Friday, 20 November 2020

देवारी तिहार, जन मान्यता अउ वैज्ञानिकता-पोखनलाल जायसवाल

 देवारी तिहार, जन मान्यता अउ वैज्ञानिकता-पोखनलाल जायसवाल

      भारत भुइँया ल तीज-तिहार के देश कहे जाथे। अपन सँस्कृति, संस्कार अउ मान्यता ले हमर देश संसार भर अपन अलग चिन्हारी राखथे। ए भुइँया ऋषि-मुनि अउ तपस्वी मन के भुइँया आय। ए धरतीपूत किसान घलो कोनो तपस्वी मन ले कम नइ रेहे हे, न कम हावै। अपन मेहनत ले ए धरती ला सदा दिन सजाय अउ सिरजाय के बूता करे हे अउ करते हे। दिन रात खेत म गड़े रहिथे। कभू सुरताय के नाँव नइ लै। एक बूता पूरा होइस, त दूसर बूता के जोखा माढ़ जथे। अभीच देख लौ, धान-पान ल बटोरत हे अउ ओनहारी उतेरे अउ बोय के जोखा करत हावै। ओनहारी सियारी सकेले के पाछू थोरकेच दिन म खातू-पाला पालथे। इही बीच मेड़ पार म ढेलवानी घलो दे डारथे। ए तरह ले देखन त किसान मनखे मेर फुरसुदहा बइठे बर बेरा बाँचबे नइ करै। उन ला कोनो दिन छुट्टी नइ मिलै।

      तइहा जुग म थके-हारे मनखे मन अपन आप ल आराम दे हे खातिर उपाय करे रहिन। मुहाचाही गोठियाय बतियाय बर अउ सुरताय बर उदीम करिन। इही उदीम अउ उपाय हर तीज तिहार आय। जे मा एक बूता ल करे के पहिली अउ करे के बाद मन म नवा उछाह अउ उमंग ले बूता ल शुरु करे के सोचिन हे, कहे बानी लगथे। उछाह शब्द उत्साह के छत्तीसगढ़ी रूप कहे जा सकथे। इही उत्साह ले उत्सव शब्द के उत्पत्ति विद्वान मन माने हें। कोनो भी उत्सव के आय ले काम बूता ले छुट्टी मिल जथे। छुट्टी याने छूट मतलब दू छिन काम नइ करे के बखत। फेर हमर पुरखा मन अइसन बखत के चुनाव करें हावैं कि कोनो बूता म बाधा होबे झन करै। आप गुनान करके देख लौ, कोनो तिहार आप ल अइसन नइ मिलै, जे काम बूता म बाधा बनै। बहुत अकन तिहार म आप ल वैज्ञानिक आधार भी देखे म मिलही। ए आधार आप खुदे खोजे के कोशिश करौ।

      तिहार मन म अइसने देवारी तिहार घलो हे। जेन म लक्ष्मी दाई के पूजा, गोवर्धन पूजा अउ भाईदूज प्रमुख माने जाथे। धनतेरस घलो शामिल होथे।

     लक्ष्मी जेन ल हिन्दू रीति-रिवाज ले धन के देवी कहे या माने जाथें। धन के नाँव लेते साठ मन म संपत्ति, दौलत, जमीन जायदाद अउ धान-पान के भाव आथे। धरती पूत के मेहनत ले उपजे खेत के लक्ष्मी के घर म स्वागत ही लक्ष्मी पूजा ले जाने जाथे। इही स्वागत म दीया बारे जाथे। ए दीया कुम्हार ले बिसा के उँखर अँधियार जिनगी म अँजोर बाँटे के उदीम होथे। ए दिन के एक मान्यता ए हवै कि इही कातिक अमावस्या के दिन भगवान राम चौदह बछर के वनवास ले लहुटे रहिन। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम आसुरी शक्ति मन के नाश करिन, जन कल्याण करिन। ते पाय के राम जन-जन के पूज्यनीय बनिन। ओकरे स्वागत म अयोध्या नगरी म ओरी-ओर दीया बारे गे रहिस। एकरे सेती एला दीपावली कहे जाथे। छत्तीसगढ़ राम के ममियारो आय, ते पाय के छत्तीसगढ़ म अपन भाँचा के जिनगी म अच्छा दिन लहुटे के खुशी अउ राज मिले के आस म घरोघर अँजोर बाँटथे। सुरहुति दिया बारथे। दूसर मान्यता यहू हवै कि धन के देवी लक्ष्मी ए रात के धरती के विचरण करथे। अपन कृपा प्रसाद ले कतको मन ल तारथे। जेकर ऊपर कृपा बरसथे, ओकर घर समृद्धि आथे। इही पाय के साफ-सफई के जतन घरोघर करे जाथे। साफ-सफई ले रहे ले जिहाँ तन बने रहिथे, उहें बने बने बिचार आय ले दिल अउ दिमाग के पोषण होथे। जेकर ले समृद्धि के दुआर खुलथे। ए दिन ल लेके अउ कतको मान्यता अउ विश्वास जुड़े हावैं।

         दूसरइया दिन देवारी जेला अन्नकूट या गोवर्धन पूजा के नाँव ले जानथन। ए दिन कतको परिवार नवा खाय बर अपन कुलदेवता ले असीस लेथे, उन ल नवा चाउँर के बने रोटी-पीठा (रोंठ)चढ़ा के पूरा परिवार हली-भली ले नवा खाथे। नवा खाना मतलब नवा फसल के अनाज/अन्न ल पका के भरपूर आदर भाव ले सपरिवार उपभोग करना आय। अइसे मान्यता हवै कि आज के दिन ही कृष्ण भगवान गोवर्धन परबत ल उठा के गोकुल वासी मन के रक्षा करे रहिन हे। तिही पाय के एला गोवर्धन पूजा घलो कहे जाथे। ए दिन गाँव-गाँव म साँहड़ा देव चौक म गोबर के गोवर्धन बना के राउत बंधुमन कोति ले पूजा करे जाथे, जेमा गाँव के सबो समाज के मनखे जुरियाथें अउ एक दूसर ल बधाई देथे, शुभकामना देथे। 

