Friday, 5 July 2024

संस्मरण डोंगरगढ़ यात्रा

 संस्मरण 

डोंगरगढ़ यात्रा


हमर संग म एक डोकरी चघिस ।ओ समय म सीढ़ी नई बने रहिस हे 1974 के बात आय ।मै अपन ममा के बेटी शशि दीदी संग गे रहेंव।ओखर एक बछर के बेटा के मुंडन कराये बर गे रहेन ।


हमन करीब तीन बजे जघे बर शुरु करेन ।एक चट्टान के बाजू म बड़े जन खोह रहिस हे ।जीजीजी  भागबली वर्मा डिप्टी रेंजर रहिस हे ।वो ह कहिस के ये मेर शेर हावय ओखर गंध आवत हावय ।ओखर ठीक पहिली एक झन डोकरी मिलिस ।एक ठन लौठी धरे रहिस हे ।हमर सियान मन लुगरा पहिरंय वइसने लुगरा पहिरे रहिस हे ।मइलखोड़हा लुगरा ।बाल बिखरे रहिस हे ।


हमन ओ खोह.ल देखे बर चल देन ।बाद म देखेन के डोकरी आगू आगू जात हे ।हमन भी दीदी के कारण बइठत बइठत चढ़त रहेन ।

जब उपर के सीढ़ी ल चढ़े के शुरू करेन तब ओ ह पाछू म रहिस हे ।हमन चढ़ गेन ।उहें नाऊ रहिस हे ।लइका के मुंडन होगे ।ओ डोकरी दिखत नई रहिस हे ।अब सांझ होय ले लगगे ।पुजारी ह कहिस अब जल्दी उतरव नही त रात हो जही ।जानवर आ जथे ।हमन कहेन एक डोकरी हमर आगू आगू.आवत रहिस हे..ओ ह पहुँचे नईये .पुजारी कहिस अकेल्ला डोकरी नहीं भाई नई आ सकय ।एक पानी भरत रहिस हे तेन ह हऊंला ले के उतरीस ।हमन उतरेन ।पुजारी उतरिस ।डोकरी कोनो मेर नई मिलिस ।नीचे के दुकान मन म पुछेंन त सब कहिन के अइसना कोनो डोकरी इंहा नई दिखय ।अब तो हमन थरथरा गेन।कोन रहिस हे ।भूत परेत तो नोहय.।हमन शेर के बात बतायेन ।डोकरी अऊ शेर के बात सुन के नीचे के पुजारी कहिस भागशाली आव भाई तुमन देवी के आरो पा लेव अउ देख घलो लेव ।वो देवी आय अपन सवारी संग साक्षात तुमन ल अपन धाम तक लेगे ।

अइसे हमन वास्तव म अनुभव करे रहेन ।मोर काका ( पिताजी ) डोंगर गढ़ के हाई स्कूल म प्राचार्य रहिस हे ।मोर बड़े बहिनी डा. सत्यभामा आड़िल के बाद कोनो संतान नई रहिस हे ।तब हमर बड़े दादी ह.दूसर बिहाव करे बर कहि दिस ।काका चार साल तक गांव वापस नई अइस । हमर माँ के सहेली मिश्रा चाची रहिस है ।ओ ह मानता रखिस अउ मै पैदा हो गेंव ।बड़े दीदी ले बारह साल छोटे ।तब तक काका ह जगदलपुर म प्राचार्य होगे रहिस हे ।चाची के बेटी जेन मोर ले एक साल बड़े हे ओखरो नाम सुधा हे।ओ चाची अपन बेटी के नाल ल हमर माँ ल पिलाये रहिस हे ।एक माँ के मातृत्व दूसर माँ के गोद सुना नहीं देख सकिस ।एक माँ ,एक सहेली के बहुत बड़े उदाहरण आय मिश्रा चाची ।हमर घर म खुशी आगे ।येला मिश्रा चाची ह डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी दाई म एक हऊंला पानी अउ एक माला  साल भर चढ़ा के पूरा करिस ।ये मोर बिहाव होय के बाद भी चढ़ावत रहिस हे .बारहो महिना चढ़ावय अउ साल म एक बेर जाके पइसा देवय । एक माँ जेन अपन लइका के नार जेन ल जमीन म गड़ाय जाथे तेन ल मोर माँ ल पियइस ।माँ के दरबार म मानता रखिस,अउ ओला सालो साल पूरा करिस ।एक मोर माँ जेन जनम देय के बाद बम्लेश्वरी ल नई भुलइस ,मोर मुंडन भी उहें होय हावय ।हमन जाते राहन ।मोर लइका बर भी मोर माँ ऐखरे अँगना म लेगिस ।मै तो तीन माँ के परेम पायेंव ।एक बेर बम्लेश्वरी संग भेट होगे ,अपन होय के आभास देवइस फेर हमन नई पहचान पायेन ।अतका सुरता हे के मैं जब थकव त ओखरे बाजू म बइठ जांव ।ओ ह मोर संग संग चलय ।दीदी काहय टोनही होही दूरिहा रह ।येला मै मुलावंव नही ।आज भी ओखर रूप दिखथे ।

सुधा वर्मा ,18-4-2016

पइसा के रूख*

 *(छत्तीसगढ़ी साहित्यिक पुरोधा छत्तीसगढ़ी के दूसरा उपन्यासकार आदरणीय श्री शिवशंकर शुक्ल जी, जउन हर 'दियना के अंजोर ' अउ 'मोंगरा' छत्तीसगढ़ी उपन्यास लिखिन हें। उंकर लिखे बाल कहानी संग्रह 'दमांद बाबू दुलरू' म संग्रहित एक ठन प्रमुख कहानी 'पइसा के रुख' हर अविकल प्रस्तुत हे । मोर पूरा प्रयास रहिस हे कि कनहुँ करा उँकर भाषा -शैली म छेड़ छाड़ झन होवे कहके, अउ एमे मंय सफल हंव, अइसन लागत हे।)*



