Thursday, 30 April 2026

नाचा के सियान- मंदराजी दाऊ

 1 अप्रैल -116 वीं जयंती म विशेष 


नाचा के सियान- मंदराजी दाऊ 





-ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’


धान के कटोरा छत्तीसगढ़ के लोक कला अउ संस्कृति के अलग पहचान हवय । हमर प्रदेश के लोकनाट्य नाचा, पंथी नृत्य, पण्डवानी, भरथरी, चन्देनी के संगे संग आदिवासी नृत्य के सोर हमर देश के साथ विश्व मा घलो अलगे छाप छोड़िस हे। पंथी नर्तक स्व. देवदास बंजारे ,पण्डवानी गायक झाड़ू राम देवांगन, तीजन बाई, ऋतु वर्मा, भरथरी गायिका सुरुज बाई खांडे जइसन कला साधक मन हा छत्तीसगढ़ अउ भारत के नाम ला दुनिया भर मा बगराइस हवय. रंगकर्मी हबीब तनवीर के माध्यम ले जिहां छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकार लालू राम (बिसाहू साहू),भुलवा राम, मदन निषाद, गोविन्द राम निर्मलकर, फिदा बाई मरकाम, माला बाई मरकाम हा अपन अभिनय क्षमता के लोहा मनवाइस. ये नाचा के नामी कलाकार मन हा एक समय नाचा के सियान मंदराजी दाऊ के अगुवाई मा काम करे रिहिन ।मंदराजी दाऊ हा नाचा के पितृ पुरुष हरय. वो हा एक अइसन तपस्वी कलाकार रिहिस जउन हा नाचा के खातिर अपन संपत्ति ला सरबस दांव मा लगा दिस ।

नाचा के अइसन महान कलाकार मंदराजी के जनम संस्कारधानी शहर राजनांदगांव ले 5 किलोमीटर दूरिहा रवेली गांव मा 1 अप्रैल 1910 के एक माल गुजार परिवार मा होय रिहिन ।मंदरा जी के पूरा नांव दुलार सिंह साव रिहिस । 1922 मा ओकर प्राथमिक शिक्षा हा पूरा होइस।दुलार सिंह के मन पढ़ई लिखई मा नई लगत रिहिस । ओकर धियान नाचा पेखा डहर जादा राहय । रवेली अउ आस पास गांव मा जब नाचा होवय तब बालक दुलार सिंह हा रात रात भर जाग के नाचा देखय ।एकर ले

ओकर मन मा घलो चिकारा, तबला बजाय के धुन सवार होगे. वो समय रवेली गांव मा थोरकिन लोक कला के जानकार कलाकार रिहिस । ऊंकर मन ले मंदराजी हा

चिकारा, तबला बजाय के संग गाना गाय ला घलो सीख गे । अब मंदरा जी हा ये काम मा पूरा रमगे ।वो समय नाचा के कोई बढ़िया से संगठित पार्टी नइ रिहिस । नाचा के प्रस्तुति मा घलो मनोरंजन के नाम मा द्विअर्थी संवाद बोले जाय ।येकर ले बालक दुलार के मन ला गजब ठेस पहुंचे ।वोहा अपन गांव के लोक कलाकार मन ला लेके 1928-29 मा रवेली नाचा पार्टी के गठन करिस ।ये दल हा छत्तीसगढ़ मा नाचा के पहिली संगठित दल रिहिस ।वो समय खड़े साज चलय । कलाकार मन अपन साज बाज ला कनिहा मा बांधके अउ नरी मा लटका के नाचा ला करय ।

मंदराजी के नाचा डहर नशा ला देखके वोकर पिता जी हा अब्बड़ डांट फटकार करय ।अउ चिन्ता करे लगगे कि दुलार हा अइसने करत रहि ता ओकर जिनगी के गाड़ी कइसे चल पाही । अउ एकर सेती ओकर बिहाव 14 बरस के उमर मा दुर्ग जिले के भोथली गांव (तिरगा) के राम्हिन बाई के साथ कर दिस ।बिहाव होय के बाद घलो नाचा के प्रति ओकर रुचि मा कोनो कमी नइ आइस ।शुरु मा ओकर गोसइन हा घलो एकर विरोध करिन कि सिरिफ नाचा ले जिनगी कइसे चलहि पर बाद मा

वोकर साधना मा बाधा पड़ना ठीक नइ समझिस ।अब वोकर गोसइन हा घलो वोकर काम मा सहयोग करे लगिन अउ उंकर घर अवइया कलाकार मन के खाना बेवस्था मा सहयोग करे लगिन ।

सन् 1932 के बात हरय ।वो समय नाचा के गम्मत कलाकार

सुकलू ठाकुर (लोहारा -भर्रीटोला) अउ नोहर दास मानिकपुरी (अछोली, खेरथा) रिहिस ।कन्हारपुरी के माल गुजार हा सुकलू ठाकुर अउ नोहर मानिकपुरी के कार्यक्रम अपन गांव मा रखिस ।ये कार्यक्रम मा मंदरा जी दाऊ जी हा चिकारा बजाइस ।ये कार्यक्रम ले खुश होके दाऊ जी हा सुकलू

अउ नोहर मानिकपुरी ला शामिल करके रवेली नाचा पार्टी के ऐतिहासिक गठन करिन ।अब खड़े साज के जगह सबो वादक कलाकार बइठ के बाजा बजाय लागिस ।

सन् 1933-34 मा मंदराजी दाऊ अपन मौसा टीकमनाथ साव ( लोक संगीतकार स्व. खुमाम साव के पिताजी )अउ अपन मामा नीलकंठ साहू के संग हारमोनियम खरीदे बर कलकत्ता गिस ।ये समय वोमन 8 दिन टाटानगर मा घलो रुके रिहिस ।इही 8 दिन मा ये तीनों टाटानगर के एक हारमोनियम वादक ले हारमोनियम बजाय ला सिखिस ।बाद मा अपन मिहनत ले दाऊजी हा हारमोनियम बजाय मा बने पारंगत होगे । अब नाचा मा चिकारा के जगह हारमोनियम बजे ला लगिस ।सन् 1939-40 तक रवेली नाचा दल हमर छत्तीसगढ़ के सबले प्रसिद्ध दल बन गे रिहिस ।

सन् 1941-42 तक कुरुद (राजिम) मा एक बढ़िया नाचा दल गठित होगे रिहिस ।ये मंडली मा बिसाहू राम (लालू राम) साहू जइसे गजब के परी नर्तक रिहिस । 1943-44 मा लालू राम साहू हा कुरुद पार्टी ला छोड़के रवेली नाचा पार्टी मा शामिल होगे ।इही साल हारमोनियम वादक अउ लोक संगीतकार खुमान साव जी 14 बरस के उमर मा मंदराजी दाऊ के नाचा दल ले जुड़गे ।खुमान जी हा वोकर मौसी के बेटा रिहिस ।इही साल गजब के गम्तिहा कलाकार मदन निषाद (गुंगेरी नवागांव) पुसूराम यादव अउ जगन्नाथ निर्मलकर मन घलो दाऊजी के दल मा आगे ।अब ये प्रकार ले अब रवेली नाचा दल हा लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, खुमान लाल साव, नोहर दास मानिकपुरी, पंचराम देवदास, जगन्नाथ निर्मलकर, गोविन्द निर्मलकर, रुप राम साहू, गुलाब चन्द जैन, श्रीमती फिदा मरकाम, श्रीमती माला मरकाम जइसे नाचा के बड़का कलाकार मन ले सजगे ।

नाचा के माध्यम ले दाऊ मंदराजी हा समाज मा फइले बुराई छुआछूत, बाल बिहाव के विरुद्ध लड़ाई लड़िस अउ लोगन मन ला जागरुक करे के काम करिस ।नाचा प्रदर्शन के समय कलाकार मन हा जोश मा आके अंग्रेज सरकार के विरोध मा संवाद घलो बोलके देश प्रेम के परिचय देवय ।अइसने आमदी (दुर्ग) मा मंदराजी के नाचा कार्यक्रम ला रोके बर अंग्रेज सरकार के पुलिस पहुंच गे रिहिस । वोहर मेहतरीन, पोंगा पंडित गम्मत के माध्यम ले छुअाछूत दूर करे के उदिम, ईरानी गम्मत मा हिन्दू मुसलमान मा एकता स्थापित करे के प्रयास, बुढ़वा बिहाव के माध्यम ले बाल बिहाव अउ बेमेल बिहाव ला रोकना, अउ मरानिन गम्मत के माध्यम ले देवर अउ भौजी के पवित्र रिश्ता के रुप मा सामने लाके समाज मा जन जागृति फैलाय के काम करिन ।

