Tuesday, 12 November 2024

पियास* (बाल कहानी)

 *पियास* (बाल कहानी)


     महूॅं खेत जाहूॅं ग,.., नइ ग बाबू... महूॅं जाहूॅं ग! शिवा ह अपन ददा सन खेत जाए बर गोहराय।

ददा ह बरजत कथे...नइ जाय बाबु, कहां ऊॅंहा जाबे, घाम पियास मा।

नहीं, जाहूॅं!  शिवा रोम्हियाय लगिस।

नइ जाय रे वह डोंगर तीर जाहूॅं, कहत ददा ह रेंगे ल धरिस। लइका के मन मानय त!  रिसाके भिंया म घुलढइया मारे लगिस। अतका म महतारी कथे लेजा न! कुंदरा मेर खेलत रही। ददा ल अब जबरन शिवा ल खेत लेगे ल परिस। 

खेत जाके ददा ह अपन  बूता मा लगगे। अउ शिवा ह कुंदरा मेर खेले लगिस। 

      शिवा ह अपन खेलई के सुर मा रहय के झकनाके  पीछू डहर  मूर के देखिस, त एक ठन हइरना अउ ओकर नानचुन पिला तीर मा आय रहय। हइरना  मन बिकट पियास मरत रहय अउ धकर-धकर करत रखाय जुच्छा भॅंड़वा मन ल सुंघियात रहय। ए देख शिवा ह पानी वाले बाल्टी ल लाके आगू मा मढ़ा दिस।  बाल्टी के पानी ल हइरना मन सकसकउहन पी डरिन। पानी पी के  सांस थिराय लगिन। हइरना जात तो अब्बड़ बिचकनहा होथे। "मरता का न करता"  फेर लइकन के भाव बड़ कोंवर होथे, तेकर सेती शिवा मेर हिलगिस। शिवा ह हइरना अउ ओकर पिला ल देख बिकट मगन रहय। हइरना पिला संग खेले लगिस। कभू पिला ल कांदी पुदक के खवाय त कभू बॉंह मा उठावय। एती हइरना ह दूनो लइका ल सूॅंघय -चाटय।

        ठॅंउका समे मा शिवा के बाबू ह कॉंदी के बोझा ल रझाक ले पटकिस। हइरना झझक के भागिस। नान कन पिलवा कहाॅं भाग सकय। उही मेर  झझक मा गिरगे। शिवा ह पिला ल बॉंह मा उठावत अपन ददा बर चिल्लाथे... डरुहाके भगवादे!  हइरना बिचारी दूरिहा म खड़े होके नरियाय अउ अपन पिलवा ल देखय। फेर डर मा आ नइ पावत रहय।

       ए देख शिवा के ददा ह शिवा ल कथे... पिला  ओकर अम्मा मेर लेगदे बेटा, जा। शिवा ह पिला ल उठाय-उठाय  ओकर अम्मा मेर अमरादिस। तहाॅं पिला अमन महतारी सन धिरे-धिरे फुदरावत डोंगरी भीतर झूॅंझ मा घुसरगिंन। 

        हइरना मन के जाय के पाछू शिवा ह अपन ददा ले पुछथे... बाबू  बाबू! पिला मन मोर मेर पानी पीये बर आय रहिंन हे न ग?

ददा कहिस..हाव बेटा, जंगल मा पानी नइ होही त खोजत अइन हें। (बाप-बेटा मा सवाल-जवाब होय लगिस।)

त जंगल मा पानी नइ मिलय ग? शिवा पूछिस।

ददा बताथे.. बरसा कम होय मा नॅंदिया-नरवा जल्दी सुक्खा पर जाथे ग! ...त बिचारा जनउर मन पियास मा एति ओति भटकत रथे। 

       हइरना मन कालि अउ आही नही ग? शिवा पूछथे। ददा ह घर बहुरे के तियारी मा कांदी के बोझा बांधत कथे.. मॅंय का जानहूॅं ग, आही के नहीं? आही त परप्परे मा आही अउ पानी नइ पाही त ओइसने उहुट जही बपरी मन।

        अतका सुनके शिवा के मन फिकर करत भावुक होगे। शिवा ह लउहा-लउहा कुॅंदरा भीतर जा के बोर ल चालू करिस, टीपा-डब्बा मन मा पानी भरिस, अउ पिला मन आही त पियास झन मरय कहिके  पानी भरे बरतन-भॅंड़वा ल मढ़ाइस। तेकर पाछू घर आगय नान्हे शिवा।



देवचरण 'धुरी'

कबीरधाम 

9174346014

Monday, 11 November 2024

कहिनी // *करम के डांड़* // **************************************

 कहिनी           // *करम के डांड़* //

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               ' बोर्रा कोहांर कहत ले लागे ' दूरिहा-दूरिहा के मनखे मन जानय के ओकर बनाय माटी के जिनीस मरकी, हांड़ी, तेलई,करसी, ठेंकवा अऊ कुड़ेरा के जबर मांग रहय।' चइत,कुवांर म कलशा-दीया,अक्ती के करसी, बिहाव के करसकरवा,देवारी के दीया,आनी-बानी के खेलउना,मरनी-हरनी के ठेकवा अऊ मूर्ति घलो बनाय जेमा गनपति, दूर्गा दाई अऊ गउरा-गउरी।' बोर्रा के बनाय मूर्ति देखे म संउहत जीयत सदावे ' अऊ मूर्ति के आँखी तो सिरतोन के आँखी निहारत असन दिखे। ' बोर्रा के बनाय जिनीस चार-पाँच कोस ले शोर बगरे रहय '।गरमी के दिन करसी अऊ सुराही बांचे नी पावय।' माटी के जिनीस ओकर *जिनगी जिये के जरिया* रहय '।एतकेच भर नी रहिस भलुक सुग्घर गीत गावय ' जस गीत,फगुआ गीत,डंडा अऊ करमा नाचा के सुग्घर गीत गावय '।

             बोर्रा के गोसाईंन सहोदरा ओकर संग म सबो बुता करे दूरिहा खार ले माटी खन-कोड़ के लाने फेर ओला सुखावय अऊ छोटे-छोटे कूच-काच के खनाय खंचवा म माटी ल डारके ओला पानी म बने साने। मूड़ी म गघरी बोह के तरिया ले पानी डोहारय।ओकर दू झिक लइका,नोनी बड़े रहिस जेकर *फूलवा* अऊ बाबू के नांव *करमू* रहिस।फूलवा संवरेली पातर देंहे के गोल मुंहरन चुक-चुक ले जोगनी कस सुग्घर फबे अपन दाई के पानी म रहय,करमू घलो अपन ददा के उतारा रहिस नशा-पानी ले दूरिहा रहय बहंगर देहें।ओकर दूनों लइका घर के काम-बुता म भिंड़ जावंय।बोर्रा जबर सिधवा,सईताधारी मनखे रहय।'झूठ-लबारी ल तीर म चटकन तको नइ देवय।'

