Thursday, 23 January 2025

खैरझिटिया: छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र

  खैरझिटिया: छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र


                          कृषि हमर राज के जीविका के साधन मात्र नोहे, बल्कि संस्कृति आय, काबर कि खेती किसानी के हिसाब ले हमर परब संस्कृति अउ जिनगी दूनो चलथे। उही कड़ी के एक परब आय, छेराछेरा। जे पूस पुन्नी के दिन मनाय जाथे। ये तिहार ला दान धरम के तिहार केहे जाथे। वइसे तो ये तिहार मानये के पाछू कतको अकन किवदंती जुड़े हे, फेर ठोसहा बात तो इही आय कि, ये बेरा मा खेत के धान(खरीफ फसल) लुवा मिंजा के किसान के कोठी मा धरा जावत रिहिस, उही खुशी मा एक दिन अन्न दान होय लगिस, जेला छेरछेरा के रूप मा पूरा छत्तीसगढ़ मनाथें। हमर छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज हरे, येती छेराछेरा परब ला, घोटुल मा रहिके सबे विधा मा पारंगत होय, युवक युवती मनके स्वागत सत्कार के रूप मा मनाये जाथें, अउ दान धरम करे जाथें। पौराणिक काल मा इही दिन,भगवान शिव के पार्वती के अँगना मा भिक्षा माँगे के वर्णन मिलथे। सुनब मा आथे कि भगवान शिव अपन विवाह के पहली माता पार्वती तिर नट के रूप धरके उंखर परीक्षा लेय बर गे रिहिस, अउ तब ले लोगन मा उही तिथि विशेष मा दान धरम करत आवँत हें। 

                     ये दिन ले जुड़े एक पौराणिक कथा अउ सुनब मा मिलथे, कथे कि एक समय धरती लोक मा भयंकर अंकाल ले मनखे मन दाना दाना बर तरसत रिहिन, तब आदि भवानी माँ, शाकाम्भरी देवी के रूप मा अन्न धन के बरसा करिन। वो तिथि पूस पुन्नी के पबरित बेरा पड़े रिहिस। उही पावन सुरता मा, माता शाकाम्भरी देवी ला माथ नवावत, आज तक ये दिन दान देय के पुण्य कारज चलत हे। भगवान वामन अउ राजा बली के प्रसंग घलो कहूँ मेर सुनब मा आथे।

                रतनपुर राज के कवि बाबूरेवाराम के पांडुलिपि मा घलो ये दिन के एक कथा मिलथे, जेखर अनुसार राजा कल्याणसाय हा, युद्धनीति अउ राजनीति मा पारंगत होय खातिर मुगल सम्राट जहाँगीर के राज दरबार मा आठ साल रेहे रिहिस, अउ इती ओखर रानी फुलकैना हा अकेल्ला रद्दा जोहत रिहिस। अउ जब राजा लहुट के आइस ता ओखर खुशी के ठिकाना नइ रिहिस, रानी फुलकैना मारे खुशी मा अपन राज भंडार ला सब बर खोल दिस, अउ अन्न धन के खूब दान करें लगिस, अउ सौभाग्य ले वो तिथि रिहिस, पूस पुन्नी के। कथे तब ले ये दिन दान धरम के  परम्परा चलत हे।

                  कोनो भी तिथि विशेष मा कइयों ठन घटना सँघरा जुड़ सकथे, जइसे दू अक्टूबर गाँधी जी के जनम दिन आय ता शास्त्री जी घलो इही दिन अवतरे रिहिन, दूनो के आलावा अउ कतको झन के जनम दिन घलो होही। वइसने पूस पुन्नी के अलग अलग कथा, किस्सा, घटना ला खन्डित नइ करे जा सके। फेर सबले बड़का बात ये तिथि ला, दान पूण्य के दिन के रूप मा स्वीकारे गेहे। अउ दान धरम कोनो भी माध्यम ले होय, वन्दनीय हे। छेराछेरा तिहार मा घलो वइसने दान धरम करत,अपन अँगना मा आय कोनो भी मनखे ला खाली हाथ नइ लहुटाय जाय, जउन भी बन जाये देय के पावन रिवाज चलत हे, अउ आघु चलते रहय। ये परब मा देय लेय के सुघ्घर परम्परा हे, छोटे बड़े सबे चाहे धन मा होय चाहे उम्मर मा आपस मा एक होके ये परब मा सरीख दिखथें। लइका सियान के टोली गाजा बाजा के संग सज सँवर के हाँसत गावत पूरा गांव मा घूम घूम अन्न धन माँगथे, अउ सब ओतके विनम्र भाव ले देथें घलो। छेरछेरा तिहार के मूल मा उँच नीच, जाति धरम, रंग रूप, छोटे बड़े, छुवा छूत,अपन पराया अउ अहम वहम जइसे घातक बीमारी ला दुरिहाके दया मया अउ सत सुम्मत बगराना हे। फेर आज आधुनिकता के दौर मा अइसन पबरित परब के दायरा सिमित होवत जावत हे। बड़का मन कोनो अपन दम्भ ला नइ छोड़ पावत हे, मंगइया या फेर गरीब तपका ही माँगत हे, अउ देवइया मा घलो रंगा ढंगा नइहे। *एक मुठा धान चाँउर या फेर रुपिया दू रुपिया कोनो के पेट ला नइ भर सके, फेर देवई लेवई के बीच जेन मया पनपथे, वो अन्तस् ला खुशी मा सराबोर कर देथे। एक दूसर के डेरउठी मा जाना, मिलना मिलाना अउ मया दया पाना इही तो बड़का धन आय। छेरछेरा मा मिले एक मुठा चाँउर दार के दिन पुरही, फेर मिले दया मया, मान गउन सदा पुरते रइथे।* इही सब तो आय छरछेरा के मूलमंत्र। कखरो भी अँगना मा कोनो भी जा सकथे, कोनो दुवा भेद नइ होय। फेर आज अइसन पावन परम्परा देखावा अउ स्वार्थ के भेंट चढ़त दिखत हे, शहर ते शहर गांव मा घलो अइसन हाल दिखत हे। ये तिहार मा ज्यादातर लइका मन झोरा बोरा धरे, गाँव भर घूम अन्न धन माँगथे, सबे घर के एक मुठा अन्न धन अउ मया पाके, उंखर अन्तस् मा मानवता के भाव उपजथे, उन ला लगथे, कि सब हम ला मान गउन देथे, छोटे बड़े,धरम जाति, ऊँच नीच, गरीब रईस सब कस कुछु नइ होय, अइसनो सन्देशा घलो तो हे, ये परब मा। छोट लइका मनके मन कोमल होथे, दुत्कार अउ भेदभाव देखही सुनही ता निराश हताश तो होबे करही।

                 छेरछेरा अइसन पबरित परब आय जे गांव के गांव ला जोड़थे, वो भी सब ला अपन अपन अँगना दुवार ले, दया मया देवत लेवत अन्तस् ले, दान धरम ले या एक शब्द मा कहन ता मनखे मनखे ले। ये खास दिन मा जइसे माता पार्वती अँगना मा नट बन आये शिव जी ला सर्वस्व न्योछावर कर दिन, राजा बली भगवान वामन ला सब कुछ दे दिस,माँ शाकाम्भरी भूख प्यास मा तड़पत धरतीवासी ला अन्न धन ले परिपूर्ण कर दिस, रानी फुलकैना अपन परजा मन ला अन्न धन दिस, अउ किसान मन अपन उपज के खुशी ला  थोर थोर सब ला बाँटथे, वइसने सबे ला विनयी भाव ले अपन शक्तिनुसार दान धरम करना चाही। लाँघन, दीन हीन के पीरा हरना चाही, अहंकार दम्भ द्वेष, ऊँच नीच ला दुरिहागे सबे ला अपने कस मानत मान देना चाही, मया देना चाही।

*दान धरम अउ मया पिरीत के तिहार ए छेरछेरा।*

*मनखे के मानवता देखाय के आधार ए छेरछेरा।*


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

[1/13, 12:28 PM] jeetendra verma खैरझिटिया: छेरछेरा अउ डंडा नाच


                     डंडा नाच हमर छत्तीसगढ़ के प्रमुख नाच मा शामिल हे। जेला अधिकतर  पूस पुन्नी याने छेरछेरा के समय मा नाचे जाथे। ये नाच मा मुख्यतः धँवई या तेंदू के छोट छोट डंडा के प्रयोग होथे, काबर कि एखर लकड़ी मजबूत अउ बढ़िया आवाज करथे। डंडा के आवाज के ताल मा ही नचइया मन गोल घेरा मा घूम घूम एक दूसर के डंडा ला एक निश्चित लय ताल मा बजाथें, अउ कमर मुड़ी ला हला हला के झुमथें। कुहकी पारना घलो डण्डा नाच के विशेषता आय। आजकल डंडा के संग ढोलक,झांझ अउ मन्जीरा तको ये नाच मा देखे बर मिलथे। ये नाच के एक विशेष लय ताल युक्त गीत होथे। डंडा नाच ला मुख्य रूप ले लड़का मन द्वारा किये जाथे। ये नाच मा लगातार घूम घूम के नाचे अउ डंडा टकरावत गीत ला दोहराए बर घलो लगथे। जब किसान मन के खेत के धान घर के कोठी मा धरा जथे ता दान पुण्य के ओखी मा मनाए जाथे छेरछेरा के तिहार, अउ इही बेरा घर घर जाके डंडा नाचत लइका सियान मन अन्न के दान पाथें। हमर छत्तीसगढ़ मा होरी के समय घलो डंडा नाचे जाथे, जेला डंडारी नाच कहिथे, फेर दुनो नाच अलग अलग बेरा व अलग अलग हावभाव के नाच आय। डंडारी विशेषकर पहाड़ी क्षेत्र मा होली के बेरा नाचे जाथे। मैदानी भाग मा डंडा नाच अउ पहाड़ी भाग मा इही सैला नृत्य कहे जाथे। जनश्रुति के अनुसार आदिवासी मन आदि देवाधिदेव महादेव ला मनाए बर येला नाचथे ता मैदानी भाग मा भगवान श्रीकृष्ण के रास नृत्य के रूप मा नाचे गाये जाथे। आदिवासी मन येला अपन पारम्परिक नृत्य मानथे। सुनब मा यहु आथे कि एखर शुरूवार राम रावण युद्ध के बाद राम विजय के समय आदिवासी  मन राम जी के स्वागत मा नाचिन, ता कहूँ कहिथे के एखर शुरुवात कृष्ण के रास लीला के समय होइस। ये नाच मा राम कॄष्ण के गीत के संग संग  शुरुवात मा भगवान गणेश, मां सरस्वती अउ गुरु वन्दना करे जाथे। पंडित मुकुटधर पांडेय जी हा ये नृत्य ला छत्तीसगढ़ के "रास नृत्य" घलो कहे हे। कतको झन मन एला छत्तीसगढ़ के डांडिया घलो कहिथे।