              *पइसा के रूख*

              ---------------------

- *श्री शिवशंकर शुक्ल*


--

                  

           एक गांव में दूझिन भाई रहत रिहिन ।बड़े के नाम दुकालू अउ छोटे के नाम सुकालू रहिस। दुनों झिन के खटला मन मं आपुसे मं रोजेचझगरा होवै । रोज के किलकिल ले  दुनों भाई मन  अलगिया गिन ।


         सुकालू बहुत एक कोढ़िया रहिस।  कभु कोनों काम धंधा नई करत  रहिस । दिन रात सूतय अउ इती उती किंदरय । ओखर इहिच बूता रहय । अपन ददा के कमई ,जोन  ओला बटवारा मं मिले  रिहिस  उही ल उड़ावय ।


              थोर दिन मं ओह अपन ददा के कमई ल  फूंक  डारिस । फेर ओह भीख मांगेल धरिस।  गांव के मन ओला बाम्हन  घर जनम  धरे ले कुछु कांही दे देवंय । अइसने इनकर दिन बीते ।


          एक दिन सुकालू के टूरा हर अपन बड़ा के टूरा मेर एक ठिन कठवा के हाथी देखिस । ओहर दऊरत दऊरत अपन दाई आई मेंरन आइस अऊ रोवन लागिस । सुकालू के खटला  हा पूछिस , का होगे , काबर रोथस ?


           टुरा ह किहिस, दाई बड़ा ह  मेला ले भइया बर कठवा के हाथी लानिस हे, वइसने मंहू ला बिसा देना । सुकालू के खटला जोंन  ला तीन दिन ले अनाज के एक सीथा खाय ल नई मिले रहिस, खिसिया गे । कहिस कस रे करम छड़हा, तोर ददा के गुन मां पसिया नइ मिलय, तोला हाथी चाही । सुकालू के टुरा अऊ रोवन  लागिस । टुरा ल रोवत देख के वोह खिसियागे अऊ दुचार चटकन  टुरा ल झाड़ दिस।


              सुकालू  ह कुरिया मं एक मांचा ऊपर बइठे रिहिस। अपन जोड़ी के गोठ ह ओला बान उसन लागिस। ओह अपन मन मं गांठ बांधिस कि मेंह कुछ काही करबे करहूं । 


            दूसर दिन सुकालू कमई करे बर आन गांव जाय बर अपन घर ले निकरिस । गांव के मुहाटी मं एक लोहार के घर रहय । सुकालू ल गांव के बाहिर जावत देख के ओह किहिस, कस गा बाम्हन देवता, कहां जाथस?


       सुकालू ह किहिस, लुहार कका में ह दूसर गांव जावत हववं, कुछु काहीं बुता करहूं। अब कले चुप्पे नइ बइठवं ।

 

        लुहार हर किहिस-- गांव ले बाहिर काबर जा थस , मोर हिंया बूता कर ।  सुकालू किहिस -- लुहार कका तैं जउन बूता तियारबे में उहीकरहूँ ।


        ओ दिन बेरा के  बूड़त ले सुकालू ह लुहार हियां घन पीटिस-  संझा जाय के बेरा लूहार ह सुकालू ल दिन भर के मजूरी तीन पइसा दीस। सुकालू ह तीन पइसा  ल लेके चलिस अपन कुरिया कोती। सुकालू ल आज एइसे लगे जइसे ओला तीन पइसा नई, कहूं के राज मिलगे ।


           कुरिया के मुंहाटी ले सुकालू ह अपन  खटला ल हांक पारिस। सुकालू के खटला ह दिन भर ले अपन जोड़ी ल नई देखे रहय । सुकालू के हांक पारत वहू  दुवारी के अंगना मं आगे । सुकालू हर किहिस, ले ये दु  पइसा, मेंह आज  बूता करके लाने हवंव । अब में ह बइठ के नइ रहवं। जतेक बेर सुकालू हर पइसा ल देत रहिस,सुकालू के  खटला ह देखिस कि  सुकालू के हाथ ह लहू लूहान  होगे  हावय। कहिस,ये तोर हाथ  मं का होगे हे? सुकालू ह  किंहिस,आज दिन भर मेंह लुहार कका हिंया घन पीटे हंवव ओखरे ये।


 सुकालू के खटला पानी तिपोइस अऊ सुकालू ल नहाय के पथरा ऊपर बइठा के  ओखर हाथ ल सेके ल तीपे पानी भित्तरी  लाने बर गिस , ओतके बेर  सुकालू ह उसका बेर सुकालू ह एक पइसा जेन ला ओहर चोंगी -माखुर बर  लुकाय ले रहिस, तेन ल नहाय के पथरा के नीचू मं लुका दिस।


        हाथ ल सिंका के सुकालू ह बियारी करिस। खातेखात वोला  नींद मातिस वो ह सूतगे ।


      बिहानियां सुकालू के खटला ह उठिस । त काय देखथे कि नहाय के पथरा के तीर म पइसा के रूख  लगे हवय। पहिली तो वोला लगिस के मोला भोरहा होवत हावय । वो ह  पथरा मेरन  जा के देखथे त  सहीं मं उहां पइसा के रुख रहय। लकर धकर ओह पइसा ल चरिहा मं भर भर के सुते के कोठी में लेग लेग के कुरोय लगिस।  पइसा के झन- झन  सुन के  सुकालू के नींद ह टूटगे। वोह देखिस कि मोर जोड़ी ह चरिहा म पइसा भर भर के लान लान  के इहां कुरोयवत हे । वो ह पूछिस, कउन  मेर  ले तोला एतका धन दोगानी मिलगे? 


