Tuesday, 1 September 2020

छ्त्तीसगढ़-व्यंग्य

 छ्त्तीसगढ़-व्यंग्य(हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा)

                    एक गांव म स्वस्थ सिसु प्रतियोगिता कराये के घोसना होइस । येमा सरत ये रिहीस के जे लइका हा बिगन खाये पिये स्वस्थ रइहि ..........  सिरीफ उही येमा भाग ले सकत हे । इनाम अऊ सनमान के लालच म कतको मनखे अपन अपन लइका ला धरके पहुंचगे । 

                    पहिली लइका स्टेज म अइस । ओला देखके कन्हो ला बिसवास नी होइस के ..... बिगन खाये पिये ...... कन्हो अतेक स्वस्थ हो सकत हे । मंच तरी खड़े मनखे मन सवाल उठा दिन । ओकर ददा बतइस – मोर लइका हा सहींच म कुछ नी खावय फेर को जनी कइसे सनसनऊंवा बाढ़त हे । तुरते ….. तहकीकात करे गिस । ओमा पता लगिस के लइका के बाप सेठ आय । जेहा दिन भर सिरीफ जमाखोरी करथे । जबले प्रतियोगिता के घोसना होय हे तबले ...... सेठ हा अपन लइका के नाव ला महंगई राख देहे ...... तबले लइका एकदमेच स्वस्थ रहत सनसनऊंवा बाढ़त हे । 

                    दूसर लइका अइस ........। मुहुं म कुछ चभलावत रहय । येहा तो खावत हे कहिके ...... तरी म ठाढ़हे मनखे मन हल्ला करिन । फेर लइका जब मुहुं ला फारिस त ...... कंन्हो ओकर मुहुं म कहींच नी पइन । स्टेज म ओकर ददा चइघगे अऊ बताये लगिस – हमन न खुद खावन  न कन्हो ला खावन देवन । काबर फोकटे फोकट आरोप लगाथव जी ..... ? तहकीकात मे पाये गिस – लइका के बाप बड़े जिनीस साहेब आय । येमन खाथे तो बहुत लेकिन कन्हो सबूत नी छोंड़य ..........। ये साहेब हा अपन लइका के नाव ला जबले भस्टाचार धरे हे तबले ....... लइका हा ......... चभलावत तो दिखथे फेर ओकर मुहुं के भितर खाये के समान नी दिखय । भस्टाचार नाव धरे ले लइका म को जनी काये हमागे ..... ओहा दिन दूना रात चउगुना बढ़हे लागिस ।   

                    तीसर लइका स्टेज म चइघिस । हाथ म खाये के धरे रहय ...... मुहुं म घला गोंजाये रहय । जनता देखत रहय जरूर फेर ........ काकरो मुहुं ले बक्का नी फुटिस । येकर पहिली जनता हा ...... साहेब के लइका उपर खाये के इलजाम लगाके देख डरे रहय ....... जेमा जनताच के थुवा थुवा होय रहय । ये दारी ..... कन्हो के मुहुं ले ....... बिरोध के कंठ नी फूटिस । लइका एकदमेच स्वस्थ रहय । तहकीकात मे पता लगिस ये लइका ........ देस के भविस्य आय । ये नेता के बेटा आय ........ जेमन कतको खाथे ... तेला जानथे अउ देखथे सब्बो झिन ....... फेर आघू म ...... कन्हो डर भय के मारे ......... त कन्हो सुवारथ के मारे ........ कहि नी सकय । केहे के लइक मनखे मन के मुहुं अऊ आंखी ........ पद अऊ पदवी के लालच म तोपाये रहिथे । ये लइका के नाव जबले मुफतखोर धरे रहय ...... तबले येहा नेता के पइसा कस ........ बिगन ज्ञात स्रोत के बाढ़त रहय । 

                  बिजेता के नाव पुकारे बर निर्णायक ले आज्ञा पाके ..... मंच के संचालक जइसे माइक ला धरिस ..... तइसने म तरी ले अवाज अइस - थोकिन रूकव ...... मोरो लइका आवत हे । घोसना रूकगे । ओ मनखे हा अपन लइका धरके चइघिस । लइका दिखत नी रहय । मोटरी म गंठियाके लाने रहय ...... लइका ला । संचालक पूछीस –  लइका ला मोटरी म काबर बांध के राखे हस ? ओ किथे – बाहिर म राखे म डरराथंव के ...... कन्हो कुछु खवा झिन दे साहेब ........ । मोर लइका ला टुंहुं देखइया मनखेमन ....... प्रतियोगिता के घोसना के पाछू ...... जबरन नानमुन चंटाये बर लुहुर टुपुर करत तिरे तिर म ओधत हे । दूसर मन खाथे ते भले नी दिखय ..... फेर मोर लइका हा खाये के समान कोती कननेखी घला देख दिही न ....... त तोर प्रतियोगिता म सामिल होये के पात्रता खो दिही । ओ मनखे हा मोटरी ले लइका ला बाहिर निकालिस .... निच्चटेच दुब्बर पातर ..... हाड़ा हाड़ा दिखत देहें ...... एकदमेच गरहन तिरे कस दिखत रहय । चिखला माटी म सनाये हाथ गोड़ म ...... अतेक घाव गोंदर ...... तेकर ठिकाना निही ..... घाव ले रहि रहि के ....... पिप बोहावत रहय । हाथ ले लहू के धार फूटत रहय । चुंदी मुड़ी छरियाय ..... देंहे ले पछीना के बास म नाक दे नी जावत रहय ।  

                    संचालक किथे – तोर लइका तो एकदमेच चुंहके कस ....... बिमरहा हे ..... तैं काबर स्टेज म चइघगे होबे ? ओ मनखे किथे – मोर लइका हा अमीर के लइका थोरेन आये साहेब ...... जेहा बिगन खाये स्वस्थ रहि .... ? येकर सुवांस चलत हे ... इही कन्हो कमती बात आय का ….. ? बिगन खाये कन्हो गरीब के लइका येकर से अच्छा जी सकत हे का ........ तिहीं बता भलुक ? संचालक पूछत रहय – तैं कहत हस के तोर लइका खाये निये कहिके फेर एकर हथेरी ला सूंघ के देख ..... रोटी के महक आवथे । ओ मनखे किथे – हमर घर म रोटी के कारखाना हे साहेब ...... फेर ...... हमन सिरीफ बनाथन ......। खा नी सकन ...... बनथे तहन ........ हमर हाथ ले नंगा के लेग जथे .........। हमन गरीब किसान मजदूर बनिहार भुतिहार आवन साहेब ....... जेकर हाथ म आखिरी म सिरीफ जुच्छा कटोरा बांच जथे । हमन न खा सकन ...... न अपन लइका ला खवा सकन । अन्न उपजइया हमन , जिनगी भर दाना दाना बर लुलवावत फिरत रहिथन । जेला बेंच के खा सकन ..... तइसन ....... हमर तिर बेंचें के लइक ....... न जमीर ...... न ईमान ...... न देस ....... न धरम ........ ।

