Monday, 15 April 2024

रांड़ी के चूरी,टिकली” कहिनीकार डॉ. पदमा साहू *पर्वणी* खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य

   “रांड़ी के चूरी,टिकली” 


                                       कहिनीकार 

                               डॉ. पदमा साहू *पर्वणी*

                              खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य 


जाड़ के दिन आय बड़े फजर ले घर के अंँगना मा बइठे श्यामसुंदर चिल्लावत हे,,,,,

“भावना नोनी भावना कहाँ हस वो । आतो बेटी मोर तीर बइठ न वो ।”  


“चूल्हा कर बइठे हों ददा दाईसन आगी-बुगी देखत हँव।” रंधनी खोली ले भावना चिल्लात हे ।


“थोरिक मोर तीर आतो तोर संग बड़ जरूरी गोठ गोठियाहूँ” –श्यामसुंदर कहिथे 


भावना अपन ददा श्याम सुंदर के तीर मा जाके–  “हाँ ददा का होगे बताना ?”


श्यामसुंदर कहिथे –  “बेटी अभी तो तोर पूरा उमर बाँचे हे । अभी तें सत्ताइस बछर के हावस, तोर भरे जवानी के ये जिनगी कलजुग के ये बखत म कइसे पहाही? दुख-सुख तो लगे रहिथे, संजय तोरसन जैसन भी करथे वोला भूला के एक घाँव तें अपन ससुरार जाके देखना बेटी तें तो पढ़े लिखे हावस समझ न। तोर सास घलो तोला समझथे ओतो बने हावय । देखत हस नहीं गाँव के लोगनमन आनी-बानी के गोठ गोठियाथें । कोन ल का उत्तर देबे? दुनिया बेटी वाले ल ही दोष देथें ” 

        अपन ददा के गोठ ल सुनके बिना कुछु कहे उदास होके भावना ह चुप बइठे हे ।

ले सोच बिचार के बताबे बेटी कहिके श्याम सुंदर खोर कोती निकल जथे ।

 शांता कहिथे– “भावना तोर ददा बने काहत हे बेटी । दाई-ददा ल अपन लइकामन के अब्बड़ संसो रहिथे अउ घर में तोर दू झन छोटे बहिनीमन हें । फेर तें अम्मल में हस, त अवैया लइका के आगू-पीछू  ल घलो सोचे ल परही बेटी ।”


भावना बिना कुछु कहे अपन लुगरा कपड़ा ल धरके तरिया चल देथे। नहा के आवत रहिथे शीतला मंदिर कर पहुँचे रहिथे ओतके बेर पूनिया गोठियावत राहै – “अपन दूनों में तो सबके घर झगड़ा लड़ई  होवत रहिथे त ये टूरी भावना ह चारो महिना ले अपन ददा घर आके बइठे हे।”

ओतके में सुखिया कहिथे – “सुने में आहे के टूरी अम्मल में हे त अपन ससुरार चल देतीस नहीं ।”


सुखिया अउ पूनिया गोठियावत-गोठियावत भावना ल देख डरथें और चुप हो जथें । सिधवी भावना घलो कुछु जवाब  दे बिनामुड़ ल निहराय अपन घर चल देथे ।


आज भावना अन पानी ल तियाग के दिनभर गुनत हे – “ में का करौं भगवान ? दाई-ददा के घर में हों त समाज के मन ताना देत हें । ससुरार म शरबइहा अउ कामचोर आदमी के रात दिन मारपीट जेन ह समझाय ले नइ समझे । करौं त का करौं?”


शांता कहिथे – “बेटी आज दिन भर उदास हावस कुछु खाय पीए घलो नइ हस । काबर अतेक संसो करत हावस? तोर ददा घलो आज दिन भर चुप-चुप हावय ।

            अइसने करत-करत हफ्ता दिन बीत गे संँझा  बेरा फोन के घंटी बाजथे । दँउड़त-दँउड़त प्रिया (भावना के छोटे बहिनी ) जाके फोन ल उठाथे–  “हलो,,,, हलो,, कोन ?”

“में तोर जीजा, प्रिया अपन दीदी ल फोन दे ।” – वो कोती ले संजय कहिथे 


प्रिया–  “ये ले दीदी जीजा के फोन।” 


भावना कहिथे – “हलो ।”


संजय कहिथे – “चार महीना होगे भावना तोला मोर सुरता नहीं आवत हे का? तें घर आजा में अब दारू पीए ल छोड़ दे हों बरोबर काम मा घलो जावत हों दाई ल पूछ ले। दाई तोर अब्बड़ सुरता करथे। दाई कसम अब में तोला नइ मारँव-पीटँव तें आजा न। भावना सुनत हावस न ।”

भावना धीर ले कहिथे – “हव सुनत हंँव सुरता तो रोज आवय फेर,,,,,,,।  पहिली फरी-फरी सबो बात ल ददा तीर गोठिया ले कि अब तें अइसन कभू नइ करस ।  तें घेरी-भेरी अइसने करबे त में नइ आवंँव । में कइसे विश्वास करौंं कि तें सुधर गे हावस?”

संजय कहिथे – “ एक बेर विश्वास कर ले भावना ।”

भावना थोरिक ठिठक के सोचे लगथे – रोज के पारा मोहल्ला के मन ताना मारथें। मोर ददा के समस्या अउ झन बाढ़य सोच के कहिथे – “ कब आबे ।”

संजय कहिथे – “काली आवत हों । तें तियार रहिबे ।”

       संजय भावना ल लेगे बर आथे । अपन सास ससुर ले फरी-फरी बात करके भावना ल ले जथे । भावना नवा दुल्हिन कस बांहा भर चूरी, बड़े जन टिकली, कारी पोत पहिने तियार होके संजय अपन ससुरार धनेली आ जथे । वोकर घर आय ले वाेकर सास रमला अब्बड़  खुश होथे । संजय अपन राज मिस्त्री के काम ल मन लगा के करथे । संजय अउ भावना के जिनगी खुशी-खुशी बीतत पाँच महीना होगे । आज उंँकर घर में एकठन बड़े खुशी के रूप में उंँकर बेटा के जनम होय हे ।

रमला अब्बड़ खुश होके कहिथे – “ फागुन के नगाड़ा ह पंद्रह दिन बाद बजही फेर आज के नगाड़ा मोर नाती के सेती बजही सब पारा मोहल्ला के मन नाचो बाजा बजावव । आज मोर पोता के छट्ठी हे।”


संजय कहिथे – “ हव दाई आज सगा सोदर आहीं । मोर सास ससुर मन घलो आतेच होही अभी फोन करे रहिस।”

उतकीच बेर श्यामसुंदर, शांता अउ उंँकर दूनों बेटी पहुँचथें ।

संजय कहिथे – “दाई पानी ला वो लोटा मा सगा आवत हें ।”

रमला कहिथे – “ ये लो समधीन पानी चलव हाथ गोड़ धोवव ।”

सब झन हाथ गोड़ धोके भीतरी डाहर जाथें । दिन भर सगामन के अवई-जवई, खाना-पीना चलथे ।


साँझ बेरा संजय कहिथे – “दाई अपन संगवारी मनसन एकन बहिरी कोती ले  घूम के आवत हंँव।”

येला भावना सुन डरथे अउ संजय ले कहिथे – “जल्दी आबे, कुछ उल्टा सीधा काम मत करबे ।”


संजय – “ ठीक हे कहीके चल देथे ।”


दू घंटाबाद घर में एकदम सन्नाटा छा जथे। बाजा गाजा बंद ओती ले चार झन मनखेंमन खून ले सनाय संजय के लास ल धर के आथें । येला देख के भावना धड़ाम ले मूर्छा होके गिर जथे । खुशी ह दुख में बदल जथे ।

ये डहर पुलिस मन घलोग घर में आ जाथें।

       आदमीमन बतावत रहिन कि – “ये दारू पीके गाड़ी चलावत रहिस आगू कोती ले बड़े असन ट्रक आवत रहिस तेमा झपागे एकर संगवारी मन एला छोड़के भागगीन ।”

भावना छाती में पथरा रख के कहिथे – “जीही बात के मोला डर रहिस उही बात होगे । संजय ते दारू पिए बर काबर गे होबे ?” तें तो छोड़ दे हों काहत रहेस ।


“आज दुल्हिन जईसे सजे-धजे भावना विधवा बनगे, रांड़ी होगे । भरे जवानी मा हाथ खाली होय के दुःख ल मोर ले जादा कोनों नइ जान सकें ।

तें काबर अइसने करे बेटा, मोर एक झन बेटा रहे ।

आज तोर घर में अतेक बड़े खुशी मनावत रहेंन । तें नइ पीते त का होतीस ?”  छाती पीट-पीट के रमला रोवत हे ।

पाँच दिन में मौत माटी के कार्यक्रम होथे । भावना के दाई ददा रोवत कहिथें – “तोर सास अउ ये नानचन बाबू ल संभालबे बेटी अब तोरे जिम्मेदारी हे”। कहिके अपन घर चल देथें ।


भावना – “में कइसे करहूँ ददा घर में कोनो नइ हे, सास अउ लइका ल कइसे सम्हालहूँ ? घर मा खेती खार नइ हे जिनगी के गुजारा कइसे करहूँ ? कहिके बिलख-बिलख के रोवत हे ।”

          सास बहू एक दूसर के ढाढस बंँधावत रोवत हें

अब अइसे-तइसे महीना दिन बीतगे गाँव गली के छोटे विचार अउ खोटहा नियत वालेमन ताना मारे के शुरू कर देहें ।


पड़ोसीन खेदिया काहत हे– “खा डारिस अपन आदमी ल । पहिली मइके में जाके बइठे रिहिस अब तो भरे जवानी में रांड़ी होगे अब तो गुलछर्रा उड़ाही ।” 

चौरा मा बईठे पोखन काहत हे – “ ये का रही ससुरार मा? जाही कोनों ल धर के।”


साँझ बेरा आज गाँव के बजार में गोरी नारी चिकनार भावना के सुग्घर रंग रूप ल देख के गाँव के मनचलहा बिगड़ेल टूरा तारन चँउक ताना मारत कहिथे – “अबे! ये तो विधवा रांड़ी असन नइ दिखे रे । ये तो अतेक सुंदर हे एला देखके मन पगला होगे ।” 


बिश्राम कहिथे  – “ हव बे ये तो घातेच सुग्घर हे फेर देख तो ओ तो चूरी पहिने हे अउ टिकली घलो लगाय हे ।”

भावना टूरामन ल घूर के देखत चुपचाप अपन घर आजथे ।


अतका में पंच सोनऊ बबा कहिथे – “कखरो बहू बेटी ल अइसन बोलथो त तुमन ल लाज नहीं आवे रे । तुंहर घर में तुंहरमन के दाई बहिनी नइ हे का रे ।”

        भावना घर आके अपन सास ल ये सब बात ल बतावत कहिथे– “दाई खेती खार तो नइ हे । घर में कोनों कमईया मरद घलो नइ हे, तहूँ सियान होगे हावस अउ जिनगी ल जिए ल पड़ही । में जादा पढ़े तो नइ हों फेर बारवी पास हों । मोला अपन पढ़ई के मुताबिक छोट-मोट काम खोजे बर रोजी-रोटी बर बहिरी जाना पड़ही ।”


रमला कहिथे – “ अब तहीं बेटा बनके पालबे दाई । दुनिया के ताना ल सुनत सुनत तो मोर जिनगी निकलत हे भावना फेर तें सही हावस त कोनों ले डरे के काम नइ हे ।”


दूसर दिन भावना अपन संगवारी तेजन ल फोन लगाके कहिथे – “ तेजन बहिनी तें जौन नगर पंचायत में सफाई कर्रमचारी के काम करथस उहाँ मोरों बर काम खोज देना ।”

तेजा – “ ऑफिस के बड़का बाबू ले आके बात कर लेबे उही जानही ।”

भावना अपन मइके के सरपंच ले बड़का बाबू ले मिलके बात करे ल कहिथे । सरपंच ह बाबू ले गोठ बात करथे अउ भावना ल काम म रख लेथे ।

       बईसाख के महीना तपत घाम मा, महीना के पहिली दिन बड़े फजर ले खाना डब्बा धर के नानचुन लइका ल अपन सास के अंचरा में देके गर में कारी पोत, हाथ मा चूरी पहिने काम मा निकलथे ।


रमला भावना के ये रूप ल देख के कहिथे – 

“भावना में जानथों तें गलत नइहस फेर गाँव वालेमन दुनिया भर के ताना मारथें । पारा मोहल्ला के मन तोर ये रूप ल देख के पहिली ले तोर ऊपर अंगरी उठावतके रहिन अब अउ गलत समझही अउ मोला कही तोर बहू काखर नाम के चूरी पहिने हे कहिके ।”


भावना कहिथे – “ घर ले बहिरी निकलहूँ  त समाज मा कतकों राक्षस मन के चील कस नजर परही, इहाँ किसम–किसम के लोगन हें । त अपन सुरक्छा बर में ये हाथ के चूरी, गर के कारी पोत, माथ के टिकली ल पहिने रहूँ दाई। गाँव वालेमन जौन सोचत हें सोचन दे काहत अपन काम में चल दीस ।”

    भावना ल काम में जावत पंद्रह बीस दिन होय रहिस। ईरखा के मारे पारा मोहल्ला के दू झन आदमी श्यामलाल अउ पोखन जेकर मोटियारी बेटीमन खुदे बिगड़े हें तेमन रमला के घर में बड़े बिहनिया ले जाके कहिथें– “तोर बहू के सेती पारा के बहू बेटीमन बिगड़त हवें । अपन बहू ल समझा के रख वो काखर नाम के चूरी, टिकली, कारी पोत पहिनथे ? आज साँझ बेरा सात बजे गाँव मा सामुदायिक भवन मा बइठका होही सास बहू आहू । में पंच, सरपंच ल बता डारें हँव।”


भावना सबो बात ल चुप सुनके अपन काम में चल देथे । काम ले मझनिया बेरा आथे अपन लइका ल धर के दूध पियावत सो जथे । संँझा के काम बूता ल करके रांध के बइठका में सास बहू पहुँचथें ।

श्यामलाल अउ पोखन – “चलो गा बइठका ल शुरू करौ सास बहू आगे ।”

सरपंच – “ का बाते  पोखन बता ।” 

 पोखन – “ तुमन सबो ल जानथो बताय के कोनो जरूरत नहीं हे । ये भावना के सेती गाँव के बेटी माईमन बिगड़त हें, अउ बेटी बहू मन झन बिगड़े । एला समझा दौ अउ पूछौ ये काखर नाम के चूरी पहिने घूमत फिरथे ।”

सरपंच अउ पटईल– “ ये गोठ ल तो हमूं मन सुने हाँवन  फेर संजय के तो इंतकाल होगे हे फेर कस ओ बहू तें  काबर  ये चूरी, टिकली पहिने हावस?”


