Saturday, 8 February 2025

धर्मेंद्र निर्मल: चुनई तिहार

 [1/30, 10:56 PM] धर्मेंद्र निर्मल: चुनई तिहार

चुनई चक्रवात के सक्रिय होए ले पूरा प्रदेस के जन समुंदर म चारो मुड़ा चुनावी लहर फइल गे हे। जेती देखबे तेती खाली चुनई के गोठ-बात चले लगिस। मानसून के आये ले किसान कनिहा म धोती ल कड़िक के बाँध लेथे। कछोरा ल भीड़के तियार हो जथे। बाँध-भीड़के खेती-बारी के जोखा मढ़ाए लगथे। नाँगर-बक्खर ल छोल-चाँच के तियार करथे। उही किसम पगरइत मन अपन झक सफेद पैजामा-कुर्ता ल निकाल डरिन। चुक-चुकले धो-धा डरिन। पानी परे फफोलाए -भरभराए भिथिया कस बिन पानी के अपन देंहे ल लीप-बरंड, पोत-चिकना डरिन। करिया मन के ओग्गर देह म उज्जर-उज्जर सँवागा ओरमाए लगिन।

पीछु चुनाव के जीते-हारे दूनो किसम के पगरइत मन के कनिहा-कुबर हँ अब नवे-झुके ल धर ले हे। पाँच-पाँच साल ले फूल माला के लदई म कतेक दिन ले अँकड़े-ठढ़िहाए रहिही। एक न एक दिन तो झुकेच् ल परही। झुके-झुके के घलो मुहुरत होथे। भगवान घलो मुहुरत-मुहुरत के हिसाब से नवे-झुके के फल देथे। 

हारे पगरइत मन सत्ता-सुख के दुख-चिंता म दुबरा-सिकुड़के नवथे । 

जीते पगरइत-मंतरी मन दूध सिराए के बाद बाचे-खुचे करौनी चाँटे के चक्कर म नवथे-झुकथे।

कोन्टा के खूँटी म टँगाए गाँधी टोपी हँ मेचका कस ‘पिच्च ले’ कूदके उन्कर मुड़ म माढ़े लगे हे, थोथना के सोभा बढ़ाए लगे हे। उन्कर कान के मूँदाए छेदा ले कनघऊवा निकल गे हे। जेकर ले अब उन ल जनता के फुसुर-फासर गोठ-बात ‘फरी-फरा’ सुनाए लगे हे। ‘बरी-बरा’ जनाए लगे हे। उन अब उही बरा अउ बरी ल मिंझारके ‘बराबरी’ के गोठ फोर-फारके फरर-फरर, फरी-फरी गोठियाए लगे हे। 

मानसून के आए ले सिरिफ किसान भर के मन नइ सरसरावय। प्रकृति के जम्मो प्रानी ऊपर एकर बरोबर प्रभाव परथे। 

चुनाव हँ घलो एकठन मानसूने हरे। चुनाव के आए ले पगरइत अउ पाल्टीच् वालेमन भर जोड़-तोड़, गुना-भाग नइ करय। किसान-धनवान, बयपारी-गुनवान, लइका-सियान जम्मो अपन-अपन गनित ल बइठारे लगे हे।

बरखा के आए ले जइसे किसान का करत हे ? नाँगर जोतत हे के परहा लगावथे, के निंदई-गुड़ई करत हे। ये सबले ओला का नफा-नुकसान होवइया हे ? ओकर ले बतर अउ कनकट्टा कीरा मन ल कोनो मतलब नइ रहय। उन ल तो जेती अंजोर दीखिस ओती झपाना हे। 

ओइसने लइकामन होथे। लइकामन बतर अउ कनकट्टा ले कम नइ होवय । चुनाव ले कोन ल का फायदा हे, कोन ल का नुकसान ? एकर ले उन ल का मतलब ? उन ल तो रंग-बिरंगी फोटू, झंडा, बेनर अउ पोंगा टँगाए गाड़ी देखिन ताहेन ‘बोट-बोट’ कहत चिल्लावत गाड़ी के पीछू दऊड़ना हे। जेन पाल्टी के गाड़ी देखिन। जेन छाप के परची पाइन। उही छाप के नाँव लेके चिचियाना हे। 

उम्मीद्वारे कहूँ लइका मन के बीच परगे त, झन पूछ ! कोनो बैट-बाल माँगथे। कोनो बैंड-बाजा माँगथे। उम्मीद्वारे के बेंड बज जथे। नइ देही माने नाक कटाही । नकटा के नौ नाँगर चुनई के बाद भले फँदाही, फेर अभीन कहाँ जाही ? डार के चुके बेंदरा, असाड़ के चुके किसान कस हाल उम्मीद्वार मन के हो जथे।

चुनई के चुके पगरइत, सत्ता के चुके पार्टी दूनो के कुकुरे गत होथे ।

जइसे बोंबे तइसे लूबे। पाँच साल ले बइठे-बइठे कुटुर-कुटुर कतर-कतर काला खाबे। तुरत दान महा कल्यान बाबू ! अभीन बाँट, ताहेन चाट खाबे चाँट-चाँट।

बिचारामन लइकन ले उबरथे ताहेन सियान मन घेर-धर लेथे। सियान मन के गनित अउ भारी रहिथे । सियानमन फोकटइहा घाम म बइठ के थोरे चुँदी ल पकोए-पँड़रियाए होथे। चुनाव हँ अभीन के बात तो नोहय, जेन ल नइ जानही-समझही । उन तो रोजे देखत-सुनत-गुनत, मुड़ धुनत जिनगी के पहाड़ ल फोरत-पहावत आवत हे।

ये डारा ले वो डारा बेंदरा कस कोन कूदथे ? सत्ता वाले सही करय चाहे गलत, विपक्षी के काम भूँकई रहिथे। चुनाव ये। पाँच साल ले आ मोर कटाए अँगरी म मूत कहिबे त इन नइ मूतय। अभी तोर गोड़ के धूर्रा ल रपोटे- चाँटे बर गिरत-अपटत दऊड़त हे।

जनता के मन घलो चुनई के दिन-बादर ल करियावत-उमड़त-घुमड़त देखके मँजूर कस पाँखी आसरा ल लमाए-छितराए उमर-घुमरके नाचे लगिस। चुनाव आइस त उन्करो कईठन माँग हँ बिला ले निकलके डोमी साँप कस फन फइलाए लगिस। 

जे आदमी बाप पुरखा बोतल नइ देखे-सुँघे रिहिस, तेनो ल बोतल वाले टॉनिक के चुलूक लगे लगिस। जेन हँ बाकी बेरा म ले-लेके पीयत रिहिस तिन्कर तो चुनाव हँ तिहारे ये। ओमन रोज उही म आँखी धोवत हे अउ जूठा मुँह अचोवत हे।


जेन घर म पियाग नइ हे उन्कर घर मिठई के डब्बा पहुँचत हे। घर- घर साड़ी पहुँचत हे। कतकोन घर नोट के गड्डी दूर देस के मतलबिया अनचिन्हार सगा कस पता-ठिकाना पूछत-सोरियावत पहुँचे लगे हे। न रासन के चिन्ता, न पानी के फिक्कर । 

