Saturday, 2 May 2020
पुरखा के सुरता - श्रद्धेय केयूर भूषण
Saturday, 18 April 2020
महामानव - डॉ अंबेडकर
महामानव - डॉ अंबेडकर
समता, समानता, बंधुत्व, मानवता हमर संविधान के मूल तत्व आय ।इन मूल तत्व के बिना हमर संविधान के वो महत्व नई रह जाही जेखर कारण हमन अपन संविधान मा गर्व करथन।
भारत जइसे बड़े देश जेमा कई धर्म, भाषा,बोली,प्रान्त हे अइसन देश ला एकता के सूत्र मा बाँँधे मा हमर संविधान के बहुत बड़े योगदान हे।हमर देश के संविधान जेहा दुनिया के सबले बड़े लिखित संविधान आय ,ऐखर निर्माण के श्रेय जिन महापुरुष ला जाथे वो महापुरुष आयँ महान चिंतक, समाजसुधारक, युगदृष्टा डॉ भीमराव अंबेडकर जी, जेला बाबा साहेब के नाम से घलो जाने जाथे।
14 अप्रैल 1891 मा वर्तमान मध्यप्रदेश के महू नाम के स्थान मा डॉ अम्बेडकर जी के जनम होईस।इंखर पिताजी रामजी मर्लोजी महू छावनी मा सूबेदार रहिन।इंखर पुरखा मन ब्रिटिश सेना मा रहिन ।बचपन ले ही आर्थिक ,सामाजिक, भेदभाव के शिकार होना पडिस।इंखर जन्म महार ( दलित) जाति मा होए के कारण से स्कूल मा पढ़ाई के दौरान जो भेदभाव के सामना करना पड़िस जेखर,बालक अम्बेडकर के मन मा गहरा प्रभाव पड़िस और यही समय मा हिन्दू समाज मा व्याप्त छुआछूत जातिप्रथा जैसे बुराई के खिलाफ संघर्ष के बीज पडिस ।
1907 मा मेट्रिक करे के बाद 1908 मा एलफिंस्टन काँलेज मा प्रवेश लेवइया पहली दलित छात्र बनिन ।
1912 मा बॉम्बे यूनिवर्सिटी ले अर्थशास्त्र अउ राजनीति शास्त्र मा बी.ए. करे के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ले एम .ए .करिन । भारत आके भारतीय समाज मा व्याप्त जाति प्रथा जइसे बीमारी ला दूर करे के कोशिश शुरू कर दिहिन।
शुरुआत उपेक्षित वर्ग जेला दलित कहे जावे तेला जागरूक करे ले होइस। उपेक्षित वर्ग के पीरा ला दर्शाए बर अउ वो वर्ग ला जागरूक करे बर बहिस्कृत भारत, मूक नायक ,जनता जैसे पत्र पत्रिका निकालिंन । उपेक्षित वर्ग के प्रति होवइया
अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाए बर 1936 मा लेबर पार्टी के गठन करीन । 29 अगस्त 1947 मा डॉ अंबेडकर ला भारतीय संविधान सभा मा प्रारूप समिति के अध्यक्ष चुने गइस , प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने के बाद मा संविधान के निर्माता के रूप मा बाबा साहेब जी हमर संविधान के रूप मा हमन ला अमूल्यनिधि दिहिन । अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता के अंत दिए गइस। हमर संविधान के प्रस्तावना ,मौलिक अधिकार जेमा समानता के अधिकार भी शामिल हे ,अउ नीति निर्देशक तत्व बाबा साहेब के विचार के दरपन आय।बाबा साहेब आज़ाद भारत के पहिली कानून मंत्री बनीन ।संविधान निर्माण मा बाबा साहेब के योगदान के कारण मरणोपरांत भारत के सबले बड़े पुरस्कार भारत रत्न ले सम्मानित करे गइन।
आज महानायक के जनम दिवस के अवसर मा हम सब उंखर दिखाए रद्दा मा चल के हमर देश ला विश्व मा महाशक्ति बने के उदीम करिन इही हम सब देश वासी के महानायक ला सबले बड़े श्रद्धांजलि होही।
आलेख - चित्रा श्रीवास
कोरबा छत्तीसगढ़
Saturday, 8 February 2020
रेखा रे रेखा - अरुण कुमार निगम
(छत्तीसगढ़िया मन बर छत्तीसगढ़ी आलेख)