      आज के बदलत समय म कतको विचार धारा इहाँ पनप गे हे। जेन मन दीपावली देवारी के अपन ढंग ले व्याख्या करथें। इही नवा विचारधारा ले प्रेरित एक वर्ग हे जउन मन देवारी तिहार ल गरीब मजदूर अउ किसान ल लूटे के षड़यंत्र बताथे। बैपारी वर्ग के षड़यंत्र हरे कहिथें। ए मन वैज्ञानिकता के नाँव ले गरीब अउ अशिक्षित मन के आस्था ल भटकाय के बूता करथे। बने होतिस कि संस्कार, संस्कृति, अउ रीति रिवाज के वैज्ञानिक पक्ष खोजतिन अउ उन ल बाँटे के साजिश नइ करतिन। मैं अतका जानथौं कि जेन लुटाना चाहथे तेने ल कोनो लूटथे। आज कतको धोखाधड़ी होवत हे, सुनत हें, पेपर म पढ़त हें, तभो ले मनखे लालच म पड़ के लुटेरा मन के चंगुल म फँस जथे। आज जमाना अइसे होगे हवै कि फोकट म कोनो ल एक रूपया देवइया नइ मिलै, त इनाम अउ लाटरी के नाँव म कोन दानी ह हम ला दान दिही? सोचे के बात हे। बैपार के मतलब सोज-सोज कहन त लेन-देन आय। ए तो तब ले चले आवत हें, जब ले मानव जीवन के विकास यात्रा शुरु होय हे। बजार-हाट अउ मँड़ई-मेला बैपार ल बढ़ाय के जगह आय। मँड़ई-मेला अउ हाट-बजार के जानकारी पुरातत्व वेत्ता मन देथे। सिरपुर म घलो खनन के बाद ए बात के प्रमाण आजो देखे जा सकत हे। बैपारी दू पइसा कमाबे करही। ए अलग बात आय कि आज मनखे के सइता नइ रहिगे हे। सकेलो-सकेलो होगे हे। इही चक्कर म जादा मुनाफा कमाय धर ले हे। आबादी बाढ़े पाछू बैपार घलो बाढ़े हे। आज बजार म सबो जाति अउ वर्ग के बैपारी हवै। अइसन म तिहार-बार ल बैपारी मन के षड़यंत्र बताना समाज ला तोड़े के प्रयास मानथौं। हमर सियान मन के सियानी गोठ हे, पाँव ओतके पसार जतका लम्बा चद्दर हे। मैं तिहार के आड़ म उदाली मारत जादा खरचा करिहौं त नुकसान तो मोरे होही। करजा बोड़ी करहूँ त छूटे ल मुही ला परही। अब *पर भरोसा तीन परोसा*, के जमाना नइ हे। ए सबो जाने धर ले हे। 

       तीज-तिहार के आय ले परिवार अउ समाज जुरमिल के उछाह मनाथे, मनखे एक दूसर ले सुख-दुख ल बाँटे के मौका पाथे। ए तीज-तिहार के पाछू के मरम मनखे ल नैतिक रूप ले अच्छा चरित्रवान बनाथे। काम-बूता के हरहर-कटकट ले थोकिन आराम करे अउ खुश होय के मौका लाथे। जेन ल ए सब नी भाय ओमन रंग मा भंग डारे खातिर नवा-नवा उदीम खोज तइहा के चलागन ला फालतू बताय के कोशिश करथे। तीज तिहार मन घर-परिवार अउ गाँव मा एका के कारण बनथे।  जे मन नी चाहे कि गाँव अउ समाज म सुमता अउ एका राहै, ओमन कतको मनगढ़ंत गोठ बना भेंगराजी डारथे अउ अपन काम निकालथे।

       मौसम/ऋतु परिवर्तन के बाद चिखला माटी सूखा जथे। घर-अँगना, बारी-बखरी अउ तीर तखार के साफ-सफाई जरूरी हो जथे। ए सब तिहार के नाँव लेके हो पाथे। एक तरह ले देवारी तिहार स्वच्छता ले  तइहा के जुड़े हावै। आज स्वच्छता के महत्तम ला सबो जाने धर ले हें। साफ-सफई रहे ले बेमारी के फैलाव नइ होय। जेकर ले तन ल कोनो कष्ट नी मिलै। धन के बचत घलो होथे। मन चंगा घलो रहिथे। अइसन मा समृद्धि घर म आथे। ए बात के जानबा हमर पुरखा मन ल रहिन हें तभे देवारी तिहार मा साफ-सफई, लिपई-पोतई के नेंग राखे रहिन। इही ए तिहार के वैज्ञानिक आधार आय कहे जा सकत हे। 

        भाई-दूज देवारी तिहार के आखिरी दिन आय। जेन भाई-बहन के प्रेम के उद्गार आय। भाई-बहन एक-दूसर के हित बर सोचथे। ए जग कल्याण के भावना ले भरे परब आय। हो सकत हे हमर पुरखा मन अज्ञानता ले जेन ल भगवान के दरजा देइंन उन ल हम भगवान नइ मानन। भगवान जइसे कोनो जिनीस नइ होय काहन। फेर ओकर पीछू के मंगल भावना जग कल्याणकारी हे। ए ल जरूर सोचे के जरूरत हे। 

       हाँ! समय के संग बदलाव जरूरी हे। बदलाव प्रकृति के नियम ए। जे बदलाव जिनगी मा खुशी भरै। जिनगी मा रंग भरै। वो बदलाव होना चाही। बदलाव के नाँव म आँखीं मूंद के अपन पुरखा मन के रीति-रिवाज ल छोड़े नइ जा सकै। ए बात के खियाल राखे ल परही।


*पोखन लाल जायसवाल*

पलारी बलौदाबाजार

9977252202

मोर देवारी-चोवाराम वर्मा"बादल"

 मोर देवारी-चोवाराम वर्मा"बादल"


रेल्वे स्टेशन के सुविधा अउ बने बड़े स्कूल म परिवार के लोग लइका मन ल पढ़ाये के लालसा म लगभग 35 बछर होगे हे अपन जन्मभूमि ले लगभग 12किमी दूरिहा कस्बानुमा गाँव हथबंद म घर बनाके राहत। इहाँ बसे के अबड़ फायदा होइस काबर के संयुक्त परिवार के जम्मो भतीजा-भतीजिन मन ल उच्चशिक्षा मिलिस।मोरो लइका मन पढ़िन-लिखिन।

 बसे बर हथबंद म भले बस गेंव फेर एको तिहार आज तक इहाँ नइ मनाये अँव। छोटे ले लेके बड़े तिहार तको ल अपन छोटे से जन्मभूमि गाँव जेन सिरतो म सरग ले बढ़के लागथे उहें मनाथँव। बाहिर म कतको मान सम्मान  मिल जथे फेर अपन जन्मभूमि के संगी संगवारी मन ले , सियान मन ले,दीदी दाई ,बहिनी भाई मन ले मिले निश्छल प्रेम मया-दुलार,आशिर्वाद के बाते निराला होथे।जन्मभूमि के चंदन कस धुर्रा के मोल हीरा मोती ले आगर होथे। मन के पठेरा ले कोनो सुरता निकल के जब आँखी म झुले लगथे,कोनो ह गुदगुदाये हँसवाये ल धर लेथे अउ कोनो कोनो ह चिटिक रोवा तको देथे त वो आनंद के वर्णन नइ करे जा सकय। 

   इही सब कारण मन ल सोंच के मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ह कहे रहिस होही---जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी--

    जइसने कोनो तिहार लकठियाथे ओइसने मन ह गाँव घर जाये बर दू चार दिन पहिली ले तुकतुकाये ल धर लेथे। इहू साल सुरहुत्ती के एक दिन पहिली ले तैयारी होगे रहिस। भइया अउ संगवारी मन के फोन आये ल धर ले रहिस। हथबंद के घर म संझा 7 बजे पूजापाठ करके पारा परोस म परसाद बाँट के अउ परोसी सियान कका ल चार दिन बर दियबाती अउ रखवारी के जिम्मेदारी देके पहुँचगेन अपन जन्मभूमि।

   उहाँ के आनंद ल का कहिबे ।पूरा बस्ती म चारों खूँट रिगबिग रिगबिग दिया के जोत।रहि रहि के दनाका फटाका के जयघोष। रात भर चहल पहल। गौरी गौरा के बिहान के होवत ले बिहाव ।तहाँ ले नहा धोके दस बजे ले दू बजे तक विसर्जन। संझा बेरा गोवर्धन पूजा। गोबर के टीका लगा के एक दूसर ले मेल मिलाप।

