Saturday, 15 January 2022

जिंहाँ नइ पहुँचे रवि ... तिहाँ पहुँचे कवि

 जिंहाँ नइ पहुँचे रवि ... तिहाँ पहुँचे कवि 


               छत्तीसगढ़ म तइहा तइहा के समे म छत्तीस ठन रजवाड़ो रहय । रजवाड़ो के बीच आपसी तालमेल घला बहुत रहय । इहाँ के राजा मन अपन अपन राज विस्तार से अधिक अपन जनता के भलाई बर जादा ध्यान देवय । एक राजा के सम्बंध दूसर राजा से बहुतेच बढ़िया रहय । एक दूसर ले रोटी बेटी के सम्बंध बनाके अपन दोस्ती अऊ रिश्ता ला अऊ मजबूती दे डरय । परोस के राजा ले कोनो खतरा नइ रहय तेकर सेती नियमित सेना के घला ओतेक आवश्यकता नइ परय । फेर काकर मन म कब पाप हमा जही अऊ कोन काकर ले दुश्मनी ठान के चढ़ई कर दिही तेकर कोनो ठिकाना घला नइ रहय तेकर सेती .. प्रशिक्षित अप्रशिक्षित कुशल अकुशल नियमित अनियमित सेना सबो राजा राखे रहय । 

             चारों डहर बगरे शांति के पाछू घला प्रशिक्षित कुशल नियमित सेना हा राज के सीमा के चौकीदारी म हमेशा तैनात रहय अऊ हरेक आने जाने वाला उपर नजर राखय । कचना धुरवा के वंशज मन विंद्रानवागढ़ के राजा रिहीन । कचना धुरवा के वंश जइसे जइसे बाढ़त गिस ... इँकर राज के विभाजन होवत गिस । भई बँटवारा म सबो के राज हा नान नान होगे । इँकर मन के मन म आपसी इरखा द्वेष पनपगे । तभो ले येमन आपस म नइ लड़िन । 

             छत्तीसगढ़ म मराठा सेना हा अपन कब्जा जमावत विंद्रानवागढ़ के वैभव सुन राजिम तक पहुँच गिस । विंद्रानवागढ़ के विभाजित राजा मन ला मराठा मन के आगमन के कानों कान खभर नइ हो पइस । एक दिन फिंगेश्वर राजा के उपर मराठा सरदार हा हमला बोल दिस । सरगी नरवा के तिर म दुनों के सेना के बीच तगड़ा मुकाबला होइस । तोप गोला बारूद अऊ नावा नावा हथियार से सुसज्जित मराठा सेना हा फिंगेश्वर के सेना ला हरावत उहाँ के राजमहल म कब्जा जमा डरिस । रानी मन सुरक्षित कोमाखान रजवाड़ा तक पहुँचगे फेर राजा निकल नइ पइस । राजा ला महल के काल कोठरी म कैद करके राख लिस । राजा तिर बहुत धन सम्पदा रिहिस .. फेर मराठा मन उहाँ तक पहुँच नइ सकिन । राजा ला काल कोठरी के भीतर बहुत यातना मिले लगिस । मार म ओकर अंग अंग सिहर गिस । मुहुँ टेड़गा होगे । कुछ दिन म ओकर हाड़ा जवाब दे बर लग गिस । 

               मराठा के सरदार हा राजा के धन सम्पति के पता लगाये बर राजा के सहयोगी मंत्री सेनानायक अऊ राजा के दरोगा तको ला यातना देवत रहय फेर कोई भी मनखे हा अपन जबान नइ खोलिस । मराठा सरदार हा इँकर जबान खोलवाये बर दरबार म उपाय पूछिस । उहाँ के राज बइद हा राजभक्त रिहिस । ओहा नइ जानत रिहिस के राजा हा मरगे हे के जियत हे । ओला जइसे पता चलिस के राजा हा कालकोठरी म धँधाये हाबे .. ओला बाहिर निकाले बर ओकर जीव म तहल बितल मातगे । सवाल के जवाब खोजत .. उपाय मिलगे । ओहा मराठा सरदार ला बतइस के राजा अऊ ओकर सहयोगी मंत्री सेनानायक मन के जुबान हा कालकोठरी म खुसरे खुसरे मार खा खाके चभगगे हे सरदार । इँकर देंहे म सूरज के गर्मी जब तक नइ परही तब तक इँकर जुबान ले बक्का नइ फूटय । सरदार ला राजबइद के बात जँचगे । उही दिन राजा , मंत्री अऊ सेनानायक ला अलग अलग कालकोठरी ले बाहिर राजभवन के खुले मैदान म लाने गिस । तीनों झन एक दूसर ला देख .. रो डरिन । तीनों झन ला गोली बनाके चँटावत राजबइद हा इँकर रिहाई के तरीका ला समझाये लगिस । राज बइद हा तीनों झन ला अपन मुहुँ खोले से बिलकुल मना कर दिस । राजबइद हा लुका लुकाके तीनों झन बर हथियार के बेवस्था कर डरिस । तीनों झन ला राजबइद हा बनेच हिस्ट पुस्ट कर डरिस अऊ भागे के उपाय बतइस फेर तीनों झन मराठा सरदार के चाक चौबंद बेवस्था देख उहाँ ले भागे के हिम्मत नइ करिन ।  

               एक दिन मराठा सरदार ला पता चलगे के .. राजबइद के इलाज से कुछ नइ होवत हे .. न सुरूज के तपन से । यहू सुगबुगाहट मिलगे के राजबइद हा तीनों झन ला इहाँ ले भगाये के योजना बनावत हे । चारों झन ला दूसर दिन महल चौक म फाँसी दे के एलान कर दिस । जनता हा .. अपन राजा ला या तो भाग गेहे सोंचय या मरगे । फेर जबले सुरूज के घाम म येमन आना शुरू करिन तबले .. जनता घला जान डरे रहय के राजा , मंत्री अऊ सेनानायक जम्मो झन जियत हे । भितरे भीतर जन सेना तैयार हो चुकिस । दूसर दिन भरे मंझनियाँ चारों झन ला फाँसी के फंदा तिर .. मराठा सरदार हा आखिरी इच्छा पूछिस । तीनों कुछ नइ बोलिन .. तब राजबइद हा किहिस के मेंहा अपन राज के गौरव गान सुनना चाहत हँव सरदार । तब राज के एक झन कवि ला .. राज बइद के आखिरी इच्छा खातिर .. राज के गौरव गान सुनाये बर किहिस । कवि हा छत्तीसगढ़ी म वीर रस के कविता तब तक सुनइस जब तक तीनों के लहू म गर्मी अऊ जोश के संचार नइ होइस । एती जनता घला विद्रोह बर तैयार हो चुके रिहीस । कविता के सिरावत ले राजा अऊ सेनानायक के जोश उमड़गे । ईँकर मन के हाथ हा पिछु डहर केवल डोर म बंधाये रहय । जोर के आवाज के साथ राजा अऊ सेनानायक हा हुंकार भरिस । बघवा संग निहत्था लड़इया राजा अऊ सेनानायक के ताकत म पिछु डहर के डोर टूटगे । राजा के आदेश ले देखते देखत विद्रोह होगे । चारों डहर अफरातफरी मातगे । मराठा सरदार ला ओकर मनखे समेत बंधक बना डरिन । 

                सुरूज के तपन हा राजा अऊ ओकर संगवारी मनखे के देंहें म .. गरमी जरूर भर दे रिहिस फेर लहू म जोश अऊ ताकत नइ भर सकिस .. तेकर सेती ओमन कतको मौका मिले के पाछू घला भाग नइ सके रिहिन । कवि के कुछ पँक्ति हा उँकर देंहें के भीतर तक अइसे खुसरिस के उँकर लहू म जोश अऊ गर्मी के संचार उमड़गे .. ईँकर ताकत जाग गे । राजा ला वापिस अपन राज मिलगे । जिंहाँ तक सुरूज नरायण नइ पहुँच सकिस तिंहाँ तक कवि पहुँचके अपन राजा ला बचा डरिस । तबले विंद्रानवागढ़ रियासत समेत देश के जम्मो भाग म .. कवि अऊ कविता ला बड़ सम्मान मिले लगिस । अइसे प्रभावशाली बात या बुता .. जेहा काकरो जिनगी ला एक नावा दिशा अऊ सोंच देके .. एक मुकाम तक पहुँचा देथे .. तब अइसन बात के कहवइया ला .. अभू घला नीक नीक सुने बर मिल जथे ... जिंहाँ नइ पहुँचे रवि ... तिहाँ पहुँचे कवि ... । 


हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा .

Friday, 14 January 2022

कहानी- नजरिया

 नजरिया 


          बहुत समे के पाछू अपन गाँव गे रेहेंव । जावत ले मुंधियार होगे रिहिस । जाते साठ हाथ गोड़ धो के जइसे अँगना म बइठेंव तइसने म .. हमर परोसी पहटिया कका हा भेंट मुलाखात बर पहुँचगे । गाँव के सबो हालचाल ओकरे ले जब आवँव तब .. घर बइठे मिल जाय । यहू दारी कका ले हमर गाँव के किस्सा सुने ला मिल गिस । कका हा बतावत रहय के गाँव म सब तो बने हे बाबू फेर अभी अभी एक ठन दुख के घटना घटगे । में अकबकाके पूछेंव – का होगे कका ? कका बतइस – लोकतंत्र मरगे किथे गा । में केहेंव – अरे .. कहीं बीमार विमार रिहिस तेमा गा ? कका किथे – नइ जानव बाबू । फेर सरपंच हा कालीचे गाँव के सार्वजनिक सभा म कहत रिहीस के हमर लोकतंत्र जबर मजबूत हे येला कन्हो कतको प्रयास कर लेवय .. नकसान नइ पहुँचा सकय .. । अभी उदुपले मरगे सुनेंव .. त थोकिन सुकुरदुम होगेंव .. अतेक सांगर मोंगर हा कइसे मरगे ते .. बड़ अजगुत लागिस बेटा । में पूछ पारेंव – काकर घर के बात आय गा तेमा ? कति मेर रहत रिहिस ओहा .. । तभे घर म निंगत सुंदरू नऊ ममा हा कहन लागिस – नइ जाने गा पहटिया हा ... । सुंदरू ममा हा .. पहटिया कका कोति मुखातिब होके केहे लगिस - काँही ला जानस न तानस अऊ फलल फलल मार देथस । कति मेर मरे हे तेमा बता भलुक । कका किथे – वा अभीच्चे सुने हँव गा .. तभे तो बतावत हँव । बीते बछर जे लइका हा सरपंच के चुनाव हारे रिहीस तिही छोकरा हा .. गाँव के बीचों बीच ठड़े होके चिचिया चिचियाके बतावत कहत रिहिस के .. सरपंच के गदहा टुरा जेहा गांधी डिवीजन म बारहवीं पास होय हे तेहा गुरूजी बनगे अऊ ओकर बनिहार के लइका जेहा बारहवीं से लेके एमे ले ओमे तक अव्वल नम्बर म पास होय हे तेहा .. उही स्कूल म चपरासी बनगे । अतेक अन्याय होवत हे .. गऊकिन .. लोकतंत्र मरगे .. । 

          सुंदरू ममा हा जोर से हाँसिस अऊ किहीस – सरपंच हा .. फोकट बर अतेक पइसा खरचा करके सरपंच थोरेन बने हे तेमा । बपरा हा विधायक साहेब ला घला अपन पइसा अऊ जनबल के प्रभाव म जिताये रिहिस । त अतका तो ओकरो हक बनथे के ओकर बदला म कुछ वहू ला मिलय । येकरे सेती विधायक साहेब हा अपन नेता ला बोलके .. सरपंच के बेटा ला गुरूजी के नौकरी देवइस हे । लोकतंत्र मर जतिस त गरीब के लइका ला नौकरी मिलतिस का तेमा ... ? नइ मरे हे बेटा लोकतंत्र हा .. जेला खुरसी म जगा नइ मिलिस .. जेला फायदा नइ मिलत हे तिही मन ... लोकतंत्र मरगे लोकतंत्र मरगे कहत ... फोकट चिचियावत हे । 


हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा .

कहानी : घाव*

 *कहानी : घाव*

          

        बुढ़ापा के नींद छुछू-मुसुवा के थोरके खुसुर-मुसुर म उमच जथे। लइका मन के खुसुर-फुसुर तो भाबेच नइ करय। कभू-कभू तो बूढ़त काल के नींद कुकुर नींद सहीं जनाथे। जे एक कान ले अवइया-जवइया के पाँव के आरो भाँप लेथे। कुछु आरो आइस कि चट्टे नींद ले जाग जथे। अइसे तो बुढ़ापा ल कतकोन मन एक ठन बेमारी मानथें। जे न बरोबर पचोये बर जानय अउ न कोनो गोठ ल बने सहीं सुन पावय। रात-दिन जर-बुखार अउ पीरा म कलहरत रहिथे। फेर ए सब हर सोहागा डोकरी बर एकोच कनी फिट नइ बइठय। ओहर बड़ पातर कान वाली डोकरी आय। कान कइसे तीपथे तेला जानबेच नइ करय। जर-बुखार तो जइसे ओकर ले डर्रावत भागथे। .... फेर डोकरी ह खा पी के सुततिच, तहाँ कतको हुँत करा ले जागबे नइ करय, हरहिंछा सुतय। कोनो किसिम के संसोच नइ राहय। न कोनो काम बूता म जाय के संसो। न कखरो तियारी म राँधे गढ़े के संसो। वोहर दिन बुड़तिहा राँध गढ़ के लउहाकन खा डरथे, अउ जूठा-काठा ल बहार बटोर के हाँड़ी मन (सबो बरतन) ल धो-माँज डरथे। कतेक मार ओकर बरतन। एक ठन थारी, एक जोड़ी लोटा-गिलास अउ नानकन बाँगा-कराही। हब-हब माँज के खपल देथे। एती सरी गाँव ह जेवन करे बर बइठे रहिथें, उही अठबज्जी रतिहा सोहागा अपन ओढ़ना दसना दसा डरे रहिथे। गाँव के सोआ परे के बेरा म ओकर एक नींद तको हो जथे। घर के सींग दुआरी के कपाट ल ओधा के भीतरी कोती के दूनो सँकरी ल एक के ऊपर एक अरझा देथे, ओकर ऊप्पर तारा ल घलव ठेंस देथे। अइसे तो ओकर घर आजू-बाजू कोनो कोती ले कुकुर-माकर के खुसरे के कोनो रस्ता ए नइ हे। चोरी-हारी होय के तो बातेच छोड़ दव। एक तो एक झन मनखे, कतेक मार ओखर जिनीस, जेला कोनो चोर चोराही। ओ करमफुटहा चोर होही, जे ओखर घर चोराय बर जाही। वृद्धा पेंशन मिलथे तेकर ले नून, मिरचा अउ तेल बिसा लेथे। राशन कार्ड म मिलइया चाँउर के छोड़ डोकरी तिरन अइसे कुछु जिनिस तो नइ रहिस, जेकर ओहर संसो-फिकर करतिस। चोरी होय के डर तो एकोचकन नइ रहिस ओला। काहय घलव, "मोर घर चोर बर रखे च का हाबय, तेला चोर चोराही।" सिरतोन गोठ घलो आय। कागज पत्तर के नाँव म सिरिफ वृद्धापेंशन कारड, राशन कारड अउ आधार कारड के संग स्मार्ट कारड मन ल कमपापड़ के थइली म तीन चार पुरुत ले लपेट के बड़ जोगासन ले जुन्नटहा संदूक म धरे हवै।  ए संदूक ल पठौनी म धर के लाय रहिस। जनामना इही हर ओकर बर सब ले बड़े पूँजी आय। अइसे कहे जाय त ओकर बर कीमती जिनिसे आय। एकरे ले सरकारी सुविधा मन के फायदा जउन मिलना ए। ए योजना मन के छोड़ ओकर सुध लेवइया कोनो हे च कहाँ। ए योजना ले अतका कन चाउँर अउ पइसा मिल जथे कि ओहर न मोटावत हे अउ न दुबरावत हे। भगवान ल सोरियावत कहिथे, जेन दिन मोर काया थक जही, हाथ गोड़ जुवाप दे ल धरही तेन दिन कलेचुप ले जबे भगवान। चाउँर महीना के महीना बिसाथे अउ वृद्धापेंशन ल झोंके बर जाथे।... जिए के मोह ल कोन ह छोड़ पाय हे। अपन जान के मोह सबो ल रहिथे। इही मोह के डारा धरे धन दोगानी के लालच म कोनो मार धन दय कहिके सबो डर्राथें, इही डर आय जउन ह मनखे ल रतिहा भीतर डाहन सँकरी अरझा के तारा लगाय बर मजबूर करथे। तारा जउन चालीस रूपया के घलव नइ रहय, इही तारा कहूँ बाहिर सँकरी म लटकगे त सबो के मन म तारा लगा देथे। मन म लगइया अइसन तारा के कोनो कूची बजार म मिलबेच नइ करय। अउ जेकर सइता नइ रहय तेकर बर अभू तक अइसन कोनो तारा च नइ बने हे, जे उँकर ले नइ खुल सकही। 

      सोहागा राहय तेन ह मुँधरहा कुकरा बासत चरबज्जी के बेरा जाग जवय। ए अलगे बात आय कि गाँव म घला पहिली सहीं अब कुकरा नइ बासय। आज के नवा पीढ़ी घर म कुकरा-कुकरी पोसई ल नइच भावँय। कहे लगथे कि सगा पहुना के घर-दुआर म जगा-जगा कुकरी मन के चिरकई ह नइ फबहय। ओकर बस्सई कहूँ मेर जाय। कुकरी-छेरी पोसे घर के मुँहाटी म पाँव रखतेच साठ (बेरा/बखत) उँकर बास ले नाक मुँह अपने अपन सिकुड़े लागथे। मन तो नइ होवय वो घर के भीतर जाय के फेर ....।

       इहीच बात आय कि घर के मुरगी दार बरोबर ह अब सिरिफ हाना भर रहिगे हे। कोनो मेर सुने ल नइ मिलय। ए अलगे बात आय कि रोजेच घर म कराही भर कुकरी बोकरा चुरथे। कुकरी नइ त मछरी। अउ मछरी नइ त... नहीं नदान म सादा आलू दिखथेच। फेर कोनो दिन कराही ह ए मन के बिना तीपबे नइ करय। पारा भर म दू-चार घर ह आरुग राहत होही। आजकल के लइकामन बर तो इही मन चना चबेना होगे हवै। अंडा के चीला, करी अउ रोल खवई ह अब फैशन बरोबर होगे हे।

        सोहागा डोकरी बड़ सफईतिन... ओला घर दुआर म कचरा एकोच नइ भावय। कखरो घर जातिस अउ घर-अँगना म कचरा बगरे दिखतिस त तुरते बहिरी खोज के बाहरे बर भिंड़ जथे। बेरा उए के पहिली रोजेच अपन अँगना-परछी ल चुक-चुक ले गोबर म लीप डारथे। घर-मुँहाटी के गली ल खरहरा म मार खरहार के गोबर छिटा घलव दे डारथे। बाँचे-खुचे गोबर ल छेना थोप देथे। ओकर जिनगी के उल्टा गिनती शुरु होगे हावय। पाँच आगर तीन कोरी बछर ले ऊपर के होही। फेर ओकर बूढ़त तन के आगू अब के नोनी मन ओकर संग कोनो च बूता म नइ सकहीं। वो ह काम बूता ले जी नइ चोरावय, अउ न जिनगी भर कभू चोराइस। एक ठन बात इहू हावय कि मरे-जिए बर एके झन बाँच गे हवय। अइसन म तीन कुरिया के पुरखौती घर म रहिके भला काकर भरोसा करही अउ काकर हिजगा करही। गँवई गाँव म किराया म रहवइया घलो तो नइ मिलय। कोनो ल मुँहाचाही बर रख लेतिस त। अपन डोकरा संग जाँगर टोर कमा के एकलउता बेटा ल पढ़ाइन लिखाइन अउ पुरखौती जिनीस ल बेच पढ़ाय बर कोनो कमी नइ करिन। जब काहय जतका काहय ततका पइसा बेटा ल देवत गिन। दूनो परानी अप्पढ़ रहिन, फेर उँकर एके सपना रहिस कि बेटा पढ़ लिख के साहेब बनय। बेटा पढ़िस लिखिस अउ शहर चल दिस। का करथे तउनो खबर नइ हे? उहें बस गे, अउ उहें के पुरती रहिगे। लहुट के नइ निहारिस दाई ददा ल। कइसन मन ले संगति हे, तेकरो पता नइ हे। शहर जा के परबुधिया जउन होगे। बेटा के मुँह फेरे ले डोकरा संसो के गहिर दाहरा म बूड़गे अउ एक दिन डोकरी ल दुनिया म अकेल्ला छोड़ के सरग सिधार गिस। बेटा ह बहू अउ नाती संग दसकरम निपटा के तुरते अपन शहर लहुट गिस। डोकरी ल अकेल्ला छोड़ दिस। डोकरी ल एक भाखा पूछिस घलव नहीं कि संग म जाबे दाई कहिके। नेरवा गड़े ए भुइयाँ म ओकर कुछु नइ हे, कहे बरोबर। पढ़ लिख के माटी अउ महतारी के करजा ल भुला गे। जउन करजा ले मनखे कभू नइ उतरय (उऋण नइ हो सकय)। ददा ह बहू के हाथ के राँधे खाय के अधूरा साध के संग सरग सिधार गे। बेटा के बिहाव ल नइ जानिस। जात सगा बाहिर बिहाव करे रिहिस, त कोन मुँह ले बतातिस। जे ल आज के पीढ़ी प्रेम विवाह कहिथे। सोहागा अपन घर म निराशा के अँधियारी म आस के दीया बारे अपन जिनगी जिए लगिस। 

          उमर भर कभू काकरो चारी-चुगरी नइ जानिस। पारा-परोसिन मन घलव ओकर ले बनेच खुश राहय। सोहागा घलव मन के सफ्फा रहिस। कोनोच कभू ओकर कोनो बात के रिस नइ करिन। सोहागा घलव काकरो कोनो गोठ-बात ल गँठिया के नइ धरिस। परोसिन मन गोठियावँय घलव, "डोकरी के एक कप चहा पिए ले, हमर बर चाय कमतिया नइ जय।'' परोसिन मन अपन लइका मन ले बुलवा के सोहागा ल चहा दे देवत रहिन। सोहागा अपन घर म कभू चहा नइ बनाइस। 

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           पंदरा दिन होगे, सोहागा बड़ मगन हे। मगन काबर नइ रइही। नाती-नतरा मन संग खेले अउ खेलाय के साध कोन ल नइ राहय। आज सोहागा के ए साध ह पूरा होवत हे। ओकर सुन्ना अँगना म लइका मन के चिहुर सुनावत हे। चार पाँच बछर बीते पाछू बेटा बहू मन घर आय हवँय। नाती संग बेटा-बहू ल घर आय पँदरही होगे हवय। तिर तखार के लइका मन ओकर नाती संग ओकरे अँगना म खेले बर आवत रहिन। सोहागा के मया ह नाती बर नदिया के पूरा कस छलकत राहय। सोहागा ह पाछू बेरा के जम्मो दुख पीरा ल बिसरा डरिस। समे के संग जिनगी के सबो घाव भरे लगथे। इही समे ल बेटा बहू लेके आँय हवँय। बेटा बहू के आय ले ओकर जुन्ना घाव म मरहम लगगे। ओकर अकेल्लापन ह मिटगे। दिन भर बने-बने बीत जाय। फेर रतिहा एक्के ठन पीरा ह ओला तरी-तरी घुना कस खाय लगिस। मनेमन सोहागा सोचे लागय, - 'कोन जनी कतेक दिन बर आय हे ते। कहूँ फेर लहुट के...चल दिही...। मँय ..फेर अकेल्ला....। महूँ ल संगे म ...।' ओकर मन म आनी-बानी के बड़ोरा उठत रहिस। मन थीर बाँह नइ धरत रहिस। 

           अभी अठुरिया बीते पाय रहिस हे, जब पारा परोस के लइकामन ओकर नाती संग मन भर खेले लगे रिहिन। अचकहा कोन जनी अइसन का होइस, ते दू दिन ले ओकर घर कोनो नइच आइन। सोहागा गुने धर लिस, कोनो झगरा न लड़ई फेर का होगे? लइकामन काबर नइ आवत हें? लइकामन ल हुत करावत बाहिर निकलिस त परोसिन के बहू ह मुँह अइँठत अपन घर के भीतरी डहन खुसर गिस। जउन ह काकी कहत साग निमेरे बर देत राहय। चहा देवइया बिटावन ह ओला देखतेच साठ अपन डेरउठी के कपाट ल भड़भड़ ले बंद कर दिस। सबो करु करु करे लगिन। कोनो ले कुछु पूछ पातिस तेकर पहिलीच ओकर आगू पुलिस के गाड़ी खड़ा होइस। अउ  चार झिन पुलिस उतरिन। पुलिस वाला मन ओला फोटू दिखावत पूछिस- ए ला चिह्नथव का? सोहागा अपन बेटा ल चिह्नी कइसे नहीं। तब ले पुलिस वाले ले पूछे लगिस, का बात आय? काबर पूछत हव? कोन आय ए हर? पुलिस वाला मन कहिन एहर नक्सली मन के गिरोह के सरगना आय। हमन ल एकर तलाश हे? हम ल खबर मिले हे कि ओहर इही गाँव म लुकाय हे। अइसन काहत एक झिन पुलिस वाला ह अखबार म छपे फोटू दिखाइस। सोहागा नक्सली नाँव सुनतेच साठ... नक्सली...मोर ...बेटा...नक्सली काहत बिचेत होके गिर गिस।

पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह (पलारी)

9977252202

कहानी-पसहर चाँउर

 *पसहर चाउर*

                                                                    

                                     चन्द्रहास साहू

                               मो - 8120578897


"दोना ले लो ओ ...!''