रेखा…...ए शब्द ला सुनके हिन्दी सिनेमा के खूबसूरत हिरोइन के सुरता आगे का ? मँय ओ रेखा के बात नइ करत हँव, गणित के रेखा के बात करत हँव। स्कूल के जमाना मन-गणित ले चालू होइस फेर अंक-गणित, बीज-गणित संग जूझत-जूझत रेखा-गणित तक आइस। रेखा-गणित मा गुरुजी पढ़ाए रहिस कि रेखा दू किसम के होथे। सरल-रेखा अउ वक्र-रेखा। सरल-रेखा के परिभाषा रहिस - दू बिंदु के बीच के कम से कम दूरी ला सरल-रेखा कहे जाथे। स्कूल छूट गे। कॉपी-किताब छूट गे। रेखा-गणित के कम्पास के संगेसंग स्केल, प्रकार, चाँदा, गुनिया, सीस अउ रबर तको छूट गे फेर रेखा के संग नइ छूटिस।
जिनगी मा जेती देखव तेती रेखा च् रेखा दीखथे फेर गुरुजी के बताए वो दू बिंदु नइ दिखैं जेकर बीच मा कम से कम दूरी नापे नापे जा सके, तिही पायके ये जमाना मा सरल-रेखा नइ दिखय। भाई-भाई के बीच, बाप-बेटा के बीच, पति-पत्नी के बीच, अड़ोसी-पड़ोसी के बीच, कहूँ मेर नाप के देख लव, कम से कम दूरी वाले सरल-रेखा नइ दिखे। हाँ, दिखावा बर कहू तो दुनों बिंदु जरूर एक दिख जाथे फेर ये आँखी के भरम के सिवा कुछु नइये। रेखा के बात चलिस तो लक्ष्मण-रेखा के घलो सुरता आगे। पंचवटी मा रेखा के भीतरी मा सीता मैया अउ रेखा के बाहिर मा साधु के भेस धरे रावण। ढोंगी साधू ऊपर सीता मैया भरोसा करके लक्ष्मण रेखा ला पार कर डारिस। बाकी के किस्सा ला आप मन जानत हव।
आज घलो अमीर-गरीब के रेखा खिंचाए हे। देश के आजाद होए के बाद अपन संविधान लागू होइस। हर नागरिक ला समान अधिकार मिलिस फेर अमीर-गरीब के परिभाषा कोन गढ़ डारिस ? मनखे-मनखे के बीच मा रेखा कोन खींच दिस ? अतको मा मन नइ माड़िस तब गरीबी-रेखा के नामकरण होगे। लोकतंत्र के एखर ले बड़े मजाक का हो सकथे कि इहाँ के स्वतंत्र नागरिक ला गरीबी-रेखा के कार्ड बनाना जरूरी होगे। जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन - लोकतंत्र के इही तो आय परिभाषा। का इही दिन देखे बर हम जन प्रतिनिधि के चुनाव करथन ? हमन जन प्रतिनिधि मन ला ये सोच के वोट दे रहेन कि एमन जनता के सेवा करहीं।कुर्सी मा बइठे के बाद इंकर तीने काम रहि जाथें - शिक्षा, स्वास्थ्य अउ सुरक्षा । एखर अलावा हमर कहे अनुसार सरकार चलावँय। लेकिन उल्टा होगे। कुर्सी मा बइठ के इन मन राजा होगें अउ इन मन ला कुर्सी मा बइठइया मन धुर्रा माटी।
गरीबी रेखा के कार्ड बनवावव, अमका कार्ड बनवावव, ढमका कार्ड बनवावव तब ये मिलही अउ वो मिलही। अच्छा एक बात अउ… गरीबी-रेखा कहे ले स्टैण्डर्ड नइ लागे तब ओखर अंग्रेजी मा नामकरण कर दिन “बी पी एल कार्ड”। ए कार्ड ला बनाने वाला मन खुदे नइ जानँय कि बी पी एल काला कथें। अजीब रिवाज चलत हे हमर देश मा। अपन जनता के सुध नइये अउ अमेरिका, जापान जइसन आने-आने देश ला नेवता देवत हें कि हमर इहाँ आवव,नवा नवा कारखाना अउ उद्योग लगावव। हमन सस्ताहा मजदूर होगेन। अपने देश मा आने आने मन ला मालिक मानत रहिबो। माने मालिकाना हक बिदेसिया के अउ हमन कुली-कबाड़ी। कभू सुरता कर लव कि गाँधी बबा हर बिदेसी कपड़ा के होली काबर जलाए रहिस?
कोनो चाँउर दे के काहत हे - *चल रे - खा* । कोनों चप्पल बाँटत हे, कोनो साइकिल बाँटत हे त कोनो लैपटॉप अउ मोबाइल बाँटत हे। अब तो नगदी रुपिया घलो खाता मा जमा करे के घोषणा होवत हे। हमरे पइसा ला हमीं ला बाँट के एहसान जतावत हे। झन दे भइया चाँउर, चप्पल, साइकिल, मोबाइल अउ लैपटॉप झन दे। किसान मन के खेत मा पानी भर के व्यवस्था कर दे, बाकी इही किसान मन अपन अपन गाँव मा ये सबो जिनिस ला बिसाए के लाइक हो जाहीं अउ बखत परे मा अपन कमाई ले बाँट तको दिहीं।
आप मन सोचत होहू कि बात तो रेखा के करत रहिस अउ रेखा कोन डहर भटक गे ? मन के पीरा हे भइया। पीरा मा बड़े-बड़े मन भटक जाथें, मोर गिनती कहाँ हे?