         ' बोर्रा के गाँव म खेत-डोली नी रहिस,ओकर नानचूक माटी के घर रहिस।' अँगना थोरिक चउंक-चाकर गोबर म सुग्घर लिपाय अऊ छुही म बढ़िया खुंटियाय रहे।माटी के जिनीस बनाके अपन परिवार के गुजर-बसर करे।फूलवा जादा नी पढ़ पाइस काबर घर के हालत ओतका जादा ठीक नी रहिस फेर करमू ल आघू पढ़ाय खातिर मिहनत करके एकक दू पइसा सकेलत गीस।करमू नान्हेपन ले पढ़े-लिखे म हुंशियार रहय,पढ़ई के संगे-संग खेल-कूद म घलो अउवल रहिस।" *नवा बिरवा के पाना चिक्कन होथे* "। करमू घर के हालत ल देख के आघू बढ़े के सपना सोचय।अपन मन म बिचार कर डारीस एक दिन मोला कलेक्टर बने बर हे।सपना ल पूरा करे बर *ठोसहा मिहनत अऊ लगन* लगा के ' लक्ष्य पाय बर पांव आघू बढ़ाय बर धर लिस '।

             गाँव के स्कूल म बासी खाके पढ़िस,हुंशियार रहे के खातिर मेट्रिक के परीक्षा म अउवल आइस।सरकार डहर ले छात्रवृत्ति पाईस।आघू के पढ़ाई करे बर साइकिल चलावत अठारा किलोमीटर रोजेच शहर जावय।कालेज के पढ़ाई-लिखाई के खरचा ओकर बहिनी फूलवा बनी-भूती करके सकेले पइसा ले हो जावय।कालेज के फाइनल म घलो अउवल आइस। "*भरोसा के अँजोर ल कभू कम होवन झन देवौ,अँजोर करे बर एकठन जोगनी काफी होथे "।*

                 सपना पूरा करे खातिर *मिहनत म मगन* होगिस।यू पी एस सी के कोचिंग करे बर दूरिहा दिल्ली जाय ल परही करमू थोरिक सोचे लगिस...एकर खरचा जादा लगही काबर के दिल्ली शहर म घर किराया अऊ कोचिंग फीस घलो लागही।फेर अपन के खरचा,खाना-पीना सबो ल गुने बर धर लीस अऊ अपन ददा बोर्रा ल सबो बात ल मन टूटहा बताइस..।कुछू करके बेवस्था करबो!..'बोर्रा पंदोली देवत कहिस.. '।अपन ददा के गोठ ले तो मने-मन खुशी होइस फेर घर कोती के हालत देख के करमू गुनमुनाइस।तैं दिल्ली जाय के तियारी कर अऊ अपन सपना ल पूरा कर !... हिम्मत बढ़ावत फूलवा कहिस। "*ठोसहा हउसला देखके मुसकुल घलो कमजोरहा पर जाथे*" ।अपन सपना ल सिरजाय बर दिल्ली जाबेच करहूं करमू मन म ठानिस।दिल्ली कोचिंग करे बर जाना रहिस उंहेच दूरिहा के नता कका दिलेसर रहत रहिस।जेन जघा म ओकर कका रहत रहिस ओकर *ठउर,ठीहा अऊ ठिकाना* के पता पूछके जाय के तियारी करे लागिस।

            दूसर दिन तियारी होके टेशन चल दिस टिकस कटाइस अऊ रेलगाड़ी समे म आइस ओमा चढ़के चल दिस।पहिली बार दूरिहा जाय म डर लागय काबर के कभू दूरिहा जाय के मउका नइ आय रहिस फेर सपना पूरा करे बर ओला घेरी-बेरी सुरता सतावत रहय...कोंचकत रहय...हुदरत रहय...।पहिली बार घर ले दूरिहा जावत रहय त डर तो रहबेच करही।घर म येती दाई-ददा संसो करत रहिन के हमर लइका पहिली बार अतेक दूरिहा जावत हे काय होही..कइसे करही... लइका ल कभू अकेल्ला नी छोड़े हन,एको घरी आँखी ओलम नी करे हन।खाय पीये बर कोनजनी कइसे करत होही।दाई के आंँसू ढरक गे दाई के मया तो आय...,' पिलहोरी गाय के बछरु ह अलग होथे तइसन लागत रहिस '..।येती करमू कइसनहो करत दिल्ली पहुंच गीस।

             करमू गाँव के लइका आय ओहा दिल्ली पहिली बार आवत हे कहिके ओकर कका दिलेसर गाड़ी टेशन लेहे बर आइस।...टेशन के बाहिर मुहाटी म खड़े अगोरत रहिस।सबो सवारी मन टेशन के बाहिर निकले लागीन।दिलेसर नजर गड़ाय सबो ल निहारत रहय।बपरा करमू अपन झोला-झंखर ल धरके निकलत रहय तइसनहे ओकर कका के नजर करमू ऊपर टप ले परगे देखते साथ झटकून ओला करमू.... करमू....चिल्लाय लागिस,फेर भीड़ म... आवा-जाही,हल्का-गुल्ला के खातिर करमू नी सुन पाइस।आघू बढ़े लागिस,फेरेच करमू...करमू..दिलेसर जोर से चिल्लाय लागिस...।दिलेसर के चिल्लइ करमू के कान म सुनाइस।करमू *अवाज ल ओरख* दारिस अऊ पाछू लहुटके देखथे त ओकर कका खड़े-खड़े चिल्लावत रहिस भीड़ ले बाहिर निकलके अपन कका के तीर आइस जोहार पैलगी करिस।ओला अइसे लागिस के *घनघोर जंगल के बीच पियासा ल पानी मिलगे* ओकर कका के संग रिक्सा बइठ के गोठ-बात करत घर पहुंचीन।