भावना सबों के बीच में खड़ा होके कहिथे – “साँच ल आँच का, सबों जानथो में चरित्रहीन, बिगड़ेल नइ हों न  काखरो बहू बेटी ल बिगाड़त हों । का होइस में रांड़ी हँव त रांड़ीमन ल समाज मा सनमान के साथ जीए के हक नइ हे का? कब तक हमन चील, कंउआँ के आँखी धरे लोगन मन ले डरबों अउ ताना सनबों? समाज के पोखन, बिश्राम, तारन जईसन के राहत ले सब दुखिया रांड़ी के हाल कभू नइ सुधर सकय। आज तो अकेझन भावना हे । काली के बखत मा मोर असन कतकों रांड़ी भावना ल चूरी, टिकली, कारी पोत पहिन के निकले ल परही । में ए चूरी ल अपन आत्मसम्मान अउ जिनगी के भरे जवानी के रक्छा बर पहिने हों ताकि में समाज मा पलत गिद्धमन के बुरा नजर ले जब तक हो सके बच सकँव । में अपन चरित्र के कोनो ल कोई प्रमान नइ देवंँव । में एला नइ उतारंँव ।”


भावना के बात ल सुन के बइठका के सबोंमन एकदम चुप । कोनों मा कुछु बोले के हिम्मत नइ हे । काबर के भावना सही हे । अतका में रमला कहिथे – “ चल बेटी ये  दुनिया ल सफई देय के कोनों काम नइ हे ।”


कहिनीकार 

डॉ. पदमा साहू *पर्वणी*

खैरागढ़ छत्तीसगढ़ राज्य

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समीक्षा


 पोखनलाल जायसवाल:

 एक समय रहिस, जब आधा उमर म विधवा होय ले बहू ल घर-परिवार म बड़ सम्मान ले चूरी पहिरा के विधवा के कालिख ले बचाय के उदिम चलय। बहू ल ताना तो सुने ल मिलय। 

     फेर गरीबी ह सदा दिन जिनगी बर अभिशाप आय। गरीब परिवार म विधवा होना तो जइसे महापाप हो जथे। जेमा पीड़ित नारी के कोनो हाथ नी राहय। समाज के तथाकथित ठेकेदार जेकर ले खुद के घर नइ सॅंभाले जा सकय, उन मन दूसर के सुख ल देख नी सकय। दुख के बोझा म बोझा लादे के प्रपंच रच थें। 

       शराब समाज ल रात-दिन घुना बरोबर खावत जावत हे। फेर सुधरे के नाॅंव कोनो नइ लेवत हे। कोन जनी का मोहनी हे ? ते शराब म। कतको घर उजरगे फेर न परिवार जागत हे अउ न समाज।

       इही शराब के नशा म बिधुन नवा पीढ़ी घलव मर्यादा ल ताक म रखे धर ले हे। जे सबो समाज बर संसो के बात आय। चिंताजनक ए। 

      शिक्षा ले ही लोगन अपन पाॅंव म खड़ा हो पाथे। विचारवान बनथे। मुश्किल घड़ी ले पार पाय के उदिम करथे। नवा रस्ता चतवारथे। भावना एकर उदाहरण हे। रूढ़ीगत परम्परा ल जिनगी के सुघरई बर बदले के साहस मिल पाथे। जे परम्परा जिनगी बर पीड़ादायी होवय ओला बदले अउ हथियार बनाय के आजादी होना च चाही।

       नारी ल संबल प्रदान करत नारी विमर्श के सुग्घर कहानी बर डॉ पद्मा जी ल बधाई 

पोखन लाल जायसवाल

 पठारीडीह (पलारी)

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 ओम प्रकाश अंकुर:

 नारी विमर्श के सुघ्घर कहानी हे आदरणीया डा.पदमा साहू के कहानी -" रांड़ी के चूरी,टिकली"। 


दारू हमर समाज के एक बड़का बुराई हरे। सौ म दो चार झन ल छोड़ के सबो एमा रंग गे हावय। दारू दुकान के भीड़ ल देखबे त पता चलथे अतकी भीड़ मंदिर म नइ राहय। का अनपढ़,का पढ़े लिखे , चपरासी, बाबू - अफसर सब ए पानी के जादू म मोहाय हे। शराबी मन ल बस बहाना चाही। बिहाव, षट्ठी म उछाह म छकत ले पीथे त मरनी - हरनी, दशगात्र जइसन दुःख के बेरा ल घलो नइ छोड़े। शराबी के दशा ह वो पतंग बरोबर होथे जेकर धागा ह कट गेहे। कटे पतंग ह कदे कर जाके गिरही तेला कोनो नइ बता सकय वइसने शराबी व्यक्ति ह कहां जाके कब झपा जाही वोकर मानी कोनो नइ पी सकय। एक शराब ह कतको बुराई के जड़ हरे।कहावत हे न "पहिली शराब,दूसरा कबाब फेर तीसरइया शबाब"। जादातर शराबी मनखे मन के दशा अइसने होथे। शराब पीये के बाद शेर बन जाथे। नंगत बकही। घर म बाई लोग- लईका ल ठठाही। काम म कोढ़ियई करही अउ रोजी मजूरी कमइया अपन गोसइन के पइसा बर नियत लगाय रही। जुआ - छट्टा खेलही। घर वाले मन के जिनगी नरक बनही। ये कहानी म दारू के दुष्परिणाम के जीवंत चित्रण सामने आय हे कि कइसे शराबी मन झूठ बोल के बाई ल बुलाथे पर दारू के नशा ल नइ छोड़ पाये अउ आखिर एक्सीडेंट होके मर जाथे।

  ये कहानी म एक शराबी घर के दसा अउ दिसा के मार्मिक चित्रण हावय।कहानी के मुख्य पात्र भावना कस न जाने कतको भावना मन के जिनगी शराबी पति के कारन नरक हो जाथे।भरे जवानी म उंकर मन के सपना ह छर्री -दर्री हो जाथे। कम उमर म विधवा हो जाथे अउ समाज ले नाना प्रकार के हीनमान सहिथे। कतको कुकर -कौंवा, गिधान मन नोचे बर तैयार रहिथे।

कम उमर म विधवा होय के बाद का का परेसानी ले गुजरे ल पड़थे अउ वोकर ले बचे बर कहानी के मुख्य पात्र भावना ह विधवा होय के बावजूद चूरी,टिकली अउ कारी पोत पहिनथे। कहानी के ये चित्रण ह नारी विमर्श के सुघ्घर उदाहरण हे। कहानीकार अपन मुख्य पात्र भावना के माध्यम ले समाज ल संदेश देथे कि एक विधवा के दसा अउ दिसा सुधारे बर अपन योगदान देवय न कि पांव खींच के गिराय के काम करय। कहानी के भाषा पात्रानुसार हावय।  बिगड़ैल टुरा मन के भाषा कइसे रहिथे वोकर खरा - खरा चित्रण हावय। पास - पडोस के लोगन अउ गांव के मनखे मन के बेवहार के बने बरनन हे। ये एक सार्थक कहानी हे। येकर खातिर कहानीकार आदरणीय डॉ. पदमा साहू ल गाड़ा- गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना हे।

करिया अक्षर भँइस बरोबर

 करिया अक्षर भँइस बरोबर 

                    छुरिया म एक झिन महाजन रिहिस । महाजन तिर अबड़ अकन चीज बस रिहिस । फेर ओकर चीज हा ओकरे कोठी के शोभा के पुरतिन रिहीस । कभू न दान जानिस न सहयोग । गाँव के मनखे भूख मर जतिस फेर ओकर हिरदे कभू नी पसीजिस । ओकर मूल हा जस के तस बाँचे रहय अऊ बियाज के पइसा म बियाज कमावय । अतेक पइसा वाला होके लोभ लालच अऊ बईमानी नी छूटय । जब मउका लगय तब बईमानी म उतर जाय । गाँव के मन जान डरे रहय तेकर सेती , महाजन तिर करजा लेवइया के गनती धीरे धीरे कमतियाये बर धर लिस । एकदमेच फिफिया जाय तभे बईमान तिर हाथ लमाये उहाँ के मनखे मन । 

                    एक बेर के बात आय । गाँव म अकाल परगे । खाये कमाये बर गाँव के मनखे मन पलायन सुरू कर दिन । उही गाँव म महंगू नाव के एक झिन मंझोलन किसान रहय जेकर बेटी के बिहाव हा एक बछर पहिली तै होगे रहय । बिहाव के दिन तिथि हा बछर भर पहिली माढ़ चुके रहय .. सगा नराज झिन होय सोंचके , अकाल दुकाल म घला अपन बेटी के बिहाव करे बर मना नइ कर सकिस । फसल नी होय रहय तेकर सेती बपरा एकदमेच फिफियागे रहय । बईमान महाजन ले करजा मांगे के अलावा अऊ कोई चारा नी बाँचिस । ओहा महाजन के बईमानी ला जानय तेकर सेती ओकर तिर जाये के हिम्मत नी करत रहय । अपन दुखड़ा ला गाँव के बड़े ठेठवार तिर गोहनइस । बड़े ठेठवार हा गाँव के बड़ नामी मनखे अऊ जबर सियान रिहिस । ठेठवार हा महंगू ला सनतावना देवत , महाजन तिर संग म जाये के बात करत कहिथे के – मोर रहत ले , महाजन तोर नकसान नी कर सकय । दुनों झिन करजा मांगे बर चल दिन । 

                    करजा देके बेरा बड़े जिनीस पोथी म महाजन हा , महंगू के आगू म करजा लेहे के अऊ लहुटाये के तारिक लिखिस । बियाज के गनती करके , वापिस होवइया रकम लिखिस । संग म गवाही के रूप म बड़का ठेठावार के नाव लिखिस । पूरा लिखा पढ़ही होये के पाछू महंगू ला पढ़वाके अंगठा लगवाय ला धरिस । महंगू घला जुन्ना समे के चऊथीं पास किसान रिहिस । उहू पूरा हिसाब किताब ला एक ठिन कागज म लिखिस अऊ बही खाता ला पढ़के ... पूरा सोंच समझ के अपन खेत के परचा ला गिरवी धरके दस्तखत कर दिस । 

                     बछर नहाकगे । करजा लहुटाये के बेरा आगे । ये बछर फसल जोरदार होय रहय । मूल अऊ बियाज के रकम ला हिसाब के कागज म लिखे अनुसार जोड़ के धर लिस अऊ महाजन तिर गिरवी राखे खेत ला छोड़ाये बर चल दिस महंगू हा । पूरा पइसा देके बावजूद महाजन हा महंगू ला अपन हिसाब किताब म आधा लहुटे के बात करथे अऊ आधा ला कब लहुटाबे पूछथे । महंगू सन खाके पटवा म दतगे । सुकुरदुम होगे । ओहा अपन थैली ले हिसाब ला निकालिस त , महाजन के पोथी के हिसाब म सहींच म आधा रहय । महंगू ला चक्कर आये बर धर लिस । उलटा पाँव लहुँट दिस अऊ सिद्धा बड़े ठेठवार के घर चल दिस । बड़का ठेठवार ला बतइस त ओहा महाजन बर बग्यागे अऊ तुरते गाँव के सियान मनला सकेल के बइसका सकेले के उदिम रच डरिस । बड़का ठेठवार जानत रहय के महाजन कस बइमान मनखे दुनिया म खोजे नी मिलय । ओहा महाजन के बईमानी ला घुसेड़ के ओकर करनी के सजा देवाये बर तै कर डरिस । 