                    तैं काबर स्टेज म आके हमर टेम खराब करत हस जी – संचालक फेर पचारिस ? ओ किथे - मेहा सुने रेहेंव के ....... नाव धरे ले ........ भारी बिकास होथे ....... महूं अपन लइका के नाव धरके ........ जीत के लालच म चइघ पारेंव ...... । संचालक किथे – स्टेज म चइघे के पहिली ..... अपन लइका के हालत ला नी देखतेस गा ..... ? निचट सोसित पीड़ित कुपोसित अधमरहा दिखत हे ? अइसन हालत म काबर लानेस तेमा .... ? ओ किथे – मेहा सोंचत रेहेंव के बिगन खाये एकर ले जादा स्वस्थ कन्हो नी होही कहिके । फेर इंहे आके देखेंव अऊ जानेव के बिगन खाये घला ..... कन्हो अतेक स्वस्थ रहि सकत हे । तोला का बतावंव साहेब ...... मोर लइका पहिली अइसन नी रिहीस हे । पहिली हमर तिर खाये बर सिरीफ कनकी ...... पिये बर पसिया ....... ओढ़हे बर गोदरी अऊ रेहे बर छितका कुरिया रिहीस हे ....... फेर ओ समे मोर लइका बड़ स्वस्थ रिहीस हे । फेर जबले येकर नाव धरे हंव तबले ...... येकर गोड़ म नक्सलवाद के कोढ़ उपजगे ....... हाथ म नांगर के जगा बनदूक आगे । अपन पछीना के कमाये चीज ला ....... नंगाके खावत देखथे तब ..... लुटेरा मन के भोरहा म अपने मनखे के लहू मा .... अपन हांथ ला बुक डारथे । जब नी सकय तब ....... लार चुचवावत बइठे रहिथे ....... । बपरा हा आगू बता नी सकिस .......... रो डरिस । संचालक पूछथे – तोर लइका के काये नाव धर डारे , जेकर सेती अतेक दुरगति होगे .... । ओ किथे – छत्तीसगढ़ नाव धरे हंव साहेब .........। दरअसल मे ....... जगा जगा इही गोठ सुने रेहेंव के ......... जबले हमर राज के नाव छत्तीसगढ़ धराये हे तबले ........ ओहा खूब फलत फूलत हे ......... बिकास करत हे । मे बड़ जिनीस गलती कर पारेंव साहेब ........ में का जानव ये लबारी आय कहिके ........ । मोरो लइका नाव धराये के पाछू छत्तीसगढ़ कस बिकास कर डरिस साहेब ...... । में बहुत पछतावत हंव ......... ओकर नाव ....... छत्तीसगढ़ धरके ..............। रोवत रोवत ददा हा किथे – मोर बेटा के पहिली ........ जतका सुंड मुसुंड पिला अइन तहू मन ...... वासतव म मोर लइका के नाव छत्तीसगढ़ धरे के पाछू भोगइन हे साहेब ।                    

                    संचालक अऊ निर्णायक मन ...... लइका के नाव छत्तीसगढ़ सुन के थथमरागे । सबो झन के बुध पतरागे । ओमन सोंचे लगिन के छत्तीसगढ़ नाव के लइका ला नी जिताबो त ....... जम्मो झिन सोंचही के ........ छत्तीसगढ़ के विकास के बात लबारी आय । जितइया के घोसना करत हाथ अऊ मुहुं कांपे लगिस ...... अपन कका ददा ला खुस करे बर ...... लोगन ला एक बेर फेर भरमाये बर अऊ अपन आप आका के बात ला सच साबित करे बर ...... उही बिमार पोटपोट करत छत्तीसगढ़ नाव के लइका ला ........ बिजेता घोसित कर दिन । बिमार लइका ला ...... नाव के सेती ........ विजेता होय के नाव मिलगे । इनाम अऊ सनमान ...... न तो छत्तीसगढ़ पइस न ओकर बाप ....... बलकि ओला बाकी तीनों लइका के बाप मन झोंकिस । ठेंगवा चांटत ...... छत्तीसगढ़ ....... सिरीफ ओतके म खुस हे अऊ मलई ला आज घलो दूसर मन चांटत हे ................।     

  हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य-वीरेंद्र सरल

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य-वीरेंद्र सरल

 बछरू के साध अउ गोल्लर के लात

वीरेन्द्र सरल

चरवाहा मन के मुखिया ह अतराप भर के चरवाहा मन के अर्जेन्ट मीटिंग लेवत समझावत रहय कि ऊप्पर ले आदेश आय हे, अब कोन्हो भी बछरू ला डराना-धमकाना, छेकना-बरजना नइ हे बस अतके भर देखना हे, ओमन रोज बरदी म आथे कि नहीं? बरदी म आके बछरू मन कतको उतलइन करे फेर हमला राम नइ भजना हे। जउन बछरू बरदी म नइ आवत हे ओखर घर में जाके ओला ढिल के लाना हे अउ भुलियार के बरदी म रखना हे। ओमन चाहे तुमन ला लटारा मारे, चाहे हुमेले। तुमन ला कहीं नइ कहना हे भलुक प्यार से समझाना हे, अइसना नइ हुमेले बेटा। सींग म पेट ला लाग जथे गा। ज्यादा उतलइन नइ करे जी, श्रीमान हो। महोदय मन अतेक काबर अतलंग करथो रे, बाबू हो। बस अइसनेच समझाना हे। न कोन्हो ला हुदरना हे, न काखरो बर लउठी उबाना हे अउ न हर्रे कहिके बरजना हे, इहां तक कि कोन्हो ला लाल आंखी तक नइ देखाना हे अउ न कोन्हो ला करू भाखा कहना हे। कोन्हो भी बछरू कोती ले तुंहर शिकायत मिलही तब तुहर जेवर पानी ला बंद कर दे जाही, समझगेव? अतका समझाय के बाद तुमन नइ मानहूं तब तुम जानो अउ तुहर काम जाने।