1940 से 1952 तक तक रवेली नाचा दल के भारी धूम राहय ।


सन् 1952 मा फरवरी मा मंड़ई के अवसर मा पिनकापार (बालोद )वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख हा रवेली अउ रिंगनी नाचा दल के प्रमुख कलाकार मन ला नाचा कार्यक्रम बर नेवता दिस । पर ये दूनो दल के संचालक नइ बुलाय गिस। अइसने 1953 मा घलो होइस ।ये सब परिस्थिति मा रवेली अउ रिंगनी (भिलाई) हा एके म सामिल (विलय) होगे ।एकर संचालक लालू राम साहू बनिस ।मंदराजी दाऊ येमा सिरिफ वादक कलाकार के रुप मा शामिल करे गिस । अउ इन्चे ले रवेली अउ रिंगनी दल के किस्मत खराब होय लगिस ।रवेली अउ रिंगनी के सब बने बने कलाकार दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा संचालित छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल म सामिल होगे ।पर कुछ बछर बाद  छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के कार्यक्रम सप्रे स्कूल रायपुर म होवत रिहिस।ये कार्यक्रम हा गजब सफल होइस ।ये कार्यक्रम ला देखे बर प्रसिद्ध रंगककर्मी हबीब तनवीर हा आय रिहिन ।वोहर उदिम करके रिंगनी रवेली के कलाकार लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, ठाकुर राम, बापू दास, भुलऊ राम, शिवदयाल मन ला नया थियेटर दिल्ली म सामिल कर लिस ।ये कलाकार मन हा दुनिया भर मा अपन अभिनय ले नाम घलो कमाइस अउ छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के सोर बगराइस । पर इंकर मन के जमगरहा नेंव रवेली अउ रिंगनी दल मा बने रिहिस ।

एती मंदरा जी दाऊ के घर भाई -बंटवारा होगे ।वोहर अब्बड़ संपन्न रिहिस ।वोहर अपन संपत्ति ला नाचा अउ नाचा के कलाकार मन के आव भगत म सिरा दिस ।दाऊ जी हा अपन कलाकारी के सउक ला पूरा करे के संग छोटे -छोटे नाचा पार्टी मा जाय के शुरु कर दिस । धन दउलत कम होय के बाद संगी साथी मन घलो छूटत गिस । वोकर दूसर गांव बागनदी के जमींदारी हा घलो छिनागे ।स्वाभिमानी मंदरा जी कोनो ले कुछ नइ काहय ।


मंदराजी दाऊ ला नाचा मा वोकर अमूल्य योगदान खातिर जीवन के आखिरी समय म भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग द्वारा मई 1984 मा सम्मानित करिस । अंदर ले टूट चुके दाऊ जी सम्मान पाके भाव विभोर होगे ।

सम्मानित होय के बाद सितंबर 1984 मा अपन दूसर गांव बागनदी के नवाटोला म पंडवानी कार्यक्रम मा गिस । इहां वोकर तबियत खराब होगे ।वोला रवेली लाय गिस । 24 सितंबर 1984 मा नाचा के ये पुजारी हा अपन नश्वर शरीर ला छोड़के सरग चल दिस ।

स्व. मंदरा जी दाऊ हा एक गीत गावय – ”


दौलत तो कमाती है दुनिया पर नाम कमाना मुश्किल है “.दाऊ जी हा अपन दउलत गंवा के नांव कमाइस ।

मंदराजी के जन्म दिवस 1 अप्रैल के दिन हर बछर 1993 से लगातार मंदरा जी महोत्सव आयोजित करे जाथे ।1992 मा ये कार्यक्रम हा कन्हारपुरी मा होय रिहिस । कन्हारपुरी म घलो  मंदरा जी के जयंती म दिनमान लोक कलाकार अउ साहित्यकार मन सकला  के उंकर योगदान याद करके श्रद्धा के फूल अर्पित करथे।जन्मभूमि रवेली के संगे- संग कन्हारपुरी मा घलो मंदराजी दाऊ के मूर्ति स्थापित करे गेहे ।वोकर सम्मान मा छत्तीसगढ़ शासन द्वारा लोक कला के क्षेत्र मा उल्लेखीन काम करइया लोक कलाकार ला हर साल राज्योत्सव मा मंदराजी सम्मान ले सम्मानित करे जाथे ।नाचा के अइसन महान कलाकार ल शत्- शत् हे। विनम्र श्रद्धांजलि।


           ओमप्रकाश साहू अंकुर

        सुरगी, राजनांदगांव

अप्रैल फूल के तिहार"

 "अप्रैल फूल के तिहार"


हमर देस मा तिहार मनाये के गजब सऊँख। सब्बो किसिम के तिहार ला हमन जुरमिल के मनाथन। तमाम जातपात, धरम-सम्प्रदाय के तिहार मन ला एकजुट होके मनाये के कारण सांप्रदायिक सदभाव अउ एकता के नाम मा हमर दुनिया मा अलगेच पहिचान हे। तिहार मनाये बिना हमर बासी-भात तको हजम नइहोवय। तिहार मनाये के सऊँख मा हमन प्रगतिशील होगेन। बिदेस के तिहारो ला नइ छोड़न। भूमंडलीकरण के जमाना मा नवा पीढ़ी हर "वेलेन्टाइन-तिहार" मनाये बर पगलागे। "वेलेन्टाइन-तिहार",  मया करइया जोड़ा के बिदेसी तिहार आय। एमा पुलिस संग "रेस-टीप" खेल के अपन मया ला जग-जाहिर करे के पवित्र भावना कूट कूट के भरे रहिथे। कभू कभू तो कुटकुट ले मार घला खाना परथे तिही पाय के ये तिहार मा बरा, सोंहारी, ठेठरी, खुरमी बनाय-खाय के परम्परा नइ रहय। रद्दा साफ मिलगे तो कोन्हों-कोन्हों  मन अपन जोड़ी-संगवारी ला चीन-देस के आनीबानी के नुन्छुर्रा चिजबस के भोग लगाथें। ये भोग दीखे मा गेंगरवा साहीं दिखथे। पताल के लाल-लाल झोर डार के येखर रंग ला घला लाल कर डारथें। कोन्हों-कोन्हों भोग अंगाकर रोटी साहीं घला दिखथे फेर अंगाकर जैसे वोमा दम नइ रहाय। एला पीज्जा कहिथें फेर खाथें।"वेलेन्टाइन-तिहार" हमर देस मा नवा-नवा आये हे।


जुन्ना बिदेसी तिहार मा "अप्रैल फूल के तिहार" हमर देस मा अप्रैल महिना के पहली तारीख के मनाये जाथे।" अप्रैल फूल के तिहार" के माई-भुइयाँके बारे में कोन्हों बिद्वान मन इंगलैंड बताथे तो कोन्हों मन फ़्रांस देस बताथे। हमला येखर माई-भुइयाँ से का लेने देना? बिदेसी तिहार हे, त सगा बरोबर मन सम्मान तो मिलबे करही। ये तिहार मा लोगन मन ला बुद्धू बनाये जाथे। पहिली के जमाना मा मोबाइल-टेलीफोन नई रहिस तब बैरंग लिफाफा मा कोरा कागद भेज के बुद्धू बनाना, झुठ्हा समाचार दे के हलकान करना, जीयत मनखे के मरे के झुठ्हा खबर दे के परेशान करना, नौकरी लगे के झुठ्हा खबर देना, अइसन कई प्रकार के हरकत करके तिहार के मजा लूटे जात रहिस। यहू तिहार मा पकवान बनाय-खाय के रिवाज नई हे। जुन्ना बिदेसी तिहार होये के कारण अप्रैल फूल के महक साल भर बगरे रहिथे। चपरासी मन बाबू ला, बाबू मन साहेब ला, साहेब मन बड़े साहेब ला, बड़े साहेब मन, अउ बड़े साहेब ला बुद्धू बनावत हें। एखर महक के बिना न भाषण लिखे जा सकथे, न पढ़े जा सकथे। कश्मीर ले कन्याकुमारी तक, अटक ले कटक तक अप्रैल फूल के महमही महसूस करे जा सकथे। बुरा लगे के बाद भी बुरा नई मानना, मामूली बात नोहय। "बुद्धू बनात हे" जान के भी चुप्पेचाप रहिना सहनशीलता के निशानी आय। अप्रैल फूल के तिहार अपन दुःख पाके दूसर ला सुख देना के संदेस देथे कि अपन सुख बर दूसर ला दुःख देना के समर्थन करथे, ये भेद अभीन ले सुलझे नइ हे। खैर, तिहार ला तिहार के नजर मा देखना चाही तब्भे मजा आही।


