Wednesday, 13 May 2020

मुहाचाही : गुड़ाखू अउ नून (धनराज साहू, खोपली बागबाहरा)


मुहाचाही ....गुड़ाखु अउ नून...

परन दिन साँझकुन नोनी के दाई के मोबाइल घनघनाइस...अपन आदत अनसार दँवड़त आइस।मैहर हर बार के जइसे टोकेंव,देख के बाई बिछल-बिछली जाबे।फेर वहु हर घाँव जइसे मोरो बात ला अनदेखी करके, सड़दंग आँट म रखे मोबाइल के घेंचउरी ला दबाइस कहिस...हलो.. हलो &&&....हाँ बहिनी अब्बड़ दिन म लगाय या।अउ का-का करत हो,अभी तो घरे म होहू... लोग लइका अउ दमांद बने हे।का बताँव बहिनी काली के हावा-गरेरा म हमर जम्मो आमा झरगे.. पेंड़वा फरकके बहिनी।पारा के गढ़ऊना टुरा मन लाहो लिन, अउ अब बाँचे-खोंचे ला दुखाही धूंका खा डारिस।सबो ला सकेल के लटपट बने-बने ला काट-पऊल के अथान डारेंव अउ गिरे-फूटे ला खुला कर दे हों।
      अब ओती ले ...हाँ दीदी सब बने-बने ओ...बस दुखाही कोरोना हा घर खुसरी बना देहे।घरे के काम बुता हा बाढ़गे बहिनी..दिन रात रँधइ -गढ़ई ...कपड़ा लत्ता, धोवइ-पोंछइ तो...अउ हमर भाँटो कइसे हे.. लइका मन बने तो हावे।भाँटो तो लॉक डाउन में घोस-घोस ले होगे होही ,खा-खा के।महुँ गाँवे म आमा लेके अथान डारे हौं।ये रोगही कोरोना तो सबो जिनीस ला महँगी कर देहे।अउ ये दुकान वाला मन के बरवाही आगे हे।असमान ले उप्पर बेचत हे गड़ऊना मन हा।आलू गतर ला 30 रुपिया,गोंदली तो रोवा डारिस बहिनी।हमर पारा के दुकान वाला तो लाहो लेथे बहिनी...अई सुन न दीदी तुँहर डाहर गुड़ाखु मिलत हे या।
   अरे नहीं रे बहिनी तोला का दुख ला बताँव ,गाँव भर के दुकान में खोजवा डारेंव फेर काकरो करा नइये।होही नहीं ओ आधा तो जलन खोरी म नई दे बहिनी महीना के राशन ला बागबाहरा ले लानथन ।ओकरे चीड़ म हमन ला नई दे।अउ भीतरे-भीतर अपन ग्राहिक मन ला  60-60 रुपिया म देवत हें कथे। अरे हमला 65 में दे देतिस...फेर उही जलन खोरी...त तोर भाँटो ला बागबाहरा भेजेंव ,काकर करा लें दू पुड़ा आनिसे... काहत रिहिस...36-36 रुपिया परे हे एक ठन हा... अउ गाँव वाला मन ला देख कइसे लूट मचाय हे दोखहा हा।अब गाँव वाला मन ^मरता का न करता^..बिचारा-बिचारी मन लेवत हवें।हम तो अउ नई रही सकन बहिनी ..हमला दु बेर चहा अउ 4 बेर मँजन होना..भले खाय बर मिले मत मिले दाई।
    हव दीदी हमरो घर तोर दमाँद उड़ीसा बार्डर जाके सराबोंग ले बड़े 5 किलो वाला डब्बा ला आने हे।ओतो ओकर सँगवारी उहें बुता करथे कहिके जुगाड़ होगे।भले बपरा रेट लिस तो लिस फेर अपन समझके दे दिस, नई ते ओमन दुकान वाला मन ला ही देवत हे।हमर गाँव के एक दुकान वाला तो उही डब्बा वाला गुड़ाखु ला जुन्ना सकेले डबिया म डारके 20-20 रुपिया म बेचत हे, तभो सबो झपा परत हे।
  अई हव बहिनी का गोठ ला गोठियाबे मोला तो धुक-धुकी धर डारे रिहिस,गुड़ाखू के नाम में।फेर ओकर पापा फिकर करके खोज-ढूँढ़ के आनिसे।हमर परोसिन गुलापा ला जानथस न...उही तोरई मुँहू के...बहिनी वहू ला माँग डारेंव ..होही तो एको डबिया दे न बहिनी कहिके..फेर बइरी चनचनही हा मुँहू ओथारे नई ये कहिस।अउ साँझ कुन वहा मार घँसर-घँसर के गुड़ाखु करत रिहिस।में नइ भूलों बहिनी ओकर ठेसरा मरई ला।
   ले दीदी कूछु नई होय,भाँटो तो अब्बड़ असन लान देहे तोर बर... अब ते देखाबे टूहूँ ।
टूहूँ निहि बहिनी मेंहा उधार नी राखों, कालिच्चे सब पारा भर बता देंव,मोरो करा आगे गुड़ाखू...&&&..हिहिहिहि...देख न बहिनी मोला नइये किहिस।
  अई सुन तो बहिनी गोठ बात म भुलागेंव हमर इँहा तोर दमांद कहत रिहिस की नून घला बजार म सिरागे हे, कँहुचो नई मिलत हे।ले देके 5 पाकिट ला चुपे चाप दुकान वाला चूतिया बनाके आने हे, अभी गाँव म कोनों ला पता नइये न।गाय-गरवा के पसिया बर 1 बोरी घला लानिसे.... फेर ओ दुकान वाला जान गे लागथे...1 किलो के 100 रुपिया लिसे।अब कइसे करबे बहिनी बिगन नून के
साग-डार अउ पानी-पसिया कूछुच नई मिठाय।तंहुँ हा कलेचुप भाँटो ला कहिके गाँव के दुकान ले काकरो करा जतका मिले लेइच ले।एकर पहिली की कोई अउ जाने ,मँगवाईच ले,रेट ला झन देख बहिनी।
   अई हाय नोनी बने करे दाई बता देस,एकर पापा तो निच्चट भोकवा आय ओ,दुनियादारी ला नई जाने।बस अपन मस्त राम परे रहिथे।घर के चिंता मोर बोझा बहिनी... नई बतांव बहिनी कोनो ला अउ झटकुन नून मँगवाथों।