"पतरी मुखारी ले ले ओ..!''

"लाई ले ले ओ.... !''

दुनो मोटियारी ओरी-पारी आरो करत हावय। आज झटकुन उठ गे हावय दुनो कोई। मुड़ी मा गुड़री , गुड़री मा पर्रा , पर्रा मा टुकनी , टुकनी मा लाई दोना पतरी दतोन मुखारी । छोटे दाऊ पारा ला चिचिया डारिस। थोकिन बेच घला डारिस। अब तेली पारा जावत हावय। जम्मो बच्छर बेचथे जम्मो नेग - जोग के जिनिस ला अपन गांव अऊ आने दु चार गांव मे। दोना पतरी वाली नवइन रेवती अऊ केंवटिन हा लाई ला बेचत हावय । फेर आज तो रेवती के अन्तस मा जइसे कोनो पथरा लदकाय हावय।

"का होगे दीदी ! आज तबियत बने हावय न ?''

"हव बहिनी ! बने हावव।'' 

रेवती हुकारु दिस फेर मन मा अब्बड़ बादर गरजत रिहिस। गौरा चौरा करा अब थिरागे दुनो कोई। पारा के आने माईलोगिन मन सकेलागे रिहिस। पर्रा के दोना पतरी ला निमारे लागिस।

" मेहा देवत हव बहिनी तुमन झन छांटो। आ बहिनी रमेसरी नेग जोग के जिनिस ला बिसा ले।'' 

रेवती अऊ केंवटिन दुनो कोई किहिस।

रमेसरी दुवार लिपत रिहिस। खबल - खबल  हाथ धो डारिस। भीरे कछोरा मा आइस महुआ झरे कस हांसत। 

"का होगे या ..?'' 

अब्बड़  खुलखुल हांसत हस बाई । केवटिन के आरो ला सुनके किहिस।

"अई तुमन मोर घर मा आये हव तब हासहु नही, तब रोहू या...। अब्बड़ धुर्रा होगे रिहिस बहिनी तेखर सेती दुवार लिपत हव। फेर ..।''

"फेर..का ?'' समारिन किहिस।

"फेर  अऊ का पानी गिरत हावय नइ देखत हस ?''

 अब छे सात झन उपासिन मन सकेलागे रिहिस। जम्मो कोई हांसे लागिस रमेसरी के गोठ ला सुनके। पारा भर गमकत हावय अब।

" सिरतोन काहत हस दीदी ! ये अखफुट्टा इंदर देव हा अइन्ते - तइन्ते बुता करथे । चौमासा मा घाम टड़ेरथे अऊ गरमी मा पूरा बोहाथे। तेखर सेती राच्छस मन नंगतेहे कूटथे ओला ओ..।''

बिसाहिन किहिस अऊ फेर खुलखुल हांसीस।

"ओ रोगहा इंदर भगवान के गोठ तो झन कर दीदी पर के गोसाइन बर नियत डोला दिस कुकरा बन के पर घर खुसरगे।  भगवान मन अइसने नियत खोटा करही तब मइनखे मन के का होही ..?'' 

 धरमिन आय। ओखरो गोठ अब मिंझरगे रिहिस। गघरा भर पानी मुड़ी मा बोहो के आवत रिहिस। छलकत पानी अऊ पानी मा मिंझरे मांग के लाली कुहकू जतका खाल्हे उतरत हावे ओतकी रंग कमतियावत हावय अऊ मन मा उछाह के रंग चढे लागिस। माथ ले नाक , नाक ले नरी अऊ नरी ले उतरके छाती मा हमागे पानी हा। 

"पसहर चाउर बिसाहू बहिनी।''

"वहु तो अब सोना होगे हावय ओ ।'' 

"धरमिन अऊ रमेसरी गोठियावत रिहिस।

कामे तौलही रेवती दीदी हा। तोला मे.., किलो में.., कि पैली मे.. ?''

जम्मो कोई फेर हासे लागिस।

" पबित्तर जिनिस हा महंगा तो रहिबे करही दीदी !'' केवटिन किहिस।

" लइका लोग सब बने- बने हावय न बेटी रेवती  !''

 महतारी कस मंडलीन डोकरी के गोठ सुनके रेवती अब दंदरे लागिस। आंसू के बांध अब रोहो - पोहो होगे। पीरा छलकगे। घो..घो..हि.. हि... हिचकी मार के ..अऊ अब गोहार पार के रो डारिस। रेवती के बेटी रितु हा काली मंझनिया ले बिन बताये कही चल देहे। कुछु बताये के उदिम करिस रेवती हा फेर मुहु ले बक्का नइ फूटे। 

"ओ काला बताही ओ !  रेवती के टुरी हा अनजतिया टुरा संग उड़हरिया भगा गे हे तेला।''

कोतवाल आवय। ओखर बीख गोठ ला सुनके झिमझिमासी लागिस रेवती ला। 

"कलेचुप रहा कका ! सरकारी दस एकड़ खेत ला पोटारे हस तेखर सेती आनी-बानी के उछरत हावस। माईलोगन के मरजाद ला नइ जानस। गरीबीन ला ठोसरा मारे के टकराहा हस ।''

" कुकुर के पूछी कहा ले सोझियाही।'' 

रमेसरी अऊ धरमिन आवय झंझेटत रिहिस।

                        रेवती भलुक गरीबीन रिहिस फेर अब्बड़ दुलार अऊ मया पाये रिहिस माइके मा। कोनो महल अटारी के नही भलुक कुंदरा के राजकुमारी रिहिस रेवती हा। राजकुमार मिलिस तब तो सिरतोन के राजकुमार बनगे रेवती बर। फेर गरीबीन के भाग मा उछाह नइ लिखाये राहय । मंद महुआ पियाईया राजकुमार हा टुरी के छट्ठी के पार्टी  बच्छर भर ले मनावत रिहिस। पार्टी नइ सिराइस फेर राजकुमार सिरागे। 

                   आंसू के एक- एक बूंद ला सकेलतीस ते समुन्दर ले आगर हो जाही..। कतका दुख के पहार ला छाती मा लदके हावय कि हिमालय कमती हो जाही। कतका ठोसरा अऊ अपमान सहे हे ...कोनो नइ जाने। बेटी के कल्थी मारत ले बइठत तक। बइठत ले मड़ियावत तक । मड़ियावत ले रेंगत तक। अऊ रेंगत ले उड़ाहावत तक...। अऊ उड़हाये लागिस तब तो झन पुछ ..! काखर आंखी मा नइ गड़े लइका हा..। पांख ले थोड़े उड़ाथे बेटी मन ..? अपन मिहनत मा सब ला जानबा करा देथे। गोड़ तिरइया मन उही मेर भसरंग ले मुड़भसरा गिर जाथे।

                 बेटी बारवी किलास मा पूरा राज मा पहेला आये हावय। पेपर छपिस जयकारा होइस। "बेटी! तिही मोर जैजात आवस। न गांव मा दु कुरिया के घर बिसा सकत हव, न खार मा खेत । ..अऊ घर अऊ खेत रहे ले मइनखे पोठ हो जाथे का  ? जैजात आवस बेटी तोला देख के मालगुजार कस महु हा छाती फुलोथो। अऊ अइसना फुलत रहु सबरदिन।

          फेर आज फुग्गा फुटगे। गुमान टुटगे। हवा निकल गे । 

"भागना रिहिस ते हमर जात सगा के का दुकाल रिहिस ओ ?  कटवा टुरा संग...छी छी...।'' कोतवाल फेर बीख बान छोड़त रेंग दिस।

                रेवती के मन गवाही नइ दिस फेर गांव के पटवारी कका बताइस तब कइसे नइ पतियाही ? उही तो आय पुरखा घर के एक खोली ला अतिक्रमण हाबे कहिके टोरवाये रिहिस। 

 "मेहां देखे हव रेवती बेटी !  बड़का अरोना बेग ला पीठ मा लाद के ओ टुरा संग भुर्र होगे तेला।'' पटवारी फेर किहिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।

"इंजीनियरिंग कालेज के तीर मा मोटियारी टुरी के लाश मिलिस दु चार दिन पाछु। बदन के जीन्स टी शर्ट जम्मो चिरागे रिहिस। पुलिस केस मा पता चलिस - कबाड़ी वाला के बेटा आवय सलमान । टुरी ला अपन मया मा फसाये के उदीम करिस अऊ नइ फसिस तब चारो कोई ओरी पारी..।''

पटइल कका आवय। रेवती के जी कलप गे। मुहु चपियागे टोटा सुखागे फेर पानी के एक बून्द नइ पियिस।

"आजकल नवा चरित्तर उवे हे भइया ! लव जिहाद कहिथे। आने जात के मन  मया मा फसा लेथे। टुरी ला मुनगा चुचरे सही चुचर लेथे। खेत जोतके बीजा डार देथे अऊ छोड़ देथे ..खुरचे बर। ये जम्मो डंफायेन हा बड़का शहर मा चले । अब हमर गांव देहात मा घला आ गेहे। धन हे श्री राम जी..! तिही बता भगवा रंग ला कइसे अइसन खतरा ले उबारबो तेला।

?''

पुजारी आय मंदिर ला माथ नवावत किहिस।

रेवती काला जानही घरखुसरी हा, लव जिहाद - फव जिहाद ला। अपन बुता ले बुता राखथे। उही पुजारी आवय जौन हा डांग-डोरी, देवी-देवता, देव- आंगा देव ला नचा लेथे। 

रेवती बम्फाड़ के रो डारिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।

                         अभिन बारवी पढ़ के निकले हावय कइसे मया के मेकरा जाला मा अरहज जाही ? अरहज सकथे न!,नेवरिया घर बारवी पास नइ होवन पाइस अऊ बिहाव कर दिस।..अऊ ओ खोरवा मंडल के  दसवीं पढ़इया नतनीन.. अब्बड़ आनी-बानी के गोठ सुनथो। ओमन अइसन करत हावय तब मोर बेटी...? अब्बड़ गुनत-गुनत अंगरी मा गिन डारिस। लइका हा छे बच्छर मा बड़े स्कूल मा भरती होइस। बारा बच्छर ले पढ़ीस । बारा छे अट्ठारा..।

"अई''

 रेवती के मुहु उघर गे। लइका संग्यान होगे। इही उम्मर मा ओखर खुद के बिहाव होये रिहिस।

रेवती के आंसू भलुक सुक्खागे रिहिस फेर आंखी उसवागे रिहिस।

"कोन कटवा टुरा आवय रे ..? हमर गांव के बहु बेटी ला बिगाड़त हे। अभिन थाना मा फोन करथव । बजरंग दल वाला मन ला घला सोरियावत हव । ओ कटवा टुरा के बुकनी झर्रा दिही ओमन।''  

सरपंच आवय रखमखा के आइस तमकत हे।

" महु देखे हव ओ रितु नोनी ला । कोन आय तेला नइ चिन्हे हव फेर सादा कुरता पैजामा अऊ मुड़ी मा  हरियर टोपी पहिरके तहसील ऑफिस कोती जावत रिहिस।''

गांव के डॉक्टर आय।

" मोला तो कोर्ट मैरिज करे बर जावत रिहिस अइसे लागथे।'' सरपंच फेर किहिस।

धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय अभिन घला।


             रेवती घर अमरगे रिहिस। अऊ घर ले दोना पतरी ला उपासिन मन ला बेचत हाबे। फेर मोटियारी बेटी के संसो मा काला धीरज धरही ?  कभु डॉक्टर करा जातिस कभु वकील करा कभु बइगिन करा तब पहटनीन करा । कतको बेरा फोन घला लगाइस फेर स्विच ऑफ आइस। 

      जेखर संग मया कर तेखर संग बिहाव घला करना चाही । नही ते..? मया ही झन कर। रूखमणी हा भाग नइ सकिस तभे भगवान किसन ला भगाये बर किहिस । अऊ रूखमणी ला हरन करके लेगगे किसन जी हा। रितु हा महाभारत देखत- देखत केहे रिहिस अऊ रेवती बरजे रिहिस । नानचुन टुरी अऊ आनी - बानी के गोठ करथस। जइसे पढाई मा हुशियार हावय वइसने खेलकूद लड़ई झगड़ा सब मा अगवाये हाबे...अऊ मया मा भागे बर...?

धिरलगहा पतियावत- पतियावत अब सिरतोन पतियाये  लागिस रेवती हा.. ।

                        बेरा चढ़गे अब। महुआ पत्ता के दोना पतरी ला कतको झन ला बेचिस अऊ कतको झन ला फोकट मा घला दिस। कतको झन ला छे किसम के अन्न राहर जौ तिवरा चना बटरा अऊ लाई दिस। छे किसम के खेलाउना बनाइस बाटी भौरा गिल्ली डंडा धनुष बाण गेड़ी। पसहर चाउर ( लाल रंग के धान जौन पानी के स्रोत मा अपने आप जाग जाथे सुंघा/कांटा रहिथे। बाली ला सुल्हर लेथे दीदी मन अऊ रमन्ज के चाउर निकालथे । लाल रंग के चाउर ) ला रांधिस   बिन जोताये खेत ले छे किसम के भाजी सकेल डारिस अमारी मुनगा कुम्हड़ा लाल पालक बथवा भाजी। गांव के डेयरी ले दूध मही घीव ले आनिस। अऊ अब जम्मो तियारी करके गौरी - गौरा चौक मा रेंग दिस। 

              मंडप साजे हे। सगरी बने हावय सुघ्घर अऊ पार मा खोचाये हे चिरइया फूल कनेर कांसी दूबी अब्बड़ सुघ्घर। दाई माई बहिनी मन घला अपन जम्मो सवांगा पहिरे- ओढ़े । मेहंदी मा रंगे हाथ अऊ आलता माहुर मा  गोड़। चुरी वाली अऊ बिन चुरी वाली सब बइठे हावय संघरा। लइका के उज्जर भविस बर असीस मांगत हावय जम्मो उपासिन मन कमरछठ महारानी ले। 

"अब तोरे आसरा हावय ओ कमरछठ दाई  !''   रेवती के आंसू बोहागे महराज के पैलगी करत। दिन भर के निर्जला उपास । जम्मो कोती अंधियार लागिस। लटपट घर अमरिस अऊ सुन्ना घर मा समावत पारबती भोले नाथ के फोटू ला पोटार लिस। बेसुध होगे।


              उदुप ले मोहाटी के कपाट बाजिस अऊ नोनी हा खुसरिस भीतरी कोती। बटन ला मसक के लट्टू बारिस।

"दाई ! ''

ये आखर रेवती बर संजीवनी बूटी रिहिस। झकनका के उठिस अऊ लइका ला पोटार लिस। नोनी रितु के नरी मा झूल गे। 

"गांव भर नाच नचा डारे। पदनी पाद पदो डारे । जिहां जाना हे, बता के जाना रिहिस तोला कब बरजे हव बेटी ! झन जा कहि के । '' 

रेवती रोवत रिहिस अऊ रितु के गाल घला झन्नागे  दाई के चटकन ले। 

"दाई रायपुर गे रेहेंव। अब तोर बेटी हा मेडिकल कालेज मा पढ़ही ओ !''

मुचकावत रिहिस रितु हा।

"अऊ पइसा ? ''

"लोन लेये हव, शिक्षा लोन। फरहान भइया जम्मो बेरा पंदोली दिस फारम भरे अऊ लोन निकाले बर। मोर संगी रुखसाना के भाई आय ओ ! फरहान हा। रायपुर दुरिहा हे तेखरे सेती अगुवाके काली  गे रेहेन मेहां रुखसाना अऊ फरहान भइया तीनो कोई। आजे आखरी दिन रिहिस काउंसिलिंग के । मोबाइल घला मरगिस तब का करहु।   जाथो कहिके पटेलीन डोकरी ला घला बताये रेहेंव । भैरी सुरुजभूलहिन नइ बताइस ?  नानचुन गोठ बर झन संसो करे कर। रितु मुचकावत रिहिस अऊ रेवती के आंसू पोछत रिहिस। 

टुरा के जेवनी कोती अऊ टुरी के  डेरी कोती पोता मारथे। नानकुन कपड़ा ला पिवरी छुही मा बोर के रितु के डेरी कोती पोता मारे लागिस। छे बार पोता  मारके आसीस दिस  खुलखुल हांसत रेवती हा अब।

बिन जोताये खेत मा उपजे चाउर कस पाबित्तर लागत रिहिस अब रितु हा। अऊ गाल मा उछाह के रंग दिखत रिहिस सिरतोन पसहर चाउर कस कस लाल-लाल । 


चन्द्रहास साहू

द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब के पास

श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़

493773

मो.  -  8120578897

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छत्तीसगढ़ लोकपरब के भुइयाँ ए। जिहाँ कतको लोकपरब आए दिन मनते रहिथे। ए लोकपरब जन जन ल जोरे रखे म बड़ भूमिका निभाथे। सामाजिकता के विकास करथे। आने आने जात के जम्मो मनखे अपन पुस्तैनी काम धंधा ले एक दूसर के सहयोग करथे। गँवई जनजीवन म एकता, भाईचारा अउ मया-प्रेम के सतरंगी खुशहाली के दर्शन होथे। विकास के निसैनी चढ़त पउनी-पसारी अब नँदावत हे। अभियो दूराँचल म जिहाँ रोजगार के गारंटी नइ हे, उहाँ पउनी पसारी लगके कतकोन मन जिनगी ल पार लगाथे। अइसन उही मन करथें, जेन मन अपन गाँव अपन छाँव के भाव ले अपन जन्मभूमि ल सरग मानथें।

       शिक्षा के सुरुज के अँजोर नइ बगरे ले कभू कभू बिन मुड़ी कान के गोठ ह जंगल के आगी बरोबर फइलते जाथे। कउँवा कान लेगे कहे म कउँवा के पीछू दउड़े लगथें। कान ल छू के परछो ले लन कहिके नइ सोच पाय। एकरे कतकोन झिन मन फायदा उठाथे अउ गरीब अउ लाचार मनखे ल हँसी मजाक के जिनिस समझथें। उँकर भावना ले खेलथें। जेकर पति नहीं, तेकर गति नहीं। कहावत शिक्षा के अभाव म चरितार्थ हो जथे। 

       भारत गाँव म बसथे। ए गोठ ल सबो मानथें अउ भारतीयता के दर्शन गाँव म देखब ल मिलथे। जिहाँ लोगन के बीच कोनो किसिम के जाति भेद अउ धरम भेद नइ झलकय। सब मिलके रहिथें आगू बढ़थे। 

        ताक म रहइया मनखे मन गाँव के हवा म जहर घोरे के बुता करथे। भरम जाल के फाँदा म जनता ल फँसा के अपन उल्लू सीधा करथे। इही अवसरवादी मन ल कहानीकार चंद्रहास साहू जी निशाना म रख के पसहर चाउँर कहानी ल लिखे हे। कहानी अपन उद्देश्य ल पूरा करत हे। 

          आम आदमी लोक लाज जाय के डर ले अधरे अधर काँपत रहिथे। जेकर ले अपन आप के विश्वास ल डगमगा डरथे, अउ अपने लइका ऊपर शक करे धर लेथे। रेवती घलव अपन हुशियार बेटी ऊपर भरोसा करे के स्थिति म नइ राहय। ए गरीबी अउ हँसइया समाज के डर के भूत आय। जउन समाज म घटत अनहोनी घटना ले रेवती के मन म जनम धर लेथे अउ एला हवा देवइया कतकोन हे। 

        कहानी के भाषा शैली बढ़िया हे। प्रवाह हे। रोचक हे। कहानीकार सिरीफ सपाट बयानी करना नइ चाहय, प्रतीक म अपन बात रखे म उन ल महारत हासिल हे। देखव बानगी---टुरी ल मुनगा चुचरे सही चुचर लेथे। खेत जोतके बीजा डार देथे अउ छोड़ देथे...खुरचे बर। 

       संवाद मन पात्र मन ल उभारे म सक्षम हवय।

     कहानीकार चंद्रहास साहू जी अपन लेखन शैली ले पाठक ल गँवई गाँव के जीवन दर्शन करावत कहानी ल आगू बढ़ाय म सफल हे। कहानी काल्पनिकता ले दुरिहा हे। 

       पाठक रेवती के बेटी रितु के प्रवेश करत ले कहानी का मोड़ लिही? एकर कल्पना नइ कर पाय, अउ पढ़े के मोह घलव छोड़ नइ सकय। कहानी के बुनावट अइसन सुग्घर हे।

      पसहर चाउँर ल खमरछठ म जतका पवित्र माने जाथे, रितु ह महतारी रेवती के जिनगी म ओतके पवित्र हे। ओकर मन के शंका ह निराधार रहिस। अनहोनी के शंका के घटा के फरियाय ले खुशी ले दमकत गाल के लाली ह कहानी के शीर्षक ल सार्थक करथे। अइसन सुखांत कहानी हर पाठक ल पढ़ना चाही। 

      चंद्रकांत साहू जी ल सुग्घर कहानी लिखे बर मँय बधाई देवत हँव।



पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी

9977252202

कहानी-पथरा

 *पथरा*


                          

                      चन्द्रहास साहू

                      मो .8120578897



"मोला माफी दे दे डॉक्टर नोनी ।''

मुहु ले बक्का नइ फुटिस मोर मनेमन मा केहेव। ....ओला देख के  रो डारेव मेहां।

मेहां तो अइसन अनित करे हंव कि सात जनम ले आगर कोनो माफी नइ देवय। फेर आज मोर आंखी उघरगे हाबे। मन अतका कलपत हावय कि अभिन धरती फाट जातिस अऊ मेहां ओमा समा जातेव। फेर मोर असन पापी ला धरती मइयां घला नइ पोटारे। फेर...नइ मरो मेहां , भलुक घूट-घूट के जिहु । भलुक आंसू मा बुड़ेI राहव, भलुक मोर तन मा किरा पर जावय फेर मेहां जिहु।...अऊ इही जीना हा मोर प्रायश्चित आवय।

मने मन मा गुनत हावव।  सी...सी..गो...गो.....आरो आइस अऊ बम्फाड़ के रो डारेव।

मोर गोसाइया मोला सम्हालिस। आंसू ला पोछेव अऊ फेर देखेव ओ डॉक्टरिन ला टुकुर-टुकुर, एक टक, बिन मिलखी मारे।