मजा लूटना, जिनगी मा आनंद लाना तिहार के खास लच्छन होथे। चार दिन के जिनगी मा कतिक टेंसन पालबो। इही सोच के हम हर दिन तिहार मनाये के बहाना खोजत रहिथन। १ अरब ४० करोड़ मनखे ला कोन खुशी दे सकथे? मनखे ल अपन खुशी के रद्दा ला खुद निकालना पड़थे। मँय घर मा खुसरे खुसरे अपन जुन्ना बियंग ला नवा पैकिंग मा परोस के तिहार मनाए के रद्दा निकाल डारे हँव, आपो मन कुछु बहाना सोचव।


*अरुण कुमार निगम*

मन के मिलौना

 मन के मिलौना


    गांव मा सूरुज नरायण के घाम हा अइसे उतरिस जइसे अंगना मा कोनो चुपचाप मेहमान आके बइठगे हवय। खेत के मेड़ पार मा हरियर हरियर कांदी हा चमकत रिहिस अउ बखरी मा कुम्हड़ा के नार हा लहरावत रिहिस।

कंठी ठेठवार हा अंगना के ओसरी मा बइठके दूरिहा ले देखत रिहिस। ओखर आंखी मा कुछु खोजे के भाव रिहिस। दाई कहिथे -  “मनखे के मन जेन दिन भर जुगत करत रहिथे  ओ दिन ओखर चैन हर उड़ जाथे।”

कंठी ठेठवार के मन घलो अइसने जुगत करत रिहिस।

ओ दिन गांव मा हाट बाजार रिहिस। लोगन सब हाट बाजार जावत रिहिन। कोनो महुआ बेचत रिहिस, कोनो कोदो-कुटकी, कोनो लकड़ी। कंठी ठेठवार के मन हाट बाजार जाय बर नई होवत रिहिस।

ओखर दाई पूछिस -

“का होगे रे? हाट बाजार नई जाबे का?”

कंठी ठेठवार धिरलगहा  किहिस  -

“जाहूं तो दाई, फेर मन नई लागत हे।”

दाई हांसे लगिस -

“अरे, मन ला लगाय ला परथे। मन घोड़ा नइहे, जिहां चाही उहां भाग जाही।”

कंठी ठेठवार चुप होगे।

असल मा ओखर मन मा कुछु अउ बात चलत रिहिस।

गांव मा फुलबसिया नाव के एक नोनी रिहिस। बचपन ले कंठी ठेठवार के संग खेले-कूदे रिहिस। फेर अब दुनो बड़े होगे रिहिन। अब गांव के बोली-बानी बदलगे रिहिस।

लोगन कहिथे -

“लइका जब जवान हो जाथे, त गांव के नजर घलो बदल जाथे।”

कंठी ठेठवार के मन म फुलबसिया बर अजीब कस अपनापन रिहिस। फेर वो अपन मन के बात कहे के हिम्मत नइ जुटा पावत रिहिस।

 गांव के जिनगी अइसने होथे जइसे धीरे-धीरे बोहावत नदी। ऊपर ले सब शांत दिखथे, फेर भीतर बहुते कुछ चलत रहिथे।

कंठी ठेठवार के संग घलो अइसनेच होवत रिहिस।

एक दिन ओहर खेत जावत रिहिस। रद्दा मा फुलबसिया मिल गे।

फुलबसिया मुस्कुरा के किहिस -

“कइसे हस कंठी, आजकल बड़ चुप-चुप रहिथस?”

कंठी ठेठवार हंसी रोकत किहिस -

“कुछु नई, काम जादा हे।”

फुलबसिया किहिस -

“काम जादा नई, मन मा बात जादा हे।”

कंठी ठेठवार चौंकगे।

“का ?”

फुलबसिया धिरलगहा हांसिस -

“गांव मा सब देखत हें। जेन बात ला लुकाय जाथे, ओ बात सबले पहिली दिख जाथे।”

कंठी ठेठवार के गला सूखगे।

ओ दिन ले कंठी ठेठवार के मन अउ जादा उलझगे।

रात मा वो खटिया मा सुते रिहिस। चंदा ऊपर चमकत रिहिस। हवा मा महुआ के गंध रिहिस।

वो सोचत रिहिस -

“का सच मा फुलबसिया समझत हे ?”

दाई के बात याद आइस -

“मनखे के मन हा मछरी जइसन होथे, पानी बिना टिके नई।”

कंठी ठेठवार सोचिस -

“मोर मन के पानी फुलबसिया हे का ?”

 दूसर हफ्ता हाट बाजार के दिन रिहिस।

गांव के सब लोग जावत रिहिन। कंठी ठेठवार घलो चल दिस।

हाट बाजार मा भीड़ रिहिस। कोनो गाना गावत रिहिस, कोनो बांसुरी बजावत रिहिस।

कंठी उदुपहा देखिस -

फुलबसिया महुआ बेचत बइठे रिहिस।

ओहर धीरे बांधे तीर मा  पहुंचिस।

फुलबसिया किहिस -

“का लेबे?”

कंठी हांसे लगिस -

“महुआ।”

फुलबसिया किहिस -

“महुआ लेबे त दाम देबे, मुस्कान लेबे त का देबे?”

कंठी चुप होगे।

 गांव मा बात बिजली जइसन बगरगे।

दू दिन बाद लोगन कहे लगिन -

“ कंठी अउ फुलबसिया के बात जादा होवत हे।”

एक झन सियान बबा घलो किहिस -

“जिहां धुंआ उठथे, उहां आग घलो होथे।”

कंठी के दाई सुनिस।

ओ रात वो कंठी ला बुलाइस -

“सच-सच बता, का बात हे?”

कंठी चुप।

दाई किहिस -

“मनखे के मन ला जियादा देर दबाके रखबे, त ओ फूट जाही।”

कंठी धिरलगहा किहिस -

“दाई… मोर मन फुलबसिया मा लाग गे हे।”

दाई मुस्कुराइस -

“बस इही बात?”

 कुछ दिन बाद दाई खुद फुलबसिया के घर चल दिस।

गांव के रीति मा अइसनेच होथे।

फुलबसिया के दाई किहिस -

“अगर दुनो के मन राजी हे, त हमन ला का दिक्कत?”

गांव मा धीरे-धीरे बात तय होगे।

कंठी जब सुनिस, ओखर मन हल्का होगे।

वो सोचिस -

“जेन बात बर मन बरिस भर ले भटकत रिहिस, ओ बात आज ठिकाना पागे।

बिहाव के दिन गांव मा मड़ई लगिस। दफड़ा - डमऊ , मोहरी बाजिस। लोगन नाचे लगिन।

कंठी अउ फुलबसिया एक-दूसर ला देखके मुस्कुराइन।

दाई धिरलगहा किहिस -

“देखव, मन के मिलौना सबसे बड़े मेला होथे।”

कंठी समझ गे -

सच मा मन जब अपन जगह पा जाथे, त जिनगी के सब उलझन अपने-आप सुलझ जाथे।

          - डुमन लाल ध्रुव 

    मुजगहन, धमतरी ( छ.ग.)

