Friday, 3 July 2020

बलराम चंद्राकर: असाड़

बलराम चंद्राकर: असाड़

असाड़, साल के चौंथा महिना, लगते पानी बादर के गुरुरघारर शुरू हो जथे। जेठ के घाम ले लाहके जीव थीर पाथे।सरग के कतको पानी ला पियासे धरती तुरते सोंख लेथे।बरसा के पानी परे ले उन्ना तरिया डबरी के मछरी बेंगवा मन ला घलो नवा जीवन मिलथे।प्रकृति मा नवा ऊर्जा के संचार होथे। भोंभराय धरती हा हरिया जथे।हरियर हरियर डारा पाना देख के लागथे भुइयाँ नवा लुगरा अंगीकार करत हे। गरमी के चार महिना थिराय कमिया किसान खेती किसानी के उदीम मा लग जथे। झुलसे धरती मा गरवा गाय के चारा घलो सबो कोती दिखे ला धर लेथे। मानसून के आय ले बादर छाय रहिथे ।सुरुज नारायण छूपा छूपी खेलत अपन तेज ला कदा करत रहिथे।असाड़ के पहिली पानी हा धरती खेत खलियान ला सुवासित कर देथे। बादर कभु गरजथे कभु बरसथे त कभु हवा गरेर घलो चलथे। सुक्खाय नदिया नरवा मा फेर जलधार बोहावत देख के मन हरस जथे।
किसान के खेती किसानी अउ चउमासा के तइयारी शुरू हो जथे। नागर बखर अउ फसल के बोनी बर कांटा खूटी ला बिन के खेत के सफाई किये जाथे।  जोताई अउ धान के बोनी बर किसान संझा बिहनिया एक करके खेत ला संवारथे। अंकुरित धान ला देख किसान के मन खुश होथे।
असाड़ के पानी परते ही किसान बियारा के पैरा ला परसार मा भरके मवेशी बर चार महिना के सुखा चारा के बेवस्था ला पुख्ता करथे।
चउमास हा पूरा खेती किसानी अउ फसल के बढ़ोत्तरी के काम बर हरे। किसान दिनरात लगे रहिथे। असाड़ के शुक्ल एकादशी ले देवता मन चार महिना बिश्राम करथे। कोनो प्रकार के मुहुर्त वाले काम बर देवउठनी तक विराम रहिथे। फेर। अन्नदाता किसान ए चार महिना जी तोड़ मेहनत कर के संसार बर अन्न उपजाथे। अउ शिव भोले के सुमिरन कर के शक्ति पाथे। काबर चउमासा भर शिव-शक्ति के उपासना होथे।
रजुतिया के तिहार अउ गुरू पूर्णिमा हर असाड़ के बहुत बड़े तिहार होथे।
 हमर छत्तीसगढ़ मा भगवान जगन्नाथ के पूजा के ए परब ला बड़ हांसी खुशी सबो डाहर मनाथे। पढ़इया लइका मन के नवा कक्षा घलो इही असाड़ मा शुरू होथे। संत मन के चतुर्मास के पहिली पडा़व हरे असाड़ हा।
असाड़ मा बियारा बखरी ला जोत के किसम किसम के बीज ला बो के चार महिना के साग भाजी के बेवस्था घलो करथे।
असाड़ लगते घर छानही के खपरा लहूटाय के काम पूरा करे बर पड़थे, बरसा के पानी चुहे ले घर ला बचाय बर। पानी निकासी के बेवस्था ला ठीक किये जाथे।कतको घर झिपारी बांधे जाथे परछी, दिवार अउ दुवारी ला पानी के छींटा ले बचाय बर।
असाड़ के महिना मा पानी गिरते नवा नवा किसम के कतको किरा मकोड़ा के भरमार हो जथे। प्रजनन काल होय के कारण ए महिना मा असंख्य प्रकार के कीरा मन दिखथे अउ कुछ दिन बाद कहां जाथे पता नइ चलय। बतर तो पहिचान हरे असाड़ लगे के। मच्छर के प्रकोप बाढ़थे त कई प्रकार के रोग के राई घलो डर रहिथे। ए खातिर खास सावधानी ज़रूरी रहिथे। मेचका, गेंगरुआ, पिटपिटी ढोढ़िया, हिरु बिच्छु, किट पतंग ले पाला पड़थे। लोग लइका मन के खियाल विशेष करे ला पड़थे, चिखला पानी ले बचाय बर।
असाड़ धरती के श्रृंगार के महिना हरे।प्रकृति चारों तरफ हरियाली ले भर जथे। । ए प्रकार ले असाड़ के महिना हा संसार के सबो जीव बर वरदान हरे। कहे गए हे - "डार के चूके बेंदरा अउ असाड़ के चूके किसान " दूबारा पार नइ पाय।सिरतोन असाड़ अमरित बरसाथे धरती मा तभे संसार हा सालभर सजीव रहिथे।

बलराम चंद्राकर भिलाई

नाँग साँप (कहानी)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

नाँग साँप (कहानी)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

कथे न, राम राम के बेरा हाँव हाँव अउ खाँव खाँव, अइसने होइस घलो जब पहातिच बेरा शहर के कृष्णा चँउक म, किसन के  घर साँप दिखगे। कोनो दतवन चाबत, त कोनो लोटा धरे, त कोनो मन बिन मुँह - कान धोय घलो वो मेर पहुँच के किलबिल किलबिल करत हे। पड़ोस के लइका  मनोज जेन दाई ददा के बिना लात घुसा खाय घलो नइ जागे तेखरो आँखी भिनसरहा ले उघर गे रहय, फेर अलाली  के मारे  कुछ देर  खटियच म पड़े पड़े गोहार ल सुनिस, अउ आखिर म आँखी रमजत वो मेर हबरगे। जिहाँ देखथे कि बनेच मनखे सकलाय हे, अउ अपन अपन ले सबे चिल्लात हे। कोनो काहत हे- ओदे संगसा म खुसरे हे। कोनो काहत हे- रँधनी खोली कोती गेहे। कोनो काहत हे, दोनो हाथ ल फैलाबे तभो वो साँप ले छोटे पड़ जही। कोनो काहत हे- बड़ मोठ लामी लामा धनमा ये। कोनो कहे- करायेत हरे, त कोनो कहे- बिखहर डोमी आय।
उही भीड़ के सँग चिल्लावत, मनोज घलो कथे- बाकी साँप के तो पता नही फेर जब तक वो साँप फेन नइ काटही,  डोमी नइ हो सके। एक ठन साँप के आरो पाके कतको झन मनखे रूपी साँप मन बड़बड़ावत हे। एती किसन के मुँह घलो नइ उलत हे, लइका लोग सुद्धा, घर के बाहर थोथना ओरमाये खड़े हे। अउ करे त का, जेखर गला मा घाँटी ओरमथे, उही ओखर दुख ल जानथे, बाकी मन तो बस लफर लफर लुथे। सबे चिल्लावत हे ,फेर कोनो भगाये बर उदिम नइ करत हे। ले दे के एकझन सज्जन साँप पकड़इय्या ल धर के लाइस। पकड़इया ह बड़ महिनत करे के बाद साँप ल घर ले बाहिर निकालिस। साँप ह जुरियाय जम्मो मनखे मन ला देख के, फेन काट के तनियाय खड़े हो जथे। लोगन मन देख फेर फुसफुसात हे देखे जुन्नेट डोमी आय। ये भारी बिखहर होथे, एक घाँव चाबिस, मतलब राम नाम सत। येती मनोज तनियाय खड़े हे, देखे में केहे रेहेंव, ते सहीं होइस न,फेन काटही कहिके। एक झन चुप करात चिचियावत कहिथे,ते चुप रे,आज के लइका का जानबे, का का साँप होथे तेला, भगवान शंकर के फोटू ल भर देखे हस, कभू बाप पुरखा नाँग देखे रेहेस।  येती किसन के पोटा साँप ल देख के काँपत रहय। किसन कहिथे, येला कोई मार देवव, आज मोर घर म घुसरिस, काली अउ कखरो घर घूँस जही। आघू म खड़े एक झन मनखे कहिथे- बात तो बने काहत हस किसन,  फेर मोर डहर अँगरी काबर देखात हस, मोर घर काबर घुसही।  वो मेर खड़े अउ मन फुसफुसावत कहिथे, काबर की तोर घर जादा धन दौलत हे। ततकी बेरा मनोज बात ल काटत कहिथे, इती के बात ल छोड़व। कइसे ग कका किसन, तैं जीव हत्या के बात करइया निरदई आदमी कइसे हो सकथस? बात वो किसन के अलग हे जउन नाँग नाथे रिहिस। ते तो निच्चट डरपोक आवस। हाँ नाँग देवता,तोर घर आय हे, बढ़िया पूजा पाठ कर, धन रतन बाढ़ही। ये मजाक के बेरा नइहे, किसन बिलखत कथे- अब तुही मन बतावव ददा, मोर घर  ले ये बला टरे। साँप पकड़इय्या वो साँप ल चुंगड़ी म भरके, मनोज ल कहिथे, चल येला कहूँ मेर छोड़ के आबों। मनोज छाती ठोंकत कहिथे ,अइसन काम बर तो मैं बने हँव। अउ साँप घलो तो जीव आय, मारना पीटना बने बात नोहय। चल ये साँप ल खाली जघा म छोड़ आबों। तीर म ओखर ददा घलो रहय। वो मनोज ल कहिस -हव ",काम के न कौड़ी के, दँउरी के बजरंगा" अउ कामे का कर सकत हे। दुनो झन साँप ल चुंगड़ी म धरके निकल गे। इती किसन ला हाय जी लगिस। लोगन मन घलो छँटियाय लगिस।
                   साँप पकड़य्या के पाछू पाछू मनोज रेंगत कहिथे, अउ कतिक दुरिहा जाबों, ऐदे मेर छोड़ देथन। बेरा उग के चढ़त रहय, मनखे के चहल पहल बढ़ गे रहय। साँप ल छोड़े बर जइसे चुंगड़ी ल खोलेल धरथे, नजदीक के घर वाले करलावत निकलथे, हव छोड़ दव इही मेर, ताहन मोर घर खुसर जाय। चलो भागो ए कर ले।  दुनो फेर सड़क नापथे, सबो जघा मनखे मन देखे के बाद दुनो ल गरिया देवव। दुनो थक हार गे। आखिर में साँप पकड़य्या कहिथे, मोर ले गुनाह होगे जी मनोज, जे सांप ल पकड़ेव। फेर ये मोर बर थोरे हरे, भलाई के जमाना नइहे, मोरे मरना होगे।
दुनो लहुट के किसन घर कर आगे। किसन पुचपुचावत कहथे-बने करे दाऊ, तोर बिना मैं तो संसो म पड़ गे रेहेंव। ले चाय पीके जाबे। किसन के बात ल सुनके, मनोज कहिथे- का बने कका, साँप तो चुंगड़ी म हे। कोनो मन अपन तीर तखार म ढीलन नइ दिन। मुँह उठाके फेर आगेन। अब तोर नाँग ल तिहीं पूज, हमन चली। अरे अरे अइसे कइसे हो सकत हे, ये गलत ए, अउ ये कोनो मोर पोसवा थोरे आय, एखर मैं काय करहूँ, किसन बिलखत हे। मनोज का, सबे झन भाग गे।  किसन के मूड़ म पहाड़ टूट गे, साँप के चुंगड़ी के दुरिहा म बैठे लइका लोग सुद्धा फेर रोय लगिस।
             एकाएक मँझानिया, मनोज के ददा कल्हरत भागत चिल्लाथे, साँप साँप साँप। अरे भागो भागो, किसन घर के  डोमी नाँग हमर घर खुसर गेहे। मनोज गिरत हपटत भागथे, अउ किसन ल खिसियाथे, जेन चुंगड़ी के आघू अपन भाग ऊपर रोवत राहय। मनोज के ददा झाँक के देखथे, चुंगड़ी भोंगरा रहय, ओखर मुहड़ा थोरिक खुल गए रहय। मनोज सोचथे, साँप पकड़इय्या लगथे, ढीले के बेरा बने से नइ बाँधे रिहिस। फेर अब साँप तो मनोज घर खुसर गेहे। किसन जान के खुश तो नइ होइस, तभो अइसे लगिस जइसे ओखर करेजा म लदे पथना, हट गे। लइका लोग सुद्धा खैर मनाइस। अउ मुंह बजावत कइथे, कइसे बाबू मनोज, अब कइसे लगत हे, जा तिहीं पूजा कर नाँग देवता के , सावन घलो चलत हे, नागपंचमी घलो अवइया हे। मनोज के ददा दाँत कटर के रिहिगे, देखते देखत मनखे मन फेर जुरियागे, हो हल्ला मात गे। कोनो काहत हे अइसन म बात नइ बने, पुलिस म खबर देना चाही। कोनो कहय पुलिस का करही, वन विभाग के अधिकारी मन  ल बतावव, उही मन ले जही। फेर वोमन फोकट म बिन पइसा कौड़ी के थोरे आही। अउ वन विभाग वन कोती रइथे, शहर नगर म कहाँ के। मनोज के ददा किसन ल देखत कहिथे, चल दुनो मिलके वन विभाग ल बलाबों।किसन मुँह अँइठत घर म खुसर गे।  अचानक साँप मनोज के घर म एक डाहर ले दूसर डाहर जावत दिखथे, भीड़ फुसफुसाए लग जथे,  किसन के बला, मनोज घर  सपड़ गेहे, लगथे किसन बने आदमी नोहे, नाना जाति के गोठ उभरे बर धर लेथे। फेर जेन संसो कुछ देर पहली किसन के रिहिस, वो अब मनोज अउ ओखर घरवाले ल सतावत हे। अब तो साँप धरइय्या घलो नइ आँव काहत हे, उहू अपन दुख दर्द बतावत हे कि मैं पकड़ के अचार थोड़े डालहू ,ये शहर म दूर दूर तक  न परिया हे न खाली जघा, मैं काल काबर मोल लेवँव। मनोज के पड़ोसी मन ल घलो संसो सताये बर लग गिस, कही ये साँप हमर घर म आ जही तब। अब सबे केहेल धर लिस, साँप ल दूध पियाबे त चाब्बे करही, ओला पाले के बजाय मार देना चाही। मनोज के ददा अउ वो मुहल्ला के दू सियान लउठी धरके, साँप कोती बढ़थे। साँप डर के मारे एती वोती भागेल धर लेथे। लउठी पड़इय्यच रहिथे, मनोज तीर में जाके हाथ ल धर लेथे। अउ कहिथे- मोर बात वन विभाग के अधिकारी मनले होगे हे, झन मारव। ये साँप बिचारा आखिर रहे त कहाँ रहे, जम्मे कोती हमन अपन ठिहा ठौर बना डरे हन, न कोनो मेर रीता भुइयाँ हे, न परिया। यहू मन तो ये धरती के प्राणी आय, अगास या पताल के थोरे, फेर हम मानव मन स्वार्थ अउ आधुनिकता के चकाचौंध म जम्मे कोती क्रंकीट अउ सीमेंट बिछा डरे हन, सांप बिच्छू मन चकचक ले  दिख जावत हे, उँखर बर बिला भरका घलो नइ  बचायेन , रुख राई के तो बातेच ल छोड़ दव। न बारी बखरी हे, न कोठा ,न कोला आखिर साँप बिच्छु कस विवश प्राणी मन रहे त कहाँ रहे? अउ कहूँ दिख जाथे, त साँप ले जादा खतरनाक हम मानव मन वोला मार डरथन। शहर नगर सिर्फ मनखे मन बर होगे हे, गाय,गरवा  मन घलो  सड़क म बैठे रहिथे। हमर करनी के फल हमन असमय गर्मी, बरसा, आंधी तूफान ले तो भुगतते हन, फेर ये निरीह प्राणी मन बिन जबरन काल के मुख म समा जावत हे। हमला उँखरो बारे म सोचना चाही।  वो मेर खड़े जम्मो झन मनखे मन मनोज के बात ल सुनके कलेचुप मुँह लुकावत छँटेल धरलिस। कुछ देर बात वन्य जीव संरक्षण विभाग वाले कर्मचारी मन आगे, अउ साँप ल लेगत बेरा, मनोज ल बूता जोंगत कहिथे- सिरिफ साँप का, कोनो भी जीव  यदि कभू भी अइसने ये मुहल्ला या तोर आसपास भटकत दिखही त आज ले तैं हमन ल सूचना देबे। तोला हमन ट्रेनिंग घलो देबों, ताकि साँप बिच्छू ल तैं पकड़ सकस। गारी गल्ला खावत, ठलहा पड़े, मनोज ल काम मिल जथे अउ  मुहल्ला वाले संग अपन ददा के घलो डाडला बन जथे। 

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)


बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

*बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

मंगतिन गांव म अपन जिनगी काटत राहय। मंगतिन के बिहाव नानपन म होय रिहिस हे अउ १५ बच्छर म ससुरार आगे रिहिस हे, वोला गुड़ाखू घसे के बड़ नशा रिहिस हे, दिन भर रतिहा जसना म जावत ले ओखर मुहु म गुड़ाखू दबे राहय। धीरे -धीरे दिन बितत गिस अउ मंगतिन तीन लईका के महतारी बनगे।धनसिंग (बड़े बेटा) कुंती (मंझली) अउ जीवन सबले छोटे रिहिस हवय, जीवन के अवतरे के दू बच्छर बाद मंगतिन के गोसैंया ल एक दिन खेत म सांप चाब दिस बिचारा बीत गे ।धनसिंग अउ कुंती बड़े होगे अउ गांव के सरकारी इस्कूल म पढ़े जाय लगिस... लेकिन ओखर छोटे बेटा जीवन के हाव-भाव,रेंगना-फिरना दूनो लईका मन ले अलग राहय कभू कखरो संग हां,हूं ,घलो नइ गोठियावय।कले चुप रेहे राहय,मल मूत्र अउ पखाना घलो ओन्हा म कर डारय,बाढ़त उमर अईसने कटत लईका बड़े होगे।
          धीरे-धीरे मंगतिन ल संसो होगे अउ बड़ परशानी घलो होवय लईका ल घर म छोड़ के बनी-भुति म निकल जावय , जीवन के बेवहार ल देख के मंगतिन हदास होगे राहय अउ खेत खार अउ  मड़ई मेला अउ सगा सोदर कोनो गांव जावय त दूनो लईका मन ल संग म धरके जावय अउ जीवन ल कुरिया मे धांध के संकरी ल लगाके रखय।
         कोनो दिन कंहू घर ले जीवन निकल जतिस त गांव बस्ती पारा परोस के मन बिचारा ल पथरा ढेला म मारय अउ कोनो पानी ल घलो ओखर ऊपर फेंक देवय...नान-नान लईका संग बड़े मन घलो बिचारा ल *बईहा* आगे कहिके भगावय ,मंगतिन हदास होगे राहय अउ घर के मुहाटी म बैठे राहय उहि बेरा मा गांव के एक झन पढ़े लिखे सियान ह शाहर के *मनोरोग चिकित्सक* डॉक्टर
के तीर म देखाए म सुझाईस अउ मंगतिन ल डॉ. के पता ठिकाना ल चिट्ठी म लिखके दे दिस दुसरईया दिन मंगतिन जीवन ल धर के  डाॅ. ले भेंट करिन अउ डॉ.साहब ह पुछिस ।
का जीवन ह ?अवतरे के तुरते बेरा रोईस हे...... मंगतिन कहिथे नहीं साहब।
का तेंहा नशा करथस?
हव....... साहब गुड़ाखू घसथंव।
फेर मंगतिन कहिथे डॉ साहब मोर लईका ल गांव वाले मन, पारा परोस के मन *बईहा-बईहा* कहिथे!हव साहब मोर लईका बईहा हे!
तब डॉ साहब (मनोरोग विशेषज्ञ)कहिथे जीवन बईहा नइहे.......ऐला मानसिक दिव्यांग कहिथे।अउ ईखर बुद्धि सामान्य लईका ले कम होथे।
जौन कोनो महतारी अम्मल म रहिथे तब के बेरा म नशा,अउ जेला घेरी भेरी झटका आथे अउ अन्ते-अन्ते नंगत अकन कारन हे अउ अवतरे के तुरते बेरा म  लईका नइ रोवय त अईसन म लईका के बुद्धि के नस बराबर काम नइ करय जेखर कारन लईका ह मानसिक दिव्यांग होथे।
*लईका बईहा नइहे* ऐला रोज के काम धाम ले संग म रहिके सिखोवव! लईका धीरे-धीरे अपन जिनगी ल चलाए बर तो सीख जहि। कखरो बर बोझा नइ रहि।

------------******-----------------
मिनेश कुमार साहू
भुरभुसी गंडई/माना कैंप रायपुर

Thursday, 2 July 2020

छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया ऊपर छंद के छ परिवार के साधक मनके विचार-

 छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया ऊपर छंद के छ परिवार के साधक मनके विचार-

   अभिव्यक्ति के आजादी के संगे संग महत्वपूर्ण बात एहू हर तो आय के साहित्यकार  ल अपन रचना प्रकाशन के ललक रहिथे .....प्रिंट मीडिया के विकास हर साहित्यकार ल पत्र - पत्रिका मं प्रकाशन के मौका दिहिस त किताब के रूप मं भी रचनाकार अपन भावना ल अलग अलग विधा मं प्रकाशित कराये लगिन  तभो ये बात के ध्यान रहय के व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के आज़ादी हर दूसर के गुलामी  झन बने पावय ...अभी  जादा दिन नई होये हे जब लोगन  के हाथ सोशल मीडिया लगिस ....साहित्यकार समय संजोग देख सुन के अपन रचना फेस बुक , व्हाट्सएप  , ब्लॉग  आदि के माध्यम से लोगन तक सहज रूप से पहुंचाये धर लिहिन ...फायदा लेखक अउ पाठक दुनों ल होइस हे काबर के साहित्यकार ऊपर सम्पादक के टीका टिप्पणी के डर नईये , प्रकाशित होही के नहीं , होही त कब होही ? सब झमेला ले मुक्ति ।  रहिस बात पाठक के त का कहना हे  सोशल मीडिया के अंगना मं पहुँचत देरी हे के मनपसंद लेख , कविता , कहानी , लघुकथा , संस्मरण  सब मिल जाथे ...अब तो on line गोष्ठी , सम्मेलन , वेबिनार तक सम्पन्न होवत हे । सोशल मीडिया हर साहित्य अउ सहित्यकार दूनों ल सर्वजनसुलभ बना देहे हे ।
आज के विमर्श मं भागीदार बुधियार  साहित्यकार मन के विचार जानके पटल के शोभा बाढ़ही ...।
  कलम तोर जय हो ।

सरला शर्मा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


       पहली कहय कि *नेकी कर अउ दरिया म डार* फेर आज सिरिफ एके चीज दिखथे, कुछु भी कर , अउ  सोसल मीडिया म डार। अउ जरूरी घलो हे,  काबर की आज सोसल मीडिया के तार मनखे के धड़कन ले जुड़ गेहे। केहे के मतलब जमाना सोसल मीडिया के हे। आज लगभग हर हाथ म मोबाइल हे, अउ सुबे साम मनखे वोमा भिड़े, जम्मो कोती के शोर खबर अउ मनोरंजन के साथ साथ गियान घलो पावत हे। बबा के लगाये बर के आज सबूत नइहे, काबर कि वो जमाना सोसल मीडिया के नइ रिहिस। आज तो एक पेड़ ल लगावत 20, 25 झन दिखथे। अउ फोटू खिचाके सोसल मीडिया म वाहवाही बटोरथे। चाहे परब- तिहार होय, या बर बिहाव सबे सोसल मीडिया म मान पावत हे।
             जब सोसल मीडिया भारत म पाँव पसारत रिहिस त भारतीय सुधिजन मन  चिंता व्यक्त करिन कि  एखर ले अंग्रेजी के बोलबाला हो जही। फेर आज हिंदी  अंग्रेजी ले आँखी मिलाके बतियावत हे। अइसन म  *छत्तीसगढ़ी* काबर पिछवाय, उहू ल हमर राज के जम्मो झन मनखे मन बरोबर बउरत हे, फेसबुक वाटससप अउ कतको माध्यम म छत्तीसगढ़ी भाषा के लेख, कविता, गीत के आडियो, वीडियो भराय पड़े हे। सोसल मीडिया म हमर भाषा बरोबर जघा बना डरे हे, साहित्य  अउ गीत संगीत के बढ़वार लगातार दिखत हे। आज कवि अउ लेखक मनके कविता, गीत लेख  तरोताजा अउ तुरते  सोसल मीडिया के जरिये चारो कोती बगर जावत हे। छत्तीसगढ़ी भाषा अउ साहित्य ल नवा ऊँचाई मिलत हे। छत्तीसगढिया मन सोसल मीडिया म बरोबर भाषा साहित्य अउ छत्तीसगढ़ के पार परम्परा ल स्थापित करत हे। नवा कवि अउ लेखक मनके संगे संग हमर पुरखा साहित्यकार मनके  गीत,कविता, कहानी अउ विचार ल घलो गुणीजन मन सोसल मीडिया म पहुँचावत हे, उँखर अइसन उदिम ले हमर साहित्य नवा ऊंचाई म जावत हे। पुरखा मनके धरोहर आज सोसल मीडिया के शोभा बढ़ावत हे। उँखर सुरता म कतको उदिम हमर राज के गुणवान संगी मन करत हे, अउ सबला येमा हाथ घलो बटाना चाही, काबर की उँखर साहित्य अउ विचार नवा जमाना बर नवा रद्दा गढ़ही।
            *पुस्तक के पहुँच सिरिफ शिक्षित मनखे तक होवय, फेर सोसल मीडिया म साहित्य आडियो वीडियो रूप म अनपढ़ के अंतस ल घलो अमरत हे।*  आज सोसल मीडिया मनोरंजन, शिक्षा, अउ सूचना के बड़का जरिया बन गेहे, ओमा हमर साहित्य घलो जगमगावत हे। सोसल मीडिया, पठोय सबे चीज ल बरोबर सम्भाल के रखथे येमा कॉपी पुस्तक कस पानी, बादर , अउ दिंयार के डर घलो नइ रहय। आज लेखक कवि मन अपन कविता लेख के बरोबर प्रचार प्रसार भी ये माध्यम ले करत हे, अउ उन ल आह, वाह , लाइक कमेंट रूपी उत्साह के संगे संग ज्ञानीजन मनके मार्गदर्शन घलो मिलत हे। लाकड़ाऊन म सबले जादा साहित्यकार मनके थेभा सोसल मीडिया  बनिस। लिखई, पढ़ई के सँगे सँग आडियो वीडियो रूप म कवि मन खूब वाहवाही बटोरिन अउ बटोरत घलो हे। छत्तीसगढ़ी  म लिखई पढ़ई दिनोदिन बाढ़त हे, येला सोसल मीडिया घलो बरोबर सिद्ध करत हे।
                सोसल मीडिया के तार जमे कोती लमे हे, अइसन म हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य न सिर्फ भारत म बल्कि विदेश म घलो पहुँचत हे। *छंद के छ* के कविता ब्लाग *छंदखजाना* के लाखों विदेशी पाठक मिलथे। अउ अइसन कतको ब्लाग हे जेला पूरा विश्व निहारत हे। आदरणीय संजीव तिवारी जी  कस कतको गुणीजन मन छत्तीसगढ़ी ल गूगल म स्थापित करत हे।  पुस्तक घलो सॉप्ट कापी जे रूप म आकर्षक ढंग ले छपत हे। आज हर कोई  मोबाइल  ले जुड़े हे, उठत बइठत सब लगे हे , अउ रंग रंग के जानकारी के साथ मनोरंजन घलो पावत हे। छत्तीसगढ़ी साहित्य के उत्थान बर सोसल मीडिया बड़का मचान बरोबर हे, जे विश्वभर ल परोसे के काम करत हे।
            सोसल मीडिया  म झूठा वाहवाही घलो गजब फलत फूलत हे, बिन पढ़े आह, वाह चलत हे, जेन कभू कभू दुख लगथे, कतको झन  कखरो लेख कविता ल घलो चोरावत दिखथे, यहू गलत बात ये।  खैर छोड़व, *सबे  चीज के बने म बने होथे, अउ गलत म गलत।* सोसल मीडिया जतके नेता, व्यापारी,डॉक्टर,मास्टर, वैग्यानिक, फ़िल्म, अउ  गुणी ज्ञानी बर उपयोगी हे, ओतके उपयोगी हम सब साहित्यकार मन बर हे, बशर्ते उपयोग के दशा दिशा सकारात्मक होय।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

छत्तीसगढ़ी साहित्य पहिली पढ़े बर नइ मिलय,बड़े बड़े साहित्यकार मन के पुस्तक छपंय पर आम जन के पहुँच से दूर रहय।
लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से हमर साहित्यकार मन ला जाने के पढ़े के मौका मिलत हे।
अब हिंदी रचना मन हर जनसुलभ तो शुरू से  हवय लेकिन छत्तीसगढ़ी साहित्य बर ये सोशल मीडिया बहुते कारगर उपयोगी होगे हे।
येखर से आज कतको ग्रुप चलत हे
एक दूसर से जाने पहचान के संगे संग रचना भी आदान प्रदान होवत हे।
अपन मन के भाव ल सबके सामने रखे के अवसर भी मिलत हे।
सबले बड़े तो सौभाग्य ये मिले हे कि येखर माध्यम से बहुत बढ़िया कक्षा भी चलत हे ,गुरुकुल जैसे वातावरण भी हे।
इहाँ सिर्फ छंद नइ सिखाय जाय
सम्पूर्ण व्यक्तित्व भी निखारे जाथे।
सोशल मीडिया में छत्तीसगढ़ी साहित्य के चर्चा होवत हे तब
छंद परिवार के कक्षा ल अनदेखा नइ किये जा सकय।
येखर माध्यम ले कतको झन नवा कलमकार मन हा अपन लेखनी ल धार करत हें। इँहा फोकट के वाहवाही नइ होवय बल्कि खरा बात होथे।
अगर अइसने हर जगह रचना मन के समीक्षा होय अउ रचनाकार येला सहजता से स्वीकार करें तो
पोठ पोठ रचना ही आही।
आज ये अभिव्यक्ति के सरल माध्यम होगे हे।
सोशल मीडिया से छत्तीसगढ़ी साहित्य सबो जगह बगरत हे अउ सम्मान पावत हे।


आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

साहित्य, समाज के दरपन आय एमा कोनो संदेश नइये काबर की साहित्य हा समाज ला एक सही दिशा प्रदान करथे।
                    आज दुनिया भर मा साहित्य के डंका बाजथे, साहित्य के परचम लहराथे माने साहित्य के अतका जादा परभाव अउ विस्तार देखे ला मिलथे जेकर कल्पना नइ करे जा सकय। छोटे-छोटे गाँव, कस्बा, शहर से लेके हर जगा साहित्य बोवाय हे। ए बात मा दूमत नइहे की साहित्य के प्रभाव अभी के युग मा जादा हे फेर साहित्य ला चलईया कलमकार मन के संख्या भी जादा हे जेमन नित दिन अपन सेवा देवत हवँँय।
                   आजकल के लोगन मन के मुँह ले सुने हँँव जेमन कहींथय कि-साहित्य के प्रभाव कम होगे हे, अइसन कछु नइहे हालांकि पहिली के साहित्य अउ आज के साहित्य मा थोर-थार बदलाव आए हे फेर विस्तार तो ओइसने हे जईसन पहिली रिहिस।
        साहित्य अउ साहित्यकार के परम धरम आय की ओमन समाज ला अउ समाज ले जुड़े हर  झन ला जागरूक करे के काम करय *काबर की जागरूकता हा एक मात्र विकल्प आय प्रगति के* हर मनखे के नकरात्मक धारणा ला बदलना भी साहित्य बर जरूरी हे, इही कारन साहित्य ला विस्तृत करना आज के तारीख मा बहुत जरूरी हे हालाँकि विस्तार हवय फेर अउ जादा विस्तार लाना एक नवा समाज के निर्मान करही।
एक बात अउ हे राजनीति घलो साहित्य ऊपर आधारित हे जब तक साहित्य हे तब तक जग मा सकारात्मकता विद्यमान हे।

*छंद साधक*- अमित टंडन अनभिज्ञ

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

       कुछ समे पहली तक छत्तीसगढ़ी भाखा मा लिखाय साहित्य नइ मिलत रहिस। शहर मन मा भले कुछ साहित्य मिल जाय फेर उहू हा सरलता ले नइ मिलत रहिस। साधारन मनखे मन ला आकाशवाणी के माध्यम ले बड़का साहित्यकार मन के गीत सुने बर मिल जाय। कभू कभू गोष्ठी साहित्यिक परिचर्चा घलो प्रसारित होवत रहिस।
       संचार माध्यम के विकास दुनिया मा होवत गिस अउ देश के सँगे संग हमर छत्तीसगढ़ राज मा घलो मनखे मन के हाथ मा मोबाइल आइस। मोबाइल मा घलो तकनीकी विकास होवत गिस अउ स्मार्ट फोन आइस। जब ले स्मार्ट फोन लोगन मन के हाथ मा सहजता ले आय हे छत्तीसगढ़ी साहित्य पढ़े सुने बर भारी मातरा मा मिलथे। एमा अबड़ अकन ठिहा हे जिहाँ जाके लोगन मन अपन बिचार छत्तीसगढ़ी भाखा मा रखथें। इही ठिहा मन सोशल
मीडिया आयँ।
          सोशल मीडिया मा बड़े बड़े जुन्ना साहित्यकार मन ले लेके छोटे छोटे जे मन ला नेवरिया साहित्यकार कहि सकथन, के विचार छत्तीसगढ़ी मा पढ़े सुने बर मिलथे। एकर माध्यम ले एक दूसर के सिरजन के आदान प्रदान सरलता ले घलो हो जवथे जेमा गलती के सरलता ले सुधार करत बन जथे। एकर ले समय अउ धन के घलो बचत होवत हे। अभी सोशल मीडिया मा छत्तीसगढ़ी के सैकड़ों ग्रुप मिल जही। गाँव गाँव मा एकर माध्यम ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रचार प्रसार होवत हे। सोशल मीडिया के माध्यम ले आनलाइन कार्यशाला, गोष्ठी, काव्य पाठ अउ बहुत अकन गतिविधि संचालित हावत हाबय जेन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला समृद्ध करत हाबय। सोशल मीडिया वर्तमान मा अपन विचार रखे के सहज अउ सरल माध्यम बन गेहे। ये कहिन कि सोशल मीडिया हा छत्तीसगढ़ी साहित्य ला बिकास के रस्ता धरा दे हे।
          सोशल मीडिया के माध्यम ले कुछ जुन्ना साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ करे बंदनीय बुता घलो करत हाबयँ। ये मन नेवरिया साहित्यकार मन ला अँगरी धर के लिखे बर सिखोवत हें अउ माँजत घलो हें । खच्चित उँकर ये उदिम छत्तीसगढ़ी साहित्य ला ऊँचाई तक ले जाही। नेट के जमाना मा मोला अइसे लगथे कि भविष्य मा ये प्रिंट मीडिया नँदा जाही अउ सोशल मीडिया के ही बोलबाला रइही जेन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ ले अउ पोठ करही।

मनीराम साहू 'मितान'

