Saturday, 3 June 2023

भाव पल्लवन-- डार के चूके बेंदरा,अषाड़ के चूके किसान

 भाव पल्लवन--



डार के चूके बेंदरा,अषाड़ के चूके किसान

------------------------

बेंदरा मन ये छानही ले वो छानही,ये छत ले वो छत,ये पेड़ ले वो पेड़,ये डारा ले वो डारा मा कूदत-फाँदत रहिथें।वो मन थोरको आगू न पाछू बिलकुल सटीक समय मा, पर्याप्त ताकत लगाकें,दूरी के सटीक अंदाजा लगाके कूदथें फेर जेन बेंदरा हा पेंड़ के ये डारा ल छोड़के वो डारा ला पकड़े बर छलांग लगाये के बेरा आलस मा परके या अपन चेत ला भटका के पल भर के भी देरी कर देथे वो हा डारा ला पकड़े मा चूक जथे अउ भुइयाँ मा भकरस ले गिरके घायल हो जथे।आन बेंदरा मन के बीच मा हँसी के पात्र तको बन जथे।अइसन चूक करे के पाछू वोकर हाथ पछतावा के अलावा कुछु नइ लगय।

   ओइसनहे वो किसान हा तको जेन हा अषाड़ महीना मा अपन खेती-किसानी के काम काँटा-खूँटी बिनना,काँद-दूबी छोलना,खातू बगराना ,खाना-मुँही के साज-संभार करना अउ बतर आये मा बिजहा बोंना के काम ला सहीं समय मा नइ कर पावय ते हा पछतावत रहिथे।  खेती के काम पिछुवाथे अउ सहीं समय मा  नइ होवय तहाँ ले उत्पादन मा फरक पर जथे। लागत जादा अउ फसल कमती होये ले नुकसान सहिथे।वो हा ये सोच-सोच के पछतावत रहिथे के  सहीं समे मा आलस ला तियाग के बने डँट के किसानी ला करे रहितिच ता ये दिन देखे बर नइ परतिच। वो हा सबले कीमती समय  ला तो खो डरे रहिथे।झरे पत्ता हा जइसे दुबारा पेड़ मा  नइ जुरै वइसने  गुजरे समय हा लहुट के नइ आवय। पानी के धारी कस समय हा आगू बढ़ जाथे तहाँ ले नइ लहुटय।एक पइत गुजरे दिन-बादर फेर कहाँ बहुरथे?कहे जाथे के जे मन समय ला बर्बाद करथे उन ला समय बर्बाद कर देथे।


चोवाराम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

सुरता// 27 मई जयंती साहित्यकार मनके धारनखंभा रिहिन डॉ. बलदेव




 सुरता// 27 मई जयंती

साहित्यकार मनके धारनखंभा रिहिन डॉ. बलदेव 

    डॉ. बलदेव के चिन्हारी हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत म सबो विधा म समान रूप ले सक्षम लेखक के रूप म होथे, फेर मैं उनला पहिली बेर एक समीक्षक के रूप म जानेंव. तब मैं छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के प्रकाशन-संपादन करत रेहेंव. उंकर पहिली रचना मोर जगा आइस, जेमा उन सियान साहित्यकार हरि ठाकुर जी के रचना संसार के लाजवाब समीक्षा लिखे रहिन हें. वोला पढ़के मैं बहुत प्रभावित होएंव. एकर पहिली मैं छत्तीसगढ़ी म अतका सुंदर समीक्षा अउ ककरो नइ पढ़े रेहेंव, तेकर सेती उनला तुरते चिट्ठी लिखेंव, कि अइसने सरलग जम्मो सियान साहित्यकार मनके समीक्षा पठोवत जावव 'मयारु माटी' के सबो अंक मन म सरलग छापत जाबोन. वोमन सिरतोन म लगातार समीक्षा भेजे लागिन. वोकर समीक्षा मनके चारों मुड़ा गजब चर्चा होए लागिस. एकर सेती उन मोला काहंय घलो- 'सुशील बेटा, तैं मोला समीक्षक बना दिए रे.' ए बात ल उन कतकों मंच म घलो कहि देवत रिहिन हें.

    तब चिट्ठी पाती के माध्यम ले ही गोठ-बात हो पावत रिहिसे. आज कस फोन/मोबाइल के बटन ल चपक ले अउ ससन भर गोठिया ले अइसन जमाना नइ रिहिसे. मोर उंकर संग पहिली बेर भेंट सन् 1988 म तब होइस, जब हमन छायावाद के प्रवर्तक कवि पद्मश्री मुकुट धर पाण्डेय जी के सम्मान करे खातिर रायगढ़ गे रेहेन.

    असल म छत्तीसगढ़ी भासा साहित्य प्रचार समिति के 1988 म रायपुर म प्रदेश स्तरीय जलसा होए रिहिसे, तेमा सियान साहित्यकार मनके सम्मान करे गे रिहिसे, फेर आदरणीय पाण्डेय जी स्वस्थ्य गत कारण के सेती रायपुर नइ आ पाए रिहिन हें, तेकर सेती समिति ह निर्णय करीस के रायगढ़ जा के उंकर घरेच म सम्मान करोबन. समिति के संयोजक जागेश्वर प्रसाद, अध्यक्ष डॉ. व्यास नारायण दुबे अउ मैं, हम तीनों रायगढ़ जाए के तारीख जोंगेन अउ डॉ. बलदेव जी ल चिट्ठी पठो देन के फलाना दिन हमन आवत हन, उहाँ के सबो साहित्यकार मनला घलो चेता देहू.

   निर्धारित बेरा म हमन रायगढ़ के रेलवे स्टेशन म उतरेन. उहाँ डॉ. बलदेव जी हमन ल ले खातिर पहिलिच ले पहुंच गे राहंय. उही दिन मोर उंकर संग पहिली बेर साक्षात भेंट अउ गोठ-बात होइस. तहांले फेर पं. मुकुट धर पाण्डेय जी के घर सबो झन गेन अउ सम्मान के कारज ल पूरा करेन.

     उहाँ सम्मान करे के बाद गोठ-बात होए लागिस. हमर मन के परिचय डाॅ. बलदेव जी पाण्डेय जी ले कराइन. पाण्डेय जी मोर नांव ल सुनीन त खुश होके कहिन- अच्छा तहीं हरस सुशील. 'मयारु माटी' के सबो अंक ल  पढ़थंव, बलदेव ह मोला सबो अंक मनला देथे. बहुत अच्छा निकालत हस. पाण्डेय जी के अतका बात ल सुनके मोर लहू ह दू किलो बाढ़गे तइसे कस लागिस. वोमन 'मेघदूत' के छत्तीसगढ़ी अनुवाद वाले किताब घलो हमन ल देइन. इही छत्तीसगढ़ी मेघदूत के माध्यम ले मैं महाकवि कालिदास जी के कालजयी रचना ल पढ़ पाएंव. तहाँ ले एकर ले प्रभावित होके एक कविता घलो लिखेंव-

अरे कालिदास के सोरिहा बादर, कहाँ जाथस संदेशा लेके

हमरो गाँव म धान बोवागे, नंगत बरस तैं इहाँ बिलम के..