        पिन - 493773

पानी के पीरा - डुमन लाल

 पानी के पीरा

                   - डुमन लाल ध्रुव 

हप्ता दिन पहिली घर के भीतरी कोठरी मा एक अजीब हलचल चलत रिहिस।

दाई अपन पुराना संदूक खोले बइठे रिहिन अऊ मोटरी उपर मोटरी बांधत रिहिन। कभु एकठन मोटरी ला खोले त कभू दू ठन मा सामान धरे। कोन मोटरी मा पूजा के फूल, धूप अऊ अगरबत्ती, कोन मा रद्दा भर  भूंजे - चना, गुड़ अऊ टिकिया, त कोन मा कपड़ा-लत्ता। हर जिनिस ला वो अइसने सहेज-सहेज के धरत रिहिन जइसे कोनो बहुमूल्य धरोहर होवय।

 जमुना हा ओ कोठरी के दुवार मा खड़े-खड़े सब देखत रिहिस।

दाई के हाथ कांपत रिहिस, फेर आंखी मा एक अजीब चमक झलकत रिहिस।

ओ चमक मा बरिस भर ले दबे एक अधूरा सपना के उजाला रिहिस।

उदुपहाइ दाई हा एक ठन छोटे मोटरी ला धिरलगहा खोलिन।

ओ मोटरी मा एक ठन नीला पगड़ी रिहिस।

दाई ओला हाथ मा धरके कुछ देर तक निहारत रिहिन।

ओ पगड़ी सिरिफ कपड़ा नइ रहिस; ओमा सियान बबा के सुरता, ओखर संग बिताय जिनगी अऊ एक पूरा समय बंधे रिहिस।

थोरिक देर बाद दाई चुपचाप पगड़ी ला फेर बांध के मोटरी मा धर दीन।

जइसे कोनो स्मृति ला फिर से मन के भीतर सहेज लेवय।

गरमी के छुट्टी मा जमुना गांव आय रिहिस।

रइपुर के एक हाईस्कूल मा वो शिक्षिका रिहिस। पढ़े-लिखे, समझदार अऊ आधुनिक सोच वाली लड़की।

घर पहुंचते ही ओखर मइया धीरे से कही दिस -

“देख बेटी, डोकरी के बात मा जादा धियान मत देबे।

अब उमर होगे हे ओखर। कहिथे के कोनो मोला राजिम संगम नहाय बर ले चल दे, त मोर आत्मा ला चैन मिल जाही।”

जमुना कुछू नइ किहिस।

मइया फेर कहिस -

“इतना पढ़-लिख गे हस, मास्टरनी बन गे हस, फेर अब अइसन बात मा यकीन करथस? नदी मा नहाय ले कोनो पाप धुलथे ?”

जमुना चुपचाप मइया के मुंह देखत रिहिस।

ओखर मन मा धीरे-धीरे एक प्रश्न उठिस -

का बूढ़ा होय  के बाद मनखे के इच्छा के कोनो कीमत नइ रहे ?

उही दाई तो रिहिन जेन रतन के जनम पर पूरा गांव भर लड्डू बांटे रिहिन।

उही दाई तो रिहिन जेन ददा के बीमारी के बखत चार दिन तक खुद भूखे रहिके पूजा-पाठ करत रिहिन।

आज वही दाई…

घर मा “डोकरी” कहे जाथे।

जमुना के मन मा एक कसक उठिस।

सांझा  जब रतन खेत ले लहुटिस अऊ ददा हा ट्रैक्टर ला गैरेज मा रखके घर आइन, तब जमुना धीर से अपन निरनय ला बता दिस -

“दाई ला मंय राजिम संगम नहाय बर ले जावंव।”

घर मा कुछ देर बर सन्नाटा छा गे।

रतन उछाह मा किहिस -

“दीदी, मंय घलो संग चलहूं।”

जमुना मुस्कुरा के किहिस -

“तंय अभी छोटे हस।

अतेक लंबा सफर मा तोला संभालना मुश्किल हो जाही।”

रतन चुप होगे।

मइया के मुंह उतरगे।

रात मा धीर लगाके किहिस -

“पूरा महीना के तनखा लाइ खरचा कर देबे?

नदी मा नहाय ले कोन पाप धुलही ?”

जमुना खिड़की ले बाहिर अंधियार देखत रिहिस।

फेर धीर लगा के किहिस -

“मइया, पाप धुले या नइ धुले, ए बात अलग आय।

पर दाई के मन मा बरिस भर ले जऊन इच्छा दबे हे, ओला पूरा हो जाना चाही।”

दूसर दिन दूनो राजिम परयाग बर निकल गेन।

रात भर छुकछुकिया के आवाज अऊ झटका मा सफर कटिस।

दाई खिड़की ले बाहिर अंधियार मा भागत खेत-खार देखत रिहिन।

कभू-कभू अपन मोटरी छूवत रहय।

जइसे पगड़ी के भीतरी सियान बबा के उपस्थिति महसूस करत होही।

जमुना समझ जात रिहिस -

दाई के मन अभीच राजिम संगम पहुंच गे हे।

बिहनिया जब सूरुज नरायण के पहिली किरन नदी के पानी ऊपर चमकिस, तब घाट मा हजारों मनखे भीड़ लगाए खड़े रिहिन।

कोनो मंत्र पढ़त रिहिस,

कोनो फूल पतरा बोहावत रिहिस,

कोनो श्रद्धा ले डुबकी लगावत रिहिस।

दाई धीरे-धीरे पानी काठे आइन।

जमुना किहिस -

“दाई, ओ डहर चल। उहां भीड़ कम हे।”

दाई मुस्कुरा दिस।

ओ मुस्कान मा अजीब विश्वास रिहिस।

जइसे उहां सच मा सियान बबा के आत्मा कहीं पास मा होवय।

जइसे ही दाई पानी मा पांव धरिन, वो अचानक ठिठक गइन।

“ जमुना … कुछू टकराइस।”

जमुना पानी मा उतरिस।

पानी मा फूल, माला, पत्तल, दीया अऊ फूटहा मटकी तैरत रिहिन।

पानी रंगीन जरुर रिहिस,

पर साफ नइ।

जमुना अंदर हाथ डारिस।

अचानक ओखर हाथ कोनो नरम चीज ले टकराइस।

वोहर घबरा के चीख पड़िस।

हाथ मा नवजात शिशु के निरजीव देह रिहिस।

इतना छोट…

इतना शांत…

जइसे अभी-अभी नींद मा डूबे हवय।

जमुना के आंखी ले आंसू गिर पड़िस।

“दाई… लोगन अइसन काबर करथे ?”

दाई कुछ देर चुप रिहिन।

फेर भारी आवाज मा कहिन -

“जब मनखे अपन करम गति ले डर जाथे,

त नदी ला अपन पाप के बोझ ढोए के साधन बना लेथे।”

दूनो दूसर घाट मा चल दिस।

फेर उहां घलो विही हालत।

कचरा, कपड़ा, माला, दीपक।

उदुपहा एक ठन मुरदा देह पानी मा बोहात दिखिस।

नंगा अऊ असहाय।

जमुना घृणा ले नजर फेर लिहिस।

दाई हा कुछ देर ओ दृश्य ला देखत रिहिन।

फेर धीरे-धीरे अपन मोटरी ला खोलेन।

सियान बबा के नीला पगड़ी निकालिन।

अऊ बिना कुछ कहे ओ पगड़ी ला लाश ऊपर उछाल दीन।

अब ओ देह के कुछ हिस्सा ढका गे।

दाई के आंखी भींज गे।

मन ही मन किहिस -

“हे सियान बबा…

अगर तोर आत्मा कहीं हे,

त देख…

आज तोर पगड़ी एक अउ मनखे के लाज ढांकिस।”

जमुना धीर लगाके पूछिस -

“दाई… नदी मा नइ नहाबे का ?”

दाई नदी के पानी ला देर तक देखत रिहिन।

फेर किहिन -

“नइ बेटी …

ये अब वो राजिम परयाग नइ रिहिगे जेन मा श्रद्धा उतर सके।

अब येमा मनखे के लापरवाही बहत हे।”

दूनो झन धरमशाला मा गिन।

नल के पानी ले नहा के अऊ मंदिर दर्शन कर वापस लहुट गिन।

गांव पहुंचते ददा पूछिन -

“अम्मा, राजिम संगम ले नहा के आगेव ?”