मुखिया के गोठ ला सुन के सब चरवाहा मन एक-दूसर के मुँहूं ला देखे लगिन। सबो झन मने-मन गुनत रहय। बड़ा मरना हे यार! संसार के सबो जीव ह ननपन में जउन बात ला सीखे-पढ़े रथे ओखरे असर जिनगी भर रथे। अइसना नियम में हमर नान-नान बछरू मन उजड्ड हो जही। कहीं नीति-नियम ला न तो जानही अउ न बड़े बाढ़ के मानही। फेर हमन ला काय करना हे ददा, जेवर-पानी के सवाल हे। जेवर पानी बंद हो जही तब पेट बिकाली म हमी मन मर जबो, तेखर ले जइसे ऊप्पर ले आदेश आय हे, वइसनेच करे में भलाई हे।

बरदी के नियम कानून ह ढिल्ला होइस तहन सब बछरू मन मनमाने उतलइन होगे। बछरू के गोसान मन सोचे कि चरवाहा मन अलाल अउ कोढ़िया होगे हे। फोकट के जेवर पाके मेछरावत हे अउ खेत म कनिहा तोड़ के कमइया सियान-सियान बइला मन अपन बछरू मन के भविष्य ला सोच के रातदिन संशो-फिकर म बुड़े रहय। ओमन मने मन गुनय कभू हमू मन बछरू रहेन तब हमर गोसान नहीं ते चरवाहा ह हमर असन दु झन बछरू ला जोड़ के एके संघरा रेंगें बर सिखोवय। नांगर म फांद के अघुवा बइला मन के पाछू-पाछू खेत म नांगर के हरिया म रेंगावय। दौड़ी म फांद के सब सियान मन संग रेंगे बर सिखोवय। लइकापन म हमन कोन्हो बरदी के नियम-कायदा ला तोड़ पारन तब छेके बरजे, फेर आजकल अइसन का होगे कि चरवाहा मन कछु बोलबे नइ करय।

येती छेल्ला पाके बछरू मन गजब लाहो ले लगिन। जब मन होवय तब बरदी ले भाग जावय। काखरो बारी बखरी म खुसरके बेन्दरा बिनास कर देवय। उखर मन में डर नाम के कोन्हो बातेच नइ रहिगे। सबे बछरू मन हरहा होय लगिन। हरहा बछरू मन कभु रखवार के सपेटा म पड़ घला जाय अउ कांजी हाऊस म धंधाय के सजा मिल जाय तब रखवार तीर तुरते गोल्लर साहब के सिफारिश आ जाय। गोल्लर साहब के डर के मारे रखवार मन तुरते हरहा बछरू मन ला कांजी हाऊस ले छोड़ देवय। गोल्लर साहब के परताप ला देख-सुन अउ समझ के बछरू मन के मन में बस गोल्लर बने के साध रहय। कभु-कभु बछरू मन अपन जहुंरिया संगी-साथी मन संग गोठियावय कि भुंकरे वाला गोल्लर बनना चाही कि आशिरवाद दे वाले गोल्लर। जिनगी के मजा इही दुनो किसम के गोल्लर बने म हे। जउन बछरू ला आशिरवाद दे वाले गोल्लर बने के साध रहय वोहा नंदिया बइला ला अपन गुरू बना लेवय अउ जउन ला भुंकरे वाले गोल्लर बने के सउख रहय ओमन भुंकरे वाले गोल्लर के आघू-पाछू किंजरय। उखर इशारा म बेन्दरा बरोबर नाचय।

गोल्लर साहब के आघू-पाछू नाचत-नाचत जब एक झन बछरू जवान होगे तब मउका देख के वोहा एक दिन गोल्लर साहब ला कही पारिस-‘‘अब तो आप मन सियान होगे हो। भुंकरे भर ला सकथव तुहंर गतर तो चले नही। अब हमू मन तो गोल्लर बने के मौका देवव साहब।


बछरू के गोठ ला सुन के गोल्लर साहब भड़क गे। कहिस-‘‘तुमन गोल्लर बने के लइक दिखथव रे। नाक बोहावत हे तेला पोछे के ताकत नइहे अउ बड़े-बड़े सपना देखथव। तुमन हमर धरम अउ पारटी के झंडा ला उठा के जिन्दाबाद कहत भुंकरव। जउन ला मन लागे तउन ला हुमेलव। जेखर बारी-बखरी ला रउंदना हे रंउदव। कोन्हो रखवार छेकही बरजही तब हमला बतावव। हमर रहत ले कोन रखवार के हिम्मत हे जउन तुंहला कांजी हाऊस म धांध सके। बस गोल्लर बने के साध झन करव नहीं ते अइसे हकन के लटारा जमाहूं कि जिनगी भर बर गोल्लर बने के साध ला बिसर जाहू, समझ गेस?

हमर रहत ले तुमन ला गोल्लर बने के अधिकार नइहे। हमर बाद हमरे पिला-पागड़ू मन गोल्लर बनही। ओखर बाद उखर पिला मन गोल्लर बनही। ओखर बाद—। तुंहर काम सेवा करना आय अउ सेवा के बदला म मेवा पाके मजा उड़ाना हे, समझेस?

फेर ये पइत तो वो बछरू के दिमाग में गोल्लर बने के भूत सवार होगे रिहिस। वोहा गोल्लर साहब के बात ला समझबे नइ करिस अउ अपन जिद में अड़े रिहिस। गोल्लर साहब के दिमाग खराब होइस तब वोहा वो बछरू ला अइसे जमा के लटारा हकनिस कि बछरू ह सोझे पशु औषधालय के आधू में जाके गिरिस।

भकरस ले आवाज ला सुन के अस्पताल के भीतरी में खुसरे डॉक्टर झकनाके खोर डहर दौड़िस। देखिस, बछरू उतान पडे रहय।

 डॉक्टर ह तीर में आके पूछिस-‘‘आपके आगमन कहाँ ले होवत हे बछरू बाबू? सुनके बछरू बगियागे। ओखर एड़ी के रिस तरवा म चढ़गे।

 वोहा किहिस-‘‘दिमाग खराब झन कर यार! सोझ बाय मरहम-पट्टी कर अउ सूजी पानी दे। डॉक्टर ह मरहम -पट्टी करे लगिस फेर बछरू ह कनिहा पीरा म हकरत-हकरत गोल्लर भैया जिन्दाबाद के नारा ला लगातेच रहय।


वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोडरा, मगरलोड

पोष्ट  भोथीडीह

व्हाया  मगरलोड

जिला  धमतरी, छत्तीसगढ़

पिन 493662

वन महोत्सव -खैरझिटिया

 वन महोत्सव -खैरझिटिया


               पानी बरसात के दिन जमे कोती हरियाली हे, मनखे मन संग जीव जंतु जमे मतंग हे। जीव जिनावर तो बिन अक्कल के बस खात पियत पड़े रहिथे बिचारा मन , फेर मनखे मन कर तो अक्कल के भरमार रहिथे। तभे तो मनखे मन, पर्यावरण संरक्षण बर रात दिन  उदिम करथे,गला फाड़ नारा लगाथे, अउ कूद कूद के पेड़ पौधा घलो लगाथे भले एक ठन पेड़ ल लगाय बर 15 झन झूमे रहय, फेर सुध तो सुध होथे, प्रकृति के जतन म तो लगे हे। वो बात अलग हे कि लगाये के बाद भले सब भुला जथे, पेड़ मरे चाहे जिये। अपन काम तो कर देथे बपुरा मन। 

              बड़खा मंच सजे हे, पोगा रेडिया पोरोर पोरोर बजत हे। जमे कार्यकर्ता सूट बूट पहिरे भाग दौड़ करत हे। लइका लोग सियान सबे जुरियाय हे। गीत कविता के तैयारी घलो हे। रेडियो म बजत  *मोर खेती खार रुनझुन मन भँवरा नाचे झुमझुम*  गीत मन ल भावत हे।। पेड़ लगाओ के नारा गजब गूँजत हे, तरिया कस खनाय सड़क म मुरुम बिछ्त हे, काबर की मंत्री जी वृक्षारोपण करे बर अवइया हे। नही नही म मंच के अलग बगल मनखे मिलाके 100 आदमी तो रहिबे करे रिहिस ,अउ मंत्री जी संग जेला चंगुरवा आही ते अलग।  यहू संख्या कोरोना काल म रिहिस, जब जादा भीड़ भाड़ नइ करना हे। फेर पेड़ , जेखर रोपण करना रिहिस वो हर गिन के 10 ठन। खैर दसो पेड़ घलो बहुत होथे, बढ़ जाए त। गर्मी म जरत मनखे संग जीव जंतु बर एक पेड़ के छाँव घलो काफी होथे। लइका सियान जमे के हाथ म झंडा लहरावत हे अउ गला म मंत्री जी के अगुवाई म मिले फेंटा गजब चमकत हे, भले ओ बपुरा मनके ओनहा कुर्था के गत नइहे। कार्यकर्ता मन कोन जन का काम म लगे हे ते, येती वोती मार भागत हे, जबकि जम्मो रेजा, कुली मन बरोबर काम ल सिधोत हे तभो। एक झन गाड़ी म चढ़के आइस अउ खबर देथे के मंत्री जी 10 मिनट म पहुँच जही। ताहन का कहना बताये अनुसार जम्मो मनखे लाइन म खड़ा होके झंडा हलाये अउ  जयकार  करे म लग गे। मंत्री जी के गाड़ी बोमियावत पहुँच गे। फूल माला म मन्त्री जी के घेंच तोपागे। स्वागत सत्कार के बाद भाषण बाजी चालू होगे। उही रटटम रट्टा डयलाक गूँजत रहय जेन आम तौर म बड़े बड़े मंच ले मंत्री ,नेता मनके मुख ले निकलथे। हव बने सुरता करेव, गरीबी भागना हे, रोजगार देना हे, विकास लाना हे ,,,,,,,,आदि आदि। बिसलरी के बोतल के संग, काजू किसमिस के प्लेट घलो नेता मनके  आघू म माढ़गे। फेर बपुरा दर्शक जेन मन अघुवाई करे बर कोन जन कतका बेर ले ओड़ा ल देहे, उन ल पानी पुछइया घलो कोनो नइहे। बिचारा मन जब ले आये हे, तब ले खुद तो हारे हे अउ नेता के जय जयकार करत हे। मंत्री जी के मीठ बचन ल सुनके सब खुश हे, मानो उही म उँखर पेट भरत हे।  उँखर पाछु तुतारी घलो चलत हे कोरोना हे मास्क लगावव। बिचारा मनके मुख बेंदरा कस करिया,पिवरा,लाल दिखत हे। फेर मंच म बैठे कार्यकर्ता मन घलो तोप लिही, त उन मन कोन पहचानही, नेता मन के मास्क घलो  मुँह ले उतर के घेंच म झूलत हे।