                      डंडा नाच मा समयानुसार साज सज्जा मा बदलाव होवत दिखथें। पहली धोती कुर्ता, कलगी, पागा,मोरपंख, कौड़ी, घुंघरू नचइया मनके सँवागा रहय, जे पारम्परिक रूप ले अभो दिखथे, फेर आजकल सुविधानुसार नचइया मन अपन अपन सँवागा के व्यवस्था करथें। ढोलक,झांझ मंजीरा संग मांदर, हारमोनियम,बासुरी  व अन्य कतको वाद्य यंत्र आज डंडा नाच के शोभा बढ़ावत दिखथे। नाचा पार्टी या फेर  हमर संस्कृति संस्कार ला देखाय के बारी आथे ता ये नाच ला कभू भी कलाकार मन मंच के माध्यम ले लोगन बीच परोसथे। नाच के बीच परइया कुहकी ला कइसे लिख के बतावँव? उह उह एक लय मा अउ एक विशेष बेरा मा नचइया मन एक साथ चिल्लाथें। देखत सुनत ये नाच बड़ मनभावन लगथे। आजकल डंडा नाच मा कतको प्रकार के करतब तको कलाकार मन करत दिखथें। आजकल बांस के डंडा घलो चलन मा आगे हे। डंडा नाचे बर सम संख्या मा नर्तक होथे, जिंखर दुनो हाथ मा  एक एक डंडा होथे। गोल घेरा मा डंडा ला दाएं बाए नाचत साथी मनके डंडा ला ठोंकत ये नृत्य ला करे जाथे।

                    वइसे तो डंडा नाच मा बड़ अकन गीत गाये जाथे, सबके वर्णन करना सम्भव नइहे, तभो कुछ पारम्परिक गीत ला लमाये के प्रयास करत हँव। सुमरनी ले ये नृत्य चालू होथे। गणेश वंदना, सरस्वती वंदना, रामकृष्ण अउ माता पिता गुरु के वन्दना घलो ये नृत्य मा सुने बर मिलथे।। सुमरनी गीत के एक बानगी,---

'पहिली डंडा ठोकबो रे भाई, काकर लेबो नाम रे ज़ोर,

गावे गउंटिया ठाकुर देवता, जेकर लेबो नाम रे ज़ोर।

आगे सुमिरो गुरु आपन ला, दूजे सुमिरों राम रे ज़ोर,

माता-पिता अब आपन सुमिरों गुरु के सुमिरों नाम रे ज़ोर।'


कुछ अउ गीत, ज्यादातर गीत के शुरुवात "तरीहरी नाना रे नाना रे भाई" काहत चालू होथे, जेखर बीच मा कहानी, कथा अउ बारी बखरी, खेती-खार संग परब तिहार के वर्णन रहिथे।


1, "एकझन राजा के सौ झन पुत्र,

    उनला मँगाइस हे मुठा मुठा माटी।"


2,  ओरिन ओरिन मुनगा लगाएंव।

     वो मुनगा फरे रहे लोर रे केंवरा, 

      तैं डँगनी मा मुनगा टोर।


3,   मन रंगी सुआ नैना लगाके उड़ भागे।

      उड़ि उड़ि सुवना, घुटवा पे बइठे।

      घुटवा के रस ला ले भागे, मन रंगी


4,  मैं बन जा रे लमडोर,

     नेकी मैं बन जा।


5,   हाय डारा लोर गे हे न।


6, तहूँ जाबे महूँ जाहुँ, राजिम मेला


ये सब पारम्परिक गीत के आलावा आजकल नवा नवा गीत भी देखे सुने बर मिलथे।

                  डंडा नचइया मन दुनो हाथ मा डंडा लेके, गोल किंजरत अलग अलग प्रकार के डंडा नाचथे। डंडा नाच के कतको प्रकार हे, एखर बारे मा हमर पुरखा कवि डॉ प्यारेलाल गुप्त जी मन अपन पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़"मा घलो विस्तार ले लिखें हें। गुप्त जी अनुसार दुधइया नृत्य, तीन डंडिया, पनिहारिन सेर, कोटरी झलक, भाग दौड़, चरखा भांज आदि कतको रूप प्रचलित हे। एखर आलावा सियान मन आधा झूल, टेटका झूल,पीठ जुड़ी, समधी भेंट, घुचरेखी आदि प्रकार के डंडा नाच के बारे मा घलो बताथे। ये सब नाच ल नाचे के अलग अलग तरीका हे, कहे के मतलब सबके अलग अलग परिभाषा हे,नाच शैली हे। जेखर विस्तार मा चर्चा फेर कभू करहूँ।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बदलाव चन्द्रहास साहू मो 8120578897

 बदलाव

                                              चन्द्रहास साहू

                                       मो 8120578897


सिरतोन जम्मो कोती बदलाव होवत हाबे अउ बदलाव होना प्रकृति के नियम आवय। रुख-राई अपन जुन्ना पाना ला छोड़ के नवा फूल पाना के सवांगा कर लेथे । तभे तो पतझड़ के पाछू सावन के हरियर आथे। सिरतोन बदलाव संग बदलना सुघ्घर होथे फेर जम्मो बदलाव हा सुघ्घर होथे का ...? आज संस्कृति, संस्कार,परंपरा अउ रीति-नीति मा बदलाव होवत हाबे। सलुखा, धोती-कुर्ता,मुड़ी मा पगड़ी पहिरे कोनो दिखथे का....? जम्मो कोती फुलपैंट जींस वाला दिखथे। अब शहर के सवांगा गाॅंव देहात मा खुसरगे हाबे। सिरतोन इही तो विकास आवय। टूरा हा टूरी  बरोबर चुन्दी बढ़ा के किंजरथे अउ टूरी हा टूरा बरन धरे किंजरत हे। टूरी के हाथ मा चूरी कमतियावत हाबे अउ टूरा हा कान मा बारी, नाक मा नथनी पहिरत हे। ये कइसन बदलाव आवय ? 

जम्मो ला गुणत-गुणत शहर जावत हावंव मेंहा आज। 

                   भलुक टीवी अउ मोबाइल ले ग्लोबलाइजेशन होइस। एक दूसर देश ले आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, संस्कृति-सभ्यता के  लेन-देन होइस फेर मोर गाॅंव देहात मा बदलाव के तीन पोठ कारण हाबे। गाॅंव के उत्ती कोती के प्रगति मैदान मा बड़का फेक्ट्री खुले हे , दइहान मा बड़का इंजीनियरिंग काॅलेज अउ सदभावना चौक मा दारु भट्ठी। चार झन रेजा अउ छे झन कुली  बस कमाथे ये फेक्ट्री मा।  गाॅंव के कोनो मनखे फेक्ट्री मा अधिकारी अउ साहब नइ हाबे भलुक परदेसिया मन गोंजाये हाबे खोसखिस ले। गाॅंव के कोनो लइका नइ पढ़े ये काॅलेज मा फेर  मोटियारी अउ जवनहा ला जादा प्रभावित करे हाबे। टूरा ला कोन कहाय टूरी मन घला सिगरेट फुंकत भरर-भरर गाड़ी चलाथे। 

टूरा टूरी दूनो एक बरोबर कोनो फरक नहीं। अब नवा चलागन देखे ला मिलत हाबे ये हाई सोसायटी मा। लिव-इन रिलेशनशिप मा राहत हाबे टूरा-टूरी एक संघरा । फेर गाॅंव मा क्रांति लाने के बुता करे हाबे तेन आय-दारु भट्ठी। सिरतोन जनम भर के अबोला मनखे घला एके गिलास मा पीयत हाबे। जात-पात, ऊंच-नीच के कोनो भेद नइ हाबे इहां। .....अउ न कोनो मुहूर्त लागे। जब मन तब शीशी ला बिसा सकत हस। अपरंपार महिमा हाबे येकर......अब्बड़ बदलाव ?

यहूं तो मोर गाॅंव के बदलाव आवय। 

           चकाचक करत रोड मा अब मोर फटफटी के टाॅप गेयर लगा के दउड़ाये लागेंव। थोकिन बेरा मा अम्बेडकर चौक अमर गेंव अउ अब सिहावा चौक कोती जाये के उदिम करत हॅंव फेर ये का....? भीड़ मा फदक गेंव। नगर सैनिक पुलिस अधिकारी मोला छेंक लिस। मेंहा सकपका गेंव। खीसा ले मोर आइडेंटिटी कार्ड ला निकालेंव। ससन भर देखिस मोला अउ मोर आइडेंटिटी कार्ड ला। 

"अच्छा तो तुम पत्रकार हो...?''

"जी सर!''

मुचकावत मेंहा हुंकारु देयेंव। 

"लगते तो नही हो  ?''

डरवा डारिस अब मोला वोकर प्रश्न हा। छत्तीसगढ़िया आवन साहब ! चेहरा ले ही गरीब दिखथन तब का कर डारबो ?  मने मन मा फुसफुसायेंव।

"पंदरा बच्छर हो गया साहब पत्रकारिता करते। भलुक पत्रकारिता की पढ़ाई कोनो युनिवर्सिटी ले नही किया हूं फेर नवा पीढ़ी के भावी पत्रकार लोग मुझसे पत्रकारिता सीखने आते हैं दोरदिर ले।''

महूं फेंके लागेंव अब। 

साहब मुचकावत रिहिस। करु मुचकासी। मेंहा अब आगू बाढ़ेंव। सत्ता पार्टी के जिला अध्यक्ष ले जोहार भेंट करेंव अउ पुछेंव घला।

"का के भीड़ आवय कका ?''