दाई हल्का मुस्कुरा दिस।

“हां… होगे।”

फेर कुछ देर बाद धीर लगा के किहिन -

“देख बेटा, जब मंय मर जावंव,

त मोर अस्थी राजिम मा मत डालिहा।”

सब चौंक गिन।

दाई किहिन -

“ राजिम दाई हा पहिलीच ले बहुत दुख सहत हे।

मोर गंदा शरीर ले ओला अउ मत सताव।”

ओ दिन ले दाई अऊ जमुना रोज गांव के गल्ली मुहल्ला साफ करे लगिन।

नदिया खंड़ मा कचरा उठाथे।

लोगन कभू हांस देथे, कभू अनदेखा कर देथे।

पर दाई के आंखी मा अब अजीब शांति रहिथे।

जमुना कई बार सोचथे -

राजिम संगम मा स्नान जरुरी नइ रिहिस।

जरुरी रिहिस -

राजिम के पीरा ला समझना।

काबर के 

नदी के गंदगी सिरिफ पानी मा नइ बोहात हे,

ओ तो मनखे के सोच मा बोहात हे।

           - डुमन लाल ध्रुव 

      मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

          पिन - 493773

प्रतिभा संपन्न समीक्षक अउ कवि रिहिस यशवंत मेश्राम ह

 प्रतिभा संपन्न समीक्षक अउ कवि रिहिस यशवंत मेश्राम ह 


हिंदी काव्य संग्रह "खो गया मिल गया" के  रचनाकार,प्रतिभा संपन्न समीक्षक अउ आलोचक , साकेत साहित्य परिषद सुरगी,राजनांदगांव के वरिष्ठ सदस्य रहे श्रद्धेय यशवंत मेश्राम जी ल उंकर पांचवीं पुण्य तिथि म शत् शत् नमन हे।


यशवंत मेश्राम के जनम 21 नवंबर 1960 म होय रिहिस। शंकरपुर , वोहा मानपुर -मोहला- अंबागढ़ चौकी के गोटाटोला म व्याख्याता रिहिस।


       श्रद्धेय यशवंत मेश्राम अब्बड़ किताब पढ़य। राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक पत्रिका नियमित मंगवाय।  बुक डिपो अउ रेल्वे स्टेशन राजनांदगांव के बुक स्टॉल म जाके नवा -नवा किताब ल बिसाय।

   हमर साकेत साहित्य परिषद सुरगी के मासिक कवि गोष्ठी अउ परिचर्चा के समाचार ल अखबार मन म पढ़ के 

वोहा मासिक गोष्ठी म आय के चालू करिस अउ परिषद म शामिल होय के निवेदन करिस।तीन- चार गोष्ठी म आय के बाद मेश्राम जी ल सदस्यता प्रदान करे गिस।  

    श्रद्धेय मेश्राम जी ह साकेत साहित्य परिषद सुरगी के मासिक काव्य गोष्ठी अउ परिचर्चा के संगे संग वार्षिक सम्मान समारोह म सक्रियता ले भाग लेवय। उंकर समीक्षा, आलोचना,कविता लेख साकेत साहित्य परिषद सुरगी, राजनांदगांव द्वारा प्रकाशित "साकेत स्मारिका" म प्रकाशित होवत गिस। राष्ट्रीय स्तर के पत्र पत्रिका म उंकर समीक्षा प्रकाशित होवय अउ अब्बड़ सराहे गिस।

    राजनांदगांव म श्रद्धेय नरेश कुमार वर्मा, कुबेर सिंह साहू, सुरेश सर्वेद अउ आने साहित्यकार मन संग भेंट करके सरलग साहित्यक चर्चा करे म रमे राहय।

  साकेत साहित्य परिषद सुरगी अउ आने संस्था द्वारा आयोजित मासिक परिचर्चा अउ वार्षिक समारोह म एक वक्ता के रूप म वोहा खूब सराहे गिस। मेश्राम जी ह वीरेन्द्र कुमार तिवारी वीरू जी अउ श्रद्धेय नंद कुमार साहू साकेत के" तीजा -पोरा"कविता के तुलनात्मक समीक्षा करिस जउन ह प्रकाशित घलो होइस।


    श्रद्धेय मेश्राम जी ह अपन निवास स्थान शंकरपुर, राजनांदगांव म साकेत साहित्य परिषद सुरगी, राजनांदगांव के दू - तीन बेर मासिक गोष्ठी अउ परिचर्चा के मेजबानी करिस। जेमा एक बार महान कहानीकार अउ उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के रचना संसार उपर चर्चा करे गिस जेमा सुप्रसिद्ध समीक्षक प्रो. थान सिंह वर्मा जी माई पहुना के रूप म आमंत्रित रिहिस।

  मेश्राम जी के एक निश्चित विचार धारा रिहिस। वोहा अंबेडकरवादी विचार धारा ल जादा महत्व देय।आपसी चर्चा -परिचर्चा के दौरान उंकर विचार धारा ह अउ लेखन म स्पष्ट झलकय। वोहा मनुवादी विचार धारा के विरोधी राहय एकरे सेति वोहा पशु पक्षी मन के नांव ल घलो जाति आधारित रखे के विरोध करिस। "बाम्हन चिरई" ल लेके वोहा कुबेर सिंह साहू ले अब्बड़ तर्क -वितर्क करिस अउ कुबेर जी के तर्क वितर्क ले वोहा सहमत नि हो पाइस।

      साहित्य के क्षेत्र म अपन माता पिता ल प्रेरणा माने के संगे- संग वोहा साकेत साहित्य परिषद सुरगी के पूर्व अध्यक्ष भाई लखन लाल साहू लहर के कविता शैली ले विशेष प्रभावित रिहिस। कविता लिखे के प्रेरणा वोहा लहर जी ल मानिस हे। मेश्राम जी ह "खो गया मिल गया"कविता संग्रह म येकर उल्लेख करे हावय। साकेत साहित्य परिषद सुरगी के संरक्षक अउ वरिष्ठ साहित्यकार कुबेर सिंह साहू संग उंकर जोड़ी खूब जमिस। वोहा कुबेर जी संग सरलग साहित्य चर्चा करय। साहित्य चर्चा बर एक दूसरा के घर आना जाना होय। सुरेश सर्वेद के प्रेस ठउर अउ मानव मंदिर राजनांदगांव म चाय के चुसकी के संग जय स्तंभ चौक म एमन घंटों साहित्यक चर्चा करय। महू ह कुछ बेरा ये चर्चा -परिचर्चा के साक्षी रेहे हंव।

    साकेत साहित्य परिषद सुरगी ह मेश्राम जी के साहित्य म योगदान खातिर साकेत साहित्य सम्मान ले सम्मानित करिस। मेश्राम जी ह कोनो भी समीक्षा, आलोचना,लेख,कविता लिखय त कुबेर सर जी कर छोंड़य। सर जी ह येला अपना कंप्यूटर म टाइपिंग करके संरक्षित कर लेवय। 

     कुबेर सर जी अउ यशवंत मेश्राम के सुपुत्र श्री अविना शंकर मेश्राम के उदिम ले मेश्राम जी के दू किताब मानसी पब्लिकेशन्स दिल्ली ले प्रकाशित होय हे। किताब के नाव हावय - कुबेर की रचनाओं में समकालीनता और समकालीन समीक्षा दृष्टि ( आलोचना), एवं आलोचना का मापदंड: हत्या ( आलोचना)। ये दूनों किताब अउ कुबेर सर जी के किताब के विमोचन कार्यक्रम 1 अप्रैल के प्रेस क्लब राजनांदगांव म साकेत साहित्य परिषद सुरगी डहन ले रखे गिस। कार्यक्रम म उपस्थित वरिष्ठ साहित्यकार डा. जयप्रकाश साव, दादू लाल जोशी, विनोद साव, संजीव तिवारी, कुबेर सिंह साहू ह जिहां यशवंत मेश्राम जी के भाषा अउ शैली पर प्रकाश डालिस त दूसर कोति उंकर व्यक्तित्व ऊपर चर्चा करिस। कुबेर जी कहिथे कि -" मुक्तिबोध, विनोद कुमार शुक्ल जइसे मेश्राम के घलो अलग भाषा - शैली हे।"

      5 अप्रैल 2021 म कोरोना के चलते उंकर देहावसान होगे। श्रद्धेय मेश्राम ल शत् -शत् नमन हे। 


            ओमप्रकाश साहू 'अंकुर "

         सुरगी, राजनांदगांव।

चार पर्यटन स्थल एक दिन म-4( यात्रा संस्मरण) -----------------------

 चार पर्यटन स्थल एक दिन म-4( यात्रा संस्मरण)

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एक ही दिन म चार जगह महादेव अउ देवी माँ के दर्शन के कल्पना नइ करे जा सकय  फेर हमन करेन।


बहुत दिन ले सोचत रहेंव के घटा रानी और जतमाई  जा सकतेंव  त जातेंव।  घटारानी म पहाड़ी चढ़ना परथे अउ जतमाई म तीन चार सौ सीढ़ी उतरे बर परथे। ये  दूनों जगह झरना वाला आये।  कई जगह म पानी बोहावत रहिथे। बारीश के दिन म तो सीढ़ी उपर ले ऊपर के पत्थरा ले नीचे पानी बोहावत रहिथे। नवम्बर दिसम्बर तक इहाँ पानी बोहावत देख सकथन। जब मैं गे रहेंव त बहुत कम पानी दिखाई दिस।


