Friday, 3 July 2020

लघुकथा- ज्ञानु

लघुकथा- ज्ञानु
 
         बड़े बिहनिया चहा पीयत रहँव तभे पाँव परत हव कका कहत गजेंद्र आइस।आ बइठ बेटा कहत खटिया ले एक डहर तिरियावत पूछेंव ,कब पहुँचे अउ सब बने बने ।गजेंद्र हव कका सब बने बने आजे रतिहा 10 पहुँचे हन। लकर धकर करत कहिस अतके बइठ हू कका बहुत काम हावय; आज ददा ला बरसी मिलात हन नेवता हे माइपिल्ला आहू कहत निकलगे।
            मैं बीते समे के सुरता मा थोकुन खोगेंव , मोर ननपन के सँगवारी दुकालू बपरा कतका तंगी अउ बीमारी के मार ला सहत सरग सिधारगे।कतको खबर भेजिस फेर वाह रे बेटा निहारे तक ला नइ आइस।
             मंझनिया मोर सँगवारी दुकालू घर गेंव , देखके आँखी चकरागे ,बड़े -बड़े पंडाल, किसिम -किसिम के पकवान ।मने मन सोचँव जतका खर्चा आज बरसी मा करत हे, इही कहू ईलाज पानी बर करे रहितिस ता मोर सँगवारी दुकालू बपरा जरूर कुछ बरस अउ जी जतिस।

इही ला कहिथे -'जीयत मा डंडा अउ मरे मा गंगा' ।
गुनत लहुट गेंव।

ज्ञानु

हरेली तिहार के वैज्ञानिक पक्ष*-पोखनलाल जायसवाल

*हरेली तिहार के वैज्ञानिक पक्ष*-पोखनलाल जायसवाल
   
       भारत भुइँया देव भूमि आय,तपोभूमि ए,सँस्कार के भुइँया ए।बीर मन के अँंगना ए।ए हर राम कृष्ण, गौतम, गाँधी, नानक, जइसन कतको के करम स्थली ए।ए पुण्य भूमि म आने-आने भाषा बोली के मनखे, अलग-अलग पंथ के अनुयायी, तरा तरा के जाति-धरम अउ रीत रिवाज के मनइया मन आपस म जुर मिल के मया परेम ले रहिथें।अनेकता म एकता ह इहाँ के चिन्हारी ए।
ए पावन भुइँया के माटी के महमहासी कोनो चंदन ले कमती नइ हे।पूरा बछर भर तीज-तिहार होत रहिथें।तेकरे सेती तिहार के भुइँया घला कहाथे।एक तिहार मनिस कि दूसर के अगोरा अउ जोखा शुरु हो जथे।खुशी कभु कमतियाय नइ पाय।कृषि प्रधान देश होय ले इहाँ के जादा ले जादा तिहार ह किसानी काम के ऊपर निर्भर करथे।कोनो फसल बोय के पहिली, कोनो बीच के काम पूरा होय के खुशी त कोनो फसल काटे के तियारी अउ लछमी के घर आय के खुशी म मनाय जाथें।
     भारत भुइँया के किसानी मानसून अवई के संग धान बोय ले शुरु होथे।आसाढ़ सावन म भरपूर पानी गिरे ले धरती दाई ह हरियर लुगरा पहिरे सबके मन ल हरिया देथे।नरवा नदिया कल-कल छल-छल बोहाय लगथे।तरिया डबरी लबालब भर जथे।जिहाँ पानी उहाँ जिनगानी,कस सबके मन आनंद ले ,उछाह ले नाचे कूदे लागथे। इही बेरा म सावन अमावस्या के हरेली तिहार मनाय जाथे।ए तिहार प्रकृति के संग मिल के धरती दाई के खुशी म खुशहाली मनाय के तिहार हरे।
         छत्तीसगढ़ म प्रकृति के संतुलन के बिगड़े के पहिली समे म बरोबर पानी गिरे ले सावन अमावस के आवत ले रोपा-बियासी के बुता पूरा हो जात रहिस।आज किसानी कोनो कोनो मेर पूरा नइ हो पावय। इही हरेली के दिन किसान मन नागर ,कुदारी, रापा जइसन किसानी म उपयोगी सबो अउजार ल धो के ओकर उपकार मानत पूजा-पाठ करके बने सुक्खा जगा म रखथें।हीरा-मोती के संग गाय-गरुवा के घला हियाव करथें।कृषि अउजार के भोग बर चीला चढ़ाथे।बइला अउ गाय मन ला लोंदी खवाथें। लोंदी म दशमूल काँदा, नून अउ पिसान ल परसा /खम्हार पान संग खवाय के चलन तइहा ले आत हे।राउत भाई मन दशमूल काँदा के जोखा करथे।एला मनखे मन घलो खाथें।एखर वैज्ञानिक पहलू ए समझ आथे कि बरसात म तरा तरा के रोग राई होय के डर रहिथे।एकरे ले बचाव बर एखर उपयोग हमर पुरखा मन अपन ढंग ले करत रहिन होही।काबर कि तब सबो कोति आज कस डॉक्टर अउ दवई के बेवस्था नइ रहिस।
        इही दिन गेंड़ी चढ़े के रिवाज हे।आज के दिन बने गेंड़ी पोरा तिहार के आवत ले  उपयोग करथे।बउरथे।गेंड़ी बाँस ले बनाय जाथे।जेमा दूनो गोड़ बर  बाँस के दू ठन टुकड़ा, अउ दूनो म पाँव रखे बर पउवा बनाके अपन मनमर्जी ऊँच्च बाँधे जाथे।कोनो कोनो के मानना हे कि एखर शुरुआत द्वापर युग म पाँडव मन करिन हे।मँय अपन बचपन ल सुरता करत सोंचथँव कि आज ले तीस बछर पहिली हर गाँव के गली मन के कँकरीटीकरण नइ होय रहिस।त गली-गली बहुतेच चिखला होवय।त  बबा पुरखा मन के समे का हाल रहिस होही,सोच सकथँन।ओ समे बरसात म चले खातिर गेंड़ी के परयोग करिन होहीं।अउ चिखला-माटी ले ,केंदवा अउ तरा-तरा के संक्रमण ले बाँचे ए ल बरसात के कमतियावत ले बउरत रहिन होही अइसे सोंचथँव।आजो बहुत अकन गाँव हो सकत हे जिहाँ गेंड़ी सउँक अउ रिवाज बर नहीं, जरूरत बर बनात होही।आज काल गेंड़ी दौड़ के भी आयोजन करे जाथे।
     छत्तीसगढ़ी समाज के पउनी-पसारी मन ए दिन अपन अपन कोति ले मालिक अउ मालिक के परिवार बर मंगल कामना करत कुछु कुछु नेंग करथें।जइसे राउत भाई मन लीम डारा घर के मुहाटी दरवाजा म खोंचथें,लीम के औषधि गुन ले सबो परिचित हँन।लुहार ह खीला के पाती दाबथें।मोला सुरता आत हे,मोर डोकरी दाई पानी गिरे अउ बादर गरजे म हँसिया कुदारी मन ल अँंगना म फेंके काहय अउ बताय कि गाज उही म गिरही, हमर कोति नइ आही।हो सकत हे लुहार के सींग दरवाजा म खीला ठोंके के कारण इही हो।सबो पउनी-पसारी ल दान पुन म चाँउर दार नून दे जाथे।
      इही दिन के रतिहा ल लेके कतको आनी-बानी के गोठ होथे।जादू-टोना अउ ताँत्रिक साधना के सिद्धि बर  साधना इही दिन शुरुआत करथे, के गोठ घला होथे।एला अइसन ढंग ले भी सोचे बर चाही कि कोनो भी काम ल करे बर कसम खा के शुरुआत करे जाय त अपन सबो काम बुता पूरा होही।कोनो अड़चन नइ आही।
     गाँव के बइगा(पुजारी) गाँव भर के सबो देवी देवता ल सुमर गाँव के पूजा पाठ कर गाँव के सुख, शाँति,उन्नति अउ सपन्नता के कामना अउ प्रार्थना करथे।बदला म वहू ल चाँउर दार दे जाथे।
       इही ढंग ले छत्तीसगढ़ी समाज आपस म जुर मिल एक दूसर के चिंता अउ सेवा म लगे रहिथे।
       आज प्रकृति ले मनखे के खिलवाड़ अतका बाढ़गे हवय कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ गे हे। जेन साफ साफ दिखथे।एके समे म कोनो कोति भयंकर गरमी त कोनो अउ कोति नदिया म भारी पूरा (बाढ़) देखे मिलथे।प्रकृति अपन बिफरे के इशारा कोनो न कोनो रूप म देत हवै फेर वाह रे मनखे विकास के घोड़ा म चढ़े, अनदेखा करत कति भागत जात हे।अभी समे हे धरती ल सँवारे के ,नवा सिरा ले सजाय के।धरती के हरियाली बाँचही त मनखे के अस्तित्व रही।इही हरियाली हमर बर संकट मोचक हरे माने ल परही।तभे हरेली तिहार अपन सही समे म सही ढंग ले नवा पीढ़ी मनाही, ए हमर नवा पीढ़ी बर पुरखा मन के हमर करजा आय मानन।

*पोखन लाल जायसवाल*
पलारी बलौदाबाजार छग.

मोटरा-गठरी(कहनी)*-हेम साहू

मोटरा-गठरी(कहनी)*-हेम साहू

          जाड़ा के दिन बादर राहय जेठिया दाई  जेन 90 साल के ढोकरी होेगे हावय। मुधियार कन भुर्री ला तापत बइठे नाती टूरा मन के रद्दा देखत हावय, रोज इहि बेरा मा इहि मेर सब्बो टूरा मन सकला के भुर्री तापथे अव डोकरी दाई मेरा किसम किसम के कहनी किस्सा सुनथे अव सीख ओकर से सीख लेथे। देखथे देखत सबले पहली बुधारू टूरा टपकथे अउ पा लागी दाई कथे दई कथे खुसी रा बेटा एकक एकक झन करके सब्बो टूरा मन सकला जाथे। बुधारू, समारू,दुकालू, सुकालू, आमरु सबो आके भुर्री तापे बर बइठ जाथे। समारू हा थोकिन चटरहा बानी के रहिथे अउ चटर पटर मारत रहिथे। समारू हा दाई लेना बने अस कहनी सुना न ओ सुकालू हा दाई सुना न ओ दाई तोर जवाना के कहनी। दाई हा मुड़ ला हलावत कहिथे ले भई ठीक हे सुना दे हूँ,  अरे सुकालू जातो रे बेटा मोर मोटरा-गठरी ले बाजार के लाड़ू होही तेन ला निकाल के लाबे। दाई के बात ला सुनके सबो टूरा मन खिलखिला के हाँस भरते अउ सुकालू हा कभू मोटरा देखे नई रहय त का जानय बपरा हा, त पूछथे दाई ए मोटर काला कथे, हमन तो नई जानन अउ जम्मो टूरा मन सुर मा सुर मिलाके हा... हा.....दाई हमन तो नई जानन। फेर दाई हा कथे ओ देख बेटा परछी के खूँटी मा टगे हे ना झोला उहिच ला मोटरा-गठरी कथे। फेर समारू हा कथे त दाई हमन का जानन मोटर- गठरी झोला ला कहिथे। जाके के सुकालू हा झोला के लाड़ू ला लाके दाई ला देथे अउ दाई हा लाड़ू ला सब्बो झन मा बाँट देथे। येति मोटरा- गठरी नाम सुनके बुधारू हा अकबकाय रहय ओला कुछु समझ नई आय झोला ला मोटरा- गठरी कथे, लाड़ू ला खाय अउ सोचय अउ मन के बात मुँह ले निकलगे अउ पूछ परिस दाई मोला बता न काबर मोटरा- गठरी ला झोला कहिथे अउ सब्बो टूरा मन सुर मिलाके हा हा बताना दाई काबर कहिथे?  दाई कहिथे त सुनव सबो झन बने कान दे के पहली हमर जवाना मा ये झोला(बैग) नई चलत रहिस हे ओकर जगह मा मोटरा- गठरी चलय। मोटरा हा बड़े होथे जेला अपन सामान के हिसाब ले जतका बड़का बना ले अव गठरी हा ओकर छोटे रूप आय। पहली हमन कुछू लाना हे या ले जाना हावय या गाँव गौतरी जाना हे त मोटरा- गठरी बनाके समान ला भर के मुड़ मा बोहिके  लेगन  या गाँव जावन। फेर समय बदलत गिस उव समय म नवा नवा खोज अउ सुविधा बर येकर रूप अउ नाम अकार बदलत गिस अउ आज उहि बदलाव हा धीरे धीरे झोला के रूप ले लिस। देखव झोला ला आज पाछू मा लदक के रेंगथव रे ..दुकालू हा झट से हा दाई ओला बैग कहिथन हा बैग के रूप लेलिस। मोटरा- गठरी मा हमन बड़े समान ला रखन उव गठरी मा छोटे छोटे समान ला जइसे रुइया पाइसा, गहना गुठी ला बने गठिया के रखन। दाई कथे अब जान डरेव न काला कहिथे मोटरा- गठरी सब झन हव दाई। अतका बढ़िया नवा जानकारी ला जनके जम्मो टूरा मन हा वाह दाई कतका बढ़िया जानकारी देव। जानकारी देवत देवत खाय के बेरा हो जाथे फेर दाई हा कहिथे चलव रे अपन अपन घर खाये के बेरा हावय अपन अपन घर चलव अउ भूरी के आगी तको कनझा गे। लेवा फेर काली एतके बेरा बइठबो त फेर कुछू नवा गोठ ला गोठियाबो ले चलव घर के मन देखत होही। जम्मो टूरा मन दाई ला कहिथे मजा आगे दाई मोटरा-गठरी के बारे मा जानके।
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील- नवागढ़, जिला बेमेतरा