थोरिक बिलम जाबे त का यक्ष के सुवारी रिसा जाही

ते तोर सोरिहा के चोला म कोनो किसम के दागी लगही

तोला पठोवत बेर चेताय हे जोते भुइयां म बरसबे कहिके...

अरे कालिदास के..

    आदरणीय डॉ. बलदेव जी के माध्यम ले पं. मुकुट धर पाण्डेय जी के एक पइत अउ आशीर्वाद मिलिस. मोर पहिली कविता संकलन 'छितका कुरिया' खातिर वोमन आशीर्वचन देइन. उहू म छत्तीसगढ़ी म लिखके. तब वोमन केहे रिहिन हें, मैं अपन जिनगी म पहिली बेर ककरो खातिर छत्तीसगढ़ी म संदेश लिखे हंव. अपन लेटर पेड म मोती कस अक्षर म लिखे रिहिन हें. महूं वोला कविता संकलन म ब्लाक बनवा के छपवाए रेहेंव. वो किताब के भूमिका ल डॉ. बलदेव जी ही लिखे रिहिन हें.

    डॉ. बलदेव जी के जनम ग्राम नरियरा, जिला जांजगीर चांपा के किसान हरा लाल साव अउ महतारी बिसाहिन देवी के घर 27 मई 1942 के होए रिहिसे. वोमन आठवीं कक्षा के पास करते सन् 1958 म ही मिडिल स्कूल म पढ़ाए ले धर ले रिहिन हें. वोमन मास्टरी करतेच करत अपनो पढ़ाई ल चालू राखिन, अउ बीए एमए फेर पीएचडी करीन. एकर संगे-संग उंकर लेखनी घलो चले लागिस. उंकर कहना रहिस, के जे दिन लेखनी रुक जाही, वोही उंकर जिनगी के आखिरी दिन होही.  अपन ए बात ल वोमन निभाइन घलो. 

   डॉ. बलदेव जी के लेखनी साहित्य के हर विधा म चलिस, जे मन देश अउ प्रदेश के जम्मो प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका म सम्मान पाइन. पद्मश्री मुकुट धर पाण्डेय, रायगढ़ नरेश राजा चक्रधर सिंह अउ पं. सुंदर लाल शर्मा ऊपर उंकर विशिष्ट शोध ह विशेष उल्लेखनीय हे. वोमन रायगढ़ म हर बछर आयोजित होने वाला गौरवशाली आयोजन "चक्रधर समारोह" के संस्थापक सदस्य घलो आंय. 

     डॉ. बलदेव गाँव-गंवई के रहइया होए के संगे-संग किसानहा बेटा घलो आंय, तेकर सेती उंकर रचना म कृषि अउ गाँव गंवई के संग प्रकृति के गजबेच सुग्घर दर्शन होथे. कुछ उदाहरण देखव-

लगत असाढ़ के संझाकुन

घन-घटा उठिस उमड़िस घुमड़िस घहराइस

एक सरवर पानी बरस गइस

    ....

मोती कस नुवा-नुवा

नान्हे-नान्हे जलकन उज्जर

सूंढ़ उठा सुरकै-पुरकै

सींचै छिड़कै छर छर छर

.....

पाटी ल धुन हर चरत हे, खोलत हे

घुप अंधियारी हर दांत ल कटरत हे

मुड़का म माथा ल भंइसा हर ठेंसत हे

मन्से के ऊपर घुना हर गिरत हे झरत हे


   हिन्दी के रचना संसार के घलो एक झलक देख लेथन-

संध्या कुल पोखर में उमगती

बह चली मधुमास की गंध-हवा

वनराजियों को हिला अभिसार में

बांसुरी के स्वर थिरकते

कोयलों की घाटियों में

डूबता गहरा रहा अंधकार में..

......

अरी ओ केलो/मुझे अपनी बाहों में ले लो!

जब भी देखा तुमको/बौराया मन

सोन तरी से टकराकर/दरक गया दरपेश

हंसी- फूटती चट्टानों से

कहा पवन ने/संग हमें भी ले लो

...

   डॉ. बलदेव साव जी सही मायने म इहाँ के साहित्य अउ साहित्यकार मन के धारनखंभा रिहिन हें. कतकों नवा अउ जुन्ना साहित्यकार मनला साहित्य जगत म चिन्हारी देवा के स्थापित करिन. एकरे सेती उनला चारों मुड़ा सराहना अउ सम्मान घलो मिलिस. वैष्णव संगीत महाविद्यालय बिलासपुर/रायगढ़ ले चक्रधर सम्मान, नगर पालिक निगम रायपुर ले पं. मुकुटधर पाण्डेय सम्मान, छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन ले हरि ठाकुर, छत्तीसगढ़ साहित्य सम्मेलन ले महावीर अग्रवाल सम्मान सहित अउ अबड़ अकन सम्मान. सागर वि. वि. के बी. ए. रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर के कक्षा ए. एम. पाठ्यक्रम म उंकर किताब घलो रिहिस. गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के बी. ए म सहायक पुस्तक के रूप म (छायावाद और पं. मुकुटधर पाण्डेय - लेखक डॉ. बलदेव) रहिस. वोमन कतकों देश के साहित्यिक यात्रा घलो करे रिहिन.

     6 अक्टूबर 2018 के दिन ल मैं कभू नइ भुलावंव. काबर के ए दिन ह छत्तीसगढ़ के महान सपूत स्वामी आत्मानंद जी के जनम दिन आय. हमन हर बछर असन स्वामी जी के समाधि स्थल महादेव घाट ले ठउका घर लहुटे रेहेन, तभे रायगढ़ ले डॉ. बलदेव जी के छोटे बेटा अउ उंकर साहित्यिक विरासत ल आगू बढ़इया बसंत राघव के फोन आगे. हमन सुन के दंग रहिगेन, के डॉ. बलदेव अपन सुवारी श्रीमती सत्या साव, बेटी विजय शारदा, जय वर्षा अउ बेटा शरद माघव अउ बसंत राघव के संगे-संग सम्पूर्ण साहित्य जगत के अपन जम्मो मयारुक मनला बिलखत छोड़ के परमधाम के रद्दा रेंग दिन.

   उंकर सुरता ल पैलगी जोहार🙏🙏

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


संस्मरण ननपन के सुरता

 संस्मरण 


ननपन के सुरता

 




     हमर जिनगी में ननपन  के गजब महत्व हे. बचपन वो उमर होथे जेमा कोनो फिकर नइ रहय.जिनगी ह राग -द्वेष ले दूर रहिथे. बचपन म खुशी पाय के कतको साधन रहिथे. छोटे -छोटे चीज ले मन ह खुश हो जथे. एकदम जादा सुविधा नइ रहय तभो ले लईका मन आस -पास के वातावरण ले अपन बर खुशी खोज लेथे. सियान मन के गजब दुश्मनी रहि वहू परिवार के लईका मन एक -दूसरा सँग सुग्घर मिल -जुल के खेलथे. 