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

आज के ये जउन दउर हे ओहर , ऑनलाइन अउ डिजिटल युग संग सोशलमीडिया के जमाना ये । आज कल हमर मन के बीच मा , अइसन - अइसन जिनिस मन के सुविधा अउ बेवस्था होंगे हावय । जीखर मन के आय ले समाज के लोगन मन ला बड़ सहूलियत होवत हावय , अउ काबर नइ होही पहिली जउन काम ला कराय बर हमला  दुरिहा जाय बर पड़त रहिस । ओहर आज कल सबो जिनिस के सुविधा मन हर , हमला अपन तीर तखार म ही मिल जवत हे । आज विज्ञान हर अब्बड़ उन्नति करे के संगे संग , अतेक बड़े - बड़े काम बुता (आविष्कार) मन ला घलो सब करे हावय । जीखर मन के बारे म मनखे मन हर कभू सोचे घलव नइ रहिन होही । पहिली के समय मा लोगन मन हर सब , जउन जउन जिनिस मन के बारे म सोचत रहिस हे । आज विज्ञान के आविष्कार अउ आशीर्वाद ले ओ सबो जिनिस मन संग , ओखर ले कइ गुना जादा हमर मन के बीच मा आज हावय ।
जेमा अगर कहूँ हम गोठ करथन सोशलमीडिया के , ता सोशलमीडिया हर अइसन सुविधा आय । जेमा ले मनखे मन हर अपन खुद के प्रचार संग , काही जिनिस मन के घलव प्रचार अउ प्रसार ला । लोगन मन के बीच मा , अब्बड़ सरलता अउ सहजता ले कर सकथे । ये जउन सोशलमीडिया हे ओहु हर हमर मन के बीच मा नाना प्रकार के हावय : - जउन मन ला हमन - टीवी , रेडियो , मोबाइल , फोन , अउ किसम किसम के समाचार पत्र अउ पत्रिका मन म रोज पढ़त सुनत अउ देखत रहिथन ।
अब हम गोठ करथन हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य मा सोशलमीडिया के , आय के बाद ले होय बदलाव संग सोशलमीडिया मा हमर पहिली के अउ अभी के जउन साहित्यिक (गतिविधि) लेखन के दउर मा पड़े प्रभाव के ।
त हमर पहिली के अउ वरिष्ठ साहित्यकार लोगन मन सब बताथे की पहिली ये सब फेसबुक अउ वाट्सअप के चलन नइ रहिस हे । तेपाय के गिने चुने अउ बड़े बड़े साहित्यकार मन के ही लिखे रचना मन हर अखबार मन म छपत रहिस । फेर आज के दउर मा ये सोशलमीडिया अउ फेसबुक वॉटसअप के आय ले येखर चलागन अइसे होंगे हावय , की आज कल कुछ भी लिखव अउ ओला अपन फेसबुक होय चाहे वॉटसअप म ड़ाल के वाह वाही लुटव , आज के दउर मा येहर सब ले सरल अउ सस्ता सुविधा होंगे हावय । अउ येखरो ले निमगा सरल तो आज कल के अखबार मन म छपना होंगे हावय , पहिली के समय के तुलना मा आज अतेक अखबार होंगे हावय हमर मन के बीच म , की लोगन मन हर कुछ भी लिखथे अउ ओ सब हर छप जथे । जेखर चलते ही आज कल लोगन मन के जउन लेखन के ये स्तर हे ओमा सुधार नइ हो पावत हे । आज सोशलमीडिया के ये दउर हर लोगन मन के दिल अउ दिमाक म अइसे घर कर दे हावय की लोगन मन ला तो बस लिखना हे अउ बस छपना हे । चाहे ओ रचना हर कइसनो राहय , ओ सब ले ओमन ला कोनो फरक नइ पड़य । आज इही हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य के पछुवाय के एक ठन कारन इहु हरय । आज भी हमर मन के बीच मा , हमर महतारी भाखा के जानकार अउ वरिष्ठ साहित्यकार भाषाविद् सुजान मन हर हवै । फेर ओखर ले जादा तो दुख के बात ये हावय की अभी के दउर के जउन नवा लिखइया कलमकार मन हे , तउन मन दू चार लाइन का लिखथे अउ अपन आप ला आज के युवा अउ वरिष्ठ साहित्यकार घलव कहिथे । जउन मन ला न तो येखर बरोबर क ख ग पता राहय । आज सोशलमीडिया हर भले हमन ला अतका सुविधा दे हावय , फेर कहिथे ना फूल के संग म काँटा तो रहिबे करथे । बस इही हे कतकोन मन बने काम बर करथे त कुछ मन हर गलत काम बर , ये अपन अपन समझदारी के बात होथे ।

                                मोहन कुमार निषाद
                            गाँव - लमती , भाटापारा ,
                         जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

                जबले संचार क्रांति आइस हावय तबले नवा नवा सबो चीज मा उन्नति होइस हावय अउ हमर छत्तीसगढ़ साहित्य एखर से अछूता नई हावय। मोबाइल आज हमर जिनगी के एक अंग बनगे हावय अउ एखर प्रभाव छत्तीसगढ़ साहित्य मा भी देखे जा सकथे। आज संचार क्रांति  के माध्यम ले  सोशल मीडिया के नवा नवा हमला प्लेटफार्म मिलिस जइसे *व्हाट्सएप, फेसबुक, ब्लॉगर* अउ ये सबो सुविधा हमर समाज के सब्बो जन मेर पहुँचत हावय। आज हमन न सिर्फ अपन रचना ला मोबाइल के माध्यम ले लिखत हावय अउ प्रचार प्रसार तको करत हावय। आज प्रसार प्रसार करे बर हमर मेर व्हाट्सएप, फेसबुक हावय अउ रचना प्रकाश बर ब्लॉग तको हावय। पहली हमर रचना ला बिना प्रकाशन के सब जन मेर नई पहुँचा पावत रहेँन फेर सोशल मीडिया आय ले एहू समस्या हा खत्म होगय। पहली प्रकाशन में गलती होंगे त ओला सुधारे के भी सुविधा नई रहिस। फेर आज  गूगल के माध्यम ले ब्लॉगर मा रचना ला प्रकाशन कर अपन रचना ला कइयो बछर सुरक्षित रख सकत हावय अउ अगर रचना में कुछ गलती हावय त ओला कभी भी सुधार भी कर सकत हावय। आज लोगन ब्लॉगर के रचना ला कहूँ मेर कोनो जगह जब भी समय मिलही पढ़ सकत हावय, चाहे मनखे दूर दराज देश मा होय या गाँव शहर में होय। आज छत्तीसगढ़ साहित्य ला सोशल मीडिया बहुत बड़े रूप मा पाठक अउ रचनाकार प्रदान करिस हावय अउ करत हावय। मोर सुरता मा सबले पहली छत्तीसगढ़ साहित्य मा ब्लॉगर के उपयोग अउ छत्तीसगढ़ साहित्य ला पढ़े के सुविधा *गुरतुर गोठ* के माध्यम ले *आदरणीय संजीव तिवारी जी* प्रदान करिन अउ उँकर अथक प्रयास ले हमर छत्तीसगढ़ी भाषा के उपयोग ला देख गूगल हा छत्तीसगढ़ी गूगल इंडक कीबोर्ड प्रदान करिन। एकर से हमन विचार कर सकत हावय की आज छत्तीसगढ़ साहित्य ला सोशल मीडया कतका प्रभावित करिस अउ कतका बढ़िया भाषा ला सहेजिस। आज छत्तीसगढ़ साहित्य मा नानम प्रकार के गद्य अउ पद्य ला सोशल मीडया के माध्यम ले सीखत अउ पढ़त हावय। सोशल मीडिया के माध्यम ले *आदरणीय अरुण निगम गुरदेव* हा छंद के छ ऑनलाइन कक्षा चालू करिन आज ओकर परिणामस्वरूप नवा नवा अनेक छन्दकार छत्तीसगढ़ मिल पाइस। मोर बिचार ले आज छत्तीसगढ़ साहित्य के विकास मा सोशल मीडया के महत्वपूर्ण भूमिका हावय अउ एला भुलाये नइ ला सके।
           
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

            छत्तीसगढ़ी भाखा अब धीरे धीरे भाषा मा तब्दील होवत हे। छत्तीसगढ़ के अधिकांश आबादी ए भाषा ला या तो उपयोग करथे या समझथे। सुदूर बस्तर के दंतेवाड़ा अउ बैलाडिला मा भी ए भाषा के जनइया आप ला मिलही ।आप आदमी  सहज संपर्क भाषा के रूप मा एला बोलचाल मा लाथे। कुछ अलग अलग रूप मा पूरा छत्तीसगढ़ मा प्रचलित हे। परन्तु हमर पढ़े लिखे अउ शासन प्रशासन के भाषा अभी नइ बने हे। कतको साहित्यकार मन समर्पित होके छत्तीसगढ़ी मा साहित्य सिरजन करे हें, अउ वर्तमान मा करत हे। आज बहुत अकन अखबार मन नियमित छत्तीसगढ़ी मा साप्ताहिक पेज प्रकाशित करत हें। आकाशवाणी, टेलीविजन ले समाचार के प्रसारण होवत हे। रेल्वे मा हिन्दी अउ अंग्रेजी के संग छत्तीसगढ़ी मा घलो सूचना मिलत हे। जनता के ये सर्वमान्य बोली ला भाषा के दर्जा बर बहुत अकन उदीम साहित्यकार मन करिन।तभे छत्तीसगढ़ सरकार हा 2008 मा राजभाषा के दर्जा दिस।अउ तब ले राजभाषा आयोग के माध्यम ले घलो छत्तीसगढ़ी के समृद्धि बर बहुत अकन आयोजन होवत आवत हे। ये छत्तीसगढ़ी अब तक कुछ पुस्तक अउ कुछ अखबार के साप्ताहिक पन्ना तक ही सीमित रिहिस।
जब ले  मोबाइल आम आदमी के हाथ मा आय हे छत्तीसगढ़ी भाषा ला नवा उड़ान मिल गे हे। साहित्य जगत मा छत्तीसगढ़ी मा लिखने वाला मन के पूछ परख बने हो गए हे। फेसबुक वाट्सप मा छत्तीसगढ़ी मा लिखइया पढ़इया मन के बाढ़ आ गे हे। छत्तीसगढ़ी बर विचार मंथन होवत हे। भाषा के समृद्धि बर चिंतन होवत हे ।आज छत्तीसगढ़ी मा गद्य अउ पद्य के लेखन मा आप ला बहुत सुधार दिखही। व्याकरण अउ भाषायी शुद्धता मा प्रगति आप ला दिखही। छत्तीसगढ़ी मा आज  गीत के साथ साथ छंद बद्ध काव्य के विपुल सामग्री आप ला दिखही, जेकर पहिली अभाव असन रहिस हे। नवगीत गजल सजल जइसे बहुत अकन हिंदी उर्दू के विधा हा घलो छत्तीसगढ़ी भाषा मा सम्मान पावत हे।

सरकार के बहुत अकन विज्ञापन आज छत्तीसगढ़ी मा रहिथे। बाजार भी आज छत्तीसगढ़ी भाषा के महत्व ला समझ के मार्केटिंग बर एकर उपयोग शुरू कर दे हे। शासन प्रशासन के कर्मचारी अधिकारी मन ला छत्तीसगढ़ी लिखे बोले बर प्रशिक्षण शाला लगत हे। छत्तीसगढ़ी आम आदमी के भाषा ए। हम जतके एकर महत्व ला बढ़ाबो, लिखबो पढ़बो बोलबो, सरकार वोतके मजबूर होही।
सोशल मिडिया के आम आदमी तक पहुंच होय ले छत्तीसगढ़ी भाषा ला संजीवनी मिल गे हे। मैशेज आज छत्तीसगढ़ी मा भी ओतके कन लिखे पढ़े जावत हे जतका कन हिंदी मा। बधाई संदेश, सूचना, कथा कहानी, कविता गीत, तीज तिहार के गोठ सबो आज आप ला छत्तीसगढ़ी मा आसानी ले मिलही सोशल मिडिया मा ।नवा नवा लेखक कवि मन बर बहुत सुग्घर मंच हो गए हे फेसबुक वाट्सप मन अउ इंटर्नेट। दूर अंचल के व्यक्ति भी छत्तीसगढ़ी भाषा ला माध्यम बना के आज प्रसिद्धि पावत हे।आंन लाइन सिखे सिखाय, लिखे पढ़े अउ गोठियाय के सुगम माध्यम उपलब्ध होय के कारण आज छत्तीसगढ़ी मा लेखन मा उत्साह दिखत हे । छत्तीसगढ़ी साहित्य निश्चित रूप ले महत्व पावत हे। भविष्य सुंदर हे। आज छत्तीसगढ़ी मा लिखइया मन के पूरा प्रदेश मा एक समर्पित समुह आप ला दिखही ।हम जतके ए ला पढ़े लिखे बोले के माध्यम बनाबो, ओतके एकर साहित्य मान पाही सरकार भी छत्तीसगढ़ी ला अपनाय बर मजबूत होही। जन बल के आगू सरकार ला झूके ला ही पड़थे। छत्तीसगढ़ी भाषा ला समाज के, साहित्य के, सरकार के, प्रशासन के भाषा बनाय बर, जन बल ला मजबूत करे बर पडही। ताकि शासन एला अवइया समय मा स्कूली शिक्षा के माध्यम बनाय। सरकार के कामकाज के भाषा बनाय। छत्तीसगढ़ी भाषा के उत्थान बर सोशल मिडिया हा जन आंदोलन के सर्वोत्तम माध्यम बनत हे।

बलराम चंद्राकर भिलाई
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

     अइसे तो हर भाखा के अपन साहित होथे।जउन म वो भाखा के बोलइया मनखे के दुख-पीरा,हाँसी-ठिठोली, सँग जिनगी जिएँ सबो चलन के दरसन करे जा सकत हे।अइसे भी कहे जाथे, कहूँ कोनो सँस्कृति अउ सभ्यता के नाँव बुताना हे (नाश करना हे)त उँखर साहित ल बिगाड़ दौ।एखर मतलब होइस कि सँस्कृति अउ सभ्यता ल जानना हे त वो देश परदेश के साहित ल पढ़ना चाही। साहित जरूरी नइ हे कि बड़े-बड़े पोथी पथरा के रूप में मिले, साहित के सरूप समे के संग बदलत गे हे अइसे कहे जा सकत हे। काबर कि बहुत कुछ जानकारी जउन अभी तक देखे म मिलथे,वो म शिलालेख या पथरा में लिखे अउ उकेरें चित्र ल भी साहित्य के रूप में लिए जा सकथे। हाट बाजार मंदिर मन म इहाँ-उहाँ बिखरे पड़े मिले हे।
     कुछ साहित मौखिक रूप ले एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी में सरलग आगू बढ़त हे। अइसन हमर छत्तीसगढ़ी साहित बर भी कहे जा सकत हे या माने जा सक थे। इहाँ कथा कहिनी बाबा डोकरी दाई मन ले सुन के कतको पीढ़ी बीत गिन, आजो बबा डोकरी दाई मन ल कई ठो कहिनी किस्सा गाँव के नाती नतुरा मन ल सुनात  देखे जा सकथे।टीवी रेडियो के चलन नइ रहे ले गुड़ी चौक मा, पारा परोस के बड़े-बड़े चौरा म किस्सा कहिनी कहि के थके हारे मनखे  मन के मनोरंजन करथे। धीरे-धीरे समे के संँग हमर पुरखा साहितकार मन एला लिखिन-पढ़िन अउ किताब पोथी के रूप में सहेजिन। आजो सहेजत जात हे।जउन ला लोकसाहित के नाव ले आज भी नवा नवरिया साहित्यकार मन अब सब परकार के छत्तीसगढ़ी साहित्य सिरजत हावे।फेर पढ़ईया के तब रोना रहिस रहे अउ आजो रोना हवे। ए कहे जा सकथे। किताब पढ़ईया अब नहीं के बराबर हे, अइसन काबर हे एखर गोठ करना अभी जरूरी नइ हे। फेर एकर पूर्ति करत नवा उदीम मोबाइल आय हे। जेमा सोशल मीडिया के रूप में व्हाट्सएप,फेसबुक,ट्वीटर गूगल के उपयोग करे जात हे। छोटे बड़े नवा नेवरिया अउ वरिष्ठ साहितकार मन ल एके मंच में देखे जा सकत हे। जेन नवा नेवरिया साहितकार मन ला मंच नइ पात रहिन।उन ल सोशल मीडिया मउका दिस।हर हाथ मोबाइल चलावत सोशल मीडिया में अपन भाखा बोली के बात सुनथे ।ए किसम ले कहे जाय त हर भाषा के साहितकार बर मीडिया बड़े वरदान साबित होत हे। फेर छत्तीसगढ़ी बर बहुते जादा वरदान माने जा सकत हे। कारण इहाँ समाचार पेपर म छत्तीसगढ़ी बहुत कम होथे ।छत्तीसगढ़ी के पर्याप्त समाचार पेपर नइ हे। छत्तीसगढ़ी के रचनाकार ल पाठक तक बरोबर पहुंचे के मौका फेर व्हाट्सएप फेसबुक के जरिया ले मिले हे।
       आज सरकारी योजना मन के अउ राजनीतिक विज्ञापन के परचार परसार भी सोशल मीडिया म भरपूर होवत हे।यहू म छत्तीसगढ़ी के परयोग एक आशा के किरण हे कि सरकार अउ नेता मन मन ले मानथे कि जनता तक छत्तीसगढ़ी ले बात सही ढंग ले पहुँचथे।एखर फायदा साहितकार मन ल उठाना पड़ही।साहित सिरजन करत छत्तीसगढ़ी ल बराबर मान देवाय बर जरूरत के उदीम करँय।
       सम के सँग चलत ही सफल होय जाथे, समे के पाछू चले ले कभू सफल नइ होय जा सकय।इही ढंग ले आज के समे सोशल मीडिया के हावै एकर उपयोग करत छत्तीसगढ़ी भाखा के विस्तार करना पड़ही।
       सोशल मीडिया म छत्तीसगढ़ी भाखा या साहित बर दू ठन बड़े चुनौती दिखथे।एक किस्सा कहिनी बड़े होय ले एला पाठक नइ पढ़े।
दूसर आज के जादा पढ़े लिखे मन अपन लइका मन ला अपन महतारी भाखा ले दूरिहा रखत हें।
       ए दूनो चुनौती ले पार सरकारी पहल ले ही  पाय जा सकथे। पाठ्यक्रम म कहिनी लोकचरित्र के सँग गीत कविता के पढ़ाई के महतारी भाखा माध्यम बनै।
      छत्तीसगढ़ी बर एक बात यहू हे कि बहुत पहिली एकर बोलइया रहिस तब साहितकार नइ रिहिन।आज दूनो हे त एला राजभाषा के सही मान देवाय म कोनो अड़चन नइ होना चाही।