हमर मंत्री जी हा आज ले जेल यात्रा मा जावत हाबे। गोबर घोटाला मा जमानत लेये बर इंकार कर दिस वोकरे सेती एण्टी करप्शन ब्यूरो  हा गिरफ्तार कर के जेल लेगत हाबे हमर मंत्री जी ला।  पहिली चक्का जाम करके विरोध प्रदर्शन करबो ताहन चंदन-बंदन, रंग-गुलाल, फूल-माला पहिराके आरती उतारके पठोबो हमर नेता ला जेल।''

कका किहिस हाथ मा फूल दुबी नरियर के भेला धरे रिहिस अउ नेताजी जिन्दाबाद के नारा लगावत चक्का जाम करे बर चल दिस।

का होही भगवान हमर देश के अइसने मा। अब संसो करे लागेंव मेंहा। स्वतंत्रता सेनानी मन गली खोर ले गुजरे तब अइसना स्वागत सत्कार होवय फेर अब नेता मन के....? 

ये कइसन बदलाव आवय परमात्मा ?

जी कलपगे मोर।

"ट्रिन..... ट्रिन........ !''

मोर फोन के घंटी बाजिस। 

"हलो ! सीताराम महापरसाद!''

"सीताराम महापरसाद !''

महापरसाद आवय । पैलगी जोहार करेंव। अब्बड़ दिन मा सुरता करत हाबे।

"सुना महापरसाद ! सब बने-बने हाबे न ?''

"का बतावंव महापरसाद ! मोर एकलौता बेटा पप्पू ला समझा दे गा ! मर जाहूं कहिथे।''

मेंहा संसो मा परगेंव। बने तो रिहिस लइका हा। पढ़े-लिखे मा अगवा रिहिस । बैंगलोर मा कम्प्यूटर कोर्स करके साफ्टवेयर इंजीनियर हाबे। न पइसा के कमती हाबे न कोनो रोकइयां-छेंकइया। अपन हिसाब ले जिनगी जी सकथे। फेर का दुख परगे ? 

"का होगे महापरसाद ! बने फरिहा के बताबे तब जानहूं जी।''

मेंहा पुछेंव फेर अब मोर आगू मा बाधा बिपत आगे।  हिन्दू जागरण मंच के रैली, गाड़ी मोटर के ची.......पो...... अउ नारा जयकारा।  आज वेलेंटाइन डे आवय। स्कूल काॅलेज गार्डन मा पहरादारी करे बर रैली निकाले हाबे। सड़क तीर के पीपर छइयाॅं मा  ठाड़े होयेव अउ अब फोन लगा के समझाये लागेंव महापरसाद ला।

"एकलौता बेटा आवय-कुल के दीपक। मरे हरे ले छेंक अउ मनाये के उदिम कर तब बनही महापरसाद !'' 

"इही तो संसो आवय महापरसाद ! वोहा  काकरो ले मानत नइ हे।''

"आजकल के लइका मन अब्बड़ ढीठ हाबे गा ! जौन मांग करथे तौन ला मनवा के रहिथे। जान रही तब कइसनो जी खा लेबो फेर कोनो अनीत हो जाही तब...? तिही हा झुक जा अब। मान ले वोकर गोठ ला।''

मेंहा संसो करत केहेंव।

"कइसे मान जावंव महापरसाद ! माने के लइक बर कभू मना नइ करो। फेर येहां ?''

"बने फोरिहा के बता महापरसाद!''

''टूरा पप्पू हा पप्पी बनहूं कहिथे।'' 

"का.....?''

"हहो...! टूरा  पप्पू हा अब पप्पी बनहूं कहिके धोरन धरे हाबे।''

"का गोठियाथस जी आनी-बानी के....?''

"सिरतोन भइयाॅं ! टूरा पप्पू हा अब लिंग चेंज करवाके टूरी बनहूं कहिथे। मेंहा संसो मा बुड़गे हावंव। कइसे काहंव टूरा ले, जा टूरी बन जा अइसे।''

मोर महापरसाद के गोठ सुनके मोला झिमझिमासी लाग गे । अकचका गेंव । 

"अइसना घला होथे महापरसाद ?''

मेंहा पुछेंव।

"हहो ! दिल्ली, बम्बई बैंगलोर अउ विदेश मा तो होथे फेर  ..... हमर रायपुर के गली-गली,खोर-खोर मा टूरा ले टूरी अउ टूरी ले टूरा बनाये के, सेक्स आर्गन इंप्लांट करे के दुकान खुलगे हाबे।''

"अरे...!''

मोर मुहूॅं उघरा रहिगे अकचकाये लागेंव। मोर गोसाइन के गोठ के सुरता आगे उदुप ले। 

तेंहा काला जानथस भोकवा नही तो ...! दुनिया कहाॅं ले कहाॅं पहुंच गे अउ कुआं के मेचका बरोबर हाबस तेंहा। उप्पर ले पत्रकार ...? पत्रकार मन तो कुकुर टाइप होना चाहिए खबर ला सुंघ के जान डारथे। न तोला सुंघे ला आवय न हाड़ा चुचरे ला। माइके ले कुछू पंदोली मिल जाथे तब घर चलत हाबे नही ते कोन जन.....? गोसाइन अइसना तो कहिथे बेरा-बखत मा। 

बेरोज़गारी मा का नइ करे हॅंव..? पनही बेचे के धंधा तक करेंव फेर उधारी अउ किराया मा बोजा गेंव। छोड़ ये गोठ ला....?

जी घुरघुरासी लाग गे मोला। मकई चौक मा बिराजे संकटमोचक दक्षिण मुखी हनुमान जी ला पैलगी करेंव अब अउ महापरसाद के आगू के गोठ ला सुने हॅंव।

"महापरसाद ! लइका हा बैंगलोर पढ़े बर गेये रिहिन तब कोनो आने टूरा संग रुम पार्टनर रिहिन। संगे संग उठना-बैठना, खेलना-कूदना, खाना-पीना, पढ़ना-लिखना, सुतना-बसना जम्मो बुता ला करे। एके थारी मा खाये तब गहरी दोस्ती घलो होगे। रुम पार्टनर तक तो सुघ्घर हाबे फेर अब लाईफ पार्टनर बन के जीबो खाबो कहिथे तब का करंव....?''

"ये तो अप्राकृतिक हावय भइयाॅं ! देश समाज अउ नवा पीढ़ी मा का असर पड़ही ? भगवान हा दुनियां बनाइस तब नारी अउ पुरुष ला घलो सिरजे हाबे। ...अउ वोकरे मेल-मिलाप ले नवा पीढ़ी हा जनम धरथे। इही तो प्रकृति आवय जी ! ...अउ जौन हा प्रकृति के विरोधी हाबे तौन हा गैर कानूनी आवय।''

मेंहा कानूनी  गोठ करे लागेंव छाती फुलोवत, गरब करत।

"नही महापरसाद ! तेंहा नइ जानस अब तो संविधान मा बदलाव होगे हाबे। कोनो घला बालिग हा अपन हिसाब ले जिनगी जी सकथे। कोनो संग बिहाव कर सकथे। बस दूनो के आपसी सहमति होना चाही। अमेरिका इंग्लैंड रुस जापान मा तो कानूनी मान्यता घला हाबे। हमरो देश के मेट्रो शहर दिल्ली बम्बई बैंगलोर कलकत्ता मा समलैंगिक समूह मन के धरना-प्रदर्शन चलत हाबे। कोर्ट मा बहस चलत हाबे। गे समलैंगिक अउ एल जी बी टी क्यू ग्रुप के नाव ले जाने जाथे येमन ला। टूरा मन तो हाबेच फेर टूरी मन के घलो अब्बड़ संख्या हाबे।''

"का.....?  टूरी मन घलो झपावत हे....?''

मुँहूॅं उघारत पुछेंव महापरसाद ला। आरुग भोकवा हस गोसाइन के गोठ के फेर सुरता आगे।

"हाॅंव जी ! कोनो कमती नइ हाबे। जइसे टूरा टूरा मिलके बिहाव रचावत हाबे वइसना टूरी टूरी घला बिहाव करथे। अइसन जमाना आ गे हाबे।''

"ये का जबाना आवय भैया ? ये तो घोर कलजुग झपागे महापरसाद ! अइसना मा का होही ये सुघ्घर दुनियां के....?''

मेंहा संसो करे लागेंव।

"दुनियां का होही तेखर अभिन संसो नइ हाबे भइयाॅं ? अभिन तो मोर लइका कइसे बाॅंच जावय येकर संसो हाबे। ले झटकुन आ हमर घर। कोनो उदिम करबोन।''

"हाॅंव महापरसाद !आवत हावंव झटकुन।''

मेंहा केहेंव अउ महापरसाद के गाॅंव कोती के रद्दा मा दउड़े लागेंव अब। 

"ट्रिन...... ट्रिन.......!''

मोर फोन फेर घरघराईस। मोर तो बीपी बाढ़गे। हाथ पाॅंव फूले लागिस। लहू के संचार बाढ़गे। ...अउ हइफो... हइफो.... सांस चले लागिस। मोर आफिस के फोन आवय ब्यूरो चीफ सिंग साहब रिहिस। नाम मा सिंग तो हाबेच फेर बुता बर घला हुदेनत रहिथे। फेर मुहूॅं....? जब गोठियाथे भूरी बिच्छी बरोबर झार चढ़ जाथे।  आगी लग गे हाबे, .... अब्बड़ करु, अब्बड़ बीख.....! थरथरावत फोन उठायेंव।

"हलो !''

"कस बे कोढ़िया, साले आधा दिन निकल गे अउ अभिन तक ब्रेकिंग न्यूज नही भेजे। कितने ही जोड़ीया हाॅटल मे रंगरेलियां मना रहे हैं, कोई सड़क किनारे मार खा रहा है तो कोई खुलेआम मार रहा है, कोई गार्डन में, कोई टाकिज में एवरी पब्लिक प्लेस मा माहौल है। किसी को भी दबोच और आफिस लेकर आओ। उसको कैसे ऐंठना है हम बतायेंगे। ..... लिव-इन रिलेशनशिप मे रहने वाली लड़की का बलात्कार करके फांसी पर लटका दिया गया था उसमे क्या तफ्तीश हुई एस आई से मिलकर बताना। ऐसे ही कोई और मामला हो तो लेकर आओ...नही तो अपना सूरत मत दिखाना.......। टू....टू.... !''