जनता के बीच कतको मनखे मलाज मछरी ले आवय न जाय। एक ठन मलाज मछरी होथे। जेकर मुँह डिक्टो साँप अउ पूछी हँ मछरी बरोबर होथे । साँप आथे त मलाज अपन मुड़ी ल बाहिर निकाल देथे। साँप् हँ मलाज ल सगा समझके अनते रेंग देथे। न डरवावय न कुछु करय। मछरी आथे त मलाज हँ पूछी ल हलू-हलू हलाके देखा देथे। मछरी मन मछरी समझ लेथे। न डर्रावय न कुछु करय।

खग जानय खग ही के भाखा। 

मलाज मछरी के ये चक्कर, चलाकी अउ चरित्तर ल ढीमरेच मन जानथे । 

अइसन मनखे मन जेन उम्मीद्वार आथे ओला इहीच् कहिथे-

‘हम तो तोरेच् अन।’

ओकर से कुछु ले के बिदा कर देथे। दूसर उम्मीद्वार आथे, त कहिथे-‘हम तो तोरेच्च् अन।’

ओकरो से कुछू लेके उहू ल बिदा कर देथे। अइसने कहि-कहिके एक मनखे कतको उम्मीद्वार ल निपटा डरथे। 

उम्मीद्वारो मन ये बात ल समझथे। उहूमन जनता बर चारा फेंके रहिथे। जेमा जनता फँस के बयकूप तो हावैच्चे, बिचारा तको हो जथे। 

जेमन मलाज कस दूनो मुड़ा रेंगथे, तेमन चुनई के राहत ले छकल-छकल खूब मजा उड़ाथे। उन्कर बीसो अँगरी दारू अउ बत्तीसो दाँत समोसा-मिच्चर म होथे। 


पाल्टी ले जुड़े मनखेमन हँ दुरिहा म खड़े चुचुवावत चुँहू देखत रहि जथे। ओमन झंडा के डंडा ल धरे-पोटारे भर बर पाथे। उही ल हलावत लुहुंग-लुहुंग किंदरत रहिथे। काबर के उन्कर घर अपन पाल्टीवाले ये कहिके नइ जावय कि हमला छोड़के आखिर जाहिच् कहाँ - बयकूप हे ? अउ दूसर पाल्टी के उम्मीद्वार ये सोचके नइ जावय के येहँ तो हमला बोट देबेच् नइ करय- गरकट्टा हे। 

धोबी के कुकुर घर के न घाट के। गंगा नहा डरथे पतरी ल चाँट के।


चुनई के असली मजा तो चमचेच् मन उड़ाथे। पाल्टी ले खरचा पानी मिलथे। प्रचार-प्रसार बर गाड़ी मिलथे। प्रचार के गाड़ी म ओमन ठसन से जंगल सफारी घूमथे। सवारी डोहारथे। खरचा-पानी मिलथे ओमा अपन घर के खरचा चलाथे। अपन पेट के आँत-नाली म पेट्रोल-पानी पलोथे अउ पलथे-पालथे। 

कतकोन उम्मीद्वार चुनई म फार्म भरे बर तो भर देथे। कोनो बइठे बर कहिथे त ‘सुट्ट-ले’ सौदा पटा लेथे। भरे परचा ल भर-रपोटके के सटर-पटर उठा लेथे। सौदा के रकम अलग अउ पाल्टी के अलग। दूनो ल गठियाके पछीत कोती दबा-चपकके बइठ जथे। उन्कर अइसने कमई हो जथे।

कई झिन एकरे सेती चुनई म नाममांत्र के खड़ा होथे।

टुटपुँजिया उम्मीद्वार देखथे के ये दफे के उम्मीद्वार बने गोल्लर कस रोंठ, पोठ अउ चेम्मर हे । एकर ले टक्कर लेवब म चक्कर आ जही । उन दिन भर अपन पाल्टी के झंडा धरे घूमथे अउ रात कन जाके गोल्लर के डिल्लर म अपट के गिर जथे-

‘कका मोला बचा लेबे । महूँ खड़े भर हौं। फेर तोर बिरोध नइ करत हाववँ । वो तो पाल्टी टिकिट दे दिस, त मैं नाम गिनती लड़त हाववँ। तोर अपोजिट कइसे जा सकथौं, मोर माई-बाप ! मोर ददामन के माई-बाप तहीं रहे। मोर लइकामन के माई-बाप घलो तहींच रहिबे। येमा कोनो दू मत के बात नइहे। यकीन नइ होवत होही त डीएनए टेस्ट करवा सकत हस। तोर असन माई बाप के राहत ले मोला कोई आपत्ति नइ हे, न काँही विपत्ति नइहे।’

ओतका म गोल्लर खुस -‘जा बेटा बछवा कस फुसर-फुसर के खा अउ मेछरा। अपन पाल्टी के थन ल थुथन-थुथनके चुहक-पी।’

नेता के थपियाए अउ छेरी के चरे कभू नई उल्होवय। ए मेर दूनो के काम बनगे।

नाम के देस सेवा काम के लाड़ू मेवा। नेता उही जेन नेत देखके गत मारथे।

चुनई के आए ले पद म बइठे उम्मीद्वारमन नरियर फोरई करथे। दूसर उम्मीद्वारमन गुल्लक टोरई करथे। ये टोरई-फोरई दूनो के गठबंधन हँ चुनाव के बाद जनता ऊप्पर गाज बनके गिरथे। जेन हँ पाँच साल ले उन्कर मुड़ पीरा बनके रेहे रहिथे। न पीरा जावय न ओकर दवई आवय।

चुनाव म नवा उम्मीद्वारमन ल बाँटे बर जादा परथे। काबर के सबो ओकर बर नवा होथे। कार्यकर्ता घलो, जनता घलो। कभू-कभू जगा घलो। अइसन उम्मीद्वार जनता बर बाढ़े पूरा म चौपट होए फसल के मुवायजा बरोबर होथैं। क्षतिपूर्ति के राहत होथे। कार्यकर्तामन बर देवरिहा बोनस बरोबर होथे। ये ठँऊका मऊका ल कोनो अपन हाथ ले गँवाना नइ चाहय। इही समे कार्यकर्तामन के असल अगिन परीक्षा होथे। 

चुनई टेम परखिए चारि, धीरज धरम मितान अउ नारि। 

भीतरघातिया मन बिला म घुसरे-घुसरे मुड़ी ल निकाले डोमी कस ताकत रहिथे। इही अवसर होथे जब दाँव देखके दुस्मनी ल भाँजे-भँजाए जाथे। भूँज-बघारके सफल करे जाथे। जिनगी ल सार्थक करे जाथे। पाल्टी एके हे ते का भइगे जी ? सबो के अपन-अपन सुवारथ होथे। पाँचो अंगरी बरोबर तो नइ होवय। तइसे जम्मो कार्यकर्ता पाल्टीच् के बढ़वार बर काम नइ करत राहय। आजकाल पाल्टी के कम अपन बढवारके रद््दा जादा खोजे-तलासे-तरासे जाथे। फायदा देखके ही पाल्टी म जुड़े-जोड़े जाथे। 

हाथ जोड़, गोड़ धर, पद पाके पुरखा सम्मेत तर। 

माने आजकाल राजनीति सुग्घर टनाटन कड़कड़ावत नोट छपइया नवा धँधा होगे हवय। 

चुनई बजार के गरम होए ले चारो कोती गहमागहमी मात गेहे। जम्मो पाल्टी अपन-अपन मुरचाए औजार ल टें-टाँ के बख्तरबंद होके मैदान म उतरगे हवय। कन्या रासि वाले मन घला एक ले बढ़के एक सबद के बान चलावत बयानबीर बन गे हे। अपन अपंग, निजोर अउ मुरझाए-मुरचाए पौरूसता के फर्जी प्रमान पत्तर देखावत चिचियाए-चिल्लाए लगे हे-