  ननपन म हमन खूब खेलन -कूदन. पारा -मोहल्ला म सँगवारी मन सँग गिल्ली -डंडा, भौंरा, बाटी, बिल्लस, चोर-पुलिस खेल, दौड़ई, अँधियारी -अँजोरी, लुका -छुपी, रेस टीप, रिले रेस, कबड्डी,क्रिकेट, रस्सा खींच, लंबी कूद, रहचुली के सँगे- सँग तरिया म जाके तउँरना (तैरना) अउ बरगद पेड़ म चढ़के पानी म कूदे के अलगे मजा रहय . जब पानी गिरे त कागज के डोंगा बना के गली म बोहावन. पानी म भीगत-भीगत गली म गिद -गिद दउँड़न. दाई -दीदी मन सँग खेत -खार जाके किसिम -किसिम के भाजी -पाला सिल्होके लावन. खेत म करमत्ता भाजी, मेंड़ म बोहार भाजी रहय वहू ल तोड़न. हमन तरिया -नदियां म जाके तउँरना सीखना ननपन म ही सिखथन.बचपन सीखे के सब ले बढ़िया उमर होथे. सँगी मन सँग तरिया जाके पहिली हमन घाट तीर -तीर तउँरे बर सीखथन. फेर धीरे धीरे अभ्यास ले गड्ढा डहर जाके तउँरे ल सीख जाथन. फेर उदिम करत -करत अइसन दक्ष हो जथन कि तरिया ल ए पार ले वो पार तउँर के पार कर लेथन. महू ह अपन गाँव के दर्री तरिया, मतवा तरिया, खमर्री तरिया, चंडी तरिया, सरग बुंदिया तरिया के सँगे सँग खरखरा नदी के "दहरा घाट " म जाके तउँरव अउ गजब मजा लेवव. तरिया -नदियां म छुवउल खेले म नंगत मजा आय. तरिया -नदियां के तीर म बरगद अउ दूसरा पेड़ म चढ़ के पानी म कूदे के अलगे मजा रहिथे. सँगवारी मन सँग मिल -जुल के तरिया -नदियां म तउँरना अउ पेड़ म चढ़के पानी म कूदे ले जउन खुशी मिलथे वोकर वर्णन करे बर शब्द ह कम पड़थे. तउँरे ले हमर  शरीर के सुग्घर व्यायाम हो जथे.येकर ले हमर शरीर के सँगे सँग मन म घलो स्फूर्ति आथे.जिनगी म तउँरना के गजब महत्व हे. विपरीत परिस्थिति म हमन तउँरना जानत हन त अपन जिनगी ल बचा सकथन. कोनो डूबत हे तहू ल बचा सकथन. ननपन म महू सँगी मन सँग खेत -खार डहर जाके पेड़ मन ले लाशा निकालव .ननपन म सँगी मन ले खेले -कूदे ले सामूहिकता के भावना म बढ़ोत्तरी होथे. येहर जब हमन ह जिनगी म आगू बढ़थन त निक ढंग ले काम देथे. येकर सीख हमन ल ननपन ले मिले रहिथे.


              


         ओमप्रकाश साहू "अंकुर "


         सुरगी, राजनांदगॉव (छत्तीसगढ़) 


    मो.  7974666840

सनपना म सवार-गुटका सितार महेंद्र बघेल


 

सनपना म सवार-गुटका सितार 

                   महेंद्र बघेल 


हमर डिजिटल इंडिया म खवई अउ जियई उपर अबड़ बहस देखे-सूने बर मिल जथे। मनखे मन जीये बर खाथें के खाय बर जीथें..।रहिगे बात हमर.. त हम तो सधारन जनता आवन.., जीये बर खाथन कहिबो तभो भला नइहे अउ खाय बर जीथन कहे म घलो भला नइहे।गुनिक, सुजानिक अउ बुधियार मनखे मन के बात ह कुछ अलगे रहिथे,वो मन सबो बात के फरी-फरी कर देथें। कहे के मतलब येमन ह समाज म एक ब्रांड के रूप म देखे जाथें । एला अइसे भी समझ सकथन के अमूल के लस्सी आय कहिके ओकर पाकिट म सफेद छुही ल घोर के बेचें जा सकथे। काबर के कीमत तो ब्रांड के होथे न..। अउ ब्रांड के ॲंधरौटी म लदगाय जनता मन तारीफ म यहू कहि सकथें ..,का गजब के छुही फ्लेवर म अमूल ह लस्सी लांच करे हे भाई.., मजा आगे..।

          हमर देश म कई ठन कला ह संस्कारी उद्योगपति अउ सत्ता सरकार के परसादे पिकियावत- फुन्नावत हे। इही पैसा वाले मन गुटका बनाय के कारखाना लगाके एक ठन नवा कला ल बढ़ाय के ग्लोबल उदीम म लगे हें। इनकर नजर म येहा जन सेवा आय, पैसा कमई नोहे.., अरे भई पैसा कमई ह इनकर बर तो हाथ के मैल ए.., कतरो बेर लाइफ्बाॅय म धो डारही अउ अपन लाइफ ल बना डारही।सरकार के नजर म गुटका ह जनता के तबियत बर हानिकारक हे फेर खुद के तबियत बर लाभदायक हे..,काबर के इहिंचेच ले गड्डी-गड्डी पैसा (राजस्व) घलव वसूल होथे।

            पहली गुटका म जरदा मिले रहय तेकर सेती सरकार ल प्रतिबंध लगाना पड़े..,  आजकल जरदा अउ सादा गुटका ह अलग-अलग पाउच म मिलथे तेकर सेती दूनो ल मिलाके खाना परथे। प्रतिबंध तो यहू म हे.., कभू-कभू जनता ल भरमाय बर इडी सीडी मन छापा मारे बर जाथें.., अउ नोट छापके आ जथें। जरदा-गुटका म बउराय जनता मन इमानदार छापामारी ले गदगदात ले खुश हो जथें। कई घाॅंव एबीसीडी वाले मन छापा मारे के पहिली हमन छापा मरइय्या हन कहिके पतली गली ले इनकर कर खबर पठो देथें। तुरते डेढ़ हुशियार मालिक मन उही पाउच म सोप-सुपारी ल भरके खुदे अपन कारखाना के कपाट ल खोल देथे - आव आव साहेब हो छापा मार लेव। सरकार अउ उद्योगपति के ये भयानक ईमानदारी ले जनता मन एकतरफा खुश हो जथें अउ दूनों के जय-जयकार शुरू हो जथे। दूसर दिन इमानदार पेपर म खबर छप जथे -" छापामारी म गुटका के जगा सोप-सुपारी मिलिस।"  उद्योगपति मन के पुरखौती चतराई ले खुश होके सरकार ह ओला राज्यसभा घलव भेज देथे। उद्योगपति बर एक जन सेवक के रूप म येकर ले बड़े अउ का इनाम हो सकथे..। एती लुहुर-टुपुर करइय्या नगदउ पत्रकार मन के पदवी घलव बाढ़ जथे।