बलराम चंद्राकर: असाड़

बलराम चंद्राकर: असाड़

असाड़, साल के चौंथा महिना, लगते पानी बादर के गुरुरघारर शुरू हो जथे। जेठ के घाम ले लाहके जीव थीर पाथे।सरग के कतको पानी ला पियासे धरती तुरते सोंख लेथे।बरसा के पानी परे ले उन्ना तरिया डबरी के मछरी बेंगवा मन ला घलो नवा जीवन मिलथे।प्रकृति मा नवा ऊर्जा के संचार होथे। भोंभराय धरती हा हरिया जथे।हरियर हरियर डारा पाना देख के लागथे भुइयाँ नवा लुगरा अंगीकार करत हे। गरमी के चार महिना थिराय कमिया किसान खेती किसानी के उदीम मा लग जथे। झुलसे धरती मा गरवा गाय के चारा घलो सबो कोती दिखे ला धर लेथे। मानसून के आय ले बादर छाय रहिथे ।सुरुज नारायण छूपा छूपी खेलत अपन तेज ला कदा करत रहिथे।असाड़ के पहिली पानी हा धरती खेत खलियान ला सुवासित कर देथे। बादर कभु गरजथे कभु बरसथे त कभु हवा गरेर घलो चलथे। सुक्खाय नदिया नरवा मा फेर जलधार बोहावत देख के मन हरस जथे।
किसान के खेती किसानी अउ चउमासा के तइयारी शुरू हो जथे। नागर बखर अउ फसल के बोनी बर कांटा खूटी ला बिन के खेत के सफाई किये जाथे।  जोताई अउ धान के बोनी बर किसान संझा बिहनिया एक करके खेत ला संवारथे। अंकुरित धान ला देख किसान के मन खुश होथे।
असाड़ के पानी परते ही किसान बियारा के पैरा ला परसार मा भरके मवेशी बर चार महिना के सुखा चारा के बेवस्था ला पुख्ता करथे।
चउमास हा पूरा खेती किसानी अउ फसल के बढ़ोत्तरी के काम बर हरे। किसान दिनरात लगे रहिथे। असाड़ के शुक्ल एकादशी ले देवता मन चार महिना बिश्राम करथे। कोनो प्रकार के मुहुर्त वाले काम बर देवउठनी तक विराम रहिथे। फेर। अन्नदाता किसान ए चार महिना जी तोड़ मेहनत कर के संसार बर अन्न उपजाथे। अउ शिव भोले के सुमिरन कर के शक्ति पाथे। काबर चउमासा भर शिव-शक्ति के उपासना होथे।
रजुतिया के तिहार अउ गुरू पूर्णिमा हर असाड़ के बहुत बड़े तिहार होथे।
 हमर छत्तीसगढ़ मा भगवान जगन्नाथ के पूजा के ए परब ला बड़ हांसी खुशी सबो डाहर मनाथे। पढ़इया लइका मन के नवा कक्षा घलो इही असाड़ मा शुरू होथे। संत मन के चतुर्मास के पहिली पडा़व हरे असाड़ हा।
असाड़ मा बियारा बखरी ला जोत के किसम किसम के बीज ला बो के चार महिना के साग भाजी के बेवस्था घलो करथे।
असाड़ लगते घर छानही के खपरा लहूटाय के काम पूरा करे बर पड़थे, बरसा के पानी चुहे ले घर ला बचाय बर। पानी निकासी के बेवस्था ला ठीक किये जाथे।कतको घर झिपारी बांधे जाथे परछी, दिवार अउ दुवारी ला पानी के छींटा ले बचाय बर।
असाड़ के महिना मा पानी गिरते नवा नवा किसम के कतको किरा मकोड़ा के भरमार हो जथे। प्रजनन काल होय के कारण ए महिना मा असंख्य प्रकार के कीरा मन दिखथे अउ कुछ दिन बाद कहां जाथे पता नइ चलय। बतर तो पहिचान हरे असाड़ लगे के। मच्छर के प्रकोप बाढ़थे त कई प्रकार के रोग के राई घलो डर रहिथे। ए खातिर खास सावधानी ज़रूरी रहिथे। मेचका, गेंगरुआ, पिटपिटी ढोढ़िया, हिरु बिच्छु, किट पतंग ले पाला पड़थे। लोग लइका मन के खियाल विशेष करे ला पड़थे, चिखला पानी ले बचाय बर।
असाड़ धरती के श्रृंगार के महिना हरे।प्रकृति चारों तरफ हरियाली ले भर जथे। । ए प्रकार ले असाड़ के महिना हा संसार के सबो जीव बर वरदान हरे। कहे गए हे - "डार के चूके बेंदरा अउ असाड़ के चूके किसान " दूबारा पार नइ पाय।सिरतोन असाड़ अमरित बरसाथे धरती मा तभे संसार हा सालभर सजीव रहिथे।