कहानीकार:- धनराज साहू,खोपली बागबाहरा

Wednesday, 6 May 2020

आलेख कोरोना संकट अउ पर्यावरण



कोरोना संकट अउ पर्यावरण

आज कोरोना वायरस ले जनमिस महामारी हा वैश्विक समाज अउ प्रशासन के जम्मो कमजोरी ला उजागर कर दिहिस हे अउ संगे संग ए खतरनाक संकट ले आधू बढ़े के डहर घलो देखाइस हे ।कोविड 19 के ये खतरनाक बीमारी जेन समय के पहिली मनखे के जिनगी मा हावी होगे हावै,अइसन संकट जेन मानव जाति ला क्षिन भर मा नष्ट कर सकत हे ये संकट मानव जिनगी ला आर्थिक विकास,सामाजिक,राजनीतिक जम्मो डहर ले प्रभावित करत जात हे।ते पाय लाकडाउन हा लंबा समय तक अइसनहे बने रहि त दुनिया मा निराशा,तनाव,चिंता जइसन गंभीर मानसिक बीमारी के बाढ़ आ जाही जेन व्यक्तिगत के साथ साथ दुनिया मा सामाजिक, आर्थिक विकास मा बाधा उत्पन्न हो जाही।कोरोना बीमारी के प्रभाव ले कम अउ आर्थिक समस्या के भार ले मानुष के मनोदशा बिगड़ जाही।
ये कोरोना काल विश्व बर एक अइसे संकट हे जेन भविष्य ला सोचे बर मजबूर कर दिये हे, कोरोना वायरस के संक्रमण ले पूरा दुनिया मानो थम से गये हे स्कूल-कॉलेज अउ यात्रा मा पाबंदी, मनखे के एक जगा इकट्ठा होय मा पाबंदी,ए जम्मो पाबंदी ले मनखे कोनो न कोनो रुप मा प्रभावित होत हे। एहा एक बीमारी के खिलाफ बेजोड़ वैश्विक प्रतिक्रिया हे। प्रश्न ये उठत हे के का लाकडाउन हा खतम हो जाही ओखर बाद भी मनखे हा का अपन पुराना दिनचर्या अउ कोरोना के डर ले साधारण जिनगी ला अपना पाही....?
का लाकडाउन ले जेन अर्थव्यवस्था आज मानो थम गये हे ओला भुलाके सुग्घर जिनगी जी पाही..?
दूसर पक्ष मा ए लंबा समय तक अइसे स्थिति बने रही अउ पाबंदी लगे रही त सामाजिक और आर्थिक नुकसान विध्वंसकारी हो जाही। प्रतिबंध समाप्त होय म घलो मानव जिनगी मा ये संकट बरोबर बने रही। संकट ले संक्रमित होय के कारण अनजान मनखे के रोग प्रतिरोधक शक्ति घलो बढ़ सकत हे फेर अइसन होय मा बहुत समय लग सकत हे। एखर लिए हमला सतर्कता के ध्यान रखके हमला दूसर के स्वास्थ्य मा घलो ध्यान देहे ला परही जेखर ले हम ए संकट ले लड़े बर कुछ भागीदारी निभा सकथन।
ये संकट हा अतका जल्दी समाप्त होय के कगार म नइ दिखत हे एखर लिए वैक्सीन बन जाही तभो ले हमला सावधानी अपनाये ल परही,सावधानी ले जिनगी बिताना परही। फेर दू साल तक ए लाकडाउन रही त देश के एक बड़े हिस्सा संक्रमित हो जाही।

विकास के अंधा दउड़ मा भुइँया अउ पर्यावरण के हमन जेन हाल करे हन ओ बीते चार दशक मा चिंता के विषय बने हुए हे फेर विकसित देश अपन जिम्मेदारी निभाये के अलावा विकासशील देश मन बर हावी होवत हे अउ विकासशील देश घलोक विकसित देश मन के डहर मा रेंगत हे अउ पर्यावरण ला नष्ट करत जात हे। पृथ्वी सम्मेलन के 28 साल बाद भी हालात जस के तस रहिस। अइसन लागथे फेर कोरोना महामारी ह विश्व के मनखे मन ला स्वस्थ होय के अवसर दे दिये हे।हवा के जहर कम होगे हावै अउ नदियाँ के जल निर्मल होगे हे।भारत मा जेन गंगा ला साफ करे के अभियान कई साल ले चलत आत हे बीते 5 साल मा लगभग 20000 करोड़ रुपया खर्च करिन हावै तभो ले साधारण सफलता तक नइ दिख पाइस हे। उही गंगा हा लॉकडाउन मा निर्मल बना दिहिस हे।वइसनहे चंडीगढ़ के हिमाचल मा हिमालय के चोटी घलोक दिखे लागे हे । औद्योगिक आय के दर हा जरूर सात फ़ीसदी ले दू फ़ीसदी मा आ गिरीस हे, अर्थव्यवस्था खतरा मा हे,लेकिन इही समय हे के पूरा दुनिया पर्यावरण अउ विकास के संतुलन बर उतके गंभीरता अउ गहराई ले सोचही जतका आज कोरोना संकट ले निपटे के सोचत हावै।

आलेख - आशा आजाद
मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

Saturday, 2 May 2020

पुरखा के सुरता - श्रद्धेय केयूर भूषण



पुरखा के सुरता - श्रद्धेय केयूर भूषण

जुन्ना पुराना चिट्ठी मन घलो अपन आप मा एक इतिहास होथें। बाबूजी के नाम मा श्रध्देय केयूर भूषण जी के दू पोस्ट कार्ड मोर तीर रखाए हे। एक चिट्ठी मा 19 मार्च 1957 के डाकघर के ठप्पा लगे हे। प्रेषक मा आदरणीय खूबचन्द बघेल जी के नाम घलो हावय। "छत्तीसगढ़ी महा सभा" के एक बछर बाद खास मुद्दा ऊपर चर्चा करे खातिर कार्यकर्ता मन बर दू दिवसीय बैठक के सूचना आय। ये चिट्ठी बतावत हे कि "छत्तीसगढ़ महा सभा"के गठन 1956 मा होय रहिस। ये सभा के कार्यकर्ता जम्मो छत्तीसगढ़ के रहिस।

दूसर चिट्ठी 29 जनवरी 1966 के लिखे आय जेमा डॉ. खूबचन्द बघेल जी के निवास स्थान मा छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन के अस्थाई बैठक के सूचना दे गेहे। ये बैठक मा सदस्य के अलावा 22 झन विशेष व्यक्ति मन ला घलो आमंत्रित करे गे रहिस। ये दुनों चिट्ठी मन मोर बर अनमोल धरोहर आँय।