                    नियत समे म बइसका सकलागे । महाजन हा अपन उप्पर लगे आरोप ले बिलकुलेच इनकार कर दिस । महंगू हा अपन थैली ले कागज के पुड़िया निकाल के पंच मनला देखइस । ओमा करजा के विवरन लिखाये रहय जरूर फेर न काकरो दस्तखत रहय न अंगठा के निसान । ओला पंच मन सबूत नी मानिन । बड़े ठेठवार के गवाही ला घला पंच मन सबूत के हिस्सा माने से इनकार कर दिस । तब बड़े ठेठवार के मांग से महाजन के बही खाता ला बइसका के जगा म मंगवाये गिस । महाजन के खाता हा महंगू के कागज ले बिलकुलेच मेल नी खावत रहय । महाजन के खाता म महंगू के दस्तखत घला मिलगे । पंच मन फइसला सुनाये के मन बना डरिन तब बड़े ठेठवार हा एक बेर खाता ला देखना चाहिस । ओला खाता देखे के इजाजत मिलगे । बड़े ठेठवार हा खाता ला उलट पुलट के आगू पिछू ला केऊ बेर देखिस अऊ ये खाता नोहे कहि दिस । पंच मन अवाक होगे । ठेठवार हा महाजन के बही खाता ला डुपलीकेट बता दिस अऊ ओरिजिनल बही खाता ला लाने के बात करिस । महाजन के कहना रहय के अऊ कन्हो खाता निये इही ओरिजिनल आय । ठेठवार मानबेच नी करिस अऊ ओहा पंच मनला बतइस के येकर ओरिजिनल बही खाता के उप्पर म अइसना नी लिखाये हे जइसन येमा लिखाये हे । पंच मन पूछिन के ओरिजिनल म काये लिखाहे तेमा ....... ? महाजन किथे – एक अक्षर पढ़हे निये अऊ ठेठवार ला तो देख गा , कइसे बड़ पढ़हे लिखे कस गोठियावत हे । ठेठवार किथे – भलुक पढ़हे नियन फेर कढ़हे तो हन । पंच मन दुनों के बीच बढ़हत वाद बिबाद ला शांत करत ठेठवार ला पूछिस के ओमा काये लिखाये रिहिस तेमे ....... ? ठेठवार किथे – का लिखाये रिहीस तेला तो मे नी जानव फेर अइसन नी लिखाये रिहीस ओमा । गाँव के जवनहा मन हाँसिन । ठेठवार किथे – तूमन हाँसथव रे बाबू हो । जेन खाता बही म हिसाब लिखाये रिहिस ते खाता बही के उप्परेच म , हमर भँइस बरोबर मोठ मोठ , करिया करिया अक्षर म , काये काये लिखाये रिहिस । येमा तो पातर दुबर छेरी कस अक्षर दिखत हे । येहा ओ खाता नोहे । गाँव के जवनहा मन महाजन के घर के तलाशी के मांग करिन । पंच मन स्वयम खाना तलासी करिन । तलासी म सहींच म ओरिजिनल बही खाता मिलगे जेमा उप्परेच म करिया सियाही म मोठ मोठ अक्षर म बही खाता लिखाये रहय । ठेठवार किहीस इहीच बही खाता आय । भितरी ला खोल के देखे गिस । महाजन के करिया करतूत पकड़ागे । पाँच बछर बर महाजन के पौनी पसारी बंद होगे । अनपढ़ ठेठवार के याददास्त म महंगू जीतगे । ठेठवार के मुहुँ ले निकले करिया अक्षर भँइस बरोबर हा , न केवल उही गाँव म बलकी जम्मो छत्तीसगढ़ म , अनपढ़ मनखे बर अभू तक प्रचलन म हाबे । 

                                                         हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

*बदला* ( छत्तीसगढी कहानी)

                   *बदला* ( छत्तीसगढी कहानी) 


                     - डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


        *पार्षद पति घर ले जल्दी-जल्दी बाहर निकलिस। बदला लेहे के एकर ले अच्छा मौका नि मिलतिस! पाछू-पाछू नौकर हाथ म डंडा ले के भागिस! एही ला कहिथें- खग जाने खग की भासा!...... मालिक का चाहत हे एला चौबीस  घंटा ओकर संग म रहइया नौकर ले जादा अउ कोन समझ पाही?* 


                        ( 1 )


        पार्षद पति संतोष यादव अपन वार्ड म बहुतेच लोकप्रिय रहिस। रात के 12 बजे घलो वार्ड के रहईया मन ओला फोन करें त ओमन के समस्या ला ओहर हल करे के कोशिश करे। काम करना एक बात हे अउ लोगन मन ला खुश करना दूसर बात। शिकायत तो शिकायत ए, रहिच्च जाथे!

       एक दिन रात के एक बजे अशोक टंडन के फोन आइस कि ओखर घर के बिजली गोल हो गे हे। पार्षद पति बोलिस कि भैया ठीक करावत हौं, चिन्ता के कोनो बात नि हे। ओ समय आँधी-तूफान चलत रहिस। फोन करे के बाद टंडन जी सुत गे अउ पार्षद पति फोन म बिजली विभाग के अधिकारी मन करा सम्पर्क करे के कोशिश करे लगिस, फेर बात नि हो पाइस। एक घंटा बाद जब पानी गिरना रूक गे तब अपन स्कूटर म बिजली आफिस गइस।उहाँ एक झन लाइनमैन बइठे रहे। लाइनमैन बतइस कि एक ठिन पेड़ बिजली तार उपर गिर गेहे हे, तेकरे कारण वार्ड के आधा हिस्सा म बिजली बन्द हे, सुधार के काम कलेच हो पाही! पार्षद पति अशोक टंडन ला सूचना देहे बर फोन करिस फेर ओखर मुबाईल बन्द रहे। 

.          एक सप्ताह बाद वार्ड म समस्या निवारण शिविर लगे रहे। अशोक टंडन तो खार-खाय बइठे रहिस। चालीस-पचास लोगन के बीच गुस्सा म बोलिस- इहाँ पार्षद पति के का काम हे? पार्षद महोदया ला बुलावा! दिन-दिन भर बिजली गोल रहिथे। कोनो ला कोई फिक्र नि हे। शिकायत करौ तब भी कोनो ध्यान नि दें!....... घरेलु महिला मन-ला घरेच्च के काम करना हे त पार्षद काबर बनथें!.......ओ दिन अशोक टंडन के उग्र रूप अउ पार्षद पति के गुस्सा ला देख लोगन मन अकबका गिन। ये तो अच्छा होइस कि दुनों के बीच मारपीट होवत-होवत रहि गे!

.        संतोष यादव वार्ड म पार्षद रह चुके हे। नगर निगम के पिछला चुनाव म महिला आरक्षित सीट होय के कारण संतोष यादव अपन घरवाली ला चुनाव लड़वाइस अउ ओहा जीत गे।  एक साल बाद नगर निगम के चुनाव फेर होवइया हे अउ अबकी बार वार्ड नं 17 महिला आरक्षित नि होही त सत्ता पक्ष ले ओला टिकट मिले के पुरा उम्मीद हे। वास्तव म संतोष यादव के महत्वाकाँक्षा नगर निगम के महापौर बने के हे फेर एकर बर ओला पार्षद के चुनाव जितना परही!..... लोगन मन के दिन-रात काम करे के बाद घलो पाछू ले कोनो पार्षद पति कहिके ब्यंग्य करथे त ओला बिछी के डंक जइसे चुभथे। अशोक टंडन के ताना ह दिल के अंतस म हमा गे।


.                         ( 2 )


         शनिच्चर के दिन पार्षद पति के घर तीर सब्जी बाजार भरे। सुबेरे सात बजे ले लेके रात के नौ बजे तक गहमागहमी रहे। पाकिटमार मन घलो अपन बूता म लगे रहें! हर हप्ता कोनो-न-कोनो के या तो मोबाईल चोरी होय या फिर पाकिटमारी!

       संतोष यादव रात देर तक वार्ड के कुछु-कुछु बूता म लगे रहिस। एकरे सेती सुबेरे नींद नि खुल पाइस अउ आठ बजे उठिस। 

    `` अरे रामू, कहाँ मर गे ? गइया-बछरू ला बाहिर बाँध दे अउ अँगना के सफई कर।महापौर घर आने वाला हे। 

      - ठीक हे मालिक। 

    थोरकुन देर बाद पार्षद पति के आवाज फेर सुनाई परिस- रामू,  गइया तीर म काकर स्कूटर खड़े हे?

      - मालिक, अशोक टंडन के स्कूटर ए। दूरिहा फेंक दो का?

       - तैं काबर फेंकबे बुरबक! तोर करा लड़े हे का? स्कूटर उपर नजर रख अउ जइसे टंडन आही, मोला खबर करबे!

        बदला भंजाय के बढ़िया मौका मिल गे। पार्षद पति के भीतर के गुस्सा उबाल मारे लगिस।.....स्याले ला आज सबक सिखाबेच्च करहूँ!


.                             ( 3 ) 


          - मालिक टंडन आ गे हे अउ अपन स्कूटर मेर खड़े हे!

    पार्षद पति घर ले जल्दी-जल्दी बाहर निकलिस। बदला लेहे के एकर ले अच्छा मौका नि मिलतिस! पाछू-पाछू नौकर हाथ म डंडा ले के भागिस। एही ला कहिथें- खग जाने खग की भासा!...... मालिक का चाहत हे एला चौबीस  घंटा ओकर संग म रहइया नौकर ले जादा अउ कोन समझ पाही? रामू मने-मन म गुनत रहिस- मोर हीरा असन मालिक करा लड़हि त आज एक-दू डंडा पेलाबेच्च करहूँ!..... जेल जाय ल परहि-त-परहि फेर टंडन ला आज  सबक सिखाबेच्च करहूँ!

       घर ले बाहर निकलिस त पार्षद पति देखथे कि अशोक टंडन ओकर गइया-बछरू ला मूली के भाजी अउ केला खवावत हे। ओकर चेहरा म पीरा के भाव स्पस्ट झलकत रहे। ओकर कातर दृष्टि अउ आँखी म आँसू देखके पार्षद पति के गुस्सा अउ खीझ धरती के अंतस म हमा गे। 

      - का होइस टंडन भाई?

     चल घर म चाय पीबो। 

     - नहीं भैया, चाय नि पियों। परसों रात बिहान-पहाती बेरा म मोर गइया अउ बछरू ला एक ट्रक ह टक्कर मार के भाग गे! सबेरे गइया ला चरे बर ढीले रहें। 

      - पुलिस म रिपोर्ट करे का? चौक के सीसी टीवी फुटेज म ट्रक के  पता चल जाही।

      - पता लगा के का करिहौं भैया? गइस तेहर तो लउट के नि आय। ओ दिन बिना मतलब तोर उपर गुस्सा हो गे रहें, माफी देबे भैया!

      - ठीक हे भैया, चार बरतन एके मेर रहिथे त टकराबेच्च करथें!


              - *डाॅ विनोद कुमार वर्मा*

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समीक्षा---


ओम प्रकाश अंकुर: 


आदरणीय विनोद वर्मा जी आप मन पार्षद पति अउ एक नागरिक के बैर ल अपन कहानी के माध्यम ले सुघ्घर सकारात्मक मोड़ दे हौ । कहानी" बदला "के माध्यम ले जिहां आज के सरपंच पति, पार्षद पति के दखल के ठोसहा वर्णन करे हौ। कतको बेरा कइसे गलत फहमी हो जाथे यहू ल बताय हौ। कई बार तमतमाय ले बात ह बिगड़ जाथे । जन प्रतिनिधि मन के सनमान घलो जरूरी हे।काबर कि इही मन आज के भगवान हरे। इंकर मन ले का बैर करबे तेकर सेति एक नागरिक ल ही संवासे ल पड़ही इही म भलाई हे। भले समस्या ह सुरसा सहिक अपन मुख ल 

   फइलात राहय। राजा अउ बैद/ डाक्टर मन ले दुश्मनी करबे त नुकसाने होथे। तेकर सेति एक नागरिक ल ही नरमाय ल पड़थे। बदला ह बने संदेशप्रद कहानी हे। मानलो स्थिति परिस्थिति वश गुस्सा होगे हन अउ अहसास होइस त वोला स्वीकार कर लेय म ही भलाई हावय। ये बात ये कहानी म बने उभर के सामने आय हे। भाई चारा के सुघ्घर संदेश हे ।एक सुघ्घर कहानी बर वर्मा जी ल गाड़ा -गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना हे।🌷🌷🌹🌹


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 पोखनलाल जायसवाल: 

सबले बड़े लोकतंत्र के बड़े विडंबना आय कि आज सत्ता मिले पाछू सत्ता के दुरुपयोग बाढ़ गे हे। आरक्षण के चलत नारी शक्ति पद म विराजथे तो, फेर सत्ता के चाबी पुरुष तिर पहुॅंच जथे। कारण कुछु रहाय। आगी ले ॲंगरा जादा तपथे। यहू बात आय कि जे तपथे ते खपथे घलव। पाॅंच बछर बीते म अइसन के कोनो पुछारी नि रहय। फेर ए पाॅंचेच बछर म क्षेत्र अउ समाज के दशा अउ दिशा दूनो अइसे बदल जथे, जेकर कल्पना नइ करे गे राहय। ए विचारणीय हे। इही दिशा म ताना मारत कहानी के कथानक बढ़िया हे।

       सत्ता के मद म कतको तो मानवीयता ल भुला जथे। सत्ता के लपट म रहे के लालची लगवार मन आगी लगाय के एको मउका नि छोड़य। 

      बात तो तब हे जब अपन अंतस् ल एक पइत ठंडा दिमाग ले झाॅंकन। काबर कि कखरो अंतस् निर्मल होथे। खोट तो मनखे के लालच अउ सइता नि रहे ले मनखे के अंतस् ऊपर पड़े  मइल आय। जेकर छटत भर के देरी रहिथे। मन बिल्कुल साफ हो जथे।

       भाषा प्रवाह बढ़िया हे। शीर्षक मोला कहिनी के प्रतिनिधित्व करत नि लगत हे। बदला के भाव भी कहानी म नि आय हे। कहूॅं टंकण त्रुटि तो नइ होगे हे। बाकी शीर्षक चुने के अधिकार रचनाकार ल हे।

      सकारात्मक संदेश देवत कहानी बर आद. विनोद वर्मा जी ल अंतस् ले बधाई 💐🌹🙏😊


पोखन लाल जायसवाल

गुनान

 गुनान 

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       एक ठन कार्यक्रम मं गए रहेंव ...बुधियार वक्ता मन ल सुने के सुख मिलिस त घर आके गुने बर पर गिस ..श्री क हर साहित्य संसार के नम्बर एक वक्ता , लेखक आय त श्री ख हर एक नम्बर के कवि अउ गायक आय , श्रीमती ग हर पहिली साहित्यकार आय ...अउ बहुत अकन विचार । 

  गुने लागेंव नम्बर मं काय धरे हे भाई ..कोन कलम हर आम आदमी के सुख दुख ल लिखिस , समाज के विसंगति ल उजागर भर नइ  करीस समाधान घलाय बताइस उही कलम के जय जयकार होही । साहित्य के कोनों भी विधा मं लिखे जावय अइसने साहित्य हर कालजयी होही ...छुट्टी पटिस न ? नहीं भाई ...एक जरुरी बात अउ हे ..। 

      " कहत सबै बेदी दिए , आंक दस गुनो होत " ..बेंदी माने शून्य , आंक माने अंक ...एतरह गुनिन त एक से ले के नौ तक के अंक के संग शून्य लगा दिन अंक दसगुना बढ़ जाही है न ? चिटिक थिरा के गुनव ..अंक के पाछू मं शून्य लगाहव त दस गुना होही जइसे एक (1) के बाद शून्य (0) = 10 होही फेर शून्य लगाहव त 100 हो जाही इही तरह हरेक शून्य हर अंक के दसगुना बढ़ोतरी करही ...बढ़िया बात आय न ? त भाई हम अंक ( नम्बर ) के चक्कर ल छोड़ के खुद ल शून्य बना लिन न ...कतका मजा आही ..? फेर एक जरुरी बात के शून्य बनबो कइसे ? 