25 मार्च के आशा गुप्ता  कहिस काली रविवार के पंचमी हे त कोनो जगह घूमे बर चलबो। मै हाँ कहि देंव फेर मोला  चिंता होगे काबर के  जिहाँ भी घूमे बर जाबो त वंउहाँ चले बर तो पड़ही, सीढ़ी चढ़ना उतरना नइ कर सकत रहेंव हंव।


कल 26 मार्च पँचमी के दिन फोन  करिस करीब सवा नौ बजे " भाभी आधा घंटे में तैयार हो जाना अपन कहीं बाहर चलते हैं। आप मिर्च खाते नहीं हैं तो होटल का नहीं खायेंगे इस कारण अपने लिये कुछ खाने का रख लेना।" मैं उही समय चाय रोटी  खाये रहेंव , मोर तो बिहनिया के इही नाश्ता राहय। जल्दी से आधा कटोरी चावल बनायेंव अउ चार रोटी बनायेंव। दूनो ल आचार अउ दूध के साथ पैक करके रख लेंव। सवा दस बज गे, ग्यारह बज गे जब साढ़े ग्यारह बजिस त मैं दूध भात अउ आचार  खा लेंव। बारह बज गे तब मैं आशा ल फोन करेंव त ओ ह  बोलिस "आप घर के बाहर आ जाओ हम लोग आ रहे हैं।"


मैं बाहर आ के खड़े हो गेंव उही बेरा म तुरंत आशा अउ ओखर पति दुर्गेश कार लेके आ गें। मैं बइठ गेंव फेर अंजू अग्रवाल के घर गेन । वहु तैयार रहिस हे। अब हम चार झन हो गेन। हमन दोस्त आन, हमर दोस्ती ल पैतीस साल हो गे हावय।


कार म बइठे के बाद पता चलिस के हमन  घटारानी जाथन। राजिम ल पार करके हमन आगे बढ़ेन। नदी म ये बछर बढ़िया पानी भरे रहिस हे। लक्ष्मण झूला बहुत सुंदर दिखत रहिस हे। हमन जइसे जइसे आगू बढ़त गेन त जंगल दिखे ले लग गे। ओखर गहनता घलो दिखे ले लगगे। हमन करीब ढाई बजे  घटारानी पहुँच गेन। उहाँ दू डाहर ले जाथें एक ऊपर डाहर ले जाके नीचे उतरथें अउ दूसर रद्दा आये जिहाँ  नीचे ले ऊपर डाहर  जाथें। हमन नीचे वाला रास्ता ले गेन।


कार ले उतरते ही सामने में भी पार्किंग रहिस हे। ओखर बाद दूनों डाहर दुकान रहिस हे।  सीढ़ी ले चढ़त -चढ़त  हमन  आगू बढ़त रहेन। दो तीन फीट चौड़ा सीढ़ी रहिस हे। मैं धीरे धीरे चलत रहेंव। सामने रास्ता में ही लोगन मन खाना खावत रहिन हें। भंडारा चलत रहिस हे। पुराने तरिका के चूल में लोहा के बरतन चढ़े रहिस हे। ओमा बड़े बड़े कुंदा लगे रहिस हे जेला पकड़ के उतारत चढ़ावत रहिन हें। दू बांस म टोकनी ल बांध के ओ बरतन के पानी म डुबावत रहिन हें। बरतन म पानी भरे रहिस हे। टोकनी म चावल डालत रहिन हें। छै फीट ले भी लम्बा बरतन म चार या पाँच टोकनी डुबे रहिस हे। सब म चावल बनत रहिस हे। चावल जब पक जाये त ओमा बंधे बांस ल पकड़ के   निकाल लेवत रहिन हें। गर्म गर्म खाना सब खावत रहिन हें। दाल भात अउ सब्जी रहिस हे।


ओखर आगे ही एक देवी के मंदिर रहिस हे। ओ मंदिर के सीढ़ी म मैं बइठ गेंव। ओखर सामने में ही दूसर डाहर शिवजी के मंदिर रहिस हें। मैं उहाँ जाके दर्शन करके आ गेंव अउ देवी के मंदिर के सीढ़ी उपर बइठ गेंव। बाकी तीनो झन पहाड़ी के ऊपर देवी मंदिर म देवी के दर्शन बर चल दिन। बहुत ही घुमावदार अउ खड़ा खड़ा सीढ़ी रहिस हे। मैं थक गे रहेंव अउ अतेक खड़ी ऊंचा सीढ  चढ़ना कठिन रहिस हे त नीचे में ही बइठे रहेंव। एक घंटे के बाद म सब झन दर्शन करके वापस आ गेन।  उंखर संग मैं कार तक आ गेंव। उहाँ अपन-अपन टिफिन खाना चाहत रहेंन फेर जतमाई म खाबो  कहिके जतमाई डाहर बढ़ गेन। लहुटत रहेन त मंदिर के तीर में ही एक बोर म सबमर्सिबल पम्प चलत रहिस हे त हमन सब झन उहाँ हाथ पैर धो के ताजा हो गेन अउ कार म आगे बइठ गेन, कार तेजी से बढ़ गे। 


बहुत ही घना जंगल रहिस हे। रद्दा ल देखके  केशकाल के घाटी के सुरता आगे। खड़ी चढ़ाई अउ खड़ा ढाल होये के कारण एक मोटर साइकिल वाला गाड़ी नइ चढ़ा सकिस अउ गिर गे। उही बेरा म तीन झन पैदल आवत रहिन हे तेने मन ओला उठाइन। हमन  इहाँ ले सात किलोमीटर दूरिहा जतमाई माता के दर्शन बर जावत रहेन। रद्दा म "दातरैंगा गाँव का डैम " घलो देखेन। जंगल के बीच म पानी के बहुत ही सुविधा रहिस हे। बिहनिया ले बदली रहिस हे, इहाँ ले निकलेन वइसने ही तेज हवा चले ले लग गे। अइसे लगत रहिस हे के बारीश होही। मोला लगत रहिस हे के मोर मन के खुशी ल इंद्र देव महसूस करत हावय अउ मोर से मिले बर आवत  हावय। पर मैं तो कार के अंदर म रहेंव।


इहाँ  " जतमाई सात किलोमीटर "के बोर्ड लगे रहिस हे इहाँ ले एरो ल देखत- देखत हमन साढ़े तीन बजे जतमाई पहुँच गेन। पूरा मंदिर रोड ले ही दिखत रहिस हे। लेफ्ट में मंदिर जाये के रद्दा रहिस हे अउ राइट डाहर बहुत अकन दुकान अउ होटल रहिस हे। हमन पहली एक होटल म बइठ गेन खाना खाये बर। हमन  सबो झन अपन- अपन घर ले रोटी सब्जी लेके आये रहेन। हमन उहाँ बइठ के खाना खायेन अउ उहाँ  टॉयलेट नवा बने रहिस हे ओखर घलो उपयोग करेन। खाना खाये के बाद चाय पीयेन। मैं राजगीर के लड्डू खरीदे रहेंव ओला ले के आये रहेंव, ओला खायेंव। अब हमन  रोड पार करके मंदिर जाये के रद्दा म आ गेन। इहाँ बड़े से गेट लगे रहिस हे। एक बरगद के पेड़ लगाये हावंय अउ ओखर चबुतरा बनाये हावंय जिहाँ लोगन बइठ सकथें। येखर बाद म जतमाई लिखे हावय अउ बड़े से गेट हावय। गेट के बाद नीचे उतरे बर सीढ़ी शुरु हो जाथे। बहुतेच्च जंगल असन पेड़ उगे हावय।हा हा हा जंगल ही है। आगू बढ़ते गेन रद्दा म एक शिव मंदिर रहिस हे, ओखर दूसर डाहर बड़े से कमरा अउ बरामदा रहिस हे। जिहाँ  ज्योत जलत रहिस हे। 'ऊ ' के आकार म कलश रहिस हे। दो ढाई हजार के करीब ज्योत जलत रहिस हे