स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, पूर्व सांसद, पत्रकार, छत्तीसगढ़ी साहित्यकार केयूर भूषण जी के जनम 01 मार्च 1928 के अउ दू बछर पहिली आजे के दिन माने 03 मई 2018 के उनकर निधन होए रहिस।

छत्तीसगढ़ी साहित्य मा उनकर योगदान ला कभू भुलाए नइ जा सके। उनकर कृति के विवरण -

सोना कैना (नाटक) मोंगरा (कहानी) बनिहार (गीत) कुल के मरजाद (छत्तीसगढ़ी उपन्यास)  कहाँ बिलम गे मोर धान के कटोरा (उपन्यास) लोक लाज (उपन्यास) समे के बलिहारी (जाति व्यवस्था आधारित उपन्यास)  नित्य प्रवाह (प्रार्थना और भजन) लहर (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह) कालू भगत (कहानी संग्रह) आँसू मा फिले अँचरा (कहानी संग्रह) हीरा के पीरा (निबंध संग्रह) डोंगराही रद्दा (कहानी संग्रह) छत्तीसगढ़ के नारी रत्न, मोर मयारुक।

केयूर भूषण जी साप्ताहिक छत्तीसगढ़, साप्ताहिक छत्तीसगढ़ सन्देश, त्रैमासिक हरिजन सेवा (नई दिल्ली) मासिक अंत्योदय (इंदौर) के संपादन घलो करिन।

छत्तीसगढ़ी भाषा मा उनकर लिखे एक सुप्रसिद्ध गीत -

तैंहर छोटे झन जानबे भइया एक ला।
एकक जब जुरियाथें लग जाथे मेला॥

एक्के भगवान ह जग ला सिरजाये हे
एक ठन सुराज ह, अँजोर बन के छाये हे
सौ बक्का ले बढ़ के होथे एक लिख्खा
गठिया के धरे रिबो मोरो ये गोठ ला।

भिन्ना फूटी ले होथे एक मती
कोटिक लबरा ले बढ़ के होथे एक जती
सब दिन के पानी तब एक दिन के घाम
बाटुर उलकुहा ले बढके एक दिन के काम
खाँडी भर बदरा अऊ एक पोठ धान।

रस्ता बना लेथे अकेल्ला सुजान
सौ सोनार के तब लोहार के होथे एक
सौ भेंड़ी ला चरा लेथे गडरिया एक
एक एक बूँद सकला के भर जाथे तरिया
एकक हरिया जोत टूट जाथे परिया

एक मा गुन अनलेख भरे हे कतेल ला मैं गिनावँव
सूवा होय तेला रटन कराबे मनखे ला कतेक लखावँव

(रचनाकार - श्री केयूर भूषण)

आलेख - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़
03 मई 2020

Saturday, 18 April 2020

महामानव - डॉ अंबेडकर



                        महामानव - डॉ अंबेडकर

           समता, समानता, बंधुत्व, मानवता हमर संविधान के मूल तत्व आय ।इन मूल तत्व के बिना हमर संविधान के वो महत्व नई रह जाही जेखर कारण हमन अपन संविधान  मा गर्व करथन।

भारत जइसे बड़े देश जेमा कई धर्म, भाषा,बोली,प्रान्त हे अइसन देश ला एकता के सूत्र मा  बाँँधे मा हमर संविधान के बहुत बड़े योगदान हे।हमर देश के संविधान जेहा दुनिया के सबले बड़े लिखित संविधान आय ,ऐखर निर्माण के श्रेय जिन महापुरुष ला जाथे वो महापुरुष आयँ महान  चिंतक, समाजसुधारक, युगदृष्टा डॉ भीमराव अंबेडकर जी, जेला बाबा साहेब के नाम से घलो जाने जाथे।

14 अप्रैल 1891 मा वर्तमान मध्यप्रदेश के महू नाम के स्थान मा डॉ अम्बेडकर जी के जनम होईस।इंखर पिताजी रामजी मर्लोजी महू छावनी मा सूबेदार रहिन।इंखर पुरखा मन ब्रिटिश सेना मा रहिन ।बचपन ले ही आर्थिक ,सामाजिक, भेदभाव के शिकार होना पडिस।इंखर जन्म महार ( दलित) जाति मा होए के कारण से स्कूल मा पढ़ाई के दौरान जो भेदभाव के सामना करना पड़िस जेखर,बालक अम्बेडकर के मन मा गहरा प्रभाव पड़िस और यही समय मा हिन्दू समाज मा व्याप्त छुआछूत जातिप्रथा जैसे बुराई के खिलाफ संघर्ष के बीज पडिस ।                                                                 
1907 मा मेट्रिक करे के बाद  1908 मा एलफिंस्टन काँलेज मा प्रवेश लेवइया पहली दलित छात्र बनिन ।
1912 मा बॉम्बे यूनिवर्सिटी ले अर्थशास्त्र  अउ राजनीति शास्त्र  मा बी.ए. करे के बाद  लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ले एम .ए .करिन । भारत आके भारतीय समाज मा व्याप्त जाति प्रथा जइसे बीमारी ला दूर करे के कोशिश शुरू कर दिहिन।

शुरुआत उपेक्षित वर्ग  जेला  दलित कहे जावे तेला जागरूक करे ले होइस। उपेक्षित वर्ग के पीरा ला दर्शाए बर अउ वो वर्ग ला जागरूक करे बर बहिस्कृत भारत, मूक नायक ,जनता जैसे पत्र पत्रिका निकालिंन । उपेक्षित वर्ग के प्रति होवइया
अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाए बर 1936 मा लेबर पार्टी के गठन करीन । 29 अगस्त 1947 मा डॉ अंबेडकर ला भारतीय संविधान सभा मा प्रारूप समिति के अध्यक्ष चुने गइस , प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने के बाद मा संविधान के निर्माता के रूप मा बाबा साहेब जी हमर संविधान के रूप मा हमन ला अमूल्यनिधि दिहिन ।  अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता के अंत दिए गइस। हमर संविधान के प्रस्तावना ,मौलिक अधिकार जेमा समानता के अधिकार भी शामिल हे ,अउ नीति निर्देशक तत्व बाबा साहेब के विचार के दरपन आय।बाबा साहेब आज़ाद भारत के पहिली कानून मंत्री बनीन ।संविधान निर्माण मा बाबा साहेब के योगदान के कारण मरणोपरांत भारत के सबले बड़े पुरस्कार भारत रत्न ले सम्मानित करे गइन।
            आज महानायक के जनम दिवस के अवसर मा हम सब उंखर दिखाए रद्दा मा चल के हमर देश ला विश्व मा महाशक्ति बने के उदीम करिन इही हम सब देश वासी के महानायक ला सबले बड़े  श्रद्धांजलि होही।