               दूसरवान दिन अपन घर के  थोरिक दूरिहा म एकठन घर किराया खोज दिस अऊ चेतइस कुछू जिनीस के कमी होही त मोला बताबे-'दिलेसर कहिस।'..' मूड़ी हलावत करमू हव कह दिस '।उंहा रहिके मगन होके तियारी करे लागिस।कोचिंग सेंटर म ओला बने जानकारी मिलत गिस।बीच-बीच म टेस्ट लेवय तेमा बने नंबर लानत जावे।अपन घर म मन लगाके पढ़े लगिस जम्मो कापी-किताब ल उलट-पलट करके सबो ल रट दारिस। *ठोसहा मिहनत,सही सोच अऊ धीरज से बड़का ले बड़का लक्ष्य मिल जाथे*।

             यू पी एस सी परीक्षा के तीन चरण होथे,पहिली प्रारंभिक परीक्षा,दूसरवान मुख्य परीक्षा फेर तिसरावन इंटरव्यू।करमू प्रारंभिक परीक्षा पास होगे घर कोती चिट्ठी लिख के करमू बताइस,येती घर के मन खुशी के अँजोर होगे। चिट्ठी म पइसा भेजे बर लिखे रहिस,बनी-भूती करके सिंघोरे पइसा मनिआडर करके फूलवा भेजिस..।करमू अपन तियारी म कोनों किसीम के कमी नी करिस अऊ मुख्य परीक्षा घलो पास होगिस।घर म फेर चिट्ठी लिख के बताइस के मुख्य परीक्षा पास हो गेंव।अब इंटरव्यू के तियारी करे बर लागिस।अलढेराही कभू नइ करिस,इंटरव्यू के तिथि घलो आ गे रहिस।

                  येती गाँव म करमू के दाई -ददा के तबीयत बिगड़े रहिस।करमू के पढ़ाई झन बाधित होही कहिके फूलवा ह करमू ल नी बताइस।पइसा कौड़ी के बिना ओकर दाई-ददा के ठीक से ईलाज नी हो पाइस अऊ जेन दिन करमू के इंटरव्यू रहिस उहिच दिन दूनोंझन के परान निकलगे अऊ सरग सिधार गीन।एकर खबर करमू ल नी बताइस काबर इंटरव्यू म कुछू अड़गा झन हो जाही कहिके।येती साहेब मन सबो के इंटरव्यू लेवत रहिस।करमू के पारी आइस जी धुक-धुकावत रहय,ओकरो इंटरव्यू लेहे गीस,सबो पूछे प्रश्न के जवाब सहीच-सही सुग्घर बताइस।थोरिक दिन के पाछू इंटरव्यू के रिजल्ट आइस त करमू पहिलिच नंबर म पास होगिस।ओकर खुशी के ठिकाना नी रहिस। *सफलता ठोसहा मिहनत अऊ संकल्प ले मिलथे*।

               ओकर पहिली नियुक्ति एस डी एम के रुप म होईस।तेकर पाछू ओला एकठन जिला के कलेक्टर बनाइस।कलेक्टर बने के बाद अपन गाँव आइस अऊ घर गिस घर म तारा फइरका लगे रहय।ओमेर के मनखे मन ल पूछिस त थोरिक दूरिहा म सड़क बनत हावे उंहे काम करे गेहे बताइस।तुरतेच बताय जघा म जाके देखथे त सड़क बनत रहिस उहीच जघा म फूलवा तगाड़ी बोहे गिट्टी मसाला अमरत रहय,ठेकेदार फूलवा ल डांटत रहिस तेला करमू दूरिहा ले देखत रहय फेर करमू चिन्हत नी रहिस,ओकर बहिनी फूलवा दूरिहा ले करमू ल चिन्हारी कर डारिस।..कतको झन करमू ल काम के जांच करइया साहेब आये हे समझत रहिन।...फूलवा दउड़त जाके करमू ल पोटार दारिस अऊ रोवत-रोवत *मया के आंँसू* के धार बोहावत सबो घटना करमू ल बताइस।करमू के आँखी ले घलो आंँसू के धार थिरकत नइ रहिस।

            करमू अपन संग फूलवा ल गाड़ी म बइठार लिस अऊ अपन के सरकारी बंगला म लेगिस।घर के सबो बीते बात अपन भाई ल फूलवा बताइस...।दाई-ददा ये दुनिया म नइ हे कहिके जानिस त करमू के *अंतस हदरगे* ओला जबर दुख होइस।ये सबो घटना ल मोला काबर नी बताय कहिके करमू अपन बहिनी फूलवा ल सुसकावत कहिस।जेन दिन तोर इंटरव्यू होवइया हे कहिके खबर मिलिस त तोर इंटरव्यू म कुछू अड़गा झन होही कहिके ददा कहे रहिस करमू ल झन बताबे तेकर सेथी नइ बतायेंव फूलवा रोवत-रोवत कहिस।थोरिक दिन के पाछू ओकर बहिनी फूलवा के बिहाव एकझन बढ़िया सुभाव के फूलसाय सरकारी नौकरी वाला संग करिस अऊ ओकर बहिनी के कहे मुताबिक *कलेक्टर करमू* घलो बिहाव करके अपन घर बसाइस *हर अँजोर के अपनेच छइहां होथे*।करम के लेखा पहिली ले नइ लिखाय रहे भलुक *करम के डांड़* खींचे बर परथे।

✍️ डोरेलाल कैवर्त "*हरसिंगार*"

        तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)

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राज्योत्सव अउ पुरस्कार

 राज्योत्सव अउ पुरस्कार

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एक नवम्बर 2000  म छत्तीसगढ़ राज्य बने रहिस।आज बाइस बछर होगें। हर बछर कोनो न कोनो क्षेत्र म बने काम करने  वाला मन ल पुरस्कृत करे जाथे। अलंकरण घलो देय जाथे। पहिली मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल म 16 ठन पुरस्कार देवत रहिन हें। रमन सरकार के बेरा म बाइस होगे। अब कांग्रेस सरकार के कार्यकाल म 33 ले 36 होगे। 


बाइस बछर म समझ म नइ अइस के सम्मान / अल़करण /पुरस्कार- देय के मापदंड काये। दिनों दिन येखर ऊपर सवाल उठतेच्च हाबय। अयोग्य मनखे अचानक अलंकरण के बेरा म योग्य हो जथे। फार्म भरे जाथे, फेर कब येखर तारीख आथे, अउ कब निकल जथे, पता नइ चलय! आधा झन तो इही कारण ले फार्म भर नइ पावंय। योग्य मनखे देखबे त गिने चुने रहिथें।


अतेक पुरस्कार/ सम्मान बर तो जूरी घलो कमती पड़ जथे। जेन क्षेत्र के सम्मान बर, मनखे चुनना हे, ओखर बर ओ क्षेत्र के जानकारी ले अनजान मनखे  ल ज्यूरी रखे जाथे। फेर ऊपर ले दबाव घलो आथे, के, इहि मनखे ल चुनना हे। कुछ तो जूरी के पसंद के मनखे भी रहिथे। योग्य /नापसंद मनखे बंदरबांट ले बाहिर हो जथे।

 सही बात तो  ये  आये-- ये पुरस्कार/सम्मानअलंकरण-- ह बंदरबाट ही होगे हावय!  