‘चलव, अब बोट डारे के बेरा होवत हे।’

धर्मेन्द्र निर्मल 

9406096346

[

बजट --------

 बजट

   -------- 

हम ठहरेन पढ़े लिखे छोटकुन वेतन भोगी आदमी।हमर घर के वित्तमंत्री हा हर महिना बजट पेश करथे तहाँ ले वोला लागू करे बर घानी के बइला कस जोंतावत रहिथँव।

    पिछू दू बछर ले वो ह महिना पुट कटौती उपर कटौती वाला बजट पेश करत हे।अब देख न मोरे कमाये पइसा के जेब खर्चा अउ पेट्रोल पानी बर पहिली दू  हजार अनुदान देवत रहिसे तेनो ह कटा-कटा के बुचड़ी होके अधियागे हे।अइसे लागथे के अब चार बजे रात के उठके मार्निंग वाक करत ड्यूटी जाये ला परही काबर के ये एक हजार ल पेट्रोल के दिन दूना रात चौगुना बाढ़े दाम ह पाके आमा कस चुहक देही त मैं ह कभू कभार चाय पानी ल कामा पी हँव।अइसे भी अबड़ दिन होगे हे चोंगी माखुर ल संगवारी मन सो माँग के खाये पिये ल परथे। हप्ता म दाढ़ी मेंछा बनवाववँ तेनो म कटौती होगे हे। सकल-सूरत बइहा कस दिखथे।

       कटौती के बात चलिस त हम का बतावन--पहिली किराना समान म चार किलो फल्ली तेल आवय तेन अब डेड़ किलो आथे। भितरहीन ह पानी के छिंटा मार-मार के साग ल भुंजथे तइसे लागथे।पापड़-सापड़ के बाते छोंड़ दव वोकर तो दरशने दुर्लभ होगे हे। सगा-सोदर आये म कभू तिहार मना लन तेमा अघोषित प्रतिबंध लगे हे। भाजी पाला म काम चल जथे। लइका मन कभू पिकनिक-सिकनिक बर देवता चढ़े कस घोंडइया मारथें त आलू चिप्स बर पाँच रुपिया देके कइसनो करके मना लेथन।ये पाँच-दस रुपिया तको भारी पर जथे।

         आप मन सोचत होहू--ये तो बने बात ये--भारी बँचत होवत होही।हाँ--महूँ अइसनेच सोचत रहेंव। हम तो ये मान के चलत रहेंन के बाई ह चरपी के चरपी दबिया के रखे होही।एक दिन मजाके मजाक में हम ये कहि परेन --तैं बँचा के दू चार हजार धरे होबे त दे न--काम हे। अतका ल सुनते वो भड़क के कहिस--तोला कुछु लागथे , धन नहीं। जतका कमाथच तेन महिना भर तको नइ पूरय। मोर टिकली-फुँदरी बर तको रुपिया- दू रुपिया नइ बाँचय अउ तैं ह दू चार हजार के गोठ करथच।ये काय नौकरी ये तोर-ठकठक ले तनखा बस ल लाके धरा देथस।हमीं जानबो के हम घर ल कइसे चलावत हन तेला।एक ठन नवा लुगरा लेये बर तरस जथँव। तोला कुछु चिंता-फिकर हे धन नहीं ते--कोरोना म बीमार परे रहेच त मोर मइके ले उधारी पइसा माँग के लाये हँव तेनो एको पइसा छुटाये नइये। हूँह---बँचत के बात करथस---तोर सबो पास बुक मन ल झर्राये म कतका झरे रहिस-- फुक्का। ये मँहगाई डायन हा अइसे चुहक देथे के महिना पूरे नइ पावय--उधारी चढ़ जथे। दूध वाला के पाछू महिना के तको देवाये नइये।


       हम वोकर चंडी रूप ल देख के सकपकागेंन। अइसे लागिस के ये मजाक ह मँहगा परगे।हम समझगेन बँचत कहाँ ---इहाँ तो घाटे-घाटा के बजट हे।बँचत बिन बिकास कइसे---बेंदरा बिनास तो होबे करही। हम चुपेचाप गली कोती सरकगेंन।


        बिहान भर एक फरवरी रहिस। महिना भर  पहिली ले ये दिन ल टकटकी लगाये हम ओइसने जोहत रहेन जइसे कोनो प्रेमी-प्रेमिका मन एक दूसर ल जोहथें या फेर दाना-पानी मिलही सोच के चिरई के नान-नान पिलवा मन झाँकत रहिथे या फेर जइसे माँगन-जाँचन मन जोहथें। आशा रहिसे के ये दरी के केंद्रीय बजट म हमर कल्याणे-कल्याण होगी। इंकमटेक्स म छूट मिलही। फेर जब बजट आइस त पता चलिस के हमर बर पाछू बछर के मुरझाये फूल ल सूँघे बर मढ़ाये गेहे।आशा के डोरी रट ले टूट गे।हम ला अइसे लागिस के कल्याण सागर म बूड़के स्वर्गवासी हो जवँ।फेर का करबे मरना अतका सरल थोड़े हे? टी वी के कान ल कई पइत अँइठ-अँइठ के पूछ डरेंव के हमर लइक कुछू होही त बता न रे भाई? फेर उहाँ जेन भइया मन सुनावत रहिन मतलब बड़बड़ावत रहीन तेन हा कुछु समझे नइ आइस।मूड़़ी -पूछी के पतेच नइ चलिस।अतके जनइस के संसद म झगरा माते हे।


      दूसर दिन साँझकुन गुड़ी चँवरा कोती बइठे ल गेंव त उहाँ बहुत झन सकलाये राहयँ। उहों बजटे उपर जुबानी खर्चा मतलब चर्चा होवत राहय। हम सोचेन ए मन ल, मोरे जइसे ,बजट के बारे म--वो कइसे बनथे--काबर बनथे --थोरको पता नइ होही फेर ये मन चिल्ल पों काबर मतायें हें।


    हमूँ जाके भेंड़िया धसान म कूद गेन।मंगलू कहिस--ये बजट म कुछ नइये। एकदम बेकार, फालतू हे।जीरो बटे सन्नाटा हे।


   वोतका ल सुनके झंगलू कहिस--'कइसे कुछु नइये।बने पावर वाले चश्मा ल ओरमा के पेपर ल पढ़। देख एमा धड़धड़ावत बुलेट ट्रेन हे, ड्रोन हे, एंड्राइड फोन हे, चाँदी हे सोन हे। अउ ये नइ दिखत ये का-अँधरा के बेटा जिरजोधन--दू करोड़ नौकरी हे, बरा हे, बरी हे, जिनिस सरी हे। स्टार्ट अप हे--वादा लबालब हे।सड़क हे-तड़क भड़क हे।' 


   अतका ल सुनके पंच पंचूराम ह ठोलियावत  कहिस--'हाँ ,कका बने बताये। सब कागज म अउ भाषण म दिखत हें फेर राशन म नइ दिखत ये।'

'वाह कइसे नइ दिखत ये। बिन पइसा के झोला-झोला चाँउर नइ दिखत ये का। तोर बाई के खाता म महतारी वंदन होवत नइ दिखत ये का? पी एम, सी एम म बने घर-कुरिया नइ दिखत ये का। खाता म आये पइसा नइ दिखत ये का '-- सियनहा मेहतरु ह कहिस।