आलेख - चित्रा श्रीवास
             कोरबा छत्तीसगढ़

Saturday, 8 February 2020

रेखा रे रेखा - अरुण कुमार निगम

“रेखा रे रेखा”……

(छत्तीसगढ़िया मन बर छत्तीसगढ़ी आलेख)

रेखा…...ए शब्द ला सुनके हिन्दी सिनेमा के खूबसूरत हिरोइन के सुरता आगे का ? मँय ओ रेखा के बात नइ करत हँव, गणित के रेखा के बात करत हँव। स्कूल के जमाना मन-गणित ले चालू होइस फेर अंक-गणित, बीज-गणित संग जूझत-जूझत रेखा-गणित तक आइस। रेखा-गणित मा गुरुजी पढ़ाए रहिस कि रेखा दू किसम के होथे। सरल-रेखा अउ वक्र-रेखा। सरल-रेखा के परिभाषा रहिस - दू बिंदु के बीच के कम से कम दूरी ला सरल-रेखा कहे जाथे। स्कूल छूट गे। कॉपी-किताब छूट गे। रेखा-गणित के कम्पास के संगेसंग स्केल, प्रकार, चाँदा, गुनिया, सीस अउ रबर तको छूट गे फेर रेखा के संग नइ छूटिस।

जिनगी मा जेती देखव तेती रेखा च् रेखा दीखथे फेर गुरुजी के बताए वो दू बिंदु नइ दिखैं जेकर बीच मा कम से कम दूरी नापे नापे जा सके, तिही पायके ये जमाना मा सरल-रेखा नइ दिखय। भाई-भाई के बीच, बाप-बेटा के बीच, पति-पत्नी के बीच, अड़ोसी-पड़ोसी के बीच, कहूँ मेर नाप के देख लव, कम से कम दूरी वाले सरल-रेखा नइ दिखे। हाँ, दिखावा बर कहू तो दुनों बिंदु जरूर एक दिख जाथे फेर ये आँखी के भरम के सिवा कुछु नइये। रेखा के बात चलिस तो लक्ष्मण-रेखा के घलो सुरता आगे। पंचवटी मा रेखा के भीतरी मा सीता मैया अउ रेखा के बाहिर मा साधु के भेस धरे रावण। ढोंगी साधू ऊपर सीता मैया भरोसा करके लक्ष्मण रेखा ला पार कर डारिस। बाकी के किस्सा ला आप मन जानत हव।

आज घलो अमीर-गरीब के रेखा खिंचाए हे। देश के आजाद होए के बाद अपन संविधान लागू होइस। हर नागरिक ला समान अधिकार मिलिस फेर अमीर-गरीब के परिभाषा कोन गढ़ डारिस ? मनखे-मनखे के बीच मा रेखा कोन खींच दिस ? अतको मा मन नइ माड़िस तब गरीबी-रेखा के नामकरण होगे। लोकतंत्र के एखर ले बड़े मजाक का हो सकथे कि इहाँ के स्वतंत्र नागरिक ला गरीबी-रेखा के कार्ड बनाना जरूरी होगे। जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन - लोकतंत्र के इही तो आय परिभाषा। का इही दिन देखे बर हम जन प्रतिनिधि के चुनाव करथन ? हमन जन प्रतिनिधि मन ला ये सोच के वोट दे रहेन कि एमन जनता के सेवा करहीं।कुर्सी मा बइठे के बाद इंकर तीने काम रहि जाथें - शिक्षा, स्वास्थ्य अउ सुरक्षा । एखर अलावा हमर कहे अनुसार सरकार चलावँय। लेकिन उल्टा होगे। कुर्सी मा बइठ के इन मन राजा होगें अउ इन मन ला कुर्सी मा बइठइया मन धुर्रा माटी।

गरीबी रेखा के कार्ड बनवावव, अमका कार्ड बनवावव, ढमका कार्ड बनवावव तब ये मिलही अउ वो मिलही। अच्छा एक बात अउ… गरीबी-रेखा कहे ले स्टैण्डर्ड नइ लागे तब ओखर अंग्रेजी मा नामकरण कर दिन “बी पी एल कार्ड”। ए कार्ड ला बनाने वाला मन खुदे नइ जानँय कि बी पी एल काला कथें। अजीब रिवाज चलत हे हमर देश मा। अपन जनता के सुध नइये अउ अमेरिका, जापान जइसन आने-आने देश ला नेवता देवत हें कि हमर इहाँ आवव,नवा नवा कारखाना अउ उद्योग लगावव। हमन सस्ताहा मजदूर होगेन। अपने देश मा आने आने मन ला मालिक मानत रहिबो। माने मालिकाना हक बिदेसिया के अउ हमन कुली-कबाड़ी। कभू सुरता कर लव कि गाँधी बबा हर बिदेसी कपड़ा के होली काबर जलाए रहिस?

कोनो चाँउर दे के काहत हे - *चल रे - खा* । कोनों चप्पल बाँटत हे, कोनो साइकिल बाँटत हे त कोनो लैपटॉप अउ मोबाइल बाँटत हे। अब तो नगदी रुपिया घलो खाता मा जमा करे के घोषणा होवत हे। हमरे पइसा ला हमीं ला बाँट के एहसान जतावत हे। झन दे भइया चाँउर, चप्पल, साइकिल, मोबाइल अउ लैपटॉप झन दे। किसान मन के खेत मा पानी भर के व्यवस्था कर दे, बाकी इही किसान मन अपन अपन गाँव मा ये सबो जिनिस ला बिसाए के लाइक हो जाहीं अउ बखत परे मा अपन कमाई ले बाँट तको दिहीं।

आप मन सोचत होहू कि बात तो रेखा के करत रहिस अउ रेखा कोन डहर भटक गे ? मन के पीरा हे भइया। पीरा मा बड़े-बड़े मन भटक जाथें, मोर गिनती कहाँ हे?
भटकाव आए जाथे भाई, जब “भारत” हर “इंडिया” बन जाथे, तब भटकाव आथे,जब “गरीबी रेखा” हर “बी पी एल” बन जाथे, तब भटकाव आथे। जब जन-सेवक हर एम पी, एम एल ए, मिनिस्टर, सी एम, पी एम बन जाथे, तब भटकाव आथे।

