव्यास जी ह घलो वोकर शर्त ला मान लीस ।
महर्षि वेदव्यास जी ह बोलत गीस अउ गणेश जी ह उत्ता धुर्रा लिखत गीस । ये प्रकार ले महाभारत  महाकाव्य के रचना होइस ।
बोलो गणेश भगवान की जय ।

लेखक - श्री महेन्द्र देवांगन "माटी"
पंडरिया  (कवर्धा)
छत्तीसगढ़
8602407353