     बात के उत्तर बात म देवत रमेशर भिंड़गे-- सब टकटक ले दिखत हे बड़े ददा।  यूरिया, पोटाश के बाढ़े कीम्मत दिखथे। दू सौ रूपिया किलो दार दिखथे। बादर ला अमरत तेल के भाव दिखथे। सब जिनिस के मनमाड़े बाढे दाम दिखथे। सुसाईट अउ सुसाईटी दिखथे। बोरा के किल्लत दिखथे--किसान के जिल्लत दिखथे। एम एस पी ल अगोरत अनाज दिखथे--बिगड़े सब काज दिखथे।'

इँकर तनातनी ल सुनके एक झन सियनहा हा समझावत कहिस- दैखौ बाबू हो तुमन धीर धरौ।धीर म खीर मिलथे। तुमन ल ये बजट म जेन थोड़-बहुत मिल जही उही म संतोष करौ। अइसे भी खाँटी रबड़ी तो बड़े-बड़े पेटल्लू मन ल मिलथे।वो मन ल कइसनों करके मिल जही। तुमन काबर नइ सोचव-- ये बजट भविष्य के सपना ये ,पच्चीस साल आगू ल देख के बनाये गेहे।'

सबके ल सुनत वो मेर बइठे बेरोजगार नवयुवक मनोज कहिस--वो तो सब ठीक हे फेर हमर वर्तमान के का होही कका?


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

बसंत ऋतु ठौर खोजत हे

 बसंत ऋतु ठौर खोजत हे


बसंत ऋतु सर्दी अउ गर्मी के मौसम के बीच के संक्रमण काल ​​आये। दिन बड़े हो जाथे अउ रात छोटे हो जाथे, तापमान कम हो जाथे, फूल खिले लग ले जथे। हवा में वसंत ऋतु के गर्म हवा शुरु हो होथे। वसंत मार्च ले शुरू होके  मई या जून तक रहिथे।

वसंत ऋतु हमर भारत देश क  छः: मुख्य ऋतु   में के एक ऋतु आये। ये करीब करीब  फरवरी के आखरी म या मार्च महिना के शुरुआत म शुरू होथे। ये ह  मई महिना तक चलथे। अइसे माने जाथे के माघ महीना क शुक्ल पंचमी ले वसंत ऋतु के शुरुआत होथे। फाल्गुन 

अउ चैत्र मास वसंत ऋतु के माने  गे हावय मतलब बसंत ह ये दू महिना प्रकृति म घूमत रहिथे। फाल्गुन बछर के आखरी महिना आये अउ चैत्र ह पहिला। ये प्रकार से हिंदू पंचांग के बछर के अंत अउ शुरुआत वसंत में ही होथे। ये ऋतु आथे त आसमान साफ अउ मौसम सुहावना हो जाथे। सर्दी के जूड़ जूड़  हवा ह  धीरे-धीरे हल्का गर्म होय ले रग जथे। मौसम म गर्माहट के मस्ती आ जथे। पक्षिमन के चहचहाहट चारोडाहर हवा म गूंजे ले लग जथे । प्रकृति घलो अपन नींद ले जागथे अउ पेड़-पौधे उपर नवा नवा पाना डारा अउ फूल आये ले लग जथे। सुप्तावस्था म परे जीव मन जागे ले लग जथें। सांप बिच्छू मेचका मन अटिवात बाहिर आथें। रंग-बिरंगा फूल खिलके चारो डाहर वातावरण ल महकाथे। चारो डाहर सरसों के फूल खिल जथे अउ खेत मन पींवरा लुगरा पहिर के सज जथें।

वसंत ऋतु के सबले महत्वपूर्ण तिहार आये  बसंत पंचमी के तिहार जेन ह  ज्ञान, कला अउ संगीत के देवी, सरस्वती माता के सम्मान म मनाये जाथे। ये दिन, लोगन पीला रंग के कपड़ा पहिरथेंं, काबर के ये ह सरसों के खेतों के खिल के महके के अउ वसंत के आये के प्रतीक आये। विद्यार्थीमन सरस्वती के पूजा करके प्रार्थना करथें अउ ओखर वेदी उपर अपन संगीत वाद्ययंत्र, किताब अउ कलम चढ़ाथें। अइसे माने जाथे के ये दिन देवी के आशीर्वाद लेय ले मनखे के ज्ञान अउ रचनात्मक क्षमता म वृद्धि होथे। नृत्य संगीत के कार्यक्रम होथे। जगह जगह उत्सव मनाये जाथे। चारो डाहर.पींवरा ही पींवरा रंग दिखाई देथे। किसान मन ये मौसम म अपन दूसर फसल के बोनी शुरू कर देथे, अनुकूल मौसम के कारण फसल के विकास तेजी से होथे। खेत ह हरियर.हरियर दिखे ले धर लेथे।बसंत ऋतु के आये ले लोगन के जीवन म ताजगी आ जथे। एक बेर फेर जाये के ईच्छा उठ जथे। ठंड अउ निराशाजनक जाड़ ल सहन करे के बाद, वसंत के गर्मी अउ सुंदरता ह आत्मा ल ऊपर उठाथे। मन म आशा के किरण जागृत होथे। मनखे मन ये सुहावना मौसम के अधिक से अधिक  लाभ उठाये.बर बाहिर घूमे बर जाथें। प्रकृति के सुंदरता के मजा लेय बर पिकनिक, क्रिकेट मैच के मजा लेथें। प्रकृति की सैर करे बर बाहिर घूमेबर जाथें।


 आज बसंत कब अइस पता नइ चलय। लोगन घर म टी वी म मस्त रहिथें। भइगे गमला के फूल दिखगे, मौसम म गरमाहट आ गे। समझ गें के मोसम बदल गे। आज न तो लइकामन तितली के पाछू भागंय अउ न पक्षी मन के आवाज के मजा लेवंय। बसंत घलो सोचथे के कोन मेर मैं रुकंव? गमला म कब तक रहिहुं, बड़े पेड़ हावय फेर रद्दा तीर म। फूल के पेड़ नंदावत हावय शो के पेड़ बाढ़त हावय। शहर म बसंत बस घूमत रहि जथे। एक ठऊर तो होना जिंहा रूक के मनखे मन के भाव ल देख सकय। डऊर खोजत खोजत कई बछर होगे। बंद करव पर्यवरण के नाश बलावव एक बेर फेर बसंत आये।

सुधा वर्मा, 2/2/2025 मड़ई

(यात्रा वृतांत) देख रे आँखी,सुन रे कान

 (यात्रा वृतांत)

देख रे आँखी,सुन रे कान

-------------------

 जब ले नवाँ साल 2025 आइस तब ले समाचार पत्र,टी० वी० अउ सोशल मिडिया मा प्रयागराज मा आयोजित होवइया महाकुंभ जेकर महिमा मा बताये गेइस के अइसन ज्योतिषीय संयोग 144साल बाद आये हे अउ त्रिवेणी संगम मा स्नान मोक्षदायिनी हे तब ले थोड़-बहुत धार्मिक स्वभाव होये के सेती उहाँ जाये बर मन मचले ला धर लेइस।मोर धर्मपत्नी जी के आग्रह अउ भारी इच्छा हा तको ये विचार ला हवा देये मा कोनो कमी नइ करिच। तहाँ ले ट्रेन मा रिजर्वेशन टिकट बर प्रयास शुरु होगे फेर कन्फर्म टिकट मिलबे नइ करिस।