बलराम चंद्राकर भिलाई

नाँग साँप (कहानी)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

नाँग साँप (कहानी)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

कथे न, राम राम के बेरा हाँव हाँव अउ खाँव खाँव, अइसने होइस घलो जब पहातिच बेरा शहर के कृष्णा चँउक म, किसन के  घर साँप दिखगे। कोनो दतवन चाबत, त कोनो लोटा धरे, त कोनो मन बिन मुँह - कान धोय घलो वो मेर पहुँच के किलबिल किलबिल करत हे। पड़ोस के लइका  मनोज जेन दाई ददा के बिना लात घुसा खाय घलो नइ जागे तेखरो आँखी भिनसरहा ले उघर गे रहय, फेर अलाली  के मारे  कुछ देर  खटियच म पड़े पड़े गोहार ल सुनिस, अउ आखिर म आँखी रमजत वो मेर हबरगे। जिहाँ देखथे कि बनेच मनखे सकलाय हे, अउ अपन अपन ले सबे चिल्लात हे। कोनो काहत हे- ओदे संगसा म खुसरे हे। कोनो काहत हे- रँधनी खोली कोती गेहे। कोनो काहत हे, दोनो हाथ ल फैलाबे तभो वो साँप ले छोटे पड़ जही। कोनो काहत हे- बड़ मोठ लामी लामा धनमा ये। कोनो कहे- करायेत हरे, त कोनो कहे- बिखहर डोमी आय।
उही भीड़ के सँग चिल्लावत, मनोज घलो कथे- बाकी साँप के तो पता नही फेर जब तक वो साँप फेन नइ काटही,  डोमी नइ हो सके। एक ठन साँप के आरो पाके कतको झन मनखे रूपी साँप मन बड़बड़ावत हे। एती किसन के मुँह घलो नइ उलत हे, लइका लोग सुद्धा, घर के बाहर थोथना ओरमाये खड़े हे। अउ करे त का, जेखर गला मा घाँटी ओरमथे, उही ओखर दुख ल जानथे, बाकी मन तो बस लफर लफर लुथे। सबे चिल्लावत हे ,फेर कोनो भगाये बर उदिम नइ करत हे। ले दे के एकझन सज्जन साँप पकड़इय्या ल धर के लाइस। पकड़इया ह बड़ महिनत करे के बाद साँप ल घर ले बाहिर निकालिस। साँप ह जुरियाय जम्मो मनखे मन ला देख के, फेन काट के तनियाय खड़े हो जथे। लोगन मन देख फेर फुसफुसात हे देखे जुन्नेट डोमी आय। ये भारी बिखहर होथे, एक घाँव चाबिस, मतलब राम नाम सत। येती मनोज तनियाय खड़े हे, देखे में केहे रेहेंव, ते सहीं होइस न,फेन काटही कहिके। एक झन चुप करात चिचियावत कहिथे,ते चुप रे,आज के लइका का जानबे, का का साँप होथे तेला, भगवान शंकर के फोटू ल भर देखे हस, कभू बाप पुरखा नाँग देखे रेहेस।  येती किसन के पोटा साँप ल देख के काँपत रहय। किसन कहिथे, येला कोई मार देवव, आज मोर घर म घुसरिस, काली अउ कखरो घर घूँस जही। आघू म खड़े एक झन मनखे कहिथे- बात तो बने काहत हस किसन,  फेर मोर डहर अँगरी काबर देखात हस, मोर घर काबर घुसही।  वो मेर खड़े अउ मन फुसफुसावत कहिथे, काबर की तोर घर जादा धन दौलत हे। ततकी बेरा मनोज बात ल काटत कहिथे, इती के बात ल छोड़व। कइसे ग कका किसन, तैं जीव हत्या के बात करइया निरदई आदमी कइसे हो सकथस? बात वो किसन के अलग हे जउन नाँग नाथे रिहिस। ते तो निच्चट डरपोक आवस। हाँ नाँग देवता,तोर घर आय हे, बढ़िया पूजा पाठ कर, धन रतन बाढ़ही। ये मजाक के बेरा नइहे, किसन बिलखत कथे- अब तुही मन बतावव ददा, मोर घर  ले ये बला टरे। साँप पकड़इय्या वो साँप ल चुंगड़ी म भरके, मनोज ल कहिथे, चल येला कहूँ मेर छोड़ के आबों। मनोज छाती ठोंकत कहिथे ,अइसन काम बर तो मैं बने हँव। अउ साँप घलो तो जीव आय, मारना पीटना बने बात नोहय। चल ये साँप ल खाली जघा म छोड़ आबों। तीर म ओखर ददा घलो रहय। वो मनोज ल कहिस -हव ",काम के न कौड़ी के, दँउरी के बजरंगा" अउ कामे का कर सकत हे। दुनो झन साँप ल चुंगड़ी म धरके निकल गे। इती किसन ला हाय जी लगिस। लोगन मन घलो छँटियाय लगिस।
                   साँप पकड़य्या के पाछू पाछू मनोज रेंगत कहिथे, अउ कतिक दुरिहा जाबों, ऐदे मेर छोड़ देथन। बेरा उग के चढ़त रहय, मनखे के चहल पहल बढ़ गे रहय। साँप ल छोड़े बर जइसे चुंगड़ी ल खोलेल धरथे, नजदीक के घर वाले करलावत निकलथे, हव छोड़ दव इही मेर, ताहन मोर घर खुसर जाय। चलो भागो ए कर ले।  दुनो फेर सड़क नापथे, सबो जघा मनखे मन देखे के बाद दुनो ल गरिया देवव। दुनो थक हार गे। आखिर में साँप पकड़य्या कहिथे, मोर ले गुनाह होगे जी मनोज, जे सांप ल पकड़ेव। फेर ये मोर बर थोरे हरे, भलाई के जमाना नइहे, मोरे मरना होगे।
दुनो लहुट के किसन घर कर आगे। किसन पुचपुचावत कहथे-बने करे दाऊ, तोर बिना मैं तो संसो म पड़ गे रेहेंव। ले चाय पीके जाबे। किसन के बात ल सुनके, मनोज कहिथे- का बने कका, साँप तो चुंगड़ी म हे। कोनो मन अपन तीर तखार म ढीलन नइ दिन। मुँह उठाके फेर आगेन। अब तोर नाँग ल तिहीं पूज, हमन चली। अरे अरे अइसे कइसे हो सकत हे, ये गलत ए, अउ ये कोनो मोर पोसवा थोरे आय, एखर मैं काय करहूँ, किसन बिलखत हे। मनोज का, सबे झन भाग गे।  किसन के मूड़ म पहाड़ टूट गे, साँप के चुंगड़ी के दुरिहा म बैठे लइका लोग सुद्धा फेर रोय लगिस।
             एकाएक मँझानिया, मनोज के ददा कल्हरत भागत चिल्लाथे, साँप साँप साँप। अरे भागो भागो, किसन घर के  डोमी नाँग हमर घर खुसर गेहे। मनोज गिरत हपटत भागथे, अउ किसन ल खिसियाथे, जेन चुंगड़ी के आघू अपन भाग ऊपर रोवत राहय। मनोज के ददा झाँक के देखथे, चुंगड़ी भोंगरा रहय, ओखर मुहड़ा थोरिक खुल गए रहय। मनोज सोचथे, साँप पकड़इय्या लगथे, ढीले के बेरा बने से नइ बाँधे रिहिस। फेर अब साँप तो मनोज घर खुसर गेहे। किसन जान के खुश तो नइ होइस, तभो अइसे लगिस जइसे ओखर करेजा म लदे पथना, हट गे। लइका लोग सुद्धा खैर मनाइस। अउ मुंह बजावत कइथे, कइसे बाबू मनोज, अब कइसे लगत हे, जा तिहीं पूजा कर नाँग देवता के , सावन घलो चलत हे, नागपंचमी घलो अवइया हे। मनोज के ददा दाँत कटर के रिहिगे, देखते देखत मनखे मन फेर जुरियागे, हो हल्ला मात गे। कोनो काहत हे अइसन म बात नइ बने, पुलिस म खबर देना चाही। कोनो कहय पुलिस का करही, वन विभाग के अधिकारी मन  ल बतावव, उही मन ले जही। फेर वोमन फोकट म बिन पइसा कौड़ी के थोरे आही। अउ वन विभाग वन कोती रइथे, शहर नगर म कहाँ के। मनोज के ददा किसन ल देखत कहिथे, चल दुनो मिलके वन विभाग ल बलाबों।किसन मुँह अँइठत घर म खुसर गे।  अचानक साँप मनोज के घर म एक डाहर ले दूसर डाहर जावत दिखथे, भीड़ फुसफुसाए लग जथे,  किसन के बला, मनोज घर  सपड़ गेहे, लगथे किसन बने आदमी नोहे, नाना जाति के गोठ उभरे बर धर लेथे। फेर जेन संसो कुछ देर पहली किसन के रिहिस, वो अब मनोज अउ ओखर घरवाले ल सतावत हे। अब तो साँप धरइय्या घलो नइ आँव काहत हे, उहू अपन दुख दर्द बतावत हे कि मैं पकड़ के अचार थोड़े डालहू ,ये शहर म दूर दूर तक  न परिया हे न खाली जघा, मैं काल काबर मोल लेवँव। मनोज के पड़ोसी मन ल घलो संसो सताये बर लग गिस, कही ये साँप हमर घर म आ जही तब। अब सबे केहेल धर लिस, साँप ल दूध पियाबे त चाब्बे करही, ओला पाले के बजाय मार देना चाही। मनोज के ददा अउ वो मुहल्ला के दू सियान लउठी धरके, साँप कोती बढ़थे। साँप डर के मारे एती वोती भागेल धर लेथे। लउठी पड़इय्यच रहिथे, मनोज तीर में जाके हाथ ल धर लेथे। अउ कहिथे- मोर बात वन विभाग के अधिकारी मनले होगे हे, झन मारव। ये साँप बिचारा आखिर रहे त कहाँ रहे, जम्मे कोती हमन अपन ठिहा ठौर बना डरे हन, न कोनो मेर रीता भुइयाँ हे, न परिया। यहू मन तो ये धरती के प्राणी आय, अगास या पताल के थोरे, फेर हम मानव मन स्वार्थ अउ आधुनिकता के चकाचौंध म जम्मे कोती क्रंकीट अउ सीमेंट बिछा डरे हन, सांप बिच्छू मन चकचक ले  दिख जावत हे, उँखर बर बिला भरका घलो नइ  बचायेन , रुख राई के तो बातेच ल छोड़ दव। न बारी बखरी हे, न कोठा ,न कोला आखिर साँप बिच्छु कस विवश प्राणी मन रहे त कहाँ रहे? अउ कहूँ दिख जाथे, त साँप ले जादा खतरनाक हम मानव मन वोला मार डरथन। शहर नगर सिर्फ मनखे मन बर होगे हे, गाय,गरवा  मन घलो  सड़क म बैठे रहिथे। हमर करनी के फल हमन असमय गर्मी, बरसा, आंधी तूफान ले तो भुगतते हन, फेर ये निरीह प्राणी मन बिन जबरन काल के मुख म समा जावत हे। हमला उँखरो बारे म सोचना चाही।  वो मेर खड़े जम्मो झन मनखे मन मनोज के बात ल सुनके कलेचुप मुँह लुकावत छँटेल धरलिस। कुछ देर बात वन्य जीव संरक्षण विभाग वाले कर्मचारी मन आगे, अउ साँप ल लेगत बेरा, मनोज ल बूता जोंगत कहिथे- सिरिफ साँप का, कोनो भी जीव  यदि कभू भी अइसने ये मुहल्ला या तोर आसपास भटकत दिखही त आज ले तैं हमन ल सूचना देबे। तोला हमन ट्रेनिंग घलो देबों, ताकि साँप बिच्छू ल तैं पकड़ सकस। गारी गल्ला खावत, ठलहा पड़े, मनोज ल काम मिल जथे अउ  मुहल्ला वाले संग अपन ददा के घलो डाडला बन जथे। 

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)


बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

*बईहा नोहय (कहानी)*-मिनेश साहू

मंगतिन गांव म अपन जिनगी काटत राहय। मंगतिन के बिहाव नानपन म होय रिहिस हे अउ १५ बच्छर म ससुरार आगे रिहिस हे, वोला गुड़ाखू घसे के बड़ नशा रिहिस हे, दिन भर रतिहा जसना म जावत ले ओखर मुहु म गुड़ाखू दबे राहय। धीरे -धीरे दिन बितत गिस अउ मंगतिन तीन लईका के महतारी बनगे।धनसिंग (बड़े बेटा) कुंती (मंझली) अउ जीवन सबले छोटे रिहिस हवय, जीवन के अवतरे के दू बच्छर बाद मंगतिन के गोसैंया ल एक दिन खेत म सांप चाब दिस बिचारा बीत गे ।धनसिंग अउ कुंती बड़े होगे अउ गांव के सरकारी इस्कूल म पढ़े जाय लगिस... लेकिन ओखर छोटे बेटा जीवन के हाव-भाव,रेंगना-फिरना दूनो लईका मन ले अलग राहय कभू कखरो संग हां,हूं ,घलो नइ गोठियावय।कले चुप रेहे राहय,मल मूत्र अउ पखाना घलो ओन्हा म कर डारय,बाढ़त उमर अईसने कटत लईका बड़े होगे।
          धीरे-धीरे मंगतिन ल संसो होगे अउ बड़ परशानी घलो होवय लईका ल घर म छोड़ के बनी-भुति म निकल जावय , जीवन के बेवहार ल देख के मंगतिन हदास होगे राहय अउ खेत खार अउ  मड़ई मेला अउ सगा सोदर कोनो गांव जावय त दूनो लईका मन ल संग म धरके जावय अउ जीवन ल कुरिया मे धांध के संकरी ल लगाके रखय।
         कोनो दिन कंहू घर ले जीवन निकल जतिस त गांव बस्ती पारा परोस के मन बिचारा ल पथरा ढेला म मारय अउ कोनो पानी ल घलो ओखर ऊपर फेंक देवय...नान-नान लईका संग बड़े मन घलो बिचारा ल *बईहा* आगे कहिके भगावय ,मंगतिन हदास होगे राहय अउ घर के मुहाटी म बैठे राहय उहि बेरा मा गांव के एक झन पढ़े लिखे सियान ह शाहर के *मनोरोग चिकित्सक* डॉक्टर
के तीर म देखाए म सुझाईस अउ मंगतिन ल डॉ. के पता ठिकाना ल चिट्ठी म लिखके दे दिस दुसरईया दिन मंगतिन जीवन ल धर के  डाॅ. ले भेंट करिन अउ डॉ.साहब ह पुछिस ।
का जीवन ह ?अवतरे के तुरते बेरा रोईस हे...... मंगतिन कहिथे नहीं साहब।
का तेंहा नशा करथस?
हव....... साहब गुड़ाखू घसथंव।
फेर मंगतिन कहिथे डॉ साहब मोर लईका ल गांव वाले मन, पारा परोस के मन *बईहा-बईहा* कहिथे!हव साहब मोर लईका बईहा हे!
तब डॉ साहब (मनोरोग विशेषज्ञ)कहिथे जीवन बईहा नइहे.......ऐला मानसिक दिव्यांग कहिथे।अउ ईखर बुद्धि सामान्य लईका ले कम होथे।
जौन कोनो महतारी अम्मल म रहिथे तब के बेरा म नशा,अउ जेला घेरी भेरी झटका आथे अउ अन्ते-अन्ते नंगत अकन कारन हे अउ अवतरे के तुरते बेरा म  लईका नइ रोवय त अईसन म लईका के बुद्धि के नस बराबर काम नइ करय जेखर कारन लईका ह मानसिक दिव्यांग होथे।
*लईका बईहा नइहे* ऐला रोज के काम धाम ले संग म रहिके सिखोवव! लईका धीरे-धीरे अपन जिनगी ल चलाए बर तो सीख जहि। कखरो बर बोझा नइ रहि।

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मिनेश कुमार साहू
भुरभुसी गंडई/माना कैंप रायपुर

Thursday, 2 July 2020

छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया ऊपर छंद के छ परिवार के साधक मनके विचार-

 छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया ऊपर छंद के छ परिवार के साधक मनके विचार-