हाथ के रेखा, माथ के रेखा, पाँव के रेखा पढ़इया के कमी नइये, फेर लोकतंत्र बर किसान के चेहरा के रेखा ला पढ़ने वाला चाही, मजदूर के हाथ मा सुख के रेखा खींचने वाला चाही, बी पी एल के रेखा ला मिटाने वाला चाही। बिदेसी मन ला नेवता दे के जघा अपने बलबूता मा अइसन कारखाना अउ उद्योग लगाने वाला चाही जउन मा चेहरा के झुर्री मिटाए बर नइ, भारत के जनता के चेहरा ले चिन्ता के रेखा मिटाए वाला फेसक्रीम तैयार हो। जनता ला घलो अब तिर्यक रेखा बने ला पड़ही जउन हर दल के समानांतर रेखा ला अइसन काटय कि एकांतर अउ सम्मुख कोन असन अमीर अउ गरीब, बराबरी मा आ जावै।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Sunday, 26 January 2020

माई चिरई - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


कहानी-माई चिरई


              छन्नू रतिहा बेरा अँगना म लाल लाल गमकत दसमत फूल तरी खटिया बिछाके,अगास म रिगबिगात  चंदा अउ चंदैनी ल फुर्सत म निहारत सोचत रहिथे कि, जिनगी के बाँसठ बछर देखते देखत म गुजरगे, अउ आज मैं अपन नवकरी ले छुटकारा पा चुके हँव।फेर उही बीते बछर के सुरता करत डाकिया बाबू छन्नू के आँखी ले आँसू तरतर तरतर झरे ल लग गिस।वोला अइसे लगत रिहिस कि कालीच तो पट्टी बस्ता धरके ददा दाई के दया मया अउ सपना ल गाँठियाय स्कूल जावत रेहेंव।कालीच तो छन्नू भैया कहिलावत गली गली घूम घूम के चिट्टी पत्री बाँटत रेहेंव,फेर कब छन्नू भैया ले छन्नू बबा होगेंव,तेखर पता घलो नइ चलिस।छन्नू ल लगिस कि सुख के पल अउ कामबूता म खुद ल घलो बरोबर टेम नइ दे पायेंव,त का अपन सुवारी देवकी अउ एकलौता बेटा सुमेर ल टेम दे पाये होहूँ।सुमेर कभू कभू अर्दली करे फेर देवकी छन्नू ल देख बड़ खुश होवय अउ बरोबर दया मया लुटावव। "होनहार बिरवान के होत चिकने पात" ये हाना छन्नू उप्पर एकदम फिट बइठे काबर कि छन्नू बचपन ले बनेच हुशियार अउ संस्कार वान लइका रिहिस।पढ़ाई लिखाई के तुरते बाद जइसने दाई ददा संग जम्मो गाँव वाले मन कहय कि छन्नू पढ़ लिख के नवकरी करही,वइसनेच छन्नू अपन गाँव भर म सरकारी नवकरी करइया पहली लइका बनिस अउ डाकविभाग म पोस्टमैन के नवकरी पाइस। कामबूता बर छन्नू बड़ चंगा अउ चोक्खा रहय,अपन जम्मो काम ल लगन अउ ईमानदारी ले करे।नवकरी पाये के पहिली भी छन्नू के गाँव म बड़ मान गउन होवय,त नोकरी लगे के बाद का कहना? फेर छन्नू ल कभू गरब गुमान अपन चंगुल म नइ फँसा सकिस।रोज जब छन्नू  कामबूता निपटाके अपन घर आवय तब वोहा गाँव गुड़ी अउ चौपाल म  बरोबर टेम देवय,संगे संग जम्मो बड़का सियान मनके आशीष घलो लेवय।घर म घलो रोज एक दू घण्टा सुमेर ल पढ़ावय अउ झट खा पी के सपरिवार सुत जावय।पहाती पहली छन्नू जागे अउ ओखर आरो ल पाके बाद म कुकरा बासे, चिरई चिरगुन घलो बाद म चहचहावय।छन्नू घर के कामबूता म हाथ बँटावय तेखर बाद नहाखोर के, नास्ता पानी करके,साइकिल ओंटत ऑफिस कोती चल देवय।

             छन्नू के सुवारी देवकी अपन आप ल बड़ भागी माने कि मैं नवकरी पेशा वाले आदमी के अर्धांगनी आँव।तभे तो छन्नू के हां में हां मिलावत सदा हाँसत दया मया लुटावय अउ लइका लोग  संग घर परिवार के सेवा जतन करत दिन पहावय। रोज पहाती पहाती देवकी उठके,परछी अँगना बाहर बटोर के,चूल्हा चाकी लीप के,नास्ता पानी,खाना पीना बना पहली छन्नू ल ऑफिस बिदा करे, तेखर बाद सुमेर ल स्कूल।पति के ऑफिस अउ लइका के स्कूल जाये के बाद  भी देवकी अपन आप ल कभू अकेल्ला नइ  पाइस।वो अबड़ लगन अउ आनन्द के संग जम्मो बूता काम ल रोजेच गीत गुनगुनावत गुनगुनावत पूरा करय।रँधई गढ़ई अउ पूजा पाठ के संगे संग देवकी कुछ समय परोसिन मन संग घलो बितावव।देवकी बिहाव होके जब ले ससुराल आय रिहिस,कभू मइके बर सुध नइ लमाइस,अउ बिचारी जाये भी त काखर मया म।ददा तो बिहाव के पहलीच गुजरगे रिहिस अउ दाई बिहाव के एक बछर बाद म।ददा दाई के मया  ल देवकी जादा दिन नइ पा सकिस,तेखरे सेती सदा पतिप्रेम म डूबे रहय,अउ ससुराल म ही अपन ददा दाई के मया ल  अँचरा म गाँठियाके  दिन गुजारय।देवकी सबो गुण म सम्पन्न रिहिस, वो आज के नारी कस भले घर के चार दिवारी ले नइ निकले रिहिस फेर सिलई कढ़ई बुनई सबे काम जाने।देवकी के गुण के सबे प्रसंशा करय चाहे गाँव वाले होय या फेर छन्नू। देवकी  प्रसंशा के लइक भी रिहिस, सादा सरल स्वभाव अउ चीज बस के कोनो गरब गुमान नही।छुट्टी के दिन कभू कभू छन्नू देवकी अउ सुमेर ल घुमाये फिराये घलो।कुल मिलाके कहे जाये त जिनगी सोला आना रिहिस न कोनो चीज बस के कमी न कोनो बात के दुख।इही सुख के डोंगा म सवार दूनो प्राणी ल कब चौथा पन अपन काबा म पोटार लिस,तेखर भनक घलो नइ लगिस।