  आज से लगभग 15 दिन पहिली भागवताचार्य पं० प्रदीप चौबे जी ,जेकर संग नेपाल यात्रा मा गे रहेंन तेकर संदेश मिलिस के बसंत पंचमी के शुभ अवसर(2फरवरी,3फरवरी 2025) मा महाकुंभ प्रयागराज मा जे मन ला आस्था के डूबकी लगाये बर जाना हे ते मन तुरंत सम्पर्क करव--बस मा कुछ सीट बाँचे हे। मैं तुरंत सम्पर्क करके दू सीट रिजर्व करवा लेंव।अँधवा ला का चाही--दू आँखी।

  यात्रा के तिथि शनिवार1फरवरी 2025 ,दोपहर 12बजे तिल्दा ले रहिसे। इही बीच 29 जनवरी के मौनी अमावस्या के दिन महाकुंभ प्रयागराज मा बड़का दुर्घटना घटगे जेमा कतको यात्री मरगें--कतको घायल होगें। टी०वी० मा,पेपर मा समाचार देख- सुनके उहाँ जाये बर मन डाँवाडोल होये ला धरलिस।बेटा-बहू,परिवार जन अउ ईस्ट मित्र मन तकों मना करे ला धरलिन। पाँच-दस झन जे मन हमरे संग बुकिंग करवाय राहयँ ते मन कैंसिल करवा लेइन। जीव के डर सबले जादा होथे।मोरो मन डाँवाडोल होये ला धर लेइस।अपन धर्मपत्नि ला पूछेंव ता वो कहिस-- कोनो कुछु काहय, कुछु करय हमन जाबोच।लेगही राम ता राखही कोन--राखही राम ता लेगही कोन।वोकर बात मोर मन ला भागे।

  जइसे 31जनवरी आइस ता यात्रा के नेतृत्व करइया आचार्य पं० प्रदीप चौबे जी से सम्पर्क करेंव के हो सकथे परस्थितिवश यात्रा स्थगित होगे होही? वो कहिस-- वर्मा जी 1तारीख के तइयार रहिबे।तुमन ला हथबंद से ले लेबो।बस हा हथबंद- भाटापारा--बिलासपुर--अम्बिकापुर होवत प्रयाग राज निकलही। मैं कहेंव--ठीक हे महराज जी फेर सुने होहू उहाँ करोड़ों मनखे मन के भींड़ अउ माते भगदड़ मा बँहुतेच मनखें मर गेहें।लोगन बतावत हें के शासन प्रशासन हा बस मन ला बीस-पच्चीस किलोमीटर दूरिहा मा रोंक देवत हे।उहाँ ले पैदल चलके संगम तक जाये बर परथे।हम भला वोतेक कहाँ रेंगे सकबो? दू-चार किलोमीटर के बात अलग हे।अभी यात्रा ला स्थगित करके डेट ला आगू खिसका दे रहितेव।वो कहिस-- बसंत पंचमी के डेट बँधा गेहे।ये तिथि दूबारा नइ आवय। जेन होही तेन देखे जाही। महूँ हा अपन 75 साल के महतारी अउ पूरा परिवार ला लेके जावत हँव।राम अउ माया एक संग नइ मिलय। यात्रा मा जेन कष्ट उठाये जाथे या मिलथे तेने हा व्रत ये-- उही हा तपस्या ये। वो एक ठन भजन के चार पंक्ति ला सुनाइस--

*इतना तो करना स्वामी,जब प्राण तन से निकले*

*श्री गंगा जी का तट हो, जमुना का वंशी वट हो,मेरा साँवरा निकट हो*

*जब प्राण तन से निकले*

    विद्वान पंडित चौबे जी हा बात ला फोरियावत कहिस-- हमन भजन ला सुनथन-- गाथन भर अउ जब अवसर आथे ता पालन नइ करन। वो कहिस- वर्मा जी अब तुमन  देखलव, जाहू धन नहीं तेला।हथबंद के दू झन मन अपन यात्रा ला कैंसिल कर दे हें।

  मोर साहित्य अनुरागी मन हा वो भजन के मर्म ला समझगे।वास्तव मा कहे भर ले कुछु नइ होवय,कोई बात ला अमल मा लाना हा असली होथे।मैं तुरंत निर्णय लेवत कहेंव-- हम जबो।आप आवव।

   1फरवरी के दोपहर 12बजे लगभग 50 यात्री ला लेके बस आगे।हम तो तइयारे रहेन।बहुत कम समान-- छोटे छोटे दू ठीन बेग ला धरके हम दूनों परानी तको बस मा चढ़गेंन।हँसी -खुशी लगभग 850 कि०मी० के यात्रा प्रारंभ होगे।बस मा यात्रा के लाभ ये रहिस के यात्री मन के चाय-पानी पिये बर या फ्रैश होये बर जेन मेर चाहयँ-जब चाहयँ बस हा रुक जावत रहिसे,भले समय कुछ जादा लगिस।

  2 फरवरी के सुबह-सुबह 8-9 बजे प्रयाग राज ले लगभग 90 किलोमीटर दूरिहा मिर्जापुर मा बस पहुँचिस तहाँ ले उत्तर प्रदेश शासन के मेला प्रबंधन के प्रभाव दिखे ला धरलिस।जगा-जगा यातायात पुलिस के बेरियर। येती मत जाव-वोती ले जाव --अइसे करत करत लगभग 400 

कि० मी० उपराहा घुमके लगभग 12 बजे बस हा नैनी (प्रयागराज) पहुँचिस।संगम ले लगभग 20 कि०मी० दूरिहा अरेल क्षेत्र मा यात्री मन के निवास अउ वाहन स्टेंड बने हवै।उँहे सेक्टर 6 मा छत्तीसगढ़ शासन के तको हावय। थोकुन तीर के उहाँ  बने स्टेंड मा बस खड़ा होगे। विचार विमर्श के बाद तय होइस के आज बसंत पंचमी आय जेन 3फरवरी के सुबह 7बजे ले रइही।जादा भींड़ ले बँचे बर आजे रात-बिकाल ले संगम मा स्नान करे जाय।सबो समान ला बसे मा छोंड़ के सिरिफ पूजा पाठ अउ स्नान के बाद बदले बर कपड़ा ला धर के संगम कोती रेंगना चालू करेन। व्यवस्था ये बनाये गेइस के हमर दल के पहिचान के एक झंडा आगू मा रइही अउ एक झंडा पाछू मा रइही।सब झन ला एक लाइन मा ही एकर बीच मा चलना हे।सबके जेब मा अपन अता-पता अउ आधार कार्ड अनिवार्य रूप ले राहय।एक दूसर ला छोंड़ना नइये।

  मन मा बीस किलोमीटर रेंगइ अउ भींड के भारी डर के बीच पैदल चलना चालू होइस।ठंड मिले तेज धूप हा अपन असर बताये ला धरलिस।सबके स्वेटर साल गुमटाके झोला मा धरागे।

  पैदल चले के डर कुछ समे के बाद सिरागे जब ये पता चलिस के प्रशासन हा यात्री मन के परेशानी ला देख के मेला क्षेत्र मा वाहन मन के प्रवेश मा 30जनवरी ले जेन प्रतिबंध लगाये रहिसे तेमा ढिलाई देवत दूपहिया-चार पहिया छोटे वाहन मन ला संगम मेला क्षेत्र ले चार- पाँच कि०मी० दूरिहा तक पहुँचे के छूट देये हे।जान के अइसे लागिस के गंगा- मइया के कृपा बरसे ला धरलिस।