   अभिव्यक्ति के आजादी के संगे संग महत्वपूर्ण बात एहू हर तो आय के साहित्यकार  ल अपन रचना प्रकाशन के ललक रहिथे .....प्रिंट मीडिया के विकास हर साहित्यकार ल पत्र - पत्रिका मं प्रकाशन के मौका दिहिस त किताब के रूप मं भी रचनाकार अपन भावना ल अलग अलग विधा मं प्रकाशित कराये लगिन  तभो ये बात के ध्यान रहय के व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के आज़ादी हर दूसर के गुलामी  झन बने पावय ...अभी  जादा दिन नई होये हे जब लोगन  के हाथ सोशल मीडिया लगिस ....साहित्यकार समय संजोग देख सुन के अपन रचना फेस बुक , व्हाट्सएप  , ब्लॉग  आदि के माध्यम से लोगन तक सहज रूप से पहुंचाये धर लिहिन ...फायदा लेखक अउ पाठक दुनों ल होइस हे काबर के साहित्यकार ऊपर सम्पादक के टीका टिप्पणी के डर नईये , प्रकाशित होही के नहीं , होही त कब होही ? सब झमेला ले मुक्ति ।  रहिस बात पाठक के त का कहना हे  सोशल मीडिया के अंगना मं पहुँचत देरी हे के मनपसंद लेख , कविता , कहानी , लघुकथा , संस्मरण  सब मिल जाथे ...अब तो on line गोष्ठी , सम्मेलन , वेबिनार तक सम्पन्न होवत हे । सोशल मीडिया हर साहित्य अउ सहित्यकार दूनों ल सर्वजनसुलभ बना देहे हे ।
आज के विमर्श मं भागीदार बुधियार  साहित्यकार मन के विचार जानके पटल के शोभा बाढ़ही ...।
  कलम तोर जय हो ।

सरला शर्मा

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       पहली कहय कि *नेकी कर अउ दरिया म डार* फेर आज सिरिफ एके चीज दिखथे, कुछु भी कर , अउ  सोसल मीडिया म डार। अउ जरूरी घलो हे,  काबर की आज सोसल मीडिया के तार मनखे के धड़कन ले जुड़ गेहे। केहे के मतलब जमाना सोसल मीडिया के हे। आज लगभग हर हाथ म मोबाइल हे, अउ सुबे साम मनखे वोमा भिड़े, जम्मो कोती के शोर खबर अउ मनोरंजन के साथ साथ गियान घलो पावत हे। बबा के लगाये बर के आज सबूत नइहे, काबर कि वो जमाना सोसल मीडिया के नइ रिहिस। आज तो एक पेड़ ल लगावत 20, 25 झन दिखथे। अउ फोटू खिचाके सोसल मीडिया म वाहवाही बटोरथे। चाहे परब- तिहार होय, या बर बिहाव सबे सोसल मीडिया म मान पावत हे।
             जब सोसल मीडिया भारत म पाँव पसारत रिहिस त भारतीय सुधिजन मन  चिंता व्यक्त करिन कि  एखर ले अंग्रेजी के बोलबाला हो जही। फेर आज हिंदी  अंग्रेजी ले आँखी मिलाके बतियावत हे। अइसन म  *छत्तीसगढ़ी* काबर पिछवाय, उहू ल हमर राज के जम्मो झन मनखे मन बरोबर बउरत हे, फेसबुक वाटससप अउ कतको माध्यम म छत्तीसगढ़ी भाषा के लेख, कविता, गीत के आडियो, वीडियो भराय पड़े हे। सोसल मीडिया म हमर भाषा बरोबर जघा बना डरे हे, साहित्य  अउ गीत संगीत के बढ़वार लगातार दिखत हे। आज कवि अउ लेखक मनके कविता, गीत लेख  तरोताजा अउ तुरते  सोसल मीडिया के जरिये चारो कोती बगर जावत हे। छत्तीसगढ़ी भाषा अउ साहित्य ल नवा ऊँचाई मिलत हे। छत्तीसगढिया मन सोसल मीडिया म बरोबर भाषा साहित्य अउ छत्तीसगढ़ के पार परम्परा ल स्थापित करत हे। नवा कवि अउ लेखक मनके संगे संग हमर पुरखा साहित्यकार मनके  गीत,कविता, कहानी अउ विचार ल घलो गुणीजन मन सोसल मीडिया म पहुँचावत हे, उँखर अइसन उदिम ले हमर साहित्य नवा ऊंचाई म जावत हे। पुरखा मनके धरोहर आज सोसल मीडिया के शोभा बढ़ावत हे। उँखर सुरता म कतको उदिम हमर राज के गुणवान संगी मन करत हे, अउ सबला येमा हाथ घलो बटाना चाही, काबर की उँखर साहित्य अउ विचार नवा जमाना बर नवा रद्दा गढ़ही।
            *पुस्तक के पहुँच सिरिफ शिक्षित मनखे तक होवय, फेर सोसल मीडिया म साहित्य आडियो वीडियो रूप म अनपढ़ के अंतस ल घलो अमरत हे।*  आज सोसल मीडिया मनोरंजन, शिक्षा, अउ सूचना के बड़का जरिया बन गेहे, ओमा हमर साहित्य घलो जगमगावत हे। सोसल मीडिया, पठोय सबे चीज ल बरोबर सम्भाल के रखथे येमा कॉपी पुस्तक कस पानी, बादर , अउ दिंयार के डर घलो नइ रहय। आज लेखक कवि मन अपन कविता लेख के बरोबर प्रचार प्रसार भी ये माध्यम ले करत हे, अउ उन ल आह, वाह , लाइक कमेंट रूपी उत्साह के संगे संग ज्ञानीजन मनके मार्गदर्शन घलो मिलत हे। लाकड़ाऊन म सबले जादा साहित्यकार मनके थेभा सोसल मीडिया  बनिस। लिखई, पढ़ई के सँगे सँग आडियो वीडियो रूप म कवि मन खूब वाहवाही बटोरिन अउ बटोरत घलो हे। छत्तीसगढ़ी  म लिखई पढ़ई दिनोदिन बाढ़त हे, येला सोसल मीडिया घलो बरोबर सिद्ध करत हे।
                सोसल मीडिया के तार जमे कोती लमे हे, अइसन म हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य न सिर्फ भारत म बल्कि विदेश म घलो पहुँचत हे। *छंद के छ* के कविता ब्लाग *छंदखजाना* के लाखों विदेशी पाठक मिलथे। अउ अइसन कतको ब्लाग हे जेला पूरा विश्व निहारत हे। आदरणीय संजीव तिवारी जी  कस कतको गुणीजन मन छत्तीसगढ़ी ल गूगल म स्थापित करत हे।  पुस्तक घलो सॉप्ट कापी जे रूप म आकर्षक ढंग ले छपत हे। आज हर कोई  मोबाइल  ले जुड़े हे, उठत बइठत सब लगे हे , अउ रंग रंग के जानकारी के साथ मनोरंजन घलो पावत हे। छत्तीसगढ़ी साहित्य के उत्थान बर सोसल मीडिया बड़का मचान बरोबर हे, जे विश्वभर ल परोसे के काम करत हे।
            सोसल मीडिया  म झूठा वाहवाही घलो गजब फलत फूलत हे, बिन पढ़े आह, वाह चलत हे, जेन कभू कभू दुख लगथे, कतको झन  कखरो लेख कविता ल घलो चोरावत दिखथे, यहू गलत बात ये।  खैर छोड़व, *सबे  चीज के बने म बने होथे, अउ गलत म गलत।* सोसल मीडिया जतके नेता, व्यापारी,डॉक्टर,मास्टर, वैग्यानिक, फ़िल्म, अउ  गुणी ज्ञानी बर उपयोगी हे, ओतके उपयोगी हम सब साहित्यकार मन बर हे, बशर्ते उपयोग के दशा दिशा सकारात्मक होय।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

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छत्तीसगढ़ी साहित्य पहिली पढ़े बर नइ मिलय,बड़े बड़े साहित्यकार मन के पुस्तक छपंय पर आम जन के पहुँच से दूर रहय।
लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से हमर साहित्यकार मन ला जाने के पढ़े के मौका मिलत हे।
अब हिंदी रचना मन हर जनसुलभ तो शुरू से  हवय लेकिन छत्तीसगढ़ी साहित्य बर ये सोशल मीडिया बहुते कारगर उपयोगी होगे हे।
येखर से आज कतको ग्रुप चलत हे
एक दूसर से जाने पहचान के संगे संग रचना भी आदान प्रदान होवत हे।
अपन मन के भाव ल सबके सामने रखे के अवसर भी मिलत हे।
सबले बड़े तो सौभाग्य ये मिले हे कि येखर माध्यम से बहुत बढ़िया कक्षा भी चलत हे ,गुरुकुल जैसे वातावरण भी हे।
इहाँ सिर्फ छंद नइ सिखाय जाय
सम्पूर्ण व्यक्तित्व भी निखारे जाथे।
सोशल मीडिया में छत्तीसगढ़ी साहित्य के चर्चा होवत हे तब
छंद परिवार के कक्षा ल अनदेखा नइ किये जा सकय।
येखर माध्यम ले कतको झन नवा कलमकार मन हा अपन लेखनी ल धार करत हें। इँहा फोकट के वाहवाही नइ होवय बल्कि खरा बात होथे।
अगर अइसने हर जगह रचना मन के समीक्षा होय अउ रचनाकार येला सहजता से स्वीकार करें तो
पोठ पोठ रचना ही आही।
आज ये अभिव्यक्ति के सरल माध्यम होगे हे।
सोशल मीडिया से छत्तीसगढ़ी साहित्य सबो जगह बगरत हे अउ सम्मान पावत हे।


आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

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साहित्य, समाज के दरपन आय एमा कोनो संदेश नइये काबर की साहित्य हा समाज ला एक सही दिशा प्रदान करथे।
                    आज दुनिया भर मा साहित्य के डंका बाजथे, साहित्य के परचम लहराथे माने साहित्य के अतका जादा परभाव अउ विस्तार देखे ला मिलथे जेकर कल्पना नइ करे जा सकय। छोटे-छोटे गाँव, कस्बा, शहर से लेके हर जगा साहित्य बोवाय हे। ए बात मा दूमत नइहे की साहित्य के प्रभाव अभी के युग मा जादा हे फेर साहित्य ला चलईया कलमकार मन के संख्या भी जादा हे जेमन नित दिन अपन सेवा देवत हवँँय।
                   आजकल के लोगन मन के मुँह ले सुने हँँव जेमन कहींथय कि-साहित्य के प्रभाव कम होगे हे, अइसन कछु नइहे हालांकि पहिली के साहित्य अउ आज के साहित्य मा थोर-थार बदलाव आए हे फेर विस्तार तो ओइसने हे जईसन पहिली रिहिस।
        साहित्य अउ साहित्यकार के परम धरम आय की ओमन समाज ला अउ समाज ले जुड़े हर  झन ला जागरूक करे के काम करय *काबर की जागरूकता हा एक मात्र विकल्प आय प्रगति के* हर मनखे के नकरात्मक धारणा ला बदलना भी साहित्य बर जरूरी हे, इही कारन साहित्य ला विस्तृत करना आज के तारीख मा बहुत जरूरी हे हालाँकि विस्तार हवय फेर अउ जादा विस्तार लाना एक नवा समाज के निर्मान करही।
एक बात अउ हे राजनीति घलो साहित्य ऊपर आधारित हे जब तक साहित्य हे तब तक जग मा सकारात्मकता विद्यमान हे।