             छन्नू अउ देवकी अपन लइका सुमेर के भविष्य ल लेके अबड़ चिंतित रिहिस। ओमन चाहत रिहिस कि लइका पढ़ लिखके अपन पाँव म खड़ा हो जातिस।अउ अइसन कते ददा दाई नइ सोंचय, फेर सुमेर पढ़ई लिखई म थोरिक कमजोरहा रिहिस।बारवीं तक तो लगभग बने बने पढ़िस फेर जब कालेज पढ़े बर शहर गिस ता, ओखर आदत बिगड़त गिस। सुमेर गलत संगत म पड़के नसा पान ,अउ लड़ई झगड़ा करेल लग गिस।कालेज के दू बछर घलो ले देके बितायस, फेर तीसर बछर म बनेच बिगड़ गे अउ एक साल फेल घलो होगे।ददा दाई के चिंता बढ़ेल लग गिस।देवकी कभू कभू छन्नू ल बोले कि सुमेर के बिहाव कर देथन, जिम्मेदारी पाके सुधर जाही फेर छन्नू तियार नइ होय। वो कहय लइका जब जिम्मेदारी उठाये के लइक होय तभे बिहाव करना चाही।कभू कभू सुमेर के व्यवहार ल देख रिस म कह भले देवय कि तोर बिहाव करबों,फेर सुमेर म कोई बदलाव नइ आय। वो लापरवाह बनके घूमय फिरय दारू गाँजा पीयय अउ लड़ई झगड़ा घलो करे।जतके बढ़िया मान मर्यादा अउ नाम छन्नू कमाय रिहिस ओतको बेकार छबि सुमेर के रिहिस।गाँव के मनखे मन ताना घलो मारे कि जादा लाड़ प्यार म लइका के इही गत होथे।छन्नू अभाव अउ दुख पीरा के भट्ठी म पकके बने मनखे बने रिहिस।जब पोस्टमैन के नोकरी लगिस तब छन्नू के मन म कभू  आवय कि मोर ददा कर कहूँ अउ सब कुछ रितिस त अउ बड़े नवकरी करतेंव।फेर आज सुमेर ल देख के डर म काँप जावय ।छन्नू सुरता करथे कि भले बालपन म अभाव रिहिस, फेर दुर्गुण अउ कोनो संसो फिकर के चिटिक भी नामो निशान नइ रिहिस, पर आज चौथा पन म जब सब कुछ हे तब जबर संसो अन्तस् ल झगझोरत हे।छन्नू देवकी कर कभू कभू तो अपन दुख के गठरी ल खोलत कहि परे कि टूरा अत्तिक उछन्द अउ झेक्खर हो जही कहिके जानत रहितेंव त नवकरी के एकात बछर पहिली जान दे देतेंव, ताकि मोर जघा वोला जीविकायापन के  माध्यम तो मिल जातिस,फेर कोन जानत रिहिस ये सब करम लेखा ल। तब देवकी छन्नू के मुँह म हाथ रखके चुप करावत कहय,वाह स्वामी, फेर मोर का होतिस अउ अइसे कहिके देवकी चिल्लाके रो पड़े। छन्नू के संग देवकी घलो संसो फिकर के घानी मा लइका के गत ला देखत पेराय लग गिस।

          एकदिन छन्नू अँगना म बइठे रिहिस ओतकी बेर सुमेर नशा म धुत घर आइस।सुमेर के हाल देख के छन्नू के आँखी लाल होगे अउ बाजू म पड़े लउठी म चार घाँव जमा घलो दिस।छन्नू अउ देवकी भले आज तक गारी देवय फेर एको बेर हाथ नइ उचाय रिहिस।छन्नू कभू सोचे घलो कि कास ये लइका ल पहली ले लउठी पड़े रहितिस, त ये दिन नइ देखेल मिलतिस।सुमेर ददा ल मारत अउ खिसियावत देख गुस्सा होगे  अउ  रिसे रिस म झोला  झांगड़ी सकेल के दस हजार पइसा धरके रात कुन घर ले फरार होगे।देवकी अउ छन्नू तीर तखार ल गजब खोजिस फेर सुमेर के आरो नइ पाइस।अब जब छन्नू अउ देवकी ल सहारा के जरूरत हे तब बाढ़ें बेटा के घर ले भाग जाना कोनो गाज गिरे ले कमती नइ हे।छन्नू के चौपाल,गाँव गुड़ी सब छूट गे।छन्नू खुदे संसो म बोजाय देवकी ल दिलासा देवत बोलय कि जादा दुख झन मना देवकी,पइसा सिराही ताहन का करही, खुदे घर आ जाही। फेर महतारी अन्तस् मा भभकत संसो के आगी कहाँ बुझे? देवकी ल यहू संसो खाये की कहूँ सुमेर चोर ढोर के संगत म झन पड़ जाये, गुंडा मवाली झन बन जाय। छन्नू अपन बचपना के सुरता करत सोंचय कि जब ददा दाई अउ सियान मन गारी देवय अउ गलती म मार घलो देवय,तब हमन वो मार ले सबक अउ सीख लेवन,फेर वाह रे आज के लइका; थोरिक मार अउ फटकार म घर ल तियाग देवत हो।कोन जनी हमर असन कहूँ सबे चीज ल खुदे सिधोवत, ददा दाई के आज्ञा मानतेव तब का नइ करतेव? छन्नू के ददा दाई अपन जाँगर चलत म ही बिना सेवा जतन कराये,झट  परलोक सिधार गे रिहिस। कथे दुख म  मनखे के दिमाग चारो कोती घूमथे तभे तो छन्नू यहू सोचे कि, जब मँय अपन महतारी बाप के बूढ़त काल म सेवा नइ करे हँव त मोर बेटा बूढ़त काल म मोर कइसे हो पाही, महूँ ल अपन दाई ददा असन झट मर जाना चाही।ये सोच  छन्नू के आँखी झलकेल बर धर लेवय।छन्नू ल सुरता आवय सुमेर के ननपन के,जब वोला वो खूब मया करे,पीठ म घोड़ा चघावव,बाजार हाट अउ दुकान घुमावव।छन्नू के घर आते साँट सुमेर ओखर झोला म मिठई खोजे त ड्यूटी जाये के बेरा साइकिल ल रगड़ रगड़ के पोछें अउ बरसात घरी टायर के चिखला ल साइकिल के पैडल  ल हाथ म चला चला बड़ मजा लेके निकालय।सुमेर शुरू शुरू  म पढ़ई म बने रिहिस,कभू छन्नू कहय घलो तोला नवकरी मिलही रे बेटा बने बने पढ़बे अउ सबके बात बानी मानत बने बने रहिबे।फेर होनी ल कोन जाने? आज सुमेर छन्नू अउ देवकी के डेहरी ल छोड़ के भाग गे हे, दूनो प्राणी दुख के दहरा म उबुक चुबुक करत हें।अब बस दूनो झन घरे म कभू लइका के त कभू यम के रद्दा जोहत दिन अउ रात ल काटेल लग गिस।