         वो ह कहिस-- उठ त देख पथरा मेरन कतेक बड़े पइसा के रुख लगे हे । सुकालू घलो देखिस त ओला अपन रात के पइसा के सुरता आइस, जेला वोह पथरा खाल्हे लुकादे रिहिस । आज वोला जनइस के अपन पसीना बोहाय पइसा मं कतेक बल होथे। वो ह  गांठ बांधिस के बिन बूता के मेंह बइठ के एक सीथा मुंख मं नई डारंव ।


             सुकालू घलो पइसा वाला बनगे। पइसा के रूख के सोर राजा लगिस। वोह खूभकन बनिहार लानिस अउ  सुकालू  के कुरिया म नींग गे। सुकालू, राजा ह हांक पारिस।  सुकालू ह अपन दुवारी म राजा ल देख के जान गे के येहर काबर आय हाबय । फेर राजा के आगु वोह काय । बनिहार मन कुदाली रापा ले के भिड़गे ,रुख उदारे बर फेर करतिस जेतक वो मन भुंया ल खनय ओतके रुख ह भुंइया मं हमात जाय।थोर दिन मं रुख हर धरती माता के कोख मं हमागे ।  राजा हर मन मार के रेंग दिस।


    सुकालू ल पइसा के रूख हर  चेत करा दिस के मिहनत के कमई हा कतेक बाढ़थे ।


*श्री शिवशंकर शुक्ल*

---

 खाँटी  छत्तीसगढ़ी शब्द -

------------------------------

खटला - औरत, सुवारी

हिंया -इहाँ , यहाँ

कुरोय लगीस -भरे लागिस,जमा करे लागिस

खाल्हे -तरी ,नीचे

------------------------------


प्रस्तुतकर्ता -

*रामनाथ साहू*

-------------::----------

छत्तीसगढ़ी बाल कहानी वोखर किराया माफ कर दे पापा

 छत्तीसगढ़ी बाल कहानी


वोखर किराया माफ कर दे पापा 

=====================

                    कमलेश प्रसाद शर्माबाबू


         प्रियांशी अउ मुस्कान अब अच्छा अउ पक्का सहेली बन गे रिहिन।पिछले तीन साल मा तो जइसे ऊखर संबंध सगी बहिनी ले घलो वो पार होगे रिहिस। दुनोझन एक संघरा पूर्व माध्यमिक शाला मा पढ़त रिहिन।एके संघरा आना जाना पढ़ना खेलना घूँमना दुनोझन के चलय।प्रियांशी जब छठवी कक्षा मा रिहिस तभे किरायेदार बनके मुस्कान के अब्बू गुलजार ऊखर गाँव आय रिहिस।कोठार मा बने नवा पक्की मकान ल प्रियांशी के पापा वो मनला किराया मा दे रिहिस।गुलजार गाँव-गाँव मा फेरी लगाके कपड़ा बेंचे के काम करय अउ वोखर पत्नी सुल्ताना घर मा पीकू फाल लगाके मशीन चलावय,अच्छा खासा कमाई हो जाय ।बिल्कुल नियत समय मा नौकरी वाले मन बरोबर पाँच तारीक के वो अपन एडवांस किराया दू हजार रूपया मकान मालिक मुरली ल बिजली बिल सहित जमा कर दय।

     कब काखर ऊपर कइसन मुसीबत आ जही केहे नइ जा सकय। फेर ये त्रासदी तो हमर देश के संग-संग कतको देश मन झेले रिहिन।पूरा कारोबार ठप्प होगे रिहिस,दू महिना के सख्त लाकडाऊन ह तो जइसे पूरा कनिहा ल टोर के राख दे रिहिस।आर्थिक स्थिति पूरा चरमरागे रिहिस।धंधा पानी सब चौपट होगे रिहिस। गुलजार ह कतको घरेलू समान टी वी, कूलर, आलमारी ल दुकान मनसे  किश्त मा खरीदे रिहिस, आखिर कोन जानत रिहिस कि आफत बनके ये कोरोना महामारी आ जाही।ये बइरी के कारण आज हजारो लोगन के हाँसत खेलत जिंदगी बरबाद होगे।घर से न निकले के सरकारी आदेश घलो बिकट सख्त रिहिस।

      कोरोना के डरावनी अउ भयानक तस्वीर  के बीच कइसनो करके दू महिना के समय रोवत-धोवत कट गे , फेर ब्यापार करे के आजादी कोनो ल नइ मिलिस।गुलजार के चिंता धीरे-धीरे बाढ़े लागिस,अब तो किराया दे मा घलो भारी परेशानी आय लागिस।दूसर तरफ मकान मालिक मुरलीधर बेहद हि कठोर इंसान रिहिस लेन-देन के मामला मा अउ भारी सख्त राहय।किराया बर तो  रोज दबाव डालय अउ रोज दू चार बात सुनाय बिना खाना नइ खाय ।संझा बिहनिया उदे पानी पियाय लागिस। गुलजार अउ सुल्ताना ल रातदिन नींद नइ आवय आखिर वोमन करय त का करँय,,, समझ नइ आय।