*छंद साधक*- अमित टंडन अनभिज्ञ

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       कुछ समे पहली तक छत्तीसगढ़ी भाखा मा लिखाय साहित्य नइ मिलत रहिस। शहर मन मा भले कुछ साहित्य मिल जाय फेर उहू हा सरलता ले नइ मिलत रहिस। साधारन मनखे मन ला आकाशवाणी के माध्यम ले बड़का साहित्यकार मन के गीत सुने बर मिल जाय। कभू कभू गोष्ठी साहित्यिक परिचर्चा घलो प्रसारित होवत रहिस।
       संचार माध्यम के विकास दुनिया मा होवत गिस अउ देश के सँगे संग हमर छत्तीसगढ़ राज मा घलो मनखे मन के हाथ मा मोबाइल आइस। मोबाइल मा घलो तकनीकी विकास होवत गिस अउ स्मार्ट फोन आइस। जब ले स्मार्ट फोन लोगन मन के हाथ मा सहजता ले आय हे छत्तीसगढ़ी साहित्य पढ़े सुने बर भारी मातरा मा मिलथे। एमा अबड़ अकन ठिहा हे जिहाँ जाके लोगन मन अपन बिचार छत्तीसगढ़ी भाखा मा रखथें। इही ठिहा मन सोशल
मीडिया आयँ।
          सोशल मीडिया मा बड़े बड़े जुन्ना साहित्यकार मन ले लेके छोटे छोटे जे मन ला नेवरिया साहित्यकार कहि सकथन, के विचार छत्तीसगढ़ी मा पढ़े सुने बर मिलथे। एकर माध्यम ले एक दूसर के सिरजन के आदान प्रदान सरलता ले घलो हो जवथे जेमा गलती के सरलता ले सुधार करत बन जथे। एकर ले समय अउ धन के घलो बचत होवत हे। अभी सोशल मीडिया मा छत्तीसगढ़ी के सैकड़ों ग्रुप मिल जही। गाँव गाँव मा एकर माध्यम ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रचार प्रसार होवत हे। सोशल मीडिया के माध्यम ले आनलाइन कार्यशाला, गोष्ठी, काव्य पाठ अउ बहुत अकन गतिविधि संचालित हावत हाबय जेन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला समृद्ध करत हाबय। सोशल मीडिया वर्तमान मा अपन विचार रखे के सहज अउ सरल माध्यम बन गेहे। ये कहिन कि सोशल मीडिया हा छत्तीसगढ़ी साहित्य ला बिकास के रस्ता धरा दे हे।
          सोशल मीडिया के माध्यम ले कुछ जुन्ना साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ करे बंदनीय बुता घलो करत हाबयँ। ये मन नेवरिया साहित्यकार मन ला अँगरी धर के लिखे बर सिखोवत हें अउ माँजत घलो हें । खच्चित उँकर ये उदिम छत्तीसगढ़ी साहित्य ला ऊँचाई तक ले जाही। नेट के जमाना मा मोला अइसे लगथे कि भविष्य मा ये प्रिंट मीडिया नँदा जाही अउ सोशल मीडिया के ही बोलबाला रइही जेन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ ले अउ पोठ करही।

मनीराम साहू 'मितान'

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आज के ये जउन दउर हे ओहर , ऑनलाइन अउ डिजिटल युग संग सोशलमीडिया के जमाना ये । आज कल हमर मन के बीच मा , अइसन - अइसन जिनिस मन के सुविधा अउ बेवस्था होंगे हावय । जीखर मन के आय ले समाज के लोगन मन ला बड़ सहूलियत होवत हावय , अउ काबर नइ होही पहिली जउन काम ला कराय बर हमला  दुरिहा जाय बर पड़त रहिस । ओहर आज कल सबो जिनिस के सुविधा मन हर , हमला अपन तीर तखार म ही मिल जवत हे । आज विज्ञान हर अब्बड़ उन्नति करे के संगे संग , अतेक बड़े - बड़े काम बुता (आविष्कार) मन ला घलो सब करे हावय । जीखर मन के बारे म मनखे मन हर कभू सोचे घलव नइ रहिन होही । पहिली के समय मा लोगन मन हर सब , जउन जउन जिनिस मन के बारे म सोचत रहिस हे । आज विज्ञान के आविष्कार अउ आशीर्वाद ले ओ सबो जिनिस मन संग , ओखर ले कइ गुना जादा हमर मन के बीच मा आज हावय ।
जेमा अगर कहूँ हम गोठ करथन सोशलमीडिया के , ता सोशलमीडिया हर अइसन सुविधा आय । जेमा ले मनखे मन हर अपन खुद के प्रचार संग , काही जिनिस मन के घलव प्रचार अउ प्रसार ला । लोगन मन के बीच मा , अब्बड़ सरलता अउ सहजता ले कर सकथे । ये जउन सोशलमीडिया हे ओहु हर हमर मन के बीच मा नाना प्रकार के हावय : - जउन मन ला हमन - टीवी , रेडियो , मोबाइल , फोन , अउ किसम किसम के समाचार पत्र अउ पत्रिका मन म रोज पढ़त सुनत अउ देखत रहिथन ।
अब हम गोठ करथन हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य मा सोशलमीडिया के , आय के बाद ले होय बदलाव संग सोशलमीडिया मा हमर पहिली के अउ अभी के जउन साहित्यिक (गतिविधि) लेखन के दउर मा पड़े प्रभाव के ।
त हमर पहिली के अउ वरिष्ठ साहित्यकार लोगन मन सब बताथे की पहिली ये सब फेसबुक अउ वाट्सअप के चलन नइ रहिस हे । तेपाय के गिने चुने अउ बड़े बड़े साहित्यकार मन के ही लिखे रचना मन हर अखबार मन म छपत रहिस । फेर आज के दउर मा ये सोशलमीडिया अउ फेसबुक वॉटसअप के आय ले येखर चलागन अइसे होंगे हावय , की आज कल कुछ भी लिखव अउ ओला अपन फेसबुक होय चाहे वॉटसअप म ड़ाल के वाह वाही लुटव , आज के दउर मा येहर सब ले सरल अउ सस्ता सुविधा होंगे हावय । अउ येखरो ले निमगा सरल तो आज कल के अखबार मन म छपना होंगे हावय , पहिली के समय के तुलना मा आज अतेक अखबार होंगे हावय हमर मन के बीच म , की लोगन मन हर कुछ भी लिखथे अउ ओ सब हर छप जथे । जेखर चलते ही आज कल लोगन मन के जउन लेखन के ये स्तर हे ओमा सुधार नइ हो पावत हे । आज सोशलमीडिया के ये दउर हर लोगन मन के दिल अउ दिमाक म अइसे घर कर दे हावय की लोगन मन ला तो बस लिखना हे अउ बस छपना हे । चाहे ओ रचना हर कइसनो राहय , ओ सब ले ओमन ला कोनो फरक नइ पड़य । आज इही हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य के पछुवाय के एक ठन कारन इहु हरय । आज भी हमर मन के बीच मा , हमर महतारी भाखा के जानकार अउ वरिष्ठ साहित्यकार भाषाविद् सुजान मन हर हवै । फेर ओखर ले जादा तो दुख के बात ये हावय की अभी के दउर के जउन नवा लिखइया कलमकार मन हे , तउन मन दू चार लाइन का लिखथे अउ अपन आप ला आज के युवा अउ वरिष्ठ साहित्यकार घलव कहिथे । जउन मन ला न तो येखर बरोबर क ख ग पता राहय । आज सोशलमीडिया हर भले हमन ला अतका सुविधा दे हावय , फेर कहिथे ना फूल के संग म काँटा तो रहिबे करथे । बस इही हे कतकोन मन बने काम बर करथे त कुछ मन हर गलत काम बर , ये अपन अपन समझदारी के बात होथे ।

                                मोहन कुमार निषाद
                            गाँव - लमती , भाटापारा ,
                         जिला - बलौदाबाजार (छ.ग.)
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                जबले संचार क्रांति आइस हावय तबले नवा नवा सबो चीज मा उन्नति होइस हावय अउ हमर छत्तीसगढ़ साहित्य एखर से अछूता नई हावय। मोबाइल आज हमर जिनगी के एक अंग बनगे हावय अउ एखर प्रभाव छत्तीसगढ़ साहित्य मा भी देखे जा सकथे। आज संचार क्रांति  के माध्यम ले  सोशल मीडिया के नवा नवा हमला प्लेटफार्म मिलिस जइसे *व्हाट्सएप, फेसबुक, ब्लॉगर* अउ ये सबो सुविधा हमर समाज के सब्बो जन मेर पहुँचत हावय। आज हमन न सिर्फ अपन रचना ला मोबाइल के माध्यम ले लिखत हावय अउ प्रचार प्रसार तको करत हावय। आज प्रसार प्रसार करे बर हमर मेर व्हाट्सएप, फेसबुक हावय अउ रचना प्रकाश बर ब्लॉग तको हावय। पहली हमर रचना ला बिना प्रकाशन के सब जन मेर नई पहुँचा पावत रहेँन फेर सोशल मीडिया आय ले एहू समस्या हा खत्म होगय। पहली प्रकाशन में गलती होंगे त ओला सुधारे के भी सुविधा नई रहिस। फेर आज  गूगल के माध्यम ले ब्लॉगर मा रचना ला प्रकाशन कर अपन रचना ला कइयो बछर सुरक्षित रख सकत हावय अउ अगर रचना में कुछ गलती हावय त ओला कभी भी सुधार भी कर सकत हावय। आज लोगन ब्लॉगर के रचना ला कहूँ मेर कोनो जगह जब भी समय मिलही पढ़ सकत हावय, चाहे मनखे दूर दराज देश मा होय या गाँव शहर में होय। आज छत्तीसगढ़ साहित्य ला सोशल मीडिया बहुत बड़े रूप मा पाठक अउ रचनाकार प्रदान करिस हावय अउ करत हावय। मोर सुरता मा सबले पहली छत्तीसगढ़ साहित्य मा ब्लॉगर के उपयोग अउ छत्तीसगढ़ साहित्य ला पढ़े के सुविधा *गुरतुर गोठ* के माध्यम ले *आदरणीय संजीव तिवारी जी* प्रदान करिन अउ उँकर अथक प्रयास ले हमर छत्तीसगढ़ी भाषा के उपयोग ला देख गूगल हा छत्तीसगढ़ी गूगल इंडक कीबोर्ड प्रदान करिन। एकर से हमन विचार कर सकत हावय की आज छत्तीसगढ़ साहित्य ला सोशल मीडया कतका प्रभावित करिस अउ कतका बढ़िया भाषा ला सहेजिस। आज छत्तीसगढ़ साहित्य मा नानम प्रकार के गद्य अउ पद्य ला सोशल मीडया के माध्यम ले सीखत अउ पढ़त हावय। सोशल मीडिया के माध्यम ले *आदरणीय अरुण निगम गुरदेव* हा छंद के छ ऑनलाइन कक्षा चालू करिन आज ओकर परिणामस्वरूप नवा नवा अनेक छन्दकार छत्तीसगढ़ मिल पाइस। मोर बिचार ले आज छत्तीसगढ़ साहित्य के विकास मा सोशल मीडया के महत्वपूर्ण भूमिका हावय अउ एला भुलाये नइ ला सके।
           
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
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            छत्तीसगढ़ी भाखा अब धीरे धीरे भाषा मा तब्दील होवत हे। छत्तीसगढ़ के अधिकांश आबादी ए भाषा ला या तो उपयोग करथे या समझथे। सुदूर बस्तर के दंतेवाड़ा अउ बैलाडिला मा भी ए भाषा के जनइया आप ला मिलही ।आप आदमी  सहज संपर्क भाषा के रूप मा एला बोलचाल मा लाथे। कुछ अलग अलग रूप मा पूरा छत्तीसगढ़ मा प्रचलित हे। परन्तु हमर पढ़े लिखे अउ शासन प्रशासन के भाषा अभी नइ बने हे। कतको साहित्यकार मन समर्पित होके छत्तीसगढ़ी मा साहित्य सिरजन करे हें, अउ वर्तमान मा करत हे। आज बहुत अकन अखबार मन नियमित छत्तीसगढ़ी मा साप्ताहिक पेज प्रकाशित करत हें। आकाशवाणी, टेलीविजन ले समाचार के प्रसारण होवत हे। रेल्वे मा हिन्दी अउ अंग्रेजी के संग छत्तीसगढ़ी मा घलो सूचना मिलत हे। जनता के ये सर्वमान्य बोली ला भाषा के दर्जा बर बहुत अकन उदीम साहित्यकार मन करिन।तभे छत्तीसगढ़ सरकार हा 2008 मा राजभाषा के दर्जा दिस।अउ तब ले राजभाषा आयोग के माध्यम ले घलो छत्तीसगढ़ी के समृद्धि बर बहुत अकन आयोजन होवत आवत हे। ये छत्तीसगढ़ी अब तक कुछ पुस्तक अउ कुछ अखबार के साप्ताहिक पन्ना तक ही सीमित रिहिस।
जब ले  मोबाइल आम आदमी के हाथ मा आय हे छत्तीसगढ़ी भाषा ला नवा उड़ान मिल गे हे। साहित्य जगत मा छत्तीसगढ़ी मा लिखने वाला मन के पूछ परख बने हो गए हे। फेसबुक वाट्सप मा छत्तीसगढ़ी मा लिखइया पढ़इया मन के बाढ़ आ गे हे। छत्तीसगढ़ी बर विचार मंथन होवत हे। भाषा के समृद्धि बर चिंतन होवत हे ।आज छत्तीसगढ़ी मा गद्य अउ पद्य के लेखन मा आप ला बहुत सुधार दिखही। व्याकरण अउ भाषायी शुद्धता मा प्रगति आप ला दिखही। छत्तीसगढ़ी मा आज  गीत के साथ साथ छंद बद्ध काव्य के विपुल सामग्री आप ला दिखही, जेकर पहिली अभाव असन रहिस हे। नवगीत गजल सजल जइसे बहुत अकन हिंदी उर्दू के विधा हा घलो छत्तीसगढ़ी भाषा मा सम्मान पावत हे।