            एती सुमेर, शहर ले लगे एक ठन होटल के छत म बने कमरा म रहे बर लग गिस,जिहाँ ले एक ठन आमा पेड़ के फुलिंग म बने चिरई खोंधरा चकचक ले दिखे।जेमा एक माई चिरई रहय जउन पहाती खोंधरा छोड़ के उड़ जावय अउ संझौती बेरा फेर लहुट आवय।कुछ दिन बाद वो  चिरई घड़ी घड़ी खोंधरा मेर दिखे ल धर लिस।सुमेर के नजर पड़िस त देखथे कि खोंधरा म दू ठन अंडा हे, तेखर सेती माई चिरई  जादा दुरिहा नइ जावत रिहिस।कुछ दिन म दू ठन नान्हे चिरई  मनके चिंव चिंव गुंजेल  लगिस।अब माई चिरई चौबीसों घण्टा पेड़ेच के आजू बाजू दिन बताये बर लग गे,खोंधरा ले दुरिहाय नही।खेवन खेवन अपन  चोंच म दाना दबा के लावय अउ नान्हे चिरई मन ल खवावय।ये सब दृश्य ल सुमेर बरोबर रोज देखय।माई चिरई के आहट पाके नान्हे चिरई मन चोंच उठा उठा के नरियावय अउ दाना माँगय।एक दिन रतिहा जइसे सुमेर के नींद पड़त रिहिस ओतकी बेर ओखर कान म  माई चिरई के भारी नरियाय के आवाज आय लगिस।सुमेर ओढ़ के सोये के कोशिस करिस फेर सुत नइ पाइस,अंत म का होगे सोचत बाहर आथे त देखथे कि एक ठन बिरबिट डोमी साँप नान्हे चिरई मन ल खाये बर खोंधरा के तीर पहुँच गे हे।माई चिरई  अपन जान के संसो करे बिना फन उठाय नांग ल उड़ उड़ के चोंच मारय, अउ भारी नरियावय,ओखर नरियई ल सुनके अइसे लगे जइसे माई चिरई, साँप ल भागे बर काहत घेरी बेरी बखानत हे। आखिर म थकहार के साँप नीचे उतरेल लगिस।माई चिरई के जीत देख के सुमेर के अन्तस् गदगद होगे।एक दिन मनमाड़े हवा गरेर के संग झमाझम पानी गिरे बर लगिस, गड़गड़ गड़गड़ बादर गरजय,कड़कड़ कड़कड़ बिजुरी चमकय अउ पटपट पटपट करा घलो गिरय।सुमेर के जी ये सोच के छटपटाय बर लगिस कि वो खोंधरा म का बीतत होही।हिम्मत करके बाहिर आइस त देखथे के माई चिरई  अपन नान्हे चिरई के उप्पर छत बरोबर बइठे हे।हवा गरेर म डारा बिकट लहसे तभो मूसलाधार बरसा अउ टप टप बरसत करा ले नान्हे चिरई ल बचाये बर माई चिरई लगातार जमे हे।थोरिक देर म हवा अउ पानी दूनो थम गे।नान्हे चिरई मन डार म फुदके बर धर लिस।खाना खावत ले सुमेर खोंधरा ल झाँकथे फेर ओला माई चिरई दिखबे नइ करिस।ओखर मन छटपटाय बर धरलिस,तुरते भागत भागत होटल ले उतर के आमा पेड़ कर चल देथे, अउ जउन देखथे ओहर ओखर छाती ल दू फाँकी चीर देथे।माई चिरई, करा अउ पानी म पिटा के जान गँवा चुके रिहिस,ओखर तन म चाँटी झूमत रिहिस। सुमेर के आँखी ले आंसू के धार बरसेल लगगे, वो फफक फफक के रोय लगिस कि वाह रे महतारी चिरई तैं  लइका मन बर अपन जान घलो दे देएस,तोर समर्पण ल मैं बारम्बार नमन करत हँव।उही बेरा सुमेर ल पहिली बार दाई देवकी अउ ददा छन्नू के सुरता आइस कि मैं कतेक अभागन आँव जेन दाई ददा ल अकेल्ला छोड़ के भाग आय हँव,कोन जनी मोर लालन पालन वोमन कइसन कइसन दुख पीरा ल झेल झेल के करे होही,मोला धिक्कार हे।सुमेर के अन्तस् ल माई चिरई के मया ममता अउ समर्पण ह रही रही के कुरेदे बर लग गिस,वो दौड़त होटल म आइस अउ अपन झोला झांगड़ी ल खाँध म अरो के घर कोती जाय बर निकलिस ,जावत बेरा खोंधरा ल झाँकथे त देखथे कि नान्हे चिरई म खोंधरा ल छोड़ आने कोती उड़त जावत रहय,अउ एती पेड़ तरी म माई चिरई मरे पड़े हे।ओखर मन म उँखर बर क्रोध उमड़िस, फेर एक क्षण बाद खुद ल वो मेर रख के देखिस त सुमेर के आँसू के धार अउ बढ़गे।माई चिरई ल आमा पेड़ तरी गड्ढा खन के पाटत बेरा सुमेर सोचे लगिस के  चिरई मन तो जानथे कि ओखर लइकामन आघू चलके खोंधरा छोड़ उड़ा जाही, ओखर कोनो काम नइ आवय, तभो अइसन मया ममता लुटाथे।फेर हमर ददा दाई मन तो अपन बुढ़ापा के सहारा अउ डीही म दीया बरइया मानथे।अइसन म लइका यदि दाई ददा ल छोड़ देय त ओखर मन म का बीतत होही? अउ जेन ददा दाई ल तज देय वो लइका ले बढ़के मूरुख अउ कोनो नोहे।सुमेर लकर धकर घर म जाके, ददा दाई के पँवरी म जाके गिर जथे। सुमेर के आँखी ले बरसत पछतावा के आँसू ल देख छन्नू अउ देवकी बेटा ल गला लगा लेथे।सुमेर के अन्तस् म वो माई चिरई के मया ममता के खोंधरा  बनगे रिहिस।सुमेर अपन ददा दाई संग सबके मन लगाके सेवा करे बर लगगे।अउ एकदिन सुमेर ल घलो सरकारी नवकरी के बुलावा आगे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