  जम्मों झन टेक्सी मा बइठ के (एक झन के 50/किराया) संगम कोती चलेन।उहाँ फोर्स के बेरियर लगे राहय। आगू वाहन प्रवेश निषेध रहिसे।सब झन उतर के जयकारा लगावत पैदल चलना चालू करेन।रस्ता मा गजब के व्यवस्था रहिसे।जगा-जगा वाशरूम,पिये के पानी, शांति वयवस्था, कोनो रेल-पेल,धक्का-मुक्की नहीं,बस आनंद अउ खुशी। मन के बाँचे-खुचे जम्मों डर सिरागे। रस्ता मा वो हैलीपैड तको मिलिस जिहाँ 1300/प्रति व्यक्ति किराया लेके मेला क्षेत्र के आसमान ले दर्शन कराये जावत रहिसे।मोरो मन होइस फेर समूह धर्म के पालन करना जरूरी रहिसे।

  लगभग 4कि०मी० पैदल चलके हम संगम घाट मा पहुँच गेन। हमर सौभाग्य रहिसे के जेती ले आयेन तेती ले संगम लकठा मा रहिसे।

 दिन के लगभग 3/4बजे संगम मा पूजा-पाठ अउ पवित्र डूबकी लगायेन।कोनो भींड़-भाड़ नइ रहिसे।हजारों मनखे डूबकी लगावत रहिन हें।

    आस्था के पवित्र डूबकी सम्पन

होगे।यात्रा के थकावट दूर होगे।अइसे लागिस के ये सफल तीर्थ यात्रा ले जीवन धन्य होगे।

 स्नान के पाछू वापसी के पहिली मेला क्षेत्र ला घूमे बर निकलगेन। बहुत जादा भींड़  कोनो जगा नइ रहिसे। भींड़ नइ रहिसे तेकर कारण समझ मा ये आइस हे के 29 जनवरी के घटना के बाद शासन प्रशासन के सख्त अउ चुस्त दुरुस्त तैयारी। यात्री मन ला एक जगा जुरियाके बइठन अउ सोवन नइ देना। चलते राहव कहना। 14 फरवरी तक मेला क्षेत्र मा वी आई पास ला रद्द करे के सेती बाहरी वाहन मन के नइ चलना।जम्मों पीपा सड़क मन ला आवाजाही बर खोल देना।वन वे ट्रेफिक। साधू संन्यासी मन बर एक अलग रस्ता अउ घाट।बड़े बड़े मंदिर मन मा दर्शन ला रोंक देना। एक दिन आके चार पाँच दिन ले मेला क्षेत्र मा जमे करोड़ो मनखे मन ला हटा देना आदि। 

 50/60 किलोमीटर क्षेत्र मा फइले मेला क्षेत्र ला जादा नइ घूम पायेन।घूमत घामत रात के अपन बस तीर सकुशल वापस आगेन अउ रातों-रात घर वापसी बर निकलगेन। रास्ता मा जगत प्रसिद्व *विंध्यवासिनी मंदिर* के दर्शन करेन जेन हा विश्व के 51शक्ति पीठ मा एकमात्र आय जिंहा *आदि शक्ति* हा अपन पूरा शरीर के साथ बिराजे हे।मंदिर मा बहुत भींड़ रहिसे फेर दर्शन होगे। 3 फरवरी के देर रात घर पहुँच के चिरस्मरणीय यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न होगे।आँखी मा जेन उहाँ देखेन अउ कान मा अफवाह के रूप मा जेन कई बात सुने रहेन तेमा जमीन आसमान के फरक मिलिस। हाँ ट्रेन मा मनमाड़े भीड़ अउ परेशानी अउ प्रयाग ले अयोध्या ,प्रयाग ले काशी जवइया सड़क मा घंटो जाम अउ भारी भींड़ के जानकारी मिलिस।

  धन्य हे महान भारत देश के सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत।धन्य हे महाकुंभ प्रयागराज जिंहा देश विदेश के लोगन संग इहाँ के हर जिला-,हर क्षेत्र के मनखे आस्था के डूबकी लगावत हें।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

सुरता--- बचपन अउ चुनावी रंग

 सुरता--- बचपन अउ चुनावी रंग


                    कहे जाथे सबले सोनहा बेरा बचपन होथे, अउ येमा कोनो शक तको नइहे। फेर पहली के लइका मन के बचपन अउ आज के लइका मन के बचपन मा धरती आसमान के अंतर हे।  हमर बेरा के बचपन के अइसने एक सुरता, नजरे नजर मा झूलथे। जब चुनाव के बेरा आय, ता बड़े मन अपन अपन दल बल मा माते रहे, फेर हम सब लइका मन मा कोनो पार्टी विशेष के नशा मा नही, बल्कि लईकई के नशा मा माते रहन। कोनो भी पार्टी के प्रचार गाड़ी होय, ए कोती ले वो कोती गाड़ी के पाछू पाछू भागना, कोनो दल के रैली होय सब मा शामिल होके मनमाड़े चिल्लाना, पेंटर मन जब दीवाल मा प्रचार बर कुछु लिखे ता वोला टकटकी लगाके घण्टो देखना, प्रचार गाना बाजा मा नाचना, सबो पार्टी के बिल्ला, पाम्पलेट, टिकली, झंडा ला सँकेलना--- आदि आदि, इही सब हमर बुता रहय। जेमा बड़ आनंद आवव, फेर पार्टी विशेष के मोह दूर दूर तक नइ रहय। हाँ फेर कभू लगे कि फलां छाप बढ़िया पाम्प्लेट देथे, ता ओखर इंतजार जरूर रहय। पार्टी मन द्वारा बाँटे टोपी, गमछा, स्टीकर अउ रंग बिरंगी बिल्ला,पाम्प्लेट बड़ मन मोहक लगे,तेखरे सेती हम सब सहज खीचा जावन। न हमन वोट डारन न कोनो पार्टी ल जानन फेर चुनावी रंग मा चुनाव के बेरा मनमाड़े रँगे रहन।

                  पहली सबे पार्टी द्वारा एक ले बढ़के एक रंगीन बिल्ला, पाम्प्लेट, झंडा छपवाके बाँटे, अउ प्रचार गाड़ी वाले मन हम सब लइका मन ला देख के फेके, जेला सँकेले बर गाड़ी के पाछू पाछू भागन।  उहू का दिन रिहिस जब थैली मा रंग रंग के बिल्ला पाम्पलेट धन बरोबर धराय रहय। जेन जतका सँकेले वो ओतकेच धनी जनाय। आलपिन, काँटापिन के अभाव मा काँटा मा तको थैली ला छेदा करके बिल्ला लगावन। लगे बिल्ला भले कोनो दल के राहत रिहिस होही, फेर हमन कखरो दल बल बर नही अपन उमंग बर ये सब करन, या या कहन लईकई के लगन मा सवार रहन। सबे पार्टी के नाचा गम्मत, गाना बाजा ला बड़ चाव ले देखन सुनन। कभू कभू तो कोनो ला लिखत देख मन मा पेंटर उमड़ जाय अउ छुही, गेरू ला घोर के कतको दीवाल ला कोनो पार्टी के नही बल्कि अपन उमंग के रंग मा रंग देत रहेन। भले बनाये या लिखे चीज कोनो पार्टी के नकल रहय, फेर ये सब करत बेरा हमर कहाँ अकल रहय।