    गुलजार हर समय मुसीबत मा अपन ससुराल वाला मनसे कुछ समय बर उधारी पइसा माँग लेवय फेर ये दरी तो उहू आसरा टूट गे।वोखर ससुर के ईलाज मा छय लाख रुपिया लगाय के बाद घलो वोला वोखर ससुराल वाले  मन नइ बचाँ सकिन।वोहा कोरोना बीमारी ले संक्रमित होगे रिहिसे।बाँचे खोंचे उम्मीद ससुर के जनाजा के संग ही दफन होगे। फेर ये सब बात ल मकान मालिक ल कोन समझाँवय।मुरलीधर तो आज फटकार लगाय मा कोनो कसर नइ छोड़िसअउ वोखर सात पीढ़ी ऊपर पानी रिको के छट्ठी के दूध सुरता कराके राख दीस।मुरलीधर अभी-अभी नवा घर बनाय रिहिस हे अउ अपन मन जुन्ना घर में राहँय।नवा पक्की मकान ल किराया दे रिहिस हे घर के दू लाख करजा घलो मूड़ मा बोझा कस माढ़े रिहिस हे, ऊपर से किरायेदार चार महिना ले किराया बर तरसावत रिहिसे जइसने मुँह मा आय तइसने उराट-पुराट सुना दय,अउ अब तो पइसा पटा के घर खाली करे के फरमान घलो जारी कर दीस।

           प्रियांशी पिछला दू दिन  ले खाना पीना सब छोड़ दे रिहिस।अस्पताल मा डाँक्टर मन वोखर पूरा टेस्ट कराइन फेर कोनो बीमारी नइ निकलिस।डाँक्टर मन मुरलीधर ल सख्त चेतावनी दीस कि अगर प्रियांशी के इच्छा अउ भावना के ख्याल नइ राखे जाही त वोला बचाना मुश्किल हे।वोला कोनो बात से गहरा धक्का पहुँचे हे। साँझ के जइसे हि प्रियांशी ल घर लाय गिस,देखे बर मुस्कान वोखर अब्बू अउ अम्मी सबझन संघरा आइन।वोमन ल देख के प्रियांशी सिसक-सिसक के रोय लागिस, मुस्कान घलो फफक-फफक के रोय लागिस सब के आँखी नम होगे,अपने-अपन आँसू चूहे लागिस।

       मुस्कान ल जइसे हि जानकारी होइस कि दू दिन ले प्रियांशी कुछु खाय-पीये नइहे, झट ले अपन मम्मी संग घर जाके एक बड़े कटोरा भर दाल खिचड़ी बनाके ले आइस अउ ले बहिनी खा,,,ले बहिनी खा कहिके खवाय लगिस।प्रियांशी ह रोवत-रोवत सबो खिचड़ी ल पेट भर खा डरिस। पापा मुरलीधर ह देख के अकबकागे, काबर कि वोहा तो पिछला दू दिन ले प्रियांशी ल खवाय के बिक्कट उपाय कर डारे रिहिस फेर प्रियांशी एक कँवरा घलो नइ खाय रिहिस।माँ गीतारानी के आँखी घलो डबडबा गे आँसू रोके नइ रूकय, संग मा मुरलीधर के आँसू घलो मउहा कस टपाटप चूहे लागिस।वोतके बेर प्रियांशी के दादा दादी मन घलो आगे। दादा दादी मन चारधाम यात्रा करे बर गे रिहिन फेर का करबे सख्त लाकडाऊन के सेती उही डाहर तीन महिना ले छेंकाय रिहिन।उहूमन नोनी के अइसन हालत ल देख के घबरागें।प्रियांशी वोमन ल पोटार-पोटार के रोय लागिस।मुरलीधर ह मुस्कान ल कीथे बेटी अब तैं रोज प्रियांशी ल अइसने आके खवाय कर कहत-कहत,,,गभरागे।

          मुरली ह जइसे हि प्रियांशी के मूड़ मा हाथ फेरे ल धरिस प्रियांशी ह वोखर हाथ ल अपन हाथ मा धरके सिसक-सिसक के रोवत कहिथे,,,वोखर किराया माफ कर दे पापा,,,वोखर किराया माफ कर दे पापा अउ जोर-जोर से दहाड़ मार के रोय लागिस।

       मुरलीधर के कठोर दिल आज चानी-चानी होगे आखिर उहू भी मनखे आय अउ हर मनखे के दिल मा कहूँ न कहूँ मानवता छिपे रहिथे वोखर पापा वादा करिस कि हाँ बेटी,,, मै तोर भावना ल समझ गे हँव कि तैं का कहना चाहत हस।ये कोरोना के त्रासदी मा जेन दुखी हे वोला अउ दुख नइ पहुँचावन अउ मिल-जुलके ऊखर सहायता करबोन। मैं तोला कसम देवत हँव बेटी कि आज से वोखर पूरा किराया माफ कर दे हँव अउ जब तक लाकडाऊन रिही तब तक अउ आगे चार महिना तक वोखर किराया माफ हे।अतका सुन के प्रियांशी के चेहरा म मुस्कान लहुटगे।


कमलेश प्रसाद शर्माबाबू

कटंगी-गंडई

जिला केसीजी छत्तीसगढ़

9977533375

लघुकथा – नाव दोष

 लघुकथा – 



नाव दोष 


एक गाँव म पति पत्नि के बीच म पटबे नइ करय । रात दिन खिटिर पिटिर होतेच रहय । इँकर सेती नोहर सोहर के एके झन बेटा के पालन पोषन ठीक ढंग से नइ हो पावत रहय । बाई हा बहुतेच उच्छृन्खल किसम के रिहिस । ओहा अपन घरवाला के एको बात नइ सुनय । अपन घरवाला ला अपन हिसाब से चलावय । बपरा घरवाला हा बदनामी के डर म कलेचुप रहय । 

घेरी बेरी किटिर किटिर के सेती परिवार म सुख शांति नइ रिहिस । बेटा ला जब पाये तब .. मारे बर बाई के हाथ उचेच रहय । घर के मुखिया हा एक झिन ज्योतिष महराज तिर देखना सुनना करवाये बर गिस । कुंडली म सबो ठीक रहय । न कोनो ग्रह दोष न अऊ कुछु दोष .. । हाथ बिचारत महराज हा उँकर नाव पूछिस । मुखिया हा अपन नाव ला संविधान .. बाई के नाव ला सरकार अऊ बेटा के नाव ला लोकतंत्र बतइस । 