Saturday, 21 December 2019

छत्तीसगढ़ी व्यंजन - डॉ. मीता अग्रवाल

"पुष्टई ले भरपूर छत्तीसगढ़ी व्यंजन"

छत्तीसगढ़ी संस्कृति, कला अउ साहित्य के अपन एक अलग पहचान हवे, इही गोठ ला चेत करके घर के रँधनी ले अपन गोठ के शुरुआत करत हँव । हमर जिनगी म खानपान के बहुतेच महत्व हवे।  छत्तीसगढ़ी जेवन के ररँधई जब महमहाथे तव मुँह मा पानी भर जाथे। "धान के कटोरा" कहाए वाला छत्तीसगढ़ मा किसम -किसम के चाँउर के उत्पादन होथे। लगभग 1000 ला आगर धान के पैदावार हमर खानपान के महत्वपूर्ण जिनिस हवे। चाँउर - दार, साग- भाजी के अलावा,  आनी बानी के कलेवा घलो बनाए जाथे, जेमा- फरा, दूध फरा, चीला, चौसेला चाँउर-पिसान ले रोजेच बनाय जाथे।
          तीज तिहार मा बनने वाला पकवान अउ जेवन  मा, चाँउर पिसान संग गँहूं पिसान, बेसन भी प्रयोग करें जाथे। इन पकवान मा ठेठरी ,खुरमी, देहरवरी ,अइरसा, गुझिया, कुसली, पिडिया,  बिडिया, खाजा, पपची, कुर लाड़ू ,बरा ,बोबरा प्रमुख हवें।
खान पान मा इहाँ विविधता के कमी नइये। रँधनी मा रोजेच
भाजी के बड़ महत्व हे।,कहावत घलो जनजीवन में प्रचलित हवे -"छत्तीसगढ़ के भाजी, जेमा भगवान राजी"।  छत्तीसगढ़ मा बासी संग भाजी सबे झन खाथें। बटकी मा बने बासी के सेवाद संग भाजी खाय के अलगे मजा हवे। इहाँ पचास ले ज्यादा किसम के भाजी गाँव अउ शहर मन मा राँधे जाथे, जउन विटामिन ले भरपूर रथे। प्रमुख भाजी मा- सरसों भाजी ,खेड़ा भाजी, बोहार भाजी , कुरमा भाजी, चाटी भाजी, चरोटा भाजी, बथुआ भाजी, खोटनी भाजी, खट्टा भाजी, मुनगा भाजी, मुरई भाजी, गोंदली भाजी, गोल भाजी, तिनपनिया भाजी, करमत्ता भाजी, चेंच भाजी, चौलाई भाजी, पाला भाजी, लाल भाजी ,अमारी भाजी, गुमी भाजी, उरीद- मूंग भाजी ,मछरिया भाजी, गुडरु भाजी,  मुस्केनी भाजी उल्ला भाजी, बर्रे भाजी चना भाजी ,मेथी भाजी ,तिवरा भाजी ,पोई भाजी, मखना भाजी, कांदा भाजी, कुसुम भाजी छत्तीसगढ़ मा ये भाजी मन अधिकतर बनाये जाथें।

कुछ भाजी ल कम बनाए जाथे ,ऐमा- भाजी मिरचा भाजी, पीता भाजी, लमकेनी भाजी, कुलफा भाजी, खोटलिइया भाजी, धरकूट भाजी ,बरेजहा  भाजी, कुरमा भाजी, कौवकानी भाजी, इमली भाजी, पटवा भाजी, कोईलार भाजी, कोचई भाजी, गिरहुल भाजी पत्थरी भाजी, सेमी भाजी, लेड़गा भाजी ,लेवना भाजी, बर्रा भाजी , उल्ला भाजी ये सबो भाजी ला बिशेष बिंध ले राँधे जाथे, जेमा फोरन मा लसून, लाल मिरचा, तिली, पताल नून डार के पकाये जाथे।
साग म जिमीकाॅदा इहाँ के राजा साग हवे जे बरबिहाव के समधी भोज मा खवाना जरुरी रथे अउ देवारी अनकूट मा घर-घर राँधेन जाथे। सुक्सा साग मा भाटा, गोभी, बुंदेला मुरई, दही मिर्चा, किसम किसम के बरी-रखिया तूमा, पपीता, कोहडा के अलावा,भात ,लाई, अदौरी बरी, विशेष कर बनाय जाथे। चाँउर पापर,चाँउर कुरेरी, रखिया बीजा के बिजौरी ला तर के पहुना ला खवाय के चलन हवे। अथान गुराम, चटनी, अरक्का के  सेवाद ह, खाना के सेवाद ला बढ़ाथे।

छत्तीसगढ़ में बनने वाला ये व्यंजन के सेवाद, केवल प्रदेश मा ही नही, पूरा देश मा, बगरे हवे, काबर कि ये व्यंजन, छत्तीसगढ़ के पहचान के संगे संग पुष्टई मा प्रोटीन, विटामिन, खनिज- लवण, कार्बोहाइड्रेट, वसा आदि ले घलो भरपूर हवे। राँधे गढ़े  मा आज के जमाना मा एकर तरीका आसान हवे। मेला- मँडई मा लोगन व्यंजन के सेवाद ल लेके आनी बानी के जेवन के प्रशंसा करत नइ थकँय।
 इही कोशिश मा मँय हर 2002 छत्तीसगढ़ी व्यंजन-"आनी बानी के जेवन" के नाम ले पुस्तक लिखे हँव , उन हमर राज्य के व्यंजन ला घरोघर बगराय म फलित होवत हवे । हमर छत्तीसगढ़ के खानपान के तरीका अपन आप मा बिशेष महत्व रखथे।

लेखिका -  डाॅ. मीता अग्रवाल मधुर, रायपुर
 छत्तीसगढ़