                  आज के लइका मन मा अइसन कहाँ दिखथे, अउ पहली कस पाम्पलेट बिल्ला फेकना तको नही के बरोबर दिखथे। भले रंग रंग के बैनर, पाम्पलेट, स्टीकर, गाना, बाजा, नाचा आजो होथे फेर आज के लइका मन ना पहली कस जुरे अउ ना वो मन ला भाव मिले। काबर कि ओमन वोटर थोरे हरे। पार्टी वाले मन काम के आदमी ला, जेन वोटिंग करथे, ओखरे तीर मा लोरे दिखथे, अउ उही मन ला रिझाथे। लइका बिचारा मन तो मोबाइल ,कार्टून मा बिजी दिखथे, भला उंखर कर भला, हमर कस समय कहाँ?जेन चुनावी रंग मा रँगे। आज यदि कोनो लइका मन हमर वो समय कस करही ता दाई ददा मन तको नइ भाही, अउ दू चार मुटका खा तको जाही, काबर कि आज हर मनुष के मन मा पार्टी/दल बिराजमान हे। सब कोनो ना कोनो दल के चेला हें, कोनो स्वतंत्र नइहे, अइसन मा लइका मन कइसे स्वतंत्र हो पाही? फेर हमर लईकई के स्वतन्त्रा, आज कोनो ना कोनो पार्टी के साँकड़ मा बंधा गय हे। *एक वो बेर रिहिस अउ आजो एक बेर हे। फेर ये बेर वो समय के पार नइ पा सके।*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कहिनी *// फइसला //*

 कहिनी             *// फइसला //*

****************************************

                      मनराखन अपन पार्टी के जबर निष्ठावान कार्यकर्ता रहय।ओकर आघू म पार्टी के विरोध म कोनों कुछू गोठिया झन पारहीं ओकर *पोड़कीपइयां बजा* देवय।ओहर पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता के संगे-संग दरी बिछइया सकलइया,झण्डा-बेनर टंगइया अऊ पार्टी के जिन्दाबाद नारा लगइया रहय।ओकर पहनइ-ओढ़इ ल देखबे त सादा कुरता-पैजामा अरारोड लगे ठाड़ किरिच वाला पहिरे,ओकर किरिच म *तुमा पउला* जाही अइसन जनावय।ओहर दू बछर पहिली ले जिला पंचायत के चुनाव म प्रत्याशी बनहूं अऊ जिला पंचायत अध्यक्ष बने के सपना मन म संजोय रहिस।जिला पंचायत अध्यक्ष बने के पाछू एकठन कारन घलो रहिस कि अवइया विधानसभा चुनाव म पार्टी तरफ ले टिकट मिल जाही कहिके के तियारी करत रहिस।

               ओहर जइसन सोचे रहिस तइसन  जिला पंचायत के अध्यक्ष पद घलो अनारक्षित होय रहिस,ते पाय के ओकर मन म *आसरा के अँजोर* जगमगावत रहिस।पार्टी मोला समर्थित प्रत्याशी बनाबेच करही।मोला नि दिही त अऊ कोन ल दिही मन म सोचे लागिस।पार्टी संगठन के बड़का-बड़का नेता मन संग ओकर चिन्हारी रहय ते पाय के समर्थित प्रत्याशी बनाही कहिके पूरा आसरा रहिस।

              उही क्षेत्र म पार्टी के कतको झन कार्यकर्ता रहंय।पार्टी के समर्थित अऊ जमीनी कार्यकर्ता के डांड़ म बैसाखू के नांव घलो चिन्हारी रहिस।पार्टी के जिला अध्यक्ष अऊ बैशाखू लइकुसहापन के जून्ना संगवारी घलो रहय।जिला अध्यक्ष बनाय म बैशाखू के हाथ रहिस।पार्टी के बड़का-बड़का नेता मन संग ओकरो उठना-बइठना रहय ते पाय के ओकरो मन म *आसरा के जोत* जगमगावत रहय।जिला पंचायत के चुनाव म समर्थित प्रत्याशी बनाबेच करहीं अइसे मन *आसा के डोरी* बंधाय रहिस।

              मनराखन अऊ बैसाखू दूनोंझन पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता रहंय।दूनोंझन म कोनों एक दूसर ले एको रंच कम नि रहंय।क्षेत्र म दूनोंं के कारज कोनों किसिम के कमी नि रहिस।दूनोंझन के गुन ल आकब करे म कम नि जनावय।दूनों के दूनोंं बरोबरी रहय।पार्टी घलो असमंजस म पर गिस कोन ल समर्थित प्रत्याशी बनाईन।येती दूनोंझन चुनाव लड़े बर जोमियाय रहिन।एकोझन पाछू घूंचे के नांव नि लेवत रहिन।

                एती नामांकन भरे के आखरी दिन लकठियावत रहे।सबो संसय म परे रहे कि पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी कोन रही।सहीच म दूनोंझन के बीच म कोनों किसिम के कमी नि रहिस तेकर ले पार्टी घलो असमंजस म परगे।पार्टी मनराखन ल प्रत्याशी बनाही त बैशाखू के जीव दुख पाही अऊ बैशाखू ल प्रत्याशी बनावत हे त मनराखन के आत्मा करलाही।पार्टी तो एकेझन अधिकृत प्रत्याशी बनाही।

               समारु घलो पार्टी के बड़का कार्यकर्ता रहिस।ओहर दूनोंझन के फारम भरे म पार्टी के वोट बंटनिया हो जाही अऊ हमर पार्टी के प्रत्याशी हार जाही.....जिलाध्यक्ष ल चेतावत रहिस।तैं ठीकेच कहत हावस समारु.....जिलाध्यक्ष कहिस।तहुं तो जबर गुनिक हावस अब काय करिन तेन बता?.....सलाव पूछत जिलाध्यक्ष कहिस।नामांकन भरे के आखरी,दू दिन बाद आइच गिस.......कुछू उपाय बता समारु....जिलाध्यक्ष फेरेच कहिस।फारम भरे के ठीक पहिली दिन एक बड़का बइठक करवाय परही....उदीम बतावत कहिस।

                 दूनोंझन के समझउता करवाय बर एक बड़का बइठक करवाय गिस जेमा ओ क्षेत्र के सबो छोटे-बड़े कार्यकर्ता मन सकलाइन।मनराखन अऊ बैशाखू अपन-अपन समर्थक धर के संगे-संग लाने रहिन।एकठन बड़का हाल म सभा करे गिस।जिहां मनखे मन खचाखच भरे रहिस।खैमो-खैमो मनखे मन जुरियाय रहिन।ओमन आपस म खुसुर-फुसुर करे धर लिन।कोनों मनराखन बर सहमति देवत रहिन, कोनों बैशाखू कोती होवत रहिन।जिलाध्यक्ष घलो बैशाखू के खासम-खास हावे.....भुखउ कहिस।