भटकाव आए जाथे भाई, जब “भारत” हर “इंडिया” बन जाथे, तब भटकाव आथे,जब “गरीबी रेखा” हर “बी पी एल” बन जाथे, तब भटकाव आथे। जब जन-सेवक हर एम पी, एम एल ए, मिनिस्टर, सी एम, पी एम बन जाथे, तब भटकाव आथे।
हाथ के रेखा, माथ के रेखा, पाँव के रेखा पढ़इया के कमी नइये, फेर लोकतंत्र बर किसान के चेहरा के रेखा ला पढ़ने वाला चाही, मजदूर के हाथ मा सुख के रेखा खींचने वाला चाही, बी पी एल के रेखा ला मिटाने वाला चाही। बिदेसी मन ला नेवता दे के जघा अपने बलबूता मा अइसन कारखाना अउ उद्योग लगाने वाला चाही जउन मा चेहरा के झुर्री मिटाए बर नइ, भारत के जनता के चेहरा ले चिन्ता के रेखा मिटाए वाला फेसक्रीम तैयार हो। जनता ला घलो अब तिर्यक रेखा बने ला पड़ही जउन हर दल के समानांतर रेखा ला अइसन काटय कि एकांतर अउ सम्मुख कोन असन अमीर अउ गरीब, बराबरी मा आ जावै।
- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
Sunday, 26 January 2020
माई चिरई - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
कहानी-माई चिरई
छन्नू रतिहा बेरा अँगना म लाल लाल गमकत दसमत फूल तरी खटिया बिछाके,अगास म रिगबिगात चंदा अउ चंदैनी ल फुर्सत म निहारत सोचत रहिथे कि, जिनगी के बाँसठ बछर देखते देखत म गुजरगे, अउ आज मैं अपन नवकरी ले छुटकारा पा चुके हँव।फेर उही बीते बछर के सुरता करत डाकिया बाबू छन्नू के आँखी ले आँसू तरतर तरतर झरे ल लग गिस।वोला अइसे लगत रिहिस कि कालीच तो पट्टी बस्ता धरके ददा दाई के दया मया अउ सपना ल गाँठियाय स्कूल जावत रेहेंव।कालीच तो छन्नू भैया कहिलावत गली गली घूम घूम के चिट्टी पत्री बाँटत रेहेंव,फेर कब छन्नू भैया ले छन्नू बबा होगेंव,तेखर पता घलो नइ चलिस।छन्नू ल लगिस कि सुख के पल अउ कामबूता म खुद ल घलो बरोबर टेम नइ दे पायेंव,त का अपन सुवारी देवकी अउ एकलौता बेटा सुमेर ल टेम दे पाये होहूँ।सुमेर कभू कभू अर्दली करे फेर देवकी छन्नू ल देख बड़ खुश होवय अउ बरोबर दया मया लुटावव। "होनहार बिरवान के होत चिकने पात" ये हाना छन्नू उप्पर एकदम फिट बइठे काबर कि छन्नू बचपन ले बनेच हुशियार अउ संस्कार वान लइका रिहिस।पढ़ाई लिखाई के तुरते बाद जइसने दाई ददा संग जम्मो गाँव वाले मन कहय कि छन्नू पढ़ लिख के नवकरी करही,वइसनेच छन्नू अपन गाँव भर म सरकारी नवकरी करइया पहली लइका बनिस अउ डाकविभाग म पोस्टमैन के नवकरी पाइस। कामबूता बर छन्नू बड़ चंगा अउ चोक्खा रहय,अपन जम्मो काम ल लगन अउ ईमानदारी ले करे।नवकरी पाये के पहिली भी छन्नू के गाँव म बड़ मान गउन होवय,त नोकरी लगे के बाद का कहना? फेर छन्नू ल कभू गरब गुमान अपन चंगुल म नइ फँसा सकिस।रोज जब छन्नू कामबूता निपटाके अपन घर आवय तब वोहा गाँव गुड़ी अउ चौपाल म बरोबर टेम देवय,संगे संग जम्मो बड़का सियान मनके आशीष घलो लेवय।घर म घलो रोज एक दू घण्टा सुमेर ल पढ़ावय अउ झट खा पी के सपरिवार सुत जावय।पहाती पहली छन्नू जागे अउ ओखर आरो ल पाके बाद म कुकरा बासे, चिरई चिरगुन घलो बाद म चहचहावय।छन्नू घर के कामबूता म हाथ बँटावय तेखर बाद नहाखोर के, नास्ता पानी करके,साइकिल ओंटत ऑफिस कोती चल देवय।
छन्नू के सुवारी देवकी अपन आप ल बड़ भागी माने कि मैं नवकरी पेशा वाले आदमी के अर्धांगनी आँव।तभे तो छन्नू के हां में हां मिलावत सदा हाँसत दया मया लुटावय अउ लइका लोग संग घर परिवार के सेवा जतन करत दिन पहावय। रोज पहाती पहाती देवकी उठके,परछी अँगना बाहर बटोर के,चूल्हा चाकी लीप के,नास्ता पानी,खाना पीना बना पहली छन्नू ल ऑफिस बिदा करे, तेखर बाद सुमेर ल स्कूल।पति के ऑफिस अउ लइका के स्कूल जाये के बाद भी देवकी अपन आप ल कभू अकेल्ला नइ पाइस।वो अबड़ लगन अउ आनन्द के संग जम्मो बूता काम ल रोजेच गीत गुनगुनावत गुनगुनावत पूरा करय।रँधई गढ़ई अउ पूजा पाठ के संगे संग देवकी कुछ समय परोसिन मन संग घलो बितावव।देवकी बिहाव होके जब ले ससुराल आय रिहिस,कभू मइके बर सुध नइ लमाइस,अउ बिचारी जाये भी त काखर मया म।