  बिहान भर मातर तिहार। उमंगे उमंग। चार दिन कइसे पहाइच पतेच नइ चलिस। 

   ए साल के देवारी तिहार म एक फरक देखे ल मिलिस कि कुछ मनखे मन कोरोना के डर म मास्क लगाये रहिन फेर अधिकांश मन पालन नइ करिन। मातर के दिन खीर के परसाद बँटय तेन ए साल कोरोना के सेती नइ बाँटे गिस।राउत नाचा म आधुनिकता के रंग चढ़े दिखिस त ए साल पिछू साल ले जादा पिये खाये लड़भड़ावत मनखे मन ल देख के बहुत दुख तको लागिस।

      

चोवा राम 'बादल' 

हथबंद, छत्तीसगढ़

जेठवनी ले जुड़े लोक मान्यता के वैज्ञानिक पहलू- पोखनलाल जायसवाल

 जेठवनी ले जुड़े लोक मान्यता के वैज्ञानिक पहलू- पोखनलाल जायसवाल

     

       अइसे कोनो मनखे नइ हें, जेन कार्तिक महीना के महत्तम ले  परिचित नइ होहीं। छत्तीसगढ़ म दशराहा माने के बिहान भर ले कार्तिक नहाय अउ रामधुन के संग प्रभात फेरी के रिवाज तइहा ले चले आवत हें। आज के नवा पीढ़ी के रामधुनी पार्टी ले नइ जुड़े से ए नँदावत हे। अब कतको गाँव म प्रभात फेरी नइ होवय। महीना भर कार्तिक स्नान करे के पाछू पुन्नी स्नान के संग आँवला छाँव तरी खीर पका के प्रसाद बाँटे जाथे। लोक मान्यता हवै कि कार्तिक स्नान ले कुँवारी कन्या ल मनवांछित वर के प्राप्ति होथे। ए स्नान के बहाना बेरा उए के पहिली जागे के आदत बनय। जउन पढ़इया लइका मन बर बने रहिथे। मुँधरहा शांत वातावरण म पढ़े ले पाठ के तियारी बने होथे माने जाथे। मन एकाग्र रहिथे तभे कोनो भी बुता म मन रम थे अउ बुता सफल होथे। बिहनिया के नवा किरण नवा ऊर्जा के संचार करथे।मन म नवा उत्साह भरथे। तभे सूरज ल प्रकृति के पोषक माने गे हे। इही धरती बर ऊर्जा के मूल स्त्रोत आय।

       कार्तिक अमावस के दिन दीपावली अउ बिहान भर देवारी माने जाथे। अँजोरी पाख के एकादशी के दिन जेठवनी/देवउठनी परब  माने जाथे। ए तरह ले कहे जाय त कार्तिक महीना तीज परब अउ बड़ महत्तम के महीना होथे।

      जेठवनी के दिन खुसियार के मँड़वा सजा के तुलसी महरानी अउ शालीग्राम के बिहाव रचाय जाथे। इही दिन ले खुसियार खाना शुरुआत करे जाथे। लोक मान्यता के मुताबिक ए दिन ल मंगल कारज बर-बिहाव के नेंग जोग,भवन निर्माण के पूजा-पाठ जइसे जम्मो नवा काज के शुरुआत बर उत्तम माने जाथे। ए दिन ल देवउठनी एकादशी के नाँव ले घलो जाने जाथे। देवउठनी मतलब देवता  धामी मन के जागरण के दिन। एक अउ मान्यता के अनुसार आसाढ़ शुक्ल एकादशी ल देवसुतनी एकादशी कहे जाथे, जेकर अनुसार ए दिन ले चार महीना देवता धामी मन धरती म विचरण नइ करे। विचरण नइ करना मतलब आराम करना अर्थात् सुतना/सो जाना आय। ए तरह ले ए एकादशी देवसुतनी एकादशी कहाथे। तब ले जेठवनी एकादशी तक कोनो भी काम के शुरुआत के मनाही रहिथे। देवता धामी मन के आशीर्वाद नइ मिलय जान के जम्मो नवा काम ल कुछ दिन बर स्थगित कर दे जाथे। ए समय के मौसम ऊपर धियान दे जाय त पता चलथे कि ए चार महीना ह चउमास के महीना होथे। जेमा खेती-बाड़ी के बड़ बुता रहिथें अउ सावन-भादो के बरसा ले घर-दुआर रोहन-बोहन रहिथें। तइहा के बेरा म गली-खोर म माड़ी भर गैरी माते राहय। आवाजाही बड़ मुश्किल हो जाय। कोनो भी कार्यक्रम करे म पहुना मन बर रहे-बसे के बेवस्था गड़बड़ात रहिन। पानी-काँजी म सबो के खान-पान के बरोबर बेवस्था नइ करे जा सकत रहिन, अइसे प्रतीत होथे। आज घलो एकर सहज कल्पना करे जा सकत हे। संगेसंग यहू विचार करे जा सकत हे कि बछर भर के खाय बर अन्न उपजाना अउ ओकर चिंता करना ले, बड़का अउ कोनो काम हो नइ सकय। इही कारण रहिन होही जे चउमास भर कोनो भी काम के शुरुआत करना ल तइहा म अच्छा नइ मानिन होही। आज सबो मौसम ले बाँचे बर नवा-नवा तकनीक आगे हे। सबो प्रकार के बेवस्था हो सकत हे। गली-खोर म चिखला-माटी नइ राहँय। बारहमासी आवाजाही के बेवस्था हे। कोनो प्रकार के दिक्कत के सवाले नइ हे। चउमास के बीते ऊपर ले चारों मुड़ा सुक्खा जउन रहिथे।

      खार के लक्ष्मी घर म पाँव धर डरे रहिथे...पाँव धरे के अगोरा रहिथे। नवा काज करे खातिर सबके हाथ कच्चा रहिथे। अजम हो जथे कि असो अमुक बुता ल करे म कोनो दिक्कत नइ होय। नोनी-बाबू के हाथ पिंवराए जा सकत हे। रहे-बसे बर छाँव के बेवस्था ल सुधारे जा सकत हे।

        जेठवनी के दिन कतको घर गाय ल सोहई बाँधे जाथे। सोहई बँधइया राऊत भाई ल अपन तरफ ले भेंट स्वरूप कपड़ा, धान, पैसा जउन बने दे के सुग्घर परंपरा चले आत हे। जेला पाके राऊत मन असीस देथें...अन्न धन ले भरे रहय भंडार। ए असीस म राउत जिहाँ किसान के भंडार भरे रहे के कामना करथे, उहें अपन पेट के चिंता घलो करथे। ए रीत ह किसान अउ राऊत के आपसी संबंध ल सजोर बनाथे। दूनो के खुशहाली के प्रतीक घलो बनथे। 