               ठउका  बेरा म पार्टी पदाधिकारी मन के आय के आरो मिलिस।थोरिक बेरा म आके ओहूमन संघरिन।आघू मंच म पदाधिकारी मन बइठ गिन।बइठका शुरू करे गिस,मनराखन अऊ बैसाखू ल आघू म आय बर कहिन दूनोंझन आघू आके बइठगिन।पार्टी के अध्यक्ष दूनोंझन ल पूछे लागिस।एकबार दूनोंझन फेर सोच विचार लेवौ....अध्यक्ष समझावत कहिस।बैशाखू के एकझन समर्थक मुरली तेन ह खड़े होके गोठियाइस कि बैशाखू चुनाव लड़बेच करही।दूनोंझन के नांव लेके लाखा निकल देवा जेकर नांव निकलही तेन ह फारम भरही....समझावत किशन कहिस।किशन ठीकेच कहत हावे .....जवाहिर हं म हं मिलावत रहिस।लाखा म निकले के झन निकले बैशाखू चुनाव लड़बेच करही...मुरली अकड़त कहिस।

                  पार्टी जेन फइसला करहि तेन ल दूनोंझन ल माने बर परही.....अध्यक्ष समझावत कहिस।कस ग बैशाखू तैं बता कि पार्टी जेन फइसला करही तेन ल मानबे कि नहीं...... अध्यक्ष कहिस।तुमन कुछू करव मैं चुनाव लड़बेच करहूं...... बैशाखू कहिस।तैं बता मनराखन पार्टी जेन फइसला करही तेन ल मानबे कि नहीं...... अध्यक्ष कहिस।पार्टी जेन कहि देही तेन ल मैं माने बर तियार हंव......अध्यक्ष के पांव तरी गिर के मनराखन कहिस।मनराखन के सुभाव ह *अँजोरी रात के चन्दा अँजोर* कस फकफक ले ओग्गर दिख गिस।आखरी बार अऊ पूछत हंव बैशाखू पार्टी जेन फइसला करही तेन ल मानबे.......अधयक्ष समझावत फेरेच कहिस।मैं चुनाव लड़बेच करहूं मोर सबो समर्थक मन कहत हें......बैशाखू जवाब देवत कहिस।ओला पूरा आसरा रहिस कि जिला अध्यक्ष बनाय म मोर हाथ रहिस ते पाय के ओहर मोला जरुर प्रत्याशी बनाही।

              बैशाखू पार्टी के फइसला ल नि मानत हे अऊ मनराखन पार्टी के फइसला मानहूं कहत हावे।येहर पार्टी के संग म हावे त मनराखन के नांव म पार्टी अपन सहमति दे देवत हावे।येहू बात घलो कहे गिस के जेन ह पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के विरोध म कारज करही तेन ल पार्टी कोती ले बाहिर के डाहर छै बछर बर देखा दिये जाही....अध्यक्ष फइसला सुनावत कहिस।

✍️ *डोरेलाल कैवर्त " हरसिंगार "*

          *तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*

****************************************

Tuesday, 4 February 2025

सुरता--- बचपन अउ चुनावी रंग

 सुरता--- बचपन अउ चुनावी रंग


                    कहे जाथे सबले सोनहा बेरा बचपन होथे, अउ येमा कोनो शक तको नइहे। फेर पहली के लइका मन के बचपन अउ आज के लइका मन के बचपन मा धरती आसमान के अंतर हे।  हमर बेरा के बचपन के अइसने एक सुरता, नजरे नजर मा झूलथे। जब चुनाव के बेरा आय, ता बड़े मन अपन अपन दल बल मा माते रहे, फेर हम सब लइका मन मा कोनो पार्टी विशेष के नशा मा नही, बल्कि लईकई के नशा मा माते रहन। कोनो भी पार्टी के प्रचार गाड़ी होय, ए कोती ले वो कोती गाड़ी के पाछू पाछू भागना, कोनो दल के रैली होय सब मा शामिल होके मनमाड़े चिल्लाना, पेंटर मन जब दीवाल मा प्रचार बर कुछु लिखे ता वोला टकटकी लगाके घण्टो देखना, प्रचार गाना बाजा मा नाचना, सबो पार्टी के बिल्ला, पाम्पलेट, टिकली, झंडा ला सँकेलना--- आदि आदि, इही सब हमर बुता रहय। जेमा बड़ आनंद आवव, फेर पार्टी विशेष के मोह दूर दूर तक नइ रहय। हाँ फेर कभू लगे कि फलां छाप बढ़िया पाम्प्लेट देथे, ता ओखर इंतजार जरूर रहय। पार्टी मन द्वारा बाँटे टोपी, गमछा, स्टीकर अउ रंग बिरंगी बिल्ला,पाम्प्लेट बड़ मन मोहक लगे,तेखरे सेती हम सब सहज खीचा जावन। न हमन वोट डारन न कोनो पार्टी ल जानन फेर चुनावी मा चुनाव के बेरा मनमाड़े रँगे रहन।

                  पहली सबे पार्टी द्वारा एक ले बढ़के एक रंगीन बिल्ला, पाम्प्लेट, झंडा छपवाके बाँटे, अउ प्रचार गाड़ी वाले मन हम सब लइका मन ला देख के फेके, जेला सँकेले बर गाड़ी के पाछू पाछू भागन।  उहू का दिन रिहिस जब थैली मा रंग रंग के बिल्ला पाम्पलेट धन बरोबर धराय रहय। जेन जतका सँकेले वो ओतकेच धनी जनाय। आलपिन, काँटापिन के अभाव मा काँटा मा तको थैली ला छेदा करके बिल्ला लगावन। लगे बिल्ला भले कोनो दल के राहत रिहिस होही, फेर हमन कखरो दल बल बर नही अपन उमंग बर ये सब करन, या या कहन लईकई के लगन मा सवार रहन। सबे पार्टी के नाचा गम्मत, गाना बाजा ला बड़ चाव ले देखन सुनन। कभू कभू तो कोनो ला लिखत देख मन मा पेंटर उमड़ जाय अउ छुही, गेरू ला घोर के कतको दीवाल ला कोनो पार्टी के नही बल्कि अपन उमंग के रंग मा रंग देत रहेन। भले बनाये या लिखे चीज कोनो पार्टी के नकल रहय, फेर ये सब करत बेरा हमर कहाँ अकल रहय।

                  आज के लइका मन मा अइसन कहाँ दिखथे, अउ पहली कस पाम्पलेट बिल्ला फेकना तको नही के बरोबर दिखथे। भले रंग रंग के पाम्पलेट, स्टीकर, गाना,बाजा,नाचा आज होथे फेर आज के लइका मन ना पहली कस जुरे अउ ना वो मन ला भाव मिले। काबर कि ओमन वोटर थोरे हरे। पार्टी वाले मन काम के आदमी ला, जेन वोटिंग करथे, ओखरे तीर मा लोरे दिखथे, अउ उही मन ला रिझाथे। लइका बिचारा मन तो मोबाइल ,कार्टून मा बिजी दिखथे, भला उंखर कर भला  हमर कस समय कहाँ?जेन चुनावी रंग मा रँगे। आज यदि कोनो लइका मन हमर वो समय कस करही ता दाई ददा मन तको नइ भाही, अउ दू चार मुटका खा तको जाही, काबर कि आज हर मनुष के मन मा पार्टी/दल बिराजमान हे। सब कोनो ना कोनो दल के चेला हें, कोनो स्वतंत्र नइहे, अइसन मा लइका मन कइसे स्वतंत्र हो पाही? फेर हमर लईकई के स्वतन्त्रा, आज कोनो ना कोनो पार्टी के साँकड़ मा बंधा गय हे। *एक वो बेर रिहिस अउ आजो एक बेर हे। फेर ये बेर वो समय के पार नइ पा सके।*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)