             भाषण बाजी के बाद मंत्री मन अपन चेला चन्गुरवा के साथ खाल्हे उतरिस अउ पेड़ लगाय बर खने गढ्ढा मेर पहुँचिस। एक ठन पेड़ मंत्री ल दिस, बाकी 9 ठन ल आने मन धरिस, फेर लगाये म धियान कहाँ हे कखरो? सब तो मंत्री संग फोटो आही कहिके ओखरे पेड़ ल आरती के थारी बरोबर धर लिस। आने मन सब अपन अपन पेड़ ल अइसने खोंच दिस, अउ मंत्री जी के बाजू म खड़ा होगे। मार पेड़ लगाओ, अउ मंत्री जी के जयकार गूँजत हे। कोरोना काल म घलो पेलिक पेला होवत हे। फेर ये का मंत्री पेड़ ल धरे हे, चेला मन खड़े हे, पर फोटोग्राफर के अता पता नइहे। कार्यकर्ता मन दाँत ल कटरत हे, अभी तो रिहिस कहाँ गे रे। बिना फ़ोटो खिंचाय मंत्री जी घलो कइसे पेड़ लगा दिही। सब सन्न हे ,खोजो खोजो मात गेहे। मंत्री जी गुसियागे ये का तमाशा ये, फोटोग्राफर बिन पौधारोपण कइसे होही। दू तीन झन अधिकारी उप्पर गाज घलो गिरगे। तमक के मंत्री जी सस्पेंड कर देहूं कहि दे हे, फेर उहू मन का करे, वो मन तो बकायदा फ़ोटो ग्राफर लगाय रिहिस, अब वो धोखा दे दिही तेला, वो मन का करही? फेर रिस तो रिस ए,का करे? कोनो मन काहत हे, कि फोटोग्राफर गाड़ी धर लकर धकर कोनो  विपत आय कस भागिस हे। कार्यकर्ता मन संग मंत्री जी घलो नाराज हे, *कहूँ फोटोग्राफर घलो सरकारी होतिस, त तो ओखर खैर नइ रितिस।* फेर का विपत आगे ,जउन अत्तिक बड़ कार्यक्रम ल छोड़ भाग गिस भगवान जाने? एती हल्ला होवत हे, कोनो दुसरा फोटोग्राफर बलाव, त कोनो काहत हे महँगा मोबाइल म फ़ोटो खींच लव, त कोनो काहत हे, थोड़ीक देर अउ खोज ली,अभी रूक जाव, पेड़ ल झन खोंचव। नही ते काली के पेपर अउ देश दुनिया म मंत्री जी के पेड़ लगावत फोटू कइसे बगरही? माने पेड़ लगई ले जादा फोटो के महत्व हे। अउ हे घलो तभे तो एक ठन पेड़ ल धरे कईझन मनखे रोजेच सोसल मीडिया म दिख जथे। कोन जन हमर पुरखा मन घलो फोटोग्राफर खोजथिस, त बड़े बड़े बर, पीपर रहितिस कि नही?  पर आज फ़ोटो जरूरी घलो हे काबर कि कोन का करत हे, तेखर पुख्ता सबूत घलो इही ताय। फ़ोटो बिना आज कहाँ कोनो काम होथे। सोसल मीडिया के जमाना हे, उठत बइठत फ़ोटो मनखे मन बगरावत हे, मुँह ल अँइठ  अँइठ के फ़ोटो खिंचावत हे। बिन फ़ोटो के उछाह के काम ल तो छोड़ दी, मरनी हरनी या कहे जाय त दुख के काम घलो नइ होय। फलाना ल श्रद्धाञ्जलि देवत फलाना, अइसनहो फ़ोटो दिखथे। घूमई फिरई , काम बुता सबके फ़ोटो चलत हे। *नांगर जोतत फलाना, अब ले करम फूट गे न।* फेर कइसनो होय केमरामेन के जाय ले सब अधर म लटकगे। तभो अपन अपन हिसाब ले उँधला  धुँधला मोबाईल म खींचत हे,कि मंत्री जी थोड़े घेरी बेरी आही। खैर कार्यकर्ता मन संग मंत्री जी के मूड घलो खराब हे, बिन फोटो ग्राफर के। तभो मोबाइल म फ़ोटो खींच खिंचाके  एक ठन पेड़ ल जम्मो झन ख़ोचीस, अउ नास्ता पानी बर बैठ गे। बाकी 9 ठन पेड़ बने से गड़े घलो नइहे। बता जब आजे ये स्थिति हे त, आघू के देख रेख भला कोन करही। चल कइसनो होय, छेरी पठरू के भोजन के तो जुगाड़ होगे। वोमन चरही,त अउ उल्होही ताहन अउ चरही, अउ उल्होही त अउ--------। फेर जेन दिमाक वाले प्राणी हे तेमन कहूँ टोर फेक दिही, त थोरे उल्होही। खैर आज वृक्षारोपण तो होगे, बाकी समय का होही, तेला का करना हे। बस एके चीज के कमी खलिस, वो हरे कैमरामैन। कैमरामैन रिहितिस, त हाँस हॉस के पेड़ लगावत सबके फ़ोटो रिहितिस। मंत्री जी दल बल समेत भाग गे, ओखर जाते ही कार्यकर्ता मन। बेचारा अगुवाई करइया दर्शक मन देखते रहिगे। फोटोग्राफर के बारे म, कार्यकर्ता मन पता करिस त मालूम चलिस की फ़ोटो ग्राफर के परिवार वाले मनके कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आये हे, अउ गाड़ी म डॉक्टर मन उनला धरके लेजत हे। उहू बपुरा के का गलती हे।येती सभा म जुरे मन म घलो दहसत हे, कैमरामैन पॉजिटिव होही त?


 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

इलाज-चोवाराम वर्मा बादल

 इलाज-चोवाराम वर्मा बादल

-----------(व्यंग्य)


डाक्टर साहब! डा साहब।

हाँ काय होगे बताव।

मोला कुछु नइ होये ये डाक्टर साहब। ए मोर गोंसइया के अचानक तबियत खराब होगे हे।काँही हो जही तइसे लागत हे ।एकर जल्दी इलाज कर देतेव--। रम्हला ह अपन पतिदेव ल डाक्टर के आगू कुर्सी म बइठावत कहिस।

ठीक हे  अभी जाँच करके इलाज करत हौं कहिके डाक्टर ह पर्ची म लिखे बर पेन के डक्कन ल खोलत कहिच-क्यों तुम्हारा नाम क्या है?

रम्हला के पति ह कुछु उत्तर नइ दिच उल्टा चुपचाप बोटोर-बोटोर देखे ल धर लित। तब रम्हला ह झनझनावत कहिच--एला गाय गरुवा मन सहीं मुँह चपका रोग होगे हे तइसे लागथे। दू दिन म मोर सो काली बिहनिया गुर्रावत --गुड़ाखू कहाँ हे अतके बस पूछे हे ।ओकर छोंड़ आम लीम नइ गोठियाये हे। महीं बता देहूँ त चलही का डाकटर साहेब।

हाँ हाँ तहीं बता दो।

एकर नाम माता सीता के पति असन हाबय।

अच्छा रघुबीर हे।

नहीं नहीं डाकटर साहेब अउ एका ठव लेवव न।

कोई बात नहीं---। रामचंद्र हे।

नहीं ।एकर ले छोटे नाम लेवव न। रम्हला ह केलौली करत कहिच।

डाक्टर ह थोकुन नराज होवत कहिच--अरे तुम्हीं  बता दोगे तो क्या हो जायेगा? टेंशन में डाल दी। नानसेंस। 

सुनके रम्हला सकपकागे।

डाकटर ह हिंदी अंग्रेजी झाड़े बर तो झाड़ दिच फेर वो नारा--"छत्तीसगढ़ म रहना हे त ,छत्तीसगढ़ी बोलना परही" के सुरता आगे। तहाँ ले आधा हिंही ,आधा छत्तीसगढ़ी म उतरत थोकुन सोंच के बोलिच--एकर नाम रामजी हे का दाई?

हाँ बेटा बने जाने ,बने जाने ---उहीच नाम हे लिख ले।

हाँ ।नाम रामजी। अउ उमर का हे?

एकर पक्का चँदी मूँड़ी ल देख के लिख ले बेटा। दू आगर तीन कोरी त होबे करही।

मतलब बैसठ साल।

हहो कहिके रम्हला ह मूड़ी ल हलाइस तहाँ ले डाक्टर ह लिख के रामजी के बी पी ल नापिस। वोकर बी पी ल साठ अउ पैंसठ के बीच म हालत देख के अपन आँखी ल गटारन कस छटकार कहिस--अरे इसका बी पी ह तो भारी लो होगे हे। अच्छा ए बता दाई अउ का परेशानी हे?