गोसाइया घला अचरज मा हाबे आज।

"किरण! देख डॉक्टर नोनी कतका सुघ्घर हावय तोर असन सुघ्घर। गोठियाथे ते तोरेच कस गुरतुर मीठ।..जेवनी गाल के तेलई । तोरे बरोबर डिप्टो, जइसे कोनो फोटो कॉपी आवय।बस, उम्मर भर के अंतर हाबे ताहन रूप -रंग,चाल-ढ़ाल, कद-काठी -सब एक बरोबर।''

गोसाइया पूछत हावय अऊ मेहां मुहु लुकावत हावव। न मोर करा कोनो जवाब हाबे न मेहां कहि ला जानव ?  फेर एक राज के गोठ हावय..। अऊ येहां नानकुन राज नोहे, रगरागावत आगी आवय। जम्मो कोई लेसा जाही, जम्मो कोई भूंजा जाही। ये आगी के आंच मोर उप्पर, गोसाइया उप्पर अऊ ओ गरीब उप्पर घला आही...।

                 अब मोला जम्मो कोई समाज सेविका के नाव ले जानथे। राजनीति मा घला अब्बड़ पहुंच हाबे। चीज बस घर दुवार कोनो जिनिस के कमती नइ हावय। पांच पीढ़ी बइठ के खाही अतका जिनिस हाबे, फेर पीढ़ी बढ़हइयां ..? कोनो नइ हावय। तीरथ-बरत,दरसन-परसन, पूजा-पाठ -जम्मो करेव फेर सब अबिरथा। मेडिकल ट्रीटमेंट पानी-पिसाब खून जम्मो के टेस्ट करवायेव।एक्सरे सोनोग्राफी सब। मोरेच भर ला करवायेव अइसन घला नही, हमर दुनो के जम्मो टेस्ट। पुरुषत्व के घला टेस्ट करवायेव फेर सब अबिरथा,सब पानी। मोर कोरा मा फूल नइ  खिले के कोनो कारण नही, तभो ले डेरउठी मा दीया बरइया कोनो नही।

              लइका मन तो फूल आय,रंग- बिरंगी चिरइया अऊ चंदैनी गोंदा कस। ..अऊ फूल ला कोन नइ भावय। फूल-फुलवारी घला मनमोहना होथे। सिरतोन राम अऊ किशन भगवान के बरन धर के खेलत हावय लइका मन। मेहां देखथो ते मेहां अघा जाथो। माता कौशिल्या अऊ माता यशोदा घला अइसना अघावत रिहिस होही। माता कौशिल्या के भाग जब्बर हावय। अपन कोरा ले सृष्टि के सिरजइया ला जनम दिस। ..अऊ माता यशोदा ओखरो किस्मत जब्बर। अपन गरभ मा नौ महीना ले नइ पालिस-पोसिस ते का होइस, सिरजनहार ला अपन मुहु के जूठा कौरा तो खवाये होही कइसे बाल लीला देखावत ब्रम्हरूप ला देखा दिस भगवान हा। 

छोड़, येमन कथा कंथली आवय । ओ रिक्शा वाला के बाई हा अपन सौत के लइका ला  पालथे-पोसथे खेलाथे अऊ दुलार करथे सगे दाई बरोबर। ओ खोरबाहरीन! अपन बहिनी के लइका ला पढ़ावत लिखावत हाबे। सेठ हा कतका तीरथ-बरत करत हे...। जकही तक हा अपन लइका ले नइ दुरिहाये। चिरई-चिरगुन कुकुर-बिलई मन घला चार दुवारी मा लेगथे लइका ला अऊ पालथे। अऊ मेहां ..?

                      जम्मो ला गुनत-गुनत सिटी गार्डन मा बइठे हव। लइका मन के रेला मोर कोती आथे ते जी घुरघुरासी लागथे। जी मिचलाये लागथे, रुआ ठाड़ हो जाथे। बही हो जाथव,जकही हो जाथव  अऊ रोथव, गिंगियाथो तब सांस बोजाये कस लागथे। पछिना-पछिना हो जाथे जम्मो काया हा। अऊ अब पट्ट ले गिर गेव ...।

"किरण मेहां तोर संग मया के धार ला नइ बोहा सकव। मया अंधरा नइ होवय मया करइया अंधरा हो जाथे। अऊ..मेहां तोर संग अंधरा बनके मया नइ कर सकव। तेहां गौटिया के बेटी अऊ मेहां बइला चरवाहा के टुरा। कभु मेल नइ होवय हमर दुनो घर संग। बीजा जब पिका फूटत रहिथे तभे मसल देबे ते अब्बड़ मिहनत ले रुखवा ला कांटे ला नइ परे। अभिन हमर मया के पिका फूटे हावय,अब दुरिहा जा।''

रमेश आज किहिस अऊ कुरिया ले निकलगे।

                अब स्कूल के पढ़ई पूरा करके कालेज मा अमरगे हन। पहिनई-ओढ़ई, घुमई-फिरई, खवई- पियई के दिन आवय कालेज के दिन हा। अब खेलउना खेले के दिन नोहे भलुक जरत जवानी ला बुझाये के दिन आवय। आने मन अपन जिनगी ला सिरजाये बर कॉलेज मा पढ़थे फेर मोर बर तो कॉलेज के मतलब मौज-मस्ती  इही आवय।

                     ब्रम्हाजी कतकोन जीव जिनावर बनाये हे फेर सबले सुघ्घर बनाये हाबे ते - नारी ला। अऊ नारी के रूप सुंदर अऊ मति ला चंचल बना दिस तब तो ओहा काखरो ले नइ हरा सके। साम दाम दंड भेद राजनीति के प्रपंच आवय फेर मया मा घला आजमाये लागेव मेहां रमेश ला पाये बर। जुग जोड़ी बनके संग जिये बर नही भलुक टाइमपास बर। कतकोन समझाइस संगी संगवारी अऊ रमेश घला फेर मोर मन मा मया के आगी लग गे रिहिस। कोन जन मया आय कि....? 

         कालेज ले लहुटे के बेरा हमर फार्म हाउस के तीर अब्बड़ झमाझम बारिस होइस आज।  रमेश तो कांपत रिहिस अऊ मेहां रगरगावत रेहेव। निझमहा फार्म हाउस मा खुसरगेन दुनो कोई पानी अतरे के अगोरा करत।

       ऋषिमुनि साधु संत कोन बांचे हावय तिरिया चरित्तर ले। रमेश कइसे बांच जाही ? काया मा चिपके भींजे ओन्हा कपड़ा। चुन्दी ले टपकत पानी के बून्द। पडरी काया,दमकत सिकल अऊ रगरगावत छाती। नदियां आज पियास मरत हावय।

रमेश ला पोटार लेव। 'अऊ एक बेरा'..  अऊ एक बेरा... काहत मया के समुंदर मा तौरे लागेव। अथाह समुंदर जिहां कोनो खारापन नही सब मीठ- मीठ...। छुअन मीठ, बोली मीठ,अहसास मीठ अऊ पीरा घला मीठ...। भलुक बिहाव नइ होये हाबे तभो ले नारी के सुख भोगत हव। सिरतोन मया निसा आवय।  फेर मोर कोनो मया के निसा नोहे तन के मिलाप के निसा आवय....महानिसा। बेरा कुबेरा निझमहा जब मौका मिलिस तब ..बस 'अऊ  एक बेरा..।' रातरानी जतका नइ ममहाइस ओखर ले जादा मेहां ममहावत हावव।

                      फूल के ममहासी सुघ्घर लागथे फेर मोर ममहासी...? दाई ददा के नाक कटावत हावय।

                       ददा हा भलुक मोला भोकवी कहिथे  फेर अब्बड़ गुनवंती हावव। पीरियड आये के कतका दिन मा गर्भधारण हो सकथे, कोन जिनिस बउरे ले सुरक्षित होथे, कोनो उच्च नीच होगे तब का दवई खाये ला पड़थे- सब जानथो मेहां। फेर आज अजम नइ पायेव। अऊ कोरा मा डुहरू धरे लागिस।

"बेटी ! आनी-बानी के गोठ सुनत हव मेहां। दुनो कोई मया करथो ते बर बिहाव कर देथव रमेश संग तोर।''

"बिहाव..? तेहां गरभ के पीरा मा दंदरे रहितेस ते अइसना नइ कहिते। ओ गरीब घर अपन राजकुमारी बेटी ला नइ देवन। कभु गोबर के गंध ला सूंघे नइ हे तौन बिहनिया ले कुंदरा ला गोबर मा नइ लीपे। फेकत डारत ले खवइया नोनी हा खाना बर नइ लुलवाये। तोला घर परिवार नइ चलाये ला आवय ते हरिद्वार जाके साधू महात्मा बन जा। फेर हमहा जूठा खवईया जुटहा नंगरा ला समधी नइ बनावन।''

सबरदिन बरोबर दाई मोर सरोटा तिरिस अऊ रगरगावत ददा ला 'जोत' दिस। 

"भोकवी ! ..महतारी बेटी दुनो भोकवी हावव।''

ददा किहिस अऊ चल दिस खेत कोती।

कोरा मा फूल के डुहरू ला रमेश ला बतायेव। उछाह होगे । अपनाये बर तियार होगे फेर मेहां अइसे बरजेव कि कभु आगू मा नइ आइस। 

"मोला तो कोनो सरकारी नौकरी वाला गोसाइया मिलही अऊ अब्बड़ जैजात वाला

घला। हमर कोठा हा पक्का हावय फेर तुंहर घर भसकहा.., का करे बर जाहू... ।''

"जादा गरब झन कर अपन काया के बस्सात ले हो जाबे। किरा परत ले हो जाबे।''

मोर गोठ ला सुनके रमेश अइसना तो केहे रिहिस। 

फेर आज अब्बड़ संकट मा हावव। दाई ला बतायेव। गाल मा लोर उपटत ले मारिस ते मारिस फेर मोर आज अऊ सरोटा तिरिस। दुरिहा गांव के मोसी घर पठो दिस। 

कतका लबारी मारिस । कतका झन ला अंधियारी मा राखेव । धोखा देयेव फेर उही होइस जेखर डर रिहिस। कोनो डॉक्टर नर्स गरभ ला गिराये बर राजी नइ होइस। 

आज महु अज्ञातवास मा हावव नौ महिना के। डुहरू फूल अब छतराये लागिस। काया मा बदलाव होइस। पेट बाढ़गे। ..अऊ अब जीव दुनिया मा आंखी उघारे बर तियार होगे। मोसी सुवईन दाई बन के जतन करिस। कतका सुघ्घर हावय... नोनी लइका हा..... कोवर-कोवर हाथ गोड़..... नान-नान  आंखी .... खोखमा बरन जम्मो काया ...अब्बड़ सुघ्घर लागत हे । छाती मा गोरस उतरिस तब अब्बड़ मया लागिस। फेर दाई के गोठ के आरो आ गे।

"किरण ! लइका ला धर के आबे तब नरक मा बुड़ जाबे। अऊ फेंक के आबे तब ...? तब उछाह मा रहिबे। ये दुनिया मा मालदार टुरा के कोनो कमती नइ हावय बेटी!''

पथरा ले जादा कठोर अऊ जल्लाद ले जादा निष्ठुर होगेव मेहां । भिनसरहा लइका ला फेंक देव। लइका के किलकारी ओखर रोवई तड़प...भैरी होगेव। थोकिन मया पलपलाइस तब मोसी...? तीरत लेगगे ।

              मरइया ले बड़का बचइया होथे। आज  मइनखे मा कुकुर अऊ कुकुर मा मइनखे के गुण आगे। निर्मोही के लइका बर कुकुर हा रखवार होगे। कुतिया, वहु तो मां आवय अपन चार पिला मन ला दूध पियावत मोर लइका ला आंच नइ आवन देवत हे कोनो बैरी ले। कुदरत के करिश्मा ला देख चबरहा-हबरहा के जात हा रखवार होगे। अऊ मइनखे हा ...?

जम्मो ला पेपर मा पढ़ेव। टीवी मा देखेव अऊ चार झन ले सुनेव। 

                 पइसा हाबे तब का नइ मिले ? सब मिल जाथे। मोर बर दुल्हा घला मिलगे। सरकारी नौकरी वाला अऊ मालदार जइसन चाहेव तइसन पायेव। 

.....फेर सब अबिरथा।

                    दु बेरा कोख हरियाइस। एक बेरा कोनो उच्च  नीच होइस अऊ गरभ खसलगे। दुसरिया दरी मरे लइका  ला जनम देयेव।

.........अऊ अब कोरा सुक्खागे। सरगे।


                 मेहां अस्पताल मा भर्ती हावव। बच्चादानी ला निकालही डॉक्टर नोनी हा। ठाकुर देव के महिमा अपरम्पार हावय। डॉक्टर नोनी घला उही आवय मोर फेकल बेटी, कुकुर के दुलार पवइया मोर लइका। 

                   निरबंसी सेठ - सेठानी मन  लइका ला गोद लिस अऊ पढ़हाइस लिखाइस।आज डॉक्टर बनगे हावय। नोनी के डोकरी दाई अइसना तो बताये रिहिस।

                    मोर केंसर वाला बच्चा दानी ला निकालही। पढ़ के आये के बाद के पहेला आपरेशन मोर करही। तेहां लइका ला दुलार नइ सकस तब बच्चा दानी के का बुता..?शायद इही भाव होही परमात्मा के। 

आज सिरतोन नोनी के गोड़ मे गिरगेव अऊ माफी मांगत हावव.... । फेर ओ तो.....? 

            " सिरतोन सेठ तेहां फेंके पथरा ला तराश के पूजा के लइक बना डारे अऊ मेहां हीरा ला  गउदन समझेव.....? डॉक्टर नोनी तो पथरा कस मुक्का होगे अऊ चल दिस ऑपरेशन के तियारी करे बर। कोन जन आज वहु पथरा होगे का.....? फेर मोर जिनगी एक बेरा अऊ पथरा होगे.....!


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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com


समीक्षा- पोखनलाल जायसवाल


जिनगी चार दिन के हे। अउ ए दुनिया घलव अतेक बड़ नइ हे कि जेकर ले हम अपन पिंडा(पाछू) छुड़ाना चाहथन वोकर ले घुम फिर के मेल भेंट नइ होही। करनी(बुरा करम) के पछतावा घलव तो अइसने आय। घुम फिर के करनी ह आगू आ जथे अउ पछतावा होथे। दुनिया अतका सिमटा गे हे कि कखरो ले मेल मुलाकात के संभावना खतम नइ होय। कोनो न कोनो मोड़ म भेंट पयलगी होना खच्चित हो जथे। मनखे ल मन म भोरहा पाल के नइ रहना चाही।

       मनखे तन माटी के पुतला ए त मनखे गलती करइया पुतला आय। जाने-अनजाने कतको गलती कर डरथे। अपनी करनी के फल तो मनखेच ल भोगे परथे। जे ह प्रकृति अउ भगवान के वरदान संग खेलवाड़ करथे, हँसी मजाक करथे। ओकर जिनगी संग घलव घलव खेलवाड़ होथे। वहू म दुनिया म मजाक बन के रहि जथे। दुनिया म एकर कतकोन उदाहरण हें। रावण कंस मन का अपन वंश के समूल नाश नइ करा डरिन। जवानी के जोश म होश गवाँ के मनखे अपन ताकत के घमंड करथे।  ताकत वाला समझ के अपन फूल कस हिरदे ल पथरा बना लेथे अउ दूसर के हिरदे ले खेलथे अउ रउद देथे। सपना ल टोर देथे। फेर समे बदलत नइ लगय। ऊप्पर वाला के राहपट जब परथे त चेत आथे, तब पूरा जिनगी ह पथरा लहुट ज रहिथे। इही सब गोठ बात ल सरेखत कहानी आय पथरा। 

      कहानी के भाषा शैली पाठक ल बाँधे रखथे। बहाव अतेक हे कि कहानी कब पढ़ा जथे पाठक ल आरो नइ मिलय। मन अघा जथे। 

       संवाद मन प्रासंगिक हे। पात्र मन बर संवाद लिखे म चंद्रहास साहू जी बड़ सावचेत लगथे। कभू नइ लगय कि कुछु जादा लिखाय। नपाय जोखाय शब्द ल पढ़ के पाठक ठगागेंव नइ समझय। 

       मनखे ल अइसन करनी करना चाही कि आघू चल के पछतावा झन होवय। मनखे ल भोरहा म नइ रहना चाही कि मोला पछतावा होबे नइ करही। सब समे के हाथ म होथे। समे सब ल नाच नचाथे। अपन मानवीय संवेदना ल कभू झन भुलावन। इही बात के संदेश दे म ए कहानी पूरा सफल हे। शीर्षक पथरा कहानी ल सार्थक करथे। अइसन कहानी ह हर पाठक के मन म चिरकाल बर जगा बना लेथे। अइसन सुग्घर कहानी लिखे बर मँय चंद्रहास साहू जी ल बहुत बहुत बधाई शुभकामना देत हँव।


पोखन लाल जायसवाल

पठारीडीह पलारी

9977252202

पुरोधा--------- स्वर्ण कुमार साहू "पुष्प"

 पुरोधा---------


स्वर्ण कुमार साहू "पुष्प"

            (गीतकार)

        सांस्कृतिक कला हर सदा दिन पीढी उपर पीढी ले छत्तीसगढ के धरोहर हे। अउ आगू घलो रही। काबर कि येकर भीतर हमर संस्कृति  के  पहिचान  समाये रथे। जब कोनो कला हर मंच ले होके आम जन मानस तक जाथे तब ओकर मान महत्तम ला मजबूती मिलथे। हमर छत्तीसगढ मा नाचा एक ठन अइसे विधा आय जेकर भीतर समाज के हर विसंगती ला, मनखे के जिनगी मा होवत उतार चघाव ला। हांसी ठिठोली के सॅग सुख दुख के घड़ी होनी अनहोनी चरित्तर ला सरल सहज रूप मा जन मानस तक पहुंचाय के दमदारी रखथे। गीत अउ गम्मत के आड़ ले समाज के असली सच ला उजागर करे मा कमती नइ रहय। नाचा मा गीत संगीत के सॅगेसॅग नान नान चुटकुला हाना दोहा ठेही ठेसरा ले  हाॅसी गुदगुदी करे मा घलो कम नइ रहय। ओइसे भी नाचा गम्मत  भरथरी पंड़वानी ढोला मारू लोरिक चंदा के उपर शोध ग्रंथ से लेके लेख विचार लिखे जावत हे । लिखना घलो चाही। काबर कि एकर जानकारी आगू पीढी तक जाना भी जरूरी हे ।

             नाचा विधा मा गीत संगीत के बात आथे तब गम्मत के अधार ले विरह सिंगार हास्य ब्यंग समाजिक सद्भाव धार्मिक आस्था  से लेके हर विसंगती उपर गीत के सिरजन होइस। अउ अभिनय प्रस्तुति ले जन मानस मा जगा बनाइस। गीत कार समय काल के मरियादा ले बॅधाय के बाद घलो ब्यंग बाण चलाके घाव करत निकल जाय । ये गोठ एकर सेती कहना परत हे कि अब के कला मंडली मा अभद्र अउ फुहड़पना हर जगा बना लेहे। एक समे मा कलम के ताकत ले अपन गीत के दम ले जन जन के बीच जगा बनाइस। वो महान गीतकार जेकर नाम स्वर्ण कुमार साहू "पुष्प" जी रिहिन। स्वर्ण कुमार साहू जी के गीत जादातर ब्यंग भरे रहय। ओकर गीत ला वो जमाना के नाचा विधा के पुरोधा मदराजी दाऊ मदन निषाद ठाकुर राम भुलवा फिदाबाई जइसन नामचिन कलाकार मन नाचा गम्मत मा गावत रिहिन ।पुष्प जी के गीत कोनो संकलन किताब तो देखे बर नइ मिले हे । ओकरे जमाना के नचकार ( मोर बाबू जी)  जेकर कापी मा साहू जी के गीत मन लिखाय मिले हे। ओकर सिरजन के कुछ हिस्सा आप सबो तक नइ पहुच पाही त बात अधुरा रहि जाही ।

         ओकर भाषा भाव अउ तरज जेहर मनखे समाज के बीच के विसंगती उपर चोट करत चलय। ऊंच नीच के भेद उपर कटाक्ष करत उन लिखथे------------------------


ले महराज बतादे तुंहर कोन घराना आये ।


जात सिकारी ला नीच बताथो ।

       देखब मा महराज छुवाथो।

तेकर लइका बालमिकी ए।

       जेकर ज्ञान सुहाये-------------


ब्यास मुनि महभारत गाइन।

      ब्रम्ह ज्ञान के भेद बताइन।

आय तउन ढिमरिन के लइका,

   बाम्हन कस कहलाइये----------------।

मुनि यारासर ला जग जानिन,

तेकर दाई जमादारिन।

जनम धरिन हे नीच पेट ले ,

     बाम्हन कस कहलाये----------।


विश्वामित्र रसपूत के कहिथे,

सुनके सुजानिक गुनत रहिथे ।

ब्रम्ह रिसि जेला काहत लागे

तेकर जात मा फरक आये-----------।


बेद मन मे कतका भरे हे,

रन्डी पेट ले जनम धरे हे।

भरतद्वाज मुनिसुद्र पिला आये----------।


दासी के बेटा आय मुनि नारद,

अइसे होइस ते ज्ञान विसारद।

" स्वर्ण" छुवा मे झन हो गारद,

    तोर भेद बिगरे जाये-------------

ले महराज बतादे तुंहर कोन'---------।


      समाज मा पसरे छुवा छूत के कालिख ला मेटे बर अउ जन चेतना ला झझकोरे बर उन अइसे गीत के सिरजन करिन जेहर मंच के प्रस्तुति ले जन जन तक जगा बना लेय रिहिस। उॅकर गीत के बोल बानगी अइसन हे-----


छुवा ला काबर डरे,

      भाई रे छुवा ला कावर डरे।


एके तरिया मा बाम्हन कनोजिया।

      जम्मो जात स्नान करे ।

सबो मिलके पानी मा थूंके,

    तब कामे भेद करे'---------

भाई रे छुवा----------------।


खातू मे उपजे धान कोदइया,

      मैला मे आलू फरे ।

मल मुत्र तोर पेट म खुसरे, 

बाहिर बर साबुन धरे---------

भाई रे छुवा----------------।


मछरी कुकरी साग चुरत हे,

      जौने हा नरख चरे ।

घिनघिन चीज ल लान के,

मुरदा मे पेट भरे-------------

भाई रे छुवा----------------


एक किसम के सबके चोला,

   "स्वर्ण" हा नइ बिसरे ।

सबो जात धरती के बसइया,

सरग मा कोन किंजरे----------

भाई रे छुवा-----------------।


        स्वर्ण कुमार साहू जी के गीत ले यहू पता चलथे कि उॅकर हिरदे मा देश प्रेम के भावना कम नइ रिहिस। आजादी के बाद देश के बटवारा अउ पाकिस्तान के नपाकी ढर्रा ओकर अड़दली पना ले काश्मीर के लड़ई बर पाकिस्तान ला बहुते लताड़ के गीत लिखिस। जेन हर मदन मदराजी नाचा साज के चर्चित गीत रिहिस।जेकर बोल हे----------