आवेदन कमती आथे, तब बाहिर के योग्य मनखे ल चुने के अधिकार जूरी मन ल हाबय। ये मेर अपन पसंद काम करथे। कोई जरुरी नइये, के हर जूरी ओ क्षेत्र के हर मनखे के बारे म जानत होही। येखर बर एक जानकार होना ही चाही। काबर के आवेदक के योग्यता के सच्चाई ल उही जान सकही। कलेक्टर के सील लगे आवेदन-- जमा होना चाही-- फेर अइसना नइ होवय।


इही कारण से कइ मनखे के चयन के बाद सवाल खड़ा हो जथे। सुंदरलाल शर्मा  पुरस्कार  ह  सदा विवाद म रहिथे। येखर मापदंड हावय साहित्य/ आंचलिक साहित्य बर पुरस्कार! साहित्य याने पद्य के संग - संग गद्य के साहित्य भी होना चाही। आंचलिक साहित्य म  छत्तीसगढ़ी, हल्बी, गोंडी बर भी सोचना चाही। एक बेर हरिहर वैष्णव जी ल मिले रहिस हे। बहुत खुशी होय रहिस हे। बाकी अभी दू बछर ले कवि ल मिलत हे। हिन्दी उपन्यासकार ल मिलिस। एक डाक्टर ल भी मिले हावय। ये सबके साहित्य के क्षेत्र म एक ही विधा हावय। का ये सब विधा म लिखने वाला मन गल्ती करत हावंय। छत्तीसगढ़ ल  एक अनिवार्य छत्तीसगढ़ी पेपर, देने वाला शिक्षाविद/विद्वान साहित्यकार- नइ होतिस त आज छत्तीसगढ़ी भाषा के लड़ाई ही शुरु नइ होतिस। आज छत्तीसगढ़ी म एम, ए,के कोर्स चालू  होगे हाबय। एखर प्रेरणा देवइया  मनखे ल तो, बला के सम्मानित करना चाही। बहुत झन छत्तीसगढ़ी भाषा के गद्यकार हावंय, एक बेर येखर मन के भी समीक्षा कर लेना चाही। हर बार सुंदरलाल शर्मा पुरस्कार विवादित काबर हो जथे? क्षेत्रीयता ल भी महत्व देना चाही। पूरा छत्तीसगढ़ के साहित्यकार ऊपर सोचना चाही। आवेदन नइ आवय, त काबर.नइ आवय? येखर चिंतन- करना चाही। संस्कृति विभाग ल हर अखबार म येखर आवेदन पत्र ल दू तीन बेर प्रकाशित करना चाही। 


संस्कृति विभाग के अंग आये राजभाषा आयोग ह! इंहा तो पूरा साहित्यकार मन के परिचय हावय। राजभाषा आयोग ले भी मदद लेय जा सकथे। आवेदन  ऊपर ध्यान देना भी जरुरी हावय। कइ बेर जानकारी मिलिस के योग्य मनखे फार्म भरे हावय फेर ओखर ले कमती योग्यता वाले ल पुरस्कार मिलगे। हर बछर एक नाम हवा म उड़ियाथे, अउ ओ ह उड़ा जथे ! अब तो लाला जगदलपुरी सम्मान घलो शुरु होगे हावय ,साहित्य / आंचलिक साहित्य बर। दूनों सम्मान के पापदंड म काय अंतर  रईही ?  येला स्पष्ट करना घलो जरुरी हे। सुंदरलाल शर्मा पुरस्कार वरिष्ठता के आधार अउ योग्यता के अनुसार होना बहुत जरुरी हावय। तभे ये पुरस्कार सार्थक होही!

सुधा वर्मा, संपादकीय, मड़ई देशबंधु, 6/11/2022

लघु कथा - " माता विसर्जन "

 लघु कथा -

    " माता विसर्जन "

 जस गीत चलिस l जगराता होइस l नौ दिन ले पूजा पाठ आरती होइस बिहनिया अउ सँझा l बढ़िया रात लाइट ले चकाचक जगमग जगमग l

     विसर्जन  के तैयारी l माता जी अब जाही अब इहाँ नई रहय l  

'नौ दिन बर तै आये दाई 

अब तोर करबो कइसे  बिदाई .. I "

"होवत हे विसर्जन हो... I "

मोला छोड़ के तै जावत हस 

मोर दाई..... I"

     डीजे म गीत बजत रहिस l कतको झन के आँखी ले तर तर आँसू झरत रहिस l रो रो के बिदाई करथे l

टेक्टर म देवी माता जी ल बैठारथेl चलो  बोलो -

'दुर्गा मईया की जै ' l उही बेरा.

दाई माई के भीड़ ले एक झन दाई आके रोवत रोवत चिल्लाके कहिथे -" कहाँ लेगत हव l"

" मय नई जी सकँव .. I "

"दाई बिना l ए मोर  दाई..I "

ओकर बिना... I" बिफ्ड बीफड़ के रोवई ल देख दू झन माई लोगिन मन काबा म पोटार के धुरिहा करथे l गत गरहन छिदीर बिदिर होगे l बही भूतही  कहे लगिन l समिति के डहर ले 

एक झन कहिस -" जाये के बर झोझा l हूम धूप  कराव l

देवी चढ़त हे l "

होम जग करवाइस l तभो ले कल्पई दाई के चलत रहिस l 

" मय कइसे करहूँ दाई... I"

"मय का करव दाई.. I "

"मय कइसे होगेँव दाई.."