             बेवस्था, उद्योगपति अउ पत्रकार मन के शुद्ध देशी गठजोड़ ले गुटका प्रेमी जनता मन भयानक ईमानदारी के शिकार हो जथें। इही सोप-सुपारी के भरोसा म सत्ता सरकार ल मनमाफिक चुनई चंदा घलव मिलथे। तहां बेवस्था ह अपन दल के हाजमा ल सुधारे के काम म लग जाथें। सत्ता सरकार ह जानथे के नइ जाने उही जाने.., फेर उद्योगपति मन देश ल विश्व गुरु बनाय के पहली खुद ल गुटका गुरू बनाना जादा जरूरी समझथें। गुटका के कारखाना उॅंकरे,गुटका ल दुकान तक अमराने वाला ट्रक उॅंकरे, दुकान उॅंकरे अउ गुटका खाके बीमार परे जनता के इलाज बर अस्पताल उॅंकरे। इहाॅं ले उहाॅं जिहाॅं ले देखहू तिहाॅं समाज सेवा के नाम म लम्भा -लम्भा इनकर पैसा रपोटो योजना चलत हे।

              गुटका प्रेमी जनता मन गुटका ल खा-खाके पुरकू कला ल जन-जन कर पहुंचाय के उदीम म लगे हवॅंय।तुमन सोचत होहू येहा कोई कला आय तेमे.., हाव जी येहा शुद्ध भारतीय कला आय।ये आम जनता के सेवा करे बर गुटका कारखाना के कोख ले जनम धरे हे, तब तो तुमला माननाच परही येहा लोक कला आय कहिके।ये कला के गौरव खातिर गुटका प्रेमी जनता मन मरे-खपे बर घलव तैयार रहिथें। फेर पता नहीं सरकार ह ये पूरक कला ल कब राष्ट्रीय कला के रूप म मानता दीही। गुटका प्रेमी जनता मन डहर ले सरकारी अस्पताल, ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, जिला पंचायत ,बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सड़क ,पाई ,पान ठेला ,किराना दुकान अउ सुलभ शौचालय के आजू-बाजू, ओन्हा-कोन्हा ल ये कला के कैनवास के रूप म बउॅंरे जाथे। पहिली जमाना म जनता मन माखुर ल खाके पूरकॅंय ओकर मखुराहा कलर ह मरधूस होके तुरते उड़ जाय। तेकर सेती ये कला ह पैदा होय के पहिलीच मर जात रहिस।ये पूरकू कला के इज्जत ल थोकिन पान खवइय्या मन जिंदा रखे रहिस फेर आधा-अधूरा..।जब ले ये गुटका पाउच ह यामू नाम के सनपना म सवार होके आय हे तब ले पूरकू कला ल नवा जिनगी मिल पाय हे। आज ये कला ह अपन कला के बरेंडी म चघके एकसस्सू नाम कमावत हे।

          येकर बर तीन ठन घटना के गोठ करना जरूरी घलव हे।एक दिन नवा कपड़ा अउ जाकिट पहिरके बिहाव म जाय बर निकलेंव। दू झन झुलपाहा टूरा मन मोर आगू-आगू बाईक म जावत रहिन।बाईक के पाछू म बैठे कुकरा छाप कटिंग वाले बांगड़ू ह अपन जेवनी साईड म गुटका के रसा ल पिचकारी मारे कस पूरकिस। ओकर रसात्मक फव्वारा अउ पूरकन (कला रस) ह मोर मुंहुं कान अउ कपड़ा म चकचक ले छपागे।मोर दिमाग भन्नागे.., मॅंय कुछ कर पातेंव ओकर पहिली अब के दरी बांगड़ू ड्राइवर ह पिचकारी के दूसर खुराक ल मोर सम्मान म अउ पूरक दिस। चकचक ले सादा कपड़ा म पहिली वाले आर्ट ल दूसरा डोज ह माडर्न आर्ट म बदल के रख दिस।वो तो अहो भाग रहिस के मोर मूड़ी म हेलमेट तैनात रहिस..,नइते रस के फव्वारा ह मोर मुखारबिंद ल डिओ के अनुभो देके माने रहितिस।

           कोरोना के समय म घुनहा- सुपारी, कड़हा- चिचोल, सरहा-माखूर, कचरा -काड़ी, कत्था -मत्था  अउ ऑंय-बाॅंय चीज ले बने केसर मुक्त केंसर युक्त गुटका के भाव ह बड़ ताव देखाय रहिस।तब ले प्रेमी जनता मन येकर मया बिन नइ रहि सकिन। अजय देवगन के मया ह विमल म सवार होके स्कूल के अटेलहा पढ़इय्या लइका मन तक अपन पहुंच बना डरे हे। जब-जब छुट्टी होथे येमन गुटका खाके पूरकू-पुरकू खेलथें। लइका होय चाहे सियान जरदा गुटका खवइय्या मन जेन कर बइठगे उही कर पुर्र -पुर्र पूरकके ओ जगा ल रंगावत अपन कला के प्रदर्शन करथें।येकर रंग (कला रस) ह मया के रंग ले जादा गाढ़ा रहिथे..बंग लाल..।पूरकनी ठउर ल देखबे त सहीच म उनकर कला ह माडर्न आर्ट ले कहूॅं ओ पार के आर्ट लगथे .. पूरा-पूरा डिजिटल आर्ट..।

            एक दिन घर बनवाय के चक्कर म नक्शा पास करवाय बर नगर पंचायत के बाबू-साहेब मन कर गेंव। सबले पहिली बड़े बाबू ल नमस्ते ठोकेंव । बड़े बाबू कहिस -" अअस्ते..अता अइसे आय..। मुंहुं म तो गुटका के कला रस ह टिप-टिप ले भराय रहिस त कहाॅं ले नमस्ते कहि सकतिस। मॅंय अउ तिखारेंव त ओओ करत ओइयावत खिड़की कर गीस अउ पूरकन विद्या के गोल्ड मेडलिस्ट कस खिड़की के बहिरी पार पक्की सड़क म पूरकके गरमागरम माडर्न आर्ट बना दिस।

           सबे मन जानथन सरकारी बिल्डिंग के ओंटा-कोंटा म ये कला ह जिंदा रहिथे। जब नवा सरकारी बिल्डिंग बनथे तब गुटका प्रेमी कर्मचारी मन खुशी-खुशी पाऊच के पूरा लरी ल बिसा डारथें अउ साफ जगा म पूरकके अपन कला के प्रति समर्पण भाव ल दिखाथें। मने ये पूरकू कलाकार मन सरकार ल खरचा करवाय बिना अपन पैसा लगाके फोकट म माडर्न आर्ट देखाथें। अउ ये सरकार ह इनकर माडर्न आर्ट ल थोरको नइ जाने.., सरकारी आदमी आय कहिके येमन ल पांच पैसा के नइ माने। येमन बड़े ले बड़े बिल्डिंग के कोठ म गुटका के खरचा म चकाचक आर्ट बनाय के दम रखथें। फेर सरकार ल गुटका बनइय्या के उपर भरोसा हे गुटका खवइय्या मन ह जाय चूल्हा म..।