फोन कटगे अइसनेच आवय लपरहा  हा । इहाॅं अपन हा आने राज ले पतरी चांटे बर आये हे अउ छत्तीसगढ़िया मन ला जुटहा कहिथे। सड़े बासी खाने वाला कहिथे। भलुक आगू मा नइ बखान सकेंव तभो ले मन के भड़ास ला निकालत नंगतहे बखानेव अउ अब ब्रेकिंग न्यूज खोजे लागेंव। ...फेर ये ढ़ोगियाहा नेता मन हा ब्रेकिंग न्यूज हो सकथे का ? ब्रेकिंग न्यूज बना के वोकरे राजनीति ला चमकावत हाबे खउवा टाइप पत्रकार मन। आज के दिन दू मयारुक मिलत हाबे तौन पहरे दारी....? इही तो उम्मर आवय भई !  जीयन खावन दे फेर अश्लीलता झन होवय अपन सामाजिक दायित्व ला निभाये के उदिम करत ब्रेकिंग न्यूज खोजे लागेंव। 

                 सिरतोन जतका विकास होइस संस्कृति अउ संस्कार के वोतका विनाश होवत हाबे। गड़वा बाजा नंदागे, पतरी वाला मांदी नइ दिखे। बिहाव के नेंग-जोग अंधियागे। ....का बाचिस ?  आधा ले जादा बिहाव तो अब कछेरी मा होवत हाबे। ....अउ अब बिहाव के जरूरत घला का हे....? लिव-इन रिलेशनशिप मा सब हो जाथे तब। इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गे हाबे न गाॅंव देहात मा अपसंस्कृति तो आबेच करही ?  हमरो गाॅंव देहात मा अब अइसना रहे लागे हाबे टूरा टूरी मन।  एक बेरा ऐकर विश्लेषण करत लेख लिखे रेहेंव। आज अउ देख के संशोधन कर दुहूं। ...या महापरसाद के लइका ला बचा लुहूं यहूं तो ब्रेकिंग न्यूज रही। 

जम्मो ला गुणत-गुणत अब ब्रेकिंग न्यूज खोजत महापरसाद के गाॅंव के रद्दा मा जावत हावंव। थोकिन दुरिहा गेयेंव तभे गार्डन तीर के घर मा भीड़ सकेलाये हाबे।  

"का होगे...?  का होगे....?''

जम्मो कोई बरोबर महूं आरो करेंव।

"आजकल तो जवनहा ले जादा अधेरहा उम्मर वाला मन उप्पर जवानी के जोश छावत हाबे।'"

"का होगे भाई ! कुछू बताबे तब तो जी।''

मेंहा फेर पुछेंव।

"बहू-बेटा, नाती-पंथी घर-दुवार जम्मो ला छोड़ के लिव-इन रिलेशनशिप मा रेहे बर चल दिस डोकरा हा।''

"थोड़को लाज शरम नइ आवय येमन ला।''

"कलजुग झपागे रे !''

"जवनहा मन ले जादा तो बुढ़वा मन अगवा गे।''

"नवा पीढ़ी ला का सीखोही अइसन मन ?''

जम्मो कोई एक दूसर संग गोठ बात करत हाबे। 

"..... नाक कटा देस पापा !''

बेटा काहत हाबे।

"कहान्चो मुहूॅं देखाये के पुरती नइ होयेंन। माई मायके तक मा तोर करतुत के सोर अमरगे। ...वोकर ले मर जातेस ते अतका बदनामी नइ होतिस।''

बहुरिया मन बफलत हे। सिरतोन डोकरा मन ला अइसन करे के का जरुरत हाबे। एक मुठा खातिस अउ परे रहितिस राम भजन करत। ....फेर ये मन तो रावण ले घला अगवा गे हाबे। 

महूं मिंझरगे रेहेंव अब वो भीड़ मा। मोरो सोच अब वोकरे मन बरोबर होये लागिस। फेर अइसन करे के नौबत काबर आइस। येकर जर तक जाये ला लागही। 

मोर पत्रकार मन मा अब डोकरा-डोकरी ले मिलके वोकर पक्ष ला जाने के होइस। रत्नाबांधा चौक मा अमरगेंव अब। माइलोगिन हा बबाजात करा आथे तब उड़हरिया खुसरगे कहिके गोठ होथे फेर ये मामला मा तो डोकरा हा चल दिस। 

गुणत-गुणत वोकर घर अमरगेंव।

इहिन्चो अब्बड़ भीड़ सकेलाये हाबे। जौन ला जइसन सुझत हाबे वइसने गोठियावत हाबे। 

नानकुन माटी वाला घर खपरा छानी के। डेखरा मा चढ़े  कुंदरु के नार छतराये हाबे अंगना मा। कोठा मा गाय पैरा खावत हे। बछरू दूध पीयत हे चपर-चपर। डोकरी गोरसी सपचावत हे आँखी रमंज-रमंज के। बैरी गुंगवा हा डोकरी के आँखी ले आँसू निकाल दिस अउ आँखी लाल कर डारिस। जम्मो ला देखत हॅंव मेंहा। कतको झन अब्बड़ पुछे रिहिस लिव-इन रिलेशनशिप के बारे मा फेर सब कोई के भादो उजार कर दे रिहिस बखान-बखान के डोकरी हा। 

हमू मन ला चैन ले जीये के अधिकार तो हाबे तब काबर पाछू परे हव जम्मो कोई। समाज के ठेकेदार अउ रोटी सेंकइया मन ला अब्बड़ बखाने रिहिस। फेर ये बुढ़त काल मा काबर अइसन करत हाबे ये जानना जरुरी हाबे न ?

सामरथ करके कुछू उदिम करत मोहाटी के खैरपा ला टारेंव अउ वोकर घर गेयेंव। 

"पाॅंव परत हॅंव दाई !''

डोकरी के पैलगी करत केहेंव। पहिली ससन भर देखिस मोला डोकरी हा अउ चिन्हे के उदिम करिस। 

"भटगांव वाला लक्ष्मण साहू के बेटा आवंव। मोर दाई हा तोर बर खाई खजाना जोरे हे अउ सोर संदेश लानबे कहिके पठोये हाबे।''

मेंहा जलेबी ला देवत केहेंव। महापरसाद घर जुच्छा थोड़े जातेंव जी ? चौक मा बिसा डारे रेहेंव।

अब मचोली ला लान के दे दिस मोला। 

"हहो, अब बुढ़त काल मा नइ चिन्हाय। का कर डारबे ? उहिन्चो अब्बड़ परिवार अउ गोतियार हाबे।  सब्बो कोई हा नइ चिन्हाय अब। अब्बड़ बाटूर सांगुर घला होगे हाबे। काला जानबे। सब बने-बने हाबे लइका लोग मन, सियान मन ?''

डोकरी पुछिस। अनचिन्हार संग हाॅंव मे हाॅंव मिलाये लागेंव अब।

डोकरा घला खटिया मा ढ़लंगे रिहिस। खाॅंसत घला रिहिस। बाम लानिस अब डोकरी हा अउ डोकरा के छाती मा लगा के गोरसी के आगी मा सेके लागिस। डोकरा के टुप टुप पाॅंव परके जोहार भेंट कर डारे रेहेंव। 

"कोन गाॅंव के सगा आवय डोकरी दाई ? मेंहा नइ चिन्हंव वो !''

"....अब का सगा ? ....का अपन...? का बिरान बाबू ...? अब हम एक दूसर के आवन।''

"बिन बिहाव के दाई !''

"का करबे ? जौन अपन रिहिस तौन तो दगा दे दिस।... जीवन के बीच रद्दा मा दगा दे दिस। मोला छोड़के परलोकी होगे। अब मेंहा अकेल्ला परगेंव। न लइका न लोग  ? बुढ़ापा बर कोनो सहारा तो लागही। ये सियान के तो भरे पूरे परिवार हाबे फेर सब अबिरथा आवय कोनो साथ नइ दिस।''

डोकरी बताइस। अब डोकरा के गोठ मिंझरगे।

हाॅंव बाबू ! डोकरी सिरतोन काहत हाबे। एक दिन बाथरूम मा गिरगेंव। माड़ी कोहनी छोलागे। कोनो नइ उठाइस। कोनो दवई पानी नइ करिस। जम्मो कोई बेटा बहुरिया मन अब्बड़ पइसा कमाथे। कोनो हा बिजनेस करथे। कोनो बड़का अधिकारी हाबे। तब कोनो हा समाजसेवी नेता हाबे फेर बाप के हाल चाल जाने बर काकरो करा समय नइ हे। .....अउ अब जम्मो जैजात हा उकरे मन के नाव मा होगे तब मोर मरे अउ जीये ले कोन ला का फरक पड़ही....। वृध्दाश्रम पठोवत रिहिस तब इही डोकरी हा मोला पंदोली दिस। कोन जन डोकरी ला कोन बताइस ते...? जब सब बने-बने रिहिस तब डोकरी हा मोर घर बुता करे ला आ जावय कभु-कभु अतकी तो चिन्ह-पहिचान आवय।''

डोकरा बताइस।

"संस्कृति बचाओ संस्था हा अब्बड़ हुड़दंग मचाइस अउ अब्बड़ धमकी घला दिस। समाज के ठेकेदार मन बिपत के बेरा नइ आइस अउ एक संघरा रहे ला धरे हावन तब दोरदिर ले आगे। गारी बखाना दिस। मुर्दाबाद के नारा लगाइस। लिव-इन रिलेशनशिप मा रहिथो कहिके दुतकारिस, थू थू करिस फेर का करंव.....? । जीयत हंव तब सहे ला पड़ही। एक दूसर के सेवा करे बर संग मा राहत हन बाबू ! कोनो लिव-इन रिलेशनशिप फिव इन रिलेशनशिप ला नइ जानंन। ....बस राहत हॅंन। जम्मो ला 

डोकरी बताइस अउ रोये लागिस।

सिरतोन येहां पाश्चात्य के लाईफ स्टाइल नोहे भलुक एक दूसर के संग जीये-मरे के बंधना आवय। ... अनजान बंधना। मोला ब्रेकिंग न्यूज मिल गे रिहिस अब। 

"ले बने राहव दाई बबा हो। कूछू बुता पर जाही तब सोरिया लुहूं। अपन विजिटिंग कार्ड ला देवत केहेंव अउ बिदा लेये लागेंव। अदौरी बरी अउ  आमा अथान ला जोरत किहिस।

"लइका मन खाही बाबू लेग जा। कोनो-कोनो बरी हा घोटराहा हाबे बाबू ! बेटी मन ला कहिबे जादा बेर ले चूरोही बता देबे अउ डोकरी ला गारी बखाना झन देये ला कहिबे घोटराहा बरी बर।''

डोकरी मोला बरजे लागिस हाॅंसत-हाॅंसत। सिरतोन डोकरी के मया दुलार अउ आसीस पाके मेंहा अघा गेंव।

"ट्रिन..... ट्रिन.....!''