पाक दोगला तोर बरोबर कोन रे बइमान ।

अन्न खाए के मुंख मा मैला भखे पाकिस्तान।


काॅख के लड़ई मे गये,

      दाॅत ला निपोरे ।

सुम्मत मा रबो कहिके,

       तिंही हाथ जोरे ।

सीमा मे फौज भेजे,

        तिंही रसता टोरे।

उड़ान- मुंह मा तोर थया नइये 

         का गोठ ला पतियान------


भुट्टो मिया चाल चले,

       रेहे रे कसमीर मे।

छापा मार कतको भेजे,

      रेहेन तूंहर तिर मे ।

धुम धड़ाका करिन जम्मो,

     हबरगे जंजीर मे ।

उड़ान-  मने मन मा बाॅधे रहिना,

   कपसा के मचान-------------


कसमीर मे चुनई करबो ,

    केहेंन तब तै टरके ।

अब काबर दाॅवा करथस,

    अरे बिन गतर के ।

सोला बच्छर होगे हे,

ताकत हस मुंहू परके।

उड़ान---इही बुध मा एको दिन,

        जाही तोर परान-------------।


मरत रेहे कॅगला बिया,

     खंडा अउ फरी मा ।

फौज बर अमरिका के,

     गिरे गोड़ तरी मा ।

" स्वर्ण" मदन बाॅधे हे,

गरदेंवा तोर नरी मा ।

उड़ान-----जबले चीन के सॅग धरे, 

    तोर होगे तिज नहान---------

पाक दोगला-------------।


घर परिवार मा पति पत्नी के बीच के बिथा ला घरू झगरा ला घलो अपन गीत के बिषय बनाके गम्मत गीत मा जगा पाइस। संवाद भरे गीत के अलगे आनंद हे। जेखर बोल अइसन हे-------


जोंड़ी के मोर चाॅउर चुरत नइहे वो ।

उही पाय के जीव हर उलत नइहे वो।

जोड़ी परबुधिया हर जतर कतर होवथे ।

जुंआ अउ मंद मे जम्मो धन दुगानी खोवथे।

मजा ला उड़ावथे पर दुवारी सोवथे ।

अइ कहिथॅव ते चारी करथे कहिथे।

साहूकार जम्मोझन घर मा दते रहिथे ।

नारी के तब का इज्जत नइये वो----------------।

गीत मा संवाद हे लम्बा हे। कम रूप मा भेजे हवॅ। एकर छोड़े अउ कतको गीत हे जेन हर मन भावन अउ जनजागरन ले भरे हे। मोर समझ मा जतका समझ बनिस लिख के भेज पारे हवॅ।


राजकुमार चौधरी "रौना"

टेड़ेसरा राजनादगाॅव🙏

आधुनिक छत्तीसगढ़ी काव्य के दशा दिशा


 छत्तीसगढ़ी काव्य के दशा दिशा


साहित्य ला समाज के दर्पण केहे गेहे, काबर कि साहित्य हा वो समय के समाज के दशा अउ दिशा ला देखाथे। जब ले साहित्य सृजन होवत हे तब ले लेके आज तक के साहित्य ला देखबों ता वो समय ला, सृजित साहित्य खच्चित बयां करत दिखथे, चाहे बात आदिकाल के होय या फेर आधुनिक काल के। कवि जेन देखथे, सुनथे अउ सोचथे वोला अपन मनोभाव मा पिरोके समाज के बीच परोसथे। छत्तीसगढ़ के साहित्य घलो आन देश, राज के साहित्य कस समृद्ध अउ सशक्त हे। आदिकाल ले लेके अब तक के साहित्य के भार ला सूक्ष्म रूप ले शब्द के टेकनी मा बोह पाना सम्भव नइहे, काबर साहित्य के गठरी बनेच पोठ अउ रोंठ हे। अवधी, बघेली अउ छत्तीसगढ़ी भाषा पूर्वी हिंदी के भाषा कहिलाथे, तीनो भाषा के साहित्य के समृद्धि दिखथे,  फेर आधुनिक काल मा छत्तीसगढ़ी भाषा गजब फुलिस फलिस अउ आजो बढ़वार सतत जारी हे। आवन भाषाविद मनके करे साहित्यिक काल विभाजन के अनुसार छत्तीसगढ़ी साहित्य के दशा दिशा ला देखे के प्रयास करन। 


(1) आदि काल/ वीरगाथा काल (1000 ई-1500 ई तक)-

ये समय मा गीत, कविता, कथा, कहानी के वाचिक परम्परा के जानकारी मिलथे। लिखित साहित्य अउ लेखक कवि मनके नाम ज्यादातर नइ मिले, अइसन जुन्ना साहित्य ला लिपि बद्ध बाद में करे गेहे। अहिमन रानी गाथा, केवला रानी गाथा, रेवा रानी गाथा, राजा वीर सिंह गाथा जइसन कतको काव्य मय कथा प्रचलित रहिस, जे ये बताथें कि, राजा मनके संगे संग वो समय रानी अउ दुदुषी नारी मनके घलो वर्चस्व रिहिस। वो समय चारण काव्य परम्परा घलो चरम मा रिहिस, कोनो राजा या रानी अपन गुणगान या फेर बल बुद्धि ला बढ़ाये बर अपन दरबार मा भाट कवि ला रखत रहिंन। खैरागढ़ राज के दरबारी कवि दलराम राव अपन संग दलवीर राव, माणिक राव, सुंदर राव, हरिनाथ राव, धनसिंह राव, कमलराव, बिसाहू राव आदि भाट कवि मनके वर्णन करे हे, वइसने चारण कवि मनके वर्णन रतनपुर राज के कलचुरि शासक मनके राज दरबार मा घलो सुने बर मिलथे।  हमर छत्तीसगढ़ राज के अउ आन राजा मन घलो आन राज के राजा कस अपन दरबार मा चारण कवि रखें। धार्मिक, पौराणिक गाथा घलो ये काल में कहे सुने जावत रिहिस जेमा फुलबासन गाथा(सीता लखन कथा), द्रोपदी चरित आदि आदि संगे संग तन्त्र मंत्र सिद्धि के कथा(आदिवासी संस्कृति के परिचायक) घलो वो काल ला परिभाषित करथे। मूलतः ये काल के कथा राजा, रानी, विद्वान ,विदुषी व्यक्ति मनके जीवन संघर्ष अउ मिलन बिछोह ऊपर आधारित हें, पढ़त सुनत वो बेर के रीतिरिवाज, चाल चलन, सेवा सत्कार घलो देखे बर मिलथे।विविध गाथा के अधिकता के कारण ये युग ला गाथायुग घलो केहे जाथे।


(2) मध्य काल/भक्ति काल (1500ई- 1900 ई तक)- बाहरी आक्रमण कारी मनके अत्याचार ले छत्तीसगढ़ घलो अछूता नइ रिहिस, अइसन आफत के बेरा मा मनखे मन भक्ति भाव भजन ला अपन सहारा बनाइन। ये काल मा वीर काव्य अउ भक्तिमय काव्य के बहुलता रिहिस, संगे संग ज्ञानमार्गी अउ प्रेममार्गी काव्य/गाथा घलो देखे सुने बर मिलथे। आक्रमणकारी मन ले लोहा लेवत योद्धा मनके गुणगान बर रचे काव्य ला वीर काव्य कहे जाय। अइसने काव्य मा  योद्धा नारी के रूप मा छत्तीसगढ़ के फुलकुंवर देवी गाथा, नगेसर कयना गाथा के रचना होय हे। कल्याण साय गाथा, गोपल्ला गीत, ढोलामारू गाथा, सरवन गाथा, राजा कर्ण गाथा, शीत बसंत गाथा, मोरध्वज गाथा घलो ये काल मा कहे सुने जावत रिहिस, जे वो समय के वीर काव्य के साथ साथ पौराणिक  अउ धार्मिक काव्य के प्रचलन ला देखाये। प्रेममार्गी काव्य के उदाहरण स्वरूप  लोरिक चन्दा, कामकन्दला गाथा,दसमत कयना,अउ ज्ञानमार्गी भक्ति काव्य मा कबीर दास के चेला धनी धरम दास जी के काव्य सामने आथे। भक्ति भाव जब आडम्बर के रूप मा स्थापित होय लगिस ता कबीरदास जी के साथ उंखर चेला धनी धरम दास जी छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधित्व करिन, अउ कबीर दास जी संग ज्ञानमार्गी भक्ति के प्रचार प्रसार करिन।  छत्तीसगढ़ी भाषा के लिखित रूप मा धनी धरमदास जी के पद मिलथे। गुरु घासीदास के अमृत बानी अउ उपदेश घलो छत्तीसगढ़ी मा सुने बर मिलथे। संगे संग गोपाल मिश्र, पहलाद दुबे, लक्छ्मण कवि, माखन मिश्र मन घलो ये काल मा काव्य सृजन करिन। ये काल के रचना समयानुसार बदलत गिस, भक्ति भाव ले चालू होके ओखर आडम्बर रूप के विरोध तक देखे बर मिलथे, संगे संग प्रेम प्रसंग, वीर  काव्य अउ धार्मिक पौरानिक गाथा घलो समाहित हे।


*धनी धरम दास जी के छत्तीसगढ़ी काव्य पंक्ति*-

‘‘पिंजरा तेरा झीना, पढ़ ले रे सतनाम सुवा।

तोर काहे के पिंजरा,काहे के लगे हे किंवाड़ी रे सुवा।

तोर माटी के पिंजरा,कपट के लगे हे किंवाड़ी रे सुवा।

पिंजरा में बिलाई,कैसे के नींद तोहे आवै रे सुवा।

तोर सकल कमाई,साधु के संगति पाई रे सुवा।

धरमदास गारी गावै,संतन के मन भाई रे सुवा।।‘‘


धनी धरम दास जी के भाषा कबीरदास जी के असन मिश्रित रिहिस जेमा छत्तीसगढ़ी के संगे संगअवधी, बघेली, उर्दू फारसी के शब्द दिखथे। धनी धरम दास जी के काव्य  पद मा होली, बसन्त, गुरु महत्ता, चौका आरती, लोक मंगल,सत उपदेश, ज्ञान मोक्ष के बात वो समय ला परिभाषित करथे।


*ह्रदय सिंह चौहान जी के काव्य पंक्ति-*

तरसा तरसा के, सुरता सुरता के

तोर सुरता हर बैरी, सिरतो सिरा डारीस ।।

जतके भुलाथंव तोला, ओतके अउ आथे सुरता

जिनगी मोर दूभर करे, कर डारे सुरतेज के पुरता

तलफ़ा तलफ़ा के कलपा कलपा के

तोर सुस्ता हर बैरी, निचट घुरा डारिस ।1।


*गुरु घासीदास जी जे अमरवाणी*

चलो चलो हंसा अमर लोक जइबो।

इहाँ हमर संगी कोनो नइहे।



*(3) आधुनिक काल(1900 ई- अब तक)*

ये काल मा साहित्य मा विविधता देखे बर मिलिस, संगे संग काव्य के आलावा गद्य घलो सामने आइस। आवन आधुनिक काल ला घलो विभाजन करके वो समय के साहित्य ला खोधियाय के प्रयास करथन।


*(अ)शैशव काल(1900ई-1925 ई तक)*


- 1900 के आसपास छत्तीसगढ़ी साहित्य के जनम माने जाथे, काबर की इही समय छत्तीसगढ़ी भाषा मा रचना करइया साहित्यकार मन  जादा संख्या बल मा सामने आइन। धनी धरमदास जी के काव्यमय पंक्ति के वर्णन मिले के बाद घलो भाषाविद मन छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि के रूप मा अपन अलग अलग विचार प्रकट करथें। भक्ति कालीन कवि होय के कारण, धरम दास जी के पंक्ति देखत श्री हेमनाथ जी हा धनी धरम दास जी ला ही छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि मानथे। इती आचार्य नरेंद्र देव वर्मा जी मन सुन्दरलाल शर्मा जी ला प्रथम छत्तीसगढ़ी भाषा के कवि मानथे ता नन्दकिशोर तिवारी जी पं लोचनप्रसाद पांडेय जी ला, वइसने डॉ विनय पाठक जी नरसिंह दास जी ला छत्तीसगढ़ी के पहिली कवि कहिथे। दानलीला के भूमिका लिखत रायबहादुर हीरालाल जी लिखे हें कि- *जउने हर एला बनाइस हे, तउने नाम कमाइस हे, काबर कि भविष्य मा छत्तीसगढ़ी के पहली कवि के रूप मा सुंदरलाल शर्मा जी ला ही केहे जाही* खैर कोन पहली रिहिस तेला खोजे बर सबे क्षेत्र मा विवाद रथे। एखर कारण काव्य के उपलब्धता, लेखनकाल अउ प्रकाशनकाल तीनो हो सकथे।

 आधुनिक काल के ये शैशव काल मा 1904 के आसपास नरसिंह दास जी के कविता शिवायन आइस। छत्तीसगढ़ के सूरदास के नाम से विख्यात जन्मान्ध कवि नरसिंह जी के काव्य मा छत्तीसगढ़ी के एक बानगी देखव---

*शिव बारात(शिवायन से)* 

आईगे बरात गांव तीर भोला बाबा जी के

देखे जाबो चला गिंया संगी ला जगावा रे।

डारो टोपी, मारो धोती पांव पायजामा कसि,

बर बलाबंद अंग कुरता लगावा रे।

हेरा पनही दौड़त बनही, कहे नरसिंहदास

एक बार हहा करही, सबे कहुं घिघियावा रे।।

कोऊ भूत चढ़े गदहा म, कोऊ कुकुर म चढ़े

कोऊ कोलिहा म चढि़ चढि़ आवत..।

कोऊ बिघवा म चढि़, कोऊ बछुवा म चढि़

कोऊ घुघुवा म चढि़ हांकत उड़ावत।

सर्र सर्र सांप करे, गर्र गर्र बाघ करे

हांव हांव कुत्ता करे, कोलिहा हुवावत।

कहें नरसिंहदास शंभु के बरात देखि,

गिरत परत सब लरिका भगावत।।*


1905 मा पं लोचप्रसाद पांडेय जी के रचना छपे के चालू होइस  जे गद्य मा रिहिस कलिकाल के कारण छत्तीसगढ़ के पहली नाटककार केहे जाथे। पं जी के ज्यादातर काव्य मन ब्रज, हिंदी, बंगाली, अउ उड़िया मा रिहिस, पंडित जी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अउ अंग्रेजी के साथ साथ उर्दू फारसी के घलो विद्वान रिहिन। छत्तीसगढ़ी काव्य मा "कविता कुसुम" देखे बर मिलथे, जेखर रचना काल 1915 के बाद के जान पड़थे। 1910 मा एक रचना "भुतहा मण्डल" नाम से घलो देखे बर मिलथे, फेर गद्य साहित्य हरे कि पद्य साहित्य ते मोर जानकारी मा नइ हे। जगन्नाथ प्रसाद भानू, जगमोहन सिंह जी मनके घलो छत्तीसगढ़ी रचना के कहूँ मेर जिक्र होथे।


पं सुंदरलाल शर्मा जी के साहित्य मा छत्तीसगढ़ी साहित्य के दर्शन ऊपर वर्णित अन्य कवि मन ले जादा दिखथे, संगे संग दानलीला के रचना काल मा घलो एक मत नइ दिखे, कोनो 1904 कहिथे ता कोनो 1912। अलग अलग संस्करण के सेती घलो ये समस्या आय होही। सतनामी भजन माला, छत्तीसगढ़ी राम लीला  घलो सुंदरलाल शर्मा जी के छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह आय, येखर आलावा ऊंच नीच, छुवा छूत जइसन सामाजिक कुरीति मन ऊपर घलो कविता गढ़े हे। शर्मा जी के कविता के एक बानगी--

*कोनो है झालर धरे, कोनो है घड़ियाल।*

उत्ताधुर्रा ठोंकैं, रन झांझर के चाल॥

पहिरे पटुका ला हैं कोनो। कोनो जांघिया चोलना दोनो॥

कोनो नौगोटा झमकाये। पूछेली ला है ओरमाये॥

कोनो टूरा पहिरे साजू। सुन्दर आईबंद है बाजू॥

जतर खतर फुंदना ओरमाये। लकठा लकठा म लटकाये॥

ठांव ठांव म गूंथै कौड़ी। धरे हाथ म ठेंगा लौड़ी॥

पीछू मा खुमरी ला बांधे। पर देखाय ढाल अस खांदे॥

ओढ़े कमरा पंडरा करिहा। झारा टूरा एक जवहरिया॥

हो हो करके छेक लेइन तब। ग्वालिन संख डराइ गइन सब॥


छत्तीसगढ़ी भाषा के शैशवकाल मा ही शुकलाल पांडेय जी शेक्सपीयर के अंग्रेजी नाटक *कामेडी ऑफ एरर्स* के सन 1918 के आसपास छत्तीसगढ़ी भाषा मा भूल भुलैया नाम से पद्यानुवाद करिन। जेमा छत्तीसगढ़ के चित्र समाहित हे। 

 1906 मा शिक्षा के अलख जगावत शुकलाल पांडेय जी मन वर्णमाला गीत रचिन----


*स्वर बर--*

अ के अमली खूबिच फरगे।

आ के आंखी देखत जरगे।

इ इमान ल मांगिस मंगनी।

ई ईहू हर लाइस डंगनी।

उ उधो ह दौड बलाइस।

ऊ ऊघरू ल घला बलाइस।

ऋ ऋ के ऋषि हर लागिस टोरे।

सब झन लागिन अमली झोरे॥

ए ए हर एक लिहिस तलवार।

ऎ ऎ हर लाठी लिंहिस निकार ॥

ओ ओहर ओरन ल ललकारिस।

औ औहर बोला कोहा मारिस॥

अं अं के अंग हर टूटगे|

अ: अ: ह अअ: कहत पहागे।


*व्यंजन बर*

क क के कका कमलपुर जाही।

ख ख खरिया ले दूध मंगाही।

ग गनपत हर खोवा अँउटाही।

घ घर घर घर ओला बंटवाही।

ड ड पढ़ गपल हम खोबोन।

तब दूसर आन गीत ला गाबोन।

च चतरू हर गहना पहिरिस।

छ छबिलाल अछातेन बरजिस।

ज जनकू हर सुन्ना पाइस।

झ झट झट ओला मारिच डारिस।

झन गहना पहिरौ जी गिंया

ञ ञपढ़ ञ पढ़ पढञ।

ट टेटकू ह आवत रहिस।

ठ ठकुरी हर घला रहिस।

ड डियल बावा हर आईस।

ढ ढकेल खंझरी बनाईस।

ण ण ण कहिके डेरवाइस।

बम बम बम कहत फरइस।

त त तरकारी भात बनायेन।

थ थ थरकुलिया दार मंगायेंन।

द द देवी ला घला चघायेन।

ध धनऊ संग सब झन खायेव।

न न नदिया के पानी पीबोन।

अब हम आन गीत गाबोन।


छत्तीसगढ़ी साहित्य के शैशवकाल के आखरी समय मा लगभग 1924 के आसपास गोविंदराम विट्ठल जी मन *छत्तीसगढ़ी नागलीला* के रचना करिन, ओखरे कुछ पंक्ति देखिन--

सब संग्रवारी मन सोचे लगिन कि,

पूक, कोन मेर खेलबो, विचार जमगे।

जमुना के चातर कछार में,

जाके खेल मचाई।

दुरिहा के दुरिहा है अउ,

लकठा के लकठा भाई।।

केरा ला शक्कर, पागे अस,

सुनिन बात संगवारी।

कृष्ण चन्द्र ला आगू करके,

चलिन बजावत तारी।।

धुंघरू वाला झुलुप खांघ ले,

मुकुट, मोर के पाँखी।

केसर चन्दन माथर में खौरे,

नवा कवंल अस आंखी।।

करन के कुंडल छू छू जावै,

गोल गाल ला पाके।

चन्दा किरना साही मुसकी,

भरें ओंट में आके।।

हाथ में बंसुरी पांव में पैजन,

गला भरे माला में।

सब के खेल देखइया मरगै,

है, पर के माला में।।

पं सुंदरलाल शर्मा जी के दानलीला के प्रभाव विट्ठल जी के नागलीला मा घलो दिखथे।


ये प्रकार ले कहे जा सकत हे, कि आधुनिक काल के 1900 से 1925 तक के समय हा छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के शिशु के रूप मा सरलग बढ़े लगिन, जइसने शिशु हा एक ले बढ़के एक लीला देखावत बढ़थे, वइसने ये समय मा घलो एक ले बढ़के एक दुर्लभ रचना  समाहित होय हे। ये समय के रचना मा विविधता घलो देखे बर मिलथे, जेमा धार्मिक पौराणिक भक्ति साहित्य के संगे संग पेड़, पात, नदी, ताल, मिलन, बिछोह, गुण, ज्ञान,साज सृंगार अउ शिक्षा के महत्ता ऊपर कविता सृजित हें। कविता के कलेवर समाज के रीति नीति, चाल ढाल, अउ रंग रूप ला परोसत दिखथे।


*(ब) छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास काल(1925-1950)*

 ये समय मा भारत वर्ष ला अंग्रेज मनके चंगुल ले छोड़वाय बर, पूरा भारत मा स्वतन्त्रा आंदोलन के बिगुल बज गे रिहिस, जेमा छत्तीसगढ़ के सेनानी अउ कलमकार मन घलो बढ़ चढ़ के हिस्सा लिन। छत्तीसगढ़ के मनखे मन ला एकजुट करे अउ जगाये बर कविमन हिंदी के संग छत्तीसगढ़ी भाषा मा घलो पत्र पत्रिका अउ गीत कविता जनमानस के बीच लाइन। सुन्दलाल शर्मा जी के जेल ले हस्तलिखित पत्रिका, अउ छत्तीसगढ़ी दानलीला(जनमानस ला एकाग्र करे खातिर) मा स्वधीनता के सुर मिले,स्वराजी अलख अउ गाँधी विचारधारा ला छत्तीसगढ़ मा फैलाए खातिर शर्मा जी, छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम ले घलो जाने जाथे। पं लोचनप्रसाद पांडेय, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र(गाँधी गीत, सुराज गीत), केयूरभूषण(भारत वंदना, गाँधी वन्दना), कवि पुरषोत्तम लाल(काँग्रेसी आल्हा,छत्तीसगढ़ स्वराज), गिरवर वैष्णव(छत्तीसगढ़ सुराज) जनकवि कोदूराम दलित(चलो जेल संगवारी),कपिलनाथ मिश्र, किसन लाल(लड़ई गीत) आदि कवि मन स्वराज आंदोलन बर अपन लेखनी के माध्यम ले जनजागरण करत अंग्रेज मन ले लोहा लिन।


*कुंजबिहारी चौबे जी के रचना मा सुराजी झलक*-

तैंहर ठग डारे हमला रे गोरा,

आँखी में हमर धुर्रा झोंक दिये

मुड़ म थोप दिये मोहनी,

अरे बैरी जान तोला हितवा

गंवाएन हम दूधो - दोहनी,

अंग्रेज तैं हमला बनाए कंगला

सात समुंदर विलायत ले आ के,

हमला बना दे भिखारी जी

हमला नचाए तैं बेंदरा बरोबर,

बन गए तैंहा मदारी जी।


*तैं ठग डारे हमला रे गोरा*/ *अवतरे धरती मा तैं गांधी देवता* अइसन कविता लिख के चौबे जी सुराजी आंदोलन ला गति प्रदान करिन।


*जनकवि कोदूराम दलित जी के रचना मा सुराज के सुर-*

अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी,

कतको झिन मन चल देइन, आइस अब हमरो बारी ।

जिहाँ लिहिस अउंतार कृष्ण हर, भगत मनन ला तारिस

दुष्ट मनन-ला मारिस अऊ भुइयाँ के भार उतारिस

उही किसम जुरमिल के हम गोरा मन-ला खेदारीं

अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी ।


अब हम सत्याग्रह करबो

कसो कसौटी–मा अउ देखो

हम्मन खरा उतरबो

अब हम सत्याग्रह करबो ।

जा–जा के कलार भट्टी–मा

हम मन धरना धरबो

‘बेंच झन शराब’–कहिबो अउ

पाँव उँकर हम परबो ।

अब हम सत्याग्रह करबो...