सरकार के बहुत अकन विज्ञापन आज छत्तीसगढ़ी मा रहिथे। बाजार भी आज छत्तीसगढ़ी भाषा के महत्व ला समझ के मार्केटिंग बर एकर उपयोग शुरू कर दे हे। शासन प्रशासन के कर्मचारी अधिकारी मन ला छत्तीसगढ़ी लिखे बोले बर प्रशिक्षण शाला लगत हे। छत्तीसगढ़ी आम आदमी के भाषा ए। हम जतके एकर महत्व ला बढ़ाबो, लिखबो पढ़बो बोलबो, सरकार वोतके मजबूर होही।
सोशल मिडिया के आम आदमी तक पहुंच होय ले छत्तीसगढ़ी भाषा ला संजीवनी मिल गे हे। मैशेज आज छत्तीसगढ़ी मा भी ओतके कन लिखे पढ़े जावत हे जतका कन हिंदी मा। बधाई संदेश, सूचना, कथा कहानी, कविता गीत, तीज तिहार के गोठ सबो आज आप ला छत्तीसगढ़ी मा आसानी ले मिलही सोशल मिडिया मा ।नवा नवा लेखक कवि मन बर बहुत सुग्घर मंच हो गए हे फेसबुक वाट्सप मन अउ इंटर्नेट। दूर अंचल के व्यक्ति भी छत्तीसगढ़ी भाषा ला माध्यम बना के आज प्रसिद्धि पावत हे।आंन लाइन सिखे सिखाय, लिखे पढ़े अउ गोठियाय के सुगम माध्यम उपलब्ध होय के कारण आज छत्तीसगढ़ी मा लेखन मा उत्साह दिखत हे । छत्तीसगढ़ी साहित्य निश्चित रूप ले महत्व पावत हे। भविष्य सुंदर हे। आज छत्तीसगढ़ी मा लिखइया मन के पूरा प्रदेश मा एक समर्पित समुह आप ला दिखही ।हम जतके ए ला पढ़े लिखे बोले के माध्यम बनाबो, ओतके एकर साहित्य मान पाही सरकार भी छत्तीसगढ़ी ला अपनाय बर मजबूत होही। जन बल के आगू सरकार ला झूके ला ही पड़थे। छत्तीसगढ़ी भाषा ला समाज के, साहित्य के, सरकार के, प्रशासन के भाषा बनाय बर, जन बल ला मजबूत करे बर पडही। ताकि शासन एला अवइया समय मा स्कूली शिक्षा के माध्यम बनाय। सरकार के कामकाज के भाषा बनाय। छत्तीसगढ़ी भाषा के उत्थान बर सोशल मिडिया हा जन आंदोलन के सर्वोत्तम माध्यम बनत हे।

बलराम चंद्राकर भिलाई
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     अइसे तो हर भाखा के अपन साहित होथे।जउन म वो भाखा के बोलइया मनखे के दुख-पीरा,हाँसी-ठिठोली, सँग जिनगी जिएँ सबो चलन के दरसन करे जा सकत हे।अइसे भी कहे जाथे, कहूँ कोनो सँस्कृति अउ सभ्यता के नाँव बुताना हे (नाश करना हे)त उँखर साहित ल बिगाड़ दौ।एखर मतलब होइस कि सँस्कृति अउ सभ्यता ल जानना हे त वो देश परदेश के साहित ल पढ़ना चाही। साहित जरूरी नइ हे कि बड़े-बड़े पोथी पथरा के रूप में मिले, साहित के सरूप समे के संग बदलत गे हे अइसे कहे जा सकत हे। काबर कि बहुत कुछ जानकारी जउन अभी तक देखे म मिलथे,वो म शिलालेख या पथरा में लिखे अउ उकेरें चित्र ल भी साहित्य के रूप में लिए जा सकथे। हाट बाजार मंदिर मन म इहाँ-उहाँ बिखरे पड़े मिले हे।
     कुछ साहित मौखिक रूप ले एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी में सरलग आगू बढ़त हे। अइसन हमर छत्तीसगढ़ी साहित बर भी कहे जा सकत हे या माने जा सक थे। इहाँ कथा कहिनी बाबा डोकरी दाई मन ले सुन के कतको पीढ़ी बीत गिन, आजो बबा डोकरी दाई मन ल कई ठो कहिनी किस्सा गाँव के नाती नतुरा मन ल सुनात  देखे जा सकथे।टीवी रेडियो के चलन नइ रहे ले गुड़ी चौक मा, पारा परोस के बड़े-बड़े चौरा म किस्सा कहिनी कहि के थके हारे मनखे  मन के मनोरंजन करथे। धीरे-धीरे समे के संँग हमर पुरखा साहितकार मन एला लिखिन-पढ़िन अउ किताब पोथी के रूप में सहेजिन। आजो सहेजत जात हे।जउन ला लोकसाहित के नाव ले आज भी नवा नवरिया साहित्यकार मन अब सब परकार के छत्तीसगढ़ी साहित्य सिरजत हावे।फेर पढ़ईया के तब रोना रहिस रहे अउ आजो रोना हवे। ए कहे जा सकथे। किताब पढ़ईया अब नहीं के बराबर हे, अइसन काबर हे एखर गोठ करना अभी जरूरी नइ हे। फेर एकर पूर्ति करत नवा उदीम मोबाइल आय हे। जेमा सोशल मीडिया के रूप में व्हाट्सएप,फेसबुक,ट्वीटर गूगल के उपयोग करे जात हे। छोटे बड़े नवा नेवरिया अउ वरिष्ठ साहितकार मन ल एके मंच में देखे जा सकत हे। जेन नवा नेवरिया साहितकार मन ला मंच नइ पात रहिन।उन ल सोशल मीडिया मउका दिस।हर हाथ मोबाइल चलावत सोशल मीडिया में अपन भाखा बोली के बात सुनथे ।ए किसम ले कहे जाय त हर भाषा के साहितकार बर मीडिया बड़े वरदान साबित होत हे। फेर छत्तीसगढ़ी बर बहुते जादा वरदान माने जा सकत हे। कारण इहाँ समाचार पेपर म छत्तीसगढ़ी बहुत कम होथे ।छत्तीसगढ़ी के पर्याप्त समाचार पेपर नइ हे। छत्तीसगढ़ी के रचनाकार ल पाठक तक बरोबर पहुंचे के मौका फेर व्हाट्सएप फेसबुक के जरिया ले मिले हे।
       आज सरकारी योजना मन के अउ राजनीतिक विज्ञापन के परचार परसार भी सोशल मीडिया म भरपूर होवत हे।यहू म छत्तीसगढ़ी के परयोग एक आशा के किरण हे कि सरकार अउ नेता मन मन ले मानथे कि जनता तक छत्तीसगढ़ी ले बात सही ढंग ले पहुँचथे।एखर फायदा साहितकार मन ल उठाना पड़ही।साहित सिरजन करत छत्तीसगढ़ी ल बराबर मान देवाय बर जरूरत के उदीम करँय।
       सम के सँग चलत ही सफल होय जाथे, समे के पाछू चले ले कभू सफल नइ होय जा सकय।इही ढंग ले आज के समे सोशल मीडिया के हावै एकर उपयोग करत छत्तीसगढ़ी भाखा के विस्तार करना पड़ही।
       सोशल मीडिया म छत्तीसगढ़ी भाखा या साहित बर दू ठन बड़े चुनौती दिखथे।एक किस्सा कहिनी बड़े होय ले एला पाठक नइ पढ़े।
दूसर आज के जादा पढ़े लिखे मन अपन लइका मन ला अपन महतारी भाखा ले दूरिहा रखत हें।
       ए दूनो चुनौती ले पार सरकारी पहल ले ही  पाय जा सकथे। पाठ्यक्रम म कहिनी लोकचरित्र के सँग गीत कविता के पढ़ाई के महतारी भाखा माध्यम बनै।
      छत्तीसगढ़ी बर एक बात यहू हे कि बहुत पहिली एकर बोलइया रहिस तब साहितकार नइ रिहिन।आज दूनो हे त एला राजभाषा के सही मान देवाय म कोनो अड़चन नइ होना चाही।