"मोर बेटा मोला छोड़ दे हे दाई... I "

"मय कहाँ जाँव दाई... I " 

     बस कलपत रहिस रोवत रहिस l

देखते देखत अल्लर परगे l आँखी लड़यारे ल धर लीस l

माता के सवारी गाड़ी आघू बढ़त  गिस l भीड़ घलो अपन धुन म  आघू बढ़त गिस l 

       काबा म पोटारे  दू झन घलो  हलकान म परगे l 

" हमन फंसगेन वो l का करन अब l "

एखर कोनो करय्या देखय्या नई हे l" 

" रोवई चिल्लाई सब बंद, दाई निकलगे तइसे लागत हे l "

दाई के आँखी मुन्दागे l

माता दाई के घलो विसर्जन होगे l डीजे बजत रहिस 

" माटी के पुतरी दाई.....

माटी के पुतरी ओ... I"


 "अतके दिन बर आये रहेस दाई अतके दिन बर ओ... I "


नौ दिन के श्रद्धा भक्ति अउ दया मया बरसाने वाली माता के विसर्जन होगे l फेर ककरो मन म ना करुणा जागिस ना दया मया l 

जेखर कोनो नई रहय अइसने मौका ल देखत रहिथे

संग साथ ला छोड़के  अपन आत्मा विसर्जन कर लेथे

 दाई असन l 



मुरारी लाल साव 

कुम्हारी

फुरफुन्दी

 कहानी संग्रह सात लर के करधन के दूसर कहिनी --

फुरफुन्दी


चेरोटा बूटा मन के तो बूता पूरगे रिहिस। नोनीमन के कुदई—खेलई—दौंड़ई, खदम-खीदिम, खदम-खीदिम, कूदत-कूदत पीछा करत फुरफुन्दी के पाछू-पाछू।, कोनो किर्री पारत हें -ये दाई-ई, ए -ददा। मरगेवं रे हाय मयं तो मरगेवं .....एदे मोर हात मा अभीनेच्च धराय रिहिस अउ उड़ घलो गे गऊ........ दूसर कहत हे ये दे मोर घलो छूटगे वो....  त तीसर कहत हे छी .... रे ....मैं तो धरे नी पात हवं -----कहत-कहत खुसी के मारे चिचियावत ..... यहाद्दे मैं तो धर डांरेवं, मयं तो धर डारेवं खुशी के तो ठेकाना नईं। पुन्नी अउ ओखरे उमर के नोनीमन संग-संगवारी पारा परोस के .... बिधुन मताए हवयं। ऊँखर खुशी ला देखे अइसे लागत हे जनो-मनो फिलफिली  अउ फुरफुन्दी मन खुदे ऊँखर संग मा आगू-पीछू कुलकत छुवा-छुवउव्वल---खेलत हवें ए सोंच के कि नोनी मन आवयं अउ हमला धरयं नई ते धरे के उदीम करयं—अइसना सोंच के कि---


लीम के छईहॉ मा चंदा के बारी मा

फुरफुन्दी धरे बर आ जाबे ना |


पुन्नी के बाबू मंगल हर ब्यारा ले अभीनेच्च लहुँट के अंगना मा गोड़ ला मड़ाय हवय कि ठठकगे। ओहर देखत हे कि ओसारीम खटिया दसे हे अउ पुन्नी के ममा बिरजू (ओखर सारा) अउ एक झिन सियान संग म  -- अंताजी बाईस तेबीस बरस के टूरा जात बइठे हवय। -----ओखर ले थोरकिनेच दूरिहा मा पुन्नी के महतारी सरोज ठाड़े हे अउ अपन भाई बिरजू संग मा गोठियावत हे ----- के पुन्नी के बाबू मंगल ला देख के जम्मो झिन खठिया ले अउ के ठाड़ होगें अउ राम-राम पैलगी करे लगिन। तब तक ले पुन्नी के दाई दऊँड़ के माची ला लान के मढ़ा दिस अउसगा मन बर चहा पानी बनाये बर रंधनी डाहर चल दिस।


बिरजू एखर पहिली अपन दीदी ला अपन आये के जम्मो बात ला बता दिये रिहिस तभे तो चूलहा ला सिपचा के सरोज पहली ले चहा ला मढ़ा दिये रिहिसे कि पुन्नी के बाबू के घलो आये के बेरा होगे हवय आते सात ओला अउ सगा मन ला चहा पानी दे देहूँ। फेर ओखर कान हर बाहिरे डहर का गोठ-बात होवत हे तेखर ऊपर लगे रिहिस। बने सगा उतरे हे पुन्नी बर ..... ओखर बाबू को जनी का जवाब दिही।


बड़ अइबी बरन के मनखे त आय .....छिन मा बने त छिन म बिफर घलो जाथे जेला मानथे त वोला देंवता बना डारथे अउ नहीं त पथरा मानत देरी नई लगावय। पंचईती मा घलो सही नियाव बर जम्मो झिन संग म लड़ जाथे | छाती धड़के लगिस सरोज के ........ हाय दई मान जातीस त सबे बने-बने हो जातीस।


बिरजू एती अपन भांटो करा फसल के खेती किसानी हाल चाल पूछत-पूछत अपन असली बात मा आगे। पहिली तो वो हर किहिस-भांटो जी-एदे सियान हर शंकरलाल हर ए अउ कुम्हारी गांव के हर आय जेन हमरे गांव करा -----थोरकिन आधू म हवय----अपन काम बुता म  मोला--जाये बर परथे तिहाँ के पोठ किसान ए। इंखरो दू फसली खेती होथे अउ ए ऊँखरे बड़का लइका सुरूज आय एमन हमर भांची पुन्नी ला देखे बर आए हें-------- अउ रिस्ता के बात चलाना चाहत हें। फेर थोकन रुक के सांस भर के कहिथे --- वइसन तो एमन सियान सजन मन के संग मा अवइय्या रिहिन फेर मिही हर कहेवं कि मैं तो जातेच्च हवं। अभीन ले जादा झिन ला लेगे से का मतलब।


एमन बेटी तपासत रिहिन जी भांटो,,,,, त ठउका मोला भांची के सुरता आगे | सुरुज हर बारवीं पास करे हे घर के बड़े बेटा ए अपन बाबू ला खेती-किसानी म मदत करथे ... बस तयं हाँ कहिदे गा भांटो घर बार तो मोर देखेच्च हवे। मंगल बईठे-बईठे कुछु सोंचत हे |


सरोज तो टूरा ला देखके एकेदम मोहागे रिहिस -- घेरी-बेरी उही ला देखे अउ मने मन म खुस होके मुचमुचावय।  पुन्नी अउ पहुना के जोड़ी ओखर आंखी-आंखी म दिखय। मंगल हर का संसो मा मरत हे ए बात के घलो चिन्ता नई रिहिस ओला। ओला तो एके बात के भय खात रिहिस कि कहूँ पुन्नी के बाबू मना झिन कर देवय।


तब सियान जेन अतका बेर ले सारा भांटो के गोठ ला सुनत रिहिस कलेचुप बइठे तेन हर कहिथे .....