फेर आगू बढ़ते गेन एक जगह म कुछ ज्यादा बड़े गढ्ढा रहिस हे उहां तीन मंदिर रहिस हे। उहाँ सामने म कुंड रहिस हे ओखर सामने ही तीन में से एक मंदिर ह जतमाई देवी के हावय। उहां माँ के  दर्शन करेन। माता जी के मूर्ती के तीर ले पानी बोहावत रहिस हे। जेन ह सीधा सामने के कुण्ड में जावत रहिस हे। इहाँ ये गुफा सरिख मंदिर के ऊपर म घलो देवी के मंदिर रहिस हे। मैं थक गे रहेंव त उहां नइ गेंव। इँहें ले दशर्न करके लहुटे ले लग गेंव। इहाँ ले नीचे के गहराई ह देखे के लायक रहिस हे। ये जगह ह कभू- कभू पचमढ़ी के सुरता देवावत रहिस हे। वापसी म मैं अकेल्ला ही सीढ़ी चढ़े ले लग गेंव। सबो झन एक के पाछू एक आवत रहेन। रद्दा म ज्योति कक्ष के दर्शन करेन। इहाँ दो हजार के करीब ज्योति जलत रहिस हे जेला "ऊ" के आकार म रखे रहिन हें।


हमन उहाँ ले फेर ऊपर चढ़ेन अउ पहिली वाले गेट के पास म बइठ गेन। इहाँ  फोटो खिचवायेन। साथ ही एक अजूबा देखेन-- बेल के पेड़ म नीबू के आकार के सैकड़ों बेल लगे रहिस हे। देखे म नीबू के धोखा होवत  रहिस हे। पत्ता ले पहचानेन के ये ह बेल आये।

इहाँ ले हमन सीधा रोड म आ गेन। कार के आवत ले हमन बरगद के चबूतरा म बइठ  के मजा घलो ले लेन। कार अइस अउ बदले मौसम के संग हमन  कार भितरी आ गेन। तेज ठंडा ठंडा हवा चलत रहिस हे त बने लगत  रहिस हे। अइसे लगत रहिस हे के इंद्र भगवान घलो आशिर्वाद देय बर पानी बरसा  दिही। कइ बछर ले देखे के ईच्छा रहिस हे अउ ये तरह ले अचानक चढ़ के देखे बर मिलही सोचे नइ रहेंव। देखे के सुख छुपत नइ रहिस हे। मन के लहरा ह इंद्र तक पहुँच गे लगत रहिस हे तभे बादल मंडरावत रहिस हे।


अचानक दुर्गेश गुप्ता जी ह ड्राइवर ल कहिस  के "कार गरियाबंद तरफ मोड़ लो। भूतेश्वर महादेव चलेंगें। "पाँच बज चुके रहिस हे। "रात हो जायेगी तो महादेव के दर्शन ठीक से नहीं हो पायेगा " अइसे ड्राइवर बोलत रहिस हे फेर दुर्गेश के मन बन गे रहिस हे के भूतेश्वर महादेव जाना है। मैं चुप बइठे रहेंव। आज के दिन कइसे हे? मन म तीसरा खुशी, एक ही दिन म तीन ईच्छा पूरा हो जाना अइसना तो जीवन म कभू नइ होय रहिस हे। दुर्गेश ह हिम्मत देके अउ हाथ पकड़ के मोला उतारिस चढ़इस।  मोर संतुलन बिगड़ जात रहिस हे त दू बेर गिरत रहेव त ओ ह मोला पकड़िस घलो। हर बेर अतेक शांति से काहय "इतना तो आप चढ़ लेंगें चलो" अउ मैं आगू बढ़ जांव।

29 किलोमीटर के दूरी म गरियाबंद रहिस हे। हमन  खाली रास्ता होये के कारण तेजी से भागत भागत छः बजे उहाँ पहुँच गेन।


रद्दा म गाँव पड़त गीस हमन बहुत जल्दी म रहेन त गाँव के नाम  तरफ ध्यान घलो नइ देन। हमन गरियाबंद पहुँच गेन। अब इहाँ ले आठ किलोमीटर दूरिहा म महादेव रहिस हे। हमर गाड़ी तेजी से भागत रहिस हे त अइसे लगिस के तुरंत पहुँच गेन।  कार ले उतरते ही बायें हाथ डाहर बड़े से महादेव दिखाई दिस। आठ दस झन दर्शन करे बर रहिन हे। कुछ दुकान बंद हो गलत रहिस हे। हमन सीधा महादेव तीर पहुँच गेन। फेर कार ले उतरते ही दाहिना डाहर नंदी जी रहिस हे। वहु ह बहुत बड़े से पत्थर के रहिस हे। हमन जब महादेव तीर पहुँचेन त विश्वास ही नइ होवत  रहिस हे के अतेक बड़ भी महादेव हो सकत हे। ये ह लगातार बाढ़त  हावय। ये ह सबसे ऊंचा महादेव के रिकार्ड म दर्ज हावय। सामने जलहरी घलो रहिस हे। हमन ओखर  आगू म गेन त एक अलग से शिवलिंग रखे रहिस हैं जेखर पूजा लोगन मन करत रहिन हें। हमन घलो पानी डारेंन अउ आक के फूल चढ़ायेन। अगरबत्ती जलायेन। ओ शिवलिंग के बाजू म सीढ़ी ले उतर के गुफा म जाये जा  सकथे। नीचे म छोटे से साफ सुथरा गुफा हावय।


ये लिंग के पाछू म शंकर पार्वती के मूर्ती बने हावय। नवा वर वधु मन इहाँ दर्शन करे बर  आथें अउ आशिर्वाद ले के जाथें। ये अनोखा भूतेश्वर महादेव सच म अनोखा हावय।

ये लिंग के तीर में ही वनदेवी के मूर्ती बने हावय। जंगल के बीच म महादेव हावय त वनदेवी घलो आगे।

बाहिर म बहुत से मंदिर बने हावय। गणेश, हनुमान जी घलो हे। इहाँ हमन ल सात बजगे। अब इंहा ले निकल के सीधा रायपुर ही जाना रहिस हे। 

सालों के ईच्छा ये तरह से एक झटका म पूरा हो जही सोचे भी नइ रहेंव। लोगन कहिथें  के दर्शन बर जब भगवान के ईच्छा होही तभे जा पाबो वरना कोई न कोई रुकावट आते रहिही। मोरो संग अइसने कुछ होइस होही। मोर ये दर्शन के माध्यम बनिन आशा अउ दुर्गेश गुप्ता। मोर संग छोड़बे नइ करिन।


इहाँ ले निकल के " अमृततुल्य चाय " पीये बर राजिम डाहर निकल परेन। पुल ले लक्ष्मण झूला बहुत ही सुंदर लगत रहिस हे। हमन उतर के फोटो खिंचवायेन। ओखर सुंदरता ल देख के अपने आप ल रोक नइ पायेन। उहाँ पुल म  उतर गेन।  मौसम ठंडा होगे रहिस हे। बहुत ठंडा ठंडा हवा चलत रहिस हे। हमन बहुत अकन फोटो खिंचवायेन। फोटो खिंचवावत बेरा म पुल कांपत रहिस हे याने हिलत रहिस हे। मन म  डर आवत रहिस हे। भूकम्प के आभास होवत रहिस। उहाँ ले हमन अभनपुर बर निकल गेन। आठ बज चुके रहिस हे।

घड़ी के सूई हमर अनुसार न चलके हमर समय ल बचावत चलत रहिस हे। ड्राइवर के संतुलित गाड़ी चलाना अउ घड़ी के हमर समय ल बचा के चलना एक साथ होवत रहिस हे।


राजिम म उतरे के बाद अइसे लगिस के मन की संतुष्टि ल ही मौसम ह बतावत हावय। अभनपुर जावत तक बारीश होय ले लगगे अउ अभनपुर ले पहिली ही बारीश हो गे रहिस हे। गढ्ढा मन म पानी भरे रहिस हे। रविवार होये के कारण बाजार दुकान सब बंद रहिस हे। गाड़ी अपनी मर्जी से भागत रहिस हे। भीगे मन ह बाहिर पानी बन के बरसत रहिस हे। इंद्र के सेना  हमर स्वागत करत रहिस हे। बने बारीश होगे तब हमन अभनपुर पहुँचेन। अचानक ड्राइवर राजू ह  कहिस " मेरे घर के पास की चंडी देवी के दर्शन कराता हूँ।"वाह अब घर जावत जावत फेर एक देवी के दर्शन। अभनपुर ले सात किलोमीटर म राजू ड्राइवर के घर रहिस हे अउ ओखर घर के बाद ही चंडी मंदिर रहिस हे। हमन मंदिर गेन। बहुत बड़े  मंदिर रहिस हे।  बहुत ही खूबसूरत मूर्ती रहिस हे। बहुत ही व्यवस्थित मंदिर रहिस हे। उहां कथा के संग संग नाचा घलो चलत रहिस हे। सालों बाद हमन नाचा देखेन।  देवी म चढ़े साड़ीमन ल तुरंत बेचत रहिन हें। 100,150,200₹ कीमत रहिस हे। कन्या भोज बर 300₹ अउ भंडारा बर 100₹ रखे गे रहिस हे। हर मनखे पइसा देय के हिम्मत कर सकत रहिस हे। इहाँ ले निकल के हमन  कमल विहार ले होवत साढ़े नौ बजे रायपुर पहुँच गेंन।