       अपन लोक संस्कृति, लोक परम्परा अउ लोक मान्यता मन ल अँधविश्वास, रूढ़िवादिता ए कहिके एक सिरा ले खारिज करे के पहिली सोचन। वोकर पाछू का भेद हवय?  तब अउ अब म जरूरत के जिनीस के उपलब्धता अउ पर्याप्तता म फरक ल समझन। समय के संग बदलाव जरूरी हे। फेर बदलाव के अर्थ ए नोहय कि पूरा के पूरा बदले जाय। विकास के नाव म जइसे कोनो भी वैज्ञानिक खोज म संशोधन कर परिष्कृत करे जाथे, वइसने लोक मान्यता, परम्परा अउ संस्कृति ल समय प्रासंगिक बनाना ही सही बदलाव रही। अइसन बदलाव के स्वागत भी करना चाही।


*पोखन लाल जायसवाल*

पलारी (बलौदाबाजार)

दू ठन उपराहा-चोवाराम वर्मा 'बादल' (कहानी)

 दू ठन उपराहा-चोवाराम वर्मा 'बादल'

(कहानी)


मातर के बिहान दिन बिहनिया-बिहनिया पारा के माई लोगिन मन बोरिंग मेर पानी भरे बर जुरियाये साग-भात, रोटी-पीठा ,खाना-पीना , कपड़ा-लत्ता अउ तिहार के चिनहा गाहना गूठी ले लेके गाँव म होये झगरा-झंझट ल गोठियाये म मगन रहिन उही समे रामबती ह तको हँउला धरे पहुँचगे। वोकर गोड़ के नवाँ साँटी ल देख के परोसिन काकी ह कहिस- ए वो बहुरिया तोला साँटी अब्बड़ फभत हे वो। तिहार के चिनहा आय तइसे लागत हे। कब लेहव वो?

  रामबती कुछु बतायेच नइ पाये रहिस--एक झन अउ पूछ डरिस---के तोला के हाबय बहिनी?बने रोंठ-डाँट दिखत हे।

वोकर बात पूरेच नइ रहिस एक झन ह अपन दुखड़ा रोवत कहे ल धरलिस --हमर घर नोनी के बाबू ह असो के देवारी म माला पहिनाहूँ कहे रहिस फेर का करबे बहिनी धान नइ बेंचाये कहिके नइ लेइच ।ले देके कर्जा बोड़ी करके लइका मन बर अलवा जलवा कपड़ा लत्ता अउ तेल गुड़ ल बिसाइस हे। तुँहर धान बेंचागे का वो रामबती बहिनी?

    हमर धान तो अभी लुयाये नइये दीदी, बेंचाही कहाँ ले। ये पानी-बादर म खेते म परे हे।बाबू के ददा ह चेत नइ करत हे।रामबती ह कहिस।

   हँ--- तुमन काम बुता करके पइसा सकेले रहे होहू तेकर ले होहू न वो बहुरिया--काकी ह पूछिस।

     कहाँ के काम बूता चलत हे काकी तेमा धन जोर डरबो। कइसनो करके पेज-पसिया म जिनगी चलत हे तेने बड़े बात हे। रामबती ह चिटिक नराज होवत कहिस।

 अतका ल सुनके कई झन एक सूर म कहि डरिन---त ए नवाँ साँटी कहाँ ले आगे वो। 

  नइ बताना हे त झन बता बहुरिया। हमन नँगा थोरे लेबो वो। जरे म नून डारे कस काकी कहिस।

   बेचारी रामबती ल नवाँ साँटी के किस्सा ल लाजे-काने बताये बर परगे। 

वो कहिस--बाबू के ददा ह सुरहुत्ती के दिन तीस -चालीस हजार जुआ म जीते रहिसे त ए दे बीस तोला के मोला साँटी पहिनाये हे।

     बने करिस भौजी फेर जुआ चित्ती खेलना अच्छा नइ होवय। आज जितही-काल हार जही। सियान मन कहे हें--जुआ किसी का न हुआ। जुआरी मन के मारे खेत-खार, गाहना-गूठी, बर्तन-भाँड़ा ,इहाँ तक धोये चाँउर तक नइ बाँचय कहिंथे। ताश के नशा म सब बेंच-भाँज के खुवार कर डरथें।पाँडव मन अपन रानी दुरपती ल हारगे रहिन--सुने तो होबे। बरज वो--भइया ल बने बरज--ताश झन खेलन दे। एक झन पढ़े लिखे पानी भरे ल आये नोनी ह समझावत कहिस।

      सच काहत हस  नोनी। अब्बड़ बरजतथँव फेर तोर भइया मानय नहीं। जेठौनी पुन्नी के जात ले कर्जा  ले ले खेलथे तहाँ ले साल भर कमा कमाके छूटत रहिथे। साल पुट खेत घलो बेंच देथे।

        बोरिंग ल टेंड़-टेंड़ के गोठ-बात करत  सब झन पानी भरके अपन अपन घर आगें।

     अठुरिया बिते रहिस होही।एक दिन बिहनिया बोरिंग म पानी भरे बर रामबती गिस त उहाँ पहिली ले चार-पाँच झन महिला मन संग काकी तको पहुँचे राहय। वो ह रामबती ल देखिस तहाँ ले पूछे ल धरलिस---कइसे वो बहुरिया तोर साँटी कहाँ गै वो। गोड़ दुच्छा लागत हे। खिनवा अउ  ऐंठी ल तको नइ पहिने अस। दोंदवी कस दिखत हस?

 सुनके रामबती कलबलाबे फेर का काहय। बेचारी ह सुसकत कहिस--बाबू के ददा ह एक ठन साँटी पहिराये रहिस हे वोकर संग म मोर दू ठन उपराहा गाहना ल ताश म हार के बेंच दिस।

        

चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

Tuesday, 17 November 2020

मोर देवारी ...ओमप्रकाश साहू अंकुर


 संस्मरण 


मोर देवारी ...ओमप्रकाश साहू अंकुर


हमर छत्तीसगढ़ मा किसम किसम के तिहार मनाय जाथे. इहां के सबो परब हा कृषि ले जुड़े हवय. वोमा कृषि संस्कृति के दर्शन होथे. चाहे वोहा अक्ती  हरेली, पोरा  राहय चाहे देवारी. 

    देवारी हा भगवान राम के चौदह बरस के बनवास के बाद अयोध्या लहुटे के खुशी मा मनाय जाथे. राम जी हा भारत वर्ष अउ हमर छत्तीसगढ़ के नर नारी मन के रग रग मा रचे बसे हवय. वोहा बुराई अउ अंधियारी ला भगा के समाज मा अच्छाई अउ अंजोर बगराय के काम करिस हे. 


  हमर भारत वर्ष अउ छत्तीसगढ़ मा देवारी तिहार गजब उछाह ले मनाय जाथे. ये समय धान हा पक के कटाय के लईक हो जाथे. हरुना धान ला कांट घलो डारथे. अउ कतको झन मन देवारी बुता मा भुलाय के सेति तिहार ला मनाय के बाद धान लुथे. माई धान 

हा देवारी तिहार मनाय के बाद कांटे जाथे. जउन साल धान हा बने बने  रहिथे वो साल किसान मन हा देवारी ला अब्बड़ उछाह ले मनाथे. अउ जउन साल पानी बादर हा कमजोरहा रहिथे वो बरस किसान मन के देवारी मा घलो दम नइ राहय. खेती किसानी ले सब बेपार हा घलो जुड़े रहिथे. 