*पोखन लाल जायसवाल*
*पलारी बलौदाबाजार छग.*

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

                  छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करे के उदिम ले चलत छंद के छ रूपी आंदोलन, सोसल मीडिया के भरपूर लाभ उठावत हे। मार्च 2016 ले सतत रूप ले आनलाइन कक्षा गतिमान हे, जिहाँ छत्तीसगढ़ के लगभग 20,22 जिला के नवा अउ जुन्ना कलमकार मन जुड़े हे, अउ छंद विद्या के ज्ञान अर्जित करत हे। आज छंद के छ परिवार म 120 ले आगर साधक संगी मन लगभग 50, 60 प्रकार के छंद म बरोबर कलम चलावत हे, एखर साथ साथ ऑनलाइन छंदमय काव्य गोष्ठी जेन 2017 ले लगातार चलत हे, तेखर माध्यम ले छंद के लय, ताल यति, गति ल घलो सीख जे अपन गायकी ल निखारत हे। छंद के छ के ये उदिम 2016 ले आजो सब ला सँग लेके , शालीनतापूर्वक बरोबर चलत हे। भविष्य म अउ साधक मन घलो जुड़ही, कई झन अभी ले, छंद परिवार के सम्पर्क में हे। आज  छंद के छ के 12 ठन कक्षा जारी हे, जिहाँ साधक मन छत्तीसगढ़ी साहित्य म छंदबद्ध रचना ल बढ़ाये बर लगे हे।
           छंद के छ के ये उदिम पूर्णतः सोसल मीडिया उप्पर आधारित हे, वाट्सअप के माध्यम ले कक्षा अउ काव्य गोष्ठी दूनो संचालित होथे। छत्तीसगढ़ी साहित्य म छंदमय कई ठन पुस्तक छंद के छ के साधक मन निकाले हे, जेमा  निगम गुरुदेव के छंद के छ(जेन ये आंदोलन के आधार बनिस), चोवाराम वर्मा जी के छंद बिरवा, मनीराम मितान जी के आगी सोनाखान के, जगदीश साहू जी के सम्पूर्ण रामायण, रमेश चौहान जी के दोहा के रंग, आँखी रहिके अंधरा आदि एखर आलावा कई झन साधक मनके पुस्तक प्रकासाधीन हे। सोसल मीडिया के सहारा ही, साधक मनके छंद, छंदखजाना ब्लाग म प्रकाशित करे जाथे, जेखर पाठक न सिर्फ हमर राज, हमर देश बल्कि विदेश म घलो दिखथे। रायपुर, बिलासपुर दुर्ग भिलाई म क्लास चलाये ले आसपास के कवि या कोनो रुचि रखइया साधक मन भर जुड़ पातिस, पर सोशल मीडिया के मदद ले न सिर्फ रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई के साधक मन जुड़े हे, बल्कि कोरबा, रायगढ़, जशपुर, कोरिया, कांकेर, राजनादगांव, कवर्धा, बलौदाबाजार, चाम्पा, बेमेतरा, गरियाबंद, महासमुन्द, बस्तर, बालोद, आदि जिला के कलमकार मन घलो जुड़े हे। अउ वाट्सअप के माध्यम ले छंद सीखत हे अउ सीखे के बाद गुरु बनके सीखवत घलो हे। गुरु शिष्य के ये परम्परा (सीखे अउ सीखाय के) पूर्णतः निःस्वार्थ अउ निःशुल्क हे। छत्तीसगढ़ी छंद बर सोसल मीडिया के वाट्सअप बड़का सहारा बनिस, ओखर प्रताप ले आज छत्तीसगढ़ी म लगभग 5000 छंदबद्ध रचना छंद जे छ के साधक मन द्वारा हो चुके हे।
           जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
           बाल्को, कोरबा
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

                 मीडिया ल लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ माने गे हे। प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  के संगे संग  नवा -नवा अवतरे सोशल मीडिया ल जेला हम प्रेम से मोबाइल मीडिया कहि सकथन, एकर रूप कहे जा सकथे। आजकल के बात करन त एमा सोशल मीडिया/मोबाइल मीडिया जेकर फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्वीटर आदि अनेक अंग हे, बड़ सजोर दिखथें।काबर कि एहा  सरी दुनिया मा छा गेहे।पढ़े लिखे मन ल कोन काहय  अनपढ़ तक मन एकर परम भक्त होगे हें।
  जहाँ तक छत्तीसगढ़ी साहित्य उपर सोशल मीडिया के प्रभाव के चर्चा करे जाय त अइसे लागथे कि ए दौर ह छत्तीसगढ़ी साहित्य के स्वर्णकाल जइसे लागथे। ए सोशल मीडिया के खाद-पानी पाके छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ रचनाकार जम्मों लहलहावत दिखथें। गाँव -गाँव म छिपे गुदड़ी के लाल मन के सृजन ल एहा जग जाहिर करत हे। पूरा जिनगी पहा जतिच फेर कभू उँकर रचना नानमुन पेपर के कोनो कोनटनिया तको म नइ छपतिच तेन ह आज चोबीस घन्टा सोशल मीडिया म छपत हे अउ ओला हमर देश प्रदेश के कोन काहय विदेश मन के मनखे मन पढ़त हें।
     आप ल ए जान के सुखद आश्चर्य होही कि-छतीसगढ़ी के नवा जुन्ना छंद साधक मन के  छंद खजाना नाम के एक फेसबुक पेज म संग्रहित होथे तेला यूरोप महाद्वीप के मनखे मन तको पढ़थे।एहा सोशल मीडिया के महिमा आय ओइसने अउ बहुत झन छत्तीसगढ़िया कलाकार, साहित्यकार मन के कृति विश्व व्यापी होवत हे।
       कल्पना करव आज ले 10 --15 साल पहिली कोनो पुरखा साहित्यकार के रचना ल हम पुस्तक म ही पढ़ सकत रहेन । फेर पुस्तक का सबो आप जनता के पहुँच म रहिसे? नइ रहिसे । आज सोशल मीडिया के कृपा ले सब सहज रूप म उपलब्ध हे। मैं प्रणम्य पं सुंदरलाल शर्मा जी , हरि ठाकुर जी , जनकवि कोदू राम दलित जी आदि के पुस्तक ल नइ पढ़े अवँ , न तो उँकर किताब मोर सो हावय फेर सोशल मीडिया के माध्यम ले अब घर बइठे पढ़त हवँ। आँजे दानलीला ल अमर कवि गायक मस्तुरिहा जी के स्वर मा देखे ,सुने हवँ।
     सोशल मीडिया के माध्यम ले सीखना सिखाना घलो होवत हे। साहित्य रस के प्रचार -प्रसार म सोशल मीडिया बड़का भूमिका निभावत हे। छत्तीसगढ़िया साहित्यकार मन के कृति म आधुनिक भाव बोध  के दर्शन होवत हे। साहित्य के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी रीति रिवाज अउ संस्कार ले परिचय ए सोशल मीडिया ह सरी दुनिया ल बहुत तेजी ले करावत हे।  भाषा घलो मँजावत हे ,एमा कोनो शक नइये।हम रचनाकार मन के  परिचय के दायरा ल ए सोशल मीडिया ह  बहुतेच जादा बढ़ावत हे, भले ए आभासी हे। कुछ नइ होना ले कुछ होना तो अच्छा हे। कुल मिलाके सोशल मीडिया ल छत्तीसगढ़ी साहित्य बर वरदान कहे जा सकथे।
        ए तो होइच सोशल मीडिया के छत्तीसगढ़ी साहित्य म चमकत एक पहलू  ।दूसर पहलू ऊपर नजर डारे म वो ह चिटिक धुँधला दिखथे। सबले बड़े करिया धब्बा तो एमा अविश्वनीयता के हाबय।  एके ठन रचना ह आने आने के नाम ले सैंकड़ों पटल म बिन लगाम के दउँड़त रहिथे। पते नइ चलय कि ओकर असली जनक कोन ए। कहूँ के ईंटा कहूँ के रोड़ा ,भानुमति ने कुनबा जोड़ा वाला किस्सा खूब चलत हे। ए हा छत्तीसगढ़ी साहित्य बर शुभ संकेत नोहय। आजकल रचना के चोरी होये ल धर लेहे। आन के रचना म अपन नाम लिख के सोशल मीडिया म डाल देथें अउ ए मीडिया ह पर्रा भर लाई कस बगरा देथे, जेला सकेलत म जीव छूट जही।
      मौलिकता ल तो ए मीडिया ह सुरसा कस मुँह फइलाये लिलत हे। दू चार शब्द आगू पाछू ,भाव जस के तस तहाँ ले होगे मौलिक । सोशल मीडिया अउ गुणवत्ता के बात करना तो बेकारे हे। ऊँचा दुकान अउ फीका पकवान के भरमार हे ।एहा घरोघर कवि,  लेखक ,शायर चुटकी बजावत गढ़ देथे । अइसन चमत्कार कर देना कोनो छोटे मोटे बात आय का?

चोवा राम 'बादल'
हथबन्द, छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

            आज नवा जुग मा अंतर्जाल हा बहुत जादा लाभकारी हे,घर बइठे दुनियाँ के जानकारी हर जिनिस मा मिल जाथे।एखर जीता जागता उदाहरण *छत्तीसगढ़ी छंद*ला श्रद्धेय श्री निगम गुरुदेव द्वारा चलाय गये हे...जेला श्री जितेन्द्र वर्मा वरिष्ट गुरुदेव मन बहुत सुग्घर ढंग ले बताइन है।
बहुत बड़े लाभ हम महिला मन ला होइस हे,घर बइठे हम साहित्य साधना करत हावन अउ जग मा साहित्य ला परोसत हन।एक महिला के कक्षा के नाव लेके बार बार घर ले निकलना नइ हो पाय,आज साहित्य मा रुचि रखने वाला हर महिला अनेको साहित्यिक पटल ,फेसबुक...आदि ले जुड़े हवय अउ लाभ ला घर ब इठे लेत हावय ऐहा आज के जुग मा वरदान हे।
फेर अंनर्तजाल के सकारात्मक अउ नाकारात्मक दुनो पक्ष हे।साहित्य मा ज्ञान के लाभ उठाना अउ आधू बढ़ना सकारात्मक हे अउ दूसर के साहित्य ला अपन नाव देके आधू बढ़ना ए हा नकारात्मक पहलू हे,ऐला अनदेखा नइ करे जा सके।
साहित्य के बात होत हे ता जब कोनो साहित्य एक लेखक अपन हिसाब से लिखथे अउ मिडिया मा डालथे ता ओला अन्य रचनाकार पढ़थे,अउ ओखर सही आकलन करथे,के जेन साहित्य ला परोसे गे हे ओ हा कतका सही हे कतका गलत...!अउ एमा तर्क वितर्क चालू हो जाथे अउ एक सही साहित्य परिणाम के रुप मा निकल के आथे।जेन विश्व बर लाभकारी हे,एखर ले ए लाभ मिलथे के जब कोनो साहित्य हा मिडिया मा डले जाय ता सही सही डाले जाय।आज के जमाना मा मिडिया..बहुत प्रभावी हे हमला सकारात्मक सोच अउ ज्ञान ला अपनाके आधू बढ़ना चाही।

आशा आजाद
मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

                   बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, के मंत्र ला साकार करे मा संचार तंत्र के भूमिका ,आरंभ से लेके आजतक चलायमान हवे।मिडिया के दू रुप आय,प्रिंट मीडिया अउ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रासंगिक दूनो हवे ,फेर वर्तमान मा इलेक्ट्रानिक मीडिया के बहुप्रचलन ले जन जन जुड़े  हवे।अभी आप संग लिखित संवाद के सशक्त माध्यम,इही सोशल मीडियाच हवे।
हर मनखे के मौलिक बिचार, हम बइठे बइठे कोनो बेरा, कोनो दिन मा सकेल लेथन,बेरा मा जुड़ जाथन अउ नवा जुन्ना सबो के गियान, मिनट भर मा ले लेथन।ये सब माया, आभासी संसार ले हवे,जऊन- छत्तीसगढ़ी भाषा,  समाज , साहित्य , संस्कृति विषय ला बगराय के काज ,सोशल मीडिया करत हावे।परिणाम हम छत्तीसगढ़ साहित्य गौरव के चर्चा ,पटल के माध्यम ले करत हन।भाषा के विकास मा साहित्य के योगदान गद्य  पद्ध दूनो विधा मा समकालीन सरोकार के हर पहलू ले जुड़े हवे।
छत्तीसगढ़ी साहित्य ला  सोशल मीडिया मा समृध्द करे के उदमी मा डाॅ  सुधीर शर्मा,  श्री संजीव तिवारी जी मन ,ब्लॉग ,यू ट्यूब चैनल के जरिया छत्तीसगढ़ी साहित्यकार अउ साहित्य के पहुँच बर देश विदेश तक जोड़े मा,भाषा ला राजभाषा के मान देवाय बर नवा नवा उदमी करत हावे।ऐखर ज्वलंत उदाहरण मा   र्व्हाटसअप के जरिया छंद असन कठिन विषय ला आसान बनाय के कारज करत हवे ,गुरु जी अरुण कुमार निगम जी ,सरलग 2016 ले छत्तीसगढ प्रदेश भर मा,छत्तीसगढ़ी साहित्य ला समृध्द करे बर , नवा पीढ़ी गढ़े मा लगे हवे।
आज फेसबुक  ब्लॉग के जरिया लगभग  दस बारह देश मा छत्तीसगढ़ी छंद ला पढ़े जात हे।
छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के विकास क्रम मा आज सोशल मीडिया के माध्यम ले साहित्य कार मन ला सजग बनाए हवे।नित नवा ऐप के क्रांतिकारी कदम ले आज छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य, साहित्य कार संस्कृति के जस चारों खूँट बगरय हवे,बिषय सामग्री  साहित्य  साहित्य कार परिचय, रचना सबो सोशल मीडिया मा असानी ले मिल जथे।सोशल मीडिया ले  छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के  जुडाव,वर्तमान मा तो अपन छाप छोड़त हवे,भविष्य मा  भी मील के पथरा माने जाही।

 *मीता अग्रवाल मधुर
रायपुर छत्तीसगढ़*
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

                     इंटरनेट आये के बाद शुरुआती समय मा पी.सी. फेर लैपटॉप मा हिन्दी के संगेसंग छत्तीसगढ़ी भाषा घलो अपन रंग जमाना चालू करिस। तब साधन संपन्न मन करा पी.सी. अउ लैपटॉप रहिस जेमा ब्लॉग अउ वेबसाइट के माध्यम ले वोमन अपन रचना, आलेख आदि पोस्ट करत रहंय। इंटरनेट वाला मोबाइल फोन आए के बाद उपयोग करने वाला मन के संख्या बढ़गे। ब्लॉगर मन घलो फेसबुक, वाट्सएप, ट्वीटर आदि मा ज्यादा रुचि लेना चालू करिन। आज इंटरनेट वाला फोन सबो झन के पास हे अउ छत्तीसगढ़ मा छत्तीसगढ़ी भाषा मा अपन विचार व्यक्त करना आम बात होगे। लेखन ला सरल बनाए मा मुख्य योगदान हिन्दी-अंग्रेजी के की-बोर्ड ला जाथे। पहिली टाइपिस्ट मन टाइप करत रहिन, आज के की-बोर्ड मा टाइपिंग सीखे के जरूरते नइये। आज सोशल मीडिया मा छत्तीसगढ़ी साहित्य छाए हे। हरेक ला अपन विचार व्यक्त करे के सुविधा उपलब्ध हे।

*संजीव तिवारी जी अपन गुरतुर गोठ डॉट कॉम नाम के वेबसाइट मा छत्तीसगढ़ी साहित्यकार, कलाकार मन के कतको रचना ला संग्रहित करत हें। कई ठन छत्तीसगढ़ी किताब के पी डी एफ तको उहाँ पढ़े बर उपलब्ध हे। पुरखा साहित्यकार मन के कृतित्व अउ व्यक्तित्व, छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउ परम्परा के जानकारी तको गुरतुर गोठ मा संकलित हे* एखर अलावा कई झन साहित्यकार के निजी ब्लॉग मा घलो छत्तीसगढ़ी रचना पढ़े बर उपलब्ध हे। *छन्द के छ - परिवार* के सदस्य मन के छन्द संकलन बर *छन्द खजाना* नाम के ब्लॉग मा निमगा छन्द रचना पढ़े बर उपलब्ध हे। *छत्तीसगढ़ी गद्य खजाना* मा इनकर गद्य रचना पढ़े जा सकथे। *हर छत्तीसगढ़ी साहित्यकार ला अपन एक ब्लॉग जरूर बनाना चाही*। ब्लॉग मा पोस्ट रचना इंटरनेट मा सदा दिन बर सुरक्षित हो जाथे अउ गूगल मा सर्च करके दुनिया के कोनो देश मा पढ़े जा सकथे।

*अरुण कुमार निगम*
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

          सच मा सोशल मीडिया के सदुपयोग करइया बर सोशल मीडिया वरदान साबित होत हे। मँय अपन आप ला येखर ले जोड़ के देखथँव ता लागथे सोशल मीडिया नइ होतिस ता मँय कहाँ होतेंव। मँय निच्चट गवँइहा अउ सायद आप सब झन ले बहुत कम पढ़े लिखे मनखे ला साहित्य के ज्ञान कहाँ ले मिलतिस। सोशल मीडिया नइ होतिस ता ना मोला गुरु मिलतिस ना ज्ञान। ना मोला हिन्दी आय ना अंग्रेजी अउ छत्तीसगढ़ी घलो जो हमर क्षेत्र में बोले जाथे उहीच आत रहिस हे। अब गुरुदेव यानी छंद के छ परिवार ले सोशल मीडिया के माध्यम ले जुड़ के धीरे धीरे बहुत कुछ सीखत हँव अउ कुछ लिख पात हँव।
येखर श्रेय सोशल मीडिया ला ही जाथे की मोला छत्तीसगढ़ी साहित्य उपलब्ध कराइस हे तभे मँय दूसर के ला पढ़ पढ़ के अपन मन मा उमड़त भाव ब्यक्त करे बर सीखत हँव।

अनिल सलाम
गाँव उरैया नयापारा
तहसील नरहरपुर
जिला काँकरे (छ. ग.)
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया

ये समय हा सोशल मीडिया के समय आय कहना अतिशयोक्ति नइ होही।संचार के जउन भी साधन हे वोमा सबले लोकप्रिय सोशल मीडिया हा हवे। येखर पहुँच जनसामान्य तक हावय काबर की आज सबके हाथ मा मोबाइल हावय ।साहित्य बर भी सोशल मीडिया हा संजीवनी साबित होवत हे अउ साहित्य के संगे संग साहित्यकार के लोकप्रिय ता बाढ़त हे ।अतका लोकप्रिय माध्यम के परभाव हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य मा पड़ना भी स्वभाविक हे अउ येमा कोनो दू मत नइहे कि सोशल मीडिया ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के लोकप्रिय ता बाढ़िस हे कतको झिन नवा रचना कार मन ये माध्यम ले अपन पहचान बनात हे।हमर पुरखा साहित्यकार मन के रचना ला संजोये के काम घलो सोशल मीडिया करत हे ।ये सब के बावजूद एक बात धियान मा रखे के लाइक हे कि जब कोनो रचनाकार हा अपन रचना ला समाचार पत्र या कोनो पत्रिका मा भेजथे ता रचना संपादक ला पसंद नइ आवय ता रचना छप नइ पावय उही रचना हा सोशल मीडिया मा डाले ले अपन जघा बना लेथे आह वाह के संगे संग लाइक कमेंट आय लगथे।रचनाकार के छपास के पीरा शांत हो जाथे आत्ममुग्धता मा रचना कार अपन आप ला बहुत बड़े साहित्यकार माने लगथे।लोकप्रिय ता के आघू गुणवत्ता छोट हो जाथे।जबकि संपादक के दुवारा कोनो रचना ला अस्वीकृत करे के बाद भले मन मा दुख होथे पर अउ अच्छा लिखे के प्रेरणा घलो मिलथे।तभो ले सोशल मीडिया के रूप मा छत्तीसगढ़ी साहित्य ला एक बेहतर प्लेटफार्म मिले हे जेखर से छत्तीसगढ़ी साहित्य के लोकप्रियता चारो मुड़ा मा बगरत हे ।साहित्यकार मन ला ये बात धियान म रखना परही कि वोमन सिरफ आह वाह से खुश मत होंय
काबर कि लोकप्रियता ही हा उत्कृष्टता के पैमाना नोहय।

चित्रा श्रीवास
बिलासपुर छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


कुलदीप सिन्हा: आज के युग मा हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ करे बर सोशल मीडिया हा जेन काम करे हवे वो कखरो ले छिपे नइ हे। येखर पहिली हमर बड़े बड़े गुनिक जन के विचार ला पुस्तक अउ समाचार पत्र के माध्यम ले पढ़त अउ सुनत रेहेन। जब ले हमर बीच मा सोशल मीडिया हा आइस हे तब ले हमन ला फेसबुक वाट्सएप इंस्टाग्राम अउ न जाने कतना समूह चलत हे जेन हा कोई ना कोई रूप में हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य ला प्रभावित करत हे। हमर मन के पढ़ाई के समय मा सोशल मीडिया हा जनम घलो नइ धरे रिहिस तब बड़े बड़े कवि अउ लेखक मन के नाम ला पढ़न ता अइसे लागे येमन हा हमर बीच के मनखे नोहय। येमन हा कोनो अलग मनखे होवत होही जेन मन हा लिखथे पढ़थे। हमन तो कभू सपना में घलो नइ सोंचे रेहे होबो कि अइसन दु आखर ला लिख लेबो। हमन ला आज जेन जगा मिले हावे वोमा आदरणीय गुरुदेव मन के संगे संग सोशल मीडिया के घलो हाथ हावे, येमा कोनो दु मत के बात नइ हे।
      आज के जमाना मा हर पढ़े लिखे मनखे मन अपन बात ला समाज के बीच मा कोनो ना कोनो माध्यम ले रख सकत हे, अउ रखत घलो हे। चाहे वोला कोनो पढ़े या झन पढ़े। फेर वो लिखइया के विचार हम सबके बीच मा आ जाथे। मेहा बात करत रेहेवँ हमर महतारी भाखा के विकास मा सोशल मीडिया के का योगदान हे, वोखर बर मेहा अतनी कही सकत हौं कि,  आज जेन जगा हमर साहित्य खड़े हे वोमा वोखर बहुत बड़े भूमिका हे।

कुलदीप सिन्हा "दीप"
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

धनराज साहू: *छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया*

बड़ सुग्घर अकन अउ सँहराये लइक एक से बढ़के एक विचार समूह म आइस। हम नवा पीढ़ी के सिखइया मन बर ,सोशल मीडिया बरदान बरोबर आय। सोशल मीडिया उपर जतेक गोठ करे जा सकत हे , हमर साहित्यकार आदरणीय मन करिन हे। आज के नावा पीढ़ी आघु के साहित्यकार मन सँग परिचित नइ रिहिन। ओकर मूल कारण पुस्तक अउ पत्र-पत्रिका के अभाव। जुन्ना सियान मन मे बहुत कम झन के पुस्तक अउ पत्र-पत्रिका म रचना छपे हे। वर्तमान म हम जतेक रचनाकार से परिचित हन ओकर ले जादा आज भी दबे- छुपे हावय। उँकर खोजबीन करके रचना मन ल सकेले जाय तो , मोला विश्वास हे , एक से बढ़के एक निमगा लिखैय्या साहित्य कार मन सँग परिचित होबो साथ ही लोक कला- लोक साहित्य अउ अन्य विधा मन के रचना मिलही। ये क्षेत्र म आदरणीय सुधीर शर्मा जी के लोकाक्षर पत्रिका के जतेक मान किया जाय कम हावय। फेर अभी भी जतेक उदिम होय हे , अइसने उदिम अउ अन्य मन ल भी करे के जरूरत हे।
  ओ तो भला हो सोशल मीडिया के जौन आज गुमनाम कवि-साहित्यकार मन के रचना कृतित्व/व्यक्तित्व के जानकारी कौनो-कौनो के पोस्ट के माध्यम से पता चल जाथे।
   कतको कवि साहित्यकार मन आज ले कइ बछर आघु पत्र पत्रिका अउ आकाशवाणी / कवि सम्मेलन म छपे अउ प्रस्तुति देंहे । फेर दुख तब होथे जब उँकर मन के नाँव कोनो साहित्य सम्मेलन अउ अन्य साहित्यिक मँच मन म नइ लिये जाए। जबकि जुन्ना साहित्यकार मन बहुत झन के कृतित्व से परिचित हें। जब तक उन मन ल मान दिये नइ जाही तो फिर नवा पीढ़ी उन ल कइसे जान पाही।आज भी कुछ साहित्यकारअउ उँकर रचना  ऊपर ही चर्चा होथे , छत्तीसगढ़ म साहित्यकार अउ साहित्य के कौनो कमी नइ हे, अउ जब तक उन रचनाकार मन ऊपर उँकर रचना ऊपर शुद्ध मन से , निस्वार्थ चर्चा अउ समीक्षा नइ करे जाही तब तक हमर छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी के लिए सोंच अधूरा रही।
  सोशल मीडिया के माध्यम से जौन गुमनाम साहित्यकार मन के बारे म जानकारी मिलथे, उँकर सूची बनाके उँकर जन्म जयंती या पुण्य तिथि म व्यक्तित्व/कृतित्व पर ऊपर चर्चा हो , ताकि सोशल मीडिया म जुड़े जम्मो जन मानस तक उँकर जानकारी पहुँचय । इही उदिम हर दिवंगत रचनाकार मन के लिए सही श्रद्धांजलि होही।

धनराज साहू

Monday, 29 June 2020

छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ समाज, विषय म छंद परिवार के साधक मनके विचार




छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ समाज, विषय म छंद परिवार के साधक मनके विचार


 छत्तीसगढ़ के समाज अउ साहित्य

     हमर छतीसगढ़ के समाज के सबले बड़े गुन के नाता रिश्ता म व्यापरिकता अउ गणितीय सुभाव यानि लेन देन , जोड़ घटाव नइये ..। दूसर बात के जनम - मरन , सुख - दुख , तीज- तिहार  मं  छोटे बड़े सबो जात बिरादरी के मनसे के जथा जोग मान सनमान करे जाथे । धोबनिन काकी , मरदनीया बड़ा , पहटिया भैया , तुरकिन बड़े दाई के चूरी , पंडित बबा के पूजा पाठ , अउ बहुत अकन उदाहरण हे । त समाज के इन्ही मन के रहन - सहन , सोच - विचार ल तो साहित्यकार मन लिखथे चाहे ओहर गद्य होय  या पद्य ...साहित्यिक विधा के चुनाव तो लिखइया मन अपन रुचि अनुसार करथें । आज के विमर्श के विषय अनुरूप हमन देखबो के छत्तीसगढ़ी साहित्य मं समाज के बदलत सरूप ल कतका अउ कोन तरह से जघा मिलत आवत हे ।

सरला शर्मा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
आशा देशमुख: समाज अउ साहित्य

हर जाति हर मनखे के खास महत्व होथे।
पहली ये नियम सामाजिक व्यवस्था अउ आपसी तालमेल के लिए काम बाँटे रहिन।
धीरे धीरे ये छुआ छूत ऊंच नीच के तुच्छ भावना घर कर लिस।
येखर पाछु अज्ञानता अशिक्षा ही महत्वपूर्ण कारण हे।
सीधे सरल मन में ये प्रश्न नइ आइस कि हमन ला काबर अइसने ऊंच नीच के डोरी में बाँधे है समाज हा।
सबो मनखे एक बरोबर हे।
सिर्फ काम के विभाजन में छोटे बड़े नइ होवय।

सबो के सहयोग से ही समाज काम करथे।
सबो के बरोबर सम्मान होवत रहय।
आपसी भाई चारा रहय।
सबो के जीविका रोजगार चलय,
सबके काम निपटे ,कोनो शोषक ,शोषित मत रहय।

आशा देशमुख
एनटीपीसी कोरबा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

तइहा-तइहा के लोक साहित्य गाँव-गँवइ के गुणी अउ सियान मनखे के अँतस म भरे राहय,जौन समे-समे म मुँह अँखरा निकले। ये साहित्य के न कँहू लिखैय्या के नाँव ने , न उँकर एको किताब।
   तभो ले लोक साहित्य म हमर छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति अउ परंपरा के प्रभाव ह , जन मानस म आज तक भरे हावय। जोंन ह ददरिया , सुवा , करमा , राहस , डंडा गीत , लोक धर्मी गीत , गौरवगाथा गीत आदि म झलकत हावय। एखर ले अलग छोटे-छोटे गियान के पद , हाना- बिस्कुटक , साखी-जनउला जानकारी लोक जीवन के सँस्कार ल बतावत रहिथे।
हमर ये लोक साहित्य ल खोजे म  देखे म लागथे की छत्तीसगढ़ के जम्मो साहित्य ह उपकार करे हावय। एकरे ले अँजोर पाके साहित्य के मनीषी मन साधू-संत मन छत्तीसगढ़ी भाखा म साहित्य के रचना कर सकिन।
  कइ ठन सदी निकलगे ये साहित्य ह परंपरा ले ममहात आवत हे , पहिली के नाँचा -गम्मत , भजन म , लोक गाथा मन म , परंपरा गीत ले मनोरंजन होवत रिहिस। आजतक लोक नाटिका , पंडवानी , अहिमन , रेवारानी , केवला रानी , फुलबासन , फुलकुँवर , कल्याण सहाय के गाथा, राजा बीर सिंह , ढोला-मारू , लोरिक चंदा ....आदि म लोक साहित्य के गुण ह उजागर होथे.. बगरत हे ...। लोक मानस ह सत के पथ ल , देखत अउ आनंद उठावत पीढ़ी दर पीढ़ी आवत हे।
   छत्तीसगढ़ के लोक साहित्य ह इँहा के जन-जन के जीवन म समाय हे। जनम से लेके मृत्यु तक हमर लोक में सँस्कार गीत अउ नेम-धेम हावय...सोहर गीत , बिहाव सँस्कार गीत , जगन्नाथी गीत ...देव धामी मनौति गीत , किसानी गीत , तीज-तिहार परब मन मे गीत...अउ तो अउ छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेल कूद के गीत मन भी छत्तीसगढ़ के जीवन म लोक संस्कृति के छाप ह जन -जन में रचे बसे दिखथे।
  फेर अब ये लोक संस्कृति अउ परंपरा ले नवा पीढ़ी हर धुरिहात हावे। हमर कइ संस्कार, रीति-नीति आधुनिकीकरण के नाँव म धीरे-धीरे खीरत हावय..जेन ल सहेजे अउ पोठ करे के उदिम करना परही। अउ एकर जिम्मेदारी साहित्यकार , लोक कलाकार के सँग आम जन मानस ल घलो हावय तभे हमर कोठी के साहित्य-संस्कार-परंपरा अउ लोक के रक्षा हो पाही।

धनराज साहू बागबाहरा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 हमर छत्तीसगढ़ मा कौनो विद्या के कमी नइ हावय फेर उचित मार्गदर्शन के अभाव मा ओकर कला या विद्या हा समाज ऊपर गलत प्रभाव डाल देथे। हमर समाज ला सुधारना हावय त सबले पहली अपन आप ला सुधारना होही। आधुनिक विचार के संगे संग जुन्ना विचार मा सामंजस्य लाये ला पहड़ी। लोक कलाकार अउ साहित्यकार मन ला लिखे या दिखाए ले पहली सोचे ला परही की हम समाज ला का संदेश देत हन अउ एकर प्रभाव समाज मा का परही? अच्छा परही की बुरा, काबर की मनखे जेला देखथे,सुनथे अउ पढ़ते उहि ला व्यवहार मा घलो लाथे। का हमन अपन संस्कृति के मजाक उड़ाके समाज ला सुधार सकथन? का हमन चुटकुला बाजी कविता लिख पढ़के समाज ला संदेश दे सकथन? नहीं ता फेर अइसन करइया ला साहित्य या समाज मा स्थान अउ सम्मान काबर? जब तक हमन अइसन मनखे ला साहित्य अउ समाज मा स्थान देबो अउ सम्मान करबो तब तक  हमर समाज मा उचित बदलाव के कल्पना नई कर सकन। अगर नवा साहित्यकार आय त ओला उचित मार्गदर्शन दव अउ जुन्ना हरय ता ओला स्थान मत दव फेर ओकर सोच जरूर बदल जाही। साहित्य होय या लोक कलाकार हमन अपन बात ला अइसन परोसन की जन मानस के दिमाग हमर बात ला घर कर लेवय अउ अपन व्यवहार मा लावय। अगर हमन छत्तीसगढ़ के व्यंजन ला छोड़ पिज्जा बर्गर के प्रचार प्रसार करबो त चीला फरा के जो गुन हे ओकर से हमर पीढ़ी वंचित हो जाही ना। जब लोक कलाकार, हमर सिनिमा, साहित्यकार मन  समाज के जो कुरीति हवय ओकर खुलके विरोध अउ प्रचार प्रसार करही अउ ये बात ला जन मानस सुनही, पढ़ही, देखही त काबर बदलाव नई आही। जब तक हमन घर परिवार अउ अपन से उठके समाज हित अउ देश हित के बारे मा नई सोचबो तब तक बदलाव कहा ले आही ?

-हेमलाल साहू

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

कहे गे हे "साहित्य समाज के दर्पण आय"। मैं सोंचत हंव छत्तीसगढ़ के संबंध मा ए बात। का हमर साहित्य मा हम अपन वर्तमान ला शामिल करथन, कि परंपरा रीति रिवाज के नाव मा सिरिफ अतीत मा फदके रहिथन? सम सामयिक विषय ला हम कतका कन अपन लेखन मा शामिल करथन?हमर आसपास के अखबार, संचार माध्यम हमर कतका कन बात करथे? हमर समस्या हमर गोठ बात ला आगू लाय के अउ सुलझाय के कतका उदीम करथे हमर कलम? का हमर रहन - सहन,मान- मर्यादा, पढ़ई - लिखई अउ पद प्रतिष्ठा बर हमर कलम संसो करथे? का हमर कलम गांव के समारू अउ सुकवारो तक जाथे? ओकर आरो ले बर? का हमर कलम दुनिया मा होवत परिवर्तन ले हम ला जोड़े के कोशिश करथे? अउ हम अपन अंदर परिवर्तन ला स्वीकार करे के कतका हिम्मत करथन? अगर ये बात मन ला हमर साहित्य नइ काहत होही त आईना कइसे बनही?
 समाज ला गढ़े बर अउ आगू बढ़े बर साहित्य ला पोठ करना जरूरी हे, हम अपन भाखा मा प्रारंभिक शिक्षा लेवन, अपन दाई के बोली मा, ए माटी के मुल निवासी के बोली मा। हम झूठ लिखथन कि मातृभाषा का हरे, सच लिखव छत्तीसगढ़ी। हिंदी अउ अंग्रेजी ला अनिवार्य स्वीकारव फेर छत्तीसगढ़ी ही छत्तीसगढ़ के संदर्भ मा स्वाभिमान के भाषा आय। ए ला हम जतके पोठ करबो, हमर गांव गंवई गरीब किसान ओतके वाचाल होही, अपन बात ला संप्रेषित करे मा सक्षम होही। अउ तभे हमर साहित्य मन घलो पढ़े जाही, पोठ होही, मान पाही, सम्मान पाही अउ दुनिया मा पुछ परख बाढ़ही।जइसे तमिल हे मराठी हे उडिया हे बंगला हे। वइसने छत्तीसगढ़ी घलो हे।अइ नइहे ते हमर संकल्प होय कि अपन भाखा ला समृद्ध करे के। तभे हम पार पाबो।
अगर साहित्य समाज के दर्पण हरे। फेर ए बात हमर संबंध मा कइसे मा सच होही? *"चेहरा देखना हे तो दर्पण के सामने खड़े होय बर पड़थे। छत्तीसगढ़ी ला खड़ा करबो तभे तो साहित्य के दर्पण मा हमू मन वाजिब मा दिखबो, वरना परछाई बन के रह जबो।"*

बलराम चंद्राकर भिलाई

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

शशि साहू

 साहित्य ला समाज के दर्पण कथे। जेमा अवइय्या पीढ़ी हर बीते पीढ़ी के सुख - दुख ला देखके अपन भविष्य के जोखा जमाथे। आज देखव कतको लइका मन उच्च शिक्षा ले के खेती बाड़ी, मछली -पालन, पशु पालन, करत हे अउ सफल होत हे। रचनाकार मन घलो अपन रचना मा खेती - बाड़ी, नागर- बियासी, नदी - नरवा, ला विषय बना के लिखत हे।
मोबाइल, लैपटॉप, कम्प्यूटर  जानना घलो जरूरी हे। आज के बेरा मा ये सब के बिना हम खोरवा हो जबो। अइसे लागथे, हम पाछू लहुटना भी चाहथन अउ आघू बढ़ना भी चाहथन। जेन अच्छा संकेत ये। गाँव मा स्वास्थ्य सुविधा हो। बरोबर नेट चले। बिजली पानी के सहज व्यवस्था होय ले, गाँव असन रहे के दूसर जघा नइ हे। देखव ना मजदूर मन के आय के पहिली गाँवेच हर कोरोना ले सुरंक्षित रिहिसे। फेर गाँव मा राजनीति अउ शराब के धुर्रा उड़त हे।
होली, देवारी  दशहरा, गौरी गौरा कोनो भी तिहार बिगर शराब, लड़ाई झगरा के पूरा नइ होय।