*कवि गिरवर दास वैष्णव के देश बर संसो उंखर साहित्य मा दिखथे*

हमर देश हर दिन के दिन,

कैसे ररुहा होवत जाथे।

सात किरोड़ एक जुवार,

खाके रतिहा भूखे सो जाथे।

का होगे कुछ गत नईपावन,

चिन्ता सब के जिव आगे।

ऊपर मा सब बने दीखथ,

अन्तस मा घूना खागे।

दौड़-दौड़ के लकर लकर,

बिन खाये पिये कमाथन गा।


*सत्तावन के सत्यानाश*


किस्सा आप लोगन ला,

एक सुनावत हौ भाई।

अट्टारह सौ सन्‍्तावन के,

साल हमर बड़ दुखदाई।

बादसाह बिन राज हमर,

भारत मां वो दिन होवत रहिस।

अपन नीचता से पठान मन,

अपन राज ला खोवत रहिस।

इन ला सबो किसिम से,

नालायक अंगरेज समझ लेईन।

तब विलायती चीज लान,

सुन्दर-सुन्दर इन ला देहन।

करिस खुशामद खूब रात दिन,

इन ला ठग के मिला लेइस।


*क्रांतिकारी रूप देखावत वैष्णव जी लिखथें*-

अतका पानी दें तैं जतका।

जिंदगी के विस्वास माँगथे।


*कवि द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र के काव्य पंक्ति*-

धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।

मैं तो तोला जांनेव तैं अस, भुंइया के भगवान।।

तीन हाथ के पटकू पहिरे, मूड म बांधे फरिया

ठंड गरम चउमास कटिस तोर, काया परगे करिया

अन्‍न कमाये बर नई चीन्‍हस, मंझन, सांझ, बिहान।


*महाकवि कपिलनाथ कश्यप जी के रामकथा के कुछ अंश*

लंका दहन

महल हवेली लंका के सब जरगे,

भगत विभीसन के घर खाली रहगे।

जइसन करथे वो वोकर फल पाथे,

हाय-हाय कर बिगड़े ले पछताथे ॥1॥

निसाचरिन सब रो-रो गारी देवंय,

बेर्य बेन्दगर लेसिस सब कह रोवंय।

भड़वा लंका आके का कर देइस,

कउन पाप के वोहर बल्दा लेइस ॥2॥


*प्यारेलाल गुप्त जी के रचना मा मानवीकरण*

गाँव मं फूल घलो गोठियाथैं।

जव सव किसान सो जाथे

झाई झुई लाल गुलाली

देख चांद मुसकाथैं

खोखमा खिल खिल हांसे लगथैं।

कंवल फुल सकुचाथैं।

गांव मां .........


गुप्त जी के कविता में प्रकृति चित्रण के एक बानगी देखव

चली किसानिन धान लुवाने, सूर्य किरण की छॉव में।

कान में खिनवा, गले में सूता, हरपा पहिने पॉव में।।


*प्यारे लाल गुप्त जी हमर कतिक सुघ्घर गाँव के एक पंक्ति मा गाँधी जी ला समायोजित करके वो समय ला देखाथे*

आपस मां होथन राजी,जंह नइये मुकदमा बाजी

भेद भाव नइ जानन,ऊँच नीच नइ जानन

ऊँच नीच नइ मानन,दुख सुख मां एक हो जाथी

जइसे एक दिया दू बाती,चरखा रोज चलाथन

गाँधी के गुन-गाथन,हम लेथन राम के नावा।।

 हमर कतिक सुघर गांव, जइसे लक्ष्मी जी के पांव


बद्री विशाल परमानन्द जी घलो 1942 के समय आजादी के गीत लिखके भजन गा गाके जन ला आजादी ले लड़ई। मा आहुती देय बर प्रेरित करे। अइसनेअउ कतको कवि, कलाकार होइस जेनम गीत, कविता, भजन अउ नाच के माध्यम ले आजादी के आंदोलन ला आघू बधाइन।


सुराज गीत कविता के संगे संग ये समय मा खेत,किसान, फूल पान, हाट, बाजार, गाँव शहर, तीज तिहार, सुखदुख, मया पीरा, बाग बगीगा, नदी ताल आदि सबे विषय मा  उत्कृष्ट रचना कवि मन करत रिहिन, फेर देश के स्वाधीनता के फिकर ये काल मा प्रमुख रिहिस। कहे जाय ता, ये काल मा घलो सृजित साहित्य हा समाज के दशा दिशा ला सहज उजागर कर देथे। आजादी के लड़ाई के बानगी ये समय के कवि के कविता मन मा रचे बसे रिहिस। सुराज बर जनजागरण, त्याग समर्पण के संगे संग अंग्रेज मन के अत्याचार ला कवि मन अपन कविता मा समेटे दिखथे। भाव भक्ति भजन, सुख सुमता, दया-मया अउ एकता के संदेश घलो कवि मन जनमानस तक बरोबर पहुँचाइस। ये काल के कवि मनके कविता ला पढ़े, सुने अउ गुने ले इही बात सामने आथे कि जइसे भारतके आन राज मा आजादी के अलख जगत रिहिस, वइसने छत्तीसगढ़ मा घलो स्वतन्त्रता सेनानी अउ कलमकार मा आज़ादी के बिगुल बजाइन।


*(स)छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रगतिकाल(1950 ले 2000)*


देश के आजादी के बाद अंग्रेज मनके अत्याचार ले आहत भारत वर्ष के नवनिर्माण खातिर कलम के सिपाही मन अपन लेखनी के माध्यम ले देश राज के नवनिर्माण मा लग गिन। ये नवनिर्माण के समय मा कवि मन नवगीत, कविता रच के जनमानस ला, एक होके चले बर संदेश दिन। यहू काल ला 1950 ले 1975 अउ 1975 ले 2000 तक के काल खंड मा विभाजित करे जा सकत हे, फेर रचनाधर्मिता, काव्य कलेवर अउ लगभग उही कवि मनके उपस्थिति विभाजन काल मा सटीक नइ बइठे, रचना मा समसामयिकता समय अनुसार जरूर दिखथे। ये काल मा छत्तीसगढ़ी भाषा सबे विधा मा खूब फलिन फुलिन। सबे बंधना ले मुक्त होके ये दौर मा कविता ऊँच आगास मा स्वच्छंद उड़ावत दिखिस। कविता मा नवा नवा प्रयोग अउ काव्य के विविध विधा घलो देखे बर मिलिस।

 ये समय कवि हरिठाकुर, श्यामलाल चतुर्वेदी, मुकुटधर पांडेय,बद्री विशाल परमानंद, नरेन्द्रदेव वर्मा,हेमनाथ यदु, रविशंकर शुक्ल,भगवती सेन, नारायण लाल परमार, डॉ विमल पाठक, लाला जगदलपुरी, हरिहर वैष्णव, संजीव बक्सी,बृजलाल शुक्ल, संत कवि पवन दीवान,दानेश्वर शर्मा, मदनलाल चतुर्वेदी, शेषनाथ शर्मा शील, विधाभूषण मिश्र, राम कैलाश तिवारी, हेमन्त नायडू राजदीप, शेख हुसैन,हेमनाथ वर्मा, मेदनीप्रसाद पांडे,विकल,उधोराम झखमार, मेहत्तर राम साहू, विसम्भर यादव, माखन लाल तम्बोली, मुरली चन्द्राकर, मनीलाल कटकवार, अनन्त प्रसाद पांडे, अमृत लाल दुबे, कृष्ण कुमार शर्मा, कांति जैन, डॉ बलदेव, देवी प्रसाद वर्मा, नरेंद्र कौशिक, अमसेनवी, बुधराम यादव, मेदनी पांडे, मंगत रविन्द्र, हरिहर वैष्णव, कृष्ण रंजन, किसान दीवान, राजेन्द्र सोनी,उदयसिंह चौहान, आनंद तिवारी, ईश्वर शरण पांडेय, डुमन लाल ध्रुव,चेतन आर्य,ठाकुर जेवन सिंह,गोरे लाल चन्देल, प्रेम सायमन, भगतसिंह सोनी, लखनलाल गुप्त, मकसूदन साहू, चेतन आर्य, ललित मोहन श्रीवास्तव, बाबूलाल सीरिया, नन्दकिशोर तिवारी, डॉ पीसी लाल यादव,विद्याभूषण मिश्र, मुकुन्द कौशल,गुलशेर अहमद खां, अब्दुल लतीफ घोंघी, विकल, मन्नीलाल कटकवार, रघुवीर अग्रवाल पथिक, लक्ष्मण मस्तूरिहा, डॉ हनुमंत नायडू डॉ. सुरेश तिवारी, ललित मोहन श्रीवास्तव, डॉ॰ पालेश्वर शर्मा, राम कुमार वर्मा, निरंजन लाल गुप्ता, बाबूलाल सीरिया, नंदकिशोर तिवारी, प्रभंजन शास्त्री, रामकैलाश तिवारी, एमन दास मानिकपुरी,डॉ॰ हीरालाल शुक्ल, डॉ॰ बलदेव, डॉ॰ मन्नूलाल यदु, डॉ॰ बिहारीलाल साहू, डॉ॰ चितरंजन कर, डॉ॰ सुधीर शर्मा, डॉ॰ व्यासनारायण दुबे, डॉ॰ केशरीलाल वर्मा, रामेश्वर शर्मा, रामेश्वर वैष्णव, डॉ माणिक विश्वकर्मा नवरंग,गणेश सोनी, मदन लाल चतुर्वेदी, बुलनदास कुर्रे,गयारामसाहू,अलेखचन्द क्लान्त, राघवेंद्र दुबे, प्रदीप वर्मा,गजानंद प्रसाद देवांगन, भागीरथी तिवारी, चैतराम व्यास, प्यारेलाल नरसिंह, भरत नायक, रामप्यारे रसिक,सुशील भोले,उमेश अग्रवाल,  डॉ जे आर सोनी,भागवत कश्यप,परमानन्द कठोलिया, नूतन प्रसाद शर्मा(गरीबहा महाकाव्य), स्वर्ण कुमार साहू, सुरेंद्र दुबे, रमेश कुमार सोनी,गेंदलाल, शिव कुमार दीपक, दुर्गा प्रसाद पारकर, सीताराम श्याम, प्रदीप कुमार दीप, फकीर राम साहू,पुरषोतम अनाशक्त------

आदि के आलावा अउ कतको कलम के सिपाही मन छत्तीसगढ़ी भाषा मा उत्कृष्ट काव्य सृजन करिन अउ करत हे, ये समय के साहित्य मा सबे रस रंग के संगे संग सबे कलेवर के रचना खोजे जा सकत हे, जे वो समय के सामाजिक, राजनीतिक अउ आर्थिक दशा दिशा ला देखाय बर सक्षम हें, आवन इही काल के कुछ कवि मनके काव्य  पंक्ति देखथन


*नवा बिहान के आरो मा विद्याभूषणमिश्र जी लिखथें*

आही किरन सकेले मोती, सुरूज़ चढ़ही छान्ही मा।

घाट-घठौधा लिखै प्रभाती, देखा फरियर पानी मा।

उषा सुंदरी हर अकास मा

कुहकू ला बगराये हे।

दुख के अंधियारी ला पी के

सुख-अंजोर ला पाये हे ।

का अंतर हातै चंदा मा, अउ बीही के चानी मा।

आही किरन सकेले मोती, सुरूज़ चढ़ही छान्ही मा।


*हँसी खुशी मंगल कामना मया मीत के गीत धरे हरि ठाकुर जी लिखथें*

आज अध-रतिहा मोर फूल बगिया मा

आज अध-रतिहा हो

चन्दा के डोली मा तोला संग लेगिहव

बादर के सुग्घर चुनरिया मा रानी

आज अध-रतिहा हो

आज अध-रतिहा मोर फूल बगिया मा

आज अध-रतिहा हो


*सुराज मिले के बाद घलो आम जन के स्थिति बने नइ रिहिस, उही ला इंगित करत भगवती सेन जी लिखथें*-

अपन देश के अजब सुराज

भूखन लाघंन कतकी आज

मुरवा खातिर भरे अनाज

कटगे नाक, बेचागे लाज

कंगाली बाढ़त हे आज

बइठांगुर बर खीर सोंहारी

खरतरिहा नइ पावै मान,जै गगांन'


*किसान मनके खेती खार ला व्यपारी उधोगपति मनके हाथ बेंचावत, अउ कारखाना के नुकसान बतावत हरि ठाकुर जी कइथे*-

सबे खेत ला बना दिन खदान

किसान अब का करही

कहाँ बोही काहां लूही धान

किसान अब का करही

काली तक मालिक वो रहिस मसहूर

बनके वो बैठे हे दिखे मजदूर।

लागा बोड़ी में बुड़गे किसान –

उछरत हे चिमनी ह धुंगिया अपार

चुचवावत हे पूंजीवाला के लार

एती टी बी म निकरत हे प्रान--


*सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधित्व करत, उन ला जगावत भगवती लाल सेन जी के पंक्ति-*

सिखाये बर नइ लागय।

गरु गाय ला।

बैरी ला हुमेले बर।।

अपने मूड़ पेल गोठ ला, अब झन तानव जी।

चेथी के आँखी ला, आघु मा लानव जी।।


*आजादी के बाद छत्तीसगढ़ ला राज बनाये के सुर घलो कवि मनके कविता मा दिखिन- माखनलाल तम्बोली जी लिखथे--*

नया लहू के मांग इही हे,

छतीसगढ़ ल राज बनाओ ।

बाहिर ले आए हरहा मन,

कतेक चरिन छत्तीसगढ़ ल ।

बाहिर ले आये रस्हा मन,

चुहक डरिन छतीसगढ़ ल ।

शोमन के फादा ल टोर के,

छतीसगढ़ ल चलो बचाओ ।


*छत्तीसगढ़ मा उजास के आरो पावत लूथर मसीह जी लिखथें*

चारों मुड़ा अंधियार,अउ सन्नाटा मं

सुते रहिस छत्तीसगढ़ माई पिल्ला

दिया मं अभी तेल हावय

धीरे धीरे सूकवा उवत हे

पहाटिया के आरो होगे हे

ओखर लउठी के ठक ठक

बिहान होए के संदेशा

छत्तीसगढ़ के आंखी उघरत हे

अपन अधिकार बार लड़त हे

छत्तीसगढ़ मंअब अंजोर होही

अब अंजोर होही ॥


*छत्तीसगढ़ी बोली के गुणगान मा गजानन्द देवांगन जी लिखथें*

हमर बोली छतीसगढ़ी

जइसे सोन्ना-चांदी के मिंझरा-सुघ्घर लरी।

गोठ कतेक गुरतुर हे

ये ला जानथे परदेशी।

ये बोली कस बोली नइये

मान गेहें विदेशी॥

गोठियाय मा त लागधेच

सुने मा घला सुहाथे –देवरिया फुलझड़ी


* जीवन दर्शन ले समाहित संत कवि पवनदीवान के चमत्कारिक कविता*

सब होही राख

राखबे त राख

नई राखस ते झन राख

कतको राखे के कोसिस करिन, नई राखे सकिन।

मैं बतावत हंव तेन बात ल धियान में राख।

तंहूं होबे राख, महूं होहुं राख

सब होही राख।

तेकरे सेती भगवान संकर हा

चुपर लेहे राख।


*मजदूर,किसान बनिहार, दबे कुचले मनके पीरा ला घलो कवि मन अपन कलम मा उँकेरे हे। सुशील भोले जी के काव्य मा रेजा मन के कलपना देखव*

चौड़ी आए हौं जांगर बेचे बार, मैं बनिहारिन रेजा गा

लेजा बाबू लेजा गा, मैं बनिहारिन रेजा गा...

सूत उठाके बड़े बिहन्वे काम बुता निपटाए हौं

मोर जोड़ी ल बासी खवाके रिकसा म पठोए हौं

दूध पियत बेटा ल फेर छोड़ाए हौं करेजा गा

लेजा बाबू लेजा गा, मैं बनिहारिन रेजा गा॥


*हेमनाथ यदु जी समाज मा छाये कलह क्लेश ला देखत लिखथें*

भाई भाई म मचे लड़ाई, पांव परत दूसर के हन

फ़ूल के संग मां कांटा उपजे, अइसन तनगे हावय मन

धिरजा चिटको मन म नइये, ओतहा भइगे जांगर हे। 


*लाला जगदलपुरी जी घलो भीतरी कलह क्लेश ला उजागर करत लिखथें*

गाँव-गाँव म गाँव गवाँ गे

खोजत-खोजत पाँव गवाँ गे।

अइसन लहँकिस घाम भितरहा

छाँव-छाँव म छाँव गवाँ गे।

अइसन चाल चलिस सकुनी हर

धरमराज के दाँव गवाँ गे।

झोप-झोप म झोप बाढ़ गे

कुरिया-कुरिया ठाँव गवाँ गे।

जब ले मूड़ चढ़े अगास हे

माँ भुइयाँ के नाँव गवाँ गे।


*गाड़ी घोड़ा ला संघेरत चितरंजन कर जी लिखथें*

घुंच-घुंच गा गाड़ीवाला, मोटरकार आत हे

एती-ओती झन देख तें, इही डाहार आत हे

तोर वर नोहे ए डामर सड़क हा

तोर वर नोहे गा तड़क-भड़क हा

तोर गाड़ी ला खोंचका-डिपरा मेड-पार भाथे

तोर बइला मन के दिल हे दिमाग हे

कार बपरी के अइसन कहां भाग हे

ओला नइ पिराय कभु जस तोला पिराथे


*आँखी मा सँजोये सपना ला पूरा होय बिना, सुख दुख के परवाह करे बिना, चलत रहे के संदेश देवत परमार जी किखथें*

तिपे चाहे भोंभरा, झन बिलमव छांव मां

जाना हे हमला ते गांव अभी दुरिहा हे।

कतको तुम रेंगाव गा

रद्दा हा नइ सिराय

कतको आवयं पडाव

पांवन जस नई थिराय

तइसे तुम जिनगी मां, मेहनत सन मीत बदव

सुपना झन देखव गा, छांव अभी दुरिहा हे।

धरती हा माता ए

धरती ला सिंगारो

नइ ये चिटको मुसकिल

हिम्मत ला झन हारो

ऊंच नीच झन करिहव धरती के बेटा तुम

मइनखे ले मइनखे के नांव अभी दुरिहा हे।


*लक्ष्मण मस्तुरिया जी गिरे थके के सहारा बनत कहिथे*

मोर संग चलवरे मोर संग चलवरे

वो गिरे थके हपटे मन,अउ परे डरे मनखे मन

मोर संग चलव रे ऽऽमोर सगं चलव गा ऽऽ।

अमरइया कस जुड़ छांव में,मोर संग बैठ जुड़ालव

पानी पिलव मैं सागर अंव,दुख पीड़ा बिसरालव

नवा जोंत लव, नवा गांव बर,रस्ता नव गढ़व रे।

मैं लहरि अंव, मोर लहर मां

फरव फूलव हरियावो,महानदी मैं अरपा पैरी,

तन मन धो हरियालो,कहां जाहू बड़ दूर हे गंगा

पापी इंहे तरव रे,मोर संग चलव रे ऽऽ


*समाज मा व्याप्त निर्ममता ऊपर नारायण लाल परमार जी लिखथें*-

आंखी के पानी मरगे

एमा का अचरिज हे भइया

जेश्वर नइये कन्हिया

हर गम्मत मां देख उही ला

सत्ती उपर बजनिया

आंखी के पानी मरगे हे

अउ इमान हे खोदा

मइनखे होगे आज चुमुक ले

बिन पेंदी के लोटा।


*नवा राज के सपना ला साकार होवत बेरा, जेन स्थिति देखे बर  मिलिस वोला शब्द देवत मस्तूरिहा जी लिखथें*-

नवा राज के सपना, आंखी म आगे

गांव-गांव के जमीन बेचाथे

कहां-कहां के मनखे आके

उद्योग कारखाना अउ जंगल लगाथें

हमर गांव के मनखे पता नहीं कहां, चिरई कस

उड़िया जाथें, कतको रायपुर राजधानी म

रिकसा जोंतत हें किसान मजदूर बनिहार होगे

गांव के गौटिया नंदागे,

नवा कारखाना वाले, जमींदार आगे।


*आजादी जे बाद के हाल ला देखावत मस्तूरिहा जी लिखथें*-

सारी जिनगी आंदोलन हड़ताल हे

आज हमर देस के ए हाल हे

छाती के पीरा बने बाढ़े आतंकवाद

भ्रष्टाचार-घोटाला हे जिनगी म बजरघात

कमर टोर महंगाई अतिया अन संभार

नेता-साहेब मगन होके भासन बरसात

ओढ़े कोलिहा मन बधवा के खाल हे

हमर देस हमर भुंई हमरे सूराज हे

जिनगी गुलाम कईसे कोन करत राज हे

दलबल के ज़ोर नेता ऊपर ले आत हे

भूंई धारी नेता सबों मूड़ी डोलात हे

देस गरीब होगे नेता दलाल हे


*देश के दशा दिशा ला देखत जीवनलाल यदु जी लिखथें*

रकसा मन दिन-दिन बाढ़त हे, सतवंता मन सत छाड़त हें

काटे कोन कलेस ला? का हो गे हे मितान मोर देस ला?

गोल्लर मन के झगरा मं ख़ुरखुंद होवत हे बारी,

चोर हवयं रखवार, त बारी के कइसे रखवारी,

जब ले गिधवा-पिलवा के जामे हे पंखी डेना,

तब ले सत्ता के घर मं बइठे हे वन लमसेना,


*छत्तीसगढ़ राज के संगे संग राजभाषा बर घलो कवि मन कलम चलाइन- छत्तीसगढ़ी भाषा के बड़ाई मा बुधराम यादव जी लिखथें*

तोला राज मकुट पहिराबो ओ मोर छत्तीसगढ़ के भाषा

तोला महरानी कहवाबो ओ मोर छत्तीसगढ़ के भाषा

तोर आखर में अलख जगाथे भिलई आनी बानी

देस बिदेस में तोला पियाथे घाट-घाट के पानी

तोर सेवा बर कई झन ऐसन धरे हवंय बनबासा

ओ मोर छत्तीसगढ़ के भाषा….



*मंहगाई मा किसान मजदूर मनके  पीरा- ,बद्रीविशाल परमानंद जी के काव्य मा*-

खोजत खोजत पांव पिरोगे

नइ मिलै बुता काम

एक ठिन फरहर, दू ठिन लाघन

कटत हे दिन रात

भूक के मारे रोवत-रोवत

लइका सुतगे ना।।

ये मंहगाई के मारे गुलैची

कम्भर टूटगे ना।।


*जीवन दर्शन करावत नरेंद्र देव वर्मा जी लिखथें*

दुनिया अठावरी बजार रे, उसल जाही

दुनिया हर कागद के पहार रे, उफल जाही।।

अइसन लागय हाट इहां के कंछू कहे नहि जावय

आंखी मा तो झूलत रहिथे काहीं हाथ न आवय

दुनिया हर रेती के महाल रे ओदर जाही।

दुनिया अठवारी बजार रे उलस जाही।


*मजदूर बनिहार मनके मन ला पढ़के हेमनाथ यदु जी कहिथें*

सुनव मोर बोली मा संगी

कोन बनिहार कहाथय

कारखाना लोहा के बनावय

सुध्धर सुध्धर महल उठावय

छितका कुरिया मा रहि रहिके,

दिन ला जऊन पहाथय

सुनव मोर बोली मा संगी

कोन बनिहार कहाथय


*किसान मजदूर मनके असल हालत ला देख तुतारी मारत रघुवीर अग्रवाल पथिक जी कइथे*

ये अजब तमाशा, सूरज आज मांगय अंजोर

गंगा हर मराय पियास अउर मांगै पानी ।

या मांगै कहूँ उधार पाँच रूपिया कुबेर

रोटी बर हाथ पसारै, कर्ण सरिख दानी ।1।

बस उही किसम जब जेला कथै अन्न दाता

जो मन चारा दे, पेट जगत के भरत हवै ।

तुम वो किसान के घर दुवार ल देखौ तो

वो बपुरा मन दाना दाना बर मरत हवै ।2।


*गाँव गँवई मा जागरूकता के बिगुल बाजत देख,चेतन भारती जी लिखथें*

निच्चट परबुधिया झन जानव,

गवई-गांव अब जागत हे।

कुदारी बेंठ म उचका के कुदाही,

छाये उसनिंदा अब भागत हे।।

जांगर टोरे म बोहाथे पसीना,

जाके भुइयां तब हरियाथे

चटके पेट जब खावा बनथे,

चिरहा पटका लाज बचाथे ।।

स्वारथ ल चपके पंवरी म,

ढेलवानी रचत, करनी तोर जानत हे ।

मोर गंवई गांव...