(शंकर) महू काहीं कहँव का सगा ---

मंगल कहिथे –अई कहव ना जी बिगन बताए गोठ कईसे आघू बाढ़ही 

–तब सियान हर कहिथे --एदे एहर मोर बेटा!!!!!!सुरुजआय एखर नांव कुम्हारी गाँव हमर गाँव ए। मोर अउ तीन झी लइका हवय गाँवेच मा पचास इक्कड़ के खेती धनहा हे अउ भाठा भूईयांघलो----- एखर पाठ के नोनी के बिहाव कर डारे हवं अउ दू झिन बेटा घर मा अउ हवें जेन ईसकूल जावत हें। 

थोकन थिराके सियान कहिथे ......अब तुमन सो का लुकाई जी,... सगा बनाना हे तब बताय बर तो परहीच्च ना। बात ए आय कि मोर इही बेटा के दू बछर ले थोकन जादा होगे हवे बिहाव होए रिहिसे मयं दूनो भाई बहिनी के बिहाव ला संगे मा करे रिहेवं। बेटा बहु मा एकोकन पटबे नईं करिस। बहु घेरी बेरी मइकेच जाय बर बिटोवय। अइसने-अइसने गोठ हर बाढग़े अउ आज दू बछर ले बहु हर अपन मइके मा बइठे हवय।

अब तो पुन्नी के बाबू मंगल हर सुकुड़दुम होगे वो कहिथें ना कि  ''काटव तो खून नहीं”वइसने हाल होगे ओखर। मने मन सोंचथे —एक तो मोर नाबालिग बेटी ला मांगे बर आये हवय ऊपर ले दूजहा ..... जानवं तो भला ईखर मन मा काय हे ..... अतका छोटे उम्मरमा बिहाव अउ छोड़ा-छोड़ी घलो होगे हे। मन लेय बर मंगल पूछथे ..... अइसन का बात होगे जी सगा! मोरो मन मा कतको सवाल उठत हे बने फॉर के बताहूँ तब मोर मन के जिज्ञासा थोकन थिराही? अब मंगल थोड़-थोड़ जान गये रिहिस कि कोन घर के बेटीला एमन छोंड़े हे फेर अपन डाहर ले सगा बतातीस कहिके मन लेये बर पूछतहे .....तब का होईस जी ?

सुरुज के बाबू कहिथे ....... अब काला कहवं जी एक ठी कलंक के बात त आय कोनो दू चार दिन के बात होतीस त लुकातेवं घलो ए तो जिनगी भर के बात ऐ ... बने सोंच के बिहाव कर देवं जी बेटा के ...... अब गलती काखर मयं हर अभीन ले नईं जान सकेवं ...... टूरा अलग झटके-झटके किंदरय त बहु के अलगेच्च रंग-ढंग।अपन गोसंइय्या ला देखे ले ओला जर चघा जावय। नान-नान लइका मन संग मा बिल्लस खेलय। मुड़ी मा ओखर लुगरा नई थहरत रिहिसे। लइका मन कस दूनों मारा पीटी हो जावयं। वइसने-वइसने गोठ बाढगे। ओखर बाबू आईस त संग मा जाये बर रोये लगिस। हमू असकटा गे रेहेन त पठो दियेन .... चार आठ दिन रहिके आ जाही कहिके फेर वो अपन बाबू के संग गईस त आबेच्च नई करिस! जम्मो झिन मना डारिन दाई-ददा पठो डारिन नईं ते नईंच्च होगे।

अब पुन्नी के बाबू के आघू मा जम्मो बात के खुलासा होगे रिहिस। सगा जब पूरा गोठिया डारिस तब अपन दूनो गोड़ ला माची मा बइठे-बइठे लमाईस जनो-मनो ओखर मुड़ी के ऊपर रखाय बोझा उतरगे वइसन ओ निच्छिन्त होगे। अउ अपन कनिहा मा खोंसे पुडिय़ा ला हेर के अपन गोसाइन सरोज ले चूना मंगाथे अउ हाथ के हथेली मा माखुर धर के बने मींज के सगा डाहर हाथ ला लमा दे थे। तब सगा एक कन उठाथे फिर बिरजू उठाथे तब मंगल अपन एक चिमटी उठा के हाथ ला झर्रा देथे। थोकन खांसथे, खखारथे तब फेर बात ला सुरु करथे |

बात ला सुरु करे के पहिली वो हर मुहाटी ला नाहक के घर ले बाहिर निकलके परोसी अंते ला बलाथे अउ ओखर कान करा अपन अपन मुंह ला लेग के खुसुर-फुसुर करथे अउ ओला कंहचो पठो देथे तब फेर भीतर अंगना मा आके अउ फुरसतहा गोड़ ला लमा के फेर माची मा बइठ जाथे। एती सगा मन अचरित होवत हें मंगल के बेवहार ला देख के कि अतका निछिन्त बेवहार कइसन करत हे। मोर बात ला सुन के कुछु कहे नइये,--------

एती मंगल अपन गोसाइन ला कहिथे ऐ सरोज सुन तो वो,-------सरोज जेन खुदे मंगलकेबेवहार ला देख के अचरज मा हवय आथे अउ पूछथे के काय ए जी ....... तब मंगल कहिथे—

जा तयं रंघनी डाहर अउ सगा मन बर घलो रांधडारबे आज ए सगा मन इहेंचरहीं एमन ला मयं काली पठोहूँ जम्मो झिन मंगल के मुँह ला बोक फार के देखत हें कखरो समझ मा कुछु नई आवत रिहिस। फेर सरोज मनेमन गुनत हे कि जरूर मोर पुन्नी के रिस्ता माढ़ जाही तइसे मोला लागत हे भगवान। ....... हे भगवान दूजहा हे त का होगे अतका सुग्धर लइका मालगुजार परवार धन  माल के कोनो कमी नइये घर बइठे भेठाय हे सोंचत वो हर जेवन बनाय बर चल दिस।

ओती पहुना मन बर जेवन चुरत हे अउ उती मंगल के गोठ बात चलत हे घर मा पहुना आये हवयं कहिके एको दू झिन परोसी मन घलो आ के बइठे हवयं। परोसिन आगी मांगे बर आईस त जम्मो झिन जान डारिन। पहुना अचारित होगे कि बिगन रिश्ता माढ़े कईसे जेवन बनवावत हे सगा हर |

मंगल हर पहुना शंकर ल अपन भाखा म मंदरस घोरे कस मिठास लानके पूछथे ..... कस जी सगा ---शंकर-- कहिथे -काय ए!!!