          हमर परोसी चरचरहीन भऊजी ह रोजिना बिहनियाच ले नल म पानी भरे के बेरा म चररे-चरर करत रहितिस। मयारू भऊजी ह सितार, राजश्री अउ विमल के परमानेंट गिराहिक रहिस।दिन भर इही गुटका मन ल मुॅंहुॅं म गोंजे रहितिस।जब गोठियाय ते सामने वाले के मुॅंहुॅं कान म छरा छित डरय अउ अपन लाली पूरकन ले गली -खोर ल आर्ट गैलरी घलव बना डरे रहय। आजकल ओकर चरचरई ह  मिटकई म बदल गेहे.., कलेचुप मूड़ी गड़ियाके पानी भरथे। मॅंय पता लगायेंव हमर चरचरहीन भऊजी ह कैसे अबोली होगे हे जी..। तब पता लगिस के ओकर तो मुॅंहुॅं ह एको कनी नइ उले बइहा..।  बपरी भऊजी ह जरदा गुटका ले अतिक मया करत रहिस के राजश्री ह ओकर मुॅंहुॅं के सितार बजा दिस.., बोलती बंद कर दिस। केसर युक्त विमल के चक्कर म मल युक्त केंसर के सपड़ म आगे.., आज ओकर मुॅंहुॅं सिलागे। ले-देके जूस के भरोसा म गाड़ी चलत हे।

          एती स्वास्थ्य विभाग ह बोमफार चिल्लावत हे - जरदा गुटका खाय ले दाॅंत सरथे, बीपी फाइब्रोसिस, ओएलपी, अस्थमा, पायरिया अउ कैंसर सही खतरनाक बीमारी होथे। ओती खुलेआम गुटका के कारोबार चलत हे.., जरदा गुटका बेचावतहे.., जनता मन खावत हे। फेर येकर ले का फरक परथे अपन ऑंखी म पट्टी बांधके ठाढ़े रेफरी मन ल..। केकरा (केंसर) कस तो इनकर चाल- चरित होगे हे जनो-मनो केंसर ह पांच साल बर छुट्टी लेके हनीमून मनाय खातिर ऊटी चल दे होही। कुलमिलाके चित ह इॅंकर,पट ह इॅंकर अंटा इॅंकर ...के। इहाॅं ले उहाॅं सबे जगा मंहगाई, बेरोजगारी, हारी- बीमारी बर ऑंखी मूॅंदे..,बड़े ले बड़े नंबरदार मन ल छपास अउ दिखास के रोग लगे हे..। लफरही अउ चमत्कार के जमाना म हमर का रोल हे.., बस डंडा-झंडा ल धरे लुहुॅंग-लुहुॅंग करत ॲंखमुन्दा उॅंकर पीछू-पीछू भागत हन,जइसे नचावत हे तइसे नाचत हन।इनकर आगू म आम जनता के अउ कतका इज्जत ल कहिबे..।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

31 मई जयंती म सुरता// छत्तीसगढ़ी मंच के पहला कवयित्री डाॅ. निरूपमा शर्मा

 




31 मई जयंती म सुरता//

छत्तीसगढ़ी मंच के पहला कवयित्री डाॅ. निरूपमा शर्मा 

    छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के मंच म सबले पहिली कवयित्री के रूप म अपन उपस्थिति देवइया डाॅ. निरूपमा शर्मा जी के घर अउ मोर घर एके पारा म दू कदम के फासला म रिहिसे फेर दीदी संग मोर चिन्हारी तब होइस, जब मैं सन् 1983 ले रायपुर के साहित्यिक गतिविधि मन संघरे लगेंव. खासकर के छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के साप्ताहिक गोष्ठी जेन पुरानी बस्ती के टिल्लू चौक के देवबती सोनकर धरमशाला म होवय. तब हमन दूनों अमीनपारा म राहन. मैं नवदुर्गा चौक म अउ दीदी हमर आगू के गली म. उंकर ठीक तीन घर के आड़ म डॉ. सुखदेव राम साहू जी घलो राहत रिहिन, तेकर सेती जब कभू मैं उंकर घर बइठे-उठे बर जावंव, त दूनों घर सरलग हमावत आवंव.

    महतारी सुरूजकुंवर अउ सियान बागेश्वर गोस्वामी घर 31 मई 1944 के जनमे निरूपमा दीदी हमन ल अपन सग छोटे भाई बरोबर मया करय. एक बेर सावन के महीना म वोमन हमन ला अपन मइके घुमाए बर घलो लेगे रिहिन हें. तब रायपुर ले हमन दीदी संग शोभादेवी शर्मा, डॉ. सुखदेव राम साहू, सुशील यदु अउ मैं कवर्धा म उंकर घर गये रेहेन. सावन के महीना फेर उप्पर ले सोमवार घलो तेकर सेती भोरमदेव मंदिर के दर्शन करे बर घलो चलदे रेहेन. तब कवर्धा के कवि संगी कौशल साहू 'लक्ष्य' ह हमन ल रायपुर ले पांच साहित्यकार आए हें कहिके हमर मनके सम्मान म एक कवि गोष्ठी के आयोजन कर डारे रिहिसे. हमन उहाँ जानेन के दीदी के मइके म कबीर साहेब ल जबर माने जाथे. दीदी बताए रिहिन हें- कबीर साहेब जब छत्तीसगढ़ भ्रमण म आए रिहिन हें, तब हमर ए घर म घलो पधारे रिहिन हें,  एकरे सेती उहाँ कबीर जी के खड़ाऊ माढ़े हवय, जेकर उंकर बड़े भैया सेवादार हें, उही मन वोकर सेवा करथें. वो डहार के जम्मो कबीर पंथी मन मिलके उहाँ हर बछर विशेष कार्यक्रम के आयोजन करथें. दीदी बताए रिहिन हें, ए कवर्धा वाले कबीर चौंरा ह दामाखेड़ा वाले कबीर आश्रम ले अलग हे. इहाँ के जम्मो देखरेख अउ व्यवस्था इहाँ अलग से करे जाथे.

    निरूपमा दीदी के लेखन संसार बहुतेच बड़े हे. उंकर छत्तीसगढ़ी म लिखे पहला कविता संकलन पतरेंगी ले लेके हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के- बूंदों का सागर, रितु बरनन, हमर चिन्हारी, दत्तात्रेय के चौबीस गुरु, मूल्यजनक पुराख्यान, इंद्रधनुषी छत्तीसगढ़, चिंतन के बिंदु/विचार के हीरा, दाई खेलन दे, छत्तीसगढ़ का ददरिया ( इहाँ ए जानना जरूरी हे, ए कृति ह दीदी के शोध ग्रंथ आय, जिनमा उन पीएचडी करे रिहिन हें), सामयिक गीत. इंकर छोड़े एक अउ संकलन छपे के अगोरा म रिहिसे- जिनगी के रूप. 