क्रोध , मोह , ईर्ष्या , अहंकार असन पंच मकार ल छोड़ के न ...उहुंक ये तो जोगी जती मन के साधना आय त हमर बर जरुरी हे आज के मकार माने मैं , माइक अउ  मंच के मोह ल छोड़े ले शून्य बने जा सकही ...। जे दिन ये मकार ले मुक्त होय सकबो शून्य बन जाबो ...फेर का ...जेकर बाजू मं बिराजबो ओकर महत्ता दसगुना बढ़ जाही । संगवारी मन ! इही शून्य के साधना हर तो निर्गुण ब्रम्ह के साधना आय त आनन्दमय कोष के जागरण आय ..चिटिक गहन गम्भीर विचार आय फेर गुनव न साहित्य लेखन हर घलाय तो एक तरह के साधना च आय जेला शब्द ब्रम्ह के साधना कहिथें । साधना कोनो किसिम के होय उद्देश्य तो आंनद के प्राप्ति आय जेला सियान मन परमानन्दम् माधवम् कहिथें । 

   मनसे च तो आन ..भूल , चूक होई जाथे तभो चिटिक थिरा के गुने बर परही अंक बने ले जादा फायदा शून्य बने ले मिलही । 

    सरला शर्मा 

     दुर्ग

कहानी आगे सगा

 कहानी


         आगे सगा



झिमिर झिमिर पानी बरसत रिहिस चिरई चिरगुन चींव चींव करत कान मा मधुरस घोरत रिहिस,फेर ये सब ले दुरिहा घर के बाहिर चौंरा म बइठे सियान अपन सियानिन ल काहत राहय

कुंती हमन अपन सबो लईका ल  जतका पढ़ही ओतका पढ़ाबो,चाहे एकर बर खेत खलिहान ल बेचे बर पड़ही त बेच तको देबो,

 हर महतारी बाप ल अपन लोग लईका के भविष्य के संसो रहिथे।


परभु रामपुर गाँव के पोठ किसान राहय,चीज बस के कोनो कमी नइ रिहिस, भगवान ओकर अँगना म चार बेटा अउ एक झन लक्ष्मी कस बेटी देके ओकर कोठी ल भर दे राहय।

परभु अउ कुंती एको अक्षर

 नि पढ़े रिहिस,तभो ले पढ़ई के महत्व ल समझय।

लइका मन ल समझा के, खिसिया के ,पढ़े बर गिलोली करतेच राहय।

अपन अउ कुंती दिन भर खेती किसानी मा मेहनत करत परिवार के खुशी जुटाय बर उदिम करत राहय।

जईसे जईसे लइका मन बाढ़त गिस तीन झन बड़े लईका मन के झुकाव पढ़ई म कमतियावत गिस

तीनों लईका लेद बरेद करके मेट्रिक पास करिन अउ खेती किसानी पुस्तैनी काम धंधा मा लग गे बेरा बीते संग बेटी तको  स्कूल के पढ़ई ल पूरा कर लिस।अउ बने रिश्ता  आय  ले उँकर बिहाव धूमधाम से घलो कर दिस।


सब ले छोटे बेटा किसन, जेन ह पढ़ाई म बचपन ले ही तेज राहय,हर कक्षा म पहला आवय,किसन के पढ़ई म लगन ल देखके परभु के आस बँधावत जाय ,

वईसे तो परभु अपन सब नोनी बाबू ल रद्दा देखावत राहय फेर जेमा जेन ल रुचि रिहिस आगु बढ़िस,,,,,


किसन तको अपन दाई ददा के सपना ल अपन सपना बना लिस अउ अपन मेहनत मा कोनो कमी नइ करिस।हर कक्षा के सफलता म दाई ददा के जब  आँखी चमकय त किसन के जुनून अउ बाढ़ जय 

बछर बीतत गिस अउ आज एम एस सी म पूरा युनिवर्सिटी मा पहिला आगे कालेज के मेरिट लिस्ट के सूची म नाँव लिखागे पेपर  परचा म किसन के फोटो देख के परभु अउ कुंती के खुशी के  कोनो ठिकाना नइ रिहिस।आज परभु ल अपन सपना साकार होय कस लागत रिहिस।जेन भी मनखे मिलय वोला बतावय मोर बेटा किसन ह कालेज म पहिला आय हे गा,आन मिठई  खा ले,चाय पी ले ग


परभु  जानत राहय पूरा पुरखा म किसन ही सबले जादा पढ़ईया    लईका हरे  अउ नौकरी जरुर करही तेखर सेती,  सड़क के तीर म तीन एकड़ खेत  बिसाय राहय अउ वोला काहय 

 तँय मास्टर नइते मुंशी बनबे न बेटा त मोर बर मास्टरनी बहू लानबे।अउ तुमन दुनो झन खेत देखे बर आहू न त गाड़ी ल सड़के तीर म खड़ा करहू ग तेकर सेती मँय हा ये खेत ल बिसाय हवँव।

काबर पहिली परभु ह मास्टर अउ मुंशी ल ही बड़े साहब  जानय   

                

 फेर नियति ल तो कुछू अउ मंजूर रिहिस हे,कोन कोती ले का बीमारी झपा जथे।परभु के चेतना शून्य हो जथे

किसन ह उही दिन एक नौकरी बर   साक्षात्कार देवा के आय रिहीस।

चार दिन ले बेहोशी  कस सुते  अपन ददा ल पकड़ के, जोर से झकझोर  के कहिथे,,,,

ददा मोर नौकरी लग गे गा,,

अऊ देख तो  घर ले लगे  ए-जमीन ल तको मैं  बिसा डरेव,

 अतका सुनके परभु के आँखी थोड़किन खुलथे ,,,,

अउ वोला होश आ जथे।जइसे इहीच खबर ला सुने बर ओखर प्राण अटके रिहिस।परभु अपन बहिनी के हाथ ल धरके कुंती ला देख के अपन खुशी जतावत हे आँखी मा फेर एक घँव चमक दिखिस।परभु ल किसन के अगोरा रिहिस,वोला वोकर सरकारी नौकरी के अगोरा रिहिस।मोर बेटा किसन के नौकरी लगगे काहत काहत परभु ये दुनिया लै चल बसथे।

किसन दहाड़ मारके अपन ददा के छाती म लग जथे। ओकर उप्पर पहाड़ टूट जथे।आँसू तको छोटे  होगे हे,सब बिरथा कस जनाएं ले धर लेथे।

किसन अपन ददा ल छूके दृढ़ परण करथे अउ कहिथे 

ददा मैं तोरे खुशी खातिर  झूठ बोलेवँ ग फेर एला  मैं जरूर पूरा करहूँ गा ,,, सरकारी नौकरी मा अपन नावं ल पक्का करहूँ,अउ मने मन रोवत राहय,,


किसन के परण वोला हौसला देथे अउ जादा मेहनत करथे, पढइ म कोनो कमी नइ करिस,  किसन के मेहनत एक दिन रंग लाथे अउ परिवार के सँग महतारी के आशीर्वाद ले वो बेरा भी आथे जेन दिन किसन के चयन एस एस सी कर्मचारी चयन आयोग मा पूरा प्रांत मा, ओकरे चयन होय राहय।

किसन जब ये खबर अपन महतारी कुंती ल बताथे त दुनों के मुँह ले शब्द नइ निकलय,अंतस के खुशी आँखी ले झर झर झरत रहिथे।

किसन अपन दाई ल जोर से पकड़ लेथे, कुंती वोला आशीर्वाद के अँचरा देवत कहिथे आज

 अइसे लागत हे जइसे जीवन के तपस्या पूरा होगे बेटा,

महतारी के तो एके सपना रहिथे कि मोर बेटा के मेहनत ह सफल होवय। खुश राहय,निरोगी राहय,अउ वोला काहीं किसम के तकलीफ झन मिलय।

किसन अपन सफलता बर अपन ददा परभु ल ही असली हकदार बतावत राहय,अपन ददा ल सुरता के फूल चढ़ावत आँसू ल रोक नइ पात रिहिस हे।

पहिली गाँव मा हर खुशी के खबर होवय या दुख के डाक बाबू ही सबके हितैषी राहय, चाहे वो नौकरी के बात राहय या पइसा कौड़ी मनीआर्डर के सबके समाचार पहुँचइया उही राहय।


कुंती बस अतका जानय कि   डाक बाबू हमला ये खुशी के खबर ल सुनाही,,

अउ वो जानत राहय कि मझंनिया डाक बाबू आथे ओखर आए के पहिली,अपन सबो काम बुता ल निपटा के,चौरा म बइठ जए अउ ओखर अगोरा करत राहय,,

जैइसे ही देखतिस पूछे ले धर लय

अइस का बाबू,,हमर घर सगा,,

कुंती नौकरी के कागज ल सगा काहत राहय

डाक बाबू काहत चल दय,,आज नइआए हे भौजी,,,,।

हमर गांव गवंई म नता गोता निभाए के बढ़ सुग्घर परंपरा रहिथे ,सब बड़े होय ते छोटे अपन रिश्ता बड़ मया ले निभाथे


कुंती ल सोवत जागत रात दिन बेटा के नौकरी के फिकर राहय, कहूँ नौकरी बर  पइसा तो नइ माँगत होही तेकरे सेती तो कागज ल दबा तो नइ दे होही,मन मा  कइ ख्याल आवत राहय।काम बुता निपटा के डाकिया के आए के पहिली 

 मुँहाटी मा

बइठ जय,आज वोला पूरा एक बछर हो गे राहय,अइसे कोनो दिन नइ होइस होही जेन दिन वो डाक बाबू के अगोरा नइ करे रिहिस होही खाए ल छोड़ दय,सबो काम ल छोड़ दय फेर डाकिया के आए के बेरा अपन दुवारी म आंखी गढाए राहय  अउ पूछे बर नइ छोड़य

 आजो नइ आए बाबू सगा?