खेती अधिया कट्टू मा चलत हे। गाय रखना झंझट हे, रूख- राई बिन खेत जंगल भाय -भाय करत हे। 30 बछर पहिली जेन गाँव ला छोड़ के आय हन, अब वो गाँव कहाँ हे। ये बात ला आप सबो जानथव,
मस्तुरिया जी कथे- कतेक ला सइहँव। पीरा ला तो कइहँव।
जय जोहार

शशि साहू
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

साहित्य बगैर समाज गूंगा हे अउ समाज बगैर साहित्य हा कोरा कल्पना मात्र आय। दोनो हा अपन अस्तित्व अउ बिकास बर एक दूसर के मुँह ताक थे।
जब तक साहित्यकार मन स्व हित ला छोड़ के परहित बर काम नइ करही तब तक साहित्य के अउ समाज के बिकास संभव नइये।
आज हमन बात बड़का बड़का गोठ बात करथन फेर जब कभू अपन अस्मिता अउ भाखा रीति रिवाज, परंपरा संस्कृति बचाय के बात आथे त हमन अलग अलग रद्दा चुन लेथन।
व्यक्तिगत हित ल छोड़ के लोक हित बर काम करबो तभे जरुर समाज के सही रूप साहित्य मा देखे बर मिलही।तभे अपन भाखा संस्कृति, परंपरा पोठ बनही।

विजेन्द्र वर्मा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

साहित्य ह समाज के दरपन होथे।ऐ दूनो एकठन सिक्का के दू ठन भाग आवय, साहित्य ह मनखे ल नवा-नवा सीख अउ जगाए बर वरदान हरय। ऐखर अस्तित्व कवि अउ लेखक बर बंधाए नइ हे।
"अपनेच सुख"बर लिखे गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस आज समाज के सुख आवय जेन आज समाज के सुख बर, समाज ल नवा रद्दा मे जाए बर एक आदर्श ग्रंथ बनगे हवय। साहित्य ह शक्ति के नवा उदिम आवय। समाज के काम-बुता लोगन मन बर चिहुर अउ असकट ले भरे हवय।अउ साहित्य म पोठ भाव लोगन मन ल जगाए बर हवय।जेखर मनखे जीवन के ऊपर म असर ह झटकुन दिखथे। दया,मया अउ सेवा भाव जइसन मनखे मा गुन हा समाथे,जौन ह समाज म साहित्य के माध्यम ले ही हो सकथे।
           आज के नवा जुग ह दुनिया भर के खोजे के जुग हरय।अउ हमन पाश्चात्य संस्कृति के रंग म अतका बूड़ गे हवन अउ ऐमा ले निकले बर हमन अपन बिनास समझत हवन।ऐ विज्ञान के बाढ़त पांव है हमर मनोबल ल रटरट ले टोर के रख दे हवय।अउ हमर समाज ल अल्लर होवत जावत हे,अउ नवा सभ्यता के पुजारी मन बैठे-बैठे हमर तमाशा देखत हवय। समाज ल पोठ साहित्य के अगोरा अउ जरुरत हवय जेखर ले समाज के भला हो सकय।हमन साहित्य के नवा-नवा रुप ल देवन। हमर काव्य लेखन हमर करम के आधार म होवय, कोनो कहानी हमर जिनगी के अंतस म उतरै अउ गीत के बीजहा हमर हिरदै म जामय।हमर समाज ह जुन्ना मान सम्मान अउ वैभव पा सकय। ऐखर बर हम साहित्य ल नवा-नवा अउ जादा ले जादा बढ़ावा देवन।


मिनेश कुमार साहू
गंडई भुरभुसी/माना कैंप रायपुर
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

मीता अग्रवाल: साहित्य अउ समाज एक सिक्का के दू पहलू आय।बिना समाज के  साहित्य  को कोनो विधा नई गढ़े जा सकय, साहित्य के सरलग विकास ला देखन तव, बेरा बेरा के बात समाज के सरुप ,वो जुग ला देखा देथे।आज नवा नवा विषय मा लघुकथा, कहनी ,कविता अउ छंद मा भी छत्तीसगढ़ के वर्तमान समाज के भाव बोध देखे  जा सकथे।जेमा आधुनिक सभ्यता के प्रभाव के संग अपन खानपान ,रीति रिवाज,बोलचाल प्रभावित होइस फेर, अपन जर- जमीन ला नइ बिसारिस।विमर्श के ये बिंदु सावचेत करा थे कि अपन भासा संस्कृति अउ समाज बर कतका सचेत हवा साहित्य ।सब ले जादा हम लोकगीतअउगाथा ,कहानी  के माध्यम ले हमर छत्तीसगढ़ी समाज के प्रतिबिम्ब साहित्य मा पाथन।जउन बीत गे तेला हम अभी साहित्य मा पढ़त हन,आज जउन लिखे जात हवे आने वाला पीढ़ी मन बर एक दरपन के काम करही।इही पाय के कहे जथे,साहित्य समाज के दर्पण होथे।
आज हमन अतका झन, समूह मा जोरियाय हन,यहू समाज हे साहित के बारे मा सोचत हे,ये नवाचार उदमी, नवाचार गढिइया समाज, काली ,साहित्य के भाव होही।
साहित्य कोनो भाखा के रहाय हमें शा समाज के  कई पक्ष रथे,तेला उजागर करे मा सरलग लगे रथे।जरवत हे पढ़े  के।

मीता अग्रवाल रायपुर
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 शोभमोहन श्रीवास्तव: छत्तीसगढ़ के समाज अउ साहित्य

 समाज मा साहित्य हे अउ साहित्य में समाज हे,  दूनो आ अलग करके नइ देखे जा सकै, जइसे समाज रही वइसने साहित्य हर ओला लिखही, कोनो भी रचनाकार अपन तीरतखार मा जेन देखके अनुभव करथे उही ला लिपिबद्ध करथे, साहित्य ला तेकरे सेती विद्वान मन समाज के दर्पण कहें हें । साहित्य समाज के लिखित अउ सबले जादा प्रामाणिक दस्तावेज होथे, बशर्ते लिखइया हर लबरा झन होय । अलग अलग भाषा के साहित्य मा एक्के बात मा अतेक लालित्य कहाँ ले आथे, काबर कि भाव हर जब भाषा के चोला धरथे तब ओकर तत्व एक ही होय के बावजूद पूरा के पूरा नवीनीकरण हो जाथे । उदाहरण बर ज इसे ब्रजभाषा के कवि हर ग्वाला ग्वालिन मनके  चित्रण करथे तब ब्रज भाषा के सुगंध बगरथे अउ जब उही प्रसंग उपर छत्तीसगढ़ी के कवि पं. सुंदरलाल शर्मा हर दानलीली लिखिन तब ओमा रउताइन मनके छत्तीसगढ़ी गहना-गूठा दुहना, टुकना, तउला, कनउजी, कतकोन शब्द मन साहित्य संस्कार मा संस्कारित होके आँखी मा झूले लगगे ।

 साहित्यकार हर अपन समाज के तत्व ला जब संस्कारित करके समाज ला फेर बहुराथे तेन प्रक्रिया मा भाव के तरंग मा आखर मा लुकाय भाव मन उजराथे ।
 तभे समाज के मुहरन पंछार होथे ।

छत्तीसगढ़ी साहित्य के भरे पूरे ओरी हे बात बात के हाना, कहावत, मुहावरा, एकर प्रमाण हे । वर्तमान छत्तीसगढ़ी साहित्य सोनहा इतिहास लिखत हे ।

शोभामोहन श्रीवास्तव
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

आशा आजाद: छत्तीसगढ़ के समाज अउ साहित्य

साहित्य हा हमर समाज बर हिरदे ले निकले ओ भाव हे जेला हम अपन आँखी मा देख के चाहे ओ कोनो सुख-दुख,कोनो अइसन पीरा जे आज के कलजुग मा घटत हावै...जो आज नइ होना चाही...ओला अपन साहित्य के माध्यम ले सत्य घटना ला हमला लिखना चाही।जेखर ले मनखे मनखे साहित्य ला पढ़के गलत रद्दा ला पूरा त्याग दय।तब साहित्य के माध्यम ले देश के उत्थान होही।साहित्य मा गद्य या पद्य के माध्यम ले एक संदेश होना चाही जेन आज के कलजुग मा होत भ्रष्टाचार, अनाचार,पाप,कुरिती,..आदि जम्मो ला मिटाये के संदेश छुपे होना चाही।
हमर द्वारा जो रचना लिखे जाथे ओ हा पूरा के पूरा समाज बर समर्पित होथे अउ समाज के गतिविधि ला देख के साहित्य सिरजन करे जाथे।मोर बिचार ले साहित्य बर अगर कोनो साहित्य परोसे जाथे(चाहे छत्तीसगढ़ी भाखा होय के हिंदी भाखा)ता ओहा सरल अउ सहज भाखा मा होना चाही,काबर के समाज के रहोइया मन साहित्य ला पढ़े बर तब आकर्षित होही जब ओ सरल अउ सहज भाषा मा लिखाय होही।जेन अनमोल शब्द अउ ज्ञान उँखर दिमाग ला तुरंते छू जाय,अउ समाज मा जागरूकता हा नित प्रतिदिन बाढ़य।

समाज के एक ठन सोच हा नित उपजथे ओहे..कोनो रचना ला जब ओ पढ़थे था बीच मा बहुत कठिन शब्द आ जथे,उहा ओ रुक जथे..काबर के ओ शब्द हा लेखक ला मालूम रहिथे फेर समाज हा अइसन शब्द चाहत हे जेला बिना अटकाल (बिना प्रश्नवाचक के) रचना के अंत तक पहुंच जाय, अउ जेन संदेश लेखक देना चाहत हे ओ पहुँच जाय।तब हमर साहित्य हा सही मायने मा सही दिशा मा जात हे।
हमर परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री अरुण निगम जी कहिथे के एक अच्छा साहित्य लिखे बर हमला साहित्य ला पढ़ना बहुत जरुरी होथे।बगैर पढ़े हम समाज ला अच्छा साहित्य नइ परोसे सकन। ऐ बात सोला आना सही हे साहित्य ला हमला पढ़ना चाही ओखर गहराई तक जाना चाही के ओमा कोन भाव अउ का संदेश छुपे हे।ओखर बाद हमला ओ साहित्य ला आगे ले जाय बर नवा कछु गढ़ना चाही,अउ आज के नावा जुग मा तकनीकी के माध्यम ले बहुत अकन साधन मिल गे हे,ता हमला अच्छा साहित्य ला समाज बर परोसे के नित्य प्रयास करना चाही।
जय जोहार छंद छत्तीसगढ़

आशा आजाद
मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

साहित्य का हरय?

हर मनखे अपन आप मा कवि, लेखक, दार्शनिक, विचारक, वैज्ञानिक होथे। सबके अपन मुहअँखरा नहिते लिखित साहित्य होथे। सबे झन अंतस मा उठत भाव ला स्वर देथे, शब्द के मर्यादा मा गुँतथे, इही शब्द के गँथना हा साहित्य हरय।

साहित्य के बूता का हरय?

साहित्य के बूता हरय विचार, ज्ञान, विद्या अउ जानकारी ला बाँटना। ए बूता मा मनोरंजन, जनजागरण घलो सँघरे हवय।

साहित्य समाज के दर्पण कइसे?

जइसे मनखे मन तन से सजे सँवरे के बूता ला दरपन ला देख के करथें, वइसने मन, बुद्धि से सजे सँवरे मा साहित्य थेभा होथे। दूसर बात दरपन मा ना भूत दिखे ना भविष्य, सिरिफ वर्तमान हा दिखथे। साहित्य मा घलो वोकर रचना के समय के समाज हा स्पष्ट दिखथे, कहे के मतलब समाज कइसे रीहिस होही पढ़ के पता लगाये जा सकथे। साहित्यकार मनगणित करके वर्तमान अइसे हे ता बीते समय कइसे रीहिस होही अउ अवइया समय कइसे होही येखर अंदाजा लगा लेथे।

छत्तीसगढ़ के साहित्य अउ समाज -

छत्तीसगढ़ मा अभी तक उपलब्ध साहित्य मा कुछ ला पढ़े के बाद पाय हौं, के इहाँ के साहित्य मा सब बर यहां तक के चिरई चुरगुन, बेंदरा, बिलाई, कुकुर मन बर दया, मया, समरसता के भाव भरे हे। हमर समाज के सोच हा अइसन हवय तभे ये बात हा साहित्य मा हे। छत्तीसगढ़िया मन हमेशा नारी के सम्मान करे हे, बेटी-बहिनी के मान सम्मान के प्रति समर्पित हे। माटी ला महतारी कहइया छत्तीसगढ़ के साहित्य हरय। दुनिया भर मा भारत ला दाई कहिथन,भारत भर मा
छत्तीसगढ़ ला दाई कहिथन, पंजाब दाई, गुजरात दाई नइ सुने हँव। बहुत झन मन कहिथें इहाँ छुआछूत हे, लेकिन मँय येखर समर्थन नइ करँव, सदा दिन ले पौनी पसारी हमर राज मा चलत आवत हे, गांव या घर के कोनो भी बूता ला सब जात के सहयोग ले करथन, अउ सम्मान देखव हमर छत्तीसगढ़ के सब सेवक मन ला ठाकुर कहिथन। दुकालू यादव के जस गीत सुनव जेमा माता के सब जिनीस मन अलग अलग जात के घर ले आथे कहिके उन गाथें, ये गीत हमर लोकगीत लोकसाहित्य के प्राण हरय, हमर सामाजिक समरसता के पहिचान हरय।

विरेन्द्र कुमार साहू,
 बोड़राबाँधा(पांडुका) जिला गरियाबंद।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ समाज-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

           चाहे कोनो भाँखा होय, साहित्य समाज ले उपजथे अउ समाज म ही घुल मिल जाथे। फेर साहित्य के समाज म मानव भर मन नइ आय, ओखर समाज म पेड़ पौधा, जीव जंतु अउ जम्मो जिनिस शामिल हे, जेखर कल्पना कलम करथे। ये मोर पोगरी बिचार आय, कोनो सहमत हो सकथे त कतको नही घलो। साहित्य समाज के बुराई ल घलो उकेर के अच्छाई कोती खींचे के प्रयास करथे। जेन साहित्य म समाज विशेष बर कोनो चिंतन मनन नइ रहय, उहू का साहित्य। चाहे जुन्ना साहित्य होय या फेर नवा, सबो तो अपन कहानी कन्थली अउ कविता के माध्यम ले समाज ल जगाये के काम करे हे, अउ करत घलो हे। बुराई के परिणाम दुखदाई अउ अच्छाई ल सुखदाई बताय हे, अउ बताना घलो चाही, नही ते साहित्य म भटकाव आ जाही। यथार्थ घलो इही आय। मनखे म दया मया के  संचार करके पेड़ पात, जीव जंतु, जल थल वायु अउ जम्मो जिनिस म सकारात्मक भाव समाज म साहित्य जगाथे। तभो तो साहित्य ल समाज के दर्पण घलो केहे जाथे। अउ जब साहित्य दर्पण आय त वोमा समाज के गुण दोष दिखना भी चाही। जेन लेख समाज म विकृति पैदा करय, वो साहित्य कइसे हो सकथे।साहित्य भाँखा के समृद्धि, अउ समाज के द्योतक होथे। साहित्यकार ल तटस्थ न होके, सम्पूर्ण जीव जगत के प्रति उत्तरदायी होना चाही। आने के संग खुद के बुराई अउ अच्छाई ल घलो झाँकना चाही। इही बड़का साहित्यकार के निसानी आय। साहित्य म लोभ लालच अउ चाटुकारिता के छीटा घलो नइ पड़ना चाही,नही ते साहित्य के दशा अउ दिशा दोनो म दाग लग जाथे। साहित्य सीख देथे, साहित्य  गुण अउ ज्ञान देथे, साहित्य संस्कार घलो देथे, फेर  साहित्य रोटी नइ, यहू कहना गलत हे, साहित्य जब ज्ञान दे सकथे, त रोटी काबर नइ दे सकही। साहित्य म सबे चीज देय के ताकत हे। बशर्ते पाठक या स्रोता वोला कइसे ग्रहण करथे , वो ओखर ऊपर हे।
            हमर पुरखा मनके साहित्य आजो धरोहर हे, उँखर कल्पना के पार पाये नइ जा सके या उँखर ले अच्छा अउ लिखाही नही, ये कहना घलो गलत हे। महिनत ले का नइ सम्भव हे। उँखर समय म जेन चलत रिहिस ओला ओमन बखूबी सामने लाइन। ओला आजो हमन पढ़त लिखत अउ देखत घलो हन। फेर कई झन साहित्यकार मन कल्पना के कलम धर अइसे अइसे रचना करिन जेन कालजयी होगे , अउ आजो  प्रासंगिक लगथे। उँखर चिंतन ल नमन हे, जेन मन भूत ,वर्तमान अउ भविष्य ल ले के चलिन। वो समय के साहित्य वो समय  के दशा अउ दिशा के बोध कराथे। आजो के साहित्यकार मन ल घलो अपन कलम ल धरहा करके सकारात्मक भाव ले समाज ल जगाना चाही। अउ अपन समय के छाप ले छोड़ना चाही। छत्तीसगढी साहित्य बासी पेज, खेती खार ल सीमित झन रहे, जमाना के संग कलम कदम मिलाके चले। अउ हो सके त अपन चिंतन मनन ले पुरखा साहित्यकार मन असन भविष्य ल घलो झाँके। तभे हमर भाँखा  मान पाही, अउ हम सबके नाक ऊँच होही। साहित्य सिर्फ कहानी कविता घलो नइ होय, साहित्य तो असीमित हे, साहित्य खोज आय, साहित्य   म सबे चीज समाहित हे। साहित्य ल ऊँचा उठाय बर साहित्यकार ल अपन सोच ल ऊपर उठाये ल पड़ही।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