    निरूपमा दीदी के जतका सुग्घर लेखनी रिहिसे वतकेच सुग्घर उंकर आवाज अउ प्रस्तुति घलो रिहिसे. उंकर एक गीत बहुत लोकप्रिय होए रिहिसे-

मंझली तोर बहुरिया ममादाई, मंझली तोर बहुरिया ह वो

रांधे-गढ़े के नइए ठिकाना, मांजथे पइरी अउ बिछिया ममादाई... 

मइके के बड़ई म चलावथे चरखा, अड़बड़ हावय चटरही

कांदी लूवथे, पीयथें पसिया, मइके म संझा बिहनिया ममादाई... 

लाली कोर लुगरा अउ गहना पहिर के मटकथे अंगना दुवारी

भुइयां म सुत के सरग के हे सपना देखत हवै अपनसुर्री

मुंह ल फुलोथे अउ नखरा देखाथे आथे जब ओकर नंगरिहा ममादाई... 

ननंद देरानी के चारी ला करके दिन रात झगरा लड़ाथे

एकर ओकर बद्दी ल सुनसुन के मन ह घलो बगियाथे

अइसन पतोहिया के आगी लगे गुन म तहीं हस रद्दा बतइया ममादाई... 

    ए गीत ल हमन कवि सम्मेलन के मंच म तो सुनबेच करन, आकाशवाणी ले घलो संगीतबद्ध सुने ले मिलय. निरूपमा दीदी एक हास्य कवि के रचना 'नोनी बेंदरी' जेमा एक किसम ले महिला मनके उपहास उड़ाए के कोशिश करे गे रिहिसे, वोकर  जवाब म घलो एक रचना लिखे रिहिन हें- 'टूरा लेड़गा'. ए दूनों रचना मन के ऊपर तब गजब चर्चा होए रिहिसे.  दीदी संग तो हमन कवि गोष्ठी, कवि सम्मेलन के संगे-संग आकाशवाणी म घलो कतकों बेर संगति करत राहन. हमर मन के छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' म उन शुरू ले जुड़े रिहिन. 'मयारु माटी' के हर अंक म दीदी के कविता, कहानी या लेख आदि रहिबे करय.

    निरूपमा दीदी छत्तीसगढ़ के महिला साहित्यकार मनला एक मंच म लाए खातिर घलो जबर बुता करे रिहिन हें. वोमन एकर खातिर एक किताब 'छत्तीसगढ़ की महिला साहित्यकार' छपवाए घलो रिहिन हें. मोरो जगा बहुत झन के नाम, पता अउ संपर्क नंबर मांगे रिहिन हें. उन काहयं- तैं प्रेस लाईन के मनखे अस तेकर सेती तोर जगा गजब झन के नाम पता रहिथे. ए किताब के छपवाए म मैं दीदी ल प्रूफ रिडिंग आदि के घलो सहयोग करे रेहेंव. उंकर एक दू अउ किताब मन म घलो.

    एक बात मैं ए जगा विशेष रूप ले कहना चाहथौं. निरूपमा दीदी के कवि सम्मेलन के मंच म जेन गरिमापूर्ण उपस्थिति अउ प्रस्तुति हमन देखे रेहेन, आज के मंच म वो कोनो मेर देखब म नइ आवय. आज तो कवि सम्मेलन के मंच ह गम्मत के रूप धारण करत दिखथे, जे हा बहुत चिंता अउ दुख के बात आय. वरिष्ठ मनला एती चेत करना चाही.

    निरूपमा दीदी ल 5 सितम्बर 2001 के राष्ट्रपति द्वारा मिले शिक्षक सम्मान सहित हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य अउ सामाजिक काम खातिर गजब सम्मान मिले हे. पं. रविशंकर वि. वि. रायपुर ह एक छात्रा ल छत्तीसगढ़ के पहला महिला साहित्यकार के रूप म एमफिल के उपाधि घलो दिए हे. वोमन प्राथमिक ले लेके उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के पाठ्यक्रम निर्धारण अउ पाठ्य विषय वस्तु के विषय समिति के मानद सदस्या घलो रहे हें.

    जिनगी के हर क्षेत्र म सफलता अउ सम्मान के शिखर ल अमरत 78 बछर के उमर म 7 जून 2022 के उन ए नश्वर दुनिया ले बिरादरी ले लेइन. उंकर सुरता ल पैलगी जोहार.

-सुशील भोले

संजय नगर, रायपुर

मो/व्हा. 9826992811


हमर देसी फिरिज--करसा

 हमर देसी फिरिज--करसा



अब तो गरमी घलो नंगत के बाढ़ गेहे। सबो जीव धारी मन बर पानी अभी के बेरा म अब्बड़ जरूरी होथे। कहूं-कहूं पानी के अब्बड़ तकलीफ घलो हो जाथे। अब तो थोरको घाम चघे नई रहय अउ टोंटा ह सुखाय ल परथे। कोई डहन ले आबे तहन ले मार संसन्न भर के ठंडा पानी पिबे तभे जीव लहुटे सही लगथे। गरमी म सरबत ह घलो बने लगथे। लिमऊ के रसा हो जाये तहन एक के ह दू गिलास पिया जाथे। गरमी म सगा मन के सुआगत ठंडा पानी के सरबत ले ही होथे। 


गरमी दिन म गंवई गांव म जादा  फिरिज तो नई मिलय पर फिरिज के बड़े ददा जरूर सबे घर मिल जाही। जेला देशी फिरिज घलो कथे--करसा, करसी, मटका, घड़ा, येकर नाव हावे। जे इहाँ के पानी ल पिथे ओला तो अमरीत पिये सरी लगथे। काबर के इहाँ के पानी एकदम ठंडा, मीठा, स्वादिष्ट रथे। नंगत घाम के आये के पीछू येला पिये के आनन्द अलगे रहिथे। येकर गुन ल जनैया मन करसा के पानी ल पिये बर अब्बड़ सोरियात रथे। घर म सियान मन के भाखा सुनात रथे- ये करसा के पानी ल देबे नोनी न।


अभी करसा मन के चलन बाढ़ गेहे। बाजार म छोटे-बड़े कतको मिल जाथे। लेवैया मन अंगरी ल टेड़गा करके मारही तभे ओकर मन माढ़थे। मने करसा के बने ठहिल पाके के परख हरे, अउ बगबग ले लाल घलो होना चाही। करसा ल घर म लान के पानी ल भर के रखे ल पड़थे। रखे बर रेती ल भींजो के रखदे नहिते लोहा के स्टेन्ड घलो बनथे। जादा ठंडा रखे बर हे त चिरहा बोरा ल पानी म भींजो के करसा म गोल लपेट के रखे ले अब्बड़ ठंडा रथे।


करसा के पानी के ठंडा रहे के कारण घलो हे। करसा म अब्बड़ नांन्हे-नांन्हे छेद रथे, जे आँखी ले नई दिख पाये। ये छेद ले पानी ह रिसत रथे, अउ करसा के बाहिर तक आ जथे। बाहिर के तापमान ह भीतरी के तापमान ले जादा होय ले वाष्पीकरण होवत रथे। जेकर ले करसा के पानी अघात ठंडा रहिथे।