मोबाइल फेर घरघराईस। महापरसाद आवय फेर फोन करत रिहिस। हरियर बटन ला दबायेंव। 

"हलो! आवत हावंव  महापरसाद मेंहा।''

"झटकुन आ महापरसाद अउ हमन दूनो कोई ला बचा ले।''

रोवत किहिस महापरसाद हा। मेंहा अकचका गेंव अउ संसो करे लागेंव।

"अब का होगे भईयां तोला ?''

"टूरा हा खेत खार अउ ज़मीन जायदाद ला बेच दिस। घर ले खेदार दिस हमन दूनो कोई ला। तारा बेड़ी लगा देहे । एकाउंट  के जम्मो पइसा ला निकाल लिस अउ बैंगलोर भाग के अपन गे पार्टनर के संग बिहाव करहूं कहिथे। अपन लिंग के बदलाव करके टूरी बनहूं कहिथे। ये कइसन बदलाव आवय महापरसाद । अइसन बदलाव होही तब हमन काकर अधार मा जीबो....? कइसे जिनगी कटहीं....? हमन तो जिते जियत मर गेंन हो....हो.....।''

महापरसाद अब रोये लागिस। सिरतोन ये कइसन बदलाव आवय। महूं गुणे लागेंव। ब्रेकिंग न्यूज मिले कि झन मिले। अब महापरसाद ला सम्हाले बर चल देयेंव मेंहा वोकर घर।

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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया

आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी

जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़

पिन 493773

मो. क्र. 8120578897

Email ID csahu812@gmail.com

सकट चतुर्थी

 सकट चतुर्थी

       


              चंदा, सुरुज, ग्रह नक्षत्र के पूजा पाठ बारो महीना चलते रथे। वइसने एक पूजा व्रत होथे, सकट तिहार। ये तिहार के दिन चौथ के चंदा मा भगवान गणेश ला विराजे मानके।ओखर दर्शन करके बेटी बहिनी मन, अपन निर्जला ब्रत ला तोड़थे, अउ अपन लइका लोग के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये सन्दर्भ मा एक कथा आथे कि, भगवान शिव हा, पार्वती द्वारा मइल ले बनाय गणेश जी के मुड़ी ला काट देथे, जेखर ले पार्वती बहुत दुखी हो जथे, अउ जब गणेश जी ला जिंदा करे बर कथे, ता ओखर मुड़ मा हाथी के मूड़ लगाथे। पावर्ती देख के खुश होथे, फेर जब अपन लइका के पहली वाले कटे मुड़ी ला देखथे ता विलाप करे लगथे। पार्वती ला विलाप करत देख, ओखर प्रण, व्रत अउ इच्छा अनुसार वो मुड़ी ला चन्द्रमा मा,शिव जी हा शुशोभित कर देथें। अउ उही दिन ले सकट तिहार के उत्तपत्ति माने जाथे। माता पार्वती अपन लइका गणेश के पुर्नजीवन अउ कटे मुड़ी के संसो बर निर्जला व्रत रहिके, भगवान शिव ला अपन बात मनवाथे। तपोबल ले प्रभावित भगवान शिव, चन्द्रमा मा मुड़ ला स्थापित करे के बाद, ये आषीश देथें कि सकट के दिन जउन भी महतारी मन, चाँद ल देखत पूजा पाठ करहीं, उंखर लइका लोग के सब संकट दुरिहा जही। उपास धास के ये सिलसिला आदि काल ले चलत आवत हे।    

                      ज्यादातर ये उपास ला लोधी कुर्मी समाज के बेटी माई मन रहिथे। पहली कस आजो ये तिहार मा, बेटी माई मन, अपन मइके मा जुरियाके सबो सँवागा सजाके रतिहा चंदा ला नमन करत अपन निर्जला व्रत ला तोड़थें अउ लइका लोग घर परिवार के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये दिन माटी के खिलौना, जेमा डोंगा, बाँटी के साथ साथ पापड़, तिली लाड़ू, कोमहड़ा पाग,पूड़ी खीर आदि पकवान बनाये जाथे,अउ भगवान चन्द्र गणेश ला भोग लगाय जाथे। ये परब ला सकट चतुर्थी घलो कथे। ददा भाई मन ये तिहार के पहली अपन बेटी बहिनी ला घर ले आथे। बेटी माई मन मइके मा ये उपास ला रथें। व्रत तिहार कोनो भी होय सबके मूल मा सुख समृद्धि के कामना जुड़े रथे। वइसनेच मया मेल,सुख समृद्धि के परब आय सकट।।


सकट तिहार-कुंडलियाँ


मइके मा जुरियाय हें, दीदी बहिनी आज।

सकट तिहार मनात हें, थारी दिया सजात।

थारी दिया सजात, हवैं बेटी माई मन।

लाड़ू पापड़ खीर, बनावत हें दाई मन।।

माँगे मया दुलार, गजानन ले व्रत रइके।

हाँसत खेलत रोज, रहै ससुरार अउ मइके।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

सपना के पांखी*//-

 कहिनी             -// *सपना के पांखी*//-

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           पं.सिरीधर श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर के पुजारी रहिस।जबर सिधवा,ऊंचपुर फकफक उज्जर देहें अऊ माथा के भरभर त्रिपुंड चन्दन के टीका लगाय रहे।चोटइया जबर लंबा अऊ मोटहा रहिस ते पाय के कतको झन चोटइया वाले महराज के नांव ले चिन्हारी करंय।पं.सिरीधर पोथी पुरान के जबर गुनिक कतको अकन दोहा-चौपाई अऊ श्लोक ल मंतरा कस मुअखरा पढ़त रहय।ओहर धोती कुर्ता पहिरे, पांव म खड़ाऊ पहिर के रेंगय।पं.सिरीधर संतोषी किसिम के रहिस ते पाय के कतको झन संतोषी महराज घलो कह देवंय।श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर ओतका जादा बड़े नि रहिस फेर ओकर महत्ता जबर रहय।

             ओहर मंदिर के पूजा-पाठ करय,काकरो धार्मिक अनुष्ठान,बर-बिहाव ,कथा घलो बांचे जावे।जजमान मन कतको दे देवय ओला झोंक लेवय कोनों प्रकार के अऊ देवा कहिके कभू नि रुंगे ते पाय के सबोझन संतोषी महराज कहबेच करय।पूजा-पाठ करवाय बर सबो बलाबेच करंय।चेला-चपाटी मन घर म पूजा-पाठ एतका जादा रहय के महराज जी ल फुर्सत नि रहय।कभू-कभू तो आने दिन करबो कहिके करारा कर देवय।

              पूजा-पाठ करे म सबो डहर चिन्हारी होगे रहिस।लक्ष्मीनारायण मंदिर शहर के बीचोबीच म रहिस,मंदिर के पाछू कोती महराज मन के रहे के ठउर-ठीहा रहिस।ऊंहा अपन गोसाईंन सबितरी अऊ दू झन लइका संग रहय।पूजा-पाठ अऊ कथा-भागवत के चढ़ोतरी ले गुजर-बसर समे के समे हो जावत रहय।समे कतका बेर केरवटिया लेथे गम नि मिले।नगर निगम के ठउका चुनाव के बेरा आय रहिस।जेन जघा म मंदिर रहय ओहर वार्ड क्रमांक - 20 म आवत रहिस जेन ह अनारक्षित महिला सीट होगे रहय।महराज जी के प्रभाव घलो उहीच वार्ड म जादा रहय।

             जेन वार्ड म महराज मन रहंय तेन वार्ड म कोनों किसिम के विकास कारज नि होय रहिस ते पाय के सबो जनता मन कतको परेशानी ल झेलत रहिन।पहिली के पार्षद रहिन तेमन कुछू काम नि करे रहे।चुनाव के लकठियाय म कतको झन अपन-अपन दावेदारी करे बर धर लिन।चुनाव के बेरा म कतको शिक्षित, मिलनसार शुभचिंतक, सुख-दुख के संगवारी, बुधियार तको मन बिल भितरी ले बहिराय के आरो देखे म मिल जाथे।

                महिला सीट रहे के खातिर उहीच वार्ड के एकझन जजमान पिलउ ह एकदिन पंडित जी करा जाके कहिथे..... ' हमर वार्ड क्रमांक 20 म कुछू विकास कारज नि होवत हे महराज '!एकठन गोठ कहत हौं महराज नराज झन होइहा। ' ले गोठिया न पिलउ का बात आय तेन ल '....महराज कहिस!नराज नि होइहा त कहत हौं....थोरिक डरावत पिलउ कहिस! ' ले गोठिया न काय बात आय तेन ल ओमा का के नराज होये के बात हे भई  '.....महराज मुसकावत कहिस! ' हमर वार्ड म आज तक कोनों विकास के कारज नि होय ते पाय के आपमन के महराजिन ल पार्षद चुनाव म ए पइत प्रत्याशी बनातेन कहिके अंदाजे हावन ' महराज.....पिलउ सकपकावत कहिस ! ' अऊ ठउका ए वार्ड ह सामान्य महिला सीट होगे हावे '......बतावत कहिस।

             ' अरे ! भई हमन ल अपन पूजा-पाठ ले फुरसत नि मिले कहाँ के चुनई -फुनई एकर ले हमन दूरिहा रहिथन,राजनीति के दांव-पेच ल नि समझ सकन ग '......महराज अपन जजमान ल कहिस।' ए दारी सामान्य महीला सीट हावे तेकर ले कहत हंव थोरिक चेत करव महराज '......पिलउ फेरेच कहिस ! ' त तैं सुन पिलउ आज हमन दूनोझन सलाव हो जावत हन फेर बताहूंँ ' .....महराज कहिस!

                    संझा जुवार मंदिर के पूजा आरती भोग के बाद रतिहा अपन महराजिन सबितरी संग सलाव होय बर धर लिन।' पिलउ आय रहिस अऊ कहत हावे के ए दारी के पार्षद चुनाव म तोला उम्मीदवारी करे बर कहत हांवै तोर का बिचार हे ' बता.......महराज अपन गोसाईंन ल कहिस!' पिलउ आय रहिस त ओला काय बोले हौ '......सबितरी कहिस! ' घर म सलाव हो जावत हन तेकर पाछू बताहूंँ कहे हंव '........महराज कहिस!' पिलउ ठीक कहत हावे ए दारी हमरो भाग ल अजमा के देख लेथन मउका मिलत हे त ' .......सबितरी खुशी मन ले कहिस। " ठीक कहत हस तैं वइसे ए वार्ड क्रमांक 20 म हमर जजमान घलो जादा हावें '.....महराज कहिस!