*पोखन लाल जायसवाल*
*पलारी बलौदाबाजार छग.*

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                  छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पोठ करे के उदिम ले चलत छंद के छ रूपी आंदोलन, सोसल मीडिया के भरपूर लाभ उठावत हे। मार्च 2016 ले सतत रूप ले आनलाइन कक्षा गतिमान हे, जिहाँ छत्तीसगढ़ के लगभग 20,22 जिला के नवा अउ जुन्ना कलमकार मन जुड़े हे, अउ छंद विद्या के ज्ञान अर्जित करत हे। आज छंद के छ परिवार म 120 ले आगर साधक संगी मन लगभग 50, 60 प्रकार के छंद म बरोबर कलम चलावत हे, एखर साथ साथ ऑनलाइन छंदमय काव्य गोष्ठी जेन 2017 ले लगातार चलत हे, तेखर माध्यम ले छंद के लय, ताल यति, गति ल घलो सीख जे अपन गायकी ल निखारत हे। छंद के छ के ये उदिम 2016 ले आजो सब ला सँग लेके , शालीनतापूर्वक बरोबर चलत हे। भविष्य म अउ साधक मन घलो जुड़ही, कई झन अभी ले, छंद परिवार के सम्पर्क में हे। आज  छंद के छ के 12 ठन कक्षा जारी हे, जिहाँ साधक मन छत्तीसगढ़ी साहित्य म छंदबद्ध रचना ल बढ़ाये बर लगे हे।
           छंद के छ के ये उदिम पूर्णतः सोसल मीडिया उप्पर आधारित हे, वाट्सअप के माध्यम ले कक्षा अउ काव्य गोष्ठी दूनो संचालित होथे। छत्तीसगढ़ी साहित्य म छंदमय कई ठन पुस्तक छंद के छ के साधक मन निकाले हे, जेमा  निगम गुरुदेव के छंद के छ(जेन ये आंदोलन के आधार बनिस), चोवाराम वर्मा जी के छंद बिरवा, मनीराम मितान जी के आगी सोनाखान के, जगदीश साहू जी के सम्पूर्ण रामायण, रमेश चौहान जी के दोहा के रंग, आँखी रहिके अंधरा आदि एखर आलावा कई झन साधक मनके पुस्तक प्रकासाधीन हे। सोसल मीडिया के सहारा ही, साधक मनके छंद, छंदखजाना ब्लाग म प्रकाशित करे जाथे, जेखर पाठक न सिर्फ हमर राज, हमर देश बल्कि विदेश म घलो दिखथे। रायपुर, बिलासपुर दुर्ग भिलाई म क्लास चलाये ले आसपास के कवि या कोनो रुचि रखइया साधक मन भर जुड़ पातिस, पर सोशल मीडिया के मदद ले न सिर्फ रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई के साधक मन जुड़े हे, बल्कि कोरबा, रायगढ़, जशपुर, कोरिया, कांकेर, राजनादगांव, कवर्धा, बलौदाबाजार, चाम्पा, बेमेतरा, गरियाबंद, महासमुन्द, बस्तर, बालोद, आदि जिला के कलमकार मन घलो जुड़े हे। अउ वाट्सअप के माध्यम ले छंद सीखत हे अउ सीखे के बाद गुरु बनके सीखवत घलो हे। गुरु शिष्य के ये परम्परा (सीखे अउ सीखाय के) पूर्णतः निःस्वार्थ अउ निःशुल्क हे। छत्तीसगढ़ी छंद बर सोसल मीडिया के वाट्सअप बड़का सहारा बनिस, ओखर प्रताप ले आज छत्तीसगढ़ी म लगभग 5000 छंदबद्ध रचना छंद जे छ के साधक मन द्वारा हो चुके हे।
           जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
           बाल्को, कोरबा
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                 मीडिया ल लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ माने गे हे। प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  के संगे संग  नवा -नवा अवतरे सोशल मीडिया ल जेला हम प्रेम से मोबाइल मीडिया कहि सकथन, एकर रूप कहे जा सकथे। आजकल के बात करन त एमा सोशल मीडिया/मोबाइल मीडिया जेकर फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्वीटर आदि अनेक अंग हे, बड़ सजोर दिखथें।काबर कि एहा  सरी दुनिया मा छा गेहे।पढ़े लिखे मन ल कोन काहय  अनपढ़ तक मन एकर परम भक्त होगे हें।
  जहाँ तक छत्तीसगढ़ी साहित्य उपर सोशल मीडिया के प्रभाव के चर्चा करे जाय त अइसे लागथे कि ए दौर ह छत्तीसगढ़ी साहित्य के स्वर्णकाल जइसे लागथे। ए सोशल मीडिया के खाद-पानी पाके छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ रचनाकार जम्मों लहलहावत दिखथें। गाँव -गाँव म छिपे गुदड़ी के लाल मन के सृजन ल एहा जग जाहिर करत हे। पूरा जिनगी पहा जतिच फेर कभू उँकर रचना नानमुन पेपर के कोनो कोनटनिया तको म नइ छपतिच तेन ह आज चोबीस घन्टा सोशल मीडिया म छपत हे अउ ओला हमर देश प्रदेश के कोन काहय विदेश मन के मनखे मन पढ़त हें।
     आप ल ए जान के सुखद आश्चर्य होही कि-छतीसगढ़ी के नवा जुन्ना छंद साधक मन के  छंद खजाना नाम के एक फेसबुक पेज म संग्रहित होथे तेला यूरोप महाद्वीप के मनखे मन तको पढ़थे।एहा सोशल मीडिया के महिमा आय ओइसने अउ बहुत झन छत्तीसगढ़िया कलाकार, साहित्यकार मन के कृति विश्व व्यापी होवत हे।
       कल्पना करव आज ले 10 --15 साल पहिली कोनो पुरखा साहित्यकार के रचना ल हम पुस्तक म ही पढ़ सकत रहेन । फेर पुस्तक का सबो आप जनता के पहुँच म रहिसे? नइ रहिसे । आज सोशल मीडिया के कृपा ले सब सहज रूप म उपलब्ध हे। मैं प्रणम्य पं सुंदरलाल शर्मा जी , हरि ठाकुर जी , जनकवि कोदू राम दलित जी आदि के पुस्तक ल नइ पढ़े अवँ , न तो उँकर किताब मोर सो हावय फेर सोशल मीडिया के माध्यम ले अब घर बइठे पढ़त हवँ। आँजे दानलीला ल अमर कवि गायक मस्तुरिहा जी के स्वर मा देखे ,सुने हवँ।
     सोशल मीडिया के माध्यम ले सीखना सिखाना घलो होवत हे। साहित्य रस के प्रचार -प्रसार म सोशल मीडिया बड़का भूमिका निभावत हे। छत्तीसगढ़िया साहित्यकार मन के कृति म आधुनिक भाव बोध  के दर्शन होवत हे। साहित्य के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी रीति रिवाज अउ संस्कार ले परिचय ए सोशल मीडिया ह सरी दुनिया ल बहुत तेजी ले करावत हे।  भाषा घलो मँजावत हे ,एमा कोनो शक नइये।हम रचनाकार मन के  परिचय के दायरा ल ए सोशल मीडिया ह  बहुतेच जादा बढ़ावत हे, भले ए आभासी हे। कुछ नइ होना ले कुछ होना तो अच्छा हे। कुल मिलाके सोशल मीडिया ल छत्तीसगढ़ी साहित्य बर वरदान कहे जा सकथे।
        ए तो होइच सोशल मीडिया के छत्तीसगढ़ी साहित्य म चमकत एक पहलू  ।दूसर पहलू ऊपर नजर डारे म वो ह चिटिक धुँधला दिखथे। सबले बड़े करिया धब्बा तो एमा अविश्वनीयता के हाबय।  एके ठन रचना ह आने आने के नाम ले सैंकड़ों पटल म बिन लगाम के दउँड़त रहिथे। पते नइ चलय कि ओकर असली जनक कोन ए। कहूँ के ईंटा कहूँ के रोड़ा ,भानुमति ने कुनबा जोड़ा वाला किस्सा खूब चलत हे। ए हा छत्तीसगढ़ी साहित्य बर शुभ संकेत नोहय। आजकल रचना के चोरी होये ल धर लेहे। आन के रचना म अपन नाम लिख के सोशल मीडिया म डाल देथें अउ ए मीडिया ह पर्रा भर लाई कस बगरा देथे, जेला सकेलत म जीव छूट जही।
      मौलिकता ल तो ए मीडिया ह सुरसा कस मुँह फइलाये लिलत हे। दू चार शब्द आगू पाछू ,भाव जस के तस तहाँ ले होगे मौलिक । सोशल मीडिया अउ गुणवत्ता के बात करना तो बेकारे हे। ऊँचा दुकान अउ फीका पकवान के भरमार हे ।एहा घरोघर कवि,  लेखक ,शायर चुटकी बजावत गढ़ देथे । अइसन चमत्कार कर देना कोनो छोटे मोटे बात आय का?

चोवा राम 'बादल'
हथबन्द, छत्तीसगढ़
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            आज नवा जुग मा अंतर्जाल हा बहुत जादा लाभकारी हे,घर बइठे दुनियाँ के जानकारी हर जिनिस मा मिल जाथे।एखर जीता जागता उदाहरण *छत्तीसगढ़ी छंद*ला श्रद्धेय श्री निगम गुरुदेव द्वारा चलाय गये हे...जेला श्री जितेन्द्र वर्मा वरिष्ट गुरुदेव मन बहुत सुग्घर ढंग ले बताइन है।
बहुत बड़े लाभ हम महिला मन ला होइस हे,घर बइठे हम साहित्य साधना करत हावन अउ जग मा साहित्य ला परोसत हन।एक महिला के कक्षा के नाव लेके बार बार घर ले निकलना नइ हो पाय,आज साहित्य मा रुचि रखने वाला हर महिला अनेको साहित्यिक पटल ,फेसबुक...आदि ले जुड़े हवय अउ लाभ ला घर ब इठे लेत हावय ऐहा आज के जुग मा वरदान हे।
फेर अंनर्तजाल के सकारात्मक अउ नाकारात्मक दुनो पक्ष हे।साहित्य मा ज्ञान के लाभ उठाना अउ आधू बढ़ना सकारात्मक हे अउ दूसर के साहित्य ला अपन नाव देके आधू बढ़ना ए हा नकारात्मक पहलू हे,ऐला अनदेखा नइ करे जा सके।
साहित्य के बात होत हे ता जब कोनो साहित्य एक लेखक अपन हिसाब से लिखथे अउ मिडिया मा डालथे ता ओला अन्य रचनाकार पढ़थे,अउ ओखर सही आकलन करथे,के जेन साहित्य ला परोसे गे हे ओ हा कतका सही हे कतका गलत...!अउ एमा तर्क वितर्क चालू हो जाथे अउ एक सही साहित्य परिणाम के रुप मा निकल के आथे।जेन विश्व बर लाभकारी हे,एखर ले ए लाभ मिलथे के जब कोनो साहित्य हा मिडिया मा डले जाय ता सही सही डाले जाय।आज के जमाना मा मिडिया..बहुत प्रभावी हे हमला सकारात्मक सोच अउ ज्ञान ला अपनाके आधू बढ़ना चाही।

आशा आजाद
मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
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                   बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, के मंत्र ला साकार करे मा संचार तंत्र के भूमिका ,आरंभ से लेके आजतक चलायमान हवे।मिडिया के दू रुप आय,प्रिंट मीडिया अउ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रासंगिक दूनो हवे ,फेर वर्तमान मा इलेक्ट्रानिक मीडिया के बहुप्रचलन ले जन जन जुड़े  हवे।अभी आप संग लिखित संवाद के सशक्त माध्यम,इही सोशल मीडियाच हवे।
हर मनखे के मौलिक बिचार, हम बइठे बइठे कोनो बेरा, कोनो दिन मा सकेल लेथन,बेरा मा जुड़ जाथन अउ नवा जुन्ना सबो के गियान, मिनट भर मा ले लेथन।ये सब माया, आभासी संसार ले हवे,जऊन- छत्तीसगढ़ी भाषा,  समाज , साहित्य , संस्कृति विषय ला बगराय के काज ,सोशल मीडिया करत हावे।परिणाम हम छत्तीसगढ़ साहित्य गौरव के चर्चा ,पटल के माध्यम ले करत हन।भाषा के विकास मा साहित्य के योगदान गद्य  पद्ध दूनो विधा मा समकालीन सरोकार के हर पहलू ले जुड़े हवे।
छत्तीसगढ़ी साहित्य ला  सोशल मीडिया मा समृध्द करे के उदमी मा डाॅ  सुधीर शर्मा,  श्री संजीव तिवारी जी मन ,ब्लॉग ,यू ट्यूब चैनल के जरिया छत्तीसगढ़ी साहित्यकार अउ साहित्य के पहुँच बर देश विदेश तक जोड़े मा,भाषा ला राजभाषा के मान देवाय बर नवा नवा उदमी करत हावे।ऐखर ज्वलंत उदाहरण मा   र्व्हाटसअप के जरिया छंद असन कठिन विषय ला आसान बनाय के कारज करत हवे ,गुरु जी अरुण कुमार निगम जी ,सरलग 2016 ले छत्तीसगढ प्रदेश भर मा,छत्तीसगढ़ी साहित्य ला समृध्द करे बर , नवा पीढ़ी गढ़े मा लगे हवे।
आज फेसबुक  ब्लॉग के जरिया लगभग  दस बारह देश मा छत्तीसगढ़ी छंद ला पढ़े जात हे।
छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के विकास क्रम मा आज सोशल मीडिया के माध्यम ले साहित्य कार मन ला सजग बनाए हवे।नित नवा ऐप के क्रांतिकारी कदम ले आज छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य, साहित्य कार संस्कृति के जस चारों खूँट बगरय हवे,बिषय सामग्री  साहित्य  साहित्य कार परिचय, रचना सबो सोशल मीडिया मा असानी ले मिल जथे।सोशल मीडिया ले  छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के  जुडाव,वर्तमान मा तो अपन छाप छोड़त हवे,भविष्य मा  भी मील के पथरा माने जाही।