डाकिया बाबू काहय आजो नइ

आय हे भौजी,  अउ

सइकिल ल ठिनिन ठिनिन बजावत चल दय।

भगवान तको ओखर ममता के पुकार अउ बेटा के प्रति समर्पण ल देखत रिहिस होही।काबर सबो के एक निश्चित बेरा होथे,आज वो बेरा हरे अगोरा करत मुँहाटी मा

बइठे कुंती सगा आय के अगोरा मा डाकिया ल देखत रिहिस।

डाक बाबू ह चिल्लावत किहिस,,मन मा खुशी, आँखी म चमक अउ चहक चहक के बड़ दुरिहा ले ये भौजी ये भौजी चिल्लावत हे,,,,,,,,,,

अतका सुनके कुंती के बेचैनी अउ तड़प ल कोनो दूसर ह महसूस

नइ कर सकय।

डाक बाबू काहत हे ए भौजी ----

आगे वो तुँहर घर सगा,,,

 स्वागत करे बर एक लोटा पानी ल तो निकाल।अतका सुनके कुंती के आँखी ले झर झर आँसू के धार खुशी के मारे बोहाय ले धरलिस।नस नस मा खुशी उर्जा बनके दउँड़े  बर धरलिस ।कहाँ ले पाँव म अतेक जान आगे कि दउड़ दउड़   के सब ल बताए बर धर लिस , आज बड़ अगोरा के बाद हमरो घर सगा आय हे। महतारी के त्याग तपस्या तड़प ममता  के कोनो मोल नइ राहय,,,,,,

 किसन के भाई भौजी संग पूरा परिवार आज खुशी ले झुमगे ,,


आज भी किसन अपन मेहनत लगन के परचम फहरावत अपन दाई ददा के सपना ल साकार करत, जिनगी के हर परीक्षा ल पास करत आज अपन घर परिवार अउ समाज मा नाँव कमावत बड़े साहब बनगे हे

अउ पूरा परिवार ल संग म ले के चलत हे,,,,,।



संगीता वर्मा 

आशीष नगर

रिसाली भिलाई

करगा

 : करगा 

                                                                    

                                          चन्द्रहास साहू

                                  मो - 8120578897

आज बिहनिया ले बादर गरजत हे, बिजली कड़कत हाबे। कोनो हा उछाह मगन होथे तब कोनो गरीब ला संसो धर लेथे। करिया-करिया बादर आमा-अमली कोती ले आइस अउ गौटिया घर के छानी ऊपर टँगा गे अब। ...अउ बरसे लागिस। 

"तेहां जइसन चाहबे वइसने करहुँ फेर तलाक झन दे। तोर बिना मोर जग अँधियार हो जाही।''

गोसइया अब्बड़ समझावत हे। फेर गोसाइन तो गाँव-गोहार पार डारिस।

"इस बैल के साथ एक पल भी नही रह सकती मैं। आई कैन नॉट लिव विथ दिस बुल। आई वांट डाइवोर्स अदरवाइस आई विल गो कोर्ट एंड पुलिस स्टेशन।''

भूरी डोमी कस फुफकारत हाबे आज वोहा। लहू के संचार बाढ़गे। धड़कन बाढ़गे। आँखी लाल होगे। गुस्सा मा हफरत हे अउ गोड़ कांपत हाबे सोनिया के। 

"लिसन, ससुरजी ! तुम लोगो का नाम लिख के मर जाऊँगी। रियली, आई विल डाई।''

ससुर जी भलुक अंगरेजी के आखर ला नइ समझिस फेर भाव ला तो जान डारिस। महाबिपत अवइया हाबे। मुड़ी ला गढ़िया के ठाड़े हाबे। .....अउ गोसाइया दिनेश ? का कर डारही बपरा हा। 

"जौन साध हे तोर जम्मो ला पूरा करहुँ। गाँव छोड़ के शहर मा रहे के साध हाबे ते वहुँ ला पूरा करहुँ। ददा-दाई संग तारी नइ पटत हाबे ते चल दुनिया के कोनो शहर मा। जी लेबो लड़-झगड़ के फेर तलाक झन माँग। ये अतराब मा अब्बड़ नाव हाबे मोर ददा के वोकर नाव ला मइलाहा झन कर ...।''

रो डारिस दिनेश हा फेर बहुरिया सोनिया ? भकरस ले भीतिया के कपाट बाजिस अउ तारा-बेड़ी लग गे। रोये चिचियाये बरतन-भाड़ा पटके के आरो आवत हाबे अब। 

                   बिहनिया के पानी अउ पहाती के झगरा जम्मो एक होगे। भीतिया के झगरा परछी मा आगे अब। परछी ले दुवारी, ....अउ दुवारी ले खोर मा अमरगे। अउ खोर मा अमरगे तब का बाचीस ? इज्जत तो गवां डारे हाबे अब गौटिया के लिंगोटी उतारत हे-गाँव वाला मन।      

                 एक मइनखे के दस मुँहू होगे। हड़िया के मुँहू ला तोप डारबे फेर मइनखे के मुँहू ला कइसे तोपबे। गॉंव भर सोर होगे। खैरागढ़िया गौटिया के बहुरिया-बेटा दुनो झन मा अब्बड़ झगरा माते हाबे। आज उघरा होवत हाबे उकरो ओन्हा हा। खाल्हे पारा के  गरीब के गोठ तो अचरी-पचरी, कुआँ-बावली, खेत-खार नरवा-नदिया मा लसुन मिरचा लगा के, भूंज बघार के गोठियाथे गाँव वाला मन। 

"कतको चद्दर ओढ़ ले गौटिया खजरी तो खजवाबे करही..?"

"सिरतोन खजरी धरे हाबे गौटिया के बहुरिया ला। देवता बरोबर गोसइया के मान नइ राखिस।''

"नांदिया बइला बरोबर समहरे रहिथे। न गोड़ के पनही हीटे न मुँहू के मुहुरंगी मेटाये।''

"रूपसुन्दरी हाबे ओ ! हिरवइन बरोबर। फेर चाल मा कीरा परगे हाबे वोकर।  दिखे बर श्यामसुंदर अउ पादे बर ढ़मक्का।''

"शहर के टूरी अउ उधार मा चूरी कभु नइ मांगना चाही। दुनो के रंग झटकुन उतर जाथे। गौटिया के बहुरिया के रंग घला उतरत हाबे।''

आनी-बानी के गोठ गोठियाये लागिस गाँव वाला मन। आधा बस्ती सकेलागे हाबे आज गौटिया घर के गम्मत देखे बर।

                गाँव भर के सुख-दुख मा पंदोली देवइया खैरागढ़िया गौटिया काखरो तीन-पाँच मा नइ राहय। एकलौती बहुरिया ला अउ जादा दुलार देथे फेर बहुलक्ष्मी के रक्सा कस बरन ला देख के मूड़ धर लेहे गौटिया हा। अब्बड़ आगी उलगत हाबे बहुरिया सोनिया हा। दहेज प्रताड़ना टोनही प्रताड़ना घरेलू हिंसा आनी-बानी के धारा के डर देखाथे बहुरिया हा। का करही ?  कोन समझाही वोला ? गौटिया-गौटनिन के जी पोट-पोट करत हे। कभु कोट-कछेरी गेये नइ हाबे। काकरो लन्दर-फंदर मा नइ राहय तभो ले ये अलहन ले कइसे बाँचव भोलेनाथ ! गौटिया मुड़ धर लेथे। 

"बहुरिया ला कुरिया ले बाहिर कोती निकालो भई ! कोनो अनित कर डारही ते फांसी हो जाही हमर ?'' 

अब्बड़ झन उदिम कर डारिन सोनिया ला कुरिया ले निकाले बर। कपाट के गुजर ला उसाल डारिस गोसइया दिनेश हा फेर सोनिया नइ निकलिस। संसो अउ बाढ़गे कोनो अहित कर डारही तब। 

"सिधवा ला जम्मो कोई डरवाथे गौटिया। अइसन पदनी-पाद पदोइया बहुरिया ला झन डर्रा। मोरो चुन्दी हा घाम मा नइ पाके हाबे भलुक अनभव के विद्या ला झोंक के पाके हावय। चेहरा मा झुर्री आय हे तौन सीख अउ परीक्षा के चिन्हारी आवय। जिनगी के पहार ला पैलगी करत कनिहा नवे हाबे अइसन टूरी बर पुरव अउ बाँचव।''

उदुप ले बईगिन डोकरी आइस अउ किहिस। वहुँ तो सुन डारे रिहिन नवा बहुरिया के चरित्तर ला। भलुक कोनो मंतर नइ जाने फेर ये घर के बिपत टरइया आवय-बईगिन डोकरी हा। गौटिया के चेहरा मा संसो के डांड़ कमतियाइस  बईगिन डोकरी ला देख के। 

"ये पहार कस बिपत ला टार दे बईगिन काकी ! मोर सिधवा लइका दिनेश के घर टूटे ले बचा दे। तलाक लुहूं कहिथे बहुरिया हा। हमन ला पुलिस कछेरी......।''

"हांव सुन डारेंव गौटिया ! संसो झन कर।''

गौटिया के बात ला अधरे ले कांट दिस बईगिन डोकरी हा।

"हेर बेटी ! कपाट ला।''

कोनो आरो नइ आवय अउ आथे तब जइसे जम्मो कोई के करेजा काँप जाथे। 

"मुझे ज्यादा परेशान मत करो। मर जाऊँगी मै। रियली,  आई विल डाई।''

सोनिया के आरो आय। बरतन पटकत हाबे कूदत हाबे बही बरोबर,चिचियावत हाबे, बाय-बैरासु धर लेहे तइसे। जम्मो कोई बरजिस अब। 

अउ अब्बड़ आरो कर डारिस जम्मो कोई  खिसियावत-दुलार करत फेर कपाट नइ उघरिस।

"का करंव ?'' 

बईगिन डोकरी हक्क खा गे। कुछु गुनिस अउ पेरा परसार कोती चल दिस। ..... अउ आइस तब नानकुन झिल्ली मा कुछु धरे हाबे। 

"अब्बड़ मरे के साध हाबे न। तब, ले मर।''

झिल्ली मा कॉकरोच अउ छिपकली रिहिस, कपाट के पोंडा कोती ले ढ़ीलत किहिस। 

"अब सोज्झ मा निकलही अउ टेड़गा मा निकलही। गाँव के कमेलिन मन गउँहा-डोमी संग बुता कर लेथे फेर शहरनिन मन तो कॉकरोच अउ छिपकली ला देख के ठाड़ कुदथे। अब देख तमासा अंगरेजी मीडियम वाली टूरी के।''

डोकरी फुसफुसाइस। अब सिरतोन रोये के,चिचियाये के आरो आवत हाबे।

"प्लीज सेव मी ! बचाओ ! कॉकरोच और छिपकली कांट देंगे मुझे, मर जाऊँगी ...। प्लीज सेव मी, प्लीज सेव ।'' 

कपाट हीट गे अब। अउ बईगिन दाई ला पोटार लिस। डर मा लद-लद काँपत हाबे सोनिया हा। चेहरा लाल होगे हे-लाल बंगाला कस। 

"नानचुन कीरा-मकोरा ला डर्राथस बेटी ! कुछु नइ करे। काबर रिसाये हस ओ बता। का जिनिस के कमती होगे  हे तोला ? मेंहा तोर बर लड़हूं ये गौटिया-गौटनिन अउ तोर गोसइया दिनेश ले। जम्मो कोई बर पुर जाहू मेंहा।''

बईगिन डोकरी दुलारत किहिस अउ पोटार लिस। ऑंसू ला पोछत पीठ मा थपकी देवत चुप कराइस सोनिया ला।..... अउ सिरतोन सोनिया ला अइसे लागथे हितु-पिरितु कोनो हाबे ते-इही दाई बईगिन डोकरी हा। सुख-दुख के संगवारी। जम्मो कोई के चरित्तर ला देख डारिस। नाव बड़े दरसन छोटे गौटिया-गौटनिन अउ बइला बरोबर भोकवा गोसइया दिनेश के।

"नाक उच्चा करके बड़का खानदान ले बहुरिया लाने हस तब वोकरो धियान राख। बहु चलाये के ताकत नइ रिहिस तब अइसन बड़का घर ले नत्ता काबर जोरेस गौटिया ! कोनो मरही-पोटरी ला ले आनतेस। ताहन रातदिन गोबर बिनवावत रहिते। बिजनेसमैन के बेटी संग नत्ता जोरे हस। वोकरो तो मान राख।.....अब तो ये बहुरिया इहाँ एक पल नइ राहय। तोला कोट-कछेरी रेंगाही तब चेतबे।''

बड़का अटैची ला तनतीन-तनतीन कुरिया ले निकालिस डोकरी हा। सोनिया जम्मो जोरा-जारी आगू ले कर डारे रिहिन।

"चल जाबो तोर मइके अउ थाना-कछेरी। दहेज प्रताड़ना के केस करबो। तब चेथी के अक्कल आगू कोती आही। .....मालपुआ खाके अब्बड़ मोटा गे हाबे, थोड़को सोंटाही।''

गौटिया-गौटनिन तो सुकुरदुम होगे बईगिन के गोठ सुनके। 

"ये का अइन्ते-तइन्ते गोठियावत हस काकी ?''

गौटिया गरजिस फेर बईगिन आवय जम्मो के बीख ला उतारत-उतारत अब्बड़ बीखहर हो गे हाबे। 

"मोला छोड़ के झन जा सोनिया ! बईगिन दाई  मोर घर टूटे ले बचा दाई !'' 

दिनेश रोवत हाबे।

"चुप रोनहा नही तो....! तोरे सेती मोर फुलकस बेटी के ये दुरगति होये हाबे।''

बईगिन बिन पेंदी के लोटा निकलगे। गौटिया के बहुरिया ला मनाये-बुझाये बर बलाये हाबे अउ भभकावत हे सोनिया ला। ससन भर देखिस जम्मो कोई ला। सोनिया संग बईगिन डोकरी  घर ले बाहिर निकलगे अउ ऑटो मा बइठ के रायपुर रोड कोती जावत हाबे अब।

                   सोनिया रायपुर के बिजनेसमैन के बेटी आवय। इंजीनियरिंग के पढ़ाई करे हाबे अउ दिनेश ? गाँव के खेती करइया। भलुक बी ए करे हाबे फेर नौकरी नइ मिलिस। खेत-खार कमा लेथे-मेड़ मा बइठ के।

सोनिया अब्बड़ मना करिस बिहाव नइ करो कहिके फेर चीज के लालच कोन ला नइ राहय। "गौटिया के एकलौता बेटा के गोसाइन बनबे बेटी ! राज करबे। धन्धा-पानी चल गे ते मालामाल अउ नइ चलिस तब बंठाधार। पचासों एकड़ अचल संपत्ति के मालकिन हो जाबे। कभु लाँघन नइ मरस। गौटिया-गौटनिन कतक जीही पाँच बच्छर कि दस बच्छर। गौटिया घला अंगरेजी मीडियम वाली शिक्षित सुशील बहुरिया खोजत हाबे। अब्बड़ दुलार करही जम्मो कोई।''

अइसना तो कहे रिहिन सोनिया के ललचहा ददा हा। अउ सोनिया अब्बड़ मना करिस फेर ददा के गोठ ला कहाँ टार सकही ? बिहाव होगे धूमधाम ले। निभत हाबे अब फेर संगी-संगवारी आइस छे महिना पाछु अउ कहे लागिस ओरी-पारी।

सोनिया ! तुम्हारा पति तो  बैल है और उनके साथ खूंटे से बंधे हुये तुम गाय बन गई हो।''

"गजब की जोड़ी है दोनों की।''

"न बात करने का सऊर है दिनेश को, न रहन सहन का।''

"तुम तो कॉलेज की क्वीन थी। हाई सोसायटी हाई स्टेटस। ....और अब गोबर में सड़ रही हो।'' 

"तलाक ले लो सोनिया ! अभी भी वक्त है। अभी बच्चा भी नही है। कही बाद में न पछताना पड़े।''

"दिलीप और अक्षय तो आज भी तेरा इंतजार कर रहें है।''

"क्या हुआ दोनों अभी बेरोजगार है तो, वेल एजुकेटेड है।''  

संगी-सहेली मन आय रिहिन तब अइसने तो कहि के खिल्ली उड़ाये रिहिन सोनिया के। ...अउ कोनो खिल्ली उड़ाथे तब, आगी लग जाथे तन-बदन मा। आज तो वोकरे संगी-संगवारी मन गाय कहि दे रिहिन। सोनिया तो बेरा खोजत हाबे  तलाक लेये बर। ....अउ आज दिनेश खेत कमाये बर गेये हाबे-रोपा लगाये के दिन ये।

"दोपहर के जेवन अमराये बर चल देये कर बेटी ! अब मोरो जांगर नइ चले। नौकर मन घला आये-जाए मा अब्बड़ बिलमा डारथे। लइका बेरा मा खाही तब सुघ्घर होही ओ !''