ददा तो बिहाव के पहलीच गुजरगे रिहिस अउ दाई बिहाव के एक बछर बाद म।ददा दाई के मया ल देवकी जादा दिन नइ पा सकिस,तेखरे सेती सदा पतिप्रेम म डूबे रहय,अउ ससुराल म ही अपन ददा दाई के मया ल अँचरा म गाँठियाके दिन गुजारय।देवकी सबो गुण म सम्पन्न रिहिस, वो आज के नारी कस भले घर के चार दिवारी ले नइ निकले रिहिस फेर सिलई कढ़ई बुनई सबे काम जाने।देवकी के गुण के सबे प्रसंशा करय चाहे गाँव वाले होय या फेर छन्नू। देवकी प्रसंशा के लइक भी रिहिस, सादा सरल स्वभाव अउ चीज बस के कोनो गरब गुमान नही।छुट्टी के दिन कभू कभू छन्नू देवकी अउ सुमेर ल घुमाये फिराये घलो।कुल मिलाके कहे जाये त जिनगी सोला आना रिहिस न कोनो चीज बस के कमी न कोनो बात के दुख।इही सुख के डोंगा म सवार दूनो प्राणी ल कब चौथा पन अपन काबा म पोटार लिस,तेखर भनक घलो नइ लगिस।
छन्नू अउ देवकी अपन लइका सुमेर के भविष्य ल लेके अबड़ चिंतित रिहिस। ओमन चाहत रिहिस कि लइका पढ़ लिखके अपन पाँव म खड़ा हो जातिस।अउ अइसन कते ददा दाई नइ सोंचय, फेर सुमेर पढ़ई लिखई म थोरिक कमजोरहा रिहिस।बारवीं तक तो लगभग बने बने पढ़िस फेर जब कालेज पढ़े बर शहर गिस ता, ओखर आदत बिगड़त गिस। सुमेर गलत संगत म पड़के नसा पान ,अउ लड़ई झगड़ा करेल लग गिस।कालेज के दू बछर घलो ले देके बितायस, फेर तीसर बछर म बनेच बिगड़ गे अउ एक साल फेल घलो होगे।ददा दाई के चिंता बढ़ेल लग गिस।देवकी कभू कभू छन्नू ल बोले कि सुमेर के बिहाव कर देथन, जिम्मेदारी पाके सुधर जाही फेर छन्नू तियार नइ होय। वो कहय लइका जब जिम्मेदारी उठाये के लइक होय तभे बिहाव करना चाही।कभू कभू सुमेर के व्यवहार ल देख रिस म कह भले देवय कि तोर बिहाव करबों,फेर सुमेर म कोई बदलाव नइ आय। वो लापरवाह बनके घूमय फिरय दारू गाँजा पीयय अउ लड़ई झगड़ा घलो करे।जतके बढ़िया मान मर्यादा अउ नाम छन्नू कमाय रिहिस ओतको बेकार छबि सुमेर के रिहिस।गाँव के मनखे मन ताना घलो मारे कि जादा लाड़ प्यार म लइका के इही गत होथे।छन्नू अभाव अउ दुख पीरा के भट्ठी म पकके बने मनखे बने रिहिस।जब पोस्टमैन के नोकरी लगिस तब छन्नू के मन म कभू आवय कि मोर ददा कर कहूँ अउ सब कुछ रितिस त अउ बड़े नवकरी करतेंव।फेर आज सुमेर ल देख के डर म काँप जावय ।छन्नू सुरता करथे कि भले बालपन म अभाव रिहिस, फेर दुर्गुण अउ कोनो संसो फिकर के चिटिक भी नामो निशान नइ रिहिस, पर आज चौथा पन म जब सब कुछ हे तब जबर संसो अन्तस् ल झगझोरत हे।छन्नू देवकी कर कभू कभू तो अपन दुख के गठरी ल खोलत कहि परे कि टूरा अत्तिक उछन्द अउ झेक्खर हो जही कहिके जानत रहितेंव त नवकरी के एकात बछर पहिली जान दे देतेंव, ताकि मोर जघा वोला जीविकायापन के माध्यम तो मिल जातिस,फेर कोन जानत रिहिस ये सब करम लेखा ल। तब देवकी छन्नू के मुँह म हाथ रखके चुप करावत कहय,वाह स्वामी, फेर मोर का होतिस अउ अइसे कहिके देवकी चिल्लाके रो पड़े। छन्नू के संग देवकी घलो संसो फिकर के घानी मा लइका के गत ला देखत पेराय लग गिस।
एकदिन छन्नू अँगना म बइठे रिहिस ओतकी बेर सुमेर नशा म धुत घर आइस।सुमेर के हाल देख के छन्नू के आँखी लाल होगे अउ बाजू म पड़े लउठी म चार घाँव जमा घलो दिस।छन्नू अउ देवकी भले आज तक गारी देवय फेर एको बेर हाथ नइ उचाय रिहिस।छन्नू कभू सोचे घलो कि कास ये लइका ल पहली ले लउठी पड़े रहितिस, त ये दिन नइ देखेल मिलतिस।सुमेर ददा ल मारत अउ खिसियावत देख गुस्सा होगे अउ रिसे रिस म झोला झांगड़ी सकेल के दस हजार पइसा धरके रात कुन घर ले फरार होगे।देवकी अउ छन्नू तीर तखार ल गजब खोजिस फेर सुमेर के आरो नइ पाइस।अब जब छन्नू अउ देवकी ल सहारा के जरूरत हे तब बाढ़ें बेटा के घर ले भाग जाना कोनो गाज गिरे ले कमती नइ हे।छन्नू के चौपाल,गाँव गुड़ी सब छूट गे।