*खेती किसानी अउ गांव गँवई के चित्रण करत डॉ बलदेव जी लिखथें*

लगत असाढ़ के संझाकुन

घन-घटा उठिस उमड़िस घुमड़िस घहराइस

एक सरवर पानी बरस गइस

मोती कस नुवा-नुवा

नान्हे-नान्हे जलकन उज्जर

सूंढ़ उठा सुरकै-पुरकै

सींचै छिड़कै छर छर छर

पाटी ल धुन हर चरत हे, खोलत हे

घुप अंधियारी हर दांत ल कटरत हे

मुड़का म माथा ल भंइसा हर ठेंसत हे

मन्से के ऊपर घुना हर गिरत हे झरत हे


*छत्तीसगढ़ी मा गजल के बानगी, गीतकार मेहतर राम साहू के काव्य मा दिखथे, प्रकृति के मानवीयकरण मा कवि के कलम खूब चले हे*

ये रात तोर असन माँग ला सँवारे हे।

बहार तोर असन मुस्की घलो ढारे हे।


*आसा विश्वास के दीया बारत मुंकुंद कौशल जी लिखथें*

आंसू झन टपकावे

सुरता के अंचरा मा

तुलसी के चौंरा मा

एक दिया घर देवे।

मोर लहूट आवट ले

सगुना संग गा लेवे

रहिबे झन लांघन तै

नून भात खा लेव


*जिनगी के बिरबिट अँधियारी रात मा अँजोर के आस जगावत पी सी लाल यादव जी लिखथें*-

चंदा चम-चम चमके, चंदेनी संग अगास म I

जिनगी जस बिरबिट रतिहा, पहावे तोर आस म II

देखाये के होतीस त,

करेजा चान देखातेंव I

पीरा के मोट रा बांध,

तोर हाथ म धारतेंव II

डोमी कस गुंडरी मारे, पीरा बसे हे संस म I

जिनगी जस बिरबिट रतिहा पहावे तोर आस म II


*रामेश्वर वैष्णव जी के रचना 94 के पूरा, पूरा के हाल ला पूरा बयां कर देवत हे*

गंवागे गांव, परान, मकान पूरा मं एंसो

बोहागे धारोधार किसान पूरा मं एसो

सुरजिनहा होईस वरसा त पंदरा दिन के झक्खर

जीव अकबकागे सब्बो के कहे लंगि अब वसकर

भुलागेंन काला काला कथें विहान पूरा मं एसों...

पैरी-सोंढुर महनदी, हसदों अरपा सिवनाथ

खारुन इंद्रावती-मांद, वनगे सव काले के हाथ

लहूट गे जीवलेवा कोल्हान पूरा मं एसों ....

वादर फाटिस, जइसे कंहू समुंदर खपलागे

रातो रात इलाका ह पानी मं ढकलागे

परे सरगे सच विजहा धान पूरा मं एसों..


*जिनगी जिये के मूल मंत्र देवत दानेश्वर शर्मा जी लिखथें*

डोंगरी साहीं औंटियावव तुम, नांदिया जस लहराव

ये जिनगी ला जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव

निरमल झरना झरथय झरझर परवत अउ बन मा

रिगबिग बोथय गोंदाबारी कातिक अघ्घन मा

दियना साहीं बरव झमाझम, कुवाँ सहीं गहिरावव

ये जिनगी ला जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव


*छत्तीसगढ़ के पहचान बासी ला कविता मा बाँधत टिकेंद्र टिकरिहा जी लिखथें*

अइसे हाबय छतीसगढ़ के गुद गुद बासी

जइसे नवा बहुरिया के मुच मुच हांसी

मया पोहाये येकर पोर पोर म

अउ अंतस भरे जइसे जोरन के झांपी

कपसा जड़से दग-दग उज्जर चोला

मया-पिरित के बने ये दासी

छल-फरेब थोकरो जानय नहीं

हमर छतीसगढ़ के ये वासी


*कबीर के उलटबासी के एक बानगी कवि सीताराम साहू श्याम जी के रचना मा देखव*-

बूझो बूझो गोरखना अमृत बानी।

बरसेल कमरा भींजे ले पानी जी।

कँउवा के डेरा मा पीपर करे बासा।

मुसवा के डेरा मा बिलई होय नासा जी।


ये काल मा लगभग सबे विषय मा अनेकों रचना कवि मन करिन, सबे कवि अउ उंखर रचना के जिक्र कर पाना सम्भव नइहे। काव्य के भाव पक्ष अउ पक्ष के घलो कोई तोड़ नइ हे। कवि मनके कल्पना मा ऊँच आगास अउ पाताल के बीच विद्यमान सबे चीज समाये दिखिस। ये काल मा मुकुटधर पांडे जी जइसे मेघदूत के छत्तीगढ़ी मा अनुवाद करिन, वइसने अउ कई  धार्मिक पौराणिक ग्रंथ के अनुवाद होइस।

ये समय सृंगार के प्रेमकाव्य के साथ साथ वीर, करुण, अउ हास्य रस ला घलो कवि मन अपन कविता मा उतरिन। छत्तीसगढ़ी मा हायकू, गजल, बाल साहित्य के बीज घलो देखे बर मिलिस। ये काल मा कवि मनके कविता आम जन के अन्तस् मा गीत बनके समाय लगिस, हरि ठाकुर, प्यारेलाल गुप्त, रविशंकर शुक्ल, लक्ष्मण मस्तूरिहा, नारायण लाल परमार, मेहत्तर राम साहू, राम कैलाश तिवारी, पवन दीवान, द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र, कोदूराम दलित,धरम लाल कश्यप, फूलचंद श्रीवास्तव,चतुर्भुज देवांगन,ब्रजेन्द्र ठाकुर,हेमनाथ यदु, भगवती लाल सेन, मुंकुंद कौशल, रामेंश्वेर वैष्णव,रामेश्वर शर्मा,विनय पाठक जइसे अमर गीतकार मनके गीत रेडियो, टीवी अउ लोककला मंच के कार्यक्रम मा धूम मचावत दिखिस। आजादी के बाद नवनिर्माण के स्वर दिखिस ता नवा राज के सपना घलो कवि मनके कविता मा रिगबिगाय लगिस। किसान, मजदूर, दबे, गिरे, हपटे सबके स्वर ला अपन कलम मा पिरो के सत, सुमता अउ दया मया के पाग धरत कवि मन छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी ला नवा आयाम दिन। गाँव गँवई, शहर, डहर, खेत खार, भाजी पाला,चाँद सूरज, परब तिहार,  पार परम्परा,खेल मेल, दिन रात सबला कवि मन समायोजित करके अतका साहित्य ये दौर मा सिरजन करिन, कि  एको जिनिस कवि मनके कविता ले बोचक नइ सकिस। ये काल मा छत्तीसगढ़ी कविता खूब प्रगति करिस। तात्कालिकता के स्वर घलो समय समय मा मुखर होवत दिखिस। ये दौर मा छत्तीसगढ़ी काव्य कविता वो दौर के समाज के दशा दिशा ला हूबहू देखात दिखथे।


*छत्तीसगढ़ी साहित्य के उड़ान काल(2000 - अब तक)*


सन 2000 मा छत्तीसगढ़ राज बने के बाद कविमन के कविता मन ठेठ छत्तीगढ़िया पन दिखे बर लगिस, छत्तीसगढ़ी भाषा मा सृजन के संख्या वइसने बाढ़िस जइसे फ़िल्म जगत मा छत्तीसगढ़ी फिलिम। पर छत्तीसगढ़ राज बने के पहली घलो  कवि मन के संख्या ला कही पाना सम्भव नइ हे, फेर राज बने के बाद का कहना। जन जन के अन्तस् मा छत्तीसगढ़ राज बनाय के सपना पलत रिहिस ,ओला कवि मन बखूबी ले सामने लाइन, अउ उंखर सपना रंग घलो लाइस। राज बने के बाद छत्तीसगढ़ के कवि मनके कविता मा उछाह के संगे संग छत्तीसगढ़ के सृजन के आरो वइसने दिखे लगिस, जैसे कोनो परिवार नवा घर बनाय के बाद ओमा रहे बर जाथे ता वो घर ला सजाथे सँवारथे। अपन घर ला अपन इच्छानुसार बनाय के उदिम करत कवि मन मनमुताबिक कलम चलाइन अउ आम जन के देखे सपना ला स्वर दिन। *माटी ले लेके घाटी अउ पागा-पाटी ले लेके भँवरा-बाँटी तक के आरो कवि मनके गीत कविता मा रचे बसे लगिस।* उछाह के स्वर के संगे संग आँखी मा दिखत अभाव ला घलो कवि मन समय समय मा कलम मा उकेरत गिन। 

                  *आधुनिक काल के प्रारभिक काल के कवि मन छत्तीसगढ़ी साहित्य गढ़के आसा विश्वास के जोती जलावत साहित्यिक जमीन तैयार करिन ता 1950 के बाद के कवि मन वो जमीन मा धीरे धीरे रेंगत, दौड़े लगिन अउ 2000 के बाद उड़े। फेर वो उड़ान मा 80, 90 के दशक के विज्ञ कवि मन मीनार कस जमीन अउ आसमान दूनो मा दिखिन ता नवा जमाना के नवा रंग मा रंगे नवकवि मन पतंग बरोबर उड़ावत। *फेर यदि छत्तीसगढ़ महतारी के हाथ मा भाव के डोर धरा के उड़ाय ता येमा कोनो बुराई घलो कहाँ हे, महिनत अउ मार्गदर्शन के मॉन्जा वो डोर ला एक दिन जरूर मजबूती दिही,अउ अइसने होवत घलो हे।  ये काल मा पत्र पत्रिका, रेडियो,टीवी, गोष्ठी अउ कवि मंच मा कविता के प्रस्तुति के अलावा एक नवा सहारा सोसल मीडिया के मिलिस। 


   सोसल मीडिया के आय ले कवि के संख्या अउ कविता के संख्या जनमानस तक जादा ले जादा पहुँचे लगिस। ये काल मा सियान मनके सियानी गोठ अउ लइका मनके लड़कपन दुनो प्रकार के साहित्य देखे बर मिलिस। *नेकी कर दरिया मा डार* के हाना, सोसल मीडिया के आय ले बदलत दिखिस, *कुछु भी कर- फेसबुक, वाट्सअप, ब्लाग या अन्य नवा माध्यम मा डार* ये चले लगिस अउ अभो चलत हे, येमा कवि मन घलो पीछू नइ हे। सोसल मीडिया के लाइक कमेंट ला कवि मन कविता के सफलता मानत दिखिन। रोज लिखे अउ दिखे के चलन बाढ़गे। साहित्य के सेवा अउ समर्पण मा स्वान्तः सुखाय अउ स्वार्थ के स्वर घलो सुनाय लगिस। कविता कहूँ करू हे, ता वो साहित्य कइसे? फेर बैरी जे लात के भूत ए वो बात मा कहाँ मानथे। तेखरे सेती पदोवत पाकिस्तान अउ आन बैरी बर अइसने सुर घलो देखे बर मिलिस। नवा जोश अउ नवा उमंग लिये आगास मा उड़ावत सतरंगी पतंग ला बछर 2016 मा छ्न्द के छ नामक एक अइसन आंदोलन रूपी माँजा डोर मिलिस, जे उन ला छत्तीसगढ़ी भाँखा महतारी ले बाँध के रखिस। जुन्ना शास्त्रीय विधा छ्न्द खूब जोर पकडिस, सबे के रचना मा छंद के विविधता दिखे लगिस, ऐसे नही कि छत्तीसगढ़ी मा पहली पँइत छंद दिखिस, एखर पहली घलो धनी धरम दास जी, पं सुन्दरलाल शर्मा,सुकलालपाण्डेय, प्यारेलाल गुप्त, कपिलनाथ मिश्र, नरसिंह दास,जनकवि कोदूराम दलित, लाला जगदलपुरी, विमल पाठक, विनय पाठक, केयर भूषण, दानेश्वर शर्मा, मुकुन्द कौशल, लक्ष्मण मस्तुरिया, हरि ठाकुर नरेन्द्र वर्मा,बुधराम यादव आदि कवि मन घलो कुछ चर्चित छ्न्द मा काव्य सिरजाइन। फेर दुनिया ला छन्द प्रभाकर अउ काव्य प्रभाकर जइसे हजारों छन्दमय पुस्तक संग्रह देवइया छत्तीसगढ़ के छन्दविद जगन्नाथ प्रसाद भानू जी, छ्न्द के छ के माध्यम ले,वो दिन मान पाइस, जब छत्तीसगढ़ी भाषा मा छ्न्द के विविधता दिखिस। ये काल मा सौ ले आगर छंद मा कवि मन कविता रचिन, अउ रचते हें। छ्न्दमय रचना के साथ कवि मनके कविता के कला पक्ष बेजोड़ होय लगिस। शब्द के सही रूप, वर्णमाला के बावन आखर, यति गति के संगे संग काल,वचन,लिंग अउ पुरुष जइसे व्याकरण पक्ष मा सुधार आइस। कविता नवा कलेवर लिए, जमीन ले जुड़े दिखिस। तात्कालिकता के स्वर प्रखर होइस, नवा नवा आधुनिक जिनिस अउ जुन्ना कुरीति के विरोध के स्वर घलो गूँजे लगिस। छ्न्द अतका जोर पकड़े लगिस कि हिंदी के लिखइया मन घलो नाना छ्न्द मा हिंदी मा रचना करिन। छत्तीसगढ़ के लगभग सबे कोती छन्द गुंजायमान दिखिस, चाहे कवि मंच, पत्र, पत्रिका, रेडियो, टीवी होय या फेर फेसबुक या वॉट्सप। सोसल मीडिया के सदुपयोग करत छत्तीसगढ़ के लगभग सबे जिला के कवि मन छंदविधा के ऑनलाइन क्लास ले जुड़के, छ्न्द सीखत अउ सिखावत हे, ये आंदोलन मा जुड़े छंदकार मनके काव्य रचना घलो तात्कालिक समाज के दशा दिशा ला  इंगित करत दिखथे। नवा छन्दक्रांति मा समसामयिकता के स्वर के संग परम्परा संस्कार अउ सँस्कृति के पाग समाये हे। मन के उड़ान ला मात्रा मा बाँधत भले भाव मा कुछ कसर दिख जही, पर विधान के बगिया बरोबर सजे दिखथे, महज चार पांच साल मा छ्न्द के गति देखते बनथे, जमे छ्न्दकार मन अनुभव  अउ महिनत के सांचा मा ढलत ढलत कविता सृजन ला नया आयाम दिही। आज  निमगा छन्दबद्ध कविता संग्रह छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत मा होय के चालू होगे हे। दर्जन भर ले आगर साहित्य लोगन के हाथ मा पहुँच चुके हे अउ दर्जन भर पुस्तक छपे के कगार में हे,जनकवि दलित जी के छ्न्द बर देखे सपना ला उंखर सुपुत्र अरुण निगम जी साक्षात करत हे। छ्न्द के छ के प्रभाव ले छत्तीसगढ़ी साहित्य मा शब्द लेखन के एकरूपता सहज दिखत हे। 


                              80,90 के दशक मा लिखइया  दशरथ लाल निषाद विद्रोही, लक्ष्मण मस्तूरिहा,रामेश्वर शर्मा, रामेश्वर वैष्णव,डॉ पीसी लाल यादव, जीवन यदु,सुशील यदु, सुशील वर्मा भोले,मुकुण्द कौशल,गोरेलाल चंदेल,बंधुवर राजेश्वर खरे, परदेशी राम वर्मा, बिहारी लाल साहू, बलदेव भारती, चेतन भारती, शिवकुमार दीपक, गणेश सोनी प्रतीक, डुमनलाल ध्रुव, दुर्गाप्रसाद पारकर, सीराराम साहू श्याम, विशम्भर दास मरहा, फागूदास कोसले,नूतन प्रसाद शर्मा, बोधनदास साहू, केशव सूर्यवानी केसर,दादूलाल जोसी, रेवतीरमण सिंह, दुकालूराम यादव,  राधेश्याम सिंह राजपूत, कौशल कुमार साहू,स्वर्णकुमार साहू, लतीफ खान लतीफ, स्वराज करुण, शिवकुमार अंगारे, वीरेंद्र चन्द्र सेन,गौरव रेणु नाविक,केदारसिंह परिहार, मैथ्यू जहानी जर्जर, प्यारेलाल देशमुख, सनत तिवारी, लखनलाल दीपक,अजय पाठक, बदरीसिंह कटरिहा, रामरतन सारथी, डाँ शंकर लाल नायक, रमेश सोनी,सीताराम शर्मा,नेमीचंद हिरवानी, आचार्य सुखदेव प्रधान, गिरवर दास मानिकपुरी, आनंद तिवारी पौराणिक, पुनुराम साहू, राकेश तिवारी,हबीब समर,डॉ मानिक विश्वकर्मा नवरंग,टिकेश्वर सिन्हा, डॉ दीनदयाल साहू,रनेश विश्वहार, शिवकुमार सिकुम, देवधर दास महंत, लखनलाल दीपक, धर्मेंद्र पारख,सन्तराम देशमुख, गणेश साहू,राघवेंद्र दुबे, महेंद्र कश्यप राही, गणेश यदु, के आलावा अउ कतको वरिष्ठ कवि मन नवा राज बने के बाद वो समय के नव कलमकार मन संग साहित्यिक सृजन ला गति दिन। जिंखर कविता मा सुख के आहट के संगे संग वो सुख ला पाय बर करे उदिम सहज झलकत रिहिस। 

                राज बने के बाद  घलो सरलग छत्तीसगढ़ी रचना ला गति देवत केशवराम साहू, सुरेंद्र दुबे, रामेश्वर गुप्ता, मोहन श्रीवास्तव, अशोक आकाश, अरुण कुमार निगम, डॉ एन के वर्मा, नरेंद्र वर्मा,कुबेरसिंह साहू, ऋषि वर्मा बइगा, कृष्णा भारती, सन्तोष चौबे, अनिरुद्ध नीरव,कान्हा कौशिक, शीलकान्त पाठक,चैतराम व्यास,चन्द्र शेखर चकोर, लोकनाथ आलोक,प्रवीण प्रवाह, वीरेंद्र सरल, नन्दकुमार साकेत, वैभव बेमेतरिहा, दिनेश चौहान, डॉ अनिल भतपहरी, डाँ नगेन्द्र कश्यप, रूपेश तिवारी, मुरलीलाल साव,प्रदीप ललकार,बलदाऊ राम साहू, महामल्ला बन्धु, कृष्ण कुमार दीप, शंभूलाल शर्मा बसंत, टी आर कोसरिया, गया प्रसाद साहू,लोकनाथ साहू,इकबाल अंजान,उमेश अग्रवाल, भागवत कश्यप, महावीर चन्द्रा, कृष्ण कुमार चन्द्रा, फत्ते लाल जंघेल, रामनाथ साहू,फकीरप्रसाद फक्कड़ राजीव यदु, दशरथ लाल मतवाले, रामरतन खांडेकर, सन्तोष चौबे, ओम यादव, शंकर नायडू,आत्माराम कोसा, दिनेश दिव्य, दिनेश गौतम, गिरीश ठक्कर,चिंताराम सेन,शशिभूषण स्नेही,  अशोक चौधरी रौना, श्रवण साहू,लखनलाल दीपक, वीरेंद्र तिवारी,,धर्मेंद्र पारख, डॉ विनयशरण सिंह,हेमलाल साहू, रमेश कुमार सिंह चौहान, सुनील शर्मा नील, सूर्यकांत गुप्ता कांत, मिथिलेश शर्मा, लोचन देशमुख, देवेंद्र हरमुख,मिलन मिलरिया, चोवाराम वर्मा बाद, गजानंद पात्रे, दिलीप कुमार वर्मा, कन्हैया साहू अमित, आसकरण दास जोगी, सुखन जोगी,ग्यानू दास मानिकपुरी, मनीराम साहू मिता,जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया, मोहनलाल वर्मा, हेमंत मानिकपुरी, दुर्गाशंकर ईजारदार, अजय अमृतांशु, सुखदेव सिंह अहिलेश्वर,आर्या प्रजापति, मोहन कुमार निषाद, महेतरू मधुकर, संतोष फारिकर, तेरस राम कैवर्त, पुखराज यादव, सुरेश पैगवार,ललित साहू जख्मी, श्रवण साहू, बलराम चंद्राकर, पुष्कर सिंह राज,राजेश कुमार निषाद, अरुण कुमार वर्मा,अनिल जांगड़े गौतरिहा, जितेंद्र कुमार मिश्र, पोखन जायसवाल, दिनेश रोहित चतुर्वेदी, जगदीश कुमार साहू हीरा, कौशल कुमार साहू, तोषण चुरेंद्र, पुरुषोत्तम ठेठवार, विद्यासागर खुटे, परमेश्वर अंचल, बोधनराम निषादराज, मथुरा प्रसाद वर्मा, राजकिशोर धिरही,रामकुमार साहू, दीनदयाल टंडन, गुमान प्रसाद साहू,बालक दास निर्मोही, कुलदीप सिन्हा, राम कुमार चंद्रवंशी, महेंद्र कुमार माटी, अनिल पाली, धनसाय यादव, ईश्वर साहू आरुग,गजराज दास महंत,अशोक धीवर जलक्षत्री, राधेश्याम पटेल, सावन कुमार गुजराल, उमाकांत टैगोर, राजकुमार बघेल, नवीन कुमार तिवारी, निर्मल राज, योगेश शर्मा, दीपक कुमार साहू, दिनेश कुमार साहू, द्वारिका प्रसाद लहरें, संदीप परगनिहा, महेंद्र कुमार बघेल, युवराज वर्मा, हीरालाल गुरुजी समय, अनुभव तिवारी, ईश्वर साहू बंधी,अश्वनी कोशरे, चंदेश्वर सिंह दीवान, ज्वाला प्रसाद कश्यप, धनराज साहू, संतोष कुमार साहू,केशव पाल, नेमन्द्र कुमार गजेंद्र, लक्ष्मी नारायण देवांगन, कमलेश वर्मा, जितेंद्र कुमार निषाद, श्लेष चंद्राकर, अमित टंडन, योगेश कुमार बंजारे, तोरण लाल साहू, दीपक कुमार निषाद, देवेंद्र पटेल,भागवत कुमार साहू,बृजलाल दावना, लालेश्वर अरुणाभ,लीलेश्वर देवांगन, हरीश अष्ट बंधु, तेज राम नायक, अनिल सलाम, विजेंद्र वर्मा, मोहनदास बंजारे, जितेंद्र कुमार साहिर, मनोज कुमार वर्मा,डमेन्द्र कुमार रौना, अमृत दास साहू, एकलव्य साहू, ओम प्रकाश साहू अंकुर, गोवर्धनप्रसाद परतेसी, धनराज साहू खुज्जी, नंदकुमार साहू नादान,मनीष साहू ,रमेश कुमार मंडावी ,राजकुमार चौधरी, शिव प्रसाद लहरें, शेरसिंह परतेती,अशोक कुमार जायसवाल, कमलेश मांझी, चंद्रहास पटेल, टिकेश्वर साहू,दीपक तिवारी, नारायण प्रसाद वर्मा, पूरनलाल जायसवाल, रिझे यादव,सुरेश निर्मलकर,भाग बली उइके, अजय शेखर नेताम,अनुज छत्तीसगढ़िया,चेतन साहू खेतिहर, तिलक लहरें,राकेश कुमार साहू,देवचरण धुरी, मनोज यादव,आशुतोष साहू, डीएल भास्कर, दूज राम साहू, धर्मेंद्र डहरवार, नंद किशोर साहू, नागेश कश्यप, नारायण प्रसाद साहू, प्रदीप कुमार वर्मा, भागवत प्रसाद, रमेश चोरिया, महेंद्र कुमार धृत लहरें, रवि बाला राजपूत, राजेंद्र कुमार निर्मलकर,रोशन लाल साहू, डीलेश्वर साहू, दिलीप कुमार पटेल, नेहरू लाल यादव, पूनम साहू,भीज राज वर्मा,मुकेश उइके, राज निषाद, वीरू कंसारी, शीतल बैस, केदारनाथ जायसवाल, कृष्णा पारकर, अखिलेश कुमार यादव, दयालु भारती, दुष्यंत कुमार साहू, द्रोण कुमार सार्वा, भलेंद्र रात्रे, मनीष कुमार वर्मा, सांवरिया निषाद, चूड़ामणि वर्मा, बाल्मीकि साहू के आलावा अउ कतको नवा जुन्ना जमे कवि  मनके कविता अउ रचित काव्य संग्रह मन ला पढ़ सुन के आधुनिक कालिन कविता के दशा दिशा ला देखे जा सकत हे। 