दू दिन होगे हे मूँह म एक दाना नइ ले गे हे।बस पानी पी पी के जीयत हे। रम्हला बताइस।

अच्छा ,अउ कोई परेशानी ?

एहा दू दिन, दू रात ले एको कनी सूते नइये। अल्थी-कल्थी मारत रहिथे ,नहीं ते थोथना ल ओरमाये बइठे रहिथे। देख न आँखी कान कइसन ललियाये हे।

कोई बात नइये।सब ठीक हो जही। आप ए बतावव  रामजी ह काय काम करथे?

एहा आड़ी के काड़ी नइ करय डाकटर बेटा ।मोर दुख ल का गोठियावँव। पहिली तो एको कनी खोर गली ल गिंजर के आवव फेर अब तो छै महिना असन होगे हे कुरियेच म खुसरे रहिथे। नहवइ-खोरइ,खाये-पिये तको चेत नइये।रम्हला ह अपन आँसू ल लुगरा के अँचरा म पोंछत कहिच।

रोवो मत सब ठीक हो जही काहत डाक्टर पूछिस--ए कुरिया म का करथे दाई?

पूछबे त रचना करत हौं कहिथे डाकटर बेटा।

अच्छा तो ए ह पोएट हे,राइटर हे। अब बीमारी पकड़ म आगे। आप चिंता मत करव। छै महीना  पहिली के कोनो घटना सुरता करके बताव।डाक्टर कहिच।

धान ल बेंच के बीस हजार म मोबाइल ले हाबय तेने सुरता आवत हे।रम्हला कहिच।

डाक्टर ह हाँसत कहिस--अब तो बीमारी के जड़ पकड़ आगे ।एके खुराक म सब ठीक हो जही। कहाँ है वो मोबाइल ?

कहाँ रइही डाक्टर बेटा। चोबीस घंटा जी असन पोटारे रहिथे। रामजी के हाथ ले मोबाइल ल झटक के डाक्टर ल देवत रम्हला ह कहिच।

 अच्छा तो ए हरे। तुमन बइठव मैं एला सूजी लगा के भीतरी कोती ले आवत हँव। अतका कहिके डाक्टर ह अपन पाँचवी पास फेर मोबाइल एक्सपर्ट कम्पाउंडर ल बलाके मोबाइल ल धरे दूनो कोई इलाज खोली म खुसरगें।

 पाँच मिनट बाद डाक्टर ह अइस अउ मोबाइल ल रामजी ल देवत कहिस --ले एला देख।

टप ले मोबाइल ल रामजी ह धर लिच अउ लकर धकर फेसबुख ल खोल के देखिस  जिहाँ वोहा दू दिन पहिली -'कड़ही साग' शीर्षक ले कविता पोस्ट करे राहय  तेमा सौ ठो लाइक, पचास ठो वाह वाह ,पचीस -पचीस ठो अनुपम के कमेंट पाँचे मिनट म आगे राहय। तहाँ ले ओकर मुरझाये चेहरा कमल असन खिलगे। खुरसी ले टिंग ले उठके ,दूनो हाथ जोड़के डाक्टर ल थैंक यू, शुक्रिया, कोटिक धन्यवाद, सादर प्रणाम घेरी बेरी कहे ल धर लिच।

बिन सूजी पानी के अपन गोंसइया ल ठीक होये देख के रम्हला ह बक्खागे। वोहा पूछिस--एला का होगे रहिसे बेटा।

कुछु नइ होये रहिसे दाई।अपन रचना म एको ठन कमेंट नइ देखके ए हा डिप्रेशन के शिकार होगे रहिसे। हमन इलाज कर देन।

ए हा अउ अइसने कभू बीमार पर सकथे का बेटा ? रम्हला पूछिस।

हाँ जब तक ए मोबाइल रइही।पूरा संभावना हे। कभू हार्ट अटेक घलो हो सकथे।डाक्टर कहिच।

अतका ल सुनके रामजी के हाथ ले मोबाइल ल नँगा के रम्हला कहिच--घर जाके अभीच्चे ए मोबाइल रोगहा ल लोड़हा म कुचरहूँ। तभे सदा दिन बर इलाज होही।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

व्यंग्य काबर, कइसे अउ काखर उप्पर-वीरेंद्र सरल

 व्यंग्य काबर, कइसे अउ काखर उप्पर-वीरेंद्र सरल

वीरेन्द्र सरल

व्यंग्य उप्पर अपन विचार लिखे के पहिली आप सबला ये बताना जरूरी हे कि मैं व्यंग्य के कोन्हों शिक्षक नहीं बल्कि पहली कक्षा के विद्यार्थी अंव। थोड़ बहुत हिन्दी व्यंग्य ल पढ़े अउ लिखे ले व्यंग्य ल जउन थोड़ बहुत समझ पाय हंव, उही विचार ल रखत हंव। अपन छत्तीसगढ़ी के व्यंग्य के संदर्भ म देखन त हम व्यंग्य ला ताना या बख्खानना कही सकत हन। उदाहरण बर देखन तब गांव गंवई म जब कोन्हों काखरो घर तीर गंदगी कर देथे, कचरा फेंक देथे या अउ कोन्हों किसम के नुकसान कर देथे तब घर के मनखे मन बिना नाम ले मनमाने बख्खानथे कि कोन रोगही रोगहा मन के आँखी फूटत हे जउन हमर नुकसान करत हे। येकर उद्देश्य ये होथे कि बिना झगड़ा लड़ाई के गलती करने वाले ला चेताना। गलती करने वाला ह गारी बखाना सुन के तिलमिलावत रहिथे फेर मोला काबर कहत हस नई कही सके, काबर की गारी ओखर नाव लेके तो कोन्हों देवत नई रहय। मोर समझ म व्यंग्य के इही काम आय। समाज ला जागरूक करना, समाज विरोधी काम करने वाला मन ला चेताना अउ विसंगति के विरोध बर जनमत तैयार करना, तार्किक अउ वैज्ञानिक सोच पैदा करना, ढोंग, आडम्बर अउ पाखंड के विरोध करना। रुढ़ि अउ कुरीति के विरोध कर के स्वस्थ समाज के निर्माण करना। राजनैतिक, सामाजिक अउ धार्मिक क्षेत्र के स्वार्थी मन के चेहरा ले नकाब उतार के असली चेहरा ला समाज के आघू म लान के समाज ला सावचेत करना। पीड़ित, शोषित, उपेक्षित मन के पीड़ा ल मुखरित करना ही व्यंग्य के काम आय। तिही पाय के अंग्रेज जमाना म व्यंग्य लिखने वाला सुप्रसिद्ध व्यंग्य लेखक बालमुकुंद गुप्त जी ह व्यंग्ययकार म ल गूंगी प्रजा के वकील कहे हे। ये तो होईस व्यंग्य काबर लिखे जाय येखर बात।