छन्नू खुदे संसो म बोजाय देवकी ल दिलासा देवत बोलय कि जादा दुख झन मना देवकी,पइसा सिराही ताहन का करही, खुदे घर आ जाही। फेर महतारी अन्तस् मा भभकत संसो के आगी कहाँ बुझे? देवकी ल यहू संसो खाये की कहूँ सुमेर चोर ढोर के संगत म झन पड़ जाये, गुंडा मवाली झन बन जाय। छन्नू अपन बचपना के सुरता करत सोंचय कि जब ददा दाई अउ सियान मन गारी देवय अउ गलती म मार घलो देवय,तब हमन वो मार ले सबक अउ सीख लेवन,फेर वाह रे आज के लइका; थोरिक मार अउ फटकार म घर ल तियाग देवत हो।कोन जनी हमर असन कहूँ सबे चीज ल खुदे सिधोवत, ददा दाई के आज्ञा मानतेव तब का नइ करतेव? छन्नू के ददा दाई अपन जाँगर चलत म ही बिना सेवा जतन कराये,झट परलोक सिधार गे रिहिस। कथे दुख म मनखे के दिमाग चारो कोती घूमथे तभे तो छन्नू यहू सोचे कि, जब मँय अपन महतारी बाप के बूढ़त काल म सेवा नइ करे हँव त मोर बेटा बूढ़त काल म मोर कइसे हो पाही, महूँ ल अपन दाई ददा असन झट मर जाना चाही।ये सोच छन्नू के आँखी झलकेल बर धर लेवय।छन्नू ल सुरता आवय सुमेर के ननपन के,जब वोला वो खूब मया करे,पीठ म घोड़ा चघावव,बाजार हाट अउ दुकान घुमावव।छन्नू के घर आते साँट सुमेर ओखर झोला म मिठई खोजे त ड्यूटी जाये के बेरा साइकिल ल रगड़ रगड़ के पोछें अउ बरसात घरी टायर के चिखला ल साइकिल के पैडल ल हाथ म चला चला बड़ मजा लेके निकालय।सुमेर शुरू शुरू म पढ़ई म बने रिहिस,कभू छन्नू कहय घलो तोला नवकरी मिलही रे बेटा बने बने पढ़बे अउ सबके बात बानी मानत बने बने रहिबे।फेर होनी ल कोन जाने? आज सुमेर छन्नू अउ देवकी के डेहरी ल छोड़ के भाग गे हे, दूनो प्राणी दुख के दहरा म उबुक चुबुक करत हें।अब बस दूनो झन घरे म कभू लइका के त कभू यम के रद्दा जोहत दिन अउ रात ल काटेल लग गिस।
एती सुमेर, शहर ले लगे एक ठन होटल के छत म बने कमरा म रहे बर लग गिस,जिहाँ ले एक ठन आमा पेड़ के फुलिंग म बने चिरई खोंधरा चकचक ले दिखे।जेमा एक माई चिरई रहय जउन पहाती खोंधरा छोड़ के उड़ जावय अउ संझौती बेरा फेर लहुट आवय।कुछ दिन बाद वो चिरई घड़ी घड़ी खोंधरा मेर दिखे ल धर लिस।सुमेर के नजर पड़िस त देखथे कि खोंधरा म दू ठन अंडा हे, तेखर सेती माई चिरई जादा दुरिहा नइ जावत रिहिस।कुछ दिन म दू ठन नान्हे चिरई मनके चिंव चिंव गुंजेल लगिस।अब माई चिरई चौबीसों घण्टा पेड़ेच के आजू बाजू दिन बताये बर लग गे,खोंधरा ले दुरिहाय नही।खेवन खेवन अपन चोंच म दाना दबा के लावय अउ नान्हे चिरई मन ल खवावय।ये सब दृश्य ल सुमेर बरोबर रोज देखय।माई चिरई के आहट पाके नान्हे चिरई मन चोंच उठा उठा के नरियावय अउ दाना माँगय।एक दिन रतिहा जइसे सुमेर के नींद पड़त रिहिस ओतकी बेर ओखर कान म माई चिरई के भारी नरियाय के आवाज आय लगिस।सुमेर ओढ़ के सोये के कोशिस करिस फेर सुत नइ पाइस,अंत म का होगे सोचत बाहर आथे त देखथे कि एक ठन बिरबिट डोमी साँप नान्हे चिरई मन ल खाये बर खोंधरा के तीर पहुँच गे हे।माई चिरई अपन जान के संसो करे बिना फन उठाय नांग ल उड़ उड़ के चोंच मारय, अउ भारी नरियावय,ओखर नरियई ल सुनके अइसे लगे जइसे माई चिरई, साँप ल भागे बर काहत घेरी बेरी बखानत हे। आखिर म थकहार के साँप नीचे उतरेल लगिस।माई चिरई के जीत देख के सुमेर के अन्तस् गदगद होगे।एक दिन मनमाड़े हवा गरेर के संग झमाझम पानी गिरे बर लगिस, गड़गड़ गड़गड़ बादर गरजय,कड़कड़ कड़कड़ बिजुरी चमकय अउ पटपट पटपट करा घलो गिरय।सुमेर के जी ये सोच के छटपटाय बर लगिस कि वो खोंधरा म का बीतत होही।हिम्मत करके बाहिर आइस त देखथे के माई चिरई अपन नान्हे चिरई के उप्पर छत बरोबर बइठे हे।हवा गरेर म डारा बिकट लहसे तभो मूसलाधार बरसा अउ टप टप बरसत करा ले नान्हे चिरई ल बचाये बर माई चिरई लगातार जमे हे।थोरिक देर म हवा अउ पानी दूनो थम गे।नान्हे चिरई मन डार म फुदके बर धर लिस।खाना खावत ले सुमेर खोंधरा ल झाँकथे फेर ओला माई चिरई दिखबे नइ करिस।ओखर मन छटपटाय बर धरलिस,तुरते भागत भागत होटल ले उतर के आमा पेड़ कर चल देथे, अउ जउन देखथे ओहर ओखर छाती ल दू फाँकी चीर देथे।