मंगल ....... तुमन तो मालगुजार अव ना अत्तेक खेती खार हवय तुमन मोला एक ठी बात ला बताहू ?

शंकर....... का बात के जवाब जी सगा पूछव ना! 

मंगल पूछथे....... जब तुमन धान ला बोंथव तब ओला अच्छा फसल आवय कहिके पहिली खातू डारथव पाछू समे-समे मा निंदाई, कोड़ाई, बियासी सब करथव.....

शंकर कहिथे.... हव जी ! 

मंगल अपन बातला चालू रखथे अब जब ओमा धान के कन्सा निकलथे तब धान ला बने पोट्ठ होके पाकत ले राखथव कि बिगन पाके झटकिन ओला लू देथव कच्चा धान ला।

शंकर कहिथे -----कइसे गोठियावत हव सगा तुमन घलोक...... भलूक कच्चा धान कोनो लूहीं। अरे फसल तो किसान के जिनगी आय ओला लइका संही जतने के बाद बिन पाके कइसे लू देबोजी शंकर थोकन कड़ा अवाज मा कहिथे। 

मंगल मनेमन कहिथे एईच्चे तो बात ए..... जेनला मयं समझाना चाहत हवं ! अब फेर मंगल के बोले पारी आ गे वो कहिथे.... उही बात ला तो मयं हर तुमन ला समझावत हवं। जइसन हम बिना समे आय ओ फसल ला नई लुवन तब फेर वो बेटा होवय कि बेटी वो मन ला समय ले पहिली पहिली काबर लू देथन | थोकन सोचव तो -- ---फुगड़ी खेले के दिन मा बेटी मन ला बाँगा-बाँगा भात पसाये के तइयारी कर देथन। खुडवा खेले के दिन बेटा मन परवार के रोजी रोटी के संसो म पढ़ई लिखई ला छोंड़ के बनी भूती कमाये ला धर लेथें । तेखर ले तो हमला चाही कि उनमन ला पहिली ईसकूल पठोके ऊँखर मन के इच्छा रहत ले पढ़ाये जाय तब जब बेटी अठारा के अऊ बेटा एकईस के हो जाही तभे बिहाव करना चाही अउ तूमन एकइस बाईस बछर मा बेटा के दूसरइय्या बिहाव के तियारीला कर डारत हव।

मोर नोनी अभी कोंवर पाना कस हे ओला मयं हर अभीनेच्च ले पेड़ के डारा ले झरे के उदीम नई करवं। भलूक तुमन गुसियाहू झन तब एक ठी मोर सुझाव हे मान लेहू त बने बात ए। अब बिरजू जेन मंगल के सारा ए जेन पहुना धर के लाने हे अपन भांटो के बात ला बोक फारके सुनत हे अउ सुनके सरमिन्दा घलोक होवत हे संग मा पहुना घलोक अउ ओखर बेटा सुरुज घलो।

मंगल फेर कहिथे तुमन अपन बेटा के बिहाव ला करेव तब तुंहर बेटा अउ बहु दूनो झिन नाबालिग रिहिन। दूनो के बाल बुद्धि रिहिस खेले खायके पढ़े लिखे के दिन मा गिरस्थी ला दूनो समझ नई सकिन। अउ अभी तो दूनो के तलाक घलो नईं होय हे त दूसर बिहाव के तो सवाले नइये ए तो कानून अपराध मानथे। अब तुमन सोंचव कि पहिली बहु बेटा के तलाक कराहू कि पहिली बहु लेगहू। जिहाँ तक ले मोर बिचार हे अभी घलो कुछु नई बिगड़े हे। तुंहर समधी तो मोर गोतियार ए दाऊ ----अउ मयं हर जानत हवं वोमन तुंहर पहल करे के अगोरा मा हवयं कि कब संदेसा आही कब बेटी ला ओखर अपन घर म पठो देबो ----–बिहाव के बाद बेटी अपन  घर मा सोभा देथे माय महतारी कै दिन के हर ए।

मंगल फेर समझावत हे परोसी मन हुंकारू देवत बइके हवयं। ए बीच मा दू अढ़ई बछर बीतगे हवय दुनो झिन बालिग होगे हवयं तुंहर बहू घलो घर के जम्मो काम बूता ला घलो सीख डारे हे अउ समझदार घलोक होगे हवय। सरोज रांध गढ़ के आके ओधा म ठाड़ होके सुनत रिहिस ओखरो आंखी खुलगे रिहिस।------मने मन वहू कहत रिहिस बने होगे दाई मोर बेटी पुन्नीके बात नई चलत हे वहू तो अभी नाबालिग हे जब तक ले वो अठारा के नईं होही मैं हर ओखर बिहाव नईं करवं। वइसने घलो पुन्नी अउ सुरुज के का जोंड़ एक ठी रतिहा के चंदा के निर्मल अंजोर अउ एक ठी दिन के राजा सुरुज । अभी तो मोर बेटी फुरफुन्दी कस छुछन्द हे एती ओती उड़त उड़त।

घंटा दू घंटा होगे ---- पहुना मन एती जेवन कर के उठे हवें ओतना मा एक ठी फटफटी मा अंतू अउ दू झिन अउ आईन। वो मन घर भीतरी आइन ---अवैय्या हर शंकर सियान ला पोटारलिस भेंट करे लगिन तब फेर सुरुल घलो नव के टप टप दूघांव पांव ला परिस। एमन सुरुज के ससुर अउ कका ससुर रिहिन।

कखरो बोलेके कोनो जरवतेच्च नईं परिस काबर कि मंगल हर ऊँखर आंखी ला खोल दिये रिहिस हवे अउ ओती अंते हर घला अवइय्या मन ला सबबात ला फोर के बता दिये रिहिस।

पहुना मन सब रतिहा सूत के बिहनिया उठिन त ऊँखर अंतस के भीतर के अंधियारी मेटागे रिहिस अउ सुरुज के संग मा नवा सुरुज अपन अंजोरी ला बगरावत मुचमुच हांसत रिहिस |