करसा के पानी फिरिज के पानी ले अपन सेहत बर बने होथे। फिरिज के पानी अउ बॉटल के पानी ल कतरो पी ले, पियास बुझाबे नई करय। शरीर बर तको नुकसानी आय। करसा माटी के बने हे जेमे कई परकार के रोग-राई के लड़े के क्षमता हे। येकर पानी के सुवाद अउ मजा बिल्कुल अलगे हे। 


करसा के पानी पिये ले जेवन ह बने पचे बर पाचन तंत्र ल सहयोग करथे। शरीर म टेस्टोस्टेरोन बढते। पेट के समस्या गैस, अपच, जलन नई होय। करसा के पानी अशुद्दी मन ल साफ कर पानी के गुन ल बढ़ाथे। वात रोग ल नई बढ़न दे। गला ल खराब नई होन दे। पी एच मान बने रथे। गर्भवती माता मन बर अउ जादा पुस्टई काम करथे, अउ नांन्हे लइका ल मजबूत बनाथे।


सियान मन कथे कि रोज बिहिनिया ले करसा के पानी ल पिये ले कोई बेमारी नई होय। बिहिनिया के पानी ल अब्बड़ फायदे माने गेहे। ये हमर आँखी, दिल, दिमाक ल बने पोठ करथे। अपन शरीर के बने ठहिल रखना हे त करसा के पानी ल जरूर अपनाए ल लगही। पहली के सियान मन करसा के पानी, हड़िया के भात, कलौंजी के साग खाये त कइसे अब्बड़ ठोस रहय। हमन येला छोड़त हन त दिनों-दिन हमर शरीर के बल कम होवत जात हे। प्रकृति ले दुरिहा भागे के फल ल पावत हन।


अब गांव रहय ते सहर सबो के मनखे मन करसा के पानी ल अपनाये हे। सड़क तीर अउ सहर मन म कतरो पियाऊ घर खुले हावे। जेमे एक झन पानी पियईया जरूर रथे। येला कोई संस्था, भले आदमी, सामाजिक संस्था वाले मन खोल के पानी पियाये के धरम काम करत रहिथे।


करसा के पानी ल फिरिज के पानी सही बिजली ले ठंडा करे के जरूरत नई हे। ये तो प्राकृतिक रूप ले ठंडा रथे। मने एकदम शुध्द देशी। बिजली के ख़र्चा करे ले बचत घलो होथे। करसा लेय ले हमर कुम्भकार भाई मन के घलो मिहनत के मान अउ सहयोग होथे। करसा के पानी ल हमन पिबो त अवइया पीढ़ी मन हमन ल देख के करसा के पानी ल अपनाही अउ अपन सेहत बर जागरूक होही। प्रकृति के तीर म रहि अउ सेहत घलो बने ठहिल रहिही।



         हेमलाल सहारे

मोहगांव(छुरिया)राजनांदगांव

डरपोक लड़की

 बाल कहानी

-------

             डरपोक लड़की

              ------------------

मूल लेखिका----विमला भंडारी

छत्तीसगढ़ी अनुवाद--- चोवाराम वर्मा 'बादल'

  हथबंद, छत्तीसगढ़

                

            डरपोकनिन लड़की

              -----------    


एक ठन कुरिया के दरवाजा बंद हे।  जिहाँ कुलुप अँधियारेच अँधियार हे। रेहाना ह डरपोकनिन लड़की  हे।वो ह बंद  अँधियार कुरिया म जेमा तिलचट्टा मन के  पूरा कालोनी खमखम ले बसे हे, जाये ले डर्राथे तेकर सेती सब झन वोला डरपोकनिन कइथें ।

          रेहाना ह तिलचट्टा मन ल कई पइत टकटकी लगा के देखे हे।वोला पता हे के अभी संझा होही तहाँ ले ऊँकर एक संग नाचा पेखन चालू हो जही। कोनो तिलचट्टा संगीत देही त कोनो ह नाचही। रेहाना बर ए ह बड़ डरडरावन होथे। रेहाना बेचारी ह मुश्किल म परगे हे काबर के वोकर अब्बू ह केरा के टोकरी ल इही बंद कुरिया म रखे ल 

कहे हे। अब्बू के कहना ल तो मानेच ल परही। रेहाना ह कपाट के सँध म कान लगा के सुने ल धरलिस।

        तिलचट्टा मन के नाचा शुरु होगे हे। बाजा- गाजा सुनाई दे ल धरलिस।रेहाना ह कान लगा के सुने ल धरलिस।

     थोकुन पाछू चर्र-चर्र करत बंद कुरिया के कपाट खुलिस अउ अँजोर के लकीर भीतर घुसिस।

      भागव--भागव-- जान बँचावव --खतरा ।तिलचट्टा मन चिल्लइन अउ अपन अपन बिला म लुकाये ल धरलिन। वो मन ल भागत--सपटत देख के रेहाना ह चिहर डरिस। वोला सुनइस--तिलचट्टा मन काहत राहयँ--भागो- भागो --कोई मनखे भीतर खुसरे हे।

   हाँ महूँ ह देखे हँव बड़का टुकनी बोहे हे।

वो टुकनी म खाये के जिनिस हे का?

नइ पता। काकर हिम्मत हे जेन जा के देखय?

ममहाय बर तो बनेच ममहावत हे।

अरे! सब चुपेचाप होके देखव-वो मनखे ह टुकनी ले निकाल के कुछु राखत हावय। एक झन तिलचट्टा कहिस।

    रेहाना कलेचुप कुरिया के भीतर जात रहिस। डर्राय,सपटे तिलचट्टा मन फेर खुसुर-फुसुर करे लागिन। 

 आज हमर नाचा कार्यक्रम ये मनखे के सेती खइता होगे भइया।

 बहुतेच बुरा होगे।

 उदास तिलचट्टा मन आपस म गोठियाइन-

    हमन ल  हमरे कालोनी म तको बने-बने नइ राहन देवयँ।

  ये मनखे मन के शिकायत होना चाही।

    ' शिकायत' ल सुनके रेहाना अकबकागे। वो ह टुकनी ल भुँइया म मढ़ावत देखिस-- सबो बिला म कुछु न कुछु गोठबात होवत राहय। टुकनी ल  वो उही मेर  छोड़ के तुरते लहुटगे अउ कपाट ल लगा दिस। एक झन तिलचट्टा ह अपन साथी मन ल बताइस के कपाट ह बंद होगे हे। रेहाना ह फेर बाहिर ले कान देके सुने ल धरलिस। तिलचट्टा मन काहत राहयँ---

    कोनो अइसे बहादुर हे का जेन ह जा के पता लगाके आवय के टुकनी म काय लाये गे रहिस। वो हमर काम के हे धन बेकार के जिनिस हे। कोनो एक झन ल भेजे जाय।

  एक झन दुब्बर- पातर फेर टंच तिलचट्टा जेकर नाम हरिमो हे ,वो जाये बर तइयार होगे। वो जतका तेजी ले गिस वोतके तेजी ले टुकनी म चढ़के अउ झाँक के लहुटगे। वो  सबला बताइस--वो टोकरी ह कच्चा केरा ले भरे हे।

  कच्चा केरा! वाह तैं कइसे कहि सकथस के केरा कच्चा हे?