"मैं नही जाऊँगी। किसी का खाने-पीने का ठेका नही ली हूँ। जिसको भूख लगे तो समय पर आकर खाये।''

सोनिया सोज्झे सुना दिस अगियावत। गौटिया के मुँहू सिलागे बहुरिया के गोठ सुनके। अपंगहा गोड़ मा रेंगत गिस खाना अमराये बर गौटिया हा अउ सबरदिन बर खोरवा होगे। बस, एकरे सेती चार गोठ सुना दिस दिनेश हा अउ इही झगरा आवय। तलाक तक गोठ अमरगे। बेरा बखत मा दुलारत समझाइस गौटिया-गौटनिन बईगिन डोकरी हा फेर सोनिया के छाती मा वोकर संगी-संगवारी के गोठ लटक गे हाबे। -"बइला संग बिहाव करके अपन जिनगी ला बरबाद कर देस सोनिया ! अभिन घला कतको झन तोर अगोरा करत हाबे। तलाक लेके रायपुर लहुट जा। गोबर संग गोबर कीरा झन बन।'' 

जम्मो ला सुरता करत करू मुचकावत हाबे सोनिया हा। अपन जीत दिखत हे अब। गाँव के खाल्हे पारा छुटही अउ रायपुर रोड अमर जाही ताहन एक्सप्रेस बस मा बइठ के उड़ा जाहूँ। चेहरा के गुलाबी बाढ़गे सोनिया के। 

"रहा ले, ऑटो वाले बाबू ! हमर घर कोती चल।

बईगिन डोकरी किहिस अउ वोकर मोहाटी मा ठाड़े होगे ऑटो हा।

"रायपुर जाहूं दाई !''

"हांव बेटी ! चार पहार रात ला कांट ले ताहन चल देबे।''

सोनिया बईगिन डोकरी घर चल दिस अब।

                         सुरुज नरायेन आज झटकुन अपन घर चल दिस फेर कमेलिन मन बिलम के  घर लहुटत हाबे। अँधियार होगे। चिखला-माटी मा सनाये बड़की बहुरिया सुशीला मुचकावत आइस अउ बईगिन डोकरी ला बताये लागिस।

"दाई ! आज रोपा लगाई बुता हा लघियात झर जातिस ओ। फेर भइसासुर वाला खेत मा नाग-नागिन मन अब्बड़ पदोइस।''

"बने पूजा पाठ नइ करे रेहेव का ओ ! भिम्भोरा मा ?''

"गोलू के पापा हा करे रिहिन दाई ! फेर का करबे ? थरहोटी अउ नानकुन टेपरी मा रोपा लगावत अब्बड़ बिलम गे जम्मो कोई। गोलू के पापा हा छुट्टी लेके बुता मा पंदोली दिस तब होइस झटकुन। नही ते रबक जातेंन। काली इतवारी मनाही।''

बईगिन डोकरी के बहुरिया सुशीला किहिस अउ गोड़धोनी कोती चल दिस। 


"गोलू के पापा मिनेश कुमार तो चार दिनिया आवय बेटी ! सबरदिन के किसानी बुता ला सुशीला करथे ओ। रोपा घरी अउ मिंजाई के घरी मा आके वोला पंदोली दे देथे मिनेश हा।''

सोनिया ला बतावत हाबे बईगिन डोकरी हा।

          "भलुक कमती पढ़े हाबे फेर अब्बड़ गढ़े हावय ओ मोर बेटी कस बहुरिया सुशीला हा ! गोठ-बात हिसाब-किताब आदत-बेवहार जम्मो मा अब्बड़ सुघ्घर हाबे सुशीला हा। महिला समूह के अध्यक्ष हाबे अभिन। अवइया बेरा मा सरपंच बनाबो कहिके गाँव वाला मन रुंगरुंगाये हाबे। कलेक्टर के मीटिंग मा जाके हिन्दी अंगरेजी मा गोठिया लेथे अउ गाँव के बइठक मा हमर मयारू भाखा छत्तीसगढ़ी मा। अब सुशीला ला चौथी पढ़े हाबे, कोनो नइ पतियाये। जम्मो ला सीखोये हाबे मोर बेटा मिनेश हा।''

सोनिया हुंकारु देवत हे। ससन भर देखथे अब बहुरिया सुशीला ला। सुघ्घर दिखत हाबे। भलुक दिनभर बुता करे हाबे तभो ले नइ कुमलाये हाबे सुशीला के चेहरा हा। सुशीला जेवन के तियारी करत हाबे रंधनी कुरिया मा। अब मिनेश घला घर अमरगे चिखला-माटी मा सनाके। 

"बेटी जात हा धान के थरहा आवय ओ। माइके ले तियार होके ससराल मा गड़िया देथे। बने मया पाके फरथे फुलथे अउ अपन वंश ला बढ़ाथे धान के पौधा बरोबर। बाली के पूजा होथे अउ करगा बोदरा ला फेंक देथे। ममहावत धान के बाली बन सोनिया ।  करगा बोदरा बनबे तब कोनो नइ भावय। आज फोन करके देख ले दिलीप अउ अक्षय ला घला। तोर अगोरा नइ करे भलुक तोला जूठा कहि। जतका मया तोला दिनेश करथे वोतका दुनिया के कोनो मनखे नइ करे। तोर उछाह बर टेक्टर ला बेच दिस अउ फोरव्हीलर बिसाइस। दाई के गहना-जेवर ला बेच के तोला सोना मा बूड़ो दिस-तोर उछाह बर। टूटहा पनही ला पहिर लेथे फेर तोर बर दर्जन भर ले आगर सेंडिल बिसाये बर नइ बरजिस। रिकम-रिकम के लुगरा लिस- तोर उछाह बर। दवई  के पइसा ले तोर बर सेंट बिसाइस। भूखाये रिहिस तभो तोर बर इज्ज़ा-पिज्जा बिसाइस। देवता भलुक नो हरे फेर सुघ्घर इंसान आवय बेटी। अउ ये दुनिया मा  सब मिलथे फेर इंसान नइ मिले। दिनेश हा तोर उछाह बर सब करही ओ ! फेर ओकरो उछाह बर  एककन संसो कर। गोठ-बात,रहन-सहन तौर-तरीका अचार-विचार जम्मो ला सीख जाही मोर सुशीला बरोबर। बेटी ! तलाक झन ले वो !''


सोनिया रोवत हाबे सिरतोन कभु करू जबान नइ देये हाबे दिनेश अउ वोकर दाई ददा मन, गुनत हाबे। 

"चलो दाई ! जेवन करबो। गोलू के पापा ला आरो कर।''

"गोलू के पापा आ गा ! मिनेश आ बेटा।''

बईगिन डोकरी आरो करिस। ... अउ आइस तब तो सोनिया सुकुरदुम होगे। इंजीनियरिंग कॉलेज के इलेक्ट्रॉनिक्स एन्ड टेलीकॉम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के एचओडी आवय डॉ मिनेश कुमार। सोनिया तो वोकरे मार्गदर्शन में अपन रिसर्च वर्क ला पूरा करे हाबे।

"गोसाइन-गोसइया हा गाड़ा के चक्का घला आवय सोनिया। अउ दिनेश हा सुघ्घर लइका आवय। मेंहा जानथो। मोर गोसाइन चौथी पढ़े हाबे। फेर मोला गरब हाबे मोर घर परिवार खेत-खार जम्मो ला सम्हाल डारिस। अउ कुछु कमती हाबे दिनेश मा तब तेहां सीखो। सीख जाही जइसे मोर मयारुक सुशीला सीख गे।''

मिनेश किहिस गरब करत अउ जम्मो कोई फुटू साग संग जेवन करे लागिस अब । सोनिया के अंतस मा जागे करगा मरगे अब। अउ ममहावत धान के बाली कस दिनेश के मया ममहाये लागिस। आँखी के आगू मा दिनेश के सुघराई दिखत हाबे अब।........... अब बिहनिया के अगोरा करत हाबे लहुटे बर। 

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

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: करगा एक ठाहिल अउ संदेशपरक कहानी हे

                       

   कहानी - करगा


   कहानीकार -  चंद्रहास साहू ( धमतरी)


    समीक्षक - ओमप्रकाश साहू "अंकुर"( सुरगी, राजनांदगांव)


युवा कहानीकार चंद्रहास साहू जी के कहानी मन के बात करथन त वोमा छत्तीसगढ़ के संस्कृति, संस्कार सुघ्घर ढंग ले झलकथे।वोकर कहानी म माटी ह ममहाथे।इंहा के सिधवापन के बरनन करथे त दूसर कोति चालाक मनखे मन के बखिया घलो उधेड़थे। वोकर कहानी म सुघ्घर संदेश समाय रहिथे। अउ उही कहानी ह सफल माने जाथे जेमा कोनो उद्देश्य ल लेके लिखे जाथे जेकर ले समाज म जागरूकता आथे। फकत मनोरंजन बर लिखे कहानी ह भलुक कहानी होथे? अइसने सुघ्घर संदेशपरक कहानी हावय - करगा।

      खैरागढ़ के गौंटिया के एकलौता बेटा के नांव दिनेश हावय। वोहा बीए तक पढ़े हे पर सरकारी नौकरी नइ मिल पाइस अउ  खेती किसानी ल करत हावय। सिधवा लइका दिनेश के बिहाव शहर के बिजनेसमेन के लड़की अउ इंजीनियरिंग के पढ़ाई कर चुके सोनिया ले तय होथे।  बेवहार के मामला म सोनिया दिनेश के बिल्कुल उल्टा हावय। शहरी परिवेश म पले बढ़े सोनिया ल दिनेश ह बइला जइसे लागथे। दिनेश ह वोकर सबो सउक के धियान राखथे पर सोनिया के मन म तो तलाक के भूत सवार होगे हावय कि इंहा ले कइसे छुटकारा पावंव।उंकर सहेली मन के ताना ह एमा अउ जले म नून डारे के काम करे हावय। सोनिया के गोसइया दिनेश ह अउ गौंटिया ह सोनिया ले अरजी करथे कि तलाक के नांव मत ले भले शहर म जाके बस जाबो। दूसर कोति दहेज प्रताड़ना के डर घलो गौंटिया -गउटनिन अउ दिनेश म समागे हावय जइसे कि कइ ठन केस म देखे ल मिलथे जब लड़का पक्ष ल झूठा केस म फंसा जाथे।

   सोनिया के बेवहार ले गौंटिया परिवार के हांसी उड़त हे। गांव म नाना प्रकार के बात होवत हे।कोट कछेरी ल कभू जाने नइ गौंटिया मन ह पर शहरिया बहू के चक्कर म फंस गे हावय?