एक लम्बा यात्रा अउ चार दर्शनीय स्थल ल एक ही दिन म शांति के साथ घूम लेन। मौसम ह साथ दिस, बदली रहिस, बारीश घलो होगे। भगवान ह मोर दिल के पूरा ध्यान रखिस।  मोर संगवारी मन संग तीस बछर  के साथ रहिस हे तभे तो ये कठिन यात्रा ल पार लगा दिन। शायद ये दोस्ती उपर घलो इंद्र देव खुशी म बरस परिस होही।

सुधा वर्मा, रायपुर

28/3/2023

चम्पा के महक - डुमन लाल ध्रुव

 चम्पा के महक

                    - डुमन लाल ध्रुव 

सहर के बिहान धीरे-धीरे खुलत रिहिस। रात भर के ठंडक अभी हवा मा बाकी रिहिस। सड़क किनारे पेड़ के पत्ता हा हल्का हल्का सरसरावत रिहिन। दुकान के शटर उठत रिहिन, चाय के ठेला मा केतली खदबदात रिहिस  अऊ लोगन मन अपन-अपन जिनगी के दउड़ मा निकलत रिहिन।

इही रोज के हलचल मा एक आवाज रोज गूंजत रिहिस -

“पांच के दस… पांच के दस… दीदी, बस दू फूल ले लो…”

मोड़ के किनारे खड़े रिहिस एक झन लइका।

दुबला-पतला, काला-कलूटा रंग, फटा-पुराना पैंट। ओखर हाथ मा एक नानचुन डलिया रिहिस। डलिया मा पीयर-पीयर चम्पा के फूल सजे रिहिन। ऊपर गीला कपड़ा ढंकाय रिहिस  फेर फूल के महक अइसन के जेन मनखे हा तीर ले गुजरे ओ एक पल बर ठहर जात रिहिस।

ओ लइका के नाव रिहिस मुरहा।

मुरहा के चेहरा साधारण नइ रिहिस। ओखर होंठ जनम ले थोड़ा कटे फटे रिहिस। बोलत बखत शब्द मन साफ नइ निकलत रिहिन। फेर ओखर आंख मा अइसन चमक रिहिस जइसे जिनगी के दुख-तकलीफ के बावजूद ओ हारना नइ जानत होवय।

सुमीता रोज उही रद्दा ले ऑफिस जावत रिहिस।

जइसे वोहर मोड़ मा पहुंचत हे ।  

 मुरहा दौड़ के ओखर लुगरा के अंछरा ला पकड़ लेथे -

“दीदी… बस दू फूल…”

पहिली-पहिली सुमीता झुंझला जावत रिहिस।

“अरे, कितनी बार कहा है… मत पकड़ा करो।”

फेर मुरहा हर बार मुस्कुरा देथे।

अऊ आखिरकार सुमीता हार जाथे।

चलते-चलत फूल ले लेथे अऊ एक रुपिया ओखर हथेली मा धरा देथे।

धीरे-धीरे ए सिलसिला रोज के होगे।

अब हालत ये होगे के अगर एक दिन मुरहा नइ दिखय त सुमीता ला खुद कुछ अधूरा-सा लगय।

कभू-कभू ओखर तीर छुट्टा पइसा नइ रहितिस तब भी मुरहा हा फूल दे देत रिहिस।

“कोनो बात नइ दीदी… कल दे देबे।”

सुमीता सोचय -

गरीबी मा रहिके भरोसा करना…

ए काम तो बड़े-बड़े अमीर मन भी नइ कर पावत हे।

मुरहा के जिनगी मा कोनो ठिकाना नइ रिहिस।

दिन भर बजार मा घूमना, फूल बेचना अऊ रात मा जिहां जगह मिल जावय वहीं सो जाना।

कभू दुकान के आगू, कभू सीढ़ी,

कभू फुटपाथ।

बरसात मा भीगना, गरमी मा तपना सब ओखर जिनगी के हिस्सा रिहिस।

फेर ओ हंसना नइ छोड़िस।

कभू सड़क किनारे चरईया भंइस के पीठ मा चढ़ जाथे अऊ फिल्मी गाना गाथे।

लोगन हांस देवे।

फेर ओला कोनो फरक नइ पड़त रिहिस।

जइसे जिनगी ओखर बर अभी भी खेल हवय।

एक दिन बजार मा अलग रौनक रिहिस।

ईद के दिन रिहिस।

दुकान मा भीड़, मिठाई के खुशबू, नवा कपड़ा पहिरे लोगन मन के रेलम पेल।

सुमीता सामान लेके घर लहुटत रिहिस।

तभी सामने एक लड़का दिखिस - नया पैंट, नई कमीज।

पहिली नजर मा सुमीता पहचान नइ पाइस।

फेर ओ हांसत किहिस -

“दीदी… देखो हमर नया कपड़ा!”

सुमीता चौंकगे -

“अरे… मुरहा !”

मुरहा खुशी ले बताइस -

“आज हमको ईदी मिला हे… देखो पइसा भी हे।”

सुमीता अपन पर्स ले सौ रुपिया निकालिस।

“ये मेरी तरफ से ईदी।”

मुरहा के आंखी चमक उठिस।

अतके मा कपड़ा दुकान के सेठ दउड़त आइस।

ओ झपट के मुरहा ला पकड़ लिस अऊ थप्पड़ जड़ दिस।

“चोर! मेरे पैसे चुरा ले गया!”

भीड़ जमा होगे।

मुरहा रोवत किहिस -

“नइ दीदी… हम नइ लेहेन…”

सुमीता आगे बढ़िस -

“पहले देख तो लीजिए।”

इतने मा सेठ के भतीजा दउड़त आइस - 

“मामू! आपने तो घर में अभी मुझे पांच सौ रुपये ईदी दिए थे।”

सेठ के चेहरा उतरगे।

भीड़ मा सन्नाटा छागे।

मुरहा के आंखी मा आंसू भरगे।

ओ धीरे-धीरे अपन नई कमीज उतारिस अऊ सेठ के मुंह मा फेंक दिस -

“ले लो… हम नइ मांगत हन तोर कपड़ा… कल कहिबे के ये भी चुरा लिया…”

ओखर आवाज कांपत रिहिस।

गरीबी ओखर जिनगी ला छोट जरुर कर दे रिहिस, फेर ओखर आत्मसम्मान अभी भी जिंदा रिहिस।

सुमीता के मन भीतरी तक 

भीगगे।

ओ मुरहा के हाथ पकड़ के सामने दुकान ले एक नई कमीज खरीद के दिस।

मुरहाइ के चेहरा खिल उठिस।

जइसे बरसात के बाद धूप निकल जाथे।

फेर ओ अपन जेब ले एक पांच रुपिया के सिक्का निकालिस अऊ सुमीता के हथेली मा धरा दिस -

“दीदी… ये हमर तरफ से ईदी।”

मीता के आंखी भरगे।

ओ सिक्का ला अपन होठ ले छू के रख लीस।

सामने आइसक्रीम वाला आवाज लगावत रिहिस।

सुमीता पूछिस -

“ मुरहा… आइसक्रीम खाबे?”

मुरहा हंस के सिर हिला दिस।

दूनों सड़क किनारे खड़े-खड़े आइसक्रीम के मजा लेवत रिहिन।

मुरहा हांसत किहिस -

“दीदी… आज चम्पा के फूल नइ मिलिस…”

सुमीता मुस्कुराइस -

“कोनो बात नइ… कल ले आना।”

संझा के हवा मा अइसन लगत रिहिस जइसे चम्पा के फूल के महक सचमुच फइलगे हवय।

सुमीता मने  मन सोचत रिहिस-

 ये दुनिया मा

जिहां लोग हजारों रुपिया के पीछे भागथे,

ओही दुनिया मा एक गरीब 

लइका पांच रुपिया के सिक्का ले इंसानियत के सबसे कीमती तोहफा दे देथे।

शायद सच्चा अमीर ओही होथे

जेखर दिल मा अभी भी सम्मान अऊ अपनापन जिंदा रहिथे।

         - डुमन लाल ध्रुव 

      मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

          पिन - 493773