माई चिरई, करा अउ पानी म पिटा के जान गँवा चुके रिहिस,ओखर तन म चाँटी झूमत रिहिस। सुमेर के आँखी ले आंसू के धार बरसेल लगगे, वो फफक फफक के रोय लगिस कि वाह रे महतारी चिरई तैं लइका मन बर अपन जान घलो दे देएस,तोर समर्पण ल मैं बारम्बार नमन करत हँव।उही बेरा सुमेर ल पहिली बार दाई देवकी अउ ददा छन्नू के सुरता आइस कि मैं कतेक अभागन आँव जेन दाई ददा ल अकेल्ला छोड़ के भाग आय हँव,कोन जनी मोर लालन पालन वोमन कइसन कइसन दुख पीरा ल झेल झेल के करे होही,मोला धिक्कार हे।सुमेर के अन्तस् ल माई चिरई के मया ममता अउ समर्पण ह रही रही के कुरेदे बर लग गिस,वो दौड़त होटल म आइस अउ अपन झोला झांगड़ी ल खाँध म अरो के घर कोती जाय बर निकलिस ,जावत बेरा खोंधरा ल झाँकथे त देखथे कि नान्हे चिरई म खोंधरा ल छोड़ आने कोती उड़त जावत रहय,अउ एती पेड़ तरी म माई चिरई मरे पड़े हे।ओखर मन म उँखर बर क्रोध उमड़िस, फेर एक क्षण बाद खुद ल वो मेर रख के देखिस त सुमेर के आँसू के धार अउ बढ़गे।माई चिरई ल आमा पेड़ तरी गड्ढा खन के पाटत बेरा सुमेर सोचे लगिस के चिरई मन तो जानथे कि ओखर लइकामन आघू चलके खोंधरा छोड़ उड़ा जाही, ओखर कोनो काम नइ आवय, तभो अइसन मया ममता लुटाथे।फेर हमर ददा दाई मन तो अपन बुढ़ापा के सहारा अउ डीही म दीया बरइया मानथे।अइसन म लइका यदि दाई ददा ल छोड़ देय त ओखर मन म का बीतत होही? अउ जेन ददा दाई ल तज देय वो लइका ले बढ़के मूरुख अउ कोनो नोहे।सुमेर लकर धकर घर म जाके, ददा दाई के पँवरी म जाके गिर जथे। सुमेर के आँखी ले बरसत पछतावा के आँसू ल देख छन्नू अउ देवकी बेटा ल गला लगा लेथे।सुमेर के अन्तस् म वो माई चिरई के मया ममता के खोंधरा बनगे रिहिस।सुमेर अपन ददा दाई संग सबके मन लगाके सेवा करे बर लगगे।अउ एकदिन सुमेर ल घलो सरकारी नवकरी के बुलावा आगे।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको,कोरबा(छग)
Saturday, 21 December 2019
छत्तीसगढ़ी व्यंजन - डॉ. मीता अग्रवाल
Tuesday, 10 December 2019
सोनाखान के शान: वीर नारायण महान - कन्हैया साहू "अमित", चोवाराम "बादल"
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*शहीद वीर नारायण सिंह*
छत्तीसगढ़ के पावन भुइयाँ जेला तइहा के जुग मा दक्षिण कौशल घलो काहयँ, बड़े-बड़े संत, गुरु, ज्ञानी अउ वीर सपूत मन ला अपन गोदी में खेलइया महतारी आय । ए महतारी के अँचरा मा घन जंगल घटते हे त हीरा, सोना ,चाँदी के खदान घलो हाबय । इहाँ के नदिया मन मीठ पानी ले भरे कुलकत- गावत रहीथें ।किसान के कोठी ह अन्न मा भरे छलकत रहिथे ।भगवान राम के महतारी माता कौशिल्या के मइके ए भुइयाँ मा सदा धरम-करम के अलख जागे रहिथे। इहाँ के रहवासी मेहनती, सरु किसान मन ला देख के कतको झन काहत रहिथें-- छत्तीसगढ़िया सब ले बढ़िया।
जुन्ना जुग ले ए भुइयाँ मा देशभक्ति के पुरवइया तको फुरुर-फुरुर चलत हे।अन्याय, अत्याचार के विरोध करें मा छत्तीसगढ़िया कभू पिछू नइ राहयँ। भारत के पहली स्वतंत्रता संग्राम ले घलो पहिली इहाँ के सपूत मन अंग्रेज मन के मुकाबला करे हें।उही कड़ी मा सोनाखान के वीर सपूत नारायण सिंह अउ ओकर पूर्वज मन ला भुलाये नइ जा सकय।
वर्तमान मा बलौदाबाजार जिला मुख्यालय ले लगभग 70 किलोमीटर दूरिहा मा डोंगरी पहाड़ के बीच, घन जंगल मा सोनाखान नाम के गाँव, जेला सिंघगढ़ घलो काहयँ, हाबय। जेन हा 17 वीं शताब्दी मा सारंगढ़ के राजा के वंशज मन के जमीदारी के राजधानी बने रहिसे। इहें के परजा हितैषी वीर जमीदार रामराय के धर्मपत्नी रानी रामकुँवर देवी के कोंख ले सन 1795 मा महान प्रतापी बालक नारायण सिंह के जनम होइच।
कहे गे हे--होनहार बिरवान के होत चिकने पात। सोला आना सहीं बात आय। बालक नारायण सिंह ला खून मा दाई के धार्मिक संस्कार और पिता के दयालु पन ,वीरता के गुण मिले रहिसे। जमीदार रामराय परजा के हित करे बर कई बेर अंग्रेज मन ले झगरा लड़ाई करिच ।अपन बिंझवार आदिवासी सेना के संग मा सन 1818- 19 म अंग्रेज अउ भोंसले राजा के विरोध मा तलवार उठाइच। तेकर सेती कैप्टन मैक्सन हा ओला अपन बड़े दुश्मन मानय।