अब दूसरा सवाल हे व्यंग्य कइसे लिखे जाय। व्यंग्य ला विद्वान मन विधा के रूप म स्वीकार कर ले हे। व्यंग्य के भाषा ह व्यंग्य ला आने विधा ले अलग करथे। जब तक भाषा तिर्यक नई होही तब तक व्यंग्य ह निशाना म नई लगे। साहित्य के सबो विधा ल अभिधा म लिखे जाथे फेर व्यंग्य ल व्यंजना म। हमर समूह के शिक्षक साथी मन अभिधा, लक्षणा अउ व्यंजना शब्द शक्ति के बारे मे भली भांति जानत हे एला जादा लमाय के जरूरत मैं जादा नई समझत हंव। हम पद्य म ब्याज निन्दा अउ ब्याज स्तुति अलंकार के बारे मे जानत हन। जो सुने म निंदा कस लागे फेर प्रशंसा होय। अउ प्रशंसा कस लागे फेर निंदा होवय। व्यंग्य ल बने समझना हे तब कबीर साहित्य के अध्ययन म सब बात मिल जहि। वइसे भी व्यंग्य अखाड़ा के प्रथम उस्ताद तो कबीर साहब आय। देश के जतेक व्यंग्यकार हे सब कबीर ल ही व्यंग्य के आदि गुरु मानथे। व्यंग्य म भाषा के बड़ा महत्व हे जइसे आज गणेश जी के आरती उतारबो के मतलब गणेश जी के पूजा पाठ से हे। फेर ये कहे जाय रहा ले ले आज तो तय मोला दिख भर जा तहन तोर आरती उतारत हंव। ये मेर आरती के मतलब सजा से होगे हे। इही हरे व्यंग्य भाषा के चमत्कार।

समूह के संगवारी मन के प्रश्न आवत हे हास्य अउ व्यंग्य म काय अंतर हे। साधारण उत्तर यही आय कि हास्य ह फ़िल्म के कॉमेडियन आय जउन मनोरंजन करथे अउ व्यंग्य ह फ़िल्म के हीरो आय जउन समाज ल दुख देवैया खलनायक संग लड़थे, ओला समूल नष्ट करे के जोखा जमाथे, आम आदमी के भीतर आततायी से लड़े के ताकत पैदा करथे। व्यंग्य के रचना म हास्य तो होना चाही। पाठक ल जोड़ के रखे बर, रचना ल पठनीय बनाए बर हास्य बहुत जरूरी हे। फेर ये साधन आय व्यंग्य के साध्य नो हे। निमगा व्यंग्य ह आसानी से पचय नहीं। फेर व्यंग्य के जउन लक्ष्य हम निर्धारित करे हन ऊंहा तक हम अपन बात पहुंचाए बर हास्य के आश्रय लेथन। हास्य ह साग में नून असन रचना के स्वाद ल बढ़ाए के काम करथे।

अब बात करथन व्यंग्य काखर उप्पर कई झन लेखक व्यंगय के नाम म अपन पत्नी, सारी, जीजा नहिते कवि, कवि सम्मेलन टी वी, कूलर, पंखा, ल व्यंग्य के विषय बनावत लिखथे, एहा व्यंग्य के धर्म नोहे। पीड़ित, शोषित, उपेक्षित, दिन हीन , असहाय मनखे उप्पर कभु व्यंग्य नई लिखे जाय। व्यंग्य हमेशा, शोषक, आततायी, समाज विघाती प्रवृति उप्पर लिखे जाथे, कथनी अउ करनी के असमानता म लिखे जाथे। 

भैया विनोद वर्मा जी काली मोला सशक्त व्यंग्यकार कही के चना के पेड़ म चढ़ा दिन ते पाय के मोर जोश चढ़गे अउ हुशियारी बघारत अतका पान लिख पारे हंव। वइसे भी मोर अध्ययन हिन्दी व्यंग्य म थोड़किन हे अउ थोड़किन हिन्दी मे ही लिखे हंव। छत्तीसगढ़ी व्यंग्य साहित्य के मोर अध्ययन अउ लेखन दुनो बहुत कम हे। कहीं आंय बांय लिख पारे होहुँ तब आप सबले हाथ जोड़ के क्षमा चाहत हंव।

वीरेन्द्र सरल

बोडरा, मगरलोड

पोष्ट  भोथीडीह

व्हाया मगरलोड

जिला, धमतरी, छत्तीसगढ़।

वृक्षा रोपण-दिलीप वर्मा

 वृक्षा रोपण-दिलीप वर्मा


पेंड़ लगाव पेंड़ लगाव, रात दिन चिल्लावत रहिथे। 

अरे कतेक पेंड़ लगाबे ,करोड़ो रुपिया खर्चा करके अतका पेंड़ लगे हे अतका पेंड़ लगे हे कि अब तो धरती म जगा घलो नइ बाँचे हे। 

जेती देख तेती पेंडेच पेंड़ दिखथे। सुरुज देवता तको ह धरती म आये बर अब तरस जथे। 

भाँठा टिकरा खेत खार नदिया नरवा पहाड़ पर्वत कोनो जगा खाली नइ हे।अरे भई अतेक पेंड़ लगाए के का जरूरत रहिस हे।अब तो लइका मन के खेले बर घलो भाँठा नइ बाँचे हे। 

खेत मा अतका पेंड़ लगे हे की खंती खनइया ल बेरा के पता तको नइ चलय अउ दिनभर काम करत रहिथे। धान के फसल तको छइहाँ के पुरवाही म खुसी के मारे ढ़लंग जथे। 

लकड़ी कटइया परेसान हे काला काटन काला बचावन। अब तो ये हाल होगे हे की लकड़ी खुदे चूल्हा म जले बर आ जथे। 

पेंड़ के चारो कोती अतका जाल बिछे हे कि अब मनखे ल वाहन के जरूरत नइ हे।घर ले निकलते ही बेंदरा कस एक पेंड़ ले दूसर पेंड़ कूदत जा सकत हे, अउ कतको तो टार्जन कस झूलत घलो जा सकत हे। 