ज्योतिष महराज हा समझगे के .. नाव के सेती परिवार के बीच तनाव अऊ अनबन होवत हे । फेर बता नइ सकिस अऊ शांति जाप म लगगे । 


 हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन . छुरा

योजना

 योजना 

                    प्रदेश के मुखिया संग , योजना आयोग के बइठक चलत रहय । योजना आयोग के उपाध्यक्ष हा भड़कत कहत रहय – खैरात म बांटे बर बंद करव । तुँहर अइसन बूता के सेती हमर जम्मो खजाना खाली होवत हे । अब अइसन बूता बर , हमर करा कन्हो फंड निये । तूमन शुरू करे हव , तुहीं मन अइसन योजना ला , अपन पइसा म चलावव । प्रदेश के मुखिया किथे – समे के मांग के हिसाब से योजना सुरू करे रेहेन बाबू .... तैं का जानबे .. ? सरकार बनाये खातिर अइसन करेच ला परथे गा ...... । कन्हो ला , एक रूपिया दू रूपिया किलो म , चऊँर दे के , ओकर पेट भरना गलत हे का ..... ? उपाध्यक्ष किथे – गलत कहीं निये , फेर सस्ता राशन के चक्कर म गरीब के संख्या , उदुप ले बाढ़गे , तबले , हमूमन गरीबी के लइन म आगेन । मुखिया किथे – असल म योजना ला हमन , सिर्फ बोट बर लाने रेहेन फेर , को जनी , कब बोटर मन घला जुड़गे एमा , तेकर सेती , खरचा बाढ़गे । योजना आयोग किथे – चाहे कहीं होय , हमर देश के मुखिया हा .... अब अइसन योजना बर , पइसा दे बर , मना करत हे , तूमन , अपन अपन , बेवस्था कर लेवव । 

                    दूसर दिन प्रदेश म , केबिनेट के बइसका म , समस्या के समाधान बर मंथन चलत रिहीस । जम्मो मंत्री मन अपन अपन सुझाव दीन । सार्वजनिक निर्माण बिभाग के मंत्री बताथे – सर , जम्मो सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला हमर बिभाग ला दे दव । मुखिया किथे – एकर ले काये होही ? मंत्री किथे – सिर्फ लीपापोती ....। कागज म चिक्कन सड़क बना सकत हन , त ये बहुत छोटे बूता आय हमर बर । सिर्फ बजट बनही , खरचा के आवश्यकता निये ... । मुखिया किथे – अरबों रूपिया के बजट ला तुँहर अधिकारी मन सड़क कस लील दिहीं तैं देखते रहि जबे ...... । तोर से नइ हो सके । मंत्री जवाबलेस होगे । 

                    सिचाई मंत्री किथे – सर , जम्मो सिस्टम ला मोला दे दव । चार दिन म खरचा म नियंत्रण हो जही । मुखिया किथे – पानी के नियंत्रण बर जे बांध बनाये हस तेमा , कतका पानी नियंत्रित होइस हे ....... ? दूधो गे दुहना घला गे , बांध अऊ पानी संघरा बोहागे ....... । तहन फसल बोहागे , मनखे बोहागे , जानवर बोहागे , मुवावजा बाँटत हमर कतको बोहागे ...... । कलेचुप बइठगे ।

                    संस्कृति मंत्री किथे – मोर करा वइसे भी कन्हो बूता निये । में सिर्फ , राजिम म कुम्भ कराथँव , कभू कभू साहित्य के सम्मेलन अऊ बछर म एक बेर , राज्य महोत्सव । में सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला बहुतेच नियंत्रण कर सकत हंव । मुखिया किथे – न तोर कुम्भ म ठिकाना , न कन्हो महोत्सव म .... , इनाम बाँटथस तिही म अंगरी उच जथे .... तैं का कर सकबे .....  नानुक बजट तोर से सम्हलत निये , तैं अतेक बजट के बूता ला काला संभाल सकबे .... तोर करा का योजना हे तेला बता .....। मंत्री किथे – काम हाथ म मिलही तब योजना बनाबो .......। 

                     बित्त मंत्री किथे – मोला लागथे अब ये काम ला सीधा , हमर नियंत्रण म दे देना चाही । हमन जइसे चहापत्ती ला ऊँच म टांग के .... गोंदली ला टिलिंग म चइघाके , जनता ला पदोथन तइसने , सस्ता राशन ल अइसे ऊँच म टांगबो के .... कन्हो अमर झिन सकय । जे अमर पारही , ते टेक्स म , मर जही ... । मुखिया किथे – येमा हल्ला होये के चांस हे । चुनई लकठियागे हे , तोर योजना म वोटर ते वोटर , बोट तको दुरिहा जही ...... । 