परोपकारी जमीदार राम राय के सन 1830 मा इंतकाल होये के बाद 35 साल के उमर मा युवराज नारायण सिंह हा सोनाखान के जमीदार बनिच अउ अपन जिनगी ला परजा मन के सेवा मा खपाये ल धरलिच । ओकर निस्वार्थ सेवा अउ राजकाज ला देख के जम्मों परजा अब्बड़ खुश राहयँ ।
जमीदार नारायण सिंह ह अपन दुलरुवा घोड़ा म बइठ के, कनिहा मा तलवार खोंचे, घूम-घूम के अपन परजा के सुख-दुख के सोर -सन्देशा लेवत राहय। एक दिन एक झन आदिवासी हा गोहराइच-- जमीदार महराज, रक्षा करव। एक ठन बघवा हा अबड़ेच उतपित करत हे। हमर पाले-पोंसे गाय-गरुवा, छेरी-बोकरा मन ला हबक-हबक के खावत हे।अतका ला सुन के वीर नारायण हा अपन जान के बाजी लगाके तुरते बघवा ला खोज के मार देइच ।चारों मुड़ा जय जयकार होगे। बताये जाथे उही दिन ले वोला चालबाज अंग्रेज मन वीर के उपाधि देये रहिन।
सन 1856 के बात आय। भारी दुकाल परगे।लोगन दाना-दाना बर मोहताज होके भूँख मा मरे ल धरलिन। वीर नारायण सिंह ले उँकर दुख देखे नइ जाय। अपन कोठी के जम्मों धान कोदो ला बाँट दिच फेर कतका झन ला पुरतिच भला ? वोहा बड़े-बड़े सेठ साहूकार मन सो हाथ पसार के अन्न माँगय।जेन मिलय तेला बाँट दय।सहीं बात ये - पाँचों अँगुरी एके बरोबर नइ होवय। कतको के हिरदे पथरा कस निष्ठुर होथे।ओइसने काइयाँ कसडोल के सेठ माखन रहिसे। वीर नारायण सिंह ह उहू ला गोहरावत कहिच-- सेठ जी! लोगन भूख मा मरत हें। तोर गोदाम मा अबड़े धान-चाउँर भरे हे। किरपा करके ओला बाँट दे ।आगू बछर धान- पान होगी तहाँ ले तोला लहुटा देबो।ओतका ला सुन के माखन भन्नागे अउ इंकार करत हाथ हलादिच । तब तो वीर नारायण सिंह हा आव देखिच न ताव , गोदाम के तारा ल टोर के धान -चाउँर ला बाँट दिच।वोती माखन ह रायपुर जाके अंग्रेज कैप्टन इलियट करा शिकायत कर दिच। अंग्रेज मन तो ओखी खोजत राहयँ। चोरी अउ डकैती के आरोप मा 24 अक्टूबर 1856 के संबलपुर मा वीर नारायण ला पकड़ के रायपुर के जेल मा डारदिन।
फेर शेर हा पिंजरा मा कतका दिन ले धँधाये रतिच ? 28 अगस्त 1857 ई. मा वीर नारायण सिंह हा अपन तीन झन साथी मन संग जेल ले फरार होके सीधा सोनाखान पहुँच गिच। वो हा अंग्रेज मन ले निपटे बर तीर-कमान वाले सेना के संग 500 बंदूकधारी सेना के गठन करिच ।एति एलियट हा कैप्टन स्मिथ ला आदेश देवत कहिच--जा नारायण ला जिंदा या मुर्दा लाके देखा।आदेश पाके कैप्टन स्मिथ हा भारी सेना लेके सोनाखान ला चारों मुड़ा ले घेरलिच।वीर नारायण सिंह हा कुर्रूपाट के डोंगरी ऊपर मोर्चा संभाले राहय।भारी लड़ाई होइच। स्मिथ अउ ओकर सेना के पाँव उखड़े ल धरलिच। बहुँते सैनिक मरगें।उही समय देवरी के गद्दार जमीदार हा आके स्मिथ सँग मिलगे। भारी मारकाट मातगे।फेर वीर नारायण हाथ आबे नइ करत रहिच। तब अंगेज मन गाँव मन मा आगी लगाये ल धरलिन। निहत्था परजा मन ला मारे काटे ल धरलिन।जेला देख के अपन परजा ला बँचाये खातिर वीर नारायण हा आत्म समर्पण कर दिच।
कैप्टन स्मिथ ला ओला पकड़ के रायपुर के जेल मा ओलिहा दिच। अंग्रेज मन ओकर उपर चोरी अउ डकैती के देखवटी मुकदमा चलाके, मौत के सजा सुनाके 10 दिसम्बर 1857 के दिन आज के रायपुर मा जेन जगा जयस्तम्भ चौंक हे उही जगा तोप मा बाँध के उड़ा दिन।
अपन परजा अउ महतारी भुइयाँ खातिर जान गवाँके वीर नारायण सिंह हा अमर होगे। जब ले ए धरती रइही, जब ले सुरुज- चन्दा रइही ,तब ले वीर नरायन सिंह के नाम अम्मर रइही।
छत्तीसगढ़ महतारी के वीर सपूत , प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी ला कोटि कोटि प्रणाम हे।
चोवा राम 'बादल '
हथबन्द (छत्तीसगढ़)
9926195747
Thursday, 21 November 2019
अगहन बिरसपति के पूजा
हिन्दू पंचाग मा अगहन महीना के बहुत महत्व हे। कातिक मास के बाद अगहन मास में बिरस्पत (गुरुवार) के दिन अगहन बिरसपति के पूजा करे जाथे।
बिरसपति देव के पूजा करे ले घर मा सुख शांति, समृद्धि, धन वैभव अउ सबो मनोकामना पूरा हो जाथे। अइसे लोगन मन के धार्मिक मान्यता हे।