    साहित्य समाज के दरपन तो आय ...सँगे सँग साहित्य ला मानव समाज के धरखन कहे जाय तव कोनो अगरहा गोठ नोहय । बने साहित्य हा बने  समाज के निरमान करथे...समाज ला सहीं रद्दा देखाथे उहें समाज हा साहित्य ला कतका स्वीकार करथे ऐहा साहित्य के  पोठहाई उपर घलो  निर्भर करथे ...लकिन कभू कभू पोठहाई घलो ला समाज कगरिया के नहके मा बेर नई करय ।
रमायण मा जिनगी के जमो सार भरे हे ...ओखर पोठहाई मा कोनो शंका नई ये लकिन ऐखर बावजूद हम कतका कन अच्छई ला धरे हन  ..?
लकिन जतका जानेन ... मानेन हमार बर ओतके खूब हे ...कहे के मतलब हावय के साहित्य अपन रद्दा मा जब ईमानदारी ले चलही तभे ऐ ढुलगत समाज के कल्यान हे अऊ ऐखर बर साहित्य कार ला गुनन मनन करे बर परही...वोला अपन सुवारथ ला छोंड़ समाज बर सोचे ला परही जेन आज बहुँत कम साहित्यकार मन मा दिखत हे। सिरिफ पईसा पहुँच के ही बल मा छा जवई हा साहित्य के पुरा तो ला सकत हे फेर समाज बर एक पोठ धरखन कभू नई बन सकय ...आज काल जेन किताब छपत हे या जेन साहित्य अखबार पेपर छपत हे वो जादा करके अईसने कच्चा साहित्य आय जेन सही ज्ञान के जघा पाठक के मन मा भरम के बिरवा लगावत हे...!
      एक बात हमका जरुर माने बर परही के पोठ साहित्य के निरमान तभे हो सकत हे जब साहित्यकार हा पोठ रइही ...
साहित्य चाहे  कोनो बोली भाखा मा लिखे जाय जब तक ओखर सिरजन हार वो बोली भाखा के सही जानकार नई रइही तब तक एक अच्छा अऊ पोठ सिरजन के आसा पाले राखना सपुना बरोबर आय..
   **
              राधेश्याम पटेल
            तोरवा बिलासपुर

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

हमर छत्तीसगढ़ के साहित्य मा तो इहाॅ वीर गाथा, दान धरम,दया मया , प्रेम पिरित ,समाज सुधारक  वीर बलिदानी,सावन ,बसंत, प्रकृति पूजा के ले संस्कृति भरे हवय, अउ अड़बड़ अकन साहित्य रचना चलो होय हवय। जेन ले हम सब ला सुघर शिक्षा रहन सहन के तौर तरीका के शिक्षा मिलथे। अउ हमर इहाॅ छत्तीसगढ़ प्रदेश हर तो  आदिवासी समाज संस्कृति ले भरे हवय,जेन मन सीधा सादा ,भोला भाला,प्रकृति पूजक ,सत सेवा भाव ,जल जंगल जमीन के रक्षक आय।
जेन ला हम छोड़त जात हवन ।

 आज हमर विषय समाज अउ साहित्य के ऊपर हवय,
छत्तीसगढ़ प्रदेश मा सबो राज्य के लोग रहिथें। सब के अपन-अपन समाज अउ संस्कृति हवय। जेन मन अपन समाज भाखा अउ साहित्य ला पोठ बनाये हवय। समाज ले साहित्य बनथे। खान पान,रहन सहन,तीज तिहार ,इही से हमर संस्कृति बनथे।जेन हा साहित्य  के रूप ला धरथे। हमर तीर सर्वश्रेष्ठ संस्कृति हे जेन मा सब मनखे बरोबर हे। जइसन अंगाकर के एक पोठ रोटी असन हे।  वोकर बर हम सब आॅखी ला मुंद लेथन, टुकड़ा टुकड़ा होके कइसे एक पोठ समाज निर्माण कर पाबो।
कहे बर तो हम सब छत्तीसगढ़ियाॅ हवन। का वास्तव मा हम सब छत्तीसगढ़ महतारी के बरोबर मान करथन, छत्तीसगढ़ी ला जीथन। आज जुरमिल के नवा बिचार सोच समझ ले मजबूत समाज रचना कर अउ भेद भाव ला मिटा के ही समाज मा साहित्य ला पोठ कर सकत हवन। रूढ़ि वादी सोच के त्याग अउ समे संग बदलाव जरुरी होथे। नइतो आने वाला पीढ़ी ला कुछ नइ दे पाबो।आज हमर खाय के अलग अउ देखाय के अलग दाॅत हो गये हे।येला रवैया ला बदले बर परही। आज वर्तमान के सब ला संग लेके चले बर परही जेन ले  समाज अउ साहित्य ला पोठ कर पाबो।

रामकली कारे
बालको कोरबा
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

साहित्य वो लिखाय रपट या दस्तावेज आय,जउन म कोनो क्षेत्र के,अंचल के ,देश-परदेश के रहवइया जनजीवन, लोक मानस के रीति-रिवाज, परम्परा, मान्यता, रहन-सहन अउ जीवन शैली ल आने-आने रूप म लिपिबद्ध कर रखे जाथे। जीवन हे त जीवन म सुख-दुख तो लगे रइथे।काम बूता म भुलाय मनखे जब फुरसुदहा म रहिथे त मनोरंजन बर कुछु काहीं सुनथे सुनाथे।कोनो सुर म,कोनो किस्सा कहिनी म मन के बात कहिथे।अइसने ढंग ले अपन मनोरंजन करथे त कभू अवइया पीढ़ी ल नैतिक शिक्षा दे के उदीम करथे।चरित्रवान बना के अच्छा समाज के चिंता घला दिखथे। तइहा के समे म जब पढ़े लिखे कम रहिन,बरोबर साधन नइ रहिन त इही गोठ बात मौखिक  रूप म एक पीढ़ी ले दूसर ल मिलय।जेन ल आज लोक साहित्य के नाव ले जानथँन।जतका हाना मिलथे ओहर आज हम ल वाचिक परम्परा ले मिले हे।जेकर संरक्षण अब लिपिबद्ध होय ले होगे हे,फेर कतको नँदा गे।अउ कतको ह अब किताब म समटागे हे।जेन चलन म रहिथे उही अपन अस्तित्व बचा पाथे।अइसने हे साहित्य बर भाखा जरूरी हे। भाखा रही त साहित्य रही।मनखे के राहत ले भाखा कभू खतम नइ होय। हाँ ! भाखा के स्वरूप बदल भले जही।कोनो भाखा बर एक ठन संकट वो क्षेत्र के जनता ह खड़ा करथे।जेन दूसर के सँस्कृति ल अपनात अपन भाखा के उपेक्षा करे धर लेथे।सँस्कृति अउ सभ्यता के पोषक साहित्य हरे।इही पाय के कोनो सँस्कृति अउ सभ्यता ला नाश करे बर साहित्य ल बिगाड़े अउ नाश करे के सोचथे।ए कर उदाहरण देश परदेश के इतिहास म मिलथे।राजा महराजा अउ विदेशी आक्रमण के काल के इतिहास म छेड़छाड़ घला इही कोति इशारा करथे।
      शहरीकरण अउ नवा तकनीक मोबाइल, टीवी,नेट कम्प्यूटर के बड़ फायदा हे, फेर एखर सँस्कृति अउ सामाजिक संबंध बर खतरा घला हे।एखर उपयोग करत हमर  संवेदना कमती होत जावत हे।एकर सीमित उपयोग अउ समे प्रबंधन करे के जरूरत हे।आज अइसे होगे हे एक चूल्हा के खाना खा के एके घर म राहत  हमर जिनगी एकाकी होगे हे।अइसन म बदलत समे के माँग के मुताबिक समाज ल जोरे के उदीम म साहित्य लेखन जरूरी हे।अइसन नइ हे कि समाज नइ जुरे हे।सोशल मीडिया ले दूरिहा के मनखे नजदीक लागथे।फेर घर अउ घर के आसपास के मन दूरियागे हे।एक साहित्यकार पहिली मनखे आय ,जउन समाज म रही समाज ल जीथें,समाज ल नजदीक ले देखथें।उहें ले उपजे सुख-दुख के भाव ल शब्द मन के मोती ले जउन माला पिरोथे,उही साहित्य आय।जेन म समाज के पूरा झलक दिखथे।उही पाय के साहित्य ल समाज के दर्पण कहे गे हे।
       समाज के भलाई बर समाज के बुराई ल मेटे के रस्ता अपन कल्पना ले साहित्यकार खोजथे।एखरे सेती एक साहित्यकार ल समाज सुधारक भी कहे जा सकत हे।कबीर दास जी अउ मुंशी प्रेमचंदजी ल भला कोन नइ जानँन।
      मोर नजर म स्वतंत्र साहित्यकार तब ले आज तक समाज हित म ही लिखे हे अउ लिखत आत हे।अपन अपन समे के समाज के अच्छाई अउ बुराई के लेखन के संग म समाज उत्थान जरूरी हे।अपन समे के अपन चुनौती घलाव होथे जेखर ले पार पा के साहित्य लेखन करना साहित्यकार के करतब समझथँव।

*पोखन लाल जायसवाल*
पलारी बलौदाबाजार छग
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

साहित्य ह समाज के दरपन आय

साहितकार जउन  देखत हे उही लिखत हवय , भले ही रोचक बनाय खातिर कुछ अलंकार(मसालेदार) या फिर अतिशयोक्ति म लिख देवत हे|
कुछ जिनिस ल सही सही अउ कुछ ल कल्पना ले लिखथे या भविष्यवाणी कस आघू के बात कही देथे लिख देथे| लेकिन वोकर ले भी समाज ल दिशा मिलथे| उदाहरण सरुप कुछ हमर पुरखा कवि- लेखक मन गीत म  गाये- बताये हवँय कि गोबर के मोल का हो सकत हे? आज देख सकत हवन गऊ धन के का महत्तम हवय अवइया  समे म का होही?
समाज ले साहित के लिये विषय मिलथे अउ समाज उपर ओ विषय हर लागू भी होथे| तेकर पाय के जउन समाज म घटत हे उही साहित बनत हे| अउ कुछ साहित म पहिली ले लिखे हे वो कर आवरती होवथे|मने लागू होवत हे|

ये दू ठन बात ह संघरा चलत रही|
बने साहित ले बने संस्कार परंपरा के निरमान होथे| ये कर उलट घलो होही| बने संस्कार परंपरा ले बढ़िया साहित बनही| ये म स्वतंत्र चिंतन , विवेक, समे काल ,वातावरण परकिति के परभाव दशा| ल जोड़ सकत हवन|
   का हमन करोना ल पहली
साहित म लिखे पढ़े रहेन ?नही न! अभी कुछ दिन म कई ठन छंद ,कविता ,कहानी कई विधा बनगे, कई -कई उप विषयवस्तु म लेख बन गय|
समाज के परिस्थिति ले घलो साहित बनथे| अउ परिस्थिति ले गुजर के समाज बनथे|समाज के सबो अंग के विकास पर  बढ़िया साहित्य होना भी जरुरी हे| साहित के उपयोग समाज के विकास के सबो पहलू म होवय|
तभे साहित ह दरपन बन सकत हे|

अश्वनी कोसरे

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 समाज ऊपर साहित्य के प्रभाव

आज हम सबे झन जानथन , हमन जउन माहुल (वातावरण) मा रहिथन , ओही माहुल (वातावरण) ल हमन समाज कहिथन । हमर देश ल बहूसाम्प्रादायिक राष्ट्र घलो कहे जथे , काबर हमर इहाँ कइयो प्रकार के जाति , अउ धर्म के लोगन मन हर हम सब संझरा मिलके रहिथन । अब अतेक जात अउ धर्म वाले देश मा , हम सब झन रहिथन , त छुआ छुत अउ भेदभाव के होना तो सहज गोठ रहिच , अउ ये छुआ छुत हर हमर पूरा समाज म फइल गे रहिस । अब हम गोठ करथन साहित्य के , साहित्य ला "समाज के दर्पण" (आइना) कहे जाथे , कोनो भी समाज के सुग्घर रचना अउ निर्माण करे म साहित्य हर ओ काम करथे , जउन काम एक झन कुम्हार हर करथे । पहिली के हमर साहित्यकार मन हर देखिन , की आज हमर समाज म जउन ये छुआ छुत अउ उँच निच के भेदभाव हे , तउन हर हमर समाज ला पूरा मइला के राख दे हवँय । अब कहूँ लोगन मन के मनले अइसन जात पात उँच निच के भाव मन हर नइ मिटही , तब तक हम नवाँ अउ जागरूक समाज के बारे म सोंच घलव नइ सकन । अइसन सब बात मन के विचार करके , समाज मा फइले सबो बुराई मन ला मिटाय खातिर बर अउ लोगन मन जगाय खातिर ही । साहित्यकार मन हर समाज मा साहित्य के जोत ला जलाइन हे , अउ अपन रचना मन ले समाज के लोगन मन ला जगाय के सुग्घर उदीम करिन हावय । अगर कहूँ हम कोनो साहित्यकार मन के नाम ला गिनाबोन ता , हमर कइ ठन पेज हर अइसने हे भर जही , फेर साहित्यकार मन के नाम हर नइ सिरावय । जउन मन हर हमर समाज के नवाँ निर्माण करे म सहयोग दिन हे । अउ जउन मन ला हमन आज ले घलव जानथन अउ उंकर बारे म आज ले पढ़थन अउ सुनथन । सबो समय म समय समय के हिसाब ले साहित्यकार मन हर होइन , अउ आज ले घलव हावय जउन मन उही बेड़ा ला उठाके । समाज ला जगाय खातिर सरलग उही उदीम ल चलावत आवत हावय , पहिली हमर समाज मा जइसन छुआ छुत उँच निच अउ जात पात मन के भेदभाव रहिस हे । ओहर आज कल जागरूक अउ पढ़े लिखे लोगन मन के आय ले , बहुते कम होंगे हावय । कहूँ हम पहिली के समय अउ आज के समे ला तउल के देखथन ता हमला आज नही के बरोबर , ओइसन भेदभाव अउ छुआ छुत के भाव हर हमर समाज म देखे बर मिलथे । हम सबो झन जानथन की समाज ला , जागरूक करके समाज के नवाँ रचना अउ निर्माण करे मा साहित्य अउ साहित्यकार मन हर कतका कन अपन योगदान देथे । तेपाय के कोनो कवि घलव कहे हावय : -
             अंधकार है वहाँ ,  जहाँ आदित्य नही है ।
             मुर्दा है वह देश ,  जहाँ  साहित्य नही है ।।

                           मोहन कुमार निषाद
                       गाँव - लमती , भाटापारा ,
                     जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 छतीसगढ़ी साहित्य अउ समाज
-----------------------------
विद्वान मन साहित्य ल परिभाषित करत कहें हे कि --जेन हा हित करय वो साहित्य ए। अब प्रश्न उठते काकर हित करय? उत्तर मा कहे जा सकथे कि --खुद लिखइया के अउ ओला पढ़इया - गुनइया मनखे के मतलब समाज के हित करय।  आप सब जानत हव कि साहित्य के कहानी, कविता , नाटक , उपन्यास, आत्मकथा आदि अबड़ अकन रूप होथे।  जेन रचना चाहे कुछु भी विधा मा राहय , जेमा भी समाज कल्याण के भावना , मानवता  के समर्थन अउ व्यक्ति के विकास के भावना रइही  उही हा साहित्य आय बाँकी ह मोर विचार ले शब्द जाल अउ बकवास बस आय ।  जइसे धर्म बर कहे गे हे "धर्म इति धारयिति" अर्थात धर्म उही विचार या व्यवहार  हरे जेन धारण मतलब अपनाये के  लायक राहय अउ जेन हा मनखे ला गिरन मत दय या गिरत ल धर के थाम लय। ओइसने साहित्य घलो उही हरे जेमा व्यक्त विचार मन अपनाये के लायक राहय ।जेकर ले कोनो प्रेरणा मिलय, मनखे ला सहीं मा मनखे मतलब अपन मन के खेवइया    बनावय। मन मा भरे संकीर्णता के घेरा ल टोरके विशाल हृदय वाला बने के ज्ञान देवय, समझ देवय उही हा साहित्य ए।
        अपन नाम के संग साहित्यकार जोड़ लेना बड़ सरल हे फेर सच म साहित्यकार बनना अबड़ेच कठिन हे।
          साहित्य ल समाज के दर्पण कहे गे हे।  मोर व्यक्तिगत विचार आय हो सकथे  तुच्छ होही ।एला अइसना कहना सहीं होही --लेखक/ कवि मन के रचना हा समाज के दर्पण होथे। समाज के जेन रीति रिवाज, खान पान ,रहन सहन ,घटना-दुर्घटना  , संस्कार -कुसंस्कार  रइही वो सब कोनो न कोनो रूप म वो समे के रचना म दिखथे । फेर दोहराये के धृष्टता करना चाहहूँ कि -सबो रचना साहित्य नइ होवय। कोनो रचनाकार अपन हीन भावना म ग्रसित होके , कोनो वाद के आड़ लेके या राजनैतिक दृष्टिकोण ले कुछु भी गलत सलत लिख देही त का दर्पण म सहीं सहीं दिखही? नइ दिखय ।ये तो ओइसने होगे जइसे मनमाड़े धुर्रा जमे दर्पण मा ककरो चेहरा ह दिखही।
कोनो कहूँ दर्पण ल पथरा मार के फोर डरे ह त का  एके ठ जइसे हाबय तइसे चेहरा दिखही? मोला लागथे नइ दिखय।
           आज के बेरा मा अगर छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ समाज मा उपर लिखे बात ल भँजा के देखन त दूनो बात दिखथे। हमर  संत महात्मा अउ  पुरखा साहित्यकार मन के रचना मन सच म समाज के दर्पण हें  फेर अभी के लिखइया मन साहित्यकार के दर्जा म कतका झन आ सकथें ? सोचे के बात आय।
             पाँचो अँगरी बरोबर नइ होवय। वर्तमान म घलो वो रचनाकार जेन मन कोनो वाद-विवाद  ले ऊपर उठके, मानवता अउ आत्म कल्याण , दीन दुखी मन के उत्थान के भावना ले कलम चलावत हे , फलदाई छत्तीसगढ़ी सद साहित्य के सिरजन करत हें।
  छत्तीसगढ़ राज बने के बाद , महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी म लिखे के क्रांति होगे हे। हजारों पुस्तक छपत हें। अब तो समय बताही ओमा कतका कस, कतका दिन ले जी पाहीं ,कतका कस  लोक हितकारी अउ कालजयी होहीं।
        हाँ अतका संतोष के बात जरूर हे कि छत्तीसगढ़ी साहित्य के कोठी ए दौर म दिन दूना ,रात चौगुना भरत जावत हे।