    जिंहा तक ये साल के देवारी के बात करन ता कोरोना बिमारी के घलो असर देखे ला मिलिस. कतको लोगन मन भीड़ भाड़ मा जाय ले घलो बचिस. 

 जिहां तक मोर देवारी के बात हे ता सबले पहिली कपड़ा लत्ता खरीदेन. लईका मन बर उठवा कपड़ा बिसायेन. मेहा मोर कपड़ा

के नांप देवाय बर  दर्जी कर गेंव  तब देवारी तिहार हा पांचे दिन बांचे रिहिस. दर्जी हा साफ बोलिस कि तुंहर कपड़ा ला देवारी के बाद ही  सील पाहूं !

 लाल बहादुर नगर(पाथरी,डोंगरगढ़) ले सुरगी(राजनांदगाँव) पहुंचेव ता माटी के घर ला साबे बर थोर कुन माटी मतायेंव. मोर गोसईन हा एक झन बनिहार तियारिस अउ लईका मन के सहयोग ले घर अँगना के लिपई पुतई करिस. धन तेरस के दिन तेरह ढक अउ नरक चौदस के दिन चौदह ढक माटी के 

दीया जलायेन. 

    सुरहोती के दिन सबले पहिली संझा कुन माटी के दीया बार के घर अँगना मा मढ़ायेन. फेर मेहा मोर भतीजा अउ बेटा के संग गाँव के देवता धामी करकाटोलिया, शीतला माता, शंकर भगवान, बजरंगबली, माता लक्ष्मी के मूर्ति के ठउर मा पहुंच के सुग्घर ढंग ले पूजा करके दीया , अगरबत्ती जला के हूम देके देवी देवता ला सुमरेन. बिनती करेन के हमर जिनगी के संगे संग गाँव मा घलो बने सुख शान्ति रहे. साकेत साहित्य भवन, माँ कर्मा सामुदायिक भवन अउ हाई स्कूल के दरवाजा मा घलो दियना के अँजोर बगरायेंव. फेर घर मा माता लक्ष्मी के पूजा करेन. वोकर बाद घर परिवार, अड़ोसी पड़ोसी मन घर प्रसाद पहुंचायेन. लईका मन हा फटाका फोड़िस. संगवारी अउ शुभ चिन्तक मन ला मोबाइल ले मेसेज कर देवारी तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना पठोयेंव. 

   गोवर्धन पूजा के दिन भाई मन घर खाय ला गेन अउ भाई मन हा सुग्घर ढंग ले खाय बर अईस. एक 

दूसरा ले मिल के सुख दुख के बात करेन .संगे संग देवारी तिहार के बधाई अउ शुभकामना देवत गेन. भाई घर जाके गोवर्धन पूजा करेन. गाय, बैला ला सुग्घर ढंग ले खिचड़ी खिलायेन. 

   फेर संझा बेरा पुराना बस स्टेन्ड मा पहुंचेन. ऊँहा गाँव वाले मन ले मुलाकात होइस. संगवारी मन ले मिल के बने बने गोठियाय ला मिलिस. बाहर नौकरी करइया अउ खाय कमाय ला गेय संगवारी मन ले मिलके गजब खुशी होइस. रिश्ता नाता अउ उम्र के हिसाब ले 

पायलागी अउ जय जोहार करेंव. 

    एकर बाद राऊत मन हा मड़ई ला  सुग्घर लहरात ,दोहा पारत अउ बिधुन होके नाचत चउक मा पहुंचिस. 

फेर महू हा संगवारी मन संग गोवर्धन चउक कोति आगू बढ़ेंव. राउत नाचा अउ मड़ई हा मन मा गजब उछाह भरिस. गाँव के लइका, सियान, जवान सबो मन मा अब्बड़ खुशी झलकत राहय. लईका, जवान मन हा रंग रंग के फटाका फोड़ के अपन खुशी ला देखात रिहिस. फटाका के आवाज ले पूरा गाँव हा गूँजगे. 

  फेर गौमाता ला गोवर्धन चउक मा ले जाके पूजा पाठ करके गोवरधन खुंदाय गिस. फेर लोगन मन हा गो धन ला एक दूसरा के माथ मा लगाके देवारी तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना देवत अपन अपन घर कोति जावत गिस. महू हा गोबर के टीका लगात, बधाई देवत अपन घर कोति पहुंचेंव अउ घर परिवार के संगे संग अड़ोस पड़ोस के लोगन मन के माथ मा गोबर के टीका लगा के  आशीर्वाद प्राप्त करेंव. 

तो ये प्रकार ले मेहा एसो के देवारी मनायेंव. 


                 ओम प्रकाश साहू अंकुर 

     सुरगी, राजनांदगॉव

Monday, 16 November 2020

क्रातिकारी गीतकार : लक्ष्मण मस्तुरिया-अजय अमृतांशु


 

क्रातिकारी गीतकार : लक्ष्मण मस्तुरिया-अजय अमृतांशु


     "3 नवंबर पुण्यतिथि विशेष"

"जागो रे जागो बागी बलिदानी मन..
धधकव रे धधकव सुलगत आगी मन..."

अइसन गीत के एक-एक पंक्ति अउ एक-एक शब्द अन्तस् ल झकझोर देथे,अउ सीना चीर के सीधा अन्तस् मा उतरथे। छत्तीसगढ़ी गीत मा क्रांति के अइसन आह्वान करने वाला क्रांतिकारी गीतकार केवल लक्ष्मण मतुरिया ही हो सकथे कइहूँ ता गलत नइ होही। छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान जगइया मस्तुरिया जी के कलम ले क्रांति के चिंगारी निकलय। अन्याय,अत्याचार, जमाखोरी, बेरोजगारी, पलायन अउ नपुंसक राजनीति उपर उँमन निडर हो के कलम चलाइन ।

मस्तुरिया जी अपन गीत म कतेक गंभीर बात कहिथे :-
        "जागो रे जागो बागी बलिदानी मन..
परिवर्तन उही ला सकथे जेन जुझारू होथे,बागी होथे, लड़े अउ मर मिटे बर हमेशा तियार रहिथे। अउ बलिदान भी उही मन दे सकथे जेन अपन मूँड़ी मा कफ़न बाँध के निकलथे । तब अइसन गीत बागी अउ बलिदानी मन बर टॉनिक के काम करथे । मस्तुरिया जी जब कहिथें-
      "धधकव रे धधकव रे सुलगत आगी मन"
तब देह के रूवाँ रूवाँ खड़ा हो जाथे। अन्याय अत्याचार के खिलाफ़ खड़ा होने वाला युवा जेन परिवर्तन लाय के जज्बा रखथे अइसन एक आह्वान ल सुन के उमन मर मिटे बर उतारू हो जाथे। जब दानव मन ले देवता मन घलो हार जाथे तब आदि शक्ति माँ दुर्गा पापी मन के संहार करे बर अवतरित होथे। तब मस्तुरिया जी वीरांगना दुर्गावती सरिक मातृशक्ति मन ल आह्वान करथे :-
"महाकाल भैरव लखनी
 महामाया दुर्गा काली मन..। जागो रे...
             ओज ले भरे अइसन गीत ल सुनके काकर तन म आगी नइ लगही ? दमदार लेखनी के संग वजनदार प्रस्तुति म मस्तुरिया के कोनो मुकाबला नइ रहिस। जेन मनखे एक घव 
मस्तुरिया जी ल सुन लय आजीवन वोला नइ भुलाय। छत्तीसगढ़ी के अमर गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया शोषित वर्ग के प्रतिनिधि कवि/गीतकार रहिन। शोषक मन के खिलाफ जब उमन मुखर होके लिखथे तब खून मा उबाल आना स्वाभाविक हे :-
"लंद फंद वाले मालामाल हे
सिधवा बर रोजे अकाल हे
अउ गोहार परत हे नाचे
छानही चढ़ चढ़ पापी मन..."