शकुंतला तरार

लघु कथा " पुतला दहन के बाद "

 लघु कथा 

   " पुतला दहन के बाद "


मंगलू  पूछत रहिस -" रावण जलिस ग  l "

टेचरू के टेचरही गोठ चलिस -" काबर जलही जी, पुतला के दहन होइस हे जइसे काली एक मंत्री के होइस हे l ओकर पुतला बना के चौक म जला दीस l अंड बंड बोल दीस समाज के ऊपर l कोन छोड़ही l ओइसने कसरहा करे हे दसहरा मनाये बर गड़िया दीस पुतला लान के रावण जलाबों कहिके l 

का? आतिस बाजी होथे कइथे न ओइसने फूट गे फटाका फड़ फड़ फड़ l"

" तोला तो मजा आइस होही बने रंगरेलिहा हस l देखे ला मिलिस होही सब बने बने ला l" 

     " त का l मजा ले ए बर तो मनाथे l रावण मरही त रोये ल जाथे सब? मजा ले बर  सब जाथे l

भारी भीड़, भीड़ के मजा अलग रहिथे l गोड़ खुनदावत हे वो चिल्लावत हे देखत नई हस अंधरा होगे हस चपकत हस गोड़ ला l"

मंगलू कइथे -"एखरे सेती मय धुरिहा ले देखेंव ,आगेव l बिगर चस्मा के धुरिहा के बने दिखय नहीं l"

टेचरु कहिस -" तीर के ला बने देखतस, है ना l 

राम दरबार तो धुरिहा म रहिस मंच म रावण सरकार तीर म रहिस l लील्ला करय्या मन खेल खेलथे l सकलाये भीड़ लील्ला नई देखय l"

मंगलू -" त काला देखथे? "

टेचरु -"सीता ला चोराये रहिस रावण ला l तेन ला देखथे lदस मुड़ी कइसे हे?

कइसे हाँसत हे?

मंगलू -"हमर इहाँ के गभरु अस उहू चोराये के लाये रहिस l ओला तो उही बाई कूट कूट ले कूट डरिस l लाने हस दे सोन के पुतरी,खिनवा l"

टेचरु -" एती ला कान धर या ओती ले कान धर l सोन के मिरगा नई दिखतीस त होतिस नहीं l सोना के लंका वाले  देखत रहिथे मौका ला l"

मंगलू कहिस -" सुने हँव ओकर टुरी कोन ला धर के भगागे? "

" काकर, पलटू के टुरी ल कहत हस?

" नाम लेना पाप हे भइया बिन जाने बिन देखे l"

"अरे साले तोतवा के टुरा हरे l 

तपत हे साले ह बाप के कमाई म बुगबुगी डांटे हे l पीछू साल जेल घलो गे रहिस l पैसा कौड़ी दीस होही जल्दी छूट के आगे 

निर्दोस बरी l आदत परगे हे चोट्टा साले के l"

मंगलू चुल्की मारत कइथे -" ओला कोन जलाही देखबो l बात तो आज नहीं तो कल खुलबे करही l" 

फेर दशहरा मनाबो गाँव म l

टेचरु हाँसत हाँसत  धरिस अपन साइकिल निकल गे l

रावण जल गे फेर ओकर गुन घर गाँव गली समाज देस राज म फैले हे l अवगुन  नई होवय दूर पुतला जलाये भर मl 


मुरारी लाल साव 

कुम्हारी

धार्मिक आयोजन अउ अंध बिश्वास "

 " धार्मिक आयोजन अउ अंध बिश्वास "

  नवा जुग वैज्ञानिक युग म अंध विश्वास के बजार चलत हे l अन्धविश्वास अउ भ्रम खतम नई होये हे l कँही न कँही ज्ञान के प्रकाश फैले म कमी हे l कारण बहुत अकन हे l बड़े कारण हे सही सोच अउ समझ के कमी l जुन्ना मैनखे के रहत ले चलही अइसन कहिथे l उहू बात गलत हे नवा पीढ़ी के लइका मन तंत्र मंत्र टोना टोटका ला  मान लेवत हे l 

 अतेक पढ़िस ज्ञान नई आइस l 

अंध विश्वास निर्मूलन समिति पहिली बहुत बड़े अभियान चलावत रहिस l साक्षरता अभियान के दौर म जागृति अउ शिक्षा के पहल होवत रहिस l ठंडा होये ले फेर गाँव देहात म शहर म बैगा मन के बजार बाढ़े ला धर लीस l बाहिर ले कम भीतरी भीतरी 

बढ़त हे l क़ानून बने हे तभो 

रीति रिवाज परम्परा ले सह मिलत हे l संस्कृति संरक्षण के आड़ म पैठ जमाये हुए हे l आस्था अउ विश्वास के साथ खिलवाड़ झन हो कहत हन भरम भूत अउ विधि विधान के परम्परा ल मानत जघा मिले हे l एक उदाहरण अभी सुने म मिलिस  सेत जंवारा अउ मारन जंवारा l जंवारा बोथे बैगा घलो होथे l देवी माई के पुजारी  बैगा होथे l टोनही अपराध  क़ानून बने हे तभो ले बैगा मन नई मानय l अउ इही बताथे  आज भी भूत प्रेत टोनही हे l पता नई चलय कोन टोनही हे l टोनही महिला मन होथे उहू मन मंत्र सीखे रहिथे जोत जंवारा ल बूता देथे l भंग हो जथे मनौती पूजा काम l एला सब सही मान लेहे l अउ दूसर बात आघू म आइस पुरखा ले चले आवत हे तोड़ देबो नियम धीयम ला नुकसान पहुँचाही ए डर समाये हे l मारन वाले मन कुकरा बोकरा के बली देके पूजा पाठ करथे l जीव हिंसा ले देवी  ल मनाना उंकर मानता म हे l दुर्गा मढ़ा के सार्वजनिक पूजा आरती होथे उहें एक झन पंडा बैगा रखथे l पंडाल म महिला मन बर चढ़ना अउ मूर्ति ला छूना  वर्जित रखे  जाथे  काबर? माई घलो नारी ए l नारी मन बर छूत दृस्टि गलत धारना लेके चलना अभी के सभ्य समाज म शोभा नई देवत हे l अउ बात औरत मन छुतही  अउ कोनो कोनो टोनही होथे l खुल के नई कहय फेर कारण अउ सोच इही हरे l 

(  क्रमशः)

आघू आप मन के विचार 


मुरारी लाल साव 

कुम्हारी