                    स्वास्थ्य बिभाग के मंत्री कलेचुप बइठे रहय । मुखिया किथे – तहूँ कुछ तो बोल .... । वो किथे – मैं का कहँव सर । जे योजना ला सुरू करथन , बदनामेच होथन । अऊ सरकार के किरकिरी होथे । आँखी के आपरेशन के अभियान चलाथन , त कतको झिन के , आँखी फूट जथे । परिवार नियोजन म , पेट म कैची छूट जथे । साँस के तकलीफ दुरिहाये बर लाने , आक्सीजन के सिलेंडर हा , बड़का बड़का कारखाना म लग जथे । फेर एक बात हे मुखिया जी ... मोला सार्वजनिक बितरण प्रणाली ला दुहू ते , कुछ महीना म तुँहर समस्या के , समाधान हो सकत हे । मुखिया किथे – कइसे ? स्वास्थ्य मंत्री किथे – फकत एक बेर घोषणा भर कर दव के , सार्वजनिक बितरण प्रणाली के सस्ता राशन , अस्पताल ले मिलही कहिके ...... । मुखिया पूछिस – येकर ले का होही ? स्वास्थ्य मंत्री किथे – जनता जानत हे , सरकारी अस्पताल के हाल ला । इहाँ आये के बाद बहुतेच कम सौभाग्यशाली मन , सकुशल वापिस जाथे , तेकर सेती , कन्हो सरकारी अस्पताल के चौंखट म पाँव दे बर सोंचथे ..... । सस्ता राशन के योजना ल , ‌हमन ला बंद करे बर नइ लागे , हमर अस्पताल म राशन बिसाये बर .... कन्हो आबेच नइ करही , त खुदे , कुछ दिन म योजना अपंने अपन चुमुकले बंद हो जही । पूरा पइसा बाँच जही ....... । चुनाव समे , जनता ला मुहुँ देखाये म घला कन्हो परेशानी नइ होय । हमन , कहि सकत हन के , हमन तो दे बर तैयार रेहेन .... फेर कन्हो झोंके बर .... तैयार निये । केबिनेट म प्रस्ताव ला मंजूरी मिलगे । चार महीना म , प्रदेश म सस्ता राशन झोंकइया के संख्या शून्य होगे । प्रदेश के गरीबी पूरी तरह ले दूर होगे । गरीब मुक्त राज्य ला यू. एन. ओ. म पुरुस्कार झोंके बर बलाये गेहे ...... ।     

 हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा .

सबके दिन बहुरय ....... जइसे घुरुवा के दिन बहुरगे .........

 सबके दिन बहुरय ....... जइसे घुरुवा के दिन बहुरगे ......... 

रोज बिहिनिया ले दुकलहिन हा दिसा मैदान खातिर जावत बेरा .. अपन घर के गोबर कचरा ला सकेल के... अपन घुरुवा म फेंक देवय । एक दिन के बात आय .. दुकलहिन हा .. बाहिर बट्टा दिसा मैदान जावत समे .. गोबर कचरा ला फेंकें धरिस तइसने म .. घुरवा के बींचों बीच .. एक ठिन मोटरी देख पारिस .. नजर थोकिन कमजोर रिहिस .. समझ नइ अइस .. उही तिर बिलमके नजर भर निहारत .. काये होही .. काला फेंक पारेंव बैरी कहत मने मन बुड़बुड़ावत .. सोंचे लागिस .. तभे मोटरी म हलचल दिखिस .. मोटरी ला एक कनिक हालत डुलत देख पारिस । भूत परेत मरी मसान होही समझके , डेर्रा गिस अऊ कचरा ला घुरुवा तिर म उलदके .. लकर धकर ... झऊँहा ला उही तिर पटक के मसक दिस । लहुँटती म .. झऊँहा टुकना उचावत खानी ...नजर अऊ ध्यान फेर उहि कोति चल दिस । बेरा पंगपंगागे रहय .. थोकिन हिम्मत आगे रिहिस । उही तिर खड़े होके ध्यान लगा के देखे लागिस । ये दारी .. मोटरी हालत डोलत नइ रहय । अचरज म परगे .. काये होही येहा सोंचत .. घुरुवा म चाइघगे अऊ धुरिहा ले मोटरी ला .. हिम्मत करके छुये के प्रयास करिस .. गुजगुज लागिस । हाथ ला वापिस खींच लिस तभे .. मोटरी फेर हालिस । दुसरइया छुये के हिम्मत नइ होइस । लकर धकर लहुँटके .. अपन गोसइँया अऊ बेटा ला बतइस । सब्बो झिन तुरते घुरुवा कोती दऊँड़िस । पिछू पिछू ओकर बहू घला भागिस । 

घुरुवा म पहुँचके मोटरा ला धीरे से लउड़ी म हुदरिस .. रोये कस अवाज अइस । लउड़ी म फँसा के ओकर बंधना ला हेरिस .. निचट उल्हुर बंधाये रहय .. फटले हिंटगे । देखिस तहन जम्मो झिन .. अवाक होगे ... काकरो मुहुँ ले बक्का नइ फुटत रहय ....... नार फुल समेत नानुक नोनी ....... । जम्मो झन घुरुवा तिर म खड़े सोंचते रहय .. ततका म बहू हा घुरुवा म चइघके .. लइका ला .. हाय मोर बेटी कहिके.. किड़किड़ ले पोटार डरिस । बिहाव के दस बछर नहाकगे रहय .. बपरी के कोख म लइका नइ नांदत रहय । रात दिन येकरे बर .. भगवान ले बिनती करत रहय .. भगवान मोर सुन लिस कहिके .. लइका ला चुमे चांटे बर धर लिस । बहू के लइका के प्रति मोहो अऊ पागलपन ला देखके .. सास ससुर अऊ ओकर घरवाला घला .. नोनी ला अपन संतान स्वीकार लिस । नोनी उप्पर .. बहू के मया अतका पलपलागे के .. लइका बियाये कस .. ओकर थन ले .. दूध के धार फेंकाये लगगे । घुरुवा म मिलिस तेकर सेती .. नोनी के नाव घुरुवा परगे । 

घुरुवा जब घर म अइस ते समे ओकर घर म ठीक से खाये बर नइ रहय । फेर घुरुवा के चरन परे ले .. घर के गाय भईँस के दूध .. अपने अपन बाढगे । अब घुरुवा के ददा हा सिर्फ पहटिया नइ रहिगे बलकि दूध बेंचइया रऊत बनगे । जइसे जइसे घुरुवा हा बाढ़त रहय .. तइसे तइसे घर के आर्थिक स्थिति बने होये लगगे । घुरुवा घला हरेक काम म अगुवा । अपन दई ददा के संगे संग .. बबा अऊ बबा दई के घला.. अबड़ सेवा जतन अऊ ख्याल करय । घुरुवा दिखम म जतेक सुंदर रहय ततके …. चुलबुली घला ... फेर बहुतेच अक्कल वाली रहय ... तेकर सेती .. गाँव भरके चहेती रहय । 