नपुंसक राजनीति के खिलाफ खुल के लिखे बर करेजा चाही,मस्तुरिया जी निडर होके लिखिन- 
"भीख माँगे म जिनगी के 
अधिकार कोनो ल मिलय नही..
कुंडली मारे साँप सिंहासन
आगी आँच बिन हिलय नहीं...।"

अइसन बात ल लिखना अउ मंच म पढ़ना तलवार के धार म चलना हवय। फेर कबीर के रददा म रेंगइया मन ककरो परवाह कहाँ करथे । 

जमाखोरी तब भी रहिस अउ आज भी ये विकराल समस्या हे जेला जड़ ले उखाड़ना जरूरी हवय। जमाखोर मन के ख़िलाफ़ उँकर आक्रोश देखव-
"लहू ले माँहगी तेल गुड़ 
निर्दयी होगे बैपारी मन ..जागो रे.."

अपन फर्ज ले विमुख, देश अउ समाज के प्रति उदासीन केवल अपन म मस्त मनखे मन ला लताड़त मस्तुरिया जी कहिथें -
"मुर्दा जागव मरद बनव रे
छाती बाँख म गरब भव रे
देश धरम पुरखा पीढ़ी बर...
मरव खपव जीवदानी मन" जागो रे..

मस्तुरिया जी कालजयी गीतकार रहिन। उँकर गीत के प्रासंगिकता तब ले जादा आज महसूस होथे।सम्मान के साथ जीना ही उँकर फितरत रहिस। उँकर कृति "सोनाखान के आगी" के पंक्ति देखव :-  
"बिना सुराजी के जिनगानी
मुरदा हे तन मरे परान
बिना मान सभिमान के मनखे
गाय गरु अउ कुकुर समान"

सिधवा छत्तीसगढिया मन ला अपन स्वाभिमान के 
रक्षा करे खातिर मस्तुरिया जी आजीवन घेरी भेरी चेताइन :-
अरे नाग तैं काट नहीं त
जी भर के फुफकार तो रे
अरे बाघ तै मार नहीं त
गरज-गरज धुतकार तो रे

छत्तीसगढ़ के पावन माटी सब ला शरण दिस। अलग अलग राज के मनखे आके इँहे के होके रहिगे। फेर कुछ लोगन छत्तीसगढ़िया मन के अस्मिता अउ स्वाभिमान सँग आज घलो खेलत हवय। उँनला मस्तुरिया जी खुला चुनौती देथे :-
"एक न एक दिन ए माटी के
पीरा रार मचाही रे ..
नरी कटाही बइरी मन के
नवा सुरुज फेर आही रे।"

येहू कटु सत्य आय कि मस्तुरिया जी आजीवन अपन स्वाभिमान के साथ कभू समझौता नइ करिन। छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के पीरा ला जीवन पर्यन्त लिखिन। मनखे के सीना धधक जय,अपन माटी के खातिर मनखे मर मिटय, मुरदा घलो खड़े हो जय अइसन प्रेरणा देने वाला अमर गीतकार सदियों मा कोनो एक होथे। मस्तुरिया जी के पुण्यतिथि मा उन ला ला शत शत नमन ।

अजय अमृतांशु
भाटापारा (छत्तीसगढ़)

Monday, 5 October 2020

छत्तीसगढ़ी कहानी : डोकरी दाई मर गे !* -विनोद कुमार वर्मा

 *छत्तीसगढ़ी कहानी  :  डोकरी दाई मर गे !* 


                                -विनोद कुमार वर्मा

 

                    ( *1* )


      'तड़ !........तड़.!........ तड़ !..........' कई गोली सब- इंसपेक्टर झिंटूराम के कान के पास से गुजर के शांत होगे। दू गोली ओखर कंधा म लगिस अउ एक जाँघ म ! एही कोई संझा के पाँच बजती के बेरा रहे। बस्तर के सुनसान दरभा घाटी म नक्सली अउ अर्ध सैनिक बल टुकड़ी के बीच दोपहर दू बजे ले मुठभेड़ लगातार चलत रहे...!..?...

          दोपहर दू बजे........ भयंकर बारूदी विस्फोट ले पुलिया उपर गुजरत बख्तरबंद गाड़ी हवा म उछल के बीस फीट दूरिहा जा गिरिस! गाड़ी म दस सैनिक सवार रहिन। ओखर पाछू-पाछू  चालीस सैनिक मन स्पेशल बस म आवत रहिन, - एहा आम बस ले मजबूत  अत्याधुनिक संचार अउ चिकित्सा उपकरण से लैस रहिस।  एही बस म सब इंसपेक्टर झिंटूराम घलो रहिस। सबो अर्धसैनिक बल के जवान मन पेड़ , टीला, गड्ढा आदि के आड़ लेत बस ले उतर के तुरते मोर्चा संभाल लिन।  सड़क के एक कोती नक्सली अउ दूसर कोती जवान मन मोर्चा ले रहिन। दरभा घाटी के घना जंगल मा युद्ध के हालात रहिस मानो दू दुश्मन देश के सैनिक मन एक-दूसर ले लड़त हें !  सैनिक मन समझ गिन कि आज ओमन नक्सली- एंबुस म फँस गे हें! दरअसल दू-तीन दिन ले ये सूचना लगातार मिलत रहिस कि दरभा घाटी के अंदरूनी क्षेत्र मा नक्सली मन के हलचल एकाएक बढ़ गे हे अउ कुछ बड़े नक्सली नेता मन डेरा डारे हुए हें!........वास्तव म एहा नक्सली मन के बड़े सुनियोजित हमला रहिस।

         झिंटूराम सात साल ले बस्तर के नक्सली जोन म नौकरी करत हे। हवलदार ले अब सब-इंसपेक्टर बन गे हे। नक्सली मन के संग मा ओखर एहा तीसरा मुठभेड़ हे, फेर सबले खतरनाक !  मरो.....या......मारो !... अउ कोई विकल्प शेष नि रहिस !........एहा वोही दरभा घाटी ए, जेहा सात साल पहिली काँग्रेस के एक दर्जन बड़े-बड़े लीडर मन के लोहू ला पीए रहिस!