ये दे शेर घलो ह दुवारी म आके नरियावत हावय।अउ काहत हे अतेक पेंड़ लगाये के का जरूरत रहिस हे।अब देख ले शिकार तको करत नइ बनत हे।हिरन मन मोला देख के बिजरावत रहिथे। अब तो कुछ रहम करव ,कुछ जगा हमरो बर छोड़ दव। 

शेर के गर्जना ल सुन के झकनका के उठेंव त देखेंव खटिया म सुते राहँव।   

बाहिर ल झाँक के देखेंव त परिया परे हे पेंड़ के नामो निशान नइ हे।खेत खार नदी पहाड़ कोनो कोती पेंड़ नइ दिखत हे।

भगवान जाने अतेक खर्चा करके कती पेंड़ लगाथे।  

कोन जनी ओ पइसा काखर भोभस म भराथे। 


दिलीप कुमार वर्मा

लहू -व्यंग्य

 लहू -व्यंग्य(हरिशंकर गजानंद देवांगन  छुरा)

                    लोकतंत्र के हालत बहुतेच खराब होवत रहय । खटिया म परे परे पचे बर धर लिस ।  सरकारी जगा के बड़े जिनीस बिलडिंग म ....... ये खोली ले ओ खोली , ये जगा ले वो जगा खटिया सुद्धा भटकत रिहीस ....... । बपरा हा लहू के कमी ले जूझत ....... जे खोली म निंगे तिंहे के कोंटा म ...... परे सरत बस्साये बर धर लेवय । तभे चुनाव के घोसना होगे । जम्मो झिन ला लोकतंत्र के सुरता आये लगिस । चरों मुड़ा म खोजाखोज मातगे के लोकतंत्र कतिहां हे ? अपनेच बिलडिंग म ...... पोट पोट करत लोकतंत्र ला देख , हरेक मनखे ओकर अइसन हालत बर , एक दूसर ला जुम्मेवार ठहराये लगिन । कइसनो करके लोकतंत्र ला फिर से ठड़ा करे के भरोसा जनता ला देवाय लगिन । लोकतंत्र के लहू अतका कमतियागे रहय के , बपरा हा सांस नी ले सकत रहय । ओला तुरते लहू चइघाये के आवसकता परगे रहय । 

                     चुनाव तिहार के समे रहय ...... लहू देबर कतको मनखे लकलकागे । हरेक मनखे अपन लहू देके लोकतंत्र ला बचाये के सनकलप करे लगिन । लोकतंत्र ला लहू चइघाये के पहिली .... लहू के मिलान करना जरूरी रिहीस । बारी बारी ले मनखे मन अपन अपन लहू के सेमफल दे लगिन । पहिली दिन कुछ पुजेरी मनखे मन , अपन लहू हा सबले पबरित आय कहिके , हसपताल के आगू म , लहू मेच कराके दान करे बर लइन लगगे । मेच सुरू होगे । फेर लोकतंत्र के बड़ दुरभाग्य रिहीस । काकरो लहू हिंदू निकलगे , काकरो मुसलमान । काकरो इसाई निकलय , त काकरो हा सिख । फेर मेच हो सकइया , भारतीय लहू , एको झिन के नी निकलिस । 

                    दूसर दिन दूसर किसिम के मनखे मन लहू देबर लइन लगइन । काकरो लहू के ग्रुप मेच नी करिस । लोकतंत्र के लहू के ग्रुप हा ओ प्लस रहय । जतका झिन दे बर सकलाये रिहीन तेमा ..... कन्हो के ओ प्लस नी निकलिस । जम्मो झिन के एबी ग्रुप निकलिस जेहा सिरीफ लेवइया ग्रुप आय ..... देवइया नोहे । जेकर ग्रुप कन्हो काल म मिलीच जाय त यहू म लफड़ा हो जाय । ओकर मन के लहू के रंग , थोक थोक बेर म , कपड़ा ओढ़ना कस , लीडर बदलते साठ , बदल जाय । कन्हो कन्हो मनखे मन चलाकी करके , लहू देके नाव कमाये बर , अपन लहू के ग्रुप ला , अपन परभाव देखाके , ओ प्लस लिखवा डरिन । फेर आगू के जांच म पता चलिस के , अइसन लहू के भितर स्वेत रक्त कणिका के जगा , स्वेत झूठ कनिका के भारी मातरा रहय । ये रक्त कनिका हा अपन सरीर के भितरी के बिमारी ले नी लड़य बलकी , दूसर मनखे ला बिमार बनाके लड़वा देवय । अइसन लहू ला लड़ केनसर के बिमारी घेरे रहय । काकरो लहू म , हीमोग्लोबिन के जगा लूटोग्लोबिन के मातरा बहुतायत म पाये गिस । प्लेटलेट के जगा , लालचलेट के कण कीरा कस बिलबिलावत रहय । कतको लहू म भरस्टाचार के बिसाणु रहय त , कतको म बईमानी के कीटाणु । दूसर दिन घला लहू नी मिल पइस लोकतंत्र ला । 

                    तीसर दिन , तीसर परकार के मनखे मन अपन लहू देबर लइन लगइन । इंकर लहू के ग्रुप ओ प्लस रिहीस फेर अतेक पतला के पानी असन । भूख गरीबी अऊ लाचारी हा लहू के हरेक बूंद म हीमोग्लोबिन बनके छा जाये रहय । परेम अऊ भाईचारा म रहवइया जीव म , अपन बिमारी अऊ बेकारी ले लड़त लड़त , स्वेत रक्त कनिका सिरा चुके रहय । प्लेटलेट हा इंकर हिम्मत कस अतका कमतियागे रहय के , कटे फिटे ले लहू के थक्का नी जमय बलकी , धारे धार आंखी डहर ले आंसू बनके लहू हा निथर जाय । इंकर लहू के एक अऊ खासियत निकलगे के , जेकर लबारी के मिठ मिठ बात म फंस जाये तेकरे कस , लहू के रंग बदल जाय । लोकतंत्र ला लहू नी मिलिस । एकदमेच छटपटाये लगिस । 

                   तभे खभर अइस के देस के सुरकछा करइया एक झन जवान के लहू भुंइया म टपकगे ।  लहू हा जइसे धरती म गिरके सनइस तइसने बिगन कन्हो मसीनी उपाय के , लोकतंत्र के देंहें म उही जवान के सनाये लहू हा रग रग रग रग दऊंड़े लगिस । लोकतंत्र के देंहे म गरमी आगे । खटिया ले उठके बिगन काकरो सहायता के अपने अपन खड़ा होगे लोकतंत्र हा । 

 हरिशंकर गजानंद देवांगन  छुरा