                दूसरावन दिन पिलउ फेर आइस,' का सलाव होय हौ महराज '...... पैलगी करत पिलउ पूछिस!बइठ पिलउ.....कुर्सी कोती इशारा करत महराज कहिस। ' देख पिलउ हमन चुनाव ल जानन नहीं पूजा-पाठ के करइया तो आन '..... महराज कहिस!'आप मन तियार भर हो जावौ बाकी कुछू करे बर नि लागय हमन सब देख लेबो '......पिलउ कहिस! ' देख अइसनहा हे त महराजिन ल तियार करत हौं '......महराज कहे लागिस!' फेर पाछू कोनों प्रकार के धोखा नि होना चाही ' .....पिलउ ल समझावत कहिस।' ठीक हे महराज चिंता करे के बात नि हे '....पंदोलत पिलउ कहिस। ' एमा धोखा के बातेच नि हे '।

               दूसरावन दिन वार्ड के मन सबो जुरमिल के पार्षद बर फारम भरे कलेक्टर आफिस के निर्धारित ठउर म महराज अऊ ओकर गोसाईंन सबितरी संग जाके भर के आगिन।उहीच वार्ड ले केकती घलो फारम भरे रहिस।केकती घलो आकब करे म कम नि रहिस अपन वार्ड के जबर कमइलिन,मिलनसार अऊ बने  गोटकारिन घलो रहय।जेन दिन फारम के स्कूटनी होइस तेमा केकती के फारम म कुछ कमी पाय गिस ते पाय के फारम रिजेक्ट हो गिस अऊ महराजिन सबितरी निर्विरोध चुनाव जीत गिस।सबोझन महराज अऊ महराजिन ल बधाई देवत रहिन।चुनाव जीते के बाद कोनों किसिम के देखावा जादा नि करिन।

               महराजिन के चुनाव जीते के पाछू वार्ड म विकास के काम दिखे लागिस।नाली बजबजावत रहे तेन साफ होय लागिस,सड़क खंचवा खनाय रहिस तेन सिरमिट के नांवा सड़क बनगे,पीये के पानी ठीक से नल म नि आवत रहिस ओहू समे म मिले धर लिस।गली म बिजली घलो लग गे जेकर ले रतिहा आय-जाए म कोनों किसीम के डर-भय नि रहे।सबो के राशन कारड घलो बनगे।वृद्धा, विधवा, समाजिक सुरक्षा पेंशन लाईक रहिन तेमन ल मिले लागिस।कतको झन ल प्रधानमंत्री आवास घलो देवाइस वार्ड के सबो मनखे महराजिन सबितरी के कारज ल सहरावत खुश रहिन।

            अइसने करत पं. सिरीधर अऊ महराजिन के मान सम्मान अऊ बाढ़त गिस।बढ़िया कारज करंय ते पाय के हर बार चुनाव म उहीच मन निर्विरोध चुनाव जीत जावत रहिन।लगातार चार पंचवर्षीय तक उहीच वार्ड ले कभू महराज पार्षद बने त कभू महराजिन।धीरे-धीरे पद -प्रतिष्ठा पूरा शहर म फइल गे।पं. सिरधर मन म सोचत रहिस के ' ए पइत के चुनाव म महापौर के फारम भरबेच करहूँ '।महराज के मन म  "*लोभ के पीकी फुटे* " धर लिस।महापौर के सपना देखत रहय।

             महापौर बने के सपना ल सिरजाय बर पं. सिरीधर तियारी करे लागिस।तिहार-बार लकठियाय त बड़का-बड़का फ्लेक्स चउंक-चौराहा म टंगवाबेच करे।घाम के दिन जघा-जघा शरबत पानी पियावय,जड़कल्ला म कम्मल बांटे, तीजा म माई लोगन मन के सम्मेलन करवा के लुगरा बांटे, राखी तिहार म घलो लुगरा अऊ मिठई बंटवाबेच करे।डाक्टर, वकिल,साहित्यकार, लोक कलाकार सबो मन के मंदिर म ओसरी-पारी सम्मेलन करवाए सबो ल नरियल अऊ साल भेंट करत जावे।सबो समाज के मुखिया मन के घलो सम्मेलन करवाईस।पं.सिरधर महापौर बने के अपन जम्मो ताकत ल झोंक दिस।जघा-जघा सोर घलो होवत रहिस के ' ए पइत पं. सिरीधर महापौर बन जाही अइसे लागत हावे '।

                चुनाव लकठियावत गिस एती पं.सिरीधर के तियारी घलो बाढ़त गिस।शहर के सबो वार्ड म पं.सिरीधर के गोठबात होवय जेमा कहंय के ए ' पइत महराज महापौर बनबेच करही '।चुनाव आयोग डहर ले चुनाव के तियारी होय लागिस।मतदाता सूची तियार होइस अऊ ओकर प्रकाशन होगिस।महापौर पद के आरक्षण करे के दिन राज्य निर्वाचन आयोग डहर ले निर्धारित होइस।एती महराज पहिली ले टी.बी. ल समाचार सुनहूं कहिके चालू करके बइठे रहिस।

               महराज जी पहिली *आज तक* समाचार चेनल लगाइस, त ओमा विज्ञापन आवत रहिस।विज्ञापन घलो जबर लंबा तक चलत रहय,असकटा के रिमोट ल दबा के *रिपब्लिक भारत* समाचार लगाइस ओमा अर्नब गोस्वामी अऊ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संग प्रयाग महाकुम्भ के गोठबात होवत रहय,फेर तुरतेच आई बी सी 24 लगाईस ओमा ठीक समाचार बोलइया समाचार बोले के शुरू करत रहय।'रायपुर, बिलासपुर,दुरुग रायगढ़,सरगुजा अऊ बस्तर कोती के आरक्षण ल बतावत गिस ' महराज कान ल बने टेंड़ के सुनत रहय,जइसे कोरबा के नांव लेवत रहिस तइसने... लाईट गोल होगे।भइगे महराज तो लाईन वाला मन ल भंसेड़े के शुरु कर दिस।इहीच बेरा रहिस लाइट गोल करे बर....मने मन बड़बड़ावत रहय।

               ' आज महराज ल नींद नि आवत रहय '।सुकवा उवे के पहिली ले जाग गे रहिस।पंगपंगाती भिनसरहा होईस तंह ले महराज जी असनान करके पूजा-पाठ ल जल्दी कर डारिस ,पेपर म समाचार पढ़े बर पेपर बंटोइया ल अगोरत रहय।पेपर बंटोइया घलो आने दिन कस जल्दी नि आइस थोरिक अबेर होगिस त पेपर बंटोइया ऊपर भड़कत अऊ खिसियावत रहय,तइसनहे पेपर बंटोइया आइस।झटकून पेपर ल देखे धर लिस।पहिली पेज के ऊपर म बड़का हेडिंग म लिखाय रहे छत्तीसगढ़ के सबो "*नगर निगम,नगरपालिका अऊ नगर पंचायत के आरक्षण सूची* "!ऊपर ले पढ़त उतरत गिस कोरबा करा आइस त कोरबा के आघू म " अनुसूचित जनजाति महिला " लिखाय रहे।महराज ल विश्वास नि होत रहिस अपन चश्मा ल फेर बने पोंछ के देखिस।कोरबा महापौर के पद अनुसूचित जनजाति महिला रहिस।

               आरक्षण सूची ल देख के पं.सिरधर ' अकबका ' गिस।ओकर " *चेहरा के चमक*" उड़िया गिस।जाड़ म घलो पसीना ओगर गे।ओकर मुँहरन देखे के लइक होगे।महापौर बने के "*सपना म पानी फिर*" गिस।महापौर बने बर एतका जादा मिहनत करे रहिस तेन सबो ह "*बाढ़े पूरा* " म बोहागे।महापौर के सपना "*ताश के घर* " कस भरभरा के गिर गिस।पं.सिरीधर के देखे "*सपना ह पांखी* " लगाके बंड़ोरा के संगे-संग अगास कोती उड़िया गिस।एकरे सेती कहे गे हावे कोनों जिनीस म जादा " *चिभीक अऊ लगाव* " नइ रखना चाही।

✍️ *डोरेलाल कैवर्त " हरसिंगार "*

          *तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)*

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बीस रूपिया के झूठ* (छत्तीसगढ़ी कहानी)

 # एक ठिन मध्यमवर्गीय परिवार के व्यथा-कथा #


     *बीस रूपिया के झूठ* (छत्तीसगढ़ी कहानी)


                           -डाॅ विनोद कुमार वर्मा 


                             ( 1 )


             ' भाई तोला एक खुशखबरी सुनावत हौं! ' मोबाईल मा मनीष के आवाज ला सुनके सुमित बड़ खुश हो गे। 

           ' का बात हे भाई! बड़ दिन बाद फोन मा तोर आवाज सुने ला मिलत हे। का खुशखबरी हे? '

          ' भाई मोर सुकुमा ले बिलासपुर ट्रांसफर हो गे हे। '

        ' अरे वाह, मैं तो समझत रहेंव कि तैं उहें मर-खप जाबे! नक्सली मन के बड़ जोर हे तुँहर इहाँ? '

.     ' नहीं, कुछु जोर नि हे नक्सली मन के। ओमन आम लोगन मन ला कुछु नइ करें।  ओमन के झगड़ा पुलिस अउ मुखबिरी करने वाला मन सो हे! अउ जेन बड़े ठेकेदार मन ओमन ला जबरिया उगाही नइ देवँय ओमन सो झगरा-लड़ाई करथें। बाकी सब ठीक हे। '

       '  अपन ट्रांसफर कइसे कराये भाई? बस्तर क्षेत्र तो अगम दरहा हे, उहाँ ले निकलना बड़ मुश्किल काम हे! '

     ' का बात बताओं भाई, तीन बछर ले लगे रहेंव तब ले-दे के ये साल ट्रांसफर होइस हे। पुरा किस्सा बिलासपुर आये के बाद सुनाहूँ! बड़ पापड़ बेले ला परिस। ..... भाई एक ठिन किराया के मकान ढूँढ दे- वन बीएचके या फेर टू बीएचके। तीन हजार रूपिया मंथली तक चल जाही। ओकर ले जादा देय के मोर कूबत नइ हे। '

.          ' टू बीएचके खाली हे हमरे मोहल्ला मा। मोर पहचान वाला हे, सस्ता मिल जाही! मैं आजे बात कर लेवत हौं। तुमन कब तक आवत हव ? '

         ' जुलाई  पहिला हप्ता मा आ जाबो। '

        ' ठीक हे, तैं अपन बोरिया-बिस्तर ला बाँध। एती ला मैं देखत हौं। '


.                            ( 2 )


                 मनीष उइके अउ  सुमित साहू बचपन के खाँटी मितान रहिन। स्कूली पढ़ाई के बाद दुनों सीएमडी कालेज के होस्टल मा एके संग रहिके गणित विषय मा ग्रेजुयेशन अउ फेर कम्प्यूटर के डिप्लोमा कोर्स पूरा करिन। साल-दू-साल के भीतर प्रतियोगी परीक्षा देहे के बाद क्लर्क के पद मा मनीष के नौकरी सुकुमा के पंचायत आफिस मा  अउ सुमित के नौकरी बाल विकास विभाग बिलासपुर मा लग गे। दुनों मितान के पाछू 12 साल ले कोई भेंट-मुलाकात नि होय रहिस फेर फोन मा कभू-कभू गोठ-बात होवत रहिस। ये बीच दुनों संगी के बर-बिहाव अउ लोग-लइका घलो होगे। दुनों अपन-अपन परिवार के संग राजी-खुशी रहिन अउ अइसने दिन बीतत-बीतत 12 साल गुजर गे।

          अब बिलासपुर मा दुनों मितान के सुख-दुख मा साथ देवत दिन ठीके-ठाक गुजरत रहिस। एक दिन सुमित कमीज खरीदे बर मनीष के संग मोटर साइकिल मा बाजार जावत रहिस। त मनीष पुछिस- ' भाई, तोर कमीज बड़ सुग्घर दिखत हे। एला कहाँ ले खरीदे रहेव? '

        ' अरे झन पूछ भाई, मोर पिछले साल के बर्थ डे मा तोर भाभी एला सरप्राइज गिफ्ट देहे रहिस। ब्राँडेड कमीज हे, 1200 रूपिया के! '

       एकर बाद दुनों एक ठिन कपड़ा दुकान मा कमीज देखे लगिन। तभे दुकानदार पुछिस- भाई साहब, ये कमीज ला कहाँ ले खरीदे हौ? ब्राँडेड लगत हे! '

       ' हाँ, ब्राँडेड कमीज हे, पाछू साल 1200 रूपिया मा खरीदे रहेंव। '

      थोरकुन देर बाद ठीक ओइसनेच्च कमीज दुकानदार भीतर ले ला के दिखावत कहिस- ' भाई साहब, ये कमीज ला मैं सात सौ रूपिया मा बेंचत हौं! कलर भर के फरक हे, ले जावव! .....  साहब आपमन फालतू ब्राँडेड के चक्कर मा पड़े रहिथा। ओमन नावा लेबल लगा के दुगुना कीमत वसूल लेथें ! '

       वोही कमीज ला खरीदे के बाद दुनों सुमीत के घर मा चाय पीये बर रूक गीन। सुमित अपन घरवाली ला कहिथे- ' देख तो, ओइसनेच्च कमीज खरीद के लाने हौ॔। '

         ' कतका मा मिलिस? '

      ' अरे, एक सौ रूपिया सस्ता मिलिस। 1100 रूपिया मा खरीदे हँव! '

     ' हाँ हाँ ठीक हे! ब्राँडेड दुकान म कुछ मंहगा मिलथे ना!'

      मनीष आश्चर्य से अपन मितान के चेहरा ला देखत रहिगे!  ...... कतका सफेद झूठ भाभीजी ला आज बोलिस हे! 

    बाहर निकले के बाद मनीष अपन मितान ले बोलिस- ' झूठ बोले के का जरूरत रहिस भाई! '

    ' एला अभी नि समझाय सकौं भाई। सही बखत म कहूँ त समझ पइबे। '


.                           ( 3 )


            एक दिन शनिच्चर के बिहनिया 10 बजे सुमित अपन मितान के घर पहुँचिस। काल बेल दबाय नि पाय रहिस कि भीतर ले भाभीजी के तल्ख आवाज सुनाई परिस- ' का जरूरत रहिस कि 40 रूपिया पाव मा तिंवरा खरीदे के? अतका मा तो दू किलो पताल आ जातिस! तिंवरा साग बने मिठाथे का कहि पारेंव 40 रूपिया पाव मा खरीद के ले आया!  20 रूपिया पाव मा मिलतिस त कोनो बात नि रहिस! अतका मंहगी साग कोनो खाथें का? मैं एक-एक पैसा बचा के घर चलाथौं अउ तूँ एके पँइत सब ला फूँक देथव ! ' - भाभीजी के गुस्सा सप्तम मा रहिस। मनीष सफाई देवत रहिस फेर भाभीजी ओला सुने बर बिलकुल भी तियार नि रहिस!

        सुमित काल बेल ला दबाईस त भाभीजी दरवाजा खोले आइस। भाभीजी के हाव-भाव अउ चेहरा मा अभी घलो गुस्सा छलकत रहय अउ आँखी मा आँसू। घर के भीतर जाय के बाद सुमित बोलिस- भाभीजी ये 20 रूपिया ला धरव। सब्जी वाली 40 रूपिया के आधा किलो तिंवरा बेचत रहिस अउ मनीष एक पाव खरीद के 40 रूपिया दे के आ गे। ओ तो अच्छा होइस कि सब्जी वाली हमन दुनों ला पहिचानथे त मोला 20 रूपिया वापिस करिस त वोही ला पहुँचाय आय हौं! ..... अच्छा भाभीजी लाल चाय पियावव। तुँहर बीस रूपिया बचा देय हवँ  आज! '

      भाभीजी के चेहरा म मुस्कुराहट आ गे! एती मनीष अपन मितान के चेहरा ला अबक हो के ताके लगिस। सुमित के झूठ हा कालीमाई कस प्रचण्ड प्रकोप ले आज मनीष के रक्षा कर दीस!


                            ( 4 )


          लाल चाय पिये के बाद दुनों मितान घर ले बाहर निकल के घुमत-घुमत गाँधी गार्डन के बेंच मा आ के बइठ गीन। एही बेरा मनीष बोलिस- ' भाई तैं झूठ काबर बोले अउ 20 रूपिया लौटाये? '

       सुमित कहिस- ' भाई परिवार ला चलाय बर कलह-क्लेश अउ शाँति के बीच संतुलन बनाय बर परथे। तैं लाल चाय पीथस अउ महूँ पीथौं काबर कि खरीदे दूध ला लइका मन पी सकें। कालेज मा तो हमन दूध के चाय पीयत रहेंन न! सही बात हे कि निही? '

        ' तोर बात तो सही हे भाई। नानकुन नौकरी के भरोसा मा परिवार चलाना बहुत मुश्किल हे।  लइका मन के पढ़ाई-लिखाई,  देखभाल, परिवार के भरन-पोषण के खर्चा उठा पाना ये मंहगाई के जमाना मा अलकर कठिन हो गे हे। हमन सारा जीवन नौकरी करके लोग-लइका मन के परवरिश करे के बाद छोटकुन घर ला खरीद पाबो त बहुते बड़का बात होही। कार खरीदना तो हमन के सपना हो गे हे! '

       ' देख भाई, ये सब तो जीवन म चलतेच रइही। बड़े नौकरी पातेन त बात अलग रहितिस। ...... मैं आज 20 रूपिया के झूठ बोलेंव त तुमन के आपस के लड़ाई बन्द हो गे अउ भाभीजी के चेहरा मा खुशी आगे। तिंवरा ला बीस रूपिया पाव मा खरीदे हौं कहिके झूठ बोल देते त तोर का बिगड़ जातिस? का तोर धरम भ्रष्ट हो जातिस ? ..... उल्टा भाभीजी खुश हो जातिन कि सस्ता मा तिंवरा खरीद के लाने हस। तोर झूठ या सच बोले ले तोर घर के आर्थिक स्थिति मा कोई बदलाव नि हो जातिस। घर मा कलह-क्लेश होना ठीक बात नोहे भाई! कतका दिन के जिनगानी हे! दाल मा नून के बरोबर झूठ तो बोले जा सकत हे। द्वापर जुग मा युधिष्ठिर कस न्यायवादी घलो एक बार आधा सच अउ आधा झूठ बोले रहिस! .....  एमा भाभीजी के घलो गलती नि हे भाई, ओमन एक -एक पैसा बचा के अउ सहेज के रखथें। अलकरहा संकट के बेरा मा तो ओही हा काम आथे! '

      ' फेर ओ दिन भाभीजी ला कमीज के रेट ला जादा काबर बताय तैं ? मोला समझा तो। '

      ' देख मनीष, मैं सही रेट ला बता देतेंव त तोर भाभी पहिली तो खुश होतिस। फेर जादा कीमत मा मोर शर्ट ला ब्राँडेड दुकान ले खरीदे के पछतावा वोला कई महीना तक घोरतिस! .....  हमन तो नुकसान ला सहि सकत हन मनीष, काबर कि नौकरी ले दू पैसा कमाके लावत हन, फेर पाँच सौ रूपिया के नुकसान गृहणी मन बर बहुत बड़े होथे, जेमन घर-गृहस्थी ला तो पैसा बचा-बचा के सुचारू रूप ले चलावतेच हें मगर पैसा बर हमर उपर आश्रित हें! पैसा के नुकसान ला सोच के ओमन या तो चिड़चिड़ा हो जाथें या डिप्रेशन मा आ जाथें! '

       मनीष ला आज समझ मा आइस कि सच-झूठ तो सापेक्षिक होथे, ओकर जादा महत्व नि हे। महत्व ए बात के हे कि घर मा शाँति के पलड़ा भारी रहना चाही। गिलास मा आधा पानी भरे हे- एहा सकारात्मक सोच हे। गिलास हा आधा खाली हे- एहा नकारात्मक सोच हे। हालाकि दुनों बात एकेच हे, पानी के मात्रा मा कोई बदलाव नि होवत हे।

        ' ठीक हे सुमित, भाई तोर बात ला मैं सबो दिन सुरता राखहूँ। '- मनीष के आँखी डबडबा गे। वइसे रोये वाला तो कोई बात रहिस निहीं फेर आँखी के का करी,ओहा तो अपन कन्ट्रोल मा नि रहे! ......  सही मायने मा जीवन के एक छोटकुन सूत्र हा आज मनीष के पकड़ मा आ गे जेकर ओला बहुतेच जरूरत रहिस। शायद वोहा अपन सच बोले अउ पैसा के तंगी के कारण रोज-रोज के घर के कलह-क्लेश ले हलाकान रहिस, फेर आज ओकर चेहरा मा डर या खीझ के भावना लेशमात्र घलो नि रहिस बल्कि निश्चिंतता अउ संतोष के भाव झलकत रहिस। 

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Story written by-


       *डाॅ विनोद कुमार वर्मा* 

व्याकरणविद्,कहानीकार, समीक्षक 


मो- 98263 40331

कुंभ मेला के अवसर म लिखे गय कहानी।ये कथा के पाठ साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ी गुजराती सम्मेलन म करे गय रहिस* *गति-मुक्ति*

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         *कुंभ मेला के अवसर म लिखे गय कहानी।ये कथा के पाठ साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ी गुजराती सम्मेलन म करे गय रहिस*


              

                      *गति-मुक्ति*

               *(छत्तीसगढ़ी कहिनी)*



                 मानसाय अठ बोधराम दूनो बइठे- बदे मितान तो नई  फेर वोकर से काँही जादा मितानी ला मनइया जीव रहिन। फेर समय के संग म सब्बो जिनिस मा लोहा कस जंग लग जाथे। वोमन के संबंध हर अब पहिली कस खर नई ये ।अब अपन कमावत है, अपना खावत हे।हफ्ता-पंद्रह दिन मा कोंहो जगहा ठेसा- टकरा गइन त दू पद गोठ बात निकल गय नहीं त अब कोई मतलब नइये काकरो से कोनो ल...।

" अरे जावन दे न वोमन ला कुम्भ मेला देखे बर परयाग राज... । अरे भई, जेकर रहही तेहर नई जाही का। हमरो रथिस त

हमू मन जाथेन...।" मानसाय अपन परानी धरमिन ला किहिस जऊन हर अभीच्चे खोल कोती ला आके ये गोठ ला अपन गोसान

मानसाय ला बताय रहिस के उन्कर मितान मन कुँभ मेला चल दिन।


            धरमिन कुछु नई कही। बहिरी ला घर के अभी-अभी बहराय घर ला फेर बाहरे लागिस जाने- माने वोहर वो गोठ ला बाहर के

निकाले के कोसिस करत रहीस फेर वोला अब ले घलो भाँय-भाँय लागत रहिस, काबर के जाये को तो वोहू मन के मन रहिस। अउ

अइसन नइये के मानसाय हर कोहो लेढुवा- थेथवा ये जेहर अपन कुटुम परिवार ल बोधराम कस प्रयाग के दरसन करा के नइ लाने सकिही। असल गोठ रहे... पूछ... पूछारी के। अतकी चलत रहेन अऊ चलत घलो हावन तव मितान अउ मितानिन कोंहो एको पद

कम से कम बात जीते बर घलो नइ कहिन के चला संग मा... कहि के। वोमन ये गोठ ला बरोबर जानत हे के संग मा जाय ले मानसाय

अऊ वोकर परिवार हर कभु काकरो बर बोझा नइ होवय । वोहर खुद आने के बोझा ला उठाये हे... तन, मन अऊ धन ले घलो ।


                   पहिली मानसाय घलो पूरा परिवार सहित कुंभ मेला देखे जाये के मन बना डारे रहीस...। बारा-बच्छर मा एक पईत तो होथे। अभी नइ जाय पाबे त अवइया आगु बारा बच्छर ले कोन जीयत हे के कोन

मरत है, का पता? फेर मितान बोधराम के परिवार के पहिली जवई ल सुनके वोकर मन हर थोरकुन खिन हो गये काबर के दुनो परिवार के का....पूरा गाँव भर के पंडा तो वोईच्च महराज आय अऊ बोधराम हर ही काबर गाँव के कोंहो भी प्रयाग राज जाही तेहर

वोकरेच्च डेरा मा जाके रहही।

" देखे... धरमिन.... देखे ! मैं हर गुनत रहें के काली वोमन के घर जाके कुंभ असनान करे जाय के सझ मढ़ाबो...। अऊ एती वोमन कहिन न बोलिन... अऊ उदुप ले निकल गईन।" मानसाय धरमिन ला साखी देवत कहिस। धरमिन घलो बाहिरी ला छोड़ के

वोकर तीर मा आगिस, अऊ कहिस... "संग मा जाये बर कहथिन तब फिर पा के ले जाय बर लागथिस नीही हमन ला। वोकरे सेथी

नइ कहिन होंही।"

मानसाय धरमिन के गोठ ला सुनिस तव हाँस भरिस वोहर कहिस कछु नहीं अऊ उठके वो जगहा ला कोठा मा आ गय। कोठा म बंधाय गाय-बइला मन मा एकठन आनंद आ के समा गय काबर के मानसाय हर गाय- गरू मन ल अब्बड़ मया करय। आजो भी कोठा मा जाके बारी-बारी ले वोहर गरूवा मन के घेंच ला समारे के सुरू कर देय रहिस। मानसाय हर ये गाय- गरू मन के मंझ म आके अपन रिस-पित्त ल भुला जावय। आज घलो इहाँ आके वोला बने लागत रहिस। ये

पोटरु बछवा हर तो हाथ ल चाँटत चाँटत चाबे  असन कर दे रहिस।



            बोधराम परिवार ला कुंभ मेला गय आज पाँचवा दिन ये। कोन जानी वोती का होवत हे तउन ल फेर आज इहाँ तो पोट्ठ अकरासी पानी गिरे है। अकरासी पानी माने बिन मउसम बरसात.. करा.. पानी.....

धुल  - धक्कड़... आँधी तूफान...। पानी अतेक गिरे हे के लागत है हफ्ता भर... नंगराही चलही अवार मा। दून वर तो पंद्रहा दिन ठीक

रहही चल हमर बर येही कासी परयाग ये... धरमिन... कहत मानसाय अपन नाँगर बइला ला लेके खेत कोती निकल गय। मितान के

वेवहार अउ येती अकरासि पानी मा खेत ला जोते के लोभ दूनो के दूनो वोमन के कुंभ मेला जाये के जोम ला बिगाड़ दिन। धरमिन तो

पहिलीच ले ये मेला -ठेला के झेल-झमेला ला एको नइ भावे फेर कुंभ मेला हर नाचा-गाना वाले मेला तो होइस नीही येहर तो गति -मुक्ति के परब ये कहिके वह वोहर जाय बर तियार हो गय रहिस। चला बने हरू लागिस हे... धरमिन मने मन मा कहत हाँस परिस।



         हफ्ता भर नाँगर के चले ले ये दे सबो खेत हर जोता गय अवार। दून तो कभू भी गड़ही अभी तो धरती अतेक कुँवर हे के दू-चार दिन अवार जोत अउ हो सकत है।

"ये ! अब अउ नाँगर- बइला ले के कहाँ जावत हव!"धरमिन अबक्क होके अपन गोसान कोती ला देखे लागिस जउन हर आन दिन कस नाँगर अठ बईला ला निकालत रहिस।

"'मितान के कोसमाही डोली... उहें आबे कलेवा पानी पसिया लेके...।" मानसाय आँखी ला मिचकावत कहिस वोला ।

"कहे हावें वोहर तुँहला?"

"नइ कहें ये तब ला का होइस। काहीं मैं वोमन ले पाछू झन हो जाँव। गंगा असनान वर आज खास दिन आय। आज साही-असनान ये। वोमन बुड़की लेवत तोर-हमर बर जरूर नाँव धरके बुड़की लीही।मितान कहही... हे गंगा मइया... ये बुड़की हर मोर मितान बर ये मितानिन कहहीं.. ये बुड़की मोर मितानिन वर ये... ।अउ.. अउ... येती मैं... ?"


         धरमिन उदित नरायन सुरूज भगवान के अंजोर ले दप-दप करत अपने गुंसान के चेहरा ल देखिस फेर मुचकावत कहिस- "

चला अगुवावा मैं कलेवा घर के आतेच्च हों।"



*रामनाथ साहू*


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लघुकथा) जाँच

 (लघुकथा)


जाँच

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अपन पड़ोस के ग्राहक मंगलू ला समान देके महेश कहिस--भाई थोकुन मदद कर।घर जाके दादी ला बता देबे के दू झिन सगा आये हें जे मन दुकान मा बइठे हें।चाय नाश्ता बना देही।मैं हा ये दे ग्राहक मन ला निपटाके दस मिनट मा सगा मन संग घर आवत हँव।

मंगलू हा हव कहिच अउ जाके खबर पहुँचा दिच।

महेश के छोटे से जनरल समान के दुकान बनेच चलय। माता-पिता के एक ठो एक्सीडेंट मा पाछू बछर मौत होये के पाछू पढ़ाई बीच मा छोड़ के अपने दुकान मा बइठय।

 ग्राहक मन के भींड़ लगेच राहय तभो ले दुकान ला बंद करके घर जाना  परिच काबर के वो लड़की निर्मला हा अपन भाई संग आये राहय जेकर संग वोकर बिहाव के बात चलत राहय।

 घर पहु्ँच के सगा मन ला बँरवट मा बइठार के महेश हा पानी ला के दिच।दादी हा पोहा के नाश्ता परोसत पूछिस-- कतका बेर के आये हव बेटी।अउ सब बने बने।

हाँ दादी सब बने बने हे। अभी आधा घंटा पहिली मैं अउ भइया आये हन--निर्मला कहिस।

चाय नाश्ता के पाछू महेश हा वोमन ला अपन घर ला घुमा -घुमाके कमरा, बाथरूम अउ किचन सब देखाइच।

तहाँ ले वोमन घर लहुटे बर दादी माँ के पाँव परके इजाजत माँगिन।

दादी माँ हा आशिर्वाद देवत कहिस-- सदा सुखी राह बेटी।बने करेच शादी के पहिली तैं खुदे आके जाँच करलेच--पाछू के गुला झाँझरी अच्छा नइ होवय।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़