                   आवन इही में के कुछ नवा अउ जुन्ना दूनो प्रकार के कवि  मन के कविता के बानगी ला देखथन--

* छत्तीसगढ़ राज मा नवा बिहान देख डाँ बलदेव प्रसाद जी लिखथें*

आज सुमत के बल मा संगी, नवा बिहनिया आइस हे

अंधवा मनखे हर जइसे, फेर लाठी ल पाइस हे

नवा रकम ले नवा सुरूज के अगवानी सुग्घर कर लौ

नवा जोत ले जोत जगाके , मन ला उञ्जर कर लौ

झूमर झूमर नाचौ करमा, छेड़ौ ददरिया तान रे

धान के कलगी पागा सोहै, अब्बड़ बढ़ाए मान रे

अनपुरना के भंडारा ए, कहाँ न लांघन सुर्तेय 

अपन भुजा म करे भरोसा, भाग न ककरो लुर्टेय

 हम महानदी के एं घाटी म कभू न कोनो प्यास मरँय

रिसि-मुनि के आय तपोवन, कभू न ककरो लास गिरय


*माटी के काया ला माटी महतारी के महत्ता बतावत डाँ पीसी लाल यादव जी लिखथें*

जमीन ले जे छूटगे, जर जेखर टूटगे।

तेखर का जिनगी ? करम ओखर फूटगे।।

महतारी के अंचरा,अउ माटी के मान ।

एखर आगू लबारी,दुनिया के सनमान।।

मयारु जेखर छूटगे,छंईहा जेखर टूटगे।

तेखर का जिनगी ? करम ओखर फूटगे।।


*अपन राज के आरो पावत मजदूर किसान बनिहार मन सालिकराम अग्रवाल शलभ जी के जुबानी कहिथें*

मालिक ठाकुर मन के अब तक, बहुत सहेन हम अत्याचार

आज गाज बन जावो जम्मो छत्तीसगढ़ के हम बनिहार।

बरसत पानी मां हम जवान,खेत चलावन नांगर

घर-घुसरा ये मन निसदित के, हमन पेरन जांगर

हमर पांव उसना भोमरा मां, बन जाथे जस बबरा

तभो ले गुर्रावे बघवा कस, सांप हवैं चितकबरा।

इनकर कोठी भरन धान से, दाना दाना बर हम लाचार 


*बानी रूपी ब्रम्ह के महत्ता बतात,गुरतुर गोठ गोठियाय बर काहत सुकवि बुधराम यादव जी लिखथें*

सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के

अंधरा ला कह सूरदास अउ नाव सुघर धर कानी के

बिना दाम के अमरित कस ये

मधुरस भाखा पाए

दू आखर कभू हिरदे के

नई बोले गोठियाये

थोरको नई सोचे अतको के दू दिन के जिनगानी हे

सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के


*कवि समाज के दशा दिशा ला दिखइया दर्पण होथे, फेर कभू कभू जनमानस के रीस घलो सहे बर लगथे, इही ला सुशील भोले जी लिखथें*

हमन,कवि आन साहेब

कागज-पातर ल रंगथन 

अउ कलम ल बउरथन

कभू अंतस के गोठ

त कभू दुखहारी के रोग

कभू राजा के नियाव 

ते कभू परजा पीरा

उनन-गुनन नहीं

कहि देथन सोझ.

एकरे सेती,कोनो कहि देथे जकला

कोनो बइहा,त कोनो आतंकी

या अलगाववादी

कभू-कभू ,देश अउ समाजद्रोही घलो

फेर दरपन के कहाँ दोस होथे

वो तो बस,जस के तस देखा देथे

ठउका कवि कस

आखिर दूनों के सुभाव तो

एकेच होथे.


 *नवा आसा विश्वास धरे मया के बँधना मा बँधत वरिष्ठ गजलकार अउ कवि माणिक विश्वकर्मा ' नवरंंग ' जी लिखथें*-

गंगा बारु मोर सँगवारी मितान।

होही छत्तीसगढ़ के नवा बिहान।।

जीयतभर निभाबो बदना के रीत।

मया के बँधना म बँधे रहिबो मीत।

मिलही सब्बो झन ल न्याय अउ निदान।।


*बेटी जनम होय मा समाज के मायूसी ला देखावत दुर्गाप्रसाद पारकर जी लिखथें*

घर म नोनी अँवतरे ले 

रमेसर रिसागे 

अब तोला घर ले निकालहूँ 

कहिके 

अपन गोसइन बर खिसियागे 

रमेसर के रिसई ल देख के 

ओकर संगवारी किहिस -

सुन रमेसर 

रिस खाय बुध 

अउ बुध खाय परान, 

तँय अतेक 

काबर होवत हस हलाकान ? 

माँगे म बेटा अउ 

हपटे म धन नइ मिलय 

माँगे म बेटा मिल जतिस त

दुनिया म बेटिच नइ रहितिस 

अब तिहीं बता 

जब बेटिच नइ रहितिस 

त ए दुनिया ह 

आगू कइसे बढ़तिस


*छत्तीसगढ़ माटी के गुणगान करत गीतकार रामेश्वर शर्मा जी लिखथें*-

एक सुमत हो घर अंगना ले बाहिर सब ला आना हे।

छत्तीसगढ़ ला सरग बना माटी के करज चुकाना हे।।

गरब करन सब ये माटी म खनिज संपदा हावय।

तांबा, लोहा, सोना, कोयला, सिमेंट, हीरा हावय।

महानदी, शिवनाथ, हसदो, इन्द्रावती, बोहावय।

मिहनत के फल हरियर सोना लहर लहर लहरावय।

छत्तीसगढ़ के गौरव-गाथा चारो अंग बगराना हे।।


*लाला फूलचंद श्रीवास्तव द्वारा रचित काव्य पंक्ति*

अइसन जनितेंव मंय चंदैनी जनम होईहंय चदैनिन हो

ललना कारी कलोरिया दुहवइतेंव मंय चंदैनी नहवइतेंव हो

मक्खन उबटन चंदन केसर चंदन हो

ललना जुरमिल सजाबो फूल सेज

मंय ललना झुलइतेंव हो...


*कथे कि गोदना धन बरोबर अमर लोक जाथे, गोदना परम्परा ला अपन कविता मा लेवत राम रतन सारथी जी कथें*

तोला का गोदना ला गोदंव ओ,

मोर दुलउरिन बेटी

नाक गोदा ले नाक मा फूली,

माथ गोदा ले बिंदिया।

बांह गोदा ले बांह बहुटिया,

हाथ गोदा ले ककनी।

तोला का गोदना...


*गेंदराम सागर जी द्वारा आसाढ़ महीना के चित्रण अउ छानी टपरे के एक बानगी देखव*

ओगरम गय हे करियेच करिया पल्हरा हे बउछाए।

खुमरी ओढ़े चढ़ गए डोकरा छानी म कउवाए।।

तरिया भर-भर पानी भर गय मेड़ पार म पोहे,

गगन-मगन हो हांसय नरवा-नरवा ल मोहे,

खेत-खार सब कुलकय नदिया सन्नाए बउराए।

खुमरी ओढ़े चढ़ गए डोकरा छानी म कउवाए।।


*सीताराम शर्मा जी नवा राज पाय जे बाद गाँव गँवई मा घलो नवा बिहान के आरो लेवत, जैविक खातू बनाये बर प्रेरित करत कहिथें कहिथें*

हम अपन गांव ल स्वर्ग बनाबो।

सुत उठ धरती ल शीश नवाबो

बड़े बिहान ले कमाये बर जाबो

कचरा घुरवा सबै ल जोरिके

गहिरा डबरा गांव बाहिर म खनिके

गोबर खाद बनाबो, अपन गांव ल स्वर्ग बनाबो।।


*छत्तीसगढ़ राज मा सुमता के आरो लेवत

सुखनवर हुसैन ' रायपुरी ' जी लिखथें*-

आंखी मिचका के मनखे ह मुंह फेरथे,

कोनो बछ्छर त ओ गोठ सुनही हमर।

हल चलाबो पछीना बहाबो अपन,

देखहू खेत सोनहा उगलही हमर।

ए हमर राज हे छत्तीसगढ़ राज हे,

सच कहंव अब इहां मान होही हमर।


*गीतकार,व्यंग्यकार रामेश्वर वैष्णव जी अपन अंदाज मा शब्द संजोवत कहिथें*

असली बात बतांव गिंया।

घाम मं होथे छांव गिंया।।

लबरा जबड़ गियानी हे,

मैंहर नइ पतियांव गिंया।

दुनिया मं मोर नांव हवय,

न इ जानय मोर गांव गिंया।

हें उकील उठलंगरा मन,

कैसे होय नियाव गिंया।

टेड़गामन सब झझकत हें

सिधवा मोर सुभाव गिंया।

पीठ पिछू गारी देथंय, 

आगू परतें पांव गिंया।

कांव कांव मांचे हावय,

अब मैं कइसे गांव गिंया।

मोला जिंहा बुलांय नहीं,

उंहा कभू नइ जांव गिंया।


*वरिष्ठ गीतकार पाठक परदेशी जी देश मा जान लुटाये शहीद मन जे सुरता करत लिखथें*-

सुरता रहि रहि शहीद के आथे।

भाव मन म देशभक्ति के जगाथे।।

होम देथे हाँसत-हाँसत, चढ़े अपन जवानी ल।

लिख देथे लहू के लाली, बलिदान के कहानी ल।।

मरके अमर होये के रद्दा देखाथे।।


*प्रोफेसर राजन यादव छत्तीसगढ़ महतारी ला भाव पुष्प अर्पित करत लिखथें-*

खूब कमावा अन उपजावा धर लव नांगर तुतारी ल।

घेरी-बेरी बंदत हवँ मैं छत्तीसगढ़ महतारी ल।।

राम करिन परतिग्या जिहाँ ओ सरगुजा के टेकरी  ल,

रतनपुर महमाई ल सुमिरौं शिवरीनारायेन सँवरी ल,

डोंगरगढ़ पीथमपुर राजिम रइपुर के दुधाधारी ल।

घेरी-बेरी बंदत हवँ मैं छत्तीसगढ़ महतारी ल।।


*आयुर्वेदाचार्य डॉ. सन्तराम देशमुख ' विमल ' दुख अउ अभाव के जिनगी ला घलो सुख मानत, उही मा जीये बर काहत लिखथें*-

जिनगी के सबो बीख हा, बनगे हय अमरीत।

जम्मो बिपदा ल गढ़-गढ़ के, लिख डारेंव मँय गीत।।

रद्दा खोजत तरिया, भारी मरत पियास,

हपटत गिरत रहेंव तब ले, नइ पायेंव बिसवास,

मोर मन हर पीरा सो जोरे, हावै सुघ्घर पिरीत।

जिनगी के सबो बीख हा, बनगे हय अमरीत।।


*बचपना के खेल मेल ला शब्द देवत शशि भूषण स्नेही जी लिखथें*

टायर के चक्का ल चलावन

तरीया म जाके धूम मचावन

जिंहाँ मन करे सुछिंदा घुमन

बेरा देखे बिना न घंटा ल गिन

कहाँ गय ओ सुग्घर दिन |

खेले हन डँडा-पचरँगा खेल

पैरा म भूँज के खावन  बेल

सोना चाँदी ल महँगा रहिस

हमर लकरी,लोहा अउ टीन

कहाँ गय ओ सुग्घर दिन |

जाड़ के मौसम म भुर्री तापन

चीरहा पेंट ल सीलन-कापन

पीपर पान के मोहरी बना के

बजावन जइसे सँपेरा के बीन

कहाँ गय ओ सुग्घर दिन |



*छंद के छ के  संस्थापक अरुण कुमार निगम जी, कटत रुख राई अउ ओखर अभाव मा होय समस्या ला इंगित करत,निवारण बर पेड़ लगाय के किलौली करत हरिगीतिका छ्न्द मा कहिथें*-

झन हाँस जी, झन नाच जी , कुछु बाँचही, बन काट के ?

कल के  जरा  तयँ  सोच ले , इतरा नही नद पाट के ।

बदरा  नहीं  बिजुरी  नहीं , पहिली  सहीं  बरखा  नहीं

रितु  बाँझ  होवत  जात हे , अब खेत मन बंजर सहीं।।

झन  पाप  पुन  अउ  धरम ला, बिसरा कभू बेपार मा।

भगवान  के  सिरजाय  जल, झन  बेंच हाट-बजार मा ।।

तँय  रुख लगा  कुछु पुन कमा,  रद्दा  बना भवपार के ।

अपने - अपन   उद्धार  होही   ये   जगत - संसार के  ।।


*संस्कृति अउ संस्कार के बाना बोहे चोवाराम वर्मा बादल जी हा जेठौनी परब ला बरवै छ्न्द मा बाँधत लिखथें*-

कातिक एकादशी के, श्री हरि जाग।

देव मनुज के गढ़थे ,सुग्घर भाग।।

गाँव शहर मा होथे, अबड़ उछाह।

लहरा कस लहराथे, भगति अथाह।।

होथे पावन पूजा, पाठ उपास।

दियना रिगबिग रिगबिग, करय उजास।


*नता रस्ता पार परिवार सब संग जुड़ के रहे के संदेश देवत जलहरण घनाक्षरी मा दिलीप वर्मा जी लिखथें*-

खटिया के चार खुरा, बिना पाटी के अधूरा, 

गाँथबे नेवार कामा, कर ले विचार तँय। 

कहूँ रखे चार पाटी, कतको रहे वो खाँटी, 

बिना खुरा पाबे कहाँ, सोंच ले अधार तँय। 

राख खुरा पाटी सँग, गाँथ ले नेवार तँग, 

सुत फिर लात तान, रोज थक हार तँय।

सुख जिनगी म पाबे,गंगा रोज तें नहाबे, 

नता रिसता ल जोंड़, जिनगी सँवार तँय। 


*गाँव के बदलत रूप ला देख रमेश चौहान जी कुंडलियाँ छ्न्द मा लिखथें*-

घुरवा अउ कोठार बर, परिया राखँय छेक ।

अब घर बनगे हे इहाँ, थोकिन जाके देख ।।

थोकिन जाके देख, खेत होगे चरिया-परिया ।

बचे कहाँ हे गाँव, बने अस एको तरिया ।।

ना कोठा ना गाय, दूध ना एको चुरवा ।

पैरा बारय खेत, गाय ला फेकय घुरवा ।।


 *छत्तीसगढ़ के अमर शहीद वीर नारायण सिंह जी के वीरता ला शब्द मा बाँधत मनीराम साहू मितान जी के आल्हा छंद के एक बानगी*

सन् अट्ठारह सौ छप्पन मा, परय राज मा घोर दुकाल ।

बादर देवय धोखा संगी, मनखे मन के निछदिस खाल ।।

रहिस नवंबर सन्तावन मा, परे रहिस गा तारिक बीस।

सैनिक धरे चलिस इसमिथ हा, तइयारी कर दिन इक्कीस ।।

आग बरन गा ओकर आँखी, टक्क लगा के देखय घूर।

बइरी तुरते भँग ले बर जय, हाड़ा गोड़ा जावय चूर।।

सिंह के खाँडा लहरत देखयँ, बइरी सिर मन कट जयँ आप।

लादा पोटा बाहिर आ जयँ, लहू निथर जय गा चुपचाप।।


*कवि अमित कुमार साहू जी,भारत भुइयाँ ला भाव पुष्प अर्पित करत कुंडलियाँ छंद मा लिखथें*-

भारत भुइयाँ हा हवय, सिरतों सरग समान।

सुमता के उगथे सुरुज, होथे नवा बिहान। 

होथे नवा बिहान, फुलँय सब भाखा बोली।

किसिम किसिम के जात, दिखँय जी एक्के टोली।

कहे अमित कविराय, कहाँ अइसन जुड़ छँइयाँ।

सबले सुग्घर देश, सरग कस भारत भुइयाँ।


*प्लास्टिक कचरा के हानि बतावत राजकुमार बघेल जी रोला छ्न्द मा लिखथें*-

बनगे प्लास्टिक देख, काल ये सब जीवन बर ।

होवत हे उपयोग, फइल गे हवे घरो घर ।।

सड़े गले नइ जान, प्लास्टिक कूड़ा कचरा ।

येकर कर  उपचार, जीव बर होथे खतरा ।।


*भ्रूण हत्या अउ दहेज जइसे कुप्रथा ला ला छोड़े बर सार छ्न्द मा मोहन निषाद जी लिखथें*-

छोड़व अब लालच के रद्दा , झन दहेज ला लेवव ।

बन्द होय ये गलत रीति सब , शिक्षा अइसे देवव ।

होवय बंद भ्रूण के हत्या , परन सबे जी ठानव ।

बेटी बिन जिनगी हे सुन्ना , बेटा इन ला मानव ।।


*नशा के दुष्प्रभाव बतावत अमृतध्वनि छ्न्द मा अशोकधीवर जलक्षत्री जी लिखथें*

नशा नाश के जड़ हरे, येला महुरा जान।

तन मन धन क्षय हो जथे, कहना मोरो मान।।

कहना मोरो, मान आज हे, कतको मरथे।

बात ल धरबे, करनी करबे, तब दुख हरथे।।

कह "जलक्षत्री", खोलय पत्री, तँय देख दशा।

झन गा पीबे, जादा जीबे, अब छोड़ नशा।।


*मोबाइल फोन के महत्ता बतावत हेम साहू छप्पय छंद मा लिखथें*

मोबाइल के देख, हवय महिमा बड़ भारी।

करले सबसे गोठ, बता के दुनिया दारी।

शहर होय या गाँव, सबो मेर लगे टॉवर।

धरै हाथ मा फोन, बढ़े हमरो बड़ पॉवर।

पहुँचे झट संदेश हा, बाँचत हे हमरो समे।

सब मनखे ला देख ले, इहिमे ही रहिथे रमे।


*काल बरोबर हबरे कोरोना ले लड़े बर प्रेरित करत अजय साहू अमृतांशु जी के चौपाई*

कोरोना के अकथ कहानी।

संकट मा सब हिंदुस्तानी।।

मिलके सब झन येला छरबो।

हमर देश ले दुरिहा करबो।।

जब जब लोगन बाहिर जाही

कोरोना ला घर मा लाही।

बंद करव जी बाहिर जाना।

कोरोना ला काबर लाना।।

साफ सफाई राखव घर मा।

कोरोना हा मरही डर मा।।

घेरी भेरी हाथ ल धोना।

तब सिरतो मरही कोरोना।।

मास्क नाक मा होना चाही ।

मुँह ला छूना हवै मनाही।।

तीन फीट के दूरी राखव ।

जब जब ककरो ले तुम भाखव।।


*संविधान के ऊपर विजेंद्र वर्मा जी के मनहरण

घनाक्षरी*

पढ़ के जी संविधान, नीति औ नियम जान,

ऊँच-नीच खाई पाट,सुमता दिखाव जी।

सब ला हे अधिकार, कोनों ला तो झन मार,

भेदभाव के इहाँ तो,भुर्री ला जलाव जी।।

होय सबके उद्धार,अंतस मा हो सत्कार,

देश के विधान सब,बड़ महकाव जी।

नारी के सम्मान बढ़े,नवा-नवा रद्दा गढ़े,

कहत रिहिन हावै,बाबा भीम राव जी।।



*दीपक निषाद जी लालच मा वोट देवइया बर अरसात सवैया मा लिखथें लिखथें*-

लालच मा जनता बिक जावँय, बारिश होय लगै जब नोट के। 

चेत शराब बिगाड़ डरे तब, का चिनहार खरा अउ खोट के। ।

फेर हरै सच जेन खवावय, वो हगवा के रही कल सोंट के। 

देवत आज दयालु बने बड़, लेग जही कल झार रपोट के। 


*शंकर छंद मा पूरन जायसवाल जी,छत्तीसगढ़ के गुणगान करत लिखथें*

महानदी अरपा पैरी सब, करत हें गुणगान।

छत्तीसगढ़ राज हमर हें बड़, पावन अउ महान।।

बाँटत हावँय अँगना अँगना, दया मया दुलार।

होरी देवारी तीजा अउ, हरियाली तिहार।।

नँदिया बइला जाता पोरा, गेड़ी मजेदार।

बाँटी बीरो अउ फुगड़ी के, हवै अलगे शान।

छत्तीसगढ़ राज हमर हें बड़, पावन अउ महान।।

सत के संदेसा देवइया, बबा घासी नाम।

शिवरी राजिम अउ तुरतुरिया, धरम के हें धाम।।

हे सोनाखान के बीर ला, मोर सौ परनाम।

भुँइया खातिर हाँस हाँस जे, तजिन अपन परान।


*भारत माँ के सपूत गाँधी जी बर  विष्णुपद छ्न्द मा विजेंद्र वर्मा जी लिखथें*

भारत माँ के सेवा खातिर,गोली खा मरथे।

वोकर सेती गाँधी जी ला,वंदन सब करथे।।

पहिनय खादी सादा धोती, ज्ञान देय सब ला।

नारी मन ला काहय बापू,नोहव तुम अबला।।

जात पात अउ छुआछूत ला,भारी वो बरजे।

कहना नइ मानय तेकर बर,गाज बने गरजे।।



*सार छंद मा ओमप्रकाश अंकुर जी के भगवान राम ला भक्तिभाव पुष्प*

त्रेता जुग मा लक्ष्मीपति हा, दशरथ सुत कहलाइस ।

कौशल्या के राज दुलारा,  बनके जग मा आइस ।।

तीन लोक के सुग्घर स्वामी, रामचंद्र कहलाथे ।

नित श्रद्धा ले नर नारी अउ , ऋषि -मुनि माथ नवाथे ।।

रामचंद्र के मोहक मूरत ,सीता सुध -बुध खोइस ।

रघुवर हा शिव  धनुष उठाइस, जनक गजब खुश होइस 

बचन पिता के राखे बर गा, राम बनिस बनवासी ।

गंगा तीर निषाद राज के , भागिस दूर उदासी ।।

गजब वीर हे रामचंद्र हा, मंदोदरी बताइस ।

 नइ मानिस लंकापति रावण, कुल ला नाश कराइस ।।

रघुपति मारिस दानव मन ला, भक्तन मन ला तारिस ।

अतियाचार मिटाये खातिर, रावण ला संहारिस ।।


 *भारत वर्ष मा नवनिर्माण के आरो लेवत बलराम चन्द्राकर जी उल्लाला मा कहिथें*

जुलमिल रेंगव साथ ये, बेरा नव निरमान के।

मनुस-मनुस सम्मान के, हिन्द देश जय गान के।।

मुकुट हिमालय देश के, सागर के पहरा हवै। 

युग-युग ले पावन करत, गंगा के लहरा हवै।। 

सत्य अहिंसा न्याय बर, पुरखा तजिन परान ला।

बर्बर दुनिया ले बचा, राखिन हिन्दुस्तान ला।।

ऊँच-नीच के रोग हा, डँसिस फेर ये देश ला।

अइसन अवगुण हा हमर, बाँट डरिस परिवेश ला।।


*छत्तीसगढ़ी काव्य सृजन मा महिला शक्ति*-


 जे राज के आदिकालिन साहित्य के मुहतुर अहिमन रानी गाथा, केवला रानी गाथा, रेवा रानी गाथा, दसमत कयना गाथा आदि विदुषी महिला मन ले होथें, भला वो राज के नारी शक्ति मन काव्य सिरजन मा कइसे पिछवाय रहीं। साहित्य सृजन प्रसव पीड़ा कस होथे, अउ येला नारी शक्ति मन ले जादा भला कोन जान पाही, तभे तो आज नारी शक्ति मन घलो साहित्य सृजन मा अघवा हे। वइसे तो छत्तीसगढ़ी साहित्य के पहली बेर लिखित प्रमाण भक्ति काल मा मिलथे, ये काल मा धनी धरम दास जी मन काव्य सृजन करिन। संग मा उंखर धर्मपत्नी आमीन माता के छत्तीसगढ़ी मा काव्य सृजन के बात घलो सामने आथे। आजादी के पहली छत्तीसगढ़ी के काव्य सृजन मा नारी शक्ति मनके वर्णन नइ मिले, फेर आजादी के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य मा उन मन बढ़ चढ़ के साहित्य सृजन करत दिखथें। लगभग साठ, सत्तर के दशक मा महिला शक्ति मन छत्तीसगढ़ी साहित्य सृजन करे बर लग गे रिहिन।फेर छत्तीसगढ़ राज बने के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य मा नारी शक्ति के योगदान के का कहना। 2000 के बाद के काल ला उड़ान काल बनाये मा नारी शक्ति मनके घलो भरपूर योगदान हे। ये काल मा कवयित्री मन बढ़ चढ़ के छत्तीसगढ़ी भाँखा मा साहित्य सृजन करिन अउ अभो साहित्य सिरजाते हें। सन 1968 मा प्रकाशित छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "पतरेगी" ला छत्तीसगढ़ के पहली कविता संग्रह अउ ओखर रचयिता कवयित्री डॉ निरुपमा शर्मा ला छत्तीसगढ़ी के पहली महिला कवयित्री के रूप मा माने जाथें। इही समय शकुंतला शर्मा जी मन घलो काव्य सृजन करत रिहिन, उंखर प्रथम कृति "चंदा के छाँव मा ढाई आखर"  प्रकाशित होइस। आजो सरलग छत्तीसगढ़ी भाषा मा अपन मन के उदगार ला डॉ निरुपमा शर्मा,शकुंतला शर्मा के संगे संग डाँ शकुंतला तरार, डॉ अनसुइया अग्रवाल, डॉ सत्यभामा आडिल, सरला शर्मा, डॉ शैल चन्द्रा, सुधा वर्मा,उर्मिला शुक्ला, तुलसीदेवी तिवारी,मृणालिका ओझा, आशा दुबे,दीप देवी दुर्गवी,रंजना शर्मा, डॉ गिरिजा शर्मा, अर्चना पाठक,इंद्रा परमार, संतोष झाँझी,वासंती वर्मा, गीता शर्मा, ज्योति गबेल, सुधा शर्मा,संध्या रानी शुक्ला, चन्द्रावती नागेश्वर, सन्तोषी महंत श्रद्धा, गीता साहू,आशा देशमुख, शोभामोहन श्रीवास्तव, शशि साहू,आशा ध्रुव,संध्या सरगम,आशा दुबे, चित्रा श्रीवास,गीता विश्वकर्मा, सुधा शर्मा,लक्ष्मी करियारे, रश्मि रामेश्वर गुप्ता,नीलम जायसवाल,चन्द्र वैष्णव,गीता देवी हिमधर,योगेश्वरी साहू,आशा भारद्वाज, अनिता सिंह, सुधा देवांगन, आशा मेहर, आशा आजाद, द्रौपती साहू सरसिज, इंद्राणी साहू साँची,सरस्वती चौहान,डाँ मीता अग्रवाल, पद्मा साहू पर्वणी,सुधा झा,उर्मिला देवी उर्मी, अनिता मंदिलवार,प्रभा साहू,पुनीता दरियाना, सुनीता कुर्रे, प्रतिभा प्रधान, चित्ररेखा तिवारी, रामकली कारे,सुजाता शुक्ला,सुमित्रा कामड़िया, केंवरा यदु मीरा, तुलेश्वरी धुरन्धर, शैल शर्मा, प्रिया देवांगन प्रियु, मेनका वर्मा, संगीता वर्मा, भारती राजपूत, निर्मला ब्राम्हणी,द्रौपती साहू, प्रियंका गुप्ता, मधुलिका दुबे,भारती पटेल,ममता राजपूत, सरिता लहरे,अनिता चन्द्राकर, जागृति बाघमार,सुखमोती चौहान,धनेश्वरी सोनी गुल, वसुंधरा पटेल, अन्नापूर्णा पवार,सुष्मा पटेल,हिमकल्याणी सिन्हा,कविता वर्मा,गीता चन्द्राकर, सुचि भुवि,जमुना देवी गढ़ेवाल,शैलेन्द्री परिहार,गीता दुबे,दीपाली ठाकुर, दीपिका झा, सीमा साहू,मीना जांगड़े, अन्नापूर्णा देवांगन, रेखा पालेश्वर, गायत्री श्रीवास,लता चन्द्रा,आदि अउ कतको कवयित्री मन व्यक्त करत हें। आवन छत्तीसगढ़ी भाषा महतारी ला समर्पित नारी शक्ति मनके मन के उद्गार के एक बानगी देखिन-


*प्राकृतिक छटा मन मा नव उमंग भर देथे, उही ला डॉ निरुपमा शर्मा जी कहिथें*

मन मउरे मउहा महक मारे ना।

सुरता के हिरना डहक मारे राजा महक मारे ना

दोनु आंखी मा तोला मैं काजर बनाएवं

नदिल गेंदवा मा रे पिरोहिल बैठारेंव ।

एक एक बोली मा चहक मारेव मैना ……..

लाली चूरी टिकली रे लाले हे महाउर

मोहनी आंखी के हे कटारी आमा मउर

हुलकथे जीउ अधिआये डारे मैना......



*सरसी छन्द मा,गोस्वामी तुलसीदास जी ला भाव पुष्प अर्पित करत, शकुन्तला शर्मा जी लिखथें*-

आशा के प्रतीक ए तुलसी धरिस एक अभियान

राम - नाव के पाइस डोगा शकुन देख अउ जान ।

रामचरित आधार बनिस हे जाग शकुन तै आज

पय-डगरी जब मिल जाथे तव सुफल होय सब काज ।

जैसे सोच समझ फल तैसे चिंतन लै आकार

शुभ चिंतन के फल भी शुभ हे देख शकुन हर बार ।

तुलसी राज-धर्म समझाइस शकुन तोर  अधिकार

धर्म - अर्थ चारों ला पा ले भवसागर कर पार ।

मनखे जनम बहुत दुर्लभ हे शकुन बात ला मान

धर्म गली मा चल तुलसी कस तै मत बन अनजान ।

तुलसी - बबा बताइस धरसा शकुन तहू पहिचान

अब दिन बूडत हावै नोनी झट के तंबू तान ।


*शिक्षा के अलख जगावत शकुन्तला तरार जी लिखथें*-

पढ़े बर चल दीदी

पढ़े बर चल बहिनी

पढ़े बर चल वो दाई

 भाग ल हम अपन चमकाबो

पढ़े बर चल वो दीदी

आवो चल कमला तयं

अउ चल बिमला तयं रे...

 मेटाबो अगियानता के अंधियारा ला

 शिक्षा के जोत बारबो रे

नान्हे-नान्हे लईका चलव

बूढ़ी दाई काकी चलव रे...

नईं हम रहिबोन अब अनपढ़ वो

बिद्या के गंगा लानबो रे

बनी भूती हम जाबोन

 ठिहा कमाये जाबोन...

दिन भर मिहनत ला हम करबोन

संझा पढ़े जाबों रे...

अब कोनो नई ठगही

अंगठा हम नई चेपावन रे...

रद्दा खुदे हम अपन गढ़ लेबोन

नवा निरमान करबो रे...


*कोरोनाकाल मा जनजागरण करत आशा देखमुख जी के एक समसामयिक शंकर छंद*

आये हावय कोरोना हा, लोगन बड़ डराय।

फइलत हवय महामारी कस,कोन कहाँ लुकाय।

संसो मा सरकार घलो हे,देत हें संदेश।

जनता ला मिलके लड़ना हे,भागय सबो क्लेश।

सावचेत हें देश प्रशासन ,कोनो झन डराव।

जागरूकता फ़इलावव सब ,सुरक्षा अपनाव।

साफ सफाई बहुत जरूरी,धोवत रहव हाथ।

मेल जोल से दूर रहव सब, देश हावय साथ।।


*पतझड़ जे बाद बहार आथे, दुख के बाद सुख आथे, इही बात ला, घनाक्षरी मा बाँधत शोभामोहन श्रीवास्तव जी लिखथें*-

पाना पतझर मा झरे,आवय तभे बहार ।

दुख पाछू सुख हे लगे,लहुटे पहुटे बार ।।

लहुटे पहुटे बार चलत नर ,लाख जतन कर ।

सुख के चक्कर,दुखद गली धर,कतको मर मर।

छोड़ गाँव घर,कहूँ मेर टर,नइ छोंड़य डर ।

बेरा हे खर,बोलत झरझर, पाना पतझर ।।



*बरवै छंद मा, बढ़े मँहगाई ला देखत शशि साहू जी लिखथें*-

मुँह फारे मँहगाई, सुरसा ताय।

जतका होय कमाई,मुँह मा जाय।

सबो जिनिस हर मँहगी,दुरिहा होय।

काला खाँव बचावँव,जिनगी रोय।

बाई मारय ताना, नइ तो भाय ।

घानी कस मँय बइला रथो फँदाय।

चुहके आमा दिखथे काया मोर।

मँहगाई के आघू, खडे़ धपोर।

अजगर कस फुफकारे,मारय पेट।

सबो जिनिस के बाढे़ हावय रेट।

मँहगाई हर मारे, रोजे लात।

पीठ पेट हर सँघरा रोवय रात।


*अमृत ध्वनि छंदछ्न्द मा पद्मा साहू पर्वणी राखी तिहार बर लिखथें*-

राखी के पबरित परब,  पुन्नी सावन मास।

भाई बहिनी के परब, दया मया के आस ।।

दया मया के, आस जगाथे, राखी धागा ।

बाँध कलाई, प्रीत बढ़ाथे, तब ये तागा।

माथे चंदन, तिलक लगाथे, दुनिया साखी।

बहिनी बाँधय, भाई ला जी, सुग्घर राखी।।


*वीर शहीद मनके सुरता करत सार छ्न्द मा चित्रा श्रीवास जी लिखथें*-

सुरता अब तुम करलव संगी,पावन दिन हा आगे ।

मिले रहिस आजादी हमला ,हमर भाग हा जागे।।

हाँसत झूलत फाँसी चढ़गे, खुदीराम बलिदानी ।

तिलक भगत अउ लक्ष्मी बाई,देइन हे कुर्बानी।।

बेटा भारत माता के सब ,हावन भाई भाई।

मिलजुल रहिबो जम्मो मनखे, होवन नही लड़ाई।।


*रक्तदान ला महादान कहिथें, उही ला बतावत रामकली कारे जी लिखथें*-

जग मा बढ़ के हे सुनौ, रक्त दान के दान।

बूॅद - बूॅद दे रक्त ले, बाॅचय मनखे प्रान।।

बाॅचय मनखे, प्रान रक्त दे, जस ला पावव।

नेक करम के, काम आज गा, कर देखावव।।

कली कहे सुन, मानवता भर, अपनो रग मा। 

सबो दान ले, रक्त दान हा, बढ़ के जग मा।।


*मद्यपान निशेष के संदेश देवत सुधा शर्मा जी कज्जल छंद मा लिखथें*-

करत हवे जिनगी उजाड़।

टूटत सबो घर परिवार ।।

बाढ़त नशा अतियाचार।  

हे समात मन मा विकार।।

गारी दाई बाप देत।  

बोले के गा नहीं चेत।।

कोनो देवत गला रेत।

नशा सेती सबोअचेत।।

छोड़व गा सब नशा पान।

एमा ककरो नहीं मान।।

डहर बने रेंगव मितान।

बनके सबो रहव सुजान।। 

जाँगर टूटत करे काम।

दारू भठ्ठी गये शाम।।

दिए कमाय पइसा फेंक। 

लाँघन लइका घर म देख।।


*कुंडलियाँ छ्न्द मा गुरु वंदना करत नीलम जायसवाल जी लिखथें*-

गुरु के चरण पखार लव, मन ले देवव मान।

गुरु के किरपा ले बनय, मूरख हा गुणवान।।

मूरख हा गुणवान, चतुर की निरमल बनथे।

जेखर पर गुरु हाथ, उही आकाश म तनथे।।

जइसे गरमी घाम, छाँव निक लागे तरु के।

वइसे शीतल होय, बचन हा हरदम गुरु के।



*नवा शिक्षा के लाभ बतावत तातन्क छ्न्द मा आशा आजाद जी लिखथें*-

शिक्षा के अनमोल रतन ले,करलव मन उजियारा जी।

हर विपदा  मा पार  लगाही,मिट जाही अँधियारा जी।।

जम्मो कारज  बन जाथे जी,तुरते हल मिल जाथे जी।

जेखर मन मा ज्ञान दीप हे,जिनगी भर सुख पाथे जी।।

वैज्ञानिक बन जाथे कतको,खोज करें आनी बानी।

जब मशीन नावा खोजे ता,तब कहलाथे ओ ज्ञानी।।

शिक्षा के तकनीक देखले,नव विधि आज पढ़ाये गा।

प्रोजेक्टर  मा  चित्र  देख ले,सबला  देख  बताये गा।।

कम्यूटर  मा  सबो  आँकड़ा,राख  सुरक्षा  दे जानौ।

जनम मरन के कागद लेले,सुग्घर सुविधा ला मानौ।।


*करिया बादर देख पुष्पलता भार्गव लिखथें*-

जा रे, जा रे,करिया बादर

      जा के मुहूँ लुका  रे ...

संगी के सुरता आथे

        करौं में ह का रे...

तैं आथस त मन मा उठथे

     पीरा बिजुरी जइसे ...

का हो जाथे तन अऊ मन ला

     काहव में ह कइसे...

पानी मा तन ह जरगे,उठै गुंगुवा रे

जा रे,जा रे....

वो निर्मोही ,वो परदेसी

    आए नहीं अब ले....

रद्दा देखत पखरा बनगे

    आंखी मोरे कबले...

का जादू करके गे हे,वो टोनहा रे


*चेत धरे बर कहत द्रोपदी साहू सरसिज लिखथें*-

का गरज परे हे दूसर के,

      तिहीं तोर रद्दा ला चतवार।

चर देही हरहा मन खेती,

      तिहीं अपन धनहा रखवार।।

पर भरोसा रहिबे झन तैं ,

      जिनगी अपन तँय संवार।

चेत लगाके बुता करबे,

      होबे झन गंजहा मतवार।।

चील जइसन नेत जमाए,

        बइठे जइसे हे हितवार।

केकरा कस रेंगे दुनो कोति,

      वो मन नो होय तोर लगवार।।


*बेटी मन बर शंकर छ्न्द मा वासंती वर्मा जी लिखथें*-

जनमें भारत मा तँय बेटी,हो गिस धन्य भाग।

आ गे कोरी एक सदी ता,झन रह सुते जाग।।1।।

पढ़ाई के गियान ल बेटी,बना ले तलवार।

बन जा झाँसी के अब रानी,सह झन अत्याचार।।2।।

लड़बे बेटी अपन लड़ाई,ककरो नि कर  आस।

बिजली कस चमकत बेटी तँय,जीत ले अकास।।3।।

इंदिरा कल्पना सरोजनी,जग मा करिन नाम।

बेटी अइसन नाम बढ़ाबे,करके बड़े काम।।4।।


*बसंत पंचमी मा माँ वीणापानी ला भाव पुष्प अर्पित करत गायत्री श्रीवास जी लिखथें*-

सबके मन ला भागे संगी,सुग्घर मौसम आगे  |

ये बसंत पंचमी सुहावन,मन मा आस समागे|

अवतार लिये माँ हंसवाहिनी,वाणी के देवइया हा |

श्वेत वस्त्र ला धारन करथे,मातु शारदा मइया हा ||

मिल-जुल के सब पूजा करबो,हमर भाग हा जागे


*जाड़ा के आरो देवत कावेरी साहू जी लिखथें*-

जाड़ के महिना आगे दाई,जुड़हा हवा चलत हे।

सर-सर धुँकी चलत हे,हाथ अउ गोड़ कँपत हे।।

दाँत हा अइसे कटरत हे,जइसे चना चबावत हे

जूड़ चीज तो छुवन नइ भावय,ताते तात खवाथे।

बासी ला तो दुरिहा रखदे,भाते भात सुहाथे।।

पुरवइया हा मारत रहिथे,करा बरोबर जनावत हे।

गली गली मा भुर्री बरथे ,लइका सब सकलाथे।

कथरी हा तो छोड़न न भाये,जाड़ा गजब सताथे।।

साल स्वेटर छुंटय नहीं अब,सुरुज घलो लजावत हे।


*नेता मनके स्वभाव ला देखावत गीतिका छ्न्द मा प्रिया देवांगन प्रियु लिखथें*

वोट माँगे जाय जब तौ, पाँव लोगन के परे।

हे खड़े जे छाप साथी, हाथ मनखे के धरे।।

देत हे लालच कहत हे, रोड बनवाहूँ बने।

साल भर के दे समय तँय, बोल के छाती तने।।

गाँव मा सब घूमथे अउ, लोभ देवय नोट दे।

काम करहूँ मन लगा के, आज मोला वोट दे।।

रात भर दारू बँटे तब, हे टपकथे लार हा।

मीठ बोली बोलथे अउ, संग बढ़ थे प्यार हा।।

सोच के सब वोट देवव, गाँव के उद्धार हो।

नाम रौशन हो सबो के, संग नैया पार हो।।

हे पढ़े मनखे बने जी, आज ओखर साथ दो।

काम करही मन लगा के, हाथ मा सब हाथ दो।।


*मतगयंद सवैया मा सुधा देवांगन जी लिखथें*-

आगय पावन सावन मास ह,दूध दही म नहावय भोले।

जाप करें उपवास करें, सबके जिबिया शिवशंकर बोले।

देय  बने वरदान ल शंकर, दुःख हरे जिनगी नइ डोले

पीर सबो जन के हरके, शिव नाम दबे सुख भाग ल खोले।

*उपसंहार*-

छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य मा सबले जादा यदि कोनो विधा मा लिखे गेहे ता वो काव्य विधा आय। कवि मनके संख्या घलो दिन ब दिन बाढ़त दिखत हे। आज छत्तीसगढ़ मा अतेक कवि हे, जिंखर रचना अउ नाम के जिक्र कर पाना मुश्किल हे, तभो लेख मा कुछ कवि मनके नाम संघेरे के प्रयास करे हँव, उंखर नाम ला सोसल मीडिया या अन्य उपब्धत पुस्तक या फेर  कोनो पत्र पत्रिका पेज मा खोज करके,पूरा जानकारी लिये जा सकथे। उदाहरण स्वरूप दिये गय कुछ पंक्ति वो कवि अउ वो काल ला पूरा के पूरा बयां करे मा घलो असक्षम हे, तभो एक बागनी देय के प्रयास होय हे। आधुनिक काल के ज्यादातर कवि मन सोशलमीडिया मा जुड़े हे, उंखर रचना मन घलो फेसबुक, वॉट्सप मा दिख जथे, उंखर मनके चाहे तो नाम खोज के पढ़े जा सकत हे, बस अतेक नाम देय के अतके कारण हे। संगे संग एक कारण यहू हे कि वो कवि मन कोन काल मा रचना लिखिन या लिखत हे। काल विशेष मा संरेखाय कवि मनके नाम घलो आघु पाछु हो सकत हे, जइसे आजादी के

पहली के कवि मन आजादी के बाद घलो लिखिन, अउ आजादी के बाद के कवि मन छत्तीसगढ़ राज निर्माण के बाद लिखत रिहिन अउ कतको लिखते हें।

पर मुख्य बात तो आधुनिक काव्य के दशा दिशा ऊपर बात करना रिहिस, आलेख मा  सँरेखाय काव्य पंक्ति एक उदाहरण मात्र हे, जे वो समय ला ज्यादातर परिभाषित करत दिखिन, चाहे बात आदि काल के होय, या आधुनिक काल के। रचना के विषय वस्तु ही वो समय ला देखाथे, आधुनिक काल के समसायिक रचना जइसे कोरोना महामारी, महँगाई, बेमौसम बारिश, चन्द्रयान, शौचालय, चुनाव,धान खरीदी, मोबाइल, प्लास्टिक कचरा,नवा नवा यन्त्र औजार आदि समाज मा चलत वस्तु स्थिति के परिचय देवत दिखथे। नदी, पहाड़, धरती, पाताल, राम कृष्ण , दया मया मीत आदि सब,  आदि काल मा घलो रिहिस अउ आजो यथावत हे, ता स्वभाविक हे आजो येमा रचना होही अउ होवत घलो हे। फेर वो समय मोबाइल, शौचालय, चन्द्रयान आदि कई चीज नइ रिहिस ता नइ होइस। केहे के मतलब कवि के लेखन मा धरातल मा घटत विषय वस्तु के छाप रहिथे। आज आधुनिक काल के रचना ये काल ला दर्पण कस देखाय, एखर बर कवि मन ला समाज मा चलत चीज ला विषय वस्तु बनाके लिखना चाही, ताकि अवइया पीढी मन ये युग ला पढ़ के देख सके। 2000 के बाद के काल ला उड़ान काल केहे के मोर आशय ये हे, कि ये काल के कुछ दशक बाद कवि मनके संख्या अउ काव्य लेखन मा गजब के बढ़ोतरी होइस हे। *"आधुनिक युग के साहित्य मा पंख लग गेहे"* भाषाविद मन आधुनिक काल मा साहित्य के बढ़वार देख  अइसन कहत नइ थके। फेर पंख हे ता उड़ान तो दिखबे करही। आज साहित्य मा उड़ान देखते बनत हे। आज हजारों कवि कवयित्री मन छत्तीसगढ़ी काव्य के सृजन मा सरलग लगे हें।  छ्न्द के छ के आय के बाद  सन 2016 मा उड़ान भरत नव कलमकार मन ला *छ्न्द के छ नामक* एक माँजा डोर मिलिस, जे उन मन ला साहित्य के जमीन मा बाँधे रखिस, जेखर परिणाम स्वरूप आज छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य महतारी भाषा के अन्तस् मा बंधाये ऊँच आगास मा उड़त दिखत हे। यदि ये आंदोलन नइ रहितिस तभो ये काल उड़ान काल हो जतिस, काबर कि नव कलमकार मा साहित्य ला उड़ाय छोड़ खुदे मन के लिखत उड़ित रिहिन। आजो हवाई यात्रा सबले महँगा हे, फेर ओखर उड़े अउ उतरे के ठौर-ठिकाना,तिथि-बार हे तब।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


*संदर्भ*

गूगल सर्च।

छत्तीसगढ़ी कविता कोश।

छंदखजाना।

गुरतुर गोठ, वेब पोर्टल।

छत्तीसगढ़ी भाषा के उद्भव अउ विकास- डाँ नरेंद्र देव वर्मा।

छत्तीसगढ़ी साहित्य के 100 साल- डाँ बलदेव प्रसाद।

छत्तीसगढ़ी व्याकरण विमर्श के निकष पर- डाँ विनोद वर्मा

श्री अरुण कुमार निगम, डाँ पी सी लाल यादव,श्री रामेश्वर शर्मा, श्री दुर्गा प्रसाद पारकर,डाँ मानिकविश्वकर्मा नवरंग, श्री मति आशा देशमुख अउ श्री ओमप्रकाश अंकुर ले फोनिक सलाह।

सबो ला आत्मीय आभार