हरिमो ह अपन मूँड़ के सिंगनल देवइया दुनों एंटीना ल हलावत कहिस--हाँ केरा कच्चा हे। कच्चा केरा हरियर होथे। वो  सब हरियर हें। मैं विज्ञान के विद्यार्थी रहे हँव।

  वोती रेहाना ल ये सुनके अबड़े अचरिज होगे।

 त का वो केरा मन हमर काम के नइये का हरिमो? छोटकू देशाजू ह पूछिस।

नहीं देशाजू! काम के तो हे फेर हमन ल केरा के पाकत ले अगोरे बर परही।

हरिमो का तैं बता सकथस --ये केरा मन ल पाके म के दिन लागही?

अरे मूरख! केरा पेड़ ले टूटगे हें। उन अब कइसे पाकहीं?

त फेर केरा ल पाके के बाद टोरना रहिसे।

रेहाना ह झाँक के देखिस-ये सलाह भोभला तिलचट्टा पपलू ह देवत राहय।

का केरा मन खाये के लइक हे?

का हमला अभी उन ल खाना चाही?

बहुत झन तिलचट्टा मन ल कुछु समझ नइ आवत रहिसे।

 चलव सब झन हरिमो के ददा नरिमो करा जाबो । वो ह वनस्पति वैज्ञानिक आय।वो सब जानथे। 

    अइसे कहिके तिलचट्टा मन के एक दल  ल सरपट दूसर जगा जावत ,रेहाना ह देखिस। ये जगा ह थोकुन साफ सुथरा अउ हवादार रहिस जिंहा  नरिमो ह बइठे रहिस। वो ह तिलचट्टा मन के बात ल सुनके विचार करके समझावत कहिस-- मैं ह जेन पढ़े लिखे हँव अउ जेन अनुभव हे तेकर अनुसार बतावत हँव तेला ध्यान देके सुनव--

कचलोइहा केरा हरियर होथे। पाके केरा ह पिंवरा होथे। कच्चा केरा सिट्ठा होथे फेर पाके केरा मीठा होथे।

 वाह वाह बढ़िया बताये सियान--तिलचट्टा मन खुश होके कहिन। दू -चार झन कहे लागिन- तब तो हमला केरा  मन ल पाके बर अगोरना परही।

   वो दल के एक झन तिलचट्टा ह अपन मूँड़ के दूनों गोल-गोल आँखी ल घुमावत पूछिस--फेर केरा पाकही कइसे?

 नरिमो ह फेर समझावत कहिस-- केरा के फोकला म पर्णहरित होथे जेला क्लोरोफिल तको कहे जाथे । उही पर्णहरित ह पाके म मदद करथे।

      नरिमो ह आगू समझावत कहिस-- तु मन ल पता होना चाही के केरा ह पेड़ ले टूटे के बाद तको साँस लेथे। वोकर फोकला म बारीक- बारीक छेदा होथे जेला 'रंध्र' कहिथन।वोकर ले हवा भीतर-बाहिर आथे -जाथे। हवा के संग 'आक्सीजन' भीतर जाथे।इही समे क्लोरोफिल ह अपन काम करथे।सब झन चेत लगा के सुनव।अब मैं एक ठन खास बात बतावत हँव--

क्लोरोफिल के काम होथे केरा ल पकोये बर जरूरी हार्मोन ल धीरे-धीरे केरा के भीतर पहुँचाना ।ये बुता वो लगातार करत रहिथे।जेकर ले वोकर हरियर फोकला ह पतला अउ पिंवरा होवत जाथे।

 हाँ ,ये तो सिरतो बात हे।एक झन सियनहा तिलचट्टा ह कहिस। मैं ह कच्चा अउ पक्का दुनों केरा देखे हँव।

   नरिमो ह अउ समझावत कहिस--क्लोरोफिल ह केरा म जेन  पोषक तत्व डारथे वोकरे ले फर के स्टार्च ह शूगर म बदल जथे जेकर ले सिट्ठा केरा ह मीठ हो जथे।

बहुतेच बढ़िया -बहुतेच बढ़िया--सब नाचे ल धरलिन।

एक झन खोरवा तिलचट्टा ह पूछिस--का अइसने सबो फर मन संग होथे? का हम ला इँखर पाक के मीठ होवत ले अगोरे ल परही ?आमा के जइसे। कच्चा आमा ह

घलो तो पाक के मीठा हो जथे।का सबो फर के संग अइसनेच होथे? 

मोर हिसाब से नइ होवय।लिमउ जेला निबू तको कहिथन--वोकर सँग अइसन नइ होवय। हरियर कच्चा नीबू ह पाक के पिंवरा हो जथे। वोकर फोकला तको पातर हो जथे फेर वोकर रस ह तो खट्टेच रहिथे, मीठ नइ होवय। खोरवा तिलचट्टा ह जब अइसन बात कहिस त बाँकी मन नरिमो के मुँह ल ताके ल धरलिन।

नरिमो कहिस-- फर मन के रंग बदले के बात तैं ह सहीं कहे। पेड़ म फरे कई ठन कच्चा फर मन के रंग आने होथे जेन पाक के आने हो जथे। जइसे ब्लेकबेरी ह पहिली लाल होथे तहाँ ले पाक के करिया हो जथे।

    बहुतेच बिचित्र दुनिया होथे फर मन के।इँकर रंग अउ स्वाद बदल जथे। इँकर गुन घलो बदल जथे। पाके के बाद फर खाये के लइक तो होबे करथे संगे संग शरीर ल अउ जादा फायदा देवइया हो जथे। लेवव जतका मैं जानत रहेंव वोतका ल  तुमन ल बता डरेंव --नरिमो ह कहिस।

    रेहाना ल तिलचट्टा मन के गोठ-बात बड़ मनभावन लागिस। ये मन तो बहुत समझदार हें। मैं ये मन ले फोकटइहा डर्राथवँ। वो ह कपाट के सेंध ले कुरिया भीतरी ल झाँक के देखना चाहिस। धीरे-धीरे कपाट ल खोलिस। कपाट के खुलतेच तिलचट्टा मन फेर भागिन। एक ठन भोला-भाला तिलचट्टा ह रेहाना के पाँव म चढ़के, चढ़त -चढ़त  फ्राक म आगे।

 उई माँ! उई मा!! उई!!! -रेहाना ह चिल्लावत कूदे लागिस।वोकर चिल्लई ल सुनके तिलचट्टा मन डर म एती- वोती लुकाये-सपटे ल धरलिन। रेहाना ल चिहकत देख के वोकर माँ बोलिस--का डरपोकनिन लड़की हे ये ह।


बादल