  इहि झगड़ा के बीच म कहानीकार ह एक पात्र गांव के बइगिन डोकरी के माध्यम ले कहानी ल आगू बढ़ाथे। पहिली तो डोकरी दाई ह सोनिया के पक्ष लेके गोठियाथे त गौंटिया अउ दिनेश ह अकबका जाथे काबर कि समझाय के बजाय वोकरे हां म हां मिलाथे। पर वो सियनहिन के उद्देश्य उंकर घर ल टोरना नइ बल्कि बनाना रहिथे। वोहा सोनिया ल ये समझा के कि काली तोला तोर मइके पहुंचाबो कहिके अपन घर ले जाथे।

  एती बइगिन डोकरी के बहू सुशीला अपन नांव के अनुरूप बने बेवहार सुशील हावय। भले कम पढ़ें लिखे हे पर अब्बड़ मिहनती हावय।संगे संग वोमा संगठन शक्ति घलो हावय तेकर सेति अवइया चुनाव म वोला गांव वाले मन सरपंच पद म लड़ाबो कहिके सोचत हावय। वहीं सुशीला के गोसइया मिनेश अब्बड़ पढ़े लिखे हे। ये उही मिनेश हरे जउन कालेज म इंजीनियरिंग के पढ़ाई करे हावय वोकर विभागाध्यक्ष हरे। जबकि वोकर गोसइन सुशीला ह कम पढ़ें लिखे हे पर दूनों के जिनगी के गाड़ी सुघ्घर ढंग ले चलत हावय। ये सब के पता सोनिया ल चलथे। मिनेश ह घलो वोला

जिनगी के मर्म समझाथे। बइगिन डोकरी ह सोनिया ल वोकर गोसइया दिनेश के कतको अच्छाई ल बताके ये सिद्ध करथे कि तंय ह वोला बइला समझ के कत्तिक बड़े भूल करत हस।

तोर कत्तिक खियाल राखथे। अपन सउक ल तियाग करके तोर सबो मांग ल पूरा करथे। ये प्रकार के संवाद ले कहानीकार ह कहानी के मुख्य पात्र सोनिया के हिरदे परिवर्तन करथे। अउ वोहा सोचथे कि सचमुच आज तक मोर गोसइया दिनेश ह कभू कड़वा बोली नइ बोले हे। मंय ह अपन रूखा बेवहार ले वोला अब्बड़ पीरा पहुंचाय हौं तभो ले आज तक मोला एक चटकन नइ मारे हावय। बइगिन डोकरी ह वोला समझाथे कि बेटी ह धान के थरहा कस होथे बेटी जेला दूसर जगह लाके गड़िया देथे। धान के बाली ह कइसे सुघ्घर लागथे उही म कोनो करगा होगे त वोला उखान के फेंक दे जाथे। त बेटी धान के बाली बनव न कि करगा। ये सब बात ल सुने के संगे -संग मिनेश अउ सुशीला के सुघ्घर जांवर जोड़ी ल देखके सोनिया म हिरदे परिवर्तन होथे। वोला अपन गलती के अहसास होथे।

तलाक अउ मइके जाय के साध ल छोड़के अपन गोसइया के संग सुघ्घर जिनगी बिताय बर राजी हो जाथे।


कहानीकार ह ये कहानी के माध्यम ले बताय हावय कि एक गांव म शहरिया अउ जादा पढ़ें लिखे बहू लाय ले का का परेसानी झेले ल पड़थे। कइसे दहेज प्रताड़ना अउ आने झूठा केस म फंसाथे। शहरिया बहू के नाना प्रकार के सउक ले घर वाले मन कइसे हलाकान हो जाथे। संगे संग कहानीकार ये संदेश देथय कि जब जुग जोड़ी म बंध जाथंव त बात सिर्फ पढ़ाई-लिखाई के हिसाब ले मत आंकव। बेवहार बड़े चीज होथे।  जिनगी म सामंजस्य बिठा के चलना चाही ताकि कोनो घर - परिवार झन टूटय। काकरो दिल झन टूटय। हमला धान के बाली बनना चाही न कि करगा।

  कहानी के भाषा शैली के बात करथन त पात्र के अनुरूप भाषा के प्रयोग करे गे हावय। कहानी के मुख्य पात्र सोनिया जउन ह इंजीनियरिंग के पढ़ाई करे हावय अउ शहर के लड़की हरय वोकर बर हिंदी के संगे -संग अंग्रेजी शब्द के उपयोग करे गे हावय। गंवइहा पात्र मन बर ठेठ छत्तीसगढ़ी के उपयोग होय हे। कहानी म हाना के सुघ्घर उपयोग हे जेकर ले कहानी ह सुगठित हावय। कहानी के शैली सरल,सरस अउ नदिया के धार कस सुघ्घर बहत नजर आथे। एक सफल कहानी "करगा" खातिर कहानीकार आदरणीय चंद्रहास साहू जी ल गाड़ा- गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना हे। कहानीकार चंद्रहास साहू के कहानी ह करगा नइ  बल्कि ठाहिल हे। कहानी लंबा हे पर  पाठक मन ल बांध के राखथे।

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पोखनलाल जायसवाल:

 आज अउ तइहा के गोठ करन त पाथन कि आज के पीढ़ी घर बसई ल घरघुँदिया सहीं समझे धर ले हें। थोरको नवा बात होइस नहीं कि उजारे के सोच लेथे। अलगे-अलगे जिनगी जिए के सोचथें। सबले बड़े आजादी चाहथे। अइसन आजादी जिहाँ कोनो रोक-टोक झन रहय। मन भर उड़ान भर सकय। फेर उड़ान भरे च ले नइ होय। उड़ान भरे के पहिली मंजिल के तो ठिकाना होना च चाही। सिरिफ कल्पना के पाँख लगाय ले बुता नइ बनय। थके पाछू पाँव मढ़ाय बर धरती तो होना च चाही। आज के नवा पीढ़ी थोरको बने का पढ़ लेथे, सियान मन ल घेपबे नइ करय। पिटिर-पिटिर अँग्रेजी के चाबुक चलाय धर लेथे। संगी जहुँरिया के बहकावा म होश खो डारथे। अब तो एक ठन अउ नवा चलागन के फेर म दिखे धर लेहे। वो नवा चलागन हे- लिव इन रिलेशनशिप। 

       जोश म होश खो के नवा पीढ़ी अपन पाँव कइसे कुल्हाड़ी(टँगिया) मारथे। का का मनगढंत परपंच (प्रपंच) नइ रच डारथे। एकर परछो करगा कहानी म मिलथे। फेर अनभो के कोनो विकल्प नइ होवय यहू ए कहानी म देखे ल मिलिस जब बइगिन दाई ह अपन सूझबूझ ले गौटिया घर आय घर टूटे के बिपत ल टार देथे। सिरतोन आय कि गाँव के बइगा-बइगिन गाँव के सियान होथे अउ अपन सियानी ले गाँव म आय/अवइया अल्हन चाहे कोनो किसम के रहय ओकर ले बँचाय के हर उदिम करथे। पूरा गाँव उँकर बर एक परिवार होथे। बइगिन दाई सोनिया के मन ल पढ़ डारथे। भाॅंप लेथे। अपन उमर खपा के सकेले अनभो के मंतर ल बाॅंचत गौटिया गौटनिन के घर आय ए अल्हन के उपाय सोच लेथे- तभे तो ओ कहिथे-" .... अइसन टूरी बर पूरवँ अउ बाँचवँ।"

       सोनिया के हिरदे जीत अउ विश्वास पाके ओ रस्ता म ले आनथे, जिहाँ जिनगी के गाड़ा के चक्का के मरम अउ सोनिया ल असल जिनगी का अउ कइसन होथे? दिखावत समझा डारथे। बइगिन दाई के ए गोठ सोनिया के हजाय बुध ल जिनगी के पटरी म ले आथे "बेटी जात ह धान के थरहा आवय ओ! मइके ले तियार होके ससराल म गड़िया देथे, बने मया पाके फरथे फूलथे अउ अपन वंश ल बढ़ाथे धान के पौधा बरोबर। बाली के पूजा होथे अउ करगा बोदरा ल फेंक देथे।  ममहावत धान के बाली बन सोनिया! करगा बोदरा बनबे त कोनो नइ भावय। ....तोला जूठा कहि दिही।" पढ़े लिखे सोनिया जूठा के मरम ल समझ जाथे।

        कहानी के भाषा शैली अउ संवाद पात्र मन के मुताबिक बढ़िया गढ़े गे हे। अँग्रेजी शब्द के प्रयोग सुग्घर ढंग ले होय हे। मुहावरा/कहावत मन के सटीक प्रयोग कहानी के सुघरई ल बढ़ावत हे। 

        "..ए अतराब म अब्बड़ नाँव हाबे मोर ददा के, ओकर नाँव ल मइलाहा झन कर..." ए वाक्य म मोला मइलाहा शब्द जादा सही नइ लागत हे। 

        दिनेश ल सोनिया ले अगाध मया परेम हे। तभे तो कहिथे-'.... तोर बिना मोर जग ॲंधियार हो जही।' एमा विवशता ले जादा दिनेश के मया हे।

        शहरी जीवन शैली अउ गँवइहा जिनगी के बीच बने भिथिया ल ढहाय के बढ़िया उदिम करे गेहे ए कहानी म।

        जोश के भुइँया म जागे पढ़े-लिखे होय के अभिमान के करगा ह अनभो के सफाचट नाशक के आगू मर जथे अउ हिरदे के खेत म मया के फुलवारी ममहाय लगथे। कहानी के शीर्षक ल सार्थक करत हे।

        व्यंजना के तार ले गुॅंथाय कहानी के भाषा शैली पात्र मन के मुताबिक सुग्घर हे। प्रवाह हे।

        सोनिया अउ बइगिन के चरित्र ल जउन ढंग ले गढ़े गे हे, ए कहानीकार के परिपक्वता के उदाहरण ए। नवा-जुन्ना पीढ़ी के बीच जउन पीढ़ी गेप हे, ओकर मनोविज्ञान ल समझे म ए कहानी मिशाल बनही। नवा जुन्ना दूनो पीढ़ी म सुग्घर समन्वय स्थापित करत ए कहानी छत्तीसगढ़ी साहित्य ल अइसन आयाम दिही, दिशा दिही।

      छत्तीसगढ़ अपन संस्कृति अउ परम्परा बर जाने जाथे। एकर माटी के ममहासी चारों खुॅंट बगरथे। लोक संस्कृति अउ माटी के ममहासी ले सनाय कतको कहानी के सिरजइया चंद्रहास साहू के कहानी 'करगा' माटी म सनाय खेती के दिन के आरो देवत शुरू होथे अउ इही माटी के ममहासी ले महकत मिनेश अउ सुशीला के मया के आरो पा सोनिया के हिरदे म दिनेश बर मया के घपटे लागथे।

      कहानीकार भाई चंद्रहास साहू जी ल बधाई💐💐

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

मुँहु चिक्कन खबड़ा के

 मुँहु चिक्कन खबड़ा के 


               बात द्वापर युग के आय । जब कंस के अत्याचार ले जनता ला मुक्ति देवाये बर भगवान कृष्ण ला धरती म आय ला परिस । भगवान हा धरती म अवतरिस ते समे जनता हा कंस अऊ ओकर दरबारी के अत्याचार ले त्राहि त्राहि करत रिहिन । 

               नंद गाँव म घरों घर गाय बइला रहय । तेकर सेती दूध दही के कमी नइ रिहिस । फेर कंस के मनखे मन दूध दही तको म टेक्स लगा दे रहय । घर के दूध दही माखन ला घर के लोग लइका मन नइ खा सकय । लइका लोग मन सऊँख तो करय फेर उँकर बर बाँचबेच नइ करय ।  उत्पादन के आधा हा सरकार के हो जाय .. एक चौथाई ला  ओकर मनखे मन लेग जाय अऊ बाँचे एक चौथाई म घर के खर्चा चलना रहय । घर म बाँचे एक चौथाई के कुछ भाग ला मथुरा म बेंचे बर ... गाँव के मई लोगिन मन ... बिहिनिया ले हँड़िया म धरके निकलय । घर के लोग लइका मन लुहुर टुपुर करत रहि जाय अऊ माँगे म चिटिक अकन मिलय । बपरा मन के सऊँख पूरा नइ हो पाय । 

               भगवान कृष्ण हा अपन बाल सखा मन के दुर्दशा ला देखिस त ओला अच्छा नइ लागिस । भगवान हा अपन घर म छकल बकल खा डरय फेर ओकर संगवारी मन के पेट चेपटा के चेपटा ... । ओला उपाय सूझिस । ओहा जम्मो सखा मन ला सकेल के अपन सोंचे उपाय बतइस । बाल सखा मन अपनेच घर म चोराय बर तैयार नइ होइन .. फेर भगवान हा ओमन ला मना थोपा डरिस । भगवान किहिस – जेकर घर ले चोराबो .. ओकरे घर के लइका हा सबो ले जादा खाही । ग्वाल बाल मन मान गिन । 

               धीरे धीरे चोरी के बुता शुरू होइस । सबो बाल ग्वाल के पेट भरे लगिस । भगवान ला संतोष होय लगिस । कुछ दिन म ग्वालिन मनला पता चलगे के भगवान कृष्ण हा माखन चोर आय ... पहिली तो कोन्हो ला विश्वास नइ होइस फेर ओमन अपन आँखी ले देखिन तब पता चलिस । माता यशोदा ला बतइन ... माता हाँस दय अऊ कहय के एहा तुँहर भ्रम आय । हमर घर खाय के कमी थोरेन हे तेमा ... कृष्ण ला तुँहर घर चोराये बर परही । ग्वालिन मन मुँहु लटका के आ जाँय । भगवान ला माखन चोरावत रंगे हाथ पकड़े के योजना बनइन ग्वालिन मन । 

               एक दिन ... सपड़ागे ।  बाल सखा मन ला उहाँ ले भगा दिस अऊ भगवान खुद पकड़ागे । भगवान के मुँहु भर माखन छबड़ाय रहय । भगवान किथे – अब जान तो डरे हव .. मेहा खाये हँव तेला ..  जे सजा देना हे तेला दे डरव । ग्वालिन मन किथे – चोट्टा ... चोरा के यहा यहा माखन ला खाथस .. तोर दाई ला बताबे ते ओहा विश्वास नइ करय .. आज रंगे हाथ पकड़ाये हस .. । तोर महतारी तिर लेगबो .. हमन ला फोकट फोकट मोर बेटा उपर इल्जाम लगाथव कहिके ... गारी बखाना करथे । भगवान हा माखन चोराये के सजा उही तिर देहे बर बहुत किलौली करिस ... फेर ग्वालिन मन नइ मालिस । ओला आज महतारी के हाथ मार खवाना रिहिस । ओमन हा ओला धरके लेगे लगिन । 