       आज नक्सली मन के तीन बड़े लीडर मन झिंटूराम के गोली के शिकार होय हें! दरअसल अर्धसैनिक बल के साथी मन लड़े बर मोर्चा लिन त झिंटूराम पेड़ के आड़ लेत अपन टुकड़ी के नेतृत्व करत  पाँच हवलदार साथी सहित  लगभग दू किलोमीटर के चक्कर काट के नक्सली मन के पाछू डहर पहुँच गिस अउ सबो 20-20 मीटर के दूरी बना के गोलाई म  पोजिशन ले लिन ताकि नक्सली मन मा भ्रम पैदा हो जाय कि सैनिक मन  पाछू कोती ले घलो घेरे हें!  नक्सली मन के संख्या तीन सौ ले उपर रहिस।ओमन संग जादा देर तक लड़ पाना मुमकिन नि रहिस।....... झिंटूराम अपन साथी मन में सबले आघू रहिस अउ बाकी मन पाछू-पाछू। जब नक्सली मन ओखर रेंज म आ गिन तव  झिंटूराम पाछू डहर ले तीन नक्सली लीडर मन के सिर ला टारगेट करके कई फायर करिस। लगभग ओही समय ओखर साथी मन भी फायरिंग करिन ।  दस मिनट के फायरिंग म नक्सली मन समझ नि पाइन कि पाछू डहर कोन कोती ले फायरिंग होत हे!.... ओही बेरा जवाबी फायरिंग म झिंटूराम ला तीन गोली एक के बाद एक लगिस।......  पाछू डहर म सैनिक मन के जादा संख्या बल के आशंका अउ अपन  तीन बड़े लीडर सहित 10 - 12 नक्सली मन के मौत ले नक्सली मन मा घबराहट अउ डर फैल गे अउ ओमन तेजी से पीछे हटिन।...... नक्सली अउ अर्धसैनिक बल के बीच मुठभेड़ कुल तीन घंटा चलिस फेर अंधियार होय के पहिली नक्सली मन अपन मृत अउ घायल साथी मन ला लेके जंगल कोती भाग गिन- सैनिक मन के हथियार अउ गोली-बारूद लुटे के ओमन के मंसूबा धरे के धरे रह गे!...... अब ये लड़ाई म  जेन सैनिक मन मरिन तेमन मर गिन ! फेर बाकी घायल मन के जान बचगे!....... नक्सली मन के हत्थे चढ़तिन तव कोनो के जान नि बचतिस !

        झिंटूराम के शरीर ले गरम-गरम लोहू तर-तर, तर-तर बोहावत रहे,- ओला रोक पाना ओखर बस म नि रहिस। अब रात के बेरा होत रहे- सरकारी सहायता बर  बिहान पहाय के इन्तजार करना परही! 

      धुप्प अंधियारी रात.....कहीं पास ले कराहे के आवाज आत रहे त कहीं दूर ले उल्लू के बोले के कर्कश ध्वनि !......झिंटूराम के चेतना धीरे-धीरे  जात रहिस। ओला अइसे लगिस कि अब ओखर आखिरी समय आ गे हे! .......बचपन के कुछ चेहरा मन ओखर पथराई खुले आँख के आघू मा चलचित्र के भाँति आय लगिन, जेमन सो या तो बहुत मया करे या फेर घृणा!.......सबले पहिली पिता के राक्षसी चेहरा सामने आइस जेहा शराब पी के ओखर अम्मा संग लगभग रोज मारपीट करय ! अउ फेर ट्रक दुर्घटना म ओखर मृत वीभत्स शरीर!......फेर अपन अम्मा के सुरता आइस जेहा अर्ध सैनिक बल म ओखर भर्ती के शुभ- समाचार ला सुन के रोवत-रोवत मुँहटा तीर म आधा घंटा ले बइठे रहिस!.....फेर सुरता आइस ओ घटना कि  नौकरी ज्वायन करे के छै महीना बाद जब ट्रेनिंग कम्पलीट करके घर वापिस आय रहिस अउ अम्मा बर नावा लुगरा के संग घुंघरू वाला पैंरी खरीद के लाय रहिस त ओला देख के अम्मा मुँहटा म बइठ के फेर रोय ला धर ले रहिस। 

        झिंटूराम के चेतना धीरे-धीरे  अंतरिक्ष म विलीन होत रहिस। ..........फेर डोकरी दाई के सुरता आइस, जेखर हाथ ले चाकलेट अउ भात खाना ओहा कभू नि भूल पाइस! ...... ओह!........ बचपन भी कतका मासूम होथे........ डोकरी दाई.!... ....डोकरी दाई !  कहत ओखर मुँह नि थके।..... भला डोकरी दाई के मया ला ओह कइसे भूल पाही?...मरत बेर घलो   बचपन के एक-एक घटना चलचित्र के भाँति ओखर पथराई आँखी म झूलत रहे ...........


                       ( *2* )


    *लगभग 22 बरस पाछू जब* *छत्तीसगढ़ राज नि बने* *रहिस* ..........


         'मर जाय साला बेर्रा ह.......कीरा परे.......मोर डेगची अउ जम्मो चाउँर ला चोरा के ले गे ! ...... ओई दरूहा मंगतू होही ! का करों.....मोर हाथ-गोड़ थक गे हे, नि तो साले ला......'  -डोकरी दाई बड़बड़ावत रहे, फेर ओखर गारी के सुनईया ओमेर कोनो नि रहिस।

          इंदिरा आवास योजना म दू जगा घर बने हे। डोकरी दाई रइथे तेन मेर चार घर अउ बाकी घर थोरकुन दुरिहा म । डोकरी दाई ओमेर अकेल्ला रइथे, बाकी तोनों घर म कोनो रहे बर नि आय हें। डोकरी दाई दू दिन ले परेशान हे , काबर कि ओखर नानकुन ताला मुरचा खा के खराब हो गे हे। बिहन्चे एक बार अउ कोशिश करिस फेर ताला नि सुधर पाईस त बाहर पार के संकरी लगा के गोबर संइते बर चल दिस। डोकरी दाई गोबर के छेना बना के बेचे त दू पइसा पा जाय, फेर हर महीना सरकारी पेंशन के पइसा अउ  चाउँर के भरोसा ओखर दिन मजे म कटत रहिस। आज गोबर संइत के आइस त देखथे कि घर  खुल्ला हे! ओखर जी धक् ले रह गे!  घर भीतरी खुसरिस त देखथे कि ओखर कुल जमा पूंजी डेगची, लोटा, गिलास अउ आठ किलो चाउँर गायब हे! ओला समझत देरी नि लगिस कि एहा मंगतू दरूहा के करतूत हे!

        मंगतू दरूहा के पाँच पीढ़ी ला गारी देत-देत डोकरी दाई थक गे, तहाँ अब चिन्ता सताय लगिस। मंझनिया  के बेरा झिंटू आही त ओला खाय बर का दूहूँ? न डेगची हे न चाउँर, फेर भात कइसे राँधहूँ ?....... पाँच बरस के झिंटू बर ओखर अतेक मया जइसे दू शरीर एक प्राण ! ओही चिन्ता म डोकरी दाई बिपतिया गे।