चोवा राम 'बादल'
हथबन्द, छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

छत्तीसगढ़ के साहित्य अउ समाज

साहित्य अउ समाज के बीच गाढ़ा नाता हे ।कोनो साहित्य ला पढ़के हमन वो साहित्यकार जे समाज मा रहिथे वोखर देशकाल परिस्थिति ला जान लेथन।रवीन्द्र नाथ टैगोर जी ला पढ़के बांग्ला समाज के रीतिरिवाज वो भी आजादी के पहली के ला जान लेथन।प्रेमचंद जी ला पढ़के  उत्तर भारत के रीतिरिवाज से परिचित होथन।फणीश्वरनाथ नाथ रेणु जी ला पढ़ के बिहार के समाज के रहन सहन ला जान जाथंन।हमर छत्तीसगढ़ घलो बड़़े बड़े साहित्यकार मन के कर्मभूमि आय ।चाहे सुंदर लाल शर्मा जी के दान लीला हो चाहे गोपाल मिश्र जी
 के खूब तमाशा जेमा रतनपुर के एक तत्कालीक घटना के वर्णन हे।अउ कई साहित्यकार जइसे कोदूराम दलित जी,लक्ष्मन मस्तुरिया जी जिखर साहित्य ला पढ़के छत्तीसगढ़ के समाज अउ ओखर संस्कृति ला समझे जा सकत हे।परिवर्तन संसार के नियम आय ।समय के संग समाज मा बदलाव आथे ये बदलाव ले साहित्य अछूता नई राहय ।टैगोर जी के बांग्ला समाज मा आज बदलाव आ गय हे ।शर्मा जी के छत्तीसगढ़िया समाज भी बहुतेच बदल गे हे।बदलाव के असर साहित्य मा घलो पड़ना स्वभाविक हे भले रीतिरिवाज नइ बदले पर वोला निभाय के तरीका जरुर बदल  गय हे अब खेत मा हमला अर्र तता तता  सुनाई नई देवय त धरले नाँगर धर तुतारी के गीत कइसे गाबो ।अब तो टेक्टर हार्वेस्टर के जमाना आ गय हे।हा कई चीज अभी घलो नई बदले वो हे शोषण ।शोषक बदल गय हे फेर शोषित आज भी उहें हे प्रवासी मजदूर मन के पीरा कखरो ले छुपे नइहे।।खेती के नवा नवा साधन अपनाय ले घलो किसान के अपन पीरा हे जेमा सबले बड़े पीरा हे वोखर फसल के सही कीमत नई मिल पावय इहाँ तक सुनाई परथे कि किसान मन ला अपन टमाटर रद्दा मा फेंकना परगे।अउ कतको बिषय हे जेमा लिखे जा सकत हे।लिखे के काहे लिख तो कोनो भी सकत हे ।सबो लिखाई साहित्य नई कहे जा सके।कोनो रचना साहित्य तभे कहाही जब वोमा भाव रइही,शोषित के पीरा के अवाज रइही अउ समाज ला नवा रद्दा देखाय के गुन रइही।

चित्रा श्रीवास
बिलासपुर छत्तीसगढ़
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

 साहित्य संस्कृति के असल रूप तो हम अपन बबा,नाना,कका दाई,ममा दाई मन के किस्सा कहानी में सुने हन,फेर आज वो संस्कृति अउ शबद मन तको आधुनिकतावाद प्रगतिवाद, पाश्चात्य संस्कृति के कुँहरा मा धूमिल होगे हे।
हमन खुद घर परिवार अपन बीच मा भी अपन मातृभाषा छत्तीसगढ़ी मा गोठियाना उचित नइ समझन यहाँ तक शरम महसूस करथन, अउ पाश्चात्य भाषा ला गोठियाये मा गर्व महसूस करथन। जब हम खुद अपन नव पीढ़ी मा अपन पुरखा बबा के रीति संस्कृति ला नव पीढ़ी मा स्थान्तरित नइ करबो ता फेर हमर मातृभाषा कइसे समृद्ध हो पाही। अगर इही दशा रइही तो कुछ साल दशक मा हमर मातृभाषा ला हमर लइका, नव पीढ़ी खुद नइ जान पाही।
अगर मातृभाषा छत्तीसगढ़ी ला सही मान सम्मान देना हे, मातृभाषा के दर्जा दिलाना हे तो हम सब अपन घर से ही एखर शुरुआत करिन।

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
                 बिलासपुर

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

कोई भी साहित्य ओखर समाज के दरपन होथे। ये बात छत्तीसगढ़ी साहित्य बर घलाव लागू होथे। छत्तीसगढ़ मा जेन भी साहित्य रचे जावत हे,फेर ओ पद्य होवय कि गद्य,ओमा समाज के छाया दिखना स्वाभाविक हे,एक बात यहू हे कि अपेक्षाकृत गद्य कम लिखे जात हे, रचनाकार मन ल यहू ध्यान म रखना पड़ही, संगे संग रचना म गंभीरता लाए ल पड़ही,,अपन समाज के रीति-रिवाज, संस्कृति ,तीज तिहार, हाना, आदि ल जीवित रखे के उदिम करना पड़ही।
       कतको जन लेख कहिनी आदि लिखत हें,अउ अखबार आदि म छपत हें। जेन जन साधारण ल पढ़ें बर सस्ता सामाग्री के रूप म उपलब्ध हे।,अइसे म हमर कर्त्तव्य बन जथे कि हम पाठक ल अच्छा सामाग्री पहुँचावन।
  मोर विचार म एक बात के विशेष रूप से ध्यान रखना चाही, कि भाषा म बनावटी पन झन दिखय--यानी हिंदी के शब्द ल तोर मरोर के छत्तीसगढ़ी झन बनाए जाय ,हमर भाषा बहुत समृद्ध हवै। प्रयास रहै कि भाषा ल शुद्ध रखें जाय। अउ यहू कि बावन अक्षर के प्रयोग ल घलौ, बेझिझक करें जाय। जेखर ले हमर भाषा अउ समृद्ध होवय। एखर अलावा, विषय ल लेके नवापन जरूरी हे, मोर विचार म हर नवा विषय म लिखना चाही। आधुनिकता ले लेके, तकनीकि तक सब ल समेटे के आवश्यकता हवय।तभे छत्तीसगढ़ी साहित्य समाज म स्थान बना सकही अउ लोकप्रियता पा सकही। एखर बर हम सब ला मिहनत करना पड़ही।
   पद्य काफी लिखे जावत हे। तभो ले कविता के स्तर अच्छा होना चाही। जब हम स्तरीय रचना समाज ल देबो,तभे समाज बर साहित्य के योगदान सफल कहाही
-- नीलम जायसवाल, भिलाई, छत्तीसगढ़ ---

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

समाज म जेन गतिविधि होवत हे ,साहित्य उही ल लिखही
साहित्य कोनो धर्म जात के बात नइ करय,वो सिर्फ सही अउ गलत के बात करथे।आजकल एकल परिवार ज्यादा हे अउ आज के पीढ़ी संयुक्त परिवार के महत्व ला नइ जानँय।
पहिली के आवागमन ,रीति रिवाज तीज त्योहार ,नेंग नत्ता,रहन सहन अइसे बहुत से पहलू हे जेखर जानकारी नवा पीढ़ी ला होना चाही,
आज वैज्ञानिक युग आगे हे
हमन ल कतिक सुविधा मिलत हे
आज घर बइठे मनखे सबो दुनिया देखत हे।
वो समय भी रहिस हे जब एक टेलीविजन ल पूरा गाँव देखे,
अउ अब तो हर कुरिया में टीवी लगे हे।
ये विज्ञान हमन बर कइसे वरदान बनगे।
अउ येखर हानि भी बहुत होगे।
कहानी किस्सा के चलन नइ रहिगे
लइका मन कार्टून देखके उही मन ला नायक समझ लेथे।
जब तक साहित्य अतीत वर्तमान ला समो के नइ चलही।
तब तक विकास नइ कहे जा सके।
हमर दायित्व बनथे।
आज ,कल दुनो ला साहित्य में लेकर चलन।


आशा देशमुख

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


Friday, 26 June 2020

आलेख-मँहगाई चौमास म(जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया")

आलेख-मँहगाई चौमास म(जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया")



             बरसा के बेरा का आइस, सबे साग भाजी एक्केदरी अब्बड़ मँहगा होगे। अइसन मँहगाई करलाई ताय। सेठ साहूकार मन घलो कल्हरत दिखते, त गरीब मनके का ठिकाना। दुच्छा भाते भात घलो तो टोंटा ले नइ उतरे, तब तो एके उपाय बचथे, जइसने दाम म मिलत हे, तइसने बिसावन अउ खावन। मँहगाई के रोना रोय ले कुछु नइ होय, आखिर ये सबके जिम्मेदार हमिच मन तान। आज  हम सब सुखियार होगे हवन, शहर नगर अउ कई किसम के  दिखावा कस चोचला म फँस गे हवन, खेत खार कोला बारी ले दुरिहागे हवन, अउ जउन जुड़े हे, तेखर बर का मँहगाई? कथे कि प्रकृति ले जुड़े जीव के परवरिस प्रकृति खुदे करथे। गायेच गरवा मन ल देख लव, बरसात म हरियर चारा पाके  मगन हो जथे।फेर आज हमर जुड़ाव सिर्फ दिखावा हे। जइसे ही बरसा के बेरा हबरथे रिकिम रिकिम के साग भाजी प्रकृति बिन माँगे परोस देथे। कतको बीजा भुइयाँ ल फोड़ के बरपेली उग जथे। मनखे बरसात म साग भाजी बर तरसथे अउ जानवर मन बरसा घरी हरसथे।  एखर मतलब साफ हे कि हमला प्रकृति के साथ चलना चाही, फेर कथनी अउ करनी म फरक हे। जेन प्रकृति ले सीधा जुड़े हे, तेखर बर चिरचिर ले जामे चरोटा संग रंग रंग के भाजी पाला, करील अउ पुटू कस मुफत के साग भाजी हे। बारी बखरी म घलो खेकसी, कुंदरू कस कई किसिम के साग सब्जी उपजथे। बाजार हाट जाये के जरूरत घलो नइ पड़े। कई मनखे तो प्रकृति के ये वरदान ल भले बाजार ले बिसा लेथे, फेर टोर टार के खाये म घलो शरम मरथे।
             पहली के मनखे मन चौमासा के तियारी गरमीच घरी कर लेवय। साग भाजी  के खोइला संग बरी बिजौरी बना के रखय। अउ जब चौमासा लगे त, बरी बिजौरी,रंग रंग खोइला, चरोटा, पुटू,अउ करील जइसन साग भाजी ल हाँस हाँस के खाय। बरसा घरी उपजइया पुटू, करील, चरोटा जइसन जम्मो साग भाजी मन मनखे मन ल बरसा घरी होवइया जर अउ रोग राई ले घलो बचावव, तन ल तन्दरुस्त रखय। फेर आज हम सब बाजार भरोसा होगे हवन। त अइसन म बाजार के उतार चढ़ाव ल झेलेच ल पड़ही। खवैया जादा होगे हवन अउ उपजइया लगभग नही के बरोबर, त सबला पूर्ति घलो कइसे होय। तेखरे सेती जेखर कर पइसा हे, उही ह बाजार हाट अउ मँहगाई ले आंख मिला सकथे।
                  ऊँच ऊँच इमारत, होटल,ढाबा, मॉल,बड़े बड़े टावर, रेल पाट अउ कई लेन के सड़क, आज खेत खार अउ बारी बखरी ल हड़प लेहे।  आज मनखे चाँद तारा ले गोठियात हे, अगास पताल सब ला अपन मुठा म धरत हे, कहे के मतलब विकास के रथ म सवार हे, फेर विकास के रथ बइठे बइठे पेट नइ भरे। पेट के अगिन,  भात-बासी , रोटी- पीठा ले बुझाथे। प्रकृति पनप नइ पावत हे, विकास के पाँव म हरिया,परिया, तरिया, रुख राई जम्मो खुन्दावत हे। अइसन म प्रकृति खुदे बचे त मनखे ल मुफत म बाँटे। कथे कि ये हमर मानुष तन घलो माटी के आय, माटी, जंगल झाड़ी, रुख राई, जीव जंतु जम्मो के थेभा होथे, फेर आज शहरीकरण के जोर म क्रंकीट अउ सीमेंट ह, माटी के छाती उप्पर बिछत जावत हे, अइसन म माटी जेन कतको युग ल पाले हे, आज का करे। माटी म दबे बीच भात, क्रंकीट अउ सीमेंट ल फोड़ के तो नइ उग सके। माटी ल माटी रहन देय म हमरे भलाई हे। माटी ले सोन उपजथे, क्रंकीट अउ सीमेंट ले का उपजही तेला, ये नवा जमाना जाने।  बिन रुख राई के धरती बोंदवा होवत जावत हे, गरमी मरे जिये बाढ़त हे, माटी नइ रही त का खेती बाड़ी,अउ बिन खेती बाड़ी के का साग भाजी, त मँहगाई तो बढ़बेच करही। विकास आज बिल्कुल जरूरी हे, फेर पेट के ठेका का सिरिफ किसाने मन ले हे? उंखरो अन्न अउ साग भाजी ल व्यपारी मन अवने पवने खरीद के, व्यपार करत हे। चाहे मनखे होय या कोनो जीव सबला खाये बर चाही , तभे जिनगी रही, एखर बर महल,मीनार, टावर,सड़क  काम नइ आय। खान पान के थेभा सिरिफ खेत खार, बारी बखरी, अउ जंगल-झाड़ी आय। आज ये सब ला सिर्फ बढ़ावा देय के जरूरत नही बल्कि इंखर ले जुड़े के जरूरत हे। मनखे जंगल म घलो कांदा- कुसा, फर-फूल, साग भाजी खाके जी सकथे, फेर शहर नगर म, बिन पइसा  के जीना मुश्किल हे। विकास के रद्दा म रेंगत रेंगत भूख घलो लगही, एखरो जोरा करके चलेल लगही। एखर बर जंगल झाड़ी, खेती बाड़ी  ले लगाव अउ जुड़ाव, दूनो जरूरी हे। अभी तो एक समय विशेष म मँहगाई  झेलेल लगत हे, यदि हम सबके झुकाव प्रकृति कोती नइ होही, त का गरमी, का सर्दी अउ का बरसा, सबे बेरा मँहगाई सुरसा कस मुख उलाये ठाढ़े रही।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

Friday, 5 June 2020

कबीर जयंती मा विशेष आलेख-अजय अमृतांसु

कबीर जयंती मा विशेष आलेख-अजय अमृतांसु
 
              #संतो देखत जग बौराना#

            *सच काहूँ तो मारन धावे झूठे जग पतियाना संतो देखत जग बौराना.....*  कबीरदास जी के ये बानी तब भी प्रासंगिक रहिस अउ आज भी प्रासंगिक हवय । कबीरदास जी के नाम निर्गुन भक्तिधारा के कवि मा सबले ऊँचा माने जाथे,उन हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व आय । कबीर दास जी जतका बात कहिन सब अकाट्य हे वोला आप काट नइ सकव, मानेच ल परही काबर कबीर हमेंशा यथार्थ के बात करथे । कोरी कल्पना या सुने सुनाये बात उँकर साहित्य म नइ मिलय। कबीर के साहित्य ल मूल रूप ले तीन भाग म बाँटे जाथे- साखी, सबद रमैनी ।
              'साखी' शब्द साक्षी शब्द के अपभ्रंश आय । येकर अर्थ - "आँखों देखी बात।" कबीर के साखी मन दोहा मा लिखे गए हवय जेमा भक्ति अउ ज्ञान के उपदेश हवय। 'रमैनी' और 'सबद' हा 'गीत / भजन' के रूप में मिलथे हैं ।
               उलटबासी मा कबीर ल महारत हासिल रहिस । दुनिया मा सबले जादा उलबासी कबीर ही लिखे हवय। उलटबासी पढ़े अउ सुने म तो उटपटांग अउ निर्थक लागथे फेर जब गहराई मा जाबे तब येकर गूढ़ अर्थ समझ आथे । पंडित मन के अहंकार ल टोरे खातिर ही कबीर उलटबासी लिखिन जेकर अर्थ ल बड़े बड़े ज्ञानी मन घलो बूझ नइ पात रहिन ।
कबीर के शिक्षा के बारे म विद्वान मन म मतैक्य नइ हे। कुछ के मानना हवय कि कबीर ल पढे-लिखे के अवसर नइ मिलिस लेकिन विद्वान मन के संग उन खूब रहिन तेकर सेती वेद अउ शास्त्र के पूरा जानकारी उमन ला रहिस। उँकरे शब्द मा--
*"मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।"*
            कबीर के छवि समाज सुधारक के रहिस। उँकर साहित्य हा काव्य पांडित्य दिखाय बर नइ रहिस बल्कि उँकर काव्य ह भक्ति काव्य रहिस जेमा रहस्यवाद के अद्भुत दर्शन मिलथे । कबीर ल स्वतंत्र अउ सम्मानजनक जीवन प्रिय रहिस,रूखा सूखा खा के ठंडा पानी पी के भी उन संतुष्ट रहिन। कबीर कहिथे :--
*खिचड़ी मीठी खांड है,मांहि पडै टुक लूण।*
*पेड़ा पूरी खाय के,जाण बंधावै कूण ॥*
           कबीर के भाखा सधुक्कड़ी माने जाथे जेमा-  खड़ी बोली, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी के शब्द बहुतायत म मिलथे। उमन अपन भाखा ल सरल अउ सुबोध राखिन ताकि आम आदमी घलो समझ जाय । जीव ही ब्रम्ह आय अउ आत्मा ही परमात्मा ये बात ल कबीर कतका सुन्दर ढंग ले समझाथे-
  *ज्यों तिल माहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग।*
   *तेरा सार्इं तुझमें है, जाग सके तो जाग।*
            ईश्वर के खोज म भटकइया मनखे ल कबीर सचेत करथे-
     *मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में*
       कबीरदास जी युग प्रवर्तक के रूप म जाने जाथे । हिंदी साहित्य के 1200 साल के  इतिहास म कबीर जइसन न तो कोनो होइस अउ न तो अवइया बेरा म कोनो हो सकय । कबीर अद्वितीय रहिन ये बात ल सबो स्वीकारथे ।

                              -----अजय अमृतांसु----