               घर के बाहिर निकले के पहिली भगवान किथे – मोला शरम लागत हे । अइसने धरके लेगहू त चार झन अऊ मनखे मन जान जहि .. मोर दाई बाबू के बदनामी हो जहि । ग्वालिन मन किहिन – चोराये के बेर तो शरम मरम नइ लागय .. अब धरागे हस त शरम के बात करत हस .. आज पूरा नंद गाँव जान जहि के तिंही माखन चोर आस । दू कदम चले के पाछू ... भगवान किथे – मोर बाबू के मनखे मन .. गली गली मोला बांधके लेगत देख लिही तहन ... तुँहर उपर भड़क जहि अऊ मोला छोंड़ाके लेग जहि । ग्वालिन मन मने मन सोंचिन .. सही कहत हे । भगवान किथे – मोला तोप के लेगव .. कोन्हो ला पता नइ लगहि । ग्वालिन मन मान गिन अऊ एक ठन चद्दर म घुम घुम ले तोप दिन । चार कदम नइ चले रिहिस भगवान फेर खड़े होगे । ग्वालिन मन किथे अब काय होगे ... भगवान किथे – एकदमेच घुम घुम ले मोला तोप दे हव .. काँही दिखत नइये .. रेंगे म ठोठकासी लागत हे । एक ठन लउठी धरा देतेव ते बने होतिस । जेकर घर चोरी होय रहय .. तेकर घर के ठेठवार के लउठी ला ले आनिन अऊ धरा दिन । भगवान ला ग्वालिन मन पूछिन – अऊ कुछु चाहि का .. । भगवान हा मुड़ी हलावत नहि के संकेत दिस । 

               ग्वालिन मन यशोदा उपर खीज निकाले के येकर ले अच्छा मौका नइ मिलय सोंचत .. ओला का का बोलना हे तेकर योजना बनावत ओकर घर पहुँच गिन । जाते भार यशोदा उपर भड़क गिन । यशोदा किथे – मोर लल्ला अइसन करेच नइ सकय .. तूमन लबारी मारत हव । ग्वालिन मन ला इही बात के अगोरा रिहिस ... ओमन भगवान ला आघू म लानके खड़ा कर दिन अऊ यशोदा ला किथे – ले उघार के तिंही देख .. आज रंगे हाथ पकड़ाये हे ... चोरी करत .. भागे नइ सकिस ... बांध के लाने हन । यशोदा हा तुरते आगू अइस अऊ ओकर मुड़ ले चद्दर ला फेंकिस ... जम्मो झन अवाक रहि गिन । जे ग्वालिन घर चोरी होय रहय .. तेकरे घरवाला हा लउठी धरे मुड़ी गड़ियाये खड़े रहय । काटो तो लहू निही ... जम्मो के बुध पतरागे । कलेचुप अपन असन मुँहु करे निकल गिन । 

               गाँव भर इही हल्ला रहय के कृष्ण हा कोन्हो अवतारी पुरूष आय ... ग्वालिन मन अपन संग होवत करनी ला देखय ... तेकर सेती ... विश्वास नइ करय । ओमन ए पइत फेर ... कान्हा ला माखन चोरावत .. रंगे हाथ पकड़े के जुगत जमा डरिन । चार दिन म ... कान्हा फेर पकड़ागे । भगवान के मुँहु भर माखन छड़बड़ाय रहय । ये पइत बिगन तोपे लेगे के योजना बनिस । कान्हा हा तोप के लेगे के फेर किलौली करिस ... ग्वालिन मन ओकर बात म नइ अइन । भगवान हा फेर किहिस – मोर बाबू के मनखे मन देख लिही तब .. । ग्वालिन मन ओकरो ले निपट लेबो अइसे कहि दिन । चार कदम रेंगे नी पइन ... नंद बाबा के आदमी दिख गिस । भगवान ला लुकाय बर .. एक झन ग्वालिन हा भगवान के मुँहु म अपन मुँहु ला जोर लिस । घर के पहुँचत ले अइसे कोन्हो ग्वालिन नइ बँचिस जेकर मुँहु म मुँहु नइ जोरइस होही । परछी म मइया संग भेंट होगे । सब झन कलल कलल करे लगिन । मइया ला किहिन – बने देख येकर मुँहु ला ... तोर बेटा आय के निही ... खाहे तेहा मुँहु भर छबड़ाये हे । यशोदा मइया हाँसिस – बेटा तो मोरे आय .... फेर ओहा खाये कहाँ हे .... खवइया के मुँहु अइसने चिक्कन रहिथे का ... । तूमन अपन अपन मुँहु ला देखव .. तुँहरे मन के मुँहु म माखन छबड़ाय हे ... ।  जम्मो झन कान्हा ला देखत अपन अपन मुँहु ला टमड़िन ... कान्हा के मुँहु सहींच म चिक्कन रहय अऊ जम्मो ग्वालिन के मुँहु छड़बड़ाय रहय .. । भगवान के लीला के कथा हा उही दिन ले हाना के रूप धरके ... हमर मन तक आजो चलत हे – मुँहु चिक्कन खबड़ा के .... । 

हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

[4/5, 8:11 AM] छुरा देवांगन: मुँहु चिक्कन खबड़ा के 

भगवान कृष्ण के दुनिया ले विदा लेहे के सूचना चारों मुड़ा म जंगल म लगे आगी कस बगरगे ।  एला सुन ... गोकुल के जुन्ना संगवारी मन लकर धकर द्वारका कोति मसक दिन । भगवान हा ओमन ला देखिस त ओकर आँखी म आँसू आ गिस । भगवान हा केहे लगिस – तूमन ला मेहा कोन्हो सुख नइ देय पायेंव । अब तो जाय के बेर आगे हे ... अवइया युग म मिलबो त तुँहरों मन बर कुछ अच्छा करहूँ । ग्वाल सखा मन केहे लगिस – तोर दिये आशीष अभू तक चलत हे भगवान फेर तोर जाय के पाछू ... को जनि ओकर प्रभाव रइहि या सिरा जहि तेमा शंका हे .. तेकर सेती हमू मन अभू चल देबो । फेर आगू जनम म हमन मिलबो तेकर गारंटी देय बर लागही भगवान ।  तुँहर कृपा ले हमन ला अइसने खाय बर मिलत रहय तहू ला सुनिश्चित करे बर लागही भगवान । 

भगवान किथे – तुम फिकर झन करव । तूमन ला खाय पिये बर लाला थापा  करे बर नइ लागय । तुमला खाय बर भरपूर मिलही । ग्वाला मन किथे – एक बात अऊ हे भगवान ... पूरा युग निकलगे हमन ला सत्ता के बागडोर नइ मिलिस । हमन तरस गेन । का अवइया युग म घला अइसने रहिबो अऊ खाये बर तुँहर मुँहु ताकबो ... । भगवान थोकिन सोंच म परगे अऊ केहे लगिस – तूमन मोर बहुत संग साथ दे हव .. तुँहर भारी उपकार हे मोर उपर ... तेकर सेती ब्रम्हाजी ला कहि देथँव ... ओहा अवइया युग म बाजी पलट दिही । तुँहर उपर मय आश्रित रइहूँ ... तुँहर ले बाँच जहि तभे मोला मिलहि । 

ग्वाला मन किथे – हमन राजा होके खाबो तहन हमन ला .... सब खावथे खावथे कहिके बदनाम करहि । तिंहीं केहे बर धर लेबे । भगवान किथे –तुँहरे संगवारी तुँही मनला बदनाम करही । तुम ओमन ला साध लेना । मे राम राम नइ कहँव ... मोर वचन हे  । तूमन अभू घला खाथव तेकर कोन्हो प्रमाण रहिथे का । अरे भई ... उहू समय ... सरबस खाके मोर मुँहु म चुपर देहु ... सब अभू कस  ... मुही ला खाये हे समझही ... । चाहे कतको खावव ... तुँहर मुँहु एक कनिक नइ छड़बड़ाय ... चिक्कन रहि । भगवान सब ला भरोसा देवा के चल दिस ।

कलयुग आ चुके रहय । सबके अगले इनिंग के तैयारी होवत रहय । ब्रम्हाजी हा भगवान कृष्ण के दिये वचन ला पूरा करे बर उपाय खोजत पस्त हो चुके रहय । ब्रम्हाजी के माथ म पछीना के धार बोहावत रहय । ओकर स्टेनो चित्रगुप्त किथे – का होगे भगवान ... भारी फिकर म बुड़े हस । सियनहा एकदमेच थकथकागे रहय । ओकर गमछा हा पछीना पोंछत निचोड़े लइक होगे रहय । चित्रगुप्त समझगे । ओला हार्ट अटेक फटेक झन आ जाय सोंच तुरते कारण खोज ... निवारण के उपाय रच डरिस । जम्मो झन ला भारत म जनम ले के व्यवस्था कर दिस ।  

कुछ दिन पाछू ... भगवान हा अपन दिये वचन के पालन सही साट होवत हे के निही ... तेकर सचाई जाने बर निकलिस । इहाँ अइस तब सत्यता जानिस । चित्रगुप्त हा जनता ला भगवान बना दे रिहिस । जेला खाय बर नइ मिलय फेर  ओकरे मुहुँ म जे पाये तेहा कुछु कहीं ला चुपर देथे । ग्वाल सखा मन देश म कर्णधार बन चुके रिहिस ... जेमन खावय तो बहुत फेर दिखय निही । भगवान पूछिस – मोला समझ नइ आवत हे चित्रगुप्त । चित्रगुप्त बतइस – इहाँ लोकतंत्र के स्थापना कर दे हँव भगवान ... जेला समझ सकना तोर बस के बात नइहे ... तेकरे सेती तोला जनता के रूप दे देंव । जे मन समझ गिन तेमन ला कर्णधार बना देंव । तुँहरे दिये वचन के पालन होवत हे भगवान । भगवान ला बड़े बड़े पेट धरे कुछ बिगन खाये मनखे दिखगे ... जेमन खाये बर मरत रहय ... । भगवान पूछिस – येकर मन के पेट तो बड़े दिखत हे फेर येमन कभू खाय नइहे तइसे ... पोट पोट करत हे । चित्रगुप्त बतइस – इँकर धोंध भर चुके हे फेर खाय के इच्छा शक्ति कमतियावत नइहे तेकर सेती पोट पोट करत दिखत हे ... वाजिम म येमन खाये बर पोट पोट नइ करत हे भगवान ... बल्कि जनता के मुहुँ म खाये के सामान चुपरे के अवसर पाय बर पोट पोट करत हे । भगवान किहिस – फेर कलेचुप खवइया मन तो बिगन हुँके भुँके आराम से बइठे दिखत हे ... येमा का राज हे । चित्रगुप्त बतइस –वास्तव म इही मन सरकार आय ... अऊ पोट पोट करइया मन विपक्ष ... । भगवान पूछिस – मोर एक आखरी सवाल अऊ हे चित्रगुप्त .. येमन खाथे कहिथस ... त खाये के निशान तो एको कनिक नइ दिखत हे । चित्रगुप्त किहिस – तैं भुलागे हस भगवान । सब तोरे वचन के पालन करे के उदिम आय भगवान । जे जतका खाही ... ओतके ओकर मुँहु चिक्कन रइहि । 

जनता भगवान भुखाये हाबे कहिके चारों मुड़ा म हल्ला माते रहय । ओला खवाये के होड़ लगे के ढिंढोरा पिटागे । खाये के सरी सामान जनता भगवान के आघू म आके माढ़गे । फेर ओला कोन्हो खाये बर नइ दिन ... । ओकर हाथ म झुनझुना धरा दिन । जनता भगवान हा झुनझुना हलावत बइठे रहिगे । खाये के सरी सामान... अपने अपन सिरागे । ओकर मुँहु ला खाये के सामान म छबड़ दिन । बिगन खाये जनता भगवान के मुँहु छबड़ाये  देख ... भगवान तिर पछताये के अलावा कुछ नइ बाँचिस । 

सरग पहुँचके ....  भगवान हा चित्रगुप्त ला तलब करिस । मोला मारे के बनेच उदिम जमा डरे हस चित्रगुप्त । दू चार दिन धरती म अऊ रहि जतेंव ते भूख के मारे मर जतेंव । चित्रगुप्त किथे – तेकर सेती तो जनता बना के तोला राखे हँव ताकि तोला जादा दिन रेहे बर झन परय । ओकर जुम्मेवार घला तिंही तास । काँही जानस न सुनस ... जइसे पाय तइसे वचन देके लहुँट जथस । पालन करे बर कतका उपाय करे बर लागथे तेला हमीं मन जानबो । भगवान किथे – ओ तो ठीक हे चित्रगुप्त ...  फेर मोला तोर संरचना म एक बात समझ नइ अइस । कोन्हो खावत दिखय निही तभो ले ... खाय के सामान हा अपने अपन कइसे सिरा जात रिहिस । चित्रगुप्त बतइस – तोला के बेर उही उही बात ला बताहूँ ... अभू उहाँ लोकतंत्र हे भगवान । उहाँ  राज चलइया मन खुर्सी म बइठथे । उही खुर्सी म अइसे यंत्र फिट करदे हाँबो भगवान ... जेमा बइठे के पाछू कतको खा ...  दिखबे नइ करय । सामान सिरा जथे फेर खुर्सी म बइठइया हा खइस तेला प्रमाणित करना सम्भव नइ रहय । खुर्सी ले उतरे के पाछू ... कतका खइस ... तेहा दिखथे जरूर फेर प्रमाणित नइ होय सकय ... । भगवान हा प्रश्नवाचक मुँहु बनाके देखिस । चित्रगुप्त समझगे के भगवान काये पूछना चाहत हे । ओहा बताये लगिस – मुँहु चिक्कन खबड़ा के ... तोरे वचन के पालन करे बर नियम बनाये हँव भगवान ... । भगवान हा उही दिन ले कोन्हो भी मनखे ला वचन नइ देय के कसम खा डरिस ।       

हरिशंकर गजानंद देवांगन .. छुरा .