समे बीते के साथ .. घुरुवा सग्यान होगे । बबा अऊ बबा दई हा निचट सियान होगे रहय । जियत ले घुरुवा के बिहाव देख डरतेन .. दु बीजा चऊँर टिक देतेन सोंचय । फेर कन्हो सगा सोदर के आरो नइ मिलत रहय । घर के जम्मो झन ला ओकर बिहाव के फिकर धर लिस । एक दिन के बात आय , जंगल म .. घुरुवा हा संगी जहुँरिया संग .. लकड़ी बिने बर गे रिहिस .. उही समे .. छतरसाह नाव के युवराज हा .. जंगल म शिकार खेलत ... रसता भुलागे । संगवारी मन के साथ छुटगे । प्यास म ओकर टोंटा सुखाये लगिस अऊ भूख म पेट पिराये लगिस । रसता अऊ संगवारी खोजत थकगे रहय अऊ रुख के छइँहा म अराम करत संगवारी मन ला अगोरत रहय .. तइसना म .. दबे पाँव एक ठिन चितवा हा राजकुमार कोती दऊंड़े लगिस । राजकुमार सावधान होतिस तेकर पहिली .. चितवा हा राजकुमार उप्पर कुद दिस । घुरुवा के नजर परगे .. हाथ के टंगिया ला जोर से फेंकिस .. चितवा के टोंटा अल्लग कटाके फेंकागे । युवराज ला खरोंच तक नइ अइस । तलफत परेशान युवराज ला .. घुरुवा हा अपन धरे पसिया ला पियइस .. बासी खवइस अऊ थोकिन अराम के बाद .. ओकर राज के नगर जाये के रद्दा सुझइस । युवराज अपन देश राज चल दिस जरूर फेर .., ओकत आँखी म घुरुवा बसगे । युवराज के मन .. घुरुवा म लगगे । दूनों के अऊ मुलाकात म .. युवराज ला पता लगिस के .. घुरुवा गरीब के बेटी आय । युवराज सोंचिस .. येला बिहाव करहूँ कहि देहूँ तब ...रानी माता नइ स्वीकारही ... ।राज के मंत्री ला समस्या बतइस ... बात राजा तक अमरगे । राजा हा घुरुवा ला बहू बनाये बर .. अऊ रानी ले हुँकारूँ भरवाये बर .. घुरूवा के दई ददा ला बड़े आदमी बना दिस ..। घुरूवा के जनम स्थान म ... घुरुवा अऊ ओकर परिवार बर .. बड़े जिनीस महल बनवा दिस । ओकर ददा ला ... अपन आधा जमींदारी दे दिस । कुछ समे म .. बिगन बिघन बाधा के .. धूमधाम से .. राजकुमार संग घुरुवा के बिहाव निपटगे । 

दाना दाना बर तरसत .. गोदरी कथरी के दसना दसावत .. छितका कुरिया म जिनगी पोहइया .. मनखे मन .. घुरुवा बेटी के परसादे .. जमींदार बनके .. राजकुमार के सास ससुर कहाये लगिन। ऊँकर दिन सँवरगे । कचरा काड़ी गोबर खातू हगना मुतना म पटाये घुरुवा हा महल बनके पबरित स्थान होके .. पुजाये लगगे । घुरुवा बेटी हा रानी बनके राज करे लगिस । एक घुरुवा हा .. दूसर घुरुवा के किस्मत बदल दिस .. तब गाँव के सियान के मुहुँ ले .. ये बात ला कोन रोक सकही के .. सबके दिन बहुरय .. जइसे घुरुवा के दिन बहुरगे .......।  

        हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा.

Sunday, 9 June 2024

रूपिया के दुख

 रूपिया के दुख


पहिली घाँव रूपिया ला रोवत देखिन लोगन । जंगल म आगी लगे जइसे खबर बगरगे ।   कतको झिन ला विश्वास नइ होइस । सचाई जाने बर कतको मनखे बेचेन होए लागिन । सरी दुनिया ला अपन तमाशा अउ करतब ले रोवइया ल ....उदुप ले रोवत सुनना अउ देखना अचरज अउ सुकुरदुम होए के विषय रिहिस । जम्मो सोंचे लागिन काबर रोवत होही रूपिया हा ....? काए बिपत्ती परे हे ओकर उप्पर । सकलागे उही जगा म कतको मनखे । रूपिया ला मुहुँ तोपे देख … पूछे लागिन । एक झिन किहिस - काए पिरावत हे तेमा .. डेंहक डेंहक के रोवथस ? रूपिया रोतेच रहय । बड़ किरोली के पाछू तैयार होइस बताए बर । रूपिया हा केहे लागिस - मोला गिर गे .... गिर गे ..... कहि के घेरी बेरी बदनाम करथव अउ पूछे ला घला आथव ? तूमन ला थोरको लाज शरम नइये ? जम्मो सकलाये मनखे मन हाँसिन अऊ केहे लागिन - हमन तोर संग कहीं कुछु होगिस होही सोंच के आए हाबन । गिरथस तेला.. गिर गे केहे म.. काए लाज ? ऐमे रोए के का बात हे । रूपिया किथे- उहीच ल बतावत हँव भई । मेंहा गिरत रहिथँव फेर उठत घला रहिथँव का ...... ? आज तुँहरे संगवारी हा गोठ गोठ में मोला ..... नेता कस गिर गे रूपिया हा ...... कहि के बदनाम कर दिस । इही बात हा मोर छाती म बाण मारे कस लागिस ।ओकरे पीरा के मारे बेचेन हो के रोवत हँव ।