 *मीता अग्रवाल मधुर
रायपुर छत्तीसगढ़*
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                     इंटरनेट आये के बाद शुरुआती समय मा पी.सी. फेर लैपटॉप मा हिन्दी के संगेसंग छत्तीसगढ़ी भाषा घलो अपन रंग जमाना चालू करिस। तब साधन संपन्न मन करा पी.सी. अउ लैपटॉप रहिस जेमा ब्लॉग अउ वेबसाइट के माध्यम ले वोमन अपन रचना, आलेख आदि पोस्ट करत रहंय। इंटरनेट वाला मोबाइल फोन आए के बाद उपयोग करने वाला मन के संख्या बढ़गे। ब्लॉगर मन घलो फेसबुक, वाट्सएप, ट्वीटर आदि मा ज्यादा रुचि लेना चालू करिन। आज इंटरनेट वाला फोन सबो झन के पास हे अउ छत्तीसगढ़ मा छत्तीसगढ़ी भाषा मा अपन विचार व्यक्त करना आम बात होगे। लेखन ला सरल बनाए मा मुख्य योगदान हिन्दी-अंग्रेजी के की-बोर्ड ला जाथे। पहिली टाइपिस्ट मन टाइप करत रहिन, आज के की-बोर्ड मा टाइपिंग सीखे के जरूरते नइये। आज सोशल मीडिया मा छत्तीसगढ़ी साहित्य छाए हे। हरेक ला अपन विचार व्यक्त करे के सुविधा उपलब्ध हे।

*संजीव तिवारी जी अपन गुरतुर गोठ डॉट कॉम नाम के वेबसाइट मा छत्तीसगढ़ी साहित्यकार, कलाकार मन के कतको रचना ला संग्रहित करत हें। कई ठन छत्तीसगढ़ी किताब के पी डी एफ तको उहाँ पढ़े बर उपलब्ध हे। पुरखा साहित्यकार मन के कृतित्व अउ व्यक्तित्व, छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउ परम्परा के जानकारी तको गुरतुर गोठ मा संकलित हे* एखर अलावा कई झन साहित्यकार के निजी ब्लॉग मा घलो छत्तीसगढ़ी रचना पढ़े बर उपलब्ध हे। *छन्द के छ - परिवार* के सदस्य मन के छन्द संकलन बर *छन्द खजाना* नाम के ब्लॉग मा निमगा छन्द रचना पढ़े बर उपलब्ध हे। *छत्तीसगढ़ी गद्य खजाना* मा इनकर गद्य रचना पढ़े जा सकथे। *हर छत्तीसगढ़ी साहित्यकार ला अपन एक ब्लॉग जरूर बनाना चाही*। ब्लॉग मा पोस्ट रचना इंटरनेट मा सदा दिन बर सुरक्षित हो जाथे अउ गूगल मा सर्च करके दुनिया के कोनो देश मा पढ़े जा सकथे।

*अरुण कुमार निगम*
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          सच मा सोशल मीडिया के सदुपयोग करइया बर सोशल मीडिया वरदान साबित होत हे। मँय अपन आप ला येखर ले जोड़ के देखथँव ता लागथे सोशल मीडिया नइ होतिस ता मँय कहाँ होतेंव। मँय निच्चट गवँइहा अउ सायद आप सब झन ले बहुत कम पढ़े लिखे मनखे ला साहित्य के ज्ञान कहाँ ले मिलतिस। सोशल मीडिया नइ होतिस ता ना मोला गुरु मिलतिस ना ज्ञान। ना मोला हिन्दी आय ना अंग्रेजी अउ छत्तीसगढ़ी घलो जो हमर क्षेत्र में बोले जाथे उहीच आत रहिस हे। अब गुरुदेव यानी छंद के छ परिवार ले सोशल मीडिया के माध्यम ले जुड़ के धीरे धीरे बहुत कुछ सीखत हँव अउ कुछ लिख पात हँव।
येखर श्रेय सोशल मीडिया ला ही जाथे की मोला छत्तीसगढ़ी साहित्य उपलब्ध कराइस हे तभे मँय दूसर के ला पढ़ पढ़ के अपन मन मा उमड़त भाव ब्यक्त करे बर सीखत हँव।

अनिल सलाम
गाँव उरैया नयापारा
तहसील नरहरपुर
जिला काँकरे (छ. ग.)
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छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया

ये समय हा सोशल मीडिया के समय आय कहना अतिशयोक्ति नइ होही।संचार के जउन भी साधन हे वोमा सबले लोकप्रिय सोशल मीडिया हा हवे। येखर पहुँच जनसामान्य तक हावय काबर की आज सबके हाथ मा मोबाइल हावय ।साहित्य बर भी सोशल मीडिया हा संजीवनी साबित होवत हे अउ साहित्य के संगे संग साहित्यकार के लोकप्रिय ता बाढ़त हे ।अतका लोकप्रिय माध्यम के परभाव हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य मा पड़ना भी स्वभाविक हे अउ येमा कोनो दू मत नइहे कि सोशल मीडिया ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के लोकप्रिय ता बाढ़िस हे कतको झिन नवा रचना कार मन ये माध्यम ले अपन पहचान बनात हे।हमर पुरखा साहित्यकार मन के रचना ला संजोये के काम घलो सोशल मीडिया करत हे ।ये सब के बावजूद एक बात धियान मा रखे के लाइक हे कि जब कोनो रचनाकार हा अपन रचना ला समाचार पत्र या कोनो पत्रिका मा भेजथे ता रचना संपादक ला पसंद नइ आवय ता रचना छप नइ पावय उही रचना हा सोशल मीडिया मा डाले ले अपन जघा बना लेथे आह वाह के संगे संग लाइक कमेंट आय लगथे।रचनाकार के छपास के पीरा शांत हो जाथे आत्ममुग्धता मा रचना कार अपन आप ला बहुत बड़े साहित्यकार माने लगथे।लोकप्रिय ता के आघू गुणवत्ता छोट हो जाथे।जबकि संपादक के दुवारा कोनो रचना ला अस्वीकृत करे के बाद भले मन मा दुख होथे पर अउ अच्छा लिखे के प्रेरणा घलो मिलथे।तभो ले सोशल मीडिया के रूप मा छत्तीसगढ़ी साहित्य ला एक बेहतर प्लेटफार्म मिले हे जेखर से छत्तीसगढ़ी साहित्य के लोकप्रियता चारो मुड़ा मा बगरत हे ।साहित्यकार मन ला ये बात धियान म रखना परही कि वोमन सिरफ आह वाह से खुश मत होंय
काबर कि लोकप्रियता ही हा उत्कृष्टता के पैमाना नोहय।

चित्रा श्रीवास
बिलासपुर छत्तीसगढ़
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कुलदीप सिन्हा: आज के युग मा हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य ला पोठ करे बर सोशल मीडिया हा जेन काम करे हवे वो कखरो ले छिपे नइ हे। येखर पहिली हमर बड़े बड़े गुनिक जन के विचार ला पुस्तक अउ समाचार पत्र के माध्यम ले पढ़त अउ सुनत रेहेन। जब ले हमर बीच मा सोशल मीडिया हा आइस हे तब ले हमन ला फेसबुक वाट्सएप इंस्टाग्राम अउ न जाने कतना समूह चलत हे जेन हा कोई ना कोई रूप में हमर छत्तीसगढ़ी साहित्य ला प्रभावित करत हे। हमर मन के पढ़ाई के समय मा सोशल मीडिया हा जनम घलो नइ धरे रिहिस तब बड़े बड़े कवि अउ लेखक मन के नाम ला पढ़न ता अइसे लागे येमन हा हमर बीच के मनखे नोहय। येमन हा कोनो अलग मनखे होवत होही जेन मन हा लिखथे पढ़थे। हमन तो कभू सपना में घलो नइ सोंचे रेहे होबो कि अइसन दु आखर ला लिख लेबो। हमन ला आज जेन जगा मिले हावे वोमा आदरणीय गुरुदेव मन के संगे संग सोशल मीडिया के घलो हाथ हावे, येमा कोनो दु मत के बात नइ हे।
      आज के जमाना मा हर पढ़े लिखे मनखे मन अपन बात ला समाज के बीच मा कोनो ना कोनो माध्यम ले रख सकत हे, अउ रखत घलो हे। चाहे वोला कोनो पढ़े या झन पढ़े। फेर वो लिखइया के विचार हम सबके बीच मा आ जाथे। मेहा बात करत रेहेवँ हमर महतारी भाखा के विकास मा सोशल मीडिया के का योगदान हे, वोखर बर मेहा अतनी कही सकत हौं कि,  आज जेन जगा हमर साहित्य खड़े हे वोमा वोखर बहुत बड़े भूमिका हे।

कुलदीप सिन्हा "दीप"
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी

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धनराज साहू: *छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ सोशल मीडिया*

बड़ सुग्घर अकन अउ सँहराये लइक एक से बढ़के एक विचार समूह म आइस। हम नवा पीढ़ी के सिखइया मन बर ,सोशल मीडिया बरदान बरोबर आय। सोशल मीडिया उपर जतेक गोठ करे जा सकत हे , हमर साहित्यकार आदरणीय मन करिन हे। आज के नावा पीढ़ी आघु के साहित्यकार मन सँग परिचित नइ रिहिन। ओकर मूल कारण पुस्तक अउ पत्र-पत्रिका के अभाव। जुन्ना सियान मन मे बहुत कम झन के पुस्तक अउ पत्र-पत्रिका म रचना छपे हे। वर्तमान म हम जतेक रचनाकार से परिचित हन ओकर ले जादा आज भी दबे- छुपे हावय। उँकर खोजबीन करके रचना मन ल सकेले जाय तो , मोला विश्वास हे , एक से बढ़के एक निमगा लिखैय्या साहित्य कार मन सँग परिचित होबो साथ ही लोक कला- लोक साहित्य अउ अन्य विधा मन के रचना मिलही। ये क्षेत्र म आदरणीय सुधीर शर्मा जी के लोकाक्षर पत्रिका के जतेक मान किया जाय कम हावय। फेर अभी भी जतेक उदिम होय हे , अइसने उदिम अउ अन्य मन ल भी करे के जरूरत हे।
  ओ तो भला हो सोशल मीडिया के जौन आज गुमनाम कवि-साहित्यकार मन के रचना कृतित्व/व्यक्तित्व के जानकारी कौनो-कौनो के पोस्ट के माध्यम से पता चल जाथे।
   कतको कवि साहित्यकार मन आज ले कइ बछर आघु पत्र पत्रिका अउ आकाशवाणी / कवि सम्मेलन म छपे अउ प्रस्तुति देंहे । फेर दुख तब होथे जब उँकर मन के नाँव कोनो साहित्य सम्मेलन अउ अन्य साहित्यिक मँच मन म नइ लिये जाए। जबकि जुन्ना साहित्यकार मन बहुत झन के कृतित्व से परिचित हें। जब तक उन मन ल मान दिये नइ जाही तो फिर नवा पीढ़ी उन ल कइसे जान पाही।आज भी कुछ साहित्यकारअउ उँकर रचना  ऊपर ही चर्चा होथे , छत्तीसगढ़ म साहित्यकार अउ साहित्य के कौनो कमी नइ हे, अउ जब तक उन रचनाकार मन ऊपर उँकर रचना ऊपर शुद्ध मन से , निस्वार्थ चर्चा अउ समीक्षा नइ करे जाही तब तक हमर छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी के लिए सोंच अधूरा रही।
  सोशल मीडिया के माध्यम से जौन गुमनाम साहित्यकार मन के बारे म जानकारी मिलथे, उँकर सूची बनाके उँकर जन्म जयंती या पुण्य तिथि म व्यक्तित्व/कृतित्व पर ऊपर चर्चा हो , ताकि सोशल मीडिया म जुड़े जम्मो जन मानस तक उँकर जानकारी पहुँचय । इही उदिम हर दिवंगत रचनाकार मन के लिए सही श्रद्धांजलि होही।

धनराज साहू