पूजा के तैयारी ------- अगहन बिरसपति पूजा के तैयारी ल बुधवार के साँझकुन ले ही शुरु कर देथे। सबले पहिली घर दुवार , अँगना , खोर ला बढ़िया लीप बहार के साफ सुथरा करे जाथे। घर के बाहिर दरवाजा मा बढ़िया रंगोली बनाय जाथे। घर मा लक्ष्मी माता के आसन बनाय जाथे। लक्ष्मी दाई के पाँव बनाय जाथे। घर ल तोरण पताका से सजाय जाथे।
लक्ष्मी माता के आसन ------- अगहन बिरसपति के दिन बृहस्पति देव अउ लक्ष्मी माता के चित्र आसन मा रखे जाथे।
आसन के तीर मा रखिया, अँवरा (आँवला), अँवरा के डारा, केरा पत्ती, धान के बाली आदि सामान रखे जाथे।
ये पूजा मा रखिया अउ अँवरा के बहुत महत्व हे।
एकर अलावा गेंदा के फूल, पीला चाँऊर , चना ,पीला कपड़ा अउ मीठा पकवान रखे जाथे।
पूजा के बाद मँझनिया (दोपहर) कुन कथा सुने जाथे तभे पूजा पूरा होथे।
पूजा पाठ करे के बाद प्रसाद बाँटे जाथे ।
बिरसपति देव के कथा ------- बहुत दिन के बात हरे। एक राज्य मा एक बहुत प्रतापी अउ दानी राजा राज करत रिहिसे । वोहा रोज गरीब मन ल दान देवय अउ ओकर सहायता करे। फेर ये बात ह रानी ल अच्छा नइ लगत रिहिसे ।।वोहा न तो कभू दान देवय न काकरो सहायता करे।
एक दिन राजा ह शिकार करे बर जंगल गे रिहिसे , उही बेरा भगवान बृहस्पति देव ह साधु के भेष मा महल मा भिक्षा माँगे बर आइस। रानी ह भिक्षा देबर इंकार कर दीस, अउ बोलथे -- हे साधु महराज मेहा तो राजा के दान पून करे ले तंग आ गे हँव। रोज के रोज दान करत रहिथे। आप ह मोला कुछु अइसे उपाय बतावव जेकर से ये सब धन दौलत ह खतम हो जाये। न रहे बाँस न बजे बाँसुरी । ताकि मेंहा चैन से रहि सँकव।
साधु महराज बोलथे --- रानी तेंहा तो अजीब बात करत हस। आज तक तो कोनों धन दौलत से दुखी नइ होय हे। फेर ते तो उल्टा बोलत हस।
रानी बोलीस के- --' हाँ महराज मँय सचमुच में तंग आ गे हँव।
तब साधु महराज बोलथे कि ------ अइसे करबे बिरस्पत के दिन घर ल लीपबे पोतबे, पीला माटी से केश धोबे, माँस मदिरा के सेवन करबे, धोबी ल कपड़ा धोय बर देबे। अइसे करे ले सब धन ह नष्ट हो जाही।
जइसे ही साधु महराज गीस रानी ह ओइसने करे ल धर लीस। बिरस्पत के दिन माँस मदिरा खाय के शुरु कर दीस। धीरे धीरे सब धन दौलत कम होय ल धर दीस। तीन बिरस्पत बीते के बाद राजा के सबो धन नष्ट हो गे। राजा रानी के ऊपर भारी विपत्ती आ गे। राजा रानी बहुत गरीब हो गे। खाय पीये बर तरसे लगीस।
ये सब ल देख के राजा ह काम करे बर दूसर देश चल दीस।
एक दिन रानी ह अपन दासी ल बोलीस के पास के नगर मा मोर बहिनी रहिथे। वोहा अब्बड़ धनवान हे। ओकर तीर ले कुछ अनाज माँग के ले आतेस त हमर कुछ दिन के गुजर बसर चल जाही।
दासी ह ओकर बात मान के रानी के बहिनी के घर मा गीस। वो दिन बिरस्पत रिहिसे । रानी के बहिनी बृहस्पति देव के कथा सुनत रिहिसे ।
दासी ह रानी के संदेश ल ओकर बहिनी ल बताइस। फेर ओकर बहिनी ह कुछु जवाब नइ दीस।
दासी ह वापिस आ के रानी ल बताइस। रानी ह बहुत दुखी होइस।
रानी के बहिनी ह पूजा पाठ पूरा करके जब उठीस त ओहा सीधा रानी के महल मा गीस, अउ बोलीस -- मेंहा बृहस्पति देव के कथा सुनत रेहेंव तेकर सेती दासी ले कुछु नइ बोलेंव। का बात हे अब बता। दासी काबर गे रिहिसे?
तब रानी ह अपन बहिनी ल सब बात ल बताइस अउ दुख ल सुनाइस।
तब रानी के बहिनी ह बृहस्पति देव के पूजा करे के सलाह दीस अउ सब विधि -विधान ला बताइस।
रानी ह ओकर बात मान के बृहस्पति देव के विधि - विधान से पूजा करे ल धरलीस। धीरे- धीरे ओकर घर मा धन संपत्ति बाढत गीस। कुछ दिन बाद राजा भी घर मा आ गे। अब राजा अउ रानी सुख से रहे ला धर लीस। फिर से दान पुन करे ला धर लीस।
लोक मान्यता हे कि ये कथा ला सुने से सब प्रकार के मनोकामना पूरा होथे , अउ घर मा लक्ष्मी के वास होथे।
बोलो बृहस्पति देव भगवान की जय ।
लेख
महेन्द्र देवांगन "माटी" (शिक्षक)
पंडरिया (कवर्धा)
छत्तीसगढ़
8602407353