       झिंटू के पिता घलो अखंड दरूहा रहिस। एक साल पाछू दारू पी के चलती ट्रक म झंपा गे। 24 साल के मुठियारी कस फरसोनहिन दुच्छा हाथ होगे।अब ओ बिचारी के सहारा केवल झिंटू रहिस.......ओखर चार साल के नानकुन लइका!..... बिचारी लइका ला सुबे आँगन-  बाड़ी केन्द्र म छोड़े , फेर बनी-भूती बर निकल जाय त चार बजे संझा  वापिस आय। आँगन-बाड़ी केन्द्र म झिंटू कुछु खाय-पिये बर पा जाय ,फेर छुट्टी होय त उहाँ ले डेढ़ किलोमीटर पैदल चलके डोकरी दाई करा पहुँच जाय।उहाँ फेर कुछु खाना-पीना मिल जाय अउ चुटुर-चाकलेट घलो। डोकरी दाई झिंटू के आय बिना खाना नि खाय। एक ठिन डब्बा म चुटुर-चाकलेट बिसा के रखे रहय, तेमा के रोज एक ठिन ओला आते-आत खाय बर दे। फिरती बेरा म फरसोनहिन हा डोकरी दाई के घर आवय - कुछु लाल चाय-वाय पियँय, अपन दुख-सुख गोठियावँय अउ फेर अपन बेटा ला पीठ म घोड़ा-बइठार के वापिस घर ले के जाय।....... डोकरी दाई अउ फरसोनहिन आन-आन जात-बिरादरी के हें फेर झिंटू के ददा के मरे के बाद डोकरी दाई फरसोनहिन ला अपन बेटी बरोबर जाने लगिस। फरसोनहिन घलो इंदिरा आवास म रहे फेर ओखर घर हा डोकरी दाई के घर ले एक किलोमीटर दूरिहा रहिस।

       आँगन-बाड़ी ले जइसे छुट्टी होइस तइसे झिंटू हा तरतिर- तरतिर डोकरी दाई के घर कोती भागिस। उहाँ पहुँचिस त देखथे कि घर हा भीतर ले बंद हे!

      झिंटू जोर से चिल्लाइस- डोकरी दाई ! डोकरी दाई !.......  फेर भीतर ले कोई आवाज नि आइस। झिंटू पूरा ताकत लगा के दरवाजा ला हला-हला के चिल्लाय लगिस। फेर ओखर आवाज के सुनईया एमेर कोनो नि रहिन।

        दरवाजा के झेंझरी ले झिंटू भीतर कोती ला झाँकिस। ओखर जी धक् ले रह गे ! खूंटी म लटके  लालटेन के मद्धिम रौशनी खटिया उपर परत रहे..... ओहा देखिस कि गोदरी ओढ़ के कोनो सुते हे!

       झिंटू जोर-जोर से विलाप करे लगिस-' डोकरी दाई मर गे ! डोकरी दाई मर गे ! डोकरी दाई उठ ओ........अब मैं तोला कभू तंग नि करों !..... '

       फेर ओखर करूण क्रंदन ला भला कोन सुनतिस?अब मरना- जीना ला भला झिंटू का जानतिस, फेर साल भर पहिली अपन पिता के मरना ला देखे रहे!...... मुहँटा मेर बस्ता पटक दिस अउ रोवत-रोवत बइठ गे।....... कतको दुख हा घेरे रहे फेर नींद हा अपन बूता ला करबेच्च करथे- झिंटू घलो रोवत-रोवत घर के बाहिर धुर्रा- गोंटी- माटी उपर सुत गे अउ स्वप्न लोक म विचरण करे लगिस। ओला अइसे लगत रहे कि डोकरी दाई ला भगवान वापिस भेज देहे हे अउ एके थारी म भात खात दुनों झन कतकोन बने-बने गोठ-बात करत हें!

       अइसने डेढ़ घंटा बीत गे । झिंटू मुँहटा तीर म  सुतत एती-ओती हाथ-पैर ला फटकारत अल्थी-कल्थी मारत रहे। कुर्ता-पेंट धुर्रियागे।.......तभे ओला अइसे लगिस कि डोकरी दाई हा जोर-जोर से  हलावत हे अउ उठे बर कहत हे। आँखी खोलके निहारिस त बिजली के झटका कस लगिस अउ चैतन्य होके तुरते खड़े होगे।........ सामने डोकरीदाई साक्षात खड़े रहे! झिंटू डोकरी दाई ला  कस के पोटार लिस अउ रोवत-रोवत बोलिस- 'डोकरी दाई तैं कहाँ चल दे रहे ? मैं अब तोला कभू तंग नि करों!'

     डोकरी दाई हाँसिस-' ए दे लड्डू खा, तोर बर दू ठिन लड्डू खरीद के लाने हँव।'

    एखर पाछू दरवाजा के पल्ला ला आघू- पीछू ढकेल के हाथ बोज के भीतर पार के संकरी ला डोकरी दाई खोलिस। झिंटू सरपट घर के भीतर खुसरिस,  त देखथे कि डोकरी दाई हा  खटिया उपर  मुसरिया ला गोदरी ओढ़ाय रहे! दरवाजा के झेंझरी ले झाँक के देखे म अइसन लगत रहे कि डोकरी दाई सुते हे!

       थोरकुन बेर म डोकरी दाई भात-साग ला चुरो दारिस अउ झिंटू दुनों ताते-तात भात-साग ला खात मीठ-मीठ गोठिवावत रहें।

     झिंटू पुछिस- 'डोकरी दाई तैं भीतर पार ले संकरी लगा के कहाँ चल दे रहे? '

    डोकरी दाई बोलिस- 'बेटा, पेंशन के पइसा लेहे बर बैंक गये रहेंव- भारी भीड़ रहिस। फेर डेगची, लोटा, गिलास,ताला अउ चाउँर - साग  ला खरीद के लाने हँव त बेरा होगे। सुबे मंगतू दरूहा सबो जिनिस ला चोरा के  ले गे हे!'

     डोकरी दाई के घर म चोरी अउ फेर ओखर मरे के डर हा झिंटू के बालमन मा घर कर गे अउ पुलिस बने के जुनून सवार होगे!

    झिंटू बोलिस- 'दाई बड़े होके मैं पुलिस बनहूँ अउ मंगतू दरूहा ला पकड़ के जेल  म भरहूँ! '

    दाई बोलिस -' बेटा पढ़-लिख के जरूर पुलिस बनबे।फेर ओ दिन तक मैं इहाँ नि रहों- भगवान के कर्जा बाँहचे हे, ओहू ला तो छूटे बर जाना हे!'

    झिटू बोलिस-' महूँ जाहूँ दाई तोर संग!'

     दाइ बोलिस-' नहीं बेटा, तैं पाछू आबे। पुलिस बनबे त अपन अम्मा बर कुछु लेबे कि निहीं?'

      झिंटू हा अपन सबो ज्ञान के निचोड़ ला समेटत बोलिस-' हाँ दाई, अम्मा के लुगरा चिरा गे हे। ओखर बर नावा लुगरा अउ घुंघरु वाला पैंरी खरीदहूँ ! अम्मा नावा लुगरा पहिर के रेंगत-रेंगत घर आही त ओखर पैरी के छम-छम आवाज मा मैं पहिली ले जान डारहूँ कि अम्मा आवत हे!


                      ( *3* )


          *कुछ दिन बाद एक समाचार अखबार म प्रमुखता ले छपिस -' छत्तीसगढ़ के अर्धसैनिक बल के सब- इंसपेक्टर झिंटूराम को* *मरणोपरांत कीर्तिचक्र से* *सम्मानित किया जाएगा। सम्मान प्राप्त करने के लिए उनकी माँ फरसोनहिन बाई छत्तीसगढ़ शासन के विशेष विमान से 24* *जनवरी को* *दिल्ली जाएँगी*।' 

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 *छत्तीसगढ़ी कहानी : विनोद कुमार वर्मा*