एक झिन किथे -बने तो किहिस । तेंहा वाजिम म नेता कस गिरथस ..... ऐमे गलत कहींच निये । रूपिया हा अउ गोहार पार के दंड पुकार के रोए लागिस । लोगन मन ब‌ड़ समझइस । थोरकिन बेरा म शांत होए के पाछू भावुक होके रूपिया हा केहे लागिस - मोला चाहे चोट्टा मन कस गिरे समझ लौ ..... चाहे बईमान कस .... चाहे बईजात कस .... चाहे झुठल्ला धोखाबाज लबरा कस गिरे समझ लौ .... फेर नेता कस गिरे झिन समझौ । चोट्टा कभू न कभू पछताथे । बईमान ल ओकर हिरदे कभू न कभू धिक्कारथे। बईजात सतसंगत के असर म कभू न कभू सुधरीच जथे। अउ झुठल्ला धोखाबाज लबरा मनखे .. सजा पाके फेर सोज रद्दा मरेंगे ल धर लेथे । फेर कोन जनी नेता ला कते माटी म गढ़हे हे भगवान घला । न वोहा कभू पछताए । न होकर हिरदे ओला कभू धिक्कारे । न कभू सतसंग के असर म सुधरे । न सजा पाके लबारी मरई अउ धोखा देवई बंद करय । 

 रूपिया हा मनखे मन ला अपन जान के बताये लागिस - मेंहा गिरथों जरूर फेर उठ घला जथँव । अउ ये नेता मन केवल गिरथें .. उठे निही । अइसन मन संग मोला संघेरहू त मोर हिरदे म कतका छेदा होए होही अउ ओहा कतका पिरावत होही तेला मिही जानहूँ । इही क्लेश मोला रोवावत हे । एक ठिन बात अऊ बतावँव ...... मेंहा गिरँव निही बलकी गिराए जाथँव । तभो ले .. गिरत गिरत घला .. मोला गिरवइया के भला घला कर देथँव। जबकि नेता मन अपन ले गिरथें अउ जतका घाँव गिरथें.... अपनेच सुख बर गिरथें अऊ दूसर ल दुख पहुँचाए बर गिरथें । जेमन सत्ता के खुरसी ऊप्पर गिरथें तेमन देश ला फोंगला करथें । जेमन धरम के खुरसी म गिरथें तेमन जनता के आस्था ल मुसेट के मार डारथें ।जेमन समाज के खुरसी म गिरथें तेमन भई भई ला लड़ाथें घर घर ल टोरथें । में कोन्हो ला गिरावँव निही हमेशा उठाथँव .... खड़ा करथँव । फेर येमन कोन्हो ला उठाए निही केवल उठाए के नाटक करथें । एमन कोन्हो ला खड़ा होवन नइ दे । अउ उठाथें केवल गिराए के मजा ले खातिर । एक ठिन बात अउ .... में गिरथँव त बड़ मुश्किल ले चलथँव ...... फेर ये मन जतका गिरथें ततके जादा चलथें ।  

एक झिन किथे - अइसन म तोला खुश होना चाहि के तोर तुलना अतका चलने वाला मनखे संग होवत हे । उहू बड़े ..... तहूँ बड़े । रूपिया किथे - निही भई में बड़े नोहों । में छोटे ले छोटे मनखे के पछीना के गरमी ले उपजे हँव। अउ येमन एसी कूलर के ठंडा म जनम धरे मनखे आए । एक झिन मनखे हा फेर चुट ले मारिस - फेर तिहीं ह येमन ल अउ बड़े बनाए हाबस जी । रूपिया किथे- में कहाँ बड़े बनाए हँव । एमन ला तुँहर वोट के ताकत बड़े बनइस । एक झिन सुजान मनखे किथे - फेर ये वोट तोरे हिम्मत ले खरीदे अऊ बेंचाथे यार । रूपिया बड़ दायसी ले केहे लागिस -ये सोलह आना सच आए । मोरे ताकत अउ हिम्मत ले येमन वोट ल खरीदथें अऊ खुरसी पाके अपन स्वार्थ पूरा करथें । फेर यहू गोठ ओतके सच आए के .. बेंचाये अऊ बिसाये के बूता ल येमन अपन संग मोला गिरा के करथें । जे खुद नइ गिर सकय अऊ मोला गिरा नइ सकय अऊ मोला गिरत नइ देख सकय ...... वो मनखे वोट नइ खरीद पाय अउ राज नइ कर सकय । 

थोकिन पानी घुटकके लम्भा साँस भरत रूपिया केहे लागिस - एक आखिरी बात अऊ बतावत हँव ....... मेंहा जेकर संग रेंगथँव या चलथँव तेकर उद्धार कर देथँव जबकि ये मन जेकर संग रेंगथे या चलथे तेकरे गोड़ ल टोर के खोरवा लंगड़ा बना देथे । में जेकर पीछू रहिथँव या परथँव तेला मंडल अऊ धनवान बना देथँव अउ एमन जेकर पीछू परथें तेकर दुर्दशा निश्चित हे .... वोला स्वर्गवासी बनाके दम लेथें । अइसन संग मोला काबर संघेरथव ?  ये हा न्याय आए का ?

रूपिया बड़ गोठिया पारिस । दूसर दिन समाचार म छपगे । नेता मन भड़कगे । बइठका सकलागे । निंदा प्रस्ताव पास होगे । रूपिया के बहिष्कार कर दिन । थोरकुन दिन म ... ये रूपिया नंदागे अउ चलन ले बाहिर होगे । एकर जगा करिया रूपिया ( काला धन ) प्रचलन म आगे ।

      हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा .