Sunday, 16 April 2023

पहाती के पाॅंव महेंद्र बघेल

 पहाती के पाॅंव 

                महेंद्र बघेल


दिनभर के भाग-दौड़ अउ हाय-हफर ले अंतस म सकलाय टेंशन ह नवा-नवा समस्या ल लांच करत रहिथे। समस्या ह काकर कर अउ कते मेर नइ हे , सोचत- सोचत बैठे रहिबे ते समस्या ह जिनगी के सबले बड़े समस्या बन जथे। त का ये समस्या ल अपन मूड़ी म थोड़े चढ़ा डरन।मार्निंग वॉकिंग वाले दीदी-भैया मन ला देखबे तब अइसे लगथे कि इनकर घर म कोई समस्या नहीं होही।

             मन म सवाल उठथे जब घर म कोई समस्या नइ हे तब ये मन सुते के बेर काबर घूमे के तपस्या करत होही। हो सकथे ईंकरो कोई भीतरौंधी समस्या होही जेकर समाधान बर मार्निंग वॉकिंग करत होही। बिना समस्या के बिहनिया ले अपन नींद ला खराब करे के भला कोन ह हिम्मत करही।

             जागरूक किसम के मनखे मन समस्या आय के पहिली समस्या ल खतम करे बर मार्निंग वॉकिंग करथें।कुछ नवछटहा मन मौसमी रहिथें जेन अकरस पानी गिरे कस नवम्बर दिसम्बर म वाकिंग करथे। बाकी लोरिक टाइप के मनखे मन पहाती के पाॅंव ल ओंटा-कोंटा म मड़ियाके मोबाइल म बिधुन हो जथें। अउ नीजि मामला म फुसुर-फुसुर करत खून अउटावत रहिथें।

         मॅंझोलन बिरादरी (मिडिल क्लास) वाले मन अपन शकल ल निखारे बर देश दुनिया के नकल करे म अपन अकल ल खपात रहिथें, स्लिम अउ फिट दिखे के बैरासू नशा ह पर्वतारोही कस तरवा के टिपुल म चढ़े रहिथें। पूछबे त एके जुवाब हम शुद्ध आबो-हवा पाय बर आक्सीजोन के शरण म जाथन, अपन आप ल तरोताजा पाथन,सुबे के हवा लाख रूपया के दवा...।जनो-मनो अपन घर म आक्सीजन के जगा नाइट्रोजन हाइड्रोजन ल नाक म पाइप फॅंसाके खींचत होही।

         आज ले कतको पहिली अक्टूबर महीना ले लेके दिसम्बर तक स्कूल म खेल प्रतियोगिता के आयोजन होवय। इही बुता ले पढ़ाई-लिखाई के संग शारीरिक शिक्षा के मूल्यांकन घलव हो जाय।तब पहातीच ले लइका मन दौड़े-भागे बर सड़क अउ मैदान म दिखाई देवॅंय।पता नहीं आजकल शिक्षा विभाग ह खेलकूद डहर थोरको भी ध्यान काबर नइ देवय। उनकर ध्यान ह स्मार्ट क्लास, हार्ड-साफ्ट काफी म तुरत-फुरत जानकारी मंगॅंई तक सीमित होगे हे।

   लइका मन पहाती ले एक दूसर के घर जा-जाके सुते ल जगावॅंय, जागे ल उठावॅंय अउ उठे ल दौडा़वॅंय। कुकरा बासे के बेरा म गाॅंव गली ह लइका मन के शोर म गमक जाय। मैराथन दौड़ बरोबर भदभिद- भदभिद भगई अउ चिल्ल-पों चिल्लई ले मार्निंग वाकिंग म निकले समस्याग्रस्त वाकिंगबाज (घुमइय्या) मन मुॅंहुॅं फार के देखते रहि जाॅंय। आजकल शिक्षा विभाग के खेल कलेन्डर ह बस कोठ (दीवाल) म शोभायमान हे बाकी खेल नीति के योजना ह विभाग डहर ले अघोषित तारा कुची म धंधाय धुर्रा खावत परे हे।ये उदासीन रवैया ले स्कूली लइका मन के पहाती दौड़-भाग म कोनो जादा अंतर तो नइ आय हे। फेर जड़काला म पहाती ले लइका मन के भदभिदई ह आजो चलत हे अउ चलते रही।

      सारी दुनिया कस महूॅं ह मार्च महीना म ठऊॅंका पहाती कुन चद्दर तानके मउहा जाड़ के आनंद लेत रहिथॅंव तभे लइका मन के  चिल्ल-पों के अवाज पाके झकनकाके उठ जाॅंव।मने ये लइका मन अनजाने म जपर्रा-उघर्रा मनखे मन ल जगाय के काम घलव करथें। 

           इही बहानाकभू-कभू महूॅं ह हाथ-गोड़ झटकारे बर मार्निंग वॉकिंग म चल देथॅंव, आजो कुकरा बासे के बेरा म जावत रहेंव। मने मन म सोचत रहेंव - हे पहाती के पाॅंव तोला कहाॅं लेके जाॅंव...।तभे मोर आगू म चार झन माइलोगिन (महिला) मन जावत दिखिन। ओ मन अतका आगू म रहिन कि पाछू म उनकर गोठ-बात ल मॅंय पूरा-पूरा सुन सकत रहेंव।

       गोठ-बात ल सुनके मॅंय अनुभो करेंव कि इनकर शरीर के समस्या ह हरू अउ घर-परिवार के समस्या ह जादा गरू हे।ओमे के एक झन मोठ-डाट माइलोगन ह हाथ लमा-लमा के चलित गोष्ठी के बोहनी करत अपन बहू के चरित्र चित्रण ल पूरा जोश खरोश ले प्रस्तुत करिस- " हमर घर के महारानी ह आठ बजे सुतके उठथे , न काम के न काज के, दुश्मन अनाज के...,  फेशन के दिवानी, सपना के करथे चानी-चानी।"

     पता नहीं कब ले चलागन चले आय हे कि सास-बहू के झगड़ा, रगड़म-रगड़ा। जेन भी वैचारिक शिविर म सास बहू के चित्रहार प्रस्तुत होय के संभावना रहिथे मतलब ओ आयोजन के सफल होय के फूल गारंटी हे। परिवार अउ समाज म एक आम धारणा बन गेहे कि सास मने घर के डिप्टी मनिज्जर ,हुकुम चलइय्या, बात-बात म बात के हंटर सोटइय्या, कोचक-कोचक के लड़इय्या..., सही का हरे ये अनुभवी च मन बता सकथे।

            फेर मनखे समाज के एक ठो अनुभो यहू हे कि सास ह परिवार के वो कद्दावर मनखे आय जेकर छत्रछाया म खुद बहू ह सास बने के विद्या ल बिन प्रशिक्षण के पा जथे। "सास भी कभी बहू थी" उक्ति ह ये बात ल सिद्ध घलव करथे। भला येमे के बहू ह चार सौ के सिलिंडर ल माॅंहगी बतावत सिलेंडर-सिलेंडर रैली निकाल के हल्ला मचाय फेर ग्यारा-बारा सौ के रेट ह ओला नइ जियानत हे, नइ बियापत हे।लगथे ये भूतपूर्व बहू ह बाबा जी के आशीर्वाद ले मौनासन म बइठ गेहे नइते सास प्रशिक्षण सेंटर म मूड़ी खुसेरके ऑंखी ततेरे के अभ्यास म लीन हे।

           जब बिहाके आथें तब शुरू-शुरू म बहू मन ससुराल म बिचारी बरोबर रहिथें, धीरे-धीरे विचारवान होवत सास के माॅंद म घुसपैठ जमाना शुरू कर देथें। सास ह मनिज्जर के गद्दी ल छोड़ना नइ चाहे अउ बहू ह तत्काल गद्दी ल हथिया लेना चाहथे।ये पद-पावर के लोभी पटकथा म सास-बहू के बीच मुॅंहुॅं चलाय ( गारी-बखाना) के देशी कला के बोहनी इहें ले होथे। समधी-समधिन अउ सगा-शील के आगू म बात साजे बर सास ह बहू ल बहुरानी कहि देथे फेर ओकर नजर म बहू के औकत बनिहार ले जादा नइ रहय।

     सास ल पूछके अउ बिन पूछे काम करे के अंतर ल सिरिफ बहू ह समझ सकथे।बिना पूछे राॅंधे-गढ़े म सास के नजर म साग ह भुॅंभवा जथे, नइते पातर-पनियर अउ नुनछूर-चुरचूर हो जथे। पूछ के राॅंधे म उहीच साग के सब्बो दोष ह छू-मंतर हो जथे।फेर दोनो दशा म जेवन-पानी के बेरा म नाक-मुॅंहुॅं ल मुरेरना सास के जन्म सिद्ध अधिकार माने जाथे।

       तभे तो सास ह मार्निंग वाकिंग के ताजा हवा म अपन बहू के प्रसंग सहित व्याख्या करे में मगन हे, उही सास ह बात ल लमावत कहिस --"काला बताॅंव ...अब्बड़ घटकार, चाय बनाबे तेला चुहक-चुहक के सुपुड़-सुपुड़ करत पीथे अउ बनाय बर गतर नइ चले..। टोस-बिस्कुट ल बोर-बोर के खाथे,लइका मन ले ओ पार हे बहिनी का गोठियाॅंव...।मोर किसमत ह खराब हे .., स्वर्ग ले सुंदर हमर घर म कइसन टेसनिन बहू सपड़ गेहे।दाऊ-गउॅंटिया के बेटी आय कहिके मांग डरिन, फकत अलाल... टिकान म फटफटी देहे त टूरा ह अहू अउ वहू दूनो फटबटी म मोहा गेहे..।बहू के गल्ती देखके घलव ओला नइ बरजे बहन..., एदे कर उठ कहि त उठही, बैठ कहि त बैठही..., रात दिन के घुमई-फिरई अउ टेस मरई म चेंदरा पर गेहे ..।

भइगे बहू ह जइसन नचावत हे तइसन बेटा ह नाचत हे...।"

     चलित गोष्ठी के बाकी तीनों सदस्य मन हुॅंकारू भर देवत रहिन, तभे ओमे के एक झन ह देखब म हिटहर सास के सिधवी बहू कस लगत रहिस। वहू हा मुॅंहुॅं बना-बनाके अपन सास के सात-पुरखा म पानी (जल) रितोना शुरू करिस..., चाहतिस ते एक लोटा म काम निपटा सकत रहिस...। --"लिखरी-लिखरी बात म फोकटइया टांच मारत रहिथे, घर के सम्हेरा म बैठे रही अउ सुआ कस बासत रही। सुत उठके भले मुॅंहुॅं नइ धोही फेर चहा बर ओड़ा ल डार दे रही। चहा म अदरक कम हो जही त ताना मारही...,तोर दाई-दाई मन तोला कुछु नी सिखोय हे का, चाय ल ढोल-ढोल ले बनाय हस।कभू तो महतारी बरोबर गोठिया लेतिस, बात-बात म टेचरही..। नवा नेवरनिन आय रहेंव त एक घाॅंव साग राॅंधे बर रमकलिया ल पउल के पानी म धो परेंव अउ बघारे बर कढ़ई म ओइरेंव ..।का बताॅंव सब गड़बड़ होगे, लिरबुट के मारे सबो साग ह लाटा कस लटियागे .., चम्मच म खोवॅंव त लच्च ले उप्पर अउ लच्च ले खाल्हे..। साग ल भूॅंजत-भूॅंजत पसीना-पसीना होगेंव फेर साग नी भुॅंजाइस। बियारी के बेरा म सास ह मोर रमकलिया रेसिपी के धज्जी उड़ावत लइन से मोर मइके परिवार के हैप्पी बर्थ-डे मनादिस।अइसनेच एक घाॅंव पुचपुचही ननॅंद ह घलव व्यंजन बनाय रहिस फेर ओला मुहुबाड़िन सास ह राम-रहिम नी बोलिस। अपन बेटी ल बेटी अउ हमला बहू.. त का एसने म बने दिन ल पहू..।"

       गोष्ठी के बाकी दू झन श्रोता मन ल बहू बने बहुत दिन होगे रहिस अउ सास बने बर बहुत दिन बाकी रहिस।तेकर सेती येमन वक्ता मन के राग झोंकत भावी सास बने के सिरिफ सपना संजोवत रहिन।

        ओ दिन के मार्निंग वाकिंग म सास-बहू के बीच के द्वविपक्षीय वार्ता ल सुने के  सौभाग्य प्राप्त होइस, मॅंय धन्य होगेंव।

         चलित विचार गोष्ठी म सास-बहू के पुटका-पुरायण ल सुनके मोला गृहस्थी म वाचिक साहित्य के अनमोल ज्ञान प्राप्त होइस। इही ज्ञान ल अउ पाय के लोभ म आगू दिन फेर उनकर पीछे पड़ गेंव। मॅंय उनकर सबो गोठ ल सुनत हॅंव ये बात के उनला एहसास होते भार ओमन अपन शिखर वार्ता के आयोजन ल तुरते उद्यापन तक पहुॅंचा दिन। का करॅंव ..पुच-पुच कूदत हाथ गोड़ ल छटियात,लंबा-लंबा फेकत मॅंय आगू बढ़ गेंव। 

   आगू म चार झन गोठकार मन देश अउ सरकार के बारे म बिधुन होके चिंतन मनन करत वाकिंग संग टाकिंग करत रहय। मॅंय कान टेड़ के उनकर पाछू म पड़ गेंव मने परिवार परायन ले निकलके राजनीतिक रसायन म अरझ गेंव। एक झन ह सरकार के नीत-नियम के बखान करे .., अउ बाकी तीनों मन मनमाने बखाने...।

           नरी म पींयर गमछा लटकाय एक झन लफरहा नेता टाइप के मनखे ह कहिस- " आज गाॅंव-गाॅंव अउ शहर-नगर म हालत बहुत खराब हे जे डहर देखबे दारू कोचिया मन अपन खीसा ल दुकान बनाके फेरीवाले कस बेचत हें,  पढ़े-लिखे युवा मन के पास काम नइहे। बेरोजगार मन के हालत ल का कहिबे येमन गाड़ी म एती-ओती भुर्र-भुर्र घूम-घूम के दिन पहावत हें,बाप कमावत हे बेटा मजा उड़ावत हे। भत्ता के नाम म सत्ता के सपना देखई ल छोड़ काम धंधा अउ रोजगार के दरकार हे,एती रोज-रोज के घोषणा के खाल्हे म उॅंघावत सरकार हे।दारू भट्टी बंद होना चाही, हमला या कोई भाई ल एकर जरवत पड़ही तब कहीं ले भी वेवस्था कर लेबो।" 

        ओकर बात ल फाॅंकत तीन रंगिया गमछा पहिरे मनखे ह अपन मुॅंहुॅं ल उघारिस - "का बात करथस दू करोड़ नौकरी देय के बात ल छोड़ी दे, सरकारी निकाय के हालत खस्ता हे, महंगाई म सिरिफ भाषण ह सस्ता हे।काला धन वाले मन लाल होगें,मोर देश के कइसन हाल होगे।" 

          अतका सुनना रहिस कि तीसर टोपी पहिरे लफरहा मनखे ह झाड़ूदार कस दूनो झन के गोठ के फलफलहा कचरा ल चुक्ता झाड़ दिस.., चिल्ला-चिल्ला के बाहरी के मुठिया ल गाड़ दिस। --" भाई हो देश में पढ़े लिखे मनखे के राज होना चाही, जगा-जगा स्कूल चाही सरकारी, नीयत म होवय ईमानदारी ..., हर मुहल्ला म मुहल्ला क्लिनिक खुलना चाही ये स्वास्थ्य बर सबले जादा जरूरी हे।"

            चौथइय्या ह सहीच के मनखे टाइप के मनखे लगिस,सुनके फकत हुॅंकारू देवइया नइ लगिस। तभे तो तीनों झन के डिंगई ल उही मेर रगड़ के रख दिस अउ कहिस - " जेन तीरस्ता के तुमन गोठ करत हव ये तीनों म एक झन नाग नाथ,दूसर ह साॅंप नाथ अउ तीसर आय टेटका..। आज खुद ल बचाना देश ल बचाय ले जादा कठिन हे, हमर आगू म सबले बड़े इही प्रश्न चिन्ह हे।"

      मार्निंग वाकिंग म ये जम्मों झन के टाकिंग ल सुनके लगिस येमन तो घर-दुवार, परिवार-समाज अउ देश-दुनिया बर ताजा जानकारी के खजाना आय। मने आम के आम अउ गुठली के दाम‌...।इहाॅं सुबे-सुबे घूमत-फिरत देश दुनिया के बारे म ज्ञान के खजाना ह फोकट म मिलतहे।अउ ओती ये पे चेनल वाले हथलमरा मन रात-दिन परोसी देश के आटा बंगाला के भाव ल सुना-सुना के हमर समस्या ल नजर अंदाज करे म बीजी हे।इही सोचत-सोचत आखिर म मॅंय मार्निंग वाकिंग के फायदा ल अंतस म गॅंठियायेंव अउ पुच्च-पुच्च कूदत, पहाती के पाॅंव ल झटकारत सुरू-खुरू अपन घर लहुटगेंव।


महेंद्र बघेल डोंगरगांव

कहानी: करजा पोखन लाल जायसवाल

 कहानी: करजा

पोखन लाल जायसवाल

                     १.

            मनखे के जिनगी चलत हे त चलत हे। जब तक साॅंसा के डोर लमे हे, जिनगी हे। ये डोर कब पूर जही? कोनो नइ जानय? कब काखर तन ह डोल जही, एकरो कोनो च ठिकाना नइ हे? बने-बने देखे अउ दिखे, तब तक स..बो बने-बने आय। एक छिन म का ले का नइ हो जथे। रद्दा बाट चलत हपटे ले घलव...जी छूट जथे। एक ठन बहाना भर तो चाही हंसा ल उड़ाय बर। रखइया उही अउ बचइया तो उही च ऊपर वाले आय। बाकी सब झन इहाॅं उही ऊपर वाले के हाथ के खेलौना ए। बजारू खेलौना कभू-कभू खेलते-खेलत नइ चले, बिगड़ जथे, वइसने च सुरेश संग होइस। साग-भाजी बिसाय बजार गे रहिस, लहुटत खानी ओकर जेवनी हाथ लरघे लगिस। हाथ के झोला छूटगे। सुरेश बजार ठउर म चक्कर खाके गिरगे। लोगन जुरियाय लगिन। बेहोश सुरेश के मुॅंह म पानी के छींटा मारे ले होश आइस। फेर ओकर मुॅंह ले निकलत आवाज कोनो ल समझ नि आवत हे। हकलाय ल धर लिस सुरेश ह। कोनो-कोनो कहे लगिन कि एला तो लकवा मार दे हे, तइसे लागत हे। एकर एकंगू कोती ह नइ चलत हे। मुॅंह घलव थोकिन टेड़गिया गे हे कहिनउ दिखत हे, हाथ ह झूलना सहीं झूले धर ले हे। चिन्हार मन तुरते अस्पताल लेगिन अउ ओकर घर म आरो करिन। डॉक्टर ह सुरेश के जाॅंच करिस अउ तुरते हायर सेंटर ले जाय के सुझाव दिस। अब तक ओकर गोसाइन अंजनी अस्पताल आगे रहिस। इहाॅं मरे-जिये बर दूनो-परानी रहिथे। दू झन लइका हें। दूनो लइका मन शहर म रहिथें। ओमन ल फोन म सुरेश के तबीयत डोले अउ ओला रायपुर लेगे के आरो दे दे गिस। अउ झप ले रायपुर बलाय गिस। एती ले सुरेश ल एम्बुलेंस म रायपुर ले जाय के जम्मो तियारी होगे रहिस, एम्बुलेंस गाड़ी म ओकर सुवारी अंजनी संग परोसी रामखेलावन घलव गिस। अंजनी बपुरी नारी-परानी भला अकेल्ला काय कर पातिस।

             सुरेश मन अपन दाई-ददा के चार लइका। सुरेश अउ रेवा दू भाई अउ दू बहिनी रहिन। दूनो भाई , भाई-बहिनी म सब ले बड़े अउ सब ले छोटे ए। रेवा गुरुजी हावय। हाईस्कूल म पोस्टिंग हे। विज्ञान के लेक्चरर आय। दूनो बहिनी मन के बर बिहा होगे हे। अपन-अपन घर परिवार म बढ़िया खुश हें। सुरेश के मन पढ़ई-लिखई म नइ रहिस। दसवीं क्लास ल दू बछर म नइ निकाले सकिस। ददा के गुजरे के दू बछर पाछू महतारी घलव दुनिया ल छोड़ परलोक चल दीस। तब घर म जमीन के नाॅंव म तीन एकड़ रहिस। घर ह चार कुरिया के कच्चा मकान रहिस। फेर ददा के बीमारी म करजा ऊपर करजा चढ़गे रहिस। फेर ददा ल नइ बचा पाइन। दूधो गिस अउ दुहना घलव गिस। दाई के बहू हाथ के पानी पिए के सउॅंक म करजा सुरसा सहीं अउ बाढ़गे रहिस।

         अस्पताल के पहुॅंचत ले बड़े बेटा धरसीवां ले रायपुर हबर गे रहिस। छोटे बेटा ह धमतरी ले आवत हे। वहू ह नौकरी के चलत धमतरी म अपन परिवार सहित रहिथे। धरसीवां वाले ह प्राइवेट पावर प्लांट म नौकरी म हाबे। उही ह परोसी रामखेलावन संग भर्ती कराय के पहिली के जम्मो भाग-दौड़ करिस। जरूरी जाॅंच के होवत ले छोटे बेटा घलव पहुंचगे रहिस। ओकरे संगेसंग रेवा घलव हबरिस। रेवा ल बड़े भतीजा ह फोन म जानबा दे डारे रहिस हे‌। रिपोर्ट आइस ऊपर ले डॉक्टर बताइस कि सुरेश ल अभी हफ्ता भर अस्पताल म राखे ल परही। दवा ले ठीक होय के उमीद हे। डॉक्टर बतावत कहिस- "यदि तीन दिन में इनके स्वास्थ्य में इम्प्रूव नहीं दिखेगा तो ऑपरेशन करना पड़ेगा। फिलहाल ऑपरेशन करने जैसी कोई बात नहीं है। समय में पहुॅंचने और त्वरित इलाज मिलने से अब कोई डरने वाली बात नहीं है।"

                    २.

                दू दिन के गे ले सुरेश ल आई सी यू ले जनरल वार्ड म सिफ्ट कर दे गिस। ओकर तबीयत म बने सुधार होवत हे लगिस। मॅंझनिया के बेरा छोटे बेटा के मोबाइल म फोन आइस। दूसर कोती ले आवाज आइस- "और कितने दिन चिपके रहोगे, एक तुम ही नहीं हो, तुम्हारा बड़ा भाई भी तो है, करने दो उनको उनकी देखभाल। उसका भी बाप है।। उसे भी बेटे का फर्ज़ निभाने दो। वहाॅं डटे रहोगे तो हमारी ही जेब खाली होगी।"  दूसर कोती ले छोटे बेटा के घरवाली बोलत रहिस हे। जेकर मन म ससुर के तबीयत ले जादा पइसा बचाय के संसो रहिस। ओला इहू नइ मालूम रिहिस कि अभी अस्पताल म दूनो भाई हवय। ए बीच छोटे बेटा अपन गोसाइन ल चुप कराय के बहुते कोशिश करिस। फेर ओती ले अवई आवाज थोरको नइ थिरकिस। जना-मना कोनो रिकार्ड बजत हवय, जेन ल बंद करबे तभे बंद होथे कहिनउ। अभी तक छोटे बेटा के मोबाइल के स्पीकर ऑन रहिस हे, तेला ओहा बंद करिस। अभी तक छोटे बहू जेन भी कहिस ओला सुरेश घलव सुन डरिस। हैलो हैलो हैलो... काहत आवाज नइ आवत हे ...के बहाना करत छोटे बेटा दाई-ददा तिर ले दुरिहा गिस। महतारी घलव छोटे बहू के ए गोठ सुन डारतिस, फेर पानी के बाटल ल भरे बर चल दे रहिस हे। बपुरा सुरेश ह छोटे बहू के गोठ ल सुन के अपन गोसाइन अंजनी मेर नि कहि सकिस। कहितिस कइसे, लोकवा ह ओकर मुॅंह ल धर ले हे। ओकर भाखा ह नइ ओरखावय। फेर अंजनी ल देख मन के जम्मो पीरा सावन भादो के नरवा-नदिया के पूरा कस बोहाय लगिस। अंजनी समझिस कि बेटा मन के दौड़-धूप ल देखत रोवत हे। 

            छोटे बेटा वार्ड के बाहिर परछी म आइस अउ अपन गोसाइन ल चमकाय लगिस। "थोरको दम नइ धरस। मैं चुप करात हॅंव त चुप हो जते त का होतिस? सबो गोठ ल ददा ह सुन डरिस। का कहि ददा ह मोला?" 

       "बने च होइस, अइसन म अपन बड़े बेटा ल घलो खरचा करे बर कही। तिहीं च ह काबर खरचा करबे, ददा तो दूनो के ए का? थोकिन राग लमावत छोटे बहू अपन गोसइया के मति भरमावत कहिस। 

          "तोला तो बस अपनेच पइसा के संसो रहिथे। अइसने च तो बड़की घलव कहि सकथे का? ओमन बड़े भले ए, उॅंकर नौकरी ह प्राइवेट हरे। वेतन कमती हे। थोरिक सोच कइसे घर चलावत होही?" छोटे बेटा अपन घरवाली ल समझाय के  कोशिश करे लगिस।

           "ओकर ले हम ल का करना हे? ओकर घर चलाय के ठेका.. हमर नोहय। बॅंटवारा तो बराबर पाही का? त खरचा घलव बराबर करय न।"  ए दारी छोटे बहू के सुर ले अपन गोसइया बर रिस झलकत रहिस हे।

             सुन त ...अभी तक मोर बड़े भाई ह मोला एक आना खरचा करन नइ दे हे, सबो दवा-पानी उही च ह बिसाय हे। अब मोर पारी हे कि महू ....घरवाला के गोठ ल पूरे नइ रहिस अउ छोटे बहू बीच म कहे लगिस- "बड़े ए.. खरचा नइ करही त कइसे बनही। सरी दुनिया उही ल बद्दी दिही। उन ल बद्दी ले बचाय के धरम तुॅंहर ए, उॅंकर छोटे भाई जेन आव।"  ए दारी छोटे बहू अपन घरवाले ल धरम के पाठ पढ़ाय लगिस। 

          थोरिक बेर ले दूनो कोई चुप रहिन। छोटे बेटा समझ नि पावत हे कि वो का करय? इही बीच  ओती ले फेर आवाज आइस- "अपन लइका मन ल देख, उॅंकर मुॅंह म पैरा झन गोंज। तुरते लहुट आव अउ अपन ड्यूटी म जाव।" मया के रस ले पागे ब्लेकमेल करे लगिस। 

                     ३.

          बेरा आछत छोटे बेटा अपन दाई अउ भैया मेर कहिस कि आफिस कोती जरूरी काम आगे हे, मोला काली ड्यूटी म खच्चित हाजिर होय ल परही। सुरेश छोटे बेटा के बहाना ल समझ गिस, फेर करय का? अंतस् फाट गिस। बेड म परे-परे अपन छाती म पखरा रख यहू पीरा ल सहे लगिस। एक आना नइ लगाय हे अउ हाथ बाॅंधे लहुट गे। वो जान डरिस कि ए नौकरिहा बेटा ह मोर इलाज बर पइसा खरचा नि करना चाहत हे। जे कर नौकरी बर घर के एक एकड़ पुरखौती खेती ल बेच घूस दे रेहेंव। सोचे रेहेंव लइका ह मोर धन आय। आज मोर वो खेती रहितिस त मोर काम आतिस। ओला पुरखा मन के गोठ सुरता आवत रहिस, पूत सपूत त का धन संचय, पूत कपूत त का धन संचय। 

             सुरेश बाॅंचे खेती ल दूनो बेटा म बॅंटवारा कर दिस। बाॅंह भरोसा रहिगे। अथक होय म दूनो बेटा के आसरा तो हे च। अंजनी बड़ चेताइस कि जम्मो जिनिस ल झन बाॅंट अपनों बर कुछ रख ले। बेरा-कुबेरा काम आही, फेर अंजनी के गोठ ल हवा म उड़ा दे रहिस छे बछर पहिली। बड़ गरब रहिस सुरेश ल अपन दूनो बेटा ऊपर। छोटे बेटा के बहाना बाजी ले बड़े बेटा ले भरोसा का करतिस। सुरेश ल अंजनी के एक-एक गोठ के सुरता आवत हे। नवा जमाना के नवा लइका ए, हिरक के नइ देखय दाई-ददा। अपन म मस्त हो जही। भुला जही कि एकर दम म ठाड़ होय हन। कहे लगही- जेन तें करे हस तेन तो सबो दाई-ददा करथें। दाई ददा के धरम आय। तैं सिरिफ अपन धरम निभाय हस कहिके दुत्कारहीं। अइसने तो केहे रहिस अंजनी ह। अंजनी ल देखत सुरेश ओकर जम्मो गोठ ल सुरता करत हे। अउ ऑंखी ले तर-तर ऑंसू ढरके लगिस। अंजनी अभियो इही समझिस कि छोटे बेटा के लहुटे के दुख म ओकर ऑंखी ले गंगा-जमुना बहे लगे हे।

                       ४.

              बड़े बेटा जेन अभी तक दवा पानी के बिल पटावत आय हे, ओकर हिम्मत घलव टूटे लगिस। जब बिहना पता चलिस कि ददा ल अधरतिहा सुते दसना म अटैक आ गिस अउ ओकर तबीयत अउ डोल गे। अपन फरज निभाय  म आगू रहिस। फेर जुच्छा हाथ करही त करही का? जतका पैसा रिहिस ओ तो उरके लगिस। प्राइवेट कंपनी म कमती वेतन के भरोसा चार परानी के परिवार के गाड़ी ल खींचत थोके-थोके सकेले जमा पइसा तीन लाख तो रिहिस फेर आठ दिन म जाॅंच, दवा दारू म पचास हजार बस बाॅंच गे रिहिस। अउ एती ओकर ददा सुरेश के तबीयत अउ बिगड़ गिस। संसो तो होबे करही। इही संसो म बूड़े बड़े बेटा अपन चाचा रेवा ल फोन करिस अउ कहिस- "चाचा ! ददा के तबीयत ह अउ बिगड़ गे हे। मोर करा अब पइसा बचे घलव नइ हे। जरूरत परे म आप पइसा जुगाड़हू। मैं इहाॅं कति ल गोहराहूॅं। आगू-पाछू मैं आप ल चुकता कर देहूॅं।" 

            दूसर कोती ले रेवा के आवाज आइस- "बेटा! तैं पइसा के संसो झन कर। मैं हॅंव अभी, सुरेश ह तोर बाप आय, त मोर भैया घलव आय। भैया ह दू बूॅंद लहू छोड़िस, त दाई ह मोला जन्म दिस हे। बाॅंटे भाई परोसी होगेन त का होगे? पहिली भाई तो ऑंव न सुरेश भैया के?" रेवा कका के अतका गोठ ल सुन के बड़े बेटा के मन के बेचैनी भागिस हे। 

               "आप थोरेचकन म बिकट घबरा जथव। बाबू जी ल कुछु नइ होवय, देखहू बाबू जी जल्दी बने हो जही।... मैं ह अपन भैया ले पइसा के गोठ करे हॅंव। थोर बहुत उहों ले जुगाड़ हो जही। जादा संसो झन करव। ... अटके म मोर गहना मन ल बेच लेबो। इही दिन म काम आथे गहना गुॅंठा मन।" बड़े बहू ह पीछू कोती खाॅंध म हाथ रखत कहिस। बड़े बेटा के टूटे मन के हिम्मत अउ बाढ़िस।

             रेवा ह ड्यूटी के बाद दिन बुड़तिहा अस्पताल हभर गिस। भतीजा ले हाल चाल पूछिस। जाॅंच रिपोर्ट आगे रहिस। ओला दिखावत बड़े बेटा के चेहरा म संतोष के भाव साफ दिखत रहिस। रिपोर्ट म घबराय के कोनो बात नइ रहिस। रेवा अपन पर्स ले एटीएम कार्ड निकाल के बड़े भतीजा ल दिस। पिन घलव बताइस। अउ कहिस जतका जरूरत परही निकाल लेबे। अउ कोनो मेर हाथ लमाय के बारी नइ आही। 

              रेवा ल निम्न पद ले उच्च पद म आय के जम्पिंग वाला एरियस दस लाख रूपिया ले आगर मिले रहिस। रेवा ल सुरता हावे ददा के ऑंखी मूंदे पाछू भैया के परसादे बारवीं पढ़ पाय रहिस। अउ शिक्षाकर्मी ३ के पद पाय रहिस। ओ बेरा पंद्रह हजार के घूस नइ देवाय रहितिस त नौकरी नइ लगे रहितिस। आज रेवा बड़ खुश हे कि ओकर एरियस के पइसा ह बने अड़चन के बेरा म मिले हे। 

           अंजनी ह कका-भतीजा के बीच होय गोठ ल सुन सुरेश ल बड़ मगन हो बतावत हे कि रेवा ह बिपत के घड़ी म हमर बर सउॅंहत भगवान सहीं कइसे खड़े हावय। सरी गोठ ल सुन‌ सुरेश के ऑंखी डबडबागे। फेर ए दारी सुरेश के ऑंखी के ऑंसू खुशी के रहिस। सुरेश ल लागे लगिस कि मोर बेटा के हियाव करइया मोर भाई हे। संसो बादर छट गे।

                 रेवा ल सुरता हे के ओकर मना करे के बावजूद पंद्रह हजार दे के फइसला सुरेश के रहिस। जेन मन पइसा नइ देइन, उॅंकर पोस्टिंग नइ होइस। पद खाली रहिगे फेर भर्ती नइ होइस। वो समे घर म कइसन तंगी के दिन रहिस। रेवा ल सब सुरता आवत हे, ददा के सरग सिधारे के पाछू ओकर इलाज पानी म खरचा ले चढ़े करजा उतरे नइ रहिस अउ अपन दूनो बाॅंह भरोसा सुरेश भैया कइसे पंद्रह हजार के नवा करजा अपन मुड़ म लाद ले रहिस हे। आज रेवा अपन भैया के उही करजा ल उतारे के कोशिश म हे। जेन करजा के नेंव ले आज वोहर अपन पाॅंव म खड़े हे।

              

पोखन लाल जायसवाल

पलारी (पठारीडीह)

जिला- बलौदाबाजार भाटापारा छग

पल्लवन- खेती अपन सेती नइ ते नदियां के रेती


 

पल्लवन- खेती अपन सेती नइ ते नदियां के रेती 


कोनो भी काम ला बने चेत लगाके करना चाही . येकर ले कारज मा जरूर सफलता मिलथे. सही समय मा कोनो काम ला नइ करे ले समय अउ धन हा व्यर्थ चले जाथे. येहा हमर जिनगी के सबो क्षेत्र मा लागू होथे. चाहे शिक्षा के क्षेत्र मा हो, व्यापार कोति हो, खेलकूद, संगीत क्षेत्र,खेती- किसानी या आने काम. सबो काम मा सफल होय बर अब्बड़ मिहनत करे ला लगथे.‌ खूब पसीना बोहाय ला पड़थे तब कहीं जाके मिहनत के फल हा मिलथे.


    हमर देश हा एक कोति ऋषि संस्कृति बर प्रसिद्ध हे ता दूसर कोति इहां के कृषि संस्कृति के गजब सोर हे. किसान ला धरती के भगवान कहे जाथे. किसान अपन मिहनत ले फसल ऊपजाके  अपन घर परिवार ला चलाथे ता दुनियां ला  घलो अन्न उपलब्ध कराथे.  खेती -किसानी मा अब्बड़ मिहनत करे ला पड़थे. येमा कोढ़ियई करे ले खेती सही ढंग ले नइ हो पाय. धान बुवाई  ले कोठी मा धान धरे तक या सोसाइटी/ मंडी तक ले जाय या नंगत श्रम करे ला पड़थे. थोरकुन लापरवाही करे ले फसल के बर्बाद होय

के डर समाय रहिथे. खेती- किसानी मा

दिन मा दू बेरा घूम के आना जरूरी हो जाथे. येखर ले मुंही के देखरेख, कीरा - मकोरा ले बचाव , मवेशी ले फसल के बचाव,खेत के सुरक्षा होत रहिथे. जादा पानी गिर दिस ता फसल के नुकसान होय के डर अउ मुंही फूटगे ता पौधा के मरे के डर बने रहिथे.  फसल कांटे के लाइक होगे ता सही समय मा लुवाई, भारा बंधइ,बियारा तक लाना,खरही गंजइ, पैर डलाई, कोड़ियाई,पैरा निकलाई, ओसाई, कोठी मा रखई या सोसाइटी तक डोहरई , फेर कांटा कराई ये सब काम ला सही बेरा मा करना चाही.नइ  ते समय,धन अउ फसल के नुकसान होथे.  


ये कहावत हा हमर जिनगी हर क्षेत्र मा लागू होथे. बने चेत लगाके मिहनत करे ले काम हा पूरा होथे. कोनो लक्ष्य बनाय हस तेमा सफलता मिलथे अउ बेमन या कोढ़ियई करे ले सब मिहनत बेकार हो जाथे. तेकर सेति कहे गे हावय - "खेती अपन सेती नइ ते नदियां के रेती".


                   ओमप्रकाश साहू" अंकुर"

              

               सुरगी, राजनांदगांव

Thursday, 13 April 2023

पल्लवन--बर न बिहाव,छट्ठी बर धान कुटाय

 पल्लवन--बर न बिहाव,छट्ठी बर धान कुटाय

------------------


कोनो भी मनखे ह अपन जिनगी के बिते समे म मिले अनभो ले सीख के अउ वर्तमान म चलत उतार-चढ़ाव के विचार करके भविष्य के सपना देखथे। 

  भविष्य के सपना देखना बुराई नोहय फेर कुछु न काँही ,रात-दिन उही सपने के उधेड़-बुन म डूबे रहना---वोकरे फिकर म परे रहना बुरा होथे। ककरो अइसन करे ले  वोकर तन अउ मन दूनो कमजोर होये ल धर लेथे।

   लोगन कहिथें के ऊँचा सपना देखना चाही फेर उहू ऊँचा सपना का काम के जेन ह बादर सहीं अमराबे नइ करही? भलुक मनखे ल तो अपन शक्ति अनुसार अइसे चीज के इच्छा पालना चाही जेन ह पूरा हो सकय।

    समाज म अइसन मनखे तको मिल जथें जेन मन बड़ लुकलुकहा होथें। जइसे के चार महिना पाछू घर-परिवार म मान ले कोनो छोटे से एक घंटा के पूजा पाठ करवाना हे जेकर जोखा एक -दू दिन पहिली अच्छा से करे जा सकथे तेकरो बर रोज-रोज ये करना हे-वो करना हे,ये समान नइये,वो समान नइये,ये लागही, वो लागही,कइसे होही, का होही--इही म बूड़े रहिथें।  पहिली-पहिली ले अइसे-अइसे मनगढंत बात करत रइथें  अउ अपन उर्जा ल जबरदस्ती खइता करत रहिथें जेकर वो समे कोनो जरुरते नइ राहय।अपन तो परेशान होबे करथे, दूसरो मन ल हलकान कर डरथें। उही बिचार ल घरिया--उही ल डसा----पिचकाट हो जथे।

      कभू-कभू तो मनखे अतेक दूर के बात ल सोच लेथे अउ ओइसने कारज करे ल धर लेथे जेला देख-सुन के अजरज के संग हाँसी लागे ल धर लेथे।अरे भई भविष्य के कोंख म का हे तेला भला कोन जाने सकही? कई झन तो मान ले अइसे होही त------मैं अभी ले ,पहिली ले अइसे कर लेथवँ----इही फिकर म दुबरावत रहिथें। मान ले के ये गणित ह जिनगी के गणित म हमेशा फिट होही अइसे जरूरी नइये।

    सोचे जाय के ---ककरो न तो मँगनी-जँचनी होये हे,न तो बिहाव होये हे अउ ये सोच के वोकर एक दिन बच्चा होही ,वोकर छट्ठी म सगा-सोदर,गाँव,परिवार मन के ल भोजन करवाये बर लागही कहिके मनमाड़े धान ल कुटवाये ल धर लिही त ये तो मूरखपना होही। अभी तो पता नइये के बिहावेच ह होही धन नहीं ते--छट्ठी छेवारी के तो बाते दूरिहा हे।

 तेकरे सेती सियान मन कहिथें बिना चिंता करे उचित समे म उचित काम करना चाही।जब के आमा तब के लबेदा ह ठीक होथे। पहिली ले कोहा मारना बेकार होथे।


चोवा राम वर्मा 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

पल्लवन डारा के चूके बेंदरा अउ आषाढ़ के चूके किसान


पल्लवन


    डारा के चूके बेंदरा अउ आषाढ़ के चूके किसान 


  कोनो भी काम ला सही समय मा करे ले बने होथे. येमा लापरवाही करे ले अब्बड़ नुकसान उठाय ला पड़थे. येहा जिनगी सबो क्षेत्र मा लागू होथे. पढ़इया लइका मन सही समय म मिहनत नइ कर पाय ता पढ़ई मा पछुवा जाथे. खेलकूद मा आगू बढ़ना हे ता सरलग पसीना बहाय ला पड़थे. नइ ते अपन लक्ष्य ले भटक जाथे. जइसे खेती -किसानी मा आषाढ़ के गजब महत्व हे. आषाढ़ मा धान बोये ले बने ढंग के फसल होथे. ये महीना मा धान नइ बोवा पाये ता फसल तइयार होय मा नंगत तकलीफ होथे. फसल कमजोरहा हो जाथे अउ साल भर अब्बड़ परेशानी ला झेले ला पड़थे. केहे  का मतलब ये हे कि एक किसान ला आषाढ़ मा ही धान बोवाई कर लेना चाही.येकर ले फसल बने होथे. अइसने  

बेंदरा जब रूख मा चढ़त बेरा डारा ला पकड़े ले चूक जाथे ता वोला चोट पहुंचे के डर बने रहिथे. सार बात ये हे कि कोनो भी काम ला सही बेरा मा करे ले काम हा सधथे अउ ढेरियाय ले नंगत नुकसान होथे. येहा जिनगी के सबो क्षेत्र मा लागू होथे.


            ओमप्रकाश साहू अंकुर

              सुरगी, राजनांदगांव

पल्लवन- मरे बिगन सरग नइ दिखय

पल्लवन- मरे बिगन सरग नइ दिखय

-----------------------------

पोखन लाल जायसवाल

        भारतीय मान्यता हे कि मनखे मरे के पाछू सरग नइ ते नरक खच्चित जाथे। हर मनखे के इही साध रहिथे कि मरे के पाछू ओला भगवान ह सरग देवय। अभी तक कोन ल सरग मिले हे, एकर जीता-जागता प्रमाण तो नइ हे। तभे पुरखा मन कहि गे हे - मरे बिगन सरग नइ दिखय। 

       भारतीय समाज म नरक अउ सरग ल ले के जेन सोच हे, जेन बिचार हे। ओकर ले इही कहे जा सकत हे कि सरग पाय या जाय के साध हे, त बने करम करे के उदिम करना चाही। घिनहा काम ले बचना चाही। कखरो अंतस् ल नि दुखाना चाही। कखरो अंतस् दुखाय ले बद्दुआ मिलथे। पाप-पुण्य के घड़ा म पाप भरत जाथे, एकर उलट नेकी करे ले असीस मिलथे, पुण्य बाढ़थे। पुण्य कमाय के रस्ता  बड़ कठिन होथे। जब कभू खाय ल बइठेन उही बेरा म कोनो लांघन-भूखन ह खाय बर माॅंगे आगे त अपन बाॅंटा के ल दे ल परथे। अइसन करना या कर पाना सबो दारी नि हो सकय। इही तरह ले सच के डाहर, त्याग अउ समर्पण के डाहर चले बर स्वार्थ ल खूॅंटी म टाॅंगे ल परथे। अइसन करे ले मन ल शांति मिलथे। मन सुख के अनभो करथे। सरी जग ह अपने लगथे, कोनो बिरान नि लगय। सब बर मया पलपलावत रहिथे। पाॅंव म काॅंटा नि गड़य। सब सुखी दिखथें। इही हर तो आय सरग के सुख। ए सुख बर अपन सरी जिनिस ले मोह छोड़े बर परथे। सब ल दाॅंव म लगा के सेवा काज करे बर परथे। अइसे कुछु जिनिस के दाॅंव लगाना अउ मोह छोड़ना बड़ मुश्किल होथे। मोर घर-बार, मोर बेटा-बहू, याने मोर-मोर के चक्कर म फॅंसे जीव भले खटिया म पचत रहिथे। रोज रोज के खटपिट-खटपिट ल सहत-सुनत नरक भोग रहिथे, तब ले ऊपर छवा इही कहिथे- भगवान लेगत नि हे। मरना मतलब अपन शरीर के मोह छोड़ना हरे। जइसे ही जीव शरीर के मोह छोड़थे फुर्र उड़ जथे। अंतस् ले मोह-माया भर के छुटत देरी रहिथे, भगवान के शरणागत होय च ले, भगवान अपन तिर बुला लेथें। भगवान के शरणागति होय ले जरूर सरग मिलथे। तभे तो लोगन मानथें कि शरीर छोड़े जीव सरगवासी होगे। 

          कभू-कभू सुने ल मिलथे - बड़ चौरासी भोगत रहिस हे, मर के बना लिस। नरक ले मुक्ति पागे। एकर मतलब तो इही होइस का? कि अपन मरे बिगन सरग नइ दिखय।


पोखन लाल जायसवाल 

पलारी (पठारीडीह) छग.

पल्लवन-साहजी के बइला कीरा के मरै

 पल्लवन-साहजी के बइला कीरा के मरै

-----------------------------------

 मनखे के ये सुभाव होथे के वोला अपन जिनीस बर आन के जिनीस ले जादा पिरिया होथे।ओइसने अपन जेब ले पइसा निकाल के---मेहनत ले कमाये धन ले बिसाये कोनो समान बर भले वो हा सस्तिहा अउ कम उपयोगी रइही तभो ले फोकट म मिले कीमती समान ले जादा पिरिया रइही---खुद के बिसाये जिनिस के जादा देख-रेख अउ कदर होही।

   ये बात ल कोनो विमोचन समारोह म मिले (बिना खरीदे) किताब अउ खुद के पइसा ले खरीदे किताब के उदाहरण ले बने फोरिया के समझे जा सकथे। विमोचन समारोह म मिले किताब ल तो कई झन पन्ना पलट के तको नइ देखयँ--पढ़ई के तो बाते ल बिसार दव। अइसन किताब मन अलमारी म भराय-भराय दियाँर के पेट भरे के काम आथे,नहीं ते रद्दी के भाव बेंचा जथे।

   एही तरा के दुर्गति साहजी म करे कोनो काम के तको होये के सोला आना कुशंका होथे। चाहे वो ह दू-चार आदमी मिलके साहजी म (साझेदारी म) करे कोनो बिजनेस होवय ,चाहे साहजी म करे खेती-किसानी होवय कुछ दिन बने-बने चलथे तहाँ ले मनमुटाव के लक्षण दिखे ल धर लेथे। अइसन साहजी के काम म सबले बड़े बीमारी कोनो जिम्मेदारी ल आन उपर टाले के,टालमटोल करे के अउ नुकसान के कारण आन ल बताये के होथे।

  अइसने एक काम अउ मिलजुल के करे जाथे जेला सहयोग कहे जाथे।सहयोग अउ साहजी म जमीन-आसमान के अंतर होथे। सहयोग ले बड़े-बड़े काम हो जथे---असंभव ह संभव हो जथे। सहयोग म कल्याण के भावना रहिथे,स्वार्थ नइ राहय,श्रेय लुटे के भाव नइ राहय।

 साहजी के बुता म स्वार्थ हावी हो जथे।दू झन किसान हे।दूनों सो एकके ठन बइला हे। एक ठन बइला म तो खेती के काम नइ हो सकय त दूनो झन सपरिहा बनके बइला मन के जोड़ी बनाके खेती किसानी करे ल धरलिन। एक झन ह अपन पारी म बइला मन ल ,खासकर दूसर सपरिहा के बइला ल मनमाड़े कोंच-काँच के,बेरा-कुबेरा रगड़ के काम लेके , बइला मन के जतन पानी म धियान नइ देके---ये सोचके के अब तो वो सपरिहा के पारी हे ,वो जानै,वो जतन-पानी करही --दूसर ल सँउप दिच।दूसरइया ह तको ओइसने रगड़ के काम लिच अउ बिना जतन-पानी करे ,वो जानै--अब तो वोकर पारी हे सोचके पहिली सपरिहा ल सँउप दिच। बइला मन कोंचई के मारे घाव-गोदर म बूड़गें। वो जानै---वो जानै के मारे जतन होबे नइ करिच। तेकरे सेती कहे गे हे--"साहजी के बइला कीरा के मरै।"


चोवा राम वर्मा "बादल"

हथबंद,छत्तीसगढ़